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Full text of "Harivamsha Purana (Supplement to Mahabharata)"

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+. | . . ञश्नमौ भगवते चासुदेवाय . ` र | 
 , -." ` श्रीमन्महर्षिं बेदव्यासप्रणीत,. ` 
महाभारत-खिलभाग हरिवंश | 
। . (ओरीहरिवंशपुराण).. . 
. ईहिंदी-टीकासंहित 


© 


टीकाकार-- 


+ पण्डित रामनारायणदत्त शास्त्री पाण्डेय "राम" 


ए) € %0ा) 211 पाण्ड्वा ८४ 
प्श 2851384 025 (पा) 
011 04 ऽ €ला10€' 2014. 


प्रकाशक--गोविन्दभवन-क्छार्यालय, गीताप्रेस, गोरखपुर | 


सं० २०२४ से २०४९ तक ५७,००० 
सं° २०५२ आटवोँ संस्करण ५,००० 
योग ६२,००० 


मूल्य--एक सौ रुपये 


मुद्रक--गीताप्रेस, गोरखपुर-- २७३००९५ 
फोन : २३३४७२१ 


ॐ श्रीपरमात्मने नमः 


1 र 
4 


नरोत्तमम्‌ । देवीं सरखतीं व्यासं ततो जयघरुदीरयेत्‌ ॥ 
व्यासाय विष्णुरूपाय व्यासरूपाय विष्णवे । नमो वै ब्रह्महृदय वासिष्ठाय नमो नमः ॥ 


=, 


नारायणं नमस्ृत्य नरं चेव न 


हयिंश-टीकासरहित 


2 


वन्दे ॥ 


सुमङ्लाधारम्‌ । 
जो विन्नोका विनारा करलेमे दक्ष, भक्तिके चरम रक्ष्य शौर प्रम 


बृन्दावन जिनकी विहारध्यटी है, उन 


श्रीगोपीगणपति ( गोपीवलम श्रीकृष्ण ) की मेँ बन्दना करता द्र | 


पीगणपत्तिकी चन्दना 
भक्तेः 
श्रीगोपीगणपरतिं 


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॥- (= ध राण 
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नि प्राथना 


नमो भगवते तसै वासुदेवाय चक्रिणे। 


नमस्ते गदिने तुभ्यं बाघुदेवाय धीमते ॥ 

ॐ नमो नारायणाय विष्णवे प्रभविष्णवे । 

मम॒ भूयान्मनःशद्धिः कीर्तनात्ते केशव ॥ 
जो षड्विध देशर्से सम्प, सरवन्यापी देवता तया चक्र धारण क्रने- 
वाङ है, उन भगवान्‌ श्रीहर्कि नमस्कार है । जिनके हाथमे कौमोदकी । 
सुमित दहै, उन परम बुद्धिमान्‌ आप वासुदेवको नमस्कार है ! जो 
प्रमावराटी, सर्वत्र व्यापक तथा सच्चिदानन्दस्य दहै, उन नारायणदेवको 
नमस्कार है । केरा | आपका कीर्तेन करनेसे मेरा अन्तःकरण शुद्ध क्षो जाय | 

"494 


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श्रीहरिः 


प्रथम संस्करणकी भूमिका 


हरिवंश वेदार्थ्रकादाक महाभारत प्रन्थका ही अन्तिम पं है । आादिपर्वके अचुक्रमणिकाध्याय्े 
महाभारतको सौ पर्वौबाखा भ््थ वतराया गया है । उसके अन्तिम तीन पव॑ इस हरिवंश ध्न्थमे ही सम्मि- 
लित है । यह बात अनुक्रमणिकाध्थायम स्पषटरूपसे निरिं है- 


हरिवंशस्ततः पव पुराणं खिखसंक्षितम्‌ । विष्णपवं शिदोश्चर्या विष्णोः कंसवधस्तथा ॥ 
भविष्यं पर्वं चपप्युक्तं खिरेष्वेवांद्तं मत्‌! पतत्पर्वंशतं पूणं व्यासेनो्त' महात्मना ॥ 


( महामा० आदिपर्व, अध्याय २] ८२-८३ ). 


जसेःवेदविदहित सोमयाग उपनिषदौके धिना साङ्ग सम्पन्न नही होता, वैसे ही ध्रीमहाभारतका 
पारायण भी हरिवंदा-पारायणके विना पूणं नहीं होता कितु हसिवंशका पारायण गीता भादिकी तरह खतन्घर 
, भी किया जाता है । इख तरह यह "पुराणं खिलसंक्षितम्‌' आदिव (२। ८२ ) के आधारपर “हरिवंश 
पुराण" तथा हरिर्वंशपव' इन दोनो ही नामोसे विद्धानोके बीच चिस्यात है । 


युज-प्राप्तिकी कामनासे हसरिवंशा-्रवणकी परम्परा भारतम चिरकासे भरयल्ित ह । विशेषकर यदि 
जन्मङ्ण्डलीमे संतानभाव सूरयके द्वारा दृष्ट, भाविष्ट या बाधित हो तो हरिवंश्य-ध्रवण ही उसफा पतिक्षार 
वतखाया गया है-- - 


# इसके अतिरिक्त निम्नर्खित प्रमाणे भी इरिवंश् महाभारतका गङ्ख सिद्ध होता है- 

१- इरिवं शपे ३० “अभ्यायत -'यथा ते कथितं पूवं मया राजधिषतमः इसके द्वारा वैशम्पायने _ मादिपर्वखय 
पूर्वोक्त ययातिकी कथाका स्मरण दिलाया है भौर उसके ल्यि "कथितं पूर्वः पदे कहे जानेकी नात कदी है | इससे दोर्नोकी 
एकम्रन्थता स्पष्ट हे । 

२-श्सीके ३२ मष्यायमे शत्वं चास्य घाता गमंस्य सत्यमाह शङ्कन्तरा कहा गया है । आकावाणीने श्न्तराके 
भिख कथनकी बति कदी ह, बह मेदाभारतके आदिप्व॑मे दी ३ । 


इ-भविष्यपर्वके ७३ब मध्यायम नो मगवोन्‌ शीकृष्णके कैलास-गमनका कारण पूढा गया है, वह भतुश्यासनिक्‌ 
पर्वे संधित कैरव-गमन इृत्तको क्य करे दी पू गया दै । इती प्रकार जर भी कर उदाहरण दै । 


५ 


(४ ) 
वंशान्तो हरिखप्णगो धिपुराान्ने भूसुते रुद्रियं सौम्ये सम्पुखकां स्यपाधविधिवन्जीवे च पित्यातिथिः 1 
शे गोषतिपालनं च कथितं मन्दे च श्तयनयः षन्याद्गनमुजङकेतुकपिलाः संतानसौष्यमद्‌ाः ॥ 
( बृ्तारशरदेराश्याल्, पूवखण्ड १६1 १४७ ) 
श्रवणं हसिविद्रास्य कर्ते्यं च यथाविधि । ऊहुयष्च दशांद्ेन दूर्वामाज्यपरिष्टटुताम्‌ ॥ 
( मन्वमक्षणैव, बृद्सुयौर्णव ) 
यौ भी दृसदे श्रवणकी षटुत मिम दै । जो फल अठारह पुसणोफे खुननेसे मिरुता है, वह केले 
हरिवंशे खुननेखे हो जाता दै-- 
अ्दृ्पुखणानां श्रवणाद्‌ यत्फलं रभेत्‌ । तत्फलं समवाप्नोति वैप्णवो नात्र संदायः 1 
( मविष्यपरवं १३५ ।४) 
अगवद्धक्ति तथा कथानककी ण्स भी दसका वड़ा महच्व है । भगवान्‌ श्रीरृप्णसे सम्बद्ध तथा 
अन्यान्य अगणित कथा दसम पेली दै, जो अन्यत्र नी आर्य 1 
पारायण-करमसे इसके जवाहका ही विधान है ! उसकी पूरी विधि इस ब्रन्थके अन्तम दे दी गयौ 
हे 14 केवर नवाद-पारायणके विश्नामस्थर नर्द दिये गये दँ 1 वद %त्यसार-समुध्वय' भ्रन्यके २२५ 
ृष्पर इस प्रकार वतसाया गया है-- 
थमे यदुवंशस्य कीर्तनावधि कीर्तयेत्‌ । द्वितीयेऽदहवि पचेद्‌ विद्धान्‌ घेचुकस्य चधावधि ॥ 
जरासंधवधं यावत्‌ ठतीयेऽदवि विचक्षणः । पारिजातस्य रणं चतुथेऽह्ि थकीतेयेत्‌ ॥ 
सेन्यभद्धः हाम्धरस्य पञ्चमेऽदि प्रयज्लतः। जनमेजयस्य वंशस्य भविष्यस्य च चणंनम्‌ ॥ 
पष्ठेऽह्वि तावद्धक्तन्यं पारायणल्यभेच्छुना । स्मे दैत्यसैन्यानां विस्तारो यावदेव दहि ॥ 
धण्टाकणीसमाधिस्तु बष्टमेऽद्नि भ्रयलततः । नचमेऽह्वि समाप्तिः स्यात्‌ पारायण उदाहतः ॥ 
इसके गनुखार प्रतिदिन क्रमशः हरिवंरापवेके २५, विष्णुप्वके १३, ४३, ७३, १०६ पं भविप्यपर्वफे 
२, ५०, ८० तथा १२५ वे सध्यायपर विश्राम करना चादिये । 
पक दूसरा क्रम इस धकार भी वतखाया गया दै-- 
प्रथमे ङृप्णजनन द्वितीये घेलुकादंनम्‌ । तृतीये इण्डिलपुरे रुविमणीहश्णं तथा ॥ 
चतुथे पटुपुस्वधमार्यास्तोज्नं च पश्चमे । मधोश्चरिजं षष्ठे वै सपमे पाचकस्तुतिः ॥ 
अष्टमे पौण्डकवथो न॑वमेऽल्वि समापयेत्‌ । वाचयेदनया रीत्या दरिर्वंरं यथाक्रमम्‌ ॥ 
सर्थं स्प्ट है। इस रमम थोडा सा अन्तर है । तदद्ुसार प्रतिदिन हरिवंशपयेके ३५ विष्णुपवंके १२, 
७२, ८२, १२० तथा भविषप्यपर्वके १२, ६२, १०१ तथा १२३५ अध्यायपर विधाम करना चाये 1 
खतरा भगवानपि रपासे मद्यभारतके साथ हरिवंशका भ्रकाश्न-कारय पूरा हुमा । धार्मिक सदाचारः 
परायण जनताके छुविधार्थं यह उसकी सचि, सरीक तथा सजिव्द्‌ भरति थकगसे भरकादित फी जा रही है । 
इसके अन्तम सन्तानगोपाल -मन्की भयुष्ठान-चिधि, इसके कई प्रकारः संतान-गोपाक-स्सोघ्र, यन्तर तथा 


विष्ण-श्तनाम-स्तोच्र-ये सव खरीक दे दिये गये हँ 1 आद्या है भरेमी पाठक-पाटिकर्पि न सववसे राम 
उखायेंगे 1 दिवमिति दिक्‌ । 


विनीत जानकीनाथ शर्मा 


$= 


# (नुठान-यरकास' के २८६ के धर भी इसिविंश-भवणकी संहित विधि दी गयी द | 


भीरि 


सदीक महामारत-खितमाग हिवंशकी सम्पण विषय-सूची 
( दरिवंशपवं ) 


अध्याय विषय पृष्ट-ंख्या अध्याय विषय पृष्ठसंख्या 
१-मङ्गलाचरण, शोनक-उग्रभा-संवाद्‌, बृष्णि- ११ -दर्ववथका वणन --" -“ ५१ 
बंशिर्यौका विस्तृत चरित्र सुननेके ल्य जनमेजय. १६-भाद्धकस्य-जनमेजयद्वारा पिताका भद्ध तथा पितू- 
की प्रार्थना ओर आदिखष्टिका वणेन " स्वसूपनिर्णयसम्बन्धी प्रद, शन्तनुका यपने 


२-स्वायम्मुष मनुके वख भौर दश्च प्रनापतिकी भद्धमे स्वये हाय बहकर मीष्मसे पिण्ड मगना ५५ 
उस्पत्तिका वणन ०“ ५ १७-पितृ्कल्य-मीष्म-मारकेण्डेय-देवाद ओर माकण्डेय- 
३-दक् प्रनापतिद्वारा दष्टि-विस्तार, नाखनीका लीके साय सन्कमारणीकं बातचीत ति “ द 
दक्षे पुरोको बिरक्त कर देना, दश्चकी साठ १८-पितृकल्य-मारकण्डेध-सनत्कुमार मितरोके 
कन्याम ओर उनकी संततिका वण॑ , , ९ गण, लोकं, शक्ति ओर कन्यार्मोका वणन तया 
४-प्युका उपाख्यान-राज्यवितरण ओर दिक्पाल. ` धितरोके पमावको देखनेके लि माकेण्डेयजीको 
~` की प्रतिष्ठा -*> १८ दिव्य दृ्टिकी प्रायि ००” ^” ६१ 
५-प्थुका उपाख्यान--वेनका अत्याचार करके १९-पितृकल्प-मरदाजके पूर्वाकी कथा, योगम 
न्ट होना मोर प्रधुक्ा जन्म तथा चसि्रि ˆ“ २० , ुर््षोकी गति, योगसिदधिके भधिकारी पुररषोके 


यनी क्षण तथा माकंण्डेथ-षनत्छुमार-संबाद्की 
दै-पथुका उपाख्यान-पृथ्तीका पृथुकौ पुत्री चनकर समासि ००, ~.“ ६७ 


अनेक प्रकारके दुघ देना तथा अनेक पातरौ एवं , 
२०-पितृकस्पय-जहदत्त ओर उग्रायुवके वश्च तथा 


दुहनेवालका वणन १८१ २४ ९ 
पूजनीया चिं ० , 
-मन्वन्तर, मनु, देवता भौर ऋषि्योका परथक्‌- ९ यादार शकरनीतिका चणन ६८ 
पथक्‌ वर्णन । २८ २१-पिव्रकल्प--माकंण्डेषजी दवाय शाद्धकी महिमा- 
<~चारो युगो, मन्वन्तर ओर ब्रह्माजीके दिन एवं का वर्णन, श्रादधके रषे कोिकपुवोको उत्तम 
वषका मान ००१ ३३ जन्मकी प्राप्ति ११ ००० ७७ 
वैवस्वत मनु, यम, यमी ( यमुना ), अभश्िनी- २२-पितरकल्प--श्चचिवाक्‌ पश्चीका स्वतन्न भादि 
मारौ प्वं शनैश्वरङी उत्पत्ति ~~ ३६ तीन पक्षरयोको शाप देन सुमना पक्षीका 
१०-वैवस्वत मुके वंशजा वर्णन ओर पुरूखाकी अनुप्रहपूवंक उन्द शापे मुक्त करना ८० 
उरपत्ति ^“ =“ ८० २ ३-दंसका काम्पिल्यनयर्से ब्रह्मदत्त आदिके रूपमे 
११-घुन्युमारकी कथा , ०५ ५३ उत्पतन होना मौर चार दंसौका अपने पितासे 
आशा लेकर मुक्त हे जना ^ ८१ 


१ २-धुन्धुमारे वंशकरा वणन ओर गाल्वक्ी उप्त ४७ 


१३ -्रिशङ्कके चरित्रका वर्णन तथा उनके वंशे र४-विभराजका ब्रह्मदत्त पुत्र बनकर उत्पन्न होना, 


दरिद्र आदिका उत्पन्न दोना --~ "-- ५८ रानी संनतिका मह्यदत्तसे रूटना, एक नद्षणके 
कहे दए. दटोकोसे ब्रह्मदत्त, पाश्चाव्य ओर 
१४-घगरफ़री उपति ओर चरित्र तथा सगर-पुत्रौके कण्टरीकको अपने ू्वजननका शान होना तथा 
1 + 001 ७०१४ 
उन्रोगसे समुद्रका "सागरः होना ५९ , त्रहमदत्त दिका तप कक मुक्त हो जान! “~ ८३१ 


कैः 


( २ ) 


२५-चन्द्रमाकी उ्पत्ति गौर राजदुय यच्च, देवपुर 
संम्राम तथा बुघकी उत्पत्ति ˆ“ ८६ 
२६-मद्टारान पुरूरवाके चस मौर वंशका वणेन, 
राजा पुरूरवाका तरेताग्निकी रचना करना र 
गन्धि लोकम जाना -“ °“ ८९ 
२७-पुरूरवाके द्वितीय पुत्र अमावस वंशका वर्णन, 
विद्वामित्र गौर परश्चरामकी उत्ति ˆ“ ९२ 
२८-राजा रजि ओर उनके पूर्वोका चरित, इन्रका 
यथने स्थानवे भ्रष्ट होकर पुनः उसपर प्रतिष्ठित 
होना ००१ ००१ ९६ 


२९-भनेनाके वंशाफा वणन, धन्वन्तरिका काश्चिराज 
धन्यके यहो पुचरूप्म अवतार दिवोदाखके राण्य. 
काल्प भगवान्‌ शिवकी आश्शसे गणेश्वर 
निकुम्भके द्वारा गररणष्ठीको लनञयूल्य बनानेका 
प्रयल, वहो दिव ओरं पार्वतीफा मिवा, 
दिषोदासका वाराणसीपर अधिकार मौर अलक. 


फी प्रशंष "^ “““ ९९ 
२०-नहूष एवं ययातिके वंशकरा वर्णन तथा ययातिका 

चरित [क 3। ००० १ [91 
३१-पूरुकी वंशपरम्पराका वर्णन = “** “ १०८ 


२२-पूषके वंशके अन्तर्गत प्यृचेयुङ्गी वंशपरम्यरा- 
अनमीटवंश, पाञ्चाल एवं सोमकृवंश, कोरवर्वंश्च 
तथा तुषु दुह्य ओर अनुक संततिका वरण॑न--‡ १११ 
३ रे-यदूवंशका वर्णन, कार्ववीर्यकी उत्पत्ति एवं 
चरित्र तथा पचो यथातति-पतरौके वंश-वर्णनके 
भवणकी महिमा ५ "० १९७ 
२ ४-दृष्णिवंशका व्णन-अकरर वघुदरैव, कुन्ती, 
` सात्यकि, उद्धव, चसदेष्ण, एकरव्य आदिका 
परिचय “"“ ५ १२१ 
२५-भीङृष्णक्रा भवतार लेना, शी्ष्णके अन्य 
मडवन मोर कुट्भ्वर्योका वर्णन तथा काल- 


यवनक़ी उलि + ~ १२४ 
६६-करो्टाके वंडका वणेन, पुरोदितके गोत्रे क्षत्रियो - 

के गोच्रका बदल जाना *““ "“ १२६. 
२७--अभुवंशका वणन ५ = १२८ 


३८-मजमानक वंशा वर्णन ओर स्यमन्तकमणिकफी 
[व 
३९ -त्वम्क्मणिके कारण प्रेन, षनालित्‌ गौर 
, शतघन्वाका मारा लाना, बल्टेवजीका दुर्योघनको 
गदाःविद्रा चिखाना, अनूरीका श्रीङृप्णको 
मणि देना जीर. श्रीकृष्णका पुनः अकूरको मणि 
लोटा देना “^ ““ १३५ 


[1 1११, 


१२३९१ 


४०-ननमेनयका भगवान्‌ङ्े वराद, दिह परड्- 
राम, श्रीकृष्ण सादि अवता्योका रदस्य पृषटना"-*१३८ 
४८१-भगवान्‌ विष्णुफे वाराह, दर्धिद, वामन, दत्तात्रेयः 
परश्चरम, भीयामः भीकृष्ण, व्या तथा कर्कि 
अवत्ारौकी संक्षि कथा ˆ“ “ १४५ 
४२-मगवान्‌ विष्णुके ईशवरत्वका वणन प्व अद्ुत 
तारकामय संग्रामकी कया  -*“ ˆ“ १५६ 
४३-देवतार्भोफे खाय युद्धके व्यि उदयत दुई दैतय- 
सेनाका वर्णन ^ "^ 
एथ-आश्वयतारकामय संग्रामम देवपेनाकी युद्धफे 


लिय दैयारी ०० ११०१ 


४६-देवापुर-संग्राम एवं भौर्वं मनििकी उत्पत्ति 


१५९ 


१६१ 
१६५ 
४६-दन्द्रद्राया चन््रमाकी स्तुति) चन्रदेव भौर वसण- 
देषके द्वारा दैत्य-सेनाका संहर, मयद्‌नवदार 
मायाका प्रयोग, पचन मोर सग्निदेवका दैत्य-ठेना- 
के खाय संग्राम भौर कालनेभिका रणमे आगमन १७० 


४७-कालनेभिका युद ओर प्रमावर "° १७५्‌ 


४८८-काटनेमि ओर भगवान्‌ विष्णुका संवाद, भो- 
विष्णुदरारा काल्नेमिका वघ त्था देवताभोको 


आश्वासन देकर ब्रह्मलोको प्र्यान १७९ 


४९-त्रह्मलोकमे भगवान्‌ विष्णुका वकार `** २८५ 
५०-नारायणाधरम्ने भगवान्‌ विष्णुक्ञा शयन ओर 
उत्थान तथा पाख मवि हुए ब्रह्मा आदि 


देवताति उनके भगमनका प्रयोजन पूना १८७ 


५१-त्रह्माजीका भगवान्‌ विष्णु. जगत्की वतमान 
अवस्थाका वणन करते हुए पृष्वीका भार्‌ - 
उतारनेके ल्यि मन्रणा करनेका अनुरोघ --` १९१ 


| 


( 


५२-मगवान्‌ विष्णु तथा स्र देवतार्ओका मेरपवतकी 
दिव्य खम्भ उपष्थित होना भौर वों पृथ्वीका 


} 


५४८-मगवान्‌ विष्णुके भ्रति देवि नारदका व्चन- 
मूलोककी वतमान अवस्थाक्रा परिचय देकर ' 
भगवानको अवतार ग्रहण कंरेके ले प्ररित करना २०३ 


भगवान भार उतारे ल्यि मर्या ५५-भगवान्‌ विष्णुके द्वारा नारदनीके कथनका उत्तर 
करा ˆ“ `  ¶र् तथा ब्रह्माजीका भगवान उनके अवतार सेने 
५३-्रह्याजीकी आशाते देवतार्भोका अंश्ावतरण "ˆ १९८ योग्य खान ओर पिता-माता आदिका परिचयदेना २०९ 
[1 १ ¬ ग्ण 
[^ ५ 
` ( विष्णुपवं ) 


१-मज्गलाचरण, नारदजीका मथुरामे आकर कंसको 
अनेवाले मयकी बचना देना ओर कंसका गपने 
सेवकोके सामने बद-ब्रदुकर बति बनाना ““““ २९३ 


र्-कंसद्रारा देवकीके ग्भके विनाशका प्रयत्न, 
भगवान्‌ विष्णुका पाताललोक्म स्थित (षड्ग्मः 
नामक दैर्येकि जीवोका आकषण करके उन निद्रा 
देवीके हाथमे देना गोर देवकीके ग्भ॑मे क्रमशः 
स्थापित फरनेका आदेश देकर अन्य कर्त॑न्य बताना 
तथा कार्यषाधनके अनन्तर बदनेवाली उस 
देवीकी महिमाका उस्टेख “° २१५ 


३-आययाकी स्तुति ०“ “ २१९ 


७-कंसद्रारा देवकीके नवज्नत रिश्युओकी इत्या, 
योगमायाद्वारा सातवें गभ॑का संकषण, श्रीकृष्णका 
प्राक्स्व ओर नन्दभवनमे प्रवेश, कंषद्ारा नन्द्‌- 
कन्याको मारनेका प्रयल अर उसका दिव्य रूपमे 
, दशन देना, कंसद्वारा क्षमाप्रार्थना जर देवकी- 
दवारा उसे क्चमा-दान *" ˆ“ २२२ 
५-वमुदेवलीका नन्दको व्रजे टोटनेकी सम्मति 
देना ओर नन्द्जीका गोत्रजकी शोभा निहारते 
हुए वहाँ पधारना ॥ “*" २२६ 


६-शकट-मञ्ञन भौर पूतना-वघ “ २२९ 


७-भीकृष्ण मौर वलरामका त्रनमे घुटनोके बल 
चना, तथा श्रीकृष्णका उद्धखल्मै वंघकर 
यमलाज्ुन-भङ्गकी टीला करना “*** २३१ 


<-श्रीकृष्ण-बलरामकी वाठचर्या, ओीक्ष्णके द्वारा 
रजको अन्यत्र ठे जनिकी चेष्ठा ओर अपने शरीरे 
भेदिर्योको उत्पन्न करके उनका. समूचे रजको 
डराना वि ... 


९~मेदिर्योके उत्पातसे जरनवासिर्योका उस स्थानको 
छोड़कर श्रीबृन्दावनमे लाना “ २३७ 


२३४ 


१०-वर्षा ठका वणन “ २३९ 
१९-श्रङ्कष्णकी अङ्गच्छय, भाण्डीर वट, यमुना योर 


काल्दहका वणन 7 ` शीकृष्णद्रारा 
कालियनागके निग्रहका विचार -*“ २४२ 
१२-शीकृष्णद्रारा काल्यनागका दमन; उसका 


समुद्रको प्रान तथा गोपौको श्रीङ्प्णकी 
महत्ताका अनुभव ^ “* २४७ 


२ २-बलरामद्वारा घेनुकासुरका वघ सौर अयरदित 
तालवने मोर्भौ तथा गोर्पौका विचरण ““ २५० 


१४-वलरामद्वारा प्रटम्नायुरका नघ “** २५२ 


१५-दन्द्रोत्छवके विषयमे शरीकृष्णकी जिचाखा तथा 
एक वृद्ध गोपके द्वारा उसकी आवश्यकताका ` 
प्रतिपादन र “*" २५६ 

१६-श्रीकृष्णके द्वारा गिरियन्ञ एवं मोपूजनका प्रस्ताव 
फरते हुए शरद्‌ तुका वणन २५७ 

१७-गोर्पोद्ाय शीकृष्णकी बातको स्वीकार करके 
भिरियक्नका अनुष्ठान तथा भगवानका दिन्यसूप 
धारण करके उनकी पूजा ग्रहण करनेके पथात्‌ 
उर व्र देना १, """ २६१ 


१८-इन्द्रका संवतक मेषोद्धारा वषा कराकर मौ 
ओर गोपो क्म डालना, श्रीङृष्णदारा 
गोवर्धनधारण तथा उसके नीचे गौ्भो मौर 
गोपो सहित तनवासिर्योका जाना ““* २६३ 


९९-देवराज इन््रका भागमनः, शीकृष्णका गोविन्द्‌ 
पद्पर अभिषेक तथा इन्द्रका श्रीक्घष्णको 
भावी कार्य बताकर अर्थुनकी देख-माल्फरे व्यि 
कदना भोर धरीङृष्णका उसे खीकार करना" २६ 
२०-ीङृष्णका अटोकिक चरित्र देखकर आशङ्कित 
हृष्ट गोरपोका उनसे प्रश्न गौर शरीकृष्णद्वारा 
, उत्तर तथा उनकी रासलील्यका संक्षेपे वर्णन २७५ 


१४) 


९१-अरिषटासुरका वधं “““ २७७ 


२२-कंसकी राङ्क, उसका रनिके समय 
 यदुवशिर्योको बुलार भरी समाम श्रीकृष्ण जोर 
विष्णुे प्रभावको "बताना; वसुदरेवपर करोर 
आश्षेप करना तथा अक्ूरको भीष्य मादिको 
बुला लनेके दिये व्रनमे जनेकी आश देना" ˆ" २७९ 


२२-अन्धकका कसको मुहतोड़ उत्तर °“* २८६ 
२४-केशीके अव्याचार ओर शीक्ष्णद्रार 
उसका वघ १० ""““ २८९ 


२५-अकूरका बलम माकर भगवान्‌ श्रीकृष्णको देखना 
खीर उनके विषयमे अनेकं परकारकी बतं सोचना २९४ 

रे्-मकूरका गोपोकि ल्यि -कंसका अदिश सुनाना 
यर वसुदेव-देवफीकी दयनीय दश्चा चताकर 
शीङृष्ण-नलरामको मथुरा चल्नेके च्य प्रेरित 
करना, मार्ग अभूरको यमुनाजीफे घल 
आश्चयमय नागलोक एवं मगवान्र्‌ अनन्त तथा 
उनकी गोदमे भीङृष्णका दशन """ २९७ 

२७-धीङृष्ण भौर वलरामका मथुरामे प्रवेश, उनके 
द्वारा रजकका वघ, माटीको वरदान; ऊुज्जापरं 
कृपा मौर कंसके घनुषका मज्जन ""** ३०१ 


२८-कंषकी चिन्ता, उसका रंगशालको देखना ओर 
उसे सुखजित करनेका अदेश देना, चाणूर एवं 
मुष्टिकको तथा कुवल्यापीडके महावतको शीङ्ष्ण- 
बलरामके वके ल्थि आश्ञ देना, मष्टावतसे 
दुभिलके द्वारा अपनी उत्पत्ती कया कहना-- 
उसकी माताका सुयाप्ुन पवतपर दरुमिल्के षाय 


खमागम तथा उन दोनौका परस्पर वरदान एव श्याप्‌ ३०६ 


२९-नागरिकेचि मरी रङ्गक्ञाले मर्थो तयाग्े्ागहौकी 
ओओोमा, कंस तथा मरस्लाका आगमन, धीड्ष्ण भौर 
बटरामका रङ्गद्ारपर पदापंण, कुवल्या पीड, 
महावत तथा हाथीके पादरक्षकौका वध ओर 
दोनो बन्धुर्मोका रङ्गसथलमें प्रवेश 
२०-रङ्शालमे मल्लयुद्धे विषयमे भीकुष्णफे 
बिचार, शीङृष्ण ओर बल्देवके दरि चाणुर्‌ 


| ॥१8। द्‌ १ 1 \ 


खीर मृ्टिक आदिका वध; फंसका संहार तथा 
पिता-माताके चरर्णेमिं * प्रणाम करके ' दोनो 

^ „३१७ 

“* २२३ 
३२-भी्ष्का कंखवपे स्यि पृश्चाचापपूर्वंक उमे 
ओचित्यका 'घमर्थन, उग्रवेनफा भीकृष्णफो 
सर्वख-खमरप॑णके पथात्‌ कंका मन्येटि-संस्कार 
फरनेके लिये अनुरोध, भीकृष्णका उने समक्षा- 
बुश्चाकर राग्यपर अभिपिक्त करना भौर 
समस्त यादर्वोकि चाय घाकर कंउ भादिका 

अन्वये्टि-संस्कार फराना "ˆ" *** ३२८ 


माह्योका उनके घरमे घाना 
२९-कंखी चखिर्यौ जर माताका विलाप 


३९-चलराम भौर धीृष्यका युर सान्दीपनिफे यक्षं 
लाकर विदा पटना भीर शुख्दश्चिणामे उनके मरे 
हुए पुत्रको उन्दः देकर मथुरपुरीको 
लोट आना “** “*“ ३३२ 
अपनी चिल्ल सेनक द्वाग 
"““ ३६२५ 
३५-जराखंघकी चेनाका वर्णन, उकी चारो दिशामि 
मथुरापुरीपर आक्रमगफी योजना, यादरवेकि 
साय जरासंघकी सेनाका युद्ध, भीङृष्ण मौर 
वलरामके पराक्रमसे उसकी सेनाका पलायन; 
जरासंषद्वारा अपने सैनिरकोको प्रोत्ादन तया 
““" ३३४ 
३६-षृष्णिवंश्ियौ तया जरासंषफे चैनिर्कोका युद्धः 


२४-जराखंधका 


आकर मथुयदुरीपर पेया दाना 


उमय पक्षे वीरम घमाछान युद्ध 


वलराम ओर लरासंघका गदायुद्ध तथा रासंघ- 


11111 ३४३ 
२३७-जरासंघके पुनः माक्रमणसे शद्धित यादवोकी 


का पराजित धेकर पलायन करना 


सभाम विकद्रुका भाषण~राजा ्यश्वका चरित्र 

उत्पत्तिका 
--- ३८६ 

२८-विकहुदवारा यदुकी संततिका वणेन तथा मघुरा- 


पुरीको खरासंघका स्नेके 
अयोग्य बताना < ““ ३५९१ 


तथा उनसे यदु एवं यादर्वोकी 


वणन 


सृक्रमण 


(५ ) 


२९-नरराम मौर शीङष्णका पुरी जीर पुरवाधियोकी 
रक्षके ल्थि मधुरे दद्धिण भास्तकी भोर 


प्रान, परश्चसमजीसे उनकी भरट तथा उन 
दोर्ोको मोमन्तपव॑तपर्‌ चल्नेके लिये 
उनकी सलाह ॥ °*“ ३५५ 


४०-भीङृष्ण, बठराम ओर पर्रामजीका गोमन्त- 
पर्वतपर आरोहण, गोमन्तकी शोभाका वर्णन 
तथा परदुरामजीका शरोकृष्णको युद्धके चि 
मोरणदन देर वसे प्रानं "३६१ 

४ १-अररामके पास वाख्णी, कान्ति णवं भी (कल्ोभा)- 
इन देवाङ्गनार्भोका अगमन) गसढके दारा 
शरोङ्ष्णको वैष्णव मुङ्कटकी प्रापि, धीङृष्णका 
बटरामसे वातालाप तथा जरासंघकी सेनक्ता 
निरीक्षण ` करके अपने आपसे दी मानसिक 


उद्र प्रकट करना ˆ“ "““* ३६४ 


#२-जराखन्धकी सेनाका वर्णन, उसका सेनाको 
पर्वतपर आक्रमण करलेकी भाश देना, 
यिष्चपाल्की सम्मतिते गोमन्तपव॑तमे माग 
लगाया घाना, पर्वतका ललना तथा बरराम 
ओर भीकष्णका पर्वतसे कूदकर राजायोकी 
सेनाम या पर्ूचना """ ३६९ 

४३-भीङृष्ण. ओर बलरामका लराखन्ध भौर 
उसकी सेनाभकि साय युद्धः राजा द्रदकी मर्यु, 
बरासंघका पराजित होकर पलायन तथा 
चेदिराज दमधोषके खाय भीकृष्ण ओर बरराम- 
का करवीरपुरम जाना *- 


~. ३०४ 
४४-भीकृष्णद्राया शगाल्का वध तथा उखके 
पुत्रका करबीरपुरके राज्यपर अभिषेक “** ३८१ 
४५-ब्रराम ओर भरीङृष्णका मथुरामे प्रत्यागमन 
मौर सगत “““ २३८५ 
४६-यलरामनीकी व्रजयाना तथा उनके द्रा 
यसुनानीका आकर्षण ` ^ 
४७-भोङ्ष्णका यादेक खाय सक्मिणी-खयंवरके 
संवरपर ऊुण्डिनपुरमे णाना तथा राना केशिक- 
द्वारा उनका षत्कार ““" 


188) 


३८७ 


“ ३९१ "~ 


४८-श्रीङष्णके -आागमनछे चिन्तित हप राजार्माकी 
समामे जरासंष जर सुनीयका माषण = †“" ३९४ , 
भाषण सुनकर 


४९- दन्तवक्त्र भौर शाल्वका 


मीम्मकका भीदङष्णके प्रमावका व्रणेन करते 
हुए उन्दं प्रसन्न करनेका ही निश्चय करना ““"” ३५७ 
५०-क्रय जर कैशिकद्वाय भगवान्‌ भीक्प्णफो 
अपने रज्यका समपं॑म, देवराज इन्द्रफे आदेशे 
सबं नरेदद्वासया ' भगवानकां रजेन्रके पदपर 
समिषेक तथा मगवाच्का सनको आश्वासन 
देना ००* „~ ५०२ 
५१-धीक्ष्ण ओर भीष्मककां संवाद्‌, भीम्मकद्वारा 
शरीङृष्णकी स्वति भीक्ष्णका 
मथुरागमन "५ """" ४०८ 
५२-शाल्वके कथनानुखार रासं यदि नरेरथोका 
शाल्वको ही काल्यवनके पाष दूत चनाकर 
मेजना ०००१ ७०० ४१ ड 
५ रे-काटयवनकी विशयेषता, राजा शास्वका उसके 
यह दुत बनकर आना ओर उसे जरासन्धका 
संदेश सुनाना ==“ "४१६ 
५४-काल्यवनका रालार्मोका अनुरोध स्वीकार 
करके भीकृष्णपर विजय पनेके चल्ि मधुरको 
प्रस्थान १ ००४२० 
५५-गर्द़का ओीकृष्णके निवायोग्य भूमि देखनेके 
राओन्र॒भीकृष्णका 
खागत, भीकृष्णद्वारा राज्ञा उग्रसेन तथा मयुर- 
वाधिर्योका सत्कार पेयं गस्डका रौरफर 


तथा 


स्यि लना, मथुरामे 


्शस्लीके विषयमे बताना "° ४२१ 
५ ६-भीकष्णकी अआश्छे यादर्वोका दारकपुरीको 

प्रस्थान ^" “° ° ४३५ 
५७-काठ्यवनका वक ^ """ ४२३ 


५८-दारकापुरीका विश्वक्माद्वारा निमीण, निधिपति 
राङ्क ओर सुषमां समाका आनयन, भीङ्ष्णद्रारा 

¢ ५८ [4 
सुम्यवत्थापूवक वरहो यादर्वोक। बलानां तथा 


-वेररामभीका रेखतीके साथ विवा "^" ४२७ 


( ६ ) 


५९-मगवान्‌ श्रीङ्कष्णके द्वारा सरिमिणीका दरण तया 
यादववीरौका जराव॑घ वं दिशुपाल भदिके 
साथ घोर युद्ध ००९५ --" ४४३ 
६०-श्रोकृष्णद्वारा सक्मीकी पराजय तथा रक्िमिणी 
आदिके खाय श्रीकृष्णका विवाह एवं उनघे 
उत्पन दुई संता्नाका संपत परिचय - * ४४८ 
६१-रक्मीकी पुत्री श्वमाज्गीदारा स्वयंवरमं परचुम्नका 


वरण, प्र्ुभ्नपुत्र॒ मनिरदधका सक्मीकी पोधरी 
स्क्मवतीके साथ विवाह तया वल्रामद्ा्य 
रक्मीका वघ [ब । ०० ४५१ 
६२-चल्देवजीका मास्य, उनके दारा स्तिनपुप्को 
गङ्खामे गिरानेका अद्भुत प्रयत्न "" ४८५५ 
६४-नरकासुरका परिचय) दवारकाम इन्द्रका आगमन 
ओर श्रीृष्णसे नरकवधके च्यि अनुरोधः 
सत्यमामासदित शरीकृष्णकरा प्राग्ग्योतिषपुरमं 
गमन तथा उनके द्वारा मुर, निषुन्द, हयप्रीव; 
विरूपाक्च; पञ्चनाद्‌) अन्यन्य अषुर्‌ तथा 
नरकाभुरका वध “” ४५६ 
६४-श्रीङृष्णका नरकाघुरके भवनम प्रवेश करक 
व्क घन-वैमव तथा सोलह हनार कुमारियोको 
द्वारका मेजना भीर स्वयं देवलोके जा अदितिक्षो 
कुण्डल दे वहयँे पारिजात टेकर छीटना ““““ ४६५ 
६प्-रेवतक पर्व॑तपर रुविमणीके नतोद्यापनका 
उत्व, उसमे पारिजात-पुष्प देकर श्रीडष्णद्रारा 
खक्मिणीका सम्मान) नारदनीद्ारा सविमणीके 
सर्वाधिकं सोमाग्यकी प्रशंसा तथा सत्यमामाका 
कोपमेवनमे प्रवेद "४६९ 
६६-श्रीकृष्णका सत्यमामाको मनाना सौर 
सत्यमामाका मानसिक खेद प्रकट करके उनसे 
तपस्याके विमि सनुमति मौँगना "* ४७३ 
६७-भीकृष्णके पूखनेपर सत्यभामाका उरनं अपने 
'सेष एवे खेदका कारण बताना, भीदरष्णका 
उनके च्यि पारिवात क्ष लनेका विद्वास 
दिखाकर उरनं संतुष्ट करना, सत्यमामा ओर 


श्रीकष्णद्वाया नारदनीका सत्कार तथा नारदनीके 
द्वारा पारिनातकी उत्पत्ति भीर मदिमाका वर्णन ४७७ 
६८-भीद्का पारिनात श्रद् मोगनेफे द्यि 
नार्दणीके दवाय श्द्रके पात संदा भेजना भौर 
न दैनेपर उन गदा मारनेकी धमकी देना “४८२ 
६९-स्वगमे महादेवजीकी परिचर्यफे चयि च्त्य-गीत 
आदि उत्छव, नारदजीकी इन््रफो चीकृष्णका 
पररिलातफे ल्यि प्रार्थनापिपयक संदेश्च सुनाना 
यर शन्द्रका अनेक कारण बताकर पारिनातको न 


देनेका विचारः प्रकट फरना ०००४८६५ 


७०-शरीरृष्णके द्वारा गद्‌ा(-प्रतरकी घमकी चुनकर 
पित हुए श््द्रफा नारदनीषे उनके मर्तावकी 
कटु माटोचना करना मीर युद किये चिना 
पारिजात शर्षको न देनेका दी निश्चय करना ˆ" * ४९१ 

७१-नारदलीके द्वारा श्रीङृष्णकी मदचाका प्रतिपादन 
सुनकर भी शृद्रका उद पारि्ञात देनेको 


उद्रतन होना 11) [३ )। ८९४ 


७र-श्रीद्रष्णका नारदनीको अमरावतीपर माक्रमण 
करनेका निश्चय बताकर श्रे पाख संदेश 
भेलना, इन्द्र ओर वृस्पतिकी बातचीत, 
बृदस्पतिकां कंश्यपनीको यह सभाचार बताना 
ओर कथ्यपजीका युद्धकी शान्तिके ल्यि मगवान्‌ 
शद्धरकी स्तुति करना ˆ" " “* ४९८ 

७२-दन्द्र ओर श्रीकृष्ण) जयन्त भौर भरुम्न, प्रवर 
खीर सात्यकिं तथा एेरावत भौर गर्ढ़का युद्ध ५०५ 

७४८-रात्रिमे युद्ध स्थगित करके श्रीक्ष्णका पारियात्र 
पवतको वरदान देना, गङ्गाका स्मरण करना, 
भिस ओर गद्धालल्पर महादेवजीका आवाहन 
करके उन ब्रिल्वोदकेद्वरकी पूना ओर स्वति 
करना, महादेवजीका उन्दर॑ अमीष्ट वर देकर 
दवयोको मारनेका आदेश्च देना तथा पारियात्र 


पर्वतपर भगवानूका निवा एवं उनकी प्रतिमाके 
पूजनकी महिमा *** “** ५११ 


॥; 


‡ ( ७ ) 


;, 
७५-ह्द्र॒ ओर गेना पुनथुंद्ध उसतिका 
पराक्य, नह्माजीफी अक्षिति कश्यप ओर 
भदितिका नीचभ मकर दौनोका युद्ध चद 
कराना, फिर उजका स्वगत गमन, अदिविकी 


अश्ना शचीद्रारा उपहार पाकर पारिजातस्दित 
द्वाग्का-गमन), पारिजाते द्वारफावाधि्योकी 


प्रसनता) सत्यभामाके पुण्यकर्म प्रतिग्रहे 

लिये श्रीकृष्णद्ारा नागद्नीका दमरण * * ५१५ 
७६-सव्यभामाद्वास पुण्यक-मतमे भीङ्ष्णका 

नारदजीको दान; नारदलीका निष्क्रय लेकर 

भीङृष्णको छोद़ना ओर उनसे वर पाना; 

श्रीकृष्णका सगे-सम्ब्रनिधर्योको पारिजात दिखाकर 

पुनः उपे स्वरममे पर्चाना “ ५२० 
७७-पुण्यक-विधिके बणंनका उपक्रम *" ५२२ 


७८-उमाद्वारा सती खरीके मष्सवका वणन करते 
हुए पुण्यके-्रतकी विधिका उपृदेश्च "५२४ 
७९-पुण्यक-नतसम्बन्धी नियम एवे दानका ब्रणन 
तथा पुत्र मादिके निमित्त किये जानेवाछे दूरे 
व्रत एवे दानक्रा प्रतिपादन "५२६ 
८०-नाना प्रकारके नर्तका विधान “"" ५३१ 
८ १-उमके दारा वतकथनका उपहार, श्रीनारदनीका 
देविर्योदारा भिये गये व्रत्तोका वर्णन करना तथा 
भरीकृष्ण-पलिरयोद्ारा बतका मनुष्टान पं दान" ५३५ 
८२-परपुरबासी अघुर्यीका संधिप्त परिचय, उन ब्रह्मा 
मोर भगवान्‌ द्िवका वरान "` ५३८ 
८रे-ब्रद्मदत्तके यक्षम वसुदेव-देवकीफा अयमन, 
दव्योद्वाय ब्रसदत्तकी कन्पाभोका अपहरण यर 
प्रयुम्नद्ासा उनदी गक्ना, नार्दजीके कनेसे 
द्योका क्षत्रिय नरेशोको अपने पक्षे मिराना 
तथा शरो्ष्णका परपु सममन "` ५४० 
८५-श्रीङृष्णद्वारा यादव-खेनाकी युद्धके लिये नियुक्ति, 
` दानर्वाका निष्क्रमण) निङ्‌म्मद्ारा ङु 
` याद्ववीरेका रुफार्मे वेदी होना, श्रीङुष्णके 
द्यर दानव-सेनिङोका संहारः प्रयुम्नद्रारा 
राजतेनिकोका गुफारमे अवरेष तथा व्रद्दत्तको 


सान्त्वन नि 188, ५४४ 


८५-निकुम्भका नयन्तसे पराजित शकर मगवन्‌ 
्रीढष्णके चाय युद्ध करना, श्रदष्यका अर्जुनको 
निङम्भका चरित चताना, आकाशवाणीकी 
पररणासे सुदर्दानचक्रदारा निङुम्भका वच करना 
मौर बहदत्तको षपुर नगर देकर द्वाराको 
प्रान करना `"  *" १४८ 

८६-अन्धकामुरकी उत्पत्ति मौर अनाचार उखके 
वघके ल्यि श्रुपियोका विचारः नारदजीका 
मन्दारपुष्पोकी मालया धारण करके अन्धके 
यँ जाना भौर उशते मन्दार वनके मर्ह 
वताना कि , „^^. ५५३ 


८७~-मन्द्राचल्पर गये हए भन्धकासुरका 
मदादेवणीद्यारा वघ ˆ“ """ ५५७ 


८८-पिष्दारतीर्थके अन्तर्मत॒ समुद्रम श्रीकृष्ण 
तथा अन्य यादर्वोक्रा जल्विहार ““" ५६० 
८र्-बख्यम्‌ ओर श्रीकृष्ण सादि यादर्वोकी जलक्रीडा 
एवं गान सादिका वर्णन“ “° ५६६ 
९०-निङकम्मद्ारा भावुमतीका अपहरण, श्रीकृष्णः 
सर्ुन ओर प्रययम्नके साय उसका युद्ध, 
गोकणतीर्थम उसका पतन, प्रथुम्नका 
भानुमतीको लेकर द्वारका पर्टुचाना, फिर 
तीरनोका निकुम्भके साथ युद्ध, उसकी अदूमुत 
माथाका वर्णन आर ` श्रोद्धष्णद्याया निङुम्भ- 
खा व # "° * ५७७ 
९१-वजनामकी तपस्या यरं वरप्रा्ति, उका 
तरिभुवन-विलयके लिये उ्योगः इन्द्रफी शरकष्ण- 
से वार्ता, भद्रनामा नयको सुनियोका वरदान, 
इन्द्रका दंोको भावदयक कतव्य ब्रताकर 


वन्चनामपुरम्‌ मेनन *" °-* ५८२ 


९२-दटर्छकरा वञ्पुरमे निवा, हंखीका प्रभावतीको 
प्रुम्नके प्रति भनुरक्त कराना, प्रमावतीका 
हंसे प्रयुम्नकी प्राप्ति करनेका सअनुगेष, 
शी ओर वज्जनामका संवाद, दि मुछ 
खच समाचार सुनकर शरीङृष्णका नस्तप 
प्रयुम्न मादि याद्वौको वञ्जपुरम मेना """" ५८५ 


४ 


(८ ) 


९३-नयशधारी यादरवोक्षा सुपुर ओर वञ्रपुरम 
सफर अभिनय करफे दानर्वोको रिञ्चाकर उनठे 
: उपद्र पाना तथा प्रच्रम्नका प्रमावतीके षम 


प्रवेश [688 *१७५ ५८९ 


न्धि भ 9 
९४-ग्रयुम्न ओर प्रमावतीका गन्वविवाह टवं 
समागम, फिर गद ओर चन्वतीका तथा साम्ब 


सर गुणवतीका गान्धवविवाद -*" ५९४ 
९८-ग्चुम्नका प्रभावती व्षौका वणन करते ह 
उखे भने फूखका परिय देना *"* ५९७ 


९६-कदयपके मना करनेपर भी वञ्जनामका त्रिलोक- 
विषयक ल्थि प्रस्थान, श्रीङ्कष्ण ओर इन्द्रका 
र्युम्नको संदेश देना ओौर उनङ्की संततिके 
प्रमावका उल्टेल करना, दै््योका भ्रद्युम्न 
यादिके पुत्रको वदी बनाना, प्रमावती दिः 
का पतिर्योको तख्वार दैकर युद्धके लिये भेजना, 
दरक दवारा उनकी सहायता तथा प्रयुम्नका 
अदूदुत परक्रम “““ “* ६०१ 

९७-प्रद्युग्नद्वास वञ्जनभिका वघ तथा प्रयुम्न मादि- 


के पुर््रोका राज्याभि्ेक “*“ ६०६ 


९८-दन्द्रकी आशासे विश्वकरमाद्रारा पुनः परिष्कृत की 
गयी द्ारकापुरीका वणन -*" ~" ६०९ 
९९्-श्रीकृष्णका द्वारका तथा अन्तःपुरं प्रवेद 
ओर मणिपवेत एवं पारिघातको यथोचित 
स्थानम स्यापि करना -““ “* 
१००-श्रीङृष्णका समस्त ॒यादूर्वोसि मिडकर उन 
सम्मानित करनेके स्थि सभे बुखना ˆ ** ६१६ 

१०१-श्रीङृष्णद्रारा यादवौका सत्कार तया नारदजीका 
याद्वोकी समामे शीदष्णके प्रभावका वर्णन करना ६१७ 

१०२्‌-नार्दनीके दारा भगवान्‌ श्रीकृप्णके दूयत 
कर्मोका वर्णन ~“ ६२२ 


१०३-श्रीकृष्णकी संतरिका वर्णन तथा चृष्णिर्वशका 
उपसंहार ५०७ ७००४ ६२५ 


१०४-प्धुम्नका जन्म, शशम्बरीयुरदार। प्र्युम्नका 
वतिकायृहते सपद्स्ण, प्रदुम्न-मायाक्ती-संवाद 


६१४ 


~~~ --~-*-+ 


खीर प्रचुम्नका शम्बरायुरके खो पुत्रके खाय 


युद # 9 5.1 ६२७ 
१०५-प्रचुम्नद्वारा शम्बरुरकी खेना योर मन्तियोका . 
संहार ००४ [8 8। ६ ३ १ 


१०६-दम्बरासुर गर प्रद्युम्नका मायामय युद्ध; 
शम्बरी चिन्ता; देवराज इन्द्रकी आशासे 
नारदजीका प्रयुम्नको उनके पूर्वं खरूपका 
1 
दमरण दिखाना जीर मावश्यक कतव्य सुत्नाना ६३६ 


१ ०७-ग्रदुम्नके देवरा श्यम्बरासुरका बध ^° ° ६४० 


१०८-मायावतीसहित प्ुम्नका द्वरकार्मे भागमन | 

ओर सिममीके भवने प्रवेशय -“ ६४२ 
१०९-ल्देवनीके दवारा प्रयुम्नको यादिकस्तोत्रका 

उपदेश ˆ“  "*"" ६५५ 
११०-साम्नकी उत्पत्ति जर मल्रदिक्षा तया द्वारक 

पघरे दृ राजार्ेकि बीच नारदजीके दासा 

भगवान्‌ श्रीकृष्णङी परम धन्यताका प्रतिपादन ६५० 
९११-श्रीकृष्णकी महिमा-अघ्ुनका भीकृणे आश 

टेकर नाक्षण-बारककी रश्चाके स्यि जाना ˆ“ ६५६ 
११२-त्राद्यणनालककी रक्षा न होनेपर ब्राह्मणद्वारा 

अनका तिरस्कार भौर शरीकृष्णके साय उनका 

उत्तर दिको गमन “^ 
११३-श्रीङृष्णद्ारा नाष्यणपूरवरोका आनयन 


-.- ६५५ 
ˆ“ ६५९ 
११४-मगवान्‌ श्रीकृष्णका अर्ुनको अपने यथार्थं 

स्वसूपका परिचय देना "^ “““ ६२ 
१प-भगवान्‌ श्रीकृष्णके पराक्र्मोफा संकषपसे वर्णन ६६४ 
११६-भगवान्‌ शङ्करका वाणायुरको पने भौर देवी 

पावतीके पुत्रके सूपमे स्वीकार करना, बाणासुर ' 

का उनवे युद्धे लिये वर मगना मोर पाना 

तथा इससे बाण-मन्त्री ऊुभ्भाण्डका चिन्तित 

होना ˆ" ६६५ 
१९७-शिव-पावंतीका करी द़ाविहार, पावैतीका उघाको 


पति-समागमके स्यि वर देना तथा. उषराकी 
विरह-व्यथाका वर्णन =" -*" ६७१ ` 


(९ ) 


११८-उघाका सवप्नम प्रियतमक्े साथ समागमः, ( १. 

, उषाकी चिन्ता, सखिर्योका उवे समन्षाना, 
कुम्भाण्डकुमारीके कहने उषाका चित्ररेखाको 
बुलार उसे अपना कष्ट बतानाः चित्रलेखाके 
जनाये हुए चित्रि उषाका अनिश्द्को 
पहचानना भौर उर लनेके ल्थि चित्ररेखाका 
दारकाकफो जाना "°" *** ६७५ 

११९-चित्रञ्खा र नारदजीका संवादः चित्रटेखाका 

“ नारदी तामसी विद्य ग्रहण कर अनिर्टयको 
शोणितपुर छे घाना, उषा भौर मनिरुदका गान्धव- 
विवाद, अनिरुटका बाणासुरे सैनिको तथा 
बाणासुरके साय युद्ध, उनका नागपाशमे ्घकर 
दी होना तथा नारदलीका द्वारका जना"**६८२ 

१२०-अनिरुढके द्वारा भर्यािवीकी स्वति ओर 


देवीका प्रसन्न होकर उ बन्घनके कष्टसे 
मुक्त करना ००७४ ००७७ ६९५ 
१२१-अनिरुदधके-यपहर्णसे रनवासमे शोक, श्रीकृष्ण 
ओर यादर्वोकी चिन्ता, गुचरौकी नियुक्ति 
सीर उनकी निफट्ता, नारदलीका आगमन 
कीर अनिष्दका समाचार-निवेदन, श्रीकष्णके 
द्वारा गर्ढ़का मावाहन ओर स्तवन, गरुड्- 
द्वार भीङृष्णकी स्तुति यीर भीङृष्णका 
शोणितपुरको प्रस्थान “-* ६९९ 
१२२-भीकृष्ण, नल्मद्र॒ ओर प्रयुम्नका शोगितपुरके 
ल्यि प्रस्थान, गस्डका आहवनीय अग्निको 
शान्त॒ करना; भीकृष्णद्रारा अग्निगणोकी 
पराजय, बाणामुरके सैनिकौके साय आीङ्ष्ण 
आदिका युद्ध, निरिरा ज्वरका आक्रमण ओर 


श्रीरृष्णके साय उसका युद्ध " ०७०८ 


» १२३-भीकृष्णसे पराजित हुए उवरका उनकी शरणमे 
जाना, उनसे वर पाना ओर उनकी यञ 
चिरोधायैकर रणभूमिसे हट घाना 


~° ७१४ 


१२४-बाणासुरकी घेनाका पलायन; भगवान्‌ राह्करक्रा 
अपने गर्णोके साथ युद्धके ल्थि आगमन) 
भगवान्‌ भरीकृष्ण जीर रुद्रका ` युद्ध तया 
वाणासुरका युद्ध भूमिम पदाष॑ग "" ७१७ 

१२५-श्री कुष्णके लुग्भाखषे भगवान्‌ शङ्का 
जंभे वधीमूत होना, नक्ञा्ीके द्वारा शिव- 


लीको धिष्णुके चाय उनकी प्कताका स्म 
दिकाना दथा ज्ह्याजीके पूषनेषर माकण्डेयजीका 


इरिदरकी पकता स्थापित करते ४ 
मादस्म्यसदहिव हरिदरारमक स्तोत्रका वणन 
# ॐ @ ## ष ७२ |. 


करना 
१२६-स्वामी कारिकेय यैर श्रीडष्णके युम स्वामी 
कािकेयकी पराजय, कोटवीदेवीका कार्विकेयकी 
रा करना, बाणासुर बौर भीकृष्णकां युद, . 
शरीङ्ष्णका बाणाञुरकी हजार सुजाओंको काटना, 
महादेवजीका वाणायुरको मक्षकाल होनेका 
वरदान देना " """ ७२५ 
१२७-अनिरडका नागपाशसे चुटकारा ओर उनके 
द्वारा श्रीकृष्ण आदिकी बन्दना, नास्दनीके 
कंहनेखे उनका वीर्थ-विवाह, उषाकी विदाई, 
सबका द्ारकाको प्रस्थान, मागमे श्रीकृष्णदास 
वरण देवतापर विजय) वरणद्वारा शीकृष्णकी 
स्तुति ओर पूजा, श्रीक्ष्णके आगमनसे द्वारका- 
वासि्योका हर्ष, मगवान्‌के यदशते पुरवाधि्यो 
दरार देवतामौकी बन्दना, इन्द्रदारा श्रीकृष्णकी 
परवा ओर सब देवता तयो षिरयो भदि- 
का अपने-मपने स्थानको नाना ०० ७३६ 


'१२८-द्वारकाम उत्सव, उषाका (अन्तःपुसमं प्रवेश 


अर सतकार, भरीकृष्ण ओर विष्णुपर्वकी मषटिमा 


तथा पवंका उपसंहार “-" ७४६ 


८ भविष्यपवं 


१-जनमेभयक़ी संतति एवं पौर तथा पाण्डवर्वश- 
की प्रतिष्ठा वणन “१ “"" ७४९ 
२-राजा जनमेनयका अश्वमेधयङ् करनेका विचार, 
स्याजीका आगमन भौर रा दारा उनका 
सकार, आपने पाण्डवौको राजसूय यश्च करनेषे 


जज णः 
पि 


क्यो नदीं रोका- यह जनमेजयका प्रन ओर 
उसके उत्तरम व्याषजीद्रारया. कालकी प्रचर्ताका 
प्रतिपादन [1.1 1, ७५० 
-व्याखजीद्धारा कलियुग स्थितिका वणन "” ७५४ 


&-कलिदुजका वणन षि 


""* ७५४ 


( ९० ) 


प्-व्यासणी आदिका गमन, जनपेजयके अश्वमेषयद- 
": म.दनद्रफा विध्न डालना) लनमेनयद्वाशर इन्द्रको 
शाप; ब्ाहणौका निवसन तथा अपनी -पत्नीफी 
:, भर्त्ना, विश्वावयुका लनमेजयको, समन्नाना' " * ७६१ 
६-जनमेलयका संतुष्ट होकर राञ्य-श्रान करना 
तथा इस ग्रन्थके षाठ ओर्‌ श्रवणकी महिमा" * * ७६४ 


७-पुष्फर-प्रदुमावके विषयमे जनमेजय प्रन ओर 

वैश्म्पायननीका उत्तर-भगवान्‌ नारायणकी 
महिमाका प्रतिपादन ** “° ७६५ 
<-सत्ययुग मादिके परिमाणा वणेन 

९~प्रल्यके प्रश्वत्‌ पएकार्णवके नसम भगवान्‌ नारा- 
यणका शयन ^ *°" ७६९ 
१०-एकाणवमे भगवान्‌ मौर माकंष्डेयजीका सवाद्‌ ७७० 


*"** ७६७ 


११-प्रमात्माके दारा भूर्तौकी खषटि तथा ब्रह्माजीको 
प्रकट करनेके लिये उनकी नाभिषे एक मष्टन्‌ 


पद्मका प्रादुमौव “** ७७ 
१२-नारायणके नाभिकमल्के दलम मत्त लोकौकी 
कुरपनां .,. .... ७७७ 
१३-मधु यर कैटभका ब्रह्मजीके साय संवाद्‌ तथा 
भगवान्‌ विष्णुके दारा वष “""* ७७८ 
श४-त्रद्याल्ीके तीन पु्रौको परम पदकी प्राप्ति, फिर 
उनके द्राण मैथुनी सष्टिका विततार, दक्ष 
कन्याभोकी संत्िका वर्णने ˆ" "७८० 


१५-जनमेजयके द्वारा मदामासत-व्णित्त चचरिवकी 


प्रासा "० ७८ 


१६-खष्टिविषयक वर्णनके प्रसञ्खमे लान ओर योगकां 


विचार "० *°* ७८६ 


१७-मैनाककी स्थिति, मेसपरटपर परमात्मासे घर्मा 
जीका प्राकय्य, मेसकी विशार्ता, बह्मालीके 
दा स्ट, ब्रह्म ओर ब्रह्मके स्वरूपका वणन, 
गङ्गाका प्रादुर्भाव, सोमी उरपत्ति. धर्मक पाद्‌, 
योग-खाधना, एेकवर्यूठे हानि, वेदौका प्राकय्य, 
यश्पुदषका वर्णन, योगवेचाकी मदिमा, चित्ती 


, उपटविधमे कारण, मोक्ष-पम्बन्दी कारमं फरनेका 
विधान जीर कर्मफलके त्यागे मुक्ति -“* ७८९ 
१८-योगके उपव्म॑८( विघ्न ), योगीकी विष्णुरूपे 
स्यति, कर्ये युक्त, सकाम कर्मियोी धूम- 
मागंसे गति ओर पुनराणृति, शनी प्यव योगी- 
फो तत्वका षाक्चात्कार तथा ब्रह्मयुगकरा वर्णन" ७९५ 
९९~योगीफी स्थिति तथा उसके समश्च यआनिवले+ 
विघ्नरूप रेशर्योका वर्णन ˆ  “*" ७९८ 
योगघारणपूर्वफ फी गयी 
..., „^ ८०२ 


२०-्रदयालीके दाय 
मानदिक सिका वर्णन 
२१-क्षयुगमे प्र्गमे श्वानटिद्र चाह्वणोका वर्णन 
प्रनापविदश्चदवारया प्राणियौ वं चारो वर्णोी 
खष्टि तथा उनका अपने पूर्रोको घत्रीका अन्त 
छाननेके ल्य आदेश्च *** ८०३ 
२र्-दक्चका अपने याये अङ्धवे खीरूप कर बहुत- 
सी कन्या्मोको उत्पन्न करना ओर उनका घर्म, 
केदयप एवं सोमको दनि कर देना, कदयप सौर 
दश्षकन्यार्मोकी संतानका वणेन तया देवरोकरो 
उरपन्न होनेवालोकी योग्यता = “ˆ ˆ" ८०५, 
२३-्रहयाभीके महायशा वणन "°" ८०७ 
२४-चारा आ्र्मोमिं स्थित हुए बाद्यणोकी ब्रह जीफे. 
यक्तस्यलके पुण्य-परदेशर्मे निवाषकी इच्छा `` ८११ 
२५-नारद आदिके दारा ब्राहमणो तया ब्रहमाजीका 
सरकार, बरल्ाजीके दरा कंश्यपको यञ्चका अदिश, 
देवता-दानव-युद्ध तथा विष्णुके द्वारा मघुकी 
पराजय "" *“" ८१२ 
२६-मधु मोर विण्णुका थोर युद्ध, देवताभौ ओर 
छप्रियोदयारा शरीविष्णुकी स्तुति, दयप्रीवरूपघारी 
विष्णुदरारा मधुका वघ ओर प्रथ्वीको मेदिनीं 


नामकी प्राप्ति "० ८१३ 


२७-मधुके पतने समस्त प्राणियौको हर्ष, वं 
एकन हृ पर्वतौ भौर ववम्त तुका वणन, 
मधुवा्िनी नदीका प्रकय्व मौर गौरीषिद्धाका 
मादृस्म्यि ५११ **° ८१७ 


५ 


( ११. ) 


१ मीर ~ 
२८-पुष्करमे श्रीविष्णु आदिकी तपस्या ओर उसके 
` प्रभावङा वर्णन ,,. ` ,.. ८२१ 
२९-तपस्याके प्रमावे देवतामका उक्ष ; ::. ८२८ 


३०--द्युका राज्याभिषेकं तथा दैवयो अर 'देवताभो- 

द्वार मन्दरचरूके मन्यनदण्डद्वारा समुद्रका 

मन्थनः, समद्रते यन्य रतनेक्रे साथ अग्रतका 
परङृव्य भोर राके विरका छेदन ... ८३० 


३१-बलिके यश वामनद्वारा त्रिलोके राग्यकां 
अपहरणतथा कालान्तर देवताओद्ासा बलिका 


राज्यामिषेक ि ,,, ८३२ 
२३२-दश्च-यश-विरध्वंख „५५ ,„ ८३३ 
३ द-वाराहावतारका उपक्रम „८३८ 
२३४-गग्ान्‌ यक्वरादके द्वारा प्रथ्वीका उद्धार ,,.„ ८४१ 


३५-भगवान्‌ वारादके (द्वारा विभिन्न दिदि 
परवतो ओर नदिरयोका निमौण „., ८४४ 


३६-जगत्की सष्टका वर्णन „^. ,,, ८४७ 
` -३७-जक्ाजीदारा विर्न व्गके भधिपतियोकी 
नियुक्ति । ,.., ८५१ 


३८-देवायुर-ठंग्राम तथा दहिरण्याक्षद्वारा दैवराच 
, इन्द्रक्रा स्तम्भन ' ' ,.* ८५ 
९-भगवान्‌ वाराहदारा दिरण्याश्चका वध "““" ८५६ 

४०-देवता्भोको अपने प्रसुत्वकी प्रापि, देवराज 

इन्द्रकी सम्पूणं लोकोके आधिपत्यपर प्रतिष्ठा, 

खत्‌-अख्त्‌ पुरुषोकी यथोचित गतिके लिये 

, भदेश देकर सगवानक्ञा अन्तधौैन होना तथा 
देवेरदमस पर्वतेकेि पंलका छेदन ^ ८५८ 


४१-हिरण्यकशिपुकी तपस्या, वरप्ाक्ति, अध्याचार, 
देवता्ोको ब्रह्माजीका आश्वासन, भगवान्‌ 
विष्णुका नरिहरूप धारण करके दिरण्यकथिपु- 
की सममि घाना तथा उख वभाका वर्णन .., ८६० 


७४१९ 


(~ 
[= 


४२-मग्वान्‌ नर्िंहका देवता, गन्धकं, अष्डरौ 
तथा द्यौ सेवित दिरण्यकशिपुको देना ,.. ८६५ 

४२. प्रहादको नरसिह-विम्रहमै समस्त तरिलोकीका 
दद्चन , षि ,.* ८६६ 


॥ 


४४-दैस्या तथा ' हिरण्यकशिपुद्वाया रर्विहपर विभिन्न 
अन्नो क्न प्रहर ५ ५ ^ ५५ ८६७ 
४-दत्योदारा क्षि गये प्रहारो भौर स्वी: गयी 
मायार्जोकी निष्फर्ता ; ,, ८६९ 
४६-दः्योके धिनाशकती सूचना देनेवाले महान्‌ उत्पात, . 
दिरण्यकेशिपुका गदा लेकर धावा करना त्था 
उसके पेरोकी घमकंसे पृध्वी, पर्वत, नदी प्व 
००, ८७१ 


देशका कम्पित होना 


४७-देवताभौके अनुरोधते भगवान्‌ नरर्विहदाय 
हिरण्यकरिपुका षध तथा देवताओं भौर 
नदाजीद्यारा उनकी स्वति ,,. ,,.„ ८७६ 


४८-वामनावितारका उपृक्रपर, बलिका अभिषेक तथा 
दत्यो का उनसे त्ैरोक्य-विलयके व्यि अनुरोष,,. ८७८ 


४९-देवताओके साय युद्धके लिपि दैव्योकी तैयारी „^ ८८० 


५०-पुलोमा, हयग्रीव, परह्ाद मौर ॒श्म्बराडुरका 
युद्ध के ल्य उ्योग ५ ,,, ८८३ 

५१-अनुहाद, विरेचन, ङुजम्भ, असिलोमा, शत्र, 
पकचक्र, षभ्रभ्राता, राहु, षिप्रचितति, केरी) 


बृषपवौ तथा बलिका युद्धके ल्यि तैयार होकर 
आगे बद्ना ,०. ,*- ८८५ 


५२-द्र आदि देवता ओर लोकपाला युद्धके 
स्थि उथोग. ओर प्रस्थान ... ,.. ८९३ 


५३-देवता्भो डीर असुरेका द्रन्दरयुद्ध, भीषणं 
उस्पात, त्रद्याजी तथा सनकादि योगेश्वरोका 
युद्ध देखनेके व्यि यागमन "** ८९९ 


५४-देवता्ओौ ओर अषुोके युद्धका यज्ञके रूपे 


वर्णन, दोनो सेना्का वुमुखयुदध चथा सावित्र 
ओर धुवकी पराजय .. ९०२ 


५५-नषचिदरेरा घर्‌ नायक वयुकी, मयासुरदरार 


स्वशकी, वायुदरेवद्या पुलोमाकीः इदयभ्रीवद्रारा 
पूषा देवताकी; शम्बरायुरदयारया मगकी तथा 


चनद्रदेवद्वारा सूची दैत्यसेनाकी पराजय ,., ९०७ 


4 


( श्र ) ` 


५६-देवताभो ओर दानर्वक्ता थोर संग्र 

` “" पितचनका विष्वक्षेनके खाय जर ऊुनम्भका 
अंश देवतके साथ युद्ध करते समय घोर पराक्रम 
प्रकट करना ... `. ९१७ 

५७-देवापुरवंम्ाममे कुनम्म, अष्लिमा ओर 
बरुनासुरके उक्कर्षका वर्णन ` तथा इरि एवं 


अश्िनीङुमारफी पराजय ... ... ९२१ 
५८-एणानि भौर प्कचक्रके, मृणभ्याघच भोर 
नलासुरके, अकतैकपाद्‌ ओर सहुके तथा 


सुधूाक्च ण्व केशी दैत्यके युदका वणेन ... ९२५ 
५९ वृषपर्वा भौर निष्ुम्भ नामक वि्वेदेवके तया 

प्रहाद ओौर काल्के घोर युद्धका वर्णन ... ९३१ 
६०-कुबेर ओर अनुहादका मयंकर युद्ध ,.., ९३८ 
६१-वरणक विप्रचि्तिके साथ युद्ध ओर पराजय. .. ९४२ 
६२-अगिनिद्वारा दैत्योकी पराजय तया बरदश्पतिके 

दासा अग्निदेवका सबन ... ,.. ९४ 
दद-राक्ता चलिके प्रति प्रहादका वचन तथा नलिका 


देवसेनापर आक्रमण ,०. ९४८ 


दलि ओर इन्द्रका युद्ध तथा इनद्रका रणभूमिषे 


पलायन ,.. ९४९ 
६५-विजयी बल्कि पाष राजलक्ष्मी दिका 
श्चुभागमन किक ,,, ९५१ 


६६-अदिति मौर कष्यपलीके साय देवतार्थोका 


न्यलोकमे जाना १५९ ००, ९५३ 


६७-त्र्माजीकी माते कश्यप भौर अदितिषित 
देवताया च्तीरशागरके उत्तरतरपर जाकर 
तपस्यामे संल्न होना ० ९५६ 


६८-कश्यपदवारा परमपुरुष परमारमाका स्वन ,... ९५७ 
६९-कदयप-भदिवि ओर देवतार्ोफो भगवान्‌ 


विप्णुका वरदान देना जओौर सदितिकै गर्भ॑ 


"प्रकय् होना ०९९ ०० ९६९ 


७०-ऋि्ो जौर विविष, देवताओका वामनलीको 
नमस्कार करना, गन्धर्वो तथा भप्ठगर्भोका 


~ 


नाचना-गाना, मगवानकते वेरि्टयका वणेन, 
भगव नका ` देवता उनका मनोरथ पकर 
बृदप्पतिजीके साथ बल्कि यर जाना; व्ह 
अपनी वाक्पतये सनको चकित कर देना 
यर राजा वलिक्रा उनसे परिचय तथा आगमन- 
का प्रयोलन -पूछना ९०१ ० ९६१ 
७१-वामनद्वारा वल्के यज्चकी प्रशंवा, चलिते 
मोगनेके छिथ प्रेरित दोनेपर वामनका उनघे 
तीन पग भूमि मोगना, शुक्राचार्यं भौर प्रहाद- 
का बलिको दान देनेसे रोकना, . बलिद्रारा 
दानका समर्थन तथा दान पति दी वामनका 
अपने विराटुरूपको प्रकर करना .० ९६५ 
७र्-विराटृरूपधारी वामनपर आक्रमण करनेवकि 
देव्योके नाम, स्प सौर आयुर्घोकाः परिचय, 
मगवानका तीन लोर्कोको नापकर राज्यका 
विभाजन करना, बलिक्रो पाताठ्का ` राज्य दे 
मर्यादा बवोँषकर उन वँ मेजना, नीविकाकी 
व्यवस्था कना, नारदनीका बलिको मोक्ष्विंशक 
स्तोत्रका उपदेश देना, उसके प्रभावसे बलिका 
बन्धन-युक्त होना ओर उद स्तोचरकी महिमा ९६९ 
७३-स्किमिणी देवीकी भगवान्‌ श्रीकृष्णे पुत्रके 
व्यि प्रार्थना ओर भगवानका उन आश्वासन 
देते हए केला जनेका विचार प्रकट करना ९७ 
७४८-मगवान्‌ ओीङ्ष्णका यादवघमामे अपनी कैल- 
यात्राकरं विचार प्रकट करते दए नगरकी रक्षाके 
लिये यादर्वोको सावधान रदनेका अदेश देना ९७९ 
७५-भगवान्‌ श्रीक्ृष्णक्री सात्यक्रि यर उद्धवसे 
नगरी रक्चकि विषयमे बातचीत तया बख्रयाम 
आदि यादु्वोको मी रक्ताका भार सौपकर उनका 
कैखासयात्राके लिये उद्यत होना ,..,.९८१ 
७प६-गरढपर आरूढ होकर भीकृष्णका बदरिकाश्रम- 
मै जाना, मार्गम देवताओौ-सुनियेद्वारा उनकी 
स्ति ` ., ९८३ 
७७-देवतार्मोसहित  श्रीकृष्णका बद्रिकंश्ममे 
प्रपियोद्धारा _ आतिषथ्य-सत्कार ` , ,,„ ९८६ 


( १३ ) 


७८-मगवान्‌ शरीकृष्यकी समाधि, मन्‌ कोटदल ओर 
उनके पा मागते हुए मृग आदिक मागमने' ९८७ 

७९-मगवान्‌ शरीङृष्णके समक्ष दो , पिशारचोका 
आगमन ` ^  -, ~ "९८९ 

८०-षण्टाकणै भौर भगवान्‌ शीङष्णका पएक-दूसरेको 
अपना परिचय देना तथा घुण्टाकणद्वारा भगवान्‌ 


विष्णुका सवन एवं समाधि-लम ० ९९१ 


८१-पिशाचको समाधि-अवयखर्मे भगवाच्‌ विष्णुका 


साक्षात्कार "९९ 
८र्-षण्टाकणदयारा भगवान्‌ विष्णुकी स्तुति "" ९९८ 


८ रे-वण्यकणद्वारा मगवान्‌ शरीकृष्णको उपहार- 
समप॑ण, भगवानूका उतते वर देना र एक 
सरे हुए ब्राद्यणको जीवित करना "१००१ 

८४८-शरीङृष्णका केलासपर पवर व्दौँ बारह 
वर्षो व्यि कठोर तपस्या संर्ग्न दोना 

८५-भगवान्‌ श्रीङृष्णके समीप इन्र यादि देवताभ 
तथा उमासहित भगवान्‌ शिवका आगमन "१००६ 

<ह्-पिशार्चा, सुनि्यो ओर अष्वरार्मोके साथ उमा- 
सदित भगवान्‌ शङ्करका श्रीकृष्णके समीप गमन १००७ 

<८७-भगवान्‌ श्रीकृष्णद्वारा महादेवजीकी स्तुति १००९ 

<< भगवान्‌ शिवद्वारा श्रीविष्णुकी स्व॒त्ति "““ १०११ 

<९्-भगवान्‌ शङ्करका ऋरुषियोको श्रीङ्ष्णतत्वका 
उपदेश देना “५ “*“ १०१६ 

९०-भगवान्‌ शङ्करद्रा श्रीङ्ष्णकी स्ठुति ओर 


००५ १ [ह 


= 


श्रीकृष्णका केलाषसे बद्रिकराश्रमे , लैव्ना १०१७ 
९१-पौण्ड्कका राजाोकी सभार्ये अपनेको 
शष्कु; चक्र आदिते युक्त वासुदेव घोषित 
करना ओर श्रीङृष्णको पराजित करनेका 
च [द । १ ८ २० 
९२्-पौण्डूकके यहो नारंदजीका भागमन भौर उकके 


मनसूतरा बोधना , *** 


साथ उनकी बातचीत “** १०२१ 
९३२-नारदलीका श्रीकृष्णके पास लाना सीर 
, पोण्डूकका द्वारकापर आक्रमण “"““ १०२३ 


९८-याद्व वीरेद्रार पोणड्ककी सेनक जोर एकः-2,, 
रब्यदयारा यादव-ठेनाका संहर } {९०९४ 
९५-पौण्डूकंदाय पूर्वद्वारे .परकोर्यौको -तोढडनेका 
मयस्न, साव्यक्रि आदि याद्ववीरोकाः रक्षके 
" ल्य रप्हुचना, सत्यका वायन्यालदारा 
पौण्ड्कसैनिकोको भगाकर पौण्डूकको युद्के 
ल्थि डलक्रारना ओर पौण्ड्ककी गवोक्ति “"" १०२७ 
. .. २०२९ 
९७-सात्यकि भौर पौण्ड्कका युद्ध ` “** १०३२ 
९८-बलभद्र' ओर एकरव्यका युद्ध तथा बलभद्र- 
द्वारा निषर्दोकरा संहार“ ` “* * १०३३ 
९९-बलभद्र ओर एकरन्यका तथा पौष्टरक ओर 


॥ 


९६-पौण्डूक ओौर सात्यकिका युद्ध 


सात्यर्किका युद्ध “° ˆ** १०३२५ 
१००-शरी्ष्यका द्वारका मागमन . मौर पैौणटूकषे 

उनकी बातचीत , **“ “““ १०३६ 
१०१-पोष्ड्क ओर श्रीङृष्णका युद्ध तथा पौण्ड्क- 

का वघ ध -°* १०३९ 
१०२-एकल्भ्यका  द्वीपान्तर-गमन, ` भगवान्‌ 


श्ीकृष्णका यादवौको अपनी यात्रकां संक्षिप्त 

बृततान्त वताना तथा अन्त्पुरमै र्किमिणीं 

ओर सत्यभामाते मिलकर उन संतोष देना १०४० 
१०३-हंख ओर डिग्भकके विषयमे जनमेनयका प्रशन १०४२ 


१०४-राजा बरह्मदत्तको भगवान्‌ शङ्करकी अराधनासे 
हंस ओर डिम्भक नामक पु्ोकी प्रा्ितया 
राजसा विप्रवर भित्रसहको भगवान्‌ विष्णुकी 
उपासनासे जनार्दन नामक पुत्रका लभ'** १०४३ 
१०५-दंस ओर डिम्भककी तपस्या, वरप्रा्ि, जनार्दन- 
सहित उन दोरनोका विवाह तथा तीनो इमार्यै- 
की धर्मनिष्ठा *“ """ १०५४४ 
१०६-देस ओर डिम्भककी मृगया “ *" १०४६ 


१०७-घेनासदित हंस ओर डिम्भकका पुष्कर-तटपर 
विध्वा, महिं कदयपके वैष्णवसनरका दर्शन 
तथा दुर्वासा आदि यतिर्योके खमुदायमे जाकर 


उनके प्रति अपनी सश्रद्धाका प्रदर्शन ˆ" १०४७ 


( १४ ) 


१०८-हंख जीर डिम्मक्रद्वारा संन्याखढी निन्दा तथा 
छनार्दनद्वाया वंन्याठ-आभमका मण्डन “” १०४९ 


१०९-दर्वाखाका रोष, बद्वा उनका तिरस्तारः 
ुर्बासद्यस उन दोनोकि व्यि शाप गीर 
जनार्दनके व्यि वरदान “** ˆ" १०५० 
११०-दर्वाखा आदि गुनियोका द्ारकागमन "९०५२ 
१११-ध्रीकृष्णकी मोखकीडा, बुषमौ समरे दुर्बाहा 
आदि युनिर्यक्रा आगमन तथा यादवो मोर 
आङ्ष्णद्वारा उनका सत्कार, श्रीकृष्णका उने 
वघ अनिका कारण पूना यीर दुर्वाषाका 
भगाय. सतुति प्व उपारम्भपूर्व॑क उनके 
प्रनका प्रचिवाद करके अपनी दुरद॑धाका 
यृत्तान्त सुनाना  *"“ -“ १०५३ 
११२-मगवाम्‌ भीङ्ष्णकी ख गौर डिम्भकके वघके 
लि प्रतिशा तथा श्मा-्ा्नापूर्वक उनका 


यतिर्योकौ मोजन कराना “** १०५८ 


११२-गनार्दनका । वको समाना; कितु दंषका 
उनकी वाव न मानकर उद दूत बनाकर 
दारकाको मेजना ग °“ १०५९ 
११४-जनारद॑नकी मगवदूदर्छनविषयक उक्कण्ठा" * ˆ १०६१ 
१९५-जनादंनका सुष्मा-खममे जाकर मगवान्‌ 
शरीङृष्णके दर्शने संत हो उनकी आच 
भगवत्छवनपू्वेक ईंख जीर दिम्मकका संदेश ` 
नाना ओर उसे शुनकरं याद्वौका उपहास 
करना = ^ ^“ १०६४ 
११६-धीकृष्णका जनार्दनको सदेश देकर छोटाना १०६७ 
११७-खात्यकिषदित जनादनका शल्वनगरमे जाना, 
हंसखे मिलना तया दहंखका जनार्दनते कारय 
विद्धिके विषयर्मे पूना = ^ “१०६७ 
११८-जनादंनका दंसको शरीङष्णदर्थनजनित खषना 
उल्छाद वतना, द्वारका हंष्के संदेशकी 
प्रतिक्रियाका वर्णन करके उखे राजसूय न 
करनेकी खटाह देना, दंखका उसे रोषपूरवक 
तिरक्रव करके चे बजानेके लवि कहना, 
॥ 


फिर सात्यकिका ईंखको शीह्ष्णका संदेश ` -' , 
सनाते हए. फटकारा °“ "° १०६८ 
११९-दख सौर दिम्मकफे उतयकिकर प्रति रोषपूं 
वचन तया सायकरिका उन वैषा दी उचचर 
देकर द्ारकाको प्रस्यान ^^" °** १०७२्‌ 
१२०-मगवान्‌ श्रीङृष्ण तथा यादवसेनाका पुष्कर- 
` तीर्थम लाकर हंठ गीर डिम्भककी प्रतीक्षा करना १०७३ 
१२१ गौर डिग्मक्की ठेना्माका पुष्करतीर्थमे 
प्रवेश ००१ ~= ०७०४ १०७५ 
१२२-उमयपष्ठकी सेनार्मोका घमावान युद्ध °“* १०७७ 
१९ द-श्रीङृष्ण ओर विचक्रका धोर युद्ध तथा 


विचक्रकां वघ ५०५५ *** १०७८ 
१२४-दंस मीर बलमद्रका युद्ध“ ““" १०८० 
१२५-खत्यिकि यर डिम्मकका युद्ध ”*" १०८१ 
१२६-दिडिम्बके साथ वसुदेव ओर उम्रसेनका युद्ध 

तथा चलमद्रके दारा दिदिम्बका चव "““ १०८३ 


१२७-गोवघंन पर्व॑तके समीप ईस गौर डिम्भकके 
खाय याद्वौका युद, श्रीङृष्णद्वारा भूतेश्वरोकी 
पराजय तथा भोङृष्ण यौर दंसका घोर युद्ध १०८६ 


१२८-श्रीक्ृष्णद्यारा दंखका वघ ˆ“ ** १०८९ 


१२९-डिम्मककी आत्महत्या ““““ ० ९०९५ 


१३०-गोप-गोपिर्योखदहित यशोदा भौर नन्दका 
गोवर्धन पर्वतपुर आकर श्रीकृष्ण यर 
चठमद्रसे भिल्नां “"** १०९१ 
१३१-दारका जति ए श्रीकृष्णका पुष्करमे ऋषियेषि 
मिलना तयां श्षिर्योद्रारा उनका स्वने १०९२ 
१३२-महाभारत जौर हरिवंशके श्रवणकी विचि जीर 
फल, वाचके गुण, प्रत्येक प्रव॑पर दान देने 
योग्य वस्तु, एक्षे केकर दव पारणार्मोकी 
मचा तथा -महामारत पवं इरिवंश्चका 


माद्यत्म्य "” १०९३ 
१३ ३-व्रिपुर-वघकी कथा (त "° ११०९ 
१३४-दरिवंशं वर्णित चृचार्न्तोका संग्रह “११०५ 


( १५ ) 


१३५-हरिवंश्च-भवणकी दश्विणा) फल. एवं मादासम्यका 
वणन ००० 
श्रोहरिवंश-माहात्म्य 


१-दरिवंश-भवणका मास्य, नारीके पौव दोष 

सौर हरिवंश-धवणठे उनकी निदृचि, पाठके 

उत्तम, मध्यम आदि मेद तथा गोत्रतकी विपि ११०९ 
२-(८ १ ) दरिवंशच-भवणकी विधि ओर फल. * ११११ 
३-( २) हरिवेश-भ्रवणङी विधि ओर फल"१११४ 
४-नवाहवती भरोतार्भोके पालन करे योग्य 

नियम, उनके द्वारा त्याज्य वस्तुभका उल्छेख, 

न्यायविसद्ध कथाश्रवण कसेवारलोकी दुगि, 

कथाम विघ्न डालनेके कारण एक नारीफो नरकफ- 

यातना एवं राक्षसयोनिकी प्राति तथा श्रोताभो- 

के चौदह मेद 


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£ 1 9.8। (4 १ © ।५। १ 


५-हरिवंशके नवाह-पारायणका उद्यापन,- -उस् किये ,, , 
त्ानेवाले दानः ` 'पुस्तक-पूजा ओर वाचकपूष्नन.. 
सआदिका विधान एवं माहार्म्य ८९१२१. 

६-हरिवंश आरम्भ .करनेके लिये उत्तम मार, तिथि, 
नक्षव मादिका निदेश, देवपूजन, व्यापून वि 
तया कथा-घमातिपर दी जनेवाटी दिगा एवं 
दन आदिका दष्टे तथा श्रवणकरा महात्म्य ११२४ 


( संतानगोपारु-मन्वषिंधि ) 
१-संतानमगोपारमन्वविधिः (१) "““ ११२९ 
२-संतानगोपालमन्न (२) **“ ११२९ 
३-षनःङमारोक्त सेतानगोपारमन्त्र (३) “११३० 
४-संतानगोपारस्तोत्रम्‌ “““ ११३२ 
४-श्रीविष्णुशतनामस्तोत्रम्‌ "** ११३९ 


9 ५ ~ _ ~^ . 
“°०१११६ ६-वन्ध्यानां पुत्रोच्यथ संतानगोपाटमन्तरविधिः ११४० 


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श्रीपरमात्मने नमः 


श्रीमहाभारतम्‌ 


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तस्य विटमागो ह्यिंराः 


तत्न हरिवंरापव 
प्रथमोऽध्यायः 
मड़लाचरण, शौनक-उग्ररवा-संबाद, इष्णिवंरिर्यका विस्तृत चिरि सुननेके किये 
जनमेजयी प्रार्थना ओर आदिसुष्टिका वर्णन 


नारयण नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्‌ । 
देवी सरखरतीं व्यासं ततो जयमसुदीस्येत्‌ ॥ २ ॥ 


चद॑रिकाश्रममिवासी परसिद्ध षरि श्रीनारायण (अथवा 
अन्तर्यामी नारायण ); नर ( नारायणसखा अजन अथवा 
आदि जीव हिरण्यगर्भं ) तथा नरोत्तम ( इन हिरण्यगभं एवं 
अन्तयामीसे भी श्रेष्ठ शुद्ध सचिदानन्दधन पुरषोत्तम श्रीकृष्ण) 
को भौर (इन नरनारायण त्था नयोत्तमके तच्वको प्रकट कने- 
वाटी) देवी सरखतीको एवं ( देवी सर्खतीनि संसारपर अनुग्रह 
करनेके च्ि जिनके शरीरमे प्रवेश किया दहै, उन ) व्यासजीको 
प्रणाम ` कके अविधारूपी अक्ञानान्धकरारको जीतनेवले 
इतिहास-पुराणादि म्रन्थौका पाठ आरम्भ करे ॥ १॥ 
दैपायनेष्ठपुरनिःखतमप्रमेयं 
पुण्यं पवित्रमथ पापहरं शिवं च । 
यो भारतं समधिगच्छति वाच्यमानं 
किं तस्य पुष्कर्जछैरभिषेचनेन ॥ २ ॥ 
(सोति कहते है--) जो व्यासजीके सुखसे निकछे हुए 
इस अप्रमेय ( अतलनीय ); पुण्यदायकः पविच्ः पापहारी 
ओर कल्याणमय महामासतको दूरके मुखसे सुनता हैः 
उसे पुष्कर तीके जसम खान करनेकी क्या यवदयकता 
ह १ ( महामारत-कथा उससे भी अधिक पावन है )॥ २॥ 
जयति पराक्ञरसचुः 
 स्यवतीहद्यनन्द्नो व्यासः । 
यस्यास्यकमलरगद्ितं 
वाड््रयमसतं जगत्‌ पिषति ॥ ३ ॥ 
मऽ ह° १-- 


माता सत्यवतीके दृदयको आनन्द प्रदान करनेवाछे 
उन पराशर-युत् ग्यासकी जय होः जिनके मुलारविन्दसे 
निके हुए बाख्रयरूपी अमृतका सारा संसार पान करताहै॥३॥ 


यो गोशतं कनकश्ज्ञमयं ददाति 
विप्राय वेदविदुषे बहुविश्रुताय । 
पुण्यां च भारतकथां श्टणुयाश्च तद्वत्‌ 
तुर्यं फलं भवति तस्य च तस्य चैव ॥ ७ ॥ 
जो गोओकि समम सोना दाकर वेदयत्ता एवं वहु 
ब्राह्मणको प्रतिदिन सौ गदँ दान देता है ओर जे पुण्यदायिनी 
महाभारत-कथाका श्रवणमात्र करता है--इन दोनमिसे 
मवयेकको वयावर ही फक मिलता है ॥ ४ ॥ 
शताश्वमेधस्य यद्र पुण्यं 
चतुःखहसरस्य शतक्रतोश्च । 
भवेदनन्तं हसरिवंशदानात्‌ 
प्रकीर्तितं व्यासमहर्षिणा च ॥ ५ ॥ 
जो चार हजार अक्षय अन्नस्नसि युक्त तथा इन्द्रपदकी 
भराति करानेवलि दै उन सौ अश्वमेध येका अनुष्ठान 
करनेसे इस लोकम ज पुण्य प्रात होता है, वद्य अनन्त 
पुण्य इस हसिवंदा प्रन्थका दानं करनेते उपलब्ध होता है! 
यह वात महपिं ग्यासजीने कही है ॥ ५ ॥ 
यव्‌ वाजपेयेन तु राजसूयाद्‌ 
दृष्ट फलं हस्तिरथेन चान्यत्‌ ।. 
व्छभ्यते ध्यास्वचः प्रमाणं 
गीतं च वाल्मीकिमहरपिंणा च ॥ ६ ॥ 


२ श्रीमहाभारते सिखभागे 


वाजपेय ओौर राजसूय यज्ञँके अनुष्ठानते तथा हाथी 
ज्ुते हुए रथक्रे दानसे जिस फख्की प्राति देखी या वतायी 
गयीदै, वदी फठ दरिविंश-अन्थका दान करनेसे मिल जाता है । 
इसमे व्याखजीका वचन प्रमाण है तथा महर्षिं वाल्मीकि- 
ने मी इसी मादात्म्यका गान किया है ॥ ६॥ 


यो हरिवंशं ठेखयति 
यथाविधिना मदाचपाः सपदि । 
स जयति ्टरिपद्कमकं 
मधुपो हि यथा रसेन दुग्धः ॥ ७ ॥ 
जो महातपस्वी. पुरुष शास्ीय विधिकर अनसार दरिवंडाको 
छ्लिता या छिखवाता दै, वह रपर छभाये हुए भेवरेके 
समान मगवान्‌ श्रीकृष्णकरे चरण-कमर्लौपर परहूच जाता दै ॥७॥ 


पितामहायं प्रवदन्ति घं 
महपिमक्षय्यविभूतियुकूम्‌ । 
नाणयणस्यां शजमेकपुरं 
द्वैपायनं वेद महानिधानम्‌ ॥ ८ ॥ 


[ हरिवंशे 


व्यक्ताग्यक्तखरूप, सनातन, असत्‌ ( कार्यरूप ); सदसत्‌ 
(कारण ओौर कार्यरूप ); अखिल विश्वमयः सतू यौर असत्‌- 
दोनेसि पर ( विलक्नण ); कारण ओर कायं दोनेकि कषाः 
पुरातनः सर्वोकृष्टः अविकारी; मद्धठ्कारीः मद्धलरूपः 
स्वन्यापी, सवके दवारा वरणीय, पापरहितः परम पवित्रः 
इन्दरियोकि प्रेरक तथा समसत चराचर जगते गुर 
ओीदस्कि मरणाम करके लोमहर्षण सूतके पुत्र उग्रश्रवासे 
स भ्रकरार पूषा ॥ ९-१२॥ 


श्रीनक उवाच 

सौते सखुमददाद्यानं भवता परिकीर्तितम्‌ । 
भारतानां च 'सर्वेषां पार्थिवानां दथैव च ॥ १३ ॥ 
देवानां दानवानां च गन्धर्वोँरगरक्षसाम्‌ ! 
दैत्यानामथ सिद्धानां गुद्कानां तथैव च ॥ १४॥ 

श्षौनकजीने कदा-चतनन्दन ! आपने भरतवंधिरयो, , 
अन्य सव रजार्ओ, देवताओं, दानर्वौ, गन्धर्वौ, नागो; रासो 
दर्यो, शिदधो तथा गुद्यकेसि सम्बन्ध रखनेवाद् यह वहत 


ब्रह्माजी आदि कारण श्रीनाययणफो जिनसे ऊप्की -- बदा उपाख्यान ( महाभारत ) कद ख॒नाया ॥ १२-१४ ॥ 


खटी% पीटूीका पुरुप वताते ई जो य्य विभूतिर्योसि युक्त 


तथा नारायणक्रे अंशे प्रकट दैः एकमा शुकदेव दी . 


जिनके पुघ्र ६८ अथवा जो अपने पिता पराद्रके एक ही 
पुत्र ६); वैदिक श्ञानकी महानिधिखरूम उन महर्षि 
श्रकृष्णदैपायन व्यासकी म उपासना करता हू ॥८॥ 
आद्यं पुरुषमीशानं पुरुष्टतं पुष्टम्‌ । 
ऋतमेकगक्षरं ब्रह्म व्यकलयकतं सनतनम्‌ ॥ ९ ॥ 
खश्च सदसच्चैव यद्धिदवं सदसत्परम्‌ १ 
प्रराघणणां स्रं पुराणं परमन्ययम्‌ ॥ १०॥ 
मङ्कल्यं महृटं विष्णुं वरेण्यमनघं श्युचिम्‌ । 
नमर्रत्थ हपीके्टं चराचस्गुरं सिम्‌ ॥ १९१ ॥ 
नैमिषारण्ये कुपतिः शौनकस्तु महामुनिः । 
सीति पप्रच्छ धमौत्मा सर्वराख्विद्छारदः ॥ १२॥ 
नेमिषारण्यकी वात दै सम्पूण शास्रे विरोषक्ञः 
धर्मात्मा प्वं कुलपति महामुनि शौनकने सवके आदिं 
कारणः, अन्तयामी पुरषः पुरुहूत ८ वहुत-से यजमार्नोद्वास 
दी गयी आहुतिकरो ग्रहण करनेवाले ); पुरुष्टुत ( वहूसंख्यक 
उपाठरकोदधार स्त॒त्य ); छत ( सद्यखरूप ), एकाक्षर 
( ग्रणवमय अथवा एकः अविनाशी )2 ब्रह्म ( परमात्मा ); 


 #म्यात्, परारर+ शकि, वसिष्ट, जदह तथा भगवाव्‌ 
नारायण--श्स प्रक्र गण्य करनेपर श्रीकएयणदेव व्यासनीपे 
छदी पदर कपर पूरब॑न श्वा हते रै ८ 
† जो ग्यारह हग पपथिधोको अश्र भादि "देकः पारनं 
करता दै, बह वेद-ेदाक्क पारगा शी -कपि पकुखकति कृषलाता ह 1 


अत्यद्धतानि कर्माणि विक्रमा धर्मनिश्चयाः। 
विचित्राय कथायोमा जन्म चाघ््यमञुन्तमम्‌ ॥ १५ ॥ 
कथिवं भवता पुण्यं पुराणं ऋछ्ष्णया गिस । 
मनम्कणेखुखं सौते प्रीणात्यमुतसभ्मितम्‌ ॥ १६ ४ 
आपने ( ्रपि-मदर्पियेकि ) अद्यत कर्मः ( शचूरकीरयोके ) 
चलधिक्रमः धर्मतच्चके निर्णयः विचित्र-विचित्र कथाःप्रसङ्ग 
तथा ८ द्रोण दिके ) श्रेष्ठ एवं परम उत्तम जन्म-ब्रृत्तान्त आदि 
प्राचीन एवं पुण्यग्रद विपरयोका अपनी मघुर वाणीद्वारा वर्णन 
करिया हे । उग्रश्राजी | मन ओर कार्नौको सुख देनेवाला यद 
म्रसङ्क-मुन्ने अगते खमान-वरपि प्रदान करता है ॥ १५-१६ ॥ 
तध जन्म कुरूणां वै त्वयोक्तं ङौमहर्धणे । 
न तु चरष्ण्यन्धकानां च तद्‌ भवान्‌ वक्तमहंति + १७ ॥ 
ऊोमदर्पणङ्कुमार ! आपने महामारत सुनाते समय 
ऊुखवंशिययके ही जन्मका विेयरूपछे वर्णन क्रिया है, वृष्णि 
तथा अन्धकरवंशाके वीररोके जन्मका नर्ही; अतः अव आप 
इन सवके लन्म-कर्मका भी वर्णन कीजिये ॥ १७ ॥ 


सौतिरवाच 
जनमेजयेन य्‌ पृष्टः रिष्ये व्यासस्य धर्मवित्‌ । 
तत्‌ तेऽहःसस्प्रवस्यामि वृष्णीनां षंडमादिवः॥ १८॥ 
खत पुत्र उप्त्राने कष्ठा-रौनकजी | जनमेजयने 
व्यासजीके भरमके्ता सिप्य वैशस्पायनर्जि जो कु पूषा थाः 


उसीके -अनुसार मे आरम्भसे ही शृष्णि्योक्ति वंशकाः आपे 
वर्णन करता हू ॥ १८ ॥ 


हरिवंदापरवं ] 


श्रुत्वेतिहासं कार्सन्यैन भारतानां स भारतः 1 

जनमेजयो महाभराल्तो वैशम्पायनमनषीत्‌ ॥ १९॥ 
भरतवंशी राजाओकि इतिंहासको पूर्णरूपसे सुनकर 

भरतनन्दन महावुद्धिमान्‌ जनमेजयने वैशम्पायनजीसे कहा ॥ 


जनमेजय उगच 


महाभारतमाख्यानं वद्धथं श्वुतिविस्तस्म्‌ । 
कथितं भवता पूर्व विस्तरेण मया श्चुतम्‌ ॥ २०॥ 
जनमेजयने कहा मुने ! आपने पहले वेदके अर्थ- 
को स्पष्ट कर विस्ठृतर्यमे वर्णन करनेवाखी, ( धर्म, अर्थः 
काम, मोक्ष आदि ) अनेक अ्थसि भरी दुई जो महाभारतकी 
कथा विस्तारपूर्वक कीः उसको मेने सुन लिया ॥ २० ॥ 
तन्न श्युखः खमाख्याता वहवः पुरुषपेभाः । 
नामभिः कर्मभिश्चैव वृष्ण्यन्धकमदहारथाः ॥ २९ ॥ 
उस महाभासत-कथामे आपने ब्रहुत-ते पुरुषश्रेष्ठ शर्ोका 
वर्णेन किया तथा वेहुत-ते वृणि ओर अन्धकवंशी महारथिरयो- 
के नाम ओर कमे भी वताये ॥ २९ ॥ 


तेषां कमौवदातानि त्वयोक्तानि द्िजोचम । 


तत्न तत्र समसेन विस्तरेणेव मे प्रभो ॥२२॥` १ 
" बार-बार इसको सुनता देः यह ( इस छोकमे ) अपने वशको 
, स्थापित्त कर अन्तमे स्वर्मखोक प्रतिष्ठित होता है ॥ २८ 1 


द्विजोत्तम ! उनके उत्तम कर्मकरा भी आपने उन-उन 
सखम संधिसरूपसे वर्णन किया है | प्रभो | अव आप उनको 
विस्तासपर्वक सुनास्ये ॥ २२ ॥ 
न च मे ठप्िरस्तीह कथ्यमाने पुरसतने। 
पकश्चैव मतो राश्िष्ठेप्णयः पाण्डवास्तथा ॥ २२ ॥ 
आपने पले जो संक्षि्तरूपसे वर्णन किया, उस्ते मेरी 
ठति नदं हुई है । ये दृष्णि ओर पाण्डव एक ही राशि 
( फुदधम्व ) के मने जति ह ॥ २३ ॥ 
भरवाश्च चंशक्रालस्तेषां प्रत्यक्चदरिवान्‌ 1 
कथयस्व कुट वेषा विस्तरेण तपोधन ॥ २७॥ 
तपोधन } आप वंशोकी कथा कहनेमे चुर है ओर 
उनकी सत्र बार्तौको आपने प्रत्यक्ष देखा है । अतएब उनके 
कूुल्का आप विस्तारपूर्वक वर्णन कीन्यि ॥ २४ ॥ 
यस्य यस्यान्वये येये तांस्तानिच्छामि घेदिम 
स त्वं सर्वमरोपेण कथयखर महासने । 
तेषां पूर्व॑विखष्टि च विचिन्त्येमां भजापतेः ॥ २५॥ 
महामुने { जिस-निसके कुलम जो-जो उत्पन्न हुए. हौः 
उन स्वको मे जानना चाहता ई; अतएव यरजापतिसे 
आरम्भ करके पू्वकार्म उनकी जिष प्रकार खष्टि हुई दे, 
उख सव्रका विचार करके आप मुञ्चे पूर्णरूपसे सत्र कथा 
' सुनादये ॥ २५ ॥ 


ग्रथमो ऽध्यायः द 


नन । 


त 


सौतिरुवाच 
सत्छरत्य परिपृष्स्त॒ स महात्मा महातपाः} 
विस्तरेणाचुपूव्यौ च कथयामास तां कथाम्‌ ॥ रदे ॥ 
उग्रश्रवाने फष्टा--जव्र सत्कारपूर्वक उनसे यद 
वात पूरी गयी, तव वे महातपस्वी महात्मा वैदाम्पायन 
क्रमशः जीर विसारे साथ उस वंदावलिकी कथा कहने रगे ॥ 


सश्रम्पायन उवाच 


म्णु राजन्‌ कथां दिष्यां पुण्यां पायप्रमोचनीम्‌ । 
कथ्यमानां मया चितां बहथां श्वुतिखम्मिताम्‌॥ २७॥ 
वैस्पायनजीने कशा--राजन्‌ ! सुनो, यद 
( बृ्णिवंशियोके जन्मकी ) कथा अलैक्रिकः पुण्वमयी 
ओर पापोँखे मुक्त करनेवाटी हैः इसमे ८ धर्म, अर्थः कामः मोक्ष 
आदि ) अनेक पुरुषार्थौका उपदेश है इस वेदके समान मान्‌- 
नीय तथा आश्वर्यमयी कथाका मै आपसे वर्णन करता ह || २७॥ 
यश्वेमां धारयेद्‌ वापि श्णुयाद्‌ षाऽप्यभीस्णशः। 
स्ववंशधारणं त्वा खगंरोे महीयते ॥ २८ ॥ 
ओ इस कथाको अपने दयम धारणं कस्तां है या 
इसको पुस्तकके रूपमे अपने घरमे स्थापित करता है अथवा 


अन्यक्तं कारणं यत्‌ तरिनत्यं सदसदात्मकम्‌। 
प्रधानं पुरुषं तस्मान्नि्ममे विश्वमीश्वरम्‌ ॥ २९॥ 
जो नित्यः सदसत्खखूप तथा कारणभूत अव्यक्त प्रकृति 
है, उसीको “प्रधानः कहते दै । सर्वराक्तिमान्‌ पुरुषरने उसीसे 
इस विश्वका निर्माण करिया है ॥ २९॥ 
तंव विद्धि. मदप्यज ब्याणममितौजसम्‌ । 
ख्टारं सषभूतानां नारायणपरायणम्‌ ॥ ३० ॥ 
महाराज [ ठम अमिते तेजखी अह्याजीको दी पुरुष 
समद्यो \ चे समस प्राणिर्योकी खट करनेवले तथा मगवान्‌ 
नारायणके आशित ह ॥ २० ॥ 
अहङ्कारस्तु म्टवस्तस्माद्‌ भूतानि जकषिरे । 
भूतभेदाश्च भूतेभ्य इति सर्गः सनातनः ॥ ३१॥ 
(प्रकृतिंतते महन्तत्वः ) महत्त्वे अहंकार तथा अदंकारसे 
सव्र सुषम भूत उत्पन्न हुए । भूतोके जो स्थूल भेदर्दै वे मी 
उन सष्म भूखे ही प्रकट हुए है । यद (८ अनादिकाल्ये 
प्रबाहरूपसे चलम आनेवाल्म >) सनातन सर्ग है ॥ ३९१ ॥ 
विस्तरावयवं चैव॒ यथाप्रक्षं यथाश्रुति । 
कीर्यमानं णु मया पूर्वेषां कीरतिदधनम्‌ ॥ २२ ॥ 
अब जैद भेरी बुद्धि द. ओर जैसा मैने गुसजनेखे सुन 


४ श्रीमहाभारते खिखभागे 


[ शिवं 


न ववव्व्््् 


रखा है, उसके अनुसार भँ भूतसर्गका विस्तारपूर्वक वर्णन 
आरम्म करता हः सुनो । यह प्रसंग पूरव्जोकी कीर्तिका 
विस्तार करनेवाल ह ॥ ३२ ॥ 
धन्यं यस्यं शाचुध्नं खरग्यमायुःपव्धंनम्‌ । 
कीर्तनं स्थिरकीर्तीनां ` सचैपां पुण्यकर्मणाम्‌ ॥ २३ ॥ 
स्थिर कीरतिवाठे उन समस्त पुण्यकर्मा पूर्वके यगका 
कीर्तन धन थर यदकी वद्धि करनेवाला; शतुर्भोका नाशकः 
खर्गकी प्राप्ति करानेवास्म तथा आयु वदानेवाख दे ॥ ३३ ॥ 
तस्मात्‌ कर्पाय ते कल्यः समग्रं शयुचये श्युचिः। 
था दृष्णिवंदाद्‌ वक्ष्यामि भूवसगंमलत्तमम्‌ ॥ २४ ॥ 
ठम इस यिपयकौ हृदयंगम करने समर्थं ओर शुद्ध 
हो ओर म इसका वर्णन करसनेम समर्थं हूं | अतः पवित्र 
होकर आरम्भसे श्रेणिवंशपर्यन्त परम उत्तम भूतसर्गका 
वर्णेन करेगा ॥ ३४ ॥ 
ततः खयम्भूमेगवान्‌ सिखश्ुर्विविधाः प्रजाः 1 
अप पव ससर्जादौ तासु वीर्य॑मवाखजत्‌ ॥ ३५॥ 
तदनन्तर सखयम्भू. भगवान्‌. नारायणने नाना प्रकासकी 
प्रजां उत्पन्न करनेकी इच्छसि सवेसे पले जल्की दी खट 
की । फिर उख जलम अपनी रक्तिका आधान किया ॥ २३५॥ 
पो नासा इति परोक्ता आपो यै नरसूनवः । 
अयनं तस्य ताः पूर्वं तेन नासथणः स्रुतः ॥ ३६॥ 
जलका दूसरा नाम ह नारः क्योकि उसकी उत्यसि 
भगवान्‌ नरे हुई & । वह जल पूर्वकाले भगवानूकरा अयन 
हया; इसय्यि वे नारायणः कलयते ईद ॥ ३६ ॥ 
हिरण्यवर्णमभवत्‌  तदण्डमुदकेश्चयम्‌ । 
तत्र जते खयं बर्मा खयम्भूरिति नः श्रुतम्‌ ॥ ३७ ॥ 
भगवानने ज्म जो अपनी शक्तिक्रा आधान किया था 
उसवे एक बहुत विगराल सुवर्णमय अण्ड प्रकट हु, बद्‌ 
दीर्वकार्तक जल ही सित था । उसी सखयम्भू ब्रह्माजी 
उत्पन्न हुए--फेसा हमने सुना दै ॥ ३७॥ 
दहिरण्यगभां भगवानुषित्वा परिवत्सरम्‌ । 
तदण्डमकरोद्‌ दघं दिवं श्ुषमथापि च ॥ ३८॥ 
भगवान्‌ दिरण्यगर्म॑ने उस अण्टर्मे एक वर्पृतक निवास 
करके उसके दो दुकदे कर दिये । किर एक उकदेसे धुरोक 
बनाया ओर दूसरेते भूटोक ॥ ३८॥ 
तयोः ्कलयोमेच्ये आकादामख्जव्‌ प्रथः । 
भण्डु पारिषत पूर्वी दिशश्च दशधा दधे ॥ ३९ ॥ 
उन दोनो इकडे वीच मगवान्‌ व्रदमाने आकार 
( अवकाश ) की खषटि की । जल्के ऊपर तैरती दुई प्रथ्वीको 
स्थापित किया । किर दसो दिर निध्ित कीं | ३९॥ 


त्र काटं मनो वाचं कामं क्रोधमथो रतिम्‌ । 
ससर्ज खष्टि तद्रूपां खष्टुमिच्छन्‌ प्रजापतीन्‌ ॥ ४० ॥ 
उस व्रद्याण्डके भीतर ही उन्देनि कालः मनः वाणीः कामः 
क्रोध तथा रति आदि भारवोकरी खष्टिकी] फिर इन भार्वोके 
अनुरूप खष्टि करनेकी इच्छाव व्रह्माजीने निम्नाद्धित (सात) 
प्रजापतिर्योको उन्न किया ॥ ४०॥ ,., 
मरीचिमन्यद्धिस्सं पुखस्त्यं पुरं कतुम्‌ । 
वसिष्ठं च मदातेजाः सो ऽखजत्‌ सत्त मानसान्‌॥ ४१ ॥ 
उनके नाम दस प्रकार ई--मरीचि, अत्रि, अद्धिराः 
पुलस्त्यः युकहः करत ओौर वसिष्ठ ¡ मदहातेजस्वी व्रह्माने इन 
सर्तौकी अपने मन ( संकद्प से खष्टि की ( अतः ये उनके। 
मानस पुत्र दं) ॥ ८१ ॥ 
सत्त बरह्माण श्व्येते चुराणे निश्चयं गताः । 
नारायणात्मकानां वे सप्तानां वह्यजन्मनाम्‌ ॥ ४२ ॥ 
ततो.ऽखजत्‌ पुनव्रंह्या रुदं रोषात्मसम्भवम्‌ ॥ 
सनत्कुमारं च धियं पूर्वेषामपि पूर्वजम्‌ ॥ ४२॥ 
पुस्णेमि ये सात व्रह्मा निश्चित क्रिये गये द । भगवान्‌ 
नारायण मन ङगये रहनैवाे इन सात ग्राह्धणेकी सष्टिके 
अनन्तर ब्रह्माजीने अपने रोप्रते सद्रफो प्रकट किया । 
फिर पूरवजेक्रि भी पूर्वन भगवान्‌ सनत्छुमारजीको 


¡उत्पन्न किया ॥ ४८२-४३ ॥ 


सप्तैते जनयन्ति स्म प्रजा सुद्र भारत। 
स्कन्दः सनत्कुमारश्च तेजः संक्षिप्य तिष्टतः ॥ ४४॥ 
भरतनन्दन ! ये मरीचि आदि सात ऋषि तथा सद्रदेव 
प्रनाकी खि करने ख्ये । छन्द ओर सनत्छुमार--ये दोन 
अपने तेजका संवरणं करफे रदते द ॥ ५४॥ 
तेषां सत्त महावंशा दिव्या देवगणान्विताः। 
क्रियावन्तः प्रजावन्तो मदर्पिभिरटंङताः ॥ ४५॥ 
उक्त सात महर्पिरयोक्रि सात ब्डे-डे दिव्य वंड ई। 
देवता भी इन्दी वंशौ अन्तर्गत दं । उन सातौ वंशषौके रोग 
कर्मनि एवं संत्तानवान्‌ दै । उन वंको वडे-वडे ऋषिर्योनि 
सुदोमित किया दै ॥ ४५॥ 
विदयुतोऽशनिमेघांश्च रोषठितेन्द्रधनूपि च । 
वयांसि च सखजौदौ .पर्जन्यं च ससर्ज ह ॥ ४६॥ 
इसके वाद व्रह्माजीने पहले विद्युत्‌, वचर मेषः -रोहित 
(सीधा) इन्द्र-धनुपः पक्षिसमुदाय तथा पर्जन्यकी खष्टि की ।}४६॥ 
चऋछचो यजूपि सामानि निर्ममे यश्सिद्धये 1 , 
मुखाद्‌ देवानजनयत्‌ पितृदचेश्चोऽपि वक्षसः। ४७॥ 
फिर बरह्माजीने यज्चकी षिद्धिके स्यि ( नित्यषिद्ध ) 
एक्‌; यजुः ओर सामकरा आविष्कार क्रिया | फिर 


हरिवं शापवं | 


दितीयो ऽध्यायः ५ 


देश्वर्यसील ब्रह्माने अपने मुखते देववार्थोको ओर वक्नःखल्े 
पितर्तेको प्रकट किया | ५७ ॥ । 


प्रजनाश्च मनुष्यान्‌ वै जघनाक्निर्ममे ऽसुरान्‌ । 
साध्यानजनयद्‌  देवानिव्येचमनुद्श्चम ॥ ४८ ॥ 
फिर उन्दने उपस्थेन्दियते मटा््योको ओर जंधा्ओंसे 
असुरोको उत्पन्न किया ! तदनन्तर उन्दने साध्य नामक पराचीन 
देवता्ओंको प्रकट किया, एेसा हमने सुना ह ॥ ४८ ॥ 


उश्चावचानि भूतानि गात्रेभ्यस्तस्य जक्षिरे 
आपवस्य प्रजासर्गं जतो हि प्रजापतेः ॥ ४९॥ 


इस प्रकार प्रजाकी खष्ट सचते हुए. उन आपव (अर्थात्‌ 
जलम प्रकट हुए ) प्रजापति बह्माके अद्खोमिसे उच 
तथा साधारण श्रेणीके बहुत-से प्राणी प्रकटं हुए ॥ ४९ ॥ 


खज्यमानाः प्रजा नैव विवर्धन्ते यद तदा ! 
दिधा रत्वा ऽऽत्मनो देहमर्धंन पुरुषोऽभवत्‌॥ ५०॥ 
अधन नासी तस्यां स सखृजे विविधाः प्रजाः। 
दिवं च पृथिवीं चैव महिम्ना व्याप्य तिष्ठतः ॥ ५९१ ॥ 


इसं प्रकार वे आपव-प्रजापतिं ( मानसिक ) प्रजा्ओको 
स्व र्दे ये; परु वे प्रजाप जवर ( अधिक) न वदी, तेव 
वे अपने शरीरके दो भाग कर एक भागते पुरुष 
ओर दूसरे भागते नारी हो गये ओर (उख नारीने गाय, 
घोड़ी आदि जिस-जिस रूप्को धारण करियाः पुरुषने उसी 
जातिके वैरः घोडे आदिका सूप धारण किया, ) इ प्रकार 
उन्दनि' उस नामे अनेक पकारकी मैधुनी.प्रजा्थको 


रचा । इस प्रकार वे पुर ओर नारी अपनी महिमाते खभ 

ओर पृथ्वीपर व्याप्त हो गये ॥ ५०-५२१॥ 

विराजमखजद्‌ विष्णुः सोऽसटजव्‌ पुरुषं वि्‌ 

पुरूपं तं मनुं विचि तद्‌ वै मन्वन्तरं .संमरतम्‌ ॥ ५२ ॥ 
भगवान्‌ विष्णुने विराग पुरुष ( आपव प्रनापति या 

ब्रह्मा) की वष्टि की थी ओर विराट्ने पुरषकी ¡ उस वैराज. 

पुरुषको तुम मनु समन्लो ८ ओर उनकी खछीको शतरूपा ) 1 

मनुके समयको दी मन्वन्तरका कदय गया दै ॥ ५२ ॥ 

दितीयमापवस्यतन्मनोरन्तरसुच्यते । 

स वैराजः प्रजासर्गं ससज पुरुषः भ्रथुः । 

नाखयणविखगः स प्रजास्तस्यान्ययोनिजाः ॥ ५२ ॥ 
आपवपु्र मनुकी जो यह दूसरी योनिज शष्ट है, यी 

से मन्वन्तरका आरम्भ वताया जाता है ! इस प्रकार शक्तिशाली 


. वैराज पुरुष ८ मनु ) ने प्रजासर्गकी सष्टि की । आपव 


प्रजापतिको नारायणसर्गं कहा गया है ( क्योकि वे नारायणः 
से ही प्रकट हुए ई ) । उनकी अयोनिजा मजा प्रथम सर्गं है 
( ओर मनुकी योनिजा पजा द्वितीय सर्गं ) ॥ ५२ ॥ 
मायुष्मान्‌ कीर्तिमान्‌ धन्यः प्रनावाज्छुतवा स्तथा । 
आदिसर्गे विदित्वेमं यथेष्टां गतिमाप्ठुयात्‌ ॥ ५७ ॥ 

जो दस आदि खष्टिको इस प्रकार जान केता है, वद 
आयुष्मान्‌? कीतिमान्‌; धन्यवादका पात्र संतानवान्‌ ओर 
विद्वान्‌ होता दैः उसे इच्छानुसार उत्तम गति प्राप्त 
दोती दै ॥ ५४ ॥ 


दति श्रीमक्षामारते लिलभागे हरिवंशे हरिंशपर्वणि भादिसरमक्यने मथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ 
दस प्रकार क्रीमहाभासत सिरमाग दयिवंशके अन्त्ैत इििकापवमे अदिसुथिकिा वर्णनवरिषयकर पसा भध्याय पूरा हमा ॥ ९ ॥ 


हितीयोऽध्यायः 


खायम्भुब मुके वंश ओर दकष प्रजापतिकी-उत्यत्तिका वर्णन 


वेश्चमपायन उवा 
स खुष्टाखु भरजास्वेवमापवो वै प्रजापतिः। 
ङेभे वै पुरुषः पर्व शतरूपामयोनिजाम्‌ ॥ १ ॥ 
वैशम्पायनीीने कहा--जनमेजय ! इस प्रकार 
( अयोनिज-मानसिकं) प्रजार्ओंकी स्वना हो जानेषर वह आपव 
प्रजापति (ब्रह्मा) ही (अपनी देहके दो भाग करके एक भागसे 
सनु नामक » पुरुष बन गये ओर उन्दनि देहके दूसरे भागते 
चनी हुई अयोनिजा शतरूपाको पत्नीरूपमे खीकार किया ॥ 
भापवस्य महिम्ना तु दिवमावृत्य तिष्ठतः । 
धमणेव महाराज हतरूपा व्यजायत ॥ २॥ 
महाराज † अपनी महिमहि चुखोकको व्याप्त करफे खित 
इए मनुके धर्मखे ही उनकी पत्नी शतसूपाकी उत्ति हुई॥२॥ 


सा तु वषोयुतं तप्त्वा तपः परमदुश्चरम्‌ । 
भतरं दीततपसखं पुरूपं प्रत्यपद्यत ॥ ३ ॥ 

वह्‌ शतरूपा दस हजार वर्पोतके प्रम दुम्कर तप करके 
( संतानकी कामनासे ) तपसे चमक्ते हुए अपने खामी 
वराज पुरुषके पास आयीं ॥ ३॥ 


११ 
सख वं खायस्घुवस्तात पुरुषो मचुरुच्यते । 
तस्येकसप्ततियुगं मन्वन्तरमिहोच्यते ॥ ४ ॥ 

तात ! वे पुरष॒ ही स्वायम्डव मलु के जति ई । उन 
(के अधिकार ) का (सत्ययुग तेता द्वापर जीर कलियुगल्म ) 
इक्र चतुय्गोका समय इस संसारम मन्वन्तर कदलाता 
दहे ( यद मन्वन्तर संध्या ओर संध्यांशके कारण इकहतर 
चठयुगोख मी कुछ अधिक समयका होता है ! ) 1 ४॥ 


द 


घंराजात्‌ पुरुषाद्‌ वीरं शतरूपा व्यजायत । 
प्रियचतोचानपादौ चीरात्‌ काम्या व्यजायत ॥ ५ ॥ 
वैराज पुक्य मनुर उनकी पत्री शतरूपाने वीर नामक 
पु्को जन्म दिया ओर वीरे उनकी पत्नी काम्यने प्रियत्रत 
चया उत्तानपादो उदयत क्रिया ॥ ५॥ 
काम्या नाम महावाहो कर्दमस्य प्रजापतेः। 
काम्ापुस्रास्तु चत्वारः सम्राट्‌ कुक्षिवियाट्‌ प्रभुः। 
परिययतं समाक्ताद्य पति सा खघुवे खतान्‌ ॥ ६॥ 
मदाब्ादयो | कर्दम प्रजापतिकी एक काम्या नामबाली 
प्री थी, उस काम्वाके सम्राट्‌, कुभिः विराट्‌ ओर प्रथ 
नामक चार पुत्र उत्वन्न हुए । उस काम्याने प्रियत्रतको 
पतिर्पमे पाकर इन पुर््ोको उत्रन किया या) ६ ॥ 
उ्ानपादुं जग्राह पुवरमधिः प्रजापतिः 1 
उशनपादाश्चतुरः खृदताजनयत्‌ सखुतनि ॥ ७ ॥ 
प्रजापति अत्रिने उत्तानपादको पुचरूपमे प्रहण कर चया | 
उत्तानपादसे उनकी पत्नी सूद्धताने चार्‌ पुत्रको उत्पन्न किया 
धम॑स्य कन्या सुश्रोणी सन्ता नाम विश्रुता । 
उत्पन्ना वाजिमेधेन धवस्य जननी द्यभा॥ ८ ॥ 
धर्मकी एक सूता नामते प्रसिद्ध सुन्दर कचिवाटी पुरी 
थी व धर्मक य अश्वमेध यसे प्रकट दर्द थी, यदी 
कश्याणकारिणी सृता ध्रुवकी माता थी ॥ ८ ॥ 
धुं च कीतिमन्तं च दिवं श्वान्तमयस्पतिम्‌। 
उत्तानपादो ऽजनयत्‌ सुयुतायां प्रजापतिः ॥ ९ ॥ 
प्रजापति उत्तानपादने सुता नामवाटी पत्नीमे धरुवः 
कीर्तिमान्‌, शान्तस्वरूप दरिव ओर अयस्पति नामक पुत्रको 
उत्यन्न किया या॥ ९॥ 
धुवो घप॑सखष्स्नाणि धीणि दिव्यानि भारत । 
तपस्तेपे महारज भ्ार्थयन्‌ खुमदद्‌ यदाः ॥ १०॥ 
भरतवंगी मदाराज | धरुवने जिनका नाम महाय # है, उन 
मगवान्‌. नारायणको पनेकी इच्छते तीन हजार दिव्यां 
यर्पोततक तपशिया या॥ १०॥ 
तस्मै घ्रह्या ददौ प्रीतः स्थानमप्रतिमं भुवि । 
यलं चेय पुरतः सपर्पीणां प्रजापतिः ॥ ११॥ 
प्रजापाटफ़ मगवान्‌ ब्रह्मा ( विष्णु ) ने ध्ुवपर प्रसन्न 
हचेयर उनको मर्पय सम्मुख एक अटीकिकः अचल 
स्यान प्रदान त्यि ॥११॥ 
तस्यातिमाघारद्धि च महिमानं नियत्य च । 
देवाष्धखणामाचायैः ग्छोकमप्युदाना जगौ ॥ १२॥ 
---=- ~~~ 


# यस नाम द्द्‌ यः 1 ( मानाएवपोपनिषद्‌ १ । १० ) 
ननुष्योरः प यपं देवताञेख्र पक दिव्य दिन हेता दै। 


[कि 
1, 


श्रीमहाभारते विलभागे 


----------------------------------------------------------- 


\ } 


[ हरिवंशे 
्रुवकी वड़ी मारी समृद्धि ओर मदिमाको देखकर देवताश 
ओर असुरोके आचारय श्ुक्राचार्यने इस शछोकका गान किया--॥ 


अहोऽस्य तपसो वीर्यमहो श्रुतमहो वरम्‌ । 

यदेनं पुरतः छृत्वा धुवं सप्तपंयः स्थिताः ॥ १३ ॥ 
(रन श्ुवके तोव्रुको देखकर आश्चयं होता दैः इनका 

दाखन्ञान मी विसयविमुग्ध कर देता है ओर इनकी रक्ति भी 

अह्वत दैः तमी तोये स्तं मी इनको अपने अगे 

स्थापित करके सित ई ॥ १३॥ 


तस्माच्छ च भव्यं च धुवाच्छम्भुव्यंजायत। 
च्छिष्ेसधत्त खुच्छाया पञ्च पुजानकटमधान्‌ ॥ १७ ॥ 
रिपुं रिपु्यं पुण्यं ष्क घूकतेजसम्‌ । 
रिपोराधत्त बृहती चा्चुषं स्वं तेजसम्‌ ॥ १५॥ 
उन श्रुवे छम्य नामवाखी खनि श्छिषटि ओर भव्य नामक 
पुर्बको उत्यन्न क्रिया । शिष्टे खच्छाया ( नामकी पत्नी ) ने 
रिपु, रिपुञ्ञय, पुण्य, इकर ओर वरकतेजा-्योच निष्पाप 
पुर्बोको उत्पन्न किया } रिपुसे उनकी बृहती नामकी पत्नीने 
सत्र देवताओकि तेजसे परिपूर्णं चाक्षुष नामक पुत्रको उन्न 
क्रिया| १४-१५ ॥ 
अजीजनत्‌ पुष्करिण्यां चीरण्यां चा्चुपो मदम्‌। 
प्रजापतेरात्मजायामरण्यस्य महात्मनः ॥ १६॥ 
मनोरजायन्त दश॒ नड्वलायां महौजसः 
कन्यायामभवन्छेठा वेराजस्य प्रजापतेः ॥ १७॥ 
चाक्षुपने यीरणकी पुत्री पुष्करिणीके गर्भ॑से मनु नामक पुत्रको 
उदयन क्रिया । वैराज ग्रजापतिके वयम उत्पन्न हुए इन परम 
तेजस्वी मदुते महात्मा अरण्यकी पुत्री नड्वखर्मे दस श्रेष्ठ 
पुत्र उत्मनन हुए ॥ १६.१७ ॥ 
ऊरुः पुसः शातद्युम्नस्तपस्वी सत्यवान्‌ कविः । 
अग्निष्टुदतिरान्रश्च सखुदुम्नर्येत्ि ते नव ॥ १८॥ 
अभिमन्युश्च दशमो नडवखायाः सुताः स्मरताः 
ऊरोरजनयत्‌ पुजा. पडाम्ेयी महाप्रभान्‌ । 
अङ्गं खुमनसं स्याति क्रतुमद्विरसं गयम्‌ ॥ १९ ॥ 
ऊरः पुरः टातचयुम्न, तपस्वी, सत्यवान्‌ कविः अग्नि- 
ष्टुत्‌, अतिरात्र ओर सुदुम्न-ये नौ ओर दसर्वो अभिमन्यु, 
ये नडवलके पुत्र कदे जति ईद । ऊरुसे अग्निकी कन्याने अङ्गः 
खमनाः ख्याति, क्रतु, अङ्घिर ओर गय नामक्र उत्तम कान्ति- 
वाले छः पुर्वोको उत्पन्न किया था | १८-१९ ॥ 


# मव्रायणीय-उपनिषदमे कषा है कि इन्द्रो अभय देनेके 
स्यि सीर द्रोका क्षय करनेके चिये ब्र्स्पति टी दूरे शयीरसे 
क्के रूपम प्रकट हो गये णौर उन्होनि मविधाको रचकः असुः 
फो मोम दाढ रखा ६। 


हरिषंशपवं ] 


विसीयो ऽध्यायः 


---------------------------------------- 44 


अङ्कात्‌ सुनीथापत्यं यै वेनमेकमजायत 1 
अपचत्‌ तु वेनस्य प्रकोपः सखुमष्टानभूत्‌ ॥ २० ॥ 
अङ्गते ( मूल्युकी पुत्री ) सुनीयाने वेन नामक्र एक पुत्रको 
उत्पन्न किया था । वेन अत्याचासै था (देवता, धर्म आदिसे द्रोह 
रखता था), अतएव ऋपरियोको उसपर बड़ा क्रोष आया 1२०] 
प्रजार्थग्रुषयो यस्य ममन्धुरद॑क्षिणं करम्‌ । 
वेनस्य पाणौ मथिते वभूव मुनिभिः पृथुः ॥ २९॥ 
( ऋरृषियोके फोपसे नष्ट हुए ) वेनके दाहिने दायको 
सुनि्ोनि संतान उत्पन्न केसैके स्यि मथा; तत्र मुनियोके मथे 
हुए. वेनके दाहिने दाथते प्रथुकी उत्पत्ति दुई ॥ २१ ॥ 
तं टरा ऋषयः प्राहुरेष वै मुदिताः प्रज्ञाः 
करिष्यति महातेजा यद्ध पाष्स्यते मदत्‌ ॥ २२॥ 
शृषियोनि उसको देखकर कदा--“यह प्रथु प्रजा्ओंको 
प्रसन्न करेगा ओर इख मदातेजखीको उत्तम यशकी प्राति 
होगीः ॥ २२॥ 
ख धन्वी कवची खद्धी तेजसा निर्द॑हम्निव । 
पृथ्वैन्यस्तदा चेमां ररष्त क्षत्रपूर्वजः ॥ २३॥ 
तवर वे क्षनिय-जातिमे प्रथम उत्पन्न हए वेनके युत्र 
पृथु धनुषः, कक्च ओर तख्वार धारण कर अपने तेजसे 
( डाकू, अधर्मी आदि दुष्ट पुस्पं ) मसा करते हण 
इस प्रथ्वीकी रक्षा कसे रगे ॥ २३॥ | 
राजसूयाभिषिक्तानामाधः स. वश्धाधिपः। 
तस्माच्चैव ससुत्पन्नौ निपुणौ सूतमागधौ ॥ २४॥ 
पथु राजख्य यक्ञमै अभिषिक्त होनेवले राजाओमि प्रथम 
भूपति । ( उन्दीके यकम अग्निस रजार्ओकी स्ति करनेमे ) 
चतुर सूत तथा ( राजार्ओंकी वंशावली पदुनेमे ) प्रवीण 
मागध प्रकट हुए ये ॥ २४८॥ । 
तेनेयं गो्म्ाराज दुग्धा सस्यानि, भारत । 
प्रजानां षृत्तिकामेन देषैः खपिगणेः सष ॥ २५॥ 
भरतवंशी महाराज | परना्थोकरो आजीविका देनेकी इच्छ 
वल पृथुने देवता ओर छपिर्योकी मण्डलि्योको साथमे ठे गौ- 
रूपिणी पृथ्वीते अन्न ८ आदि सकर वस्वुओं )को दुहा था॥ 
पिदभिदौनवेश्वैव गन्धैः साप्सरोगणैः । 
सर्पः पुण्यजनैश्चैव वीरुद्धिः पर्वतैस्तथा ॥ २६ ॥ 
तेषु तेषु -च पात्रेषु दुह्यमाना चसुन्धरा । 
भरादाद्‌ यथेष्छितं क्षीरं तेन भ्राणानधास्यन्‌ ॥ २७ ॥ 
( प्रधुके खमय ) पितरः दानवः गन्धर्व, अप्सरा, सर्प, 
यक, ृक्च ओर पर्वतोनि अपने-अपने पामे दुहा -या | पृथ्वीने 
# उनके कैसे-केसे पात्र येः कैते-वैसे बख्डे.ये ओर उन्होने 


कोम-कौन-सा दूष दुहा था, श्का विस्तृत वर्णन आगे ५ वें अध्याये 
येग । 


उनको इच्टानुखार दुं दिया था ओर उस दूरे उन सवने 
अपने प्रार्णोको धारण किया था ॥ २६-२७ ॥ 


पृथपुशौ त धर्मो जाते.ऽन्तद्धिपालितौ । 
हिखग्डिनी दविधीनमन्तर्धानाद्‌ व्यजायत ॥ २८ ॥ 
युके अन्तर्पान जीर पाल्ति-ये दो धरमन हु मीर 
अन्तर्धाने दिखण्डिनीने हविर्धान नामक पुत्रको उत्मनन 
किया ॥ २८ ॥ 
हविधौनाव्‌ षडग्नेयी धिषणाजनयत्‌ सुतान्‌) 
प्राचीनबर्हिषं शङ्खं गयं छृष्णं वजाजिनौ ॥ २९॥ 
हषिर्धानिसे अग्निकी पुती पिपणाने प्राचीनवर्दिः शङ्क 
गयः कृष्णः ब्रन ओर अनिन नामवले छः पुर््ोको उत्पन्न 
किया ॥ २९॥ 
प्राचीनवर्हिभंगवान्‌ महानासीवद्‌ प्रजापतिः“ । 
हविधौनल्महारज येन संदरदधित प्रजाः ॥ २३० ॥ 
महाराज { भगवान्‌ प्राचीनवर्ि, जिन्टने प्रजार्ओोका 
पाटन एवं संवर्धन किया थाः अपने पिता हविर्धाने 
बटुकर प्रजापाठ्क दए. ॥ २० ॥ 


प्राचीनाग्राः छुद्ास्तस्य पृथिव्यां जनमेजय । 
प्राचीनवर्हिभगवान्‌ पृथिवीतचारिणः।॥ ३१ ॥ 
जनमेजय उनके यक्‌ करते समय विछे हुए. प्राचीनाग्र 
कुश समस भूमण्डकपर फीरुकर उनके महत्वको प्रकट कर्‌ रदे 
थे, अतएव उनका नाम भगवान्‌ प्राचीनवर्हि हे ॥ ३१ ॥ 
समुद्रतनयायां तु कवदासेऽभवत्‌ प्रभुः । 
महतस्तपसः पारे सवर्णायां महीपतिः ॥ ३२॥ 
महीपति प्रु प्राचीनवर्दिने वडा भारी तप कसनेके 
पश्चात्‌ समुद्रकी पुत्री सवणोके साथ विवाह किया ॥ ३२ ॥ 


सवण ऽ ऽधत्त खासुद्वी दश्च भ्राचीनवर्िंषः। 
सवं प्रचेतसो नाम धयुव॑दस्य पारगाः ॥ ३६ ॥ 
प्राचीनवर्हिसे समुद्रकी पुत्री सवर्णाने दख पुत्र उत्पन्न 
किये, उनं दर्सोका परचेता यह एकदीनामथा। वेसर 
धनुवदके पारगामी थे ॥ ३३ ॥ 
अपृथग्धर्मचरणास्तेऽतप्यन्त महत्तपः । 
दशावषसष्टसाणि खमुद्रसलिेशयाः ॥ ३४ ॥ 
बे खव ्रचेतागण एक साय समान धर्म-कर्मका आचरण 
करते ये ओर एकस. शील्वठे येः उन्होने समुद्रकै-जस्मे 
प्रवेश करके दस हजार वर्षोतकं बड़ी भारी तपस्या की ॥२५] 
# येशर्यश्य समग्रेख `धर्मख - यशः नियः । 
शनकेरग्ययोस्चैमः प्णां भग॒ शतीरणा ५॥ 
पूणं देशय, पमं, यश्च, रकमी शान सौर चैराग्यका -नाम भम 
४१ ये छः वस्तु जिनमे पूणंश्पते शे रेरे योगौ मषटप्मा भादिके 
साथ भी-भगवान्‌ छष्दक्र भरयोग त्रिया मा सक्लाहै 


ए 


\9 


८ भीमहाभारते सिकभागे 


तपश्चरत्सु पृथिवीं प्रचेतस्सघु मष्टीरुहाः। 
खरक्यमाणामाववुरवभूवाथ प्रजाक्षयः ॥ ३५ ॥ 

जव प्रचेतागण तप कर रहे थे, तव्र॒ अरक्षित पड़ी ह 
प्र्वीको श्नि चारौ ओरसे ठक दिया, इससे प्रजार्ओका 
नाश दोने लगा ॥ २५ ॥ 


नाशकन्मातो वातुं दृतं खमभवद्‌ दमैः । 
दशवर्षसहस्राणि न रोकुश्ेष्ितुं परजाः ॥ ३६॥ 


दस हजार वमिं वृक्षेनि आकारतकको घेर च्याः 


तत्र वायुका चलना वंद हो गवा ओर प्रजार्ओका चेष्ट 
करना ( हाथ-पैर दिलाना ) मी वंद होने खगा ॥ २६॥ 
तदुपश्चत्य तपसा युक्ताः स्वै प्रचेतसः । 
मुखेभ्यो बायुमग्नि च तेऽखज्ातमन्यवः ॥ २७ ॥ 
अपनी तपस्या ८ श्ानदृ्टि ) से इन सव्र वातोँको जानकर 
सव्र प्रचेता इखका उपाय केके ल्थि उद्यत हो गये ओर 
उन्देनि क्रोधने भरकर अपने मुखेसि वायु ओर अग्निक प्रकट 
किया ॥ ३७ ॥ 
उन्मूलानथ तान्‌ छृत्वा वृक्षान्‌ बायुर्शोषयव्‌ । 
वानग्निरदष्टद्धोरं पवमासीद्‌ दुमक्षयः ॥ ३८ ॥ 
वायुने इृ्षोको जद्से उखाढ़कर उनको सुखां दिया, 
तवर अगि प्रचण्ड होकर उन इक्षोको जखने छ्गीः इस 
प्रकारं दृक्षोका नार होने ख्गा ॥ ३८ ॥ 
द्मक्षयमथो बुद्ध्वा किंचिच्छिष्टेषु शाखिषु । 
उपगम्या्वीदेतान्‌ यजा सोमः प्रजापतीन्‌ ॥ ३९ ॥ 
इस प्रकार जक्ते-जल्ते जवर कुछ ही वक्ष वाकी वचेः 
तवर इृ्करि संहारकी वातको जानकर इन दृ्षकि राजा 
सोम प्रजापति प्रचेता्ेकरि पास जाकर वोटे--॥ ३९ ॥ 
कोपं यच्छत राजानः सदं श्रायीनवर्हिषः। 
वृष्षशुल्या रता पृथ्वी श्ाम्येतामग्निमारुतौ ॥ ४०॥ 
शप्राचीनवर्दिके पुत्र प्रचेताओ | तमने तो प्रथ्वीको ब्षेसि 
शल्य ष्टी कर डाटा ! राजाय { अव अपने क्रोधको रेको 
तथा इन अग्नि ओर पबनको शान्त करो ॥ ४० ॥ 
रत्नभूता च कन्येयं दक्षाणां वरवर्णिनी । 
भविष्यं जानता तत्वं धृता गर्भेण वै मया ॥ ४१॥ 
ध्यह्‌ वृर्षोकी रत्नखरूपा स॒न्दरी कन्या है । मैने 
भविष्यके तत्वको .जानकर इते अपमे ग्मि सापित कर 
च्या था * | ५१॥ । 


। ,, "णपरम 
# वायुने बृ्छोको सुखाते समय उनका जडीय सारां्च जख्कै 


कारण सूर्यम पृ्हुचा दिया, शस भकार पृथ्वीका सारभूत अदय जल- 
मव'चनदरमा्मे पर्हुचा दिया । श्ल प्रकार फल्यारूप ध्नोका वौं 
सोमने मपने गर्म धारण कट च्याः, यदह बात ठटौक ष्ट ६। 


[ हरिवंशे 


मारिषा नाम कन्येयं बरक्लाणामिति निर्मिता । 
भायौ वोऽस्तु महाभागाः खोमवंशविवद्धिनी ॥ ४२॥ 
ध्यह॒ मारिषा नामवाली कन्या बक्षकरि वीर्यं अर्थात्‌ 
सारांदासे रची गयी है । महामाग | इस सोमवंशकी वृद्धि 
करनेवाली र्धोकी कन्याको ठम मार्यार्पर्मे ग्रहण 
करो ॥ ४२॥ 
युष्माकं तेजसोऽर्धेन मम चार्द्धेन तेजखः। 
अस्यासुत्पत्स्यते पुत्रो दरो नाम प्रजापतिः ॥ ४३ ॥ 
ुम्दारे ओर मेरे दोनोकि तेजके अधपि-आधे भागके 
द्वार इस कन्यके गर्भे एक पुत्र उ्पन्न होगा, जिसका 
नाम होगा--द्च प्रजापति ॥ ४३ ॥ 
य॒ इमां दग्धभूयिष्ठां युष्मत्तेजोमयेन वै। 
अग्निनाग्निसमो भूयः प्रजाः संवधेयिष्यति ॥ ४४॥ 
तुम्हारे तपरूपी अगिसे अग्निके समान ही प्रतापी 
वह दस्ष अधिकाय जली हर्द इस प्रथ्वीपर फिर 
प्रनार्ओकी वृद्धि करेगा? ॥ ४४॥ 
ततः सोमस्य धचनाज्ञगृुस्ते परचेतसः । 
संहत्य कोपं वृष्षेभ्यः पत्नीं धरेण मारिधाम्‌ ॥ ४५॥ 
; चन्द्रमाके इस प्रकार कहनेपर उन प्रचेताथनि बृ्भोकी 
ओरते थपने क्रोधको समे लिया ओौर मासिको विवाहरूपी 
धर्मकः दाया पत्नीरूपमे महण कर छया ॥ ४५ ॥ 
मारिषायां ततस्ते वै मनसा गर्भमादधुः । 
देदाभ्यस्तु प्रचेतोभ्यो भारिषायां प्रजापतिः । 
दक्षो जक्षे महातेजाः सोमस्यांशेन भारत ॥ ४६॥ 
तदनन्तर उन प्रचेतार्थनि अपने मनसे मारिषा गर्भ॑ 
स्थापित किया । भरतवंशी राजन्‌ ! इस प्रकार चन्द्रमाके 
अंशसे दस प्रचेता्ओकि द्वारा मारिघके गर्भसे मदातेजखी दक्ष 
प्रजापति उन्न हुए ॥ ४६ ॥ 
पुत्राठुत्पादयामाल सोमवंशविवर्धनान्‌ । 
अचरांश्च चरंचैव दिपदोऽथ चतुष्पदः 1 
स दष्ट मनसा दक्षः पशचादेव्यखजत्‌ सयः ॥ ४७॥ 
तव उन द्षप्रजापतिने चन्द्रमाके वंशको वदानेवाठे पुत्र 
उद्यन्न विये ओर स्थावर, जङ्गमः दो पैरवाके; चार पैरवाऊे 
स्वनेयोग्य प्राणिर्योकी खष्टिके ययि मन्म विचारकर पीछे 
लिर्योकी मी स्वना की ॥ ४७ ॥ 


षि क 
“विव बृह चन्द्रमसमनु प्रविरति-टृष्टि बरसकर चन्द्रमा भरविषट 


ष्ठो जाती ६" शत धुत्सि भी जओपभियोकि साररूमसे पटिका 
चनद्मामे परवेद करना सिदध होता है । शस प्रकार चन्माका यह 
वचन ठीक दहै कि मनि इतत वृर्लोकरी कन्याको जपने स्मे 
धारण क्रछियाथा।' 


शरिवशप्वं 1 


ठैतीयोऽभ्यायः ९ 


-------------------------------- =-= 


ददौ सख दश धमीय कद्यपाय धगरोदरश 1 
हिणः सोमाय राक्षेऽथ नक्षत्राख्या ददै प्रमुः॥४८॥ 
प्रभु दक्नने उन्मेष दस कन्यर्थँ धरमकोः तेरह कन्या 
कदययको ओर शेष वची हुई नक्षत्रसम्न्धी नामबाली 
सत्ता्ईदस कन्या राजा चन्द्रमाको दे दीं ॥ ४८ ॥ 
तासु देवाः खगा नागा गावो दितिजदानवाः । 
गन्धर्वाप्सरसदचैव जक्षिरेऽन्याश्च जातयः ॥ ४९ ॥ 
उन कन्या्ति देवता; पकी, स्यः गौरः देव्य 
दानवगन्धर्व, अप्छरारण तथा अन्य जातिरयोके प्राणी 
उदयन्न्‌ हुए ॥ ४९ ॥ 
ततः प्रथृति राजेन्द्र॒ प्रजा मैथुनसम्भवाः 1 
संकटपाद्‌ दक्श॑नात्‌ स्पश्तीत्‌ पूर्वेषां खष्िरुखयते॥ ५० ॥ 
रजेन ! तभीसे प्रजे मैयुनद्यास उचन्न होने लगीं 
इखते पहले प्राणिधकी उत्पत्ति संकट्पः# दर्य॑न ओर 
स्पसि होती थो-येसा कहा जाता है ॥ ५० ॥ 
जनमेजय उवाच 
देवानां दानवानां च गन्धर्वोरगरक्षसाम्‌ । 
सम्भवः कथितः पूवं दक्षस्य च महात्मनः ॥ ५१ ॥ 
जनमेजयने कहा--ुने ! आपने पहठे भी देवताः 
दानव, गन्धव, स्प॑ ओर राक्षस तथा महात्मा दश्चकी 
उत्पत्तिका वर्णन किया है ॥ ५१ ॥ 
अद्भष्ठाद्‌ ब्रह्मणो जातो दक्षः प्रोक्तस्त्वयानघ। 
वामाङ्क्ात्‌ तया चैव तस्य पत्नी व्यजायत ॥ ५२॥ 
निप्पाप मदै ! वरहो आपने कहा दै किं व्रसाजीके 
(दाहिने ) अंगूठेसे दघ्न प्रजापति उन्न हए ओर्‌ ब्र्माजीके 
वाये अंगूढेसे दक्षकी पत्नी उत्सन्न दुई ॥ ५२ ॥ 
कथं प्राचेतसत्वं स ॒पुनरेभे महातपाः । 
पतन्मे संशयं विप्र सम्यगाख्यातुमरहसि । 
दोहि्रदचेव सोमस्य कथं श्वद्युरतां गतः ॥ ५३ ॥ 


वे महातपस्वी दश्च फिर प्रचेताकरि पुत्र कैसे हुए ! 
चन्द्रमकरे नाती दश्च फिर उनके श्वन्रुर कैसेवन गये! 
विप्रवर ! मेरे इन सदेरदौको मी प्रकार व्याख्या करके 
आप दुर कर दीज्यि ॥ ५३ ॥ 
वैश्रमायन उद्च 
उत्पत्तिश्च निरोधश्च नित्यौ भूतेषु पाथिव । 
छषयोऽ्र न सुद्छन्ति विद्धं स्वव ये जनाः ॥ ५४॥ 
यैरास्पायनजीने कहा-्रथ्वीनाय { जन्म॒ ओर 
मृत्यु-ये समसत प्राणि्ेकि स्थि नित्य ( खामाविक ) दे । 
इस विषयमे श्रूप्रिर्योको कमी मोह नीं होता । जो विद्वान्‌ 
पुरुष दैः वे भी इस विषयमे मो्ित नदीं होते ॥ ५४ ॥ 
युगे युगे भवन्त्येते स्वँ दक्षादयो दप। 
पुनस्चैव मिरुष्यन्ते विद्धा स्तघ्र न स्यति ॥ ५५॥ 
नरेश्वर ! ये दश्च आदि सव खोग अ्रव्येक युग्मे उत्पन्न होते 
ओर मरते रहते है, अतः विद्वान्‌ पुरुष इस विषमे 
मोहको नहीं प्रात हेते द ॥ ५५ ॥ 
ज्येष्ठं कानिष्ठमप्येषां पुतं नासीञ्ननाधिप। 
तप पव गयीयो.ऽभूत्‌ प्रभावदचैव कारणम्‌ ॥ ५६॥ 
राजन्‌ { पहले इनमे ज्येष्ठता ओर कनिष्ठताका अर्थात्‌ 
पटले-पीछे उत्पन्न ्टोनेका कोरर विचार नदीं थाःतपष्टी 
इनकी दृष्टिम गरि था ओर प्रभाव ही इनमे सम्बन्ध होनेका 
कारण होता था॥ ५६॥ 
ष्टमां विख्षटि दक्षस्य यो धिात्‌ सचराचराम्‌ । 
भ्रजावानापदुत्तीणैः खर्छ मीयते ॥ ५७ ॥ 
जो मनुप्य चर तथा अचर प्राणिर्योषहित इस 
दक्च प्रजापतिकी खष्के तच्वको जानता है वह संतानवान्‌ 


होता है ओर अआपत्तियेकरि पार दो खगम प्रतिष्ठा 
पूर्वक रहता है ॥ ५७ ॥ 


इति श्रीमहाभारते लिल्भगि हरिवंशे हरिवंशपवंणि प्रजासर्गे दक्षोस्पत्तिकथने द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ 


द प्रकार श्रीमहामारत हिरमाग इरिदोके भन्तः हिरव प्रजासकेपरसंगमे दकौ उत्पत्तिका चणेननिषयकर दूसर अध्याय पूरा हुमा ॥२॥ 
~ -*‡----- 


तृतीयोऽध्यायः 


दकष प्रजापतिददारा सृषटिःदिस्तार, नारदजीका द्षके पूर्रोको विरक्त कर देना, 
दक्षकी साठ कन्याओं ओर उनकी संततिका वर्णन 


जनमेजय उवाच 
देवानां दानवानां च गन्ध्रगरक्षसाम्‌ 1 
विस्तरेण [ च 
उत्पि मां वेङाम्पायन कीर्तय ॥ २॥ 


*उ्न दस प्रचेता एक दो जौरस पुत्र कैसे इभा १ शस शङ्काका उस्र श्त शोके संकप शम्दसे मिलता 
दरसोका संकत्प एकता धा, अतः उनके एक शै भौर पुत्र हमा । 


जनमेजयने कष्टा-वैदम्पायनजी ! आप्‌ इस देवता 


दानवः गन्धर्व, सपं ओर राकषरसोकी उत्पत्तिको विस्तारपूर्वक 
कदिये ॥ १॥ 


हे । भरद्‌ घन्‌ 


१० श्रीमष्टाभास्वै सिलभपो 


वैशम्पायन उवाच 
प्रजाः खृजेति व्यादिष्टः पूर्वं दश्चः खयम्धुवा। 
यथा सखजं भूतानि तथा श्णु महीपते ॥ > ॥ 
वैशम्पाप्नजी ोटे--राजन्‌ ! पे खयम्भू ब्रहमा- 
, जीने दक्षको आश्ञादी कि ्वुम प्रजाओँकी खष्ि करोः | उख 
समय दश्नने (जयायुन आदि) प्राणिर्योकी खशि जिस प्रकार की 
थी; उसे सुनो ॥ २॥ 
मानसान्येव भूतानि पूर्वमेवाख्जव्‌ प्रभुः । 
ऋषीन्‌ देवान्‌ सगन्ध्वीनखुरानथ यक्षसान्‌। 
यक्षभूतपिशाचांश्च  वयःपश्युसरीखपान्‌. ॥ ३ ॥ 
ग्रमु दक्नने पदे प्रि, देवता, गन्धर्वः, असुरः रासः 
यश्च, भूतः पि्ाचः पुः पक्षी ओर सर्पोकी मानसी खट 
स्वी अर्थात्‌ इनको अपने संकरद्यमात्रसे ही उन्न कर दिया ॥ 


यदास्य तास्तु मानस्यो न न्यवद्धन्त वै प्रजाः। 
अपध्याता भगवता मष्ट्रैवेन धीमता ॥ ४॥ 
ततः संचिन्त्य तु पुनः भ्रजाहेतोः भ्रजापतिः। 
ख मरणुनेन धर्मेन सिख्ुर्विविधाः प्रजाः ॥ ५ ॥ 
अधिक्तीपावहव्‌ पत्नी वीरणस्य प्रजापतेः 
सुतां खतपसखा युक्तां महती छखोकधारिणीम्‌ ॥ ६ ॥ 
परेत (पूर्वकल्पे वेरको सरणकर ) बुदिमान्‌ मगवान्‌ 
महादेवे जव यह विचार क्रिया कि दक्षकी मानखी प्रजाप 
न वर्देः ओर तदनुसार जव उनकी मनसे उन्न की 
हुई श्रजर्णे अधिक उन्नति न कर सर्कीः तवर दस्र प्रजापति 
विचास्मै पड़ गये ओर पिर उन्दनि प्रजाकी वृद्धि करनेके 
चयि मैथुनधर्मति यनेक प्रकारकी प्रजार्ओको रचनेका विचार 
करिया] इस पिचारके अनुसार वे परम तप करनैकरे कारण संसारको 
धारण क्लेरमे समर्थं वीरण प्रजायतिकी महामहिम पुत्री 
अधिक्रीको पलनीरूप्म विवाह कर छ्यि ।॥ ४-६ ॥ 
अथ पु्रसषहद्ाणि वीरण्यां पञ्च वीर्यवान्‌ । 
असिक्न्यां जनयामास दश्च प्व प्रजापतिः ॥ ७ ॥ 
इसके वाद वीर्यवान्‌ दश्च प्रजापतिने वौरणकी पुत्री 
असिक्नीम पोच हजार पूर्वको उत्पन्न करिया | ७॥ 


वास्तु दष्टा महाभागान्‌ संविवर्धयिषून्‌ प्रजाः 

देवपिः नरियस्लंघाद्र नारदः भाव्रवीदिदम्‌ । 
 नाश्चाय वयनं तेषां शापायैवात्मनस्तथा ॥ ८ ॥ 
परंतु उन महाभाग्यवान्‌ दष्चपूर्वोकर प्रजाकी बृद्धि करने- 
केचि उत्छुक देख प्रियवादी देवर्धिं नारदजीने उनको (चछानका 
अधिक्रार खमन्नकर आत्मरानका ) उपदेश दिवा | नारदजीकरे 
उस वचनचे दष्चपुत्र नष्टो गये ( अथवा उनकी संवा 


[ श्यिवंशे 


आसक्ति नष्ट दो गवी); परंतु नारजीकरा यद श्ानोपदेदर 
देना स्वयं शाप परेम दी एक कारण वन गया ॥ ८ ॥ 
यं कदय॒पः सुतवरं परमेष्ठी व्यजीजनत्‌ । 
दक्षस्य चं दुहितरि दक्चश्ापभयान्सुनिः॥ ९ ॥ 
ब्रह्माजीने जिन श्रेष्ठ पुत्र नारदको उत्पनन करिया 
था, उनको दी कदयप मुनिने दक्करे यापक मयते ( दलकी 
पत्नीकी छोरी वब्रहिन अतएव ) उनकी ( पु्रीके समान ) 
कन्यर्मे उयन्न क्रिया था | ९॥ 


पूवं स हि समुत्पन्नो नारदः परमेषटिना । 
असिक्न्यामथ वीरण्यां भूयो देवर्पिंसत्तमः।` 
तं भूयो जनयामास पितेव मुनिपुङ्गवम्‌ ॥ १०॥ 
नारदजी पदठे ब्रह्माजीसे उत्यन्न हुए येः फिरवेद्ी 
देवप्रिंसत्तम नारद वीरणकी पुत्री असिक्नी (की ोरी 
ब्रहिन ) भ उन्न हुए ये । उन मुनिपुङ्खव नारदजीको कदयप- 
ने जद्याजके समान दी पिरि प्रकट क्रिया था | १० ॥ 
तेन दक्षस्य पुता वै हर्यभ्व। इति विश्वुवाः ! 
निमेथ्य नाशिता; सवे षिथिना च न संशयः ॥ ११ ॥ 
८ इस धटनाको स्पष्ट करते द---) दष्क दर्य॑श्च नामसे 
प्रसिद्ध (जो पोच हजार ) पुत्र थे, नारदजीमे उनको शख्रोक्त 
रीतिसे देदामिमानसे मुक्त कर॒ इस संसास्से नष्ट कर दिया 
था (अर्थात्‌ वे सवर नारदजीति चेतावनी पाकर संसारके त्याग 
परमात्माकी खोज करके च्ि वन्न चङे गये ); इसमे कुछ 
रंदेद नदीं है ॥ ११॥ 
तस्योद्यतस्तदा दक्षो नाह्ायामितविक्रमः 1 
महर्पीय्‌ पुरतः रत्वा याचितः परमेष्ठिना ॥ १२॥ 
तव अनुयम पराक्रमी दक्ष प्रजापति नारदजीको नष्ट 
करनेके लिय उ्यत हो गये | उस सभय ब्रह्माजीने मरीचि आदि 
महर्पियोकि साथ जाकर दक्षसे एेसा न करनेके च्वि प्रार्थना की | 
ततोऽभिसंधि चक्रस्ते दक्षस्तु परमेष्ठिना । 
कन्यायां नारदो मद्यं तत दुध्रो भवेद्रिति 1 १३॥ 
तवर मदर्पियोनि दध ओर ब्रह्याजी्मे संधि क्या दी। 
दक्षने कहा किं "पक्र पुत्र नारद मेरी पुत्री ( अर्थात्‌ छोरी 
खाली ) का पुत्र बनकर उत्पन्न होः |} १३॥ 
ततो दक्षस्तु तां पादाव्‌ कयां वैं परमेष्ठिने । 
ख तस्यां नारदो जक्ष द्चशापभयादपिः ॥ १४ ॥ 
तव दश्चने प्रजापति कदयपको ८ तेरह कन्यार्पँ अर्पण करते 
समय ) उस कन्याक्रा दान कर दिया था । इस प्रकार दक्षके 
शापके मयते नारद ऋषि उख-कन्यासे फिर उत्पन्न हुए य ॥ 


जनमेजय उवाच 


कथं विनाशिताः पुश्रा नारदेन मर्र्पिणा । 
भजापतेद्विजघ्रेष्ठ॒ भोतुमिच्छामि तत्वतः ॥ १५ ॥ 


इरिवंपवं ] 


अनमेजयने पु्ा-दविजश्रेठ ! महिं नारदने प्रजापति 
दक्षके पुर्वोको किंस प्रकार नष्ट करिया था! इसको मै स्पष्ट 
सूपसे युनना चाहता हू ॥ १५ ॥ 

वै्स्यायन उवाच | 

दक्षस्य पुत्रा हर्यश्वा विवधेयिषवः प्रजाः । 
समागता महावीयी नारदस्तानुवाच ह ॥ १६॥ 

वेदाम्पायनजीने कह--रजन्‌ ! दघ्षके हय॑श्च नामक 
पुत्र महावी्वान्‌ येः जव वेप्रजाओंकी चृद्धिका बिचार केके 
लि उगत हुए तत्र नारदजीने उनसे कहा] १६ ॥ 


वालिश्चा वतः यूयं वै नास्या जानीथ वे सुवः 
प्रमाणं स्ष्टुकामाः स्थ प्रजाः प्राचेतसा्मजाः। 
अन्तरू्ष्वमधर्चैव कथं खक््यथ वे प्रजाः ॥ १७ ॥ 
"प्राचेतस ८ दक्न ) के पुत्रो [ खेदके साथ कहना पडता 
हेकित॒म वड़े नादान दहो। ठम्दै प्रजकी खष्टि करनेकी 
इच्छा हुई दै; किंतु ठम इतना भी नदीं जानते कि जहां 
खष्टि करनी दै, उस प्रथ्वीकी टेवाई-चौडाई कितनी है १ यहं 
ऊपरनीचे ओर मीतरसे केसी है १ एेसी दशाम तुमलोग 
प्रजाओंकी खष्टि कते करोगे ¢ ॥ १७ ॥ 
ते तु तद्वचनं श्रुत्वा प्रयाताः सर्वतोदिशम्‌ । 
प्रमाणं द्रष्टुकामास्ते गताः प्राचेतसात्मजाः ॥ १८ ॥ 
नारदजीकी इस वातको सुनकर वे प्राचेतस दक्षकरे पुत्र 
( इस पृथ्वीका ) प्रमाण अर्थात्‌ माप देखनैके स्थि सव 
दियार्ओोकी ओर चर दिये ॥१८॥ 
चायोरनश्नें प्राव्य गतास्ते वै पराभवम्‌! , 
अद्याप न निवर्तन्ते समुद्रेभ्य इवापगाः ॥ १९ ॥ 
प्राणवायु व्यि आहार न पाकर वे सवके सव परामव 
(विनस ) को प्राप्तो गये जैने नदिर्यो समुत्रमै मिल 
जानेपर फिर वसि पीछे नदीं छरती है, उसी प्रकार वे जाकर 
अवतक नहीं ङे ॥ १९ ॥ 
हरयदवेप्वथ नष्टेषु दक्षः प्राचेतसः पुनः! : 
वैरण्यामेव पुत्राणां सखदस््रमखजत्‌ प्रस: ॥ २०॥ 
प्रचेताओके पुत्र प्रु दक्षने दर्यश्चोके नष्ट हो जनिपर वौरण- 
की पुत्रीमे ही फिर सदसत पु्रोको उत्पन्न किया ॥ २०॥ 
विवधयिषवस्ते तु रावखाश्वाः प्रजास्तदा । 
पृक्तं वचनं तात नारदेनैव नोद्रिताः ॥ २९॥ 
तात } वे द्क्रे पुञ्र गावलाश्च जव प्रजाकी वृद्धिके स्यि 
इच्छुक हुए तव नारदजीने पूवक्त वचन कहकर उनको भी 
पृथ्वीका प्रमाण जाननेकरे चि प्रेरित किया ॥ २१ ॥. 
अन्योन्थमुचुरुते सर्व॑ सम्यगाद महामुनिः । 
श्रावृर्णां पदवीं श्ातुं गन्तव्यं नाज संशयः ॥ २२॥ 
तवर वे" सव आयतम कहने र्गे-“महामुनि नारदजी 


तृतीयो ऽध्यायः 


५, 


ठीक कहते है, अपने मादइयेकिं मार्गको जाननेके च्ि निःसंदेह 
हमे भी अवदय प्रयल करना चष्धये ॥ २२॥ 
्षात्वा पमाणं पृथ्व्याश्च सुखं खक््यामहे प्रजाः । 
पकार; सखस्थमनसया यथावदनुपूर्वशः ॥ २२॥ 
ष्टम पृथ्वीके प्रमाणको जानकर एकाग्र ओर खस्थ- 
चित्तसे सुखपूर्वक प्रजाओंकी क्रमानुसार खंष्टि करेगे ॥ २३॥ 
तेऽपि तेनेव मार्गण प्र्राताः सर्वतोदिशम्‌ । 
अयापि न निवर्तन्ते समुद्रेभ्य इवापगाः ॥.२४॥ 
रसा निश्चय करे वे मी उषी मर्गिते चाये दिशार्ओकी 
ओर चर दिये ओर समुद्रोसे उनम मिटटी हुई मदियेकि 
समान अभीतक नहीं छोरे ॥ २४॥ 
नष्टेषु शावलद्वेषु दश्च; क्रद्धोऽवदद्‌ वचः 1 
नारदं नाशमेदीति गर्भवासं वरेति च ॥ ९५॥ 
राबखाश्वोके भी नष्ट दो जानिपर दश्च प्रजाप्रतिने कोधे 
भरकर, नारदजीसे यह वात की कि" तुम्हारी देह नष्ट हो जाय 
ओर ठम फिर गर्भम निवास करोः }॥ २५॥ 
तदाग्रशति वै श्राता भरावुरन्वेषणं शप । 
भयात नर्यति क्षिप्रं तन्न कायं विपश्चिता ॥ २६॥ 
राजन्‌ ! उस दिनसे जो भाई भारक सोजनेके स्यि 
जाता ह, वह शीघरही नष्ट हो जाता दै, अतएव विद्रानक्ो 
ेसा न करना चादिये अर्थात्‌ भाईको टटनेके ल्ि मार्को 
नदी जाना चयि ॥ २६॥ 


तांश्चापि नष्टान्‌ विज्ञाय पुत्रान्‌ देष्ठः प्रजापनिः। 

षष्टि भूयो ऽसखजत्‌ कन्या चीरण्यामिति नः ्रुतम्‌॥ 
हमने सुना दै कि अपने उन पूर्वौ मी नष हभ जान- 

कर द्त प्रजापतिने वीरणकरी पुरीम फिर साठ कन्यार्ओकौ 

उद्यन करिया ( क्योकि कन्या खरी होनेसे नारदजीके आत्म- 

ज्ञानके उपदेशकी पात्र नदीं थीं ) ॥ २७ ॥ 

तास्तदा प्रतिजग्राह भाय कद्यपः प्रमुः\ 

सोमो धर्मश्च कोरभ्य तथेरान्ये महर्षयः ॥ २८॥ 
कर्कुरेयनन जनमेजय ! उन ( मेते क्छ कन्यारओं ) 

को प्रभु करयपजीने अपनी प्नीके रूपमे खीकार कर लिया 

एवं चन्द्रमा; धर्म॑तथा दूसरे मदरियोनि भी उन ( मेते 

क्रितनी दही कन्याओ ) को अपनी पत्नीके रूपे खकार 

कर छया ॥ २८ ॥ 

ददौ स दश धमौय कदयपाथ चयोदश्च । 

सप्तविंशति सोमाय चतस्रो ऽरिष्टनेमिने ॥ २९॥ 

दे चैव भगुपु्ाय दे चैवाङ्गिरसे तथा। 

दे रश्ताश्वाय विदुषे तालं नामानि मे श्णु ॥ ३० ॥ 
दक्षने धर्मक दसः कश्यपओीको तेरह, चन्द्रमाको 

सत्ताईसः अरि्नेमिको चार, भगुपुघ्रको दौ, अङ्खिराको दो 


१२ 


श्रीमहाभारते श्िडभगे 


{ हरिवंशे 


ओर विद्वान्‌ कृगाश्च छ्रषिको दो कन्यार्पै दी, उनके नार्मौ- 
को गुन्चसे खुनो--॥ २९-३० ॥ 
अखन्धती वद्ु्यौमी छम्ब भायुर्मरुत्वती । 
संकल्पा च सुहृत च लाघ्या विभ्वा च भास्त। 
धर्म॑पल््यो दद्य त्वेतास्ताखपत्यानि मे श्रणु ॥ ३१॥ 
भरतवंशी राजन्‌ { अर्न्धतीः वयु, यामीः म्वाः भानुः 
मरत्वती, संकल्पा, मुहूर्ता, साध्या तथा विश्वा--ये दस धमकर 
पलिर्यो ई । इनम जो संतान उवयन्न हुः उनके नार्मोको 
मुन्नते सुनो--॥ ३१ ॥ 
विद्वेदेवाश्च विश्वायाः साध्यान्‌ साध्या उ्यजाग्रत 1 
भसख्त्वत्यां मवत्वन्तो वसोस्तु वसवस्तथा ॥ ३२ ॥ 
विश्वानि विदयेदेव नामक पुत्रको ओर साध्याने साध्य 
नामवले पुर््रोको उत्यन्न करियाः मरत्वतीसे मरुत्वान्‌ ओर 
येसुसे वसु प्रकट दूए ॥ ३२ ॥ 
भानोस्तु भानवस्तातं॑समुद्तौया सुहर्तजाः 1 ३२ ॥ 
ओर तात { मानुसे मानुदेवता ओर मुहूतसि ८ क्षणः 
रव आदि कालामिमानी देवता ) मुहर्तन उदन हए ॥३३॥ 
छम्वाया्चैव घोषो ऽथ नागवीथी च यामिजा 1 
पृथिवीविषयं सवंमसन्धत्यां व्यजायत्त ॥ ३४ ॥ 
घोप्र नामक ( मन्राभिमानी ) देवता छम्वासे उत्पतन 
हुजा तथा यामीषे ( खर्गाभिमानिनी ) नागवीथी उत्पन्न 
हुई तया अरन्धतीरमे ८ धृतः पञ्च, ओपथ आदि ) ख 
परथ्वीकरे विषय उत्पन्न हए ॥ ३४ ॥ 
संकरपायास्तु स्ोत्मा ज्ञे संकटप एव हि । 
नागवीध्याश्च यामिस्या चृषटम्वा व्यजायतं ॥ ३५॥ 
तथा संकल्पासे सर्वात्मा संकस्प अर्थात्‌ मानसक्रिया- 
भिमानी देव्ता उत्पन्न हुआ ओौर यामिपुत्री नागवीथी इृष- 
रम्बा (कालान्तरे फरषटिकरनेवले धर्म या ईश्वरका अवटम्बन 
करनेवाखा देवता ) उत्पन्न टज ॥ ३५ ॥ 
या साजन्‌ सोमपल्न्यस्तु दक्षः प्राचेतसो ददौ) 
स्रौ नक्षजनाम्न्यस्ता उयौतिषे परिकीर्तिताः ॥ ३६ ॥ 
राजन्‌ | प्राचेतस दश्षने चन्द्रमाको जो कन्य दी 
थीः वे सव सोमपलिनर्यो नघ्नत्रोकरि नामसे अ्यौतिषशास्मे 
परसिद्ध ई ॥ ३६ ॥ 
येस्वन्ये ख्यातिमन्तो वैदरेवा ज्येतिःधुखेगमाः। 
वसवो ऽ्ौ समाख्यातास्तेषां वक्ष्यामि विस्तसम्‌॥३७॥ 
अव जो ज्योति आदि दूसरे प्रसिद्धं देवता द ओरजो 
विख्यात आख चु देवता ई» उनका विस्तृत वर्णन मँ आप्ते 
करगा ॥ ३७ ॥ | 


आपो धुचश्च सोमश्च धरद्तैवानिरानद । 
पत्युश्च प्रभासश्च वसवो नामभिः स्वाः ॥ २८ ॥ 
अपिः भुव सोम; धर) अनिटः अनटः प्रत्यूष ओर 
प्रमास् (--मे जठ ) वसु नामे प्रसिद द ॥ ३८ ॥ 
आपस्य पुय वैतण्ड्यः श्रमः खान्तो मुनिस्तथा । 
धुचस्य पुत्रो भगवान्‌ कारो रछोकप्ररालनः ॥ ३९ ॥ 
आपके वैतण्ड्यः श्रमः; शान्त ओर मुनिनामक पुत्र 
उदयन हए ओर संघारको अपने अंकुदाम रखनेवले भगवान्‌ 
करल ध्रुवके पत्र द ॥ ३९ ॥ 


सोमस्य भगवान्‌ वची बेस येन जायते । 
धरस्य पुश्रो द्रविणो हतदव्यवहस्तथा 
मनोदरयाः क्िद्षिरः पाणोऽथ रमणस्तथा ॥ ४० ॥ 
ओर सोम नामक वसुक्र पुत्र मगवरान्‌ वर्चा दैः जिन (का 
पूजन कसे ) से मनुष्य वर्चस्वी हौ जाता दै । धर वसुके 
द्रविण ओर हुतहन्यवद नामक्र दो पुज हुए तथा ( धरकी 
दूसरी पत्नी ) मनोदरसे गिशिरः प्राण ओर रमण नामक 
पुत्रहुए ॥ ४० ॥ 
अनिलस्य शिचा भाय यस्याः पुञो मनोजवः \ 
अनिक्षातगतिश्चैव दौ ' पुत्रावनिरस्थ ठु ॥ ४१॥ 
अनिल्की पल्मीका नाम शिवा थाः उसके पुत्र मनोजव 
ओर अविक्ञातगति ये, ये दोनो अनिक्करे पुत्र धे ॥ ४९॥ 
अग्निपुत्रः कुमारस्तु श्रस्तम्पे धियान्वितः । 
तस्थ शाणो विशाखश्च नेगमियश्च पषठजाः ॥ ४२॥ 
अग्निके पुत्र श्रीमान्‌ मार सरकंडकि द्ंड्मे प्रकट 
हुए थे । उनफ़े पीडे शाख, विदयाख ओर नैगमेय हुए ( इस 
प्रकार अग्निके चार पुत्रथे)॥५२॥ 
अपत्यं त्तिकानां तु कार्तिकेय इति स्तः 
स्कन्दः सनत्कुमारश्च खः पदेन तेजसः ॥ ४३६ ॥ 
(ये कुमार ही) ऊत्तिकार्ओकी संतान कार्तिकेय (ओर ) 
स्कन्द कहते द ओर ये ही सनत्कुमार दै । अग्निने 
दण्द अपने तेजक्रे एक अंशते प्रकट किया है ( ओर शाख 
अदि तीनक्रो मी अपने तेजक्रे एक-एक चौथाई अंसे 
प्रकट करिया दै । छन्दोग्य-उपनिषदूम छिलिा है कि (तं स्कन्द 
इत्याचक्षते यह सनच्छमार दी स्कन्द ई । इषे प्रतीत होता 
दे कि सनत्कुमार इनका उपनाम है ) | ४३ ॥ 
भ्त्युषरस्य विदुः पुति नास्ना च देवलम्‌! 
दौ पुरौ देवलस्यापि -क्षमाबन्तौ तपखिनो ॥ ४४॥ 
र्यके पुत्रका नाम देवल ओर ८ पुत्रीका नोम ) 
तऋरृष्टि था) देवलके भी दो पुत्र थे,जेो भमावान्‌ तथा 
तपखी ये| ४४॥ ` 


हरिषेदापवें ] 


लुतौयोऽभ्यायः 


२ 


बृहस्पतेस्तु भगिनी वर्छ्यी बर्मवारिणी । 
योगसिद्धा जगत्‌ ऊत्त्मसक्त{ विचचार हः॥ ४५॥ 
नृहसनिकी वरहिनका नाम ब्रह्मचारिणी था, वहं योग- 
पिद्ध श्रेष्ठ खी आसक्तिको त्यागकर सरे संसासयै विचरण किया 
करती थी ॥ ४५ ॥ 
प्रभासस्य चसा भाश्री वसूनामष्टमस्य च । 
विश्वकमी महाभागस्तस्यां जक्षे भ्रजापतिः ॥ ४६॥ 
` वह्‌ प्रमास नामवाके आटे वसुक्री मार्या बन गयी । 
उस्क्रे ग्म॑से विश्वकर्मां नामबठे महाभाग्यवान्‌ प्रजापति 
उत्पन्न हुए ॥ ४६ ॥ 
क्ती शिटपसहस्नाणां जिष्टशानां च वध॑किः। 
भूकणानां च सवैषां कतौ शिल्पवतां चरः ॥ ४७ ॥ 
उन्दने हजारो शिव्पो ( कलाओं ) की सचना की है ओर 
वे देवताओके बदृई दै तथा वे रिष्िरयोमिं श्रेष्ट विश्वकर्मां 
सव आमूषोके बनानेवाे ई | ४७ ॥ 
यः स्वसा विमानानि देवतानां चकार ह। 
मयुष्याश्चोपजीवन्ति यस्य श्चिल्यं महात्मनः ॥ ४८ 
उन्न सवर देवताओंकरे विमार्नौको बनाया है ओर उन 
महात्माके दिस्पसे मनुष्य भी अपनी आजीदिका चलते ई | 
खुरभी कदयपाद्‌ रुद्रानेकादव्ष॒विनिममे । 
महद्रेवप्रसदेन तपसा भाविता सती ॥४९॥ 
अनेकपादहिवुध्यस्त्वष्ा॒द्द्राश्च भारत । 
त्वष्टुशरैवात्मजः धीमान्‌ विश्वरूपो महायश्चाः॥ ५०॥ 
(अवर दने कदयप मुनिको जो तेरह कन्दर्प दी श, 
उनसे सुरमिकर संतानका वर्णन करते है) तपम मग्न हुई 
सुरभिने म्टादेवजीते वर पाकर कदयपजीके द्वारा ग्यारह सद्रेको 
उत्व क्रिया था । भरतवं राजन्‌ ¡ अजनैकपाद्‌, मदिरवुष्यः 
त्वष्टा तथा एद्र-ये सवर सुरभिकी ही संताने दै ! व्वष्टके महा- 
यगरसखी ओर श्रीमान्‌ पुचका नाम विश्वरूप था ॥ ४९-५० ॥ 
हरश्च बहुरूपश्च  ऽयम्बकश्चापरजितः । 
दृपाकपिश्च राम्भुश्च कपदीं रेवतस्तथा ॥ ५१॥ 
खगव्याधशच सर्पश्च कंपाटी च विशाम्पते । 
पकादसेते कथिता रुद्राखिुबनेभ्वणः ॥ १५२ ॥ 
राजन्‌ { हर, ब्रहुरूपः ज्यम्बकं अपराजितः दृषाकपिः 
शम्भु, कपर्दी, रैवतः मृगव्याधः -सर्पं ओर कपाल्मै- ये तीन 
वनोके ईश्वर ग्यारह सद्र कंदे गे ई ॥ ५१-५२ ॥ 
शतं त्वेवं समाख्यातं श्द्राणाममितौजसाम्‌ । 
पुराणे भरतश्रेष्ठ येव्यप्ताः सचराचरः ॥ ५३ ॥ 
लोका भरतशार्दूल कदयपस्य निवे मे 1 
भवितिदिंतिरदयुशवैव अरिष्रा खुरा खश्‌ 1 ५8,॥ 


सुरभिर्विनता चैव ताघ्ना फोधवदरा दय । 
कुरमुनिश्च रजेन्द्र॒ ताखपत्यानि मे श्ण ॥ ५५॥ 
भरतश्रेष्ठ | पुर्णेर्मि इन अग्रि परसक्रमी ररक 
सेक रूप बतये गये द । इनसे चराचर लोक भरे हु द । 
मरतरादृल 1 अव तुम मुञ्चे कश्यपकी ( लिर्येकि नाम ) 
सुनो । ( वे ईद) अदितिः दितिः दनु, अरिः, सरसाः 
खशाः सुरमि, विनता, ताम्रा, क्रोधवशा, इराः कद्रू ओर 
मुनि । रजेन्द्र ¡ अव्र इनसे जो संतान उत्प दुई, उनका 
वर्णन गुक्षसे खनो--॥ ५२-५५ ॥ 
पूर्वमन्वन्तरे शरेष्ठा द्वादशालन्‌ खयेत्तमाः 1 
तुषिता नाम ॒तेऽन्योन्यमूदुर्येवखतेऽन्तरे ॥ ५६॥ 
उपस्थिते ऽतियश्चसि चा्युषस्यान्तरे मनोः 1 
हिताथं सर्वलस्वानां समागम्य परस्परम्‌ ॥ ५७ ॥ 
पह चाक्षुष मन्वन्तरे तुषित नामवाङे वारह शरेष्ठ 
देचता ये । वे उस अत्यन्त यशस्वी मन्वन्तरका अन्त आनेपर 
वैवस्वत मन्वन्तरके आरम्भे सव्र प्राणिर्योका हित करनेके चयि 
परस्पर मिरकर कदने खगे--।! ५६-५७ ॥| 
मागच्छत द्रुतं देवा अदितिं सम्ण्विदय वै। - 
मन्वन्वरे प्रसूयामस्तन्नः भयो भदिष्यति ॥ ५८ ॥ 
ष्देवताओ } शीघ्र आओ | हम अदिति प्रवेद वेस 
अगले ( वैवस्वत ) मन्वन्तरे उत्पन्न हगिः यह कार्य हमारे 
चि श्रेयस्कर दोगाः ॥ ५८ ॥ 
वैशम्पायन उवाच 
पवमुक्त्वा तु ते खवँ चाघ्युषस्यान्तरे मनेः। 
मासीचात्‌ क्दयपाजातास्तेऽदित्या दक्षकन्यया ॥५९॥ 
वैशम्पायनजी कहते है-षपे सभी देवता चाष 
मन्वन्तरके अन्तम इस प्रकार बातालाप कर मरीचिपुत्र कव्यप- 
से दक्चकी कन्या अदितिके गर्भते उयन्न हो गये ॥ ५९ ॥ 
त्र विष्णुश्च शाक्रश्च जक्षाते पुनरेव हि । 
अर्यमा चैव धाता च त्वष्टा पृषा च भारत ॥ ६० ॥ 
विवस्वान्‌ सविता चैव मिध वरुण पब च । 
अंशो भगश्चातितेजा आदित्या दवादश स्ताः ॥ ६९ ॥ 
भारत ! वर्ह विष्णु ओर इन्द्र फिर उतन्न हुए} चे तथी 
अर्यमा, धाता, तषट; पूत्राः त्रिवश्वान्‌, सविता, मित्र; वरुण, 
अंश ओर परम तेजसी भग--ये बारह आदित्य ककत 
है ॥ ६०.६१ ॥ 
चाश्चुषस्यान्तरे पूर्वमासन्‌ ये तुषिताः सुराः 
वैवख्तेऽन्तरे ते वै आदित्या द(दश स्य॒ताः ॥ ६२ ॥ 
पले चाक्षुष मन्वन्तरे जो तुष्रित नामवठे देवता थे, 
वे अव वैवस्वत मन्वन्तरमे बारह आदित्य कटखाते ई ॥६२॥ 
स्तविशतियोः प्रोक्ताः सोमपत्न्यो ऽथ सु्रताः। 
तासखामपत्यास्यभवन्‌ दीप्तान्यमिततेजसाम्‌# ६२ ॥ 


१४ 


यवन 


जर जो खुन्दर ब्रत धारण करनेवाटी चन्द्रमाकी सततार्ईदस 
पलियौ कृष्टी गयी है; उन अमित तेजखिनी परलिर्योकी 
भ्योतिर्मयी संताने उत्यन् हई ॥ ६३ ॥ 
शरिष्टनेमिपत्यीनामपत्यानीह  वौडश्य । 
बहुपु्स्य वि्धपश्चतस्नो विधुतः स्मृताः ॥ ६४ ॥ 

अनेक प्रवे विद्वान्‌ अरिनेमिकी वियत्‌ नामवाटी 
श्वार पलिर्यो थीं । उनसे सोर संतानं उत्पन हुई ॥ ६४ ॥ 
प्रत्यङ्गिरसजाः श्रेष्ठा ऋचो बहार्पिसत्छताः। 
रदाश्वस्य तु राजर्पदेवप्रहटरणानि च ॥ ६५ ॥ 

राजर्पि कृराश्वके व्रदमरियेसि सत्त श्रेष्ठ प्रत्यद्धिरसना 
चार्थ जीर देवताओक्रि आयुध प्रकट हुए ॥ ६५ ॥ 


एते युगसहस्रान्ते जायन्ते पुनरेव हि । 

सर्वदेवगणास्तात धरयिशव्‌ तु कामजाः ॥ ६६ ॥ 
तात ! ईश्वरकी कामनासे उन्न होनेवले ततस देवता 

सत्ययुग आदि चायो युगेकि एक दजार बार ब्रीतनेपर ( प्रत्येक 

कल्प्म ) पुनः उतसन्न हु करते ई ॥ ६६ ॥ 

तेषामपि च राजेन्द्र॒ निसोधोत्पत्तिरुच्यते ॥ ६७ ॥ 


राजेनद्र { उन देवतार्ओकी भी उत्पत्ति ओर नारका वर्णेन 
उपटन्ध-दोता दे ॥ ६७ ॥ 
यथा सूर्यस्य गगने उदयास्तमने श । 
पवं देवनिकायास्ते सम्भवन्ति युगे युगे ॥ ६८ ॥ 
जते आका सूर्थका उदय ओर अस्त वारंवार होता 
रहता दै, इसी प्रकार ये देवतार्थे समूह प्रवेक युगम उत्यन्न 
( तथा नष्ट ) देते ई ॥ ६८ ॥ 
दित्याः पुब्रद्यं जके कदयपादिति नः श्चुतम्‌ । 
हिरण्यकरिपु्चैव हिरण्याक्षश्च वीर्यवान्‌ ॥ ६९ ॥ 
( इस प्रकार आदिर्योका वर्णन करके अव दैर््योका 
वर्णन करते ६-) दमने युना रै; कदयप श्रपिसे दितिके 
दो पुत्र उन्न हु भे, ( उन्मेष एक ) दिरण्यक्शिपु ओर 
( दूस ) वीर्यवान्‌ हिरण्यान् था ॥ ६९ ॥ 
सिदिका चाभवत्‌ कन्या विश्रचित्तेः परिग्रहः। 
सहिकेया इति ख्यातास्तस्याः पुघा महायखाः। 
गणैश्च सह॒ रजेन्द्र॒दशसादस्रमुच्यते ॥ ७० ॥ 
( इन क्यप ओर दितिकी ) एक " सिंटिका नामवाली 
कन्या भी थी, वह विप्रचित्तिक्रो विवादी गयी थी | उसके 
महाबली पुत्र सैहिकेय नामे प्रसिद्ध ई । राजेन | वे अपने 
गर्गोदित दस, हजार ई ॥ ७० ॥ 
तेषां पुरश्च पौत्राश्च शतशोऽथ सषस्रशः। 
ससंश्याता महावाहो हिरण्यकरिपोः श्टणु ॥ ७१॥ 
ओर उनके सैको पुत्र.ओर दारो पौत्र है उनकी 


आमष्ामास्ते लभागे 


[ शि 


न 


गिनती नष्टी की जा सकती । महावरादो ! अव दिरण्यकयिपुः 
की ( संतार्नौका वर्णन > चुनो ॥ ७१ ॥ 
हिरण्यकदिपोः पुचराश्चत्वारः प्रथितौजसः 1 
सनुहादश्च हादश्च प्रहादश्चैव वीर्थयान्‌ 1 ७२ ॥ 
संहादश्च चतुथोऽभृद्‌धदपुत्रो हदस्तथा । 
संहादपु्रः ख॒न्दश्च निखुन्दस्तावुभौ स्यौ ॥ ५३॥ 
दिरण्यकयिपुके अनुष्टाद, हाद, वीर्यवान्‌ प्रहाद भौर 
चौथा संहाद-ये चार प्रसिद्ध पराक्रमी पुत्र उचन्न हृएट । 
हवादका पुत्र हृद हुआ। सुन्द ीर नियुन्द-ये दोनो संहादके 
पुत्र कलते ई ॥ ७२-७३ ॥ 
यचुहादछतौ शायः शिविकारस्तथैव ह 1 
विरोचनश्च प्राहादिर्वलिर्जक्षे विरतेचनात्‌ ॥ ७४॥ 
अनुहादके आयु ओर दिविक्राल नामक दौ पुत्रये। 
परहादके विरोचन नामक पुत्र हुमा अर विोचनसे बलि 
नामवाला पुत्र उन्न हु ।॥ ७८ ॥ 
वलेः पुव्रदातं त्वासीद्‌ वाण्येष्ठं नराधिप 1 
धतरा सूर्य चन्द्रमाश्ेन्द्रतापनः ॥ ५५॥ 
कुम्भनाभो गर्दभाक्षः कुक्षिसित्यिवमादयः । 
बाणस्तेपामतिवखो ज्येष्ठः पद्युपतेः प्रियः ॥ ७६॥ 
चक्रि सौ पुत्रे | उनम व्राण (स्वरसे) वदाथा। 
राजन्‌ | धृतराष्टः सूर्य, चन्द्रमा, दइन्द्रतापन; कुम्भनामः 
गर्द॑भाक्ष ओर कुक्षि आदि ८ वचि रौ पुत्र ये)! इनमे 
अतिव्रली बाणवद़ा था ओौर वह्‌ दिवक्रा प्रिय भक्त था ।७५-७६। 
पुराकल्पे हि वाणेन भरसायोमापति भ्रभुम्‌ । 
पाद््वतो विहरिष्यामि त्येवं याचितो वरः ॥ ७७ ॥ 
पहले क्पे बाणायुरने उमापति शंकरो प्रसन्ने करके 
यह्‌ वर मेगा थाकि भ्म आपके परास विदारकः ! ७७] 
याणस्य चेन्द्रदमनो लोदहित्यामुपपद्यत ! 
गणास्तथादुण गजन्छतसाटस्रसम्मिताः ॥ ७८॥ 
वाणे स्यरहिती नामक पकी इन्द्रदमन नामक पुत्र 
उव्यन्न हुआ । राजन्‌ ! लर्खो असुर उसक्रे गण थे ॥ ७८॥ 
हिरण्याक्षसुताः पञ्च विद्वांसः खमदावलाः। 
सरः शकुनिश्चैव भूतसंतापनस्तथा । 
महानाभश्च विक्रान्तः काटनाभस्तथैव च ॥ ७९॥ 
दिरण्याक्षके ध्रः, यकुनिः मृतसंतापन, महानाभ 
ओर पराक्रमी काटनाम नामक पोच पुत्र हुए वे विद्धान्‌ 
ओर परम पराक्रमी थे | ७९ ॥ 
अभवन्‌ द्युपुत्रश्च जतं तीवपरक्रमाः। 
तपलिनो महावीयौः प्राधान्येन निवोध तान्‌ ॥ ८०॥ 
( अव दनुके वंशका वर्णन करते दै--) दनुके 
ठी पुत्र दए । वे सव्र परम पराक्रमी, तपस्वी अर महावीर्यवान्‌ 
ये 1, उनमेठे मुख्य-मुख्यं अयुरोका बर्भन सुनिये ॥ ८० ॥ 


हरिर्वशपरवं 1 


दिमूधौ शङुनिं्ैव तथा शकश विसुः। 
शाङ्ककणां विराधश्च गवेष्टी दुन्दुभिस्तथा 1 
अयोमुखः शम्बरश्च कपिरो वामनस्तथा ॥ ८१॥ 
मरीचिर्मधघवाश्चैव इरा शङ्करिय बकः । 
विक्षोभणश्च केतुश्च केतुदीर्यशतहदौ ॥ ८२॥ 
इन्द्रजित्‌ सत्यजिच्चैव वञ्जनाभस्तथेव च । 
महानाभश्च विक्रान्तः कारनाभस्तथैव च ॥ ८३ ॥ 
पकचक्रो मष्ावाहुस्तारक्शछ महाबलः । 
वैश्वानरः पुलोमा च विद्राचणमहाछधरो ॥ ८४ ॥ 
खभावुदंषपवौ च तुण्डश्च मदाखुरः। 
सृष्मयेवातिचन्दरश्च ऊर्णनाभो महागिरिः ॥ ८५ ४ 
असिलोमा च केशी च शख बलको मद्‌ः । 
तथा गगनमूधी च छम्भनामो महासुरः ॥ ८६॥ 
प्रमदो मयश्च कुपथो हयग्रीवश्च बीर्यवान्‌ । 
वेखटपः सविरूपाक्षः खुपथोऽथ हरायै ॥ ८७ ॥ 
हिरण्यकरिपुश्चैव शतमायश्च शम्बरः । 
शारभः शाठभस्मैव विप्रचित्तिश्च वीर्यवाय्‌ ॥ ८८ ॥ 
पते स्वं दनोः पुत्राः कदयपाद्भिजक्षिरे 1 
विप्रचित्तिभरधानास्ते दानवाः खुमदावखाः; ॥ ८९ ॥ 
दिमू्धा, शकुनि तथा विश, शङ्कुशिराः श्ुकर्ण, विराध 
ओर गवेष्ठी, दुन्दुभि तथा अयोुख, शम्बर ओर कपिलः 
वामन तथा मरीचिः मघवान्‌ ओर इरा, शङ्कुशिरा, इकः 
विक्षोमणग ओर केतु तथां केतुवीर्यः शतहदः इन्द्रजित्‌ 
सत्यजित्‌ ओर ॒वज्ननाम तथा महानाम ओर विक्रान्तः 
काटनामः महाभुज एकचक्र ओर महावटी तारकः वेदवानर, 
पुलोमा; विद्रावण ओर म्रहासुरः खर्भानु, इृषपर्वा ओर 
महान्‌ असुर व॒हृण्डः सृष्टम ओर अतिचन्द्र तथा ऊर्णनामः 
महागिरि, असिलोमा ओर केशी एवं शर, तथा वल्कः 
मद तथा गगनमूर्धा ओर महान्‌ असुर कुम्भनामः ममदः 
मय ओर कुपथः हयग्रीव ओर वीर्यवान्‌ वेखपः विरूपाक्षसदित 
सुपय ओर हर, अहर, हिरण्यकरिपु तथा सैकड् प्रकारकी 
माया जाननेवाल शम्बर, श्रमः शर्म ओर वीयंवान्‌ 
विप्रचित्ति-ये सव दनुके पुत्र कद्ययजीसे उत्यन हुए ये । इनमे 
विप्रचित्ति प्रधान था | ये सव दानव बड़े वल्वान्‌ये॥८१--८९॥ 
पतेषां यदपत्यं तु तन्न शक्यं नराधिप । 
प्रसंख्यातुं महीपाल पु्रपौजायनन्तकम्‌ ॥ ९० ॥ - 
नराधिप | इनकी जो संताने हुदै, उनकी गिनती नरी 


की जा सकती । महीपा } इनके अनन्तर पुत्र-पौतर 
उत्पन्न हुए ॥ ९०॥ 


` खभौनोस्तु प्रभा कन्या पुलोम्नश्च सुताघ्यम्‌ । 
उपदानवी हयरिरः शर्मिष्ठा सार्प॑पर्वणी ॥ ९१॥ 
स्वभानुके प्रमा नामक पुत्री उत्प हर भौर पुखोमाके 


` शुषीयोऽभ्यायः 


१५ 


उपदानवी; हयक्चिया ८ तथा श्षव्ची ) तीन ` कन्यर्पि 
उद्यत हुईं ¦ दरषप्वाकि रार्मिष्ठा नामकी पुत्री उन्न 
हरं ॥ ९९ ॥ । 
पुलोमा कङिका चैव वैश्वानरुते उभे! . 
बहपत्ये महावीर्ये मार्विस्तु परिश्रहः ॥ ९२ ॥ 
बैरवानर दानवकी पुलोमा ओर कालिका नामकी दो 
पुत्रयो हदं ! ये दोनो मरीचिनन्दन कद्यपको विवादी गर्यी 
ये बड़ी शक्तिदालिनी थीं । इन कन्याओकि वहुत-खी संताने 
उत्पन्न हुई ॥ ९२ ॥ 
तयोः. पुघ्रसदसराणि षष्टि द्ानवनन्दनान्‌ । 
चतुद शरातानन्याच्‌्‌ हिरण्यपुरवासिनः ॥ ९३ ५ 
मासीचिजैनयामास महता तपसान्वितः । , 
पौलोमाः कालकेयाश्च दानवास्ते महाबलाः ॥ ९४ ॥ 
अचध्या देवतानां च हिरण्यपुरवासिनः । , 
ताः पितामहेनाजौ निहताः सव्यसाचिना ॥ ९५ ॥ 
परम तपस्वी मारीचि ८ कर्यप `ने उन दोनो लिर्येमिं 
दानर्वोको आनन्द देनेवले साठ हजार पुत्रको जन्म दिया | 
किर चौदह सौ पुर ओर उत्पन्न कयि । ये सव हिरण्यपुरम 


` रते ये । इन हिरण्यपुरम रहनेवाछे महाबली पौलोम ओर 


काख्ैय दयनर्वोको वब्रह्माजीने ( वर देकर › देवता्ओंसे भी 
अव्य ८ न मरि जानेयोग्य ) कर्‌ दिथा था } अर्जुने इनको 
रणम मार डाल था 1९२-९५॥ 
प्रभाया नहुषः पु; संजयश्च शचीसुतः । 
पुरं जक्षेऽथ शर्मिष्ठा दुष्यन्तमुपदानवी ॥ ९६॥ 
प्रभाके नहुष नामक पुत्र हुआ ओर शचीके दुजय । 
शर्मष्ठाने पूरको उन्न किया ओर उपदानवी दुम्यन्तको ॥ 
ततोऽपरे महावीयौ दानवघास्त्वतिदारुणाः 1 
सिहिकायामथोत्पन्ना विभरचित्तेः सुतास्तदा॥ ९७ ॥ 
देत्यदानवसंयोगाज्ञातास्तीवपराक्रमाः 1 
सेंिकेया इति स्याताख्योद्‌हा महावखाः ॥ ९८ ॥ 
तदनन्तर ओर भी ब्रहुत-ते महार्वीर्यवान्‌ अतिदासण 
दानव सिंहिकामे विप्रचित्तिखे उत्पन्न हुए, फिर दैत्य-दानवेकि 
संयोगसे विप्रचित्तिके बहुत-से तीन पराक्रमी पुत्र हुए । इनमे 
तेरह महावली दानव ठंहिकेय' नामसे प्रसिद्ध दै ॥॥९७-९८]] 
व्यंशः शव्यश्च वङिनौ नभश्चैव महावलः । 
वातापिनेमुचिश्चेव शद्वलः खखमस्तथा ॥ ९९ ॥ 
अञ्जिको नरकदवैव काठनाभस्तपैव च । 
शुकः पोतरणदकैव वञ्जनाभश्च वीर्यवान्‌ ॥१००॥ 
( उनके नाम इस प्रकार द-) बलवान्‌ व्य॑रा ओर 
शल्यः मह्रटी नभः वातापि ओर नमुचि, हस्व तथा 
खम, आशक्जिक -ओर नरक तथा कालनाभः शुक अर 
पोतरण तथा बीर्यवान्‌ वनाम ॥ ९९-१०. ॥ 


१४ 


अम्ाभास्ते-जिरुभागे 


[ हरिर 


ध 


राहुश्ये्ठस्तु तेषां पै सर्यचन्द्रविम्द॑नः 

मूकदचैव तण्डश्च हावपु्ौ बभूवतुः ॥१०१॥ 
इनमे राहु सवते वड़ा हैः जो सूर्य, तथा चनद्रमाको 

पीड़ा देता रहता दे । हाद मक्र ओर वृण्ड नामवले दो 

पुत्र उयन्न हुए ॥ १०१ ॥ 

मारीचः सुन्द्पुध्रश्च ताडकायां भ्यजायत । 

शिवमाणस्तथा चैव सखुरकट्पश्च घीयंवान्‌ ॥१०२॥ 


-ुन्दके ताडका मारीच नामक यु उत हभ 
तथा ८ सन्द ओर ताडकाके ) रिवमाण ओर वीर्यवान्‌ 
सुरकस्प नामक पुन्न मी उत्पन्न हए ॥ १०२॥ 


पते षे दानवाः भेष्ठा दयुवंश्िवद्धेनाः 1 
तेषां पुश्च पौराश्च शतशोऽथ सहस्रशः ॥१०३॥ 


ये समी दानव श्रे भौर तुके वंशका विस्तार करे- 
वाले हैः इनके सैको पुत्र ओर हजारो पौत्र ६ ॥१०३॥ 


संहादस्य तु दैत्यस्य निवातकवचाः कुले । 
समुत्पन्नाः सुतपसा महान्तो भावितात्मनः ५ १०४॥ 


संहाद दैत्यकरे कुलम निवातकवच उत्पन्न हुए” वे सव 
उदार थे र उन्दनि बरहा भारी तप॒ करके अपने चिन्तको 
पवित्र कर लिया या ॥ १०४] 
तिः कोस्यः सुतास्तेषां मणिमत्यां निवासिनाम्‌ । 
तेऽप्यवध्थास्तु देवानामनु नेन निपतिताः ॥१०५॥ 


` वे मणिमत्ती नगररीमि निवास करते ये । उनके तीन करोड 
पुत्रये। वे मी देवता्भेसि अवध्य थे उनको भी अजुन 
मार डाल था} १०५ ॥ 


षर्‌ खता: सुमह्ासस्वस्तान्नाथाः परिकीर्तिताः । 
काकी द्येनी च भासी च सु्रीवी श्चुचि गधिक्रा॥ १०६॥ 


ताम्राकरे काकीः व्येनीः भासी; सुग्रीवी, शुचि भौर 
गृभ्रिका नामकी अत्यन्त बल्यालिनी छः पुत्र्या की 
जाती ई ॥ १०६॥ 


ककी काफानजनयदुदुक्षी भत्युटककान्‌ 1 
द्येनीच्येनांस्तथाभासी भासान्‌ गरधश्च गृ्यपि॥ 
श्यचिसैदकान्‌. पक्षिगणान्‌ सुग्रीवी तु परंतप। 
सभ्वायुषटरान्‌ गदेभांश्च ताम्रावंशः परकोर्वितः ॥१०८॥ 


परंतप ! काकीने कौर्मकि, उद्रकीने उस्टुर्भोकोः 
द्येनीने येनो ( बाज ) को; भार्खीने मास नामक पियको 
ओर ग्रभ्रीने गीरधोको उत्यन्न किया । चिने ज्म रहमेवाऊे 
वक्षर्योके ओर सुग्रीवीने थोदे, ऊट तथा गर्धक जन्म 
विया । यष्ट मैने ताम्नाके वंशका वर्णन किया हे ॥१०७-१०८॥ 


1 


पिनतायास्तु पुरौ छावरणो गरुडस्तथा । 
सुपर्णः पततां धेष्ठो दाणः स्वेन कर्मणा ॥ १०९॥ 


विनताके अद्ण ओर गरुड नामक दो पुर दुए। 
इन्मेसे पक्ियेमिं श्रेष्ठ गरुड अपने कर्मके कारण वदे दारण 
मनि गये ६ ॥ १०९॥ 


खरसायाः सष्टच्लं तु सर्पाणाममितौजसाम्‌ 1 
भनेकरिरसां तात खेचराणां महात्मनाम्‌ ॥११०॥ 


सुरसाके हजारो सपं उन्न हुए । तात [वे स्व सपं 
अगितपराक्रमीः अनेक फर्नविडिः आकादा्मे विनरण 
करनेवाले तथा विदाराय ई ॥ ११० ॥ 


काद्रवेयाश्च बलिनः सहस्रममितौजसः । 
खुप्णवदाया नागा जङ्िरेऽनेकमस्तकाः ॥१११॥ 
तेषां पधानाः सततं श्चेपवासुकितस्षकाः 1 
परावतो महापद्मः कम्बलाश्वतरादुभौ ॥११२॥ 
पलापधस्तथा शंखः कर्कोटकधनंजयौ । 
महानीलमदहाकर्णो धृतराए्यराहकौ ॥११३॥ 
क्रः पुष्पदंषटश्च दुसखः खुसुलस्तथा । 
द्राङ्कश्च शाङ्कपारश्च कपिलो वामनस्तथा ॥११४॥ 
नहुषः शङ्कसेमा च मणिरित्येवमादयः। 
तेषां पुत्रश्च पौराश्च गरुडेन निपातिताः ॥११५॥ 


कद्ूके मी परम पराक्रमी दार्ये सर्पं उदत्न हुए । उन 
चल्वान्‌ सपौके अनेक मस्तक ई ओर वे सर्वदा गरुढके 
अधीन रदते ३ । उन्म शेष; वासुकि, तकः रेरावतः 
महापद्मः कम्बलः; अश्वतरः एलापत्र; शद्ध, कर्कोटकः 
धर्न॑जय, महानीकः महाकर्णः धृतराष्टः च्मदकः 
कुहरः पुष्यदंष्र, दुर्ुखः सुमुखः शद्धु, राद्धुपारः कपिल; 
वामनः नहुषः शङ्ुरेमा तथा मणि आदि प्रधान ईह । इनके 
पुत्र ओर पौरवोको गस्डने मार डाल था ॥ १११-११५॥ 


चतुर्दश खद्ख्राणि क्रृरणां पवनादिनाम्‌ । 

गणं क्रोधवशं चिद्धि तस्य सवे च देषः ॥११६॥ 
वायु पीकर रहनेवाठे चौदह हार करूर ॒स््पोका 

करोधवद नामवाल एक गण है ! उस गणक्रे समसत सपं 

दार्दोवाठे ह ॥ ११६ ॥ 

स्थलजा पद्सिणोऽम्नाव्ध धरायाः प्रसवाः स्सूताः। 

गास्तु घें जनयामास सखुरभिर्महिषां स्तथा ॥११७॥ 
खल ओर जले पक्षी धराकी संतान कषति ई । 

सुरमिने गौ, वैर ओर भेको उत्पन करिया ॥ ११७ ॥ 

्या॒बृक्षकतावह्टीस्दणजातीश्च सर्वशः। 

खरा तु यक्षरक्तांसि सुनिरप्सरसस्तथा, ॥११८॥ 


शरिवंडापवं ] 


वतीयोऽध्यायः 


१७ 


श्रामे व्च; ठताः वेक तथा सवरं प्रकारफी घार्सकरो 
उत्पन्न क्रिया 1 खशने वर्षो ओर राक्षसोको तथा मुनिने 
अप्रार्ओको जन्म दिया | ११८ ॥ - 


अरिष्टा तु महासत्वान्‌ गन्धवौनम्रितौजसः 1 

पते कदयपदायादाः कीर्तिताः स्थाणु्जगमाः \९१९.॥ 
अरिष्टने महासस्ववाले अमित पराक्रमी गन्धर्वोको उवयन्न 

क्रिया] यह करयप पिकी सावर जीर जंगम संतार्नोका वर्णन 

हु ॥ १९९ ॥ 

तेषां पुत्राश्च पोत्राश्च शातश्तोऽथ सदस्रशः । 

धष मन्वन्तरे तात सर्गः खासोचिषे स्मृतः ॥१२०॥ 
इनके सैकड़ों पुत्र ओर हजासँ पौत्र हए । तात यह 

खारोचिष सन्वन्तरकी खटिका वणन दै ॥ १२० ॥ 


वैवख्ते तु महत्ति वारुणे वितते क्रतौ 1 
जुहानस्य ब्रह्मणो वे प्रजासगं इहोच्यते ॥१२९॥ 
जव वैवस्वत मन्वन्तसमै वरुणदेवतासम्बन्धी वड़ा 
भारी यक च रहा था, तव बह्माजीके आहुतिं देते समय 
प्रजाओंको स्चनेका जो क्रम चलम थाः उसका यहो वर्णन 
क्या जाता दै ॥ १२९ ॥ 
पूर्वं यत्र तु बह्मपीमुत्पन्नान्‌ सप्त मानसान्‌ । 
पुञ्त्वे कल्पयामास सख्यमेवे पितामहः ॥१२२॥ 
उस समय पितामहं बेह्याने पहले अपने मनके संकर्यसे 
उन्न हुए. सात ब्रहार्र्योको स्यं ही अपने ओरस पुत्रके. 
रूपमे स्वीकार किया | १२२॥ 
ततो विरोधे देवानां दानवानां च भारत । 
दितिविनष्ु्ा वै तोषयामास कदयपम्‌ ॥१२३॥ 
मारत ! तदनन्तर जव देवता ओर दैत्योमे विरोध होने- 
पर दितिके युत्र नष्ट हो गये, तव उसने ८ मर्ष ) कद्यप- 
को ( फिर ) प्रस्ने किया | १२३॥ 
तां करयपः प्रसन्नात्मा सम्यगाराधितस्तया । 
घरेण खडछन्दयामास सा च त्रे वरं ततः ॥१२४॥ 
पुत्मिन्द्रवधा्थीय समर्थममितौजसम्‌ । 
सख च तस्यै वरं भरादत्‌ प्राथितं सुमहातपाः ॥१२५॥ 
उसके भरीर्मोति आराधना करनेपर्‌ कद्यपजीका चित्त 
प्रसन्न हौ गया ओर उर्होनि उस्ते वर मोगेके स्मि कहा । 
तवर उस दितिने चर मोगा किं “मञ्चे इन्द्रका वध करने लि 
अमित परक्रमी पु दीज्यि » ` यह सुनकर उन महातपखी 
कश्यपने उसका मोगा हुआ वर उसको देदिया॥ १२५-१२५॥ 
द्वा च बरमन्यग्रो मारीचस्तामभाषत । 
भविष्यति खुवस्तेऽयं ययेवं धारयिष्यसि ॥१२६॥ 
इन्द्रं खतो निहन्ता ते गर्म वै शरदां शतम्‌ | 
यदि धारयसे शौचं तपरा नतमास्थिता ॥१२७॥ 


वह्‌ वर देकर कदयप सुनि उस्ते शान्तभावसे बोले--ध्यदि 
पम इस ( गर्म) कोमेरी वत्रायी हुई विधिसे धारण कर सकोगी 
तो वम्हास पुत्र इन्द्रको मारमेवाख होगा ! तमहं पविन्रतापूर्वक 
रहनेका बत छेकर सौ वर्तक अपने उदस्मे इस गर्भ॑को 
धारण करना पडेगा । यदि ठम एेसा कर सकोगी तो बह पुत्र 
इन्द्रको सरनेवाल्म होगा? ॥ १२६-१२७ ॥ 
तथेत्यभिहितो भती तया देव्या महातपाः । 
धा्प्यामास गसं तु श्चचिः सा वसुधाधिप ॥१२८॥ 
तव॒ उस देवीने अपने महातपस्वी स्वामीसिकहा करि 
(अच्छाः मँ देसा ही कलग ।› राजन्‌ | फिर बह गर्मको धारण 
कर्‌ पवित्रतापूर्वक रहने रूगी ॥ १२८ ॥ 
ततोऽभ्युपागमद्‌ दित्यां गर्भमाधाय कद्यपः। 
सेचयन्‌ वै गणधरेष्डं देवानाममितौजसम्‌ ॥ १२९॥ 
तेजः सम्भृत्य दुर्धर्षमवध्यममरेरपि । 
जगाम पर्वतायैव तपसे शंसितव्रतः ॥१३०॥ 
अमितपराक्रमी देवतिके शरेष्ठ गणको परकाधित करने- 
वाठ करश्यपजी इस ग्रकार दिति गर्मकरो खापित कर वहसि 
चर द्यि 1 वे परशंसित तपवाटे ( महिं दितिमे ) 
देवताओसे भी अवध्य अपने दुर्ध तेजको सखापित करक 
तप करमेके स्यि पर्ब॑तपर चङे गये ॥ १२९-१३० ॥ 
तस्याद्चैवान्तस्पेष्छुरभवेत्‌ पाकशासनः । 
ऊने वर्षशते चास्या द्दरशौन्तरमच्युतः ॥१३१॥ 
( इधर ) इन्द्र उसके छिद्रको दने लगे ओर अच्युत 
इन्द्रने सौ वषं पूरणे दयोनेसे पहले दी उसका दोष देख 
ल्या ॥ १३१ ॥ 
अकृत्वा पादयोः शौचं दितिः शयनमाविशत्‌ । 
निद्रां च कास्यामास् तस्याः कुक्षि प्रविदय सः॥ १३२॥ 
(एक वार्‌ ) दिति विना पैर धेये ही रायन केके स्यि 
चरी गयी । इसी समय इन्द्रे उसकी कोखमे घु्तकर्‌ 
उसे ( अपनी मायासे ) निद्रा अधीन कर दिय ॥ १३२ ॥ 
वज्रपाणिस्ततो गभं सप्तधा तं स्यृन्तत । 
ख पाव्यमानो वज्रेण गर्भस्तु भ्ररुयोद्‌ ह ॥१३२॥ 
कर्‌ वज्रपाणि इन्द्रने उस गर्भे सात इुकदे कर डठे, 
वञ्चते काटे जनेपर वह गमं जोर-जोरसे रोने खगा | १३३॥ 
मा रोदीरिति तं शक्रः पुनः पुनरथाच्रवीत्‌ । 
समोऽभवत्‌ सक्ता गर्भस्तमिन्द्रो रुषितः पुनः॥१२७॥ 
पकेकं सप्तधा चक्रे वञ्रेेवारिकर्शन. । 
मस्तो नाम देवास्ते वभूद्ु्भरतर्षभ ॥१२५॥ 
तत्र उस गभे इन््रने वारवार ध्मा रोदीः-मत रो" इख 
भकार कहा ओर उख गर्भ॑के सात्‌ इकडे दो गये, तव 


१८ 


शतुरओकि नष्ट करनेवाले इन्द्र॒ रिरं क्रोध मरकर वग्रदयरा 
उस प्रयेकं टुक्डेके भी सात-सात इकडे कर उलि । 
भरतर्षभ ! वे मरत्‌ नामक ( उन्‌चास ) देवता हुए ॥ 
यथैषो मघवता तथैव मरुतोऽभवन्‌ । 
देवा पकोनपश्चाश्त्‌ साया चज्जपाणिनः ॥१३६॥ 
इन्द्रने चूंकि (मा रोदीः ) कहा थाः दसल्यि 
वे मरत्‌ नामक देवता दो गये । बे उनूचास द ओर वज्रपाणि 
इन्द्रकी सहायता करते दं ॥ १३६ ॥ 
तेषामेवं प्रवृद्धानां भूतानां जनमेजय । 
सेचयन्‌ वै गणध्रेष्ठं देवानाममितोजसाम्‌ ॥९२७॥ 
निकायेषु निकायेषु हरिः प्रादात्‌ प्रजापतीन्‌ । 
क्रमशस्तानि राज्यानि पथुपू्ौणि भारत ॥१३८॥ 
जनमेजय ! जवर वे प्राणी इस प्रकार वद्‌ गये तव अमित- 
पराक्रमी देवतार्ओंकरी श्रेष्ठ मण्डलको प्रकानित करनेवाले 


श्रीमहाभारते लिख्भणे , 


सनि उनकी टो प्रजापति नियुक्त कर दिये । भारत ॥ 


फिर उरन्दनि पृरुको पदे राज्य अर्पण किया; तवसे ये राज्य 
क्रमशः चके आ रहे द ॥ १२७-१३८ ॥ | 
हरिः पुरो वीरः ष्णो जिष्णुः प्रजापतिः । ` 
पर्जन्यस्तपनो ऽव्यक्तस्तस्य सर्वमिदं जगत्‌ ॥१३९॥ 
वे हरि पुरुषः वीरः कृष्ण, जिष्णु सीर प्रजापति 
द तथावे द्द मेषः सूर्यं ओर अव्यक्त दं एवं यद्‌ सव जगत्‌ 
उन्दीका है ॥ १३९॥ 
भूतसर्गमिमं सम्यग्जानतो भर्तपभ। 
मरुतां च शुभं जन्म श्टण्वतः परतोऽपि वा 1 
नाघत्तिभयमस्तीह परलोकभयं छतः ॥१४०॥ 
भरतर्पम | इस भूतखष्टिको पूर्णरूप जाननेवले 
ओर मरर्तोकरे श्म जन्मकौ सुनने या पदनेवाटेकफो जन्म-मरण 
का भय नदीं रहता, फिर परटोकका भय तो होगाष्टी 
कटखि ?॥ १४० ॥ 


इति श्रीमहाभारते खिरुभगे हरिवंशे हरिवंदापर्वणि मस्युस्पत्तिकयने तृतीयोऽध्यायः ॥ ३. ॥ 


दस प्रकार श्रीमहाभारत द्िरमाग दसििंरके अन्तर्गत हखिवंशापरथमे मरस्तोको उतपत्तिका वर्णनत्रिषयक तीसस अध्याय पुरा हमा 1३॥ 
८ वव 


चतुर्थोऽध्यायः 
पृथुका उपाख्यान) राज्यवितरण , ओर दिक्पा्ोकी प्रतिष्ठ 


वैद्यम्पायन उवाच 
अभिषिच्याधिराज्ये त॒ परुं वैन्यं पितामहः! 
ततः क्रमेण राज्यानि व्यादेष्टुसुपचक्षमे ॥ १ ॥ 
वैशम्पायनञी कहते है--एजन्‌ ! पितामह (म 
विराजमान दरि ) ने सजाति ऊपर भी भधिराजारूपतसे वेनकरे 
पुत्र पृथुका अभिषेक किया? फिर ( उन ॒प्रजापतिने ) क्रमदाः 
राञ्यका वितरण आरम्भ क्रिया ॥ १॥ 
द्विजान। वीटधां चैव॒ नक्षत्र्रदयोस्तथा । 
यक्लानां तपसां चैव सोमं सन्ये ऽभ्यचेचयद्‌ ॥ २ ॥ 
( प्रजापतिने ) द्विजः रताः नक्चचः ग्रह, यज्ञ ओर तपके 
राञ्यपर चन्द्रमाका अयिप्रक करिया ॥ २॥ 
अपां तु चरूणं राज्ये राकां वेशधवणं प्रमुम्‌। 
बृहस्पति तु विद्वेषां द्दावा्निरसं .पत्िम्‌ ॥ ३ ॥ 
जले राज्यपर वर्णका तथा राजाओं ( ओर यक्षो )के 
राज्यपर विश्रवाके पुत्र कुतरेरका अमिप्रेक कर दिया । विच्वेदेवो- 
परर अङ्खिरसगोची बृहस्यतिको राजा बना दिया ॥ ३॥ 
भूमृणामधिपं चेव क्यं राज्येऽभ्यषेचयत्‌ । 
आदित्यानां तथा विष्णुं वदूनामथ पावकम्‌ ॥ ४ ॥ 
भरगुवंि्योके खामीरूपसे शक्राचार्यका राज्याभिषेक कर 


दिया । आदिर्त्योक उप्र विष्णुको ओर वदुओकरि ऊपर अगनि- 
को(राजाव्रनादिया)॥४॥ 
भजापतीनां दक्षं ॑वु मरुतामथ. चासवम्‌ 1 
दैत्यानां दानवानां च शह्मदभमिदौजसम्‌ ॥ ५ ॥ 
वैवसखतं च पितृणां यमं राज्ये ऽभ्थयेचयत्‌ । 
दक्षको प्रजापतियोका, इन्द्रको मरर्तोका तथा अमित 
पराक्रमी ्रह्वादको दैत्य ओर दानवोका राजा बना दिया एवं 
पितररौके राज्यपर विवखान्‌ (सूर्यं) के पुत्र यमका 
अमिपेक कर दिया ॥ ५१ ॥ 
मातृणां च तानां च परस््राणां च तथा गवाम्‌॥ ६ ॥ 
यक्षाणां राक्षसानां च पाथिवानां तथैव च । 
नारायणं तु साघ्यानां रुद्राणां दृपभध्वजम्‌ ॥ ७ ॥ 
पोडरामातृकाः बत, मन्व, गौः यः राक्षस, पार्थिव 


` पदाथं ओर साध्य देवताओंके राज्यपर नारायणका अभिषेकं 


कर दिया ओर श्दोके राज्यर परूषमध्वज.( शंकरजी ) 

अभिग्रक्त हुए ॥ ६-७ ॥ 

विप्रचित्ति तु राजानं _दालत्रानामथादिशत्‌ 1 

सर्वभूतपिशाचानां भिरिदं शूलपाणिनम्‌ ॥ ८ ॥ 
विप्रचित्तिको दानर्वोका राजा घननेका अदेशा दै 


॥ 


^ 


| हरिवंशे ॥ † 


"हरिवंदापवं 1 


चतुर्था ऽभ्यायः 


१९ 


----------------------------------------------------------------------- ~ 


दिया ओर सक भत-पिगार्चोक्रा शूपाणि महदेवजीको 
राजा बना द्विया ॥८॥ 
शेखानां हिमवन्तं च नदीनामथ सागरम्‌ । 
गन्धानां मरुतां चैव भूतानामरसीरिणाम्‌ । 
शाब्दाकादावतां चेव वायुं च. वलिना वरम्‌ ॥ ९ ॥ 
हिमाचरुको पर्वतोका ओर समुद्रको नदिर्योका राजा बना 
दिया । गन्धद्रव्यो, मर्द्रणो, अमूर्तं भूतौ तथा शब्द ओर 
आकारावाटी अस्तुओंके राज्यपर भी वल्वा्नमिं श्रेष्ठ 
वायुका अमिषरके कर दिया ॥ ९ ॥ 
गन्धवौणामधिपति चक्रो चित्ररथं प्रभुम्‌ । 
नागानां वासुकि चक्रे सपीणामथ तक्षकम्‌ ॥ १० ॥ 
प्रभावशाटी चिच्नरथको गन्धर्वा सामी चना दिया; 
वासुकिको नार्मोकां ओर तक्षकको सर्पौका राजा बनाया ॥ 


चारणानां च राजानभैसावतमथादिश्त्‌ । 
उच्चैःश्रवसमण्वानां गरुडं चैव पक्षिणाम्‌ ॥ १९॥ 
हाथिर्योका एेवतको, धोडौका उच्चैःश्रवाको ओर 
पक्षिर्योका गरुडको राजा चना दिया ॥ ११ ॥ 
सृगाणामथ श्षादुंङं गोवृषं च गवां पतिम्‌ । 
चनस्पतीनां राजानं प्लक्षमेवादिश्त्‌ प्रञुम्‌ ॥ १२॥ 
वनचारी पडुओंपर सिंहको तथा गौर्ओपर रसोडको 
स्वामी बनाया ओर पाकड़्को वर्षका प्रभावशाली राजा 
वना दिया ॥ १२॥ 
सागराणां नदीनां च मेघानां वर्षणस्य च । 
आदित्यानामधिपतिं ` पर्जन्यमभिषिकचान्‌ ॥ १२ ॥ 
` सागर, नदी, मेघः वर्षा ओर सूर्यकी किरणेकि अधिपति- 
पदपर्‌ पर्जन्यका अभिषेक कर दिया ॥ १३ ॥ 
सर्वेषां देष्टिणां शेषं राजानमभ्यचेचयत्‌ । 
स्ीखपाणां सपीणां राजानं चैव तक्षकम्‌ ॥.१४॥ 
दादृवाके समस्त सपके ऊपर शेषकोः ( निर्विष इण्डुम 
आदि ) सर्पौ ओर सरीसरपों (पेयके बर्पर चल्नेवले जीवो ) 
के ऊपर तक्षकको राजा वना दिया ॥ १४॥ 
गन्धर्वाप्सरसां चेव कामदेवं तथा प्रभुम्‌ । 
ऋतूनामथ मासानां दिवसानां तथेव च ॥ १५॥ 
पक्षाणां च क्षपाणां च मुहतत्तिथिपवेणाम्‌ । 
कराकाषछठाप्रमाणानां गतेरयनयो स्तथा ॥ १६॥ 
गणितस्याथ योगस्य चक्रे संवत्सरं प्रथम्‌ । 
गन्धव ओर अप्रा्थेके ऊपर एेरय॑शाखी कामदेवका 
अभिषेक कर दिया । क्रतुः मासः दिनः पक्त, रात्रिः मुहूर्तः 
तिथिः पर्वकला-काषटके प्रमाण--उत्तरायण ओर दश्चिणायनकी 
गति तथा उपराग अर्थात्‌ अहण ( के अभिमानी देवताओं ) 
पर प्रु संवत्सरका अभिषेक कर दिया ॥ १५-१६१ ॥ 


पवं विभज्य राज्यानि .कमेण स पितामहः ॥ १७ ॥ 
दिश्ापालानथ सतः स्थापयामास भारत । 

मारत ! पितामहने इस प्रकार क्रमपूवंक रार्जयोका 
विभाग करके फिर दिकृपालोकी स्थापना की थी ॥ १७ ‡ ॥ 
पूर्वस्यां दिस पुत्रं तु वैराजस्य प्रजापतेः ॥ १८ ॥ 
दिशापारं खधन्वानं राजानं चाभ्यषेचयत्‌ । 

उन्हनि वैज प्रजापतिके पुत्र राजा सुधन्वाको पूर्व दिगा- 
के दिक्धालपदपर अभिषेक कर दिया ॥ १८३ ॥_ 
दक्षिणस्यां मत्मानं करदमस्य॒ पजापतेः ॥१९॥ 
पुत्रं शङ्धपदं नाम राजानं सोऽभ्यषेचयत्‌ ॥, 

कर्दम प्रजापतिके पुत्र महात्मा राजां शद्धुपदको दक्षिण 
दि्षाके दिकपालपदपर अभिषिक्त किया ॥ १९ ॥ 
पश्चिमायां दिधि तथा रजखलः पुत्रमच्युतम्‌ ॥ २०॥ 
केतुमन्तं महात्मानं राजानं सोऽभ्यषेचयत्‌ । 

इसी प्रकार पश्चिम दिशामि रजसूके पुत्र अच्युत 
महात्मा केतुमानका राजा ( दिक्ूपार ) के पदपर अभिषेक 
कर दिया ॥ २०३ ॥ 


तथा हिरण्यरोमाणं पञजन्यस्य प्रजापतेः ॥ २९॥ 
उदीच्यां दिशि दुर्धषं सजानं सो ऽभ्यषेचयत्‌ । 
इसी प्रकार उत्तर दिशम पर्जन्य प्रजापतिके युत 
दुध दिरण्यरोमाका राजपद्‌ ८ दिकृपारूपंद ) पर अमिषेक 
कर दिया ॥ २९१ ॥ 
तैरियं पृथिवी सवौ सततत्तीपा सपर्वता ॥ २२॥ 
यथाप्रदेशमद्यापि धर्मेण परिपाल्यते । 
उन पुरस्परदयारा स्तौ द्वीप ओर पर्वतोँसहित सारी 
प्रथ्वी ओर उसके वे-वे प्रदेशा आज भी धर्मानुसार पालित 
होरे ई॥ २२१ ॥ 
राजसूयाभिपिक्तस्तु ` पृथरेभिर्नरधिपेः। 
वेदद्टेन विधिना साज्राज्ये नराधिप ॥ २६॥ 
जनेश्वर ! इन राजा्ओने वेदम वित विधिखे 
राजसूय यर्षमे राजा्थोके भी राजाके पदपर प्रथुका अभिषेक 
क्ियाथा।) २३॥ 
ततो मन्वन्तरेऽतीते चाश्वुषे ऽमिततेजसि +. 
वैवसरताय मनवे बह्मा राज्यमथादिश्त्‌। 
तस्य विस्तरमाख्यास्ये मनो्वैवस्तस्य हट ॥ २४॥ 
तबानुकरूल्याव्‌ राजेन्द्र यदि द्युश्चूषसेऽनध । , 
मदद्धेतदधिष्ठानं पुराणं परिकीर्तितम्‌ 
धन्यं यक्स्यमायुष्यं खगंबासकरं शुभम्‌ ॥ २५॥ 
तदनन्तर अमिततेजस्वी वे्षुष मनुकरे मन्वन्तरके 
चीतनेपर "्रह्माजीने वैवस्वत मनुको राव्य देदिया या। 
निप्पाप राजेनद्र [ य॒दि आप अनुकूल रहकर सुनमा च्हेगे 


२० - 


तो मँ मापने वैवखत मनुके वरितारका वर्णन करँगा | मैने 
आपको यह वड़ा मारी प्राचीन इतिदासत कद सुनाया ! इसको 
सुननेते प्रतिष्ठ! वदती है, धन मिल्ता हैः यदा मिलता दैः 
आयुकरी बृद्धि होती दे यर इस श्म आख्यानको सुननेसे 
( यन्तम ) सर्गकी प्राति दती दै ॥ २४२५ ॥ 
जनमेजय उवाच 
विस्तरेण पृथोर्जन्म वैराम्पायन कीर्तय । 
यथा महान्मना तेन दुग्धा चेयं धरश्ंधया ॥ २२द ॥ 
जनमेजयने कदहा--वैम्पायनजी { आप प्रकरे 
जन्मका विस््रारपूर्वक वर्णन कीजिये, उन मदात्माने इस 
पृथ्वीको किस प्रकार दुहा था १॥ २६ ॥ 
यथाच पिदभिरदुग्धा यथा देवैर्यथर्पिभिः। 
यथा दैत्यैश्च नानैश्च यथा यश््यया द्रुमैः ॥ २७॥ 
यथा दौः पिरारयैश्च गन्धर्वैश्च दिजोत्तमेः 1 
राक्षसश्च मदासचैय॑था दुग्धा वसुधस ॥ २८॥ 
तेषां पाचविलपांश्च वैदाम्पायन कीर्तय । 
वत्लान्‌ क्षीरविद्ेपांश्च दोग्धारं चापूर्वः ॥ २९.॥ 
प्रितरोनि दस प्रथ्यीको जिस प्रकार दुहा थाः. देवता तथा 
छ्रप्रियेनि, दैत्यो ओर नागनिः यमो र वर्तन इस पृथ्वीको 
जिष प्रकार दुद्ा था तथा पर्वतः परिगाचः गन्धर्व, द्विजोत्तम 
ओर मदान्‌ थक्तिदाखी रा्रसनि इस वधय पूथ्वीको जिस 
प्रकार दुद्रा थाः वह्‌ बताइये । वैगम्यायनजी { इन सरके पास 
केरे-कते पातर ये कैरे-केते वदे ये, कैसा-केता दूध दुदय 
गया था योर कौन-कौन दुद्नेवाले थे १ इन सवका करमपूर्वक 
वर्णन कीजिये ॥ २७--२९ ॥ 
यस्माच कारणात्‌ पाणिर्वनस्य मथितः पुरा । 
छद्धेभदर्पिभिस्तात कारणं तच्च कीर्तय ॥ ३०॥ 


तात ¡ प्राचीनकाले महिनि जिस कारणसे वेनके 


श्रीमहाभारते चिखभागे 


[ हरिषे 


दाथका मन्थन किया था ओर महर्भियेनि जिस कारण क्रोध ` 
किया था) उस कारणक्रा भी आप वर्णन कीजिये | ३० ॥ 
दैश्स्पायन उवाच 
हन्त ते कथयिष्यामि पथोर्दैस्यस्य विस्तयम्‌। ,, 
पकाग्रः प्रयतश्चेव शऋणयुप्व जनमेजय ॥ २३१॥ 
वैराम्पायनजीने कह[--जनमेजव ¡ मँ तमसे वेनके 
पुत्र प्रकरा चरित अव विस्तारपूर्वक कटता हः इस चरितरिको 
एकाग्र ओर सावधान होकर सुनो ॥ ३१ ॥ 
नाद्युचेः श्चुद्रमनसः ईटिप्यायावरताय च । 
कीर्तनीयमिदं राजन्‌ कृतघ्नायाहिताय वा ॥ २२॥ 
राजन्‌ ] जिक्र मन वच्छ होः जो अपवित्र हो, जो 
कचिष्य हो यीरसोत्रत न करता दौ तथा जो कृतन्न दो 
एवं जो स्षसारका अदित करनेवाला दो, उसमे इस चसि्िका 
वर्णन नदीं करना चादि ॥ ३२॥ 
खरग्यं यदास्यमायुध्यं धर्म्यं वेदेन सम्मितम्‌ । 
रहस्यस्पिभिः परोक्तं श्यणु राजन्‌ यथातथम्‌ ॥ ३२३ ॥ 
राजन्‌ {यह ( इतिदास ) खर्गः यदा; आयु तया धर्मकी 
प्राति करनेवास ओर वेदे समान द । ऋपिर्योनि इस रहस्य- 
का वंन क्रिया हैः इसे तुम यथार्थं रीतिसे सुनो ॥ ३३॥ 
यद्येनं कथयेन्नित्यं पृथोर्वैन्यस्य चिस्तरम्‌। 
ब्राह्मणेभ्यो नमस्कृत्य न सख चोचेत्‌ कतारूैः। ३४॥ 
जो पुरुप व्राहमणेको प्रणाम करे चेनकरे पुज पृथुके 
इस चरित्रको विस्तारपूर्वक कता है, उसे कार्याका्यके ( मनि 
सदा पाप कर्म क्रिये; धमं कभी नदीं किया, रेते ) पश्चात्तापसे 
शोक नदीं करना पड़ता अर्थात्‌ इस चरिचको सुननेसे 
सव प्रकारके परपनष्ट दो जति ओर सवर यन्नि फठ 
प्रात देते ई ॥ ३४॥ 


इति श्रीमहाभारते लिरुभागे हरिवंशे दरिवंशपत्रणि पृथूपाख्याने चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ 


दृ प्रफार श्रीमदामास लिग्ाण्‌ इसिविदके अन्तर्गत इसिंडाप्वमे पृथुका उपाठ्यानविषयर चौथा अध्याय्‌ पुरा हुमा ॥८॥ 
"स^ , 


प्चमोऽध्यायः 
धुका उपाख्यान--वेनका अत्याचारं करके न्ट होना ओर प्रुका जन्म तथा चस्ति 


वृश्नश्पायन उवाच 

आसीद्‌ धर्मस्य गोप्ता वै पूर्वमनिसमः प्रभुः 1 
अधिचंशसमुत्पन्तस्त्वद्मौ नाम प्रजापतिः ॥ १॥ 

वैशम्पायनजी कहते ह- जन्‌! ्राचीन कार्की बात 
ट, धर्मके रक्षक अत्रि वंशम एक प्रजायति उलन्न टुएः 
जिनका नाम या यद्ध । वे अत्रिके दी समान ग्रभावदाटी ये ॥९॥ 
तस्य पुञोऽभवद्‌ वेनो नात्यर्थं धर्म्तोचिदः। 
जातो त्युखुतायां वै सुनीथायां पजापतिः ॥ २ ॥ 


उनका पुत्र वेन हाः परततु उसे धर्मे रदस्यका 
पतान था] वह राना वेन मेल्युकरी पुत्री सुनीथाके 
गमसे उयन्न हुजा या ॥ २॥ 
स मातामहदोषेण वेनः काटात्मजाऽऽत्मञः । 
खधर्म पृष्ठतः रत्वा कामाह्योभेष्ववर्तत ॥ ३ ॥ 
` काट्कर पुत्री सुनीथाका पुत्र वह वेन नानाके दोषे 
अपने धर्मकी उपेभ्ा कर कामके कारण लोमे फंस गया ॥२॥] 
मयौदां स्थापयामाल धमोपेतां स पार्थिवः, 


-- वेनः 


हरिवंराप्वं 1 


पञ्चमोऽध्यायः 


॥. 


वेदधमौनतिक्रम्य सो ऽध्मनिरतो ऽभवत्‌ ॥ ४ ॥ 
वह राजा धर्मविहीन मर्यादाको खापित्त करने ख्गा 
जर वेदोक्त धमौका उछ्न कर अधर्म फस गया ॥ ४ ॥ 


निःखाध्यायवषद्‌ कारास्तस्सिन राजनि शासति। 
धवृत्तं न पयुः सोमं इतं यक्षेषु देवताः ॥ ५ ॥ 
उस राजाकेः शासनकरार्मे देवतालोग ( उनकी वपिके 
ल्थि किये जानेवले ) ख्याय ओर वषटुकरारसे बच्चित दो 
गये थे; इसच्ियि अपने उद्दैश्यसे अपरि तथा यज्ञकरुण्डोमे 
होमे गये सोमका मी वरे पान नदीं कसते ये ॥ ५॥ 
न यष्रस्थं न होतव्यमिति तस्य प्रजापतेः । 
आसीत्‌ प्रतिक्षा कररेयं विना प्रत्युपस्थिते ॥ ८६ ॥ 
उसक्रा विनाशकार समीप आ गया थाः अतः उस 
प्रजापतिने यह क्रूर प्रतिक्ञा घोभिते की किं भेरे राज्यम 
कोई यज्ञ -ओर हवन न करः ॥ ६ ॥ 
अहमिज्यश्च यथा च यक्षश्चेत्ति ऊुरूद्ध् 1 
मयि यज्ञो विधातव्यो मयि होतव्यमित्यपि ॥ ७ ॥ 
कुसगश्रेष्ठ ! ( वह कहता था कि) भ्ये ही यज्ञेद्रारा आराध्य 
ओरी यक्ञ करनेवाला हू तथा यत्त मीही । मेरे 
च्यि ही यज्ञ ओर हवन करना चादियेः ॥ ७॥ 
तमतिक्रान्तमयौदमाददानमसाम्पतम्‌ 1 
उुर्महर्षयः सवै मरीचिध्रसुखास्तदा ॥ ८ ॥ 
जग वह इस प्रकार मर्यांदाको तोडने ल्गा ओर अनु- 
चितरूपसे ( कर आदि माक ) सथ कुर द्टने खगाः तत 
जो मरीचि आदि बड़े-बड़े अपरि येःउन्दौने उससे कहा-॥८॥ 
चयं दीक्षा प्रवेक्ष्यामः संवत्सरगणान्‌ बहन्‌ । 
अधम क्र मा वेन नैष धर्मः सनातनः ॥ ९ ॥ 
ष्टम बहुत वपम पूर्णं रोनेवाी दीश्वमि प्रवेश्य करगे \ 
वेन { अवर तम अधम न करो; क्योकि यह सनातन धर्म , 
नही है ॥ ९॥ 
निधनेऽत्र धसूतस्त्वं परजापतिरसंश्यम्‌ 1 
प्रजाश्च पारयिष्येऽहमिति ते समयः कृत्तः ॥ १० ॥ 
“निःसंदेह ठुम इस वंशम प्रजापतिके रूपमे उत्पन्न हुए 
हो ओर वुमने प्रतिज्ञा की थी किं भम प्रजाका पालन 
करगाः. ॥१०॥ । । 
तांस्तदा यवतः सवौन्‌ महर्षीनत्रवीस्‌ तदा । 
प्रहस्य दुवुंद्धिरिममर्थमनर्थवित्‌ ॥ .९१९॥ 
जव्र मदर इस प्रकार कह रहे थे, उस समय अनर्थको 


वेन उवाच 
खा धर्मस्य कश्चान्यः श्रोतव्यं कस्य वे मया। 
शरुतवी्य॑तपःसत्ये्मया कवा कः समो अवि ॥ १२॥ 
चेनने कष्टा--धर्मका स्चनेवाखां मेरे सिवा ओर 
कौन दै मै किसकी वात सुरद १ इस प्रथ्वीपर वेदः वीयः 
तप ओर सत्यमे मेरे समान दूसरा क्रौन दै १॥ १२॥ 
ध्रवं सर्वभूतानां धमौणां च विरोपतः। 
सम्मूढा न विदुनैनं भवन्तो मामचेतसः ॥ १३॥ 
आपलोग मूख हैँ ओर अचेत हो रहे दैः अतः स्‌ 
भूतो ओर विरोषतः धमेकि उत्पत्तिस्थान मुद्ध वेनको 
नदीं जानते र।६९१ ॥ | |. . , हि 
द्ख्छन्‌ दहेयं पृथिवीं छावयेयं तथा जेः । 
खं भुवं चेव रुन्धेयं नाच काया विचारणा ॥ १४॥ 
मै चरं तो प्र्वीको भस करं दू अथवा इसको जसम 
डवो दु ओर परथ्वी तथा आकाशको भी ( अपने तेजते) ठक 
दू इसमे विचार. कसनेकी कोई ब्रात नहीं हे ॥ १४ ॥ - 
यदा न शक्यते मोदाद्वरेपाच्च पार्थिवः 1 
अनुनेतुं, तद . वेनस्तदः क्रुद्धा महर्षयः ॥ १५॥ 
गर्वं ओर मोहके वशम पड़े हुए उस राजा वेनको जब वे 
षि अधर्म करनेसे न रोक सकः तव वे क्रोधमै भर ग्ये॥ 


निगरृ् तं महात्मानो विस्फुरन्तं महावरम्‌ 1 
ततोऽस्य सव्यमृरं ते ममन्धुजोतमस्यवः ॥ १६॥ 
फिर तो वे महात्मा उस उछल-कूद सनचाते हुए महाबली 
राजाको वल्पूर्वक पकड़कर करोधमे भर उसकी दाहिनी जाध- 
को मथने ख्ये ॥ १६॥ 
तस्मिस्तु मध्यमाने वै राक्ञ ऊरौ प्रलक्षिवा्‌ । 
हस्ाऽतिमाजः पुरूषः छृष्णश्चात्ति वभूव ह ॥ १७॥ 
राजाकी उस ज्घाके मथे जानेपर उसमेसे बहुत ठिगना 
ओर बहुत ही काला एक पुरुप निकल ॥ १७] 


स भीतः प्रा्जलिभू्वा स्थितवाञ्जनमेजय । 

तमन्निर्विहरं दृष्ट निपीदेत्यत्रवीत्‌ तदः ॥ १८॥ 
जनमेजय बह उरा हभ था, अतः हाथ जोड़कर खड़ा 

हो गया \ तवर अत्रिने उसे भयस विहर देखकर उससे कहा 

ध्निषीद--तैठ जाः ॥ १८ ॥ 

निषादवंशकततौसो. वभूव वदतां चर । 

धीवरानखजचच्चाथ वेनकरठमपसम्भवान्‌ ॥ ९९ ॥ 
` वक्ताओमे श्रेष्ठ जनमेजय ! वह निषादोके वंशका चलने. 

वाला हया ओर उसने धीवरौको जन्म दिया । ये समी वेनके 

पापसे उव्पनन हुए थे ॥ १९ ॥ 

ये चान्ये चिर्ध्यनिलयास्तुषासस्तुभ्बरास्तथा 


अपनानेवारे दधि वेनने सकर उन लेगेति ये तिं कीं ॥ अधर्भरूचयो ये च विद्धि तान्‌ वेनसस्भवान्‌ ॥ २० ॥ 


२२ 


श्रीमहाभारते विभागे 


[ हरिवंशे 


न~~ 


इन धीवरोके अतिरिक्त जर भी ज विन्ध्ये रहनेवाठे 
तुषारः तुम्बर तथा अधर्मे प्रम करनेवाले वनवासी ( गोण्ड- 
कौर आदि ) दैः इन सत्रको ठुम वेन ( के पप ) से उन्न 
हुआ समघ्चो ॥ २० ॥ 
ततः पुनर्महात्मानः पाणि वेनस्य दक्षिणम्‌ । 
अरणीमिव संर्धा ममन्थुस्ते महपयः ॥ २९ ॥ 
तदनन्तर वे करोध्म भरे हुए महात्मा महिं वेनके 
दाहिने हाथको अरणीके समन मथने लगे ॥ २१ ॥ 
पृथुस्तस्मात्‌ समुत्तस्थौ कराञ्ज्वलनसंनिभः। 
दीप्यमानः खवपुपा साक्षादग्निरिव स्वखन्‌. ॥ २२॥ 
तवर उस हाथसे अधिके समान प्रथु उच्यत हुए वे 
अपने शरीरे चाध्वात्‌ प्रज्वलित अधिके समान प्रकारित हो 
रदे ये॥ २२॥ 
सं धन्वी कवची जातः पृथुरेव महायदाः। 
आदयमाजगवं नाम धचगंह्य महास्वम्‌। 
शरांश्च दिव्याम्‌ र्नाथ कवचं च महाप्रभम्‌ ॥ २३ ॥ 
,, महायशसवी प्रथु हाथमे धनुप्र ओर व्राणको धारण वयि 
हए ओर राके लि महाकान्तिमान्‌ कवच ओर दिव्य 
वा्णेकोः धारण क्वि हुए दी उत्पन्न हुए । वे हाथमे महान्‌ 
शब्द करनेवले प्राचीन आजगवं नामक धनुषको धारण कयि 
हुए ये ॥.२३॥ 
तसिजा्तेऽथ भूतानि सम्प्रहृष्टानि सवशः 
समापेतुमंहाराज येनखच भिदि गतः 1 २७॥ 
महाराज ! उनके उदन्न होनेपर सव प्राणी प्रसन्न होकर 
उनके पास दौड़ आये ओर वेन खर्णको चस गया | २४॥ 
समुत्पन्नेन कौैरव्य सत्पुत्रेण मदात्मना । 
शातः स पुरुयव्याघ्र पुम्नास्नो नरकात्‌ तदा ॥ २५ ॥ 
पुसषव्याघ कौर { उस महामा सत्पुजके उत्यन्न होनेपर 
उस वेनकी “पु नामक नरकते रष्वा हो गयी ॥ २५ ॥ 
तं समुद्राश्च नद्यश्र रत्नान्यादाय सर्वशः 1 
तोयानि चाभिषेका्थं सर्वं पवोपतस्थिरे ॥ २६॥ 
-उन पथुका अमिषेक करेके चल्थि सव्र समुद्र ओर 
नदिर्यो चासं ओस्े जल ओर रत्न केकर वरदो उपस्थित हूर ॥ 
पितामहश्च भगवान्‌ देैराद्िरसेः खष्ट 1 
स्थावराणि च भूतानि जङ्गमानि तथैव च ॥ २७ ॥ 
समागम्य तदा वैन्यमभ्यपिश्चन्नसधिपम्‌ । 
म्वा राजराज्येन प्रजापारं महाद्युतिम्‌ ॥ २८॥ 
मगवान्‌ पितामह मी अद्किराके पुत्र, पौत्रौ तथा समी 
देवताओकरि छथ चर्दो अये ओर खावर-जज्गम प्राणियेनि मी 
वहू आकर महाकान्तिमान्‌. वेनके प्रजापाल्कं पुत्र प्थुका 
वदे मारी राजाधिराज-पदपर अमिषेक कर दिया ॥ २७-२८ ॥ 


सोऽभिपिक्तो महातेजा विधिवद्धरमकोविदैः । 
आदिर्ये तद्‌! याक्षं पथ॒वन्यः प्रतापवान्‌ ॥ २९ ॥ 
पिच्रापरञ्जितास्तस्य प्रजास्तेनाचुरञ्जिताः 
अञ्ुरागात्‌ ततस्तस्य नाम॒ राजेत्यज्ायत ॥ ३० ॥ 

जव धर्मके जाननेबासोनि महातेजस्वी ओर प्रताथी वेनकरे 
पुच प्रधुका राजाेकि आदिराय्य ८ साम्राज्य )-पदपर 
विधिवत्‌ अभिषेक कर दिया, तवर उन्देनि पिताद्वास पीडितकी - 
हुई पजाक्रो अपनी तेवाओसि सू प्रसन्न किया । इस प्रकार 
ग्रजासे अनुराग करनेकरे कारण उनका नाम राजा पड़ गया ॥ 
आपस्तस्तम्भिरे चास्य समुद्रमभियास्यतः । 
पर्वताश्च ददुर्मागं प्वजभङ्गश्च नाभवत्‌ ॥ ३१॥ 

जवे ये समुद्रपर चल्ते येः तव जक स्तम्मित दौ जाता 
था ( अर्थात्‌ समुद्रका जल श्थलकी तरह कड़ा हो जता था ) 
ओर जवर ये आकादामे चलते थे; तत्र पर्वत इनके च्ि मं 
छोड़ देते ये । इस कारण इनके र्थकी ध्वजा वृक्ष आदिमे 
कमी नदीं ट्ट्ती थी ॥ ३१ ॥ 


अकृष्टपच्या परथिवी सिध्यन्त्यन्नानि चिन्तया । 

सवैकामदुघा गावः पुरके पुटके मधु ॥३२॥ 
८ उनके शाखनकारमै ) प्रथ्वी विना जोते हुए दी अनन 

देती थी 1 चिन्तनमात्रसे दी अन्न ( भोज्य पदाथ ) तैयार हो 

जति थे, गैौर्ठकामपेलुकरे समान सव कामना्योको पूणं करती थीं 

ओर इ्धौके पत्त-पतेमे मधुर रख भया रहता था ॥ ३२ ॥ 

पतसिन्नेव के त यक्षे पैतामहे शमे । 

सूतः सत्यां समुत्पन्नः सौत्येऽहनि महामतिः। ३३ ॥ 
दन्दके ( राज्यत्व ) कार्य पितामहके शभ यज्ञम खोमको 

निकाल्नेके दिन सोमका अभिषव करते समय अर्थात्‌ रस 

निकाल्नेकरे च्थि सोमल्ताको कृूटते समय महबुद्धिमान्‌ 

सूतकी उत्पत्ति हुई थी | २३ ॥ 

तस्मिन्नेव महायक्ष जक्षे प्राक्लोऽथ मागधः । 

पृथोः स्तवार्थं तो तत्र समाहतो सुरपिभिः ॥ २४॥ 
तदनन्तर उसी महाय बुद्धिमान्‌ मागघ प्रकट हुमा । 

देवता ओर श्रषिर्योनि पृथुक स्ठुति करनेके व्यि उन दोर्नोका 

वरहो आवाहन किया था ॥ ३४॥ 

तावुदुर॑णयः सवै स्तूयतामेष पार्थिवः 1 

कमरतदनुरूपं वां पात्रं चायं नराधिपः ॥ ३५॥ 
सव क्रषिर्योनि उन दोनोसि कटा कि त॒म दोनो इन 

परथ्वीपतिकी स्त॒ति करो, यह कर्मं॑वुम्दारे अनुरूप है ओर 

ये राजा भी स्ततिके पात्र है ॥ ३५ ॥ 

तावृचतुस्तदा सर्बास्तारृपीन्‌ सूनमागधो । 

आवां देवानरषीथ्चैव प्रीणयावः खकर्मभिः ॥ ३६ ॥ 
उस समय सूत ओर मागधने उन सव श्रपि्योखि कदा; 


हसिविंशपवं ] 


(म अपने क्सि देवता ओर ऋप्रियोको प्रसन्न करेगे ॥ ३६॥ 
न चास्य विद्धो वै क्म न तथा क्षणं याः 1 
स्तोरं येनास्य कुर्याव राक्षस्तेजखिनो दविजाः॥ २७ ॥ 
ध्परंतु ब्राह्मणो ! इन तेजस्वी राजके कर्मः लक्षण 
ओर यद्रको तो हम जानते दी नही, निससे इनकी 
स्तुति करे" ! ३७ ॥ 
ऋषिभिस्तौ नियुक्तौ च भविष्यैः स्तूयतामिति! 
यानि कमीणि इतवान्‌ पृथुः पश्चान्महावखः॥ ३८॥ 
तत्र ऋष्रियोनि उन्हे यह कहकर स्वुति-काय॑मे नियुक्त 
किया कि ध्ठुम दोनों इनके मवि्यमे होनेवाठे युणोका उर्ठेख 
करते हुए सबन करो ।› उन्होने वैसा ही करिया । सूत ओरं 
मागधे जो-जो क्म बताये, उर्दीको महावखी प्थुने पीते 
पूण करिया ॥ ३८ ॥ 
“ सत्यवाग्‌ दानश्चीलखेऽयं सत्यसंधो नरेश्वरः 
भीमाञ्जेनः श्चमारीले विक्रान्तो दुटरासनः॥ २९ ॥ 
( सूत ओर मागधने राजा पृथुक स्तुति इस प्रकार आरम्भ 
की-) ध्ये नरेद्वर सच्ची प्रतिज्ञा करनेवाठे, सत्यवादी दान 
देनव, लक्ष्मीवान्‌ ओर विजयी ह । ये क्षमा करनेवाले 
पराक्रमी तथा दुका शासन करनेवाले ह ॥ ३९ ॥ 
, धम॑कषश्च ऊतक्षश्च दयावान्‌ भ्रियभाषणः । 
मान्यो मानयिता यस्वा ब्रह्मण्यः सत्यसंगरः ॥ ४० ॥ 
.पर धर्मज्ञः कृतज्ञः दयावान्‌ ओर पिय माषण करनेवाठे 
है। ये माननीय है ओर ( दूसरौका ) मान करनेवाले दै । 
यज्ञ करनेवाले, ब्राह्मण-भक्त तथा सत्यप्रतिज्ञ दँ ।। ४० ॥ 
शमः शान्तश्च निरतो व्यवहारस्थितो चपः । 
ततः प्रभृति टखोकेघु स्तवेषु जनमेजय । 
आश्चीवौदाः प्रयुज्यन्ते सूतमागधवन्दिभिः ॥ ४१९ ॥ 
धये राजा शमसम्पन्न) चान्तः कार्य॑तत्पर तथा अपने 
व्यवहास्मै संख्य रहनेवाले ई | जनमेजय | उसी समयसे 
ोगेमि स्तुतिके अवसररोपर सूतः मागध ओर्‌ बन्दियोके द्वारा 
आशीवाद दिखनेकी प्रथा प्रचलति हुई ॥ ४१ ॥ 
तयोः स्तवेस्तैः सुप्रीतः पृथुः प्रादात्‌ प्रजेश्वरः। 
अनूपदेशं सूताय मगधान्‌ मागधाय च ॥ ४२ ॥ 
प्रजाओके ईश्वर प्रुने उन दोनोके इने सतोत्रोचि प्रसन्न 
होकर सूतको अनूपदेश ओर मागधको मगध देश दे 
दिया ॥ ४२॥ 
` त दष्टं परमप्रीताः प्रजाः भ्राहुमहषेयः 
इत्तीनामेष वो दाता भविष्यति जनेश्वरः ॥ ४३ ॥ 
इस व्राततको देखकर महर्षिं परम प्रसन्न हुए ओर उन्दने 
प्रजायसे कहा; चये जनेश्वर ( राजा ) ठम्हैे दृत्ति- 
आजीविका देनेवारे होगे | ५३ ॥ 


पञ्चमो ऽध्यायः 


------------------------------------------------- ~ 


, २ 


ततो वैन्यं मष्टाराज प्रजाः समभिदुदधुः । 
त्वं नो बच विधत्स्वेति महषिवचनात्‌ तदा ॥ ४७ ॥ 
महाराज ! महर्षियोके फेला कहनेपर प्रजा वेनपुत्र राजा 
पृथुके पास दौड-दौडकर अने ओर कने ख्गी किं (आप 
हमारी इृत्तिका प्रबन्ध कीज्यिः । ४४ ॥ 
सोऽभिद्रूतः प्रजाभिस्तु प्रजाहितचिकीषंया 1 
धयुरंद्य पृषत्काश्च पृथिवीमाद्रवद्‌ बरी ॥ ४५॥ 
जव प्रना उनके पास इस प्रकार दौढड़कर आयी 
तवर वे महाबली मरेश॒परजाका दित करनेकी इच्छसे 
अपने धनुष ओर ब्राण लेकर पृथ्वीको रक्य कके दौडे॥४५॥ 
ततो वैन्यभय्रस्ता मोभुत्वा पराद्रवन्मही। 
तां पृथुर्धनुरादाय द्रवन्तीमन्वधावत ॥ ४६॥ 
तव तो परथ्वी वेन-कुमार प्रथुके भयते चस्त हो गौका- 
रूप धारणकर भागने ठ्गी। परु मी धनष लेकर उस मागती 
हई परथ्वीके पीछे दौड्ने खो ॥ ४६॥ 
सा छोकान्‌ ब्रह्मलोकादीन्‌ गत्वा वैन्यभयात्‌ तद्‌ए। 
प्रददश्शैरतो वैन्यं प्रगरहीतश्षरासनम्‌ ॥४७॥ 
थ्वी राजा प्रथुके भयसे बक्षलोक आदि लोकमि गयी; 
परतु ( उसने सव॑न ही >) वेनपुच्र प्रथुको हाथमे धनुप्-वाण 
धारण क्ये अपने सामने खड़ा हुम देखा ॥ ४७॥ 
ज्वलद्धिनिशितैर्बणैरदी्ततेजखमच्युतम्‌ । 
महायोगं महत्मानं दुधंषंममरेरपि ॥ ४८॥ 
अकभन्ती चु सा चाणं वैन्यमेवान्वपद्यत 1 
रुताञ्जकिपुखा भूत्वा पूज्या खोकंखिभिः सदा ॥ ४९ ॥ 
उवाच वैन्यं नाधम्यं स्रीवधं कठमर्ह॑सि । 
कथं धारयिता चासि प्रजा राजन्‌ विना मया ॥ ५०॥ 
अपनी मर्यादासे कमी च्युत न होनेवाले पथु प्रज्वलित 
तीते बाणेदरारा ओर भी तेजते उद्धासित हो रहेथे।वे 
महान्‌ योगवर्से सम्पन्न महात्मा नरेश देवताथकि स्मि भी 
दुर्धषं थे । जवे पृथ्वीको कहीं भी इरण न मिली, तव्‌ वह्‌ 
पृथुकी ही शरणमे पर्हुची ओर तीनों छोकोकी सदासे 
पूजनीया प्रथ्वी दोनो हाथ जोड़कर वेनपुत्र पथु कने 
लगी-“आपको स्रीवधरूम अधर्मका काम करना उचित नहीं 
हे । राजन्‌ { ( पदे आप यह तो सोचिये किं ) मेरे बिना 
इन प्रनाओको कां खापित करेगे १ ॥ *८-५० ॥ 
मयि रोकाःस्थिता राजन्‌ मयद्‌ धायते जगत्‌। 
मद्विनाशे विनश्येयुःप्रजाः पार्थिव विद्धि तत्‌॥ ५१ ॥ 
(राजन्‌ | ये सवर खोक मुद्चपर ही खित दै, मै ही इस जगत्‌- 
को धारण कर रही हू; (अतः) भूपार {आप इस वातको जान 


रक्लँ कि मेरा विनाश होनेपरं ये सव प्रना भीनष्टहो 
जर्येगी ॥ ५१ ॥ 


४ 


श्रीमहाभारते खिकभागे 


[ ररव 


न त्वमर्हसि मां दन्तु ्रेयश्वेत्‌ त्वं चिकीरपसि । 
प्रजानां पथिचीपार श्टणु चेदं यचो मम ॥ ५२॥ 
धृथ्वीपाल ! यदि आप प्रजाका कल्याण करना चादते 
हं तो आपको मेरा वध कंला उचित नही है । साय द्यी आप 
मेरी इस वातको भी सुनिये ॥ ५२ ॥ ू 
उपायतः समारब्धाः सरवे सिध्यन्त्युपक्रमाः। 
उपायं पद्य येन त्वं धास्येथाः श्रजा दप ॥ ५२३॥ 
प्रायः सव कार्य ठीक उपारव॑से आरम्भ किये जनेपर 
की सिद्ध होते है; यतः राजन्‌ ! उस उपायका विचार 
कीन्यिः जिखते कि थाप प्रजाका पाटन कर सके | ५२ ॥ 


दत्वापि मां न शक्तस्त्वं भ्रजा धारयितुं दष । 
यञुभूता भविष्यामि यच्छ कोपं मदध्युते ॥ ५४ ॥ 


ध्राजन्‌. | आप मेया वध के मी प्रजक्रा पटन वं 
धारण न कर सवेगे { अतः मदादयुते ! अप अपने क्रौधको 
शान्त कर, अ आपकी आक्ञाका पल्ने करेगी ॥ ५४ ॥ 
अवध्याद्च सियः प्राहुस्िर्यग्योनिगतेष्वपि । 
सच्येषु पथिवीप(र न धमे त्यक्तुम॑सि ॥ ५५ ॥ 

भ्मूषा | तिर्यकू-योनिके प्राणियमि मी च्िरयोको 
अवध्य कहा दै, अतः आप धर्मक पसियाग ने करै" ॥ ५५॥ 
पयवे वहुचिघं वाकयं श्रुत्वा रजा महामनाः । 
कोपं निगृह्य ध्मीत्मा वद्ुधामिद्रमत्रवीत्‌ ॥ ५६॥ 

पसे दयी शौर ब्रहुत-से ( यतुनय-विनयके ) वकर्योको 
सुनकर धर्मात्मा ओर उदार मनव राजा पृधु अपने 
क्रोधकरो रोककर वसुधाते दख प्रकार ब्रोठे ॥ ५६ ॥ 


दति श्वीमहामारते खिरुमतोे हरिव हरिवंदापर्वणि पएृथुपाख्याने पद्चमोऽप्यायः ॥ ५ ॥ 


इस प्रकार श्रीमहामारत लिरमाण दयिंके अन्तपेत दरिदशपवैमे पुयुका उपाल्यानत्िषवक प्च; अध्याय पुरा हुमा॥ ५॥ 
॥ [9 ॥ प 


षष्ठोऽध्यायः 
पृथुका उपास्यान- पृथ्वीका धुकी पुत्री चनक्र नेक्‌ प्रकारके दूध 
3 देना तथा अनेक षार एवं दुहनेवार्छोका चणन्‌ 


पृथुर्षाच 
धकेस्याथौय यो हन्यादात्मनो चा परस्य वा 1 
चन्‌ वै पाणिनो सोके भवेत्‌ तये पातकम्‌ ॥ १ ॥. 
पृथुने कदा--वसुधे! जो पुखष इस संसारम अपने वा 
पराये किसी भी एक व्यक्तिके चयि बहुत-से जीरवोकरा वध करतां 
दै, उसे ही यदो पाप रगता है ॥ १॥ 
शखमेधन्ति यहयो यस्तु निद्तेश्यभे । 
तस्मिन्‌ नास्ति ते भद्रे पातकं चोपपातकम्‌ ॥ २ ॥ 
भद्रे ¡ जिख पापी व्यक्तिके मारे जनेसे बहते 
प्राणियकिो सुख मिख्ता हो; उरुको मारनेदे न तो पाप 
रगता है भौर न उपपातक दी ॥ २॥ 
पकस्सिन्‌ यत्र॒ निधनं प्रापिते दुष्टकारिणि ! 
चहनां भवति क्षेमं तत्र पुण्यम्रदरो वधः ॥ ३ ॥ 
जदा दुटताका व्यवहार करनेवाठे एक व्यक्तिका वध 
करनेसे घटुत-से मनुप्योका कल्याण दोता" दो, वो उसका 
वध करना पुण्प्रद ही है ॥ २ ॥ 
सोऽहं प्रजानिमित्तं त्वां हनिष्यामि चसुंधरे ! 
यदि मे वचनं नाय्य करिष्यसि जगद्धितम्‌ ॥ 9 ॥ 
अतः वर्धे } यदि आज तू जगत्‌का दित करनेवाले 
मेरे वचनको नहीं मानती हैतो म प्रजाके हितकरे च्ितेरा 
अवदय वध कर उद्गा ॥ ४॥ 


त्वा निहत्याय वाणेन मच्छसनपरङ्‌ सुखीम्‌। 


, सात्मानं प्रथयित्वाहं प्रजा धारयिता चिरम्‌ ॥ ५ ॥ 


तू आज मेरे शासनसे पराव्मुख हो रदी दैः अतः 
आज तत्ने वाणसे मारकर अपने देदको ही फैलकर मै उपर ' 
श्रजाकी धारण कर्मा | ५॥ 
सा त्वं शासनमास्थाय मम धर्मभृतां चरे 
संजीवय प्रजाः सर्वाः समर्था यसि धारणे ॥ ६ ॥ 
अतणएवे धर्मासि श्रेढ देवि ! तू मेरे यासनको 
मानकर सारी प्रजाको जीवित रख; क्योकि तू भ्रजाको 
धारण करने--जीवित र्खनेमें समर्थं है| ६ ॥ 
इद्िकत्वं च मे गच्छः तत्त पनमदं शरम्‌ 
नियच्छेयं त्वद्यधा्थदयतं घोरदर्शनम्‌ ॥ ७ ॥ 
साथही तरूमेरीपुत्री धन जाः तवर तेरे वधके व्यि 
उठये हुए इस भयंकर दीखनेवाले घाणकौ रोक दणा॥७॥ 
एुधिन्युकाच 
सवमेतदहं वीर विधास्यामि न संदायः। 


उपायतः समार्धाः सव सिद्धश्न्तयुपक्रमाः॥ ८ ॥ 


पृथ्वीने कहा--पीर ! मँ निस्तंदेह यह खवर कुछ 
करूगी, परंतु ठीक उपायसे आरम्भ करनेपर ही सव काय 
शद्ध हेते टै॥ ८ ॥ 
उपायं पद्य येन त्वं धारयेथाः प्रज! इमाः । 
त्स ॒तु मम सम्पद्य क्षरेयं येन वत्सला ॥ ९ ॥ 


------------------------------------------------------------------- ~ ~~~ ~~ ~~~ 


अतः आप उस उपायको देखिये या हद निकारियि, 
जिससे आप इन प्रजार्ओको पुष्ट. कर्के धारण कर 
सरवे ¦ ( इतकी युक्ति मँ चताती हर) आप मेरेल्यि एक 
बद्ढेकी खोज कीज्यि, जिससे म ८ स्नेष्ठसे ) पेस्शाकर 
दुधदू॥९॥ । 
समां च कुस सर्वत्र मां त्वं घर्मश्रतां घर । 
यथा धिस्पन्दमानं मे क्षीरं सवं भावयेत्‌ ॥ १० ॥ 
र्मधासियेमि श्रेष्ठ ! आप सुत्ने सर्वध समं ( चौर ) 
कीजिये, जिससे कि मेर सरता दुभा दूष स्म्र ( भ्यात ) 
हो जाय ॥ १० ॥ ' 
वैशम्पाजने उवाच 
„ तत॒ उत्सारयामास शोकाभ्छतक्तदसस शः । 
धलुष्कोर्पा तदा वैन्यस्तेन शेला धिवश्चिताः ॥ ११॥ 
वैश्चम्पायनजीने कष्टा--जनमेजय | तब ॒वेनपुजर 
प्रथुने धनुषके कोनेसे सैको -ओर सदो परतोको उटाकृर 
(यक दीवास्के समान › खड़ा कर रिम; इससे पर्वत 
न्डेहो ग्ये॥ ११॥ । 
इत्थं यैन्यस्तव्‌ए रासा म्यां शे ष्टमां ततः । 
मम्पम्धरेष्यतीतेषु विषमासीष्‌ षट्ंधस ॥ १२॥ 
स प्रकार येनपु्र राजा प्रथने प्रष्वीको सम 
( चौरस )कर दिया । पिले मन्बस्तरोमि मह पृथ्वी ऊंषी- 
नीची थी ॥ १२॥ 
खभदेनाभवन्‌ शस्याः समारि विषमाणि च । 
चाक्षुषस्यान्तरे पूर्व॑मासीदेवं रदा किर ॥ १६॥ 
पहले चाक्षुष मन्वन्तस्मे इस पृथ्वीके प्रदेश खमावतः 
ञचि-नीचे ये ॥ १३॥ 
न हि पूर्वविसर्गे वे विषमे पृथिवीतडे। 
विभागः पुसणां च भरामाणां क तदाभवत्‌ ॥ १४॥ 
पहले सर्गम ध्र्वीके विषम होनेके कारण नगर ओर 
ार्मोका विभाग नी हआ था ॥ १४] 
न सस्यानि न गोरश्ता न छषिमं वणिक्पथः । 
व सत्यारतं ठच्च स रोभोन ख मत्सरः ॥ १५॥ 
उस समय न किसी प्रकारका धान्य होता था, न गोरशा 
होती थी ओर न खेती शेती थी तया न रत्य एवं भिच्यामे 
मिखा हुआ ( वाणिज्य ) होता था, उस इमद न कोम भा 
म मत्छर ॥ १५ ॥ * 
वैवलतेऽन्तरे चास्मिन्‌ साम्प्रतं घमुपस्धिते । 
वेभ्यात्‌ प्रश्ति राजेन्द्र सर्वस्यैतस्य सम्भवः ॥ १६॥ 
राननदर ¡ इस वर्तमान वैवखत मन्वन्तरके अनिपर वेनपुत्र 
पृथुके समयसे ही इन समी वरस्र्ओकी उत्पति हुं र १६ ॥ 


यश्र य्न समं त्वस्या भूमेरासतीदिदहानध । 


` ष्ठोऽन्यायः 


२५ 


तच्र ठेत्र परजाः सौः संवासं समयेचयन्‌ ॥ १७ ॥ 
निष्पाप नरेश ! जर्हो-सर्हय यह भूमि सम हो गयी? बर्हा 
प्रजाने रहना पसंद्‌ करिया ॥ १७ ॥ 


आ्ारः कलमूखानि प्रजानामभवत्‌ तदा । 
रुच्टरेण महता युक्त श्त्येषमवुद्चश्चम.॥ १८॥ 
हमने पेखा सुना है किं ( वेनपुत्र प्ुद्धाश भूमिका दोहन 
होनेसे ) पहले प्रजार्ओीका आदार फर ओर मूल था तथा बह 
मी उर्ह बद्धी कटिनतासे मिलता था ॥ १८ ॥ 
संकट्पयित्वा षत्सं ठु मयु खायम्भुष प्रभुम्‌ । 
सरपाणौ पुरुषेष्ठ दुदोह पृथिवीं ठततः। 
सस्यज्ञालानि सषौणि पृथु म्यः प्रतापवान्‌ ॥ १९.॥ 
वेलाभनेन प्रजास्तात वर्तन्तेऽद्यापि नित्यदा, 
पुरुषभेष्ठ ! वेन-पुच प्रतापी प्रथने प्रमु स्वायम्भुव मजुको 
अहृ बनाकर पृथ्वीसे सव प्रकारके धान्योको अपने हाथमे 
ही शुदा । तात { उस दिनसे समे प्रजा उसी अन्नसे आजतक 
बद्‌ रहीहै॥ १९१ ॥ 
ऋषिभिः श्रूयते श्वापि पुलदुरधा चष्ुंभरा ॥ २०॥ 
षत्स; सोमो ऽभवत्‌ तेषां दोग्धा चाह्गिरसःसुतः। 
बृदस्पतिरम्ातेजाः पाकं छन्दांसि भारत । 
क्षीरमासीदयुपमं तपो ब्रह्म च शाभ्वतम्‌ ॥ २१॥ 
भारत | सुना हैः फिर ्रुषियेनि मी भूमिके दु था, उस 
समय सोम उनका बेखधा हयाः अङ्गिरके पुत्र महातेजस्वी 
दृहस्पति दुहनेवाके बने ओर छन्द ( वेद ) पात्र बने ये। 
तपोमयं शाश्वत ब्रह्म अनुपम दुग्धके सूपे प्रकट हुआ 
था ॥ २०-२१॥ 
पन्देवगणेः स्वैः पुरवरपुरोगमः । 
काञ्चने पत्रमादाय दुग्येयं श्चूयते मही ॥ २२.॥ 
(यह भी ) सुना जाता है किं फिर इन्द्र आदि सब देच- 
तानि भी सुवणैका पात्र ठेकर इस एृथ्वीको दुहा था ।॥२२॥ 
घत्सस्वु मधवानासीद्‌ दोग्धा व सविता प्रमुः । 
शषीरमूस्करं शैव वर्तन्ते येन देवताः ॥ २३॥ 


( उस समय ) इन्दर बछ्ड़ा ओर मगवान्‌ श्य दुरने- 
वाले गने तया पुष्टिकारक अमूतरूपी क्षीर भकट इय, 


“ जिसे देवता सदा जीवित रहते ह ॥ २३॥ 


पिभिः श्यते चापि पुनर्दुग्धा वसधा । 

जतं प्रमाय खधाममितविक्रमैः ॥ २४॥ 
सना है कि फिर अव॒ल पराक्रमी पितरेनि मी र्वीको दु 

या, उन्डनि चादीका पात्र केकर खधा ( स्पीदुध) का 

दोहन किया या | २४॥ 

यमो ेषसासयषमासीद यत्स भतापवाम्‌ । 

मभ्तक्माभव्‌ दोग्धा काडो लोकप्रकालनः । २५॥ 


॥ 


२ 

परतापी विवस्वान्‌-पुत्र यम उनका बडा वने यौर ले्कौका 
अन्तकरनेवाला काल-अन्तकर उनका दुहनेवाखा बना धा॥२५॥ 
नागैश्च श्रुयते दुग्धा वत्सं कृत्वा तु तक्षकम्‌ । 
अछा पात्रमादाय विषं क्षीरं नरोचम ॥ २६॥ 

नरोत्तम }८ फिर यह मी ) खना जाता दै कि नागोनि तक्षकः 
को वत्स बनाकर अमु ( तूम्वरी ) के पाको लेकर विपरल्पी 
दूष दुहा था॥ २६॥ 
तेष्नेरवतो दोग्धा धृतराष्टः प्रतापवान्‌ 1 
नागानां भरवरेष्ठ सपौणां च महीपते ॥ २७॥ 

मरतशरेष्ठ भूपाल ! उस समय दुहनेबाल नाम रेरावत 
था भौर सपेनि प्रतापी धृतरष््को इहनेवाला वनाया था ॥ 
तेनैव वर्त॑यन्त्यु्रा महाकाया विोल्यणाः । 
तदाहएयास्तदाचारास्तद्वीयौस्तदुयाश्चयाः ॥ २८॥ 


जिनमे स्पषटरूपसे विष लक्ता दै, एेसे ये विक्षार शरीर- 
व्राठे सर्पं उस विप्रसे अपनी आजीविका चलाते | ये दस विंष- 
को खाते द ओर इस विषरका प्रयोग कर दूसरा आदार प्रात 
करते टद तथा ये इख विप्ररूपी वलकरा सहारा ठेकर दस संसारम 
अपनी प्रतिष्ठा वनय हुए ई ॥ २८ ॥ 
असुरः श्रुयते चापि पुनर्दुग्धा वद्ुधरा । 
आयसं पात्रमादाय मायां दाघ्रुनिबर्दिणीम्‌ ॥ २९॥ 
सुना जाता है कं असुसौने भी रेदेका पाच लेकर शुर 
को नष्ट करनेवाखी माया ( स्पी दृध) को इस पृध्वीसे 
ददा था ॥ २९॥ 
विरोचनस्तु धाहादिर्वत्सस्तेषामभूत्‌ तवा । 
ऋच्विग्िमूद्धी दैत्यानां मधुदोगधा महावलः; ॥ ३० ॥ 
उस समयं प्रहादका पुत्र विरोचन उनका वख्डा वना 
था ओर दैत्योका ऋत्विक दो सिरोवाला महाबली मषु उनका 
दुहनेवाख था ॥ ३० ॥ ` 
तयते माययाद्यापि सरवै मायायिनोऽखुराः 
वर्तयन्त्यमितप्रक्षास्तदेषाममितं यम्‌ ॥ ३१॥ 
अमित बुद्धिवारे मायावी अमुर आजकल मी उसी मायासे 
काम चते है यह माया ही उनका अपार वरल है ॥ ३९ ॥ 
यक्षैश्च श्रूयते तात पुनर्दुग्धा वचष्ुधस । 
आमपाषे महाराज पुरान्तद्धौनमक्षयम्‌ ॥ ३२ ॥ 
तात ! यद मी सुना जाता है किं इसके चाद उस प्राचीन 
काल यक्षेनि मी पृथ्वीको दुहा था 1 महारज ] उरन्हनि 
कच्चे पारम अन्तर्धान ( गुप्त ) हेनेकी अक्षय विध्याको 
द्हाथा॥ ३२॥ । 
वत्खं वेश्रवणं कृत्वा यक्षैः पुण्यजनेस्तदा 1 
दोग्धा रजतनाभस्तु पिता मणिबरस्य यः ॥ ३३ ॥ 


श्रीमहाभारते सिटभागे 


[ स्वंशे 


उस समय यक्च ओर रा्वसेनि विश्रवक्रे पुत्र कुवरैरको 
चखा तथा मणिवसे पिता रजतनाभक्रो दुद्टनैवाटा 
व्रनाया धा॥ ३२३॥ , 
यक्षाचुजो मदातेजासिशशीषेः खम्ातपाः । 
तेन ते वर्तयन्तीति परमर्पिख्याच ह ॥ ३४॥ 
उन यक्षो छोटे भाई मदतिजसी यर मदातधम्बी 
रजतनामके तीन सिर द । इस यन्तर्धान-वि्यासे वे यन्न जीविका 
चलते, इत प्रकार परमर्पि (व्यासदेव ) ने कदा था ॥३४५॥ , 
राक्षसैश्च पिशाचैश्च पुनदुग्धा वसधा । 
शावं कपारमादाय प्रजा भोक्त नरपंभ ॥ ६५॥ 
मरणे { फिर राक्रसो ओर पिशाचेनि मुदरैकी खोपद़ी 
केकर अपनी संतानको चृप्त कमक य्य इस वसुन्धकरो 
दुद था॥ ३५॥ 
दोग्धा रजतनाभस्तु तेषपामासीद्‌ कुरूढह । 
वत्सः सुमाली कौरव्य क्षीरं रुधिरमेव च ॥ ३६॥ 
कुर्वंशधर | उस समय रजतनाभ उनका दु्टनेवल् 
था ओर माटी उनका बड़ा था । कौरम्य ! उस्र समय 
उन्दनि र्तरूपी दूध दुदा था ॥ ३६ ॥ 
तेन ष्ीरेण। यक्षाश्च सकसाश्चामसोपमाः। 
वर्तयसि पिद्याचाश्च ` भूतसंधास्तथेव च ॥ २७॥ 
देवतार्ओंकी दी मेति यत्तः राधस, पिदाच ओर मूर्तौ 
की भी मण्डलिर्यो उस दूधसे अपनी-गधनी भजीविका 
चलती ह ॥ ३७ ॥ 
पशमे पुनर्गा गन्धर्वैः साप्सरोगणैः । 
घत्सं चित्ररथं रत्वा श्युचीन्‌ गन्धान्‌ नरप॑भ ॥ ३८ ॥ 
नर्खम { फिर अप्सरारओं ओर गन्धर्वनि भी चित्रसथको 
त्रखदा बनाकर पद्मपत्रमे वदुधतसि पवित्र गन्धको दुद्या था॥ 
तेषां -च सखुरुचिस्त्वासीद्‌ योगधा भरतसत्तम । 
गन्धर्व॑राजोऽतिवरो मष्टात्मा सूर्यसंनिभः ॥ ३९ ॥ 
मरतसत्तम | उस समय सूर्यके तुल्य तेजसी ओर अत्यन्त 
चल्वान्‌ महात्मा गन्धर्वा सुचि उनका दुहनेवला था ॥३९॥ 
हरै शूयते राजन्‌ पुनुग्धा वसुंधरा । । 
ओपधीरवे मूतिमती रत्नानि विषिधानि च ॥ ४०॥ 
राजन्‌ | खना जाता है कि पर्वतेनि मी पूर्वे मूर्तिमती 
ओषधिर्यो ओर नाना प्रकारके रत्नौको दुहा था ॥ ४० ॥ 
वत्सस्तु हिमवानासीन्मेसदोग्धा महागिरिः । , 
पां. तु ्ेलमेवासीत्‌ तेन ह्नोखा विवर्धिताः ॥ ४९ ॥ 
"उक्त समय दहिमाचर चख्डा बना या, महागिरि मेर 
दुदनेवाल था तथा पत्थर पा्नकी दोहनी वनी थी । उस 
दुभवे परवरतौकी इदि हई ॥ ४९१॥ , 


हरिवंदापवं ] 


च्ो ऽध्यायः 


>$ 


वव 


वीरद्धिः श्रूयते राजन्‌. पुनदुंग्धा वद्ंघरा ! 
पाटाश्षं पात्रमादाय दग्धच्छिन्नप्ररोहणम्‌ ॥ ४२॥ 
राजन्‌ ! सुना जाता है किं इसके बाद पलमशकरे पत्तेका 
पात्र ( दोना ) लेकर वक्षन भी प्थ्ीका दोहन किया । 
जल जाने या कट जानेपर जो पुनः अंकुरि होनेकी शक्ति 
ह, बही उन्दँ दुधके स्यम प्रात दुद थी ॥ ५४२ ॥ 
दुदोह पुष्पितः सारो चत्सः पुश्चो ऽभवत्‌ तद्‌ । 
सेयं धाश्री विधात्री च पावनी च वसुंधरा ॥ ४३॥ 
उस समय खिले हुए साल बृक्षने इस पृथ्वीको दुहा था 
ओर पाकेडका इश्च वखड़ा वना था । इस प्रकार यह 
पृथ्वी धात्री-विधात्री ( माताके समान सव्रका धारण-पोपरण 
करनेवाटी ) तथा पवित्र है ॥ ४२ ॥ 
चराचरस्य सर्व॑स्य प्रतिष्टा योनिरेव च। 
सर्वकामदुघा दोग्भी सर्वसस्यप्ररोहणी ॥ ७४ ॥ 
यह पृथ्वी समस्त चराचर प्राणियोका आश्रय-स्थान ओर 
उसयत्ति-स्थान दै । यह समसत कामनाजोको पूर्णं करमेवाखी 
कामधेनु है तथा यही सवर प्रकारे स्यो ( अन्नके पौरदौ ) 
को अंकुःसिति करनेवाली है ॥ ४४ ॥ 
आसीदियं समुद्रान्ता मेदिनीति परिश्चुवा । 
मधुकैटभयोः कत्स्रा मेदसाभिपरिप्ठटुता ! 
तेनेयं मेदिनी देवी श्रोच्यते ब्रह्मवादिभिः ॥ ४५॥ 
पटे यह समुद्रतककी सारी प्रथ्वी मधु ओर कैयभके 
मेद ( चरखी ) से भर गयीं थी, इस्ल्यि भेदिनी नामसे 
विख्यात हुई; अतएव यह देवी ब्रह्मवादिरयोद्यास मेदिनी 
कही जाती दै ॥ ५५ ॥ 
ततो.ऽभ्युपगमाद्‌ राक्षः परथोन्यस्य भारत । 
दुहिदत्वमनुपाक्षा देवी पृथ्वीति चोच्यते । 
पृथुना प्रविभक्ता च शोधिता च वस्ुधस ॥ ४६॥ 
सस्याकरवती स्फीता पुरपत्तनमालिनी 1 
पवेप्रभावो वैन्यः सख राजासीद्‌ राजसत्तमः ॥ ४७ ॥ 


भरतवंशी राजन्‌ { फिर वेनपुत्र राजा पृथुके पुत्रीरूपमे 
अङ्खीकार करनेपर्‌ यह देवी उनकी पुरी बन गयी; इससे यह 
ए्रथ्यी कहती दै । इस पृथ्वीको प्रुने अनेक मागोमे विभक्त 
एवं शद्ध क्रियाः इसको अन्न आदिकी खान वरना दिया 
ओर समृद्धिगालिनी वनाकर इसे ग्रामो ओर नग्सकी 
-रेणियोसे सुशोभित कर दिया । दृपशरेष्ठ | महाराज पृथु रेस 
प्रभावशाटी ये | ४६-४७ || 
नमस्यश्चैव पूज्यश्च भूतग्रामैन संशयः । 
वराह्मणेदच महाभानेवेदवेदाङ्गपारगैः ॥ ४८॥ 


== 


पृथुरेव नमस्कायों ब्रह्मयोनिः सनातनः! 
अतएव समी प्राणिर्योको निःसंदेद उनकी पूजा त्था 
वन्दना करनी चाहिये । वेद-वेदाङ्गके पारगामी महात्मा 
ब्राहमर्णोको भी ( अभिक्रम उन्न रोनेके कारण ) रह्म- 
योनि एवं सनातन पुरुष ८ विष्णुरूप ) पृथुके प्रति निश्चय 
ही नमस्कार करना चहिये ॥ ४८६ ॥ 
पाथिवैर्च महाभागैः पार्थिवत्वमभीप्भिः ॥ ४९ ॥ 
आदिराजो नमस्कार्यः पृथुर्वैन्यः प्रतापवान्‌ । 
पृथ्वीके स्वामित्वको चाहमेव महामाग्यवान्‌ राजा्ओंको 
मी आदि राजा वेनपुत्र प्रततापी प्रधुको प्रणाम करना 
चादि ॥ ४९३ ॥ । 
योधैरपि च विक्रान्तैः प्राप्तुकममिजयं युधि । 
पृथुरेव नमस्कायों योधानां प्रथमो चपः ॥ ५० ॥ 
जो पराक्रमी राजा युद्धमे विजय चाहते हों उनको मी 
योद्धा्मिं अग्रणी राजा प्रथुको अवदय प्रणाम करना चादिये ॥ 
यो हि योद्धा रणं याति कीर्तयित्वा पथं चपम्‌ । 
स घोररूपान्‌ संप्रामान्‌ क्षेमी चरति कीतिमान्‌ ॥ ५२१ ॥ 
जो योद्धा राजा प्रथुका कीर्तन करके युद्धम जाता है, बद 
भयङ्कर संग्रामको कुरापूर्वक तर जाता ( उस्म विजव प्रात 
कएता ) ओर यशस्वी होता है ॥ ५१ ॥ पनत 
वैदयेरपि च वित्ताख्येः पण्यशृच्तिभनुष्डितैः। 
पृथुरेव नमस्कायां वृत्तिदाता महायशाः ॥ ५२॥ 
वाणिज्य आदिते आजीविका चलानेवाछे धनवान्‌ वैश्यो 
को भी चोदये किं वे इत्ति ( आजीविका ) प्रदान करनेवाठे 
महायराखी प्रथुको अवश्य प्रणाम करं ॥ ५२ ॥ 
तथैव शुद्धैः शचिभिखिव्णपस्िारिभिः। 
आदिराजो नमस्कार्यः श्रेयः परमभीप्सुभिः ॥ ५३ ॥ 
इसी प्रकार परम कस्याण चाहनेवाठे एं ब्राह्मणः क्षत्रियः 
वैश्य--इन तीनों वरणो सेवामे परायण रहनेवले पवित्र शूद्रौ. 
को मी आदि राजा प्थुको प्रणाम करना चादिये ।॥ ५३॥ 
एते वत्सविशेषादच दोग्धारः श्ीरमेव च । 
पात्राणि च मयोक्तानि किं भूयो वणेयामि ते ॥ ५७ ॥ 
मैने दमे इन वर्दोकाः पाचका, दुदनेवार्छेका ओर 
दुर्धोका वरन कर दिया | अव मँ मसे ओर स्या करट ॥५४॥ 
य ॒ददं श्यणुयान्नित्यं परथोश्चरितमादितः। 
पुजपोजखमायुक्तो मोदते चिरं भुवि ॥ ५५॥ 
जो पुरुष ( मरलयेक कल्पर्म होनेवाखे अतएव ) नित्य इस 
्रथु-चरिक्तो आदिसे ( अन्ततक ) सुनता दै, वह युरुष युत्र- 
पो्नोके साय इस परथ्वीपर चिर-काठ्तक आनन्द्‌ करता हे ॥ 


इति श्रीमहाभारते लिरभागे हरिवंशे हरिविंशपर्वणि पएुपाख्याने पष्ठऽध्यायः ॥ ६ ॥ 
प भक श्रीमन दिमाग दृरिदके अनत इरिने पथु उपाथानकौ समाएितियक छठा अध्याय पूर सा ॥ ६ ॥ 
~न ~ 


२८ । भीमष्टाभार्ते सिलभामे 


[ हस्विो 


सषमोऽप्यायः 
मन्पन्तर, मदु, देता शौर च्पिरयोका एयङ्‌-एम्‌ बणन 


जनमेजय उषाच 

अम्वन्तराणि स्वीणि विस्तरेण तपोधन । 
तेषां खि विख ख वैरम्पायम कीतय ॥ ९ ॥ 

जनमेजयने क्ष्टा--तपोभन वैशम्पायनजी ! सभी 
मन्वन्तरोँ तया उनकी खष्टि ओर भिखीन होनेफा दृश्तान्त 
अव आप विज्लासपर्वक कष्य ॥ १ ॥ 
यावन्तो भनव्तैव यान्तं फारमेद घ । 
मन्वन्तरं तथा बह्न्दरोतुमिच्छामि चचतः ॥ २ ॥ 

बर्न्‌ [ जितने मद दते ६ ओर जितने समयत टक 
मन्वन्तर रता दैः उखको म टीक-टीक सुनना चाहता 
ह॥ २॥ 

वतनम्पायन उपाच 

म शाक्यो विस्तरस्तात षच्‌ धर्थशतेरपि । 
मर्वन्तराणां कौरव्य संक्षेपं त्वेव मे श्णु ॥ ३ ॥ 

वैशस्पायनजी फष्ते है--तात । कौरव्य | मन्वन्तरे 
` विस्तारा तो सौ कपेमिं भी वर्णन नदीं किया जा सक्ताः 
अतः उसे संक्षेपे ्टी मुदे समो ॥ ३ ॥ 
सखायम्भुवो मयुस्तात मनुः खारोदिपस्तया 1 
उ्मस्तामखदचैव  रेवतश्चा्चुषस्तथा ॥ ४ ॥ 
वैवस्रवश्च कौरव्य खाम्परतो मयुरुच्यसे । 
सावर्णि मचुस्तात भौत्यो रौच्यस्तथैव च ॥ ५ ॥ 
तथैव मेवसाव्णीत्वाये मनवः स्ताः । 
अतीता वर्तमानाश्च तथैवानागतादच ये॥ ६॥ 
कीर्विता मनवस्ता्त मयैते तु यथाश्रुतम्‌ 1 
ऋर्थस्तिषां प्रदस्यामि पुथरान्‌ देषमर्णास्तथा ॥ ७ ॥ 

तात | कौरव्य ! खायम्धुव मनुः खवारोचिप्र मनु, उत्तम 
मतु, तामस मनु; रेवत मनु एवं चाष्चुष मनु ( वीत 
गये ई) ओर वर्तमान ( सतिवे ) मनुका नाम वैवखत मनु 
दे} ( अव भविष्ये मन्वन्तर्योका वर्णन करते ई-¬) तात } 
सावर्णिं मतु, भत्व मनु ओर रौच्य मनु एवं चार मेरसावर्णं 
( बक्षछावर्णि, सद्रमावरभिः मेरावर्णि, दश्चसावर्णि--ये चारय 
मेख पर्वतपर तप करे सिद्ध दो गये ई अतएव ये चारौ 
मेससावर्णिं करति ई ) कदे गये ई । तात | ने भूत, 
भविष्यत्‌ भौर वर्तमानं ( चौदह ) मनुर्ओंका गुरभेसि जिस 
प्रकार सुना याः वैसा वर्णेन किया; अव्‌ मै उनके शरभः 
पुत्र ओर देवतार्थोका वर्णन करता हँ ॥ ४-७ ॥ 
मरीचिरन्रिमंगवानक्षिसः पुलहः क्रतुः । 
पुलस्त्यश्च धसिष्ठदच सप्ते ब्रह्मणः सुताः ॥ ८ ॥ 


उच्चरस्यां दिशि तथा राजन्‌ सप्तपयोऽपरे 
देषादच श्रान्तरजसस्तथा भरृतयः परे । 
यामा नामे सथा देवा आसन्‌ सायम्धवेऽन्तरे ॥ ९ ॥ 
आ्री्ष्चाद्चिवाहुद्च मेधा मेधावियिवेखुः । 
ज्योतिष्मान्‌धुतिमान्‌ श्व्यः सवनः पुश पव च ॥ १०॥ 
मनोः खायम्भुचस्पैते दश युधा मष्टौजलः। 
पतत्‌ ते प्रथमं सजन्‌ मन्वन्तसमुदाहटवम्‌ ॥ ११॥ 

राजन्‌ | स्वायम्भुव मन्वन्तर वर्तमान मन्वन्तरसे भिन्न 
मरीचिः भगवान्‌ अनन, अक्खिर, पुल, क्रतु, पुटस्य ओर 
भसिष्ठ-ये व्रह्याजीके सात पुत्र सक्षपिं कर उत्तर दिदार्म 
रहते ये { सखायम्भुव सन्वन्तसमे श्ान्तरनाः शरकृति तथा याम 
नामक देवता पूजित ते थे । खायम्मुव मनुके आग्नीध्रः 
अग्निबाहू, मेधा, मेधातिथिः वसु, च्योतिप्मान्‌, द्युतिमान्‌ 
म्यः सवन ओर पुत्र--ये दस महावली पुत्र ये । रजन्‌ | 
मैने ठमसे यह पदले मन्यन्तरका वणन फिया ॥ ८-२१॥ 
ओवो घस्िष्ठपुखदच स्तम्बः कादयप एव च । 
प्राणा ब्रृदस्पतिश्चैव दतो निदस्ययनस्तथा ॥ १२॥ 
पते महर्षयस्तात वायुप्रोक्ता महावराः। 
देवादच तुपिता नाम स्ताः स्वारोचिपेऽन्तरे ॥ ९३ ॥ 

तात { वायुने स्वारोचिष मन्वन्तरे वसि्ठके पुत्र ओर्व! 
सम्बः काश्यपः प्राण, ब्रहस्पति, दत्त ओर निर्व्यवन--ये 
सात मदात्रतधारी ऋषि व्रतय दै अर देवतार्मोका नाम 
षित कदा हे ॥ १२-१३ ॥ 
हविध्ः सुरृतिर्योतिरापोपूषिरयस्यः। 
प्रथितश्च नभय्यदच नभ ऊजंस्तथेव च ॥ १४॥ 
खारोचिषस्य पुच्रास्ते मनो स्तात मष्टात्मनः । 
कीर्तिताः पथिवीपाक महावीर्यपराक्रमः ॥ १५ ॥ 
द्वितीयमेतव्‌. कथितं तच मन्वन्तरं मया 1 

तात | महात्मा खारोचिप मनुके महावीर्यवान्‌ ओर 
पराक्रमी हवि, सुकृति, ज्योति, आपः मूर्वि, अयस्मय 
प्रथितः नभस्य ऊजे ओर नभ-ये (दस) पुत्र येः 
उनका वर्णेन कर दिया । प्रथ्वीपाङ { यह मैने दुमे 
दूरे मन्वन्तरका वणैन कर दिया ॥ १४१५६ ॥ 
शद्‌ वत्तीयं वक्ष्यामि तन्निवोध नराधिप ॥ १६॥ 
वसिष्ठपुश्वाः सप्तासन्‌ वाल्िष्ठा इति विश्चुताः। 
हिरण्यगर्भस्य खता ऊज नाम सुतेजसः ॥ १७ ॥ 
छूषयोऽघ मया प्रोक्ताः कीत्यमानान्‌ निबोधमे, 
आत्तमेयान. महाराज दश्च पुत्रान्‌. मनोरमान्‌ ॥ ९८ ॥ 
दष उरजस्तनूजद्च मधघुमौधव पव, च । 


हरिवंशपर्व 1 


श्रः शुक्रः सभ्येष मभस्यो मभ पव अ ॥ १९॥ 
भानवस्तथ्च॒देवाश्व मस्वन्तरसुदाहतम्‌ । 
राजन्‌ | अम तीसरे मन्वन्तरका वर्णन करवां दर, सुनो । 
उश्म नामक मन्वन्तर वाषिष्ठ नामखे प्रसिद्ध षसिष्ठजीके 
सात पुत्र ( सप्तिं ) थे । वे प्ले हिरण्यग्मके पुत्र ये । उनके 
नाम ऊर्जं ये. तथा वे वे तेजस्वी ये| इख प्रकार मैने 
षिका वर्णन कर दिया । महाराज ! अव म उत्तम 
मनुके दस मनोर पर््रोका वर्णन करवा ह; नो- 
इषः ऊज तनूज, मधु, माधवः शुचिः शुक्र, सष, नमस्य 
ओर नम ( ये दस उत्तम मनुके पुत्र ये ) ओर उस मन्वन्तर 
भानु नासक देवता थे । ( इस प्रकार यह तीसरा ) मन्वन्तर 
तरताया गया ॥ १६-१९१ ॥ 
मम्बन्तरं चतुर्थं ते कथयिष्यामि तच्करणु ॥ २० ॥ 
काव्यः प्ृथुस्तथेवाभ्निजैन्युधोता च भारत । 
कपीवानकपीवांश्च तन्न॒ सप्तषेयोऽपरे ॥ २१॥ 
पुराणे कथितास्तात पुताः पौधराद्च भारत । 
सत्या देवगणाद्चैषव तामसस्यान्तरे मनोः ॥ २२ ॥ 
पुषांक्वैव प्रवक्ष्यामि तामसस्य भमनोरैप । , 
धतिस्तयस्यः सखतपास्तपोमूखस्तपोधनः ॥ २३ ॥ 
तपोरतिरकटमाषस्तन्ती धन्वी परंतपः। 
तामसस्य मनोरेते दद्य पुध्रा महाबलाः ॥ २७ ॥ 
"भारत | अव्र भँ चये मन्वन्तरका वर्णन करता हूः 
सुनो । तामस नामक मन्वन्तर कान्यः पृथुः अग्निः जन्युः 
घाताः कपीवान्‌ ओर अकपीवान्‌- ये सात सति थे] तात | 
पुराणों इनके बहुत-ते यु्ौर्वोका वर्णन टै । तामस 
मन्वन्तर सत्य नामक देवता थे । भारत ! अव मँ तामस 
मनुके पुर्नोका वर्णन करता दँ । राजन्‌ | तामस मनुके 
धुत्तिः तपस्य, सुतपाः तपोमूल, तपोधनः तपोरतिः कल्माष, 
तम्बीः धन्वी ओर परंतप--ये दस मदाबरी पुत्र थे ॥२०-२५॥ 


चायुमोक्ता महाराज पश्चमं तदनन्तरम्‌ । 
वेदबाषटुयंदुध्रद्च मुनिरवेदरिसस्तथा ॥ २५॥ 
हिरण्यरोमा पर्जन्य उर्वंवाहुद्च सोमजः । 
सत्यने्रस्तथाऽऽत्रेय पते सतषयो ऽपरे ॥ २६॥ 
देवादवाभूतरजसस्तथा भ्रङूतयो ऽपरे । 
पारिष्वदच रैभ्यश्च मनोरन्वरसुच्यते ॥ २७ ॥ 
अथ पुत्रानिमांस्तस्य निबोध गदतो मम। 
धृतिमानव्ययो युक्तस्तरददशशीं निसत्छुकः ॥ २८ ॥ 
अरण्यरच प्रकाशाङ्च निमोंहः सत्यवाक्‌ कविः। 
रेवतस्य मनोः पुराः पञ्चमं चैतदन्तरम्‌ ॥ २९॥ 
दन सब्रका वायुने वर्णन किया है । महाराज ] अव 
पेचिव ( रेवत मन्वन्तस्का वर्णन करता हू । ) उस मन्वन्तरमे 
वेदबराहुः यदुभ्रः वेददिरा मुनिः हिरण्यरोमा, पर्जन्य, सोमपुत्र 


सप्तमो ऽ०्यायः - 


२४ - 


~~~ 


ऊर््मगाह ओर अनिपुभ सत्यनेष-ये सात ऋषि ये ! उस 
मन्मन्तस्यै भगूतरजा, प्रङति, परिष्क भौर रेम्य नामकं 
देवगण ये । यह सब ८ पञ्चम ) मन्वन्तरका वर्णन है । अव 
मै रेवत मनुके पुर्घोका वर्णन करता द, नो । धृतिमान्‌, 
जन्ययः युक्तः तस्दर्शौ, निर्त्युक, भरण्यः प्रकारः, निमोहः 
सत्यवाक्‌ ओर कवि-ये रेवत मनुके पुत्र । य्ट॒पञ्जम 
मन्वन्तरका बणन दुआ ॥ २५-२९ ॥ 


षष्ठं ते सम्प्रव्यामि तक्षिषोध भराधिप । 
भृगुर्नभो विवखाद्च सुधामा धिरजास्तथ्ल ॥-२० ॥ 
अतिनामा सहिष्णुश्च सेते ' वे मदषयः। 
चाध्चुषस्यान्तरे तात ॒मने्ैवानिमास्क्ुणु ॥ २१ ॥ 
आचाः प्रभूता क्रभवः पृथग्भाव दिवौकसः 1 
टेखादच नाम रजेन्प्र पञ्च देवगणाः स्मतः । 
ऋषिरजञिरसः पुश्रा महात्मानो मष्टौजसः ॥ ३२॥ 
नाड्वलेया महाराज्ञ दच्च पुषा विश्वुताः 1 
ऊयग्रभृरयो राजन्‌ षष्ठं मन्वन्तरं स्मृतम्‌ ॥ २३ ॥ 
नराधिप 1 अब ओम ठे ( चाश्चुषप मन्वन्तर ) 
काषर्णन करता षह सुनो । तात | चाक्षुष मन्वन्तस 
भृगु, नमः विवसान्‌ सुधामा; विरजा, अतिनामा 
ओर सषिष्णु-ये सात महिं थे । रजेन्द्र | अब (दस 
मन्वन्तरे ) देवताओंका परिचय यनो । भग्र; प्रभूतः श्रः 
पथग्भाव ओर ठेखा नामवाढे देवताभकरि पोच गण येः 
ये खर्गमे रहते थे | ये सव्र अञ्चिरा श्रुषिके पुत्र ये ओर 
समी परम तेजघ्वी मष्टत्मा ये । इनकी माताका नाम. 
नद्क्ला था. 1 महाराज | ( च्चुष मनुके) ऊ 
आदि दस प्रसिद्ध पुत्र येः ¦ राजन्‌ |- यष्ट छठे 
मन्वन्तरका वर्णन किया गया ॥ ३०-२३ ॥ 
अबिरवसिष्ठो भगवान्‌ कदयपदच मदानुषिः। 
गौतमोऽथ भरद्वाजो विभ्वामिन्नस्तथैव च ॥ २४॥ 
तथेव पुत्रो भगवाचीकस्य महात्मनः । 
सप्तमो जमदग्निश्च श्रषयः साम्प्रतं दिवि ॥ ३५ ॥ 
(अव सप्तम मन्वन्तरका वर्णन करते है--) दस वर्तमान 
समयमे सखर्गमे खित अचि, भगवान्‌ वसिष्ठ, महर्षिं कदयपः 
गौतमः भरद्वाजः विश्वामित्र ओर सातवे महात्मा श्र चीकेक 
पुत्र भगवान्‌ जमदभरि-ये सप्तपिं ह ॥ २४-३५॥ 
साध्या सद्वाश्च विवे च मरुतो वसवस्तथा । 
आदित्याश्चाग्विनौ चेव देवौ वैवस्वतौ स्तौ ॥ ३६॥ 
मनेर्वैवखतस्यैते वतन्ते साम्पतेऽन्तरे । 
इ्वाकुप्रसुखाश्वेव दश्च पुत्रा महात्मनः ॥ २७ ॥ 


साध्यः रुद्रः विश्वेदेव, मस्त्‌, वयु, आदित्य ओर 
दोनों अशिनीक्रुमारः जो कि पूर्यके पुत्र कलते हैः 


2० 


श्रीमहाभारते लिरुभागे 


[ हरिवंशे 


ये सव इस त्र्तमान वैवछ्ठत मन्वन्तर्के देवता दै 
आर स महात्मा प्रैवखत मनुके द्रा आदि दस पुत्र 
~. दै ॥ २६-२४॥ 
पतेषां कीर्तिवानां तु महर्पीणां मष्टौजसाम्‌ । 
राजन्‌ पुत्राश्च पौराश्च दिक्षु सवौ भारत ॥ ३८॥ 
भ्तवंदणि राजन्‌। जिनकी चर्चा हुई दै, इन परम तेजसी 
महरधियेके पुत्र ओर पौत्र सवे दिशामि ( व्याप्त 
ह) ॥३८॥ 
मन्वन्तरेषु सवेषु पाण्दिशाः सप्तसप्तकाः । 
स्थिता खोकव्यवस्था्थं लोकसंरक्षणाय च ॥ ३९॥ 
सत्रे मन्वन्तरोमे पूर्वं कथिते उनूचास पवने लेोर्कोक्री 
व्यवस्था ओर रघ्रा करनेके व्यि खित रहते ई ॥ ३९ ॥ 
मन्वन्तरे ऽतिक्रान्ते चत्वारः सप्तका गणाः । 
शृत्वा कमं दिवं यान्ति बह्मरोकमनामयम्‌ \ ४० ॥ 
प्रत्रेक मन्वन्तरके ्रीतनेपर उनमेते अघर्दस पवन अपने 
कर्मको (पूरा) करके खरग जाकर अनामय ( व्याधिरित ) 
बरह्यखोकक प्रात हो जति दै ॥ ४०] 
ततोऽन्ये तपस युक्ताः स्थानमापूरयन्त्युत 
अतीता वरत॑मानाश्च क्रमेणैतेन भारत ॥ ४१॥ 
एतान्युक्तानि कौरव्य सप्तातीतानि' भारत 1 
मन्वन्तणि षट्‌ चापि नियोधानागतानि मे ॥ ४२॥ 
भारत { तव मन्वन्तरके अन्तर्म दूसरे वायु तपोवलसे उनके 
पदप्र आरू होकर उनके खानको पूर्ण कर देते है । 
कौरव्य ! वरति हुए ओर वर्तमान सात मन्वन्तररोका वर्णन कर 
दिया । मस्तनन्दन ! अव भविष्यकरे छः ८ सात › मन्वन्तरोका 
वर्णन मुक्ते सुनो ॥ ४१-४२ ॥ 
सावणौ मनवस्तात पञ्च तांद्च निवोध मे । 
पको वैधखतस्तेषां चत्वारस्तु प्रजापतेः ॥ ४३ ॥ 
परमेष्ठिखुतास्तात मेरुसावर्णतां गतः। 
दक्षस्यैते हि दौहिचाः प्रियायास्तनया चप । 
महान्तस्तपला युक्ता मेरपृष्टे मदौजसः ।॥ ४४ ॥ 
तात { सावणिं मनु र्पोच रैः उनको मुद्चसे सुनो । 
उनमेते एक तो सूर्ये पु ह ओर चार प्रजापति परमेष्ठी, 
ये स्व दके नाती दै तथा ( दक्षकन्या ) प्रियाके पुत्र 
है । राजन्‌ ! मेर पर्वतपर बरहा भारी तप करके ये 
मृहातेपस्वी मनु मेरसावर्णं नामको प्रास हुए ॥ ४२-४४ | 
सचेः परजापतेः पुत्रो रौच्यो नाम मनुः स्यतः! 
भूत्यां चोत्पादितो देव्यां भौत्यो नाम सचेः खुतः॥ ४५ ॥ 
प्रजापति रेचके पु रौच्य मनु करते ह ओर भृति 
देवीके गर्ते उस्न रचिके पुत्र भीय कटन्यते है | ४५॥ 
अनागलाश्च सेते रखता दिवि महर्बयः । 
सावणेस्य हं ताञ्छरणु | ४द ॥ 


अव भविष्यत्‌-कार्मे होनेवाठे खावर्णिं मन्वन्तरे जो 
सात महर्पर खर्म विराजमानं दै, उन ( अष्टम मन्वन्तरे ) 
ऋषिर्योकरो सुनो ॥ ४६ ॥ 
रामो ग्यासस्तथा.ऽ प्रेयो दीप्िमानिति विश्ुतः। 
भारद्वाजस्तथा द्रौणिरश्वत्थामा महुतिः॥ ४७॥ 
गोतमस्यात्मजश्चैव शरद्वान्‌ गौतमः रूपः । 
कौशिको गालवदयैय रुरः कादयप एव च ॥ ४८ ॥ 
({ पर्चु- ) समः व्यास, अच्निपुत्र दीश्निमान्‌ः 
भरद्वाजगोत्री द्रोणपुत्र महातेनस्वी अश्वत्थामा, गौतमके वंशज 
एवं गौतम-गोव्री रदन्‌ (के पुत्र ) कृपाचार्य, कौगिकगोनी 
गालव ओर कादयपगो्री खर ॥ ४७-४८ | 
पते सप्त महत्मानो भविष्या मुनिसचमाः। 
बरह्मणः सदश्षाइचेते धन्याः सपर्पयः स्मृताः॥ ४९ ॥ 
ये बरह्माजीके समान धन्यवादफे पात्र मविप्यफे सात 
मुनिश्रेष्ठ महात्मा सपर कदे गये ह ॥ ४९ ॥ 
अभिजात्या तपसा मन््नन्याकरणैस्तथा । 
ब्रह्मलोकमभतिष्टास्तु स्मृताः सप्तर्षयोऽमलाः ॥ ५० ॥ 
ये जन्मः तपः मन्त्र ओर व्याकरणे पमावसे पवित्र सात 
चपि ब्र्यटोकरमै रहते ई ॥ ५० ॥ 


भूतभव्यभवज्क्ान वुद्ष्वा सेव तु ये स्वयम्‌। 
तपस! वे प्रसिद्धा ये संगताः प्रचिचिन्तकाः ॥ ५१ ॥ 
ये ऋषिं स्वये अपने तपसे भूतः, भविप्य ओर वर्तमान 
कारके सव वृ्तान्तको जानकर प्रसिद्ध दो गये हतया 
परस्पर मिलकर परमात्मतत्वका विचार करते रहते र ॥ ५१॥ 
मन्ञभ्यकरणादेश्च देभ्व्यात्‌ सर्वशश्च ये । 
पतान्‌ भायौन्‌ द्विजो क्षात्वा नैष्ठिकानि च नाम च॥५२॥ 
ये मन्त्र, व्याकरण आदिते तथा एरय कारण भी (रवर 
परिदधे) । ब्राहमण इन भरण करनेयोग्य ऋपिरयोको तथा 
इनके नैष्ठिकं कर्मो ओर नामोको जानकर ८ कल्याणका 
भागी होता है ) ॥ ५२ ॥ 
सतते सक्तभिद्चैव गुणैः सप्तर्षयः स्पृताः । 
दीधौयुपो मन्नरूत ईश्वरा दर्घचश्चुषः ॥ ५३ ॥ 
ये सप्तो अपने सात गुणोके कारण सतपि कहते ह ओर 
दीर्षायु, मन्नद्र्ट, सव॑सम्थं तथा दीर्दनीं है | ५३ ॥ 
बुद्धया प्रत्यक्षधमरौणो गोत्र्ावर्तकास्तथा । 
ेतादिषु युगाख्येषु सर्वेष्वेव पुनः पुनः ॥ ५५ ॥ 
प्रावतयन्ति ते वर्णानाभ्रमांर्चैव सर्युशाः 
सपतपरभो महाभागाः सत्यधर्मपरायणाः ॥ ५५॥ 
र अपनी शुद्धिते धर्मे महत्वका प्रस अनुभव 
होता है तथा ये गोत्वर्तक ( गोत्र चलनेवलि ›) है ] 
मत्यधरमम प्रायण रहनेवले ये महामाग सि सत्ययुग 
|} 


हरिवंदापवं ¡| 


# 


, सक्तमोऽ्ध्यायः ३९ 


आदि समी युगोमे सर्व ( ब्राह्मण आदि चारों ) वर्णो ओर 
अह्वचर्य आदि चास) आश्र्मोको वारंवार खधममि प्रवर्त कसते 
रहते ह ॥ ५४.५५ ॥ 
तेषां चेवान्वयोत्पन्ना जायन्तीह पुनः पुनः 1 
मन्तव्राह्मणकतोरे धर्मे प्रशिथिले तथा ॥ ५६॥ 
धरमकरे िथिक होनेपर. इन्दी ऋषिर्योफे वंशज विद्वान्‌ 
पुरुष मन्न ओर ब्राह्मण भागक्रे प्रणेता होकर वारेबार यहो 
धर्मोद्धासके स्यि जन्म धारण करते दै 1 ५६ ॥ 
यस्माश्च वरदाः .सप्त परेभ्य एव याचिता; । 
तस्मान्न कारो न चयः प्रमाणसुषिभावने ॥ ५७ ॥ 
ये सातो वर देनेवले ह ओर दूसरे पुरुष्र इनसे याचना 
करते है, अतएव इन ऋषरियोके सम्बन्धे विचार करनेपर 
न तो इनकी उत्पत्तिका समय वताया जा सकताहै गौर न इनकी 
अवस्याका परिमाण ही ॥ ५७ ॥ 
पष सपर्िकीदेशो व्याख्यातस्ते मया प । 
सावणस्य मनोः पुरान्‌ भविष्याञ्छृणु सत्तम ॥ ५८ ॥ 
राजन्‌] मेने ठमसे यह सर्भि्यो करी बात संक्षेपसे कह दी । 
सत्तम ! अव , सावर्णिं मुके भविष्यमे दोनेवाठे पुर्रौका 
चणन सुनो ॥ ५८ ॥ 
वरीयश्चावययांश सम्मतो . धृतिमान्‌ वखः । 
चरिष्णुरप्यधृष्णुश्च वाजः सुमतिरेव च । 
सावणेस्य मनोः पुरा भविष्या दश भारत ॥ ५९॥ 
` भरतवंशी राजन्‌ । वरीयान्‌; अवरीयान्‌; ` सम्मतः 
धृतिमान्‌; वसुः चरिष्णुः अधृष्णुः वाजः सुमति 
(तथा एक ओर )-- ये सावर्णिं मनुके भविष्यमे होनेवाे दस 
पुत्र है ॥ ५९ ॥ 
भरथमे मेरुसावणं प्रवक्ष्यामि सुनीज्छ्णु । 
मेधातिथिस्तु पौलस्त्यो वसुः काङयप एव च॥ ६०॥ 
ज्योतिष्मान्‌ भा्गवद्चैव युतिमानङ्ियस्तथा । 
सावनद्चेव वासिष्ठ आत्रेयो दन्यवाहनः ॥ ६९ ॥ 
पौलः सक्त शव्येते मुनयो रो्ितेऽम्तरे । 
देवातार्नां गणास्तश्र धयं एव नराधिप ॥ ६२॥ 
अव भँ प्रथम मेरसावर्णं अर्थात्‌ नवम मनुके समकाटीन 


ऋषरिवोका वर्णन करता द्र सुनिये ! पुरुत्यगोतरी मेधातिथिः 


करयपगोची सुः रगुवंशी ज्योतिष्मान्‌ अङ्किरागोती दयतिमान्‌, 
वसिष्ठगोज्ी सावनः अन्निपुत्र हम्यवाहन ओर पुरद-गोत्री सपत- 
रोहित# मन्वन्तरकेये सात षि ह ओर राजन्‌ {उस मन्वन्तरमे 
देवताओके तीन ही गण गि ॥ ६०-६२॥ 

दक्षपुश्रस्य पुश्रार्ते रोहितस्य प्रजापतेः। 

मनोः पुञओ धृष्टकेतुः पञ्चहोश्रो निराङूतिः ॥ ६२ ॥ 


# मेरुसावणिका दी दूरा नाम रोदिति दै । 


पृथुः श्रवा भूरिधामा ऋचीको ऽतो मयः 
परथमस्य लु सावर्णेनेव पुत्रा महौजसः ॥ ६४ ॥ 
ये द्षके पुत्र रोहित प्रजापतिके पुत्र दै ओर इन प्रथम 
सावर्णिं मनुकरे धृष्टकेत, ग्रथहोनः निराकृतिः प्रथु श्रवाः 
भूरिधामा, ऋचीकः, अष्टहत , ओौर गय-ये नौ महाब 
पुत्र होगे ॥ ६२-६४॥ | 
द्मे त्वथ पर्थाये दितीयस्यान्तरे मनोः । 
हविष्मान्‌ पौटहस्यैव सुरूतिश्चैव भागवः ॥ ६५॥ 
अपोमूर्तिस्तथाऽऽतरेयो वासिष्ठश्चा्टमः स्मतः। 
पौरस्त्यः प्रमितिद्चैव नभोगदचैव काडयपः 
अद्धि नभसः सत्थः सेते - परमषंयः ॥ ६६ ॥ 


दसं ओर दूसरे सानर्णिं मनु (दक्ष सावर्णिं) के मन्वन्तरे 
पुख्हगोत्री हविष्मान्‌ भृगुवंरी सरति, अन्निवंशी अप्रोमूर्ति, 
वसिष्ठपुन अष्टमः पुलस्त्यगोतरी प्रमितिः करयपगोत्री नभोग ओर 
अङ्खिरावंशी नभसुके युत्र सत्य-ये सात परम ऋषि हेये ॥ 


देवतानां गणौ दवौ. वौ ऋषिमन्वाश्च ये स्पृता 
मनोः खुतोत्तमोजाश्च निङ्कषञश्च. वीयेवान्‌ ॥ ६७ ॥ 
सातानीको नियमितो दृषसेनो जयद्रथः 1 
भूस्दुम्नः खर्वश्च ददा त्वेते मनोः खुताः ॥ ६८ ॥ 
उस समय ( दक्षिण-मा्गके अभिमानी धूम आदि ओर 
उन्तरमा्गके अभिमानी अथि आदिय) दो देवताओक्रे गण होमे 
तथा ऋष्रियुक्त मन्द्रा जिन देवताओंका प्रतिपादन दता, 
वे भी उस समयक देवता होगे तथा मनुसुत,उत्तमोजाःनिकुषञ्ञ 
वीर्यवान्‌; शतानीकः निंरामिचः दृषसेन, जयद्र थःभूरिनुम्न ओर 
सुवर्चा--ये मनुके दस पुत्र होगे | ६७-६८ | ` 
एकादशेऽथ पयौये ठतीयस्यान्तरे मनोः। 
तस्य सप्त छषधापि फीत्यंमानान्‌ निवोध मे॥ ६९ ॥ 
अव ग्यारहके मनु-एवं तीसरे सावर्णिं मनु ( श्द- 
सावि के मन्वन्तस्मेजो सात षि ओर देवता गिः उनका 
वर्णन करता ह, सुनो ।॥ ९९ ॥ 


हविष्मान्‌ कादयपश्चापि हधिष्मान्‌ यश्च भागेवः 
तख्णञ्च तथाःऽऽत्रेयो कसिघ्रस्त्वनधस्तथा ॥ ७०} 
अङ्गिराश्चोदधिष्ण्यदच पौलस्स्येः निश्चर स्तथा 
पुलद््थाग्नितेजाश्च भाव्याः `स मषट्षयः ॥ ७१॥ 
बह्मणस्तु सुता देवा गणास्तेषां चयः स्मताः 
संवतंकः सुदर्मां. च देवानीकः पुरुषः ॥ ७२ ॥ 
क्षेमधन्वा ` खडायुख आदरः पण्डको मचुः। 
साबणस्य तु पुत्रा चे तृतप्यस्य नव स्खेताः ॥ ७३ ॥ 
कदयपगोत्री हविष्मान्‌, गुवंशी हविष्मान्‌, अत्रिगोनो- 
त्पच्न तरुणः वसिष्ठगोत्री अनधः अङ्कखिरागोत्री उदधिष्ण्य 


॥ 


२३२ 


पुखस्त्यगोत्री निर प्षं पुरुहगोश्री अभितेजा-ये सात मर 
हशि ये सव-के-सव ह्याजीके( मानस ) पुत्र है 1 उस मन्वन्तर 
म देवताथेक्गि तीन गण गे तथा न तीसरे सामर्णि 
मनुफे संवर्तक, सुार्मा, देवानीकः पुरूद्ह, क्ेमधन्बाः 
हढायु, आदर्श, पण्दक ओर मनु-ये नौ पुत्र मने गये ॥ 
चतुर्थस्य तसु सावर्णेश्रैपीन्‌ सतत निबोध मे। 
दुतिर्थसिपुक्रश्च सभेयः दखुतपास्तथा ॥ ७४॥ 
भद्भिरास्तपसो पूर्तिस्तपस्थी काषयपस्तथा । 
तपो.ऽश्मश्च पौलस्त्यः पौलहश्च वपो रपिः॥ ७५॥ 
भाग॑वः सप्तमस्तेषां विष्ठेयस्तु शपोश्टतिः। 
पञ्च देवगणाः प्रोक्ता भानसा ब्रह्मणश्च ते ॥ ७६॥ 
अष चरं सावर्णिके ( अर्थात्‌ गार्य मन्बन्तरके ) 
फरोषिर्योफा भर्णुन करता दू सुनो । कसिष्टजीके पुत्र थुति 
अभिगोभरश्र उत्पत सुतपा, शद्गिरागोत्री तपोमूर्तिः कश्यप- 
गोधी तपसी, पुरससयवंशर्मे उतपन्न तपोऽदानः पुलष्टगोत्री 
तपोरषि श्रौर सातर्वो भरगुंी पपोपृति (को) समष्ठना 
ग्ाहिये । ( एव मन्यन्त ) रेबता्थोके पश्व गण गि । 
वे सब ब्रह्माजीके संकस्पसे उत्पन्न हेग ॥ ७४-७६ ॥ 
देषषायुरद्र्च देवधेष्ठो विदूरथः । 
मिधषान्‌ मिभ्रदेषश् मित्रसेमश्च मिषत्‌ 1 
मित्रबाहुः स्ुषचौग्य द्वादशस्य मनोः सताः ॥ ७७॥ 
इन मारव मनुके देभबायु, अवुर) देगशरेए, निवूरथः 
मित्रवान्‌, मिग्रदेष, मिघ्रसेन, मित्रङृत्‌, मित्रबाह भर 
सुवर्चा ८ -ये दस › पुत्र गि ॥ ७४॥ 
्रयोदरेऽथ पयौये भाग्ये मन्वन्ररे मनोः। 
यङ्धिरादयैश धृतिमान्‌ पौटस्स्यो हन्यपस्तु यः॥ ७८ ॥ 
पौठहस्तरवक्र्शी च भार्गवश्च निसत्सुकः। 
निष्प्रकम्पस्तथाऽ.ऽघेयो निर्मोहः काष्यपस्तथा॥ ७९ ॥ 
खुतपाद्यैव वासिष्ठः सपतेते तु महर्षयः । 
य पव गणाः परोक्ता देवतानां सथयम्भुवा ॥ ८० ॥ 
फिर मविष्यकरे तेरह मनुके मन्वन्तरे अङ्खिरागोत्री 
धृतिमान्‌, पुलस्त्यवंशी व्यप, पुरदबंशोपयन्न तरभदर्सीः 
भरुगोत्री निरुत्सुक, अन्निगोग्री निप्प्रकम्पः कृश्यपगोजी 
निर्मोह ओर इसिष्टगोत्री सुतपा-ये खात मर्धि हग ओौर 
देवताकि तीन गण गि, एेखा स्वयं ब्रक्माजीनि कहा रे ॥ 
्योदशास्य पुत्रास्ते विषयास्तु सचेः श्टुताः । 
चिष्रसेनो विचिक्रश्च नयो धर्मशतो श्वसः ॥ ८१ ॥ 
सयुमेतरः श्ज्रवृचिञच सुतपा निर्भयो डः । 
रौच्यस्यैते मनोः पुषा अन्वरे तु योदश ॥ ८२॥ 


श्रीमहाभारते सिखभागे 


क्डन्न्यन्कन्यन्कन्क्कन्कन्न्ान्क्ननकानण्यन्कन्यन्न्कन्क दन्य 


[ हरिचंदर 


< अव्र तेरह मनु ठचिके प्रो इस प्रकार जानो-- 
चित्रसेनः विचित्र, नय, धर्ममृतः धृत) सुनेत्र, धत्रष्रदधि, 
सुतपा, निर्भय ओर ष्द--ये तेर मन्षन्तस्मै रोच्य नामक 
मनुके पुत्र गि ॥ ८९-८२॥ 
चतुर्वशेऽथ पर्याये भौत्यस्थैवान्तरे मोः। 
भागषो शतिबाहुश्च श्चुचिरङ्धिरखस्तथा ॥ ८३. ॥ 
युकषयैव वथाऽऽघेयः शुक्रो चासिष्ठ पय च । 
सनितः पौल्दयैव धन्त्याः सप्तर्षयश्च ते ॥ ८४ ॥ 
पवौदषटये मौत्य नामक मनुफे मन्वन्तस्यै शगुगोप्रो्यन 
अतिबराहु, अङ्गिरागोश्ी शचि, अङ्धिरागोघधी युक्त 
अभिगोग्रोषद्न युक्त, अभिगोप्री शुक्रः सिगरी शुक्र तथा 
पुल्यो्री अजित-ये अन्तिम स्पर्पिं हेगि ॥ ८३-८५॥ 
पतेधां कल्य उत्थाय कीर्तनात्‌ ध्युमेधते । 
यशश्चाप्नोति छमषदायुष्माश्च भवेन्नरः ॥ ८५॥ 
अतीतानागतानां वै महर्षीणां खदा नरः। 
देषतानां णणाः पोकाः पञ्च पै भरतर्षभ ॥ ८६॥ 
मवुष्य प्रातःकाषठ उरकर इन भूत-ममिप्यत्‌-काकके 
महपिर्योका फीर्तन करनेठे सदा सुख पाता, सायद्टी वह 
मषा भारी यदा पताह भोर दीर्घायु देता है] मरतर्पम ! 
उस्न समय देषता्ओकि पोच गण रगे ॥८५-८६॥ 
सरङ्भीर्येग्र्च सरस्वानुप्र प्व ख 
अभिमानी प्रघीणश्च जिष्णुः सक्रस्वयस्सया ॥ ८७] 
तेजस्थी सबलश्चैव भौत्यस्यैते मनोः ताः । 
भौरयस्यैवाधिक्रे तु पूर्ण कत्पस्तु पूर्यते ॥ ८८॥ 
, भौत्य मनुके तरङ्मीर, वप्र, तरसान्‌, उमर, अमिमानी 
परगीणः निप्णु संक्रन्दनः तेजसी ओर सवल--ये ( दस ) 
पुज गे तया मोत्य मुका अधिकारकाल पूर्णं निप्र कर्प 
( अर्यात्‌ त्रह्नाजीकी आयुका एक दिन ) पूरा हे जाता द ॥ .. 
इत्येते नामतोऽवीदा मनवः कीर्तिता मया। >. 
तैरियं परथिवी तार सखमुत्रान्ता सपना ॥ ८९1 
पूर्ण , युगसष्खं ठु परिपाल्या नसधिप । 
पजाभिद्वैव तपसा संहारस्तेयु भागशः ॥ ९०.॥ `` 
यह्‌ मेने नाम केकर बति हुए (वर्तमान ओर होनेबाके ) 
मनुरओंका वर्णन क्रिया । नराधिप [ ये ८ मनु ) तपस्या- 
के प्रमावते हजार चद्यंगी पूर्णं होनेतक नगरसँसे ठेकर 
समुद्रतककी पृथ्वीका तथा प्रजाका सर्वदा पालन करते ई} 
उक्त समी मन्वन्तरयेम अन्मा-अख्ग प्रजाका संहर शेता 
हे ॥ ८९-९० ॥ 


इति श्रीमहाभारते खिरमागे हरिवंशे शरिवंशपदंणि मन्वन्तरवर्णनं नाम सहमोऽध्याबः ॥ ७ + 
एस प्रकार श्रीमहामास्त श्विरुभाग ईैरिवंदारे भन्तर्ण॑त दरिवेदापरमे मन्वन्तर-पर्णनगिषयक 


सातरयो ध्याय पूरा हुमा ॥ ७ ॥ 
ग्द 


.हरिवंशपवं ] 


(व 


अष्टमो ऽध्यायः 


जज === 


> 


॥ 


अष्टमोऽध्यायः | 
चारो युगो, मन्वन्तर ओर बरह्ाजीके दिन एवं वषका मान 


जनमेजय उवाचं 
मन्वन्तरस्य संख्यानं युगानां च म्रहामते । 
बरह्मणोऽक्कः भरमाणं च वक्तुमंसि मे द्विज ॥ १ ॥ 
जनमेजयने कहा--परम बुद्धिमान्‌ द्विजवर ! आप 
मुक्षसे मन्वन्तयेके युर्गोकी संख्याका वर्णन कीजयि तथा 
नक्षाजीके दिनका प्रमाण भी बताइये ॥ १॥ 


वैयम्पयायन उवाच 
अहोरात्रं भजेत्‌ सूर्यौ मानवं लौकिकं परम्‌ 1 . 
तासुपादाय गणनां श्ण संस्यामरिवम ॥ २॥ 
वैशहाम्पायनजी बोले--रानरुदमन ! सूयं मदुरयोकि 
दिन ओर रात्रिका विभाग करते ई । इस लीकिक 
गणनासे आरम्भ करके मनुसे भी परे द्विपरार्घनामक 
ब्राह्म-गणनातकका वर्णन सुनो ॥ २॥ 
निमेषः प्चदकषमिः काष्ठा भिशव्‌ तु ताःकलाः। 
भिदात्कलो सुहतस्तु शिद्ता तैर्म॑नीषिणः ॥ ३ ॥ 
अदहोराग्रमिति पाटुदचन्द्रसर्यगति शप । 
विशेषेण तु सर्वेषु अष्टोरत्रे च नित्यश्षः॥ ४ ॥ 
राजन्‌ } पंद्रह निमेषोकी एक काष्ठा होती है ओर 
तीस काष्टार्ओकरी एक कलम होती है । तीस कलार्ओका 
एक सुहृत होता ह ओर बुद्धिमान्‌ पुखष तीस महर्तौको एक 
दिन-एत कहते ईँ, जिसका निर्माण चन्द्रमा तथा सूर्यकी 
गतिद्वारा होता है! विरोषकर सूर्य-चन्द्रमाके उदय-अस्तसे 
मेखके परिवतीं भू.गदेर्मे रत-दिन होता है ॥ २-४॥ 
अहोरात्राः पञ्चदश. परश्च हत्यभिश्ग्दिः। 
दौ पक्षो तु स्सरतो मासो मासौ दाबृतुरुच्यते॥ ५ ॥ 
परह अहोरात्र (दिन-रात)का नाम पक्चहै जीर दोपक्षौ- 
पखवार्हौका एक महीना माना जाता है तथा दो महीनीकी 
प्क ऋतु कहल्मती है ॥ ५ ॥ 
अब्दं दधयनमुक्तं च अयनं त्वृुभिकिभिः। 
दक्षिणं चोरः चैव संख्यासरवविष्ारदैः ॥ ६ ॥ 
तीन छतुओंका एक अयन होता है ओर दो अयर्नोका 
प्क वर्ष होता ह । संख्याके तत््वको जाननेरमे चतुर पुर्षोनि 
उन दोर्नो अयर्नोका नाम दक्षिणायन ओर उम्तरायण 
. बताया दै ॥ ६ ॥ ` 
मानेनानेन यो मासः पञ्चदयसमन्वितः। 
पिवृषां तदषोरात्रमिति काकविदो विषुः ॥ ७ ॥ 
इस मानते जो दो पर्षोका ( एक ) मास होता हे, 
उसे समयको जाननेकले ८ चुर पुरुष ) पितर्योका ( प्क ) 


म्ण 


दिन-रात कहते ह ॥ ७ ॥ 
कृष्णपक्स्त्वहस्तेषां श॒ङ्छपश्चस्तु श्वस । 
छृष्णपक्षं त्वष्टः राद्धं पितृणां वर्तते चप ॥ < ॥ 
कष्ण-प्ष उन पितर्योका दिन होता है ओर शुर पक्ष 
उनकी रात्रि होती है दस्य राजन्‌ ! एप्णपक्चरूप दिनमे 
पितरौका श्राद्ध होता है# ॥ ८ ॥ 
मायुषेण तु मानेन यो वै सेवस्सरः स्मरलः। 
देवानां तदष्टोराश्रं दिवा चैवोत्तरायणम्‌ । 
दक्षिणायनं सम्रता राघ्रिः प्ाज्ञैस्तच्ार्थकोषिदेः॥ ९ ॥ 
मनुष्योके मानसे जो एक वर्ष कदा गया दहै, वह देवतार्ओंका 
एक दिन-रात होता है । तत्वको जाननेम चर बुद्धिमान्‌ 
पुरुषोने उत्तरायणफो देवतार्ओंका दिन ओर दक्षिणायनको 
देवतार्ओकी रान्न बताया दै ॥ ९॥ 
दिव्यमब्दं दशागुणमद्येरत्नं मनोः स्मतम्‌ । 
अदोराधं दशगुणं मानवः पश्च उच्यते ॥ १०॥ 
देवता्ओके दस वर्षका मनुका प्क दिन-रात कष्टा दै 
ओर इस दिन-रातका दसगुना मनुका प्क पक्च कषटखाता 
है॥ १०॥ 
पक्षो दशगुणो मासो मासेदठीवशभिगेः। 
ऋतुमेनूनां संभोक्तः प्राक्षेस्तत्वार्थदर्दिभिः। 
ऋतश्रयेण त्वयनं वदूदयेनैव घत्सरः ॥ ११ ॥ 


दस पक्षोौका मनुका एक मारु होता है, बारह 


महीर्नौकी एक आतु होती है । त्वा्थदशीं बुद्धिमार्ननि 


# चन्द्रलोके रहनेवाठे पितर शु्-प्ष्म चन्द्रमसि ठके हृ 
सर्य॑को नहीं देखते । कृष्ण-पक्षमे सय॑ जर चन्द्रमा पक 
दूसरेके सम्मुख दोनेके कारण उन्द सयका दशन होता दै, 
इण शु्-पक्षको पितर्तोकी राति भोर ङष्ण-पक्षकरो पितरोका दिन 
कष दै । इसलिये सम्पूणं इष्णवक्षको भयमा अत्यन्त भावश्यकता 
होनेपर दिनका भन्त शेनेके कारण भमाषास्याको भाद-कारु , 
गताया दै । 


† तात्पर्यं यष्ट दै कि मक्र-संक्रान्तिसे मिशुन-संक्चन्तिके 
भन्ततक्‌ सुयके रथकी विदिणेकि ओर भर्षादकी किरिणेकि मतिदिन † 
षके भोर सचते रषटनेसे उन्तरवपे भोर चछनेबाढा सुं मेरु 
पर्वतके रिखरपर रदनेवरे देवतामोको दीखता रतां रै, भतः 
उत्तरायण देवतार्भोका दिन शेता है तथा कर्व-संकान्तिते ऊेकर 
धलुः-संकान्तिके अन्तक उन दोनों भ्रकारकौ किरिणोकि भुवको 
भरतिदिन क्रमश्चः छोढते रषनेसे दक्षिणकी भोर चरता मा स्यं 
देवताभेग्नि सदी दीखता । अतयव दक्षिणायन देतार्भोकी राद रै । 


५ 


श्रीमष्टाभारते लिखभागे 


{ हरिवंशे 


तीन ्रतुर्थोका एक अयन माना है ओर दो अयर्नोका 
एक वर्षं कहा है # ॥ ११॥ 


चत्वार्येव सदस्राणि वपौणां तु छतं युगम्‌ । 

तावच्छती भवेत्‌ संध्या संध्यांशश्च तथा चप ॥ १२॥ 
राजन्‌ ! देवतार्ओके चार हजार वर्पोका एक सत्ययुग 

होता दै, चार सौ वर्की उसकी संध्या होती है ओर तना 

ही उसका संध्यांश होता टै { ॥ १२॥ 

श्रीणि षर्षसटस्नाणि शेता स्याद्‌ परिमाणतः । 

तस्यार्च तिराती संध्या संध्यां शरच तथाविधः॥ १२३॥ 
तीन हजार बषकि परिमाणका ्ेतायुग रोता ६ ओर 

तीन सौ वरभीकी उसकी संध्या होती है तथा तना ही 

उसका संभ्यांश होता है ॥ १३ ॥ 

तथा वर्षसदखरे द्धे दापरं परिकीर्तितम्‌ । 

तस्यापि दिश्षती संध्या संघ्यांश्चद्व तयाविधः ॥ १४॥ 
इसी प्रकार दो दजार वर्पौका द्वापरयुग कदा गया दैःदो 

सौ वर्पोकी उसकी संध्या होती ओर तना ष्टी उसका 

संध्यांश रोता दहै || १४ ॥ 

कलिर्वर्पसष्टसखं च खंख्यातोऽश मनीपिभिः। 

तस्यापि शतिका संध्या संभ्यांशद्चैव तद्धिधः॥ १५॥ 
इसी गणनाके अनुसार बुद्धिमान्‌ पुर्पेनि कचयुगक्रो 

प्क हजार वेबाखा वताया है । सौ वर्परौकी उसकी संध्या 

होती १ ओर इतना दी संध्यांश होता है ॥ १५॥ 

पपा द्वादशसाहस्री युगसंख्या प्रकीर्तिता । 

दिन्येनानेन मानेन युगसंख्यां निवोध मे ॥ १६॥ 
यह बारह हजार वर्षीकी एक वचदुर्युगकी संख्या कही 

गयी 1 राजन्‌ | इस दिव्यमानसे ठम युरगोके वर्षोकी गिनती 

समदम रो ॥ १६ ॥ 

छतं श्रेतवा द्वापरं च कछिदचैव चतुर्ग । 

युगं तदेकसप्तत्या गणितं सपसत्तम ॥ १७॥ 


मन्वन्तरमिति पोतं संख्यानाथविशारदैः । 
अयनं चापि सत्मोक्तं दे.ऽयने दकषिणोषखरे ॥ १८ ॥ 


# भर्थात्‌ देवतामेकि वदत्त हजार वर्पोका मनुका एक दिन 
होता है 1 

† युगके पष्ठ मागका नाम संध्या भौर युगके भन्तिम 
भागका नाम सं्याद दै। 

{ सत्ययुग, घरैतायुगः द्रापरयुग चौर कृषियुगकी एक चतुंमी 
देवताभेकि नारष्ट हजार वर्पौकी ्ोती ६ अर्थात्‌ दिव्य दच्च जार 
वेकिये चार्यो युग ते 1 ध्न चरते दुर्गोकी संध्यायै एक 
हजार दिष्य वर्पौकी होती ह भीर श्नके सव्याय मी एक नार 
दिष्य वर्षमे शेते र। 


सत्ययुग, चेता; द्वापर ओर कलिदुग---इन वचार्योको 
चचर्युगी कहते ६ । शरपशरे्ट | संख्या करम चतुर पुख्परेनि 
इकदत्तर चौकदी युगो (से कु अभिक काट ) का नाम 
मन्वन्तर क्षा टै ८ क्योकि दजारका चीददरवो माग 
इतना ही होता है ) । दस्फरे मी दक्षिणायन ओर उत्तरायण-- 
ये दो अयन कटे गये ६ #* ॥ १७-१८ ॥ 


मयुः प्रलीयते यत्र समापते चायने प्रभोः। 

ततोऽपरो मनुः कालमेतावन्तं भवत्युत ॥ १९ ॥ 
उत्तरायणके पूर्णं दोनेपर मनु नर्म टीन दौ जति 

| फिर इतने ही समयतक दुसरे मनु रते ६ ॥ १९ ॥ 

समतीतेयु राजेन्द्र भक्तः संवत्सरः स वे। 

तदेव चायुतं प्रोक्तं युनिन। तस्वदुदिीना ॥ २० ॥ 
राजेन्द्र ! तच्वदर्खी मुनिने दस हजार ८ अस्सी ) 

मलुर्थोका बरह्माजीका एक वर्धं कहा है ‡ ॥ २० ॥ 


ब्रह्मणस्तदहः धों कटपदचेति स कथ्यते । 
सषहस्नयुगपर्यन्ता या निशा प्रोच्यते बुधैः ॥ २१॥ 
निमन्जत्यण्छु यन्नोर्वीं सशेखवनकानना । 
तस्मिन्‌ युगसहस्रे तु पूणं भरतसचम ॥ २२॥ 
ब्राह्मे विवसपयेन्ते कर्पो निःशेष उच्यते । 
युगानि सप्ततिस्तानि साग्राणि कथितानि ते ॥ २३॥ 
छृरप्रेतानियद्धानि मनोरन्तरमुच्यते । 
चतुर्षरोते मनवः कीतिवाः कीर्तिवर्धनाः ॥ २४॥ 
वेदेषु सपुराणेषु सर्वेषु प्रभविष्णवः 
प्रजानां पत्तयो राजम्‌ धन्यमेां प्रकीर्तनम्‌ #॥ २५॥ 
भरतसत्तम | व्रक्षाजीका जो दिन कषा है, उसीका 
नाम कत्य है ओर विद्वान्‌ पुखपोनि हजार युर्गोकी ब्र्षा- 
जीकी जो रात्रि कही है, उसमे बन ओर पर्वतौसहित प्रथ्वी 
जस द्भव जाती ६ ओर उन हजार चवुयगि्योके पूर्णं होनेपर 
जो ब्रह्माजीका दिन आरम्भ होता दै, उसकी समापि- 
तकका समय एक क्प कष्टता है । राजन्‌ { सत्ययुग 
धेतायुगादिसहिति कषतर ॒चतुरयुंगीसे कुछ अधिकं 
कालका एकं मन्वन्तर कषराता दै { यह कीर्ति 

# भर्योत्‌ वे पे भूमादिमामेसे देवलोके पटुःचकर्‌ भपने 
भधिकारको मोगनेके अनन्तर उत्तरायणके मासे लोके पटच 
लति र । 

† इकष्टतर चतुयुंगके हिसाबते चौदह मन्वन्तसोमे ९९४ 
चतुद होते ईं । तया न्षाके पक दिनम एक नार्‌ चतुुंग हेते 
द भतः छः चतुग ओर बचे । छः चतुयंगका चौदहवौ माग 
कुष्ठ कम पोच एजार एक सौ तीन दिव्य वषै हेता १ । शस प्रकार 


एक मन्वन्तररमे इ्कदत्तर चतुयंगफे अतिरिक्त श्तने दिव्य यं ओर 
मधिक रेते र। 


हसिवराप्वं ] 


अष्टमो ऽध्यायः 


व्य 


ब्रदानिवले चौदह मनुर्जोका वर्णन कर दिया । समी 

पुराणो ओर वेदिं इन प्रभावशाली प्रजापति मनतुर्भका 

वर्णेन आता रै । राजन्‌ ! इनका कीर्तन करनेसे 

धनकी प्रापि होती है ॥ २९-२५॥ 

मन्वन्तरेषु संहाराः संहारान्तेषु सम्भवाः । 

न ॒दाक्यमन्तरं तेषां वक्तं वषंशतेरपि ॥ २६॥ 
मन्वन्तरोम कितने ही संदार दते ह ओर संदारफे ब्राद 

कितनी दी खष्टर्यो होती रहती ईह । इनके अन्तरको सैकर्ड 

सर्पमिं भी महीं बताया जा सकता ॥ २६॥ 


विसर्गस्य प्रजानां वे संहारस्य च भारत । 

मन्वन्तरेषु संहाराः श्रुयन्ते भरतषेभ ॥ २७ ॥ 
भासत ! भरतश्रेष्ठ ! प्रायः सभी मन्वन्तरेमि यदा-कदा 

प्रजाकी खष्टि ओर संहारकी परम्पराका उपसंहार हो जाता 

हे--यह वात सुननेमे आती दै ॥ २७ ॥ 

सद्रोषास्तघ्र तिष्ठन्ति देवाः सप्तर्षिभिः सह । 

तपसा ब्रह्मयर्येण श्रुतेन च समाहिताः ॥ २८ ॥ 
मन्वन्तरोके बाद जो संहार होता है, उसमे तपस्या, 

ब्रह्मचर्य ओर शाख-ज्ञानसे सम्पन्न कुछ देवता ओर सपर्षि 

रेष रह जाते रै ॥ २८ ॥ 

पूणे युगखहस्े ठ॒॒कट्पो नि्दोष उच्यते । 

, तत्न स्वौणि भूतानि दग्धान्यादित्यतेजस ॥ २९.॥ 
सहस चतयुगियेकि पूणं होनेपर कल्प पूरा हो जाता दै । 

उस समयं सव भूत द्वाद आदिर््योकी किरणोसे भस्महो 

जते ह ॥ २९॥ 

बरह्माणम्रतः सृत्वा सहादित्यगणेर्विभुम्‌ । 

योगं योगीश्वरं द्वेवमजं क्षेषक्षमच्युतम्‌ । 

प्रविशन्ति सुरथेष्ठं हरि नारायणं प्रसुम्‌ ॥ ३० ॥ 


ओर वे ( द्वादश सूयं ) मी ( जिसका ईधन जल गया 
ह, एसे अग्निक मति अपनी आत्माकां उपसंहार करके ) 
देवताओंसदित बह्माजीको आगे करॐे योगीश्वर योगस्वरूपः 
देव, अजः कषेत्रज्ञ अच्युतः सुरश्रेष्ठ, सवन्यापीः प्रमु श्रीहरि 
नारायणम भ्रवेशा कर जते ह ॥ ३० ॥ 
यः स्र सवभूतानां कट्पनन्तेषु पुनः पुनः । 
अव्यक्तः श्राश्वतो देवस्तस्य सर्वमिदं जगत्‌ ॥ २९ ॥ 
जो प्रसेक कल्पका अन्त दोनेपर ( दुसरे क्का आरम्म 
होनेके समय ) ब्रारंवार सब भूतोको रचते दै, जो अप्रकटः 
गाश्वत देव दैः उन्दींका यह सम्पूरणं जगत्‌ टै ॥ ३९ ॥ 
तत्र संवर्तते रान्निः सकलैकार्णवे तदा । 
नारायणो दधे निद्रां ष्ठं वरप॑सहसरकम्‌ ॥ २२॥ 


~ 


` यथतौष्रूतुलिङ्ग(नि 


( यह्‌ प्रख्य सुपुतिके समय होता है, अतयव ) जव 
सम्पूणं विश्व एकार्ण॑वके जलम निम्न हो जाता है, तव रात्रि 
होती ३ ओर बह्माजीके हजार वर्षोततक नारायण निद्रा 
ठेते ६ ॥ ३२॥ 
ताचन्तमिति काटस्य रा्िरित्यभिहाब्दिता । 
निद्रायोगमयुप्रापतो यस्यां शेते पितामहः ॥ २२ ॥ 

जितने समयतक ब्रह्माजी योगनिद्राका आश्रय ठेकर शयन 
करते ई उतना समय उनकी रानि कस्रती दै । ३३ ॥ 
सा च राभिरपक्रान्ता सहस्रयुगपर्यया । 
तदा प्रबुद्धो भगवान्‌ बरह्मा खोकपितामहदः ॥ २३७ ॥ 
पुनः सिखश्चया युक्तः सगौय विदधे मनः। 
सैव स्मरतिः पुखणेयं तदुतत तदिचेष्टितम्‌ ॥ ३५ ॥ 

जबर वह्‌ रानि सट चतुर्युगी बीतनेपर समाप्त होती दैः 
तव कोकेकि पितामह मगवान्‌ ब्रह्माजी जागते ह । फिर 
रचनेकी इच्छसे युक्त रोकर मनम शष्ट करनेका विचार 
करते दै । उस समय उनकी चेष्टा ओर स्प्रति पहठे 
कल्पकी तरह दी होती है 1 ३५२५ ॥ 
देवस्थानानि तान्येव केषटं च पिपयेयः। 
ततो दग्धानि भूतानि सवौण्यादित्यरदिमभिः ॥ ३६॥ 
देवर्पिय्चगन्धवीः पिशाचोरगराक्षसाः 1 
जायन्ते च पुनस्तात युगे भरतसत्तम ॥ २७ ॥ 

तात | उस समय ( ब्रह्माण्डे सूयं आदि ) देवताओंकि 
(ओर पिण्डमे चक्षु आदिके ) स्यान भी वे ही होते द । परं 
(जीका) विपर्यय (उख्ट-फेर ) होता रहता है । भरतसत्तम ! 
सूर्यकी किरणेसि भस्म होकर ( भगवान्‌ विष्णुर्मे लीन 
हुए ) सव्र भूत तथा देवताः ऋषि, गन्धर्व, यक्षः पिशाच, स॑ 
ओर राक्षस भी फिर उस युगमे उत्पन्न हो जते दै ।॥२६-२७॥ 


नानारूपाणि पर्यये । 
हदयन्ते तानि तान्येव तथो ब्राह्मीयु राशिषु ॥ ३८ ॥ 
जेते ८ ग्रीम्म-शीत आदि ) ठकि चिह उन 
ऋतुओके आनिपर प्रकट होने लगते £, दसी प्रकार 
बरह्माजीकी रत्नियोकि बीतनेपर ( पूर्व कल्पके समानं ) अनेक 
रू्फवले प्राणी ( फिर ) दीखने लगते ह ॥ ३८ ॥ 
निष्क्रमित्वा प्रजाकारः प्रजापतिरसंदायम्‌ । 
ये च वै मानवा देवाः सर्वे चैव महर्षयः ॥ ६९ ॥ 
ते सङ्गताः श्ुखसङ्गाः राश्वद्धर्मविसर्गतः। 
न, भवन्ति पुनस्तात युगे भरतसरम्तम ॥ ४०॥ 
ततत { प्रजार्थको स्चनेवाले प्रजापति ( उस समय 
नारायणमेसे) निकल्कर (फिर भूतो स्वने छगते ह । ) जो- 
जो मनुष्य, देवता ओर महर्पिगण शाश्वतम अर्थात्‌ देहादि 


२६ 


धीमह्ाभारते लिखभागे 


[ स्यदो 


आतमब्रुद्धिरूय स्वाभाविक दोर्पोको त्यागकर वद्ध नहारमे 
पर्हुचकर उसमे रीन द्यो जते दैः भरतसत्तम | वे किर 
( वृस ) कव्य्मे उत्पन्न नरह दते ॥ ९-४० ॥ 
तत्स्व छमयोगेन कारसंख्याविभायवित्‌ । 
सख्घ्रयुगसंख्यानं रत्वा दिवसमीश्वरः ॥ ४१ ॥ 
त्रि युगसदन्ञत्वां रत्वा च भगवान्‌ विभुः । 
सं्र्यथ भुतानि खजते च पुनः पुनः ॥ ४२॥ 
कालकी संख्याका विमाग करनेमे चतुर घे सर्वसमर्थ 
भगवान्‌ परमात्मा क्रमानुसार सदस्ष युर्गोकी संख्या- 
वटे दिन ओर ८ दसी प्रकार ) सदसत चदुर्युगिर्योकी 
रात्निको वनाकर प्राणिर्योकी वारंवार स्वना ओर संहार 
करते रते  ॥ ४१-४२॥ 


व्यक्ताव्यक्तो महादेवो हरिनारायणः प्रभुः 
तस्य ते कीर्तयिष्यामि मनेर्वेवखतस्य ह # ५२॥ 
विस्म भर्वधेष्ठ॒ साम्प्रतस्य मादयते 
सृष्णिवदाप्रसद्धेन कथ्यमानं पुरातनम्‌ ॥ ७४ ॥ 
यत्रोत्पन्नो भदत्मा स हरिवृष्णिकुे प्रभुः 
सवीघ्ुरविनाद्ाय सर्वखोकदिताय च ॥ ४५॥ 
मष्टादेव श्रीदरिनारायण प्रस ही स्यूल-पष्म-स्प ( मे 
सर्य विराजमान ) 1! मदाययुते | वर्तमान यैवस्रत मनु 
मीउनके टी अया ६। ब्रृष्णिवंदाके प्रसन्ने म उनकी 
पुरातन खटिका वर्गन करंगा । भरतश्रेष्ठ | वरे परमात्मा 
ओौर प्रम श्रीहरि खरे अयुर्येका विना तथा सम्पूण 
लेोर्कोका कल्याण कसनेके स्वि दसी वृष्णिवंदर्म 
उत्पन्न दए. ये ॥ ४२-४५ ॥ 


दति श्वीम्टामारते खिखमगे इरिवंने इरिवंषपर्वणि मन्यन्तरगणनायामष्टमोऽध्यायः 1 ८ ॥ 


दस प्रकार श्रीमदामारत श्िकमागः हरिवंशे अन्तर्गत दरि्वमपरवंमे मन्वन्तर 
गणनाव्रिषयक मार्य भघ्याय पूरा हुमा ॥ ८ ॥ 


"न्द 
नवमोऽध्यायः 
वैवखत मु, यम, यमी ८ यद्रना ), अधिनीकङमारो एवं शनैश्वरकी उत्पत्ति 


वैश्रम्पायन उवाच 
विषखान्‌ कष््यपाच्क्षे दाक्षायण्यामरिंदम । 
ठस्य भायौभवत्‌ संक्षा त्वाषटरी देवी वियखतः॥ १ ॥ 
वेशम्यायनजी कते है--गनुदमन  कद्यपीये 
दश्चकी पुरीम विवस्वान्‌ उत्पन्न दुष्ट ओर त्व्टकी पुत्री 
संशा्देवी उन विवस्वान्‌ ( सूर्यं ) की मार्या दुद ॥ १ ॥ 
सुरेणुरिति विख्याता भिघु छोकेषु भादिनी। 
सा वै भाया भगवती मार्तण्डस्य महात्मनः ॥ २ ॥ 
मदात्मा मारत॑ण्डकी वह पविज अन्तःकरणवाली मार्या 
भगवती संशा तीर्नो लोकमि सुरेणुके नामे ८ भी) 
प्रसिद्ध दै ॥ २॥ 
भर्ठैरूपेण नातुप्यद्‌ रूपयौवनशालिनी । 
सक्षा नाम ख॒तपसा दीपने समन्विता ॥ २॥ 
वद रूप्रयौवनद्याखिनी संशा अपने पति वूर्यदेवके मण्डलक 
तीत्र तपः तेज, एवं दीप्तिक कारण प्रसन्न^नर्दी रदती थी ॥ ३॥ 
सादित्यस्य हि तद्रूपं मण्डखस्य सुतेजसा । 
गात्रेषु -परिदग्धं वै नातिकान्तमिवाभवत्‌ ॥ ४ ॥ 
उस -संशाका रूप सूर्यमण्डले तेजसे अद्धकि संतत्त 


दोनिके कारण ( छलस-सा गया । अतण्व सूरं उसको) बहुत ` 


यच्छे नीं ख्ते थे | ४॥ 


न खठ्वयं खतोऽण्डस्य दति से्ादभाषत । 
अह्लानात्‌ कदयपस्तस्मान्मावतंण्ड इति चोच्यते॥ ५ ॥ 

( अदितिके ) अशनम पडनेपर कदयपर्जीने स्नेदपूर्वक 
कहा था किं यह मया नही हैः किं अण्ड (गर्म) दितदहैः 
दसल्वि तवते सूर्यं “मार्तण्ड कंदे जते ६* ॥ ५॥ 


तेजस्त्वभ्यधिकं तातं नित्यमेव विवखतः 1 
येनातितापयामास बीश्छोकान्‌ कदयपात्मजः॥ £ ॥ 

तात [ ( कदयपके मादात्म्यके कारण जीवित हुए ) 
विवस्वानर्भे सर्वदा अधिक तेज रहता है । उसी तेजसे कदयप- 
जीके पुत्र सूर्यं तीनो ठेर्कौको तपते रदते ६ ॥ ६ ॥ 


च्रीण्यपत्यानि कौरन्य संक्षायां तपतां वरः । 
आदित्यो जनयामास कन्यां दौ च प्रजापती ॥ ७ ॥ 


# जब सूर्यं अदितिके गर्भम थे, उत समय बुध उनके पास 
भिक्ला मोगनेके स्यि आयेऽ-परंतु भिति गर्मके गोक्षके कारण 
हीघतासे चख्कर भिक्षा न दे सकी, तब बुधने अदिततिश्ये शापदे 
दिया किं ठेरा गमं श्त टो जाय । चह सुनक अदिति ग्याङुर हो 
गयी, सब कटयपजीने पनी दाक्तिते बुधे शापक दूर कर्‌ दिया जीर 
कदा कि यष्ट वास्तवर्मे शृत नहीं हुमा, चण्ड (ग्म) के 
भीतर व्त॑मान £ । अदित्िके ( मेरा ग्भ मृत टो गय ) श्स 
विपरीत शानक कारण ्टी सूयं मात॑ण्ट कष्टलति रै । 


हरिवंशपवं ] 


नवमो ऽध्यायः 


८1 


1३७ 


५ ९ 
--------------------------------------------- ~~~ ----- ~ 
भि 


कुख्वंशी राजन्‌ { तपनिवा्मि श्रेष्ट, आदित्यने  संशकरे 
गर्भे दो प्रजापति ओौर एक कन्या---इन तीन संतानौको 
उत्यन किया ॥ ७ ॥ 
मलुैषेखतः पूर भाद्धदेवः प्रजापततिः । 
यमश्च युना चेव यमजौ सम्बभूवतुः ॥ ८ ॥ 
उनम एक प्रजापति तो विवखान्‌ ( सय॑ ) फे पुत्र 
वैवखतः मनु थे ओर दूसरे प्रजापति शराद्धदेष यम थे । इस तरह 
यम तथा यम्ना नामक दौ जुड़ीं संतान उत्पन्नं इई थी ॥ 
सा विवर्णं तु तदरूपं शष्ट संञा विवसखतः। 
असदन्ती च स्वां छायां सवर्णा निर्ममे ततः ॥ ९२ ॥ 
तदनन्तर संशने सूरयके कटिनतासे सहने योग्य तेजस्वी 
रूपको देखकर उनके तेजेको न सह॒ सकनेके कारण अपनी 
छायाको ही अपने समान नाम ओर रूपवाली बनाकर तैयार 
कर दिया# ॥ ९ ॥ 
मायामयी तु सा संशा तस्यादछाया समुत्थिता । 
पाञजलिः प्रणता भूत्वा छाया संशा नरेश्वर ॥ १०॥ 
उवाच किं मया कायं कथयश्च श्युचिसिते । 
स्थितासि तव निशे शाधि मां -वरवणिनि। १९ ॥ 
वह मायामयी संशा संलाकी छायासे.उत्यनन हु थी । 
नरेश्वर { वह छाया संज्ञको प्रणामकर्‌ हाथ जोड़कर ` बरोली- 
शशयुचिस्िते { बताओ; मुदे क्या करना चाये शरेष्ठ अद्ौवारी \ 
भ दम्हयारी आकाका पाठन्‌ करछगी, तुम मुञ्चे आका दोः ॥ 
संज्ञोवाच । 
अहं यास्यामि भद्रं ते खमेव भवनं पितुः। 
त्वयेह भवने मध्यं वस्तन्यं निर्विकास्या'॥ ९९1 
पमौ च वारको मह्यं कन्था चेयं सुमध्यमा । 
सम्भाव्यास्ते न चाख्येयमिदं भगवते कचित्‌॥ १३॥ 
संक्षाने कटा-चश्रारा कल्याण होः] मँ अव अपने 
पिताके धर जा रही दह तुम मेरे इस घरमे शान्त होकर 
रदो । ये मेरे दोनौँ पुत्र द ओर यह एक सुमध्यमा ( सुन्दर 
कटिवाली ) कन्या है ! इनका तू ध्यान रखना ओर ` इस 
रहस्यको भगवान्‌ सूर्यसे कभी.न व्रतल्मना ।॥ १२-१२३ ॥ 
छाथोषाचे 
अआ कंचग्रहणाद्‌ देषि आ शापान्नेव कर्िचित्‌। 
आस्थास्यामि मतं तुभ्यं गच्छ देवि यथाङुलम्‌॥ १७ ॥ 
छयाने कष्टा--देवि ! मेरे बाल पकडे जने तथा 


` शप देनेकी नोवतं,आनेके पूव मँ यह बात किसी प्रकार भी 
"षी ककत 


| # संशटके समान नामे ओौर्‌ वर्णवारी होनेसे छायाका नाम 
सवण भी है 1 श्सीे पुत्र सावणि मनु है । 


14 


न कटूगी } आप सुखपूर्वक ( अपने पिताक यँ ) जाये ॥ , 
वैश्चस्पायन उवा 


समादिष्य सवर्णा तां तथेत्युक्ता च सा तया । 
त्वषः सखमीपमगमद्‌ वीडितेव तपस्विनी ॥ १५॥ 
पितुः समीपगा सता तु पित्रा निभंत्लिता तदा) 
भतः समीपं गच्छेति निरुक्ता च पुनः पुनः ॥ १६॥ 
अगच्छद्‌ बद्धवा भूत्वा ऽ ऽच्खाद रूपमनिन्दिता) 
छरुनथोत्तरान्‌. गत्वा तेणा्येव चच्रार ह ॥ १७॥ 
वैश्षस्पायनजी कहते है--अपने समान नाम-रूपवाली 
छयाको आज्ञा देकर आर उससे प्तथास्तु, कदे जानेपर चह 
तपस्िनी र्ञित्-सी होती हुई अपने पिता च्व्टाके यदो ची 
गयी | पिताके पास पर्हुचनेपर उसके परिताने उसे बडे जोरों 
से डंटा तथा उससे बार-बार पतिके पास ही जानिके लि कहा । 
तव निन्दित कमेसि सदा दूर रहनेवाली वह संज्ञा अपने रूपको 
ब्रदरकर धोका रूप. धारण करके उत्तरकुरु देम जाकर 
पास चरने र्गी ॥ १५-१७॥ ` 


. द्वितीयायां तु संक्षायां सं्ेयमिति चिन्तयन्‌ । 


आदित्यो जनयामास पुत्रमात्मसमं वदा ॥ १८ ॥ 
उस दूसरी संश्को भी संजञा ही समक्षते हु सूयं देवता- 
ने उसके गर्भसे अपने ही समान पुन्न उच्यन्न किया ॥ १८ ॥ 
पूर्वजस्य मनस्तात सदद्षोऽयमिति प्रभुः । 
सवणेत्वान्मनेो्भयः सावणं इति चोक्तवान्‌ ॥ १९ ॥ 
तात ! ये अपने क्डे मा मनुके समान .बणै तया 
शक्तिवारे थे, अतएव सावरणं कदल्य ॥ १९ ॥ 
मलुरेवाभवन्नान्ना सावणं इत्ति. चोच्यते । ," 
द्वितीयो यः सुतस्तस्याः स विक्शेयः नेश्वरः ॥ २० ॥ 
वे ही मनु दए जिनका नाम, सावर्ण मनु है । उख 
( छया ) से जो दूसरों पुत्र'उत्पन्न हुआ, उनको वुम शनैश्चर 
समन्चो ॥ २० ॥ 
सक्षा तु पाथवी तात खस्य पुजस्य वे तदा । 
चकाराभ्यधिकं स्नेदं न तथा पूर्वजेषु वै ॥ २१॥ 


- मनुस्तस्याक्षमत्तत्त॒ यमस्तस्या न चक्षमे\ ` 


, बह पाथिवी संज्ञा अपने पुत्रस तो अधिक स्नेह करती 
यी, परंतु वैखा स्नेह उने पहलेकी संतानोसि नदी करती 
यी । मनुमे ते इस .वातको सहः दिया, परंतु यम इते न 
सद सके ॥ २११ ॥ 
तां स रोषाच बाल्याश्च भाविनोऽथंस्य वै बलात्‌ । 


~~~ 


~~~ 
, *# संश्ाकी छयके 'पृ्वीमे प्ड्नेके कारण वह पृथ्वी उतप्न 
हई अतण “पार्भिती' कदरती धी । 


८ - 


श्रीमहाभास्ते सिखभागे 


{ शरिवंदे , 


-------------------------------- नच्च 


पदा सतैर्जयामास संशां वेमस्यतो यमः ॥ २२॥ 
वे वैवखत यम ब्रारुखमाव एवं रोप्के कारण तथा 

होनहार ( मानी) के वशीभूत रो संज्ञाको पैर दिखाकर ॐरने 

ल्ग ॥ २२॥ 

तं श्श्याप ततः रोधात्‌ साबर्णजननी खप। 

चरणः पततामेष तवेति श्दादुःखिता ॥ २३॥ 
राजन्‌ ! इसपर साबर्णकी माताने अति दुःखित दो कोप्मे 

मरकर उन शाप दिया कि पवुम्ारा यह चरण गिर जाय ॥२३॥ 

यमस्तु तत्‌ पितुः सरं प्रा्जयिः प्रत्यवेदयत्‌ । 

भशं चापपिभयोदि्यः संक्षावाक्यप्रतोदितः ॥ २४॥ 
दा्रा-संशके उस वाक्यसे पीडित ओर शापके मयते अत्यन्त 

भ्याकरुल होकर यमने हाय जोड़कर पितासे वह सत्र वात कद दी ॥ 

शापोऽयं विनिवर्तेत श्रोबाच पितरं तद्‌ । 

मात्रा स्नेहेन सर्वेषु वर्तितव्यं सुतेषु पे ॥ २५॥ 
वे पिताते बोके--“नचे यह शाप न च्छो । (देखिये ) 

माताको तो सवर पुरोत रतिं समानरूपे स्नेदपूर्वक भ्यवहार 

करना चाये ॥ २५॥ 

सेयमस्मानपाष्टाय यवीयांसं वुभूपति। 

स्यां मथोदयतः पादो न तु देहे निपातितः ॥ २६॥ 

बास्यादढा यवि वा मोष्टाव्‌ वद्धवान्‌ ्न्तुमर्हति। 

'्पर यह हम सव्रको छोड़कर सव्रते छोरेसे ही 
स्नेहका व्यवहार करती है । सो मैने उसके ऊपर पैर उठाया 
ही शा, शरीरपर मारा नही था। मेने यह काम लकपनसे करिया 
हो अथवा मोहवशः, परतु आप मुरचे क्षमा कर दे ॥२६१॥ 
यस्माच्‌ ते पूजनीयादं लक्ष्तिस्ि त्वया सुत ॥ २७॥ 
तस्मात्‌ तवैष चरणः पतिष्यति न संद्ययः। 
अपत्यं दुरपत्यं स्यान्नाम्या कुजननी भवेत्‌ ॥^२८ ॥ 

^( संशञाने कहा-)व्रेय ! मँ तुम्हारी पूजनीया ह+ तो 
मी दमने मेरा तिरस्कार क्रिया है अतः तुम्हारा यह पैर 
निस्संदेह भिर जायगा ।› संतान तो क्रुसंतान हो सकती दैः 
परंतु माता माता नदीं दयो सकती ॥ २७-२८॥ 
हापतोऽहमस्मि लोकेश जनन्या तपतां वर । 
सव भ्रसादाश्चरणो न पतेन्मम मोपते ॥ २९॥ 

प्लोकेश्वर ! माताने मुन्ने गापदे दिया है, परंतु तपने- 
वार्छोमि श्रेष्ठ गोपते! आपकी कृषसे मेरा वैर न गिरेणेसी कृपा 
कीजिये )' ॥ २९॥ 
विकस्वादवाच 
अखश्शयं पु महद्‌ भविष्यत्यत्र कारणम्‌ । 
येनत्वामाविशव्‌ क्रोधो धर्मशषं सत्यवादिनम्‌ ॥ ३० ॥ 


सूयन कदा-पुत्र ! ठम धर्मश ओर सत्यवादी दोः 
तुमको जो क्रोध चद्‌ आया दस्मे निस्संदेह कोई वडा मारी 
कारण दोगा॥ ३० ॥ 


न दाक्यमन्यथा कर्तुं मया मातुर्वचस्तव । 
मयो मांसमादाय यास्यन्ति धरणीतटम्‌ ॥ २१॥ 
तव पादान्महाप्राक्न ततस्त्वं प्रा्स्यसे खुखम्‌ 1 
तमेवं षचस्तथ्यं मातुस्तव भविष्यति ॥ ३२॥ 
शापस्य परिदष्रेण त्वं च चातो भपिष्यसि । 

म म्हारी माताके वचनकरो ( सर्वथातो) टी नदीं 
सकता । ( पर ) मदाप्राज्  कीढे तुम्हरे चरणर्भेते मांस देकर 
परध्वीतल्यर चले जार्येगेः तवर तुमह सुख मिलेगा ¡ इस प्रकार 
वम्हारी माताका कदा हया वचन ( भी) स्त्यदहो 
जायगा ओर गापका परिहार हनेसे वण्दारी भीरा 
जायगी ॥ २९-३२१९ ॥ 
आदित्योऽथात्रवीत्‌ संक्ां किमर्थं तनयेषु रै ॥ ३३ ॥ 
तल्येष्वभ्यधिकः स्नेहः क्रियतेऽति पुनः पुनः। 
सा तत्परिहसन्ती तु नाचचक्षो विवस्वते ॥ ३४॥ 

फिर पूर्यने संश्ञासे कदा--"समी पुत्र वराव्र £, ती 
मी तू ( किसीति कम ओर किससे ) अधिक स्नेहं कयो करती 
द ।' सूर्यने यह व्रात वार्चार कही, परंतु वद सती ही रद 
गयी ओर उसने सूर्यस कुट भी न कहा } ३३-२४॥ 
आत्मनं समाधाय योगात्‌ तथ्यमपदयत 1 
तां राप्तुकामो भगवान्‌ नाद्याय कुरुनन्दन ॥ ३५ ॥ 
मूर्धजेषु च जग्राह समयेऽतिगतेऽपि च। 
सा तत्‌ स्तं यथावृत्तमाचचक्षे विवखते ॥ ३६ ॥ 

कुर्नन्दन {भगवान्‌ सूर्य॑ने अपने चित्तको एकाग्र करके 
योगकर द्वारा सत्य वात जान ली ओर थापद्वाय उसका विनाश 
करनेके व्यि उसके करेय पकड़ ल्य} तव अपनी रापथके 
उतर जानेपर छायने सूर्यनारायणसे सारी वात रऽ्यो-कीत्यौ 
्रतदख दी ॥ ३५-३६ ॥ 


विवखनथ तच्छुत्वा कछृद्धस्त्वश्ारमभ्यगात्‌ । 
त्वश्ठ तु तं यथा न्यायम्चयित्वा विभावसुम्‌ । 
निर्दरधुकामं रोषेण सान्त्वयामास यै तद्‌ ॥ २७ ॥ 
सूर्यनारायण इस व्रातकरो सुनते ही क्रोधरमे भरकर त्व्टाके 
पास पर्हुचे ! त्वष्टोने विपिपूवंक उनक्री पूजा करके जव देखा 
क्रियेतोरोप्रसे मुन्ने मसही करना चाहते है, तव उन्हनि 
सूर्यनारायणको इस प्रकार गान्त करना-समद्नाना आरम्भ 
क्रिया 1 २३५७ ॥ 


स्व्टोवाच 


तवातितेजसाविष्रमिदं सूपं न शोभते। 
असहन्ती च तत्‌ संक्षा घने चरति श्ाद्दठे ॥ ३८ ॥ 


हरिवदापवं ] 


नवमोऽध्यायः 


२९ 


त्वष्टाने का--आदित्य | आपका यद्‌ अतितेजस्वी रूप 
अच्छा नहीं रुगता 1 इसको न सह सकनेके कारण दी संज्ञा 
हरी षासवाकेवनमे ( हरी षा्सोको ) चर रदी दै ॥ ३८॥ 
ष्टा हि तां भवान खां भार्या श्युभचारिणीम्‌ । 
नित्यं तपस्यभिरतां वडवारूपधारिणीम्‌ ॥ २९ ॥ 
पणीहारां रशा दधैनां जटिखां ब्रह्मचारिणीम्‌ । 
हस्विहस्तपरिङ्िणं व्याकुलां पञ्चिनीमिव । 
इलायां योगबलोपेतां योगमास्थाय गोपते ॥ ० ॥ 
किरणोके खामी ! आज आप दाथीके सूडसे खीचे जानेके 
कारण पद्विनीके समान व्याकु दुर, शद्ध आचरणवाली ओर 
योगके बलत सम्पन्न अतएव योगसे घोड़ीका रूप धारण करके 
सदा तप करती दूरई, पर्तोका आदार करनेवाली दुव्रलीः 
दीनः जयाधारिणी ओर ब्रह्मचारिणी -अपनी उस प्ररंसनीया 
भार्याको देखगे ॥ ३९-४० ॥ 
अनुकूरं तु देवेशा यदि स्यान्मम तन्पतम्‌ । 
रूपं निर्घतयाम्यद्य हव कान्तमरिदम ॥ ४९॥ 
देवेश ¡ यदि आपको मेरी बात ठीक स्मो तो शनरुदमन 
मै आज आपके रूपको मनोदर वरना दू ॥ ४९.॥ 
रूपं विवसतश्चासीत्‌ तिर्थगूर््वसमं त॒ वै। 
तेनासौ सम्प्रतो देवरूपेण तु विभावसुः ॥ ४२॥ 
पदे सूरय॑का सूप तिरछा, ऊँचा ओर सब ओरसे एक-सा 
था | उस सूपसे सम्पन्न होनेके कारण ही बे बिमावसु कद 
जति द ॥ ४२ ॥ । 
तस्मात्‌ त्वष्टुः स वै वाक्यं बटु मेने प्रजापतिः। 
समनुक्षातवश्चैव त्थष्टारं रूपसिद्धये ॥ ४२ ॥ 
इखि उन प्रजापति सू्य॑नारायणने त्वष्टाकी ब्रातको 
बहुत अच्छा समन्ना ओर उन्दोने अपना रूप ठीक करनेके 
लिये व्वष्टाको अनुमति दे दी ॥ ५३ ॥ 
ततोऽभ्युपगमात्‌ त्वघा मातंण्डस्य विवस्वतः । 
भमिमारोप्य तद तेजः शातयामास भारत ॥ ४४॥ 
भारत ! तब त्वटने मार्तण्ड (सूर्य) के समीप आक्र 
उनको सानपर चदाकर उनके तेजको खरादना आरम्भ 
र दिया ॥ ४४॥ 
ततो निभौसितं रूपं तेजसा सं्टतेन भे । 
कान्तात्‌ कान्ततरं द्वष्टुमधिकः द्युद्याभे तदा ॥ ४५॥ 
इस प्रकार तेजके छि जनेसे उनका स्प खिल उठा 
ओर उनका रूप रम्यातिरम्य होकर अधिक सुशोभित होने 
(1813#3। 
सुखे निवर्तितं रूपं तर्ब देवस्य गोपतेः । 
तेते प्रभति देवस्य सुखमा्ीत्‌ सु सोदिलम्‌ 1 


मुखयगं तु यत्पृ मातंण्डस्य सुखच्युनम्‌ ॥ ८६॥ 
आदित्या द्वादकतोवे्ट सम्भूता मुखसम्भवाः। 
धातायंमा च मिश्रश्च वरुणो ऽद्पे भगस्तथा ॥ ४७ ॥ 
इन्द्रो विवस्वान्‌ पूषा च पजेन्यो ददामस्तथा 1 
ततस्त्वा ततो विष्णुरजघन्यो जधन्यजः ॥ ४८ ॥ ` 
तवसे किरणेकि खामी भगवान्‌ सूर्यके मुखका स्प बदल 
गया । उस समयते उनक्रा मुल रक्तवर्णका हो गया । 
उन मार्तण्डके मुखते जो मुखराग दयूटा थाः; उमसे 
बारह आदित्य उत्पन्न हुए । उनके मुखस धाता, अर्यमा, 
मित्र, वरुणः अंशः भगः इन्द्रः विवस्वान्‌; पूषा; दसै, 
पर्जन्यः त्वष्टा; बारहर्वे विष्णु उत्पन्न हुए, जो अन्तमे प्रकट 
होनेके कारण सव्रसे छोटे रोकर भी गुरणेमिं सर्वभेष्ठ ये ॥४६--४८॥ 


हय छेभे ततो देयो ष्ट ऽऽविर्यान्‌ खदेहजान्‌ । 
~, पुष्पैरलेकारेभौखता 9 _ चै 
गन्धैः पुभ्यैरलंकारोभौखता सुटेन शख ॥ ४९॥ 
गन्धः पुष्प, अलंकार ओर प्रकायमान मुक्ोसे सुखोभित 
अपने शरीरते उत्पन्न हृए उन आदि्योको देखकर भगवान्‌ 
सयं बडे प्रसन्न हुए ॥ ४९ ॥ 


प्रं सम्पूजयामास त्वष्टा वाक्यमुवाच इई । 
गच्छ देव निजां भार्या कुरूश्वरति सोत्तरान्‌ ॥ ५० ॥ 
वडवारूपमास्थाय वने चरति शाद्वङे । 

इस प्रकार सूर्यनारायणका पूजन कर त्वष्टानेः उनसे 
कहा--ष्देव { अब्र आप अपनी प्रदीके पास जादये । वद्‌ 
उत्तर कुर (दे) म श्रमण कर्‌ रही रै ओर दरी घाससे 
भरे हुए वनम धोडीका रूप धारण करके विचर रही है" || 
ख तथा रूपमास्थाय स्वभा्यीरूपलीलया ॥ ५१ ॥ 
ददद योगमास्थाय स्वां भार्या वडषां तत्तः। 
अधृष्यां सर्वभूतानां तेजसा नियमेन च ॥ ५२॥ 
वडवावपुषा राजंश्चरन्तीमक्तोभयाम्‌ । 
सोऽश्वरूपेण भगवांस्तां सुखे समभावयत्‌ ॥ ५३ ॥ 
मेथुनाय वियेष्न्ती परपुंसोपशङ्कया । 
सा सक्निरवमच्हुक्रं नासिकायां विवस्वतः ॥ ५७ ॥ 

तवर सूर्यनायणने मी अपनी पत्नी रूपके अनुसार 
घोदेके समान विचरण करमेके स्वि घोढेका री रूप धारण कर 
लिया} उख समय पूर्यने ध्यानसे देखा तो उन्टं तेन ओर 
नियमके कारण सब भूतसे अष्रष्य षोड़ीका रूप धारण कर 
किसी आओरसे भी भयकी आक्षंका न कर निर्भय हो विचरवी 
हुई अपनी मायां ( संज्ञा ) दख पड़ी । राजन्‌ ! फिर तो षोडेके 
सूयर्म भगवान्‌ सूयं उसके मुखरके समीप पूवि । प्र 
चह परपुरुपकी आशेकसे मेथुनके प्रतिकूल चेष्टा करे 
र्गी ओर सूर्यके वीयैको उसने अपनी नाक्परसे गिरा 
दिया॥ ५९-५४ ॥ * 


© 


श्रीमहाभारते लिलभागे 


^~ -----------------------~--~----------------~-~~-~---~-~~-~---~----~-----~----~--------- --------- ~~~ -----~----~---~--~--~ -~--- 


देवौ तस्यामजयित्तामण्िनौ भिषजां वये । 
नासत्यश्चैव दस्र स्मतौ द्वावश्विनाविति ॥ ५५॥ 
उठे वेमि श्रेष्ठ अश्विनीक्कमार नामक देवता उत्प 
हुए । वे दोनो अश्विनीकरुमार नासत्य ओर दस नामसे प्रसिद्ध 
है ॥ ५५॥ 
मातंण्डस्यात्मजावेतावष्टमस्य प्रजापतेः । 
 संक्ञायां जनयामास वडवायां स भारत। 
तां तु रूपेण काट्तेन वृयामास भास्करः ॥ ५६ ॥ 
भारत ] ये दोन आय प्रजापति मार्तण्डके पुत्ररदै। 
इन्द सुर्य भगवान्‌जे अश्वारूपा संशके गर्मसे उन्न करिया था । 
तदनन्तर सूर्ये उसे अपने मनोहर स्प दर्खन दिया॥ ५१ ॥ 
सा च भीर तुतोष जनमेजय । 
यमस्तु कर्म॑णा तेन अशं पीडितमानसः ॥ ५७॥ 
जनमेजय | तवर बह स्वामीको देखकर वदी संत हूर । 
इधर यम अपने उस कर्मसे मन-दी-मन ब्रदे दुःखित 
रहते ये ॥ ५७ ॥ 
धर्मेण रञ्जयामास धर्मराज ईष प्रजाः। 
ख लेभे कर्म॑णा तेन परमेण मद्ायुतिः ॥ ५८॥ 
पितृणामाधिपत्यं च रोकपालत्वमेव च 1 
शै 
मवु; धजापतिस्त्वासीत्‌ सावरणं; स तपोधनः ॥ ५९ ॥ 
अतयव बे अपने धर्मराजत्वके अनुरूप ही धम॑युक्त आचरणे 
प्रजार्ओको प्रसन्न रखने स्मो! उस श्रेष्ठ कर्मके कारण 
उन महाकान्तिमान्‌ धर्मराजको पितरयोका आधिपत्य ओर 
छोकपाखका पद्‌ मिला तथा षे तपस्याके धनी प्रजापति सावर्ण 
मनु हुए ॥ ५८५९ ॥ 
भाव्यः खोऽनागते कि मनुः सावर्णिकेऽन्तरे 1 
मेरपृष्ठे तपो धोरमद्यापि चरति प्रुः ॥ ६० ॥ 
वे सर्वखमर्थं सावण भविष्यके ( आठ ) मन्वन्तरके मनु 
गि । वे आज भी सुमेरुपर्व॑तके शिखरपर धोर तप कर 
रे दै॥ ६० ॥ 


-----------------------------~--------------------------------~------- ~ ------- ~~~ ~~ त~ 


स्राता शनैश्चरश्चास्य ्रहु्वसुपलम्धवान्‌ 1 
नासत्यौ यौ समाद्यातौ स्वर्वचौ तौ यभूवतुः ॥ ६१॥ 


इनके भारं गतैश्वर ग्रह वन गये ओर जिन नासर्व्योका 
वर्णन किया दैः वे स्वर्गके वैय बन गये ॥ ६१ ॥ 
सेवतोऽपि तथा रज्नण्वाना श्षान्तिदो ऽभवद्‌। 
त्वष्टा तु तेजसा तेन विष्णोश्चक्रमकर्पयत्‌ ॥ ६२ ॥ 
तवप्रतिदतं युद्धे दानवान्तचिकीपंया । 

ये उपासना करनेवलेके पोर्ढको शान्ति देतेर्दै । उसी 
तेज ( की छीटन ) से त्वष्टाने विष्णु भगवान्का ( सुदर्यन ) 
चक्र बनाया । वह दान्वेकि अन्त करनेकी इच्छासे बनाया गया 
चक्र युद्धम किख प्रकार मी व्यर्थं नहीं जता ॥ ६२३ ॥ 
यवीयसी तयोयौ तु यमी कल्या यशस्विनी ॥ ६३ ॥ 
अभवत्‌ सा सरिच्टृष्ठा यमुना खोकमाविनी। 
मनुरित्युच्यते लोके सवणं इति चोच्यते ॥ ६७॥ 


उन दोरनेमिं छोटी जो यमी नामकी यद्यखिनी कन्या थीः 
बह नदिर्योमिं श्रेष्ठः खोकंकि पवित्र करनैवाटी यम्रना 
दुरं । मनु संसारस्य मनु कलते है ओर सावणं भी 
कहलति ई ॥ ६३-६४ ॥ 
वितीयो यः सुतस्तस्य मनोश्रता शनैश्चरः । 
भ्रहत्वं स च ठेभे वै सर्वलोकाभिपूनितम्‌ ॥ ६५॥ 

उनके दूसरे पु ओर मनुके भ्राता जो रामैश्वर 
हैः उन्हे सत्र लोकेति पूजित अरहका पद प्रा 
करिया ॥ ६५ ॥ 
य इदं जन्म देवानां श्णुयाद्‌ चापि धारयेद्‌ । 
आपद्धःधः स बिसुच्येत प्राप्युयाख् महद्‌ यशः ॥ ६६ ॥ 

जो मनुष्य देवता्थेकि जन्म (की इस कया) को 
सुनता है अथवा मनम धारण करता है, वद आपचियेसि 
चू जाता ओर बड़ा भारी यञ्च पावा ३ ॥ ६६ ॥ 


इति महाभारते खिलमागे हरिविरो दैरिदिशपर्वणि वैवस्वतोत्पत्तौ नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥ 


इस प्रकार श्रीमहामारत शिरमाग हिक अन्तरगत इखिेदपरवमे वैवस्वत मनु 
५ आदि ) क्षी उत्पत्तिविषयक नर्व अध्याय पूरा हुमा ॥ ९ ॥ 


[वि = 


दामोऽध्यायः 
वैवखत मलुके षंशर्जोका वर्णन ओर पुरूरवाकी उत्पत्ति 


 - वैश्रम्पायमे उवाच 
भनेर्वेषस्ववस्यासन्‌ पुत्रा वै नव तत्समाः । 
६ष्वाङ्ददेव नाभागो धृष्णुः शर्यातिरेव ख ॥ २ ॥ 


नरिष्यंश्च सथा पराद्युनौभागारिएटसप्तमाः। 
कर्प पृषध्रश्च नवैते भरतर्षभ ॥ २॥ 


दरिषेदापवं | 


बेशम्पायनजी कहते ह--भरत्षभ ! वैवस्वत मनुके 


` उनके ही समान इष्वाकुः नाभागः धृष्णु, शर्यातिः 


"+~ ~ 


नरिष्यन्तः प्ा्यु, सातर्वे नाभागारि, करूष ओर एषप्र-- 
येनौ पुत्र हए ॥ १-२॥ 
अकरोत्‌ पु्रकामस्तु मयुरिष्टि प्रजापतिः। 
मिन्नावरुणयोस्तात पूर्वमेव विह्याम्पते ॥ ३ ॥ 
असुत्पन्नेषु नवसु पुत्रेष्वेतेषु भारत । 
तस्यां तु बर्तमानायाभिष्स्यां भरतसत्तम ॥ ७ ॥ 
मित्रावरुणयोरंशे मुनिराहुतिमाजुषटोत्‌ 1 
आहृत्यां हयमानायां देवगन्धवंमायुषाः ॥ ५ ॥ 
वु तु परमो जग्मुमुंनयश्च तपोधनाः। 
अहोऽस्य तपसो वीर्यमहोऽस्य शुतमद्धतम्‌ ॥ ६ ॥ 
प्रजापालक तात ! इन नौ पुकि उन्न होनेसे पिके 
प्रजापति मनुने पुचकी कामनासे मित्रावरुणकी इष्टि ( यज्ञ ) 
की थी । भारत | जव्र यह इष्टो रदी थी, उस समय 
मुनिने मित्रावरुणके लि आहुति दी 1 भरतश्रेष्ठ | आहुतिके 
सम्पन्न दोनेपर देवता, गन्धर्वः, मनुप्य ओौर तपोधन सुनि परम 
प्रसन्न हुए ८ ओर कहने र्गे-) “अदो इका तपोब्रल 
आश्वर्यजनक दै ओर इसका शालीय श्न भी अद्ुत 


है [' ॥३-६॥ 


त्र दिव्याम्बरधरा दिल्याभरणभूषिता। 
दिष्यसंहनना चेष इला जक्षे इति श्चुतिः ॥ ७ ॥ 
उस यकम दिव्य वरस्रौको धारण क्रिय हुए दिष्य 
आभूषणेसि विभूषित ओर दिव्य शरीरवाी इला नामक 
कन्या उत्यन्न हुई थीः एेसी ख्याति है ॥ ७॥ 
ताभिरेत्येव होवाच मयुर्दण्डधरस्तदा 
अनुगच्छस्व मां भद्रे वमिखा प्रत्युवाच शट । 
ध्मियुरमिदं वाक्यं पुषकामं प्रजापतिम्‌ ॥ ८ ॥ 
राजा मनुने उस कन्याको (दला? कहकर पुकारा ओर 
कहा--भ्द्रे | वू मेरे पीङे-पीछे आ । तव पुत्रक 
कामनावारे प्रजापतिको इखने यह धर्ममय उत्तर दिया॥ ८॥ 
इलोवाच 
मित्रावरुषयोरंशे जातासि वदतां वर । 
वयोः सकाहां यास्यामि न मां धर्मो दतो ऽवधीव्‌॥ ९ ॥ 
कते क्ा--वक्तामि शरेष्ठ ! मँ धर्मकी हत्या नदरी 
कर सकती, अन्यया धर्म मुभे भी सार डलेगा । मे मितायर्ण- 
के अंशसे उत्पन्न दु ह उतः उनके ही पाखःजार्कगी ॥९॥ 
सेवसुक्स्या मयुं देवं मिश्रावरूणयोरिखा । 
गत्वान्तिकं घरारोहा प्रा्जलिवौक्यमम्रषीत्‌ ॥ १० ॥ 
शरेष्ठ नितरम्बोबाखी छा राजा मनसे स प्रकार ककर 
मिभ्रावरुणके पास गयी ओर दनो शाय जकर उनसे इस 
रकार कहने स्गी-। १० ॥ 


वशामोऽभ्यायः 


७१ 


अोऽस्मि युबयोजीतादेषौ कि करवाणि वाम्‌। 
मुना चाहमुक्ता वै अनुगच्छस्व मामिति ॥ ९१ ॥ 
ष्देवताओ | भै आप दोनेकि अशते उसनन हर ईहः 
अतः अपलोग॒व्रतादयेः मँ आपकी क्या - सेवा करर ? 
मनुजीने भुद्षसे कदा है कि त्‌ मेरे पीठे-पीठे आः ॥११॥ 
तां तथावादिनीं साध्वीमिलां धर्म॑पसयणाम्‌। 
मित्रश्च वरुणश्चोभावरूचतुरयम्निबोध तत्‌ ॥ १२॥ 
राजन्‌ ! धर्मपरायणा साध्वी शलाक इस प्रकार कटनेपर 
मित्र॒ ओर वर्णने उस्ते जो कुर कदा था, उसे 
खनो ॥ १२॥ 
अनेन तष धर्मेण प्रभ्रयेण दमेन च। 
सत्येन चैव सुश्रोणि प्रीतौ स्वौ घरवणिनि ॥ १३ ॥ 
शयुन्दर कण्भिागवाली सुन्दरी ! तेरे इस धर्म॑, विनयः 
इन्द्रियसंयम ओर सव्यते हम दोन त॒मपर बहुत प्रसन ६ ।॥९३॥ 


आवयोस्त्वं महाभागे स्याति कन्येति यास्यसि। 

मनो्शधरः पुप्रस्त्वमेव च भविष्यसि ॥ १४॥ 
'महामागे | तरू हमारी पु्ीस्पसे प्रसिद्ध होगी ओर मनुका 

वंशधर पुज भी त्‌ ही दोगी॥ १४॥ 

सुधुम्न शति विस्यातसिषु खोकेषु शोभने । 

जगत्यो धम॑श्शीखो मनोर्वंशविवर्धनः ॥ १५ ॥ 


'शोमने | ( उख समय » दू मनुके वंको बदानेवाे, 
जग्मे परियः धमम॑शील सुदयुम्नके नामसे तीनों लोकमि 
प्रसिद्ध होगी" ॥ १५॥ 
निवृष्ता सा तु तच्दटत्वा गच्छन्ती पितुरन्विकम्‌। 
घुधेनान्वरमासाथ मेथुनायोपमन्त्रिता ॥ १६॥ 

इस बातको सुनकर ह अपने पिता मनुके पा वापस 
जा रदी थीः इसी ब्रीचमै अवसर देखकर बुधे उसे 
सहवासके स्मि आमन्नित क्रिया ॥ १६ ॥ 
सोमपुषराद्‌ बुधाद्‌ राजंस्तस्यां अक्षे पुरूरवाः । 
जनयिस्वा खतं सा रमिखा खुदुम्बतां गता ॥ १७ ॥ 

राजन्‌ { चन्द्रमाके पुत्र धुधद्वारा उस इाके गर्भसे 
पुरूरवा उसन्न हए. ओर उस पुत्रको उत्पन्न करके वह्‌ टा 
सुधुम्न हो गयी ॥ १७॥ 


खदयुम्नस्य तु दायादाख्यः परमधार्मिकाः । 

उत्कलश्च गयद्चैव विनताश्वश्च भारत ॥ १८॥ 
मारत | सुदुम्नके उत्कटः गय ओर विनताश्च नामक 

तीन परम धार्मिक्र पुत्र उत्पन्न हुए | १८ ॥ 

उत्करस्योत्कखा राजन्‌ विनताद्षस्य पश्िमा। 

विक्‌ पूर्वा भरस्रेष्ठ गयस्य तु गया पुरी ॥१९॥ ` 
राजन्‌ | उत्कछ्की राजभानी उक्ता ( उद्ीसा > इर्‌ | 


॥॥ 


4. 


----------ननन च~ ~~ ज जव्च्व्ववव्व==----=---=---------------- 


विनताश्वको पश्चिम दिशाका राज्य मिला ओर भरतश्रेष्ठ | 
गयकी राजधानी पूवं दिले गया नामकी पुरी हुई ॥ १९॥ 
प्रविष्टे तु मनौ तात दिवाकरमरिदम। 
दखधा तदधत्क्ष्रगकयोत्‌ पृथिवीमिमाम्‌ ॥ २० ॥ 

तात ! शघुचूदन ! मनुके सूर्यम प्रवेश कर जनेपर 
उनके इष्वा आदि दस पुर्रोनि पृथ्वीको दस मागि 
वोट लिया 1 २०॥ 


युपाद्किता वसुमती यस्येयं सवनाकरा । 
शछ्वाङुर्जये्ठदायादो मध्यदेष्ामवाक्ठवान्‌ ॥ २९ ॥ 
मनुके बद पुत्र इदवाकुको मघ्यदेदाका राज्य मिल । 
यज्ञस्तम्मेसि अलंकृत एवं वन ओर खार्नोसदित यह खारी 
पृथ्वी इष्वाकुकी दी दै ॥ २९ ॥ 
कल्याभावाचच खुदयुम्नो नैनं गुणमवात्तवान्‌ । 
वसिष्ठवचनाच्चासीत्‌ प्रतिष्ठाने महात्मनः ॥ २२॥ 
प्रतिष्ठा धर्मराजस्य खदुम्नस्य कुरूढह । 
सुद्युम्न कन्यामाक्के कारण इख सोमाम्यपू्णं पदको 
न पासके | परंतु ऊुरुद्द | वसिष्ठजीके वन्चनसे महात्मा 
धर्मराज सुदुम्नको भी प्रतिष्ठानपुर ( ्ूसी-प्रफग)का 
राज्य मिल गया था॥ २२६ ॥ 
तत्पुरूरवसे प्रादाद्‌ राज्यं प्राप्य मद्ायदः ॥ २३॥ 
खुयुम्नः कारयामास प्रतिष्ठाने चपक्रियाम्‌ । 
महायशखी चु्ुम्नने सज्य पानेके वाद प्रतिष्ठानमे (कुछ 
दिनतक ) राञ्य किया; फिर उर्दनि अपना राज्य पुरूरवा- 
कोदेदिया॥२३६॥ 
उत्कटस्य जयः पु्राछ्िघु लोकेषु विश्चुताः। 
श्ु्टकश्चास्बसीषश्च दण्डद्चेति खुतासख्रयः ॥ २४ ॥ 
उक्तल्करे तीन पुत्र येः जो तीनों लोकम प्रसिद्ध ये 1 
उनके नाम ये-धृष्टकः अम्बरीष ओर दण्ड ॥ २४॥ 
यश्चकार महात्मा वै दण्डकारण्यसुत्तमम्‌ । 
घनं तह्लोकविस्यातं तापसानामयुत्तमम्‌ ॥ २५ ॥ 
तश्र प्रविष्टमाधस्तु नरः पापात्‌ प्रमुच्यते 1 
महात्मा दण्डने दण्डकारण्य नामक वनका निर्माण 
किया, जो तपखिर्योके स्यि परमोत्तम ( आश्रम ) तथा 
लोकम अत्यन्त विख्यात है । उसमे प्रवेश करते ही मनुम्य 
समन्त पापि क्त दो जाता दै ॥ २५१ ॥ 
द्युम्नस्य दिवं याव पेखसुत्याद्य भारत ॥ २६॥ 
मानवेयो मदाणजन ख्षुंखोरश्षणर्युवः । 
श्ववान्‌ य शृटेत्येव खुयुम्नश्चातिविश्चुतः ॥ २७॥ 
मरतववंशी महाराज | सुदम्न कन्यावस्याम फेर (पुरूरवा) 
को(नोर पुर्षावस्याम उत्कर आदि अन्य तीन पुरक) उत्यन 


श्रीमहाभारस्ते खिकभगे 


[ दसिविंहे 


करके सर्म चले गये । ये सुद्युम्न खरी तथा पुख्ष दोनेकि दी 


लक्षणेसि संयुक्त हुए थे । इन्दौँने इतके रूपमे रहनेपर 
गर्भं धारण कया था, फिर ये ही ( पुरप्रत्व प्रात होनेपर ) 
सुद्ुम्न नामे प्रसिद्ध हो गये थे ॥ २६-२७ ॥ 
मरिष्यतः हाकाः पुजा नाभागस्य तु भारत । 
अम्बरीषो.ऽभवत्‌. पुषः पाथिवपभसन्तमः ॥ २८ ॥ 
भारत | ( भनुके पञ्चम पुत्र ) नरिप्यन्तके पुत्र शक 
हृ ओर ८ मनुके द्वितीय पुत्र ) नामागके पुत्र राजराजेश्वर 
अम्बरीष हुए ॥ २८ ॥ 
ध॒ष्णोस्तु धाक क्षत्रं य वभ ह । 
करूषस्य तु कारूषाः क्षिया : ॥ २९ ॥ 
खट क्षन्नियगणो विक्रान्तः सम्बभूव ह । 
नाभागारिष्टपुताश्च क्षबिया वैदयतां गताः ॥ २० ॥ 
( मनुके तृतीय पुत्र ) धृष्णुके धार्ष्टकं नामक क्षत्रियं 
हए । वे रणम दढीठ ये । (मनुके आवें पुत्र ) करूषसे करूप 
नामव युद्धदुम॑द क्षत्रिय हुए । यदह हजारो क्षत्रिरयोका 
मण्डर परम पराक्रमी था । ( मनुके सप्तम पुत्र ) नामागारिष्ट- 
कै क्चन्निय पुत्र वैशय दो गये ये# ॥ २९-३० ॥ 
पराशोरेकोऽभवत्‌ पुः शयौतिरिति बिश्युतः । 
भरिष्यतस्य दायादो राजा दण्डधये दमः। 
क्षयौतेर्मिथुनं चाखीदानतों नाम विश्वुतः ॥२३१९॥ 
पुत्रः कन्या छुकन्थाख्या या पत्नी च्यवनस्य ह। 
आनर्तस्य तु दायादो रेवो नाम मष्द्युतिः ॥ ३२॥ 
८ मनुके छठे पुत्र ) परां्चके एक पुत्र हयाः वह शर्याति 
नामसे प्रसिद्ध था ¡ ( मनुके पञ्चम पुत्र ) नरिष्यन्तका पुत्र 
दण्डधारी राजा दम हया । ८ मनुके चौथे पुत्र ) शर्यातिकी 
दो संतान उत्पन्न हुई; उनम एक तो पुत्र थाः जो अनर्व 
नामसे प्रसिद्ध हुमा ओर एक कन्या थी जिसका नाम सुकन्या 
था । वह च्यवन ऋषिकी पत्नी हृरद । आनर्तक रेव नामका ` 
मदाकान्तिमान्‌ पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ ३९-२३२॥ 
आनतंविषयश्चासीव्‌ पुरी चास्य कुद्रास्थली । 
रेवस्य रेवतः पुः ककुष्री नाम धार्मिकः ॥ २३ ॥ 
उसका राव्य आनसं ( जरा आज द्वारका है ) देशम 
था यौर उसकी पुरी ( राजघानी ) का नाम कुरसखली ( आजकी 
द्वारकापुर ) या । रेवके पुज रेवत हए, शर्हीका दूसरा 
नाम क्कुग्री था | ये धार्मिक ये॥ ३३॥ 
व्येष्ठःपु्र्वस्यासीद्‌ राज्यं पराप्य कुशस्थलीम्‌) - 
५.कन्यासदिवः श्रुत्व ानयनंनहमणोऽन्विके ॥ ३७॥ 
# युद्धम हार जनिके कारण क्षत्रिय दोनेपर मी इनका नाना 
भपनेको वैदय कहता था; अतः देसी वैद्यपुत्रीके पुत्र नेसे ये वैश्य 


४1 ॥ ५4 
कषाये ! श प्रन्धके ग्यार्वं जघ्यायके नवे छोक्की रिम्पणीमे श्सका 
पूर्णं घमाषान द३। 


हरिषिंदापवं ] 


मु्त॑भूतं देषस्य गतं बहुयुगं प्रभो । 
आजगाम युवैवाथ स्वां पुर यादवैदंताम्‌ ॥ ३५॥ 
` (रेखक ) री पुोभि ये सत्रसे ज्येष्ठ थे । कुशस्थलीका राज्य 
पानेके.अनन्तर एक दिन ये अपनी कन्याके साथ (ब्रह्मलोक ) 
गये, वर्ह ब्रह्माजीके समीप गन्धर्वोका गीत सुनने ख्गे। 
राजन्‌ }! संगीत खनते-युनते ये दौ घड़ी वरहा ठरे रदे । 
इतने ही समयमे मानवलोकमे अनेक युग वीत गये । 
तसश्वात्‌ ये थादवेसि धिरी हु अपनी पुरसमे अये । 
उस समयतक इनकी युवावस्था ग्यो-कीत्यो वनी 
हुई थी ॥ ३४.३५ ॥ 
छतां दारवतीं नाम्ना बहुद्धारां मनोरमाम्‌ । 
भोजवृष्ण्यन्धकैगतां  बाखदेचपुरोगमेः ॥ २६॥ 
( उस समय उस पुरीम ) बरहुत-ते दरवाजे चन गये थे 


पकाद्‌दो ऽध्यायः 


७३. 


ओर वासुदेव आदि भोज, ब्ृभ्णि ओर अन्धकवंशी उस 
रमणीय परीकी रक्षा कर रदे ये | यादर्बोने उसका नाम 
त्रदखकर दारवती रख दिया था ॥ ३६ ॥ ॥ ९ ॥ मवम 

ततः सर रेवतो श्षात्वा यथातच्वमेरिंदम । 
कन्यां तां यख्देवाय सुतां नाम रेवतीम्‌ ॥ ६७ ॥ 
दत्त्वा जगाम हिखरं मेरोस्तपसि संस्थितः । 

रेमे रामोऽपि धमौत्मा रेवत्या सितः खुखी ॥ २८ ॥ 


शन्ुमरद॑न ¡ इन सत्र वातोको यथार्थ सौतिते जानकरराजा 
रेवत अपनी रेवती नामकी सुत्रता कन्याको बल्देवजीके हाथमे 
देकर खयं मेरपर्वतके शिखरपर चरे गये ओर बर्हा 
तपस्यामे खग गये । ( इधर ) धर्मात्मा बल्रामजी भी रेवतीके 
साथ सुखपूर्वक विहार करने रमो ॥ ३७-३८ ॥ 


इति श्रीमहाभारते खिरुभागे हयिवंशे हरिवेदापर्वणि णेरोत्पत्तिव्णनं नाम दङ्षामोऽध्यायः ॥ १० ॥ 
दस प्रकार श्रीमहामापत चिरुमाग हरिवशके अन्तर्मत ट्रिलजपरवमे पुरूरवाकी उत्पत्तिका 


व्ण॑नविषयक दसर्व भष्याय पुरा हुभा ॥९० ॥ 
^ 


एकादशोऽध्यायः 
घुन्धुमारकी कथा ५ - ` 


जनमेजय उवाच 
कथं बहुयुगे कारे सम्रतीते द्विजोत्तम । 
न जरा रेवतीं प्रात्ता रैवतं च ककुद्चिनम्‌ ॥ २ ॥ 
जनमेजयने पखा--द्विजोत्तम ! ब्रहुत-से युगोका 
समय ब्रीत जानेपर मी रेवती ओर ककुदी रैवतको बुदापा 
क्यो नहीं ज्यात हुआ १॥ १॥ 
मेर गतस्य वा तस्य शार्याते संततिः कथम्‌ 
स्थिता पृथिव्यामद्यापि श्रोतुमिच्छामि तत््वतः॥ २ ॥. 
शर्यातिके पपौत्र रैवत मेर्पर्वतपर चले गये, तव 
भी उनकी संतान आजतक परथिवीपर से वर्तमान है १ इस 
बातको मेँ यथार्थं रीतिते सुनना चाहता दहर ॥ २॥ 
वैशम्पायन उवाच 


न जरा श्चुत्पिपासे वा न मृत्युभेरत्ष॑भ । 
ऋतुचक्रं न भवति ब्रह्मलोके सदानघ ॥ २ ॥ 


वैशम्पायनजीने उत्तर दिया-निष्याप भरतशरे् ! 
त्रह्लोक्रमे मृत्युः भूख-प्यास ओर बुदापा नहीं होते ओर वर्ह 
ऋदठचक्र भी अपना प्रभाव नहीं दिखाता ८ वरहो तौ सदा 
एक-सी दा रहती है )। ॥ ३ ॥ 
ककुग्निनस्तु तं छोकं शेषवस्य गतस्य ह्‌ । 
हसा पुण्यजनेस्तात राक्षसैः सा कुदास्थली.॥ ७ ॥ 


तात | जवं रेवत ककुड्री ्रह्मलेकको चङे गये, तव 
यरो ओर राक्षसेनि कुरखखीको नष्ट-म्रष्ट कर दिया ॥ ४ ॥ 
तस्य आ्राठशतं चासीद्‌ धार्मिकस्य महात्मनः \ 
तद्‌ वध्यमानं रक्ोभिर्दिदाः प्राद्रवदच्युतम्‌ ॥ ५ ॥ 
धर्मात्मा एवं महात्मा रैवतके सौ भाई थे । वे राक्षसि 
हारि नदी, परंतु राक्षसंकि बार-बार आक्रमण करनेके कारण 
( अर्नेक ) दिशामि भाग गये ॥ ५ ॥ 
विद्भुतस्य तु राजेन्द्र॒ तस्य स्रातृातस्य वै । 
तेषां तु ते भयाक्रान्ताः ्चश्नियास्तत्न तत्र ॥ ६ ॥ 
राजेनद्र | जब उनके सौ भाई माग गये, तव उस कके 
अन्यु्षत्निय भी राक्षसेकि मयसे भागकर जरतो चरस गये॥६॥ 


अन्ववायस्तु सुमहा स्तज तञ चिक्ताम्पते । 
येषामेते मक्ाराज श्ायीता इति बिश्वुताः ॥ ७ ॥ 
क्षिया भरतश्रेष्ठ दिक्षु सवौ धार्मिकाः । 
सर्वेशः पवेतगणान्‌ प्रविष्टाः छुरुनन्दन ॥ ८ ॥ . 


प्रजानाथ ! उनका बडा मारी वंश जहीतहौ 
फर राया । महाराज { उनके वंशके ही ये धार्मिक क्षनिय 
सव दिशार्ओमि रार्यात नामसे प्रसिद्ध है |. भरतश्रेष्ठ 
करन्दन ! वे सव क्षत्रिय चारो ओरके पर्वतोकी कन्दराओमिं 
प्रविष्टिहो गये ये) ७.८ ॥ 


1} 


श्रीमहाभारते सिलभगे 


1 
1 


[ हिरो 


नाभागारिषपु्री दौ वैश्यौ ब्राह्मणतां गतो । 

करूषस्य च कारूषाः क्ष्निया युद्धदुर्मदाः ॥ ९ ॥ 
नाभाग ओरअरण्टके पुत्रये दोनो वैश्य होकर पुनः)# 

ब्राह्मणत्वको प्राप्त हो गये] करूषके कारूषनामक 

युद्धदुर्मद क्षत्निय उत्पन्न दए ॥ ९ ॥ 

भ्रादोरेको ऽभवत्‌ पुः परजातिरिति नः श्रुतम्‌ । 

पृथघरो हिंसयित्वा तु शुयो्ां जनमेजय ॥*१०॥ 

शापाच्छ्रद्त्यमापननो नवैते परिकीतिंताः। 

वैवस्वतस्य तनया मनोव भरतर्षभ ॥ ११॥ 
हमने सुना है किं ( मनुके छठे पुत्र ) पराके प्रजाति 

नामका एक दी पुत्र उत्पन्न हुआ था । जनमेजय | गुस्की 


इश्वाङस्तु विङस्षि वे सष्टकायामथादिशाव्‌ 1; 
मांसमानय श्राद्धार्थं खगान्‌ हत्वा मष्टाबलः ॥ १६॥ 
महात्रली द्वाङ्ुने अष्टका श्राद्धके ल्थि ( अपने पुत्र) 
विजुक्षिको आहा दी किं तू. मृग नामक कन्दविरोषको 
काटकर श्राद्धके ल्थि उसका गूदा ला ॥ १६ ॥ ¦ 
श्राद्धकर्मणि चोदिष्टमङ्ते श्राद्धकमेणि । 
भक्षयित्वा शशं तात शश्चादो सुगयागतः ॥ १७ ॥ 
परंतु तात | विकुक्षे श्राद्धकरमैके चि नियत विवि इए, 
शय (कन्दविरेष)को श्राद्ध पूणं होनेसे पहले ही खाकर उच्छिष्ट 
कर दिया ओौर शिकार करके वापस ीट आया ॥ १७ ॥ 


कष्वाङणा परित्यक्तो -वसिष्ठवचनात्‌ प्रभुः । 


द्वाफो संस्थिते तात शशादः पुरमावखस्‌ ॥ १८ ॥ ` 
उस समय इष््वाकुने वसिष्ठजीके कहनेसे दारादको 


त्याग दिया । तात [ फिर इश्वाकुके मरनेपर शशाद नगरम \. 
आया (ओर राज्यका स्वामीःवनकर राज्य करने रगा) ॥१८॥\ 


गौको मारनेपर ८ गुरुके ) शापसे पृषध्र श्ुदरत्वको प्रात दो 


गया था 1 भरत्षम | या तक वैवस्वत मनुके नौ पु्बोका 
मैने वर्णन किया ॥ १०-११॥ 


छ्षुवतश्च मनोस्तात द्वाकुरभवत्‌ सखुतः। 
तस्य पुत्रशतं त्वासीदिश्वाकोभूरिदश्चिणम्‌ ॥ १२॥ 


तात | मनुके छीकनेसे दश्वा नामक पुत्रकी उत्पत्ति 
हृ थी । उन दक्वाकुके भी सौ पुत्र उत्पन्न हए । 
ये सव-के-खव वदी-वदी दक्षिणा देनेबले ये ॥ १२॥ 


तेषां चिकुक्षिज्यंष्स्तु विङ्कक्षित्वादयोधताम्‌ । 
प्राप्तः परमधर्मक्षः सोऽयोध्याधिपतिः प्रभुः ॥ १३॥ 
उनम सवसे वड़ा पुत्र विकुक्षि था । यह विकरुक्षि-बिशाङ 
कोख ८ वक्षःस्थल ) वास होनेसे स्व॑था अयोध्य था; अर्थात्‌ 
उसके सामने कोई योद्धा ठहर नहीं सकता था । बही परम 
धामिक राजा विकुक्षि अयेोष्याका स्वामी हुमा ॥ १३॥ 
शाुनिप्रप्रुलास्तस्य पुताः पञ्चाशदुत्तमाः। 
उच्तरापथदेशस्था रक्षिता महीपते ॥ १४॥ 
-राजन्‌ } उसके रकुनि आदि पचास उत्तम पुत्नथे, वे 
उत्तरापथ देशम रहकर उस देशकरी रघा करते ये ॥ १४॥ 
चत्वारिदादथाछौ च दक्षिणस्यां तथा दिशि । 
शाशादव्रसुखाश्चान्ये रक्षितारो विश्चाम्पते ॥ १५॥ 


जनेश्वर उसके शाद आदि अढताखीस् पुत्र दक्षिण 
दिदामं रदकर दक्षिण दिराकी रक्षा करते ये ॥ १५ ॥ 


# माद्नातयः पुत्राः स्यु--पुव माताकी जापक होते % श 
शास्य वचने वैद्य-स्थीमं उत्पन्न ्ोनेके कारण ये पुत्र वैश्य 
कषटटति यै ओर त ॒वैश्य-स्रीका पिता भी -क्षत्निय था, परंतु 
सभरामर्मे शुभेसि हार जानेके कारण अपनेको वैय कहने छग 
धा! श्छ कथाका विस्तृत वणन माकंण्डेयपुराणके ११३ वै अध्याये । 


शरादस्य तु दायादः कङ्कु्स्यो नाम वीर्यवान्‌ । 
इन्द्रस्य चृषभूतस्य ककुत्स्थो ऽजयताखुरन्‌ ॥ १९ ॥ 
पूं देवाश्छुरे युद्धे कक्ुरस्थस्तेन हि स्यतः । 
अनेनास्तु ककुत्श्यस्य परथरानेनसः स्मरतः ॥ २० ॥ 
रारादके ककुत् नामवाख वीर्यवान्‌ पुत्र उत्पन्न हुआ 
उसे पहले देवासुरसंग्रामे इन्द्रने स्मरण किया था 1 उस 
समय उसने इन्द्रको वैर बनाकर उनके कडुद्‌ (पीठ) पर बैठ- 
कर असुरोको जीता था; इसस्थि इसका नाम ककुत्ख हुआ । 
कठुत्थके अनेना नामक पुत्र हुआ ओर अनेनाका पुत्र ध्रु 
हआ ॥ १९-२० ॥ 
विष्टयभ्वः पृथोः पुष्रस्तस्मादाद्रंस्त्वजायत । 
आद्र॑स्य युवनाश्वस्तु ्रावस्तस्य तु चात्मजः | २९॥ 
पृथुके विष्टराश्च ओर विष्टसाश्चके आद्र नामक पुत्र 
उत्पन्न हुआ, आर्द्रके युवनाश्च ओर युवनाश्वका पुत्र श्राव 
हज ॥ २१॥ 
जक्षे भावस्तको राजा भावस्ती येन निर्मिता । 
श्रावस्तस्य तु दायादो इहदश्वो मष्टायश्षः ॥ २२॥ 
वह श्रावसक नाम धारण करके राजसिंह्यसनपर बैठा; 
उसीने श्रावस्तीपुरी वसायी । श्रावस्तका पुत्र महायशस्वी 
बृहदश्च हुआ ॥ २२॥ 
कुवलाश्वः खुतस्तस्य राजा परमधार्मिकः । 
यः स शुन्धुवधाद्‌ राजा धुन्घुमारत्वमागतः ॥ २३ ॥ 
उसका पुत्र परमधोर्मिक राजा कुवलाश्व हुआ, घुन्धु- , 
नामक दैत्यक्रो माखेके कारण बह राजा ्ुन्धुमारः नामसे भी 
प्रसिद्ध हुञा ॥ २३ ॥ 


हरिव'शपर्वं 1 


पकाददोऽभ्यायः ` 


& 


४५ 


जनमेजय उवाच 
धुन्धोर्वधमषटं ब्रह्मज्छरोतुमिच्छामि तत्वतः 
यव्‌थ कुवलाश्वः सन्‌ धुन्धुमास्त्वमागर्तः ॥ २४ ॥ 
जनमेजयने कहा-चद्यन्‌ ! मै धुन्धुके वधकी उस 
कथाको यथार्थं रीतिसे सुनना चाहता ह, जिससे कुवलश्वका 
नाम धुन्धुमार पड़ गया था ॥ २४॥ 
वैशम्पायन उवाच 
कुवलाभ्वस्य पुत्राणां हतमुत्तमधन्विनाम्‌ । 
सवं विधाञु निष्णाता बलवन्तो दुससश्षः ॥ २५ ॥ 
वैशस्पायनजी वोे--ऊुवलश्वके धनुर्धारियेमि श्रेष्ठ 
सी पुत्र थे | वे सभी समस्त विद्याओंमे निपुण, बल्वान्‌ तथा 
दुर्दम्य थे ॥ २५॥ 
बभूवुधीर्मिकाः सवं यञ्वाने भूरिदक्षिणाः । 
कुवलादवं खतं राज्ये बृहदश्वो न्ययोजयत्‌ ॥ २६॥ 
वे समी धार्मिक पुत्र यन्न करके ब्रहुत-सी दक्षिणा दिया 
करते ये |, बृहदश्वने अपने ज्येष्ठ पुन्न कुवलश्वको राज- 
सिंहासनपर बैठाया ॥ २६ ॥ 
पुजरसंक्रामितभीस्तु वनं राजा समाधिक्त्‌। 
तसुत्तङ्धोऽथ विप्र्षि;ः प्रयागं प्रत्यवारयत्‌ ॥ २७ ॥ 
अपनी राज्यलक्षीको पुत्रके अधीन करके राजा बृहदश्व 
स्वयं वनको चले ¡ उस समय ब्रह्मपरं उनत्तङ्कने उन्हे वने 
जानेसे रेका ॥ २७ ॥ 
उत्तङ्क उगत 
भवता रक्षणं कायं तत्‌ तावत्‌ कर्तुमर्हसि । 
निरुदधिम्मस्तपश्चतुं न हि श्ाक्तोषि पार्थिव ॥ २८॥ 
उचङ्क ऋषिने कह्या--राजन्‌ ! हमारी र्षा करना 
आपका कर्तव्य है; अतः पहले वदी कीज्पि । अन्यथा आप 
निश्चिन्त होकर तप नहीं कर सकते ॥ २८ ॥ 
त्वया हि पृथिवी राजन्‌ रक्ष्यमाणा सदहात्पना 
भविष्यति निरुद्धिम्ा नारण्यं गन्तुमर्हसि ॥ २९ ॥ 
राजन्‌ |} जब आप-जेसे महात्मा इस प्रध्वीकी रक्षा 
करेगे तमी इस पृथ्वीपर शान्ति होगी; अतः आपका वन- 
मे जाना उचित नर्हीहै | २९॥ 
पाटने हि महान्‌ धर्मः प्रजानामिह हद्यते । 
न तथा ददयतेऽरण्ये मा ते भूद्‌ बुद्धिरीदरी ॥ ३० ॥ 
हम देखते द करि यदय रहकर प्रनाका पालन करनेसे 
आपको महान्‌ पुण्य होगा | वनम रहनेपर एसे पुण्यकी प्राति 
आपको होः यह दमे महीं दीखता । इसल्यि.आप रेसा 
विचार न करे ॥ ३०.॥ 
ददशो न हि राजेन्द्र धर्मः कचन द्यते । 
प्रजानां पालने यो वै पुय राजिभिः छृतः। 
रक्षितव्याः प्रजा यशा तास्त्वं रक्षितुमर्हसि ॥ ३१॥ 


राजेनद्र ! प्राचीन कार्य राजररियेनि प्रजारओका पालन 
करे सैखा पुण्य-संचय किया दै, वैसा पुण्य ओर कदीं नहीं 
दिखायी देता । राजाको श्रजाओंकी र्षा करनी चायः 
अतः आप प्रजाकी रघ्चा करे ॥ ३९॥ 
ममाश्रमसमीपे शि समेषु मरुधन्यसु 1 
समुद्रो बादुकापूर्ण उज्ञानक ति श्चुतः! . 
देवतानामवध्यश्च महाकायो महावलः ॥ ३२॥ 
अन्तभूमिगतस्तत्र वालुकान्तर्हितो महान्‌ । 
राश्चसस्य मधोः पुच्रो धुन्धुनामा महासुरः 
शेते छोकविनाश्षाय तप आस्थाय दारुणम्‌ ॥ ३३ ॥ 
मेरे आश्वमके समीप मरुप्रदेशकी समतल भूमिम से 
मरा हुभा उज्जानक नामवाला समुद्र दै । वहीं एक विशाल- 
काय महाबली रक्षस रहता है, जो देवता्क्रि व्यि भी 
अवध्य है । वह महान्‌ असुर मधु नामक राक्षस्का पुत्र है । 
उसका नाम धुन्धु है बह वहो पृरथ्वीके भीतर बाद 
छिपकर सोता है ओर सम्पूणं लोर्कोका संहार करमेके व्यि 
कठोर तपस्या कर रह! है ॥ ३२.३३ ॥ 
संबत्छरस्य पयेन्ते स निःश्वासं प्रमुञ्चति । 
यवा तदा भूश्चलति सशेकवनकानना ॥ ३४ ॥ 
वैह एक व॑ ्रीतमेपर जव बडे जोरसे ससि छोडता दै, 
उस समय पर्व॑त ओर वनोसहित सारी प्रथिवी डोलने 
ख्गती हे ॥ २४ ॥ 
तस्य निःश्वासवातेन रज उद्धूयते महत्‌ । 
भदित्यपथमाचृत्य सपाहं भूमिकम्पनम्‌ ॥ २५ # 
उसके श्वासकी वायते बड़ी मारौ धूलि उद्ती है, 
सूयके मार्गको भी ठक ठेती दहै; साथ ही एकर सपताहतक 
भूकम्प होता रहता है ॥ २३५ ॥ 
सविस्फुलिङ्गं साङ्गारं सधूममतिदारुणम्‌ । 
तेन तात न शक्तोमि तसिन्‌ स्थातुं खकाधमे 1 २६॥ 
तात } ( उस समय प्रथिर्वमिसे ) चिनगाि्यो, अंगे 
ओर अत्यन्त दारण धुर निकलने र्गते है ! इसल्ि तात ! 
मै अपने आश्रमम ८ सपूर्वं ) नहीं रह पाता ॥ २६ ॥ 
तं मास्य महाकायं. लोकानां हिचकाभ्यया । 
लोकाः स्वस्या भवन्त्व तस्मिन्‌ विनिदते ऽस्रे॥ ३७ ॥ 
आप छर्कोका हित करमेकी इच्छासे उस विशार शरीर- 
वले दैत्यका संहार करे, आज उस असुरे मारे जनिपर 
सत्र छोग सुखी दो जर्ये |! ३७ ॥ 
त्वं हि तस्य वधायैकः समर्थः पृथिवीपते । 
विष्णुना च वरो दत्तो मद्य पूर्वयुगेऽनघ ॥ ३८॥ 
पृथिवीपते | एक आप ही उसक्रा वधं कृर सकते ई, 
करयोकरि निष्पाप नरेश ! भगवान्‌ विष्णुने पठे युगम मुभे 
एक वर दिया था॥ ३८ | 


४६ 


श्रीमहाभास्ते खिकभागे 


॥ 
८ 
[ दपिविंशे 


यस्त्वं महासुरं रौद्रं हनिष्यसि मदायलम्‌ । 

तस्य त्वं वरदानेन तेज आप्याययिष्यसि ॥ २९ ॥ 
मगवान्के उस वरदानकरे अनुसार जवर प्रि ( ययोध्याके 

राजा ) आप इस महावटी भयंकर दानवका संहार करगे; 

अपने तेजकरो ८ वैष्णव तेजये ) परिपुष्ट कर खगे ॥ ३९ ॥ 

न हि धुन्धु्महातेजास्तेजसाल्पेन शक्यते । 

निद॑ग्धुं पृथिषधीपार स हि वर्पशयतैरपि। 

चीर्यं॑हि सुमहत्तस्य देवैरपि इुरासदम्‌ ॥ ४०॥ 
प्रथिवीपाल ! महातेजस्वी धुन्धुको अल्प तेजवाला पुरर 

सौ वर्ष्म मी नहीं मार सकता । उस्म इतना अधिक बलद 

करं दैवता्कि ल्ि मी उसे दवाना कठिन है ॥ ४०॥ 

ख पवमुक्तो राजर्षिरुत्तद्टेन मदात्मना । 

कुवलादवं खतं प्रादाद्‌ तस्मै धुन्धुनिवारणे ॥ ४९ ॥ 
महात्मा उन्तद्धने जत्र उन राज्षिते इस प्रकार कदा, तव 

उन्देनि धुन्धु दैत्यको नष्ट करनेके ल्थि अपने पुत्र कुवत्मश्च- 

को उनकी सेवम दे दिया ॥ ४१ ॥ 

उहदधच उवाच 

भगवन्‌ न्यस्तश्ाखरोऽदमयं तु वनयो मम। 

भविष्यतति द्विजधेषठ धुन्धुमारो न संशयः ॥ ४२॥ 
बृहद्वते कहा-भगवन्‌ ! मेने तो शखर व्याग दिये 

ह कंठ द्विजश्रेष्ठ ¡ यह मेरा पुत्र (आपको समर्पित) दै, यह 

अवक्द्य धुन्धुमार होगा ॥ ४२ ॥ 

स तं व्यादिद्य तनयं रजपिंधुन्धुमारणे । 

जगाम पर्वतायैव तपसे संरितव्तः ॥ ४३ ॥ 
( यह ककर ) प्रशंसनीय रतव वे रामर अपने 

पुत्रको धुन्धुक्रां वथ करनेकी आचा देकर स्वयं तप करनके 

चयि पर्वतपर च्छे गये ॥ ४३॥ 

कुवलाश्वस्तु पुत्राणां शतेन सह पा्थिवः। 

प्रायादुश्चङ्कसहितो धुन्धोस्तस्य विनिध्रहे ॥ ४४॥ 
तव राजा कुवत्मश्च अपने सौ पुर्न ओर उत्तङ्कको 

साथमे लेकर धुन्धुको दण्ड देमेके च्ि चठ दिये ॥ ४४] 

तमाचिश्यत्‌ तदा विष्णुर्भगवांस्तेजसा श्रुः । 

उत्तङ्कस्य नियोगाद्‌ वै खोकस्य हितकाम्यया ॥ ४५॥ 
उस समय भगवान्‌. विप्णु उत्तङ्क आभिकी प्रेरणासे 

लोकोका हित करनेके च्यि अपने तेजःस्वरूपसे उस राजाके 

दरी प्रत्रिष्ट हो गये ॥ ४५ ॥ 

तस्िन्‌ भ्रयाते दुर्धषं दिवि शब्दो महानभूव्‌ ! 

प्रथ श्रीमानवध्योऽच धुन्धुमारो भविष्यति ॥ ४६॥ 
तव उस दुर्धषं राजाके पस्थान ` करमैपर आकादामे 

गम्भीरं वाणरी-खुनुयी दी करि े श्रीमान्‌ राजा अवध्य हः आज 

इनके हाथसे धुन्धु अवद्य मारा जायगाः ॥ ४६ ॥ 


दिन्यैम््िश्च नं देवाः समन्तात्‌ समवाकिरन्‌ । . ` 
देवदुन्दुभयश्चापि प्रणेदुर्मरत्पभं ॥ ४७॥ 
भरतर्थम ¡ तदनन्तर देवता्थेनि अपनी दुन्दुमिर्यो बना- 
कर उनक्रे ऊपर चारो ओरसे दिव्य पुर््पोकी व्षाकी ॥४७॥ 
स गत्वा जयतां श्रेष्ठस्तनयैः सह वीर्यवान्‌ । 
समुद्रं खानयामास वाटुक्रा्ण॑वमव्ययम्‌ ॥ ४८ ॥ 
विजय पनेवार्खमि श्रेष्ठ वह वीर्यवान्‌ राजा अपने 
प्रोकि साथ व्हा पर्हुवकर अपार रेतेते भरे हए सपरद्रको 
खुदवने चगो ॥ ५८ ॥ । 
नारायणेन कौरव्य तेजसाऽऽप्यायिचः स वै । 
वभूव स महातेजा भूयो बलसमन्वितः ॥ ४९॥ 
कौरव्य ! वे महाव्रली राजा मगवान्‌ नारायणके तेजसे युषट 
होनेके कारण ओर भी अधिक तेजस्वी हो गये ॥ ४९॥ 
तस्य पुत्रैः खनद्धिस्तु वादुकान्तर्हितस्वदा । 
धुन्धुससादितो राजन्‌ दिशमाचृत्य पश्चिमाम्‌ ॥ ५० ॥ 
राजन्‌ | धरती खोदते हुए कुवत्यश्वपु््रोनि घ्राद्धके भीतर 
चिषे हुए धुन्धुका पता ख्गा च्या । वह पश्चिम दिशाको 
पेरकर पडा था ॥ ५०॥ 
भुखजेनाश्निना क्रोधाहोकाञुद्तयन्निव । 
वारि सुस्राव वेगेन महोदधिरिवोदये ॥ ५९१॥ 
सोमस्य भस्तघ्रे्ठ॒॒धायोर्मिकलिटं मष्टत्‌ । 
वस्य पुश्रह्यतं दग्धं त्रिभिरूनं तु रश्चसा ॥ ५२॥ 
नध अपने मुखकी आगसे सम्पूर्णं लेोर्कोका संहार्सा 
करता हुआ जल्का शोत बहाने लगा । भरतश्रेष्ठ | जैत 
चन्द्रमाके उदयकारूम समुद्रम ज्वार आतां दहै, उसकी 
उत्ता तर बने स्गती ई, उसी प्रकार वरदो धाराः लहर 
ओर कीचढते युक्त महान्‌ जल्खोत वेगपूर्वक बद्ने लगा} उस 
रा्रसने कुवलश्वकरे सौ पुर्वेभिसे तीनको छोडकर शेष्र सव्रको 
अपनी भुखामिते जलकर मस कर दिया ॥ ५१-५२॥ 
ततः स राजा कौरग्य राक्षसं तं मदावलम्‌ । 
आससाद महातेजा धुन्धुं धुन्धुनिव्हणः ॥ ५३ ॥ 
करन्दन ! तव धुन्धुका संहार करनेके व्यि अयि हुए वे 
महातेजस्वी राजा उस महात्री राक्षसके सामने पहुचे ॥५३॥ 


तस्य वारिमयं वेगमापीय सख नराधिपः। 

योगी योगेन वहि च शमयामास चारिणा ॥ ५४॥ 
फिर उन योगी नेशन योगके प्रमावसे उस्के जलमय 

वेगको पी छिया तथा जक्ते अभिको गन्त कर दिया| ५४ | 


निहत्य तं महाकायं वलेनोदकराश्चसम्‌ । 
उत्तङ्कं दशयामास -रृतकमी- नराधिपः ॥ ५५॥ 
इस प्रकार उस विश्ञाल रारीरवाठे जल-राक्षसको बल- 


ह 


शवशप ] 


दादश ऽध्यायः, 


89 


11 


पूर्वक मारकर राजाने अपना काम पूर्णं करके उस मरे 

हए रक्षसको उत्तङ्क ऋभिको दिखाया ॥ ५५ ॥ 

उत्तङ्कस्तु वरं प्रादात्‌ तस्मे रक्ते म्त्मने । 

ददौ तस्याक्षयं वित्तं शन्रभिश्चापराजयम्‌ ॥ ५६ ॥ 
उस समय उन्तङ्कने उन महत्मा रजको बर्दान 

दिया करि अपके पास अध्य धन रहेगा तथा शाचुरओंसि 


--------~ ---------- 


~~~ 


आप कमी पराजित नदीं हेगि ॥ ५६॥ 

धमे रति च सततं ` स्वगंवासं तथाक्षयम्‌ । 

पुरणं चाक्षर्योट्ोक(न्‌ सवग ये रस्लसा हताः ॥ ५७ ॥ 
भ्धर्मपर आपकी श्रद्धा सर्वदा बरनी रहेगी तथा आप्र 

अनन्त कार्तक स्वर्गे रहैगे । साथ दही राक्षसे आपके जिन 

पुकि मार डाला है, उन भी स्वर्गमे अक्षय रोक मिेगे".॥ 


इति श्रीमहाभारते खिरूभागे हरिशे हरिवंशपर्वणि धुन्धुवधे एकादशोऽध्यायः ॥ ११ 1 
` इस प्रकार श्रीमद्ामारत दिमाग दस्तक भन्तपन दशिविदापर्वमे घुन्धुवध विषयक ग्यारह; अस्थाय पुरा हुमा ॥ ९९ ॥ 


दाद्शोऽप्यायः | 
धुन्धुमारके षंशका वणन ओर गारवफी उत्पत्ति 


वैश्चम्पायन उवाच 


त॑स्य पुश्राखयः शिष्ठा उडाश्वो ज्येष्ठ उच्यते । 
चदद्राभ्वक्पिराभ्वो तु कुमारौ दधौ कनीयसो ॥ ९ ॥ 
वैशम्पायनजी कते है--राजन्‌ ! उन (धुन्धुमार ) 
के तीन पुत्र वेच श्ये ये, जिनमे दडाश्च ससे बडा था तथा 
चन्द्रश्च ओर कपिलश्च दो छोटे ये ॥ १ ॥ 
धोन्धुमारिरददाश्वस्तु दर्यभ्वस्तस्य चात्मजः ! 
हर्यश्वस्य निकुम्भो ऽभूत्‌ क्षत्रधर्मरतः सदा ॥ २ ॥ 
 धुन्धुमारके दाश्च, दढाश्चके हरयश्च ओर हरयश्वके निकुम्भ 
नामक पुत्र हुआ, जो सदा क्षत्रियधर्मम तर रहता था 1 २॥ 
संहताश्वो निकुम्भस्य पुत्रो रणविशारदः । 
अृ्एएश्वः छशाद्वश्च संदतार्वसुतौ चप ॥ ३ ॥ 
निकुम्भकरे संहताश्च नामक युर हुः जो युद्धकी कलमे 
निपुण था । राजन्‌ [ संहताश्वके अक्दाश्च ओर कृशाश्व नामक 
दो पुत्र हए ॥३॥ 
तस्य हैमवती कन्या - सतां माता दषद्यती । 
विख्याता च्रिषु छोकेषु पुधश्चास्याः प्रखेनजिष्‌ ॥ ४ ॥ 
उस ( संहताश्च ) की भार्या दिमवानकी पुत्री थी, जो 
तीनो लोकमि षद्रतीके नामसे प्रसिद्ध ह ! उसते - प्रतेनजित्‌ 
मामक पुत्र उत्पन्न हुआ था 1 वद शष्ठ पूर्नोकी 
अननी थी॥ ४1] 
लेमे भ्रसेनजिद्‌ भाय गौर नाम पतिव्रताम्‌ । 
अभिरता तु सा भां नदी वै वाहदाभवत्‌॥ ५ ॥ 
परसेनजित्की गोरी नामाली भार्यां थी । वह पतिव्रता 
यी } बह पतिक शाप दैनेपर बाहुदा नदी दो गयी ॥ ५ ॥ 
तस्याः पुरो महानासरीद्‌ युवनाश्वो महीपतिः । 
मान्धता युवनाश्वस्य भिलोकविजयी सुतः ॥ ६ ॥ 
॥ 


उसके पुत्र महाराजे युवनाश्व थे; युवनाश्चके त्रिखोक- 
विजयी मान्धाता नामक पुत्रे हआ ॥ & ॥ 
तस्य चैश्ररथी भार्या श्चश्शविन्दोः खुताभवव्‌। 
साध्वी बिन्दुमती नाम सूपेणासरश्ती मुवि ॥ ७ ॥ 
यरविन्दुकी पुरी बिन्दुमती, जिसका दूसयो नास चैत्ररथी 
थाः मान्धाताकी मारयां थी । बह साध्वी परथ्वीमे अनुपम 
रूपवती थी ॥ ५ ॥ 
पतिव्रता च ञ्येष्ठा च श्रावृणामयुतस्य स्ता । 
तस्यासुत्ा्यामास मान्धाता द्वौ खुतौ खप ॥ ८ ॥ 
पुरुङकत्सं च धर्मक सुशुङन्दं च धार्मिकम्‌ । 
पुरकुत्सतस्त्वासीत्‌ खद स्युर्महीपतिः ॥ ९ ॥ 
उसके दस हजार भाई थे ओर वह पिबता उनम सबसे 
बड़ी थी । राजन्‌ { मान्धाताने उसके ग्म॑से धर्मज्ञ पुशकुत्स 
ओर धार्मिक मुचुकुन्द-इन दो पु््रोको उन्न किया। पुरकुत्स- 
का पुत्र राजा तरसदस्यु हआ ॥ <९॥ 
नम॑द्प्यामथोत्पन्नः सम्भूतस्तस्य चात्मजः । 
सम्भूतस्य त॒ दायादः दधुधम्वा नाम पार्थिवः ॥ १०॥ 
धरसदस्युके नर्मदा नामवाली श्ीके गर्मसे सम्भूत नामक 
पुत्र उन्न दुभा । सम्भूतका पुत्र सुधन्मा नामक राजा था ॥ 
खधन्वनः छखतश्चासीत्‌ जिघन्वा रिपुमर्धेनः । 
राकखिधस्वनस्त्वाखीद्‌ विदां खय्यारूणः सुतः॥ ११ ॥ 
उधन्वाके न्रिधन्वा नामक पुत्र हआ, ओ शतरर्ओका मर्दन 
करनेवाला थां । राजा त्रिधन्वाके तय्याङ्ग नामक विद्वान्‌ 
पुत्र हुभा॥ १९॥ 
तस्य सत्यव्रतो नाम कुमारो ऽभूत्महावसः । 
पाणित्रहणमन्व्ाणां विघ्नं चक्रे खदु्मतिः ॥ १२॥ 
य्यासणके सत्यव्रत नामवाल्य महावर कुमार्‌ हुआ । उसकी 


४८ 
शुद्धि बडी खोटी थी} वह्‌ ( परख्रीदरणद्वास ) विवाहके 
मन्ति विन्न डालने ठ्गा|॥ १२॥ 


येन भार्या ता पूर्व कृतोद्वाहा परस्य व 
-वाल्याद्‌ कामाच्च मोदा्च संहपौष्यापटेन च।॥ १३॥ 
उसने वाटकपनः कामः मोद, दर्यं ओर चपटताके कारण 
किसी दूसरे (नागरिक) की वरिवादिता जीको छीन लिया था ॥१३॥ 
सहार कन्यां कामात्‌ स कस्यचित्‌ पुरवासिनः 
अधर्म्ाह्कुना तेन राजा त्रय्यारणो.ऽत्यजत्‌॥ १४॥ 
धपष्वंसेति बहुषो बदन क्रोधसमन्वितः 
पितर सो ऽव्रवीव्‌ त्यक्तः फ गच्छामीति वे सुहुः॥ १५॥ 
सी प्रकार उसने कामके वर्मे दोकर एक पुरवासीकी 
कन्याको हर लिया था। इस पापरूपी कीर्ते विद्ध दोनेके 
कारण राजा प्रय्यारुणने क्रोधरम उत्ते बार-बार कदा--'ओ 
नीच ! भाग जा यदेति | पितकरे त्याग देनेपर उसमे वार 
चार उनसे पूष्टा-- करदो जाऊँ  ॥ १४.९५ ॥ 
पिता चेनमथोवाच श्वपाकः सष्ट॒वर्तय । 
नादं पुत्रेण पुत्रार्थी त्वयाद्य छुर्पांसन ॥ १६॥ 
तव उसके पिताने कदा--“ओ छुख्कठंक [ जा तू श्वपार्को# 
कै साथ रदः म तु्च-जेते पुमे पुतवान्‌ बनना नदीं चादताः॥ 
इत्युक्तः स निराक्रान्नगराद्‌ वचनाच्‌ पितुः । 
नच तं चारयामास घसिष्ठो भगवागरषिः ॥ १७ ॥ 
पित्ताके स प्रकार कूनैपर वह उनके कथनानुसार 
नगरते ब्राहुर निकलठ गया । उस समय भगवान्‌ वसिष्ठ ऋछष्रि- 


ने भी उसके पिताको इख प्रकार कमेत नदीं मेका ॥ १७ ॥ 


स तु सत्यवतस्तात श्वपाकावसखथाम्तिके । 

पिश्रा व्यकोऽचसद्‌ धीरः पिता तंस्य वनं ययौ ॥ १८ ॥ 
तात { धीर सत्यव्रत पिताकरे त्याग देनेपर चाण्डार््ेकी 

यस्तीमे रदने ठ्गा ओर उसके पिता अय्या्ण ८ विरक्त 

हकर ) घनकरो चठे गये ॥ १८॥ 


श्रीमहाभास्वे खिकभागे 


॥ 
[ हरिवंशे 


जै 


ततत्तस्मिस्तु विष्ये नावर्प॑त्‌ पाकशासनः 1 
समा द्वादश राजेन्द्र तेनाधर्मेण वे तदा १९॥ 
राजेनद्र ! उस खमय उस देद्मे (उस कन्यादररणल्य ) 
अधर्मके कारण इन्द्रने बारह वर्पोतक वर्षां न्दी की ॥ १९॥ 
दासस्तु तस्य विपये विश्वामिरो महातपा; । 
संन्यस्य सागरानूपे चचार चिपुलं तपः ॥ २० ॥ 
उस समय महातपस्वी विद्वामित्नर मी सदयन्रतके उस 
देम अपनी स्रीको न्यास ( धरोहर ) के रूपम रखकर 
समुद्रके तटपर भयंकर तप करर्देये॥ २० ॥ 
तस्य पत्नी गे बद्ध्वा मध्यमं पुध्रमौरसम्‌ । 
शेषस्य भरणाथीय व्यक्रीणाद्‌ गोश्तेन चं ॥ २१ ॥ 
विदयामित्रकी खी अपे शेष कुटुम्के पाल्नके च्यि 
अपने मध्यम पुत्रके गले रस्सी धकर उसको सौ गौमकि 
मूृल्यपर बरेचनेकरे ल्ि लेकर धूमने ल्मी ॥ २१॥ 
तंतु बद्धं गले दष्ट विक्रीयन्तं छपात्मजः। 
मदर्पिषु्रं धमोत्मा मोक्षयामास भारव ॥ २२॥ 
भारत | धर्मात्मा राजकुमार ८ सव्यत्रत ) ने उस 
मदर्पिपुत्रको ग्ठेमे वधा तया विकता देखकर चछा 
च्या ॥ २२॥ 
सत्यवतो मषात्राहुभरणं तस्य चाकरोच्‌ । 
विश्वामित्रस्य तुष्चर्थमदुकम्पाथंमेव च ॥ २३॥ 
फिर महात्राहु सत्यवतने विद्वामित्रको संठ॒ष्ट करने ओर 
उनकी कृपा प्राप्त करनेके च्वि उस पुत्रका भरण-पोषण किया २३ 
सोऽभवद्‌ गावो लाम गल्वन्धान्महातपाः 
महर्षिः कौशिकस्तात तेन वीरेण मोक्षितः ॥ २४॥ 
वह महातपस्वी गेम बन्धन पद्नेके कारण गालव 
मामघे प्रसिद्ध ह्या † तात | ( इख प्रकार ) उत्त वीरने 
ऊुरिकवंशी महर्षिं ( गाख्व ) को ( इस आपत्तिसे ) मुक्त 
कियाथा॥ २४॥ 


इति श्रीमहममाते दिरुमगे रिवय हरिवंदपर्दणि गावीखतती द्ादक्षोऽव्यायः ॥ १२ ५ 
षस प्रकार ्रीमहामासत दिरुमाग दरिवशंके अन्तत इखिंशपरमे मास्वकी उत्पत्िविषयक यारहवँ भप्थाय पूरा हुमा ॥६२॥ 
(पि (> 
अयोदशोऽध्यायः 
त्रिश्ुके चरतरिका षर्णन तथा उनके वमे हस्थिन्द्र आदिका उन होना 


वैशम्पायने उवाच 


सत्यततस्यु भक्त्या च कपया च प्रविह्या ! 
विन्यामित्रकं रप्‌ बभार विनये स्थितः ५ १॥ 


# दरा ष्दाण्डाशडी प्‌ः यतिदं शमे ३। ` उक्बदन्न्स्वन्न्प्करा- ~ 


वैशस्पायनजी कष्ते है-राजन्‌ ! विश्वामित्रजीके 
प्रति श्रद्धा-मक्ति, उनके असहाय कदटुम्बके प्रति दयाभाव ` 
तथा अपनी की इ प्रतिस प्रेरित हो सत्यव्रत षिनय- , 


---------------------------------न- ~ ~~ ~~ 


'हरिवशषपवं ] 


पूर्वक विश्वामित्रजीकी स्ीका पालन क्से ख्गा॥१॥ 


हत्या मगान्‌ वराहश्च मद्िपाश्च वनेचरान्‌ । 
विश्वामिाश्चमाभ्यास्े मांसं वृक्षे घयन्ध सखः ॥ २ ॥ 
वह्‌ हदनेसे मिनेवले कंदविशेषः व्ररादी कंद तथा 
महि कंद आदि जंगली कंद-मूौको [काय्कर उनका गूदा 
विश्वामित्रके आश्म पासके दृक्षोमि बोध देता था॥२॥ 
उप्रद्युवतमास्थाय वीक्षां दादश्वापिकीम्‌ । 
पितुर्नियोगादवसत्‌ तस्मिन्‌ वनगते खपे ॥ ३ ॥ 
पिता (राजा) के वन चके जनिपर वारद व्पौकि व्यि 
वह चुपचाप ८ किसको विदित न हो इस प्रकार ) व्रत करने 
ल्गा॥३॥ 
अयोध्यां चेव रषं च तथेबान्तःपुरं मुनिः! 
याज्योपाध्यायसस्बन्धाद्‌ वसिष्ठः प्रस्त ॥ ४ ॥ 
इधर मुरेहिताई ओर यजमानीके सम्बन्धके कारण मुनि 
वसिष्ठ अयोध्याकी, शग्यक्री ओर रनिवासकी रक्ता के 
ल्गे॥४॥ 
सत्यवतस्तु वाटयाश्च भाविने ऽथंस्य वा वत्‌ । 
वसिष्ठेऽभ्यधिकं मन्युं धारयामास वै तदो ॥ ५ ॥ 
इधर सत्यव्रत अपनी मूर्खता या होनहारे कारण वसिष्ठ- 
जीके ऊपर अधिक कुपित रने ख्णा ॥ ५॥ 
पिघ्र! तु तं तदा रात्‌ त्यज्यमानं खमात्मजम्‌। 
न ॒बार्यामास सुनिर्वसिष्ठः कारणेन ह ॥ ६ ॥ 
परंतु मुनि वसिष्ठने तो उसके पिताकोः उनके द्वार 
अपे पुत्रके रज्यसे निकाले जते समय विरेष॒कारणक्श 
ही नदीरोकाथा॥६॥ 
पाणिग्रहणमन्नाणां निष्ठा स्यात्‌ स्मे पदे । 
"गं च सत्यव्रतस्तस्य तमुपां्यमदुध्यत ॥ ७ ॥ 
पाणिग्रहण अर्थात्‌ विवाहके मन्त सप्तपदीके पुण होनेपर 
पूण हृष्ट मनि जति है ! (इस पदले सीमे कन्यात्व ही रहता 
है; अतः वसिष्ठजी सत्यवतसे बारह वर्षोततक कन्यादरणका 
भायशित्त कराना चाहते थे ) । परंतु विष्ठजीके इस गूढ 
आरायको सत्यत्रत समन्च न खका ॥ ७॥ 
जानन्‌ धर्म षसिष्ठस्तु न मां घ्रातीति भारत । 
सत्यव्रतस्तदा रोषं वसिष्ठे मनसाकरोत्‌ ॥ ८ ॥ 
ध्वसिप्ठजी धर्मको जानते हैः तवर भी मेरी र्षा 
नहीं के ह 1 मारत ¡ यह बिचारकर सत्यतनत अपने मनम 
उनपर कुपित रहने खगा ॥ ८॥ 
गुणवुद्धया तु भगवान्‌ वसिष्टः तवां स्तथा 
ष॒ ख सत्यव्रतस्तस्य तसुपांड्ुमवुष्यत ॥ ९ ॥ 
भगवान्‌ वसिष्ठजीने तो गुणुदधिसे णे किया 


श्रयोदशोऽध्यायः 


४९ 


^ __ _ _--------------------~- न ~-------------------------------------------------------------- ज - 


था, परंतु सत्यतरत उनके इस गुप्त अभिप्रायको समन्न 
न स्का ९॥ 
तस्िन्नपरितोषो यः पितुरासीःमदात्मनः 1 
तेन दादश वर्पाणि नावर्षत्‌ पाकशासनः ॥ १० ॥ 
उसके महात्मा पिताको सत्य्रतक्रे ऊपर ज असंतोष 
उत्पन्न हो गय इस कारण दन्द्रने उसके राज्यम बारह पष 
तक्र वर्षां नदी की॥ १०॥ 
तेन त्विदानीं बहता दीक्षां तां दुवा भुवि । 
कुरस्य निष्कृतिस्तात कृता सा वै भवेदिति ॥ १९॥ 
न तं वसिष्ठो भगवान्‌ पिघ्रा त्यक्तं न्यच्ास्यत्‌। 
अभिषेक्ष्याम्यहं पुखमस्येत्येवं यतिञुनेः ॥ १२॥ 
तात [भ्यदि ( सव्यत्रत ) भूतख्यर कठिनतासे पूर्ण 
होनेवाली इस दीक्चाको पूर्णं कर खगा तो इसके कुल्का 
उद्धार हो जायगा? । यह विचारकर भगवान्‌ वसिष्ठने उसके 
पिताद्वारा त्यागे गये सत्यचतक्रो नहीं सेका थाः उनक्रा विचार 
था किं ५( प्रायश्चित्ते अनन्तर ) इसके पुत्रको ठी मँ राज्यपर 
अभिषिक्त कर दुंगाः | ११.१२ ॥ 
स ठु द्ादशवपीणि दीक्षां ताुदहद्‌ वली । 
उपांडयुवतमास्थाय महत्‌ सत्यव्रतो सृप ॥ १३ ॥ 
राजन्‌ ¡ वलवान्‌ सत्यत्रतने मी चुपचाप दीक्षा ठेकर 
वारह्‌ वर्ष॑तकर इस महाततको धारण किया॥ १३ ॥ 
अविधमने मांसे तु वसिष्ठस्य महात्मनः । 
सवेकामदुघ दोग्रीं ददक्ं स दपातमजः ॥ १४॥ 
एक समय कंद-मूलके गृदेके न रहनेपर उस राजकुमार- 
की दृष्टि सव कामनार्ओंको पु्णं करनेवाखी महात्मा वसिष्टकी 
दुधार गौके ऊपर पड़ी ॥ १४॥ 
तां वै फ्रोधाच मोद्य मायैव श्चुधार्दितः। 
दश्चधमीन्‌ गतो राजा जघान जनमेजय ॥ १५॥ 


जनमेजय [ राजछुमार सत्यवतने उस गौको क्रोध 
मोह ओर कामके कारण तया भूखसे पीड़ा पानेके कारण 
दश अनिष्ट धर्मो ( जवलयाओं )& को प्रास होनेकी दशाम भार 
डाला ॥ १५ ॥ 


# वे दस धमं या अवख एत प्रकार ६ै-- 


मत्तः भमत्त उन्मत्तः आन्तः क्रुद्धो बुयुक्षितः 1 
त्वरमाणश्च भीर उन्धः कामी चते दद ॥ 


अर्यात्‌ मद, भमाद, उन्माद, अरम, फरोध, भूख, उतावली, 
मयः रोभ ओर काम--श्न दस दामि पदे हए मनुष्य पराप 
क्र बैठते र । 


1, श्रीमहाभारते खिखभागे 


| दिवे 


~ --------------------------~------~---------~------ 


तच्च मांसं खयं चेव विश्वामिच्स्य चात्मजान्‌। 
भोजयामास तच्छुत्वा विष्टोऽप्यस्य चुक्कधे । 
छृद्धस्तु भगवान्‌ घाक्यमिदमाद चपात्मजम्‌ ॥ १६॥ 
उस मांसकरो उसने विश्वमित्रके पुरक चिखाया थौर 
अपने आप भी खाया ] यह सुनकर वसिष्नी मी क्रोधने भर 
गये ओर क्रोधर्मे भरे हुए. वसिष्ठजीने राजाके पु्से वह॒ चात 
कटी || १६ ॥ 
वपिष्ठ उवाच 
पातयेयमहं करूर तव॒ शङ्कमखंशयम्‌. 1 
यदि ते द्वाविमौ शङक्रुन स्यातां वै रती पुनः॥ १७ ॥ 
वसिष्ठजीने फदा- चरर } यदि ठम पिर क्यि हुए 
येदो जङ्कु (पाप) नदेतितोर्म तरे प्रथम द्ध (पाप) 
को अवद्य नष्ट कर देता ॥ १७ ॥ 
पितुश्चापरितोषेण शुरोर्देग्धरीवधेन च 1 
अप्रोक्षितोपयोयान्च चधिविधस्ते व्यतिक्रमः ॥ १८ ॥ 
पिताकरो संतुष्ट न रखने, शुखुकी दध देनेवाली गौकी 
हव्या कर डासन यौर अप्रोक्षित मास सखनिसे तुम्दारे 
द्वारा तीन प्रकरे पाप वन गये॥ १८॥ 
व््रस्यायन उवाच 
पवं धीण्यस्य श्ाङकरूनि तानि दद्रू महीतपाः। 
चिराङ्करिति होवाच त्रिशङ्कुरिति स स्मतः॥ १९॥ 
वेदाम्पायनजी योे--दख प्रकार उसके तीन गद्भु- 
अकरि देखकर महातपस्वी वरि्ठजीने जो उसे नियाद्कु 
कटाः इसके कारण उद तरिश दी कदलने खमा | १९॥ 
विभ्नामिघस्तु दासणामागतो भरणे रते । 
ख तु तस्मे वरं पाद्रान्मुनिः प्रीतस्िश्द्रवे ॥ २० ॥ 
जत्र विश्वामिन्रजी ठे, तव अपनी छी आदिक्रा मरण- 
पोप्रण करमेके कारण प्रसन्न होकर व्रिद्भुको वर देने लगे ॥ 
छन्यमानो वरेणाथ वरं चे चृपात्मजः। 
खशरीये यजे खर्गभित्येवं याचितो मुनिः ॥ २९॥ 
जव विश्वामित्रजीने यज्छुमारसे इच्छानुसार वर मोगनेके 
च्यि कदा तव उसने मुनिसे वर मोगा कि रं सदेह 
स्वरम जाः ॥ २१॥ . . - 
अनाद्ृष्टिभये तस्िन्‌ गते दादद्रावापिकि । 
राग्येऽभिपिच्यपित्ये तु याजयामास तं मुनिः॥ २२॥ 
( विश्वामिश्रके प्रसादमा्रसे ) बारह वर्पेकरी अनाव्र्टि- 
का भय दुर्‌ दयो जानेपर विश्वामित्र (मुनि अपने तपते उसके 
पार्पोकरो मस के ) उसका पताके राज्यपर अभिपेक 
कर उसका यक्च करने स्मो | २२॥ 


मिषतां देवतानां च वसिष्टस्य च कौदिकः । , 
सश्यरीरं तदा तं तु दिवमासेपयत्‌ धमुः ॥ २२॥ 
तदनन्तर तकी सक्तिसे सम्यन्न करौरिकरमोत्री विवामित्र- 
वतिष्ठ॒ ओौर देवतार्थकि देखते-दैषठते दी व्रियद्ुको 
सदारीर स्वर्गे मेज दिया ॥२३॥ 
तस्य सत्यरथा नाम भायौ कैकयवंदाजा। 
छुमारं जनयामास हरिच्चन्द्रमकस्मपम्‌'॥ २४ ॥ 
्रिगद्भुके केकयवशम उचत टुर्द णक सत्यरथा 
नामी मार्या शरी | उस्म उसने दरिद्र नामव 
निप्याप पुत्रको उत्त क्रिया ॥ २४॥ 
स पै राजा दस्न्दरदेशद्रुव इति स्म्रतः। 
आहर्ता राजसूयस्य स सथ्राडिति विश्रुतः ॥ ५५ ॥ 
वे राजादरिनद्र तरशद्धुवनामतत प्रसिद्ध ये, उरन्योने रजमूय 
यज्ञ प्रिया थाः अतण वे सम्राट्‌ कटति ये ॥ २५॥ 
हरिन्द्रस्य पुत्रोऽभृद्रोहितो नाम कीवान्‌ । 
येनेदं सेदितपुरं कारितं गज्यसिद्धये ॥ २६॥ 
दरिश्चन्टके रोहित नामवाया वीर्यवान्‌ पुत्र उत्पन्न 
हुः जिसने अपने राज्यकार्यं सिद्धिकरे ध्ये रोदितपुर 
व्रसाया धा. २६ ॥ 
छतबा सज्यं स रजर्पिः पारयित्वा स्वथ प्रजः । 
संसारासारतां शात्वा दिजेभ्यस्तव्पुरं ददौ ॥ २७॥ 
उस राजर्पिने राव्य तथा प्रजाक्रा प्रान करनेके 
अनन्तर संचारकी असारताको जानकर अपना नगर बाद्र्णो- 
कोदेदियाथा॥ २७॥ 
हरितो येदितस्याय चज्छुहसीत उच्यते । 
विजयश्च शुधेवश्च चञ्चुपु्ौ चभूवतुः ॥ २८॥ 
रोहितक पुत्र हरित ओर हरितका पुत्र चञ्चु हुभा- 
यह्‌ प्रसिद्ध दै! चञ्चुकरे विजव ओर सुदेव नामवठे दो 
पुत्र दुष ॥ २८ ॥ 
जेता क्षत्वस्य सरस्य विजयस्तेन संस्घ्तः। 
रुख्कस्तनयस्तस्य यजधमीर्थकोविद्‌ः ॥ २९॥ 
उस (विजय) ने सम्पूर्णं क्घरिर्योक्रो जीत ल्य थाः 
इसथ्थ्ि वह विजय कदखाता या । उसके राजकार्यं, धर्म- 
कार्यं ओर आधिक विषरयरमिं चतुर रक्क नामवाला पुत्र 
हया ॥ २९ ॥ 
सुरक्रस्य रकः पूत्रो घुकाद्‌ य!दुस्तु जक्षिवान्‌ । 
शकय॑वनकाश्योजैः पारदैः पहयैः सह ॥ २० ॥ 
देद्यास्तालजङ्घाश्चनिरस्यन्ति स तं दृपम्‌। 
नात्यथं धार्मिक्स्तातं स हि धर्मयुगेऽभवत्‌ ॥ ३१ ॥ 
सुरकका पुत्र वृक हुआ यर वरकके त्राह नामबाल 
पुत्र उत्न्न हुआ | वह रजा उष ( राज ) धर्मक युग्मे 


हरिवंशपवं ] 
अतिधार्मिक नदीं था, इसल्ि दैहय ओर तात्जङ् वंशकर 
राजान शाकः यवनः काम्बोजः पारद ओर पहु ८ आदि ) 
राजार्ओका साथ देकर वब्राहुकको उसके राञ्यते भ्रष्ट 
कर दिया | ३०-३१॥ 
सगरस्तु खतो वाोर्जक्षे सह गरेण च 1 
यर्वस्याधरममागस्य भागेवेणाभिरक्षितः ॥ ३२॥ 
बाहुकका जो पुत्र उन्न हुआ वह गर अर्थात्‌ विष- 
के साथ ही उयन्न दभः था! इससे वह सगर कटने 
रगा । (उसी माताके ) ओ्वके आश्रमम अनिपर भ्गुवंशी 
ओर्वने उसकी रघ्चाकी थी ॥ ३२॥ 


चतुर्दशोऽध्यायः 


५९ 


आग्नेयमसखं कञ्घ्वा च भागवात्‌ सगरो चपः । 
जिगाय पूथिर्वीहत्वा तालजङ्धान्‌ सदैहयान्‌॥ २२ ॥ 
सगरने भृगुवंशी ओव आग्नेय अस्रको सीखकर 
ताखनंघ ओर दैहय राजार्ओंको , मारकर प्रथिवीको 
जीत छ्य ॥ ३२ ॥ , ` 
शकानां पहवानां च धर्मं निरसदच्युतः। 
क्षननियाणौ कुरभेषठ पारदानां स धर्मवित्‌ ॥ २७ ॥ 
कुवभरष्ठ ! धर्मकरो जाननेवाटे पूर्णराक्ति-तम्प्न सगरे 
शकः पहव ओर पारद क्षत्ियोको धर्मभ्रष्ट कर दिया 
था।|३४॥ 


` इति श्रीमहाभारते लिलभागे हरिवंशे हरिवंखपर्वणि त्रिशङ्कुचरितकथनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ ५३ ॥ 
इस प्रफार श्रीमहाभार खिलमाग हरिवते अन्तमेत हरिं शप त्रिरष्टुके चरित्रफा वर्णनविषयफ तेरह मध्याय पूरा हुमा ॥ ९३ ॥ - 
4 


 चतुदेदोऽध्यायः 
सगरी उत्पत्ति ओर चसि्रि तथा सगर-पुत्रफि उ्योगसे सयुद्रका सागर होना 


जनमेजय उवाच 

कथं स सगरो ज्ञातो गरेणैव सदाच्युतः । 
किमयं च शकादीनां क्षनियाणां महौजसाम्‌ ॥ ९ ॥ 
धर्मं कृखोचितं छर्धो सजा निरसदच्युतः। 
पतन्मे सर्वमाचक्ष्व ॒षिस्वरेण तपोधन ॥ २ ॥ 

जनमेजयने कह--तपोधन ! वे रजा सगर विष्के साथ 
क्यो उत्यन्न हुए थे १ विप्रक साय रते हुए भी मरे क्यो नदीं! 
ओर मर्यादस च्युत न होनेवारे उन नरेशने क्रोधमे भरकर 
महाबली शक आदि क्षत्रियोके ऊुखोचित धर्मको क्यो नष्ट 
कर दिया था १ इसका आप मुञ्चते विस्तारपूर्वक वणेन 
कीनि ॥ १-२॥ 

वैश्नस्पायस उवाच 

बाषोर्व्यसनिनस्तात हृतं राज्यमभूत्‌ किर । 
हेशयेस्तारजङ्धैश्च शकैः सार्ध विद्ाम्पते ॥ ३ ॥ 

वेशम्पायनजी वोखे--राजन्‌ ! राजा बाह शिकार 

ओर जए आदि व्यस्म ही पदा रहता था । तत्त ! ( इस 
अवसस्ते खम उटाक्रर ) बाहुके राज्यको हैहयः ताखजङ्ध 
' तथा शकने छीन ख्या ॥ ३ ॥ 
, चनाः पारदादचेव काम्बोजाः पह्लवाः खसाः! 
. पते पि गणाः पञ्च हैहया पराक्रमन्‌ ॥ ४ ॥ 

यवनः पारदः काम्बोजः खश्न ओर पद्‌ रव-इन पोच 
गर्णोने भी देह्य राजा्ओंक ल्थि पराक्रम किया था ॥ ४ ॥ 
हृतराज्यस्तदा राजा स वै बाहुर्वनं थयौ । 


पल्या चाुगतो दुःखी वने प्राणानवाखजव्‌# ५ ॥ ` 


राज्यके छिन जनेपर राजा बाहु वनको चला गया जौर 
उसकी पत्नी भी उसके पीकि-पीठे गयी । इसके बाद उख 
राजनि दुखी होकर वनम ही अपने पार्णोको त्याग दिया ॥५॥ 
पत्नी तु यावी तस्य सगभी पृष्ठतोऽन्वगात्‌। 
सपल्या च गरस्तस्यै दत्तः पूर्वमभूत्‌ किरु ॥ ६ ॥ 

उसकी पत्नी यदुवंशकी कन्या थी । वह गर्भवती थी, 


तव मी बाहुके पीपर वनम गयी यी ! उसकी सौतने 


उसे पटे ही विषर दे दिया था॥६॥ 
सा ठु भवुंश्चितां इत्वा बने तामध्यरेहत । 
ओीर्वस्तां भार्गवस्तात कारुण्यास्‌ समवास्यत्‌ ॥ ७ ॥ 


तात ¡ जव्र वहं स्वामीकी चिता वनाकर उसपर चने 
ठगी; उसी समय वनमे विराजमान शगुवंशी जवं श्चुषिने 
दयाके कारग उसे रेका ॥ ७ | 


वस्याश्चमे च. तं गर्भ गरेणेव सदाच्युतम्‌ । 


व्यजायत महाबाहुं सगरं नाम पार्थिवम्‌ ॥ ८.४ 


तव उसने उनके आश्रममे ही बिष ( गर ) सहित गर्म. 
2 जो आगे चलकर सगर नामक महाबाहु राजाके रूपम 
परसिद्ध हुः उत्पन्न किया 1 राजा सगर कमी धर्मे च्युते 
नदीं हुए ये ॥ ८ ॥ । . - 
ओर्वस्व॒ जातकमीदि तस्य रत्वा महात्मनः। 
अघ्याप्य वेद्शास्राणि ततोऽस प्रत्यपादयत्‌ ॥ ९ ॥ 
ओर्वने महामना सगरके जातकर्म आदि संस्कार कराकर 
उन्दं वेद ओर शासन पद्ये, किर अविद्या सिलायी || ९॥ 


॥, 


५२ 


` श्रीमहाभारते सिलेभागे 


[ स्थिरे 


आग्नेयं तु महाघोरममरैरपि दुःखदम्‌! 
स तेनाखरयलेनाजी यलेन च समन्वितः ॥ १०॥ 
देदयान्निजधानाद्य छदो रुद्रः परानिच । 
आजहार च रोकेषु कीर्तिं कीर्तिमतां वरः ॥ ११॥ 
उनि सगरको दैवताथक्रि स्रि भी अर्य महाघोर 
अग्नेय अस्र दिया था । जव वे अल आर शारीरिक ब्रलसे 
सम्पन्न हो गये, तव क्रोधने भरकर रद्र जेते शीघरतासे पञ्युभौ- 
का संहार करते हैः उसी धकार उन्दनि दै््योका संहार कर 
डाला ! इस प्रकार कीर्तिमानं शरेष्ठ उन वीर पुरुपने संसारम 
( अद्भुत ) कीर्ति पायी थी ॥ १०-११ ॥ 
दतः शकान्‌ सग्रवनान्‌ काम्बोजान्‌ पारदास्तथा । 
पह्ववाश्चैव निम्दोषान्‌ करतुं व्यवसितस्तदा ॥१२॥ 
इसके अनन्तर उन्दौनि शकः यवन, काम्बोजः पारद ओर 
पषटलवोको भी निःशेष (सवया नष्ट) करनेका निश्चय किया।१२॥ 


ते घष्यमाना घीरेण सगरेण महात्मना 1 
वसिष्ठं शरणं गत्वा प्रणिपेतुर्मनीधिणम्‌ ॥ १२३॥ 
जव वीर ओर महात्मा सगर उनका सर्वनाश करने 
ठग; तव वे ( शकः यवनादि ) बुद्धिमान्‌ वरिषएटजीकी 
शरणम गये ओर उनके परमं िर पदे ॥ १२ ॥ 
वसिष्ठस्त्वथ. तान्‌ षट समयेन महाद्युतिः । 
सगरं वारयामास तेषां दच्वाभयं तदा ॥ १४॥ 
परम यशीस्वी वसिष्टजीने - कु विष शर्तौपर उनको 
अमयदान दिया ओर सगसको ( उरन्दं माखेसे ) रोका | ९४॥ 
सगरः स्वां प्रतिक्लां च गुयेवीक्यं निश्शम्य च। 
ध्म जघान तेषां वै वेषान्यत्वं चकार ह ॥ १५॥ 
खगरने अपनी प्रतिज्ञा ओर गुस्के वाक्यकी यर ध्यान 
देकर ( उनके प्राण नदीं च्य) उनके धर्मको नष्ट कर 
दिया; ओौर उनका वेष 'वदल दिया | १५॥ 
अर्ध शकानां शिरसो युण्डं त्वा व्यसर्जयत्‌ 
यवनानां शिरः सर्वै काम्बोजानां तथेव च ॥ १६॥ 
उन्दोनि शकोकि आधे शिर भूँंडकर छोड़ दिया, यवनोकि 
खरे शिरको मूड दिया, ओर पहवोके भी शिरको मुंडवा 
दिया ॥ १६॥ 


पारदा सुक्तकेश्षाश्च पहवाः दमश्चुधासि्णिः 1 
निःखाध्यायवषर काराः छ तास्तेन महात्मना ॥ १७ ॥ 
उन मदात्मा नरेदने पारदोकं शिरो मुक्तकेशा ८ खुले 
हुए केशोवाल ) कर दिया ओर पहूरवोको श्मश्रुधास ( केवल 
दादीवाखा ) वना दिया ओर सबको स्वाध्याय तथा वषट्‌कारते 
रहित कर दिया ॥ १७ ॥ 
दाका यवनकाम्बोजाः पारदाश्च विश्यास्पते । 
कोछिसपौः खम्टिपा दायौश्चोखाः सकेरलाः ॥ १८ ॥ 


सरवै ते क्षत्ियास्तात धर्मस्तेषां निराङतः। 
घसिष्टवचनाद्‌ राजन. सगरेण मदात्मना ॥ १९ ॥ 
तात | अनेश्वर ! रकः यवनः काम्योजः पारद, कोलि. 
सर्प, मिषः दर्द, चोल ओर केसे सव धत्रिय दी ये 1 
वसिष्ठजीके वचसे महात्मा सगरने (दन सवका संहार न 
करे केव ) इनके धर्मकौ दी नष्ट कर दिया था ॥१८-१९॥ 
खसांस्त॒पारश्चोरशि मद्रास्‌ किप्किर्धकास्तथा। 
षौन्त्लाश्च तथा द्नान्‌ सास्वान्‌. कौद्कणकांस्तथा॥२०॥ 
सं धर्मविजयी राजा विजिव्येमां चञंधयम्‌ । 
अदवं वै प्रेरयामास वाजिमेधाय दीश्चितः ॥ २१॥ 
उन धर्मविजयी सजने अश्वमेधकी दीक्षा ठेकर खस; 
तुषारः चोलः मद्रः किणिन्धकः कौन्तटः वद्ध, सास्व तथा 
कोद्कण देशके राजार्ओको जीता ! दस प्रकार पृथ्वीका विजय 
करते हए उन्दनि अश्वमेध यजके ल्ि अपना धो छोदा ॥ 


तस्य चारयतः सोऽश्वः समुद्रे पू्वदक्षिणि। 
वेखासमीपेऽपष्टतो भूमि रव प्रवेशितः ॥ २२॥ 

जव उनका घोदा घुमाया जा रहा था; उस समय 
पूर्व-दक्षिण समुद्रके किनारे क्रिसीने उस धोदेको चुरा 
लिया ओर उसे भूमिम छिपा दिया ॥ २२॥ 


स तं देशं तदा पुरैः खानयामास पार्थिवः। 
आसेदुस्ते ततस्तत्र खन्थमाने महार्णवे ॥ २३॥ 
तमादिपुरुषं देवं रं कृष्णं प्रजापतिम्‌ । 
विष्णुं फपिखरूपेण खयपन्तं पुरुषोत्तमम्‌ ॥ २५॥ 
उख समय रजा ( सगर ) ने अपने पुर्नेसि उस स्थान- 
को खुदवाया ! समुद्रके खोदनैपर उनके पुनि आदिपुरषः 
हरि ( अवि्याक दरनेवले ); दृष्ण (सचिदानन्दखरूप) 
प्रजापति पुरपोत्तमः ८ कपिलूपी विग्णुको व्हा सोते हण 
समाधिम चित › देखा ॥ २२-२४॥ । 
तस्य चश्ुःखसुत्थेन तेजसा प्रतिबुध्यतः । 
द्ग्धास्ते वै महाराज चत्वारस्त्ववरोपिनाः ॥ २५॥ 
चर्दकेतुः खकेत॒श्च कंथा धर्मरथो दपः । 
श्रः पञ्चजनर्चैव तस्य वंशाकयो दपः ॥ २६॥ 


उनके योगनिद्राको त्यागनेपर उनके नेनर्मषे निकख्ते हु 
तेजछे वे सव ( राजकुमार >) भस द्यो गये । महाराज | 
केवर वके सुकेठः राजा धर्मरथ ओर वंशको 
चरनेवाखा शूर पञश्चजन-ये चार राजकुमार ष्टी जीषित 
वच स्के थे | २५-२६ ॥ 


प्रादाच्च तस्मै भगवान्‌ हरिनौरायणो चरान्‌ । 
अक्षयं वंशमिष्वाकोः कीर्तिं चाप्यनिवर्तनीम्‌॥ २७॥ 
पुषं समुद्रं च विभुः खगंवासं तथाक्षयसू। 
पुत्राणां चाक्ष्याश्लोकांस्तस्य ये चश्छुषा इताः॥ २८ ॥ 


शवपवे ] 


' पञ्चदशो ऽध्यायः 


` ५३ 


उन्दँ ( कपिलरूपी ल्पी ) विश्य हरिनारायण -भगवानूने यह 
वरदान दियाथा किं इष्वाकुका वंश अक्षय रहेगा ओर 
राजा पगरकी कीर्ति कमी नष्ट नहीं होगी । समुद्र उनका पुत्र 
कटा जायगा ८ अर्थात्‌ भविप्यमे यदह सागर नामसे प्रसिद्ध 
होगा ) ओर न्द अक्षय स्वर्गवासं मिकेगा । केपिरजीने 
अपने नेत्रके तेजसे भस हुए सगरपुतौको भी अक्षयटोरकोकी 
प्राति हेनेका वर दिया ॥ २७-२८॥ 


ससुद्धश्चाष्य॑मादाय ववन्दे . तं महीपतिम्‌ । 
सागरत्वं च लेभे स कर्मणा तेन तस्य वै ॥ २९॥ 


( उस समय ) समुद्रने अर्यं ठेकर उन राजा (सगर्‌ ) 
को प्रणाम किया ओर सगरके . इस कम॑के कारण समद्रका 
सागर नाम पड़ गया ॥ २९॥ ` 
तं चाश्वमेधिकं सोऽदवं ससुद्धादुपलन्धवान्‌। 
आजहाराश्वमेधानां शतं स सुमहायशाः । 
पुराणां च स्टस्राणि षष्टिस्तस्येति नः श्यत्‌ ॥ ३० ६ 

उन्न अश्वमेधयक्के घोदेको “भी ' समुद्रसे प्राप्त किया । 
दूस तरह उन महाययस्वी राजने सौ अश्वमेध यज्ञ कि 
य-स खना जता हे ¡ इन महाराजे पु्ोकौ संख्या साठ 
हजार थी ॥ ३० ॥ 


इति श्रीमहाभारते लिरुमागे हरिवो हरिवशपर्वणि सगरोत्पत्िनौम चतुद॑शोऽध्यायः ॥ १४ ॥ 
इसप्रकार श्रोमहःमारत लिममाप हरिवंशे अ्तम॑त हरिशे सरक उतिका वर्भनविषयक श्वीददर्यै; अघ्याय पूरा हुमा ॥ ९४ ॥ 


पञ्चदरोऽध्याय 
छयवदरका वणन 


जनमेजय उवाच 
सगरस्यात्मजा वीराः कथं जाता महात्मनः । 
विक्रान्ताः षण्टिसाहस्रा विधिनाकेन वा दज ।॥ १ ॥ 
 जनमेजयने कहा--द्विज ! महात्मा सगरे साठ हजार 
वीर ओर पराक्रमी पुत्र किंस प्रकार उत्पन्न हुए थे १॥ ९ ॥ 
वेद्म्पायन उवाच 
ढे भाय सगरस्यास्तां तपला धग्धकिरिवपे । 
ज्येष्ठा विदभ॑डुहिता केशिनी नाम विशता ॥ २ ॥ 
वैशस्पायनजीने उत्तर दिया-सगरकी दो रानिरयो 
थीं । तपसे उनके पाप नष्ट हौ गये थे] उनमे बदधी रानी 
विदभ.नरेशकी पुत्री थी ओर केशिनी नामसे परसिद्ध थी ॥ २॥ 
कनीयसी तु या तस्य पत्ती परमधर्मिणी । 
सरिषटनेमिदुष्िता स्येणापरतिमा भुवि ॥ ३ ॥ 
उन राजाकी जो छोटी पतनी थी, वह बड़ी ही धर्मात्मा 
यी | वह्‌ अरिष्टनेमि (कश्यप )की पुत्री यी 1 उसके समान 
एथिवीपर कोई भी दूसरी रूपवती सी नदीं थी ! ॥ २ ॥ 
ओरवस्ताभ्यां वरं परादात्‌ तं निवेरध जनाधिप । 
षष्टि पुश्रसष्टस्ाणि गृङ्गातवेका तपस्विनी ॥ ४ ॥ 
पक वंशधरं त्वेकां यथेष्टं चस्यत्विति । 
जनाधिप ! ओरवने उन दोरनोको ज वर दिया था, उत 
सुनो । ( ओने कहा था ) दोनो कोई एक तपस्विनी 
रानी तो साठ हजार पुत्र मोग ठे ओर एक वंश चखनेवाठे 
एकं दी पुच्रको सगि । अव जिसे जो वर अच्छा र्गता दो 
वह्‌ उख वरो मोगके॥ ४१ ॥ 


तत्रैका जगहे पुर्बष्डुन्धा शूरान्‌ बहुस्तथा ॥ ५ ॥ 
पकं वंशधरं त्वेका तथेत्याह च तां सुतिः । 
केशिन्यसूत  सगरादसमअसमात्मजम्‌. ॥ ६ ॥ 

उन्मेस एक पुत्रखोभिनी सीने तो बहुतसे शूरवीर 
पर्वोको मोग लिया तथा एकने एक ही वंशधर पुश्रको 
मोगा 1 तब सुनने तथास्तु-रेसा दी होगा, कहकर वरदान 
दे दिया । केरिनीके सगरसे असमञ्जस नामक पुत्र उलन 
हुआ ॥^५-६ ॥ 


राजा पञ्चजनो नाम वभूव खमहावलः। 
इतरा सुषुवे तुम्बीं वीजपूणीमिति शतिः ॥ ७ ॥ 
वह पञ्चजन मामे प्रसिद्ध महावल्वान्‌ रजा था । दूखरीने 
वीजेसे भरी हुई एक त्री उसन्न की, यह वात परसिद्ध ॥ ७ ॥ 
तत्न षष्टिसहस्राणि गसौस्ते तिरसखम्मिताः 
सम्बभूवुर्यथाकाखं बड्घुश्च यथाक्रमम्‌ ॥ ८ ॥ 
, उस वीमे तिलके समान साठ हजार गर्भं येः जो समयं 
अनिप्र उ्यनन हुए ओर करमशः बढ्ने रमो ॥ ८ ॥ 
घृतपूणैषु ङस्मेषु तान्‌. गभौन्‌ निदधे पिता 1 
धात्रीश्चैकैकशः प्रादात्‌ तावतीरेव पोषणे ॥ ९ } 
पिताने उन गर्भको पृतते भरे दपए षडमि डाक 
दिया ओर उनका पोषण केके ल्यि एक-एक घडेपर एक- 
एक करके उतनी ही धादयोको नियुक्त कर दिया ॥ ९ ॥ 


ततो दरु मासेषु सरंसुत्तस्थु्यथाुखम्‌ । 
कुमासस्ते यथाकालं सगरप्रीतिवर्धनाः ॥ १०॥ 


५५2 


श्रीमहाभारते लिरुभागे 


[ हरिवंशे 


0 


सा - ~~ 


~~~ ~ ~~~ ~~ ~ 
-----------~---~~ 


दस महीने वीतनेपर सगरकी प्ीतिको ब्रदानेवारे च्टुत-से 
वच्चे युखपूर्वक समयानुखार उन्न होने लगे । १० ॥ 


पष्टिः पुरसहस्राणि तस्यैवमभयन्‌ सप । 
गभौदलाबुमध्याद्‌ वै जातानि पृथिवीपते ॥ १९॥ 
राजन्‌ ! इस प्रकार उगरके साठ हजार पुत्र उ्यन्न हुए 
ये ओर ध्थिवीपते ! वे वीक वीोकी तरद रतव (लोकी ) 
के मध्यमे रखे हुए गमे उत्पन्न हुए ये ॥ ११ ॥ 
तेषां नारायणं तेजः प्रविष्टानां महात्मनाम्‌ । 
पकः पञ्चजनो नाम पुत्रो राजा वभूव ह ॥ १२॥ 
मगवान्‌ नारायण ( कपिख्देव ) के तेज प्रव्ि्ट-हुए 
राजङ्कमारोभिते एक पञ्चजन ( असमंजस ) नामक.रोजपुत्र दी. 
राना हो पाया ॥ ९२॥ 
खतः पश्चजनस्यासीदंद्युमान्‌ नाम वीयंवान्‌ । 
दिखीपस्तनयस्तस्य खटुवाङ् एति विश्वुतः ॥ १३॥ 
पृञ्चन्‌ ( असमंजस ) का युत्र वीर्यवान्‌ अ्चमान्‌ हुआ) 
उसका पुत्र दीप हुआ> जो खट्‌वा्ग नामसे भी प्रसिद्ध 
हे॥ १३॥ 
येन स्वगीदिष्ठागत्य सुहत प्राप्य जीवितम्‌। 
श्रयोऽदुखंधिता लोका बुदखधश्या सत्येन चानघ ॥ १४ ॥ 
अनघ | उसने मुहूर्तं भरका ( ४८ भिनय्करा ) जीवन 
पाकर स्वर्गसे हस मृत्युलोकयै आकर सूष्म दुदधिसे तथा 
सत्य (ब्रह्ममाव) के द्वारा तीनो ख्कौको तत्वतः जान 
च्यिथा॥ १४॥ 


दिलीपस्य तु दायादो महाराजो भगीरथः । 
यः सर गदां सरिच््ष्ठामवातारयत प्रः ॥ १५॥ 


दिलीपके पुन महाराज भगीरथ हुए । उन प्रमुने 
सदि्यमिं थेट गद्धाजीको ( स्वर्गसे भूमिपर) उतारा था ॥१५॥ 


कीङिमान्‌ स . महाभागः शतुस्यपयक्रमः। 
खसुद्वमाचयच्चेनां दुदिदत्वेन कटपयत्‌। 
सस्माद्‌ भागीरथी गक्षा फथ्यते वंडाचिन्तकैः ॥ १६॥ 
इन्द्रके तुल्य पराक्रमी उन यदस्वी महापुरुषने ग्गाजी- 
को समुद्रतक परहा दिया ओर उन्दने गङ्घाजीको अपनी पुत्री 
बनाया; इरील्यि वंशका कीन फरनेवासे विद्वय्‌ गङ्गानीको 
मागीरथी ( मगीरंथकी पुत्री ) कहते द ॥ १६ ॥ 
भगीिरथद्ठुते राजा श्रुत शत्यभिविश्ुतः 1 
ज्कभागस्छु शतस्यासीह पुशः परमधार्मिकः ॥ १७ ॥ 
मगीरथका पुत्र श्रुत नामे भरि है । भ्रुतका नामाग 
" नामक परमभार्गिक्र पुत्र उत्यन हुआ ]} १७॥ 
अम्बर्स्तु भाभिः सिन्धुद्ीपपिकभवत्‌ ! 
सप्ुलाजिव्‌ तु द्याद्‌ःिन्धुद्धीपस्य सीर्यवान्‌ ॥ १८॥ 


नामागका पुत्र अम्बरीपर हुआ 1 वद सिन्धुद्धीपका पिता 
था । सिन्धुद्रीपके अयुताजित्‌ नामक वीर्यवान्‌ पुत्र 
हज ॥ १८॥ 
अयुताजित्छुतस्त्वासीदतुपणां महायश्ाः। 
दिव्याश्चष्टदयक्षो वै राजा नलसखो वली ॥ १९॥ , 
अयुतानित्के ऋतपणैनामवाटा महायदमस्वी पुत्र उवन्न 
हया । वह दिव्य अक्ष (चुत) वियाका रदस्यवेत्ताः राजा नलका 
सखा तथा वड़ा वली था ॥ १९॥ 
ऋतुपणसुतस्त्वासीदावुपणिमेीपतिः 
_ खदाक्तस्तस्य तनयो राजास्विन्द्रसखो ऽभवत्‌ ॥ २०॥ 
छ्तपर्णका पुत्र राजा आ्वपर्णिं हुआ । उसक्रा पुत्र 
राजा सुदास हुमा, जो इन्द्रका मित्र था! २० ॥ 
खुदासस्य खतस्त्वासीत्‌ सौदासो नाम पाथिवः। 
ख्यातः फट्मापपादो परै नास्ता मिघ्रसहस्तथा ॥ २१ ॥ 
खदासके सौदास नामका पुर हाः जो राजा कल्माष- 
पाद्‌ ओर मिनस नामसे मी प्रसिद्ध था ॥ २१॥ 
कर्मापपादस्य सखतः सर्वकर्मेति विश्चुवः। 
अनरण्यस्तु धुरोऽभूद्‌ विश्वतः सर्वकर्मणः ॥ २२॥ 
कल्माप्रपादके सर्वकर्मा नामसे प्रसिद्ध पुत्र उस्न हय 
ओर सर्वकर्माका पुन अनरण्य नामे रिख्यात्त हुमा ॥ २२ ॥ 
अनरण्यद्खुतो मिष्नो निष्नपु्रौ वभूवतुः। 
अनमित्रो रथु्चैव पार्थिवर्षभ सत्तमौ ॥ २३॥ 
खपश्रे्ठ | अनरण्यका पुत्र निघ्न हुआ; निष्नके अन्‌- 
मित्र ओर रघु नामक दो शरेष्ठ पुत्र उलन हुए | २३॥ 
अनमित्रस्य धमोत्मा विदान्‌ दुलिद्ुह्ये ऽभवत्‌ । 
दिरीपस्वनयस्तस्य रामप्रप्रपितामहः ॥ २४॥ 


अनमित्के दुलिदुद नामवाला धर्मात्मा ओर षिद्वा्‌ पुत्र 
उत्प हुआ । दुखटुहिके पुत्र दिखी हुए, जे श्रीरामचन्द्रजी- 
के बद्ध प्रपितामह ये ॥ २४॥ 
दी्ेबाहुर्दिखीपस्य रघुनौच्नाभषत्‌ खतः। 
अयोध्यायां महाराजो रघुश्वासीन्महावलः ॥ २५ ॥ 
दिलीपके रघुनामक महाबाहु पुत्र उन्न हुए । ये खु 
अयोष्याम महावली सम्राट्‌ हु. ॥ २५ ॥ 
अजस्तु रघुतो जक्षे अजाद्‌ दशरथोऽभवत्‌ 
रामो दशरथाख्क्षे धमीर्मा सुमहायशाः ॥ २६॥ 
रघुसे अज उतन्न हुए । अजे दशरथ हुए तथा 


द्ररथसे धर्मात्मा एवं महायशस्वी श्रीरामचन्द्र प्रकट 
इए ॥ २६ ॥ 


रामस्य तनयो जक्षे कुश इत्यभिविश्तः 1 
अतिथिस्तु कुरालक्षे निषधस्तस्य चत्मजः ॥ २७ ॥ 
श्रीसमकरे कुश नामते प्रसिद्ध पुत्र उत्पन्न हुभा । कुशके 
अतिथि नामक पुत्र हुआ ओर अतिथिकरे पुच्रका नाम निषध 
था ॥ २७॥ 
निषधस्य नलः पुत्रो नभः पुत्रो नस्य त । 
नभ्य पुण्डरीकस्तु क्षेमधन्वा ततः स्सतः ॥ २८ ॥ 
निषधकरा पुत्र नलः नल्का पुत्र नमः नमका पुत्र 
पुण्डरीक ओर पुण्डरीकका पुत्र क्षेमधन्वा हा 1 २८॥ 
कषेमधन्धसुतरस्वारीद्‌ देवानीकः प्रत(पचान्‌ । 
आसंद्हयीनगुनौम देवानीकसखुतः भरघुः ॥ २९॥ 
क्षेमधन्वाका पुत्र प्रतापी देवानीक हुआ, देवानीकके 
अहीनगु नामक प्रभावशारी पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ २९॥ 
अहीनगोस्तु दायाव्‌ः सुधन्वा नाम पार्थिवः। 
सुधन्वनः सुतदवैव तसो जक्ञेऽनखो चपः ॥ ३०॥ 
अदीनगु्रा पुत्र राजा सुधन्वा हुआ ओर सुधन्वाका 
पुत्र अनर नामक राजा हुम ॥ २३०॥ 
उक्थो नाम स ध्रमौत्मानखपुत्रो बभूव इ। 
वज्नाभः खतस्तस्य उक्थस्य च महात्मनः ॥ २९ ॥ 
अनले उक्थ नामक धर्मात्मा पुत्र उत्यन्न हुआ ओर 
उन मदात्मा उक्थक्रे पुत्रका नाम वज्नाम हुआ ॥ ३१॥ 
श्भुस्तस्य सुतो विद्धान्‌ व्युपिताभ्व इति शरुतः। 
पुष्पस्तस्य सुती प्रिदानर्थसिदिस्तु तत्सुतः ॥ २२॥ 
वञ्ननाभके शंख नामक विद्धान्‌ पुत्र उसन्न हुआः.जो 
वयुपरिताश्वके नामते भी प्रसिद्ध है | शंलका पुत्र पुष्प ओर 
पुष्पका पुत्र विद्वान्‌ अर्थसिद्धि था ॥ ३२॥ 


पीडे ऽध्यायः 


५५ 


खुद्नः सुतस्तस्य अग्निवर्णः सुदर्शनात्‌ । 
अग्निवर्णस्य शीघस्तु शीघ्रस्य तु मरूः सुतः ॥ ३३ ॥ 
अर्थसिदधिका पुत्र सुदर्शनः सुदर्शनसे अग्निवर्णः 
अग्निवर्णा पुत्र शीघ्र ओर शीघरके मस नामक्रा पुत्र हु ॥ 
मरुस्तु योगमास्थाय कखापद्वीपमास्थितः। 
तस्यासीद्‌ विशवुतबतः पुत्रो राजा बृष्टद्वलः ॥ ३७ ॥ 
मर योगक्रा आश्नय लेकर करपद्वीपमे रहने ङ्गे । 
परम प्रसिद्ध मस्के पुत्र राजा बृहद्र हुए ॥ २४॥ 
नो दावेव विख्यातौ पुराणे भरतर्षभः। 
वीरसेनात्मजर्चैव यद्चेक्वकुक्रोद्वदः ॥ ३५ ॥ 


भरतर्षम ! पुराणम नर नामसे दो ही राजा प्रसिद्ध है- ^ 
एकर वीरसेनःपुत्र नलं ओर दसरा इष्वाकु-कुछोत्यनन 
( निष्रध-पुत्न ) नर ॥ ३५ ॥ 


दश््वाङ्वंराप्रभवाः पराधान्येनेह कीर्तिताः । 

पते दिवस्वतो वंशे राजानो भूर्तिजसः ॥ २६॥ 
विवस्वान्‌ ८ सूर्यं ) के वंशम ये परम तेजस्वी राजा 

उयन्न दुष्ट दै । यहां इकष्वकुवंशमे उलन्न हुए सुख्य-सुख्य 

राजाओंका वर्णन क्रिया गया है ॥ ३६ ॥ 


पठन्‌ सम्यगिमां सृष्टिमादित्यस्य विवस्वतः । 


श्राद्धदेवस्य देवस्य प्रजानां पुष्टिदस्य च ॥ २७॥ ` 


प्रजावानेति सायुज्यमादित्यस्य बिवखतः। 
विपाप्मा विरजाङ्चेव आयुष्मांश्च भवत्युत ॥ ३८ ॥ 


जो मनुप्य अदितिनन्दन भगवान्‌ सूर्यकी तथा प्रजा 
के पोषक देवता श्राद्धदेवकी इस घष्टि-परम्यरका भटीर्मोति 
पाठ करता दै, वह्‌ संतानवान्‌ होता ओर निष्पाप, रजोगुण- 
रदित एवं दीर्घायु हो अन्तमे भगवान्‌ सूर्यका सायुज्य प्राप्त 
कर केता हे ॥ ३७-३८ ॥ 


दति श्रीमहभारते खिरुभगे दरिवंशे हरिवशापर्वणि आदित्यस्य वंदानुकीरतैनं नाम॒ पच्दरदतोऽध्यायः ॥ १५ ॥ 


इस प्रकार श्रीमछभारत सिसुभाग दरिवश्ते अन्तत दरिवंशपनेमे सुवशका यणेनविषयक पद्य; अध्याय पुरा हुमा 1९५] 
>= 


पोडरोऽध्यायः 


भराद्धकल्प--जनमेजयद्वारा पिताका श्राद्ध तथा पित्खरूपनिर्णयसम्बन्धी प्र, शन्ततुका 
अपने श्राद्धमे खयं हाथ घटाकर भीष्मस पिण्ड मगना 


जनमेजय उवाच 


कथं वै आद्धदेवत्वमादित्यस्य विवस्वतः । 
भोतुमिच्छामि विप्राय श्राद्धस्य च परं बिधिम्‌॥ ९ ॥ 


सूर्यके पुत्र यम श्राद्धदेव क्यो कदलते ह १ ओर श्राद्धकी 
उत्तम विधि क्या है १ इसे भँ सुना चाहता ह ॥ १॥ 


पितृणामादिस्ं च क पते पितरः स्मृताः । 


जनमेजयने पूष्ा-द्विजभेष्ठ ! अदितिनन्दन भगवान्‌ परं च श्वुतमसपाभिः कथ्यमानं द्विजातिभिः # २ ॥ 


1 


भै 


धीमष्टाभारते सिकभागे 


[ हरिषे 


~ 


स्यर्गस्याः पतसे ये च देवानामपि देवताः । 

एकि वेद्पिद्‌ः ब्रा्ुरेतषिच्छामि चेिठुम्‌ ॥ ३॥ 
पितरौकी आदि खट कैसे हू १ ये पितर कौन ६! 

हमने बराघ्षणेकि मुखते यदह मात सुनी दै किं जो पितर 

स्व्मम शित दै वे देवताथेफि मी देवता द! वेद- 

¢ जाननेवाछे भी रेता टी कहते ह । अतः मँ इस घातको 

मलीर्मोति जामना चाहता हू ॥ २३ ॥ 

धे च तेषां गणाः प्रोक्ता य्व तेषां वदं परम्‌ । 

यथा च एृतमस्माभिः धाद्ध प्रीणाति वे पितृन्‌ ॥ ४ ॥ 

प्रीता पिते ये ख धेयसा योजयन्ति हि । 

ध्यं वेषितुमिर्छामि पितृणां सम॑सुष्ठमम्‌ ॥ ५ ॥ 
उनके जो भण कदे गये हैः उनका जो परम वल दै 

अर हमार किया हुभा श्राद्ध निस प्रकार उन्द वृत करता दै 

तथा जो पितर प्रसन्न देकर मलु्योका कस्याण करते ६ उन 

सको एं उत्तम पितृसर्गको भ जानना चाहता हू ॥ ५५ ॥ 

धै्नस्फयन उवाच 

ह्य दे कथयिष्याभि पितृणां समंसुचमम्‌ । 

यथः च छृतमसाभि, घां प्रीणाति वे पितृन.! 

प्रीताश्च पितसे ये स श्रेयसा योजयन्ति हि ॥ ६ ॥ 

मकण्डेयेन कथितं भीष्माय परिपृच्छते । 

सपृरच्छष्‌ धर्मराजो हि शरतल्पगतं पुरा । 

ष्यमेय पुरा प्रदतं यन्मी त्वं परिपुच्छसि ॥ ७ ॥ 

तद्‌ तेऽचुपुष्यौ षक्ष्यामनि भीष्मेणोदाहतं यथा। 

यीतं सनत्कुमारेण मार्कण्डेयाय पर्छते ॥ ८ ॥ 


वैशम्पायनजी योके--बहुत अच्छा; भै ठमसे 
पितरोके उक्तम सर्गकां वर्णन करसगा, हमारा किया 
हुआ श्राद्ध जिस प्रकार पितरोको तप्त करता टै तथा जो 
पितर श्रादसे संतुष्ट होकर हरये कद्याणकरे भागी वनाते 
है, उनका पर्चिय र्गा । पूर्वकर्म भीप्मके पुनेपर 
मार्ण्डेयजीमे उनसे ख विषयका वर्णन किया था। 
फिर महामास्तकार्मै शरशय्यापर पदे हुए भीष्मजीसे 
धर्मराज युधिष्ठिले भी परे णे टी प्रव्न करिया था, जेष 
एस समय ठम मुद्रते पछ रदे टो । भीष्मजीने युधिष्ठिरको 
जिख प्रकार उत्तर दिया थाः वह स्वं म दरम््ं क्रमद्ः 
यताऊंगा । पठे मारकण्डेयजीके पृष्नेपर सनक्छुमारजीने 
जो उपदेश दिया थाः ` वही युधिष्ठिर ओर मीष्के संवादर्े 
कशा गया है ॥ ६-८॥ 


युधिष्ठिर उवते 


पुिकामिन धर्मक्ष॒ कथं पुष्टिरवाप्यते। 
पतद्‌ चै घोतमिच्छामि फ एुखौणो न द्रोचति ॥ ९ ॥ 


युधिष्ठिरने पएछा-धर्मश | पुष्टि चाहनेवाल्् 
पुरुष किच प्रकार पुटि पा स्कृता है ओर कैखा कर्म करन- 
से मुप्यक्रो शोक नदीं करना पडता १ से अ नना 
चादता हू॥९॥ 


भीष्म उवाच 
श्रद्धः प्रीणाति हि पिवृय्‌ सर्वकामफरैस्तु यः। 
तत्परः प्रयतः श्राद्धी भरेव्यं चेह च मोदते ॥ १० ॥ 
भीष्मजीने कहा--युधिष्ठिर ! जो खमस कामना्यको 
पणं करनेवाठे शराद्धोदयारा तत्पर द्येकर पिरक वृत्त करता 
है वह पितर्यकरी प्रीति छीन रदनेवाखा शराद्धकर्ता धस 
संसारम आनन्दभागी ता दै ओर मरनेके वाद परटोकर्मे 
खख भोगता ६ ॥ १० ॥ 
पितो धर्मकामस्य प्रजाकामस्य च प्रजाम्‌ । 
पुष्टिकामस्य पुटि च प्रयच्छन्ति युधिष्ठिर ॥ १९॥ 
युधिष्ठिर } पितर धमं चाहनेवालेको धर्म, संतान चादनै- 
वल्को संतान ओर पुष्टि चाहमेवल्को पुटि भी अदान 
करते द ॥ १९॥ 


युधि्िर उवास 
वतन्ते पितरः स्वगे केषांचिन्नरफे पुनः। | 
प्राणिनां नियतं घापि कर्मजं फङमुचयते ॥ १२॥ 
युधिष्ठिरने पूा--किन्दीके पितर सर्गम रदते 
ओर किरि नसकरमै; क्योकि यद वात प्रसिद्धै कि 
प्राणिर्योको ( अपने ) क्मसि उत्यन दोनेवाला फ अवदय 
भोगना पडता हे ॥ १२ ॥ 
भाद्धानि चैव कर्वन्ति फटकामाः सदा नराः। 
अभिसंधाय पितरं पितुश्च पितरं तथा ॥ १३॥ 
पितुः पितामहं चेव भिषु पिण्डेषु नित्यशः। 
तानि भा्धानि दश्तानि कथं गच्छन्ति वे पितृन्‌॥ १४॥ 
फट चाहनेवाठे पुरपर॒ सदा पिताः पितामह अर 
प्रपितामहको ल्क्य करके श्राद्ध करते द । सव॑दा एम 
तीन पि्डरमि टी द्यि गये श्राद्ध पितरौको कैसे प्रात 
हेते ६१ ॥ १३-१४॥ 
कथं च शक्तास्ते दातुं नरकस्थाः फं पुनः। 
के घा ते पितयोऽन्ये सम कान्‌ यजामो षयं पुनः। १५॥ 
ओर वे पितर ( जव स्वयं ) नरके निवास कर रे 
तव्र वे फर भी केसे दे सकते ह १ अथवा य॒दि वे पितर उनसे 
भिन्न हतो कौन ईहै--उनका क्या पस्वियशै१? हम किन 
पित्रोकी पूजा करे १॥ १५॥ 
देषा अपि पितृन्‌ स्वगे यजन्तीति च नः शरुवम्‌। 
पतदिच्छाम्यहं भोतु विस्तरेण महाधुते ॥ १६॥ 


हमने सुना है किं स्वर्गमे ( रहमेवाले ) देवता भी पितरो 
का पूजन करते द । महादे { इन सव वारतोको मे विसार 
पूर्वक सुनना चाहता हूं ।॥ १६ ॥ 


स भवान्‌ कथथत्वेतां कथाममितबुद्धिमान्‌ 1 

यथा दत्तं पिवृणां वै तारणायेह कल्पते ॥ १७॥ 
पितरसौके निमित्त किया हया श्राद्ध किस प्रकार प्राणिर्यौ- 

का उद्धार करता दहै १इस कथाका आप वर्णन कीज्यिः 

क्योकि आपकी बुद्धि अथा हे ॥ १७ ॥ 


भीष्म उवाच 


अधर ते कीतैविष्यामि यथाश्रुतमरिंदम । 

ये च ते पितसेऽन्ये स्म याच्‌ यजामो चयं पुनः। 

पित्रा मम पुरा सीतं लोकान्तरगतेन वै ॥ १८ ॥ 
भीष्मजीने क्ा--रात्ुमदन ! हमखोम जिनकी पूजा 

करते हैः इस विषयको जैसा मैने खना है, वद सव तमसे 

कहुगा । जो अन्य ( पिता-पितामह आदिसे मिनन ) 

पितर, इस विषयमे मेरे परल्येकवासी पिताने भी गाथा गायींे ॥ 

भाद्धकाठे मम ` पितुम॑या पिण्डः समुद्यतः। 

तं पिता मम हस्तेन भित्वा भूमिमयाचत ॥ १९ ॥ 
श्राद्धके समय जव मँ अपने पिताको पिण्ड देने र्गाः तब 

उनका हाथ भूमिक फाड़कर निकल आया ओर वे उस हाथमे 

ही मुञ्चते पिण्ड मोगने रगे | १९॥ 

इस्ताभरणपूर्णेन केयूराभरणेन च। 

रकाङ्कलितटेनाथ यथा दष्टः पुरा मया ॥ २०॥ 
उनका वाजूबंद आदि हाथके आमूषणसे विभूषित ओर 

लर्खल अङ्कुलि्योवास बह हाथ वैसाही थाजेसा मेनि 

पहले ( जीवित अवशां ) देखा था ॥ २० ॥ 

नैष कपे विधिर इति संचिन्त्य चाप्यहम्‌ । 

शरेष्वेव ततः पिण्डं दुक्तवानविचारयन्‌ ॥ २९ ॥ 
` उख समय भने विचारा कि कस्पस्ोमे तो भैम एसी 

विधि कीं नही देखी हैः यद विचारकर मैने विना कुक परवा 

कयि ही पिण्डको कुरार्ओंपर दी रख दिया ॥ २९ ॥ 

ततः पिता मे सुभीतो वाचा मधुरया वदा । 

उवाच भरतशष्ठ॒प्रीयमाणो मयानघ ॥ २२॥ 
निष्पाप भरतश्ष्ठ } उस समय मेरे द्वार संव्ट किये 

॥ पिता परम प्रसन्न हुए ओर मधुर वाणीम मुससे कहने 

रगं [|२२॥ 

त्वया दायादवानस्मि कृतार्थो ऽसुश्र चेह च । 

सत्पुन्नेण त्वया पुतन धर्मेन चिपञिता ॥ २३॥ 

`. त्र । त्‌ धर्म ओर ' विद्वान्‌ है! तस्च-सरीखा सुपु 
~ होनेसे मुके पुत्रवान्‌ दोनेका फल मिल गया तथा मै इस 


- पषोडदोऽन्यायः 


$ 


[कषक 1 गयग्यन्किकन्कान्काकन्छनकन्कक्रकाकन्कष्छन्ककायान्वीकान्कनक्काकानान्कान्यनक्काग्कष्यान्काकयन्या्यान्यानि यि 1 र ीावोन्कावााकानकन्काक्किन्कानकेन्कान्न्कोन्कन 


लोक ओर परलोक--दोनेमि तार्थं हे गया ॥ २३ ॥ 
मया त तव जिक्षसा भयुक्तैषा उढनत ) 
व्यवस्थानं तु धर्मेषु कतुं छोकस्य खानघ ॥ २४ ॥ 
."हदतापूरवक व्ह्मचर्यं त्रतका पाटन करनेवले निष्याप 
भीष्म ! धर्म॑ ठेर्गोकी आस्था टद्‌ करनेके स्यि ही मैने यद 
तेरी पक्षा खी है ॥ २४॥ 
यथा चतुथं धर्मस्य रश्चिता कथते फलम्‌ । 
पापस्य हि तथा मूढः फं प्रापनोत्यरक्षिता ॥ २५॥ 
'धर्मकी रक्षा करनेवल्को जैसे धर्मका चौथा फल 
मिलता हैः इसी प्रकार धर्मकी रक्षा न करनेवाला मूढ मनुष्य 
पापके चौथाई फर्को पाता दै ॥ २५ ॥ 
प्रमाणं यद्धि कुरुते धमौचारे्ु पार्थिवः । 
प्रजास्तदञचुवर्तन्ते धमाणाचरितें सरष्टा ॥ २६॥ 
ध्धर्मविघयक आचार राजा जिस बातको प्रामाणिक बता 
देता है, प्रजा उस प्रमाणभूत राजाके आचरणक्रा अनुकरण 
करती है ॥ २६ ॥ ` 
त्वया च भरतश्रेष्ठ ॒वेदधमौश्च शाश्वताः । 
छृताः प्रमाणं प्रीतिश्च मम निरवर्तितातुखा ॥ २७॥ 
(भरतश्रेष्ठ ! तूने सनातन वैदिक धर्मको ही प्रमाण माना 
हे इसचस्थयि गै तुमपर बहुत ही प्रसन्न हुआ हूँ ॥ २७ ॥ 
तस्मात्‌ तवादं खप्रीतः परीत्या च घरमुचमम्‌ । 
ददामि तं भरतीच्छ त्वं धिषु खोकेषु दुरभम्‌ ॥ २८ ४ 
“अब इस प्रसन्नताके' कारण मेँ तुम्हे शरेष्ठ वर देना चाहता ` 
हर । द्‌ तीनो लोकमि दुखंम वरको म्रहण कर ॥ २८॥ 
न ते प्रभविता सृत्युथौवन्जीषितुमिच्छसि । 
त्वसोऽभ्युसषं सम्प्राप्य सत्युः प्रभविता तव ॥ २९ ॥ 
(तू जव्रतक जीवित रहना चादेगाः तवतक तुदयपर मूद्यु- 
कः प्रभावन होगा | तेरी आज्ञा परनिपर दी ठक्चपर मृल्यु 
प्रभाव डार सफेगी ॥ २९ ॥ 


कि वा ते पार्थितं भूयो ददामि बर्युन्तमम्‌ । 

तव्‌ बहि भरतश्रेष्ठ यत्‌ ते मनसि षत॑ते ॥ २० ॥ 
भरतश्रेष्ठ | ओर जो बात तेरे मनम हो उसे वताः 

र ठन्ने तेरी प्रार्थनाके अनुसार ओर कौन-खा उस्तम वर 

दू १।३०॥ 

श्त्युक्तवन्तं वमहमभिवादघय ऊचाञ्जलिः। 

अघ्रवं छतङ्त्योऽदं प्रसन्ने त्वयि सत्तम ॥ २१ ॥ 
पिताजीके इस यकार कनेपर गने उन्हे दाथ जोड़कर 

प्रणाम किया ओर कहा--श्रेष्ठतम पुरुष ! मै आपकी 

प्रसन्नतासे ही कतक्त्य हो गया ॥ ३९ ॥ 

यदि त्वघं भूयस्त्वततोऽखमि मदादयुते । 

प्र्षमिख्छामि वे किञिद्‌ घ्याहतं भवता रषयम््। ३२॥ 


५८ 


ध्ीमदाभास्ते विरभागे 


[ हरिवंसय 


'्मदादयुते { मदि मे इससे भी अधिके आपके अनुप्रह- 
का पात्र दोः तो मँ आयकरे मुखसे एक -प्रदनका उत्तर 
सुनना चाहता हू ॥ ३२॥ 

ख मामुवाच धमीत्मा नहि भीष्म यदिच्छसि । 
छेतासि संशयं सर्वं यन्मां पुच्छसि भारत ॥ ३३.॥ 
तव उन धर्मात्मने मुदयसे कदा--भ्मीष्म | वताः तू 
मुदसे क्या पूना चाहता दै १ भारत ! तू मुक्ते जो कुछ 
` पूरेगा, तेरे उस संदेहको मै दूर करूंगा, ॥ ३२ ॥ 
अपुच्छं तमष्टं॑ तातं तघ्ान्तर्ितमेव च। 
गतं सुङृतिनां रोक कौतुहखसमन्वितः ॥ ३४ ॥ 
तत्र मनि वरहो अदृश्य होकर खद ओर पृण्यात्माथोकि 
लोकमि पर्वे हुए अपने पितासे कौर्म भरकर पृष्टा ३४ 
मीप्म उवाच 
श्रूयन्ते पितो देवा देवानामपि देवताः 
देवाश्च पिततेऽन्ये बा कान्‌. यजामो चयं पुनः ॥ २५ ॥ 
भीष्मजीने पुा--पिताजी ! पितरगण देवता्कि मी 
देवता सुने जति दै । देवता दी पितर ई या दोनों मिन्न-मिन्न 
१ दम किनकी पूजा करे १५] ३५ ॥ 
कथं च द््तमस्माभिः राद्धं प्रीणात्यथो पिवृन्‌ । 
छोकन्तरगवास्तात किन्यु श्राद्धस्य चा फम्‌ ॥ ३६॥ 
तात | दूसरे लोक गये हुए पितरोको हमारा दिया हुआ 
श्राद्ध कैसे वृत करता ३ १ ओर्‌ श्राद्धका क्या फल है १ ॥३६॥ 
कान्‌ यजन्ति स रोका वै सदेवनरदानवाः। 
सयक्षोरगगन्धवौः खकिञ्नरमदोरयाः ॥ २७ ॥ 
दैवता, दानव ओर मनुष्य तथा यक्षः नागः गन्धर्वः 
किन्नर ओर मदासपं आदि किसकी पूजा करते ई १ ॥ ३७॥ 
अघर मे खंशायस्तीव्रः कौतूहलमतीव च । 
तद्‌ बरहि मम धर्मे सर्वक्षो ह्यसि मे मतः। 
एतच्छुत्वा वचस्तस्य भीष्मस्योवाच वै पिता ॥ ३८ ॥ 
धर्मच | इस विरये मुद्रे वड़ा कौतूहल ओर संदेह 
है; अतः आप इसका सुक्षसे वर्णन कीज्यिः क्योकि मेरे 
विचारसे आप सर्वज्ञ दै । भीप्मक्रे इस वचनको सुनकर पिता 
८ शन्तु ) वोटे ॥ ३८ ॥ 
शन्तदुरुवाच 
संकषेपेणेव ते व्ये यत्मां पृच्छसि भारन । 
पितरश्च यथोद्धूताः फलं वर्तस्य चानघ ॥ २९ ॥ 


पितृणां कारणं श्रद्धे श्णु सकं समाहितः) 
आदिदेवसुतास्तात पितसे' दिवि देवताः ॥ ४० ॥ 
द्रान्तसुजीने कदा--मारत [ जो वात तू मुद्चसे पृषता 
द उसे मँ संकषेयसे कदता हू । निष्याप { पितर जिस प्रकार 
उच्यन्न हुए ह ओर उनको (अन्न शादि ) देनेसे जो फल 
मिक्ता दै, श्रा पितरौके कारणको अर्थात्‌ जिनके ये कायं 
है उनको तू सावधान होकर सुन) तात | स्वरम सित पित्र 
देवता आदिदेव ब्रह्माजीके पुत्र ६ ॥ ३९-४० ॥ 
तान्‌ यजन्ति स वै लोकाः सदेवासुरमादषाः। 
सयक्षोरगगन्धवीः सकिन्नरमहोरगाः ॥ ४९॥ 
देवताः असुरः मनुप्यः यक्षः नाग, गन्धर्वै; किन्नर 
ओर महासर्थं आदि उनकी द पूजा कसते ई ॥ ४१ ॥ 
आप्यायिताश्च ते श्राद्धे पुनराप्याययन्ति च । 
जगत्‌ स्देवगन्धव॑मिति चद्यालुश्षासनम्‌ ॥ ४२॥ 
वे श्राद्धं त्त किये जानेषर देवतार्थो ओर गन्धर्वो 
सदत जगतो त्रृप्त कसते ई--यद वेद (अथवा बह्याजी ) 
का अनुदखासन दै ॥ ४२ ॥ 
तान्‌ यजस्व महाभाग श्रादधैसप्ैरतस्दितः। 
ते ते श्रेयो चिधास्यन्ति सर्वकामफरपदाः ॥ ४२ ॥ 
मदाभाग | तू आच्स्यरदित होकर श्रेष्ठ श्राद्धेद्रारा उन 
पितर्रोका यजन कर, ततवर वे सत्र कामनार्थोका फट देनेवाले 
पितर तेरा कल्याण करेगे | ४३ ॥ 
त्वया चाराघ्यमानास्ते नामयोध्रादिकी्तनेः। 
अस्मानाप्याययिष्यन्ति स्वर्गस्यानपि भारत ॥ ४४ ॥ 
भारत ! यदि तरू नाम-गोत्र आदिका उ्वारण करके 
उनकी आराधना करेगा तो वे पित्तर हमे -ओर दमे स्वर्गीय 
पितर्रोको भी तृप्त करगे | '*४॥ 
माक॑ण्डेयस्तु ते शोषमेतत्‌ सर्य श्वक्ष्यति । 
पष वै पितृभकतश्च विदितात्मा च भारत ॥ ७५॥ 
ओर चाकी सव्र वार्तोको मार्कण्डेयजी वुद्चते करेगे । 
भारत ! वे पिवर-मक्त ओर आत्मज्ञाने परिपूर्ण ईं ॥ ४५ ॥ 
उपस्थितश्च श्ाद्धेऽद्य ममैचाचु्रदाय वै ] 
पन पृच्छ मष्टाभागमित्युक्त्वान्तरधीयत ॥ ४६ ॥ 
आज ये मैरे ऊपर अनुग्रह केके चि दी श्राद्धमे 
आये द, अतः इन महामाग्यवान्‌ मा्कण्डेयजीछे ष्ट त्‌ एन 
प्रभकि पृष } इतना ककर शन्तनुजी अन्तर्धान दो गये ॥ 


इति श्रीमहामारते लिकमागे हरिवंशे रिवंकापवभि श्रादधकल्पम्रसङ्गो नाम पोदशोऽध्यायः ॥ १६ ॥ 


स प्रकार श्रीमहाभारत लिरभाग दरश भन्तत इशे श्रादकरप-निषमकु सोर मध्याय पूरा हुमा ॥ ९६ ॥ 
नौकर 9 क 4 


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# अत्‌ "कर्मणा पिद्रलोको विधया देवलोकः, इस श्रते कहा दै कि कर्मे पितृलोक मिलता है जौर निासे देवलोक । ब्रह्यशोकसे 


प] प 1 


चर, 


| सदोऽध्यायः 
पितृकल्य--भीष्म-माक्डेय-संबाद ऊर मार्दण्य्जीके साथ सनत्छमारजीकी बातचीत 


भीष्म उवाच 
ततोऽहं तस्य चचनान्माकण्डयं समादिः । 
्रद्नं तमेवान्वपृच्छं यन्मे पृष्ठः पुण पिता॥ ९॥ 
भीष्मजी कहते है--युपिष्ठिर ! तव मैने पिताजीके 
कथनानुसार एकाग्रचित्त हो माकंण्डेयजीसे फिर वदी प्रभ पृाः 
जिसके विषयमे पहले पिताजीसे जिक्ञासा की यी ॥ ९ ॥ 
स मामुवाच धमोत्मा माक॑ण्डेयो महातपाः 
भीष्म वक्ष्यामि कात्स्येन श्ण भ्रयतोऽनघ ॥ २ ॥ 
तवर महातपस्वी धर्मतमा माकण्डयजी मुद्से कहने रगे-- 
पिष्याप भीष्म ! मै तञ्च सव वात कहता हू? त सावधान 
होकर सुन ॥ २॥ 
अहं पिवप्रसादाद्‌ वै दीघौयुषटुमवाप्तवान्‌ । 
पितृभक््येव लब्धं च ्राग्छोके परमं यशः ॥ ३ ॥ 
प्राचीन काले भने पितृ-प्रतादते ही दीधोयु प्रात की 
थी ओर पिवृ-भक्तिते दी इस संसारम बदा भारौ यशर 
पाया है ॥ ३॥ 
सोऽहं युगस्य पर्यन्ते बहुवसहस्िके । 
अधिरुह्य गिरि मेर तपोऽतप्यं दुश्चरम्‌ ॥ ७ ॥ 
'एक समय म मेसुपर्वतक्रे ऊपर जाकर अनेक सह वपम 
पूर्ण होनेवाे युगान्त कारुतक धरोर तप करता रहा ॥ ४॥ 
ततः कदाचित्‌ पदयामि दिवं भ्ज्वास्य तेजसा 1 
विमानं .महदाथान्तसुत्तरेण शिरिस्तदा ॥ ५॥ 
"दसी वीच मैने एकं समय पर्वते उत्तरी ओरसे एक 
गदे मारी विमानको अति हुए देखा, बह अपने तेजते (सम्पूण) 
आकाराको प्रकादित कर रहा था ॥ ५॥ | 
तस्मिन्‌ विमाने पर्यङ्के उ्वछितादित्यसंनिभम्‌ । 
अपद्यं तच्च चैवादं शयानं दी्षतेजखम्‌ ॥ ६ ॥ 
अङ्गुष्ठमात्रं पुरुषमद्चावम्निमिवादितम्‌ । 
सो ऽहं तस्मै नमर्कृत्य प्रणम्य शिरसा विभुम्‌ ॥ ७ ॥ 
संनिविष्टं विमानस्थं पायाच्यीभ्यामपूजयम्‌ 1 
अप्च्छं चैव दुर्ध विद्याम त्वां कथं विभो ॥ ८ ॥ 


(उम विमानके सिंदहासनपर मैने चमकते हुए सूर्यके समान ` 


दीप्त तेजवाले तथा अग्निम स्थापिन कयि हुए अग्निके समान 
अङषठमा्र पुरक छेटे हुए देखा । मेने उन विभुको सिर 
छकार प्रणाम किया ओर विमानमे विराजमान उन दषं 
पुरुपकी पाच ओर अर्ये पूजाकर उनसे पूा--विमो ! 
हम आपको कैसे जनिं किं आप करौन ई १ 1 ६-८॥ 
तपोवीयौत्‌ समुत्यन्नं नारायण गुणात्मकम्‌ । 

देवनं शसि देवानामिति. मे चतंते मतिः ॥ ९ ॥ 


(नारायण ! यद्यपि आपका यदह स्वरूप नारायणके गुण 
डद सतवते निर्मित तथा तपके परमावसे प्रकट _ जा हैः मेरा 
विचार है कि आप देवता्थेकि भी देवता दै! ` ९ ॥ 

स माभुवप्च धमीत्मा सयमान द्वानघ । 
न ते तपः सुचरितं येन मां ॥ १० ॥ 
पतवर वे धर्मात्मा मुसकराकर कहने लगे--“निष्पाप ¦ 
तुमने (अभी ) मरी प्रकार तप नहीं करिया है, इस कारण 
तम मुने पह्वान न सके ।\ १० ॥ 
क्षणेनैव प्रमाणं स विश्रदन्यदृरप्वमम्‌ 1 
खपेण न मया कथिद्‌ श्पूवः पुमान्‌ छचित्‌॥ १९॥ 
श्षणमरमे ही उन्न दूसरे उत्तम स्वरूपको धारण 
कर छिया । रेते रूपवाला दस्य कोई पुरुष मैने पहले कमी 
नहीं देखा था? ॥ ११ ॥ 
सनत्कुमार उवाच 
विद्धि मां ब्रह्मणः पु मानसं पूर्वजं विभोः 1 
तपोवीर्यससत्यन्नं ` नायणगुणात्मकम्‌ ॥ ९२ ॥ 
सनत्कुमारजी एने { तम मुदे विष ब्रह्माजीका 
च्येष्ठ मानस पुत्र जानो । चै उनके तपके प्रमावसे उन्न 
हआ हरू ओर मेर शरीर नारायणके गुण-श्॒दध स्तवसे भरा 


हुआ द ॥ १२॥ 
सखनत््कमार इति यः श्रुतो देवेषु वे पुय । 
सोऽस्मि भागव भद्रं ते कं कामं करवाणि ते ॥ १३॥ 
प्राचीन काकते ही देवतार्योमि जो सनत्कुमार परसिद्ध है 
मनै वही द । भार्गव ! तुम्हारा कल्याण होः म ठम्ारी 
किंस कामनाको पूरणं करू १ ॥ १३॥ 
ये त्वन्ये बह्मणः पुत्रा यवीयांस्तु ते मम) 
आतरः सप्त दु्धषौस्तेषां वंशाः प्रतिष्ठिताः ॥ १४॥ ,. 
्द्याजीके जो दूसरे पुत्र रै" वेमेरे छोटे माई ।वे मेरे 
सात भाई परम दुरधभं हेः उनके वंश प्रतिष्ठित है॥ ९४॥ 
क्रतर्वसिष्ठः पुः पुरस्त्योऽनिस्तथाज् राः ! 
मरीचिस्तं तथा धीमान्‌ देवगन्ध्चैसेविताः। 
च्छोकान धारयन्तीमान देवगन्धर्वपूजितः ॥ १५ ॥ 
८ उनके नाम इस प्रकार दै) केत, वसिष्ठः पुलहः 
पुरुखय, अचरि, अङ्िर ओर बुद्धिमान्‌ मर्रीचि--इन सवकी 
देवता अर गन्धर्वं॑सेवा करते दै । भे देवता ओर 
गन्धरसे पूनित ऋषि तीनों लेकोको < अपने तपसे ) 
धारण क्रिय हुए दै ॥ १५ ॥ 
वयं तु यतिधमौणः संयोज्यात्मानमात्मनि 1 
अरजञाध्मै च कामं च व्यपहाय मदहासुने ॥ १६॥ 


2० - 
५. 
महायुने ! हम ८ सनत्कुमार, सनक आदि ) तो अपने 
आत्माको आत्मामे टीनकर प्रजा ८ उत्यन्न कर्ने ) के धर्म 
ओर कामको दूर करक यतिधर्मका पान करनेवटि ६॥ १६॥ 
यथोत्यन्नस्तथेवादं छमार दति विद्धि माम । 
तस्मात्‌ सनत्छुमारेतति नामेतन्मे प्रतिष्ठितम्‌ ॥ १७ ॥ 
. मै जते उदन हया दः वैसा ही कुमार दँ । अर्थात्‌ 
चार्के समान गगदेप आदिसे ्रन्य टह; अतः तस 
मुन्ने कुमारं जानो । इसील्यि येरा॒ नाम सनक्कुमार 
प्रसिद्ध दे ॥ १७॥ 
मद्भक्त्या ते तपश्चीणं सम दशंनकाङ्कया । 
पप दृष्टोऽस्मि भवता कं कासं करवाणि ते ॥ १८॥ 
तमने मेरा दर्शन क्रनेकी अभिलापासे मक्ति (श्रद्धा ) 
पूर्वक तपस्या कीहै, अतः मँ वमदारे सामने प्रकट हुयार्हू। 
चता ! अव्र भँ वुग्दारी किंस इच्छाको पूरणं कर! ॥ १८॥ 
इत्युक्तवन्तं तमं प्रत्यवोचं सनातनम्‌ । 
अयुक्षातो भगवता प्रीयमाणेन भारत ॥ १९॥ 
भारत [ बह सनातन कुमार सनत्कुमार जवर इस प्रकार 
कद चुके ओर जव प्रसन्न होकर उरन्दोनि मुदे प्रन करनेकी 
आज्ञा दे दी, तव मने उनसे वातालप क्रिया था ॥ १९॥ 


ततोऽहमेनम्थं दै तमपृच्छं सनातनम्‌ । 

पृष्टः पिवृणां समं च फट आद्धस्य चानघ ॥ २० ॥ 

चिच्छेद संशयं भीष्म स तु देवेश्वसे मम। 

ख मासुवाच धमौत्मा कथान्ते वहुवापिके । 

रमे त्वयाहं चिप्रपं श्टणु स्वं यथातथम्‌ ॥ २१ ॥ 
निप्याप भीष्म | तव मैने उन सनातन शरृषरिवे पितर्योकी 

उत्यत्ति ओर श्राद्धके फल-सम्न्धी विपरयको लेकर दी पर्न 

करिया । मेरे पूछमेपर उन देवेश्वरने मेरे संदेदको दुर कर 

दिया । वृहत कालठ्ते आरम्म की हर्द कथाकरे अन्तम 

उन धर्मात्मने मुद्रसे कदा--पविप्रे | म तम्दारे प्रदनसे 

संह । ठम इन सव प्रदर्नोका उत्तर यथार्थं रीतिसे 

सुनो ॥ २०-२१॥ 


देवानखजत ब्म मां, यक्ष्यन्तीति भार्गव । 

तसुत्खज्य तथात्मनमयजंर्ते फलार्थिनः ॥ २२॥ 
्ा्गव | देवत्ारोग मेरी पूजा करैगे--इस विचारे 

मरह्याजीने उनकी स्वना कीः तु वे फलके लोभम पद- 


कर ब्ह्माजीको छोढ़ अपनी ही पूजाम खगा गये--इन्द्िय- 
वर्िके चक्र ही पड़ गये ॥ २२॥ 


ते इस! व्रह्मणा मूढा नघ्सं्षा दिवौकसः । 


न स्सकिचिद्‌ विजानन्ति ततो लेोक्ोऽप्यसुत॥ २३॥ 
---_---__~__ 


# स्नत्‌ अर्थात्‌ निरन्तर कुभारके समान राग-देष, आदिसेः 
ल्य-7यदह सनत्छुमार छब्दका अथं रै । 


# 
1 


१) 


श्रीमहाभारते सिरभागे 


1 


[ हस्वे 


्टसपर व्रह्याजीने उन भाप दे दिया; जिससे उन 
मो्स्त देवतार्ओकी चेतना नष्ट दो गयी ओर उरनं कु 
मी श्वान न रह गया। फिर तो उनका अनुसरण करनेवात् 
संसार भी मोदे पड़ गया ॥ २३ ॥ 
ते भूयः प्रणताः श्प्ताः प्रायाचन्त पितामहम्‌ । 
अचुप्रहाय छोकानां ततस्तानध्रवीषिदम ॥ २ ॥ 
ध्टस प्रकार शाप दौ जानेपर वे फिर ब्रह्याजीके चरेम 
जाकर गिरे ओर उनसे क्षमान्याचना की 1 तव व्रह्माजीने 
लोककल्याणकी र्टिसे उन देवता्थेमि इस प्रकार कदटा-। 
भ्रायध्ित्तं चरध्वं वै व्यभिन्राये हि वः कतः। 
पुांश्च परिपृच्छ्य ततो ानमचाप्स्यथ ॥ २५ ॥ 
“अव तम प्रायश्चित्त कये; क्योकि तमने व्यभिचार (वूज्य- 
पूजाका च्यतिक्रम ) क्रियादे; दरसल््यि त॒म अपने पुरस 
पूरो; तव छमलोर्गोको ज्ञान प्राप्त ्ोमा 1 २५ ॥ 
प्रायथित्तक्रियार्थं ते पुरा पप्रच्छुरा्तवव्‌ । 
तेभ्यस्ते प्रयतात्मानः शशंुस्तनयास्तदा ॥ २६॥ 
तवर देवता्मेनि दुखी होकर अपने प्रसि प्रायध्ित्त- 
कर्मके विषयमे पृष्ठा । फिर तो वे जितात्मा पुत्र बहुत सोच- 
विचारकर उनसे बोले ॥ २६ ॥ 
प्रायधित्तानि धर्म॑क्षा वाट््नःकर्मजानि वै। 
शंसन्ति कुश्खा नित्यं चश्ुभ्यामपि नित्याः ॥ २७॥ 
धर्म-छानमे निपुण पुख्पोका कना कि वाणीः मन ओर 
कर्मे तथा नेनेति भी सदा प्रायश्चित्त होता है ॥ २७ ॥ 
प्रायश्ितार्थतत्वना छच्धसंक्षा दिवौकखः। 
गम्यन्तां पु्का्चेति पुत्ैसक्ता्च ते तदा ॥ २८॥ 
“अतः देवताओं { ठम प्रायश्ित्तके त्को जानकर सचेत 
षो जाओ { फिर पुर्रौनि उनसे कहा क्रि प्पुत्रो | अव 
ठम जाओ ॥ २८ ॥ 
अभिरशाप्तास्तु ते देवाः पुत्रवाक्येन निन्दिताः! 
पितामदसुपागच्छन्‌ संायच्छेदनाय चै॥ २९॥ 
धतव वे देवता पुर्ोद्धारा पुत्र कदे जानेपर अपनी निन्दा 
समदते हए तथा पुर्बोसे भी अभिरत होकर अपना 
संशय दूर करनेके च्वि व्रह्माजीके पास पहुचे || २९ ॥ 
ततस्तानन्रवीद्‌ देवो यूथं वै ब्रह्मवादिनः 
नस्माद्‌ यदुक्तं युष्माकं तत्‌ तथान तदन्यथा ॥ ३० ॥ - 
"तव् बरदयाजीने देवता्ेसि कदा--'तुमलोग बह्यवादी 
दो । इसल्यि उन्दनि छमते ज कु कहा दैःबह ठीक ही 
दै । इसमे कुट मी अनुचित नदीं है ॥ ३० ॥ 
यूयं हरीरकतीरस्तेां देवा भ्षिप्यथ । 
ते तु क्षानप्रद्‌तारः पितसे चो न खंदायः॥३१॥ 


।। 


हरिकदापर्व ] 


अष्टादसो ऽध्यायः । ६ 


न्व 


शुम तो उनके शरीरी स्वना करमनेवले देवता होगे 
शरैर वे सान प्रदान करनेवाले तुम्हरे पितर होगे--इसमे 
तीक भी संदेह नही दै ॥ ३१ ॥ 
अन्योन्यं पितरो यूयं ते चैवेति न संशयः । 
देषाग्च पितसचैव तद्‌ बुध्यध्वं दिवौकसः ॥ ३२॥ 
द्देवताओ ओर पितरो ! त॒म दोनौ आपसमे एक दूसरेके 
पितर होः इमे कु भी संदेह नरी. दै । स्वरगवासियो ! इस 
वातकरो ठम भीमेति जान खः ॥ ३२॥ 
ततस्ते पुनरागसभ्य पुघानुचुरदिवौकसः। 
ब्रह्मणा च्छिन्नसंदेदाः प्रीतिमन्तः परस्परम्‌ ॥ २६ ॥ 
(तत्र वे देवत्ताः जिनका सारा संशय ब्रह्माजीदाय नष्ट हो 
गया था ओर जो परस्थर प्रीतियुक्तं थे, पुनः पु्नोके पास 
अये ओर उनसे वोले--!॥ ३३ ॥ 
यूयं वै पितरोऽस्माकं यैर्वयं प्रतिबोधिताः । 
धर्मक्षाः कश्च वः कामः को वसे वः प्रदीयताम्‌ ॥ ३४ ॥ 
\ तुम हमारे पितर दौः सयोकरि तुमने दमक्रो ज्ञान प्रदान 
किर्या है, तुम धर्मज्ञ होः तुम्हारी क्या इच्छा? तुम्हे क्या 
व्र दिया जय १॥ ३४॥ 
यदुक्तं चैव युष्माभिस्तत्‌ तथा न तदन्यथा । 
उक्ताश्च यस्माद्‌ युष्माभि; पुत्रका इति वै वयम्‌ । 
तस्माद्‌ भवन्तः पितरो भविष्यन्ति न संशयः ॥ ३५॥ 
तुमने जो वात कही हैः वह टीक है इसमे कु 
अनुचित महीं है ¦ परंतु तुमने जो हमे प्पुत्रकाः) कहकर 
सम्बरोधित क्रिया है इस कारण तुम पितर दोओगे, इसमे कुछ 
संदेह नदीं दै" ३५॥ 
योऽनिष्् तु पिवृज्छरदधैः करियाः काश्चित्‌ करिष्यति । 
राक्षसा दूनिवानागाः फल प्राप्स्यन्ति तस्य तत्‌ ॥२९॥ 
जो प्राणी श्राद्धोद्यरा ८ पहले ) पितरोका पूजन कयि 
विनादीजो कुछ क्रिया करेगा, उन क्रियाओका फर 
राक्षसः दानवे ओर सपौको प्रात होगा ॥ ३६ ॥ 
श्रद्धैराप्यायिताश्रैव पितरः सोममव्ययम्‌ । 


आप्याय्यमना युष्माभिर्वदधयिष्यन्ति नित्यदा ॥ ३७ ॥ 
ठम दिव्य पितर हो, तुम्हारे द्वारा भाद्धखे परिपुष्ट किमि 
गये लोकिकं पितर स्यं तूभम दो .अपने अभिदेवता 
सोमक्री इद्धि करेगे }} ३७) | 
श्रद्धैयन्यायितः सोमो सोकानाप्याययिष्यति । 
समुद्धपव॑तरनं जङ््माजङ्गमेदैतम्‌ ॥ ३८ ॥ 
श्राद्धे आप्यायित होता हुआ चन्द्रमा समुद्र, पवतः 
वन ओर चर-अचर प्राणियेसि भरे इए लोकौकौ आप्यायित 
(वृत्त) करेगा ॥ ३८ ॥ , 
श्राद्धानि पुष्टिकामाश्च ये करिष्यन्ति मानवाः । 
तेभ्यः पुरि परजादचेच दास्यन्ति पितरः सद्‌ा ॥ २९. ॥ 
जो मनुष्य पुष्टि पानेकी इच्छासे श्रा करेगे, पितर 
उनको खदा पुष्ट ओर संतान देंगे ॥.३९॥ 
श्राद्धेये च प्रदास्यन्ति जीन्‌ पिण्डान्‌ नामगोत्रतः। 
स्वे वर्तंमानांस्तान्‌ पितरः सपितामहान्‌ । 
भावयिष्यन्ति सततं श्राददानेन तर्पिताः ॥४०॥ 
जो पुप्र सर्दल् पि्मान पिता, पितामह ओर प्रपिता- 
महको उनके नाम ओौर गोका उच्चारण कर तीन.पिण्ड देगेः 
श्राद्धन्दानते वृक हुए वे पितर उनकी सदा दृद्धि करगे 1\*०॥ 
पवमाक्षापितं पूरवं॑ ब्रह्मण परमेष्ठिना । 
इति तद्वचनं सत्यं भवत्वद्य दिवौकसः! 
पुाश्च पितरश्चैव वयं सवै परस्परम्‌ ॥ ४१॥ 
"परमेष्ठी ब्रह्माजीने पहले दी एेसी आशा दी है । 
स्वर्गवासियो { उनका वचन अब सत्य हो, हम सम परस्पर 
पुत्र ओर पितर है, ॥ ४९ ॥ 
सनत्कुमार उवाच | 
त पते पितरो देवा देवाश्च पितरस्तथा} ' 
अन्योन्यं पितरो छेते देवाश्च पितरश्च ह ॥ ४२॥ 
सनत्कुमारजीने क्ा-घने जो देवतां दैः वे ही पितर 
ओरजो पितरर्हैःवे ही देवता ह । इस प्रकारये देवता ओर 
पितर आपसे एक दूसेरेके पिता ओर पूव्य ई ॥ ४२ ॥ 


` इति श्रीमहाभारते खिकभागे हरिवंरो - हरिविंशपर्वणि पितूकरपे सक्तददोऽघ्यायः । १७ ॥ 
इस्‌ पकार श्रीमरपभासत द्िरभाग दरिवशके भन्तगंत दसििपमे पिरक उत्पत्तिनिषयक सत्रहने अध्याय पुर हुता 1 ९७ ॥ 


अष्टादशोऽध्यायः | 
पिदकल्प-माकण्डेय-सनल्छुमार-संबादमे पितरो गण, रोक, शक्ति ओर कल्याओंका वर्णन ` 
तथा पितरोके प्रभावफो देखनेके रिथे माकंण्डेयजीको दिव्य दृ्टिकी प्रापि 


~ मार्कण्डेय उवच 
इत्युक्तोऽहं भगवता देवदेवेन भास्वता} 
सनत्कुमारेण पुनः पृष्टवान्‌ देवमव्ययम्‌ ॥ ९ ॥ 


संदेहममरशेष्ठं भगवन्तमरिदमम्‌ । ` 
निवोध तन्मे गाङ्गेय निखिलं सर्वमादितः ॥ २ ॥ 


माकंण्डेयजी कहते है--गज्नानन्दन मी | तेजसी 


दम 


देबदेन भगवान्‌ सनल्कुमारफे दस प्रकार कडनेपर भने काम- 
क्रोधादि शतरर्जोका दमन फरनेवले उन देवशर अग्यय 
मगवान्‌ सनक्कुमारसे अपने जिन सरि संदेदौको आरम्भते पूरा 
था, उर मुशचसे सुनो ॥ १-२॥ 
कियन्तो वै पिठ्गणाः कर्स्म्धोके प्रतिष्ठिताः । 
घतंन्ते देवप्रबया देवानां सोमवद्धेनाः ॥ ३ ॥ 
(श्राद्धे द्वारा ) चन्द्रमाको पुष्ट करनेवाठे तथा देवतार्थी 
के भी श्रेष्ठ देवता पितरोके क्रितने गणै ओर बे किस लेोकरम 
प्रतिष्टित रहते ह १ ॥ ३॥ 
सनत्छूमार उवाच 
सेते यजतां श्रेष्ठ स्वरे पितगणाः स्सताः। 
चत्वारो मूर्तिमन्तश्च न्रयस्तेषाममूलंयः ॥ ४ ॥ 
सनत्कुमारजीने कहा--याजकमिं श्रेष्ठ मारकक॑ण्डेय | 
सवर्गम रहनेवले सात पितर माने गये दै उने चार तो 
मूर्तिमान्‌ दै ओर तीन मूर्तिरहित #॥ ४॥ 
तेषां खोकं विस च कीर्तयिष्यामि तच्छ्णु । 
प्रभावं च मष््वं च षिस्तरेण तपोधन ॥ ५ ॥ 
तपोधन ! मेँ उनके खकः खष्टि, प्रभाव ओर मह्वका 
विस्तारपूर्वक वर्णन करता हः उसे सुनिये ॥ ५॥ 
धर्ममूर्तिधसास्तेषां रयो ये परमा गणाः। 
तेषां नामानि लोकांश्च कथयिष्यामि तच्छ्पयु ॥ ६ ॥ 
(साथ दही) धर्ममय शरीर धारण करनेवाले पितरोकि 
जो तीन परम गण हैः उनके नाम ओर लोकौका भी मँ वर्णन 
करता हूः उसे भी सुनिये ॥ ६ ॥ 
ङोकाः सनातना नाम यत्र तिष्ठन्ति भास्वराः, 
अमूर्तयः पिदगणास्ते वै पुत्राः प्रजापतेः ॥ ७ ॥ 
उन पितररोके (सनातनः नामवलेलोक हैः ज्ोवि तेजस्वी; 
मोतिक शारीरे रित--दिव्य रूपबाले पितृगणः जे प्रजापतिके 
पुत्र है निवा करते ई ॥ ७ ॥ 
विरजस्य दविजधेष्ठ वैराजा इति विश्रुताः 
यजन्ति तानू देवगणा बिधिष्ेन कर्मणा॥ ८ ॥ 
दविजश्रेष्ठ | विराज प्रजापतिके पुत्र होनेके कारण वे 
. वैराज नामस प्रसिद्ध है । देवगण शाखरोक्त विधिसे इन वैराज 
पितर्रोका पूजन करते द ॥ ८ ॥ 
पते वे योगविश्र्ठा खोकान्‌ प्राप्य सनातनान्‌। 
पुनयुंगसदस्रान्ते जायन्ते ब्ह्मवादिनः ॥ ९ ॥ 
ये योगभ्रष्ट होनेके कारण सनातन ब्रहयरोकमे पर्हुचनेषर 
# अर्थात्‌ सुकरा, आङ्गिरस, सुखधा ओर सोमपा-ये चार्‌ 
मूर्तिमान्‌ ह । शद दिव्य दारीर प्राप्त हमा £ । वैराज, यध्धिष्वात्त 
जौ वर्हिषद्‌--ये तीन अमूतं ह । ( नील्कण्ठीते) ` 


16 


भ्रीम्टाभारते खिलभागे ` 


न~ -------------------------------------------------------- 


[ हरिषे 


मी सद युभोके अन्तम ब्रह्माजीकरे साथ मुक्त नदी होते; अतः 

दूसरे कद्यमे ८ प्रजापति ही ) व्रहमवादी सुनिके स्परम फिर 

प्रकट हो जतिर्दै॥९॥ 

ते तु प्राप्य स्यति भूयः साहं योगमयुत्तमम्‌। 

यान्ति योगगति सिद्धाः पुनरावृ्तिदुरभाम्‌ ॥ १०॥ 
वे पिर पूर्वकस्य स्मृति दोनेसे परम उत्तम सांख्ययोगका 

अनुष्ठान करफ़े सिद्ध हो जाते ह ओर पुनरादृत्ति (जन्म-मरण) 

से रहित योग-गतिको प्राप्त होते ६ ॥ १० ॥ 

पते स्युः पितरस्तात योगिनां योगवर्धनाः 1 

आप्याययन्ति ये पूर्वं सोमं योगवलेन च ॥ १९ ॥ 
तात } जो पहले योगवल्से सोमो पुष्ट क्सतेर्दवेही 

ये पितर योगियेकि योगको बदनिवारे ह ॥ ११ ॥ 

तस्माच्छद्धानि देयानि योगिनां तु विोपतः। 

पप वै प्रथमः सर्गः सोमपानां महात्मनाम्‌ ॥ १२॥ 
इसव्यि इन योगियेकर स्थि विदपररूपसे श्राद्ध करना 

चाद्ये यदी सोमकी ब्रद्धि करनेवाले पसोमपा'नामक पितररोका 

प्रथम सर्गंहै॥ १२॥ 

पतेषां मानसी कन्या मेना नाम महागिरेः । 

पल्ली हिमवतः श्रेष्ठा यस्या मैनाक उच्यते ॥ १३॥ 
इन ८ वैराज पितयं ) की मानसी कन्याका नाम मेना दै । 

वह महागिरि हिमाचल्करी शरेष्ठ पत्नी दै । उसका पुत्र मैनाक 

कहा जाता है ॥ १३॥ 

मैनाकस्य खतः धीमान्‌ कौश्ो नाम महागिरिः। 

पर्वतप्रवरः पुरो नानारलरसलमन्वितः ॥ १४॥ 
मेनाकका पुत्र महागिरि श्रीमान्‌ करौ ८ पर्व॑त ) हैः 

जो पर्वतमि शरेष्ठ ओौर नाना प्रकारे रनति भरा-पूरा ६ ॥१४॥ 

तिः कन्यास्तु मेनायां जनयामास श्षेखरा्‌ । 

अपणीमेकपणां च ठृतीयामेकपाटलाम्‌ ॥ -६५॥ 
पर्वतराज दिमाल्स्यने मेनाके ग्भ॑से तीन कन्या उत्यनन 

की; जिनके नाम ये--अपर्णाः एकपर्णा तथा तीतरी 

एक्रपारख ॥ १५ ॥ 

तपश्चरन्त्यः सुमहद्‌ दुग्चरं देवश्रानवेः। 

लोकान्‌-्तापयमसुस्तास्तिखः स्थाणुजङ्गमान्‌। ९६॥ 
इन तीनो कन्याओने एेसी घोर तपस्या अनुष्ठान प्रारम्भ 

क्रियाः जो देवताओं ओर दानवोक्रे च्थि भी दुप्कर थीः 

इससे उन तीनोने खावर-जङ्गमसहित समस्त रोक्रौको संतप्त 

कर दिया | १६ ॥ 

आहारमेकपर्णेन पकपण समाचरत्‌ । 

पाटक्छपुप्पमेकं च आद्धावेकपारला ॥ १७॥ 
( उन दिनों ) एकपर्णा एक ही पत्ता खाकर रह जाती 


हरिवंशपवं ] 


अ्टाव्दो ऽध्यायः . - | 
व=~ 


थी ओर एकपारखा पार्य ८ ताग्रपुप्पी ) के एक ही पुष्पको 
आहारसरूपमे ग्रहण करती थी ॥ १७ ॥ ,. 


पका तत्र निराहारा तां माता प्रत्यषेधयत्‌ । 
ड “मा इति निपेधन्ती मात्तस्नेहेन दुःखिता ॥ १८ ॥ 


उनमेदे एक ( अपर्णा स्वंथा > निराह्यर रहने स्गी । 


तव्र मावरखेहके कारण दुःखित हो उखकी माताने उससे (उ. 


माः ( अरी ! टेखा मत कर ) ककर ( निराहार रदनेका ) 
निषेध करिया ॥ १८ ॥ 
खा तथोक्त तया माचा देवी दुख्रचारिणी । 
उमेत्येवाभवत्‌ ख्याता चिषु छोकेषु सुन्दरी ॥ १९. ॥ 
वह दुश्चर तप करनेवाली ॒न्दरी देवी इस प्रकार माता- 
द्वारा कदे जानेपर इस (उमाः नामे हयी तीनों लेको- 
म विख्यात हो गयी || १९॥ 
तथैव नाम्ना तेनेह विश्रुता योगधर्मिंणी । 
पतत्‌ तु त्रिकुमारीकं जगत्‌ स्थास्यति भार्गव ॥ २०॥ 
उसी प्रकार वह्‌ योगधर्मका पालन करनेवाटी उसी 
नामसे विख्यात हई । भार्गव { इन तीन इमासियोँ (की 
तपशक्ति ) से युक्त होकर ही यह जगत्‌ स्थिर रदेगा।२०॥ 
 तपञश्चसीरास्ताः सर्वास्तिखो योगवखान्विताः। 
सवौश्च बह्यवादिन्यः सवौश्चेवोर्ष्वरेतसः ॥ २१॥ 
इन तीर्नोका शारीर तपोमय दैः ये सव्र योगवल्से सम्पन्न 
ह तथा ये समी ब्रह्मवादिनी ओर ऊर्ध्वरेता ई ॥ २९॥ 
उमा तासां वरिष्ठा च ज्येष्ठा च वरवर्णिनी । 
महायोगवरेपेता महदरेवसुपस्िता ॥ २२॥ 
उमा उन सरमे च्येष्ठः श्रेष्ठ; सुन्दरी तथा महान्‌ योगर- 
वरल्ते सम्पन्न थीं ! उनक्रा विवाह महादेवजीसे हु ॥ २२ ॥ 
असिततस्यैकपणौ तु देवलस्य महात्मनः! 
पल्ली दत्ता महाब्रह्मन्‌ योगाचायौय धीमते ॥ २३॥ 
महाब्रह्मन्‌ ! एकपर्णा बुद्धिमान्‌ महात्मा योसाचार्यं 
असित-देवल्को पलीरूपमे दी गवी | २३ ॥ 
जेगीषव्याय तु तथा विद्धि दामेकपाटलाम्‌ । 
पते चापि महाभागे योगाचायौढुपस्थिते ॥ २४ ॥ 
इसी प्रकार एकपात जैगीषन्यको न्यादी गयी थीःये 
दोनों महाभाग्यवती कन्यार्पँ योगाचार्योकी सेवा उपसित 
हरं द ॥ २४॥ 
खोकोः सोमपदा नाम मरीचेयेश्र वै खताः 
पितसो यत्र वर्तन्ते देर्बास्तान्‌. भावयन्त्युत ॥ २५॥ 
, (अवर दूसरे गण अग्निष्वात्त पितरोका वर्णन कस्ते दै) 
 पितरयौके लि दूसरे सोमपद्‌ नामवले ले ईहः जर्दो मरीचि 
प्रजापतिके पुत्र.“पितरः दोकर रहते हँ । वरहो देवता इनकी 
पूजा क्ते द ।[ २५॥ 


अग्निष्वात्ता ति ख्याताः सर्वं एवामितोजसः! 

पतेषां मानसी कन्या अच्छोदा नाम निन्नगा ॥ २६॥ 
ये सब अमिततेनस्यी पितर अग्निष्वात्त नामसे प्रसिद्ध 

है । अच्छोदा नामकी नदी इनकी मानसी कन्या 

दै ॥ २६॥ 

अच्छोदं नाम विख्यातं खरो यस्याः समुत्थितम्‌ । 

तय{ न दष्पूबौस्ते पितरस्तु कदाचन ॥ २७ ॥ 
उसीसे अच्छोदनामक प्रसिद्ध सरोवर प्रकट हुआ है । 

उस ( नदीरूपी मानसी कन्या ) ने इन पितसोक्रो पहले कमी 

नदीं देखा था ॥ २७ ॥ 

अप्यमू्तौनथ पितृन्‌ सा ददशं शुचिस्मिता । 

सम्भूता मनसा तेषां पिवृन्‌ स्वान्‌ नाभिजानती॥ २८ ॥ 
उस पवित्र मुसकानवार्छीने अमूर्तं पितरोको मी दिन्- 

दृष्िसे देखा । पर उन देलकर भी बह चह न जान सकरी किं 

ये मेरे पिता ह ओर मै इनके मनसे उत्पतन हई ह ॥ २८॥ 


जीडिता तेन दुग्खेन वभूव वरवर्णिनी । 
साद्रा पितरं बवे वसुं नामास्तरिस्षगम्‌ ॥\२२॥ 
अमावसखुरिति स्यातमायोः पुं यश्चस्विनम्‌ । 
अद्विकाण्सरसायुक्तं॒विमाने ऽधिष्ठितं दिवि ॥ ३० ॥ 

तवर बह सुन्दरी अच्छोदा उस दुःखके कारण छनित हो 
गयी । फिर उसने वसुको, जो आयुके यसी पुतचर,अमावसु नासे 
विख्यातः अन्तरिश्चचारी ओर सखर्गमे अद्धिका अप्सराके साथ 
विमान वरेठे थे, देखा ओर उन्दीफो अपना प्रिता, मान 
ल्या ॥ २९-३० ॥ 


सा तेन व्यभिचारेण मनसः कारूपिणी । 

पितरं धपार्थयित्वान्यं योगश्चष्टा' पपात ह ॥ २१॥ 
वह इच्छानुखार सूप धारणं करनेवाली खी दूसरेको पिता 

चनाकर मानसिक व्यभिचारे कारण योगभ्रष्ट होकर गिरे , 

ल्गी॥२३१॥ 


श्रीण्यपदयद्‌ विमानानि पतमाना विवद््युता । 
श्रसरेणुप्रमाणानि सापशष्यत्‌ तेषु सान्‌ पितृन्‌ ॥ ३२॥ 
सख्येखष्मानपरिष्यरानम्नीनग्निष्विवादितान्‌ । 
भायभ्वमित्युवाचातौ पतप्ती तामवाकि्चराः ॥ ३३ ॥ 
स्वगंसे अष्ट रोकर नीचेको गिरती दुई अच्छोदाने 
चसरेणुके आकारे तीन निमार्नोको देखा । तदनन्तर उने 
उनम (व्रैढे हट ) उन पितरोको देखा, जो अच्यन्त सृषम; 
स्पष्ट न दीख पड़नेवके ओर अभ्िर्यभे खापित अथिके समान 
उद्दीप हौ रदे थे । नीचे सिर करके गिरतीं हर्द अच्छोदाने 
उनसे आत सखवरम कहा--भिरी रश्रा कीन्िः ॥ ३२.३३] 


तेरा सा तु मा भेषीरिति व्योचि व्यवस्थिता। 
वतः प्रसादयामास ताम्‌ पितृन्‌ द्निया गिरा ॥ ३४ ॥ 


उन पितसेने कहा--प्डरो मतः उनके फेस कहते दी 
अच्छोदा आकार स्क गयी ओर फिर दीन वाणीस उन 
पितरयोको प्रसन्न करने छ्गी } ३४ ॥ 
उमदुक्ते पितरः कत्वां शरष्टैश्व्या व्यतिक्रमात्‌ । 
अष्टरेभ्वयौ खदोपरेण पतसि न्वं वयुचिस्सिते ॥ ६५॥ 
व्यतिक्रमके कारण पु्ीको रे्र्यसे भरष्ट हुईं देख 
वे पितर कदने स्गे--(ुचिसिते } तू अपने दी दोपसे 
पिश्र्यते ष्ट होकर शिर रदी है॥ २३५॥ 
वैः क्रियन्ते हि कमीणि द्रायीरेदिवि वैवतेः। 
सैरेख ॒सत्कम॑फचं प्राप्लुबन्तीह देवताः ॥ २३६ ॥ 
“स्वर्गस्य देवता जिन शर्ररेर दारा चैसा कमं कसते उन 
क्का कछ वे उन शसक दौ धारण करके भोगतेद ॥२६॥ 
सद्यः फरुन्ति फञौणि देवत्वे प्रेत्य माषे । 
छद्मात्‌ त्वं तपसः पुति परतयेदं प्राप्स्यसे फलम्‌ ॥ २७ ॥ 
देवयोनि देवयोगवश चने हए कर्म तत्का ही फक 
देते ६ ओर मनुध्ययोनिमे किये हुए कमोका फर मरनेके बाद 
मिह करता है, अतः पुत्रि | तरू मरनेके बाद तपस्याका फल 
प्राप्र फरेगी ॥ ३७ ॥ 
धत्युका पिद्भिः सा ठपिवृन्‌ प्रसादयत खकान्न। 
ध्यात्वा प्रसादं ते चक्रस्तस्याः सवे ऽलुकम्पया ॥ ३८ ॥ 
पितररोके स प्रकार कनेर उसने अपने पितर्योको प्रसन्न 
किया । तब उन छोगोनि दयापूर्वके उसके कस्याणके विषमे 
विचर क्रिया ॥ ३८ ॥ 
भवदयं भाविनं क्षात्वा तेऽर्थ॑मूञुस्ततस्तु ताम्‌। 
अस्य राक्षो चसोः कन्या त्वमपत्यं भविष्यसि ॥ २९. ॥ 
उत्पन्नस्य पृथिव्यां तु मसुषेचु महात्मनः । 
फन्या च भूत्वा लोकान्‌ खान्‌ पुनः प्राप्स्यसि दुखंभान्‌४० 
वे अवश्य होनेबाखी घटनाको जानकर उससे कने 
रूगे---“जव यह महात्मा वसु मृत्युखोकये मनुष्य-योनिरम उत्प 
शिगाः तव तू इस राजाकी कन्या होगी । इस ग्रकरार 
इसकी कन्या बनकर तू फिर अपने दुम लोकौको मरत 
करेगी ॥ २९४० ॥ 
पराशरस्य दायादं स्वे पुश्च जनयिष्यसि । 
ख वेदमेकं व्रह्य्पिश्वतु्धा विभिष्यति ॥ ४१॥ 
महाभिषस्य पुधो दये शन्तनोः कीतिवर्ध॑नो । 
हिविधयीयं धर्मक्षं तया चिवाड्दं शुभम्‌ ॥ ४२॥ 
न्त्‌ परक्षर ऋषिका वंशधर पु उत्प करेगी । 
वह जिं पक वेदको चार भागो बिमक्त करेण । 
श्रित ( ओ ) महाभिष शन्तनु नामे राजाफी 
# एन्तु ही पूवष महाभिष बे । 


श्रीमहाभारते खिरभागे 


यव्य ववप्व््वववव 


कीतिको बदनिवाछे दो पुरोक्तो उत्पन्न करेगी, उनरभेसे 
एक धर्म पुत्रका नाम बिचिचवीर्य देगा अर दूसरे कल्याण- 
मय पुजका नाम चिब्राद्धद ॥ ४८१-४२ ॥ 
पतायुत्पा्य पुंस्त्वं पुनर्खकनदाप्स्यस्ि । 
व्यतिक्रमत्‌ पिवृर्णां च जन्म प्राप्स्यसि छुत्सितम्‌॥७३॥ 
ध्न पुत्रोको उत्पन्न करके तू अपने ल्ेकमिं फिर आ 
जायगी । पितरोौका व्यतिक्रम करनेके कारण तन्चे कुत्तित . . 
ज्म मिलेगा ॥ ४३॥ 
अस्यैव रान्नः कन्या त्वमद्विकप्या भविस्यसि । 
अश्वि भवित्री त्वं द्वापरे मत्स्ययोनिजा ॥ ४४ ॥ 
शू इसी राजक द्वारा अद्रिकाके गर्भ॑से कन्यारूपर्मे उत्यनन 
होगी ! ओर अघ्र्दसवै द्वापरे मख्खीकी संतानके रूपमे 
प्रकर होगी | ४४ 
एवमुक्ता तु 'दण्ेयी जाता सत्यवती तदा । 
मत्स्ययोनौ समुत्पन्ना राश्स्तस्य वसोः खता ॥ ४५ ॥ 
पितसोके इस प्रकार कहनेपर वह राजा वसुकी पुत्री 
( बनकर ) मत्स्ययोनिमे उतस्यन्न हई ! वही दाशेयी ( दाश- 
राजकरी पुती ) तथा सत्यवती कहटाती है ॥ ४५ ॥ 
वैराजा नाम ते रोका दिवि सम्ति सुदर्छनाः। 
यत्र॒ बर्हिषदो नाम पितसे दिवि विश्रुताः ॥ ४६॥ 
( अव पितरौके तीसरे गण बर्हिषर्यकां वर्णन कसते ई-) 
स्वम वैभ्राज # नामके दर्च॑नीव ल्क ह । जहो वर्हिषद्‌ 
नामवाठे द्युलोकःविख्यात पितृगण निवास करते द ॥ ४६ ॥ 
सान्‌ वे देवगणाः सवं यक्षगन्धर्वैसक्षसाः। 
नागाः सपः सुपणीदच भावयन्त्यमितोजसः ॥ ४७॥ 
समस्त देक्यणः यक्ष, गन्धर्वं, राक्षस, नाग, सपं 
तथा अमिततेजस्वी गण्ड आदि उन ८ वर्दिषद्‌ नामवकति 
पित्त ) की उपासना करते द || ४७ ॥ 


"पते पुत्रा महात्मानः पुलस्त्यस्य प्रजापतेः । 


मदत्मनो महामागास्तेजोयु्तास्तपखिनः ॥ ४८ ॥ 
ये वर्हिधद्‌ नामक पितर मदामाग्यवान्‌ तेजस्वी, तपस्वी 

ओर मदात्मा दै तथा महान्‌ आत्मयल्ते युक्त प्रजापति 

पुरस्त्यके पुत्र द ॥ ४८८ ॥ 

पतेषां मानसी कन्या पीवरी नाम विश्चुता । 

योगा च योगिपत्नी च योगिमाता तथेव च ।॥ ४२॥ 

भविष्षि दपरं प्रप्य युगं धर्म॑श्तां वस । 

परादारकुखोद्धत तः श्यको नाम महातपाः ॥ ५० ॥ 

भविष्यति युगे तसन्‌ महायोगी द्विजर्षभः । 

व्याल्ादरण्यां सम्भूतो विधुमोऽच्निरिव ज्वलन्‌ ॥५९॥ 


~~~ --~- ^ 
# निंद सूयनारायणका पक नाम्‌ रै । उन विराट्‌ स्॒यदेवके 


शोक वे्नाजं करुते रे । 


हरिवंशपषे ] 


हन ८ वर्हिषरद्‌ पितयं ) की मानसी कन्या पीवरी नामसे 
विख्यात है ! पीवरी स्वयं योगिनीः योगीकी पत्नी तथा योगिर्योकी 
माता है! धर्मधारिणी लियेमि श्रेष्ठ यह पीवरी द्ापस्मै उत्पन्न 
होनेवाटी दै । उसी युगम परारारके कुर्म व्यासजीके द्वास 
अरणीसे आविर्भूत धूमरहित अग्निके समान प्रकाशमान्‌? 
महातपस्वी, महायोगी दिजरेष्ठ शुक उत्पन्न होगे ।४८९-५१॥ 
सं तस्यां पित्कन्यायां पीवयां जनयिष्यति । 
कन्या पुधरांश्च चतुरोयोगाचायौन्‌ महावखान्‌ ॥ ५२ ॥ 
कृष्णं गौरं रमु शम्भुं छत्व कन्यां तथेव च । 
बरह्मद्तस्य जननीं मष्िषी त्वणुष्टस्य च ॥ ५३॥ 

वे ही श्युक्देव पितर्यौकी इस कन्या पीवर्मे कष्ण, गौरः 
प्रयु ओर शम्मु-इन चार मदाबरी योगाचार्य पुर्रो तथा 
्रह्मदत्तकी जननी ओर अणुदकी पत्नी कृत्वी नामाली 
कन्याको उत्यन्न करेगे ॥ ५२-५३ ॥ 


पताचुत्पाद्य धमौत्मा योगाचायौन्‌ महावलान्‌ । 
श्रुत्वा खजनकाद्‌ धमौन्‌ न्यासादमितयुद्धिमान्‌॥ ५९॥ 
महायोगी ततो गन्तापुनरावर्तिनीं गतिम्‌ । 
यत्तत्पदससुदि्ययव्ययं जह्य शाश्वतम्‌ ॥ ५५॥ 
चे धर्मात्मा इन महात्रतधारी योगाचार्योको उत्पन्न कर 
अपने पिता व्यासजीसे धर्मौका रहस्य सु्नैगे 1 तदनन्तर अपार 
बुद्धिवले महायोगी श्चक अपुनरावर्तिनी गतिको प्राप्त ₹हेगि । 
वह परमगति उद्वेगरहितः कभी नष्ट न होनेवास तथा सनातन 
ब्रहपदरूप हे 11 ५४.५५ ॥ 
अमूर्तिमन्तः पिते धर्ममूर्तिधरा सुने । 
„ कथा यत्ेयमुत्यन्ना चृष्ण्यन्धककुखान्वया ॥ ५६ ॥ 
सुने } अमूर्तिमान्‌ पितर धर्ममय शरैर धारण करनेवाले 
दै । इन्दणि इष्णि ओर अन्धक कुकसे सम्बन्ध रखनेवारी 
यह कथा आरम्भ होती है ॥ ५६ ॥ 
खुकखा नाम पितरो वसिष्ठस्य प्रजापतेः । 
निरता दिवि छोकेषु ज्योतिभौसिघु भाखुरः। 
सर्वकामसमृद्धेषु द्विजास्तान्‌ भावयन्त्युत ॥ ५७ ॥ 
इकार नासक पितर पजापति वसिष्ठके पुत्र ई । वे 
दीतिमान्‌ पितर स्वर्गे समी कामोपमोगंसि परिपूर्ण तथा 
ज्योतिमय सेकौमिं निवास करते दै । ब्राह्मणलोग उनकी 
ˆ आराधना करते है ॥ ५७ ॥ 
तेषा वै मानसी कन्या गौनौक्ना दिवि विश्रुता । 
वंशे या दत्ता शुकस्य महिषी परिया। 
पकम्ङ्गति विख्याता साध्यानां कीतिवदधिनी ॥ ५८ ॥ 
( माकंण्डेयजी कहते ह- भीष्म { ) इन ( युका नामक 
पितरो ) की मानसी कन्या सवर्गम गौ नामे विख्यात 
दै बह ठम्हारे ही बंद दी गयी है । वह ञ्ककी प्रिया 
.भ० ह° § 


अष्टददो ऽध्यायः 


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४६५ 


माया है । सार््योकी कीतिं वद्निवाली वह गो ( या ) 

एकश्रङ्खा नामसे प्रसिद्ध दे ॥ ५८ ॥ 

मरीचिगस्तौहटोकान्‌ समाभित्य व्यवस्थिताः) 

चे त्वथाङ्गिरसः पुराः साध्यैः संवर्धिताः पुरा ॥ ५९ ॥ 
( अब क्षत्रियो द्वारा पूञ्य आङ्गिरस पितरौका वर्णन कसते 

६-¬) पले निनका स्योने पोषण क्रिया थाः वे अङ्गिरा 

ऋछषिके पुत्र अङ्गिरस पितर सूकी किरणेसि प्रकाशित दने 

वाठ ठोर्कोका आभय ठेकर रहते द ॥ ५९ ॥ 

तान्‌ श्भियगणास्तात भावयन्ति फलार्थिनः । 

सेषां तु मानसी कन्या यद्योवा नाम विश्वुता ॥ ६० ॥ 
तात ! फल चादनेवारे क्षन्निय लोग उन ( आङ्धिरस 

पितसका पूजन करते है! इन ८ आङ्गिरस पितरो) कौ 

मानसी कन्या यदोदा नामसे प्रसिद्ध है ॥ ६० ॥ 

पत्नी सा विभ्वमहसः स्युषा वे बृखद्ार्मणः। 

रजर्जननी चापि विटीपस्य महात्मनः ॥ ६१ ॥ 
मह विश्रमहानी पत्नी, इदधश्षमीकी पुप्रबधू एनं 

रानि महात्मा दिखीपकी मातां हे ॥ ६१ ॥ 


तस्य यक्षे पुरा गीता गाथाः भीतेर्महर्षिभिः। 
तदा देषयुगे तात वाजिमेधे मष्ामसे ॥ ६२॥ 


तात { उस समय देवयुगे उस ( दिलीप ) के अश्वमेध 
नामक महाय महर्षियनि प्रसन्न होकर यष्ट गाया गायी थी-॥ 


अग्नेर्जन्म तथा श्रुत्वा शाण्डिस्यस्य महात्मनः । 
दिङीपं यजमानं ये प्यन्ति खुसमादिताः। 
सत्यवन्तं महात्मानं तेऽपि खर्गजितो नराः ॥ ६३ ॥ 
४जो मनुष्य चित्तको एकाग्र करके शाण्डिल्यगोघरमे उत्पन्न 
महात्मा अग्निके जन्मको सुनकर सत्यवादी महातमा दिलीपको 
यच करते देखते ई, वे मी स्वर्गको जीत रगे, ॥ ६३ ॥ 


खखधा नाम पितरः कर्दमस्य प्रजापतेः । 

समुर्पक्नास्तु पुरहान्महात्मानो दिजर्षभाः ॥ ६७ ॥ 
कर्दम प्रजापतिके सुस्वधा नामवारे पितर ईः जो 

जास्णोमिं भेट ओर मदान्‌ आत्मबल्ते सम्पन्न ह तथा मषिं 

पुल्हसे उसन्न हुष् दै ॥ ६४॥ 

रकेषु दिवि षर्तन्से कामगेषु विष्ङ्गमाः। 

सां देदयगणास्तात भावयन्ति फलाथिनः ॥ ६५ ॥ 
तात | ये आकाशम विचरण करनेवाे ( सुस्वधा संश 

पितर ) स्मर्गमे इच्छानुसार सव्र कामना्ओंकी पूति करनेबाठे 

रोकौमि रते र । फल-कायुक वैश्यगण इनी उपासना 

करते द ॥ ६५ ॥ । 

लेषां वे मानसी कन्या विष्जा नाम विशरुखा ! - 

ययातेजेलनी जक्षभ्‌ महिषी महुषस्य च ॥ ६६॥ 


५. 


( सनक्छरुमास्नी कहते ई) ब्रह्मन्‌ | इनकी मानसी कन्या 
विरजा नामसे प्रसिद्ध दै। वह ययातिकी माता ओर 
नहुषकी पत्नी दै ॥ ६६ ॥ 
खय पते गणाः पोक्तश्चतुर्थं तु निवोध मे । 
उत्पन्ना ये खधायां ते सोमपा वै कवेः सुताः! 

` हिरण्यगर्भस्य खुताः शद्रास्तान्‌ भावयन्त्युत ॥ ६७ ॥ 

यह मैने मनुप्यून्य पितरस तीन गर्णोका वर्णन कर दिया । 
अव्र चये गणका वर्णन सुनो ये पिचरगण कथिकी पुत्री 
स्वधाके गर्भसे उत्पतन हुए पुत्र द ओर सोमपा कलते ई । 
ये अभ्निके आत्मज द । शूद्र इनकी उपातना करते ई ॥६७॥ 
मानसा नाम वे छोका यत्र तिष्ठन्ति ते दिवि 1 
सेषं वै मानसी कन्या नर्मदा सरितां वय ॥ ६८॥ 
ये स्वर्गमै जिन स्रोकेमिं निवास करते ईः वे मानस- 
रोक कहलाते दै । इनकी मानसी कन्या नर्मदा कदाती दै? 
जो नदिरयमि श्रेष्ठ है ॥ ६८॥ 
या भावयति भूतानि द्तिणापयगामिनी । 
पुरुकुत्सस्य या पत्नी धरसदस्योर्जनन्यपि ॥ ६९॥ 
वह दक्षिणापथकी ओर बहकर प्राणिर्योको पवित्र करती 
दे । वह पुर्कुत्छकी पत्नी ओर त्रसदस्युकी माता है ६९ ॥ 
तेषामथाभ्युपगमान्मचुस्तात युगे युगे। 
प्रवर्तयति धाद्धानि नष्टे धमे प्रजापतिः ॥ ७० ॥ 
तात! प्रजापति मनु प्रयेकं युगके आरम्भर्मे एन पितररोको 
पूज्य समन्नकर दुत दए भाद्ध-धर्मका उद्धार करनेके च्ि 
श्रद्धोको फिर प्रचलति किया करते द ॥। ७० ॥ 
पिवरृणामादिसगेण सर्वेषां दिजसत्तम 1 
तस्सदेनं ख्धर्तेण श्राद्धदेवं वदन्ति वै ॥ ७१] 
द्विजसत्तम | ( यम ) इन सवर सात प्रकारके पितरेकरि 
आदि उत्यन्न होत दै ओर ये अपने धर्मके प्रवर्तक है । स 
कारण इनको श्राद्वदेव कहते ह ॥ ७१ ॥ 
सवेषां राजतं पा्मथ वा रजतान्वितम्‌ । 
दषं खधां पुरोधाय दध प्रीणाति वै पितृन्‌ ॥ ७२॥ 
दन सव पितररोको चोदीका या ्चोदी मिला हुआ पान 
तथा (स्वधा पिव्रम्यः+ कहकर दिया हया भाद्ध तृप्ति एवं 
प्रसन्नता प्रदान करता ह ७२ ॥ 
खोमस्याप्यायनं छृत्वा अग्नेदैवखतस्य ख । 
उव्गायनमप्यद्रावग्न्यभावेप्प्छु चा पुनः ॥ ७६॥ 
पितृन्‌ प्रीणाति यो भक्त्या पितरः भ्रीणयन्ति तम्‌। 
यच्छन्ति पितरः पुष्टि प्रजाश्च विपुलास्तथा ॥ ७४॥ 
खर्गमायोग्यमेवाय यदन्यदपि चेप्सितम्‌ । 
देवकायौदेपि सुने -पिदरकार्य विशिष्यते ॥ ७५॥ 


इति श्रीमहाभारते खिकभागे हरिवंशे दरिवंशापर्वणि 


ध्रीमदाभास्ते सिखभागे 


[ हरिशे 


जो मनुष्य सोम, अग्नि ओर वैवस्वत यमका आप्यायन 
करके फ़िर अगन्म उदगायन करता है यथवा अग्निके अभावे 
ज्म उदगायन करके पितर्यौको भरिपूर्वक वपत करता ४, 
उसे पितर्‌ वप्त करते ६ । तथा ब्रहुत-सी संतानः पुष्टि, स्वर्ग 
प्वं आरोग्य ओर समस्त अमी वस्र्य प्रदान करते ई । मने | 
पितृकार्यं देवकार्यसे मी श्रेष्ठ है ॥७३-५७५॥ 
देवतानां हि पितरः पूर्वमाप्यायनं स्प्रतम्‌ । 
दीघ्रप्रसादा हक्रोधा खोकस्याप्यायनें परम्‌ ॥ ७६॥ 
पितर आप्यायन ८ तरूप्त ) करनेपर देवताओंसे भी 
पहले प्रसनन दो जति ह । ये पितर शीघ्र प्रसन्न दोनेवके तथा 
क्रोधरष्िति ई ओर लोर्कोको प्रसन्न रखनेवारे ई ॥७६॥ 
स्थिरग्रसादाश्च सदा तान्‌. नमस्यख भार्गव । 
पित्भक्तोऽसि विप्र मद्धकुश्च चिरोपतः ॥ ७७] 
( सनक्कुमारजी मारकेण्ेय ऋछपिते कते ६ › मार्ग॑व | 
पितर्योका प्रसाद सदा स्थिर रटनेवाख ताह, दस्य वम उन्दं 
प्रणाम किया करो ! विप्रे | चम पितरोकि मक्तष्टो भौरमेरेतो 
वहुत वदे मक्त दो ॥ ७७ | 
धेयस्तेऽय विधास्यामि परत्यक्षं कुरु तस्‌ खयम्‌। 
दिव्यं च्षुः सविक्षानं प्रदिद्रामि च तेऽनघ ॥ ७८॥ 
निष्पाप मदर्थं | शस्य भ आज वुम्दाया कव्याणं करगा, 
उखे ठम स्यं परत्यक देख लो | तुम्द विश्ानसदित दिव्य 
नेत प्रदान करता हँ ॥ ७८ ॥ 
गतिमेतामथरमन्तो मार्कण्डेय निदामय। 
न हि योगगतिर्दिव्या पितणां च परा गतिः ॥ ७९॥ 
त्वद्धिधेनापि सिद्धेन दद्यते मांसचश्रुपा 
स पवमुक्त्वा देवेशो मामुपस्यितमप्रतः ॥ ८० ॥ 
चध्दस्वा सविक्षानं देवानामपि दुर्खभम्‌ । 
जगाम गतिमिष्टां वै दितीयो ऽभिरिव ज्वलन्‌ ॥ ८९॥ 
माकण्डेय ¡ अव तुम (श्रादके फलर्पे मिल्नेवाटी ) 
इस गतिको सावधान दोकर देखो । ठम-मैखा सिद्ध पुरुप मी 
इख मांसमय चष्युसे योगिरयोकी दिव्य गतिको ओर पितर्योकी 
परा गत्रिको नही देख सकता । यो कष्टकर वे देवेश्च सामने 
खे हु मुस्क देवताओंके ल्थि मी दुर्लम विटानसुहित 
दिव्य नेत्र देकर द्वितीय अग्निके समान प्रकाशित शेते हुए 
अपने इष्ट-प्यानको चे गये ॥ ७९-८१ ॥ 


तक्षिबोध कुरधेष्ठ॒यन्मयासीक्निदामितम्‌ 1 


` म्रसादात्‌ तस्य देवस्य दुर्यं मुवि मादुैः ॥ ८२॥ 


करशरेष्ठ भीम्म { उन देवताकी कृपासे सने जो षटना 
देखी थी» उसे ठम खनो । एथिवीमं उस षटनाका जानना 
मनु्योके ल्म मदाकठिन है 1 ८२॥ 
पणि पिठकस्पे घष्टदकोऽध्यायः ॥ १८ ॥ 


श प्रकार रशरमहयभारत सिरभाग दिवश भन्तमत इिवंशपरवमे पितृकटपविषयक अठारह प्याय पूरा हुमा ॥ ९८ ॥ 
------ग ०५ ----- ~ । 


हस्विशपषं ] 


पकोनविदो.ऽभ्यायः 


६७ 


ननन ज~ 
एकोनविंशोऽध्यायः 
पितकल्य- भरद्राजके पप्रोकी कथा, योगस्र् पुररषोकी गति, योगसिद्धिके अधिकारी 
पुरुषेफि र्षण तथा माकेष्डेय-सनल्डमार-संबादकी समाधि 


मारकेण्डेय उवाच तजा 
आसम्‌ वात भस्दाजात्मजा दिजाः। . 
श चठ दुग्धरितेन वै ॥ २ ॥ 
माण्डेयजी कहते है--८ सन्कुमारजीने अन्तर्धान 
होनेसे पहले मुञ्चते इस प्रकार कहा--) तात ! पू्वयुगसे 
कुछ जाह्यण रहते थे, जो मरद्वाजके पुत्र थे । वे योगधर्मका 
सेवन करतेकरते दुयाचास्मै फस जनके कारण ( स्वगंसे ) 
्रष्टहोगयेये॥ १॥ 
अपथंदामसुप्रा्ा योगधम्गौपचारिणः। 
महतः सरसः परे मनसस्य विसंक्षिताः ॥ २ ॥ 
वे योगधम॑का उष्छद्धन करनेवाञे आद्यण अचेतन-से 
होकर महान्‌ मानसरोवरके तटपर आकर गिरे॥ २॥ 


तमेवार्थमयुध्यायन्तो नष्टमण्छिव मोष्िताः। 

अप्राप्य योगं ते सवे संयुक्ताः कारुधर्मणा ॥ ३ ॥ 
वे समी जलम इ्भवते दए पुरुषके समान मोहम पड़ गये 

ओौर उसी योगविषयका विचार -करते-करते योगके तत्वको 

बिना पयेद्यीमरगये।॥३॥ 

ततस्ते योगविश्रष्टा देवेषु सुचिरोषितः । 

जाताः कौिकदायाकाः कुरक्ेषे नरर्षभाः ॥ ४ ॥ 
अव वे योगश्रष्ट नरश्रेष्ट मरद्वाज-पुत्रः जो दीर्घकाङतक 

देवतायंमि रह चुके है, कुर्न कौशिकके पुत्र बनकर 

उत्पन्न हग ।॥ ४॥ 

हिंसया विहरिष्यन्तो धम ॑पिदरूतेन बै। 

ततस्वे पुनराजाति च्रष्टाः धाष्सयन्ति कुत्सिताम्‌॥ ५ ॥ 
वे (ब्राह्मण होनेपर भी ) पितरोके लि धर्म ( श्राद्ध )के 

बहाने हंसा करगे फिर वह दहिसारूपी पाप करनेके कारण 

भरष्ट होकर कुत्सित योनिम उत्पन्न होगे ॥ ५ ॥ 

तेषां पिपसरदेन पूर्वजाविरूतेन वै । 

स्मरतिरत्पत्सयते प्राप्य तां तां जासि जुगुप्सिताम्‌॥ ६ ॥ 
परतु पूवंजन्मक्रे पितरोकी कृपाकरे कारण उसउस 

निन्दित योनिम उत्पन्न होनेपर मी उनको पूर्वजन्मकी स्यृति 

बनी रहेगी ॥ ६ ॥ | 

` ते धर्मचरिणो नित्यं भविष्यन्ति समाष्िताः। 

आह्मण्यं धतिरुष्स्यन्ति वतो भूयः खकर्मणा ॥ ७ ॥ 
वे प्रयेकं जन्ममे धर्मात्मा रहकर अपने चित्तो सावधान 

रखे ओर ( अन्तम ) अपने कर्मक फिर बाह्मणत्वको 

प्रात करल ॥७॥ 


ततश्च योगं ाप्स्यन्ति पू्ेजातिरूतं पुनः । 
भूयः सिद्धिमलुपापताः स्थानं भराप्स्यन्ति शभ्वसम्‌॥ ८ ॥ 
उस जन्मभे वे पुनः अपने पूरवजन्मके योगको पार्थेगे ओर 
फिर सिद्धिको पाकर शाश्वत स्थानको प्रप्त करेगे ॥ ८ ॥ 
चवं धत च ते बुद्धिभैविष्यति पुनः पुनः । 
योगध्मे च नितरां प्राप्यसे बुद्धिसु्वमाम्‌ ॥ ९ ॥ 
इसी प्रकार ठम्हारी बुद्धि भी बार्वार धर्ममही र्गी 
रहेगी ओौर वमद योगध्मके विषयमे सव प्रकारसे उत्तम 
बुद्धि प्राप्त होगी ॥ ९ ॥ 
हि दु्तंभो नित्यमल्यपर्ेः कदाचन । 
कश्ध्वापि नाश्यन्त्येनं ्यसनेः कटडतामिताः। 
अधरमष्वेव वर्तन्ते प्रादैयन्ते शुरूनपि ॥ १०॥ 
अस्यबुद्धि मनुर््योको योगसिद्धि मिख्ना सदा दुकंम है । 
उन्दं कदाचित्‌ योगसिद्धि मिक मी जाय तो वे (मृगया अदि) 
व्यसरनोपि करर होकर उसे नष्ट कर डालते द । वे अधर्मे 
कामम ही तपो रते ६ तथा अपने गुसज्नोको भी कमै 
डार्ते रहते दै ॥ १० ॥ 
याचन्ते न त्वयाच्यानि रस्षन्ति शरणागतान्‌ । 
नावजानन्ति कृपणान्‌ माधयन्ते न धनोष्मणा 1 ११॥ 
युकाष्टारविष्टाराश्च युकयेष्टाः सकर्सु । 
ध्यानाभ्ययनयुकत( न नष्टालुगवेषिाः ॥ १२ ॥ 
नोपभोगरता नित्यं न मांसमधुभक्षणाः। 
न च कामपरा नित्यं न विप्रासेविनस्तथा ॥ १३॥ 
नानार्यसंकथासका नालस्योपष्टतास्तथा । 
नात्यन्तमरानसंसक्ता गोष्ठीषु निरतास्तथा ॥ १७ ॥ 
भाप्लुबन्ति नरा योगं योगो वै दुर्लभो यवि । 
भदन्त जितक्रोधां मानाहंकारवर्सिताः ॥ १५॥ 
जो अयाच्यसे याचना नदीं करते, शरणागतीकी 
रशा करते हैः कृपण ८ दीन ) पुरषोका अपमान 
नदीं करते तथा जो धनकी गर्मसि मदमत्त नहीं होते; 
जिनक्रा आहारविदार शाल्ञानुकूठ होता है, जो अपने कर्म 
शालरानुसार चेष्ट करते हैः रईश्वरके ध्यान तथा खाष्या्यमे 
परायण रहते हैः नष्ट हुई वस्वुको पनिके च्वि चोर 
आदिको नदीं द्वदे, सर्वदा भोगमे ही खीन नही रहते, 
सव॑दा मघु-मांसका भक्षण नदीं करते ओर सर्वदा काम- 
परायण भी नहीं रहते तथा जो सवदा ब्राहर्णोकी सेवा करते, 
अनार्यं पुसर्ोकी बाम आसक्तं नहीं होते, जिनको कमी 
आख्स्म नह सताता, जो अयन्त अमिमानमे आसक्त नहीं रहते, 


४८ 


श्रीमष्टाभारते सिर्भागे 


[ हरिवंशे 


सदा आत्ममीमांसा करने तमे रदते ई, पेसे शान्त चिमे, 
क्रोधको जीतनेवदे, मान तथा अष्टकाररष्ित मनुरष्योको योग- 
चिद्धि मिरती ह; क्योकि पृथ्वीम योगकी प्राति अति दुर्लमदै ॥ 
कल्याणभाजनं ये तु ते भवन्ति यत्रताः। 
णवंविधास्तु ते चात ब्राह्यणा हयभवंस्तदा ॥ १६॥ 
पसे तोका पठन करनेवाले मनुष्य टी कल्याणके पातन 
दते दै । तात ¡ वे ( भरषवाजप्रुष ) पेते ही नाण ननकर 
उलन हुए द ॥ १६ ॥ 
स्मरन्ति ्ात्मनो योषं ॒प्रमादङूतमेव तु। 
ध्यानाभ्ययनयुकाध शान्ते घत्म॑नि संस्थिताः ॥ १७॥ 
वे अपने प्रमादवशा हुए दोषका स्मरणं करते रहते द ओर 
ध्यान तथा स्वाध्यायमे रगे रहकर शान्त मागम सित रहते ये॥ 
योगधमौद्धि धर्मक्ष न धममोऽस्ि विदोपवान्‌। 
वरिष्ठः सर्व॑धमीणां तमेवाचर भार्गव ॥ १८॥ 
धर्मज्ञ मा्गव ! योगधर्मसे शरेष्ठ ओर कोर धर्म नही दै । 
बह सभी ध्माति श्रष्ठहै, अतः तुम उसीका आचरण करो ॥१८॥ 
कालस्य परिणामेन र्ष्वादासे जितेन्द्रियः। 
तत्परः प्रयतः श्राखी योगधर्ममवाष्स्यसि ॥ १९ ॥ 


यदि छम श्रद्धापू्ैक प्रयलशील एवं योगधर्मं परायण 
रहकर एलका मोजन करते एए भ्तिन्द्रिय रदोगे तो 
कालक्रमसे तुमं योगसिद्धि प्रा हो जायगी | १९॥ 
श्तयुक्त्वा भगवान्‌. देवस्तभ्रेवान्तरधीयत । 
अदैवं वपीणि त्वेकादमिव मेऽभवत्‌ ॥ २० ॥ 
( मार्कण्ेयजी कहते ६ किं) इतनी बाति कहकर 
भगवान्‌ सनत्कुमार वटी अन्तधनि हयो गये । ये (सनक्छुमारः 
की सेवम बीति हुए ) भठारह वषं भन्ने एक दिनकरे समान 
प्रतीत हुए. ॥ २० ॥ 
उपासतस्तं देवेशं वच्पीण्याद्दोव मे। 
प्रसादात्‌ तस्य देवस्य न ग्टानिरभवत्‌ तदा ॥ २९१॥ 
अढारह्‌ वर्ष॑तकं उन देवेशकी उपासना करते रदनेपर 
भी उनकी कृपाके कारण उस समय सक्च कुछ नी ग्छानि 
नदीं हई ॥ २१ ॥ 
न क्षुत्पिपासे कालं चा जानामि स तदानघ। 
पश्चाच्छिप्यसकाशाद्‌ ठु काटः संविदितो मया ॥ २२॥ 
निष्पाप | मुद्चे भूखः प्यास ओर नमय आदि कु न 
माद्म हुथा । वाम िष्यके द्वारा मुनचे समयका पता ख्गा ॥ 


दति श्रीमष्टाभारते चिकभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि पिठ्कट्पे एकोनविंशोऽध्यायः ।। ५९ ॥ 
इस प्रकार श्रीमहाभारत क्िकभाग दसिवंरके अन्तत रखिंशपवमे पितृफट्पतिपयक उत्तीर अध्याय पृरा हुमा ॥ ९९ ॥ 


विरोऽध्यायः 


पिवकल्प--बहदत्त ओर उग्रायुधके ष॑श तथा पूजनीया चिडियादारा ययुक्रनीतिका वणेन 


मारकेण्डेय उवाच 
तसिन्नन्तर्हिते देवे वचनात्‌ तस्य वै प्रभोः 
चश्षरदिन्यं सविक्षानं प्रादुरासीत्‌ तदा मम ॥ १ 
माकण्डेयजी वोे--उन सनक्कुमारदेवके अन्तर्धान 
होनेपर उन्ीं प्रसुक्रे वरदानसे मुन्ने दिव्य विज्ञानमय नेत 
प्राप्त हो गया ॥ १॥ 
ततोऽहं तानपर्यं वै नाह्यणान्‌ कौशिकात्मजाय्‌ । 
आपगेय कुरुक्षेत्रे यावा वियु्म॑म ॥ २॥ 
गङ्गानन्दन भीष्म | तव मैने उन कौरिकपुत्र बाह्र्णो- 
को कुरक्ेत्रमे देखा, जिनका विभु सनक्छुमारजीने युदसे वर्णन 
क्रिया था॥२॥ 
न्षप्तोऽभवद्‌ राजा यस्तेषां सप्तमो द्विजः। 
पिकृवर्तीति विख्यातो नाम्ना शीखेन कर्मणा ॥ ३ ॥ 
उन कुिकपूर्बमिं जो सातर्वो पिवरवर्तीं नामसे विख्यात 
ब्राह्मण थाः, वह अपने शील ओर कर्मसे ( सात जन्म ) 
ब्रह्मदत्त नामक राजा हुआ ॥ ३॥ 


शचुकस्य कन्या छृत्वी तं जनयामास पार्थिवम्‌ । 
अणुषात्‌ पार्थिवधे्ठात्‌ काम्पिल्ये नगरोत्तमे ॥ ४ ॥ 
काग्पिल्यनामक शरेष्ठ नगस्म पाधिवश्रेठ अणुहके यों 
ञ्॒ककी कन्या कत्वीके उद्रसे राजा व्रह्मदत्त उन्न हज ॥ 
भीष्म उवाच 
यथोवाच महाभागो माकण्डेयो मदातपाः। 
तस्य वंशमहं जन्‌ कीतयिष्यामि तच्छ्रणु ॥ ५ ॥ 
भीष्मजी बोले-राजन्‌ ! महाभाम्यवान्‌ एवं महातपस्वी 
माकंण्डेयजीने जिस प्रकार मुद्चसे कहा था, ( उमी तरह ) 
म उस राजाके वंशका वर्णन करंगा, ठुम सुनो--॥ ५॥ 
युषि्ठिर उवाच 
अणुहः कस्य वै पुत्रः कस्मिन्‌ काले वभूव ह्‌ । 
राजा धर्मश्रतां शषठो यस्य पुञ्चो महायशाः ॥ ६ ॥ 
युधिष्ठिरने पूखा--(पितामह {) जिनके पुत्र महायदास्वी 
(ब्रह्मदत्त) येः धमात्माओमि श्रेष्ठ वे राजा अणुह किनके पुत्र 
थे ओर किस समय उतपन्न हए थे १॥ ६ ॥ 


'हरिवंशापवं | 


विरोऽध्यायः 


द, 


ब्रह्मदत्तो नरपतिः किंवीर्यः स बभूव ह । 
कथं च सप्तमस्तेषां स बभूव नराधिपः ॥ ७ ॥ 
राजा ब्रह्मदत्तका पराक्रम केसा था१ओौर वेउन 
(मरद्वाजयुनँ ) मे सत्वे कैसे ये १॥ ७ ॥ 
न शयल्यवीयौय श्युको भगवोद्धोकपूजितः। 
कन्यां भ्दच्याद्‌ योगात्मा छृत्वीं कीतिंमतीं प्रमुः॥ ८ ॥ 
लोकमि पूजनीय योगकी मूरति स्ंशक्तिसम्पन्न भगवान्‌ 
शचुकदेवजीने अपनी कीर्तिमती कन्या कृत्वीको किसी 
साधारण शक्तिवाले युरुषके हाथमे नदीं दिया होगा ॥ ८ ॥ 
पतदिच्छाम्यदहं श्नोतुं॑विस्तरेण महाद्युते । 
ब्रह्मदत्तस्य चरितं तद्‌ भवान्‌ वक्तुमर्हति ॥ ९ ॥ 
महायुते । म ब्रह्मदत्ते इस चरित्रको विस्तारपूर्वक 
खनना चाहता हूः अतः आप उसका वर्णन कौन्यि ॥ ९ ॥ 
यथा च वत॑मानास्ते संसारे च दविजातयः 
माकंण्डेयेन कथितास्तद्‌ भवान्‌ प्र्रवीतु मे ॥ १० ॥ 
माकेण्डेयजीने उन द्विजोके संसासमे विचरण करनेका 
ब्तान्त जिस प्रकार कदा हो, उसे आप उसी भोति भुद्यरे 
किये ॥ १० ॥ 
मीष्म उवाच 
प्रतीपस्य तु राजषेस्तुल्यकालो नराधिषः। 
पितामहस्य मे राजन्‌ बभूवेति मया श्रुतम्‌ ॥ १९॥ 
भीष्मजीने कटा--राजन्‌ ! गने सुना ह कि राजा 
बरसदत्त मेरे पितामह राजिं प्रतीपके समयमे दी हुए ये ॥ 
बह्मदचो महाभागो योगी राजपिंसत्तमः। 
खुतक्षः सर्वभूतानां सर्वभूतहिते रतः ॥ १२॥ 
ब्रह्मदत्त सव प्राणियोके हितमे खगे रहनेवाले, राजर्ियेमि 
शरेष्ठः महाभाग्यवान्‌ ओर योगी ये । वे समी प्राणियोकी बोली 
समञ्च ञ्तेये॥ १२॥ 
सखाऽऽस गाखवो यस्य योगाचार्यो महायदाः। 
रिक्षासुत्पा्य तपसा क्रमो येन प्रवर्तितः । 
कण्डरीकश्च योगात्मा तस्यैव सचिवो महान्‌ ॥ १३॥ 
._ जिन्दनि तपोवर्ते वेदाञ्गभूत रिक्षाका आविर्भाव करके 
वेदिक संदिताकरे मन्ोका क्रमपाठ प्रचलति क्रियाथा, वे 
महायशस्वी योगाचायं गाख्व बह्यदत्तके सखा ये । तथा 
योगात्मा कण्डरीक इन्दी राजाके प्रधान मन्त्री ये | १३ ॥ 
जात्यन्तरेथु सर्व॑ सखायः स्वं पव ते। 
सप्तनातिषु सप्तैव बभूवुरमितौजसः । 
यथोवाच महाभागो मकरण्डयो महातपाः ॥ १४॥ 
तस्य बेशमहं राजन्‌ कीतैयिष्यामि तच्छृणु । 
ब्रह्मदत्तस्य पौराणां पौरवस्य महात्मनः ॥ १५ ॥ 
इनं खात भरद्वाजपुरनोके सात जातिर्योमि सात बार जन्म हए 
ओर ये समी अमिततेजस्वी द्विज उन सम्पूणं जन्मान्तरोमि 


ए दुसरेके मित्र वने रहते थे ! राजन्‌ | महामाम्यवान्‌ 
एवं महातपस्वी मार्कण्डेयजीने जिख प्रकार सुश्चसे कटा थाः 
उसी प्रकार मेँ पुख्वंशियोँ एवं पुखवंशी महात्मा नक्षदस्तके 
वंशका वर्णन करता हू उसे सुनो ॥ १४-१५॥ 
चृहतक्षनस्य दायादः खदोत्रो नाम धार्मिकः । 
खद्टोत्रस्यापि दायादो हस्ती नाम बभूव ह ॥ १६॥ 
बृहत््ष्रके पुत्र धार्मिक सुहोत्र हए ओर सुशेत्रके भी 
पुत्र हस्ती हए ॥ १६ ॥ 
तेनेदं निर्मितं पूर्यं॑हस्तिनाएुरसुत्तमम्‌। 
हस्तिनश्चापि दायादाख्यः परमधार्मिकः ॥ १७ ॥ 
अजमीढो द्विमीढश्च पुरूमीढस्तथेव च । 
अजमीढस्य धूमिन्यां जके बहदु । 
बृहद्धलु्बहदिषोः पुचस्तस्य महायदाः ॥ १८॥ 


राजन्‌ } उन्होने ही इस .उत्तम दस्तिनापुरको वसया 
था | हस्तीके भी अजमीढः द्विमीढ ओर पुरमीढ नामवाके 
परम धामिक तीन मुत्र हुए । अजमीटके धूमिनी नामकी 
पत्नीके गर्भसे बरहदिषु उदन्न हुए ओर वृहदिषुके पुत्र 
महायशस्वी बरहदुधनु हुए ॥ १७-१८ ॥ 
बरदद्धमंति विख्यातो राजा परमधार्मिंकः। 
सत्यजित्‌ तनयस्तस्य विश्वजित्‌ तस्य चात्मजः ॥ १९ ॥ 
वे परम धर्मात्मा राजा बृदद्धरमां नामसे भी प्रसिद्ध थे । 
उनके पु सत्यजित्‌ हूए ओर सत्यजित्‌ पुत्र विशवभित्‌ हए ॥ 
पुध्रो विभ्वजितश्चापि सेनजित्‌ परथिवीपतिः। 
पुत्राः सेनजितश्चाखंश्चत्वारो लोकविश्रुतः ॥ २० ॥ 
विश्वजित्‌के भी पुत्र राजा सेनजित्‌ हुए. ओर सेनजित्‌के 
चार पुत्र हुए जो समस्त विश्वमे विख्यात ये ॥ २० ॥ 
रुचिरः शेतकेतुश्च महिम्नारस्तथेव च । 
वत्सश्चाचम्तको राजा यस्यैते परिवत्सकः ॥ २९॥ 
राजा ( सेनजित्‌ ) अवन्तीम रहते थे । उनके. रुचिरः 
उवेतकरेु, महिम्नार ओर वत्स नामक ( चार ) पुत्र थे ।२१॥ 
सुचिरस्य तु दायादः प्ृुखेनो महायशः । 
पृथुसेनस्य पारस्तु पारान्नीपस्तु जक्षिवान्‌ ॥ २२ ॥ 
खचिरके पुत्र महायरस्वी परथुसेन हुए । पृरथुसेनके पार 
ओर पारके पुत्र नीप हुए ॥ २२॥ 
नीपस्यैकरतं तात ॒पुत्राणाममितौजसाम्‌ । 
महारथानां रजेन्द्र॒ शूराणां वाहुशालिनाम्‌ । 
नीपा दति समाख्याता राजानः सर्वं एव ते ॥ २३ ॥ 
तात ! नीपके परम पराक्रमी, बाहुराली एवं महारथी 


सो वीर यु उत्पन्न हुए. । रजेन्द्र । वे सव नीप्वंशी राजा 
करते थे ॥ २३ ॥ 


५७9 


तेषां ` बंदाकरो राजा नीपानां कीरतिबदधंनः। 
काम्पिट्ये समयो नाम सचेष्टसमये ऽभवत्‌ ॥ २४७॥ 
काम्पिल्य नगस्मै उन नीपेकि नंशप्रवर्तक एं कीर्तिवर्धंक 
राजा समर हृष्ट । उनको संग्राम ब्रहुत प्रिय था ॥ २४॥ 
समरस्य परः पारः सदभ्ब शति ते भयः। 
पुकः परमधर्महाः परपुधः पथर्यभौ | २५'॥ 
समर प्रर पार ओर सदश्च-वे तीन परम धर्म॑ पुत्र 
हष । षरफे पुत्र पृथु हृष्टः ॥ २६५ ॥ 
पृथोस्तु॒ सुकृतो नाम खुरूतेनेह कर्मणा 1 
जक्षे सर्वगुणोपेतो निश्राजस्तस्य चात्मजः ॥ २६॥ 
संसार पुण्यकमं ८ शकृत ) करनेके कारण पृथुके 
सरवगुणसम्पन्न सुकृत नामक पुत्र उसन्न हुभा ओर सुकृतकरे 
पुत्र विभ्राज हुए ॥ २६ ॥ 
बिश्राजस्य तु पुषोऽभूदणुहो नाम पा्थिवः। 
वभौ श्युकस्य जामाता छृत्वीभती म्टायश्चाः ॥ २७ ॥ 
विभ्राजकरे पुत्र अणुह हुए । वे भहायशस्वी राजा श्चुक- 
के जामाता ओर कृत्वीके मतकि रूपमे बे सुशोभित हए ॥ 
पुबोऽणु्टस्य राजर्पिर्रहमदत्तोऽभवव्‌ प्रभुः । 
योगात्मा तस्य तनयो विष्वक्सेनः परंतपः ॥ २८॥ 
विभ्राजः पुनरायातः खरूतैनेष्ट कर्मणा । 
अणुद्के पुत्र राजर्धिं नक्मदत्त हुए । उनके पुर योगात्मा 
विष्वक्सेन हृष जो बद प्रमावाटी जर शघुरओको संतप्त 
करनेवाले थे .। विश्राज अपने कर्मके कारण त्रहमदप्तकरे पुत्र 
( बिष्वकूसेन ) वनकरर फिर उत्पन्न हु ये ॥ २८१ ॥ 
ब्रह्मदतस्य पुच्रोऽन्यः सर्वसेन शति श्चुतः ॥ २९॥ 
चक्षुषी तस्य निर्भिन्ने पक्षिण्या पूञनीयया । 
सुचिरोपितया राजन्‌ ब्ह्मद्चस्य वेदमनि ॥ ३० ॥ 
ज्रहमदत्तफे दुसरे पुत्र सव॑सेन नामसे प्रसिद्ध ये। 
राजन्‌ | उनके दोर्नो नैर्नोको वहत समयसे ब्र्मदत्तकर 
-महृल्मै रहनेवाली पूजनीया नामक पक्षिणी ( चिडिया ) न 
फोड़ दिया था-॥ २९-३०॥ 
अथास्य पुश्कस्त्वपसे ब्रह्मदत्तस्य जश्िवान्‌ । 
विष्यक्सेन शति ख्यातो मष्टाबरुपराक्रमः ॥ २१ ॥ 
तदनन्तर ब्रह्मदत्तके दूसरा पुत्र उत्पन्न हुआ । यद 
महाजरी एवं परार्मी ८ विभ्राजावतार ) विप्वकूसेनके 
नामते प्रसिद्ध था ॥ ३१॥ 
धिष्वकसेनहथ युधो ऽभूद्‌ दण्डसेनो महीपतिः । 
भह्वायोऽस्य.कमारो ऽद राधेयेन हतः पुरा ॥ २३२॥ 
विष्वकृषेनके पुत्र राजा दण्डसेन हुए । इनका पुत्र 
मच्छट द्मा, जिते राधापुत्र कर्ने मार डाला था ॥ ३२॥ 
कषदतेगात्मजः शरी मदात्मा कुलवद्दनः। 
भक्षयन उुबद्धिरभवच्च युधिष्ठिर ॥ ३२॥ 


श्ीमहाभास्ते खिरभागे 


द ~ ~~~ 


[ शरिषंशे 


युधिष्ठिर ! दण्डसेनका पुत्र भक्खट श्रूर्वीर, म्त्मा 
ओर कल्को बदानेवाला था; परैतु मस्छयका पुष बहा 
दुर्बद्धि निकला ॥ ३३ ॥ 
स ॒तेपामभवद्‌ राजा नीपानामन्तङन्टेप । 
तेन उग्रायुधस्याथं स्यं नीपा विनारिवाः ॥ २७ ॥ 
राजन्‌. ¡ वह उन नीर्पौका अन्त करनेवाला राजां हुमा) 
उसने उग्रायुधकरेच््यि समस्त नीरपोका विनाश करवा दिया था] 
उभ्रायुधो मदोत्सिको भया विनिहसो युधि । 
दृपौन्वितो दरर्परुचिः सततं चानये रतः ॥ ३५॥ 
निरन्तर अनीतिमे लगे रहनेवाठे गौर दर्म श्चि 
रखनेवके उस अभिमानी मदोन्मत्त उग्रायुधको मैने ही युद 
मार उस था 
युि्ठिर उवाच 
उप्रायुधःकस्य खतः कस्मिन्‌ षंरोऽथ जलिवान्‌। 
किमथं चैव भवता निष्टतस्तद्‌ ब्रवीहि मे ॥ ३६॥ 
युधिध्िरने पृछा--(दादाजी [) उग्रायुध किसका पुत्र 
था? क्रिस वंारमे उत्य्न हुआ था ओर आपने उखे रयो मार 
डाला १ यह भु्ने ताद्य ॥ ३६ ॥ 
मीप्म उवाच 


अजमीढस्य दायादो विद्धान्‌ साजा यवीनरः। 
ध्रतिमांस्तस्य पुश्रस्तु तस्य सत्यरतिः खतः ॥ २७ ॥ 
भष्पजीने कहा--अजमीदफे पुत्र विद्वान्‌ राजा 
यवीमर ये ! उनके पुव धृतिमान्‌ हुए ओर धृतिमान 
पुत्र सत्यधृति थे ॥ ३५ ॥ 
जलः सत्यष्रृतेः पुत्रो श्ढनेमिः प्रतापवान्‌ । 
ख्डनेमिखुतश्चापि खुधम नाम पार्थिवः ॥ ३८॥ 
सत्यधृकतके प्रतापी पुर द्ठनेमि दए । दृदनेमिके पुत्र 
राजा सुधर्मा ये ॥ ३८ ॥ 
आसीत्‌ खुधर्मणः चुः सार्वभोमः प्रजेश्वरः । 
सार्वभौम इति ख्यातः पृथिव्यामेकराड्‌ विसुः ॥ २९ ॥ 
सधर्मा पुत्र प्रजापाल साव॑मोम हुए, जो समस्त 
्रथ्वीके एकच्छन सम्राट्‌ थे | इसील्यि सार्वभौम नामसे 
प्रसिद्ध हुएये॥ ३९॥ 
तस्यान्ववाये महति महान्‌ पौरवनन्दनः । 
महतापि पुत्रस्तु राजा रुक्मरथः स्मरतः ॥ ४०॥ 
उनके महनीय वंश्ये पोरवोको प्रसनन करनेवठे महान्‌ 
नामक राजा हुए । महान्‌ पुर राजा सक्मरथ हुए ॥४०॥ 
पुघ्रो रुक्मरथस्यापि रइपाश्वों नाम पार्थिवः । 
सुपादवंतनयश्चापि सुमतिनौम धार्मिकः ॥ ७१ ॥ 


सक्मरथके पुत्र राजा सुपार्वं हुए] सुपार्वे पुत्र सुमति 
हए जो वदे धार्मिक थे ॥ ४१ ॥ 


हरिवंदापवं 1] 


सुमतेरपि धमौत्मा संनतिनीम॒ चीयंवान्‌ । 
तस्य वै संनतेः पुः ङतो नाम महावङः ॥ ७२ ॥ 
सुमतिके पुन संनति हुए, ओ वीर्यवान्‌ ओर धर्मात्मा 
थे ! उन संनतिके पुज महाबली कृत हुए ॥ ४२ ॥ 
शिष्यो हिरण्यनाभस्य कोशस्य महात्मनः। 
चतुर्विंशतिधा तेन सप्राच्याः सामसंहिताः ॥ ४३ ॥ 
स्म॒तास्ते प्राच्यसामानः कार्तयो नाम सामगाः, 
वे कोरा्देखौय महात्मा हिरण्यनाभके रिष्य ये । उन्हनि 
प्राचीन साम-संहिताके चीवीस विभाग क्रिये थे, जो प्राच्यसाम 
कहते है ओर उन सामोका गान करनेवाठे कीर्ति-सामग 
कटे जाते दै ॥ ५३६ ॥ 
कातिसप्रायुधः सोऽथ वीरः पौरवनन्दनः ॥ ४९ ॥ 
बभूव येन विक्रम्य पृषतस्य पितामहः! 
नीषो नाम महतेजाः पर चाखाधिपति्हतः ॥ ४५॥ 
इन्हीं कृतके पुत्र पौरवनन्दन कीर उग्रायुध थे, जिन्दनि 
अपने पराक्रमसे पाश्चारकि स्वामी एृषतके पितामह मदा- 
केजस्वी नीपको मार डाला था ॥ ४४-४५ ॥ 
उभ्रायुधस्य दायादः क्षेम्यो नाम महायशाः। 
क्षेम्यात्‌ सुवीरो पतिः सुवीरात्‌ तु शरपंजयः ॥ ४६॥ 
चपंजयाद्‌ षहुरथ श््येते पौरवाः स्मरताः । 
उग्रायुधके पुत्र महायरास्वी क्षेम्य हुए । क्षेम्यके पुत्र 
राजा सुवीर हुए ओर बीरे पुत्र दषंजय हुए । शपंजयक्रे 
पुत्र बहुरे हुए वे ही पौरव कलते द ॥ ५६९ ॥ 
ख॒ चप््युग्रायुधस्तात दु्खद्धिरभवत्‌ वद्‌? ॥ ४७ ॥ 
भवृद्धचक्रो बलवान्‌ नीपान्तकरणो महान । 
ख दर्पैपूणो हत्वाऽऽजो नीपानन्यांश्च पाथिवान्‌ ॥ ४८ ॥ 
तात ! े उग्रायुध वड दुष्ट खभाववाठे ओर वख्वान्‌ ये । 
उनका महान्‌ चक्र चता था ! उन्न नीपोका घोर संहार 
कग डाला । वे नीपो तथा दूसरे राजार्ओका युद्धम वध कमक 
घमंडसे मर गये | ४७-४८ | 
पितयुंपरते मध्यं भावयामास किल्विषम्‌ । 
माममात्थैः परिवृतं शयानं धरणीतखे ॥ ४९. ॥ 
जिस समय भेरे पिता मर गये ये ओर ॐ मन्धियसि धिर 
इअ पथ्वीपर शयन करता था, उसी खमय उन्दोनि भुभ्मते 
बढ़ी कुत्पित ( पापपू्णं ) यात कदल्यी | ४९] 
उभ्रायुधस्थ राजेन्द्र दुसो ऽभ्येत्य वचो.ऽ्वीत्‌ । 
अद्य त्वं जननीं भीष्म गन्धकारी यशखिनीम्‌ । 
स्रीरतनं ममर भायो्ं प्रयच्छ कुरुपुङ्गव ॥ ५० ॥ 
. राजेनद्र { उग्रायुधका दुत मेरे पास आकर कहने ख्गा- 
(कुरुपुङ्खव मीष्म | अज तुम चिरम रत्सखस्य अपमी 


मातां `यद्चस्विनी गन्धकाटीको भेरी भार्या बननेके च्वि 
देदो॥५०॥ 


विंशोऽध्यायः 


७१ 


^ ~~ -~-----------~---------------------------------------------------------------- ~~ 


पवं राज्यं च ते रुफीतं धनानि च न संशयः। 
धदास्यामि यथाकाममदहं, वै रत्नभाग्‌ भुवि ॥ ५१॥ 
ध्यदि तुम एेसा करोगे तो निस्संदेद मै ठम्दे इच्छानुसार 
विशार राज्य तथा धनदा ओर मेँ ( गन्धकरालीको पाकर ) 
इस भूतख्पर रलका भागी हो जाऊँगा ॥ ५१ ॥ 
मम प्ज्वरितं चक्रं निशम्येदं सुदुर्जयम्‌ । 
श्यो विद्रवन्त्याजो दर्शनादेव भारत ॥ ५२॥ 
'्मारत { मेरे दस परम दुर्जय एनं जाज्वस्यमान चक्रको 
दान करकेशत्रुगण युद्धे मुशे देखते दी माग खड दोतेदै५२॥ 
राषटस्येच्छसि चेत्‌ सस्ति प्राणानां चा कुटस्य वा, 
शासने मम तिष्ठख न हि ते शान्तिरन्यथा ॥ ५३ ॥ 
(तुम यदि राज्यः कुर एवं अपने पार्णोका कल्याण 
चाहतेहोतो मेरी आज्ञा मनो, नहीं तोचैनसे न रह 
सकोगेः ॥ ५२ ॥ 
अधः भस्त(रङएयने इाजानस्तेन चोदितः । 
दूतान्तर्हितमेतद्‌ , वै अक्यमभ्निरिखोपमम्‌ ॥ ५४ ॥ 
जव यँ मूमिपर कुशाओंकी सय्भापर तो रदा था, उस 
समय उत्तमे दूतके दारा यह अग्निक ऽवालक्रे समान 
( जलनेबाखी ) वात कहलयी थी ॥ ५४ ॥ 
ततोऽदं तस्य दुदधेषिंक्षाय मतमच्युत । 
आश्षापयं वै संग्रामे सेनाध्यश्षाश्च सर्वशः ॥ ५५ ॥ 
अच्युत ! तव गने उस दुद्धिफे अभिप्रायको जानकर 
अपने सेनापतिर्योको सरे प्रकारसे संग्राम करनेकी आज्ञा 
दे दी॥ ५५॥ 
विचिच्रवीयं वारं च मदुपाश्रयमेव च । 
इष्ट क्रोधपरीतात्मा युद्धायैव मनो दधे ॥ ५६॥ 
विचित्रवीयं मेरे आश्नयमे रहता है तथा यह्‌ वाल्क होनेके 
कारण युद्ध भी नहीं कर सकता, इस बातको देखकर कोधे 
भरकर मने स्वयं ही युद्ध करका विचार किया | ५६ ॥ 
निदीतस्तदाहं तैः सचिवेम॑न्धकोधिषैः । 
ऋत्विग्भिवेदकत्येश्च सुहद्धिश्वार्थवदिभिः ॥ ५७ ॥ 
निग्ैश्च दाखविद्धिश्च संयुगस्य निषतेमे । 
कारणं भवितश्चास्ि युकरूपं वदाल ॥ ५८ ॥ 
निष्पाप [ उस समय मन्धश्च मन्विर्यो, बेदङ् ऋतजा, 
तत््दर्शी भिर्वौ ओर साखवे्ता स्म युस्षोने सले जु 
करनेसे रोक दिवा ओर इका उन्नित कारण म बताया ॥ 
मच्विण ऊन 
यचरत्तचकः पापोऽसी त्वं चाशौचगतः प्रभो । 
न चेष पथमः कर्पो युद्धं नाम कदाचन ॥ ५९ ॥ 
मन्वियोने कहा-- ममो } उस पापीकरा चक्र चल रहा है 


ओर आपको अशौच र्गा हुआ हैः अतः यह युद प्रथम कल्य 
कभी नही माना जा सकता ॥ ५९ ॥ 


५७२ 


धीमहाभार्ते सिरुभागे 


॥ हरिशे 


ते षयं सामपूर्धं वे दानं भेदं तथैव च । 
परयोक्ष्यामस्ततः शुद्धो दैवतान्यभिवाद्य च ॥ ६०॥ 
ृतखस्त्ययनेो विपरवंहीन्‌ सम्पूज्य च द्विजान्‌ । 
बराह्मणैरभ्यनुक्ातः प्रयास्यसि जयाय वै ॥ ६१॥ 
हम पले उसपर सामः दान ओर भेद नीतिरयोका प्रयोग 
करे | तव्रतक आप शुद्ध भी हौ जा्यैगे, फिर आप देवताओ- 
को प्रणाम करके ब्राह्म्णोसे स्वस्िवाचन कराकर अग्नि-ओीर 
जाक्षर्णोकी पूजा. करनेके वाद ब्राहर्णोकी आषा केकर विजयकरे 
चि प्रस्ान कीन्यिगा ॥ ६०-६१ ॥ 
असखाणि न प्रयोज्यानि न प्रवेयश्च संगरः । 
अशौचे वर्वमाते वु इखानामिति दासनम्‌ ॥ ६ ॥ 
शटोका कथन दकि जब अशौच चल रहा दो, उस 
खमय अक्नोका प्रयोग ओर युद्धमे प्रवेडा नहीं करना 
चाय ॥ ६२॥ 
सामदानादिभिः पूर्वमपि भेदेन चा ततः। 
तं हनिष्यसि विक्रम्य शाम्यरं मघवानिव ॥ ६३ ॥ 
अतः पहले सामः, दानः, मेदसे इसको वशम करमेका 
यल किया जाय (तत्रभीन माने तो) फिर जैसे इन्द्रने 
शम्परासुरको मार ठाल्म था, उसी प्रकार पराक्रम करके आप 
इसको मार ल्यिगा ॥ ६१ ॥ 
भ्राषानां घचनं कारे षृद्धानां च विरोपतः। 
श्रोतव्यमिति रच्छरुत्वा निदचोऽस्मि नराधिप ॥ ६४॥ 
समय पद़नेपर बुद्धिमान ओर वृर्दोकी वात विदेषरूपते 
सुनी चाहिये । राजन्‌ ! यह सुनकर मँ युद्धे दक गया |॥६४५॥ 
ततस्तैः संक्रमः सर्वैः परयु्तः शास्मकोविदैः । 
तस्मिन्‌ काटे कुरघ्रेष्ठ कम चारन्धमुत्तमम्‌ ॥ ६५॥ 
कुरभरेष्ठ ¡ तवर उन शाछन्ञानमे चतुर सम्पण मन्वियेनि 
सामः, दान, भेद आदि वृर उपायो दवारा शान्ति-खापनका प्रयोग 
करिया ओर दके स्यि उत्तम कार्य आरम्म कर दिया ॥ ६५॥ 
स॒ सामादिभिरेवादादुपायैः धाक्तचिन्तितैः । 
अनुनीयमानो दुखुद्धिरखुनेतं न शषयते ॥ ६६ ॥ 
परंतु वे घुद्धिमानेकि विचारे हुए साम, दान आदि उपायोका 
श्रवोग करके भी उस दुयुद्धिको न समन्ना फे | ६६॥ 
मरवृच्चं॑ तस्य तश्चक्रमधर्मनिरतस्य वै। 
परदाराभिखुषिण सद्स्तात निवतितम्‌ ॥ ६७ ॥ 
तात ! इतने समयमे अधरम मग्न रहनेवले उग्रायुधका 
ग्रतापचक्र मी परखीकी कामना करनैसं तत्क्षण ही स्क 
गया ॥ ६७ | 
न त्वहं सस्य जाने तक्निवृत्तं चक्रमुचमम्‌ । 
शतं खकर्मणा तं तु पूरं सद्भिश्च निन्दितम्‌ ॥ ६८ ॥ 


~~ 
~~ -~-- 


उसका उत्तम चक्र निषत्त द्रो गया टै ओर ष्टे 
सत्पुस्सि निन्दित दोकर वद अपने करमोद्ारा ष्टी मर गया 
है; दस वातकरो म न जानता था ॥ ६८ ॥ 
कृतदौचः शरी चापी रथी निष्फम्य कै पुरात्‌ । 
कृतखस्त्ययनो विप्रैः प्रायोधयमहं रिपुम्‌ ॥ ६९॥ 
जव मै अज्ञौच-निषृत्तिके पश्यात्‌ शद्ध हया, तव 
तरीषणि स्वसिवाचन कराकर धनुष-वाण ठे रथम बेट 
नगरसे बाहर निकला ओर शनुसे युद्ध करने ख्या ॥ ६९ ॥ ` 
ततः संखर्ग॑मागभ्य वकेनास्रवलेन च। 
त्यदमुन्मत्तवव्‌ युद्धं देचासुरमिवाभवत्‌ ॥ ७०॥ 
तदनन्तर उसके निकट परहुचकर रारीर-बल ओर अघ्- 
ल्के द्वारा देवासुर-संप्रामकी तरद तीन दिर्नोतक टम दोन 
का उन्मत्त-खा युद्धं चलता रहा ॥ ७० ॥ 
स॒ मयासख्रप्रतापेन निर्दग्धो रणमूर्धनि 
पपाताभिमुखः श्रस्त्यक्त्वा प्राणानरिद्म ॥ ७१॥ 
गन्ुदमन | ततश्वात्‌ मेरे अख्चके प्रतापसे भस दोकर 
वह वीर रणकरे सुहानेपर अपने प्रार्णोको त्यागक्रर गिर 
पड़ा ॥ ७१ ॥ 
पतस्िन्नन्वरे ताच काभ्पिल्ये पृषतो ऽभ्ययात्‌ । 
हते नीपिभ्वरे चैव हते चोग्रायुधे सपे ॥ ७२॥ 
आष्ठिच्छन्रं खकं राज्यं पिञ्यं प्राप महादयुतिः। 
दरुपदस्य पिता जन्‌. म्मैवाुमने तदा ॥ ७३ ॥ 
तात ! इसी वीच ( उग्रायुधद्वारा ) नीपेश्वर तथा 
(मेरे द्वारा) राजा उग्रायुधके मारे जनिपर परप्रतने भी 
काम्पिस्य नररपर आक्रमण कर दिया । राजन्‌ ! तत्र मेरी 
अनुमतिसे महाकरान्तिमान्‌ द्रुपदके पिताने अपने वैदक राज्य 
अदिच्छत्रपर ( पुनः ) अधिक्रार कर लिया ॥ ७२-७३ ॥ 
ततोनेन तरसा निर्जित्य द्भुपदं रणे। 
आदिच्छश्रं सकास्पिट्यं द्रोणायाथापवर्जिंतम्‌ 1 ७४ ॥ 
तदनन्तर अर्जुने युद्धम द्वुपदको वस्यूर्वकं जीतकर 
काम्पिल्य ओर अहिच्छत्रको द्रोणाचार्ये ( चरणो ) समर्पित 
कर दिया था ॥ ७४ ॥ 


प्रतिगृह्य ततो द्रोण उभयं जयतां वरः 

कासिपिल्यं द्ुपदायैव धायच्छद्‌ विदितं तव ॥ ७५॥ 
तवर विजय पानेवाट्ं श्रेष्ठ द्रोणने दोनो देशोको ठेकर 

काञ्िल्यनगर तो द्वुपदको ष्टी वापस कर दिया था, जिते 

तम जानते षीद ॥ ७५॥ 

एप ते दरुपदस्यादौ ब्रह्मदत्तस्य चैव ह । 

वंशः कारस्येन वैभरोकतो नीपस्योग्रायुधस्य च ॥ ७६॥ 
दस प्रकार भनि तुमसे द्रुपदः व्रह्मदत्त नीप ओर 

उमयुधके षंशका पू्णरूपये वर्णन कर दिया ॥ ७६ ॥ 


हरिवंशपवं ] - 


विक्रेऽध्ययः 


७२ 


युधिष्ठिर उवा 
किमथं अह्यदच्स्य पूजनीया शकुन्तिक। । 
अन्धं चकार गाङ्गेय ज्येष्ठं पुं पुरा विभो ॥ ७७ ॥ 
युधिष्ठिरने पू्ा-समर्थं गङ्गानन्दन ! पदले पूज- 
नीया चिड्याने नस्दत्तके य्येष्ठ पुजको अधा स्यौ कर 
दिया था १॥ ७७ ॥ । 
चिरोषिता गृहे चापि किमर्थं चैद-यस्य सा। 
चकार विभ्रियमिदं तस्य याको महात्मनः ॥ ७८॥ 
वहु जिसके महल्मै वहरुत समयसे रहती थीः 
उसी महात्मा राजाक्रा उसने एेसा अनिष्ट क्यो किया । ७८ ॥ 
पूजनीया चकारासौ कि सख्यं तेन चैव ह । 
पतन्मे संशयं छिन्धि सर्व॑सुक्त्वा यथातथम्‌ ॥ ७९ ॥ 
उस पूजनीयाने उनके साथ मित्रता क्यो की थी १अप 
इन सव वारतोको यथार्थं रीत्िसे वताकम्‌ मेरे सारे संदर्ीको दूर 
करद (७९॥ | 
भीष्म उवाच 
श्णु सर्वं महाराज यथाचृत्तसभूत्‌ पुरा । 
ब्रह्मदत्तस्य भवने तन्निवोध युधिष्ठिर ॥ ८०॥ 
भीष्मजीने कष्टा--महाराज युधिष्ठिर ¦ प्राचीन कारे 
मद्यदत्ते महल्मै जो घटना धटी थी, उसे तुम 
र्णरूपसे सुनो ॥ ८० ॥ 


काचिच्छद्ुन्तिका राजन्‌ बह्मद्तस्य वै सखी { 
हितिपक्षा शोणरिराः शितिपृष्ठा श्वितोदय ॥ ८१ ॥ 
- राजन्‌ ! शकं ॒चिदिया थी, जिसका राजा ब्रह्मदत्ते 
स्नेह हो जनेके कारण वह उनकी सहचरी बन गयी थी । 
उसके दोनों पंख, पीठ ओर उदरका भागतो काल था; 
परंतु मस्तकका रग छाल था ] ८१] 


खली सा बहदन्तस्य सुखदं सद्धसौदद्‌। । 

तस्याः कुखायमभवव्‌ गेहे ठस्य नरोत्तम 1 ८२॥ 
नरोत्तम ! राजा व्रह्मदम्तकी वृह सहचरी उनके खुद्द 

स्नेदपारमे व गयी थी; अतः उन्हीफि महकमे उसका 

घोसल था | ८२ ॥ 

सा सदाष्टनि नित्य तस्य राहो गृ्ठोरतमात्‌ । 

चचाराम्भोधितीरेषु पल्वलेषु सरस्घु च ॥ ८३ ॥ 
वह दिनम निरन्तर उस जाके उत्तम महर्से 


निकल्कर समुद्रके किनारे तथा ताराय ओर तैर्योपर 
विचरती थी ॥ ८३ ॥ 


नदीपरवेतकुज्जेषु वनेषूपवनेु च । 
प्रुषु तडणिषु करेषु सुगन्धिषु ॥ ८७॥ 
कसुवोत्परुकिअचल्कसुरभीरुतवायुषु 
हंससारसघुेद कारण्डवदतेषु च ॥ ८५ ॥ 
चरित्वा वेषु सा राजय निरि काम्पिल्यमागमत्‌। 


राजम्‌ ! वह नदी, पर्व॑तः कुञ्ञ, चन ओर उपवर्नमि 
तथा जिनमे सुगन्धित कमर खिले हए थेः जर्होकी वायु ` 
कुद, उत्पल ओर किञ्ञल्ककी सुगन्धे वासित थी श्वं 
जो हंस, सारस ओर कारण्डवके कलरवेसि गुजायमान ये-- 
एते तड्ागोपर्‌ धूम-घामकर वह ॒रात्रिके समय काम्पिल्य- 
नगरम खौट आती थी ॥ ८४.८५९ ॥ 


सपतेर्भवनं प्राण्य 'अह्यदत्तस्य धीमर्तः ॥ ८६ ॥ 
राक्षा तेन सदा राजन्‌ कथायोगं चकार सा । 


राजन्‌ ! वह चुद्धिमान्‌ राजा ब्रह्षदप्तके महरम पर्हुचकर 
उस राजासे प्रतिदिन बाकते किया करती थी ॥ ८६१ ॥ 


आश्यरणि च दष्टानि यानि वृत्तानि कानिचिद्‌ ॥ ८७ ॥ 
चरित्वा विविधान्‌ देशान्‌ कथयामस सा निशि । 

चह वहुत-ते देमि घूमकर जो ऊक आश्चर्यजनक 
षटनर्प देखती थी, रात्निके समय उन्दै ( राजसे ) 
कहा करती थी ॥ ८७१ ॥ 


कदाचित्‌ तस्य ॒श्रपतेर्ह्यदसस्य कौरव ॥ ८८॥ 
पुषो.ऽभुद्‌ राजशादुंल सवंसेनेति विश्रुतः । 
पूजनीयाथ सा तस्मिन्‌ प्राखताण्डमथापि च ॥ ८९ ॥ 
कुर्वंशी राजशादुंख | एक समय राजा बरह्षदत्तके पुन 
हुमा जिसका नाम सर्वसेन रखा गया । उसी समय उस 
पूजनीयाने भी वर्ह एक अंडा दिया ॥ ८८-८९ ॥ 


तस्मिन्‌ नीडे पुरा शेकं तत्किल धरास्पुटव्‌ तदाः । 
स्फुटिते मांसपिण्डस्तु पपा ॥ ९० ॥ 
वश्चवकत्र्व्ुहीनो बभूव पृथिवीपते । 
चष्ठुष्मानप्यभूव्‌ पश्चादीपषत्पक्षोत्थितश्च ह ॥ ९१ ॥ 
पृथ्वीपते ! प्क दिन उस सेमे उसका वह एक 
अण्डा पटा ओर उससे एक मांसपिण्ड निकल, जो हाथ- 
पैर ओर गखसे युक्त था । उसका भह भूरे रंगका था; 
परु नेत्र नदी प्रकट हट थे । कुक समय वाद्‌ उसके नेत्र 
खुर गये जर उस छोटे-छोटे पंख मी निकल अयि ॥९०-९१॥ 


खथ सा पूजनीया चे राजपुधसपुश्रयोः ! 
तल्यखेश्चत्‌ प्रीतिमती वितते विदसे+भवत्‌ ॥ ९२ | 

तदनन्तर वह्‌ पूजनीया अपने यच्वे ओर राजछुमारपर 
खमान स्नेद होनेके कारण प्रतिदिन पक-सी प्रीति रखने 
्गी॥ ९२॥ 


आजष्टार सद सायं चऽ्च्वासखफलद्वयम्‌ । 
यग्धुतासखाद्सदक्षं सर्वंसेसतनूजयोः ॥ ९३ ॥ 

वद सदा सायंकालमे अगृतके खमान खादिष्ठ रछसे भरे 
हए दो फट सर्वसेन ओर अपने बच्येके स्थि अपनी चोचे 
लाया करती थी | ९३ ॥ 


७४ 


स वाङ ब्र्दत्तस्य पूजनीयाघुतश्च ह । 
ते फे भक्षयित्वा च पृथुकौ श्रीतमानसो ॥ ९४ ॥ 
अभूतां नित्यमेवेह खादतां ती च ते फले । 
ब्रक्षदत्तका वालक ओर पूजनीयाका वच्चा-ये दोनों 
उन फर्छीको खाकर बडे प्रसन्न होते थे ¦ इस प्रकार वे दोर्नो 
नित्य पेते फर्लेको खाया कसे ये ॥ ९४९ ॥ 
तस्यां गतायामथ च पूजन्यां वै सदाहनि ॥ ९५॥ 
दिष्ना चरकेनाथ धात्री तं तुरियं ख्प। 
तेन प्र्रीडयामास बह्यदचात्मजं सदा ॥ ९६ ॥ 
नीडात्‌ तमारूष्य तदा पूजनीयाङृतात्‌ ततः । 
राजन्‌ ! प्रतिदिन उस पूजनीके चके जानेपर राज. 
कुमारकी धाय उस चिद्धियाके वनाये हुए ्घौसटेते उसके 
चच्चेको खींचकर उसके द्वारा ब्रह्मदत्ते रिश्चु पुत्रको 
खेखाया करती थी ॥ ९५-९६२ ॥ 
भरीडता राजपुप्रेण कदाचिशखटकः स तु ॥ ९७ ॥ 
निग्र्हीतः कन्धरायां शिद्युना दटमु्ठिना । 
दर्भक्षसु्टिना रजन्नसून्‌ सयस्त्वजीजदस्‌ ॥ ९८ ॥ 
एक समय उस शिष्य राजकुमारने खेर्ते-खेरूते अपनी 
सुदृद्‌ युष्म उस वच्चैका गल पकड़ लिया | राजन्‌ । 
राजछुमारकी मुदी व्री कठिनतासे खुर सकती थी । 
( अतएव दवाव पडनेके कारण ) उस चिदियाफे वच्चेने 
तत्काल दी अपने प्राण त्याग दि ॥ ९७-९८ ॥ 
तं तु पञ्चत्वमापन्नं व्यात्तास्यं वारुघातितम्‌ । 
कथंचिन्मोचितं षट खपतिदुःखितोऽभवस्‌ ॥ ९९ ॥ 
राजा त्रह्यदत्तने उसको किसी प्रकार अपने पुत्रके 
दायते चुदाया; परंतु उसे मरा मुख फैखकर पड़ा 
हुआ तथा अपने कल्कके दवाय मारा गया देखकर 
वे दुखीहोग्ये॥ ९९॥ 
धारी तस्य जगर्हे तां तदाश्वुपरमो चपः। 
तस्थौ श्तोकान्वितो राजञ्छोचंस्तं चटकं तदा ॥९००॥ 
राजन्‌ | तय ब्रह्मदम्तने शोकाक्कुर दो नेत्रे अष्‌ मरकर 
उस धायकी निन्दा कौ | फिर वे खद्धे-खदे उस बच्येके 
ल्ि शयोक करने त्तो ॥ १०० ॥ 
पूजनीयापि चत्काले णृष्टीत्वा तु फरद्धयम्‌ । 
ब्रह्मद्स्षस्य भवनमाजगाम वनेचरी ॥ १०१॥ 
उसी समय वनम विचरण करनेवाखी पूजनीया भी दो 
फर्छको लेकर ब्रह्मदत्तके भवनम या पर्ची ॥ १०१॥ 
अथापदयत्‌ तमागण्य गृहे तस्मिन्‌ नराधिष । 
पश्चभूतपरित्यक्तं शावं तं खतनूद्धवम्‌ ॥१०२॥ 
यजन्‌ { उस भवनम आकर उसमे अपने दारीरसे उत्पन्न 
ह बच्चेको पञ्चभूोसे रदित युदक रूपमे देखा ॥ १०२॥ 


श्रीमहाभार्ते सिखभगि 


[ रिंद 


स॒मो दर तं पुनं पुनः संक्षामथारभव्‌ । 
खन्धसंक्षा च सा राजन्‌ विखखाप तपखिनी ॥१०२॥ 
राजन्‌ ¦ पुत्रकी णेखी दशा दैखकर वह मूच्छिति दो 
गयी ] कुछ देर वाद उसे फिर चेतना आयी; तव वद्‌ तपस्विनी 
विखप कसे लगी ॥ १०३ ॥ 
पूजनीयोव।च 
न तु त्वमागतां पुत्न चारन्तीं परिसर्प॑सि । 
कुरव॑श्चाटसदखाणि = अव्यकतकटया भिस ॥१०४॥ 
पूजनीयः वोटी--पुत्र ! मै आकर कू शब्द कर 
रदी हूः तवर भी तू अस्ुट ८ तोतली ) दोनेसे मनोहर ख्गने- 
वाली वाणीम हजारे व्रातं करता हा मेरे सामने क्यो 
न्दी आता १ ॥ १०४ ॥ । 
व्यादितास्यः श्युधा्तश्च पीतेनास्येन पुरक । 
श्नोणेन तादयुना पुश्च कथमद्य न सर्पैसि ॥१०५ा 
पुत्र | क्षुषासि पीडित होकर अपने खल्लर ताद तथा 
पीटी चौँचवले मुखको खोख्कर तू मेरे पास आज 
क्यो न्दी आता १॥ १०५॥ 
पक्षाभ्यां त्वां परिष्वज्य नु वाहयामि चाप्यहम्‌ । 
चीचीकरूचीति वादान्तं त्वामद्य न शणोमि किम्‌॥ १०६॥ 

म वक्षे अपने पखोति स्पेयकर रोरदी हरः तव भीर्मँ 
ठे चीची कक खन्द करता हुआ क्यो नदं सुनती १ ॥ 
मनोत्थो यस्तु मम पदयेयं पुत्रकं कद्‌ । 
व्यात्तास्यं वारि याचन्तं स्फरत्पक्षं ममप्रतः ॥१०७॥ 
ख मे मनोरथो भग्नस्त्वयि पञ्चत्वमागते । 
विलप्यैवं वहुविधं रानानमथ सा्रवीव्‌ ॥१०८॥ 

मेरे मनम जो यद अमिखपाथी कि मँ अपने सामने 
अपने पुत्रको परकर फटफटाकरर चौँच कैलाकर जल मोगता 
हआ कब्र देगी, सो मेरा वद मनोरथ तेरे मरनेते नष्ट दहो 
गया-यौ अनेक तरसे विलप करफे व राजासे 
बोटी | १०७-१०८॥ 
नु मूधौभिषिकस्त्वं धर्म वेत्सि सनातनम्‌ । 
अथ कस्मान्मम खतं घात्या घातितवानसि ॥१०९॥ 
तद पुशेण चाृष्य क्षभियाघम शंस मे । 

९ क्षत्रियाधम [ त॒. तो मूर्धामिषिक्त ( स्प्राट्‌ ) राजा 
दै ओर खनातनधमैको जाननेवाला है, तो मी तूने मेरे यच्चेको 
धायसे ओर अपने पुन्रसे खिचवाकर क्यौ मरवा डाल १ इस 
वातका तू उन्तर दे ॥ १०९१ ॥ 

न च नूनं श्चुता तेऽभूदियमाङ्गिरसी शतिः ॥११०॥ 
शरणागतः श्ुघार्व्च शछ॒भिश्ाप्युपद्रुतः । 
चिरोपितश्च खणरदे पातन्यः सर्वदा भवेत्‌ ॥९९१॥ 

(क्या तूने यह्‌ आङ्गिरसी श्रुति नदीं सुनी दै किं 
श्यरणमे आयि इए, भूखसे व्याकुल, चवु्द्राय पीडा कयि 

भे 


{ 


॥॥ 


हरिवंदपवं ] 
जति हुए ओर चिरकाखते अपने धरम रहनेवल्की रका सदा 
करनी चाहिये ॥ ११०-१९११ ॥ 
अपाटयश्रो याति कुम्भीपाकमसंरायम्‌ । 
कथमस्य दविर्देषा गृह्णन्ति पितरः खधाम्‌ ॥११२॥ 
ध्यदि मनुष्य इनकी रक्षा नहीं करता है तो वह 
निस्संदेह कुम्भीपाकं नरकमै पड़ता है । देवता रसे पुरुषकी 
हविको ओर पितर स्वधाको मलन कैते रहण कर सकते दै ॥ 


पवसुक्त्वा महाराज दश्धर्मगता सती । 
होकाती तस्य वाटस्य चधचुषी निर्विभेद सा ॥११३॥ 
कराभ्यां राजपुरस्य ततस्तश्चश्चुरस्फुरत्‌ । 
रत्वा चान्धं दपसुतमुत्पपात ततोऽम्बरम्‌ ॥११४॥ 
महाराज } राजासे यो कहकर शोकसे आतुर हनेके कारण 
ददाधर्म# को प्राप्त हुई उस पूजनीयाने अपने दोनो पञ्ञोसि 
उस राजकुमारके दोनों नेर्नौको विदीर्ण कर दिया; जिससे 
उसकी ओखिं पूर गयीं । इस प्रकार राजकरुमारको अन्धा कर 
देनेके पश्चात्‌ पूजनीया अकराशमे उड़ गयी ॥ ११३-१९४॥ 
अथ राज्ञा सुतं पूजनीयासुबाच श्ट । 
विशोका भव कल्याणि रतं ते भीर शोभनम्‌ ॥ १९५॥ 
तब राजाने प्रकी ओर देखकर पूजनीयासे कहा-- 
(कल्याणि | अव तू दोकरहित हो जा } भीरं | तूने बहुत 
अच्छ क्रियाः॥ ११५ ॥ 
गतक्ोका निवत॑ख अजयं सस्यमस्तु ते। 
पुरेव वस भद्रं ते निवत रमसर च ॥११६॥ 
“अव तरू शोकरहित होकर रौर आ ! तेरी मेत्री खुद्द 
बनी रहे । तेरा कल्याण हो, तू लीट आ ओर आनन्दपूर्वक 
पहलेकी भति यही रह ॥ ११६॥ 
पुत्रपीडोद्धवश्वापि न कोपः परमस्त्वयि। 
ममास्ति ससि भद्रं ते कतैव्यं च कृतं त्वया ॥११७॥ 
(सि ¡ तेरा कस्याण हो ! पुत्रको पीड़ा देनेपर भी मँ 
तेरे ऊपर कुपित नदी हुजा हू । वने वही किया, जो करना 
चाहिये था? | ११७ ॥ 


पूजनीयोकाच 
आत्मौपम्येन जानामि पु्रस्नेहं तवाप्यहम्‌ । 
न चाहं बस्तुमिच्छामि तव पुत्रमचश्चुषम्‌ । 
रषा षे राजशादुंर त्वद्‌ गहे ऊतकिल्विषा ॥११८॥ 
दपश्रे् ! म अपने ही समान वुम्हारे पुन्न-पेमको भी 
जानती हूः अतः तुम्हारे पुत्रको नेजहीन करके कारण 
अपराधिनी होकर तम्हारे घस रहना नहीं चाहती ॥ ११८ ॥ 


~~~ 
#मतुष्यक्रो न्याकुर ओर्‌ बिवेकह्यन वना देनेवारी जो कोष आदिकी 
द दशार्ण है, उनको ददाधमे कहते रै! देखिमे १० ४९ कौ टिप्पणी । 


विदो ऽध्यायः 


\७५ 
गाथाश्चाप्युशनोगीता शमाः श्ण मयेरिताः । 
मिं च कुदेशं च कुराजानं कसौवम्‌ । 
कपुर च कुभार्यां च वरतः परिवजेयेद्‌ ॥११९॥ 

आप भुक्षसे शक्राचारय॑की गायी हुई इन गाथार्ओंको सुने, 
पोट मित्र, खोटे देश, खोटे राजाः खोटे युदद्‌-बन्धु, खोरे 
पुत्र तथा खोटी मार्याको दूरसे ही त्याग देना चाये ॥९१९॥ 
कुमिषरे सौष्टदं नास्ति कभायौीयां कुतो रतिः । 
कतः पिण्डः कुपु वे नास्ति सत्यं कुराजनि ॥१२०॥ 

खोटे मिम प्रम नही होता, कुभार्यासे सुख नदीं 
मिल सकता, कुपुत्रसे पिण्ड मिलना कठिन है ओर कुराजासे 
सत्य ( न्याय ) की आशा नही की जा सकती है ॥ १२०॥ 


कुसीदे क विश्वासः कुदेशे न ठु जीन्यते । 
क्ुराजनि भयं नित्यं कुपु्रे सर्व॑तो ऽलम्‌ ॥ १२१॥ 
कुमिन्नपर भल विश्वास केसे हो सकता है ओर 
कुदेशे जीना मी सम्भव नहीं हे । खेटे यजसे सर्वदा भय 
चना रहता है ओर कुयुत्रते तो सब प्रकारसे दुःख ही 
मिक्ता है ॥ १२१ ॥ 
अपकारिणि विम्भं यः करेति नराधमः। 
अनाथो दुर्बलो यद्धश्न चिरं स तु जीवति ॥१२२॥ 
जो अधम मनुष्य अपराधीपर विश्वास करता दैः 
वह अनाथ ओर दुर्बछ मनुष्यकी भत्ति चिरकाख्तक 
जीवित नदीं रह सकता ॥ १२२॥ 
न विभ्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत्‌) 
विश्वासाद्‌ भयमुत्पन्नं मूलान्यपि निरृन्तति ॥ १२३॥ 
अविश्वासीका विश्वासं न करे ओर विश्वासीपर भी 
अधिक विश्वस न करे क्योकि रसे शेर्गोपर विश्वास 
करनेसे ज मय उत्पन्न होता हैः वह जड़को भी काट 
डालता है ॥ १२३ ॥ 
राजसेविषु विश्वासं गर्भ॑संकरितेषु च 1 
यः करोति नरो मूढो न चिरं स तु जीवति ॥१२९॥ 
जो मनुष्य राजसेवको तथा संकर जातिर्योपर विश्वास 
करता हैः वह मूढ चिरकारुतक , जीवित नहीं रह 
सकता | ९२४ ॥ , 
अप्युल्नति प्राप्य नरः भरावारः कीटको यथा । 
ख॒ विनश्यत्यसंदेहटमादैवसुश्ना खपु ॥१२५॥ 
राजन्‌ ! जैसे पल निकलनेषर ऊपरको उड़ा हुभा 
चया मौतकरे सुखम चला जोता है, उसी प्रकार एेसे पुरषो 
पर विश्वास रखनेवाला पुरुष मी मारा जाता है, दस्म - 
कुछ संदेह नहीं है-रेसा श्क्राचार्थका कथन है ॥ १२५ ॥ 


७ धीमष्टाभारते लिकभागे [ स्यि 


अपि मार्घवभावेन गानं संलीय वुद्धिमान्‌ । दातुसे सम्बन्ध करके भी उसके ऊपर विश्वास न करे 

अरि नाशयते नित्यं यथा वदटिर्महाद्ुमम्‌ ॥ १२६॥ क्योकि इन््रने जामाता ( दामाद ) होकर मी पुलोमाको युद 
सते ठता अपने दारीरको वचाये रखकर फोमल्ताते म मार डाला या ॥ १३२ ॥ 

महादृ्क्रा आलिङ्गन करके उते युला देती 2, उसी प्रकार निधाय मनसा वैरं भ्रियं वकी यो नरः। 

बुद्धिमान्‌ पुरष भी अपने दारीरकी चदा रघा करते दए नम्रता. उपसरपैश्न तं प्राक्षः कुरङ्ग श्व दुन्धकम्‌ ॥ १३४॥ 

पूवक शनुका नाश्च कर देते हं ॥ १२६ ॥ जो मतुप्य मन्म यैरको छिपाये हुए प्रिय वात कता द 

खद्दर; छृशो भूत्वा दनैः संलीयते रिपुः । धुद्धिमान्‌ पुरुष ( उसपर विश्वास करके ) उसके पात न 

घर्मीक व धृक्तस्य पश्वान्भूखानि न्तति ॥१२७॥ जाय; सीक उसी तर, कते गरग वदेलिके निकट नदीं 
ससे दीमक एदा दोनेषपर भी आर्द्रं (लििग्ध) टौ जाता॥ १२३४॥ 

वर्मे लगकर दानैःरानैः उसकी जढ़को का डल्ता॒न चासन्ने निवस्तव्यं खवैरे वर्धित स्पौ। 

दै, दसी मकार शतु द्व देनेपर मी लिनग्ध वनकर पातयेत्‌ तं समूलं हि नदीरय इव द्रुमम्‌ ॥१३५॥ 

(सवेह दिखाकर ) शरीरं शु आता ( ओर अवसर यदि वैर र्खनेवाल् त्रु षद्‌रहाद्यो तो उसके पास 

भानेमर ) जहे उलाद शकता दै ॥ १२० ॥ निवास नदीं करना चादिये; क्योकि जैसे व्रदृती हुई नदीका 


अद्रोहसमयं छत्वा मुनीनामग्रतो हरिः। वेग वृषको गिरा देता इसी प्रकार वद उसको जदसे 
जघान नमुचि पञ्चादपां फेनेन पार्थिव ॥१२८॥ उखाढ़ डाल्ता १ ॥ १३५ ॥ 


राजन्‌ ¡ इन्द्रे भुनिर्योके सामने द्रोह न करनेकी अमित्रादुश्रवि राण्य नोन्नतोऽस्मीति विभ्वसेत्‌। 


प्रतिश्ा करके मी पीठे जल्के फेनते मगचिको मार तस्मात्‌ पप्योकषसि नद्य्‌ प्रावार दव कीटकः ॥ १२६] 
डाल था॥ १२८ ॥ 


छुं मततं परमतं वा घातयन्ति रिपुं नसाः। . श्ट उन्नति पनिपर भं मी उन्नत शेगया र फेला 
विचेण वद्धिना वापि शसरेणाप्वथ मायया 1 ९२९॥ विश्वास न करे । उसे उन्नति पानेपर मी मदुप्य प्रावार्कीट 
( पोखवष चरि ) की तरद्‌ नष्ट दो जाता द ॥ १३६ ॥ 

मनुष्य सेये दए; मतवले तया उन्मत्त शुको विपः दद्ानोगीता 

अग्निः शखर अथवा छल-कपटसे मी मार टल्ते द ॥१२९॥ येता = „ याया धायौ विपश्विता । 

न॒ च शेषं श्रङ्वन्ति पुनयैरभयाकरयः। छ्रर्वता चात्मरस्यां वै नरेण पृथिवीपते ॥ १२७॥ 

घातयन्ति समरं दि शरुवेमासुपमां चप ॥१३०॥ = _ , ्वीनाय | वदन्‌ युदय आतमरा करता हना रकता 
रन्‌! नम्य वासस वैर हने मयते शुम चार्यकी गायी हुई इन मायार्थोको अपने मनर स्मरण रखे॥ 


्े नदी सवते, वे तो इस मिमनद्ित उममाको सुनकर मया सकिल्थिपं दभ्यं परयुकतमतिदाणम्‌ ] 


दतुको जसे ही न कर डार्ते ६॥ १२०॥ पुधमन्धं प्रकुवेन्त्या तस्मान्नो चिभ्वसे त्वयि ॥ १३८॥ 
शेष्णाच्छेयं शेषमग्नेश्च॒ भूमिप । | मने आपके पुजको अधा वनाकर अति दारण अपराध करिया 


ुनर्वधैव सम्भूय तस्माच्छें न शेषयेत्‌ ॥१३९॥ दै, अतः अव मै आपका विश्वा नदीं करठगी ॥ १३८॥ 
भूपार | यदि श्रुको, ऋणको अथवा अन्निको पवखुक्त्वा दुद्राव तदाऽऽकादयं पत्गिनी । 
८ योढा-खा मी ) वाकी रने दिया जाय तो ये फिर इकछा॒शत्येतत्‌ ते मयाख्यातं पुरामूतमिदं चप ॥१३९॥ 
दोकर चद्ने छते & अतः इनके शेषको मी शेष न॒ब्रहमदच्चस्य राजेनद्र यद्‌ दृचं पूजनीया । 
रहने दे ॥ १३९ ॥ राजन्‌ { इस प्रकार कहकर वंह चिद्या आकागमे उद्‌ 
हसते जल्पते वैसे पकपाे भुनक्ति च । गयी । राजेन्द्र | प्राचीन कार्ट्म व्रद्यदत्तकरा पूजनीयाके साय जो 
प्कासनं चारोदति स्मरते तश्च किरिविपम्‌ ॥१३२॥ वाद हया थाः वद म॑ने ठमते कद दिया ॥१३९१ ॥ 
रत्र यद्यपि एक खाय हसता ३, वोल्तादैः एक दी धद्धच पच्छसे यन्मां युधिष्ठिर महामते 1 {०५०॥ 
पारमे साय-साय भोजन भी करता है यौर एक द्र आसन- अतस्ते वरतंयिष्ये ऽह्मितिष्ासं पुरातनम्‌ । 
पर खाथ-खाय वैठता है, तयापि पूर्व वैस्का स्मरण तो करता गितं सनत्कुमारेण माकण्डेयाय पृच्छते ॥१४१॥ 
ही रदतादै ॥ ? ३२ ॥ महामति युधिष्ठिर ! अव तुम जिख शभाद्ध-विष्रयकौ मुश्चसे 
रत्वा सम्बन्धकं चापि विभ्वसेच्छदणण न दि । भू रदे येः उसे सुनाता रह! मारकण्डेयजीके पूषनेपर 
पुठोमानं जघानाजौ जामाता सन्दातक्रतुः ॥१३३॥ सनक्कुमारजीने जो कु कदा था, उसी प्राचीन इतिदास 


५७५9 


हरिवंशपर्वं ] पकविहोऽध्यायः 
~~~ व=-----~ 
(केश्षेष माग) कोम तुमसे कर्टरमा 1 १४०१९४९ ॥ महाराज ! भर्तनन्दन { भरीरमोति भिये ये श्रादधके 
भाद्स्य फङमुदिद्य नियतं खुरूतस्य च । नियत पुण्यफरुको लयम रखकर के गये, गरवः कण्डरीक 


विव वमल -लतजातिष रहे । ९५९॥ ओर तीसरे बह्मदत्त--इन व्रह्मचारी योगिर्योके सातो शन्मोके 
ब्ह्मदत्तठतीयानां योगिनां ब्रह्मचारिणाम्‌ ॥१४३॥ चरित्रको ठम सावधान होकर खनो} १४२-१४२॥ 


दति श्रीमहाभारते खिखुमागे हरिवंशे हसिविदापर्वणि पूजनीयोपाटयाने चरकाख्यानं नम विद्रोऽध्यायः ॥ २०४ 


इस प्रकार श्रीमहाभार्त खिकभाम हरिके अन्तरमत इरिवशप्वमे पूजनीयोपार्यानम चटक ( चिच्ि) की कथा नामक 
वीसरवो अध्याय पुरा इग ॥ २० ॥ 


एकविंशोऽध्यायः 
पित्कव्प- मार्कण्डेयजीद्ारा शराद्धकी महिमाका मर्णन, श्राद्धके फरसे 
- कौशिक-पुत्रौको उत्तम जन्मकी प्रप्त 


£ 
माकेण्डेय उवाच 


श्राद्धे प्रतिष्ठितो रोकः श्राद्धे योगः श्रवते । 
हन्त ते वर्तयिष्यामि श्राद्धस्य फलमुत्तमम्‌ ॥ १ ॥ 
माकण्डेयजी वोङे--यह सारा संसार श्राद्धमे ही 
प्रतिष्टित है ओर श्राद्ते दी योग सम्पन्न होता है ! अतः मँ 
तुमसे श्राढके उत्तम फलका वर्णन करता हू ।॥ १॥ 
अह्मदत्तेन यत्‌ प्राप्तं सप्तजातिषु भारत । 
तत प्व हि ध्म॑स्य बुद्धिर्निवर्तते शनैः ॥ २॥ 
भारत | बहदत्तने ( भारदयाजः, कौरिकः व्याधः मृगः 
चक्रवाकः दंस ओर शरोत्रिय--इन ) सात जन्मे जो ( श्राद्ध ) 
धर्मका फर पाया थाः उसको सुननेसे रनैः-रनैः 
धर्म-बदधि प्रात हो जाती है ॥ २॥ 
पीडयाप्यथ धर्मस्य कते श्राद्धे परानध । 
यत्‌ प्राप्तं नाह्यणेः पूर्य तन्निवोध महामते ॥ ३. ॥ 
निष्पाप महामते { प्राचीन काल्मे कुछ वरासने 
(िसारूपी अधमके द्वारा) धर्मको पीडित करनेपर 
मी श्राद्धं करे जो फर पाया था, उसे तुम सुनो ॥ ३ ॥ 
ततोऽष्टं तानधर्मिष्ठान्‌ कुरुक्षेत्रे पितचतान । 
सनत्कुमारनिर्दिनपदयं सतत वै दिजान्‌ ॥ ४ ॥ 
दिव्येन `चश्चुषा तेन याुवाच पुरा विभुः । 
विश्रु सनक्छुमारजीने जिनका वर्णन क्रिया थाः मैने 
अपने दिभ्य नेनसे सनल्छुमारजीके चतये हए उन सात 
नाहर्णोको अधमैमे प्रायण होनेपर मी कुरे श्राद 
केरते देखा ॥ ४१ ॥ 
वाग्दुष्टः क्रोधनो हिंसः पिद्युनः कविरेव च । 
खसमः पिदवतीं च नामभिः कर्मभिस्तथा ॥ ५ ॥ 


उनके नाम दस प्रकार थे--वाग्दुष्टः क्रोधन, दिख, पिंद्यनः 
कविः खसम ( ख अर्थात्‌ आकारै सरण करने--विचरनेके 
स्वभाववाढा परलोकार्थी ) ओर पित्वं । जसे उने नाम येः 
वैसे ही उन्केकर्मये॥५॥ 


कौशिकस्य सुतास्तात रिष्या गार्ग्यस्य भारत । 
पितयुपरते सखये अतवन्तस्तदाभवन ॥ ६ ॥ 
तात ! भारत ! वे कौशिक ( विश्वामि्न ) के पु्रये 
ओर जव इनके पिता विश्वामितरक्र शाप देकर उदासीनं हो 
गये; तव वे समी गार््यके शिष्य बनकर ( ब्रह्मचर्य ) त्रतका 
पालन करमैकरे व्यि उन यहो रहने को ॥ ६ ॥ 
विनियोगाद्‌ श॒सोस्तस्य गां दोग्रीं समकाखयन्‌। 
समानवत्सां कपिखां स्वं न्यायागतां तदा ॥ ७ ॥ 
तेषां पथि ध्युधातीनां बाल्यान्मोहाख भारत । 
क्रूरा बुद्धिः समभवत्‌ तां गां वै हिंसितं तदा ॥ ८ ॥ 
मास्त { एक समय वे सव गुरुके आज्ञा देनेपर उनकी 
दुधार कपिल गौ ओर उसके कपिल वर्णे बखदेको 
वनमे चरानेके स्यि छ गये। वह गौ गुर गार्म्यको न्यायतः 
प्राप्त हुई थी । मार्गमे 'क्षुधासे पीडित होनेके कारण उन्होने 
मोह ओर मूरख॑ताके कारण गौको मारनेका क्रूर विचार 
किया ॥.७-८ ॥ | 


तान्‌ कविः खश्छमश्चैव याचेते नेति ३ तद्रा 1 


न चादाकयन्त ते ताभ्यां तदा वारयितुं द्विजाः ॥ ९ ॥ 


# विश्वामित्रने अपने पचास पू्घोको शाप देते हुए का 
था-- तुम्हारे वंशका न्त हो जाय) तुम अपनी प्रजाका भक्षण 
करो अर्थात्‌ अव तुम्हरे पुत्र आदि जाह्नण नहीं कदर्येगे । श्स 
श्रकार तुम अपनी प्रजा ( के ब्राह्मणत्व ) का भक्षण करोमे 
उन पचास प्ररभेसे ये बाद्दुट आदि भी ह । सुना जात्ता है 
कि अन्धः पुण्ड आदि मीश्नकी ष्टी संताने रै! (नीलकडी) 


७८ 


श्रीमहाभारते लिरभागे 


[ शरिषंे ' 


उस समय कपि ओर खखमने उनसे एेसा न करकी 
प्रार्थना की; परत वे ब्राह्मण इनके द्वारा किसी प्रकारभी 
रोकैनजांस्के ॥९॥ 
पिदवतीं ठु यस्तेषां नित्यं श्राद्धाहिको द्विजः । 
स सवौनत्रवीद्‌ रावन्‌ कोपाद्धम समादितः ॥ १०॥ 
तव उनम जो प्रतिदिन श्राद्ध करनेवाख धर्मात्मा 
पितव्रवर्ती नामक द्विज था, चह उन सव्र भादर्योसे बिगङ्कर 
चोद ॥ १० ॥ 
यद्यवदयं प्रहन्तन्या पिवृुदिदय साध्विमाम्‌ 1 
भदर्वीमहि-गां सम्यक्‌ स्वं पव सम'दिताः ॥ १९॥ 
भ्यदि से अवदय ही मारना है तो ह्मे चित्तको सावधान- 
कर इसे पितरोकरि निमित्त ही मारना चाद्ये ॥ १९ ॥ 
पवतेषापि गौर्धर्म प्राण्स्यते नान्न संश्षयः। 
पिवृनभ्यच्यं धर्मेण नाधमं ऽस्मान्‌ भविष्यति ॥ १२॥ 
'्टेसा करनेसे इत गौको मी निस्संदेद धर्मकी प्राति 
होगी ओर धम॑पू्वक पितसोका पूजन कर देनेसे हम भी 
अधमं न ख्ोगाः ॥ १२ ॥ 
तथेत्युक्त्वा च ते स्वे धोक्षयिन्वा च गां ततः। 
पिव्रभ्यः कल्पयित्वैनासुपायुञ्जन्त भारत ॥ १३ ॥ 
भारत ! तवर उन सवने (तथास्तु, ककर गौका प्रोक्षण 
क्रिया ओर उसक्रो पितरोके निमित्त अर्पित करके उसका 
मनमानां उपयोग क्रिया ॥ १३॥ 
उपयुज्य च गां सवं शुरोस्तस्य न्यवेदूयन्‌ । 
शादुंलेन इता धेलुर्वत्सोऽयं गृह्यतामिति ॥ १४॥ 
गौको उपयोगे लकर उन सर्योनि गुरुजीसे निवेदन 
क्रिया किं गायको तो सिंहने मार डाल, यह उसका 
चढ़ा है, इसे आप प्रहण कीजिये, ॥ १४ ॥ 
आर्जवात्‌ स तु तं वत्सं प्रतिजग्राह कै द्विजः। 
मिध्योपचर्य॑ते तं तु गुरुमन्ायतो दिजाः। 
कालेन समयुज्यन्त सवं प्वायुषः श्ये ॥ १५॥ 
सरलस्वभाव टोनेके कारण उन ब्राह्मणने भी उस 
वख्देको ग्रहण कर ख्या । इस प्रकार वे व्राह्मण 
अन्यायद्वारा अपने गुरुको धोखा देकर आयु समाप होनेपर 
मत्युको प्रात्त हए ॥ १५ ॥ 
ते वै रतया सरा जनार्यत्वाद्‌ गुरौ सथा । 
उग्रा हिसाविदःराश्च सप्ताजायन्त सदयः ॥ १६॥ 
तत्पश्चात्‌ अपनी क्रूरता ओर गुरसे अनार्यताका 
व्यवहार करनेकरे कारण बे सात माई उग्र सखभाववारे, 
हिंसाविहारी व्याध वनकर उत्पन्न हुए ॥ १६ ॥ 
तयुन्धकस्यात्मजास्तात वल्बन्तो मनखिनः। 
पिवृनभ्यच्यं धर्मेण प्रोक्षयित्वा च गां तदा ॥ १७ ॥ 


स्ति; परत्यवमदरीश्च तेषां जात्यन्तरे ऽभवत्‌ 1 
जाता व्याधा दशाणंघु सप्त धर्मविचक्षणाः ॥ १८ ॥ 
तात | उस समय वे एकं वदेय््यिके बलवान्‌ टवं मनस्वी 
पुत्र हए । उन्दनि धर्मतः पितररौका पूजनकर गोका प्रोक्षण 
क्रिया था; दसस्थि दूसरा जन्म पानेपर भी उनको अपने 
पूर्वजन्म ओर्‌ पूर्वजन्ममे क्रि हु कर्मकरा स्मरण वरना रहा । 
वै सातौ दारणं ॑देदामे धर्मकरु्र ` व्याध वनकर उत्पन्न 
टुए थे ॥ १७-१८ ॥ 
खकर्मनिरताः सवं लोभाद्रृतविवर्जिताः। 
तावन्मां प्रङ्कर्वन्ति यावता प्राणधारणम्‌ ॥ १९. ॥ 
वे सवर लोम ओर असत्यसे दुर रहते इए अपने कर्मं 
तत्पर रहते थे ओर उतना ही भोजन करते थे, जित्से 
म्राण चिकि रदे ॥ १९॥ 
हरेषं ध्यानपसः कालमदुष्यायन्ति कम तव्‌ । 
नामधेयानि चाप्येपामिपान्यासन्नराधिप ॥ २०॥ 
राजन्‌ ! उनके पास जो समय वचता थाः, उसमे ध्यानमग्न 
होवे अपने ( पूर्वजन्म) कर्मका चिन्तन कसते रहते थे । इस 
जन्ममे उनके नाम इस प्रकार ये--। २० ॥ 
निर्वे निरतिः श्गन्तो निर्मन्युः छृतिरेव च । 
चैधसो मादवतीं च व्याधाः परमधार्मिकाः ॥ २९ ॥ 
निर्वै निरृति, शान्तः निर्मन्यु, कृतिः वैधस ओौर 
मातरव्तीं | ये सभी व्याध परम धार्मिक ये ॥ २१॥ 
तैरवमुषितैस्तात रईहिसाधर्मरतैः सदा । 
माता च पूजिता चद्धा पिता च परितोषितः ॥ २२॥ 
तात [ इस प्रकार वे दशाम रहकर हिंसामे भी 
धर्मका पान करते रहतेथे | वे अपनी चरद्धा माताका सक्तार 
करते थे ओर परिताको भी संतष्ट रखते ये ॥ २२॥ 
युदा माता पिता चैव खंयुकतौ काङुधर्मणा । 
तद्रा धनूपि ते त्यक्त्वा चने प्राणानवास्टूजन्‌ ॥ २३ ॥ 
जव उनके माता-पिता मर गये; तव उन्होने अपने-अपने 
धनुप्रका परित्याग कर वनम ( अनशन आदिके द्वारा ) 
अपने प्राण त्याग दिये ॥ २३॥ 
शुभेन कर्मणा तेन जाता जातिस्मरा खगाः) 
जासाचुत्पाद्य संवि्या रम्ये कालञ्जरे गिरे ॥ २६॥ 
( माता-पिताकी सेवारूप ) शुम कर्मके कारणवे पूर्व 
जन्मक्रा स्मरण रखनेवाले मृग व्रनेकर उत्पन्न हुए } ८ पले 
हिंसाके दाया -दुसरोकौ ) त्रास देनेकरे कारण वे रमणीय 
कलञ्ञर पवतर सदा उदि रहते थे ॥ २४॥ 
उन्मुखो नित्यविच्रस्तः स्तन्धकर्णों धिरोचनः 1 
पण्डितो घस्मरो नादी नामतस्तेऽभवन्‌ सूृगाः॥ २५ ॥ 


हरिवंरापवं ] 


पकविक्षोऽध्यायः 


७९, 


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उन मृगोकरे नाम उन्मुखः नि्यवित्रस्तः स्तेच्धकर्णः 
पिलीचनः पण्डित, धसर ओर नादी ये ॥ २५ ॥ 
तमेवार्थमदध्यान्तो जतिस्मरणसम्भवम्‌ । 
आसन्‌ वनचराः क्षान्ता निधा निष्परिग्रहाः॥ २६॥ 

( उस जन्ममे भी ) पूर्वं जन्मकी स्मरति होनेसे याद 
अये हुए उन्दी कर्मो ओर उनके फालका स्मरण करते हुए 
वे स वैवूर्वक कष्ट सहन करते, शीत.उष्ण आदि दरदौकी 
प्रवा नही कसे ओर पररह ८ दिरनियोके संग ) से दुर 
रहकर वनम धमते रहते थे ॥ २६ ॥ 


ते सव श्चुभकमौणः सधमौण्ये वनेचराः 
योगधर्ममयुपराप्ता वि्रन्ति स्म तत्र ह ॥ २७॥ 
वे सन समानरूपसे .धर्मका पाखन करते ओर इमकर्मोमि 
तत्पर रहते थे एवं योगघम॑का आश्रय ङेकर ( आत्मविचार 
क्रते हुए ) वनम इधर-उधर धूमते रहते थे ॥ २७ ॥ 
जहुः प्राणान्स साध्य कष्वाहारास्तपखिनः । 
तेषां मरं साधयतां पदस्थानानि भारत । ` 
तथैवादयापि दद्यन्ते गिसै कार्ररे शप ॥ २८॥ 
मारत !उन मूरगौनि हल्का आहार तथा मर (निजंर रहने ) 
की साधना करके तपस्यामे तत्पर हौ बहौ अपने प्राण व्याग 
विये | रजन्‌ ! जर न पीनेकी साधना करनेवलि उन 
युगोकि वैके लिह काटस्र पर्व॑तपर अव भी पूर्ववत्‌ 
दिखायी देते ई ॥ २८ ॥ 
कर्मणा तेन॒ ते तात श्ुमेनाद्युभवर्सिताः। 
छ्ुभाच्छुभतसं योनि चक्रवाकत्वमागताः ॥ २९ ॥ 
तात ! इस शुभ कर्मकरे कारण वे अघ्युम योनिसे चूट्कर 
अतिद्धम चक्रवाककी योनिम उसन्न दए ॥ २९॥ 
शमे देशे शरद्वीपे सतेवासटीकसः। 
त्यक्त्वा सहचरीध्म मुनयो ब्रह्मचारिणः ॥ ३० ॥ 
वे सातौ कल्याणमय शरद्रीप ,( जल्द्वीप ) मे जख्चर 
पश्ची बनकर उत्पन्न हुए. 1 वरदो मी वे सहचरीधमं अर्थात्‌ 
सहवासका स्यागकर्‌ ब्रहम्वारी मुनि वनकर रहने खगे 1 ३० ॥ 
निःस्पृष्ठे निर्ममः क्षान्तो निर्दन््धो निष्परिग्रहः । 
निद्ति्नितश्चेव शाङ्ना नामतः स्मृताः ॥ ३१॥ 
(इस चक्रवाक-जन्मर्मे ) नके नाम निःपरहः निर्ममः 
क्षान्तः निनद्र, निष्परिमरहः निर्त्ति ओर निशत थे ॥ ३१९ ॥ 
ते तन्न पक्षिणः सदे शाना धर्मचारिणः । 
निराहारा जहुः प्राणांस्तपोयुकताः सरित्तटे ॥ ३२॥ 
उन स्व धर्माचारी पक्षि्ोनि नदीके किनारेपर निराहार 
रहकर तपं करते-करते अपने प्राणेको त्याग दिया ॥ ३२॥ 
अथ त्ते सोदरा जाता हंसा मानसचारिणः। 
जातिस्मरः खुखंयु्ताः सैव ब्रह्मचारिणः ॥ ३२ ॥ 


तदनन्तर वे सातो सहोदर भाई मानसरोवरपर विचरने- 
वाले हंसके रूपमे उन्न हए. { इस जन्ममै भी उनको 
अपने ( पूर्वं ) जर्न्मौका स्मरण वना रहता था । अत्तः 
वे सार्तो ही सदा साथ रहकर पूर्णरूपसे वरह्मचर्य॑का पाटन 
करते थे ॥३३॥ । 
विपरयोनो यतो मेोषहान्मिथ्योपचरितो गुखः । 
तिर्यग्योनौ ततो जाताः संसखरे परिवश्चमुः ॥ ३४ ॥ 
उन्होने ब्राह्मणयोनिमे मोहवसा अपने गुरुसे मिथ्या-भाष्रण 
किया. याः इसच्यि वे तिर्यकूयोनिमे उतपन्न होकर संसारमे 
मय्करदेये | ३४ ॥ 
यतश्च पित्वाक्यार्थः ऊतः सख्वाथं व्यवस्थितैः। 
ततो क्ञानं च जातिं च ते हि परापुशंणोखराम्‌ ॥ ३५॥ 
स्वार्थ तत्यर रहमेपर भी उन्दने पितरोके श्राद्धनिमित्त 
संकल्प बोलकर कार्य किया था; दसस उन्है उत्तरोत्तर 
उत्कृष्ट गुणसे युक्त ज्ञान ओर जन्म मिख्ता गया ॥ ३५ ॥ 
सुमनाः श्युचिवाक्छुद्धः पञ्चमदिखद्रदर्सनः। 
खमेन्रथ्य खतन्त्रश्च राकना नामतः स्प्रताः ॥ २६॥ 
( इस जन्ममे ) उन दंसोके नाम ये--सुमनाः द्चचिवाक्‌ः 
शः पञ्चमः चिद्रदरशन, सुनेत्र ओर स्वतन्त्र ॥ ३६ ॥ 
पञ्चमः पाल्चिकस्तत्न सघ्तजातिष्वजायत । 
षष्ठस्तु कण्डरीको ऽभूद्‌ ब्रह्मदत्तस्तु सक्षम: ॥ २७ ॥ 
उन ( वाग्दुष्ट आदि कौशिक-पु्ों ) मे ज रपोचर्ो 
(कवि ) थाः बह मावी सातवें जन्ममे पाश्चिकर ८ नामक 
राजमन्त्री ) हज । छठा ( सखम मावी मनुष्य-जन्ममे ) 
कण्डरीक हुआ ओर सातर्वो ( पितृवर्ती भावी सात जन्ममे ) 
ब्रह्मदत्त हुआ ॥ ३७ ॥ 
तेषां तु वसा तेन सप्तजातिरूतेन तै । 
योगस्य चपि निर्या भ्रतिभानाच्च शोभनात्‌ ॥ ३८ ॥ 
पूर्वजातिषच॒यद्‌ व्रह्म श्तं गुरुकुलेषु वै 1 
तथैबावस्थिता बुद्धिः संसरेष्वपि वतंताम्‌ ॥ ३९ ॥ 
उरौ सातो अन्मे जो तप किया, उससे, योग- 
षिद्धिसे, पूर्नन्मके कर्मोकी स्मरति होनेदे तथा पूर्मजन्मभे 
र्कुमे रदकर जो वेदाष्ययन किया गया था; उसके 
प्रमावसे संसार श्रमण करतेपर भी उनकी बुद्धि वैसी ही यनी 
रही, बदली नदीं ॥३८-२९॥ 
ते ब्रह्मचारिणः सव विहङ्क ब्रह्ममादिनः। 
योगधर्ममनुध्यान्ते विहरन्ति स्म रत्र ट ॥ ४०॥ 
वे समी आकारचारी दंस अक्षचारी तथा ब्रह्मवादी होकर 
योगधमेका पालन कंते हुए विचरते रहे 1} ४० ॥ 
तेषां त्न विज्ञाना चरतां सहचारिणाम्‌ । 
नीपानामीण्वसे राजा विभाजः पौरवान्वयः ॥ ४१॥ 


८० श्रीमहाभारते खिरभागे 


_ न्व व वव व्ववव्वव= ~~ या कवक 


[क 0 


विश्राजमानो वपुषा प्रभावेन समन्वितः। 
श्रीमानन्तःुरवृतो चनं तत्परविवे् ट ॥ ४२॥ 
.इस प्रकार वे सव पक्षी वहां साथ-साथ विचर रदे येः 
इतनेदीम नीर्पोका स्वामी पौसववंशी श्रीमान्‌ विभ्राज अपने 
शरीरकी कान्तिसे ्रकारित होता ओर अपना प्रमाव दिखाता 
हु अपने अन्तःपुरको लेकर उस वनम आया | ४१-४२ ॥ 


खतन्धरश्च विदङ्ोऽसौ स्पृहयामास तं यपम्‌ । 
दष्टाऽऽयान्तं धियोपेतं भवेयमष्टमीटदाः ॥ ४२ ॥ 


यद्यस्ति सुरतं किञ्चिच्तपो वा नियमोऽपि वा । 
खिनोऽऽस्ि हापवासेन तपसा निष्फलेन च ॥ ४४॥ 


तव स्वतन्व नामवले दसन वटो अये हुए उस च्खमीः 
वान्‌ राजाक्रौ देस्वकर उसके समान व्रननेकी कामना 
की । ( वह विचारे ख्णाकरि) यदि मेरे पास कुछ भी 
पुण्य; तप या नियम हो, तो म इत राजाफे समान दो जाँ । 
अव मै इस उपवास ओर निप्फ तपसे लिन्न ही 
रदा हू ॥ ४२-४४ ॥ 


एति श्रीमष्टाभारंते सियु हरिवंशे हिवंशपरवणि पिवृकस्पे एकर्विलोऽध्यायः ॥ २१ ॥ 


इस प्रकार श्रीमहाभारत द्िरुभाग रिवंदाके अन्तत दखिविशपवमे पितुकरपविषयक इकीसर् अध्याय पृरा हुमा ॥ २९ ॥ 
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दापिशोऽध्यायः 
पिवृकर्प, शुचिवाक पक्षीका खतन्त आदि तीन पधिर्याको शाप देना, सुमना 
पश्षीका अुग्रहपूषेफ उन्दं शापसे भुक्त करना 


मार्कण्डेय उवाच 
ततस्तं चक्षवाक्तै दवृचतुः सष्टचारिणौ 1 
आवां ते सदिषौ स्यावस्तव भरियदितैपिणौ ॥ १ ॥ 
भारकष्डेयजी चोे--उख समय उस स्वतन्त पभी- 
के साथमे रहनेवाठे दो चक्रवार्कौनि उससे कदाः--दम आपका 
प्रिय एवे हित चाहटनैवाठे आपके मन्त्री वरनेगे ॥ १ ॥ 
तथेत्युक्त्वा च तस्यासीत्‌ वदा योगात्मिका सतिः! 
पदं ते समयं चक्रः श्ुचिवाक्‌ वसुबाच द ॥ २ ॥ 
तवे स्वतन्तने कटाः व्वहुत अच्छः । यों कहकर 
चह पुनः अपने योगधर्मका विचार करने खगा ¡ जवर इस 
भकार उन तीनि प्रतिज्ञा कर छी, तत्र इचिवाकूने उस 
(स्वतन्न) से कदा} २॥ 
यस्मात्‌ कामप्रधानस्त्वं योगधर्ममपास्य वै। 
वं वरं प्रार्थयसे तस्मद्‌ वाक्यं निवोध मे ॥ २.॥ 
त्‌ योगधर्मको छोडकर कामप्रधान धर्मकी कामनासे णेस 
वर मोग रहा है हृसल्ि तू मेरा यह शाप सुन ठे॥ ३॥ 
राजा त्वं भवित(तात कास्पिल्ये नात्र संशायः। 
भविष्यतः सखायो च दाविमौ सचिवौ रद ॥ ४ ॥ 
तात | त्‌ काम्पिल्य नगरका राजा वनकर उत्पन्न दोगाः 
सम संदेह नटी । तेरे ये दोनो मित्र मी तेरे मन्त्री यनकर 
उन्न हेगि॥४॥ 
दरप्त्वा चानभिभाष्यास्तांश्चत्वारश्वहुरण्डजाः। 
ताख्ीनिभीष्खतो सज्यं व्यभिचारप्र्दितान्‌ ॥ ५ ॥ 
(शख भ्रकार) शेष चार पक्षियोनि राज्यकी शन्छा करके 


५ 


योगपर्म॑ति भ्रष्ट होनेवाले उन तीन पक्षिर्योको शाप देकर उमसे 
बोलना मी दो दिया ॥ ५ ॥ 
दाप्ताः खगाख्रयस्ते तु योगशा विचेतसः! 
तानयाचन्त॒चतुरखयस्ते सहचारिणः ॥ ६ ॥ 
इस प्रकार योगश्रष्ट होनेके कारण शापे रस हृष वे 
तीनो प्ी स्के मारे अचेत दो गये। उन तीनो खापिर्यौनि चारो 
पक्िर्योसे ( शापक्रा अनुग्रह करनेकी ) प्रार्थना की ॥ ६ ॥ 
तेषां प्रसादं ते चक्रुरथेवान्‌ खुमनाऽचवीद्‌ । 
सवषामेव वचनात्मसादालुगतं च्चः ॥ ७ ॥ 
तवर उन्दनि उनके ऊपर कृपा की ओर सवकी सम्मतिसे 
सखुमनाने अनुम्रपूर्वक यदं वात कही! ७ ॥ 
अन्तवान्‌ भविता शापो युष्मा नार संरायः। 
दतद्च्युताश्च माद्यं पराप्य योगमवाष्ष्यथ ॥ ८ ॥ 
(दसम सदेह नहीं कि वम्दरि इस शापका दीघ दी अन्त 
होगा } यहो योगते भ्रष्ट हकर चम मतुष्ययोनिमे उत्पन्न होगे 
ओर अन्तम फिर ठम्हं योगज्ञान प्रात होगा ॥ ८ ॥ 
स्वंसत्वरतक्षश्च खतन्त्रोऽयं भविप्यति । 
पिच्भसादो छयस्माभिरस्य प्राप्तः रतेन ३ ॥ ९ ॥ 
गा प्रोक्षयित्वा धर्मेण पिठभ्य उपरप्यताम्‌ ! 
अस्माक क्षनसंयोगः सर्वेपां योगसलाधनः ॥ १०॥ 
“व स्वेतन्त नामक हंख सव जीवोँकी बोली समक्नेवाटा 
होगा । पूजन्ममे हसीकरे कथनानुखार कार्य करनेते दमे 
पित्तरोकी कृषा प्रात हुई 1 सने कहा या कि ष्गौका प्रोक्षण 
करके इसे पितरको अपिंत किया जाय !दसीके पाठने हम 
सव्रको योगसाधक शनकी प्राति हुई है ॥ ९-१० ॥ 


हसियिंशापवं 1 


चयोधिदावितमो ऽध्यायः 


८१ 


मंच वाफयसंदर्मन्छोकमेकसुदाहतम्‌ । 
पुरुषान्तरितं श्रुत्या ततो योगमवाप्स्यथ ॥ ११ ॥ 
उस मतुप्य-जन्ममे ज कोई पुरुष तुम्हुं यह आगे बताया 


जनिवाख वाक्य संदर्भरूप ( (सपतम्याधा दशार्णेषु, आदि )* 
शोक सुनाविगा, तत्र तुं यह्‌ मोक्ष देनेवाला शानमय योग- 
धर्म फिर प्रास हो जायगा॥ ११॥ 


इति श्रीमहाभारते खिणेषु हरिवंशे हरिवंशपर्वमि पिकस्य द्वा्विशोऽप्यायः ॥ २२ ॥ 


इस प्रकार श्रीमहाभार्त लिरभाग ररिवंशके न्तमेत हरिवशपवमे पितृकरपविषयक वर्सन अप्याम पूरा हुमा ॥ २२॥ 
अकर 


त्रयोविंशतितमोऽध्यायः 
हसोका काम्पिल्यनगरमे जह्मदत्त आदिक रूपमे उत्पम्‌ होना ओर चार दंसोका 
अपने पितासे आशना ठेकर शुक्त हो जाना 


माण्डेय उवा 


ते योगधमनिरताः सक्त मानसचारिणः। 
पश्मग्मो ऽरविन्दाक्षः क्षीरगभैः खुखोसनः॥ १ ॥ 
उरुविन्दुः खुबिन्दुश्च दैमगर्भस्तु सत्तमः । 
वाय्वम्बुभक्षाः सततं शरीराण्युपश्ोषयन्‌ ॥ २ ॥ 
मार्कण्डेयजीने क्ा--तदनन्तरः योगधर्ममे निरत 
रदनेवाठे उन सात मानसचारी कंसंनि, जो पञ्मगर्भ, अरविन्दाक्ष? 
क्षीरगर्भ, सुलोचन, उसबिन्दु, सुबिन्दु ओर हैमगर्भ॑नाम 
धारण करते ये, केवर जल ओर वायुका दी मक्षण करके 
अपने शरीरको सुखाना आरम्भ कर दिया ॥ १-२॥ 
राजा विश्राजमनस्तुं वपुषा तद्‌ . वने तदा। 
चचारान्तःपुरवृतो नन्दनं मघवानिव ॥ २ ॥ 


इधर वह राजा अपने शरीरसे प्रकाश फैलाता हआ 


अपनी छिर्योको साथ ठे उस वर्मे हस प्रकार धूसने ल्गाः 
जसे नन्दनवनभे इन्द्र घूसते हँ ॥ २॥ 


स तानपदयत्वचरान्‌ योगधमौत्मकान्‌ खप। 
निवेदाश्च तमेवार्थमनुध्यायन्‌ पुरं थयौ ॥ ५ ॥ 

राजन्‌ ¡ उस राजानि उन पक्षियौको ( एकाग्रता आदि 
बाह्य लक्ष्णोते ) योगधर्ममे परायण देखा । इससे वह ( पक्षी 
मी योगसाधन करते है । हाय ! मँ मनुष्य शकर भी योग- 
सधन न कर सका | इस प्रकार ) कुछ निर्विण्ण होकर, उसी 
* यातको सोचता हया अपने नगरको चला गया ॥ ४॥ 


अणुहो नाम वस्थाऽऽसीतयु्ः परमधार्मिकः । 
अणुधर्मरतिर्नित्यमणं सोऽघ्यगमस्पदम्‌ ॥ ५ ॥ 
उसके अणु नामक परम धार्मिक पुत्र था! बह अणु 


धर्मक स्म तत्वके चिन्तनमे अनुरक्त था । इसस्यि उसे 
अणुपद (ब्रह्मके सृषम खरूपका ब्रोध ) प्राप्त हया था ॥ ५॥ 


# (सतव्याधा दद्याणेषु, आदि शाक्य चौवीसवं अध्याय बीसर्वा ओौर शीस धोक दै 1 


प्रादाकन्यां श्युकस्तस्मे त्वी पूजितरक्षणाम्‌ । 
सत्यदीखगुणोपेतां योगधर्मरतां सदा ॥ ६ ¢ 
उसको शकने श्रेष्ठ रक्षर्णोवाखी सत्यशीर एषं अन्यान्म 
गु्णेसि सम्पन्न ओर सदा योगधर्मका पालन करनेवाली अपनी 
कन्यां कृत्वी अर्पित की थी ॥ ६॥ । 
सा शदिष्ठा पुरा भीष्म पिलृकन्या मनीषिणी । 
सनत्छुमारेण तदा संनिधौ मम शोभना ॥ ७ ॥ 
मीप्म ! जैसा कि सनल्छुमारजीने पहरे सुक्षे बताया 
था, वह सुन्दरी कन्या कृत्वी पितररोकी ही बुद्धिमती कन्या 
( पीवरी) थी॥ ७॥ 
सत्यधर्मध॒तां धेष्ठा दुर्विक्ेया छतात्मभिः। 
योगा च योगपत्नी च योगमाता तथेव च ॥ < ॥ 
वह सत्यधम॑का पालन करनेवाखी नासियेमिं शरे्ठः थी । 
पुण्यात्मा पुरुष भी उसके स्वरुपको वदी कठिनतासे समक्ष 
सकते थे! वह स्वयं तो योगिनी थी ही; योगीकी ्ी 
पत्नी ओर योगीकी दही माताभमीथी॥८॥ 
यथा ते कथितं पूर्वै पितकल्येषु वे मया । 
विभ्राजस्त्वणहं राज्ये स्थापयित्वा नरेभ्वरः ॥ ९ प 
आमच्छ्य पौरान्‌ श्रीतात्मा ब्राह्मणान्‌ खस्ति वाच्य ख। 
भ्रायाव्‌ सरस्तपश्चर्तुं यत्र॒ ते सहचारिणः ॥ ९० ॥ 
नि पठे पितर-कस्यके समय ये सब बाते वुं वतायी 
थी | राजा विभ्राज अणुहको राज्यर्सिंहासनपर वैटाकर प्रसन्न- 
चित्त हो पुरवासिर्योसि विदा ले जाकर्णोसे स्वसिवाचन करयष्टर 
जं वे सारी ्ंस रते थे, उस सरोवरपर तप केके स्थि 
व्ङे गये 1 ९-१० ॥ 
स धि तश्र निरा्टारो घायुभक्षो महारपाः। 
त्यक्त्वा कामांस्तपस्तेपे सरसस्तस्य पादर्वतः ॥ ११॥ 
वै उस सरोवरे तय्पर सत्र कामना्ओकि त्याग निरा- 
हार रह वायुको ही पीकर तपस्या कने स्मो ॥ १९ ॥ 


† भगु शम्दकी व्युत्पत्ति श्स प्रकार द--(अणून्‌-सकषमाद्‌ भरभात्‌ इनि पामोतीति सणुष्ट-पहम तर्योको समसेी शुक्ति) 


१ 


८२ श्रीमहाभास्ते खिकभागे 


[ हरिव 


तस्य॒ संकट्प आसी्च तेपामेकतरस्य वै । 
पुत्रस प्राप्य योगेन युज्येयमिति भारत ॥ १२॥ 
भारत | उनका यद संकल्प था किं मै इन ( योगी सो 
मसे ) किसी पकका पुत्र बनकर उत्पन्न होऊं तो ओ मी योग- 
धम॑का पाठ्न कर सकूगा | १२॥ 
छृत्वाभिसन्धि तपसा महता स॒ समन्वितः । 
महातपाः स विभ्ाजो पिररर्जा्रुमानिव ॥ १६॥ 
इस प्रकार विचार करके वे महातपस्वी विभ्राज वड़ा 
भारी तप करके सूर्ये समान शरोमित होने खो ॥ १३॥ 
ततो विश्रान्तं तेन वैभ्राजं नाम तद्धनम्‌ । 
सरस्तच्च कुरुश्रेए वैश्राजमिति संशितम्‌ ॥ १७॥ 
कुरे ! उन्न (अपने नयसे ) उस वनको विभ्राजित 
( प्रकारित ) कर दिया । इसल्वि वह सरोवर ओर वद्‌ वन 
भी वैभ्राज सरोवर ओर वैभ्राज वनके नामसे प्रसिद्ध दो 
गये | १४ ॥ 
तत्र ते शकुना राजंश्चत्वासे योगधर्मिणः! 
योगश्रष्ठाल्रय्येव देहन्यासकूतोऽभवन ॥ १५॥ 
राजन्‌ { ( इसी समय ) उस सरोवरपर उने योगधर्मका 
पालन क्ररेवाठे चार दंसेनि तथा योगभ्रष्ट तीन हंसेनि मी 
अपने श्षरीरको त्याग दिया॥ १५॥ 
काम्पिल्ये नगे ते तु बह्मदष्ठपुरोगमाः। 
जाताः स महात्मानः सवै विगतकर्मपाः ॥ १६ ॥ 
वे सारतो निष्पाप महात्मा काम्पिल्य नगरसय ब्रह्मदत्त 
आदि ( नासि ) उत्पन्न हुए ॥ ९६ ॥ 
क्षानध्यानतपःपूजवेदवेदाद्धपास्गाः | 
स्पतिमन्तोऽच चत्वारख्रयस्तु परिमोहिताः ॥ ९७ ॥ 
ये सव शान, ध्यानः तप ओर पूरजर्मि तो रदते ये ओर 
वेद-वेदाङ्गके पारगामी विद्धान्‌ थे । इनम चारको तो अपने 
पूव॑-जन्मोका स्मरण था ओर तीन शापे मोदित नेक 
कारण अपने पूवंजन्मकौ स्मृतिसे वञ्चित ये ॥ १७ ॥ 
खतन्स्त्वणुदाखक्षे बह्यद्तो महायदाः । 
यथा द्यासीत्पक्षिभावे संकल्पः पूर्वचिन्तितः ¦ 
क्ञानष्यानतपःपूतो वेदवेदाङ्कपारगः ॥ १८ ॥ 
स्वतन्ने अपने पक्षी-शरीै जैसा संकस किया था; 
उसीके अनुसार वद अणुहके मदायशास्वी पुत्र ्रह्यदप्तके 
रूपम उत्पन्न हुयं वह्‌ जानः ध्यान ` ओर तप करके पवित हो 
राया था तथा वेद ओर बेदाङ्गका पारगामी विद्वान्‌ था॥ १८॥ 
खिद्रद्ी खुमेषश्च तथा वाश्रव्यवत्सयोः । 
जाती श्रोषियदायादौ वेद्षेदाङ्गपारमौ ॥ १९॥ 
वाभ्रन्य ओर वत्स-(ये दोनो वह राजा अणुहके मन्त्र 
तथा श्रोत्रिय बराह्मण ये ।) छि्रदर्यन ओर सुनेत्र नामक स 


-" उन्दी धरोत्रिय राजमन्तियोके कुलम वेद्-वेदाद्रके पारगामी 


श्रिय पुत्र बनकर उत्पन्न हुए ॥ २९ ॥ 
सदायौ ब्रह्मदत्तस्य पूर्वजातिसदोपितौ ! 
पाश्चारः पाञ्चिकश्चंच कण्डरीकस्तथापरः ॥ २० ॥ 
ये दोनों पदठे जन्मे ब्र्मदत्तके खाथ रदे थे ओर उनकी 
सदायता करेकरे व्यि उस्यत्न हृष्ट ये  ( इनम जे पूर्ववर्ती छः 
जन्ममिं अपने सात भादयंर्भिमे > पोचर्वो ( टोकर उन्न हा 
था, वद कवि सतव जन्मर्म ) पाश्चार नामक श्रोत्रिय हु 
ओर छटा ( खम ) कण्डरीक नामने प्रसिद्ध हया ॥ २०॥ 
पाश्चारे वदचस्त्यासीदाचार्यत्वं चकार ह । 
दिवेदः कण्डरीकस्तु छन्दोगोऽध्वय रेव च ॥ २१॥ 
नमे पाश्वाल ब्रहैव अर्थात्‌ प्रग्येदी था ¦ वद आचार्य 
(पुरो्ित ) का काम करने लगा ओौर कण्डरीक रन्द्र 
गान करनेवाद्य खमवेदी तथा अध्वयुं ( यजुर्वेदी ) हयाः 
इत प्रकार चह दौ वेर्दोका श्रता था} २१] 
स्व॑सत्त्वर्तक्षस्तु राजाऽऽसीदणुदात्मजः। 
पा्चारुकण्डरीकाभ्यां चस्य सख्यमभूत्‌ तदा ॥ २२॥ 
अणुदका पुत्र राजा व्रह्मदत्त सव प्राणिर्योक्री वरोटीको 
समक्ष ठेता था! उखकी पाश्चाठ ओर कण्टरीकसे मित्रता 
ह्ये मयी ॥ २२॥ 
ते ग्राम्यध्माभिरताः कामस्य वद्रावर्तिनः। 
पूचजातिरूतेनासन्‌ धमेकामाथंकोविदाः ॥ २३॥ 
ये तीनो पराम्यधर्मं ( संसारी पुरयेकि धरम ) मे मग्न रहते 
ये ओर काम ( द्च्छा ) के व्र्मे होकर चलते ये । इन्दनि 
पूर्वजन्म जो सक्कर्म॑क्िया था, उसके फटसे ये धर्म, अर्थं 
ओर कामके तत्व हुए ॥ २३ ॥ 
अणुहस्तु न्रप्ेष्ठो व्रह्मदत्तमकस्मपम्‌ । 
राज्येऽभिषिच्य योगान्मा परां गतिमवाप्तवान्‌ ॥ २४॥ 
राजार्थेमिं श्रेष्ठ अणुह निष्पाप ब्रह्मदत्तका राज्यपर 
अमिपेक करफे स्वयं योग-साघन कर परम गतिको प्राप्त 
होग्ये]) २४॥ 
ब्रह्मदत्तस्य भाया तु देवटस्यात्मजाभवत्‌ । 
असितस्य हि दुधषपं॑संनतिनौम नामतः ॥ २५॥ 
असित देवरी पुप्री, जिघका नाम संनति था तथा 
जिसका तिरस्कार करना किखीके स्मि भी वहत कठिनं याः 
राजा जद्यदत्तकी धर्मपत्नी हुई ॥ २५॥ 
सामेकभावसम्पश्नां ठेभे कन्याममुचमाम्‌ । 
संनति संनतिम देवखाद्‌ योगधर्मिणीम्‌ ॥ २६॥ 
उस एकभाव ( ब्रलममाव ) से सम्पन्नः नघ्नताकी मूर्तिः 
योग-धर्मका पान करनेवाली संनति नामकी शरेष्ठ कन्याको 
भ्रसदत्तने देवल ऋषिसे पत्नीके रूपमे प्राप्त करिया था ॥२६॥ 


हरिविंदापवं ] 


चतुर्विदातितमो ऽध्यायः 


(| 


पञ्चमः पाञ्चिकस्तत्र सपजातिधु भारत । 


` वुरिद्र्चमनपारृत्य पुधरार्थाश्वैव पुष्करान्‌ । 


षष्ठस्तु कण्डरीकोऽभूद्‌ बरह्मदचस्तु सप्तमः ॥ २७॥ , श्युधूषामपयुज्यैव कथं वै गन्तुमथ ॥ देर ॥ 


मारत | जन्मे पौँचर्वो होकर उत्पन्न दोनेवाख 
पाञ्चिक ( कवि ) पाथ्चाल हुआ, ख्ठा कण्डरीक हुमा ओर 
सातर्वो व्रह्मदत्त दुखा ॥ २७ ॥ 


हेषा विहङ्गमाः ये वै कम्पिल्ये' सहचारिणः। 

ते जाताः शरोत्रियकुठे दरिद्रे सहोदराः ॥ २८॥ 
जो शेष सहचारी पक्षी थे वे कामिव्य नगरम अव्यन्त दख 

्रोत्रियकुलमे सगे माई बनकर उस्यन्न हुए ॥ २८ ॥ 


शतिमान्‌ सुमना विद्ध स्तच्वदश्ची च नामतः । 

वेष्टाध्ययनसम्पन्नाश्चत्वारदिखद्रदर्दिनः ॥ २९॥ 
वे चागेँ धृतिमान्‌ सुमनाः विद्धान्‌ ओर तस्वदर्शकि 

नामसे प्रसिद्ध थे ओर बेदोके अध्ययन करनेमे सत रहते 

थे । साथ ही योगसाधनके च्वि गह-त्यागका अवसर दरदुते 

ये अथवा अपने सह्वारि्योके भोगासक्ति सूप दुधणपर मी 

हृष्टि रखर्ते ये ॥ २९॥ 

तेषां संविचथोत्पत्ना पूर्वजातिङूता तदा । 

ये योगनिस्ताः सिद्धाः प्रसितः सवं एव हि ॥ २० ॥ 
इनकी पूर्वं जन्मेमिं जैी वैराग्ूरणं बुद्धि थीः वैसी ही 

इस जन्म प्रकट हुई । अतः वे सव सिद्ध पुरुष योगपरायण हो 

घरसे चलनेके व्यि उत हुए ॥ ३० ॥ 

आमन्व्य पितरं ता पिता तानन्नरवीत्‌ तद्‌ 1 

अधमं पप युष्माकं यन्मां त्यक्वा गमिष्यथ ॥ ३१॥ 
तात [ जव उन्होने अपने पितासे पकर जानेका विचार 

क्रिया, तव पिताने उनसे यह्‌ वात कही--^तुमलोग यदि मुञ्चको 

छोड़कर वनम जाभोगे तो यद तुम्हारे स्थि भधमं ही होगा ॥ 


मलोग मेरी दद्ट्िता दूर न करे तथा पुत्रः सिद्ध 
होनेवारे प्रचुर प्रयोजर्नोकी भी सिद्धि णवं मेरीखेवा भीन 
करके कैसे चले जाना चाहते हो १ क्या यही उचित दै १।२२॥ 
ते तमूुर्दिजाः स्वँ पितरं पुनरेव ध। 
करिष्यामो विधानं ते येन त्वं वर्तयिष्यसि ॥ २२॥ 
तवर उन सव द्विजेनि अपने पितासे कहा--हमोग 
ेसा उपाय करेगे जितप्ते आप जीवन-निर्वाह कर सकैगे (तथा 
दम-जेसे पुर्बोको पाकर आपको अपने उद्धे व्यि भी 
चिन्ता करनेकी आवच्यकता नहीं है ) ॥ ३३ ॥ 
दमं इलोकं महां त्वं राजानं स्ट्मन्धिणम्‌। 
श्रावयेथाः समागस्य ` ब्रह्मद्त्तमकलट्मषम्‌ ॥ २७ ॥ 
८आप निष्पाप राजा ब्रह्मदत्तसे मिलकर यह महत्वपूरण 
( प्ठप्तव्याधा दभु, इत्यादि ) इखक उनको ओर उनके 
मन्निर्योको खनाद्येगा ॥ ३४॥ 
श्रीतात्मा दास्यति स ते ग्रामान्‌ भोगांश्च पुष्कलान्‌ । 
यथेष्ितांश्च सवीथौन्‌ गच्छ तात यथेम्ठितम्‌॥ २५ ॥ 
(तात ! इससे प्रसन्न होकर वे आपको वह्ुतसे ग्रामः 
प्रचुर मोग ओर आपकी इच्छानुसार स्व पदार्थं दमे । 
आपकी अव इच्छा हो तव ( ब्रह्मदत्ते पास ) चरे नायँ" ॥ 
पतावदुक्त्वा ते सवं पूजयित्वा च तं गुरुम्‌ । 
योगध्ममयुप्राप्य परां निदरतिमाययुः ॥ ३६॥ 
इतनी वार्ते कहकर उन सरबोने अपने पिवाकी पूजा की 
जर योगध्मका साधन कर वे परमानन्दमय मोको प्राप दो 
गये | ३६ ॥ 


इति श्रीमष्टामारते खिखेषु हरिवंशे हरिवंदापर्वणि पिवृकस्पे त्रयोर्विशोऽध्यायः !\ २३ ॥ 
इस प्रकार श्रीमरभारत दिरुभाग इरिवंशे अन्तत रखिंशपरवमे पितुकसप्रिषथफ तेर्दसवह अध्याय पुरा हुमा ॥ २२॥ 


मन कीष्धीनिषि----क-- 


चतुषिरातित्तमोऽध्यायः 


विभ्राजका जहदन्तका पुत्र नकर उत्पन्न होना, रानी संनतिका बरहमदत्तसे रूठना, एक 
ब्राह्मणक करे हुए श्टोकोसे ब्रह्मदत्त, पाश्वाल्य ओर फण्डरीकको अपने पूर्वजन्मका 
ज्ञानं रीना तथा ब्रह्मदत्त आदिका तप करके युक्त हयो जला 


मार्कण्डेय उवा 
ब्रह्मदत्तस्य तनयः सख विश्राजस्त्वजायत। 
योगात्मा तपसा युक्तो विष्वक्सेन दति श्चुतः ॥ ९ ॥ 
मा्कण्डेयजीने कहा--जिसके मनमे योग-साधन- 
विष्रयक संकत्य हु या, बद तपस्वी राजा विभ्राज त्रष्मदत्त- 


का पुत्र दोकर उत्पन्न हुआ ओर ( उस अन्म ) वह 
विष्वकृसेन नामसे प्रसिद्ध हुमा ॥ १ ॥ 


कदाचिद्‌ ब्रह्मदत्तस्तु भार्यया सहितो घने । 
विजहार प्रहण्टत्मा यथा शच्या शचीपतिः ॥ २ ॥ 
एक समयकी चात द, राजा ब्रह्मदत्त प्रस्चित्तसे पनी 


८४ ध्रीमषटाभारते खलभागे 


[ हरिवंशे 


मार्याको खथ चयि उपवनमे हव प्रकार विहार कर रटे येः 

नैते इनदर इन्द्राणीके साथ विहार कर रदे द ॥ २॥ 

ततः पिपीछिकर्तं सख श्भराव नराधिपः 

कामिनीं फामिनस्तस्य याचतः कोदातो शशम्‌॥ २ ॥ 
उसी समय साजने एक चटिका स्वर सुना, जो कामके 

वर्मे होकर अपनी काभिनी र्चीटीसे वहुत गिदगिदाकर 

प्रार्थना कररहाथा॥३॥ 

श्ुत्वा चु याच्यमानां तां छदां खक्ष्मां पिपीलिकाम्‌। 

ब्रह्मदत्तो मष्टाष्टासमकस्मादेव चादसत्‌ ॥ ४ ॥ 
छोटी-खी चटी कुपित हो मान क्वि वैडी दै ओर चय 

उरते याचना कर रहय दै, यह देख-घुनकर नद्मदत्त अचानक 

ष्टी वदे जोरसे हस पड़े ॥ ४॥ 

वतः सां संनतिर्दना सीडितेवाभवत्‌ तदा । 

निराहारा वहुविथं वभूव घरवर्णिनी ॥ ५ ॥ 
उस समय सुन्दरी रानी नति ठनित-सी हो गयी ओर 

दीन येकर वहुत दिर्नोतक उसने खाना-पीनातक खोद दिया ॥ 

्रसाद्यमाना भ्रौ सा तघ्ुवाच श्युचिस्िता । 

त्वया च खिता राजन्‌ नादं जवितुमुत्सदे ॥ ६ ॥ 
जव्र पतिदेव उसे मनाने खगे, तव पवित्र मुसकानवाटी 

संनतिने उनठे कहा--याजन्‌ | आपने मेरी दसी उड़ायी दै, 

अतः मेँ जीवित रहना नदीं चाहती, ॥ ६ ॥ 

ख तत्कारणमाचस्यौ न च सा धद्धाति तत्‌ । 

उचाच चैनं पिता नैप भावोऽस्ति मादे ॥ ७ ॥ 
तत्र राजाने ्दसनेका कारण वताया, पर संनतिने उस 

वातपर विश्वास नहीं क्रिया ओर कोपन भरकर कदा-- 

“मनुष्यरमे सी शक्ति ( सव प्राणिर्योकी योखीको समन्ननेकी 

रक्ति ) नदी हो सकती ॥ ७ ॥ 

को षै पिपीलिकरतं मापो वेलुमर्दति । 

छते देवपरसादाद्‌ वा पूर्वनातिरतेन वा ॥ ८ ॥ 

तपोवलेन वा राजन्‌. विद्या वा नराधिप । 
ध्याजन्‌ [ देवतार्ओकी कृषाः पूर्वजन्मरमे किये हए तप अयवा 

विदा (योगशक्ति)के विना णेस कौन मनुष्य दैः जो 

्चस्किी वोखीको समस्न स्के ॥ ८२ ॥ 

यथेप वै पभवस्ते सर्वसत्वरुतक्षतः ॥ २ ॥ 

यथाहमेतस्नानीयां तथा अत्याययख माम्‌ । 
ध्यदिं आप्मे स्व प्राणिर्योकी माषाको समक्षनेकी शक्ति 

है, तो म जिच प्रकार इस वरातको समक्ष सर्वः उस प्रकार मुके 

विश्वास दिलद्ये ॥ ९४ ॥ 

भ्राणान्‌ वापि परित्यक्ये जम्‌ सत्येन ते हाप ॥ १० ॥ 
भयजन्‌ | यदि आपणा न करगे तो म आपसे सत्यकी 


शपय खाकर कहती दः अपने प्राण त्याग र्दगीः ॥ १०॥ 


तत्‌ तस्या घचनं शरुत्वा महिष्याः परुपाद्रम्‌। 

स राजा परमापन्नो देवधेठमगात्‌ ततः ॥ ११॥ 

शरण्यं स्वेभूतेदयां भक्त्या नारायणं हरिम्‌ । 

समा्ितो निराष्टारः पड्राप्रेण महययद्ताः ॥ १२ ॥ 
रानीके इन कठोर दा्व्दोको नकर राजा वरद्धी विपर्तर्मे 

पड गये] तव उर्मि शरणागत-रसकः समस्त प्राणियेकि स्वामी 

देवश्रेष्ठ मगवान्‌ नारायण रिक क्षरण खी । उन मदायग्रस्वी 

महात्मा जाको निराहार रद भक्तिपूर्वकं खमादितचित्तसे 

उपाखना कसते हुए छः रते ब्रीत गयीं ।॥ ११-१२॥ 

ददर्श दशने यजा देवं नारायणं प्रयम्‌ । 

उवाच चैनं भगवान्‌ सर्वभूता्ुकम्पकः ॥ १२॥ 
छट रातर्मे राजाने प्रम नासयणदेवका दर्गन किया । 

समस्त श्राणिर्योपर अकारण दया करनेवाले भगवानले 

राजासे कदा--॥ १३ ॥ 

बरह्मदृश्च प्रभाते त्वं कल्याणं समवाप्स्यसि । 

त्युक्त्वा भगवान्‌ देवस्तधैवान्तरघीयत ॥ १४ ॥ 
श्रह्वदत्त ! प्रातधकाट ह्ोनेपर ठते कल्याणकी प्राप्ति 

होगी । इतनी यात ककर भगवान्‌ वदी अन्तधनि दौ गये ॥ 

खतुणा तु पिता योऽसौ बाह्मणानां महात्मनाम्‌] 

म्रोकं सोऽधीत्य पुत्रेभ्यः छृतरूत्य दवाभवत्‌ ॥ १५॥ 
इधर जो चारो महात्मा बाह्मणेकि पिता येः वे प्रसि 

नोक सीखकर कृतङृत्य-से हो गये ॥ १५॥ 

से राजानमथान्विच्छन्सदमन्तरिणमच्युतम्‌ 1 

न ददश्मीन्तरं किचिच्छोकं. धावयितुं तदा ॥ १६॥ 
वे धर्मे कमी च्युत न दोनेवाले राजा बक्षदत्त तया 

उसके मन्निर्योको खोजने च्म, परठु उन्द शोक सुनानेका 

कोद अवसर न मिला ॥ १६ ॥ 

अथ राजा सरःसरातो ख्ष्वा नरायणाद्‌ वरम्‌। ` 

भ्रविवेदा पुरर श्रीतो र्थमासा काञ्चनम्‌ ॥ १७ ॥ 
दतनेर्मे भगवान्‌ नारायणे वर पाकर राजा सरोवर 

स्नान करके सुवर्णजटिति रथम वैठे ओर प्रसन्नतपूर्वक 

अपनी नगरमे प्रवेश कणे तमो ॥ १७ ॥ 

तस्य रद्मीन्‌ परत्यगरक्ात्‌ कण्डरीको द्विजर्षभः । 

चामरं व्यजनं चापि वाश्रन्यः समवक्षिप्‌ ॥ १८॥ 
उस समय बाणश्रे्ठ कण्डरीकने अपने हाथमे व्रहमदत्तकरे 

धो्दौकी बागडोर ठे रखी थी ओरयाभरव्य-पुत्र पाञ्चा उनके 

ऊपर चवर ओर व्यजन ( पंखा ) इला रदे थे ॥ १८ ॥ 

दद्मन्तरमित्येव ततः स ब्रह्मणस्तदा! 

श्रावयामास राजानं छक तं सचिवौ च तौ ॥ १९ ॥ 


हसरिविंशपर्वं ] 


चतुरविंशतितमो ऽध्यायः 


८५ 


---------------------- वव 


भवह अवसर ह” यह समन्यकर वे ब्राह्मण राजाको ओर 
उनके दोनो मन्विर्योको उसी समयं शोक सुनाने रो ॥१९॥ 
सप्त ्याघा दृशा खगाः कार्जरे गिसे । 
चक्रवाकाः शरद्धी हसाः सरसि मानसे ॥ २०॥ 
तेऽभिजाताः करुक्षेत्रे ब्राह्यणा वेदपारगाः । 
परस्थिता दी्मध्वानं यूयं किमवसीदथ ॥ २१॥ 


ध्जो दशार्णं देशम व्याधः कालञ्र पवतर मृगः 
शरद्वीपे चक्रवाक तथा मानस-सरोवसमे दंस हुए थे, उन्मेषे 
हम चार तो कुर्े्मे वेद-पासगामी कुखीन व्राह्मण होकर दीर्ध 
मार्गपर चके आये है ( अर्थात्‌ योगसाधना करके मुक्तहो 
गये । अव शेष वरचे हुए.) त॒म ( तीन व्यक्ति योगमार्गसे श्रष्ट 
होकर ) कयो कष्ट पारे हो १ ॥ २०-२१॥ 


तच्छुत्वा मोदमगमद्‌ बह्दत्तो नराधिपः । 

सचिवश्चास्य पाञ्चाल्यः कण्डरीक्श् भारत ॥ २२॥ 
भारत { राजा ब्रह्मदत्त वह शोक सुनकर मूच्छिति रो 

गये ओर उनके मन्त्री पाञ्चाल तथा क्ण्डरीककी भी 

वदी दसा हूरई ॥ २२॥ 

खस्तरद्िममतोदौ तौ पतितव्यजनाचुभौ । 

दृष्ट्रा वभूवुरखस्थाः पौराश्च सु्दस्तथा ॥ २३॥ 


कण्डरीकके हाथरमेसे चाञुक ओर बागडोर चट गयीं तया 
पाञ्चालके हाथमेसे भी चवर ओर पेखा चूटकर नीचे गिर 
पदे । नगरनिवासी ओर मिन्रवगं राजा तथा दोनो मन्तिर्योकी 
इस दद्राको देखकर खिन्न दो गये ॥ २३ ॥ 
सुदहत॑मेव राजा स सह ताभ्यां रथे स्थितः । 
प्रतिखुभ्य ततः संज्ञां प्त्यागच्छदरिदमः ॥ २४॥ 
दोनो मन्नियोसदित-शच्रुदमन राजा ब्रह्मदप्त रथमे दो घड़ी. 
तक मूर्छित पड़े रदे । तत्पश्चात्‌ उन होश आया ओर 
ये अपने नगरमे छौट अयि ॥ २४॥ 
ततस्ते तत्सरः स्त्वा योगं तसुपङभ्य च । 
ब्राह्मणं विपुलैर्थैभोगिश्च समयोजयन्‌ ॥ २५॥ 
तदनन्तर उन ती्नोको उस सरोवरका ध्यान 
आ गया ओर अपने पूर्-जन्मके योगका मी सरण 
होने लगा । तव उन्दौने उस ब्राह्मणको वहुत-स्ा धन ओर 
भोगनपदार्थ दिये ॥ २५॥ 
अभिषिच्य स्वराज्ये तु धिष्वक्सेनमरिंदमम्‌ । 
जगाम बष्मदत्तोऽथ सदारो वनमेव ह ॥ २६॥ 
किर ब्रह्मदत्तने अपने राज्यपर शत्रुदमन विप्वकसेनका 
अभिषेक करिया ओर अपनी खीको साथे .छेकर चनको 
चल दिये ॥ २६॥ 


अथैनं संनतिघींसा देदछस्य खुता तदा । 

उवाचं परमभ्रीता योगाद्‌ वनगतं शपम्‌ ॥ २७ ॥ 
तदनन्तर योग-साधन कसमेकरे स्थि वनर्मे अयि ए 

राजा व्रह्मदन्तते देवकी पुत्री धीरखभावासंनतिने परम प्रसन्न 

होकर कहा--॥ २७ ॥ 

जानन्त्या ते महाराज पिपीडिकरुतक्षताम्‌ । 

चोदितः कोचसुदिद्य सक्तः कमिषु वै मया ॥ २८॥ 
महाराज ! मँ यह चात जानती थी कि आप चीटीकी 

ब्रोीको समञ्च सकते रै, तव मी मैने आपको संसारके भो्गो- 

म आसक्त देख यह क्रोधका नाटक स्वकर आपको योगकी 

ओर प्रेसि किया है ॥ २८॥ 

इतो षयं गमिण्यामो गतिमिष्टामचुत्तमाम्‌ । 

तव चान्तर्हितो योगस्ततः संस्मारितो भया ॥ २९॥ 
अव्र हम परम उत्तम अभीष्ट गतिको प्राप्त करेगे, इसी 

उदश्यते भने आपको भूरे हए योगका स्मरण 

दिल्या है ॥ २९॥ 

स राजा परमप्रीतः पल्याः श्रत्वा चचस्त्ा । 

प्राप्य योगं वदेव गति भ्राप खुदुखभाम्‌ ॥ ३०॥ 
तव अपनी पलनीकी यह वार्त सुनकर राजा बरे प्रसन्न हुए 

ओर योग-साधना करके उन्दने उसके बर्ते ही परम दुर्लभ 

गतिपूायी ॥ ३० ॥ 

कण्डरीरकोऽपिथमीत्मा सांख्यथोगमलुत्तमम्‌। , 

प्राण्य ; सिद्धो विशयद्धस्तेन कर्मणा ॥ ३१ ॥ 
ध्मत्मा कण्डरीक मी परमश्रेष्ठ साख्ययोगका श्चान 

पाकर योगका आश्रय ठे उसके साधनते शुद्ध एवं सिद्ध 

( शुक्त ) हो गये ॥ ३१ ॥ 

कमं प्रणीय पा्वाल्यः रि्चां चोत्पा् केवरम्‌ । 

योगाचा्यंगति श्राप यदरा्चाग्यं महातपाः ॥ ३२॥ 
महातयसी पाखचालने भी वेदिकमि परसिद्ध क्रमपाठ की "विधि 

एवं विद्यद्ध शिक्षाः ( नामक वेदाङ्ग अथवा योगविषयक 

रिक्षा ) की रचना करके योगाचार्यकरी गति ( मोक्ष ) तथा 

उत्तम यख प्राप्त किया ॥ ३२॥ 

एवमेतत्‌ पुराृत्तं मम ॒प्रत्यक्षमच्युत । 

तद्‌ धास्यख गाङ्गेय धेयसा योक्ष्यसे ततः ॥ ३३ ॥ 
( माकंण्डेयजी कहते दै--) अच्युत मीम्म { प्राचीन 

कामे घटित हुआ यद शाद्ध-मादातम्य-तूचक इृत्तान्त मैने 

म्यक देलाहे। त॒म मी इसे धारण करो तो वुग्हाय 

कस्याण होगा ॥.३३ ॥ 

ये चान्ये धारयिष्यन्ति तेषां चरितमुत्तमम्‌ । 

तियग्योनिषु ते जातु न गमिष्यन्ति कर्दिंचित्‌ ॥ ३४ ॥ 


८६ 


्ीम्ाभारते लिखभागे 


॥ हरिशे 


जो दूसरे सजन भी इन वाग्‌ दुष्ट आदिके उत्तम चरित्रको 
सुनगे, वे भी कमी तिर्यग्‌-योनिमे उत्पन्न न दहगि ॥ ३४ ॥ 
श्रुत्वा चेदमुपाख्यानं महां महतां गतिम्‌ । 
योगधमो हदि सदा परिवतंति भारत ॥ २५॥ 
भारत ! महात्मार्ओकी सद्रति देनेवाले इस महर्वमय 
उपाख्यानको खुननेसे दयम योग-धर्म पृणंरूपसे प्रकाशित 
होने खता हे ॥ ३५ ॥ 
स ॒तेनैवायुवन्धेन कदाचिह्ठभते शमम्‌। 
ततो योगगतिं याति श्चुद्धां तां भुवि दुरुभाम्‌ ॥ ३६॥ 
दयम उस योगधर्मको धारण करनेसे ही मनुष्य कमी 
शान्ति-लभ करता है; फिर उते प्रथ्वीर्मे दुर्भ योगिर्योकी 
छद्ध-गति प्राप्त होती दै ॥ ३६ ॥ 


वेश्नम्पायन उवाच 
एवमेतत्‌ परा गीतं माक॑ण्डेयेन धीमता । 
श्राद्धस्य फलसुदिद्य सोमस्याप्यायनाय वै ॥ २७॥ 
वैराम्पायनजी कते ईह-प्राचीन कार्म बुद्धिमान्‌ 
मार्कण्डेयजीने श्राद्धके फट्को टश्य्मे रखकर सोम ( चन्द्रमा ) 
का आप्यायन ( पोपरणं ) करनेके व्यि यह एसी कया 
कटी थी ॥ ३७ ॥ 
सोमो हि भगवान्‌ देवो खोकस्याप्यायनं परम्‌ । 
चृष्णिवंशापसद्गेन तस्य वंद निवोध मे॥ २८॥ 
भगवान्‌ सोम दी लोकरौकि परम तति देनेवलि द । अव 
बरूष्णिवंके प्रसद्धमे छम चन्द्रवंडाका वर्णन खनो-1 ३८ ॥ 


इति श्रीमहाभारते सिरेषु हरिविंे ्रिवदापर्वणि पिवृकल्यसमातिनौम चतुविंशोऽध्यायः ।। २४ ।१ 
स प्रकार श्रीमहाभारत लिसभाग दसिवंशके अन्तर्गत दखिंशोपरवमे पितृफरपफा उपसंहारनामर ्वीवीसवे भष्याय पुरा हुजा॥ २४ 


प्विंदातितमोऽध्यायः 
चन्द्रमाकी उत्पत्ति ओर राजघठय यन, देवासुरसंग्राम तथा घुधकी उत्पत्ति 


वैशम्पायन उवाच 
पिता सोमस्य वे राजम्‌ जक्ेऽ्रिर्भगवासरपिः 1 
बरह्मणो मानसात्‌ पूर्वं प्रजासर्ग विधित्सतः ॥ १ ॥ 
वैदाम्पायनजी कहते है--राजन्‌। प्राचीन काल्मर ह्या 
जीने प्रजाकी खट करनेका विचार क्रिया । उस समय उनके 
मानसिक संकल्पसे सोम ( चन्रमा ) के पिता भगवान्‌ 
अन्नि ऋपरि उत्पन्न हुए ॥ १॥ 
तघ्राधिः सर्वभूतानां तस्थौ खतनययुंतः। 
कर्मणां मनसा चाचा शुभान्येव चचार सः ॥ २ ॥ 
अत्रि श्रूषि भी प्रजाकी खमि ही संल्म्रहुए) वे 
तथा उनके पुत्र मनः वाणी ओर कर्म॑ते सव प्राणिर्योका 
कल्याण करनेवारे कार्यं ही करते ये ॥ २॥ 
अहिंस्रः सर्वभूतेषु धमौत्मा संशितवतः। 
काष्ठकल्यरिखाभूत  ऊष्ववाहुर्महादयुतिः॥ २ ॥ 
अनुत्तरं नाम॒ तपो येन तप्तं महत्‌ पुरा । 
श्रीणि व्प॑सहस्राणि दिव्यानीति हि नः श्रुतम्‌ ॥ ४ ॥ 
हमने सुना है किं प्राचीन कार्ल प्रशंसनीय व्रतका 
पार्न करनैवाठे, महातिजस्वीः धर्मात्मा अति ऋरृषिने तीन हजार 
दिव्य वर्षोतक्र अपनी भुजर्पे ऊपर उठाकर काष्ठ, दीवार ओर 
पत्थर समान निश्चर रहकर किसी प्राणीको तनिक भी कष्ट 
प्हुचाये व्रिनाही अनुत्तंर नामक महान्‌ तप किया था ॥३-५॥ 


१. जिससे उक्छृ्ट दूस कोई तप नदीं है, उसे “अनुत्तर! 


कते है 1 


तत्रोष्यैरेतसस्तस्य स्ितस्यानिमिपस्य ह 1 
सोमत्वं वल्ुरपेदे महासत्वस्य भारत ॥ ५ ॥ 
भारत ! थत्रि ऋषि महान्‌ सत्वगुणते सम्पन्न थे ।वे एकः 
टक देखते हुए ऊर्ध्वरेता (््मचारी ) र्दफर सोमकी मावनासे 
खदे-खड़े तपस्या करते ये, अतः उनका शरीर सोमरूपर्म 
परिणत हो गया ॥ ५॥ 
ऊर्ध्वमाचक्रमे सस्य सोमत्वं भाविताेमनः । 
नेत्राभ्यां वारि खुसखाव युद्राघा दयोवयद्‌ दिष्टः ॥ ६ ॥ 
शुद्ध अन्तभकरणवले मुनिके ने्चोसे वह सोमरूप तेजः 
जलरूपमे ब्रह निकला ओर दरो दिशा्भेको प्रकारित करता 
हुमा आकारे चदने ख्गा ॥ ६ ॥ 
तं गर्म विधिना हृ दश्च देव्यो दधुस्तदा 1 
समेत्य धार्यामासखुन च त; समदाक्युवन्‌ ॥ ७ ॥ 
तव प्रसन्रतामि भरी हुई दस दिशारूपी देविंयोनि 
सम्मिखित हौ उस तेजको अपने गमम विधिपूर्वकं धारण ` 
करियाः परंतु वे उस तेजक्रो धारण करलेर्मे समर्थ न दो सकी | 
ख ताभ्यः सहसेवाथ दिग्भ्यो गर्भैः प्रभान्वितः। 
पपात भासर्येल्छोकाञ्छीतांश्ुः सर्वभावनः ॥ ८ ॥ 
तव्र (ओप्रध आदिके दवारा ) सव लेरकोको पुष्ट करनेवाला 
गीतल किर्णैति . सुशोभित वह्‌ प्रकाशमान गर्भ॑लोकेकि 


हरिवंस्षपवं ] 


पञ्चर्विदहातितमोऽध्यायः 


८५9 


व ज~ ~ 


ग्रकाशित करता 
गिर पड़ा॥८॥ 
यदा न धारणे शक्तास्तस्य गर्म॑स्य ता दिशः। 
ततस्ताभिः सदैवाद्यु निपपात वसुंधराम्‌ ॥ ९ ॥ 

जत्र दिवा उस गर्मके तेजकरो न रोक सकी, तो वह 
ग्म उनके साथ ही परथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ९॥ 


पतितं सोममालोक्य बह्मा लोकपितामहः । 

रथमारोपयामास खोकानां हितकाम्यया ॥ १० ॥ 
सोमको गिरा हुमा देख लोकपितामह ब्रह्माजीने 

संसारका हित करनेकी भावनासे उसे रथपर रस ख्या ॥१०॥ 


स हि वेदमयस्तात धमौत्मा सत्यसंग्रहः। 

युक्तो वाजिसहसखरेण सितेनेति दि नः श्चुतम्‌ ॥ ११॥ 
तात ¡ हमने सुना दै कि वह रथ वेदमयं, धर्मरूप 

तथा सत्यसे नियन्नित था । उसमे एक हजार चवेत धोड़े जते 

दए थे ॥ ११॥ 

तस्मिन्‌ निपतिते देवाः पुत्ेऽेः परमात्मनि । 

त्वुत्रह्मणः पुजा मनसाः सप्त ये श्चुताः ॥ १२॥ 
अभिपुत्र भगवान्‌ सोमक मिरनेपर ब्रह्माजीकरे सुप्रसिद्ध 

सात मानस पुत्र उनकी स्तुति करने लगे ॥ १२॥ 


तथेवाक्षिरसस्तश्न भूगररेवात्मनैः सह । 
ऋग्भर्यजु्धिर्बदुखैरथवीङ्गिरसेरपि ॥ १३॥ 
अङ्गिरा-गोत्री मूगु ऋषि ओर उनके पुत्र ऋम्ेदः 
यजुवद ८ सामवेद ) ओर अथव॑वेदकी अनेक शरुतियोखे 
सोमकी स्तुति कसे लगे ॥ १३ ॥ 
तस्य संस्तूयमानस्य तेजः सोमस्य भाखतः। 
आप्यायमानं खोकांखीन्‌ भासयामास सर्वशः ॥ ९९ ॥ 
( 'अंशसंद्यष्टे देवं सोमाप्यायताम्‌ इत्यादि मन्नोके दारा ) 
स्वति करमेपर पुष्ट हा प्रकाशमान ` सोमका तेज तीनों 
लोर्कोको सर्वथा प्रकाशित करने र्गा ॥ १४॥ 
स तेन रथमुख्येन सागरान्वां वसुंधराम्‌ । 
नरिःसपरत्वो ऽतियदयाश्चकाराभिप्रदक्षिणम्‌ ॥ १५॥ 
तबे उन परम यदस्वी ८ बक्माजी ) ने उस ( सोमवान्‌ ) 
शरेष्ठ रथम बैठकर समुद्रतककी पृरथ्वीकी इक्ीस बार 
प्रदक्षिणा की ॥ १५॥ 
तस्य यच्च्यावितं तेजः पृथिवीमन्वपद्यत । 
ओषध्यस्ताः समुदूतास्तेजसा प्रज्वलन्त्युत ॥ १६॥ 
उस समय ( रथके वेगसे छल्ककर ) सोमका जो तेज 
पृथ्वीपर टपकने ख्या; उस तेजसे प्रकाशपुणं . ओषधिरयो 
उत्यन्न हुई । ९६ ॥ 


हुआ दिग्देवियेक्रि उदरसे . सदसा 


१. अर्थाद्‌ है चच््देव { आपकी प्रत्येक किण परिपुष्ट द्ये 


ताभिधीयौख्रयो खोकाः प्रजाश्चैव चतुर्विधाः । 
पोष्ठा हि भगवान्‌ सोमो जगतो जगतीपते ॥ १७॥ 
उन ओषरधिर्यसि भूक, भुवलक ओर स्वर्गलोक--इन 
तीर्नो लोकोका ओर जरायुजः अण्डजः, स्वेदज ओर उद्धिज-- 
इन चार प्रकारकी प्रजार्ओंकरा पालन होता रहता है । राजन्‌ ! इस 
प्रकार भगवान्‌ सोम सम्पण जगत्का पोषण कसते दँ ॥ १७॥ 
स लब्धतेजा भगवान्‌ संस्तवेस्तेश्च क्मेभिः। 
तपस्तेपे महाभाग पद्मानां दृ्तीदंश ॥ १८॥ 
महामाग | उन स्तुतिरूप कर्मेति तेजस्वी होकर भगवान्‌ 
सोमने एकर हजार पद्म वर्षरोतक तप क्रिया ॥ १८ ॥ 
दिरण्यवणौ या देव्यो धारयन्त्यात्मना जगत्‌। 
निधिस्तासामभूद्ेवः प्रख्यातः स्वेन कर्म॑णा ॥ १९ ॥ 
चोदीके समान शङ्क वर्णवाटी जो जल्की अधिष्टात्री 
देविर्यो अपने खरूप्रभूत जठ्ते जगतका पाटन करती है 
चन्द्रदेव उनकी निधि हुए । वे अपने कमोसे विख्यात ह ॥९९॥. 
ततस्तस्मै ददौ राज्यं बरह्मा बरह्मधिदां वरः । 
बीजोषधीनां विप्राणामपां च जनमेजय ॥ २० ॥ 
जनमेजय 1 तदनन्तर ब्रह्वेत्ताओमि श्रेष्ठ ॒वब्रह्माजीने 
चन्द्रमाको बीज, ओषधि, ्राद्यण ओर जलका राजा बना दिया ॥ 
सोऽभिषिक्तो महाराज राजराज्येन राजराट। 
लोकांखीन्‌ भासयामास खभासा भाखतां वरः॥ २९॥ 
महाराज † जव प्रकारावार्नमि श्रेष्ठ चन्द्रमाक्रा इन चारके 
राज्यपर सम्राट्‌ रूपमे अभिषेक हो गया; तद ( सम्राट्‌ ) 
चन्द्रमा अपनी कान्तिसे तीनों खोकोकि प्रकारित करने स्मे ॥ 
सक्तविरतिमिन्दोस्तु दाक्चायण्यो महानताः 
ददौ प्राचेतसो दक्षो नक्षत्राणीति या विदुः ॥ २२॥ 
उस समयं प्रचेता्ओंके पुत्र दक्षने अपनी महाव्रतधारिणी 
सत्ताईस कन्यर्प् चन्द्रमाको व्याह दीं, जिन्दं विद्वान्‌ पुरुष 
सत्ता्ईख नक््बोके रूपमे जानते है ॥ २२॥ 
स तच्‌ प्राप्य महवूरास्यं सोमः सोमवतां वरः । 
समासहे राजखयं सहसलदातदक्षिणम्‌ ॥ २३ ॥ 
इस बद भारी राज्यको पाकर पितृदेवता्भमिं भष सोमने 
राजसूय यह्का अनुष्ठान किया, जिसमे उन्देनि एक त्ख गौ 
दक्षिणाम दी थीं ।॥ २३॥ 
होतास्य भगवानधिरष्वयंभंगवान्‌ -भ्रयुः। 
दिरप्यगर्भश्चोद्राता ब्रह्मा अद्यत्वमेयिवान्‌ ॥ २४७॥ 
सौमके ( उस यज्ञम ) भगवान्‌ अचरि होता चने | 
भगवान्‌ शगु अध्वयुंः हिरण्यगभं उद्गाता तथा वसिष्ठजी 
ब्रह्मा बने ॥ २४॥ 


८८ 


श्रीमहाभारते खिरभागे 


` { हरिवंशे 


नान्न ------------- ~ ------- 


सदस्यस्त् भगवाम्‌ हरिनौरायणः खयम्‌ । 

सनत्कमारपरमुसेरायेव्रहयपिंभिदरतः 1 २५॥ 
उस यकम सनत्कुमार आदि प्राचीन व्रदर्ियेनि स्वयं 

भगवान्‌ नारायण हरक ही सदस्य बनाया था | २५॥ 

दक्षिणामददात्‌ सोमस्रील्लोकानिति नः भतम्‌ । 

तेभ्यो ब्रहम्पिमुस्येम्यः सदस्येभ्यश्च भारत ॥ २६॥ 
भारत ! मने सुना है कि उन व्र्रपिरयमि श्रे सदस्यो 

को सोमने तीनो लेक दक्षिणम देदियेये॥ २६॥ 

तं सिनिश्च छुहव्यैव युतिः पुष्टिः प्रभा वसुः । 

कीर्तिंधरंतिश्च लक्ष्मीश्च नव देव्यः सिपेविरे ॥ २७॥ 
उस समय सिनोवाटीः कुहू युतिः पुष्टि प्रमा, वसु 

कीर्ति, धृति ओर खक्ष्मी (शोमा }- ये नौ देविय नित्यप्रति 

चन्द्रमाकी सेवमि लगी रहती थीं | २७ ॥ 

भ्राप्यावभथमग्यप्रः सवेदेवपिपूनितः। 

विर्यजाधिराजेन्द्रो दशधा भासयम्‌ दिशः ॥ २८ ॥ 
इस प्रकार समी श्रुष्रि ओर देवताओंसे सत्कार पाकर 

द्विजराज चन््रमाने अवथ स्नान क्रिया, फिर वे दसो दिशार्ओ- 

को प्रकादित करने ख्ये 1 २८ ॥ 

तस्य तत्‌ प्राप्य दुष्पराप्यमेश्वरयं सुनिसत्छतम्‌ 1 

विवश्राम मतिस्तात विनयादनयाऽऽ्ता ॥ २९॥ 
तात ! सुनिर्योद्वारा सम्मानित उस दुर्छम रेशवर्यको पाकर 

चन्द्रमाकरी बुद्धि विनयसे भ्रष्ट हो गयी ओर उसे अनीतिने 

धर दवाया ॥ २९ ॥ 

शृ्टस्पतेः स वै भाया तारां नाम यदाखिनीम्‌। 

जहार तरसा सवौनवमत्याब्गिरभुतान्‌ ॥ २० ॥ 
तत्र उन्दौनि अङ्गिर सव्र पुत्रका तिरस्कार करफे ब्रदस्पति- 

की यदास्विनी मार्या ताराकरा व्रस्ूर्वकं अपहरण कर 

च्या ॥३०॥ 

ख याच्यमानो देवैश्च तथा देवर्पिभिः सह । 

नैव व्यसर्जयत्‌ तारां तस्मा आङ्गिरसे तदा । 

स संरन्यस्ततस्तसिन्‌ देवाचा बृहस्पतिः ॥ ३१ ॥ 
देवताओं तथा देवर्षि्योके याचना करनेपर मी उन्हेनि 

कृहस्पतिकी शी उनको नदीं लेययी । तव तो देवताओंकि 

आचार्य बृहस्पतिजी उनके ऊपर अत्यन्त कुपित हो उठे ॥ 

उदाना तस्य जघ्राह पाष्णिमाद्विरसस्तद्‌ा । 

स हि रिष्यो महातेजाः पितुः पूवं ब्रहस्पतेः ॥ ३२॥ 
उस समय शुक्राचार्यने चन्द्रमाका पश्च छिया ओर खद्रने 

दृहस्पतिकाः क्योकि महातेजस्वी सद्र बृहस्पतिके पिता अङ्गिराके 

दिष्यये।॥ ३२॥ 

चेन - स्नेहेन भगवान्‌ रद्स्तस्य वृहस्पतेः! 

वाष्णिप्राोऽभवयव्‌ देवः प्रग्ाजगवं धलुः ॥ ३३ ॥ 


५. 


उसी गरमा स्नेहसे भगवान्‌ शिव अपना आजगव नामक 
धनुष लेकर वृहस्यतिजीके पाप्णिग्राह ( सदायक ) चने ये| २३॥ 
तेन ब्रह्मशिरो नाम परमासख्रं महात्मन । 
उहिश्य दैत्यायुत्खष्ठं येनैषां नाहितं यश्लः ॥ २४ ॥ 

मदात्मा सुद्र दैर्योको लक्ष्य करके नकदिर नामक 
शरेष्ठ अघर छदाः जितने उन ८ दर्यो ) के खरि यशपर 
ही पानी फेर दिया ॥ ३४॥ 


तत्र तद्‌ युद्धमभवत्‌ प्रख्यातं तास्कामयम्‌ । 
देवानां दानवानां च रोक्र्वयकरं महच्‌ ॥ २५॥ 
वरह तारकरे व्यि देवताओं ओर दानर्वोिं बदा मारी 
युद्ध हुभा, जो तारकामय महातंग्ामके नामते प्रसिद्ध है । 
स्मे संसारका वदा भारी संहार हुजा ॥ ३५ ॥ 
तघ्र शि्टस्तु ये देवास्तुपिताश्रैव भारत ! 
ब्रह्माणं शरणं जग्मुरादिदेवं सनातनम्‌ ॥ ६६ ॥ 
मारत ! दस युद्धम मरते वचे हुए देवता ओर सुपित- 
गणं आदिदेव सनातन नद्याजीकी शरणम गये ॥ ३६॥ 
ततो निवायोंशनसं शुदं ज्येष्ठं च शद्ररम्‌ । 
ददावक्विरसे तारं खयमेव पितामहः ॥ २७ ॥ 
तत्र बरस्याजीने शुक्राचायं तथा स्द्रोमिं व्येष्ठ शङ्कर 
को भी समक्षा-बुञ्चाकर युद्ध करलेसे रोका; फिर उन्दने स्वयं 
ही तारको स्यकर ब्रइस्पत्तिजीको दिया ॥ ३७ ॥ 
तामन्तःप्रसवां शष्ट तारां पाह बृहस्पतिः । 
मदीयायां न ते योनौ गभां घायैः कथंचन ॥ ३८॥ 
उस समय ताराको य्म॑वती देख ब्ृहस्पतिर्जाने कहा- 
ञ्चे मेरे क्षेत्रे किंसी तरह पराया गर्भं नहीं धारण करना 
नाये ॥ ३८ ॥ 
योनाबुत्खछनत्‌ तं सा कमार दस्युहन्तमम्‌! 
इगीक्ास्तम्यमासाद्य ज्वलन्तमिव पावकम्‌ ॥ ३९ ॥ 
तत्र ताराने अयोग्यं सान--र्सीकिकि श्चरमु्मे जाकर 
प्रज्वचिति अग्निके समान तेजस्पी उस मायी दस्युर्न्ता 
छुमारको उत्पन्न क्रिया ॥ ३९ ॥ 
जातमाषः स भगवान्‌ देवानामश्षिपद्‌ वपुः 1 
ततः संशयमापन्ना श्मामकथयन्‌ खुराः ॥ ४०॥ 
उस रेवर्यवान्‌ कुमारे उत्पन्न होते टी अपने शरीरकी 
कान्तिस्े देवतार्ओका तेज फएीका कर दिया ! तम ती देवता 
संदेदर्मे पड़कर तारासे कने लो--) ४० 
सत्यं बरूहि खुतः कस्य सोमस्याथ वृहस्पतेः । 
पृच्छश्माना यदा देषैनौह सा साध्वसाधु वा 1 ४९ ॥ 
तदा.तां शप्तुमारन्यः कुमे दस्युहन्तमः। 
तं निबायं ततो अक्षा तारां पपच्छ संरायंम्‌ ॥ ४२॥ 


हरिवंरापर्वं ] 


वड्विशोऽभ्यायः 


८९, 


ययव 


'अरी ! सच वताः यद पुत्र चन्द्रमाका दै अथवा 
बृहस्पतिका १ परंतु देवतायेकि पृचनेपर भी जव उसने भल- 
बुरा कुछ उम्तर न दिया, तव वह दस्युदन्ता कुमार उसे शाप 
देनके ल्थि तैयार दो गया । उस समय ब्रह्माजी उसे 

‰ सेककर तायते इस संदेदको पृछा-।४२-४२॥ 
यद्ध तथ्यं तद्‌ ब्रूहि तारे कस्य खतस्त्वयम्‌ । 
सा प्राञ्जलिरुवाचेदं बह्माणं वरदं अमुम्‌ ॥ ४२ ॥ 

"तारे { यह किंसका पु दै--दस बातको तू सक-खीक 
वता । तवर उसने दोन हाथ जोड़कर वर देनेवाले प्रथ ब्रह्मा- 
जीसे कहा ४२ ॥ 
सोमस्येति महात्मानं कुमारः दस्युहन्तमम्‌ । 
ततस्तं सुल्युपाघाय सोमो घाता प्रजापतिः ॥ ४४ ॥ 
बुघ इत्यकरोन्नाम तस्य पुरस्य धीमतः। 
प्रतिकूलं च गगने समभ्युचिष्ठते वुघः ॥ ४५॥ 

श्रमो ¡ यह सोमका ही पुर है ।* तव उस गर्भको धारण 
करानेवले प्रजापति चन्द्रमाने उस महामना दस्युहन्ता कुमार- 
का मस्तक सूधकर उस बुद्धिमान्‌ पुत्रका नाम ध्वुधः रखा । 
यह बुध जव आकार्मि उदय होता दैः तवर प्रतिकूल चेष्ट 
( उत्वात ) क्रिया करता है ॥ ४४.४५ ॥ 
उत्पादयामास ततः पुं वै राजयुननिका । 
तस्यापत्यं महाराजो बभूवैलः पुरूरवाः ॥ ४६॥ 

तदनन्तर वैराज मनुकी पुत्री इतने बुधसे एक 


पुत्र उत्पन्न क्रिया| उनके वे पुत्रै महाराज पुरूरवा 
हए ॥ ४६ ॥ 


उर्वश्यां जक्षिरे यस्य पुश्राः सत्त महात्मनः} 

प्रसद्य धर्षितस्तत्र सोमो वै राजयक््मणा ॥ ७७ ॥ 
महात्मा पुरूरवा उर्वंशीके गभ॑से सात पुत्र उत्पन्न हु । 

इधर सोमक्रो हटात्‌ राजयक्ष्मनि धर दवाया ॥ ४५७ ॥ 

ततो यक्ष्माभिभूतस्तु सोमः प्रक्षीणमण्डटः। ` 

जगाम शरणाथीय पितरं सोऽच्रिमेव तु ॥४८॥ 


यक्ष्मासे ग्रस्त होनेपर. चन्द्रमाका मण्डल क्षीण होने 
लगा, तव वे अपने पिता अत्रिकी शरणमे पर्हुचे ॥४८॥ 


तस्य॒ तत्तायशमनं चकारात्िर्महातपाः। , 

स राजयक्ष्मणा मुक्तः धिया ज्वार सर्वैतः ॥ ४९ ॥ 
महातपस्वी अत्रिने उने तापको दूर कर दिया । बे 

( चन्द्रमा ) राजयक्ष्मा रोगसे मुक्त होकर स्व ओरसे प्रकाशित 

हो उठे ॥ ४९ ॥ । 

पवं सोमस्य वे जन्म कीवितं कीर्तिवर्धनम्‌ । 

वंदामस्य महाराज कीत्यंमानं च मे श्टणु ॥ ५०॥ 
महाराज ! इस प्रकरार मैने ठमते चनद्रमाके जन्मफा 

वर्णन क्रियाः जो कीर्तिको बद्निवाला ३। अब मेरे द्वार 

चन्द्रमाके वंशका वर्णन सुनो ॥ ५० ॥ 


घन्यमारोग्यमायुष्यं पुण्यं संकल्पसाधनम्‌ । 
सोमस्य जन्म श्चुव्वेव पपेभ्यो विप्रमुच्यते ॥ ५१॥ 

मनुष्य चन्द्रमा जन्सको सुनते ही सव पापोसि भक्त 
शे जाता है । यह चन्द्रमाकरे जन्मकी कथा धनः, आयु, आसेग्य 
ओर पुण्य देनेवाल्ी दै ! इखे सुननेसे मनुष्यके सरे संकद्य-- 
मनोरथ सिद्ध हो जते ह ॥ ५१ ॥ 


इति श्रीमहाभारते विलभागे हरिवंशे दरिवशपर्थणि सौमोतपत्तिकयने पद्चविशोऽच्यायः ॥ २५ ॥ 


शस प्रफार श्रीमहभारत दिरूभाग इथिदके अन्तर्गत हयिदापरवमे चन्दरमाफो उत्पत्तका 
वणनविषयफ पचसे! अध्याय पुरा हुमा ॥ २५ ॥ 


~व 
पट्विरोऽध्यायः | 
महाराज पुरूरबाके चखि ओर वंशका वणन, राजा पुरूरषाका ्रेताग्निकी 
रचना करना ओर गन्धर्ोकि कोके जाना 


वैश्रम्पायन उवाच 


बुधस्य तु महाराज विद्धान्‌, पुत्रः पुरूरवाः । 
तेजसी दानशीलश्च यज्वा विपुलदक्षिणः ॥ १ ॥ 
ब्रह्मवादी पराक्रान्तः दात्रुभियुंधि दुर्जयः 
आतो चाग्निहोधस्य यक्चानां च म्यीपतिः ॥ २ ॥ 
वेशम्पायनजी कहते है--मदाराज ! बुधके विद्वान्‌ 
युन युरूरवा हुए जो तेजस्वी, दानीखः यरकर्ता, वहुत-सी 
दक्षिणा देनेवलि, बरह्मवादयी, युद्धम परक्रम दिखानेवाले ओर 


शनुओसे दुर्जय थे । वे राजा अग्निहोत्र ओर यशे अनुष्ठान 

करनेवाटे ये !॥ १-२॥ । 

सत्यवादी पुण्यमतिः काम्यः संदृतमेथुनः। 

अतीव श्रिषु रोकेषु यदशसाप्रतिमस्तदा ॥ ३ ॥ 
राजा पुरूरवा सत्यभा्री ओर्‌ पवित्र विचारवाठे थे । उन- 

का रूपम वड्ा सुन्दर था ओर वे गुसरूपसे सदवास करनेवाठे 

थे । वे अपने समयमे तीनो लोकमि अनुपम यशस्वी ये॥ ३॥ 

तं बह्मवादिनं क्षान्तं धर्मश सत्यवादिनम्‌ । 

उर्चश्ची षरयामास हित्वा मानं यदाखिषी ॥ ४ ॥ 


९.© 


श्रीमष्टाभारते चिलभागे 


(ह्वरो 


न 


उन बह्यवादी, क्षमापययणः धर्मज्ञ तथा सत्यमाषी राजा- 
कौ यशस्विनौ उर्वी अप्पराने गवेका परित्याग करके पतिरूप- 
म वरण कर ल्या था॥४॥ 
तया सदाबसखद्‌ राजा घपौणि दडा पञ्च च । 
पञ्च षट सतत चाष्टौ च द्द चाष्टौ च भारत ॥ ५ ॥ 
वने चैभ्रसथे रम्ये तथा मन्दाकिनीतटे । 
अलकायां विशाखायां नन्दरमे च वनोत्तमे ॥ ६॥ 
उत्तणन्‌ स कुरून्‌ प्राप्य मनोरथफरुदरुमान्‌ 1 
गन्धमादनपादेषु मेरुपृष्ठे तथोत्तरे ॥ ७ ॥ 
भारत ! राजा पुरूरवा उस अष्ठरके साथ दस वर्ष॑तक 
रमणीय चैत्ररथ वर्मे, पोच वर्षतक्र मन्दाकिनीके तटपर वसी 
हुई अख्कापुरमि, पाच वर्ष॑तके बदरीनारायणफे वरनोर्मेः छः 
वर्तक उत्तम उपवन नन्दनवरनमैः सात वर्घतक मनोरथ- 
रूप फल्को देनेवाले शर्षोते परिपूणं उत्तकर्देशेमि, आर 
चर्षतक गन्धमादन पर्वतके शिखर्योपर, दस वर्षतक मेखपरषंतपर 
तथा आट वर्ष॑तकं उत्तराचलपर विहार करते रदे ॥ ५-७ ॥ 
प्तेषु वनमुख्येषु खुरेराचरितिथु च । 
उर्व्या सदितो राजा रेमे परमया सुदा ॥ ८ ॥ 
राजा पुरूरवा उर्वशीको साय लेकर देवतार्भोसि सेवित 
हन सुख्य-मुख्य वर्मं यदवे आनन्दके साथ विहार किया 
करेथे ॥ ८ ॥ 
देक्षे वचुण्यतमे चैव महर्पिभिरभिष्टुते । 
राज्यं च कारयामास धरयागं पृथिवीपतिः ॥ ९ ॥ 
पृथ्वीपति पुरूरवा ८ उर्वंशीके साय ) मदर्पियोसि प्रशंसित 
परम पवित्र देद्रा प्रयाग्मे राज्य करते थे ॥ ९॥ 
तस्य पुत्रा चभूस्ते सतत देवसुतोपमाः 1 
दिषि जाता महात्मान आयुर्धीमानमावसुः ॥ १० ॥ 
विश्वायुश्चैव धमौत्मा श्रुतायुश्च तथापरः! 
षायुश्च वनायुश्च शतायुगोर्वशीखुताः ॥ १९॥ 
राजाके द्वारा उर्वशीके गर्भसे स्वर्गं देष-पुरनोकि तस्यं 
आयु, बुद्धिमान्‌ अमावस, धर्मात्मा विश्वायुः शरुतायु दृदायुः 
वनायु ओर दातायु नामक सात पुत्र उत्यन हुए, जो समी 
महान्‌. आत्मवल्से सम्पन्न ये ॥ १०-११ ॥ 
जनमेजय उवाच 
गन्धर्वीं चोर्वशी देवी राजानं भाचुषं कथम्‌ । 
देवाचुत्खञ्य सम्प्राप्ता तक्नो बृहि वहुश्व॑स ॥ १२॥ 
जनमेजयने पूछा-हुशरुत वैशस्पायनजी { उर्वरी- 
देवी तो अप्रा थीः फिर देवतार्ओका परित्याग कर वह 
मनुष्य राजाकरे पास कर्योकर आयी १ यह सुप्ते बतादये ॥ १२॥ 
वैशम्पायन उवाच 
ह्मद्ापाभिभूता सा माुपं समपद्यत। 
पलं तु सा वरोद समयाव्‌ समुपस्थिता ॥ १२॥ 


वैशम्पायनजीने कहा--राजन्‌ ! ब्रह्मयापके कारण 
उर्बश्ीको मनुम्यलोक्म ' आना पड़ा था 1 वेद सुन्दर अर्घौ- 
वाखी उर्वी कु शतेकि साथ इला-नन्दन पुरूरवाके पास 
रही थी ॥ १३॥ 
आत्मनः शापमोक्षाय समयं सा चकार ह । 
अनय्रदरशनं चैव सकामायां च - मैथुनम्‌ ॥ १४॥ 
दौ मेषौ शयनाभ्यारो सदा बद्धौ च तिष्ठतः । 
घरुतमानरो तथा ऽऽदारः कारमेकं तु पार्थिव ॥ २५॥ 
भूपाल | उसने अपने शापसे दयटनेके लि यह शर्त कर 
टी थीकरि नँ अपकरो नंगा नदे मेरे सक्रामदोनेपरदी 
आप सहवास कर, मेरे पलंगके पास सदा दोर्भेदर्वरपे रगे जर 
मे दिनम एक वार थोद़ा-साधूत्तमात्र मोजन कर्गी । ९४.१५] 
यद्येष समयो राजन्‌ यावत्कालं च ते ददढः। 
तावत्कारं तु चत्स्यामि त्वचः समय एष नः ॥ १६॥ 
(राजन्‌ { जवरतक इन प्रतिजञार्यका अप दद्ताके साथ 
पालन कते रहैगे, तवतक यै आपके पास रहगी-यद म 
आपे प्रतिज्ञा करती हू ॥ १६ ]॥ 
तस्यास्तं समयं खर्वं स राजा समपालयत्‌ । 
पवं सा वसते तत्र पुरूरवसि भामिनी ॥ १७॥ 
राजा उसकी स्व रा्तौकरा पठन करने लगे । इस 
प्रकार वह श्रेष्ट अप्ठरा पुरूरव यदा रहने स्गी ॥ १७ ॥ 
चपौण्येकोनपष्टिस्तु तत्सा शापमोदिता। 
उरच॑द्यां मायुषस्थायां गन्धर्वाधिन्तयान्विताः ॥ १८॥ 
शापके कारण उवव॑शीको जवर राजामे आखक्त होकर रहते 
हट उनसठ वरं व्री गये, तत्र गन्धर्वोको मनुष्योकि वीच 
चसनेवाखी उर्वशीकी चिन्ता हई ।॥ १८ ॥ 
गन्धवा ऊदुः 
चिन्तयध्वं महाभागा यथा सा तु वराङ्गना। 
समारच्छेत्‌ पुनदेवादुर्वशमी खर्गभूषणम्‌ ॥ १९॥ 
गन्धर्वौने क्टा--महामागो ! वर्धना उर्वशी 
देवतार्जमिं फिर किं प्रकार अवि १ इसका उपाय सोयी, 
क्योकि वह स्वर्गका भूषण रै ॥ १९ ॥ 
ततो बिश्वावश्चुनौीम सत्रा वदतां वरः। 
मया तं सखमयस्ताभ्यां क्रियमाणः श्चुतः पुरा ॥ २० ॥ 
तत्रे वक्तार्भमिं शरेष्ठ विश्वावसु नामक गन्धर्वने कहा--~ 
'उन दोनेनि दके जो मतिः की थी, उन्ह भने सुना १ ॥ 
व्युत्कान्तखमयं सा घे राजानं त्यक्ष्यते यथा! . “ 
तदृहं वेद्म्य्ेयेण यथा भेत्स्यत्यसौ शपः ॥ २९॥ 
°राजाके प्रतिक्ला भङ्ग करनेपर वह उसे छीड़ देगी । उस 


रा्जाकी प्रतिज्ञा जिस प्रकार द्ूटेगीः मै उते भी भीभोति 
जानता हू ॥ २९॥ 


हरिषंदापर्वं ] 


षड्विंशोऽध्यायः 


९१ 


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ससहायो गमिष्यामि युष्माकं कार्यसिद्धये । 
पवमुषत्वा गतस्तचघ्र प्रतिष्ठानं महायशाः ॥ २२॥ 

नुम्हारे कामको सिद्ध करमेके चयि अष्मने सहायकोको 
साय ठेकर म बर्हो जागा | यों कहकर वह महा- 
यशस्वी गन्धर्व प्रतिष्ठानपुर ( श्ँसी-प्रयाग ) मे गये ॥ २२॥ 
निदायामथ चागस्य मेषमेकं ` जहार सः। 
माठबद्‌ वर्त॑ते सा तु मेषयोश्चारुहासिनी ॥ २२ ॥ 

वर्हो आकर उन्होने यतमे एक मेंड चुरा छी । मनोहर 
हासवाली वह उर्ंशी उन भेढोंपर माताके समान स्नेह 
करती थी ॥ २३॥ । 


गन्धवीगमनं श्चत्वा शापान्तं च थरखिनी। 
राजानमव्रवीव्‌ तच पुत्रो मेऽहियतेति सा ॥ २४॥ 
यशस्विनी उर्वरीनि गन्धरवेकि आगमनक सुनकर विचारा 
कि अव मेरे शापके अन्त होनेका समय आ गयाः, तवर उसने 
राजासे कदा-- "राजन्‌ ! मेरे एक वच्चेको चोर चुरा ठे गयेः ॥ 
पवसुक्तो विनिश्चित्य नप्नो नैवोदतिष्ठत । ,, 
नग्नं मां द्रक्ष्यते देवी समयो वितथो भवेत्‌ ॥ २५॥ 
यह्‌ कहनेपर भी वह यद विचारकर नंगा नहीं उठा 
` किं यदि यह देवी मुङ्ने नंगा देख छेगी तो मेरी प्रतिज्ञा शटी 
हो जायगी ॥ २५ ॥ - 
'ततो भूयस्तु गन्धव द्वितीयं मेषमाददुः । 
 दितपये तु हृते मेषे रें देव्यत्रवीदिदम्‌ ॥ २६॥ 
इतनेहीम गन्धवं पुनः दूसरे भँडको मी उट लेगये । दूसरे 
भड्के चुराये जानेपर देवी उवंशीने पुरूरवसे यह कदा-॥२६॥ 
पुषरो मेऽपहतो राजन्ननाथाया इव प्रभो 
प्वसुक्तस्तथोत्थाय नमो राजा प्रधावितः ॥ २७ ॥ 
मेषयोः पदमन्विच्छन्‌ गन्ध्वियुदप्यथ । 
उत्पादिता सुमहती ययौ तद्भवनं महत्‌ ॥ २८॥ 
भकारितं वै सदसा ततो नश्नमवैद्छत । 
नग्नं दष्टा तिरोभूता सान्लरा कामरूपिणी ॥ २९॥ 
स्तामरध्याली राजन्‌ ! अनाथ खरीक समान मेरे पुत्ोको छीन 
सिया गया }› यो उर्वं्ीके कहनेपर राजा नंगे ही उठकर 
भेडोके पे चिका अनुसरण करते हुए दौड़ । इसी समय 
गन्धवनि बड़ी भारी त्रिजटी चमकरायी । उस समय वह्‌ 
विषा भवन एक साथ प्रकाशित हो गया । तव तो उव॑शीने 
राजाकरो नंगा देख लिया । वह॒ कामरूपिणी अप्सरा राजाको 
नंगा देखते ही अन्तर्धान हो गयी ॥ २७-२९ ॥ 
उत्खष्राबुरणौ दद्रा राजा गृद्यागतो गरे । 
अपद्यन्मुर्वदगं तत्र॒ विलाप सुदुःखितः ॥ ३० ॥ 
उधर राजा भी ८ गन्ध्वौके ) छोडे दए भेको देख 


उन साथ केकर षम धुय पर वहो उन उर्वशी 
नहीं दिखायी दी । तव वे परम दुःखित हौ विलप 
करने सगे ॥ २० ॥ 


चचार पृथिवीं सवां माग॑माण शतस्ततः। 
अथापद्यत्‌ स तां राजा कुरुसेत्रे मायल; ॥ ३१ ॥ 
क्षती पुष्करिष्यां हैमवत्यां समाप्तम्‌ । 
क्रीडन्तीमष्सरोभिश्च पञ्चभिः सह शोभनाम्‌ ॥ ३२॥ 


फिर वे उर्वश्षीको खोजते हट प्रथ्वीपर सर्वत्र घूमने 
रगे । कुछ समयके अनन्तर उन महाबली नरेदाने उस 
शोभामयी यप्सयाको कुरकषे्के पक्षती्थकी हैमवती नामवाली 
पुष्करिणीमे स्नानकर अपनी पोच ससिर्योके साथ कीड़ा 
करते देखा ॥ ३१-२२ ॥ 


तां क्रीडन्तीं ततो ष्टा विललाप खदुःखितः। 
सा चापि त्र तं ष्टा राजानमविदुरतः ॥ ३२ ॥ 
उर्वशी ताः सखीः ध्रा स॒ पष पुरुषोत्तमः । 
यस्मिन्नहमवात्सं वै दृदीयामास तं नपम्‌ ॥ ३७ ॥ 


क्रीडा करती हई उर्वंशीको देखकर राजा दुःखित होकर 
विलाप करने स्त्रो । इधर उर्व॑शीने भी उस राजाको समीप 
ही देखकर अपनी सखियंसि राजाको दिखाया ओर कहा--धे - 
वे ही पुरषोत्तम है, जिनके पास गै रही थीः ॥ ३३-२३४॥ 


| 


समाविग्नास्तु ताः सवी पुनरेव नराधिपः । 
जाये ह तिष्ठ मनसा घोरे वचसि तिष्ठ ह ॥ ३५॥ 
एवमादीनि सक्तानि परस्परमभाषत। 

उर्वशी चात्रवीदैटं सगभीहं त्वया प्रभो ॥ २३६॥ 


उस समय वे सभी अप्सरार्णैः ( उर्वशीके पुन्ममनकी 
आशद्धासे ) धवरां गयी । इधर शजा उससे फिर कने 
स्गो--श््रिये ! तू थोडा ठहर ओ कठोर हृदयवाली ! 
ठहर जा ओर अपने वचर्नोपर द्द्‌ रह !' इस प्रकार 
वैदिक सूर्तोको वे दोनो एकर दुसरेके प्रति उम्तर-प्युत्तरके 
रूपमे कहने खगे । उस समय उर्वंशीने इद्-पुत्र पुरूरवासे 
कहा--श्रभो ! मँ आपके द्वारा गर्भवती हू ॥ ३५-३६ ॥ 


संवत्सरात्‌ कुमारास्ते भविष्यन्ति न संशायः। 

निदासेकां च चपते निवत्स्यसि मया सह ॥ ३७॥ 
ध्यजन्‌ ! निस्संदेद एक-एक व्ष॑पर मेरे स्म॑से आपकर 

कुमार उत्पन्न हेगि तथा प्रतिवषं एक रात्रि आप मेरे साथ 

रह स्केगेः ॥ ३७ ॥ 

हृष्ठो जगाम राजाथ ` खपुरं तु महायश्षाः। 

गते संवत्सरे भूय उर्वशी पुनरागमत्‌ ॥ ३८ ॥ 
.तेव वे महायरस्वी राजा प्रसन्न हो गये ओर अपने 


९म्‌ 


नगरसय आ गये । वर्प समाप्त होनेपर उर्वशी उनके पसि 
फिर आयी ॥ ३८ ॥ 
उपितथ तया साद्धैमेकरां मदायश्णः । 
उर्वद्यथाव्र्चिटं गन्धचौ वरदास्तव ॥ ३९ ॥ 
महायशस्वी पुरूरवा उरुके साथ एक रत्रिं रदे। 
तदनन्तर उरव॑शीने पुरूरवसे कदा-- "गन्धव आपको वर देना 
वाहते ॥ ३९ ॥ 
तान्‌ चणीष्व महाराज बरहि चैनांस्त्वमेव हि । 
वृणीष्व समतां राजन्‌ गन्धवौणां मदात्मनाम्‌ ॥ ४०॥ 
"महाराज ! अव आप वर मोग छीन्यि। आप इनते 
हन महात्मा गन्ध्वोकी समता मोग खीज्यि' ॥ ४० ॥ 
तथेत्युक्त्वा यरं वत्र गन्धर्वश्च तथास्त्विति । 
भूरयित्वाग्निया स्थी गन्धवौश्च तमघ्रुवन्‌ ॥ ४१ ॥ 
तव पुरूरवाने प्वहुत अच्छा ककर गन्धवंसि वर मोग 
छया | तव गन्धर्वानि व्वहुत अच्छा “रेस ही दोगाः” ककर 
णक थालीमे अग्नि भरकर पुरूरवाते कहा--।॥ ४१ ॥ 
अनेनेष्ट् च लोकाच्नः प्राप्स्यसि त्वं नराधिप । 
तानादाय कमारांस्तु नगरायोपयक्रमे ॥ ४२॥ 
'एजन्‌ | इस अग्निसे यन्न कफे तुम हमि लोकमि 
आ जाओगे ।* तव वे राजा ( अग्नि ओर ) अपने पुर्नोको 
केकर नगस्की ओर चले ॥ ४२॥ 
निक्िप्याग्निमरण्ये तु सयुत्रस्तु गदं थयो 1 
स घेताग्नि तु नापद्यद्श्वत्यं त्र र्वान्‌ ॥ ४२॥ 
( मार्गम ) उन्दनि वनम अग्निको रख दिया ओर अपने 
पर्बोको केकर धरम प्रवे किया 1 फिर बनर्मे जानेपर वरदो 
उन्दनि अगनिकरो नदीं देखा; किंतु उखकी जगह एक पीपटके 
ब्ृष्ठको खड़ा देखा ॥ ४३ ॥ 
शमीजातं तु तं दष्ट अश्वत्थं विसितस्तद्‌ा 1 
गन्धर्वेभ्यस्तदाशंसष्ग्निनारां ततस्तु सः ॥ ४४॥ 


भरीमहाभाप्ते खिरुभागे 


[ हस्वे 


तव वे रजा ( अग्निको अपने गर्मर्मे दिषनेवाठे ) 
णमी ( जंड ) के वृष्षमेसे उन्न दए. पीपठ्को देखकर 
विस्मयम पद्‌ गये ओर उन्दनि गन्धवति अग्निक न दीखनेका 
वृत्तान्त कदा | ४४ ॥ 
शरुत्या तमर्थमसिल्मरर्णी तु समाद्विदान्‌। 
अन्चत्थाद्र्णीं त्वा मथित्वाग्नि यधाविधि ॥ ४५॥ 
मथित्वाग्नि धिधा रत्वा अयजत्‌ स नराधिपः । 
षट यत्रै्वटुविधर्गतस्तेषां सलोकताम्‌ ॥ ४६ ॥ 
गन्धर्वेनि सत्र वातकरो सुनकर कट्‌); स्तुम पीपल्की अरणी 
चनास" तव उन्देनि पीपली अरणी चनाकर गाश्ीय विधिकर 
अनुसार उन अरणिर्योकरो मथक्रर अग्निको उच्यन्न क्रिया । फिर 
उस्र अभ्निकरे तीन विभाग क्रिये | तदनन्तर उस अग्निस 
उन्दोनि यजन किया था वै उस प्रेताग्निसे अनेक प्रकारके 
यज्ञ कर गन्धर्वाकरी समानता पाकर गन्धर्वोकरे छोकरमे पुव 
गये | ४५-४६ ॥ 
गन्धर्वेभ्यो वरं छ्ध्वा धेताग्नि समकारयत्‌ । 
पको ऽग्निः पूर्वमेवासीदरैरखेतामकास्यत्‌ ॥ ४७॥ 
राजा पुरूरवाने गन्धवति वर पाकर मेताग्निकी रचना 
की थी । पदठेअम्नि एकी था, पुरूरवाने उदको तीन 
नाया था ॥ ४७॥ 


प्व्रभावो राजासीदैलस्तु नरसत्तम । 
देदो पुण्यतमे चैव महर्पिभिरभिष्डुते ॥ ४८॥ 
राज्यं स कारयामास प्रयागे पृथिवीपतिः। 
उत्तरे , जाह्वीतीरे प्रतिष्ठाने समदायः ॥ ४९ ॥ 
नरमरष्ठ [ राजा पुरूरवा एसे प्रतापी ये। उन मदावदास्वी 
परथ्वीपतिने गज्गाके उत्तर तटपर वसे हुए महियेपि प्रंसित 
परम पवित्र प्रतिष्ठान ८ शसी-म्रयाग ) मे सन्य 
क्रिया या} ४८-४९ ॥ 


इति श्रीमहाभारते खिरभागे हरिवंशे दसिवंशपर्वणि पेरोर्पत्तिनौस पद््विशोऽप्यायः 1} २६ 1 
इस प्रफार श्रीमहाभारत सिमा दखिंदके अन्तम हसि पुरूखाफी उसत्ििषयर छन्यीस्वो भध्याय पृ हुमा ॥ २६ ॥ 


सप्तविदोोऽष्यायः 
पुरूरवाके द्वितीय पुत्र अमावसुके दंशका वणेन, विशामित्र ओर परजयुरामकी उत्पत्ति 


वैशम्पायन उवाच 
पुरा बभूवुस्ते सवै देवखुतोपमाः। 
दिवि जाता महात्मान आयुर्धीमानमावसुः ॥ १ ॥ 
विष्वायुख्वेव घमौत्मा श्रुतायुश्च तथापरः । 
इटायुञख वनायुश्च शतायुश्चोर्वरीखुताः ॥ २ ॥ 
वैशाम्पायनजी कदते है--जममेजय ! पुरूरवाकर 


समी पुत्र देव्मा्तेके तस्य ये } चे सव्र महात्मा उर्वंषीके 
गर्म॑से स्वर्गमिं उत्पन्न हुए थे । ( उनके नाम इस प्रकार 


है--) आयु, बुद्धिमान्‌ अमावमु, धरमत्मा विश्वायु श्रुतायुः 


ददायु, वनायु जौर शतायु ॥ १-२॥ 


अमावसोश्च दायादो भीमो राजाथ नग्नजित्‌ 1 
श्रीमान्‌ भीमस्य द्रयादो यजासीत्‌ काञ्चनप्रभः! 


हरिवंशपर्व } 


स्तविशो.ऽध्यायः 


व । 


---------------------------------न ज~ 


विद्ास्तु काञ्चनस्यापि खदो्रोऽभून्महावरः ॥ ३ ॥. . 


अमावसुके राजा भीम ओर नग्नजित्‌ नामक पुत्र दए 
ये । भीमकरे पुत्र श्रीमान्‌ राजा कच्चनप्रभम हुए । काञ्चनके 
महाव पुत्र सुच हष, ज वड़े विद्धान्‌ ये ॥ ३ ॥ 


सौरोधिरभव जहुः केशिन्या गर्भसम्भवः । 
आजद्रे यो महत्सच्ं सवैमेघमदहामखम्‌ ॥ ४ ॥ 
युदोचकरे केिनीके गर्भ॑से जह नामक पुत्र हुए. । उन्दने 
स्व॑मेध नामक मदहायका अनुष्ठान क्रिया था ( जिसमे बहुत 
बड़ा 'अन्नसत्र होता है ) ॥ ४ ॥ 
पतिरोभेन यं गड पतित्वे ऽभिससार ह । 
नेच्छतः प़ावयामास तस्य गङ्गां च तत्सदः । 
स तया छावितं दष्ट यक्षवारं समन्ततः ॥ ५ ॥ 
सौहिधिरव्रवीद्‌ गङ्गां क्रुद्धो भरतसत्तम ॥ ६ ॥ 
ग्ञाजी उनको पति वनानेके छोभसे उनके समीप गयी 
थी परंतु जव्र उन्होने इस वातकी इच्छा न कीः तव गद्धाजीने 
उनकी समाक्रो जल्ते मर दिया था । भरतसत्तम ! सुहोत्न-पुत्र 
जहुने अपने यज्ञवाटको गङ्गाजीकरे दवारा वता हुआ देख 
क्रोधमे भरकर गङ्गाजीसे कदा-- ५-६ ॥ 
पष ते विफलं यतनं पिवन्नम्भः कसेसम्यदम्‌ । 
मस्य गङ्गेऽवलेपस्य सद्यः फरमवाप्ुहि ॥ ७ ॥ 
"गङ्ख ! मँ तेरे इस जख्को पीकर तेरे यत्नको व्यर्थ किय 
देता हूं । तू अपने अभिमानका फर शीघही पाठेः ॥ ७ ॥ 
राजर्षिणा ततः पीतां गङ्गां दष्ट मद्षयः। 
उपनिन्युम॑हाभागां दुदित्त्वेन जाहवीम. ॥ ८ ॥ 
तदनन्तर उन राजर्षिने गङ्गाजीको पी चिया | यह देखकर 
महयन मदामागा गब्धाजीको उनकी पुत्री मानकर (उनका 
नाम ) जाहवी स्तर दिया ॥ ८ ॥ 
युबनादवस्य पु तु कावेर्य जह्वुरावहत्‌ । 
युवनाश्वस्य शपेन गद्घाधंन विनि्म॑मे। 
कावेरी सरितां श्रेष्ठां जदोभीयमनिन्दितपम्‌ ॥ ९ ¶॥ 
त जहुने युवनादवकी पुत्री कविरीसे विवाह क्रिया था; 
युवनाइवके गापसे गङ्गाने अपने ही आपे मागद्रारा 
प्रकट करिया था; इस प्रकार सरिताओमि शरेष्ठ साध्वी कावेरी 
जहुकी माया हई ॥ ९ ॥ 
जस्तु दयितं पुनं सुन नाम धार्मिकम्‌ । 
कावेर्यां जनयामास अजकस्तस्य चात्मजः ॥ १०॥ 
जने काविरीकरे र्मे सुनह नामक धार्मिक पुत्रको 
उसन्न करिया । सुनहरे पुत्र अजक हुए ॥ १०॥ 
अजकस्य ठं दायादो वखाकाश्वो महीपतिः । 
बभूव खृगयारीलः कुशस्तस्यात्मजो ऽभवत्‌ ॥ १९॥ 


अजक पुत्र राजा बलाकाश्च हुए । उनको श्गयाका 
व्यसन.था ! उनकरे पुत्र कुश हुए ॥ ९१ ॥ 
खपुर वभूद्दिं चत्वारो देववचैसः । 
कुरिकः ुटानाभश्च कुदापम्बो मतिमांस्तथा ॥ ९२॥ 
कुदाके देवताभोके समान कान्तिमान्‌ कुशिकः कुशनाभः 
कुदाम्ब यर मूर्तिमान्‌ नामक चार पुत्र उन्न हए ॥१२॥ 
पलवैः सह॒ सवृद्धि राज्ञा चनचरेस्तदा । 
कुशिकस्तु तपस्तेपे पुतमिन्द्रलमप्रभम्‌ । 
छमेयमिति तं श्क्रल्रासाद्‌भ्येत्य जक्षिवान्‌ ॥ १३॥ 
राजा कुशिक वनवासी पहुवोकरे साथ पलक्रर बड़े हुए 
थे । उन्होने इन्द्रे समान प्रमाववलि पुत्रको पनिकी इच्छसे 
तप करना आरम्भ कर दिया । तव इन्द्र॒ उनके भयसे स्वर्यं 
दी उनके यहो पुत्र बनकर उन हो गये ॥.१३॥ : 
पूणे व्षसदस्रे वे तं तु राक्रो श्यपर्यत । 
अत्युभ्रतपसं दष सदखाक्तः पुरदरः ॥ १४ ॥ 
समर्थः पुत्रजनने खमेवांशमवाखयत्‌ । ` 
पुत्रत्वे कल्पयामास स देवेन्द्रः .खुरोत्तमः ॥ १५॥ 
राजा कुशिकको जब ( तप करते ) एक हजार वषर पर 
हयो गये, तव इन्द्रका ध्यान कुदिककी ओर गया, हजारनेर्नो- 
वले पुरन्दर इन्द्रमे .राजाको अति उग्र तप करे पुत्र उत्पन्न 
करनेमे समर्थं देख उन ( क वीर्यं ) मे अपने अंशको स्थापित 
कर दिया । इस प्रकार देवेन्द्र सुरोत्तम कुदिकके पुत्र 
तने थे ॥ १४-१५॥ | 
स गाधिरभवद्‌ राजा मघवान्‌ कौशिकः खयम्‌ । 
पोसकुत्स्यभवद्‌ भायौ गाधिस्तस्यामजायत ॥ १६॥ 
इस प्रकार इन्द्र स्वयं ( कुशिकके पुत्र ) कीरिक गाधि 
चनक्र उदन्न हुए. थे । रजा कुशिककरी पनी पुरुकुत्सकी पुत्री 
थी, उसके गर्मसे ही गाधि उत्पन्न हुए थे ॥ १६ ॥ , 
गाघेः कल्या महाभागा नास्ना सत्यवती श्युभा । 
तां गधिशरयुपुत्राय चीकाय ददौ प्रयः ॥ १७॥ 
गाधिकी महाभाग्यवती द्यम कल्याका नाम सत्यवती था, 
राजा गाधिने सत्यवतीका विवाह भगुपुत्र ऋचीके साथ कर 
दिया था॥ १७॥ 
तस्याः प्रीतोऽभवद्‌ भती भागंबो श्रगुनन्द्नः । 
पुत्राथं कारयामास चरं गाधेस्तथेव. च ॥ १८॥ 
सत्यवतीके स्वामी गुशी ऋचीकने अपनी पत्नीके 
ऊपर प्रसन्न होकर उसके ओर गाधिके ल्थि पुत्र देनेवाखा 
न्वेर बनाया ॥ २८ ॥ 
उवाचाहय वां भती छचीको भार्गवस्तदा । 
उपयोज्यश्चरप्यं त्वया मारा त्वयं तव ॥ १९॥ 


तदनन्तर सत्यवतीके स्वामी भृगुवंशी ऋचीके सत्यवतीको 


९ 


भीमहाभार्ते खिलभागे 


[ दरिवंत्े 


~~~ 


बुल्यकर कहा-^तृ इस चसका उपयोग करना ओर स (दृसरे) 
चरका उपयोग करेक्रे स्थि अपनी मातासे कहना ॥ १९॥ 


तस्यां जनिष्यते पृषो दीप्तिमान्‌ क्षत्ियर्षभः। 
अजेयः क्षधियेोके क्षभियपभसूदनः ॥ २० ॥ 
म्हारी मातक्रे जो पत्र होगा, वह्‌ क्षत्रियो श्रेष्टः 
दीतिमान्‌, संसारम क्षतरिर्योसि अजेय भीर वडबे क्षनिर्योको 
दवानेवाल हौगा ॥ २० ॥ 
तवापि पुरं कल्याणि धृतिमन्तं तपोनिधिम्‌ । 
हामात्मकं दिजश्रेष्ठं चरुरेष विधास्यति ॥ २९॥ 
+कल्याणि ! यह चर तुम भी पैर्थधारी तपोनिधि ान्त- 
स्वरूप दविजश्रेष्ठ पुत्र देगा" ॥ २१ ॥ 
पवमुक्त्वा तु तां भायौखचीको शगुनन्दनः । 
तपस्यभिरतो नित्यमरण्यं पविवेहा ह ॥२२॥ 
सदा तपस्या्मे ही तत्पर रहनेवाठे शगुनन्दन श्रूचीक 
अपनी पल्नीसे स प्रकार कहकर ( तप करनेके च्ि ) वर्मे 
चले गये ॥ २२॥ 
गाधिः सदारस्तु तदा श्छचीकावासमभ्यगात्‌। 
ती्थयत्नप्रसद्धेन खतां द्रष्टं जमेश्वरः॥ २३ ॥ 
उसी समय राजा गाधि अपनी मार्याकरे साथ तीर्थयात्नाके 
प्रसङ्खसे अपनी पुत्रीको देखनेके व्यि श्रूचीक प्रपरिके 
आश्रमपर अये ॥ २३ ॥ 
चरुद्वयं गृष्टीत्वा तदपेः सत्यवती तषा । 
चरुमादाय यत्नेन सा तु माग्ने न्यवेदयत्‌ ॥२४॥ 
तव सत्यवतीने ्रष्रिके दिये हुए. दोनो चरर्भको ग्रहण 
करके उन्हें यत्नपूरवंक अपनी माताके सामने लाकर रख 
व्रि ॥ २४॥ | 
माता व्यत्यस्य दैवेन दुभ स्वं चरुं ददौ । 
तस्याश्चरुमथाक्लानादात्मसंस्थं चकार ह ॥ २५॥ 
तवर दैववडा माताने चर बदलकर पुत्रको अपना चरु 
दे दिया ओर उसने अज्ञानव पुत्रीके चरुको स्वयं खा 
च्य ॥ २५॥ 
अथ सत्यवती गर्भ॑प्षियान्तकरं तदा । 
धारयामास दीपेन पुषा धोरदरनम्‌ ॥ २६॥ 
तदनन्तर सत्यवतीने क्षरिर्योका संहार करनेवाले गर्मको 
धारण कर चियाः जो अपने जरीरकी कान्ति कारण घोर 
(क्रूर ) दीखने ख्गा|। २६ ॥ 
तासरचीकस्ततो दष्ट योगेनाभ्यजुखत्य च । 
तामव्रवीद्‌ द्विजश्रेष्ठः स्कं भाया वरवर्णिनीम्‌ ॥ २७ ॥ 
उसको देखकर करषिने ध्यानके दवारा सारी ब्रातोको जान 
ल्या] रिर्‌ द्विजश्रेष्ठ ऋचीक ऋषि अपनी श्रेष्ठ अङ्खोवाटी 
मायासि कटने खगे-- २७ ॥ 


। १ 


मासि वञ्चिता भद्रे चरुव्यत्यासहेतुना । 
जनिष्यति हि पुच्स्ते फए़रकमौतिदूाखणः ॥ २८॥ 
श्रात्ता जनिष्यते चापि ब्रह्मभूतस्तपोघनः। 
विद्व दि ब्य तपसा मया ठस्िन्‌ समपितम्‌ ॥ २९॥ 
'्मदरे ! माताने तुनने ठग चिया है, चस्म उटरेर हनेसे 
तेरा पुर अत्यन्त दारुण क्रूर कार्य करनेवाल दोगा ओर 
तेरा माई तपस्याका धनी एवं त्रह्मस्वस्प दोगा, मनि तपके 
द्वारा उम (चर) म सासा वेद मर दिया थाः ॥ २८-२९॥ 
पवमुक्ता मष्टाभागा भ्रौ सत्यवती तदा 1 
प्रसादयामास पतिं पुरो मे नेखदो भवेत्‌ । 
ब्ाह्मणापसदस्तत्न इत्युक्तो सनिरव्वीव्‌ ॥ ३०॥ 
पतिके इस प्रकार कदनेपर मदहाभाग्यवती सत्यवती स्वामी- 
करो प्रसन्न करे बोखी--मेर पुत्र एेसा बादाणाघम न दौ ॥' 
तवर मुनिने उससे कदा---1 ३० ॥ 
नेप संकल्पितः कामो मया भद्रे तथास्त्विति । 
उथ्रकमौ भवेत्‌ पुत्रः पितुमौतुश्च कारणात्‌ । 
पुनः सत्यवती वाफ्यमेवसुकाव्रवीदिदम्‌ ॥ ३१ ॥ 
धभद्रे पिता अथवा माताके कारण ही पुत्र करूर कम॑ 
करनेवास्म हौ जता दैः मैने तो उग्र कर्म करनेवढे पुत्रकी 
कामना नदीं की थी (परंतु तेरी ही असावधानीमे चस्का 
उल्ट-केर हो गया है अतएव एेसा ही पुत्र होगा) 1 दरु प्रकार 
कहनेपर सत्यवतीने फिर कहा--॥ २३१ ॥ 
श्च्छँल्छोकानपि मुने खजेथाः कि पुनः सुतम्‌ 1 
दामात्मकञ्ं त्वं मे पुचं॑दातुमिहार्दसि ॥ ३२॥ 
शुने {आप चद तो तीनों लोरकोका निर्माण कर सकते 
दः फिर पुत्रकीतोबातद्टीक्या १अ तो मस्ते शमपरायण 
सरक पुत्र ही प्रदान करे ॥ ३२ ॥ 
काममेवंविधः पोत्रो मम स्यात्तव च प्रभो। 
यद्यन्यथा न श्यं वै कर्तुमेतद्‌ द्विजोत्तम ॥ ३२ ॥ 
पप्रमो | द्विजश्रेष्ठ † यदि इस वातको पल्य न जा सके 
तो मले दी आपका ओर मेरा पौत्र ेसा हो जायः ॥ ३३ ॥ 
ततः प्रसादमकरोत्स तस्यास्तपसो वलात्‌ 1 
भद्रे नास्ति विदेषे मे पौत्रे च वरवर्णिनि। 
त्वया यथोक्तं वचनं तथा भद्रं भविप्यति ॥ ३४॥ 
तत्र॒ उन्दने अपने तपोवरसे उसके ऊपर अनुग्रह 
किया ओर कहा-भद्रे ! वरवर्णिनि ! मेँ ( पुत्रम ओर) 
पौचमे कु भेद नर्हा समद्ताः अतः तूने जो कहा हैः 
यह वैसा ही होगाः ॥ ३४ ॥ 
ततः सत्यवती पुनं जनयामास भार्गवम्‌ । 
तपस्यभिरतं दान्तं जमदग्नि शमात्मकम्‌ ॥ ३५ ॥ 


हरिवंशपर्वं | 


तदनन्तर सत्यवतीने भगुवंशी जमदग्निको जन्म दिया; 
जो तपस्यापरायणः जितेन्द्रिय तथा शम ( मनोनिग्रह ) से 
सम्पन्न थे ॥ ३५ ॥ 
श्रगोश्चरूषिप्यौसे रौद्रवेष्णवयोः पुरा । 
यजनाद्‌ वैष्णवेऽथादो जमदग्निरजायत ॥ ३६॥ 

गरगुवंशी ऋचीक सुनिने पूवंकार्मे जो देवताओंकी 
आराधना की थी उसीके प्रमावसे सद्र ओर विष्णुके अंशमूत 
उन दोन चरू्ओमि उल्-फेर हौ जानेपर भी वैष्णव चख्के 
अंसे शान्तस्वभाव जमदग्नि सुनिका जन्म हया ॥३६ ॥ 


सा हि सत्यवती पुण्या सत्यधर्मपरायणा । 
कौरिकीति समाख्याता प्रवृत्तेयं महानदी ॥ २७ ॥ 

सत्यवती सत्य-धर्ममे तत्पर रहमेवाी पुण्यात्मा स्री थी। 
यदी कोशिकी नामस विख्यात महानदीं हद ॥ २७ ॥ 


दष्वाकुवंदाप्रभवो रेणुनौम नराधिपः 

तस्य कन्या महाभागा कामली नाम रेणुका ॥ २८ ॥ 
इ्ष्वाकुवंसर्म रेणु नामवाले एक नरे थे। उनकी कन्या 

महामागा रेणुका थीः जिसका दूसरा नाम कामली भी था ॥ 


रेणुकायां तु कामल्यां तपोवियासमन्वितः । 
आर्चीको जनयामास जामदग्न्यं सुदारुणम्‌ ॥ २९.॥ 
सर्वविद्यासुगं श्रेष्टं धयुर्वेदस्य पारगम्‌ । 
रामे क्षत्रियहन्तारं प्रदीप्तमिव पावकम्‌ ॥ ४०॥ 
उस रेणुका या कामरीके गर्भ॑स्ते तपस्वी एवं विद्वान्‌ 
ऋ चीकपुत्र जमदग्निने अत्यन्त कठोर स्वभाववाङे परञ्च 
रामजीको प्रकट, किया; जो समस्त विद्याओमि पारङ्गतः 
धनुवदमे प्रवीणः क्षत्रियङ्कुखका संहार करनेवाले तथा प्रज्व- 
चिति अग्निके समान तेजस्वी थे 1] ३९-४० ॥ 
ओर्वस्थेवसरचीकस्य सत्यवत्यां महायराः। 
जमदगििस्तपोवीयौजक्षे बअह्यविदां वरः ॥ ४१९॥ 
इस प्रकार ओर्व नामते प्रसिद्ध ऋचीक सुनके तपोवर्ते 
उनेकी पत्नी सत्यवतीके गभ॑ ्वेत्ताओमिं शरेष्ठ महायश्चस्वी 
जमदग्निका प्रादुर्भाव हज ॥ ४९ ॥ 
मध्यमश्च श्युनम्दोपः श्युनःपुच्छः कनिष्ठकः । 
विश्वामिनं तु दायादं गाधिः ऊुशिकनन्द्नः ॥ ४२ ॥ 
जनयामास पुं ॒तु तपोविद्याहामात्मकम्‌ । 
प्राप्य ब्रह्मर्षिसमतां योऽयं सप्तर्षितां गतः ॥ ४२ ॥ 
ऋचीकके मक्षले पुत्र शुनःशेप ओर छटे पुत्र शनःपुच्छ 
थे । इधर कुरिकनन्दन महाराज गाधिने विद्वामिव्रको पुतर- 
स्पमे प्रकट क्रियाः जो तपस्वी; विद्वान्‌ ओर शन्त ये | वे 
मह््षिकी समता पाकर सप्तपियोमि प्रतिष्ठित हुए दै ॥ ४२-४२ ॥ 


विभ्वामित्रस्तु धमौत्मा नाख्ना विश्वरथः स्सृतः। 
जके श्रगुभसादेन कोरिकाव्‌ बंशावर्भनः ॥ ४७॥ 


सप्तविशोऽभ्यायः 


९५ 


धर्मात्मा विश्वामित्रका दूसरा नाम विद्वरथ था।वे 
कुरिकवंशी राजा गाधिकरे यहां मरुवंली ऋजीक सुनिकी 
छृपासे उत्पन्न हए ये ओौर अपने वंडाका विस्तार करनेबटठे घे ॥ 
विश्वामिन्नस्य च सुता देवरातादयः स्स॒ताः। 
भख्याताखिषु रकेषु तेषां नामानि मे शण ॥ ४५॥ 

विदवामिनके देवरात आदि वहुत-ते पुत्र के गये दैः 
जो तीनों लोकमि विख्यात थे । उनके नाम मुद्चसे सुनो ॥ 


देवश्रवाः कतिश्चैव यस्सात्कात्यायनाः स्ताः 1 
शाखावत्यां हिरण्याय रेणोजेक्षेऽथ रेणुमान्‌ ॥ ४६ ॥ 
खांृति्गखवद्चैव सुद्रलर्चेति विश्युताः। 
मधुच्छन्दो जयद्चैव देवलश्च तथाष्टकः ॥ ४७ ॥ 
कच्छपो हारितर्येव विश्वामित्रस्य वे सुताः 
तेषां ख्यातानि गो्राणि कौशिकानां महात्मनाम्‌ ॥४८॥ 
देवश्रवाः कात्यायन मोचक प्रवर्तक कति ओर दिरण्याक्ष- 
ये तीनो शलवतीके गमंसे उत्पन्न हुए थे } उनकी दूसरी 
स्रीका नाम रेणु था, जिससे रेणुमान्‌, साङ्कुतिः गाख्वः पुद्घलः 
मधुच्छन्दः जय तथा देवल उत्यन्न हुए. थे 1 अष्टक ( दषदती 
या माधवीका पुत्र था); कच्छप ओर हारति भी विश्वा- 
मित्रके ही पुत्र थे । इने कौरिकववंदी महात्मायोके प्रसिद्ध 
गोत्र इस प्रकार है ॥ ४६४८ ॥ 
पाणिनो वश्रवक्वैव ध्यानजप्यास्तथैव ख। 
पार्थिवा देवराताश्च शाट्ङायनेवाप्कलाः ॥ ४९ ॥ 
लोहिता यामदुताश्च तथा कारीषवः स्ताः} 
सौश्वताः कौदिका राजंस्तथान्ये सेन्धवायनाः ॥ ५० ॥ 
देवला रेणवदचैव याक्षवस्क्याघमर्षणाः। 
ओंदुम्बया हछयभिष्णातास्तारकायनचुञ्खुखाः ॥ ५१॥ 
शाखावत्या हिरण्याक्षः सारृत्या गाख्वास्तथा। 
वादसयणिनश्चान्ये विभ्वामिघस्य धीमतः ॥ ५२॥ 


राजन्‌. } पाणिनः बभ्रु, ध्यानजप्य, पार्थिवः देवरातः 
शालङ्कायन, बाष्कल, टोदित, यामदूत; कारीषुः ' सौशरुतः 
कौशिकः सैन्धवायनः, देवर, रेणु, याश्वस्क्य, अघमर्षण) 
ओदुम्बर, अभिष्णात, तारकायनः चुश्ुर, शालावत्यः हिरण्या- 
कष, साङ्ुत्यः गार्व तथा बादरायणि-ये तथा ओर भी 
बहुत-छे बुद्धिमान्‌ विद्वामित्रके पुत्र थे ॥ ४९-५२ ॥ 
ऋष्यन्तरविवाष्टाश्च कौदिका वहवः स्ताः । 
पौरवस्य महाराज ब्रह्ैः कोशिकस्य च । 
सम्बन्धोऽप्यस्य वंरोऽस्मिन्बरह्मक्षजस्य विश्वुतः ॥५२॥ 

कौशिकगोनी ब्रदमणोकी संख्या बहुत हे । वे अन्य 
ऋषिर्योके कलमे विवाह-सम्बन्ध स्थापित करलेके योग्य है । 
महाराज ! राजर्षि पौरव तथा ब्रह कौशिकके कुलम सम्बन्ध 
हुआ दै । इस प्रकार इस वंशमे ब्राह्मणो तथा कषनिर्योका 
परस्पर वैवािक सम्बन्ध विख्यात हे ॥ ५३ ॥ 


। = 
च # र 


९६ 


श्रीमहाभारते विभागे 


[ हरिवत 


` विश्वामिनात्मजानां तु श्चुनःशेपोऽग्रजः स्मतः) 
भार्गवः कौरिकत्वं हि प्राप्तः स सुनिखत्तमः॥ ५४॥ 
विश्वामित्र पुत्रम शनःशेप सवसे वदे माने गये ह । 
मुनिश्रेष्ठ शनःशेपका जन्म यद्यपि भृगुकुले हुजा था तथापि 
वे कौरिकगोत्री हो गये ॥ ५४ ॥ 
विश्वामिजनस्य पुत्रस्तु श्युनःशेपोऽभवत्‌ किर । 
्रिद्श्वस्य यक्षे तु पद्युत्वे विनियोजितः ॥ ५५ ॥ 
देषैरदत्तः शुनभ्शेपो विश्वामिघ्ाय वै पुनः। 
वेवैदैततः स वै यस्माद्‌ देषरातस्ततोऽभवत्‌ ॥ ५६ ॥ 
कदते दै राजा हरिदश्व ८ हरिन्द्र ) के यकम शुनःशेप 
पञ्यु यनाकर ख्ये गये थे । उसी समय वे विश्वामित्रे पुत्र 
हुए । देवताओंने विद्वामित्रफे हाथमे पुनः श॒नःशेपको दे 


दिया था । देवतार्भदवारा प्रदत्त देनेक्रे कारण वे ( ष्देमैः रातः" 
इस व्यु्पत्तिके अनुसार ) देवरात नामन्ते विख्यात हूर ॥ 
देवरातादयः सप्त विश्वामिघ्रस्य वै सुताः 
खपद्धतीखतश्चापि विश्वामित्रात्‌ तथाष्टकः ॥ ५७ ॥ 
विद्वामित्रके देवरात्त आदि सात प्रमुख पुत्र थे । उन्दी 
से अष्टकका भी जन्म हुमा थाः जो दपद्रतीकां पुत्र या ॥ 
अष्टकस्य सुतो छो्िः प्रोक्तो जदुगणो मया । 
यत ऊर्वं प्रवक्ष्यामि वंशामायोमदात्मनः ॥ ५८ ॥ 
अष्टकका पुत्र छौदि वताया गया है ] इस प्रकार मने 
जदुक्ुलका वर्णन किया । इफ वाद महात्मा आयुके वंशका 
वर्णन कर्गा ॥ ५८ ॥ 


इति श्रीमहाभारते खिरुभागे हरिवगो हरिवदापर्वण्यमवसुवककीतंनं नाम सकर्विदोऽध्यायः ॥ २७ ॥ 


श्य प्रकार श्रीमहामारत सिरुभाग हरिवश्के अन्तर्गत गिविदापर्वमे अमावसुके 
दंशका वणेनविषयफः सत्रदसव अघ्याय पुरा हमा ॥ २७॥ 


अष्टाविदोऽध्यायः 
राजा रजि ओर उनफे पुत्रका चरित्र, हन्द्रफा अपने स्यानसे श्र्ट होकर पुनः उसपर प्रतिष्ठित होना 


वैदयम्पायन उवाच 
अयोः पुत्रास्तथा पञ्च सवै वीरा महारथाः 1 
सख्भौदुतनयायां च प्रभायां जक्षिरे चप॥१९॥ 
वैरास्पायनजी. कहते है--नरे्र ! स्वर्भानुकुमारी 
प्रमा आयुकी पलनी थी । उसके गर्भ॑से आयुर पोच पुज 
उन्न हुए जो सव-के-सव वीर ओर महारथी थे ॥ १ ॥ 
गरहुषः प्रथमं जक्ले बृद्धरामौ ततः परम्‌ । 
रस्भो रजिरनेनाश्च चरिषु लोकेषु विश्वताः ॥ २॥ 
उने सवस पठे नहुषका जन्म हभ । तत्पश्चात्‌ वृद्ध- 
शर्मा उत्प हए । तदनन्तर क्रमशः र्म; रजि ओर अनेना 
प्रकट हुए ! ये तीनों लोकमि विख्यात थे ॥२॥ 
रजिः पुत्रशतानीह अनयामास प्च वै। 
राजेयमिति विख्यातं क्ष्रमिन्द्रभयावद्म्‌ ॥ ३ ॥ 
रजिन पोच सौ पुर्बोको जन्म दिया । वे समी श्षत्निय 
राजेय नामे विख्यात हुए । उनसे इन्द्र मी उरते थे |} ३॥ 
यश्च देवासुरे वि युद्धे समुत्पन्ने खुदारणे ! 
दैवा पितमदमथाघ्रुवन्‌ ॥ ४ ॥ 
. आवयोर्भंगवन्‌ युद्धे करोः विजेता भविष्यति । 
बृहि नः सर्वभूतेश श्रोतुमिच्छामि ते वचः ॥ ५ ॥ 
पूर्वकाले देवताओं तथा असुयोमे अत्यन्त भयंकर युद्ध 
ˆ आरम्भ होनेपर उन दोनों पर्षौके ोगोनि पितामह , बह्माजौसे 


५. पूम--“मगनन्‌, 1 सर्मभूतेश्वर { बतादये, हम दोनकि युद्धम 


कौन विजयी दोगा १ हम दस विषयमे आपक्री यथार्य॒ब्रात 
सुनना चाहते ई ॥ ४-५॥ 
ब्रह्मोवाच 

येषामथोय संग्रामे रजिरात्तायुधः प्रभुः! 
योत्स्यते ते जयिप्यन्ति ररर्खिकाननात्र संडायः ॥ ६ ॥ 

अद्याजीने कद्ा--रक्तियाली राजा रजि दाथ इथियार्‌ 
केकर जिनके व्व संग्रामभूमि खड़े हो युद्ध करेगे, वे तीनों 
लोकोपर विजय प्राप्त कर ठेगे ] इसमे संशाय न्दी ह ॥ ६ ॥ 


यतो रजिधतिस्तज श्रीश्च तत्र यतो धृतिः। 

यतो धृतिश्च श्रीश्चैव धर्मस्तत्र जयस्तथा ॥ ७ ॥ 
जिस पक्षम रजि है, उधर दी धृति दै जदो धृति दै वदी ल्मी 

हे तथा जदो धृति ओर लक्ष्मी है वदी धरम एवं विजय है ॥ ७॥ 


ते द्ेव्ानवाः प्रीता देवेनोक्ता रजे्जये । 

अभ्ययुजयमिच्छन्तो दृण्वाना भरतर्वभ ॥ < ॥ 
भरतकरलमूषण जनमेजय ! रजिकी विजयक्रे विषयमे 

ब्रह्याजीके एसा कदनेषर देवता ओर दानव प्रसन्न हयो अपनी- 

अपनी विजय चाहते हुए रजिका वरण करनेके ल्य उनके 

पासगये॥८॥ ` 

स हि स्वभौयुदोदिधः प्रभायां समपद्यत । 

राज परमतेजसखी सोमवंशाधवर्धनः ॥ ९ ॥ 
वे राहुके दौदित थे । राहुकी पुरी प्रभाक गर्भे उनका 

जन्म हुजा था । सोमवंशकी दद्धि कसेवके वे या रजि बडे 

तेजस्मीये ॥ ९॥ 


हरिवंदापवं ] 


अष्टार्विश्षो ऽध्यायः 


९५७ 


र 


ते ष्ठमनसः स्वँ रजिं देवाश्च. दानवाः। 

उखुरस्मञ्जयाय त्वं गृहाण वरकामुंकम्‌ ॥ १० ॥ 
समस्त देवता ओर दानव दोनो ग्रसन्नचित्त टौ रजिके 

पास जाकर चोले--“राजन्‌ { आप हमारी विजयक्रे लियं अपना 

श्रेष्ठ धनुष धारण कीज्यि° ॥ १० ॥ 

अथोवाच रजिस्तत्र तयोरै देवदैत्ययोः । 

स्वार्थः स्वा्थमुदिद्चय यशाः स्वं च प्रकाशयन्‌ ॥ ११ ॥ 
तव स्वार्थ॑को समक्षनेवठे रजिने वर्ह स्वार्थको - सामने 

रखकर अपने यदाको प्रकारमे खति हुए देवता ओर दानवे 

दोनों पक्षक लोगंतसि कदा ॥ ११ ॥ 

रजिरुवाच 

यदि दैत्यगणान्‌ सवौक्जित्वा शक्रपुरोयमाः। 

हन्द्रो भवामि धर्मण ततो योत्स्यामि संयुगे ॥ १२॥ 
रजि बोे--इन्द्रादि देवताज ! यदि मैँ समस्त दर्यो 

को जीतकर धर्मतः इन्द्र हो सकर तो वम्हारी ओरसे रणभूमि- 

म युद्ध करगा ॥ १२॥ 

देवाः प्रथमतो भूयः प्र्यूचुदह्टमानसाः । 

पवं यथेष्टं चृपते क्रामः सम्पद्यतां तव ॥ १६॥ 
यद्‌ सुनकर देवताओनि पिर प्रसन्नचित्त दो पदे दी 

उत्तर दिया--ननरेश्वर ! पेखा दी होगा | ठम्ारी अभीष्ट 

कामना पूणं दो* ॥ १३ ॥ 

शरुत्वा सुरगणानां तु वाक्यं राजा रजिस्तदा । . 

पप्रच्छासुरमुख्यास्तु यथा देवानपृच्छत ॥ १४ ॥ 
देवता्ओंकी यद वात सुनकर उस समय राजा रजिन 

सुख्य-ु्य अयुरसि मी वैसी ही बात पूषी जैखी देवतापि 

पृषी थी ॥ १४॥ 

दानवा, दर्पपूणौस्तु स्वार्थमेवालुगम्य ह । 

पत्ूञ्स्ते सरपवरं साभिमानमिदं च्चः ५१५॥ 
तब अहंकारी दानवेन स्वार्थको ही सामने रखकर अनु- 

सरण करते हुए उन श्पशरष्ठको अमिमानपूवंक यँ उत्तर 

दिया- ॥ १५॥ 

अस्माकमिन्द्रः प्रहादो यस्याँ विजयामहे । 

असिस्तु समये राजस्तिष्टेथा साजखत्तम ॥१६॥ 
'राजरिरोमणे | मारे इन्द्र तो प्रहाद ही दै जिनके 

लि हम विजय प्राप्त करना चाहते ई । राजन्‌ ¡ अपको 

इसी पार्तपर हमारे पक्षम खडा द्येन चायः ॥ १६ ॥ 

स॒ तथेति ह्वुवन्नेव देषैरष्यभिचोदितः। 

भविष्यसीन्द्रो जित्वेवं देवैरकस्तु पार्थिवः। 

जधान दानवान्‌ सवौन ये वध्या षञज्पाणिनः ॥ १७ ॥ 
वे बहुत अच्छाः कहकर अघुर्योकी बात माननां ही 


मण व° - 


चादते ये कि देवतानि फिर उन्दै अपने पक्षम अनेके व्यि 
प्रेरणा देते हए कहा--'राजन्‌ } तुम इस प्रकार विजय पाकर 
हमारे इन्द्रे हो जाओगे ॥+ देवतार्ओकि एेसा कहनेपर राजा 
'रजिने उन समस्त दानर्वोका संहार कर डवः जो वन्रपणि 
इन्द्रके द्वारा मारे जाने योग्यं थे | १७ ॥ 
स विषणष्टां देवानां परमश्रीः धियं वशी । 
निहत्य दानवान्‌ सवोनाजहार रजिः प्रयुः ॥ १८ ॥ 
मनको वमे रखमेवाले परमकान्तिमान्‌ एवं शक्तिशाली 
राजा रजिने समसन दानवोका संहार करके देवतार्भोकी खोयी 
हई सम्पत्तिक्रो फिर वापस स्म दिया.॥ १८ ॥ 
ततो रजिं महावीयं देवैः सह शतक्रतुः । 
रजेः पुषोऽहमित्युक्त्वा पुनरेवान्वीद्‌ वचः ॥ १९ ॥ 
तब देवतार्ओसहित इन्द्रने अपनैकौ रजिका पुत्र बताकर 
उन महापराक्रमी रजिसे पुनः इस प्रकार कदा-॥ १९ ॥ 
इृ्द्रोऽसि तात देवानां सर्वेषां नात्र संशयः । 
यस्यामिन्द्रः पुत्रस्ते ख्यातिं यास्यामि कर्मभिः ॥२०॥ 
(तात [ आपं हम सब देवता्भकि इन्द्र दहै, इसमे संदाय 
नदीं है; क्योकि मै इन्द्र आजसे आपके इन वीरोचित कर्मो 
द्वार अवुयदीत हो आपका पुत्र कदटखऊँगा 1 आपके पुत्र- 
रूपम क्षी मेरी ख्याति होगी" ॥ २० ॥ 
स तु शक्रयचः श्रुत्वा वञ्चितस्तेन माय्या । 
तथेत्येवात्रवीद्‌ राजा प्रीयमाणः दातक्रतुम्‌ ॥ २१९ ॥ 
इन्द्रकी यह बात सुनकर उनकी मायासे वञ्चित हो 
महाराजं रजिने (तथास्तु, कंद दिया । वे इन्द्रपर बूत 
प्रसन्न थे ॥ २१ ॥ ` 
तस्सिस्तु देवसर दिवं प्राप्ते महीपतौ । 
दायाद्यमिन्दरादाजहूुराचारात्‌ तनया रजेः ॥ २२॥ 
उन देवोपम भूपारु रजिके ब्रह्मखोकवासी हो जानेपर 
उनके पत्रौने लोकन्यवहारके अनुसार इन्द्रस अपना दाय- 
भाग मगा ओर बल्पूर्वेक ठे स्या ॥ २२ ॥ 
पञ्चपुत्रशतान्यस्य तद्वै" स्थानं शतकरतोः । 
समाक्रमन्त बहूधा स्वग॑रोकं धिविष्टपम्‌ ॥ २३॥ 
रजके पोच सौ पुत्र ये । उन्होने इन्द्रके निविष्टप नाम 
प्रसिद्ध स्वगंलोकपर बारंवार आक्रमणकरके उसे के 
च्वि ॥ २३॥ 
ततो बहुतिथे काले समतीते महावलः । 
हतराज्योऽन्रवीच्छक्रो हृतभागो बृहस्पतिम्‌ ॥ २७ ॥ 
तदनन्तर बहुत समय बीत जनेपर राञ्य ओर यज्ञभाग- 
से वञ्चित शो अत्यन्त दुर्बल हप इन्द्रने एक दिन एकान्तम 
बरहस्पतिजीसे कहा ॥ २४॥ 


श्रीमहाभारते सिखभागे 


{ हयिवंशे 


इन्द्र उवाच 


वद्रीफरमान्नं वै पुरोडाशं विधत्स्व मे। 
बरह्ष येन विष्टेयं तेजसाऽऽप्यायितः सदा ॥ २५॥ 


न्द्र योले--्रर्थं ! आप पक बेरे बरावर भी पुरो- 


डउाद्खण्डकी व्यवस्था मेरे व्यि कर दः जिसे मी सदा 
तेजसे परिपुष्ट दवा रह ॥ २५ ॥ 
ब्रह्मम्‌ रष ऽहं विमना हृतराज्यो हताद्यानः। 
हतीजाः दुर्वी मूढो रजिपुगरैः छतः प्रभो ॥ २६॥ 
ज्रदन्‌ ! प्रभो ! रजके पुनि मेरा राज्य ओर भोजन 
छीनकर मुच अत्यन्त कृशः खिन्नचित्त, हतोत्साहः दुर्वरु णवं 
मृदु बना दिया है ॥ २६ ॥ 
वृहस्पतिर्वाते 
यथेव चोदितः श्वक् त्वयास्यां पूर्वमेव हि । 
नाभविष्यत्वत्परियार्थमकर्तश्यं ममानघ ॥ २७ ॥ 
बृहस्पतिजीने कष्टा--मिष्याप शनद्र ! यदि रेसी वातत 
द तो दमं मुक्ते पठे दी यद कना चाये था । म्हारा 
प्रिय करनेके स्यि रेसा को कायैनद्टीदेःजोरमेन कर 
सद |} २७ } 
प्रयतिष्यामि देवेन्डधः त्सस्परिया्धं न संशयः) 
यथा भागं च राज्यं च नचिराद प्रतिरुप्स्यसे ॥२८॥ 
देवेन्द्र { ओ तुम्दारे प्रिय मनोरथकी सिदधिके ल्यि निः- 
सदेह सा प्रयल कर्गा, जिससे तुम अपना राज्य ओर 
यक्तभाग शीघ्र प्राप्त कर रगे ॥ २८ ॥ 
तथा तात करिष्यामि मा भूव्‌ ते विद्धं मनः। 
ततः कर्म चक्रायास्य तेजसो वर्धनं तदा ॥ २९॥ 
तात ! तुम जैसा चादते दो तैसा दी करस्गा | त॒म्दारा 
मन व्याक्रुल न दो । एेसा ककर बृहस्पतिजीने उस समय 
हन्द्रके तेजको वदूनिवाके कर्मका अततुष्ठान किया ॥ २९॥ 
तेषां च शुदधिसम्मो्मकयेद्‌ दिजसत्तमः। 
नास्तिवादार्यदासखं हि धर्म॑विद्धेषणं परम्‌ ॥ २० ॥ 
दविजश्रेष्ठ बृह्स्यतिने रजके पुर्बोकी घुदधिभ मोह उत्पन्न 
करमेके स्थि रेते शाल्का निर्माण किया; जो मास्तिकवादसे 
पसिूर्ण तथा धर्मके प्रति अच्यन्त द्वेष उयने करेवा 
थां ३० ॥ 


परमं ॒तकडास्राणामसतां तन्मनेोऽयुगम्‌ । 
न हि धर्मभरधानानां रोचते तत्कथान्तरे # ३१ ॥ 
केवल तक्के आधारपर अपने सिद्धान्तका प्रतिपादन 
करनेवाटे शा्चेमि वद उत्कृष्ट माना गया दै । वृदस्पतिका 
वह्‌ नासिक दर्यान दुष्ट पुख्धकरि दी मनको अधिक भाता 
धर्मप्रधान पुरसर्पोको वात्तचीतके प्रसंगे भी उसकी चर्चा नदीं 
खयाती दे ॥ ३१॥ 
ते तद्‌ ब्रृ्स्पतिरृतं श्रां श्ुत्वाल्पचेतसः । 
पूर्वाकधर्मदास्राणामभवन्‌ देपिणः सदा ॥ ३२॥ 
वृदस्पतिके उस गाखको सुनकर वे मन्दबुद्धि रजिपुत्र 
पदलेके धर्मगा्मेसि सदा देप स्ठने लो ॥ ३२॥ 
प्रयचतुन्यीयरदितं तन्मतं यदु मेनिरे। 
तेनाघमेण ते पापाः स्च पव श्यं गताः ॥ २३ ॥ 
यक्ताका वेह न्यायरदित मत उन्दरं व्रहुत उत्तम जान 
पद्मै खगा । उसी अधर्मते वे सच पपी नष्ट दो गये ॥३३॥ 
बेलोकयराज्यं शक्रस्तु प्राप्य दुष्परापमेव च । 
बृस्पतिपसादाद्धि परां नि्चंतिमम्ययात्‌ ॥ ३४॥ 
इस तरह वृदस्पतिकी पासे त्रिखेकीका वह्‌ दुम राज्य 
पाकर इन्द्र कदे प्रसन्न हुए | ३४ ॥ 
ते यदा तु सुसम्मूढा रागोन्मत्ता विघर्मिणः। 
जहमद्धिपश्च संदृत्ता हतवीर्यपराक्रमाः ॥ ३५ ॥ 
ततो कमे सुरेभ्वर्थमिन्द्ः स्यानं तथोत्तमम्‌! 
हत्व(रजिखुतान्‌ सवौन्‌ कामफ्रोधपरायणान्‌ ॥ ३६ ॥ 
वे रजिके पुत्र जब्र नास्िकवादका आश्रय ठे विवेकशून्यः 
रागोन्मत्तः धर्मक चिपरीत चल्नेवठे, व्रहद्रोदीः याक्तिदीन 
ओर पराक्रम्य हो गये, तवर कामक्रोध तत्पर रहनेवालि 
उन समस्त रजिपुर्नौको मारकर इन्द्रनै देवतार्मोक्रा रेश्वयं 
ओर उत्तम स्थान पात कर छिया !} ३५.३६ ॥ 
य दषं च्यावनं स्थानाच्‌ प्रतिष्ठां च दातक्रतोः। 
श्णुयाद्‌ धारयेद्धापिन स दौरत्म्यमाप्डयाव्‌॥ २७ ॥ 
जो इन्द्रके अपने स्यानेवे भ्रष्ट ने ओर पुनः उपर 
प्रतिष्ठित दोनेके इस प्रसञ्गको सुनता ओर अपने दयम 


धारण करता दै, उसके म्मे फमी दुर्माबना नदीं 
आती ॥ ३७॥ 


इति श्रीमहाभारते सिरूमागे शरिवंशे हरिवंदापर्वणि आयोर्वशकी्त॑नं नामा्टर्विोऽध्यायः ॥ २८ ॥ 


श्छ भकार श्रीमह्ममारत दिमाग दिदे अन्तम्त इिव्राप्वमे आपके वंशका 
वर्णनविषयक अद्रुदसव अध्याय पुरा हमा ॥ २८ ॥ 


~^ &-- ^> --~ 


हरिषंशपयं 1] 


पकोननित्तोऽभ्यायः 


९.४, 


एकोनर्रिदोऽध्याय 
अनेनाकै वंशका वर्णन, धन्वन्तरिका काशिराज धन्यके यह पत्ररूपमं अवतार, दिषोदासके 
राज्यकालमे भगवान्‌ शिवकी आश्ञासे गणेश्वर निङ्घम्भके हारा बाराणसीको 
जनद्ूल्य वनानेका प्रयत्स, षौ रिव ओर पाव॑तीका निवास, 
दिबोदासका बाराणसीपर अधिकारं ओर अलकंकी प्रशंसा 


वैशम्पायन उवाच 
रम्भोऽनपत्यस्तशरासीद्‌ षंशं वश््याम्यनेनसः । 
अनेनसः सुतो राजा प्रतिक्षत्रो मायाः ॥ १ ॥ 
वैशास्पायनजी कषटते ह-जनमेजय ! आयुपुत्र रम्भके 
कोई संतान नहीं हुई ! अच मै अनेना वंशका वर्णन करसगा। 
अनेनाकरे पुत्र महायशस्वी राजा प्रतिक्षत्र हुए ॥ १ ॥ 


प्रतिक्षश्रसुतश्चापि खञ्जयो नाम विश्चुतः। 
सृञ्जयस्य जयः पुश्रो विजयस्तस्य चात्मजः ॥ २ ॥ 
प्रतिक्षत्र पुत्र सृञ्जय नामसे विख्यात हुए. । खञ्ञयके 
पुत्र जय ओर अयके पु विजय हुए । २॥ 
विजयस्य ईतिः पुषस्तस्य हर्यभ्वतः सुतः 
हर्यशवदद्युतो राजा सदेवः प्रतापवान्‌ ॥ २ ॥ 
विजयके पुत्र एति, तिके हयैष्व ओर रय्वके पुत्र 
प्रतापी रजा सहदेव हुए ॥ ३ ॥ 
सषदेवस्य धमौत्मा नदीन ति विशतः । 
नदीनस्य जयत्सेनो जयत्सेनस्य खंरतिः ॥ ४ ॥ 
सहृदेवका धर्मात्मा पुत्र नदीन नामसे विख्यात हृ । 
नदीन पुन जयत्सेन ओर जयत्वेनका सङ्कति था ॥ ४ ॥ 
संकृतेरपि धमौत्मा क्षघ्रमौ महयशाः। 
अनेनसः समाख्याताः क्षघरवृद्धस्य मे श्ण्णु ॥ ५॥ 
सङ्कतिकरे पुत्र महायशस्वी धर्मात्मा क्षत्रधर्मा हट । यर्दौ- 
तक अनिनफे पुर्बोका वर्णन हुमा । अव्र सुक्षसे क्ष्नबृद्धकी 
संततिका वर्णन चनो ॥ ५॥ 
क्ष्रवृद्धत्मजस्त्च सखुनहोध्ो महायद्ाः। 
सुनहो्रस्य दायाद्ाखयः परमधार्मिकाः ॥ ६ ॥ 
काशः शलश्च दवेतौ तथा गृत्समदः भुः । 
पुष गृत्समदस्यापि शुनको यस्य शौनकाः ॥ ७ ॥ 
षतरबृद्धके पुन मदायदास्वी सुनहोत्र हुए । सुनदोत्रके 
परम धार्मिक तीन पुत्र थे--काशः र ओर प्रभावशाखी 
गृत्समद । शत्समदके पुत्र शनक हुए, जिससे होनक-वंशका 
विस्तार हुमा ॥ ६-७ ॥ 
बराह्मणाः क्षत्रियाश्चैव वैद्याः शुद्ध।स्तथेव च । 
शलात्मजश्चरिषेणस्तनयस्तस्य काकः ॥ ८ ॥ 
शोनक-वंदामे ह्मणः क्षत्रियः वैश्य ओर शद्र समी 


व्णोके छोग हुए । शके पुत्रका नाम आविण था । 
उनके पुतन कारक हुए ॥ ८ ॥ 
कादास्य कादायो राजम्‌ पुश्रो दीर्घरपास्तथा । 
घन्धस्तु वीर्ध॑तपसो विद्यान्‌ धन्वन्तरिस्तसः ॥ ९ ॥ 
राजन्‌ ! काराके वराज ८ पुत्र ) काशि ककय । इनमे 
दीर्घतपा सबते प्रथम पुत्र ये ! दीर्बतपक्रे धन्व ओर धन्व- 
से विद्वान्‌ धन्वन्तरिका प्रादुर्भाव हआ ॥ ९ ॥ 
दपसोऽन्ते खुमष्टतो जतो शृद्धस्य धीमतः। 
पुनधैन्बन्वरिविगो मारषेष्विह अक्षिवान. ॥ १० ॥ 
अपनी मान्‌ तपस्या पूरी करके अन्तम धन्वन्तरि देवने 
बुद्धिमान्‌ एवं बद्ध राजा धन्वे यहो दस मतुभ्यरूपमे पुनः 
जन्म ग्रहेण किया ॥ १० ॥ 
जनमेजयं उषा 
कथं धन्वन्तरिदेषो मासषेष्विहट जशषिवान्‌ । 
पतद्‌ बेधितमिच्छामि वन्ये बरूहि यथातथम्‌ ॥ ११९॥ 
जनमेजयने पखा- बहन्‌ | धन्वन्तरि देव हस मनुष्य 
लोकम किंस प्रकार उन्न हुए. १ यह्‌ मे जानना चाहता 
हं । अतः यह प्रसङ्ग मुश्षे ठीक-ठीके बताष्ये ॥ ११ ॥ 
वैशम्पायन उवाच 
धन्वन्तरेः सम्भवोऽयं धयतां भरतर्षभ । 
जावः स हि ससुदासु मथ्यमाने पुराखते-॥ १२॥ 
वेशग्पायनजी कते है--भरतप्रेष्ठ ] धन्वन्तरि 
जन्मका यह प्रसङ्ग सुनो । वे पूर्वकाय अमतमन्धमकफे समय 


 सम्रद्रसे प्रकट हरये ॥ १२॥ 


उत्पक्नः कटशात्‌ पूर्घं सर्वतश्च धिया वृतः । 
अभ्यसन सिदिका् हि विष्णु शट हि तस्थिवान्‌॥१३॥ 
पहले जवे वे समुद्रसे प्रकट हुए, उस समय भगवान्‌ 
विष्णुके नामका जप ओर आरोग्य-साधक का्यका चिन्तन 
करते हुए सत्र ओस्से दिन्य कान्तिसे प्रकराित हो रहै ये। 
ये अपने सामने भगवान्‌ विष्णुको देखकर ख्डे दौ गये ॥ 
अम्ञस्त्मिति होवाच तस्सादभ्जरस्तु स स्मृतः 
अष्जः प्रोषाच विष्णु षेतव पुश्रोऽसि वै पभो ॥ १४॥ 
विधत्ख भागं स्थानं च मम छोके सुरेभ्वर । 
पवमुकतः स दृष्ट षे तथ्यं प्रोवाच तं प्रसुः॥ १५॥ 


१०० 


धीमदाभारते सिरभणे 


[ हरिवो 


मगवाच्‌ चिम्णुने उनसे कषाम अप्‌ अर्थात्‌ जरते 
प्रकट हुए हो, इस्यि अन्न दो ।' उनके खा कहनेते वे 
अन्न कटने स्रो | उस्र समय अन्ञने भगवान्‌ विष्णुसे 
कटा-श्रमो | म आपका पुर । युरेधर ! मेरे स्मि यश्मागकी 
व्यवस्था कीञ्ि भीर छोकरमे मेरे स्थि फो स्थान दीनियि ।' 
उनकै शेवा कहनेपर भगवान्‌ विष्णुने उनकी ओर देखकर 
यह यथार्थं वात कषठी-- १४-१५ ॥ 


कृतो यशविभागो हि यरि खुरैः पुरा। 
दषे षिनियुक्तं शि पिद्धिः दोघं महर्षिभिः ॥ १६॥ 
ूरवकाल्मे यशसम्बन्धी देवतानि यश्का विमाग कर 
ल्वा है | मदर्धियेनि हवनीय पदार्थोका दैवता्करि स्विष्ट 
विनियोग किया है । ख वातको ठम अच्छी तरह समक्ष ठो ॥ 
न श्क्ष्यसुपदोमा यै तुभ्यं कर्तु कदाचन । 
धवोग्भूतो ऽसि देवानां पुत्र सं तु नष्ठीश्वरः ॥ १७॥ 
तरे | वर छोे-मौटे उपदोम कमी नदं अर्पित वयि 
शा सकते ( क्योकि वे ठम्दारे योग्य नदीं ६ )। ठम देवताभौ- 
से पीठे उत्यन्न ए. हो । अतः वम्दारे च्य बेद-विसद्धः यश- 
मागकी कल्पना नहीं की जा सकती ओर वैदिक यशञमाग 
पनिके ठम अधिकारी नष्टं हो ॥ १७॥ 
दितीयायां ठु सम्भूत्यां छोके ख्याति गमिष्यसि । 
अणिमादिश्च ते सििर्ग्म॑स्यस्य भविष्यति ॥ १८ ॥ 
दूसरे जन्म म संखा विख्यात होगे । वर्शे गर्मा- 
वस्थार्म टी दम्हं अणिमा आदि सिदि प्राप्त हो जायगी ॥ १८॥ 
वेतैथ त्यं शसरेण देषत्यं प्राप्स्यसे प्रभो । 
खयमन्रर्वतैजीप्यर्यक्ष्यग्ति त्वां दविजातयः ॥ १९॥ 
श्रमो | छम उसी शरीरे देवत्व प्रात कर छोगे ओौर 
बाक्मणखोग चरः मन्त्र वत वं जपनीय मर्न्रोह्वारा वुम्दारा 
यजन करगे ॥ १९ ॥ 
अधा त्वं पुनन्रैवमायुर्ेदं विधास्यसि । 
अवद्यभावी शर्थो ऽयं प्राग्दण्स्त्वन्नयोनिना ॥ २०॥ 
"फिर ठम उस जन्मे आयुरदेदकौ आठ मागम विमक्त 
करके उसे आठ अङ्खसि.युक्त # वना दोगे, यदह वात अवद्य 


#-वैथक्मे आयुर्ेदके माठ शङ्क दसं प्रकर गतये गये दै 
कायवाटग्रहोष्वोङशव्यदंष्राजरागृषान्‌ । 
यष्टावङ्कानि तस्याहश्चिकित्ा येषु संधित 
१-कायचिकत्सा, २-वालचिकित्सा, ३-रहचिक्त्सा, 
४-रध्मीकगयिकित्सा, ५-दस्यचिकित्ा, ६-दंष्रचिकित्सा, 
७~-मराचिकित्सा यर ८-दृपचिकित्छा-ये आढ प्रकरी चिकि- 
स्सा £ । पूर्वोक्त काय, वाट भादि जो भाठ ङ्ग, उनप्र्‌ ष्टी 
चिकित्सा अवर्म्वित शती है । शारीरिक रोगेकि निदान जीर 
उपचारक कायचिकित्ा क्ते द । बाठकोके रोगोंका विचार लौर 
उन दूर करके पाय लादि बाखचिकित्साके शन्तमैत ह । मूतः 


न 


होनेवाली ट । कमल्योनि गक्षाजीने एसे पष्व्ते ष्टी देख 

ल्या दै॥ २०॥ 

हितीयं दापरं राप्य भविता तस्धं न खंदायः। 

मं तस्मै धरं दस्या षिष्णुरन्तर्धये पुनः ॥ २१॥ 
"दूसरा द्वापर अनेपर हम संसा प्रकट शेओगे, इसमे 

संशय नदीं है ।* धन्वन्तरिको यद वर देकर मगवान्‌ विष्णु 

फिर अन्तर्धान हो गये ॥ २१॥ 


* दितीये दार प्रापे लौनोत्रिः स कारिराद्‌ । 


पुधरकामस्तपस्तेपे धन्यो वीध तपस्तदा ॥ २२॥ 
जवर वसस द्वापर आया? तव सुनदोघ्रके पुत्र काशिराज 
धन्व पुघ्रकी कामनासे दीर्घकाटीन तपष्या करने खो ॥ २२॥ 
प्रपद्ये देवतां वां ठ या मे पृद्रंप्रदास्यति। 
अम्जं देवं चुताथौय तद्‌ाऽऽराधिसवान्‌ चपः ॥ २३ ॥ 
उन्न मन-दी-मन सोचा क्रि ध्म उख देवताकी श्षरणं 
द जो सुप्ने पुघ्र प्रदान करेगा ।* सा विचारकर राजनि 
पुत्रके च्वि अन्जदेव ( भगवान्‌ धन्वन्तरि) की आस 
धनाकी॥ २३॥ 
रतस्तु्ः ख भगवानम्जः भ्रोवाच तं पम्‌ । 
यदिष्छसि घरं बूहि तत्‌ ते वास्यामि शुवव ॥ २९ ॥ 
उस आराधनासे संदष्ट होकर भगवान्‌ अन्न राजा 
धन्वसे बोले-“उत्तम ग्रतका पाटनं करनेवाले नेग | हुम जो 
वर प्राप्त करना चाहते हो, उखे बताओ । वह भ त गाः ॥ 
नृपउवातच 
भगवन्‌ यदि तुष्टस्त्यं पुश्रो मे य्यातिमाय्‌ भव । 
तथेति क्षमचुश्ाय रकरेधान्तरधीयत ॥ २५॥ 
राजा श्रोे--भगवन्‌. { यदि आप सुते सवृ्ट है तो 
मेरे प्र हो ज्य ओर इखी रूपम मापकी ख्याति षो ! तव 
“तथास्तु ककर मगवान्‌ धन्वन्तरि वदँ अन्तर्धान हो गये ॥ 
तस्य रे, समुत्प्नो देवो धन्वन्तरिस्तदा । 
कादिराजो महाराज श्वंरोगग्रणादानः ॥ २६॥ 
महाराज ¡ तदनन्तर धन्वन्तसिदेव धन्वकरे धरम अवतीर्ण 
हुए । कारिराज धन्वन्तरि समस्त रोर्गोका नाश क्ले 
समर्य ये | २६॥ 


परेत, पिद्याच आदिके अवेद्र॑से शेनेवाटी पीडको समक्षना भौर 


विभिन्न प्रकारके उपनवारोदवारा उसे दूर करना यदचिकत्सा दै । 
सिर, नेत्र आदि ऊपरके अङ्गोकी वीमारीको दूर करनेकी चेटा एवं 
विधि ऊर्वाङ्गचिकत्छा कषटछातरी ६ 1 भल-श्रसकि आपात आदि 
होनैवाठे धावको चीर-फाढकर टठीकं करनेकी जो क्रिया 8, उसे 
शल्य-चिषित्सा कहते ै । सर्पदंशन यादि जङ्गम तया जफीम मादि 
स्थावर विपको दूर करनेका उपचार दं्चिकित्सा ६ । रसायन 
भादिके दारा बुदापाको रोकना था उसे दूर करना जशचिकित्सा 
£ { वाजीक्ण तन्त्रको टौ यृषचिकित्सा कहते रै । 


हिर्वशप्षं ] 


पकोनजिपेऽभ्यायः 


१०१ 


आयुर्वेदं भरदाजाव्‌ भव्येह भिषलां क्रियाम्‌ । 
शम्र्टधा पुनण्यंस्य हिष्येम्यः प्रत्यपादयष्‌ ॥ २७ ॥ 
उन्हनि भुनिवर भरद्राजसे आयुर्वेद तथा चिकित्साकम॑का 
शन प्राप्त करके उते आठ भागि विक्त किया ओर उन 
सव्रकी विस्तृत विवेचना की । किर वहुतसे रि्ण्योको उस 
अष्टङ्गयुक्त आयुंदकी शिक्षा दी ॥ २७ ॥ 
धन्वन्तरेस्तु तनयः केतुमानिति विश्चुतः। 
अथ केतुमतः पुतो वीरे भीमस्यः सूटसः ॥ २८॥ 
धन्वन्तरिके पुज केठ॒मान्‌. नामते विख्यात हुए । केतु- 
माने वीर पुत्रका नाम भीमरथ था ॥ २८ ॥ 
खतो भीमरथस्यापि दिवोदासः प्रजेश्वरः । 
दिबोदासस्तु धर्मात्मा बारणस्यधिपो ऽभवत्‌ ॥ २९ ॥ 
मीमरथके पुप्र धमत्मा राजा दिवोदास हुए, जो वाराणसी- 
पुरीके खामी ये ॥ २९॥ 
पतस्मिर्नेव काले तु पुस षाराणसीं दष । 
हस्या निषासलयामाख क्षेमको न।म राक्षसः ॥ ३० ॥ 
नरेश्वर ¡ राजा दिवोदासके राज्यकार्ये टी शापवदय 
वाराणघीपुरी जनद्युल्य हो गयी थी, जिसे पे भगवान्‌ सद्रके 
अनुचर क्षेमक नामक राक्षसे वसाया था ॥ २०॥ 
शता हि खा मतिमता निङ्घुम्भेन म्त्मना । 
हल्या वर्ष्तदक्षं वे भविधी नात्र संशयः ॥ २९१॥ 
भगवान्‌ शद्रके पार्षद अुद्धिमान्‌ महात्मा निकुम्भने यह 
शाप देदिया थाक ष्वाराणखीपुरी एक हजार वर्षौतकं जन- 
धत्य यनी रहेगी । शसम संशय नहीं है ॥ ३१ ॥ 
सस्या तु शषमाभायां दिवोदाखः प्रजेश्वरः । 
विषयान्ते पुरी रस्यां गोमत्यां संन्यदेश्यत्‌ ॥ ३२॥ 
उख पुरीके शापप्रस्त हो जानेपर राजा दिवोदासमे अपने 
राज्यकी सीमापर गोमती नदीके विनारि एक रमणीय नमरी 
चसायी | ३२९॥ 


भद्रेण्यस्य पूर तु पुरी वासणसीत्यभूत्‌ । 
भद्रभेण्यस्य पुज्राणां शतमुक्तमधन्धिनाम्‌ ॥ ३२ ॥ 
हत्वा निवेशयामास दिवोदासो नरर्षभः) 
भद्रश्रेण्यस्य तद्‌ राज्यं हृतं तेन बलीयसा ॥ ३४॥ 

पहर वाराणसीपुरी ८ यदुवंशी मदिष्माच्े पुत्र) भद्र- 
भेष्यके अधिकार थी । भद्रभ्ेण्यके सौ पुत्र येः जो श्रेष्ठ 
धतुर्षर माने जत्ति थे नरश्रेष्ठ दिवोदासने उन सबको 
मारकर बह अपना राव्य स्थापित किया । उन महाबली 
नरेशने मद्रभेण्ये उस ॒राज्यका वल्कं अपदरण 
कर स्या ॥ ३३-३४ ॥ 


जनमेजय उवाच 
वाराणसीं निकुम्भस्तु किमयं शत्तथान्‌ प्रभुः । 
निकुर्भकश्च धमीत्मा सिद्धं शशाप यः ॥ ३५॥ 
जनमेजयने पूष्ा-एने ¡ वाराणसी ती सिद्धसेन 
( मोक्षधाम >) ह ओरं प्रभावशाली निकुम्भ बडे धमात्मा है । 
फिर उन्न उस पुरीको श्राप किंस च्थि दिया १॥ ३५ ॥ 
वैशम्पायन उका 
विषोदासस्तु राजर्धिनगरी प्राप्य पार्थिवः । 
वसति स महातेजाः स्पीतायां तु नराधिपः ॥ ३६॥ 
वैशाग्पायनजीने क्टा--पजन्‌ | महतेजखी , नरैर 
राजिं दिवोदसि वाराणसी नगरीको पाकर बहेकरि राजा हो 
गये । वे उस समृद्धिशाख्िनी नगरम सदा ष्टी निवास 
करते ये| ३६॥ 
पतसित्तेव काटे तु छतवारो महेश्वरः । 
देव्याः स प्रियकामस्तुन्यवसच्छवश्युयम्तिके ॥ ३७ ॥ 
इन्दी दिनों भगवान्‌ शङ्कर विवाह करके देवी पार्बतीका 
प्रियं करनेकी ृच्छासे अपने श्वद्युरकै पास टी निवास 
करते ये ॥ ३७ ॥ 
देवाक्षया पार्षदा ये त्वधिरूपास्तपोधनाः। 
पू्वोतरपदेदौश्च तोषयन्ति सस पार्वतीम्‌ ॥ ३८॥ 
उस्र समय महादेवजीकी आक्ञसे उनके सुयोग्य पार्षद, जो 
तपस्या धनी थे, उनके पहले दिये हुए उपदेशके अतुसार 
पावतीदेवीको संव॒षट करते रहते थे ॥ २८ ॥ | 
हृष्यते वै महादेवी मेना नैष प्रहृष्यति । 
जुगण्छत्यसशृत्‌ तां घे देवी देवं वयैष सा ॥ २९॥ 
इससे महादेवी पावती ते मवम रहती थी रंदु उनकी 
माता मेनाको संतोष मर्दी होता था । वे महादेवी पार्वती तथा 
भगवान्‌ शङ्कस्की वारंवार निन्दा ही करती थी | ३९ ॥ 
सपाषदस्त्वनायारस्तव भती मदेश्वरः। 
दरिद्रः सवदैव शिलं तस्य न वर्त॑ते ॥ ४० ॥ 
उन्दने एक दिन कहा-“उमे { तेरे पति महदेव ओर 
उनके पार्षद समी अनाचारी है । साथ ही बे भोलेनाथ सदाके 
दद्डि दै ¦ शील तो उनमे नाममात्रको मी नहीं है ॥ ५० ॥ 
माश्ना तथोक्ता वरदा स्रीखभावाश्च चुक्रधे । 
स्मितं छत्वा च वरदा भवपादर्वमथागमत्‌ 1 ४१ ॥ 
वरदायिनी उमा माताके देखा कहनेपर ज्ञीस्वभाववक्च 
कुपित दो उटीं ओर रिचित्‌ मुसकराकर महादेवजीके 
पास आर्यं ॥ ४९१ ॥ 
विवणंवदना देवी म्टादेवमभाषत । 
नेह घल्स्याम्पदं देव नय मां स्वं निकेतनम्‌ ॥ ४२॥ 


१० 


्रीत्रहाभारते खिङभागे 


[ हरिवो 


कौ 


उस समय उनका मुख मलिन ्टोरष्टाथा। निकट 
आकर देवीने महटदेवजीसे कहा-"देव ! अव गै यहो (नैश ) 
नदीं ररहुगी । आप मुके अपने धर ले वरदे" ॥ ४२॥ 
तथा कतु महादेवः सवंलोकनवेक्षत । 
वासार्थं रोचयामास प्रथिध्यां कुरुनन्दन ॥ ४२ ॥ 
वाराणसीं महातेजाः सिरिक्षेषरं महेश्वरः । 
करुखनन्दन 1! पार्वतीजीके कथनानुसार कायं करनेकरे चि 
मष्टादेवजीने सम्पूर्णं छेर्कोपर दृष्टिपात फिया । उन महातिजस्वी 
महेश्वरे पृथ्वीपर अपने रहनेके च्वि सिद्धिकषेप्र वारणसीपुरी- 
को पसंद किया ॥ ५३३ ॥ 
दिवोदासेन तां शास्था निविष्टां नग्स भवः ॥ ४४॥ 
पाद्यं तिष्ठम्तमाहूय ` निकुम्भमिष्मध्रवीष्‌ । 
परंतु उस नगरमे राजा दिवोदास निवास फरते है, यह 
जानकर महदेव्जीने अपने पास खड हुए निकुम्भसे स 
प्रकार कहा---)) ४४१ ॥ 
गणेभ्यर पुरी गत्वा श्ल्यां षाराणसीं कख ॥ ४५॥ 
खदुनैवाभ्युपायेन शातिवीरयः स पार्थिवः। 
ध्गषोश्वर | उम जाकर वारणसीपुरीको मतुष्यंसि सूनी 
कर दो; परंतु सकफे व्यि कोम उपायसे टी काम केना 
क्योकि वे राजा दिवोदास ब्रडे बख्वान्‌ है ॥ ४५१ ॥ 


ततो गत्वा निकुम्भस्तु पुरी षाराणरसी तवा ॥ ४६॥ 
खथ्ने निदर्शयामास कषण्डुकं नाम नापितम्‌ । 
` भेयस्तेऽष्े करिष्यामि स्थानं मे रोखयानघ ॥ 9७॥ 
मदूपां भरतिमां छत्वा नगरय॑म्ते तथैष ख। ` 
हतः स्वप्ने यथोहिषटं सवं कारितधान्‌ दप ॥ ४८॥ 
तव निकरुम्मने वाराणसीपुरीम जाकर कण्डुक नार्द्रो 
स्वमरम दर्शन दिया ओर कहा-'अनष | तू नगरकी सीमापर 
मेरी प्रतिमा बनाकर मेरे व्ि निवासस्थानकी व्यवस्थां कर । 
सा -कस्नेसे मँ तेरा कल्याण करहगा ।' नरेश्वर | तवर उस 
नाईने स्वभर्म जता कहा गया था उसके अनुसार सव कुछ 
क्रिया ओर कराया ॥ ४६-४८ ॥ 
पुसहारे त॒ धिक्षाप्य राजानं शच यथाविधि । 
पूजां तु महतीं तस्य नित्यमेव प्रयोजयत्‌ ॥ ४९॥ 
राजाको सूचना दैकर उसने नगरे द्वारपर बिधिपूर्वक 
निङ्कम्भ-परतिमाकी खापना की 1 फिर वह प्रतिदिन वे 
समारोहे साथ उस प्रतिमाकी पूजा करने र्गा ॥ ४९ ॥ 


गम्परे्च धूपमाल्यैश्च मरक्षणीयैस्तयैव ख । ` 
अल्पननप्रथोगैश्च अस्यद्भतमिषाभवकत्‌ ॥ ५०॥ 

गन्धः पुष्प, माला, धूपः प्रोक्षणीय जल तथा अन्न-पान 
आदि अपण करके वह्‌ नाई निकरुम्भकी पूजा करता था । यह 
बर्हो अत्यन्त अद्ुत-खी बात हुई ॥ ५० ॥ 


= = 


९ 
म 


गक गुरि 


पवं सम्पूज्यते तश्र नित्यमेष गणेश्वरः । 
ततो षरसष्ं त॒ नागराणां प्रयच्छति । 
+ [4 
पुत्रान्‌ हिरण्यमायुश्च सवौन्‌ कामां स्तथैव च ॥ ५१॥ 
दस प्रकार वर्हौ नित्य टौ निकुम्भनामक गणेशकी पूजा 
होती ओर वे नागरिकोको सरतो वर प्रदान कसते ये । पुत्रः 
सुवर्ण, आयु तथा सम्पूणं मनोवाश्छित वस्र्य सषको 
देते ये ॥ ५१ ॥ 
राशस्तु म्िषी धेष्ठा छयश्या नाम धिश्वुता 1 
पुघ्नार्थमागता देघी साण्वी राक्षा प्रचोदिता ॥ ५२॥ 
राजा दिवोदासकी श्रेष्ठ महारानी सुयशा नामसे विख्यात 
थीं | तजाकी आक्षा ठेकर वे साध्वी मष्टारानी पुश्रकी कामना- 
से बह आयीं ॥ ५२॥ 
पूजां त धिपुखां स्वा देषी पु्रमयाखश । 
पुनः पुनरथागत्य बहुशः पुत्रकारणात्‌ ॥ ५३॥ 
व्ह जाकर बड़े विस्तारे साथ पूजा करके देवी सुयश्चा- 
ने निक्रुम्भसे पुत्रके स्यि याचना की | उन्हेनि मारंषार 
आकर पूजन किया भीर अनेक वार पुत्रके ल्यि प्रार्थना 
की | ५३॥ 
न प्रयच्छति पुं हि निङ्कुम्भः कारणेन हि । 
राजा तु यदि नः कुप्येत्‌ कार्यसियिस्वतो भवेष््‌॥ ५४॥ 
पर निकुम्भ कारणवदश न्ह पुत्र नरह देते ये| उन्दो- 
ने सोचा--“यदि राजा किसी तरद्‌ हमपर कुपित हे जाय तो 
हमारा काम वन जायः }॥ ५४ ॥ 
अथ दीर्घेण काठेन क्रोधो राजानमाविदष्‌ । 
भूत पष महान्‌ दारि नागराणां प्रयर्छति ॥ ५५॥ 
प्रीतो वरन्‌ वै श्ावशो मम किंन प्रयच्छति । 
भामकषेः पूज्यते निस्यं नगर्या मे सदैव हि ॥ ५६॥ 
षिह्ापितो मयात्य्ं देव्या मे पुश्रकारणात्‌ । 
न ददाति च पुश्रं मे कृतध्नः केन हेतुना ॥ ५७ ॥ 
ततो नाति सत्कारं मत्सक्राशाद्‌ विदोषः । 
तस्माद्‌ तु नाद्यायिष्यानि स्थानमस्य दुरात्मनः ॥ ५८ ॥ 
तदनन्तर दीर्षकालकरे पश्यात्‌ राजाके मनमे क्रोध हुञ। 
वे सोचने लगे--भेरे नगरके दवारपर बैठा हुआ यह महान्‌ 
भूत प्रसन्न होकर नागरिकको सैकड़ों प्रकारके वर देताः 
परंतु मुप्ने क्यो नही देता १सदामेरी ही नगरी, मेरेष्टी 
कोग इसकी नित्य पूजा करते द । मैने भी दैवीको पुत्र प्रदान 
करनेके लि बार-बार निवेदन क्रिया; परंतु यह्‌ कृतध्न न 
जाने किंस कारणते सुक्षे पुत्र नहीं दे रहा है | अतः अग यह 
विशेषतः सु्चसे सत्कार पाने योग्य नहीं रहा । दस्थि एस 
दुरात्माके सथानका मे नारा कर गाः ॥ ५५-५८ ॥ 
प्वं स तु धिनिश्चित्य दुसरमा राजकिल्विषी । 
स्थानं गणपतेस्तस्य नादायामास दुर्मतिः ॥ ५९. ॥ 


हरिवंशपवं | 


ेसा निश्चय करफे दुरात्मा दद्धि एवं पापी राजने 
सणपति निकुम्भे उस स्थानके नष्ट करा दिया ॥ ५९ ॥ 


भग्ममायतनं दृष्टा सजानमश्चपत्‌ प्रु; । 
यसमादनपरधस्य स्वया स्थानं विनादितम्‌ 1 
पर्यकस्मादियं दात्या तव नूनं भविष्यति ॥ ६० ॥ 
अपने वासस्थानको भग्न हभ देख भगवान्‌ निकुम्भने 
राजकरो शाप देते हए कदा-“राजन्‌ ! तमने चिना किसी 
अपराधके मेरे खानको नष्ट कराया रहै इसय्यि निश्चय ही 
वुम्दारी यह नगयी अकस्मात्‌ जनचयूत्य हो जायगी ॥ ६० ॥ 
ततस्तेन तु श्रपेन द्रुत्य वारणसी तद्‌ । . 
शप्त्वा पुरी निकुम्भस्तु महादेवमथागमव्‌ ॥ ६१ ॥ 
तदनन्तर उस शपे उस समय वाराणसीपुरी सूनी दो 
गयी { उस पुरीको शाप देकर निङ्कुम्भ महादेवजीके पास 
चले गये | ६१ ॥ 
अकसमात्‌ तु पुरीसा तु षिद्ुता सवंतोदिदम्‌ । 
तस्यां पुर्या ततो देशे निमेमे पदमात्मनः ॥ ६२ ॥ 
वाराणसीमे रहनेवले सव रोग अकस्मात्‌ सम्पूर्णं दिराओं- 
म माम गये ¦ तवर महादेवजीने उस पुरीम अपना निवास- 
स्थान यनाया | ६२ ॥ 


समते तध वै देवो रममाणो गिरेः खुताम्‌ 1 
त रति तत्र वै देवी रभते गृहविस्मयात्‌ । 
चसाम्यश्र न पुरयां तु देवी देवमथाव्रचीत्‌ ॥ ६३ ॥ 
फिर वे भगवान्‌ शिव गिरिराजनन्दिनी उमाका मनो- 
रञ्जन करते हुए वहो आनन्दपूर्वक रहने रगे । परंतु देवी 
पावतीका मन वरहो नदीं क्गता था, क्योकि वरहो को 
निश्चित ह न होनेसे वे विस्मयम पड़ी रहती थी । ( अथवा 
पिताके धरे ल्यि उत्कण्ठित दोनेकरे कारण देवीको वर्हो 
प्रसन्नता नहीं प्राप्त दोती थी। ) उन्होने महादेवजीसे कदा-- 
'मगवन्‌ !म इस पुरीमे नदीं रहंगी ( अप मेरे धरको 
चल्यि)  ॥ ६२३ ॥ 
दैव उवाच 
नां वेद्मनि षत्स्यामि अविसुकत हि मे गृ्टम्‌ । 
नाह तत्र गमिष्यामि गच्छ देवि गृ रति ॥ ६४ ॥ 
महदिवजी बोले-देषि ¡ मै ओर की घरमे नदीं 
रहूगा । यह अविमुक्त क्षे दी मेरा धर दै । अतः यै वर्शे 
नहीं चर्देगा ) ठम जना चादौ तो अपने उस घरको 
जाओ + ६४ ॥ 
दसन्नुवाच भगवांस्व्यस्वकचिपुखन्तकः । 
तस्मात्‌ तदविभुक्तं हि परोक्तं देवेन वै खयम्‌ ॥ ६५ ॥ 
पवं वाराणसी शप्ता अविसुक्तं च कीर्तितम्‌ ॥ ६६ ॥ 
जिपुरोका विनाश करेवा श्रिनेच्धारी भगवान्‌ शिवने 


पकोनचिश्चो ऽध्यायः 


शण्द 


हसते हए पूोक्त वात कही थी । महादेवजीने स्वयं ही उस ` 
क्षे्रको अविमुक्त कदा था; दइसस्ि वह॒ अविमुक्त नामसे 
प्रसिद्ध हो गया । इस तरह वायाणसीपुरीको शाप प्रात हुआ 
जर उसे अविभुक्त क्षेत्र कदा गया । ६५.६६ ॥ 
यस्मिन. वसति वै देवः स्वदेषनमर्छृतः । 
युगेषु जिघु धमत्मा सह देव्या मदेश्वरः ॥ ६७ ॥ 
स्वदेववन्दिते धर्मात्मा देवं मेश्वर सत्ययुग आदि तीन 
युमोमे देवी पाव॑तीके साथ उस अविमुक्त कषत्रमे प्रत्यक्ष निवास 
करते ह | ६७ ॥ 
अन्तथौनं करौ याति तत्पुरं हि महात्मनः । 
अन्तर्हिते पुरे तस्िन्‌. पुरी सा वसते पुनः । 
पवं वाराणसी शा निवे पुनसगता ॥ ६८ ॥ 
कलियुग आनेपर महात्मा महदेषजीका वह नगर अदस्य 
दो जाता दै । उसके अदस्य हौ जानेपर वायणसीपुरी पसे 
त्रसती है । इस प्रकार वाराणसी मगरी शापम्रस्त दोकर 
उजङधी ओर पुनः वसी थी ॥ ६८ ॥ 
भद्वश्रेण्यस्य पुत्रो वे दुद॑मो नाम विश्वुतः। 
दिकोदासेन बति घृणया स विवजितः ॥ ६९ ॥ 
मद्रशरेण्यका एक पुत्र दुर्दम नमते विख्यात भा । 
दिवोदासने उसे वारक समञ्मकर दयावस जीवित रीड 
दियाथा॥६९॥ 
देदयस्य वतु दप्याद्ं रतवान्‌ वै मदहपतिः। 
आजहे पितृदायाद्यं दिबोदासहतं बखात्‌ ॥ ७० ॥ 
उस राजाने हैदयका पुज होना स्वीकार किया ओर 
उन्हीकी सहायतासे उसने दिवोदासद्रारा वल्मृरव॑कं अप्त 
हुई अपनी पैतृक सम्पत्तिको किर वापस रौटाया ॥ ७० ॥ 
भद्रश्रेण्यस्य पुम्ेण दुर्दमेन मदात्मना । 
वैरस्यान्तं महाराज क्षभरियेण विधित्खता ॥ ७१ ॥ 
महाराज ! मद्रशरेण्यका महामनस्वी पुत्र दुर्दम एक्‌ 
बीर क्षविय था ¦ उसने वैरका बद सेनेके स्थि ही वैख 
कियाथा)॥ ७१॥ 
दिषोदाखाद्‌ शक्त्यां वीरो अक्षे पतर्वनः । 
तेन पुश्ेण वारेन प्रतं तस्य चै पुनः ॥ ७२॥ 
दिवोदास के द्वारा उनकी पत्नी हषद्रतीके गर्भ॑से वीर 
प्रतर्दनका जन्म हा । उस राजङ्ुमासे बालक दोनेपर मी 
दुरदमसे पुनः राज्य छीन चिया ॥ ७२॥ 
प्रतर्दनस्य युजौ दो चत्छभा्भौ बभूवतुः । 
वत्सपुघो छरकैस्तु संनतिस्तस्य चात्पसः ॥ ७२३ ॥ 
भतर्दनङे दो पुत्र थे-चत्स ओर माम॑ । वत्सफे पुत्र 
अलक ओर अल्कंक संनति दए ॥ ७२ ॥ 


१०४ 


शरीमष्टाभारते खिल्भागे 


[ हरिवंशे 


अरुकंः काशिराजस्तु ब्रह्मण्यः सत्यसङ्गरः । 

अलक प्रति राजप शोको गीतः. पुरातनैः ॥ ७४ ॥ 
काशिराज अर्कं वदे ब्राद्यणभक्त ओर सत्यप्रति ये। 

राजर्धिं अलके विषयमे प्राचीन पुखषरनि निम्ना्कित श्टयेकका 

गान कियाद ॥ ७४॥ 

षश्टिवषसदस्राणि षष्टि वर्षदातानि च। 

युष रूपेण सम्पन्न आसीत्‌ कारिकुखोद्ध्ः ॥ ७५॥ 
(कारिववंशावतंस अकं छठ दजार छः सी वर्पीतक 

युवावसखा तथा न्द्र रूप-वैमववे सम्पन्न रहे ॥ ७५॥ 

छोषासुद्रा्रसखदेन परमायुरवाप सः। 

तस्यासीद्‌ छमदद्राज्यं रूपयौवनदालिनः ॥ ७६॥ 
उन्दनि लोपामुद्राकी कृपासे उत्तम अयु प्रात की थी। 

षप ओौर युवावखसि युदोमित होनेवले अल्क॑का राज्य बहुत 

विशाल था ॥ ७६ ॥ 

हापस्यान्ते महाबाहुर्हत्वा क्षेमकराक्षसम्‌ । 

रम्यां निवेशयामास पुरी घाराणरसी पुनः ॥ ७७॥ 
महावराह अ्कंने निकम्मके शापका अन्त होनेपर क्षेमक 

नामक राक्चसको मारकर पुनः स्मणीय वाराणसीपुरी वसायी 

यी ॥ ७७ ॥ 

संनतेरपि दायादः सुनीथो नाम धार्मिकः । 

सुनीथस्य तु दायादः क्षेम्यो नाम महायज्ञाः ॥ ७८ ॥ 
संनतिके पुत्र धर्मात्मा सुनीय हुए ओर सुनीयका 

महाययस्वी पुन क्षेम्य नामते प्रसिद्ध हुआ ॥ ७८ ॥ 

कषेम्यस्य केतुमान्‌ पुरः खकेतुस्तस्य चात्मजः । 

सुकेसोस्तनयग्यापि धममकेतुरिति स्तः ॥ ७९. ॥ 


शषिम्यके पुत्र केठमान्‌, केठ॒माऩ पुत्र सुकेत जीर सुकेतु- 
के मी पुत्र धमकर हुए. ॥ ७९ ॥ 
धममकेतोस्तु दायादः सत्यकेतुर्भदारथः। 
सत्यकेतु्ुतश्चापि वियु्नमि प्रजेश्वरः ॥ ८० ॥ 
धर्मरतुकरे पुत्र महारथी खवयकरेठ॒ हए ओर सत्यकेतुके 
पुत्र प्रजापाक्क विभु दए ॥ ८० ॥ 
आनर्तस्तु विभोः पुतः खकुमारस्तु तत्सुतः । 
खकुमारस्य पुत्रस्तु धृष्केत॒ः खधार्मिकः । 
धृष्टकेतोस्तु दायादो वेणुोघ्रः प्रजेश्वरः ॥ ८१ ॥ 
.-विभ्रुके पुत्रका नाम आनर्तं था ! आन्तंका पुत्र सुकुमार 
हज । खकुमारके युर परम धर्मास्मा धृष्ेठ॒ हुए ओर 
धृष्टकरेठकरे पुत्र राजा वेणुदोत्र थे ॥ ८१ ॥ 
वेणुदयो्रखतश्चापि भगा नाम प्रजेश्वरः । 
वत्सस्य वत्सभूमिस्तु भरग॒भूमिस्तु भागवत्‌ ॥ ८२॥ 
वेणुदयो्रका पुत्र राजा मर्गके नामसे विख्यात हआ । 
परतर्दनके जौ वत्स ओौर भर्गं नामक दो पुत्र वतलये गये हैः 
उन्मेस वत्सके वत्छभूमि तथा मागके शरुभूमि नामक पुत्र हए ॥ 
पते त्वङ्गिरसः पुत्रा जाता वंशेऽथ भागंवे। 
बराह्मणाः क्षन्निया वैद्यास्तयोः पुराः सहस्रदाः 1 
इत्येते कादायः प्रोक्ता नहुषस्य निवोध मे ॥ ८३ ॥ 
ये अङ्गिरागोत्री माल्वकरे वंशज हैः जो मार्गववंशर्म 
उव्यनन हट । नमे बाद्यणः कषत्रिय ओर वैश्य तीनों वणक 
खोग ई। वत्सभूमि ओर भगुभूमिके सहद्ो पु् के गये दै । 
इस प्रकार ये राजा काशिके कुट उत्पन्न हए क्षत्रिय वताये 
गये दै । अव्र ठुम शवु्षसे नहुषकी संतानोंका वर्णन खनो ॥८२॥ 


इति श्रीमहाभारते खिरुभागे हरिवंशे इरिवंदाप्वणि एकोनर्विरोऽध्यायः ॥ २९ ॥ 


इस प्रकार श्रीमहाभास्त किरभाग हरिवंशे अन्तर्गत इखिंशपतमे उनतीसवे! अध्याय पूरा हुमा ॥ २९ ॥ 
न+ क 


वरिरोऽध्यायः 


नहुष एवं ययातिके वंशका वणेन तथा ययातिका चरि 


वेश्म्पायनं' उवाच 

उत्पन्नाः पिदकन्यायां विरजायां मदौजसः । 
नेहुषस्यं तु दायादाः षडिन्द्रोपमतेजसः ॥ ९॥ 

वैदाम्पायनजी कहते ह--राजन्‌ { नहुषके उनकी 
पत्नी पितृकन्या विरजे गर्म॑े छः महाव्रटी पुत्र उदयन्न हूए 
जो दन्द्रके समान तेजसी ये ॥ १ ॥ 
यतिर्ययातिः संयातिरायातिः पाञ्चिको भवः। 
सुयातिः षष्ठस्तेषां ओ ययातिः पार्थिवोऽभवत्‌ । 
यतिर्यंष्टस्वु तेषां वै ययातिस्तु ततः परम्‌ ॥ २ ॥ 


उनके नाम इस प्रकार ह-यति, ययाति, संयाति, आयाति; 
पोचर्वौ मव ओर छठा सुयाति । इनर्मेते ययाति हयी राजा 
इट ! इन छः मादरयोमि खवसे वदे थे यति ओर उनके बाद 
ययाति उत्पन्न हुए-ये ॥ २ ॥ 
ककुरस्यकन्यां गां नाम केभे परमधार्मिकः 1 
यतिस्तु मोक्षमास्थाय बह्यभूतो ऽभवन्मुनिः ॥ ३ ॥ 

परम धर्माप्मा यत्तिने कङुत्छकी कन्या गौको पल्नीरूपरम 
प्रात किया था | वे मोक्षधर्मका आश्रय ठे नद्मस्वरूप भनि 
शहेग्ये॥३॥ 


हरिवंशपवं 1 


भिद्ेऽन्यायः 


व ~~~ ~~~ ~~~ ~~~ ~~~ 


तेषां ययातिः पञ्चानां विजित्य वसुधामिमाम्‌ । 
देवयानीमुशनसः खतां भायोमवाप सः। 
शामिष्ठामासरस चैव तनयां वृषपर्वणः ॥ ४ ॥ 
दोष पोच मादययेमि ययातिने इस प्रथ्वीको जीतकर शुक्रा- 
चार्यकी पुत्री देवयानी तथा अमरराज दृषपर्वाकी कन्या 
रामिष्ठाको भी पत्नीके रूपमे प्राप्त किया ॥ ४ ॥ 
यदुं च दुर्वसुं चैव देवयानी ञ्यजायत ! 
दर्यं चां च परं च शामिष्ठा वाषपर्णी ॥ ५ ॥ 
देवयानीने यदु ओर ठवैसुको जन्म दिया तथा इृषपवा- 
की पुत्री शर्मिष्ठने द्रुह्युः अनु तया पृरू-ये तीन पुत्र 
उत्पन्न कयि | ५॥ 
तस्मै हाक्रो ददौ प्रीतो रथं परमभाखरम्‌ । 
असद्भं काञ्चनं दिव्यं दिन्यैः परमवाजिभिः ॥ ६॥ 
युक्तं मनोजवैः श्ुभरर्येन भार्यीसुबाह' खः । 
ययातिपर्‌ प्रसन्न होकर इन्दरने उन्द एक अत्यन्त प्रकाश- 
मान रथ प्रदान किया; जिम मनके समान वेगसाली, दिव्यः 
उत्तम एवं श्वेतवर्ण अश्वजुते हुए. थे । वह दिष्य स्थ 
सोनेका बना हआ था । उसकी गति कीं भी अवसद्ध नदीं 
होती थी | उसी रथके द्वारा वे अपनी भार्याको ज्याहकर 
लये थे | ६१ ॥ 
स॒ तेन रथमुख्येन षडरम्रेनाजयन्मषठीम्‌ । 
ययातियुधि दुर्धर्षस्तथा देवान्‌. दानवान्‌ ॥ ७ ॥ 
उस श्रेष्ठ रथक्ते दारा दुधंषं राजा ययातिने छः रातेमि ष्टी 
सम्पूणं ए्वी तथा देवताओं ओर दानरवोको भी जीत किया था ॥ 
स रथः पौरवाणां तु सर्वेषामभवव्‌ तव्‌ । 
यावसु वखुनाम्नो वै कौरवाञ्जनमेजय ॥ ८ ॥ 
जनमेजय } कुखुवंशी राजा वसुतक समी पौरव नरेशेकि 
पास वह रथ प्ररम्परया प्राप्त होकर विदययमनि था ॥ ८ ॥ 
ङयोः पुरस्य राजेन्दर राक्नः पारीक्षितस्य ह । 
जगाम स रथो नादं शापाद्‌ मा्म्य॑स्य धीमतः ॥ ९ ॥ 
रजेन््र { कुरुवंशी परीक्षित्‌-कुमार इन्द्रोत जनमेजयको 
बुद्धिमान्‌ गाग्यंका शाप भ्रात होनेके कारण वह्‌ रथ उनके 
यहसि अटद्य हो गया ॥ ९ ॥ 
गायस्य हि सुतं बार स याजा जनमेजयः । 
वाक्ट्ररं हिंसयामास ब्रह्महत्यामवाप खः ॥ १०॥ 
वरात यह थी कि गार्गयके एक वाख्क पुत्र थाः जो बड़ा ही 
वाचार था उसे इन्द्रोत नामवले राजा जनमेजयने मार 
डाखा । इससे उन्हे ब्रहमहत्या प्रात हुई ॥-१० ॥ 
स त्ोदगन्धी राजर्पिः परिष्यवभ्नितस्ततः । 
पोरजानपरैस्त्यकतेः न चेमे दामं कर्ष ॥ ११॥ 


पुरबासि्यो तथा जनपदके लोगेनि उन्हे त्याग दिया । 
उनके शरीरमे छोैकी-सी गन्ध आती थी (अथवावे 
पतितके खमान जानं पड़ते ये ) । राजिं इन्द्रोत इधर-उधर 
भागते-फिरते येः किंतु कहीं भी उन्दँ शान्ति नहीं मिलती थी ॥ 
ततः स दुःखसंवक्तो नारभत्‌ संविदं कचित्‌ । 
इन्द्रोतः शौनकं राजा शारणं परत्यपद्यत ॥ १२॥ 

जब कहीं मी स्वख ्ोनेका उपाय नहीं सञ्ञा, तब दुःखसे 
संतप्त हए रजा इन्द्रोत दौनक सुनिकी शरणमे गये ॥ १२॥ 
याजयामास चेन्द्रोतं शौनको जनमेजयम्‌ । 
अश्वमेधेन राजान पावनां दिजोचमः ॥ १३ ॥ 

द्विजप्न् शौनकने राजा ृनदरोत जनमेजयको शद करनेके 
स्यि उनसे अश्वमेध यक्लका अनुष्ठान करवाया ॥ १३ ॥ 


स लोहगन्धो व्यनश्तत्‌ तस्याबश्रथमेत्य ह । 
स च दिव्यो रथो राजन्‌ घसोध्येदिपतेस्तदा । 
दत्तः शक्रेण तुष्टेन ऊेमे तस्माद्‌ दृषशद्थः ॥ १४॥ 
उस यक्शके अन्मे अवग्धथ स्नान कर केनेपर इन्द्रोतका 
पाप दूर हो गया ओर उनके शरीरसे जो रेहेकी-सी गन्ध 
आती थी, वह मिट गयी । राजन्‌ ! तत्पश्चात्‌ इन्द्रे संतुष्ट 
होकर वह दिन्य रथ चेदिराज उयरिचर वसुको दे दिया । 
फिर वसुस बह रथ मगधराज बृहद्रथको मिल ॥ १४॥ 
बृददथाद्‌ क्रमेषेव गतो बर्हद सपम्‌ । 
ततो हत्वा जरासंधं भीमस्तं रथभुखमम्‌ ॥ १५॥ 
भ्रददौ वासुदेवाय प्रीत्या कौरवनन्दनः 
बृहद्रथसे क्रमराः वह्‌ रथ उनके पुत्र राजा जरासंधको 
प्रात जा । तयश्वात्‌ कौरवकुरुको आनन्दित करमेवारे 
भीमसेने जराठधको मारकर वह उत्तम रथ ग्रसनतापू॑क 
भगवान्‌ शरीकृष्णको दे दिया ॥ १५१ ॥ 
सप्तद्वीपां ययातिस्तु जित्वा पृथ्वीं सागरम्‌ ॥ १६॥ 
व्यभजत्‌ पञ्चधा राजन्‌ पुराणां नाहुषस्तका । 
राजन्‌ | नुषनन्दन राजा ययातिने समुद्र ओर खातीं 
द्रीपोसदित सारी पृध्वीको जीतकर उसके पोच भाग कयि ओर 
उन्द अपने पाचों पुमि बोर दिया ॥ ९६१ ॥ 
दिशि दक्षिणपूर्वस्यां तुर्वसुं मतिमान्‌ सपः ॥ १७॥ 
भ्रतीच्यासुष्तरस्यां च दुष्टो चासु च नाहुषः 1 
दिशि पूर्वो्तरस्यां वै यदु ज्येष्टं भ्ययोजयत्‌ ॥ १८॥ 
उन बुद्धिमान्‌ नरेशने दक्षिणपूर्वं दिखा दुर्वखुकोः पश्चिम- 
म द्रु्यको ओर उत्तर दिशामि अनुको-अमिषिक्त करे पोत्र 
दिद्ाके ( दशान कोण ) राज्यपर श्येष्ठ पुश्च युको नियुक्त 
कर दिया ॥ १७-१८ ॥ 
मध्ये परं च राजानमस्यषिशथचत नाहुषः । - 
तैरियं पथिषी सधौ सद्वीपा सपत्तना ॥.१९॥ 


१०्द 


यथाप्रदेशमद्यापि धमेण प्रतिपाल्यते । 
भ्रजास्तेयां पुरस्तात्‌ तु वक्ष्यामि खपसखन्तम ॥ २० ॥ 
- इएके व्राद॒नहूषनन्दन यातिने मध्यदेगके राज्य- 
सिंहानपर पृदका अभिषेक क्रिया | शपश्ेष्ठ | वे तया 
उनके वंगज आज मी खातों दीपौ ओौर नगरोँसदित इस सारी 
प्र्वीका अपने-अपने प्रदेदाके अनुसार धर्मपूर्वक पालन करते 
ह । अव अगे भ उनकी संतानका वर्णन करेगा ॥१९-२०॥ 
धनुर्न्यस्य पृषत्कांश्च पञ्चभिः पुरुषर्षभैः । 
जरावानभवद्‌ राजा भारमावेद्य बन्धुषु ॥ २१॥ 
पोच पुरुषप्रवर पुत्रंसि कृतक्त्य दो राजा ययातिने 
राज्यका मार अपने उन बन्धु-बान्धर्वौपर स्वकर धनुष ओर 
चार्णोकाभरी त्याग कर दिया 1 तद्यश्वात्‌ उन्द जरावस्यनि 
कावूर्मे कर य्या ॥ २१ ॥ 
निशक्षिप्तद्यल्लः पृथिर्घी निरीक््य पृथिषीयपतिः। 
प्रीतिमानभघद्‌ राजा ययातिरपयनितः। 
पवं विभज्य पृथिवीं ययातिवैदुमनवीत्‌ ॥ २२॥ 
किसीसे परास्त न होनेवले प्रथ्वीपति राजा ययाति अखर- 
शखौका त्याग करके प्रथ्वीको सुञ्यवसित देख वदे प्रसन्न 
हुए । इस तरद भूमण्डल्क्रां बिमाग करके ययातिने 
यतुसे कटा-1 २२॥ 
जरां मे प्रतिगरहणीष्व पुत्र छत्याम्तरेण वै । 
तरुणस्तव रूपेण चरेयं पृथिवीमिमाम्‌ । 
जरं त्वयि समाधाय तं यदुः परत्युवाच € ॥ २२॥ 
धवेया ! एक दूरा कार्यं उपसित हज दै, जिसके लि 
मुम्ने ठम्दारी युवावसा चाद्ये । उम मेरा बुढापा ग्रहण करो 
ओर मँ मर्म अपनी वद्धावस्था स्यापित करके तुम्हारे रूपसे 
तरण होकर इस पृरथ्वीपर विचरण कर ।' तवर यदुने उर 
यो उत्तर दिया--॥ २३ ॥ 
अनिर्दि्ा मया भिक्षा बाद्यणस्य प्रतिश्चुता 1 
अनपार्‌त्य वां राजन्‌ न प्र्टीष्यामि ते जसम्‌ ॥ २७ ॥ 
'्म्रज | मने प्क नाक्षणको गँहमोगी भिक्षा देनेकी 
प्रतिधा कर खी टै, अमीतक्र उने यह स्पष्टरूपसे वताया नदी 
दि कि भ्ुपने अग्रुक वस्तु चादिये |” भँ जवतक उसकी मिक्षा- 
का श्ण उतार न दूँ, तवतक आपका वुदापा नदी ठे सर्कगा ॥ 
जरायां वद्षो दोषाः पानभोजनकारिताः । 
चस्माज्यं न ते यजय श्रहठीतुमदसुत्से ॥ २५ ॥ 
"राजन्‌ | बुद्पिमे खान.पानघम्बन्धी बहुत-खे दोप 
अतः म पका बुढापा नदीं रहण करगा ॥ २५॥ 
सन्ति ते वदवः पुरा मत्तः प्रियतरा चप 
प्रतिग्रहीतुं धरमैषठ पुत्रमन्यं बुणीष्व दै ॥ २६॥ 
धनरधर { भापके तो वहते पुत्र ई, जो युसवे भी 


श्रीमष्टाभार्ते खिखभागे 


[ हस्विंशे 


चद्कर्‌ प्रिय ई; अतः धर्मच महाराज ! जरावस्था ग्रदण कसने- 
के स्थि किसी दूसरे पुचका वरण कीजिये ॥ २६॥ ` 
सख पवसुकतो यदुना राजा कोपसमन्वितः । 
उवाच वदतां शरेष्ठो ययातिर्गदैयन्‌ सुतम्‌ ॥ २७ ॥ 
यदुके एसा कहनेपर वक्ताओमिं श्रेष्ठ राजा ययाति कुपित 
दो उठे ओर अपने उस पुत्रकी निन्दा कसते हुए बोले-॥२५७॥ 
क आाश्रयस्तवान्यो ऽस्ति को वा धमं विधीयते । 
मामनादत्य दुकुँदधे यदं तव देशिकः ॥ २८ ॥ 
र्दे । मेरा अनादर करके तेरा दूसरा कोन-खा आश्रय 
है १ अथवा तू किस धर्मका पालन कररहादैण््म तो तेर 
गुर हँ ( फिर मेरी आक्ञाका उल्ल्वन केसे कर रदा है १)» ॥ 
पवसुक्त्वा यदुं तात शशापैनं स मन्युमान्‌ । 
अराज्या ते प्रजा मूढ भवित्रीति नराधम ॥ २९॥ 
तात | अपने पुत्र यदसे फेला कहकर कुपित हुए राजा 
ययातिने उन शाप दिया-भमूढ ! नराधम | तेरी संतान खदा 
राज्यसे वञ्चित रदेगीः ॥ २९ ॥ 
स तुर्वसं च दष्टं चाप्यं च भरतषभ । 
पवमेवात्रबीद्‌ राजा भत्याख्यातश्च तेरपि ॥ ३०॥ 
भरतश्रेष्ठ | तदनन्तर राजा ययातिने क्रमशः ठर्वसु 
दुह्य ओर अनुको मी चलकर उनते रेखी ही वात कीः 
परंतु उन्देनि भी उनकी वात माननेसे इन्कार कर दिया ॥२०॥ 
शाश्चाप तानतिक्रुद्धो ययातिरपराजिवः । 
यथा ते कथितं पूर्वे मया राजर्षिसत्तमः ॥ ३१ ॥ 
तव किसीसे मी पराजित न दोनेवारे राजर्षिरिरोमणि 
ययातिने अत्यन्त कुपित हो उनको मी वैता ही शाप दिया ~. 
जैता युके प्रसन्ञमे पहठे तमद बताया गया ह ॥ ३९ ॥ 
पवं शप्त्वा खुतान्‌ सर्वश्चतुरः पूरुपू्वंजान्‌ । 
तदेव वचनं राजा पृरुमण्याह भारत ॥ २२॥ 
भारत ! इस प्रकार पुरस पदे उत्प हुए अपने चार्यो 
पुर्घोको शाप देकर राजा ययातिने पूरके सामने मी बी 
प्रस्ताव रक्खा ॥ २२॥ 
वरूणस्तव॒ सरूपेण चरेयं पृथिवीमिमाम्‌ । 
जसां त्वयि समाधाय त्वं पूरो यदि मन्यसे ॥ ३२ ॥ 
पुरो | यदि ठम स्वीकार करो तो मँ अपने बुदपिका 
भार वुमपर रखकर वम्हारे रूपसे तरण होकर इस पथ्वीपर 
विचर ॥ २३२ ॥ 
स जगं प्रतिजग्राह पितुः पूरः प्रतापवान्‌ । 
ययातिरपि रूपेण पूरोः पर्यचरन्महीम्‌ ॥ ३४ ॥ 
यह्‌ सुनकर प्रतापी पूरन पिताक बुदापा ङे सिया ओर 
ययाति मी पूरके रूपठे तरुण दो इस प्रथ्दीपर विचरने स्मो ॥ 


हरि्धाय्ं ] 


ह, 3 
भिोऽध्यायः ` 


१०७ 


य 


छ मार्गमाणः कामानामष्ठं भर्वसक्षम। 
विभ्ाध्या सहितो रेमे षते सेधय्ये प्रभुः ॥ २५॥ 
भरतश्रेष्ठ । प्रमावक्षाखी ययाति कामनाओंका अम्त 
दते इण वैश्ररथ नामक वनम गये ओर वरहो विश्वाची 
नामक अप्तरके साथ रमण करने रो ॥ ३५॥ 
यदावितश्णः कामानां भोगेषु स नराधिपः । 
तषा पृते, सकारा षे खां जसं प्रत्यपद्यत ॥ ३६॥ 
इतनेपर भी जव्र उन्हं कामोपभोगसे वृति नहीं हुः तेम 
उन गेरेने पर आकर पृरुसे अपना बुटापा ले लिया ॥२६॥ 


हशर राधा महारज श्टणु गीता ययातिना । 

याभिः परस्याहरेत्‌ कामान्‌ सर्धतोऽङ्धानि कू्म॑वत्‌॥ ६५७॥ 
महाराज | वहो ययातिने जो गाथ गायीं ( उद्वारप्रकट 

करिये) उन्हं नो । उनपर ध्यान देनेसे सत्य सव 

भोगी ओरसे अपने मनेफो उसी प्रफार टा सकता है जैसे 

कया अयने अज्गीको सव ओरसे समेट ठता है ॥ ३७ ॥ 


ल जतु कामः कामानासुपभोगेन क्षाम्यति । 

हविषा रष्णवसेष भूय एवाभिवर्धते ॥ २८ ॥ 
ययातिने कहा-^भोगोकी इच्छा उन भोगनेते कभी 

शान्त नद होती; अपितु घीसे भआगकी भति ओर मी वदती 

हौ जती दै॥ ३८॥ 

यल्‌ पएथिष्यां व्रीहियवं हिरण्यं पश्यः खियः । 

गारमेकश्य ठत सथमिहि पदयक्न सुष्ाति ॥ ३९ ॥ 
"स प्ष्वीपर जितने मी धान, जी; सुवणं, पञ्च॒ तथा 

लियो हैः पे सवर एक पुरुषफे त्थि भी पर्यात नी है । ेसा 

समश्षकर विदन्‌ पुरष मोहम नदीं पडता ॥ १९॥ 

यवौ भवं न कुरते क्षंभूतेषु पावक्षम्‌ । 

कमणा प्रवसता पाथा च्रह्म सम्पद्यते ठद्‌। ॥ ४०॥ 
(प्र जीवय मन, याणी ओर क्रियाद्वासा किसी भौ प्राणीके 

परति पापदुदधि नीं करता, तव वह्‌ बअरह्ममावकौ प्रात हो 

जता १ ॥ ४०॥ 

यदुस्यिभ्यो ने भिभ्येत यदा खास्मान्न बिभ्यति । 

यदा नेख्छति न द्वेि ब्रह्म सम्पदते वदा ॥ ७१॥ 
भजग वहं दूसरे प्राणिमि नहीं रता, अग्र उससे भी 

` दूरे प्राणी नही डसते तथा जवे वह्‌ इन्ा-दषते परे शे जाता 

है, उस समय क्षमाय प्रात हेता १ ॥ ४१ ॥ 


या इुस्स्यजा दुमंतिभियौ त ओी्य॑ति जयंतः । 
योऽसौ प्राणान्तिको रोगस्तां ष्णां त्यजतः सुखम्‌! ७२। 


(खोदी बुद्धिवरे पुरषोद्ारा जिसका स्याग होना कठिन 
हैः जो मुष्यके भूद होनेपर मी स्मयं बढ़ी नीं हेती 
तथा जो प्राण-नाशक रोगके समान है, उस दृष्णाका स्याग 
करनेवारेको टी शुख मिरुता दै ॥ ४२ ॥ 
जीर्यन्ति जीर्यतः केशा दर्ता जीर्यन्ति जीर्यतः । 
जीषितादा धनाशा च जीर्यतोऽपि न जीर्यति ॥ ४३॥ 

“दे होनवारे मतुष्यकरे धार पक जति दै, उसके दति 
भी ने रते ईः परं धन ओर जीबनकी आक्षा उस मतुः 
प्यके जणं होनेपर भी जीणं ८ शिधिरू ) नी होती || ४३ ॥ 
यश्च कामसुखं सोके यश्च विष्यं महरसुखम्‌ । 
तष्णाक्षयस्ुखस्यते बार्हतः पोडरीं कलाम्‌ ॥ ४४॥ 

भसंसारमै जो कामजनित छख शै तथा जो दिस्य षान्‌ 
सुख ई षे सत्र मिरकर पुष्णाक्षयतसे होनेवारे शुखके शोर- 
हवीं काके यराषर भी नदीं हौ सक्ते ॥ ४४ ॥ 
पवसुषसषा स राजर्पिः सदारः प्राविष्टद्‌ घनम्‌ । 
कालेन महसा धापि घच्चार विपुलं दपः ॥ ४५॥ 

सा कहकर राजपिं ययाति शीसषितं षन चङे गये । 
वहो बहुत समयतक उन्दने भारी तपस्या फी ॥ ५५ ॥ 
शयलङ्गे तपस्तप्त्वा तपसोऽभ्ते मदासपाः। 
अलश्षम दे्सुर्खस्य क्षदारः खगंमातवान्‌ ॥ ४६॥ 
उन महातपस्वी नरेदमे भगुवुद्धं नामक धिखरपर तप- 
स्या करफे लीसषटितं उपयासफे द्वारा देहफो ध्याग दिया 
ओर स्वर्गलोक प्रातं किया ॥ ५६ ॥ 
तस्य षदो महाराज पञ्च राजदिक्षशमाः। 
यैभ्यौपतता पृथिवी सवी सूर्यस्येव गभस्तिभिः ॥ ४७॥ 
महाराज | उनके पदमे यदु आदि पोच रजर्षिशियो- 
मणि हुए, जिनके षंराजेसि यष सारी पृथ्वी उसी प्रकार व्यातं 
ह, जैसे सूर्यकी विर्णोति यह व्याति दोती र ॥ ५७ ॥ 
यदोस्छु श्टणु राजष रासर्पिसस्छतम्‌ 
यत्न नारायणो अके दरिषृष्णक्ुेोद्धहः ॥ ४८॥ 
राजिं युका वंश समस्त राजषियोदवाय सम्मानित है । 
दम उसका वर्णन सुनो । उसी व॑दाम इष्गिकुरुभूषण भीकृष्ण- 
के सपमे धीनारायण रिका अवतार ( प्रादु › हुआ था ॥ 
धन्यः प्रजाषलनायुष्मान्‌ कीर्तिंमाश्च भवेश्षरः । 
ययालेश्चरिवं पुण्यं पटभ्कूश्यम्‌ नराधिप ॥ ४९॥ 
नरेश्वर ¡ जो मनुष्य यथातिके दस पुण्यमय चरिभिको 
पदता ओर छ॑नता दै, वह धनसम्पन्नः संतानवान्‌, दीघा 
तथा यरास्वी होता है | ४९ ॥ 


इति श्रीमहाभारते सिरुभागे रिव दरिदशषपर्वणि ययातिचरिते व्रिक्षोऽध्यापः ॥ ३० ॥ 
शस्‌ प्रकार श्रीमहाभाग्त दि रमाग दरि अन्तरगत दसििशपर्वमे ययातिका च्रितरविषयऱ तीस अध्याय्‌ पुरा हभ ५ ६०॥ 


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१०८ 


भीरष्ाभारते शिङभाणे 


, [ हरिवंशे. 


, एकमिगोऽध्यायः 


पूरुकी ध॑शपरम्पराका षर्णन 


जनमेजय उवा 
पृरो्षदयमहं प्रहमम्टरोतभिच्छामि वरषतः। 
दुषटोश्वानो्यवोग्ैष वर्षसोश्च पृथक्‌ पृथक्‌ ॥ १ ॥ 
अनमेजयने कहा--जहान्‌ ! यै पू, द्रहः अनुः यदु 
ओर र्वु वंराका एक्‌ -एयक्‌ यथार्थ वर्णन सुना चाहता ॥ 
बुष्णिवंदाप्रसङ्गेन स्वं वदां पूर्वमे त॒ 
पिस्तरेणादुपूष्यौ च तद्‌ भवान्‌ घक्तुमर्हेति ॥ २ ॥ 
' शृष्िषंदाके प्रसंगसे दन सम्रका वर्णन म॒मे सुनना 
परं सव्रते पहले मँ अपने षी वंश ( पूख-कुल ) का क्रमशः 
विस्तारपूवंक वर्णन सुनना चाहता हू | अतः आप पहले 
उसीकफा षर्णन करं ॥ २॥ 
सैशस्पायने उवाच 
श्ण पूरोरम॑हायज वंशसुमपौरयम्‌ 1 
विस्तरेणालुपूव्यी च यत्र जातोऽसि पार्थिव ॥ २ ॥ 
वैशम्पायनजी घोले- महाराज | उम्तम पराक्रमसे 
सम्पन्न पृर्वंदका, जिसमे वम्हारा जन्म हुमा है, मै क्मानुसार 
विस्तारपूर्वक वर्णन करता ट । एृ्वीनाय | छम से सुनो ॥ 
स्तं ते कीर्तयिष्यामि पूतोर्घशमदुष्ठमम्‌ । 
बुह्ोश्वानोयेदोग्धैव दु्वसोश्च॒ नराधिप ॥ ४ ॥ 
नरेधर ! म बडे हर्षके साथ तुमत परम उत्तम पूरवंदा- 
का वर्णन कर्गा । फिर द्रष्य, अनुः यदु तथा वरर्बदुके ्वंश- 
का कीर्तन किया जायगा ॥ ४॥ 
पूरो; पुरो महावीर्यां रजाऽऽसीनमेजयः । 
भ्रचिन्धास्तु तस्तस्य य'प्राचीमजयद्‌ दिकम्‌ ॥ ५ ॥ 
पूरके मष्टापराक्रमी पुत्र राजा जनमेजय श्ुए ¡ उनके 
युघ्रका नाम प्रचिन्वान्‌ थाः जिन्दनि पूर्वदिशाको जीता था ॥ 
प्रचिन्वतः प्रवीरोऽभून्मनस्युस्तस्य चात्मजः। 
रजा चाभयदो नाम मनस्योरभवच्‌ सुत; ॥ ६ ॥ 
प्रचिन्वानके पुत्र प्रवीर ओर प्रवीरके मनस्यु हुए, मन. 
स्युके पुत्र राजा अमयद थे ॥ ६ ॥ 
तथैश्राभयदस्यासीकष खुधन्वा तु मक्षीपतिः। 
सुधन्वनो बहुगषः शाम्यातिस्तस्य चात्मजः ॥ ७ ॥ 
अमयदके पुत्रका नाम सुधन्वा था; जो दस पृथ्वीका 
अधिपति हआ । सुधन्वाफे बहुगव ओर बहुगवके पुत्र 
शम्याति हए ॥ ७॥ 
शाभ्यतेस्तु रदस्याती सैद्राश्वस्तस्य चात्मजः! 
शै्राश्वस्य घृताच्यां वै दशाप्सरसि खूनयः ॥ ८ ॥ 


श्म्यातिके रदस्याति ओर रहस्यातिके पुत्र रौद्रादय हुए। 
रोद्रादयफे धृताची अप्सराके गर्मसे दस पुत्र हुए ॥ ८ ॥ 
चऋचेयुः प्रथमस्तेषां छकणेयुस्सथैव च । 
कक्षेयुः श्थण्डिलेयुख सप्रतेयुस्तयेव च ॥ ९ ॥ 
ददाणंयुजखेयुश्च स्थलेयुश्च सशायदाः। 
धनेयुश्च घनेयुश्च एुतरिकश्चि वद्य खियः॥ १०॥ 
उनके नाम दत प्रकार है-श्रचेयु अपने वमी भाग्येन 
ष्येषठ ये | उनके वाद कृक्णेयु, कक्षेयु, स्यण्डिलेयु, खन्नतेयु 
ददार्णेयु, जलेयुः मदायशस्वी स्थेय, धनेयु ओर बनेयु थे । 
इनके सिवा रोद्रादवके दस कन्यार्पूः मी थी, जो पुतिका-धर्मके 
अनुसार व्याष्टी जनेवाटी ्थीं। ९-१०॥ 
शद्रा श्वा च भद्रा च मदा मरह तथा । 
खटदा चैव राजेन्द्र नख्दा सुरसापि च) 
तथा गोचपछा त॒ खीरत्नकूटा ख ता ददा ॥ ११॥ 
रजेन्द्र ] उन कन्याके नाम एसप्रकार-रद्रा, श्रा, 
भद्रा, मलदा, मल्हा, खलदा नलदा; सुरणा, गोचपला तथा 
छीरत्तकूय-वे कुल मिलकर दस थीं ॥ ११॥ 
श्पिजीतोऽतरिवंशे वु तासां भतौ प्रमाकरः। 
भद्रायां जनयामास श्तं सोमं यद्ाखिनम्‌ ॥ १९॥ 
अत्रिकुरम उत्पन्न महर्षिं प्रमाकर उन सवके पति ए । 
उन्हनि ख्टके गर्म॑से यद्रस्वी सोमको पुधररूपर्म उत्पन्न किया॥ 
खर्भादना हते सूयं पतमाने दिवो महीम्‌ । 
तमोऽभिभूते छोके च प्रभा येन प्रवर्तिता ॥ १२६॥ 
राहुसे आहत कर जबर सूर्यं आकाशसे प्रष्वीपर गिरने 
ल्ग ओर समस्त संसारम अन्धकार छा गया, उस समय प्रमा- 
करे ष्टी अपनी परमा फैरायी ॥ १३ ॥ 
खस्ति तेऽस्त्विति चोक्तो वै पतमानो दिवाकरः। 
थखनात्‌ तस्य विप्रपनं पपात दिषो महीम्‌ ॥ १४॥ 
महर्षिम गिरते हुए सूर्यको शम्याया कल्याण शो? यद 
कहकर आदीर्वाद दिया 1 उन ब्रहष्षिके इस वचनसे सूर्यदेव 
प्रथ्वीपर नहीं गिरे ॥ १४॥ 
सश्रिधेष्ठाति गोध्राणि यश्चकार महातपाः । 
यजञेष्यत्रर्धनं चेय भ्रवरतिंतम्‌ ॥ १५॥ 
म्टातपस्वी प्रभाकरने सत्र गोमि अन्रिगोघ्रकी ही शरेएठता 
स्थापित की । अक्के यज्ञि उनि प्रभावसे देवतानि 
धन प्रस्तुत किया था॥ १५॥ 
स ताष्ठु जनयामास पुश्रिकाखु सनामकान्‌ । 
दश्च पुनान्‌ मदात्मा स तपस्युप्रे रतान्‌ सदा ॥ १६॥ 


हरिंहापर्वं | 


पकभिदो ऽध्यायः 


१५९ 


, मात्मा प्राक रौद्राश्च पुत्रिका-धर्मके भवुसार 
प्रात हु कन्याभकि गमस एके दी नामबले दस पुरक 
जन्म दिया; जो सदा उग्र तपद्यार्मे तत्पर रहमेषारे थे ॥१६॥ 
ते तु गोधकय राजञस्नुषयो वेदपारगाः । 
खस्यघरेया इति स्याताः किं त्यध्निधनवर्जिताः ॥ १७॥ 
राजन्‌ | वे सव-के-तव वेदि पारङ्गत विद्वान्‌ तथा गो्- 
प्रवत॑क रषि हए । स्वस्त्यात्रेय नामसे उनकी ख्याति हुई 
परेदु मे अत्निगोत्री पिताके धनसे वञ्चितं रदे ( म्योकि 
पुभिका-धर्मरे अनुसार वे अपने नानाके पुत्र थे ) ॥ १७ ॥ 


क्ेयोस्तनयाश्चासंखय पव , मष्ठरथाः । 
सभानरशाक्षुषश्च परमन्युस्तथैव च ॥ १८ ॥ 

कधेयुके सभानरः चाष्चुष ओर परमन्यु-ये तीन पुत्र 
उलन हुए । तीनों ही महारथी ये ॥ १८ ॥ 


सभानरस्य पुरस्तु विदान्‌ काछानरो दपः । 
कारानलस्य धर्मकः खञ्जयो नाम वे सुतः ॥ १९॥ 

समानरका पुत्र विद्वान्‌ सजा कालनर हुआ । काल- 
नल्का धर्मश पुघ्र खञ्जय नामसे विख्यात हआ ॥ १९ ॥ 
खखयस्यामधत्‌ पुश्री षीरो सजा पुरस्जयः। 
शनमेजयो म्टारज पुरञ्ञयसुतो ऽभवघ्‌ ॥ २०॥ 

खश्षयके पुत्र वीर राजा पुरञ्जय हुए । महाराज | 
पुरषयक पश्र जनमेजव हुआ ॥ २० ॥ 


जनमेजयस्य राजर्घमेदाशालोऽभववत्‌ छतः । 

देषेषु स॒ परिशषातः प्रसिष्ठितयशा भुवि ॥ २१९॥ 
राजिं जनमेजयके पुत्र महारार हुए, जो देवताओंमि 

मी विख्यात ये ओर इस परथ्वीपर भी उनका यश फैला 

हुआ था॥ २१॥ । 

मष्ामना नाम सुतो. महादालस्य धार्मिकः । 

जहे षीरः सुरगणैः पूजितः श्युमहायशाः ॥ २२॥ 
मषटाशल्के धार्मिक पुत्रका नाम महामना था । वे एक 

वीर पुप्रके स्यम उन्न हए थे । महाग्रशस्वी महामनाका 

देवता मी सम्मान करते ये ॥ २२॥ 


महामनास्तु पुरौ दौ जनयामास भारत । 

उशीनरं च ध्म तितिक्ष, च मष्टावलम्‌ ॥ २२ ॥ 
भरतनन्दन । महामनाने द पूर्वको जन्म दिया-धर्मर 

उशीनर ओर महाबली तितिक्षु ॥ २३ ॥ 

उदीनिरस्य पतल्यस्तु पञ्च राजषिंवश्तजाः । 

गा कमी नवा दवौ पञ्चमी च दषद्धती ॥ २७ ॥ 
उरीनरकी पच पलिर्यौ थी, ज राजर्षियोकि कुलमे 

उत्पन्न हई थीं । उनके नाम दस प्रकार दै--दगाः कमी; 

नवाः द्वा ओर पचनी दृषद्वती ॥ २४] 


उशीनरस्य पुरस्तु पञ्च ताछ इुरोददाः ।, 


` तपसा धै सुमहता आता श्रूखस्य भारत ॥ २५॥ 


उनके गर्भे उशीनसे पोच पुष्र हुए जो अपने वंशक्री 
मर्यादाको ऊँ उठनिवल़ ये । भारत | वे अपने शद्ध पिता- 
के महान्‌ तपसे उत्पन्न हुए थे } २५] 
खगायास्तु खगः पुश्रः म्यां ्मिरजायत । 
नवायास्तु नधः पुधो दवौयाः सखुघतोऽभवत्‌ ॥ २६॥ 
गरगाके पुत्र द्ग ये, कृमीके गमते कृमिका जन्म हज 
थाः नवके पुत्र नेव तथा दर्बाके सुत्त हुए ॥ २६ ॥ 
हषद्वत्यास्तु संजक्षे दिबिरौशीनये चृपः। 
रिषेस्तु शिवथस्तात यौधेयास्तु अगस्य ह ॥ २७ ॥ 
तात | दषद्वतीके गर्भ॑ते उशीनरछुमार राजा शिबिका 
जन्म हु । शिबिको दिबिदेशाका ज्य मिला ओौर मको 
यौधेय प्रदेदाका ॥ २७ ॥ 
नवस्य नवरा ठु मेस्तु कृमिला पुरी । 
सुतस्य तथास्वघठा िबिपु धाल्निबोध मे ॥ २८॥ 
नवको नवराषटर तथा कृमिको कृमिटापुरीका राज्य प्राप्त 
हुआ । सुत्रतके अधिकार अम्बष्ठ देश आया । अब शित्रिके 
युत्नौका वर्णन सुनो ॥ २८ ॥ 
हिषे पुश्रा्वस्वारो वीरखैलोषयविश्वुताः । 
धृषद्भः खुबीर्ध मघ्रकः केकयस्तथा ॥ २९} 
दिनके चार वीर पुत्र हुए-इृषदर्भः उवीरः मद्रक 
तथा कैकय । ये चायो राजकुमार तीनो लोकौ विख्यात ये ॥ 
तेषां जनपदाः स्फीताः केकया मद्रकास्तथा । 
धृषदभौः खुषीरश्च तितिक्षोस्ते प्रजाः श्ण ॥ २०॥ 
इनके समद्धिखाटी जनपद भी दरन्दफ़ि नामसे प्रसिद्ध 
होकर दरषदर्म सुवीर, मद्रक तथा केकय कष्टलये । अव 
तितिक्षुकी संतत्तिका वर्णन सनो ॥ ३० ॥ | 
ठेतिक्षबोऽभवद्‌ राजा पूर्वस्यां दिशि भारत । 
उषद्रथो महाबाहुस्तस्य फेनः खतो ऽभघष्‌ ॥ ३१॥ 
भारत | तितिक्षुके पुत्र महाबाहुं राजा उषद्रथ हुए, जो 
पूवं दिश्षाके अधिपति थे । नके पुत्रका नाम फेन था ॥३१॥ 
फेनाव तु खुतपा जक्ञे खवः सुतपसो बलिः । 
जालो माञुषयोनौ तु स राजा काञ्चनेषुधिः ॥ ३२ ॥ 
केनसे सुतपाका जन्म हभ । सुतपाके पुत्र ब्रलि ये । 
दानवराज बलि दी मनुष्ययोनिम जन्म लेकर राजा विकर 
मामसे विख्यात हुए । वे सोनेका तरकस रखते थे ॥ ३२ ॥ 
महायोगी स तु बलिर्थभूव चपत्तिः पुरा । 
पुभारत्पादयामास पञ्च चंहाकरान भुवि ॥ ३२ ॥. 
पूर्वकाल राजा अलि महान्‌ योगी थे । उन्होनि इस 


११० 


भूतल्पर वंदा द्धि फरनेवलि पाचि पुपर उत्यन्न कयि ॥२३॥ 
अङ्गः प्रथमतो जके षङ्गः घुह्यस्सथैय घ । 
पुण्डः कलिङ्गश्च तथा घालेयं क्षत्रसुख्यते ॥ २४ ॥ 
उनम सतब्रसे पषटले अङ्घकी उत्ति हु । तदश्रात्‌ 
क्रमाः वङ्गः युकः पुण्ड तथां कलिश्च उत्यत्त हुए । ये सव्र 
लोग ब्रेय क्षतिय कलि ६ ॥ २४॥ 
चादयः घ्राह्मणाश्नैव चस्य षंदाकरा भुषि। 
घलेस्तु प्रह्मणां दत्ता षराः प्रीतेन भारत ॥ ३५॥ 
महायोगित्थमायुश्च कदपस्य परिमाणतः । 
संप्रामे पाण्यजेयत्वं धर्मे चैव प्रधामता ॥ २६॥ 
ब्ैलोकषयवर्शनं यैव प्राधान्यं प्रसये तथा । 
बटे चाप्रतिमत्वं पै धर्मतर्वार्थदुरतनम्‌ ॥ २७॥ 
खतुरो नियतान्‌ षर्णास्त्ं च स्थापयिता भुधि। 
दरयुकतो धिना साजा षष्टिः क्षान्ति पसं ययौ ॥ २८॥ 
लिक कुलम ग्रलिय ब्रह्मण भी हुए जो दस भूतषछपर 
उनके वणक शृदधि कसनेवाके ये । भरतनन्दन । बरह्माजीने 
बरलिपर प्रसन्न होकर उन्हं निप्नङ्कित वर वयि ये-त्ुम भष 
योगी होओगेः ठम्दारी आयु एक फल्पकी होगी, वम युम 
अजेय होभोगेः धर्मम ठम्दारी प्रधानता होगी; हम तीन 
टोरकोकी देखभाल फरोग (अथवा द्म तीनों लेोककी सभी 
ब्रत प्त्यक्षकी भोति देखोगे ) ठरम्हारी संतति श्रेष्ठ समक्ती 
जायगी, बलम वम्हारी समानता करनेवाख फोर्‌ न होगा 
ठम धर्मतत्वकरे शाता होगे तथा भूतल्पर चार वर्णो 
नियन्वणम रखकर उन मर्यादाके भीतर स्यापित करोगे ॥ 
भगवान्‌, बरक्षाजीके पसा कष्टनेपर राजा बलिक्रो ब्र 
षान्ति मिली ॥ ३५-३८ ॥ 
तस्य ते तनयाः स्वँ श्षप्रजा युनिपुङ्गपाद्‌ । 
सम्भूता ` दीर्घतपसो सदेष्णायां महीजक्तः ॥ २९॥ 
उनफे पे समी पुत्र क्षि्ज ये । भुनिवर दीर्धतपष्टारा 
रानी बुदेष्णाफे गर्भे प्रकट हुए ये | उनका बल महान्‌ था | 
घकिस्तानभिपिच्येष्ट पञ्च पुश्रातकत्मपान्‌ । 
एवाथः सोऽपि योगात्मा योगमाधित्य स प्रसुः ॥४०॥ 
अधृष्यः सर्वभूतानां काखपेक्षी चरन्नपि । 
काटठेन महता राजन्‌ स्थं च स्थानसुपागमत्‌ ॥ ४१॥ 
राजा ब्रलिने उन पोच निष्पाप पुर््रोफो बिभिन्न रण्यौ 
पर अमिष्रि्तं छरकफे अपनेको कृतार्थ माना । उनका मन 
सदा योगमै ल्णारहताथा।वे श्रोगकरा आध्रय ठे समस्त 
प्राणि्येकि ल्ि अजेय हो गये थे । फालकी प्रतीक्षा करते हुए 
सर्वत्र विचरते थे । राजन्‌ | दीर्घकाले पश्चात्‌ उन्द अपना 
स्थान ( उतल्टोक्र ) उपलब्ध हु ॥ ४०-४१ ॥ 
तेषां जनपदाः पञ्च अङ बदाः सदुह्यकाः। 
कलिङ्गाः पुण्ड्काश्चैव प्रजास्त्वङ्गस्य मे श्णु ॥ ४२॥ 


ओमष्टाभारते सिरुभागे 


[ शरिषंरो 
उनके पचि पुरौ अधिकरास्मै जो जनपद थे, उनके 
नाम एस प्रकार है-अङ्ग, यङ्ग, सु्ष, फलिङ्ग ओर पुण्ड्रक । 
अत्र त॒म मुक्षसे अङ्ककी पंतार्नौका वर्णन सुनो ॥ ४२॥ 
जङ्गपुत्रो महामासीद्‌ राजो दधिवा्नः । 
द्रधिधाहनपुषस्छ यजा दिधिरथोऽभयत्‌ ॥ ४१ ॥ 
अज्के पुध्र महान्‌ राजाभिराज दधिवाहन भे ओर दभि- 
वाहनके पुध्र राजा दिविरथ दूए ॥ ४२ ॥ 
युश्रो दिविरथस्यासीच्छक्रतुटयवराक्रमः। 
विद्धान्‌ धर्मरथो नाम तस्य विष्रथः सुतः" ४४॥ 
दिविरथके पुत्र इृ्छतस्य पराक्रमी ओर विद्वान्‌ ये। 
उनका नाम धर्मरथ धा । धर्मरथके पुत्र चित्ररथ हुए ॥५४५॥ 
तेग धित्रस्थेनाथ तदा चिष्णुपे गिरी) 
यज्ञता स्ह शक्रेण सोमः पीतो महात्मना ॥ ४५॥ 
राजा चिप्ररथ जब्र विष्णुपदे पर्वतपर यश करते थे, उस 
समथ उन महामना नेन श्रनद्रफे साथ बैठकर सोमपान 
करिया था॥ ५५॥ 
भथ चित्ररथस्यापि प्रो ददार्थोऽभवषत्‌ । 
छोमपाद्‌ ति ख्यातो यस्य शास्ता पुताभयद्‌॥ ४६॥ 
चित्ररथे पुत्र दद्रारथ दु) जिनफा दुसरा नाम छोम- 
पाद था तथा शान्ता जिनकी पुष्री थी | ४६॥ 
तस्य धादारयिर्धीरशचतुरो महायदहाः। 
शष्यग्शङ्गप्रसप्रिस जके कुलविषधनः ॥ ४७॥ 
उन ठोमपाद यां ददारथफे पुध्र मष्टायश्स्वी बीर चतु- 
र्द्गषहुएः जो श्रप्यश्टङ्क सनिकी एपसे उन्न हुए ये। 
चतुरङ्ग अपने कुलफी शृद्धि करनेवलि थे ॥ *७ ॥ 
चमुरङस्य पुग्रस्तु पृथुखाक्त इति स्मृतः । 
पृथटाक्षघ्ुतो राजञा षस्पो नाम महायशाः ॥ ४८॥ 
चतुरङ्के पुत्र प्रथुटाक्ष के गये | पृयुत्मक्षकफे पुष 
मष्टायदास्वी राजा चम्प हुए ॥ ४८ ॥ 
खम्पस्य तु पुरी स्पा या माकिन्यभवद्‌ पुरा । 
पू्णभदपसदरैन श्य॑ङोऽस्य उतोऽभषत्‌ ॥ ४९॥ 
चम्पफी राजधानी चम्पा थीः जो पृष्ठे मालिनीके नामसे 
प्रसिद्ध थी । चम्पके पुर ह्यह हए, जो पूर्णभद्र नामक 
युनिकी कृपासे उत्पन्न हए ये ॥ ४९ ॥ 
ततो वैभाण्डकिस्वश्य घारणं शक्रवारणम्‌ । 
भवतारयामास मषी मन्तैषौहनसुलतमम्‌ ॥ ५० ॥ 
विभाण्डकयपुत्न ऋष्यश्द्ने हर्यह्की सवारीके व्यि इन्द्र- 


के उत्तम वाहन गजराज पेरावतको मन्द्रा स्वर्गसे भूतल- 
पर उतारा था ॥ ५० ॥ 


हरिवंशपवं | 


शै 


र्यस्य तु दायादो राजा भद्ररथः स्खरतः। 
पुत्रो भद्ररथस्यासीद्‌ बृदत्कमो प्रजेश्वरः ॥ ५१॥ 
हर्यङ्गके पुत्र राजा भद्ररथ कहै गये ई । मद्रस्थकरे पुत्र 


राना बृहत्कर्मा ये ॥ ५१ ॥ 


बृहव्दमंः सुतस्तस्य तस्माजक्षे बृहन्मनाः । 


` ब्रृ्न्मनास्तु राङेन्द्र जनयामास वे सुतम्‌. ॥ ५२ ॥ 


नाम्ना जयद्रथं नाम यस्माद्‌ रडरथो शपः । 
आसीद्‌ दढरथस्यापि विश्वजिनमेजय ॥ ५३ ॥ 
इृदत्कमवि पुर वृहदर्म थे, उनसे वृहन्मनाका जन्म 
हआ । राजेन्द्र | बृहन्मनाने जयद्रथ नामक पुच्रको जन्म दियाः 
जिससे राजा दढरथकी उयत्ति हुई । जनमेजय [ दृढरथकरे 
पुत्र विद्वनित्‌ हुए ॥ ५२-५३ ॥ 
दायादस्तस्य कणेस्तु विकर्णस्तस्य चात्मजः । 
तस्य पु्रद्रातं त्वासीदङ्ञानां कुलवर्धनम्‌ ॥ ५४ ॥ 
विदवजित्‌के पुत्र कर्णं तथा कर्णक पुत्र विकर्णं हुए । 
बिकर्णके सौ पुत्र थेः जो अद्ध्वशाकी वृद्धि करनेवलि ये ॥ 
बृ्द्दर्भखतो यस्तु राजां नाम्ना बृहन्मनाः । 
तस्य पत्नीद्धयं चासीच्चेयस्येते खते शमे । 
यशोदेवी च सत्या च ताभ्यां वंदास्तु भिद्यते ॥५५॥ 
बृहदेमंका जो ब्ृहन्मना नामसे प्रसिद्ध पुत्र था उसकी 
दो पलिर्यो थीं । ये दोनों ही चेदिराजकी सुन्दरी कन्यर्ण् 
थी | एककरा नाम यन्लोदेवी था ओर दुसरीका सत्या । उन 
दोनेकरि दवारा उस वदाम मेद हो गया अर्थात्‌ दोर्नौकी 
प्थक-पथक वंदा-परम्परा चली ॥ ५५ ॥ 
जयद्रधस्तु राजेन्छ यत्नोदेव्यां व्यजायत । 
बरहमक्षरोत्तरः सत्यां विजयो नामं विश्रुतः ॥ ५६॥ 
राजेनद्र ! वृहन्मनाका जो जयद्रथ नामक पुत्र थाः वह 


द्वारिक ऽध्यायः 


१९१ 


यशोदेवीके गभैते उन्न हुआ था तथा उनका दूसरा 

पुज, जो विजय नामसे विख्यात था, सत्यक पेरते पैदा हज 

था । चह शान्ति आदि युरणोमि ब्राह्णेसि ओर शौर्य आदि 

गुणोमे क्षत्रियौसे भी उक्ष था ॥ ५६ ॥ 

विजयस्य धृतिः पुरस्तस्य पुश्रो धत्तः । 

ध्रतत्रतस्य पुरस्तु सत्यकमौ महायद्याः ॥ ५७॥ 
विजयका पुत्र धृतिं ओर धृतिका पुत्र धृतव्रत था। 

धृतव्रतक्र पुत्र महायशस्वी सत्यकर्मा हुए । ५५७ ॥ 

सत्यकर्मसुत्चापि सूतस्त्वधिरथस्तु वै । 

यः कर्णं प्रतिजग्राह ततः कर्णस्तु सूतजः ॥ ५८ ॥ 


सत्यकर्माका पुत्र अधिरथ नामक सूत हु) जिसने 
कर्णकरो गोद लिया था । इसीय्ि कर्णको सूतपुत्र कहा जता दै ॥ 
पतत्‌ ते कथितं सर्वं कर्णं प्रति महाबलम्‌ । 
कर्णस्य वृषसेनस्तु वृषस्तस्यात्मजः स्यतः ॥ ५९ ॥ 
राजन्‌ ! यद सत्र मेने वुम्दे महावली कर्णके विषये 
ताया दै । क्ण॑का पुर इषसेन हुआ ओर दरषतेनका पुन 
वृष कदा गमया दै ॥ ५९ ॥ 
पते ऽङ्धवंशजाः स्च राजानः कीर्तिता मया । 
सत्यव्रता महात्मानः प्रजावन्तो महारथाः ॥ ६० ॥ 
ये सत्र अङ्गवेशी राजा मेरे दार बतयि गये ई; जो सत्य- 
त्रतीः महात्मा, पुचरवान्‌ तथा महरिथी ये ॥ ६० ॥ 
ऋचेयोस्तु मक्षाराज रद्धाश्वतनयस्य ह । 
श्यणु वंशमचुप्रोकं य्न जातोऽसि पार्थिव ॥ ६९ ॥ 
महाराज ! प्रथ्वीनाय ! अव मै रौद्राश्वकुमार ऋ चेययुके 
वंश॒का वर्णन कर्गाः जिसमे तुम्हारा जन्म हज है । ठम ` 
ईसे सुनो ॥ ६१ ॥ 


इति श्रीमहाभारते खिकभागे इरिवंगे दरिवंदापर्वणि उश्षयुवंशाल॒कीतनं नाम पए्कव्रि्ोऽध्यायः ॥ ३१ ॥ 


` इख प्रकार श्रोमह!भारत खिरुभाग दिशे अन्तर्मत्‌ इरिविशप्लमे 


कुक्ेयुवेश्षका वणेनविषयक इकतीसर्व अध्याय्‌ पुरा हुआ ॥ ३९ ॥ 


9 1 । 


दानिशोऽध्याय 
पूरुफे व॑श्फे अन्तर्गत छवेयुकी वंश-परसम्परा--अजमीटवंश, पाश्चारु एमं सोमक्षंस 
फरोरव-वंश तथा तुवेसु, दद्य ओर अतुकी संततिका वर्णन 


चैश्रम्पायन उवाच 
अनाधृष्यस्तु राजर्षिछैचेयुश्चैकरद्‌ सखतः 
चेयोज्वलना नाम भयौ वै तक्षकात्मजा ॥ २ ॥ 
वेशस्पायनजी क्ते है--जनमेजय ! राजिं ऋचेयु 
एकच्छत् सम्रार्‌ माने ये दह | वे दूसर्ोके स्यि अजेव ये । 
ऋचेयुकी पत्नीका नाम॒ ज्वलना थाः जो तक्षक नागकी 
प्त्रीथी॥९॥ 


तस्यां स देव्यां राजर्धिरमहिनायो महीपतिः ! 

मतिनारश्ताशासंख्जयः परमधार्मिकाः ॥ २.॥ 

तंखुराद्यः भरतिरथः सुवाष्ुश्चैव धामिकः । 

गीरी कन्या च विख्याता मान्ध(तुजननी श्यभा ॥ ३ ॥ 
महारानी ज्वल्नाके गर्मसे पृथ्वीपति राजबिं मतिनारका 

जन्म दुखा । मतिनारके तीन परम धर्मात्मा पुत्र हुए-प्रथम 

तयु, दूसरे प्रतिरथ ओर तीसरे ' धर्मात्मा सुतराहु । मतिनारके 


११२ 


श्रीमहाभारते सिकभागे 


` [ रवं 


एक कन्या मी हुई थौ, जो गौरी नामते विख्यात थी । श्म- 
लक्षणा गौरी ही राजा मान्धाताकी जननी दई ॥ २-३ ॥ 
सर्व वेदविदस्तत्र ब्रह्मण्याः सत्यवादिनः। 
सवे तासा वलिनः सरव युद्धविल्लारदाः ॥ ७ ॥ 
मतिनारफे समी पुत्र वेदवेत्ता व्राद्यणमक्तः सत्यवादी; 
अल्रविध्राके विद्धान्‌ चख्वान्‌ तथा युद्धक्रुखल थे ॥ ४ ॥ 
धुजः श्रतिरथस्याखीत्‌. कण्वः समभवन्मरपः । 
मेधातियिः सुतस्तस्य यस्मात्काण्वायना दिजाः॥ ५ ॥ 
मतिनारके दूसरे पुत्र प्रतिरथके वेटेका नाम कण्व था | 
कण्व राजा ये } कण्वके पुत्र मेधातिथि हुए, जिने काण्बायन 
ब्राह्णौकी परम्परा प्रचलित हुई ॥ ५ ॥ 
ई्लिनी भृप यस्यासीत््‌. कन्या वै जनमेजय । 
ब्रह्मवादिन्यधि खी च तंसुस्तामभ्यगच्छत ॥ ६ ॥ 
राजा जनमेजय { जिनकी कन्या ईलिनी नामे प्रसिद्ध 
हुई यीः वे ईलिनि नामक नरेद ब्रह्मवादी ब्राह्मणसमुदायमे 
उत्कृष्ट माने जाते ये । उनकी उस ईिनी नामक कन्याको 
तेसुने पल्नीरूपमे प्राप्त करिया ॥ ६ ॥ 
तंसोः खुरोधो राजर्पिधंमनेभो महायशाः । 
ब्रह्मवादी पराक्रान्तस्तस्य भार्योपदानवी ॥ ७ ॥ 
उपदानवी ख॒तोँस्खेभे चतुरस्त्वैलिकात्मजान्‌ । 
दुष्यन्तमथ सुष्मन्तं प्रवीरमनघं तथा॥ ८ ॥ 
तंसुके मदहायशस्वी राजग्रिं सुरोध हुए, जो धर्मक प्रवर्तक 
नेते धर्मनेत्र कदखाते थे । वे ब्रह्मवादी ओौर पर- 
क्रमी ये । उनकी पत्नी उपदानवी थी 1 उपदानवीने चार 
पुत्र प्राप किये, जो दुष्यन्त, सुप्मन्तः प्रवीर ओर अनधके 
नामसे विख्यात ये । ये चायो ईलिनीकुमार स॒रोेध या 
धर्मनेत्रके पुत्र ये ॥ ७-८ ॥ 
दुष्यन्तस्य तु दायादौ भरतो नाम वीर्यवान्‌ । 
ख सर्वदमनो नाम नागायुतबसख महान्‌ ॥ ९ ॥ 
दुष्यन्तके पु्का नाम मरत था ! वे वदे पराक्रमी ये। 
सवका दमन करके कारण उनका दूसरा नाम सर्वदमन भी 
या । महान्‌ कीर भरतम द हजार दाथियोंका बट था | 
चक्रवती खतो जक्षे दुष्यन्तस्य महर्मनः। 
हाकुन्तखायां भरतो यस्य नाम्ना स्थ भारताः ॥ १०॥ 
` * महात्मा दुष्यन्तके वीर्य ओर खकुन्तखके गर्भे चक्रवती 
भरत पुत्ररूपर्मे उत्पन्न हुए. ये, जिनके नामपर तुमलोग 
भारत कहल्ति दो ॥ १०॥ 
दु्यन्तं भ्रति राजानं वागुवाचाशरीरिणी । 
माता भख पितुः पुध्रो येन जातः ख पव सः॥ ११॥ 
भरख पुत्रं दुष्यन्त मावमंस्थाः शङन्वखाम्‌ । 


रेतोधाः पुत्र उश्नयति नरदेव यमक्षयात्‌ ॥ १२॥ 
त्वं चास्य धाता गर्भ॑स्य सत्यमाह हाकुन्तखा । 

( कते ईै-दुभ्यन्तने तपोवने जाकर शकुन्तलाके साय 
गान्धर्व.विवाह किया था ओर अपनी राजधानीको छीय्कर 
उसके विषयमे कुछ बताया नदीं था | जव शङन्तला भरतको 
टकर दुष्यन्तके य्ह गयी; तव वे उसे पदचानने्े भूल करने 
स्मो । उस मय ) आकाशवाणीने राजा इुष्यन्तको सम्बोधित 
करके कदा--ुष्यन्त | मातः तो केवल चमदेकी धौँकनीके 
समान दैः पुत्रपर अधिकार तो पिताक द्वी टै । पुत्र जिसके 
द्वारा जन्म ग्रहण करता दै, उषीका स्वरूप होता है । ठम इस 
पुत्रका पालन-पोषण करो, शकघुन्तल्यका अपमान मत करो । 
नरदेव | अपने ही वीयसे उत्पन्न हमा पु अपने पिताको 
यमलोकठे ( निकालकर खर्गलोकको ) ठे जाता दै । (ख 
पुत्रके आधान करनेवाले द्दीं दो-शङुन्तखाने यह वात ठीक 
दी कटी दै ॥ १९-१२१ ॥ 
भरतस्य बिनष्ेषु तनयेषु मक्षीपतेः॥ १३॥ 
मावृणणां वात कोपेन मथा ते कथितं पुरा । 

राजा भरतके करद पुत्र होकर मर गये | तात | मातार्ओं- 
के क्रोधे एेता हुमा था । यह त्रात मँ वमद पदटे ( आदिः 
पर्वे ) वता चुका हं ॥ १३१ ॥ 
शृ्स्पतेगाङ्गिरसः पुरो राजन्‌ महामुनिः । 
संक्रामितो भस्दाजो मर्द्धिः क्रतुभिर्विभुः ॥ १४॥ 

राजन्‌ { भरतके यमे अये हुए देवताओनि भरतके 
लि अद्गिरानन्दन बृ्स्पत्तिजीके पुत्र मदाप्रुनि मरदाजको ही 
पुत्र बनक्रर दे दिया ॥ १४॥ 
उरेवोदाहरन्तीमं भरद्ाजस्य धीमतः । 
धर्म॑संक्रमणं चापि मरद्भिर्भर्ताय वै॥ १५॥ 
अयाजयद्‌ भरद्वाजो मरद्धिः क्रतुभिर्हिं तम्‌ । 
पूवं तु विये ठस्य ते वै पुध्रजन्मनि ॥ १६॥ 
दवोऽथ वितथो नाम भरद्वाजद्खुतोऽभवत्‌ । 

शठी प्रसज्खमे बुद्धिमान्‌ भरद्वाजके धर्म॑वक्रमणकी यद्‌ वाव 
कटी जाती है । मसद्र्णेनि मरतको पुत्ररूपमै जव भरद्राजको 
ही अर्पित कर दिया, तव भरद्राजने भरते देवताओंखहित 
यज्का अनुष्ठान करवाया । इसके पदे भरतके पुन्न-जन्मका 
सारा प्रयास वितथ ( व्यर्थं ) हो चुका था । मरद्ाजके प्रयसे 
जो पुत्र उत्पन्न हुमा, उखका नाम वित्तय हुमा ॥१५-१६१॥ 
ततोऽथ पितथे जाते भरतस्तु दिवं ययौ ॥ १७॥ 
वितथं चाभिषिच्याथ भस्दाजो वनं ययौ! 

वितथकां जन्म टो जानेपर भरत स्वर्गवासी हो गये। 
तत्पश्चात्‌ विंतथका राज्यामिषेक करके मरद्राजजी भी वनम 
चले गये ॥ १७३ ॥ 


- द 


| हरिवंशपवं ] 


स राजा वितथः पुत्राञ्जनधामास पञ्च वे ॥ १८ ॥ 
सुरं च खुदोतारं गयं गग तथैव च । 
कपिलं च महात्मानं ख॒दो्रस्य सखुतद्धयम्‌ ॥ १९॥ 
कारिकश्च महाखत्वस्तथा गृत्समति्चपः। 
तथा गृत्समतेः पुत्रा ब्राह्मणाः क्षत्निया विद्धाः ॥ २० ॥ 
कारिकस्य तु किय पुतो दीर्घतपास्तथा 1 

राजा वितथने पोच पुत्र उत्यच् क्रियि--स॒दोचः सुषटोताः 
गय, गर्गं तथा महात्मा कपिर । सुहो्रके मी दो पुत्र हृए- 
महान्‌ शक्तिखाखी कारिक तथा राजा यृत्समति । गत्छमतिके 
पुत्र ब्राह्मणः क्षत्िय ओर वैद्य तीन वणौके ोग दए । 
कारिकके दो पुत्र ये-कशिय ओर दीर्घतपा ॥ १८-२०३ ॥ 


आजमीढोऽपरो वंशः श्रूयतां पुरुषषभ ॥ २१॥ 
खहोधरस्य वृष्टत्‌ पुश्रो बृ्टतस्तनयास्रयः। 
अजमीढो द्िमीदश्च पुरमीढश्च वीर्यवान्‌ ॥ २२॥ 
पुरुषप्रवर | अव्र आजमीढ नामक वृसरे कंशका वणंन 
सुनो -पूवोक्त राजा सुहोत्रके एक तीसरा पुत्र ओर था बृहत्‌ । 
वृहत्के तीन पुत्र हुए-सजमीटः द्विमीढ ओर पराक्रमी 
पुरमीढ ॥ २१२२ ॥ 
(अजमीढस्य पल्यस्तु तिखरो वै यदरासखान्विताः। 
नीलिनी केशिनी चैव धूमिनी च वराक्षना ॥ २३ ॥ 
अजमीढकी तीन छिर्यो थी । तीनो ही बड़ी यशखिनी 
थीं | उनके नाम ये-नीलिनीः केरिनी ओर लिर्यमि श्रेष्ठ 
धूमिनी ॥ २३ ॥ 


अजमीढस्य नीखिन्यां सुशान्तिरुदपद्यत । 
पुरुजातिः खुरान्तेस्तु बाह्याश्वः पुशजातितः ॥ २७ ॥ 
बाह्याश्वतनयाः पञ्च चभूुरमसेपमाः ॥ २५॥ 
अजमीढके नीलिनीके गर्भसे सुशान्ति नामक पुर हुमा । 
णन्तिसे पुरुजाति ओर पुखजातिसे वाह्याश्वका जन्म हज । 
बाह्यश्वके पोच देवोपम युत्र हुए ॥ २४२५ ॥ 
सुदैकः खञजयश्रैव राजा बृहदिषुः स्वः ¦ 
यचीनर्ध विक्रान्तः रमिलाग्वश्च पञ्चमः ॥ २६॥ 
उनके नाम इस प्रकार ईदै-द्ररः खयः राजा वृष्ट 
दि, पराक्रमी यवीनर तथा पौरवे मिश्च ॥ २६ ॥ 
पथ्चेते रक्षणायारं देशानामिति विश्वाः । 
पञ्चानां विद्धि पञ्चालान्‌ स्पफीतैर्जनपदेश॑तान्‌ ॥ २७॥ 
य पोच अपने अधिकारम अये हुए देदोकी रष्तके 
ल्ि अलं ( समर्थ ) ये, इसल्ि समद्ि्ाली जनपदे युक्त 
उन देको पञ्चाल समद्नो ॥ २७ ॥ 
अलं संरक्षणे तेषां पञ्चाला इति विश्रुताः 
सुद्रलस्य तु दायादो मौदल्यः सुमहायशाः ॥ २८ ॥ 


दाचिदो ऽध्यायः 


११३ 


००५००७०५० 


सर्वं पते महात्मानः क्षत्रोपेता द्विजातयः । 
पते शङ्धिरसः पश्चं संधिताः कण्वमौदरलाः ॥ २९ ॥ 
उन देर्शोकी रक्षाके स्यि अं होनेसे ये र्पो वीर 
पञ्चाल नामसे विख्यात हुए । मुदल पुत्र महायशसवी मौदधस्य 
ये । ये सव-के-सव महात्मा क्षाचधर्मते युक्त ब्राह्मण ये । ये 
अद्धिराके पक्षका आश्रय लेकर कण्वमौद्रल कदरयि ॥२८-२९॥) 
मोद्रलस्य खुतो ज्येष्ठो व्रह्मषिः खुमहायश्णः 
इन्द्रसेनो यतो गर्भ वेध्यद्वं प्रत्यपधत ॥ २० ॥ 
मौद्भलके ज्येष्ठ पुत्र महायदासी ब्रहप्रिं इन्द्रसेन हुए 
जिने कयश्वका जन्म हुआ ॥ ३० ॥ 
वध्यदवान्मिथनं अक्षे मेनकायामिति श्रुतिः । 
दिवोदासश्च राजर्षिरद्र्या - च यश्ाखिनी ॥ ३९ ॥ 
वभ्यश्वसे मेनकाके गर्भ॑से एक पुज ओर एक कन्याका 
जन्म हुआ, एसी प्रसिद्धि दै । पुच्रका नाम दिवोदा था; 
जो राजिं शवं ब्रहरषिं ये । कन्या यरखिनी अहल्या थी ॥ 
शरद्धतस्तु दएयादृम्ल्या समसूयत । 
दातानन्वसूषिशचेष्ठं तस्यापि सखम्टायश्शाः ॥ २२ ॥ 
पुः सत्यधृतिनौम धचुचेदस्य पारगः । 
अहल्या महिं शरदाम्‌ ( गौतम ) की पत्नी थी ! उखने 
गौतमके पुज सुनिभ्रेष्ठ शतानन्दको जन्म दिया । रतनन्द- 
के भी एक महायशस्वी पुच उत्पन्न हुआ, जिसका नाम सत्य- 
धृति था । (ये सत्यधृति भी अपने पितामहके समान रारदयान्‌ 
कलते थे ।) सत्यधति धनुवैदके पारङ्गत विद्वान्‌ थे॥२२३॥ 
तस्य॒ सत्यधृते रेतो द्ृषटष्लरसमध्रतः ॥ ३२ ॥ 
अवस्कन्नं शरस्तम्बे मिथुनं समपद्यत । 
कृपया तञ्च जग्राह शन्तनुश्रंगयां गतः ॥ २४ ॥ 
धक दिन अपने सामने एक अप्छराको उपस्थित देख 
सत्यधृति ८ शरद्मान्‌ ) का वीयं स्वल्ति होकर सरकंडकि 
समूदपर गिर पड़ा ! उससे एक चालक ओर बालिका जुड़ीं 
संताने उ्यन् हुई । उस समय राजा शन्तनु रिकार खेरने- 
के ल्यि वनम गये हृ ये । उन्होने कपापूर्वैकं उन दोनों 
बालर्कोको ले लिया ॥ ३३-२४ ॥ 
रपः सरतः स वै तस्माद्‌ गोतमी ख पी वथा । 
पते शारदताः भोक्ता पते ते गोतमाः स्मृताः ॥ ३५ ॥ 
कपापूरवंक महण करमेके कारण बालकका नाम कृप ओर 
उस गौतम-बालिकाका नाम ज्ृपी हुमा ! ये शतानन्द, सल्य- 
धृति ओर कृप शारद्वत के गये तथा ये गौतम मी 
कते दै ।॥ ३५ ॥ 
अत ऊर्व प्रवक्ष्यामि दिवोदासस्य संततिम्‌ । 
विवोदासस्य दायादो जक्रपिमियुर्छंप ॥ २६॥ 
मैश्रायणस्ततः सोमो मैभ्ेयास्तु ततः स्छरताः । 
पते हि संभिताः पक्षं क्षत्रोपेतास्तु भार्गवाः ॥ ३७ ॥ 


११४ 


नरेर ! अव म दिवोदासकी संततिका वर्णन कल्गा | 
दिवोदास पुत्र ब्रह्यपिं मित्रयु दए । मित्रयुसे मंत्रायणका 
जन्म हुमा 1 रैनावणके सोम हुए । सोमके वंदा भेत्रेय कदे 
गये हई । ये भार्गव-ध्का आश्रय लेकर क्षपघ्नोपेत भार्गव 
कटत्ये ॥ ३६-२७ ॥ 
आसीत्‌ पञ्चजनः पुरः खञ्जयस्य महात्मनः । 
खतः पञ्चजनस्यापि सोमदतो महीपतिः ॥ ३८ ॥ 


मदात्मा सृञ्जयके पञ्चजन नामक पुत्र हुभा आर पञ्चजन- 
के पुत्र ध्रथ्वीपति सोमदत्त दए ॥ ३८ ॥ 
सोमदत्तस्य दायादः सददेदो मदायश्पः। 
खहदेवसुतश्चापि सोमको नाम पार्थिवः ॥३९॥ 
सोमदत्तके पुत्र मदायशसवी सददेव ये ओर सदेवके 
पुत्र राजा सोमक्र हुए ॥ ३९ ॥ 
अजमीढात्‌ पुनजौतः क्षीणवेशे तु सोमकः । 
सोमकस्य सुतो जन्तुर्यस्य पु्रश्यतं वभौ ॥ ४०॥ 


अजमीढ वेशी सहदेवे सोमकका जन्म उस अवद्या 
हु जवर क्रि उनकी चंरा-परम्परा भीण दो ची थीं | सोमक- 
कै पुत्रका नाम जन्तु था । जिसके खानपर सोमक्के सी पुव 
हो गये ॥ ४० ॥ 
चेषां यवीयान्‌. पृषतो द्रुपदस्य पिता प्रसुः । 
- शृष्ठधुम्नस्तु द्रुपदाद्‌ धृष्टकेतुश्च तस्तः ॥ ४१॥ 
अजमीढाः स्म्रता शेते महात्मानस्तु सोमकाः । 
पुत्राणामजमीढस्य सोमकत्वं महात्मनः ॥ ४२॥ 


उनम शवे छोटे ये प्ररत; जो राजा द्ुपदके प्रमावशाटी 
पिता ये| दुपदते धृषटयुञ्न ओर ृषुश्से धृष्ठकेठका जन्म हुआ । 
ये महामनस्वी क्नरिय अजमीढ ओर सोमक कदे गये ईह । महा- 
मना अजमीढके संतर्नोकी दी सोमक संशा हुई ॥४६-४२॥ 


मठिषी त्वजमीढस्य धूमिनी . पुत्रगृद्धिनी 1 

सीया तच पूर्वेपां अननी पृथिवीपते ॥ ४३ ॥ 
राजा अजमीढकी जो धूमिनी नामवाली तीसरी रानी 

यी? उनके मन्म पुत्रकी वड़ी रखा थी | पृथ्वीनाथ [वे 

ही ठम्दारे पूर्वर्ोकी जननी हई ॥ ५३ ॥ 

सातु पु्ार्थिनी देवी वतचर्यासखमन्विता। 


ततो चायुतं तप्त्वा वपः परमदुश्चरम्‌ ॥ ४४ ॥ 
दत्वर्नि विधिवत्‌ खा तु पविश्रमितभोजना । 


अग्निदोभङ्दोप्वेन खुष्वाप जनमेजय ॥ ४५॥ 


# सोमकने जन्तुको यक-पश्यु बनाकर एक यक का, जिषसे 
उनकी सौ लियेकि गर्भे पक-एक करके सौ पुत्र उत्पन्न हुए । 
( देखिये महाभारतः वनपवं, १२७-१२८ अध्याय ) 


श्रीमहाभास्ते विकभागे 


{ 


[ हस्व 
जनमेजव ! पुत्रकी अभिलपरा स्खनेवी धूमिनी देवी 
त्रतका पालन करने र्गी । वे दस हजार वर्षोतक्र अत्यन्त 
दुष्कर तपस्या करती हद विधिपूर्वक अग्निम आहुती देती, 
पवित्रतापूर्वक परिमित भोजन करतीं गीर अग्निदोत्रकेकु्गो- 
पर दी सोती ॥ ८४-४५ ॥ 


धूमिन्या स तया देव्या त्वजमीढः समेयिवान्‌ । 

छश्च संजनयामास धूमवणं खुदद्तनम्‌ ॥ ४६ ॥ 
तदनन्तर राजा अजमीढने देवी धूमिनीके साथ समागम 

किया । इससे उन्टनि श्रृ नामक पुत्रको जन्म दिया। 

ऋध धूम्रके समान वर्णवले एवं न्दर दर्शनीय पुरुष ये ॥ 

ऋक्षात्‌ संवरणो जके कुरः संवरणात्‌ तथा । 

यः प्रयागादतिक्रम्य ऊुरक्षे्रं चकार ट 1॥ ४७ ॥ 
करृ्षसे संवरण ओर संवरणसे कुस उत्पन्न हए जिन्दनि 

प्रयागे जाकर कुरकषेत्रकी स्थापना की ॥ ४७ ॥ 

तदै तत्स महाभागो वर्षाणि सुवहन्यथ । 

तप्यमाने तदा शक्रो यत्रास्य वरदो वभौ ॥ ४८॥ 
मदामाग कुख्ने उस क्षेत्रे बहुत पेर्पोतकं तप क्रिया । 

उनके तप करते समय वरदायक्र भगवान्‌ इन्द्रने वदो जाकर 

उर्दं वर प्रदान किया ॥ ४८ ॥ 


पुण्यं च रमणीयं च पुण्यङृद्धिर्निपेवितम्‌ । 
तस्यान्ववायः सुमहा स्तस्य नाम्ना स्थ कौरवाः ॥४९॥ 
वद पवित्र एवं रमणीय क्षेत्र पुण्वात्मा्ओद्धारा सेवित 
दै। कुरुका वंश बहुत बढ़ा है । वुमलोग कुर्क दी नामसे 
कौर कलते हो ॥ ४९ ॥ 
कुरोश्च पुत्राश्चत्वारः सुधन्वा सुधनुस्तथा । 
परसक्िच्च महावाहुः प्रवरश्चारिमेजयः ॥ ५० ॥ 
कुस्के चार पुत्र हए-सखधन्वा, सुधनु, महाबाहु परी- 
क्षित्‌ ओर श्रेष्ठ वीर असमिजय ॥ ५० ॥ 
"सुधन्वनस्तु दायादः सुक्षेध्ो मतिमांस्ततः। 
च्यवनस्तस्य पुरस्तु राजा धमौथंकोविदः ॥ ५१ ॥ 
सुधन्वाके पुत्र पुदोत्र हु । सुहोत्रके मतिमान्‌ तथा मति. 
माने पुत्र राजा च्यवन एः जो ध्म ओर अर्थके शाता ये| 
च्यवनात्‌ रतय्स शटा यक्षैः ख धर्मवित्‌ । 
विश्चुतं जनयामास पुष्मिन्द्रसमं रपः ॥ ५२॥ 
च्यवने कृतयज्ञ हुए । उन धर्मज्ञ मरेदाने यज्ञ करके 
इन्द्रे समान सुविख्यात पराक्रमी पुत्रको जन्म दिया ॥५२॥ 
चैयोपरिचरं वीरः वसं नामान्तरिष्चगम्‌ । 
चेचयोपस्चिराजक्षे भ 
चेदयोपरिचराक्षे गिरिका सप्त मानवान्‌ ॥ ५२ ॥ 
उसका नाम या उपस्विर वसु । वे वदु चेदि देदके नि-- 
वासी थे ओर आकागमार्गेते चलते थे । चेदिदेशीय उप- 


हरिवंशं ] - 


दवाधिशो ऽध्यायः 


` ११५ 


सविर षसुसे उनकी पत्नी गिरिकाने सात मनु््योको उत्यन्न करिया ॥ 


महारथो मगधराड्‌ विश्वतो यो शृ्व्रथः। 
प्रत्यग्रहः कुशाश्रैव यमादर्मणिषाहनम्‌ ॥ ५४ ॥ 
मारश्च यदुभैव मत्स्यः काटी च सस्मः। 

उनम प्रथम संतान थे सुषिख्यात महारथी राजा बृहद्रथः 
जो मगध देहके अधिपति ये । दुसरे पुत्रका नाम प्रत्यग्रह 
था | तीसरे रजा छश थे, जिन्दै मणिषा््न भी कहते दै । 
चौथे मारतः पोच यतु ओर छठे श्रे्ठतम पुरुष मत्स्य 
` भे | सातषीं संतान कन्या थी, जो काली (या सत्यवती ) कषटलायी | 


बृहद्रथस्य धायाव्‌ः कुशाप्रो नाम धिश्चुवः ॥ ५५ ॥ 
कुशाप्रस्यात्मजो विद्वान्‌ धृषभो नाम वीर्य॑घान्‌ । 
बृहद्रथका पुर कुशाग्र नामसे विख्यात हुभा । कुशाप्रे 
पुर दषम पे, जो विद्वान्‌ ओर ्रल्वान्‌ थे ॥ ५५१ ॥ 
घूषभस्य तु दायादः पुष्पवान्नाम धार्मिकः ॥ ५६ ॥ 
षरायादस्वस्य विक्रान्तो समा सव्य्िसः ससुतः ॥५७॥ 
दृषमकरा पुत्र धर्मात्मा पुम्यवान्‌ धा । उसफे पुत्र परा- 
क्रमी राजा कत्यहित दूए ॥ ५६.५७ ॥ 
वस्य पुरोऽथ धमीरमा नाम्ना अजस्तु जशिषान्‌ । 
उरस्य सम्भवः पुश्रो यस्य अक्षे स वीर्यवान्‌ ॥ ५८॥ 
सत्यहितके धर्मात्मा ऊजं नामक पुत्र उत्पन्न 
हुआ । ऊरजके पुत्रफा नाम प्म्भय था (जिति दृषटय भी 
कषे ह ) । इसे पराक्रमी राजा जरासंधकी उत्पति द थी ॥ 
शकटे दे स वै जातो जरया संधितः सतु। 
जथा संधितो यस्माज्जयास्तंधस्सतः स्ष्र्ः॥ ५९ ॥ 


बह आधे-आधे दारीरफे दो कुक रूपमे ८ दौ माता. 
के गर्भते ) उलन हुभा था । इन दोनों इकहौक्रो जस 
नामबाी राक्षसीने जोड़ दिया । जरसे संधित ( जोदागया) 
, नेते उका नाम जरासंध भा ॥ ५९ ॥ 
सेक्ष्सय जेतासौ जरासंधो महावलः । 
जरासंधस्य पुरो धै क्ष्गरेवः प्रतापवान्‌ ॥ ६० ॥ 

महरी जरासंधने म्प कषत्रिय-सष्ुदायको जीत छिया 
था 1 उसका पु्र प्रतापी सष््देव था ॥ ६० ॥ 
सहेवात्मजः श्रीमायुवायुः ख महायशाः । 
उवायुजेनयामास्त पुं परमधामिंकम्‌ ॥ ६१ ॥ 
धुतधमेति नापानं मगधान्‌ योऽघसद्‌ पिसुः । 

सषटदेवके कान्तिमान्‌ पुत्र मष्टायशस्वी उदायु हुए । 
उदायुने भरुतध्मा नामक प्रम धर्मात्मा पु्रकरो जन्म दिया; 
ज बैभवसग्यम्न होकर मगध देशम निवास करता था ॥ 
` परीक्षितस्तु दायादो धाभिक्षो जनमेजयः ॥ ६२ ॥ 
जनमेजयस्य द याद्रालय एव मदा स्थाः । 


श्रुतसेमोध्रसेनौ च भीमसेनश्च मामतः ॥ ६६ ॥ 
पसे सधं महाभागा विक्रान्ता बल्ालिनः। 
सनमेजयस्य पुरौ ठं सुरथो मतिमांस्तथा ॥ ६४ ॥ 
कुस वृसरे पुत्र परीकषित्‌के आत्मज धर्मात्मा जनमेजय 
हु । जनमेजयङ्ष श्रुतेन, उग्रसेन ओर भीमठेन--ये तीन 
महारथी पुच्र थे । वे सभी मष्माग राजकुमार पराक्रमी तथा 
बलशाली थे । जनमेजयके दौ पुत्र हु द्ुरथ ओर मतिमान्‌ ॥ 
सुरथस्य तु धिकान्तः पुत्रो जके धिषूरयः। 
विपूरथस्य दायि शराश्च पव महारथः ॥ ६५॥ 
हितीयः स षभौ राजा नाम्ना तेष संकितः। 
सुर्थफे एक पराक्रमी पुत्र उत्यन्नं हआ, जिसका नाम 
था विदूरथ । विदुरथके महारथी पु्का नाम भी श्रक्षही 
था।ये बूसरेराजा धेणजो उसी ( प्रक्ष ) मामसे 
परसिद्ध हुए ॥ ६५३ ॥ 
दावृष्षौ तथ वंरोऽसिनश्चषेव ठु परीक्षितौ ॥ ६६॥ 
भीमसेमाखयो राजन्‌ वायेष अनमेल्यौ । 
रजन्‌ | दग्रे एस वदमे दो क्ष! ओर दो ही '्परी- 
क्षित्‌, नामके राजा टौ गये ट । तीन (भीमेन ओर यो 
८अनमेजय, हुए द ॥ ६६६ ॥ 
क्रक्षस्य तु तीयस्य भीमसेनो ऽभवत्‌ सुतः ॥ ६७ ॥ 
प्रसीपो भीमसेमरथ प्रतीपस्य तु शम्तदुः। 
देषापिषीहिकश्रैय श्रय पष मष्टारथाः ॥ ६८ ॥ 
द्वितीय श्रुक्षफे पुन्न भीमसेन हुए । भीमसेनके प्रतीप 
ओर प्रतीप पुर शन्ततु, देवापि तथा बराहिक ये । ये तीनों 
ही महारथी पीर ये ॥ ६७.६८ ॥ 
हान्तनोः प्रसवस्त्येष यत्र जातोऽसि पार्थिव । 
ाह्िकस्य तु राज्यं वै सतवाष्ं नरेभ्वर ॥ ६९.॥. 
प्रथ्वरीनाथ | यह शन्ततुका रुर हैः जिसमे पुम्शारा अन्म 
हुआ है । नरेदषर | ब्ा्िकका राज्य सप्वाष् ८ मन्त्री आदि 
सात अक्दरारा संचालित ने योग्य ) था ॥ ६९ ॥ 
ाह्िकस्य सुतश्चैव सोमदन्तो म्ायदाः । 
जकषिरे सोमदत्तात्त॒॒भूरिभूरिभवाः शालः ॥ ७० ॥ 
ब्हिवकरे पुर मदायशस्वी सोमदत्त हुए । सोमदत्तते 
भूरि, भूरिभ्रया ओर दल-ये तीन पुर उत्पन्न दए | ७० ॥ 
उपध्यायस्तु देवानां देघापिरभषन्सुनिः। 
खयघनस्य एतः पुत्र दषटभासीनम्ात्मनः ॥ ७१ ॥ 
देवापि देवता्जौके उपाध्याय ओर्‌ शुनि हुए } महात्मा 
च्यवनने उन अपना प्रिय पुर बना च्या था।) ७१॥ 
शन्तयुस्त्वभवद्‌ राजा कौरवाणां धुरन्धरः 1 
शान्तनोः सस्प्रवक्ष्यामि यश्रजातेऽसि पाथिव ॥ ७२॥ 


न 


११६ 


राजा शन्तनु फौरवदुखका भार वन करनेषलि हए । 
ष्वीनाय | अव्र मे शन्तनुके वंशका वर्णेन फरता ह, जिसमे 
ब॒श्हारां जन्म हुभा है ॥ ७२ ॥ 
गाङ्गं देवतरतं नाम पुं सोऽजनयत्‌ परुः 
स तु भीष्म ति ख्यातः पाण्डवानां पितामष्टः॥ ७३ ॥ 
प्रमावद्याखी शन्तनुने गक्ञाजीके गर्मसे देवव्रत नामक 
पु्नको जन्म दिया । वे ष्टी भीष्म नामते विख्यात इए, जो 
पाण्डवे पितामह ये ॥ ७३ ॥ 
काली विचिघ्ीयं तु जनयामास भारत । 
शन्तनोदैयितं पुं धमौत्मानमकठ्मपम्‌ ॥ ७४॥ 
भारते [ उनकी दुस्तर पतलनी कारी ( सत्यवती ) ने शन्ततु- 
के प्रिय पुत्र षिचिन्नवीर्यको उत्पन्न किया, जो पापशूल्य तथा 
धम्मि थे ॥ ७४ ॥ 
छृष्णद्धेपायनषश्चैव धे वैचिघ्रवीर्यके । 
धतरा च पाण्डुं च विदुरं चाप्यजीजनव्‌ ॥ ७५॥ 
विचित्रवीयकर क्षे ( अर्थात्‌ उनकी पलियोकरे ग्भ ) से 
शरकृष्णदैपायन ग्यासजीने धृतराष्टः पाण्डु ओर विदुरको 
उत्पन्न किया था | ७५॥ 
ध्रतराषटश्च गान्धार्या पुष्रातत्पादयच्छतम्‌ । 
तेषां दुर्योधनः शेष्ठः क्त्वैषामेव स प्रथुः ॥ ७६॥ 
धृतराषटूने गान्धारीके गर्म॑ते सो पुत्र उत्पन्न कयि । उन 
समे दुर्योधन ट शरेष्ठ ओर प्रमावराटी था ॥ ७६ ॥ 
पाण्डोर्नंजयः प्रः सौभद्स्तस्य चात्मजः) 
अभिमन्योः परीक्षित्‌ तु पिता तव जनेश्वर ॥ ७७॥ 
पाण्डुके पुने धनंजय ८ अन ) हुए ! धनंजये सुमद्रा- 
कुमार अभिमन्युका जन्म हुआ । जनेश्वर ! अभिमन्युके पुत्र 
वम्हरि पिता परीक्षित्‌ थे ॥ ७७ ॥ 
पष ते पौरवो वनो यन्न जातोऽसि पार्धिव । ' 
ए्व॑सोस्तु प्रवक्ष्यामि द्रद्ोष्यानोर्यदोस्तथा ॥ ७८ ॥ 
जनमेजय ! यह ठमते पौरववंशका वर्णन किया गया; 
निसमै ठम्दारा जन्म दुआ दै । अव तुर्व, शरुः यदु ओर 
अनुकी संततिका वर्णन करगा ॥ ७८ ॥ 
खुतस्तु तर्व॑सोर्बहिरवहेगोभायुरात्मजः । 
गोभानोस्तु खतो राजा चेसाुरपराजितः ॥ ७९ ॥ 
ठर्वुके पुत्र वहि ओर विके गोमा हृष्ट । गोभालके 
पुत्र राजा वैसा ये, जो कमी परास्त नदीं होते ये ॥ ७९ ॥ 
करन्धमस्तु जेसानोर्म॑स्तस्तस्य चात्मजः । 
अन्यस्त्वावीक्षितो राजा मसत्तः कथितस्तव ॥ ८०॥ 
जैतानुके करन्धम ओर करन्धमके पुत्र मत्त हुए । 


श्रीमह्भारते सिरभागे 


[ हरिषे 


भविक्षित्के पुश्र राजा मरत धुरे द । उनका परिचय व 

दिया जा चुका दै# ॥ ८० ॥ । 

अनपत्यो ऽभवद्‌ राजा यज्या विपुखदश्षिणः। 

वदिता सम्मता नाम तस्यासरीक्‌ पृथिषीपते ॥ ८१ ॥ 
ये करल्धम-पुने राजा मस्त पुत्रहीन थे । ये वदद 

यज्ञ करते ओर उन प्रचुर दक्षिणा देते थे । प्रष्वीनाय | 

उनके एक पुत्री थी, जिसका नाम सम्मता था ॥ ८१॥ 


दक्षिणार्थं स वै दत्ता संबतीय मष्टात्मने । 
वुष्यन्सं पौरधं चापि ठेभे पु्रमक्दमषम्‌ ॥ ८२॥ 
उन्न महात्मा संवर्तको अपनी वह्‌ कन्या ही दक्षिणा- 
रूपर्मे दे दी थी । ( फिर संवर्तने दुष्यन्तके पिताको वद कन्या 
अर्पिति कर दी । उनके संयोगसे ) सम्मताने पुखवंशी दुष्यन्त- 
को पुत्ररूपमे प्राप्त किया । दुष्यन्त निष्पाप राजा ये ॥ ८२॥ 
पसं ययातेः शापेन जरसं मणे तदा । 
पौष्पं तु्वसोर्॑शः प्रवियेश् शपोरखम ॥ ८२ ॥ 
गरपेष्ठ | इत प्रकार पूर््रोको अपना धुदापा ठेनेके स्यि 
कहते समय ययात्तिने जो श्राप दिया थाः उसे अनुखार 
ठर्वुका वंश समाक्त केकर पौरवा विलीन हो गया ॥ 
दुष्यन्तस्य तु दायादः करुत्थामः प्रजेश्वरः । 
कसत्थामाद्‌तथा ऽऽ क्रीदग्त्वार स्तस्य चात्मजाः॥८४॥ 
पाण्ड्यश्च केररदवेव कोकश्चोरुश्च पार्थिवः। 
तेषां जनपवाः स्फीताः पाण्ड्पाश्चोखाः सकेरलाः ८५ 
दुष्यन्तके ( श्ुन्तरसे भिन दुसरी रानीके गर्भे ) राजा 
कर्त्थाम हुए । करत्थामसे आक्रीडका जन्म हआ । उसफे 
नवार पुत्र थे--पण्ड्यः केरल, फोट तथा राजा चोर । उनके 
समृद्धिशाली ग्रदेरा भी उर्दि नामपर पाण्ड्यः चोल ओर 
केरल कख्यि ॥ ८४.८५ ॥ 
दुद्योश्च तनयो राजन्‌ बभ्रुः सेतुश्च पार्थिवः । 
अङ्कारसेतुस्तव्पुष्ो मतां पतिस्चयते ॥ ८६॥ 
राजन्‌ | ययातिङुमार दहयुके पुत्र राजा बभ्रु ओर सेत 
हुए. । सेदकरे पुत्र अक्गारसेठ॒ हप । इन्दं मर्त्पति भी कहा 
जाता हे ॥ ८६ ॥ 
यौवनाद्वेन समरे छच्टरैण निहतो वली । 
युद्धं खमष्ट्वस्यासीन्माखान्परि चतुर्दश ॥ ८७ ॥ 
युवनाश्व पु मान्धाताके साथ इनका चौदह महीनो- 
तक बड़ा भारी युद्ध दज । उस समराङ्गणमे वलवान्‌ अङ्गार- 
से शाचुद्रारा बड़ी कठिनार्ईसे मरे गये ॥ ८७ ॥ 
अङ्कारस्य तु दायादो गान्धासे नाम भारत 
ख्यायते तस्य नाम्ना वे गान्धारकिषयो महान्‌ ॥ ८८ ॥ 


# देलिये मदामारत, प्रोणपवे ( ५५ । ३७--४९ ) तथा 
आदवमेभिकपवं ( अध्याय ६ से १० तक\}। 


हरि्वेधापषं ] 


भरयश्धिशो ऽध्यायः 


` ११७ 


= 


५ 


गाण्भाखेष्यजाष्यैष तुरगा घाजिनां वणः । 
भरतनन्दम ! अङ्गारके पुत्र गान्धार हुए | उन््ीके 

नामते महान्‌ गान्धारदेराकी स्याति हई । गान्धारदेदाके 

धोहे. सर धोडति श्े्ठ माने गये है ॥ ८८१ ॥ 

अनोस्तु पुश्रो धर्मो ऽभूद्‌ धवस्तस्यात्मजोऽभवक्‌ ८९ 

धृता तु दुदुष्ो जके प्रचेतास्तस्य चात्मजः । 

` प्रधेवसः सुचेतास्तु कीर्तितो छ्यानचो मया ॥ ९० ॥ 

ययातिपुत्र अनुक पुत्र "धर्म हुए ओर धर्मे पु धृतः 


भृते शुदुहफा जन्म हुआ । दुदुहे पु प्रचेता ओर 
प्रचेताके पुप्र सुचेता हृ । स प्रकार मैने ( संेपते ) अनुः 
घंदाका घर्णन किया है ॥ ८९-९० | । 
यदोर्षशं प्रवक््यामि अ्ये्टस्यो्मतेसक्तः । 
धिस्तरेणालुपष्यौस गदतो मे निशामय ॥ ९१ ॥ 

अब मै ययातिके ष्येष्ठ पुर उत्तम तेजस्वी य॑दुके यंशषका 
करमशः विस्तारपूर्वक वर्णन कसा । प्रम मेरे मुखते 
सको सुनो ॥ ९१ ॥ 


इति श्रीमहाभारते खिकभागे हरिवंशे शरिरवशपर्वणि प्र्वंशानुकीरतन हात्रिदोऽध्यायः ॥ ३२ ॥ 
इस प्रकार श्रीमहषभारत खिरभाग हरिवंशे अन्तरत इखिंशपवमे पस्वंशका व्णनविषयक ब्तीसवे अध्याय पुरा हृभा ॥२२॥ 


त्रयसिदयोऽध्यायः 
यदुवंशका वर्णन, कारतवीर्यकी उत्पत्ति एवं चस्ति तथा पं ययाति-पुत्रफि 
वंश॒-बणंनके भ्रवणफी महिमा 


वैशम्पायन उवाच 
बभूवुस्तु यदोः पुत्राः पञ्च देवुतोपमाः। 
सष्टक्षदः पयोदश्च क्रोष्टा नीरोऽञ्जिकस्तथा ॥ ९ ॥ 
वैशम्पायनजी कहते ह--जनमेजय } यदुके पोच 
देवोपम पुत्र दुए-सदलद, पयोद, क्रोष्टुः नील ओर 
अञ्जिक ॥ १॥ 
सहस्रदस्य दायदासख्मयः परमधार्मिकाः । 
हैहयश्च हयद्चेय राजन्‌ वेणु्टयस्तथा ॥ २ ॥ 
राजन्‌ | सषहलदके तीन परम धर्मात्मा पुत्र हुए--दैदयः 
ह्य ओर वेणुहय ॥ २ ॥ 
रैहयस्याभवत्‌ पुरो धर्मेने इति रुदतः । 
धर्मनेशरस्य कार्तस्तु साहञ्जस्तस्य चात्मजः ॥२॥ 
हैहयका पुत्र धर्मनेत्र हुआ } धर्मनेनरके कार्त ओर कार्तक 
सादृ नामक पुत्र हुए ॥ २३ ॥ 


साष्टजनी नाम पुरी येन राक्षा निवेशिता । 
सहस्य तु दायादो महिष्मान्‌ नाम पार्थिवः ॥ ४ ॥ 
माहिष्मती नाम पुस येन राक्षा निवेशिता 
राजा सादञ्जने साहञ्जनी नामक्र पुरी वसायी । साहञ्चकरे 
पुत्र राजा महिष्मान्‌ हुए, जिन्होनि माहिष्मती नामक नगरी 
वसायी थी ॥ ४१ ॥ 
आसीन्महिष्मतः पुत्रो भद्रशनेण्यः प्रतापवान्‌ ॥ ५ ॥ 
वाराणस्यधिपो राजा कथितः पूवमेव तु । 
महिप्मान्‌फर पुत्र प्रतापी भद्रशरेण्य थे, जो वाराणसीपुरी- 
के अधिपति केदे गये है । राजा भदरभरण्यका परिचय ठ 
पटने ही दे दिया गया है ॥ ५१ ॥ 


भद्रश्रेण्यस्य पुषरस्तु दुरव॑मो नाम विश्चुदः ॥ ६ ॥ 
दुद॑मस्य सुतो धीमान्‌ कनको नाम घीर्यवान्‌ । 
भद्रशरेण्यके पुच्रका नाम दुर्दम था, जो भूमण्डलके विख्यात 
राजा थे । दुर्दसके पुत्र कनक हुए जो बुद्धिमान्‌ ओर 
रवान्‌ थे ॥ ६१ ॥ 
कनकस्य तु दायादाश्चत्वासो छोकविश्चुताः ॥ ७ ॥ 
छृतवीयः छतौजाश्च ` तवम तथैव च । ` 
छताग्निस्तु चतुथा ऽभूद्‌ एतवीयोौह्‌ वथाञयुनः ॥ ८ ॥ 
कनकके चार पुत्र हुए, जो सम्पूणं विश्वम विख्यात ये । 
उनके नाम इस प्रकार है--कृतवीरय, कृतौजा, छृतवर्मां ओौर 
कृतागनि । कृताग्नि कनकके चौथे पुत्र ये 1 कृतवीर्यसे अर्जुन- 
की उत्पत्ति हुई ॥ ७-८ ॥ 
यस्तु बाहुसहस्रेण सषदपेश्वसेऽभवव्‌ । \ 
जिगाय पृथिवीमेको स्थेनादित्यवर्चंसा ॥ ९ ॥ 
अञ्न सहस युजाओतसि युक्त हो सातं दवर्पौका राजा 
हुमा । उसने अकर ही सूकरे समान तेजस्वी रथदवारा समपूर्ण 
प्ृथ्वीको जीत ख्या था॥ ९॥ 
स हि वपौयुतं तप्त्वा तपः परमदुश्चरम्‌ । 
देत्तमासधरमासर कार्तवीयों ऽत्रिसम्भवम्‌ ॥ १० ॥ 
कृतवीय॑कुमार अर्जुनने दस हजार वरौतक अत्यन्त 
दुष्कर तपश्या करके अचरिपुत्र दत्त ८ दत्तात्रेय › की 
आराधना की ॥ १० ॥ 
तस्मै दन्तो वरान्‌ प्रादाश्वतुरो भूरितेजसः । 
पूव बाहसष्टलं तु प्रार्थितं खमहटद्धरम्‌ ॥ ११॥ 
दत्ता्रेयजीने उसे परम तेजसी चार घर प्रदान कि | 


५. = 


न ज ज ज अ जन म 


११८ 


प्ते तो उसने बहुत बड़ा वर यह्‌ मोगा था कि ध्युद्धमे मेरी 
स्ट भुजाय हो ज्य" ॥ ११ ॥ 
अधमे वर्तमानस्य सद्धिस्तश्च निवारणम्‌ । 
उग्रेण पृथिर्धीं भित्वा खधर्मेणाचुस्डनम्‌ ॥ १२॥ 
वृसा वरय था किं ध्यदि कमी म अधर्म-कार्यमं 
प्रहृत्त हो तो व्ह साधु पुसप्र आकर भु्चे रेक दे । तीसरे 
चरके रूपमे उसने यष प्राना की कि भ्व युदक दारा ए््यी- 
फो जीतकर स्वधर्म-पारनके द्वार प्रजाफो प्रसन र्य, ॥१२॥ 
संप्रामन्‌ सरुवहून्‌ एत्धा हत्वा घारीन्‌ सहसदाः। 
संग्रामे ष्ंमामस्य घधं चाप्यधिकाषु रणे ॥ १३॥ 
चरीधा वर इस प्रक्रार है--म ब्रहुत-ते संग्राम कखे 
सहसत पलुर्ओोको मौतफरे घाट उतारकर संग्राममे टी रहते 
समग्र जो युद्धम मुप्नसे अधिक शक्तिद्राटी टो, उसके द्वारा 
वधको प्राप्त हर्ज ॥ १६॥ 
सस्य बाष्ुसष्सरं त युध्यतः किर भार । 
योगाद्‌ योगेश्वरस्येय प्रादुर्भवति मायया ॥ १४॥ 
भरतनन्दन | युद्ध करते स्मय क्रिसी योगेश्वरकी भति 
योगव्रल ओर सकेतमात्रसे उस प्क सष शुजारद प्रकट् दो 
जाती शीं | १४॥ 
तेनेयं पृथियी सौ सततद्ठीपा सपना । 
ससमुद्रा क्नगया इध्रेण धिधिना जिता ॥ १५॥ 
राजा अर्जुने द्वीप, समुद्रः पत्तने ओौर नगरोसहित सारी 
प्र्वीफो उम्रकमं ( युद्ध ) कै द्वास जीताथा॥ १५॥ 
तेन ल्त पिष सत्त यशशतानि धै । 
प्राप्तानि पिधिना साक्षा श्रूयन्ते जनमेजय ॥ १६॥ 
जनमेजय | उप्त राजाने साते द्वपमिं विधिपू्॑क सात तौ 
यश करि थे, फेसा सुना जाता रै ॥ १६ ॥ 
सधं यक्षा महात्राहोस्तस्यासन्‌ भूरिदक्षिणाः । 
सधं काञ्चनयूपाश्च सवै काञ्चनयेदयः ॥ १७॥ 
महरा अश्चुनके वे समस्त यश्च प्रचुर दक्षिणा देकर 
सम्पन्न श्रिये गये ये । स्मे सोनेके यूप गदे थे जर सोनिकी 
ही वेदविर्यो बनायी गयी ्थी॥ १७॥ 
सर्ेदषेमदाराज धिमानस्पैररुंषटताः। 
गन्धर्वैरण्लरोभिश्च निर्यमेधोपशोभिताः ॥ १८॥ 
मष्टाराज | बिमानोपर त्रैठे हए सम्पूणं देमता, गन्धर्व 
ओर अप्सरारपैः सदा टी उने यरशेको अलंकृत एवं चशोभित 
करती थी॥ १८ ॥ ` 
यस्य यक्षे जमौ गाथां गम्धर््रो नाखस्तथा। 
घरीद्रासात्मजो विदान्‌ महिम्ना चस्य विस्मितः ॥ १९ ॥ 
कार्तवीयके यदं उसकी महिमासे चकित होकर वरीदाम- 


महाभारते लिरभगे, 


थि क नि 


[ इरिषंदो 

के विद्धान्‌. पुत्र नारद नामक गन्धर्वने इस गाथाका गान 

रियाथया॥ १९॥ 

नारद्‌ उकाश 

न नूनं का्त॑धीयंस्य गति यास्यन्ति पार्थिवाः । 

यकैदौतैस्वपोभिषौ विक्रमेण श्युतेन च ॥ २०॥ 
नारद्‌ बोे--अन्य राजाकोग यक्षः दान, तपस्या, 

पराक्रम ओर शाघ्लकाने कार्तवीयं अर्जुनकी सितिको नदी 

पहुंच सकते ॥ २० ॥ 

स्त हि सपद्ु दीपेषु सङ्गी चमी शरास्षमी । 

रथी द्वीपानदुचरन्‌ योगी संहदयते वभिः ॥ २१॥ 
घष्ट योगी था | इसल्यि मनुषेक्रो सातौ द्वपमिं ढाल- 

तलवार, धनुप्र्ण भौर रथ वि सदा स्र ओर विचरता 

श्लियीदेताथा॥ २१॥ 

अनण््ठ्यता चैव स प्रोकोन च विख्मः। 

प्रभावेण महाराशः प्रज्ञा धर्मेण रक्षतः ॥ २२॥ 
धर्मपूव॑क प्रजाफी रक्षा करनेवाले मष्ाराज कार्तवीर्यके 

प्रभावे किसीफा धन नष्ट न्ह होताथा। मतो किंसीको 

शोक होता आरन फो श्रमम दयी पडता था॥२२॥ 

पश्चाक्रीविसहस्राणि धषीणां प नराधिपः । 

ल सर्वरत्नभाक्‌ सत्रा चक्षव्रतीं बभूव ह ॥ २३॥ 
वष्ट प्रवासी हजार व्रतिक सब्र प्रकारे रत्नेसि सभ्य 

चक्रवर्ती सघ्राट्‌ रहा ॥ २३॥ 

स पश्र यश्नपालोऽभूस्‌ क्षेच्रपालः स एष च । 

छ एव वृष्या पजन्य योगित्वावरशगुनोऽभवषद्‌॥ २४ ॥ 
योगी होनिके कारण राजा अर्युन ष्टी यको ओर सेतौकी 

रक्षा करता थाओौरवष्टी वर्प्ाकारमै मेष रन जातां 

था॥ २४॥ 

स धै याहुस्सरेण ऽपाधारकषटिनरषखा । 

भाति रदिमस्रहखेण शरदीष दिवाक्ररः ॥ २५॥ 
जसे शरद्‌-ऋर ठम भगवान्‌ भस्फर अपनी सदसो करणेति 

शरोमा पते ह, उसी प्रकार राजा कार्तवीर्यं अर्जुन प्रत्यञ्चाकी 

रगणसे जिनकी त्वचा कठोर टो गयी थी) उन स्षह्तौँ 

शुजा्थमि सुक्लोभित होता था ॥ २५ ॥ 

सहि नागान्‌ मरेष्येषु महिष्मस्यां महादुतिः | 

कक्ररकष्ुताजित्वा पुथ तस्यां भ्यवेहायत्‌ ॥ २६॥ 
महातैजश्यी अनने कर्कोटकनागफे पुर्रौको जीतकर 

उन्हं अपनी नगर माहिष्मती पुरीम मनु्योफि प्रीच व्ताया 

था॥ २६॥ 

स वै वेगं समुद्रस्य प्राबृदकालेऽगबुजेश्षणः । 

क्रीडन्निव भुजोद्धिन्नं प्रतिस्रोतश्चकार ह ॥ २७ ॥ 


{ 


\ 


= ५ 


"~~ 


हरिवंशपवं ] 


कमलनयन कात॑वीयं वर्षाकालमे जल-ऋ्रीडा करते समय 
समुद्रकी जलरारिके वेर्गोको अपनी भुजाओंके आधातसे सेक- 
कर पीछेकी ओर लोया देता था ॥ २७ ॥ 
दुण्ठिता क्रीडिता तेन फेनस्ग्दाममादल्िनी । 
चलदूर्मिसहस्रेण राङ्किताभ्येति नर्मदा ॥ २८॥ 
केनरूपी पृष्पहारोसे अकृत नम॑दाकी जलरारिमे ज्र 
वह लोरता ओर क्रीड़ा करता था, तव वह ॒परपुरुषके उप- 
भोगम आयी हुई नारीके समान शद्कित-सी होकर अपनी 
सदसो चञ्चल छदरोके साथ अपने प्रति समुद्रके निकट जाती 
थी ॥ २८ ॥ 
तस्य॒ बाहुसहस्रेण ्षुभ्यमणे महोदधौ । 
भयान्निरीना निश्चे्ः पातालस्था महासुराः ॥ २९॥ 
महासागरमे धुसकर जव वह अपनी सहरखो भुजे 
पटकता, उस समय समुद्र िक्षुन्ध हो उठता था ओर 
पातालनिवासी महादैत्य निश्चेष्ट होकर भयते दिप 
जति थे ॥ २९ ॥ 
चूर्णीङितमदावीचि चलन्मीनमहातिमिम्‌ । 
मारुताविद्धफेनौधमाव्तश्चोभदुःसहम्‌  ॥ ३०॥ 
धावतेयत्‌ तदा राजा सहस्रेण च वाहुना । 
देवाघुरसमक्षिप्तः क्षीरोदमिव मन्दरः ॥ ३१ ॥ 
जब्र राजा अर्जुन अपनी सहसत भुजाअंसि समुद्रको मथने 
खगताः उस समय उसकी उठती हुई उत्तार तरं चूर-चूर 
हो जाती थीं । बडे-वड़े तिमि ओर मीन आदि जर-जन्तु छट- 
पटने ख्गते थे । भुजाओं वेगसे उटीं हई बायुसे टकराकर 
उसकी केनरादि छिन्न-भिन्न हो जाती थी ओर समुद्र बडी- 


. बड़ी मेवरोकि कारण क्षुब्ध एवं दुःसह दिखायी देत्ता था । 


देवताओं ओर असुरोकरे द्वारा डके हुए मन्दराचल्न क्षीर 
समुद्रकी जो दगा कर दी थीः वैसीं ही ददा उसकी भुजाओं 
से मथित हुए महासागरकी हो रही थी ॥ ३०-३१ ॥ 
मन्दर्नोभचकिता असतोद्धवश्ङ्किताः। 
सहसोत्पतिता भीता भिमं दषटरा नपोन्तसम्‌ ॥ ३२॥ 
नता निश्वलमूधौनो ` बभूयुस्ते मदोरगाः। 


सायाहे कदलीखण्डाः कभ्पितास्तस्य वायुना ॥ ३३ # 


` उस समय मन्दराचलके द्वारा समुद्रमन्थनकी आशङ्कसे 
चकित ओर अमृतकी उत्पत्तिसे भयभीत हुए बड़े-बड़े नाग 
सहसा उछलकर देखते ओर भयंकर वपश्रेष्ठ॒कार्तवीर्यपर 
दृष्टि पडते दी मस्तक छकाकर पत्थरके समान निच्चेष्ट हो 
जते थे । जेते संध्याके समय बायुके सरिते कदटीखण्ड 
(क्रेलके बगीचे ) कोपने रुगते है उसी प्रकार उसे शरीरसे 


` उटी हुई वायुकरे दारा वे नाग मी हिलने लगते थे॥३२-३३॥ 


सवे बद्ध्वा धलुन्थीभिसत्सिकं पञ्चभिः शरेः । 
रङ्गेशं मोष्टयित्वा तु सबं रावणं वात्‌ । 


चयखिशो ऽध्यायः 


१९१९ 


निर्जित्यैव समानीय माहिष्मत्यां बवन्ध तम्‌ ॥ २४॥ 


राजा कार्तवीर्यने अभिमानसे भरे हुए. ठ्कापरति रावण- 
को अपने पेचि ही बार्णोद्रारा सेनासहित मूर्छित एवं पराजित 
करे धनुषकी प्रत्यञ्चसे बोध लिया ओर मादिष्मतीपुरीमे 
खकिर बंदी बना लिया ॥ ३४ ॥ 
श्रुत्या तु बद्धं पौलस्त्यं रावणं त्वज्ञुनेन तु 1 
ततो गत्वा पुङस्त्यस्तमर्जुनं ददो स्यम्‌ । 
सुमोच रक्षः पौरस्त्यं पुलस्त्येनाजुयाचिततः ॥ ३५ ॥ 
अर्जुने मेरे कंज रावणको कद कर ल्या ह, यह 
सुनकर महषि पुरस्त्य स्वयं वरहो गये ओर अर्जुनसे मिटे । 
पुस्तके प्रार्थना करनेपर उसने उनके पौच राक्षस राणक 
मुक्तं कर दिया ॥ ३५ ॥ 


यस्य॒ बाहुसष्टस्रस्य वभूव ` ज्यातलस्वनः । 
युगान्ते त्वस्बुदस्येव स्फुरतो छयशनेरिव ॥ २६ ॥ 

अजुनकी हजार जाओंम धारण कयि गये धनुोँकी 
प्रयख्ाका एेसा घोर शब्द होता था, मानो प्रलयकाले मेप 
गर्ते हौः अयवा वचर फट प्रड़ा हो ॥ ३६ ॥ 


महो वव मृधे वीर्ये भागवस्य यदच्छिनत्‌ । 

राज्ञो बवाहुसदखं तु हैमं तालचनं यथा ॥ ३७ ॥ 
अहो ! भगुवंशी परश्चरामजीका पराक्रम धन्य ह, जिमते 

उन्दोनि युद्धम सुव्मय ताल्वनेके समान रुजा कार्तवीर्यकी 

सहलो सुजार्ओको काट डाला था ॥ ३७ ॥ 


ठषितेन कदचित्‌ स भिक्षितश्चिजभायुना । 
स भिक्षामदद्‌द्‌ वीरः सपतद्वीपान्‌ विभावसोः ॥ २८ ॥ 
पुराणि भ्रामधोषांश्च विषयांश्चैव सर्बशः। 
जज्वाल तस्य स्वौणि चिध्भालुदिधक्षया ॥ २९ ॥ 
स तस्य पुरुषेन्द्रस्य प्रभावेण महात्मनः! ` 
ददाह कार्तघीयस्य शेलाश्चैव वनानि च ॥ ४०॥ 
एक दिनकी बात दै-मूरै-प्यासे अग्निदेवने राजा कार्त- 
वीरयते भिक्षा मोगी । तब उस वीर राजाने साती हप, नगर, 
गोवि, गोष्ठ तथा सारा राज्यं अग्निदेवको भिक्षा दे दिये । 
अग्निदेव सर्वे प्रज्वलिते हो उठे ओर पुरुषप्रवर महात्मा 
कार्तवीर्यके प्रभावसे समसत पर्वतो एवं वर्नोको जलने 
लगे ॥ ३८--४० ॥ ॥ 
स शुल्यमाश्रमं रस्यं वरुणस्यात्मजस्य ३े। 
ददाह वनवद्‌ भीतश्ि्रभायुः सहैहयः ॥ ४१ ॥ 
कायैवीर्यकी सहायता अग्निने दूसरे साधारण बनोकी 
भोति चरुणपुत्रके रमणीय आश्रमको भी सूना पाकर उरते. 
डरते जला दिया ॥ ४१ ॥ 
यं छेभे वरणः पुं पुरा भाखन्तमुत्तमम्‌ । 
चकिष्टं नाम स सनिः स्यात आपव इत्युत ॥ ४२॥ 


१२० 


श्रीमदाभास्ते खिमागे 


[ दसिवंशे 


पूर्वकर्म वख्णने जिन तेजस्वी एवं प्रेष्ठ महर्पिको पुत्र- 
रूपम प्रा्ठ क्रिया था, उनक्रा नाम वरिष्ठै । वे दी सनि 
आपव नामसे मी विख्यात द ॥ ४२ ॥ 
यत्रापवस्तु तं क्रोधाच्छत्तवानर्जुनं षिभः । 
यस्माक्न वर्जितमिदं चनं ते मम द्य ॥ ४३॥ 
तस्मात्‌ ते दुष्करं कमै छृतमन्यो हनिष्यति । 

महिं वसिष्ठका सूना आश्म जलाया गया था, इसल्वयि 
उन रेशर्यशाली आपवने अर्जुनको क्रोधपूर्वक शाप दिया- 
दय | नूने मेरे इस वनको भी नलये विना न छोडाः इसि 
तेरे द्वारा जो विश्वविजय आदि यशोवर्दक दुष्कर करम किया 
गया ह, उसे दुसरा वीर ( तुक्च पराजित करके ) नष्ट कर 
उलिगा ॥ ५२३ ॥ 
रामो नाम महाबाुजोमदगन्यः प्रतापवान्‌ ॥ ४७॥ 
छखिरवा बाहसष्टखं ते प्रमथ्य तरसा घटी । 
तपस्वी बाह्मणश्च त्वां वधिष्यति स भागंवः ॥ ४५॥ 

प्जमदग्निके प्रतापी पुत्र महावाह परराम बलवान्‌ ओर 
तपस्वी बराह्मण दै! वे मृगुवंशी वीर तेन्ने वल्पूर्वक मथ 
डरठेगे ओर तेयं इन सदख युजाओक काटकर तुते भी मीतके 
धार उतार दरो ॥ ४४-४५ ॥ 

वैशम्पायन उवाच 

अनष्टद्रव्यता यस्य बभूवामिन्नकरन । 
प्रभावेण नरेन्द्रस्य प्रजा धर्तेण रक्षतः ॥ ४६॥ 

वेशाम्पायनजी कहते हँ--गतरुसूदन जनमेजय | धर्म- 
प्तक ग्रजाकी रक्षा करेवाङे राजा कार्तवीरयके प्रमावसे उसके 
राज्यम करिसीकी धन-सम्पत्ति या दूसरी कोर्द वस्तु नष्ट नहीं 
होती यी ॥ ४६ ॥ 

(= € 

रामात्‌ दतोऽस्य सृत्यु्वं तस्य दायान्धुनेर्ख॑प । 
वस्थैप दि कौरव्य खयमेव वृतः पुरा ॥ ५७॥ 

कुस्वंशी नरे | वसिष्ठ मुनिके चापत्े ही परद्यरामके 
हायते उसकी मृ्यु हई थी । उसने स्वयं ही पदे इसी तरट्‌- 
काचर मोगा था ॥ ४७ ॥ 
वस्य ॒पुक्रदातस्यासन्‌ पञ दोषा महात्मनः । 
तासा बलिनः द्युस धमौत्मानो यश्चखिनः ॥ ४८ ॥ 

महामना कार्तवीर्यके सौ युन ये, किंतु उनम पोच दी 
शोष वचे । वे समी अख्र-्रेकि शताः वलवान्‌ शर, धर्मात्मा 
ओर यशसी ये ॥ ४८ ॥ 
द्यूरसेनश्च शख धृषेः छष्ण पव च । 
जयष्वजश्च नाम्नाऽऽखीद्‌ावन्त्यो पतिर्महान्‌ ॥ ४९ ॥ 

उनक्रे नाम ये ई--यस्वेनः चर, धृष्टः कृष्ण ओर 
जयघ्वज । इनर्म जयध्वज अवन्तीदेशके महाराज ये | ४९॥ 


कार्तवीर्यस्य तनया धीर्यषन्तो महदारथाः। 


जयध्वजस्य पुनस्तु तार्जद्वो महावलः ॥ ५० ॥ 
करार्तवी्यके ये समी पुच् व्रख्वान्‌ ओर महारथी ये। 
जयष्वजक्रे पुत्र मदावली तालजद्ध दए ॥ ५० ॥ 
तस्य पुत्राः शतं ख्यातास्ताजह्वा इति श्रुताः 1 
तेषां कुरे मद्यराज दैदयानां महात्मनाम्‌ ॥ ५१ ॥ 
वीतिद्यो्राः सुजाताश्च भोजाश्चावन्तयः स्पृताः । 
तौण्डिकेरा इति ख्यानास्तालजद्वस्तथेच च ॥ ५२॥ 
भरताश्च खता जाता वहुत्वान्नाुकीर्तिताः । 
चृपप्रभरृतयो राजन्‌ यादवाः पूर्णकर्मिणः ॥ ५३ ॥ 
ताठजद्घुके सौ पुत्र थे, जो ताल्जद्र नामे दी विख्यात 
ये । महाराज | मष्टामनखी दैदयोकि कुख्मे वीतिदोत्ः सुजात्तः 
भोजः, अवन्तिः तौण्डिकेरः ताल्जद् तथा मरत आदि श्षत्रिर्यो- 
क समुदाय उयन्न हुए । इनकी संख्या बहत दोनेके कारण 
इनके प्रथकृ-ष्थक्‌ नाम नदीं वतायै गये । राजन्‌ ! वष्र आदि 
ब्रहुत-से पुण्यात्मा यादव इस परथ्वीपर उसन्न हुए. ये ॥५१-५३॥ 


वृषो वक्षधरस्तच॒तस्य पुत्रोऽभवन्मधुः) 
मधोः पुत्रशतं त्वासीद्‌ बपणस्तस्य चंश्भाक्‌॥ ५४ ॥ 
उनमे दष वंदाप्रवर्तकं हुए । बर्के पुत्र मघु ये । मधुकेसी 
पुत्र हुएः जिनमे बषरण वं चलनेवले दए ॥ ५४॥ 
चृषणाद्‌ इष्णयः सर्वे मधोस्तु माधवाः स्सताः। 
यादवा यदुना चाग्रे निसच्यन्ते च हैहयाः ॥ ५५ ॥ 
वरृपणसे जो सततान-परम्परा चली; उसके अन्तर्गत सभी 
छत्निय इृप्मि कलये ओर मधुके वंशज माधने नामते प्रसिद्ध 
हुए । इसी प्रकार यदुके नामपर उस वंशे ठोग यादव 
कहलाते दै तथा आगे दोनेवाले ददयके वंशाज दैहय कदे 
जाते ई ॥ ५५ ॥ 
न तस्य विरनाशोऽस्ति गं प्रतिरमेष्व सः । 
कातैवीर्यस्य यो जन्म की्तैयेदिष्ट नित्यश्चः ॥ ५६॥ 
जो यद प्रतिदिन कार्तवीयं अ्ुनके जन्मका वृत्तान्त 
कहता या सुनता है, उस्के धनका नाश नदी होता ओर 
उस्तकी खोयी दुई मस्तु मी उखे मिरु जातीं है ॥ ५६ ॥ 
पते ययातिपुत्राणां पञ्च वंश्या विश्चाम्पते। 
कीर्तिता रोकवकीरणां ये रोकान्‌ धारयन्ति चै॥ ५७ ॥ 
भूतानीव महाराज पञ्च स्थावरजज्गमान्‌ । 
प्रजानाथ | इस प्रकार ये विश्वषिल्यात मीर ययाति- 
पुत्रेकि पोच वंश यों बतखये गये दै । महाराज | षे पेच 
भूत स्थावर, जङ्गम प्राणियोकि गरीरोको धारण करते है, उसी 
प्रकार ये पोच वंश समस्त छोकोौको धारण करते ई ॥५७३॥ 
श्ुत्वा पञ्चविसर्ग तु सजा धमौर्थकोविद्‌ः ॥ ५८ ॥ 
वशी भवति पञ्चानामात्मजानां तथेश्वरः । 
इन पर्चा वंशोकी खटिका वर्णन सुनकर राजा धर्म ओर 


हसिविदापवं ] 


अर्के तत्वका साता होता दैः अपनी पोच इद्धिर्योको वामे 
रखता है तथा अपने पुर्नोपर प्रमुत्व यापित कर ठेता दै ॥ 
टमेव पञ्च वरांश्चैव दुलभानिद लौकिकान्‌ ॥ ५९ ॥ 
आयुः कीर्तिं तथा पुजानैश्वयं भूमिमेव च । 
धारणाच्छरूवण्ेव पञ्चवर्गस्य भारत ॥ ६० ॥ 
भरतनन्दन ! इन पोच वंशोके भवण ओर ` धारणवे 
मतुप्य इस जगतमे आयु, कीर्तिः पुत्रः एेर्यं तथा भूमि-- 
इन पोच लोकोपयोगी दुर्टम वरोको प्रास्त कर केता है ॥ 
क्रोष्टोस्तु श्णु राजेन्द्र॒ वंरासुत्तमपोरुषम्‌ । 


चतुखिशोऽध्यायः 


१२९१ 


यदोर्वशधरस्याथ यज्वनः पुण्यकर्मणः ॥ ६१ ॥ 
्रोटिं वंशं शचतवेमं सर्वपापैः भसुच्यते । 
यस्यान्ववायजो विष्णुरिंष्णिक्ुरोददहः ॥ ६२ ॥ 


राजेन्द्र ! अव त॒म उत्तम पुरुषार्थसे युक्तं क्रोष्टुवंाका 
वर्णन सुनो ! राजा क्रोष्टु यदुके वंशधर, यज्ञ करनेवाले तथा 
पुण्यकर्मा थे | उनके इस वंशका वर्णन सुनकर मनुष्य स्व 
पपि मुक्त हो जाता है । राजां क्रोष्टु वे ही दै, जिनके कुर्म 
सर्वव्यापी भगवान्‌ श्रीहरि दृप्िवंशावतंस श्रीकृष्णके - रूपमे 
अवतार ल्या था ॥ ६१-६२॥ 


इति श्रीमहाभारते खिरभागे हरिवंशे हरिवंशपवंणि जय्िरोऽध्यायः ॥ ३३ ॥ 


दस प्रकार श्रीमहाभारत दिमाग हिर अन्तग॑त हिवंशपर्वमे तैतीसरवौ जप्याय पूरा हुमा ॥ ३६ ॥ 


चतुदिशोऽध्यायः 


वृष्णिवंशका वणन--अक्रूर, वसुदेव, इन्त, सात्यकि, उद्धव, चारुदेष्ण, एकरव्य आदिका परिचय 


वै्चम्परयन उवाच 
गान्धारी चेव माद्री च करोष्टोभौयं वभूषतुः । 
गान्धारी जनयामास अनमिचं महावलम्‌ ॥ १ ॥ 
वैशम्पायनजी कहते है--जनमेजय ! कोष्टकी गान्धारी 
ओर माद्री नामकी दो मार्या थी । गान्धारीके गर्भसे महावटी 
अनमित्र उत्पन्न हुए ॥ १ ॥ 
माद्री युधाजितं पुञं ततोऽन्यं देवमीद्धुषम्‌ । 
तेषां वंशखिधा भूतो चष्णीनां कुलवर्धनः ॥ २ ॥ 
माद्रीके पुत्र युधाजित्‌ ओर दूसरे पुत्र देवमीडष हए 
बृणिर्योके ऊुखको बद़निवाला उनका वंश तीन शसाखा्ओमिं 
वेट गया ॥ २॥ 
मद्राः पुरस्य ज्ञाते सुतौ चृष्ण्यन्धकावुभौ । 
-जज्ञाते तनयौ चृष्णेः श्वफल्कश्चि्रकस्तथा ॥ ३ ॥ 
माद्रीके पुत्र ( युधाजित्‌ ) के दृण्णि ओर अन्धक नाम- 
केदोपुत्र हुए ओर दृष्णिके पुत्र श्वफस्क तथा चित्रक 
हुए ॥ ३॥ 
श्वफस्कस्तु महाराज धमोत्मा यन्न चतंते 1 
नास्ति व्याधिभयं त्न नावषंभयमप्युत ॥ ७ ॥ 
महाराज | धर्मात्मा श्वफल्क जहा रहते थे, वहो व्याधि 
ओर अनाद््टिका भय नहीं होता था ॥ ४॥ 


कदाचित्‌ काशिराजस्य विभोर्भ॑स्तसन्तम । 

भ्रीणि वर्षाणि विषये नावर्ष॑त्‌ पाकशासनः ॥ ५ ॥ 
भरतसत्तम ¡ एक समय राक्तिशाखी कारिराजके देशम 

इन्द्रने तीन वतक पानी नहीं बरखाया ॥ ५ ॥ 

स तत्र वासयामास श्वफल्कं परमार्चितम्‌ । 

श्वफल्कपरिवतं च ववर्ष हरिवाहनः ॥ ६ ॥ 
तत्र उन्दने परम पूज्य श्वफस्कको बुखकर अपने यह 


ठदराया ओर श्वफस्कके पधारते दी इन्द्रे जल बरसाना 
आरम्भ कर दिया ॥ ६ ॥ 


श्वफल्कः काशिराजस्य खुतां भार्यामविन्द्व । 

गान्विनीं नाम सागां लु ददौ चेष नित्यशाः ॥ ७ ॥ 
शफस्कका काशिराजकी गान्दिनी नामबाली त्रे विवाद 

हो गया । वह ब्ाक्र्णोको निवयप्रति गौओका दान देती रहती 

यी ( इसीच्यि उसका नाम गान्दिनी पड़ा था ) ॥ ७ ॥ 

सा मालुख्दरस्था तु बहन्‌ वर्षगणान्‌ क्रि । 

निवसन्ती न वै जके गर्॑स्थां तां पिताघवीत्‌ ॥ ८ ॥ 
वह अपनी माताके उदर बहुत वर्षोतक री थी जौर 


उत्पन्न नहीं होती थीः तवर गर्भम सित कन्यास उसके पिता- 
ने कदा-॥ ८ ॥ 


१२२ 


श्रीमहाभारते सिरभागे 


. जायख शीघं भद्रं ते किमर्थमिह विसि । 
प्रोवाच चैनं गर्भस्था कलन्या्गां च दिने दिने॥ र ॥ 
यदि द्यां चतो ऽया जाययिष्याति तां पित्ता । 
तथेत्युवाच तं चास्याः पविता काममपूरयत्‌ ॥ १० ॥ 

(भद्रे | ) तेरा क्स्याणहोः तू श्नीघ्र ही उत्पन्न दयोः 
तू (इतने वर्ेमि ) किंस ल्ि गर्भे पड़ी दई हे (* तव उस 
गर्म सित कन्याने कहा--्यदि आप प्रतिदिन सश्चते गो- 
दान करानेका संकद्प कर तो म ज ही उच्यनन हो जार्ज! 
तव पिताने उससे (तथास्तु, ककर उसकी कामनाकर पूष 
किया ॥ ९-१०॥ 
दाता यज्वा च धीस्थ श्रुतवानतिधिप्रियः। 
अक्रूरः धुव तसाच्छदफरकाद्‌ भूरिदक्षिणः ॥ ११ ॥ 

इन श्वफल्क ( ओौर गान्दिनी ) के यर्दो दान देनेवलि; 
यश्च करनेवाटे, पैर्यवान्‌ शाखि ज्ञाता; अतिथियेसि प्रेम 
करनेवाले तथा प्रचुर दक्षिणार्ण देनेवाले अ्रूर उत्नन 
हुए ॥ ९१1 
उयपखद्कस्तथा महसदुख्श्यारिमिजयः। 
अचिक्षिपस्तथोपेक्षः द्ाचुघ्रोऽथारिमर्दनः ॥ १२ ॥ 
धर्मधृग्‌ यतिधमौ च गृधो भोजोऽन्धकस्वथा 1 
आबाहभरतिवादौ च सखुन्दसे च वराङ्धना ॥ १३ ॥ 

तथा उपासद्धः मद्गुः मदुर, अरिमेजयः अपिक्षिपः 
उपेष्वः शत्रुष्नः अरिमर्दनः धर्मक; यतिधर्माः यभ, मोजः 
अन्धकः आवाह्‌ अर्‌ प्रतिवाद (नामक अग्रूरनीके भाई) तथा 
वराङ्घना नामक सुन्दरी कल्या ८ भी )उद्न्न हुई ॥१२-१३॥ 
अकरूरेणोग्रसेनायां खगाघ्यां सनन्दन । 
्सेनध्योपदेषश्च अक्षते देववर्चसौ ॥ १४॥ 

कुषनन्दन [ इन अर्रूरजीसे सुन्दराङ्गी उग्रसेनके द्वारा 
देवता्फि समान कान्तिवाले प्रसेन तथा उपदेव नामके दो 
पुत्र उत्पन्न हुए ॥ १४ ॥ 


लिनकस्यपभवन. पुजा पृथर्चिगृधुरेव च । 
अश्वप्रीचोऽभ्ववाहटुश्च खपार्वकगवेषणौ ॥ १५ ॥ 
अरि्टनेमिरभ्वश्च सुधमौ ध्मभृत्‌ तथा | 
खवाहुवहुवादुशच श्रविष्ठाश्रवणे स्यौ ॥ १६ ॥ 
( अक्रूस्नीके माई ) चिचकके श्रविष्ठा अर श्रवणा 
नामकी दो धर्मपलिर्यो थी जिनसे पुः विपृथुः अश्वग्रीव, अश्च- 
„बाहु, सुमाद्वंकः गवेषणः, अरिण्नेमिः अदवः सुधर्मा, धर्मभत्‌? 


सुत्राहु तथा वहुवाहु नामक पुत्र उद्यन्न हुए. ॥ १५-१६ ॥ 
अदमकयां जनयामास श्युरं वै देवमीदुपः। 
मिष्यां जक्षिरे शुराद्‌ भोज्यायां पुरुपा दशत ॥ १७ ॥ 
( करोष्टके ठेतीय पुत्र ) देवमीद्पके अष्मकी नामकी 
पत्नीसे श्र नामक पुत्र उत्पन्न हुआ | चरके भोजराज्करुमारी- 
से दस प्र उन्न हुए ॥ १५॥ 
वसेन मष्ावाहुः पूवेमानकटुन्डुभिः। 
जन्ते यस्य प्रसूतस्य दुन्दुभ्यः प्राणन्‌ दिवि ॥ १८ ॥ 
पहले महावराह चसुदेवजी उपनाम आनकटुन्दुभि उयन्न 
हुए इनके उन्न दोनिपर खर्गमि--आकारश्मे दुन्दुभिर 
चजी ्थी।। १८ ॥ 
आनकानां च संहादः सुमहानभवद्‌ दिवि 1 
पपात पुष्पवपं च द्युरस्य भवने महत्‌ ॥ १९॥ 
तथा खर्गम--आाकारा्मे नगारयोका बदा मारी शब्द हुआ 
था} ( दर्षि वसुदेवजीका नाम आनकटुन्दुमि पड़ा!) 
साथ ही इनके उत्पन्न टोनेषर श्यूरफे घर्मे पूर्प्पोकी बड़ी 
मारौ वपां हुई थी ॥ १९॥ 
मलुष्यरोके छत्सेऽपि रूपे नास्ति समो भुवि । 
यस्यासीत्‌ पुसपाग्यस्य कान्तिश्चन्द्रमसरे यथा ॥ २० ॥ 
पुरुप अग्रगण्य वसुदेवजीकी कान्ति चन्द्रमाके तमान 
थीः इनके समान रूपवान्‌ सम्पूर्णं मनुप्यरोकरमै ओर कोई 
नदद या॥ २०॥ 
देवभागस्ततो जके तथा देवश्रवाः पुनः। 
अनाधृष्टिः कनवको चत्सावानथ गृञ्जमः ॥ २९ ॥ 
इयामः हामीकेो गण्डूषः पञ्च चास्य वसाद्गनाः । 
प्रथुकीर्तिः पथा चैव श्रुतदेवां श्वुतश्चवाः ॥ २२ ॥ 
राजाधिपरेवी च तथा पञ्चैता वीरमातरः । 
पृथां दुहितरं वव्रे कुन्तिस्तां छुसुनन्दन ॥ २३ ॥ 
शूरः पुञ्याय चद्धाय ऊन्तिभोजाय तां ददौ । 
तस्मात्‌ न्तीति विख्याता कुन्तिभोजात्मजा पृथा 1२७ 
कुखनन्दन ! वसुदेवजीके बाद ( शूरे य्ह >) देवभागः 
देवक्नवा, अनाधृष्टिः करनवक्र वत्साचान्‌ः रञ्ञिमः इयाम 
शमीक ओर गण्ट्रूप नामक पुत्र तथा पृथुकीर्तिः पथाः श्रुतदेवा; 
श्रुतश्रवा ओर राजाधिदेवी नामकी पोच कन्य उन्न हुई 
थीः जो रमणि रत्ने समान थीं) ररपं कन्यर्पै 
वीर पुर्बोकी माता थीं } रजा ऊुन्तिने प्रथाको अपनी पुत्री 


हरि्वदापवं 1 वहखिश्षोऽभ्यायः १२६ 


-- 
च 
चननिक व्मि मग ल्या । (पर ) शररेनने एको पूज्य मष्ामाग्ववाच्‌ पुन उलन्न ईप । ये उद्धव देवताकि समान 


तथा दृद राजा छरुन्तिमोजकरो दे दिया ] इस कारण प्रथा 
कुन्तिमोजकी पुरी ओर न्ती नामठे विख्यत हुई २१-२४ 
भन्त्यस्य शरुतदेषायां जगृहुः युषे छतः। 
श्रुतभ्रषा्यां भैधस्य रिश्ुपालो महायरः ॥ २५ ॥ 
हिरण्यकरिपुर्थोऽसौ दैत्यराजो ऽभवत्‌ पुरा । 
अन्त्यके श्रुतदेवा जग्रह नामक पुत्र उन्न हया 
तथा चेदिवंशी दमधोषरके शरुतश्रवासे मशप्ररी शिश्युपारउत्वनन 
हमा, यह परे जन्मे दै्यराज हिरण्यकरिषु था ॥ २५१. ॥ 


पृथुकीत्या त तमयः संजके धुददा्मणः ॥ २६ ॥ 
करपाधिपतिर्वीति दर्ववक्री मदावलः। 


इृद्धरामति एएरथुकीर्तिके कूपर देशका सामी महाव्रली वीर 
दन्तवक्र उखन्न हुआ ॥ २६१ ॥ 


पथां दुहितरं धक कुन्तिस्तां पाण्डुरावहत्‌ ॥ २७ ॥ 
यस्यां स धर्मविष्‌ राजा धमौजकषे युथिष्ठिरः । 
भीमसेनस्तथा बातादिन्द्राश्चैव धनंजयः ॥ २८ ॥ 
खोकेऽप्रतिरथो धीरः दाक्रतुस्यपराक्रमः। 

कुन्तिभोजने जिन एथाको अपनी प्री भना लिया थाभडनका 
विवा पाण्डुके साय हुआ 1 उन परथाके धर्मे जाननेवले 
राजा युधिष्ठिर धर्मसे उतपन्न हुए ओर बायुखे भीमसेन तथा 
हनदरसे संसारके अनुपम वीर) इन्दरके समान पराक्रमी धनंजय 
 भर्ुन ) उन्न हुए ॥ २७.२८१ ॥ 
अनमिभाष्छिनिजंरे कनिष्ठाद्‌ दूष्णिनन्दनात्‌ ॥ २९ ॥ 
शेनेयः सत्यकस्तस्माद्‌ युयुधानश्च सात्यकिः । 
भसङ्गो युयुधानस्य भूमिस्तस्याभवत्‌ सुतः ॥ १० ॥ 
भूमेयुंगधरः पुत्रः इति वंशः समाप्यते । 

्रोष्टके स्रत छोटे पुः सक्र ब्रप्णिवंशिर्योको प्रसन्न 

करनेषाठे अनमिभ्रसे शिनि उत्पन्न हुए, उनसे शैनेय उपनाम 
सत्यक हप ओर उनसे युयुधान उपनामबाे सात्यकि हुए । 
युयुधानके पुत्र असङ्ग हुए ओर असङ्गके युपर भूमि 
हृ । भूमिके पुच्र युगधर हुए । यर्होपर क्रो्टाका वंश समाप्त 
होता हे ॥ २९-३०९ ॥ 
उद्धयो वेषभागस्य मष्टाभागः सुतोऽभवत्‌ । 
, पण्डितानां परं प्राहुदषभ्रवससुखवम्‌ ॥ ३१ ॥ 
( बसुदेवजीके राता ) देवभागके उद्धव नामक 


कीर्तिवाछे एवं परम पण्डितको सूपे प्रसिद्ध हए ॥ ३१ ॥ 


अदमकयां प्रातवान्‌ पुध्रमनाध्रशियैशासिनम्‌ । 
निषृ्तशाप्रुं शच्रुघ्रं देवभषा व्यजायत ॥ ३२॥ 
( वसुदेवजीके तीसरे भाईोभनाधृठिने अदमकीसे यदखी 
नामक पुत्रको उलन क्रिया तथा दूसरे भाई देवश्रवनि शतुओीः 
फो हटानिवाले शत्रुघ्न नामक पुत्रको उदयन क्रिया।३२॥ 


देवश्रवाः भ्रजातस्तु नैषादिर्यः भरतिश्चुतः। 
पकरुव्यो महायज्ञ निधारैः परिवर्धितः ॥ ३३ ॥ 
महाराज ¡ ( किसी कारणवदा वाखकपनमे ही त्वागद्ि 
जनिके कारण `) स देवभ्नवाके पुत्रको निषादौने पालकर 
बढ़ा किया थाः ्सल्यि यह निषादवंदी एककम्यके नामसे 
परसिद्ध हु ॥ ३२ ॥ 
धत्साधते त्वपुत्राय षलुदेवः प्रतापवान्‌ । 
अद्धिदंदौ चुतं वीरं शौरिः कोशिकमौरसम्‌ ॥ ३४ ॥ 
श्रूरनन्दन प्रतापी वसुदेवजीने (अपने छोटे भार) पुरदीन 
वत्सावानक्षो अपना ओरस पुत्र कौरिकं जरते संकर्प कफ 
दे दिया ॥ ३४॥ 
गण्डूषाय त्वपुश्राय विष्वपतेनो ददौ तान, । 
चारदैष्णं सुखारं च पञ्चाटं इृतरक्षणम्‌ ॥ ६५ ॥ 
(धसी प्रकार) श्रीकृप्णने (बसुदेवजीके दुसरे छोटे भा) 
अपुत्र गण्डरषको चाद्देष्णः सुचारु, पञ्चाल ओर कृतरक्षण 
नामके अपने चार पुत्र दे दिये ॥ ३५॥ 
असंभरामेण यो वीरो नाधरतत कदाचन । 
सौकिपमणेयो महायाहुः कनीयान्‌ पुरुप्पभ ॥ ३६ ॥ 
पुरुषर्षम | सकिमिणीके छोटे पुत्र महाशन चवार्देष्ण 
युद्ध किये बिना ( रणभूमिषे ) कमी नदी टी्ते थे ॥ ३६॥ 
वायसानां सष्टस्राणि यं यान्तं पृष्ठतोऽम्बयुः। 
चाङमांसानि भोष्ष्यामश्वारुदेष्णदहतानि त॒ ॥ २७ ॥ 
उनके पीछे जारो फौए. इछ इच्छते जति थे कि 
नके द्वारा मारे गये शरुओंका चास ( स्वादि ) माष म 
ख्यगे,(इस प्रकार कौर्भोफो )चास ( खादिष्ट) भोजन देने. 
वाठे होनेते ये चार्देष्ण कलये | ३७ ॥ 
तन्द्िजस्तन्द्रिपालश्च खुतौ कनवकस्य सु 1 
घीर्ाभ्वदनस्भेव वीरो तावथ शुखिमो ॥ ३८ ॥ 


१२७३ 


( वसुदेवजीके भाई ) कनवकके तन्द्िज ओर तन्द्िपाट 
नामक दो पुत्र दुष्ट तथा श्क्ञिमफे वीर ओर अश्वहन नामक 
दो वीर पुत्र उन्न हुए ॥ ३८ ॥ 
दयामपुत्रः शमीकस्तु शमीको राज्यमावष्टस्‌ । 
्ुयुष्समानौ भोजत्वाद्‌ राजसयमवाप सः । 
अजातश शाध्रूणां जक्षे तस्य विनाशनः ॥ २९ ॥ 

( पयदैवजीके भां ध्याम अपने छोटे भाई दामीकको 

अपने पुघ्रके समान मानते थे । द कारण ) श्यामके पुन 
शमीक हुए | हन शमीकने राज्य किया था, उन्हनि मोज 
होनेके कारण ( अर्थात मोजवंशी एक वंदकरे ओर एक 
देशके ष्टी राजा ई-यह ) निन्दा मानकर उर््हने राजसूय 


श्रीमहाभारते सिलभगे 


{ हरिये 


८ सात्राज्य ) पायां था समीकके यप्नुना्रक अजातदातरु 
नामकं पुत्र हआ ॥ ३९॥ 
वयुदेष्तार्‌ धीरान्‌ कीतंधिष्यामि सा ॥ ० ॥ 
अव म वसुदेवजीके वीर पर्वौका वर्णन करता ह, उसको 
आपि उुनिये ॥ ४० ॥ 
दृष्णेखिविधमेवव्‌ तु यहुश्षाखं मौजसम्‌ । 
धास्यन्‌ यिपुटं॑धंशं नानरैरि्ट॒ युज्यते ॥ ४१॥ 
जो मनुष्य बृप्िकरे ब्हुत-सी शाखार्जौवाटे, मदापराक्रमी 
पुरेति खुयोभित शस तीन प्रकारके यदे विशाल वंशके 
दृत्ान्तको मनम धारण करता दैः वष्ट स संसारके 
अनसि मुक्त रदता १ ॥ ४१ ॥ 


इति श्रीमष्ाभारते थिकभागे हरिवंशे हरिव शपर्व॑णि श रिणिवंदाकीतेनं नाम चठस्पिदोऽध्यायः ॥ ३४ ॥ 
इ प्रकार श्रामहाभास्त लिमा सिदे भनतर्गत हयिवंदापम वृष्णिवेदाका फीतैनव्िषयकर नोती सर्वौ मध्याय पूरा हुमा 1४ 


पञत्रिरोऽध्यायः 
श्ीृष्णका अवतार सेना) शरीृष्णकैः अन्य भाई-वहिनों ओर इड्म्विरयोका षर्णन तथा काठयवनकी उत्पतति 


वैत्म्पायन उवाष 

याः वल्यो वसुदेवस्य चटु षराङ्गमाः। 
पौरी रोहिणी नाम श्य च तथा थरा ॥ १ ॥ 
वैशाखी च तथा भद्रा खुनाम्नी चैव पञ्चमी । 
सष्टदेवा दान्तिग्रेवा श्वीयेवा देवरक्षिता ॥ २ ॥ 
दकतरेयुपदेवी च देवकी चैव सपतमी । 
षुतलुषंश्वा सैव दे पते परिचारिके ॥ ३ ॥ 

वैदाम्पायनजी कष्ते ह--जनमेजय | वसुदेवजीकी जो 
प्रीदह युन्दराक्की पतिर्यो थी, उनमे रोष्टिणी ओर रोिणीसेोरी 
इन्दिरा वैशाखी, भद्रा तथा पेचिव खुनाम्नी-ये पोच पौरव- 
वेदाकी थी तथा सदेवा, दान्तिदेवा, श्रीदेवा; देवरक्षिता 


बृकदेवी, उपदेवी ओर सातवीं देवकी-ये सात देवल्की , 


पुर्यो थीं तथा सुतनु ओर वडवा-ये दौ ऽनकी धस्विर्या 


` , केवाली लियो थी ॥ १-३ ॥ 


पौरवी रोषिणी नाम श्िकस्यातमजभिवव्‌ । 
ज्येष्ठा पत्नी महाराज दयिता.ऽऽनकदुन्दुभेः ॥ ४ ॥ 
महाराज {पौरव -वंशकी कुमारी रोहिणी ( महाराज शन्तनुके 


बडे भाई ) वाहिककी पुत्री थी वे वसुदेवजीकी प्रियतमा बद 
पत्नी थी॥४॥ 


लेभे ग्येष्ठं छतं रामं सारणं दाठमेष च । 
ददं " दमनं श्वभ्रं पिण्डारकमुशपिनस्य्‌ ॥ ५ ॥ 
चिश्रां नाम कुमार्यं च रोहिणीतनया ददा । 
चिघरा खभद्रेति पुनर्धिख्याता कुखनस्दन ॥ ६ ॥ 
छखनन्दन  रोदिणीके ज्येष्ठ पुर बलराम ओर ( उनसे 
छोटे ) सारणः शठः दुर्दम; दमनः श्वभ्र पिण्डारक ओर 
उश्षीनर हुए तथा चित्रा नामकी पुत्री उन्न हुई । ८ यह 
चित्रा प्क अप्रा थीः जो रोहिणीके गर्भे उत्पन्न दोते ष्टी 
भर गयी थी । इसने मरते समय अपनेको धिकार था किरम 
यादवङुलम जन्म धारण करके भी यदुवंशे उत्यन्न ्ोनेवाले 
भगवानक्ती लीरको न देख सकी । इस वासनाके कारण ) 
यह चिघरा दी दूरी वार समद्रा बनकर उत्पन्न हई श्री । इत 
प्रकार रोहिणीके दख संताने उसन हई ॥ ५६ ॥ 
वछुदेवाश्च देयक्षयां .जक्षे शौरिर्महायदाः। 
रामाश्च निराठो जक्षे रेवत्यां दयितः छतः ॥ ७ ॥ 
चयुदेवसे देवरकमिं मदायशखी री्ृष्ण उत्यनन हए ओर 
वलरामर्जीसे रेवतीके दारा उनके प्रिय पुत्र निशठ उत्पन्न हुए ॥ 


सखुभद्वायां स्थी पाधोदभिमन्युरजायत । 
अक्रुराव्‌ काशिकन्यायां सत्यकेतुरजायत ॥ ८ ॥ 


हरिविश्यपषं 1 


अर्युनसे सुभद्राम स्थी अभिमन्यु उत्न हुए ओर अन्रू 
से कारिराजकुमारीम सत्यकेठ उत्पन्न हुए ॥ ८ ॥ 
थसुरेवस्य भायखु मष्टाभागाष् सपघु । 
ये पुत्रा जरे श्यूरा नामतस्तान्‌ निवोध मे ॥ ९ ॥ 
वयुदेवजीकी सात महाभाग्यवती पिर्म जौ शूरवीर 
पुत्र उवयक्ष हुएः उनके नाम म आप्ते कता 
ध स॒नियि ॥ ९ ॥ 
भोजश्च विजयदचैव श्णन्तिदेवासुवायुभौ । 
धृकदेवः सुनामायां गदश्चास्तां सुतावुभौ ॥ १०॥ 
मोज ओर विजय-ये दो शान्तिदेवाके पुत्र ये तथा दृक- 
देव ओर गद्-ये दो सनाम्नीके पुत्र ये ॥ १०॥ 
उपासङ्गषरं लेभे तनयं देवरक्षिता। 
अगावष्टं महारमानं दुकदेवी ध्यजायत ॥ १९ ॥ 
देवरक्षिताके पुत्र उपासङ्खवर हुए ओर इकदेषीके पुत्र 
मदात्मा अगावहं हुए ॥ ११९ ॥ 
कन्या भिगत॑यजस्य भती वै प्ौरिसथणः। 
जि्ासां पौरे धके न चस्कन्दे ऽथ पौरुषम्‌ ॥ १२॥ 
षृकदेवी भ्िगर्तराजकी कन्या थी । त्रिगर्तरजका भर्ता 
( पुरोत ) ग्गगेश्री हैशिरायण था ! उसके खलेन, जो 
यादेर्वोका पुरोष्टित था, यह जानना चाहा कि स्मे पुंस्त्व ह 
अथवा नही, परंतु ( व्रतधारी होनेसे ) उसका वीर्यं स्खलित 
नहीं हुआ ( इसपर उसके सालेने हास्यवश उसको मिथ्या 
ही नपुंसक धोपित कर दिया ) ॥ १२॥ 
कृष्णायससमेप्रस्यो वपं ददशमे तथा । 
भिथ्याभिशप्तो गाग्यंस्तु मन्युनाभिसमीरितः ॥ १३॥ 
बारह वर्का नियम पूणं होनेपर मिथ्या ही नपुंखकताका 
दोष लगयि जनके कारण गर्गगो्ी शेशिरायण कोधे भर 
गये, इसे उनके शरीरका वर्णं॒ठेदेके समान कारा 
दीखने ख्गा ॥ १३॥ 
गोपकन्यासुपादाय मेथुनायोपचक्रमे । 
गोपाखी ्वप्सरास्तस्य गोपस्मीवेपधारिणी ॥ १४ ॥ 
उन्न एक रोपकन्याके साय सहवास किया । वह खी 
गोप-लीका वे धारण करनेवाली गोपाली नामकी अप्रा थी | 
धारयामास गार्स्य गभं दुरधंरमच्युतम्‌ । 
माचुष्यां गाग्य॑भायौयां नियोगाच्छ्खपाणिनः ॥ १५५ 


पश्चध्रिश्षो ऽध्यायः 


। १२५ 


स काटयवतो नाम जप्त साजा महाबयः। 
धृषपू्ीरधकायास्तमवहन्‌ धाजिनो रणे ॥ १६४ 
उसने गार्ग्यं चेदिरायणके अच्युत ओर दुर्धर वीर्यको 
धारण कर छिवा । उस सनुष्यका येश धारण करेबाही 
गार्म्य॑की भायसि दिवजीकी आश्चसे काठ्यवन नामक प्रसिद्ध 
महाबली राजा उसन्न हुआ थाः वैलकि घमान आये शरीरके 
घोडे युद्धम उसके षान वनते ये ॥ १५-१६ ॥ 
अपुरस्य स राकषस्तु ववृघेऽन्तःपुरे शिशुः 1 
यवनस्य मष्टाराज स कालयवनोऽभवत्‌ ॥ १७॥ 
महाराज | एक यवन राजा संतानष्टीन था, उसके अन्तः. 
युस वह बालक पठने खगा । इस प्रकार षद फाख्यवनके 
नामसे ग्रसिद्धभ हुआ ॥ १७ ॥ 
स युद्धकामी पतिः पर्यपृच्छद्‌ विजोच्मान्‌। 
दृष्प्यन्धकछुलं तस्य नारवोऽकथयद्‌ विधु; ॥ १८॥ 
वह्‌ राजा युद्ध कसेकी श्च्छसे प्रेरित दो ब्ाक्षणेति 
(अपने षमान येोद्धा्ओंको ) पृष्धने लगा । सव जगह प्हुचने- 
वड़े नारदजीने उखे धृष्णि जर अन्धककुल्फे वीरको उसके 
समान योद्धा वताया ॥ १८ ॥ 


अक्षौहिण्या तु सैन्यस्य मथुरामभ्ययात्‌ तदा |, 
दूतं सम्प्रेषयामास दृष्ण्यन्धकनिवेशनम्‌ ॥ १९॥ 


तव व एक अदौदिणी सेना केकर मधुरापुरीपर ष्वद 
आया । उसने ष्णि ओर अन्धकेकि मवन्भे दूतको भेजा ॥ 


ततो चरष्ण्यन्धकाः रष्णं पुरररूत्य मष्ामतिम्‌। 
समेता मन्ध्रयामाश्च्यवनस्य भवाद्‌ तदा ॥ २० ॥ 


तव काल्यवनके डरे इष्ण ओर अन्धकेनि मष्टामति 
भरीट्ष्णके सभापत्ित्वम कटे होकर मन्नणा की ॥ २०॥ 


रत्वा च निश्चयं सवं पलायनपरायणाः 1 
विष्टाय मथुरां रम्यां मानयन्तः पिनाकिनम्‌ ॥ २१ ॥ 
शस्यं द्रवतीं निवेशयितुमीप्सवः । 

तव वे खव निश्चय करके शिवजीकी मनौती मानते इए 
कुशसखली द्वारकाको वसानेकी इच्छसे रमणीय मयुरापुरीको 
त्यायकर भाग खडे हुए } २११ ॥ 


# शस भिद दा ई ढि गोपाडी भम्सत छदन मति 


॥ 
| 


- क्र ड्‌ गवीषी। 


+ 


१२६ 


श्रीमहाभारते खिरूभागे 


[ दयि 


इति कृष्णस्य जन्मेदं यः द्य॒चिनिंयतेन्द्रियः। 
पश्च धाययेव्‌ विदानदेणः स खल्ली भवेत्‌ ॥ २२॥ 
जो विद्वान्‌. पुरुष शन्द्िर्योको वशम करके पविनर होकर 


| 


श्रकृष्णके जन्मकी इस कथाको पर्वे खमय घुनाता दहै, उसका 
श्रूण लुक जाता ६ ओर उसफो परम सुखकरी प्राति 
दती है ॥ २२॥ 


षति शवीमहाभारते सिरभागे हरिवंशे हरिवंशतपरव॑णि श्रृष्णजन्मालुकीतेनं नाम पञचव्रिशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥ 
इस प्रफः् श्रीमहाभारत हिरभाग दरिवंके अन्तत इरिवंशदमे शरीृग्णजन्मफीतैनविययक पतीस; मध्याय पूरा हुमा ॥ ६५ ॥ 


ष्टत्रिरोऽ्यायः 
कोष्ट शका पर्ण, पुरोहितके गोत्रसे कषत्रिय के गो्रफा बदर जाना 


वैश्रमायन उवाच 

प्रोष्टोरेवाभवस्‌ पुरो पृजिनीवान्‌ मष्टायदशाः । 
धृजिनीषत्सुतभ्धापि सराहिः खराहाछृतां घरः ॥ १ ॥ 

कैशस्पायनसी कष्टते है-जनमेजय | ८ युके एन ) 
्रष्टके टी एक धरजिनीवान्‌. नामक महायरासखी पुत्र हुए 
षूजिनीषान्फ पुत्र स्वा हुए, वे खाहम अर्थात्‌ होम कणेवाठमिं 
श्रेष्ट थे ( जिख प्रकार फ्रष्टके वंदरमे श्रीकृष्ण उत्पन हुए, उसी 
प्रकार क्रक वंशते घत्यमामा आदि भी हृ हधरियेमि एक 
छलक होनेपर भी सात पीदिरयां बीत जनिके बाद पुरोष्ितके 
गोध्रसे यजमाते क्षत्रियका भी गोर दल जाता है ओर इष 
भकार गोनभेदसे उमम षिषाह हो जते ह । इस अध्यायं ्रो्ट- 
के वंशकी उस शाखाका वर्णन किया जायगा, जिम मष्टा 
रक्मीकी अवतार शवर शक्ति शरीदकिमिणीजी उत्पन्न हुई थी) ॥ 


खादहियु्रोऽभवव्‌ जा र्पहर्वदतां घरः । 
महाक्रतुभिरीजे यो विषिवैरभूरिवक्षिणैः॥ २॥ 
छतप्रसतिमन्विच्छन्‌ स्पहुः सोऽग्यमातममम्‌ । 
जे चिरथस्तस्य पु्रः कर्मभिरन्वितः ॥ २ ॥ 
सादिक पुत्र रषु हुः ३,अच्छे बोलनेवाठे ये ओर 
नङ़ी-वद्ी दक्षिणावलि अनेक प्रकारके भहायश्न करते रते थे ! 
उनकी यह्‌ च्छा थी कि भेर य पत्र-पर्रोवाल्य शरेष्ठ पुत्र 
उन्न टो; इस प्रकार पुत््टि आदि यरकर्म करते-करते 
उनके या चित्ररथ नामक पुत्र उत्यन हु ॥ २-२ ॥ 
आसीच्यैश्रयिरवीरो यज्वा विपुरुदक्षिणः। 
शदाधिन्दुः पर वृत्तं राजर्पीणामनुष्ठितः ॥ ४ ॥ 
चित्ररथके पुत्र वीर शशबिन्दु हुए, वे बड़ी-बड़ी दक्िणा- 


ञे बश करके राजवियोक शरेष्ठ भचरणका पाकनं करते 
रहते ये ॥ ४॥ 


पृथुश्रवाः पृय॒यश्षा राजाऽऽसीच्छशयिन्दुजः । 
शंसन्ति च पुराणक्षाः पार्थधवल्तमुष्तरम्‌ ॥ ५ ॥ 
शशचिन्दुके पुत्र महायस्सरी राजा प्धुश्रवा दए पुराणो 
के जाननेवाठे कहते टै कि प्रधुश्रवाके पुत्र उत्तर हुए. ॥५॥ 
छनन्तरं शछुयशस्तु खुयशतनयोऽभवद्‌ । 
उदातो यक्षपसिरं खधर्मसुदातां षरः ॥ ६ ॥ 
उत्तरे पुत्र सुय दए सुयरशके पुन उदात हृ कामना 
कटेवालेमिं रेट उशत अपने सम्पूणं धर्मो ओर यश्का 
अनुष्ठान सदा करना चाहते थे ॥ \॥ 
रिनेयुरभषत्‌ ख चखदातः श्रुतापनः। 
मर्तस्सस्य तनयो राजर्षिरभवन्टृप 1 ७ ॥ 
राजन्‌ | उदातके पुत्र शत्रुओको संतप्त करनेवाले शिनियु 
हए, उनके पुत्र राजर्षिं मरुत्त हए ॥ ७ ॥ 
मस्घोऽखभव ज्येष्ठं सुतं कम्बटवर्हिषम्‌ । 
चचार विपुलं ध्म॑ममषीव्‌ प्रत्यभागपि ॥ ८ ॥ 
मस्तके ष्येष्ठ पुत्र कम््ल्वर्हिष हुए । जो धर्म मरणके 
अनन्तर फल देता है, अपने जीवनम ष्टी ह उस मष्टन्‌ 
धर्मका आचरण कणे रो ॥ ८ ॥ 
खुतप्रसतिमिच्छन्‌ वै छतं कम्बलवर्दिषः 1! 
वभूव रक्मकवचः शतप्रसवतः द्ुतः ॥ ९ ॥ 
कम्बल्वर्िघ बेर्यो-पोतोसे समृद्ध पुत्र पाना चाहते येः 
उस धर्माष्ठानके फलरूप उनके सक्मकवच नामका पुत्र 
उत्पन हुमा, ओ सौ बाकौमि अकेला बचा था ॥ ९ 1 


निष्टत्य॒सक्मकवचः दातं कवचिनां रणे । 
धम्बिनां मिरितै्बणिरकप भियमुलमाम्‌ ॥ १० ॥ 


हरिवंशपवं 


षट्‌्निदोऽध्यायः 


१२४ 


सक्मकवचमे युद्धम धनुष ओर कवचको धारण करमे- 
वलि सौ योद्धा्ओंको मारकर बड़ी भारी कीतिं पायी थी ॥ 
अक्ञेऽथ रुष्मकवचचात्‌ पयजित्‌ परवीरा । 
क्षरे पञ्च पुत्रास्तु महावीर्याः पराजितः ॥ ११॥ 
सक्पकवचकरे पुत्र राध्ुवीरनागाक पराजित्‌ हुए, पराजित्‌- 
के महावीर्यान्‌ पचि पुत्रे टृए ॥ ११ ॥ 
रुफमेपुः पृथुरुक्मश्च ज्यामधः पालितो हरिः । 
पालितं च हरि चेव विदेहेभ्यः पिता ददौ ॥ ९२॥ 
( उनके नाम इस प्रकार दै) स्क्मेपुः प्रधुरुक्मः 
ज्यामघः पाटित ओर हरि ! उनके पिता पराजित्‌ने पाट्ति 
ओर दरक विदेह देशका पालन केके ल्यि वहोके राजक 
देदियाथा॥ १२॥ 
सफमेषुरभवद्‌ राजा पृथुरुक्मस्य संधितः। 
ताभ्यां परनाजितो सज्पाञ्ज्यामधो ऽवसदाश्चमे ॥ १६ ॥ 
सुक्मेपु प्रथुरखुक्मका आभ्य लेकर राजां बन गया थाः 
उन दोर्नौनि ज्यामघको. राज्यसे निकार द्वियाः तच ज्यामघ्‌ 
आश्नममे रहने छ्णा ॥ १३॥ 
भरश्ान्तः स वनस्थस्तु बाह्यणैश्चाघयोधितः । 
जिगाय रथमास्थाय देशमन्यं ध्वजी रथी ॥ १४॥ 


वह ८ वद्ध होनेते ) शान्त हौकर वनमे पड़ा रहता था? 
परंतु ब्राह्मणेन तप आदिके द्वारा उसको वख्वान्‌ बना दिया; 


तव रथी ज्यामधने एक ध्वजावाले रथमे बरेठकर एक दूसरे ` 


देशको जीत छिया } १४ 


नमदाक्रूरूमेकाकी नगयी खत्तिकावतीम्‌ । 
पक्षवन्त गिरि जित्वा श्युक्तिमत्यासुवासर सः ॥ १५॥ 
उसने अकेठे ही नर्मदा किनरेकी मत्तिक्रावती नगरी 
सर श्रक्षवान्‌ पर्बतको जीतकर छक्तिमतीपुरीमे अपना 
निवास-खान वनाया 1 १५ ॥ 
ल्यामधस्याभवद्‌ भायौ श्चैन्या वलवती सती । 
अपुत्रोऽपि च राजा स नान्यां भायामविन्द्त ॥ १६॥ 
व्यामघकी भार्या सती शैव्या ब्रड़ी वलवती थी, इस. 
स्यि उ्यामधघने पुव्हीन होनेपर भी दूसरा विवाह 
नहीं किया | १६} 
तस्यासीद्‌ विजयो युद्धे त कन्यामवाप सः। 
भार्यामुवाच संघस्तः स्युषेति स नरेश्वरः ॥ १७॥ 


उसने एक युद्धम विजय होनेपर एक कन्या प्राप्त कीर 
उस नरेश्वरने उरकर अपनी भार्ये उस कन्याको स्तुषा 
€ पु्रवधू ) कह दिया ॥ १७ ॥ 
पतच्छुत्वाव्रवीद्‌ देवी कस्य चेयं स्युषेति वै। 
अ्रवीत्‌ तदुपधचुत्य ज्यामघो राजसत्तमः ॥ १८५ 
यह भुनकर पत्नीने पूछा--प्यह॒क्खिकी पुचवधू 
हे तव राजसत्तम ज्यामधने प्रतिला करके कहा-- ॥ ९१८॥ 
यस्ते जनिष्यते. पुत्रस्तस्य भार्योपदानवी । 
उग्रेण तपसा तस्याः कन्यायाः सा व्यजायत । 
पुं विगूरमं सुभगा शैव्या परिणता सती ॥ १९॥ 
` ततरे जो पुत्र उलन्न होगा, यह उपदानवी कन्या उसकी 
मार्या होगी 1 उस उपदानवी कन्याकी उग्र तपस्माके प्रभावसे 
सौमामग्यवती ओेव्याके बूढी होनेपर मी उसफे विदर्भं नाम्रफा 
एक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ १९ ॥ 
राजपुः्यां लु विद्वांसौ स्युषायां कथकतेशिको । 
पश्चाद्‌ बिदर्भो.ऽजनयच्छररौ रणविशारदौ ॥ २० ॥ 
तदनन्तर बिद्भने उस राजकरुमारीसे शूरवीर श 
रणविशारदः क्रथ ओर कौशिक नामके दो विद्धान्‌ पुजनोकर 
उत्यन्न किया ( २० ॥ 
लोमपाद ठदतीयं त पुं परमधार्मिकम्‌ । 
खोमपादात्मजो वश्राहतिस्तस्य चात्मजः ॥ २९॥ 
तथा छोमपाद नामक एक तीसरे परम धार्मिक पुत्रको 
भी उत्पन्न करवा छोमपादके पु बभ्रु इए ओर उनके पुत्र 
हुए आहति ॥ २९ ॥ 
आहतेः कौशिकर्येव विदान्‌, परमधार्मिकः । 
चेदिः पुश्रःकीशिकस्य तस्माच्यैया सपाः स्शता॥ २२॥ 
आहतिके पुत्र कौशिक हए बे विद्वान्‌ ओर परम 
धार्मिक थे । कोरिकके पुच चेदि हुए, इस कारण - उनके 
वंशके राजा चै कते ह ॥ २२॥ 
भीमो विदर्भस्य खतः ुन्तिस्तस्यारमजो ऽभवत्‌! 
कुल्तेध्टसुते अक्षे रणधृष्टः प्रतापवान्‌ । 
धुष्ठस्य जक्लिरे शुराखयः परमधामिकाः ॥ २२ ॥ 
आवन्तश्च दश्चाश्च चटी चिषष्टर्च यः। 
दशार्हस्य सुतो व्योमा व्योम्नो जीमूत उच्यते॥ २४ ॥ 
विदर्भका ( चथा ) पुत्र मीम हुभा, भीमके पुत्र कुन्ति 


१२८ 


. हुए, न्तिके रणम टीठ वं प्रतापचाय्‌ धृष्ट नामक पुत्र ए 1 
षके शूरवीर एवं परम धार्मिक आवन्त, दाद ओर 
वलवान्‌ विषदर नामक तीन पुत्र उन्न हुए । दाक पुज 
व्योम हए ओर व्योमके पुत्र जीमूत हए ॥ २२-२४॥ 
आषूठपुभो दृ्तिस्तस्य भीमरथः खतः । 
अथ भीमस्थस्यासीत्‌ पुञ्रो नघस्थस्तथा ॥ २५॥ 

जीमूतके पुत्र बृहति ओर उनके पुत्र मीमसय हणः 
मीमरथके पुत्र नवर हुए 1 २५ ॥ 
खस्य चासीद्‌ दृकारथः श्तङ्ुनिस्तस्य चात्मजः, 
स्पात्‌ करम्भः कारम्भिदेवरतोऽभवन्द्रपः॥ २६॥ 


नवरथके पुत्र ददार हए ओर दव्यस्थके पुत्र शकुनि 
दए 1 श्निके पुत्र करम्भ इए. ओर करम्भके युन्र राजा 
देवरात दष ॥ २६ ॥ 
देषश्चघोऽभवव्‌ सस्य दैवक्षन्ि्मह्ायशाः 1 
देषगर्मसमे जने देव्षघस्य नन्दनः ॥ २७॥ 
मधूनां वंशाद्‌ राजा मधुर्मधुरवागपि । 
मघोर्ज्षेऽय वैद्या पुरो मस्वसास्तथा ॥ २८॥ 


श्रीमहाभारते सिलभागे 


[ दरवो 


देवरातकरे पुत्र देवक्ष हुए । देवश्नत्रकरो आनन्द देनेवाले 
मदायशस्वी दैवश्चत्रि हए, वे देवतार्ओकि वालको समान 
तेजस्वी ये.। उनका नाम मधु थाः उनकी वाणी मी मधुर 
थीः, वहु मधुरवंदाके प्रवर्तक राजा ये । मधुकरे वैदर्मीसि मख्वस 
नामक पुर उत्पन्न हुए ॥ २७-२८ ] 


आसीन्मरुवसः पुत्रः पुखढान्‌ पुरुषोत्तमः, 
मघुजैक्षेऽय वैदर्भ्या भद्रवत्यां ऊुरूदष्ः ॥ २९॥ 
पे्वाकी चाभवद्‌ भाय सत्त्वास्तस्यामजायत 1 
सत्वान्‌ सर्वगुणोपेतः सात्वतां कीर्तिवर्धनः ॥ २० ॥ 


मस्वेसके पुत्र पुरुषोत्तम पुषद्रान्‌ हए । उरन्दीकि 
विदर्म-राजकुमारी मद्रवतीषे ऊुख्वंशकी वृद्धि कसेवाल 
मधु नामक पुत्र हुजा ओर इष्वाकुवंशकी भार्यासि सत्वान्‌ 
नामक पुत्र उत्पन्न हआ । सान्‌ सर्वगुणसम्पन्न थे ओर 
अपने वंशम साच्चर्तोकी कीर्तिको बदानेवाठे ये | २९-३०॥ 


मां विख चिक्षाय ज्यामघस्य महात्मनः । 
युज्यते परया कीत्य प्रजावांश्च भवेश्चरः ॥ ३१ ॥ 


मनुष्य मदात्मा ज्यामघक्रे इस वंदाका परिचय प्राप्त कर 
परम कीतिं पाता है ओर संतानवान्‌ हो जाता है ॥ ३९ ॥ 


इति श्रीमदाभारते लिकभगे रवं हरिवंशपर्वणि षर्रिदोऽध्यायः ॥ ३६ ॥ 


स प्रफार श्रीमदामार्त सिरभाग हिंद भन्तमत संश पर्वे ( ज्यामघो वराका वर्णनव्रिषयफ \ 
छक्तीस्वौः मच्याय पुर हुमा ॥ ३६ ॥ 


नौ @ का 


स्रियो ५ 
ऽध्यायः 
वभवशका वणन 


वैम्पायन उवाच 
खसवतात्खस्वसम्प्नाय्‌ कौरशस्या खुपुवे खतान्‌। 
, भजिनं भजमानं च दिन्यं देवावृधं चपम्‌ ॥ १९ ॥ 
अन्धकं च महाबा चूध्णि च यदुनन्दनम्‌ । 
देषां विसगौश्वत्वासे विस्तरेणे वन्द्रुण ॥ २ ॥ 


वैशम्पायनजी कष्टते दै--जनमेजय | स्वान्‌ उपनाम- 
वाजे सतवते कौशल्याने मलिनः भजमानः दिव्य राजा 


देवादृधः मदायुज अन्धक ओर यदुनन्दन दृष्णि नामक ` 


सस्वसम्पन्न पुत्रको उत्पन्न क्रिया उनके चार वंश चके; 
उनको आप विस्तायुर्वक सुनिये ॥ १-२॥ 


भजमानस्य खजय्यौ वाष्टाकाथोपबाष्यका 1 
आस्तां भां तयोस्तस्माज्जलषिरे बहवः सुताः ॥ २ ॥ 

भजमानके खञ्यकी पुरी वाह्यकरा ओर उपव्ाह्यका 
नामवाटी दो चर्यो थीं । उनखे उसके बहुतसे पुत्र उत्यन्न 
हए ॥ ३ ॥ 


मिश्च क्रमणस्ैव . धृष्टः शूरः पुरंजयः । 
पते वाद्यकखञजय्यां भजमानाद्‌ विजक्षिरे ॥ ४ ॥ 


मजमानके खज्ञयकी पुत्री ब्राहमकासे कृमि, क्रमणः 
धृष्ट छर ओर पुरंजय नामक पुत्र उयन्न हुए ॥ ४ ॥ 


अयुताजित्सहस्नाजिच्छताजिश्वाथ दाशकः । 


हरिर्वक्शषपवं ] 


स््िद्रोऽप्ययः 


१२९. 


उपवाह्यकष्टय्यां भजमानाद्‌ विजक्षिरे ॥ ५ ॥ 
उरन्दी मजमानके खञ्ञयकी दूसरी पुरी उपवाह्यकराते 
अयुताजित्‌, सदसाजित्‌, शताजित्‌ ओर दाशक नामक युर 
उयन्न हुए ॥ ५ ॥ 
यञ्तरा देवाचृधो राजा चचार विपुलं सपः! 
सरवयणोपितो . 
पुः सर्वगुणोपेतो मपर स्याधिनि निशितः ॥ ६ ॥ 
यज्ञ करनेवाले राजा देवाबधने भ्मेरे सर्वयुणसम्पन्न पुन्न 
होः इस निश्चयकरे साथ बड़ा भारी ततप किया ॥ ६ ॥ 
संयुञ्यातमानमे्ं तु पणीश्षाया जलं स्पृशन्‌ । 
सदोपस्पृश्वस्तस्य चकार प्रियमापगा ॥ ७ ॥ 
वे राजा अपने चित्तम एसा निश्चय कफे पणांशा नदीके 
ज्ये खड़े होकर तप करते थे ! अपने जलम सदा खड रहने- 
वाङ राजाका न्दने प्रिय करना चादा ॥ ७ ॥ 
चिन्तयाभिपरीता सा जगपिक्राभिनिश्चयम्‌ । 
कटयाणन्वान्नरपतेस्तस्य सा निम्नगोत्तमा ॥ < ॥ 
नाध्यगच्छत तां नारीं यस्यामेवंविधः सुतः । 
जयेत्‌ तस्मात्‌ स्यं हन्त भवाम्यस्य सवता! ९ ॥ 
उसको एेसी कोई स्री नहीं दीखीः जिसके द्वारा टे 
पुर उदयन्न दौ सके । तव चिन्तासे व्याप्त दोकर नदि्यभि रेष्ठ 
पर्णाशाने उस राजाका कल्याण कसले सिय एकान्तम यद 
विचार किया कि भै ही इनकी सहचारिणी बन जाँ ८-९ 
अथ भूत्वा कुमारी सा धिश्रती परमं चपुः। 
वर्यामासर नरपति तामियेष च स प्रभुः॥१०॥ 
तदनन्तर उसने कुमारी बनकर श्रेष्ठ रूप धारण करके 
राजाको वरना चाहा ओर राजाने भी उसको पल्मी वभौना 
चाहा ॥ १० ॥ 
तस्यामाधत्त गभं च तेजखिनपुदास्धीः। 
अथ सा दशमे मासि खघुवे सरितां वरा ॥ १९॥ 
पुत्रं सबवेशुणोपेतं वभ्रं देवाद्धाग्डपात्‌। 
तदनन्तर उन महाष्षुदधिमान्‌ राजने उसभ तेजसी गर्भ- 
को स्थापित कियाः तत्र उस दियो श्रेष्ठ पर्णासिने राजा 
देवादृधके वीरयते दसवें महीनेमे सर्वगुणसम्पन्न वभु नामक 
पुत्रे उत्पन्न किया ॥ ११३ ॥ 
अत्र वंशे धुराणक्षा गाथन्वीति परिश्रुतम्‌ ॥ १२॥ 
शुणान्‌ देवावृधस्याथ कीतंयन्तो महात्मनः । 
मर | ‰. “ ५-.-“ 


यथैवाग्रे समं दरत्‌ पयान च तशणान्तिके ॥ १३॥ 
सुना है कि इस वंशके प्राचीन इतिहासको जाननेवाले 
छोग महात्मा देवादृधके शुर्णोक्रा इस प्रकार कीर्तन करते थेः 
पमेहात्मा देवाह्धकौ हम जैसे दूर देदामे देखते येः वैसे ही 
उनको समीपम देखते थे अर्थात्‌ उनको योगवलसे अनेक 
स्प धारण कर सर्वैन एक स्यम विराजमान देखते 
येः ॥ १२-१३ ॥ । 
अश्रः शरेष्ठो मदुष्धाणां देषैदेवादृधः समः । 
पष्टिश्च षट च पुरुषाः सस्राणि च सप्त च ॥ १४॥ 
पतेऽशृतत्वं सभ्पाप्ता वश्दवाच्रधावपि । 
बभ्रु मनुम्योमे शरेष्ठ द ओर देवादृध देवता समान ई 
सात हजार छाछठ पुरर्षोसहित वभु ओर देवाद्रध अमृतत्वको 
प्राति हो गये अर्थात्‌ सं्रामभूमिमे अपने प्रार्णोको स्यागकर 
अह्षलोकम पर्हुच गये ॥ १४१ ॥ 
यज्वा दानपतिर्विदान्‌ बहमण्यः सुददायुधः ॥ १५॥ 
कीर्तिमांश्च महातेजाः खाच्वतानां महावरः। 
तस्यान्ववायः सुमहान्‌ भोजा ये मार्तिकावताः ॥ १६ ॥ 
राजा ब्रश्ु दनि्योमि शरेष्ठः यज्ञ करमेवष्टिः विद्वान्‌ 
ओर ब्राह्षणमक्त थे । उनके आयुधे बडे षद ये। वे कौर्तिमान्‌; 
महातिजखी तथा सत््वतवंशियोमे परम ष्ठ थे उन 
वभुका वंश बहुत बड़ा दैः मा्तिकावतमोन उनकी ही 
संतानेमिं दं ॥ २५.१६ ॥ 
अम्धक्ात्‌ कादयदुहिता चतुयोऽलभतात्मजान्‌। 
कुकुरं भजमानं च शमि कम्बरवर्हिंषम्‌ ॥ १७ ॥ 
अन्धक्रसे कारिराज ( दृदाश्च ) की पु्रीके दवार कुकुरः 
भजमानः शमि ओर कम्बल्वर्हिष नामक चार पुत् 
उन्न हए ॥ १७ ॥ 
कुङ्रस्य छतो धूष्णुष्णोस्तु तनयस्तथा । 
कपोतरोमा ` तस्याथ तैत्तिरिस्तनयोऽभवत्‌ ॥१८ ॥ 
ुुरके युत पूष्णु ओर धृष्णुके पुत्र कपोतरोमा 
हपट तथा उनके सुच तैत्तिरि हए ॥ १८ ॥ 
जक्षि . नवैसस्तसमादभिनित्‌ ख पुन्वंसोः। 
तस्य वे पुत्रमिधुनं वभूवाभि्नितः किङ ॥ १९ ॥ 
तैकतिरके यु युनर्बसु हुए, पुन्सुके पुत्र अभिजित्‌ हुए; 
उन भभिनितुके एक पुर ओर एक पुत्रीय दो जुवं 
संताने हुदै, एेसी वात सुनी जाती है ॥ १९ ॥ 


१३० 


आहुकश्चाहुकी चैव स्यातौ ख्यातिमतां वरौ । 

शमां चोदाहरन्त्यत्र गाथा प्रति तमाहुकम्‌ ॥ २० ॥ 
ख्यातिप्रा्त लोभ श्रे वे दोनों आहुक ओर आहुकीके 

नामसे प्रसिद्ध हुए । न आहुकके सम्बन्ध ( मनुध्य ) इस 

गाथाक्रो गाया करते  ॥ २०॥ 

दवेतेन परिवारेण किशोस्प्रतिमो मष्टान्‌ । 

अदीतिचर्मणा युक्तः ख दपः प्रथमं यजेत्‌ # २१॥ 
वह तस्ण पोडेके समान उत्साष्टी राजा जब्र अपने विश्य 

परिवारके साथ चलते ये, तच उनके ( काठके चने) सज- 

सिदामनकरो अस्सी मनुष्य उठाया करते ये ॥ २१९ ॥ 


नापुश्रवान्‌ नाशवत्दो मासदस्लश्षतायुषः। 
नादुद्धकमी नायञ्खा यो भोजमभितो यजेत्‌ ॥ २२॥ 


उन भोजके साथ उर परकर चलनेवले रोगि णेस 
कोद नदीं था, जो पुत्रहीन टौ अथवा सैकदोकी दक्षिणा 
देनेवाल न हो अथवा सैकढरो-सदलो वर्पोकी आयुबाला न 
दो अथवा अशुद्ध क्म करनैवाद्य हो तथा यश करने- 
वालानष्ो॥२२॥ 


पृवेस्यां दिशि नागानां भोजय्येत्यञुमोदनम्‌ 1 
सोपासङ्गादकपौणां ध्वजिनां सवरूथिनाम्‌ ॥ २३ ॥ 
रथानां मेघप्रोपा्णां सदस्लाणि दीव तु । 
रूप्यकाञ्चनकक्षाणां सहस्याणि दृश्ापि च ॥ २४ ॥ 

पूवं दिशा्मे राजा मोन ( आहुक ) का अमिनन्दन 
करनेके व्यि चोदी ओर षोनेकी सौकठेंति येपि जानेवाले 
दस हजार हाय आति ये तथा उपासन ( घुभा ), अनुकर्षं 
( रथके नीचेका काष्ट ) जीर वरूथ ( रथत्राण कवच ) वलि 
एवं मेरवोक्री मेति घोष करनेवठे ध्वजाधारी दख हजार रथ 
उनका सखागत करनेके व्यि अते ये ॥ २३-२४॥ 


तावन्त्येव सष्टस्राणि उत्तरस्यां तथा दिशि 1 
आ भूमिपालान्‌ भोजाः खाुपति्ठच्िद्धिणीकिणः॥२५॥ 


उतने दी हजार स्थ ओर हाथी उत्तर तथा अन्य 
दिडार्मिं भी राजा आहुकका अभिनन्दन कसनेके च्य अति 
ये । मोजवशी यादव सव्र सामरन्तोको वशम करके आहुककी 
उपासना करते थे } राजा आहुकने उन सवके रथ सोनिकी 
पेर्यो-र्धूुरर्थोवले वनवा दि ये ॥ २५॥ 


श्रीमहाभारते सिखभागे 


[ हरिं 


गादुकरीं चाप्यवन्तिभ्यः खसार दृदुर्धक्राः। 
आहुकस्य तु फादयायं द पुत्रौ सम्वभूवतः ॥ २६॥ 
देवकश्चोप्रसेनश्च दरेवपु्नसमावुभौ । 

अन्धकवंदिरयोनि आुककी वदिन आटुकीको यचन्तिक 
राजववंगर्मे म्याद्‌ दी । यहुकके कायिराजकी पुत्रीय देवकुमारो. 
फे समान सुन्द्र देवफ ओर उग्रेन नामके दौ पुप्र 
उन्तन्न दुष्ट ॥ २६१ ॥ 


देवफस्याभवन्पुघ्रा्चत्वारखिदश्योपमाः ॥ २७ ॥ 
देववायुपदेवश्च खेयो देवरक्षितः। 
देवकके देवेकरमार्यो-ञैमे देवान्‌ उपदेव, सदेव ओर 
देवरधित नामे चार पुत्र ये ॥ २७१ ॥ 
कुमायः सप्त चाप्यासन्‌ वसुरेवाय वा द्द 1 २८ ॥ 
देयकी शन्तिदरेवा च सुद्रेवा देवगक्षिता। 
दृकटरेव्युपदेवी च सुनासी चैव सप्तमी ॥ २९॥ 
उर्दि देवकी, बान्तिदेवा चदेवाः देवरक्षिता, वृकदेवी, 
उपदेवी ओर सात्वं सुनासी--दम प्रकार सात पुर्यो यी 
देवकरने उन सत्रका विवाद वबुद्रैवमीके साथ कर द्वियाथा॥ 
नयोग्रतेनस्य सुतास्तेषां कंसस्तु पूर्वजः। 
न्यप्रोधब्च सुनामा च कड शारः भूमिपः ॥ ३० ॥ 
राष्पाखोऽथ उउतञ्चरनाधृषश्य पुमान्‌ । 
तेषां स्वसारः पञ्चा ऽऽसन्‌ कंसा कंसवती तथा ॥ ३१॥ 
ख्छननू. रष्पाली च कटरा चैव घराद्गना । 
उग्रसेनः सहापत्यो व्याख्यातः फुकुरोद्धवः ॥ २२ ॥ 
उग्रथेनके नो पत्रय, उनम कंस सवते वदा या] 
शोके नाम हस प्रकार ह-न्यप्रोधः सुनामाः कष्टः सुभूमिप 
शङ्क, रषटरपाट, सुतनु, अनाधृष्टि ओर पुष्टिमान्‌ । इनकी 
कंसा, कंसवती, सुनन्‌, रषट्रपाटी ओर कदा नामकी पच 
सुन्दराद्री बनें थी } इस प्रकार कङुरवंभमे उच्यन्न हुए 
उग्रेन ओर उनकी संतानका वर्गन क्रिया गया ॥३०-३२॥ 
छक्रणामिमं वंशं धास्यन्नमितौजसाम्‌ । 
आत्मनो विषु वंशं प्रजावानाप्तुधान्नरः ॥ ३२ ॥ 
जो मनुप्य इन अमिततेजती कुद्रोकि वंशका वर्णन 


सुनता है वह्‌ संतान पाता दे तथा उसके वंशक्री वही बृद्धि 
होती दै ॥ ३३ ॥ 


इति श्रीमद्याभारते लिरूभगे इरिनदो हरिवंदापर्वणि सर्विशोऽध्यायः ।; ३७ ॥ 
इस प्रकार श्रीमदामास दिरूभाग इरिरंदके भन्तपैत इिशपवेने ( बजुवश-चर्णन-विषयफ ) सती भ्या पूरा हुम। ॥ ३७ ॥ 


हरिवंशपवं ] 


यष्टि ऽध्यायः 


१२१ 


अष्टत्रिदोऽध्यायः 
भजमानके वंशका वर्णनं ओर स्यमन्तकपमरणिकी कथा 


वैशम्पायन उवाच 
भजमानस्य पुरोऽथ रथमुख्यो विदुः! 
राजाधिदेवः शुरस्त॑विदुरथसुतोऽभवत्‌ ॥ १ ॥ 
वैदास्पायनजी कहते है--राजन्‌! अन्धकपुच मजमान- 
के रथिरयमिं मुख्य विदूरथ नामक पच हुआ } विदूरथके पुत्र 
शूरवीर राजाधिदेव हए ॥ १ ॥ 
राजाधिदेवस्य सुता अक्षरे वीर्यवत्तराः । 
दत्तातिदचविनौ शोणाश्वः दवेतवा्टनः ॥ २ ॥ 
शमी च दण्डकामी च दण्डशावुश्च शश्चुजिव्‌ 1 
भरवणा च विष्ठा च खसारौ सम्बभूवतुः ॥ २ ॥ 
राजाधिदेवके वख्वान्‌ दन्त ओर अतिदत्तः सोणाश्चः 
श्वेतवाहनः शमी, दण्डशर्मा, दण्डदानं ओर शातरुजित्‌ नामकं 
प्रम घख्वान्‌ पुत्र उस्न दए ओर श्रवणा तथा भविष्ठा 
नामकी दो कन्यार्पे हुई थी |} २-३ ॥ 
शमीपुघ्रः प्रतिक्षञ्नः प्रतिक्षन्रस्य चात्मजः। 
खयंभोजः खयंभोजाद्ुदीकः सम्बभूव ह ॥ ४ ॥ 
शमीके पुत्र प्रतिक्चने हुए प्रतिक्ष्नके पुन स्वयंभोज 
ओर खर्यभोजके पुत्र ददीक हुए. ॥ ४॥ 
तस्य पुष्रा बभूवु सवं भीमपराक्रमाः । 
छृतवमी्रजस्तेषां श्तधन्घाथ मध्यमः ॥ ५ ॥ 
दृदीकके सभी पुत्र भयंकर पराक्रमी थे, उन्म कृतयमां 
समसे पटले उत्पन्न हुए. ओर दतधन्वा उमके म्ले पुज ये| 
देवपे्वचनात्‌ तस्य भिषग्‌ वैतरणश्च यः। 
खुदान्तश्च विद्‌ान्तश्च कामदा कामदन्तिका ॥ £ ॥ 
देवि ' उयवनके चचनसे शतधन्वाके भिषक्‌, वैतरणः 
सुदान्त एवं विद्रान्त नामक चार पुत्र उत्पन्न हुए तथा 
कामदा ओर्‌ कामदन्तिका नामकी दो पुन्यो उत्पन्न हु ॥ 
देवर्वाश्चाभवत्‌ पुत्रो विद्वान्‌ कम्वरुवर्दिषः। 
असमीजास्तथा वीते नासमौजाश्च ताबुभौ ॥ ७ ॥ 
( अन्धक्पुत्र ) कम्ब्रखवर्हिपके पुत्र विद्वान्‌. देवान्‌ दए 
तया वीर असमौजा तथा नासमोजा नामक दो पुच्र 
मीर हुए ॥ ७ ॥ 


अजातपुत्राय खता प्रददाघसमौजसे 1 
खद चाररूपं च रष्णमित्यन्धकादयः ॥ ८ ॥ 


अन्धकके ( कुकुर आदिक अतिरिक्त › सुद्र, चाररूप 
ओर कृष्ण नामके तीन पुत्र ( ओर) ये । अन्धकने उन 
तीनौँ पुर्बोको पुत्रहीन असमौजाको दे दिया ॥ ८ ॥ 


पते चान्ये च बवे अन्धकाः कथितास्तव } 
अन्धकानामिमं वंशं धारयेद्‌ यस्तु नित्यशः ॥ ९ ॥ 
आत्मनो विपुर चंदं रभते नात्र संशयः । 


इनका तथा ओर भी वहुत-ते अन्धकवंदी राजार्ओका 
आपसे वणेन कर दिया । ज पुरुष नि्यप्रति अन्धक्ोके इस 
वंशका वर्णन सुनता है उखका वंश अति विस्तृत दो जाता है 


, इसमे कुछ संदे नदीं दे ॥ ९६ ॥ 


गान्धारी चैव माद्री च क्रोष्टुभार्ये बभूवतुः ॥ १० ॥ 
गान्धारी जनयामास सनमिनं महावलम्‌ । 
माद्री युधाजितं पुं वतो त देवमीदुषम्‌ ॥ १९॥ 


यदुपुत्र करोष्टके गान्धारी ओर माद्री नामकी दो मारय 
यीं । गान्धारीके पुत्र महाबली अनमित्र हुए तथा माद्रीके पुत्र 
युधाजित्‌ ओर देवमीद्वान्‌ हुए | १०-११ ॥ 
सअनमित्रममिघ्राणां जेतारमपराजितम्‌ । 
अनमिश्रधतो निष निष्नतो दो बभूवतुः ॥ ९२ ॥ 
प्रसेनश्चाथ सजाजिच्छन्रुसेनाजिताबुभौ । 


अपराजिते अनमित्र श्ुर्भको जीतनेवाठे थे } अनमिच- 
के पुर निघ्न ट निष्नके प्रसेन ओर साजित नामे दो 
पुज्र उत्पन्न हुए वे दोनो गाचर्ओकी सेनाओंकतो जीतने- 
बलि थे॥ १२१ ॥ 
प्रसेनो दारव्यां तु निवसन्त्या महामणिम्‌ ॥ १२ ॥ 
विन्य स्यमन्तकं नाम समुद्धादुपर्ब्धवान्‌ । 
चस्य सत्राजितः खयः सखा प्राणसमो ऽभवत्‌ ॥ १४ ॥ 
द्वास्कापु्ीमे असते समय प्रेनकेः स्यमन्तक नामकी 


दिम्य मणि सृपरुदके तरपर परम्परासे प्राप्त दुई थी । प्रसेन 
भाई सत्ताजितके सयनारायण प्राणके समान प्रिय मि ये ॥ 


१३२ 


~~ 


स॒ कदाचिल्िरापाये रथेन रथिनां वरः । 
अग्धिक्रूढसमुषस्पष्टुमुपस्थातुं ययौ रचिम्‌ ॥ १५ ॥ 

रथिर्येमि शरेष्ठ सत्राजित्‌ एक समय रावि वीतनेपर लान 
प्वं सूर्योपस्थान करनेकरे लि समुद्र-तरपर गये थे ॥ १५ ॥ 
तस्योपतिष्टतः सूर्यं वित्रख्वानश्रवः स्थिः । 
अस्पष्टमूर्िर्भगवांस्तेजोमण्डखवान्‌ प्रभुः ॥ १६॥ 
अथ राजा विवखन्तसुवाच खितम्रभ्रतः । 


वे सूर्यौपस्थान कर रहे ये कि इतने सूर्यनारायण उनके 
सामने आक्र ख्डेषो ग्ये ! उख समय सर्व॑शक्तिशम्पन्न 
भगवान्‌ सूर्यदेव अपने तेजस्वी मण्डलठके मध्यमे बिराजमन येः 
इस कारण उनका रूप स्पष्ट न्ट दीख रहा था । उस्र समय 
राजने अपने सामने खड़े हुए भगवान्‌ सूर्यसे कदा--] १६१] 


यथवं व्यो परयामि सदा त्वां उ्योतिपाम्पते ॥ १७॥ 
तेजोमण्डलिनं देवं तथैव पुरतः स्थितम्‌ । 


को विशेषोऽस्ति मे स्वचतः सख्येनोपामतस्य वै ॥१८॥ 


ध््योतिर्मय ग्रह आदिके स्वामिन्‌ } मे आपको जैसे 
नित्यप्रति आकारा देखता हः वैसे दी मँ आपको तेजका 
मण्डल धारणक्रर अपने सामने खदा हा देख रहार तो 
फिर आपजो मेरे पास मिन्नरतावश पधि, इसमे विप्रता 
क्या हूरई १ ॥ १७-१८ ॥ 
पतच्छ्रुन्वा तु भगवान्‌ मुप्रिरत्त स्यमन्त्रकम््‌ 1 
खकण्टादवमुच्यैव पक्रान्ते स्प्रस्तवान्‌ त्रिभुः ॥ १९ ॥ 
इतना सुनते दी प्रथु सूर्धनारायणते अपने कण्ठसे 
मणिरत्नं स्यमन्तकक्रो उतारकर एकान्तम अल्पा स्ख 
दिया ॥ १९॥ 
ततो विश्रहवन्तं तं दद्रक्षं॑सपतिस्तदरा। 
परीतिप्रनथ वं दृष्टा सुहत रतवान्‌ कथास्‌ ॥ २० ॥ 
तव राजा स्पष्ट अवृयरवोवले सूर्घनारायणके शरीरको 
देखकर प्रसन्न हुए ओर उन्हौनि पूर्यनारायणके साथ मुहू्त- 
मर (दो घड़ी ) तक वार्तारूप क्रिया ॥ २० ॥ 
तमपि भ्रस्तं भूयो .चिषखन्तं ख सघजिस्‌ । 
खोका्चद्धासयस्येतान्‌ येन त्वं सततं प्रभो । 
वपरेवन्प्रणिरत्नं मे भगवन्‌ दातुमर्हसि ॥ २१९ ॥ 
वातचीत करने अनन्तर जवर सूर्यनारायण भिर चट्ने 
तफरोः तव सत्राजित्‌ने उनसे कदा-'मगवन्‌ ! आप जिसपे सद्रा 


श्रीमहाभारते खिष्धभपो 


[ द्वये 


इन तीनो छोकोको प्रकामित करते रते £ उस स्यमन्तक- 

मणिक सुस्ने दे दीनि ॥ २१॥ 

ततः स्यमन्तकम्रणि दन्तवांस्तरस्य भास्करः । 

स॒ तमावद्ध्य नगयी प्रविवेश महीपतिः ॥ २२॥ 
तव सूर्यनारायणने वह श्यभन्तक-मणि उन्दँ दे दी ओर 

राजानि उसे बोधकर नमसे प्रवेरा क्रिया ॥ २२॥ 

तं जनाः पर्यधावन्त सूयां ऽयं गच्छतीति ह । 

पु विस्मरापचित्वा च राजा त्वन्तःपुरं ययौ ॥ २३ ॥ 
तवतो मनुप्य ध्येसू्यजा रहै हैः कहते हुए उनके 

पीछे दौ । इस प्रकार नगरीको विसित करते हए वे गजा 

अपने रनवासमे चले गये ॥ २३॥ 

तत्‌ भ्रसेनजितं दिव्यं मणिरत्नं स्यग्नन्तकम्‌ । 

दृदौ रात्रे नरपतिः भेम्णरा सजाजिटुचमम्‌ ॥ २४॥ 
तदनन्तर राजा सत्राजित्‌ने मणिरयं रतनरूप वह दिव्य 

खमन्तक-मणनि परमके कारण पने भाई प्रतेनजितूको दे दी ॥ 

सख मणिः स्यन्दते सुफमं चृष्ण्यन्धकनिवेदाने । 

कालवर्षी च पर्जन्यो न च व्याधिभयं ह्यभूत्‌ ॥ २५॥ 
वद मणि जि बरूष्णि ओर अन्धकङकुलबालेके धरम रहती 

थीः उसके य्य वह सुवर्णकी व्रा करती रहती थी । उख 

देर मेध समयपर वर्षा करते थे ओर वरदो व्याधिका मय 

भी नदीं होता था ॥ २५ ॥ 

छिष्ां चनने प्रसेनात्ु मणिरत्ने स्यमन्तके । 

गोविन्दो न च वद्लेमे शक्तोऽपि न जहार सः ॥२६॥ 
श्रीकरप्णते प्रसेनजितसे मणिर्येिं रत्नके समान वह 

दिग्य मणि स्यमन्तक लेनी चाही, परंतु उसने नदी दी । 

श्रीकृष्ण यद्यपि समर्थं येः तथापि वह मणि उदनि वल्मूर्क 

न्दी छीनी ॥ २६ ॥ 

कद्‌ाचिन्मुगयां यातः भसेनस्तेन भूपितः । 

स्यमन्तकरृते सिद्याद्‌ वधं श्राप चनेचरात्‌ ॥ २७॥ 
अमेन एक मय उस मणिसे विभूषित टोकर रिक्रार 

खेलने गये ओर मणिके कारण ही वनम विचरण करनेवाके 

सिहके द्वारा मरे गये ॥ २७ ॥ 

अथ सिहं प्रधावन्तचक्षरजो महदावदछः। 

निहत्य मणिरत्नं तदादाय विलमाविराच्‌ ॥ २८॥ 
तदनन्तर मदाव्री ऋृसयज जाम्ब्रवानूने 'उस दौडते 


हरि्वंशापयं ] 


अषनि्तोऽप्पप्रः 


१३ 


जल 


हृषः विकतो मार डला ओर उस मणिर्न छेक वे भपने 
व्रि ( शुफा ) म धुख गये ॥ २८ ॥ 


न 


तते वृष्ण्यन्धकाः ङष्णं प्रसेनवधकारणात्‌ । 
रार्थनां तां मणेबद्भ्वा सवं एव शशङ्किरे ॥ २९ ८ 
उस समय प्रसेनके मरे जनिसे सभी ब्ृप्णि ओर 
अन्धकौनि यह समन्ा किं श्रीडष्णने सत्राजिपूठे मणि 
मोगी थी; अतएव उन्देनि दी उसको मार डल दोगा॥ 
स श्ाङ्न्यमानो धमौरपा नकार वस्य कक्षणः । 
आदरिष्ये मणिमिति प्रतिक्षाय चनें ययौ ॥ २३०॥ 


यद्यपि उन्दनि यद कायं नहीं कियाथाः शिरि भी 
उन धर्मातमापर सी दका कीना रही थी; अतएव 
प्त मगणिको लजगाः यह प्रतिज्ा करके वे वनेको 
चले ॥ ६० ॥ 
यत्र प्रसेनो सगयामाचरत्‌ तत्र चाष्यथ । 
प्रसेनस्य पष गृह्य ॒पुस्पैरात्तकारिभिः ॥ ३१ ४ 

उन्होनि विश्वासी मनुर्योसि जहौ प्रसेनने शिकार खेत 
था वहो उनके पैरो चिर्होका पता लगाया ॥ ३१ ॥ 


ऋक्षवन्तं भिरिवरं विन्ध्यं च गिरिमुत्तमम्‌ । 
अन्वेषयन्‌ परिश्रान्तः ख ददरश्ं महामनाः ॥ ३२॥ 
उन चिहके सहारे खोज छख्गाते-ल्गाते जव महामना 
श्रीकृष्ण थक गये, तव उन्होने ऋक्षवान्‌ ओर विन्ध्य 
नामक शरे पर्वरतोको देखा }) ३२ ॥ 
सादवं हतं प्रसेनं वे नाविन्दच्चेच्छितं मणिम्‌ 1 ` 
अथ सिंहः प्रसेनस्य शरीरस्याविदुरतः ॥ ३२ ॥ 
च्स्षेण निहतो ष्टः पदैररश्षश्च सूचितः । 
पक्नैरन्वेषयामास शृहासक्षस्य माधन्नः ॥ ३४ ॥ 
्रीकरप्णने वरहो प्रतेनको ओर उसके षोडेको मरा 
हज पाया; परंतु जिसकी उनको इच्छा थीः वह मि 
उन्द बहा नदीं मिली । तदनन्तर प्रसेनकी साशसे थोड़ी 
दूरपर ही रीच्छे द्वारा मारा हु सिंह उन्हे पड़ा हभ 
दीखाः मारनेवलेके पैसैसे यह पता चल्ता यथा किं यह 
रीछ या । तदनन्तर माधवने रीखके पदविद्भेति रीछकी 
गुफाको द्द्ना आरम्भ किया ॥ ३३-३४ ॥ 
महत्युक्षबिले वार्ण शुशाव प्रमदेरिताम्‌ । 
धाव्य कुमारमादाय सुतं जास्व्वतो सूप 1 
्रीडापयन्त्या मणिना मा योदीरित्यथेरिताम्‌ ॥ ३५॥ 


राजन्‌ | उस समय श्रीकृष्णे ( रके व्रिल्के पस 
प्रपर ) एक छैक वा सनी । उक्र सप 
कि धाय जाम्वरवानूकरे बाख पु्रको छेकंर्‌ मणि सिखाती 
इद उससे कह रदी थीः तू रो मत ॥ ३५ ॥ 
घात्युवाच 


सिदः प्रसेनमवधीत्‌ सियो जाम्बवता हतः । 
खुङुपार्क मा सेदीस्तव येष स्यमन्तकः ॥ २६ ॥ 
धाय कह रही थी--मेरे यना | सिंदने प्रसेनकरो 
मार डल ओर सिंदको जाम्बवान मार उख्य; अवतर 
रो मतः यदह स्यमन्तक मणि अवतेरीदहीदै)॥ ३६1 
खुन्यक्तीरुतशब्दुस्तु तूष्णीं षिलमथाविश्चत््‌ । 
प्रविष्य चापि भगवांस्तम्श्षषिखमञ्जसा ॥ २७ ॥ 
स्थापयित्वा विलुद्वारि यदूर्खदगद्धिना सह । 
शाद्गधन्वा विरस्थं तु जाम्बवन्तं ददर्शं ह { ३८ ॥ 
अब धायकी वाते उन्दति स्पष्ट सुन टी; तव भगवून्‌- 
ने बलरामृको तथा यादर्वोक्ो तो गुफाके द्वारपर खड़ा कर 
दिया ओर स्वयं मोन दोकर सीधे चरिल्मे जा धुते । दस्र 
प्रकार शाङ्गधनुषधारी भगवानूने शुफमि अगि बरदकर 
जम्बवान्को देखा ॥ ३७-३८ ॥ 
युयुधे वासुदेवस्तु विखे जाम्बवता सह्‌ । 
याहुभ्यामव गोविन्दो दिवसानेकतिशतिम्‌ ॥ ३९ ॥ 
वसुदेवनन्दन गोविन्द जाम्बवानके साथ अपनी थुजा- 
असि ही इक्कीस दिनतक विस्म युद्ध कसते रदे ॥ ३९॥ 
पिष्टे तु बिं रृष्णे वलरेदपुरःसगः। 
पुरीं दारवतीमेत्य हतं ष्णं न्यवेदयन्‌ ॥ ७० ॥ 
श्रीकृष्णे चिमे प्रवेद करनेके वाद वरहुत दिनाक 
न लैद्रनेपर ब्रस्देव आदिन द्वसकामे जाकर कहा क्ति 
श्रीकृप्ण मारे गये ॥ ४० ॥ । 
वासुदेवस्तु निर्जित्य जाम्बवन्तं महावरम्‌ । 
भेजे जाम्बधर्त्री कन्यामृष्षराजस्य सम्मताम्‌ । 
मणि स्थमन्तकं चैव जग्राात्मचिद्ुदधये ॥ ४२॥ 
( उधर ) श्रीकृम्पने महावली जाभ्बवानूको जीतकर 
ऋक्षराजकी प्यारी पुत्री जाम्बवत्तीसे विवाद किया श्नौर 


अपनी लिता षिद्ध कलेकरे चिप्र स्यमन्तकमणिको भी 
ठे ल्य ॥५१॥ 


१६२३४ 


अनुनीयक्ष॑सजानं निर्ययौ च सदा विखात्‌। 

इारकामगमत्‌ छष्णः भियां परमया युतः ॥ ७२ ॥ 
तदनन्तर श्रीङृ्ण जाम्बवान अनुनय-विनव करके 

विठ्ते निकट अवि ओर परम चोमा पाते हुए द्वारकाको चल 

दि ॥५२॥ 

पवं स मणिमाहत्य विशोष्यात्मानमच्युवः। 

दौ सघराजिते तं॑वै सर्वसाच्चतसंसदि ॥ ४३॥ 
भगवान्‌ अच्युतने इख प्रकार मणिको वकर सव सात्वत 

की समार्मे अपनी विद्यद्धनाको प्रमाणित कर वह मणि 

सत्राजित्को दे दी ॥ ४३ ॥ 

प्वं मिथ्याभिद्तेलन रष्णेनामिध्रधातिना । 

आत्मा विद्योधितः पापाद्‌ विनिर्जित्य स्यमन्तकम्‌ ॥ 
श््रुनाराक श्रीक्रप्णने इस प्रकार मिथ्या दोष रूगनेके 

कारण स्यमन्तकमणिको जीतकर खनेके वराद अपने आपको 

निर्दोच सिद्ध कर दिया ॥ ४४ ॥ 

सघाजितो शश त्वासन्‌ भार्यीस्तासां तं सुताः । 

ख्यातिमन्तदखरयस्तेषां भङ्गकारस्तु पूर्वजः ॥४५॥ 

धीम बातपतिक्ष्चैव उपस्ावांश्च ते धयः। 


सत्राजित्के दख मार्यं यी ओर उनसे सौ पुत्र हुए 
थे; उनम तीन प्रसिद्ध ये; जिनमे सवसे वडा मङ्गकार था। 
८ दूय ) वीर वातपति था ओर तीसरेका नाम॒ उपस्ावान्‌ 
था | ४५१ ॥ 
कुमार्यश्चापि तिखो वै दिश्चु ख्याता नराधिप ॥ ४६॥ 
सत्यभामोत्तमा खणां वतिनी च डढवता । 
तथा प्रघ्रापिनी चैव भार्या रृष्णाय तां ददौ ॥ ४७॥ 
राजन्‌ ! इसी परकरार लिर्येमिं रल्नखरूपा सत्यमामा, दद्‌- 
व्रतधारिणी बतिनी ओर प्रापिनी-ये उन्नी तीन पनिं 
थी, जो दिदा-विदिनार्थ्म प्रसिद्ध थी | इन्मेते उसने सत्य- 
मामाकरा विवाद श्रीङृप्णके सखाय कर दिया | ४६-४७ ॥ 
समासो हकारस्य नारेयश्च नरोत्तमौ । 
जक्ाते युणसम्प्नौ विश्रुतौ रूपसम्पदा ॥ ४८॥ 
मङ्घकारके पुश समक्ष ओर नारेय हुए, ये दोनों अपने 
स्य ओर गु्ेकि कारण म्यम उत्तम माने जाते 
ये ॥ ४८ ॥ 
माद्रीपुध्रस्य जनेऽथ पृद्धिनः पुरो युधाजितः । 
क्ति तनयौ पने; श्वफलट्कच्िघ्रकस्तथा ॥४९.॥ 


धीमहाभारते सिरूभागे 


[ हसविंशे 


( अव क्रोष्ट्री छोरी सनी माद्रीके । पुत्र युधाजितूके 
वंशका वर्णन क्रिया जाता दै-~)माद्रीकरुमार युधाजित्के 
पुत्र पृष्िन हुए तया पूदिनके पुत्र श्वफल्क ओर चित्रक 
दए ॥ ४९॥ 
श्वफल्कः काशिराजस्य सुतां भायौमविन्दत । 
गान्दिनी नाम तस्याश्च सदा गाः प्रददौ पिता॥ ५० ॥ 

श्वफल्कका विवाह कादिराजकी पुत्री गान्दिनीसे हुमा थाः 
इन गान्दिनीके पिता अपनी पु्रीते प्रतिदिन गोदान कराया 
करते ये ॥ ५० ॥ 
तस्यां जन्ते मावाडुः श्रुतवानिति विश्युतः। 
यक्रूयेऽथ महाभागो यज्वा विपुखदक्षिणः ॥ ५९ ॥ 

उन गान्दिनीसे महभाग्यवान्‌ अक्रूरजी उत्यनन इटः ये 

महावाहु अक्रूर शाके रूपम प्रसिद्ध येः इरन्दोनि यज्ञ करके 
चद़ी-बड़ी दक्षिण दी थीं ॥ ५१ ॥ 
उपासद्भस्तथा महग दुर्यारिमेजयः 1 
अविक्षिपस्तथोपेक्षः हाघुहा चरिम्टंनः ॥ ५२॥ 
धर्मधृग्‌ यतिधमौ च गधो भोजो.ऽन्धकस्तथा । 


आवाहग्रतिवादौ च सुन्दरी च वराङ्गना ॥ ५३ ॥ . 
गान्दिनीके अक्रूरजीके अतिरिक्त उपासङ्गः मदूगु, . 


मृदुरः अरिमेजयः अविक्षिप, उयेक्न; श्त्ुव्नः अरिमर्दनः 
धर्मधक्‌, यतिधर्मा, धः भोज, अन्धक्रः आवाह ओर प्रति- 


वाह नामक पुत्र तथा वराङ्गना नामकी स॒न्द्री कन्याभी 


उत्यन्न दुई थी ॥ ५२.५३ ॥ 

विश्रुता साम्बमष्टिषी कन्या चास्य वक्ुधस । 

रूपयौवनलम्पन्ना सर्वसत्त्वमनोहरा ॥ ५४ ॥ 
वे खाम्बदेदाकी रानी प्रसिद्ध हैः इनकी सूप-यौवनते 

सम्पन्न एवं सव प्राणि्योकरे मनक्रो मोहित करनेवाली कन्याका 

नाम वसुन्धरा या ॥ ५४ ॥ 

अक्ररेणोग्रसेन्यां तु खतो दौ कुरुनन्दन । 

प्रसेनश्योपदेवश्च ज्ञाते दंववर्चसौ ॥ ५५॥ 
कुखनन्दन ! अक्रूरे उग्रसेनीके द्वारा देवतकरे समान 

कान्तिवले प्रसेन ओर उपदेव नामके दो पुत्र उत्व हष 

ये ॥ ५५ ॥ 

चिघकस्याभवन्‌ पुत्राः पृथ्॒दिपृथुरेव च" 

अश्वग्रीबो.ऽश्ववाहुख सखुवादर्वकरगवेपणौ ॥ ५६॥ - 


हरिवंरापवं ] 


अरिष्तेमिरणश्वश्च घमो धमेमृत्‌ तथा ! 
सुबाहु्वहुवाहंश्च धविष्ठाश्चवणे सियो ॥ ५७॥ 
( अक्कूरजीके चाचा ) चि्कके श्रवणा ओर भविष्ठ 
नामकी से धर्मपलिर्यो यीःउनते पृथुःविप्ुःअश्ग्रीवःअश्ववाहुः 
सुपादर्वकः गवेषणः अरिष्टनेमि, अश्व, सुधर्मा, धर्मत, 


पकोनचत्वारिदो ऽभ्यायः 


------------न------------------------------------- ~ 


१२५ 


सुबाहु ओर बहुवाहु नामक पुन्न हुए \ ५६-५७ ॥ 

मां मिथ्याभिश्चस्ति यः छष्णस्य समुदाहृताम्‌ । 

वेद्‌ मिथ्याभिशापास्तं न स्पृशन्ति कदाचन ॥५८॥ 
जो पुरष श्ीक्ष्णके इस मिथ्या कटककी कथको 

पद्ता ३, उसको शठे दोष कभी नहीं र्गते ॥ ५८ ॥ 


इति श्रीमहाभारते खिरुभागे दर हरिवंदापर्वण्यष्टतरिशोऽध्यायः ॥ ३८ ॥ 


हस प्रकार श्रीमदामासत द्विरूभाग रशि अन्तरत दणिरपरवमे ( स्यमन्तकमणिः कथाविवयक्‌ ) 
अदतीस्ः मध्याय पुरा हुमा ॥ ३८ ॥ । 


एकोनचलारिशोऽध्यायः 
खमन्तकमणिके कारण प्रसेन, सत्राजित्‌ ओर शतधन्वाका मारा जाना, बरुदेवजीका 
दुर्योधनको गद्‌-षिधा सिखाना, अक्रूरजीका श्रीकृष्णफो भणि देना 
ओर श्रीकृष्णका पुनः अक्रूरो मणि रोया देना 


वैशम्पायन उवाच 


यत्‌ तत्‌ साजिते ष्णो मणिरत्नं स्यमन्तकम्‌ । 
अदात्‌ तद्धस्यामास चथ इतधन्वना ॥ १ ॥ 


वेदाम्पायनजपि कहते है-जनमेजय | श्रीकृष्णने सत्नाजित्‌- 
को जो मणिर्योमे रनखरूप स्यमन्तकमणि लीटाकर दीः वमु 


(करूर) उसको शतधन्वाके दारा चुरवाना चाहने खगे ॥१॥ 


सदा हि प्रार्थयामास सस्यभामामनिन्दिताम्‌ । 

अक्रूरो ऽन्तरमन्विच्छन्‌ मणि चैव स्यमन्तकम्‌ ॥ २ ॥ 
मणि सुवर्णं देती थी; इस कारण उस्तको चाहते इए 

अकर अनिन्ध सुन्दरी सत्यमामाको सी सदा चाहते थे॥ २ ॥ 

सत्राजितं ततो हत्वा रातधन्वा महाबलः । 

रात्रौ तं मणिमादाय ततो ऽकसाय दन्तवान्‌ ॥ २ ॥ 
एक दिन मौका पाकर मावली शतघन्वाने रान्निमे 

सवराजितको मारकर वहं मणि खाकर अ्ूरजीको दे दी ॥३॥ 

अक्र्रस्तु ततो रत्नमादाय भर्तषभ। 

समयं कार्यांचक्रे नविद्योऽदं त्वयेत्युत ॥ ४ ॥ 
भरतषभ { उस समय अकरुरने रत्न सकर दातधन्वासे 


भति करारी कि आप किंसीको यद्‌ न बताये किं मणि 
मेरेपास ३॥ ४॥ 


“ चयमभ्युपयास्यामः कृष्णेन त्वामभिद्रुतम्‌ । 


ममाद्य द्वारका सवौ वशे तिष्ठत्यसंशयम्‌ ॥ ५ ॥ 
जव श्ीष्ृष्ण ( श्वश्यरके वधसे क्रोधरमे भरकर ) 
आपके पीछे पदमे, तम दम भी आपके साथमे खड होकर 
लद्गे । आजकल सारी द्वारका मेरे वशम है, इसमे भाप छु 
संदेह न समते ॥५॥ 
हते पितरि दुःखत सत्यभामा .याखिनी । 
प्रययौ रथमारुह्य नगर वारणावतम्‌ ॥ £ ॥ 
यशखिनी सत्यभामा पिताके मारे जनेपर बड़ी दुखी दुं 
ओर रथपर चद्कर हस्िनापुरकौ चरी गयीं | ६ ॥ 
सत्यभामा तु तद्दत्तं भोजस्य शतधन्वनः । 
भ्ठर्निवेच्य दुःखातौ पादर्वस्थाश्रूण्यवर्तयत्‌ ॥ ७ ॥ 
वहो दुखिया सत्यभामाने अपने पतिसे भोवरी खतधन्वा- 
की करतूत कदं सुनायी ओर वे उनके पास खडी होकर नेर 
से सू बहाने र्गी ॥ ७ ॥ 
पाण्डवानां तु दग्धानां हरिः ऊत्वोदकक्रियाम्‌ । 
चल्यारथं चापि पाण्डूनां न्ययोज्ञयत्‌ सात्यकिम्‌) ८ ॥ 
ङस समय श्रीकृष्ण ( इस्तिनापुर्म थे ओर लक्षाण्भ) 
मस्म हुए पाण्डर्वोकी उदकक्रिया कर सुकरे येः इसके 


उपरान्त उरन्हनि परण्डवोका अलि-संचयन केका कार्यं 
सात्यकिको सोप दिया ॥ ८ ॥ 


~ 
>. ^ 


१२ 


श्रीयहाभौर्ते स्विरुमाये 


[ दर्वि 


ततस्त्वरितमागत्य दारकं मघुसखूदनः। 

पूवज हलिनं श्रीमानिदं वच्तनमचरवीत्‌ ॥ ९ ॥ 
तदनन्तर श्रीमान्‌ छृप्णचन्द्रने रंत ही द्वाखाधुर्दमि 

अक्र अपने वरहे माई दृट्धरसे यह वीत कदी--॥ ९ ॥ 


हतः प्रसेनः रसिदेन सव्राजिच्छतधन्वना । 
स्यमन्तकः स मद्‌ गामी तस्य धरश्ुरष धिम ॥ १०1 

प्रमो | प्रसेनको सिंहे मार डाख था, शातघन्वाने 
सत्राजित्को मार डाटा । अत्र इस मणिका उत्तराधिकार रश्च प्राप्त 
होता है; अवरम उसका खामी ॥ १०॥ 


तवायोह रथं शीघं भोजं हत्वा महावलम्‌ । 
स्यमन्तको महावाहो स्माकं स भविष्यति ॥ १९१॥ 
'महावाहौ | दस्थि अव आप शीघ्र हयी रथषर चदियेः 
महावटी भोज ( वंशी शतधन्वा ) फो मंसिनके वाद. बह 
स्यमन्तकमणि निस्सदेह हमारी होगी” ॥ ११ ॥ 
ततः धव॑दते युद्धं वसुं भोलकृष्णयौः । 
दातधन्वा ततो ऽक्ररमवेस्लत्‌ सर्वतो दिशाम्‌ 1 १२ ॥ 
तदनन्तर मोजवशी शर्तधन्वा ओर श्रीकृष्णमे घमासान 
युष प्रारम्म हुआ । उस समय ग्रातधन्वा सवर दिदार्य्मिं अक्रूर 
छो देखने खगा ॥ १२॥ 


संरब्धौ ताबुभौ श्रा तत्न भोजजनादनौ । 
शक्तोऽपि शाव्याद्धार्दिकयमक्करो नाभ्यपद्यत ॥ १३ ॥ 
शतधन्वा ओर श्रीकृष्णको क्रोम मरा हुमा देखकर 


अक्रूर समरथ हौनेपर मी शठताके कारण दृदीकके पुत्र शत- 
धन्वाकी सहायता करन नदीं गये ॥ १३ ॥ 


अपयाने ततो बुद्धि भोजश्चक्रे भयार्दितः । 
यौजनानी शतं साग्रं हयया प्रत्यपद्यत ॥ १४॥ 
तव तो भयसे घत्रराया हया दातधन्वा भागनेका विचार 
करने लगा ओर वह घोड़ीपर चदुकर चार सौ कोससे अधिक 
दूर निकर गया ॥ १४॥ 
विख्याता दया नाम शरातयोजनगामिनी । 
भोजस्य वडवा राजन्‌ यया रष्णमयोधयत्‌॥ १५॥ 
राजन्‌ | शतधन्वाने जिस घोड्धीपर चद्कर श्रीकुष्णके 
साथ युद्ध करिया थाः उख घोद़ीका नाम हृदया था ओर षह 
चार सौ कोसका धावा मारेवालीके रूपे प्रसिद्ध थी ॥१९॥ 


क्षीणां जयन च हयामध्वनः दातयोजने 1 
दष्टा रथस्य ता चदि. शत्तधन्वा सम्यजत्‌ ५ १६॥ 
घोड़ी वेगसे चलने कारण चार तौ कोका मार्मं॑तव 
करमैकरे चाद थकन ल्मी | इधर गतधन्वानि श्रीकुप्णके स्थकौ 
बरदुते देखकर भोड़धीको छोड़ दिया ( ओौर वह पैदल 
मागने ख्मा)॥ १६॥ 
ततस्तस्या हयायास्तु श्रमात्‌ सेकाश्च भारत । 
खयुत्पैचुरथ शरणाः छृष्णो राममथान्रवीत्‌ ॥ १७॥ 
भारत | तदनन्तर उस घो्डमि श्रम ओर खेदे कारण 
अपने प्रार्णोको छो दिया । उस समय श्रीकृप्णने चख्देवजी- 
से कदा- १७ ॥ 
चिष्ठस्वह महावाहो दण्दोपा हया मया 1 
पद्धां गत्वा हरिष्यामि मणिरत्नं स्यमन्तकम्‌॥ १८ ॥ 
(महाव्रादौ ! घ्रोडे थक गये है, उनका यद दोष मने 
देख छलिया है; अतः आप यदीं ठहस्यि, म पैदल दी जाकर 
मणियेमिं रतनश्वरूप स्यमन्तक-मणिको छीन लखऊगाः ॥ 
पद्व धामेष ततो गत्वा शतधन्वानमच्युतः । 
मिथिलामभितो राजन्‌ जघान परमास्रधित्‌ ॥ १९॥ 
राजन्‌ | तदनन्तर अस्रवि्याके पारगामी श्रीकृष्णे पैदल 
ह्री जक्रर शतधन्वाकी मिथिखनगरीके समीप मार डाला ॥ 
स्यमन्तकं 'ख नापदयद्धत्वा भोजं महावरम्‌ । 
निदत्त चाव्रवीत्‌ कृष्णं रत्नं देष्टीति लाङ्गटी ॥ २० ॥ 
महावटी मोजवंडी दातधन्वाको मारनेपर मी श्रीकृप्णकरो 
स्मन्तक-मणि न मिटी । श्रीकृष्णे वापस आनेपर बख्देवजी- 
ने उनसे कदां करि '्वह्‌ मणि-रलन दीन्यिः ॥ २० ॥ 


नास्तीति छृष्णश्चोषाच तत्तो रामो रुपान्धितः। 
धिक्छनब्दमसङृत्‌ कृत्वा पत्युवाच जनार्दनम्‌ ॥ २२॥ 


सत्र श्रीकृष्णे कदा-“मणि तो वद्य नदीं मिटी तव 
तो व्देवजीने क्रोधमे भरकर वारत्रार शधिष्छार है ! धिष्छार 
दहै || कहकर श्रीकृष्णे कदा- २१ ॥ 


श्रादत्वान्मषयाम्येष खस्ति तेऽस्तु बजाम्यष्टम्‌] 
कृत्यं न मे द्वारकया न त्वया न च वृष्णिभिः ॥ २२॥ 
ध्माई दहोनेके कारण आपकी इस फरतूतको ओँ 8 रह 


1 


॥। 


हरिवंशपरव 1 


पकोनचत्वारिशोःऽध्यायः 


१३७ 


नज 


टर, आपका कल्याण दौ { भै चरता दर । अव सुनने द्ारकिः 
आपसे ओर दृप्णिवंरियेसि भी कोई काम नदीं है, ॥ २२॥ 


प्रविवेश ततो रामो भिथिलामरिमदंनः। 
सर्वकामेरपहतेरमेथिलेनाभिपूजित्तः ॥ २३॥ 


तदनन्तर द्नुमर्दन बख्देवजी मिथिकापुरीमे चले गये । 


व्हा मिथिखानेरेयने बहूत-पे शरेष्ठ पदार्थोकी भेर देकर वल- 


देवजीका खागत किया | २३॥ 


पतसिन्नेव काले तु वश्रुमतिमतां घरः। 
नानारूपान्‌ क्रतून्‌ सवौनाजहार निरगं खान्‌ ॥ २४ ॥ 


इसी समय बुद्धिमारनमिं शर वशर ( वंशी अक्रूरजी भी ) 
अनेकं प्रकारके बरहुत-से यक्ञोको धड्ल्लेके साथ करने रो ॥ 
दीक्षामयं स कवचं रक्चाथं प्रविवेश ६। 
स्यमन्तकक्ते प्राक्ो गान्दीपुत्रो महायश्चाः ॥ २५॥ 
महायशसखी बुद्धिमान्‌ गान्दीपुचने स्यमन्तकके च्वि 
दीक्षारूयी कक्वको अपनी रक्ता स्यि पिन लिया ( अर्थात्‌ 
यक्मे दीक्षा सेनेवालेको युद्ध करनेका अधिकार नहीं होताः 
इसथ्यि उन्होनि युद्धसे बचनेका यह्‌ मार्ग निकार च्या) ॥ 
अथ रत्नानि चाश्चश्चाणि द्रव्याणि विविधानि च । 
षष्टि वषौणि धंमीवग्र यक्षेषु विनियोजयत्‌ ॥ २६॥ 
उसके वाद्‌ - धर्मात्मा अक्रूरने साठ वर्षौतक यज्ञम 
अनेक प्रकारे द्रव्य ओर उत्तम रल दक्षिणारूपमे दिये ॥ 
अक्रूरयक्षा इति ते ख्यातास्तस्य मदात्मनः। 
बहन्नदक्षिणाः सवे सर्वकामप्रदायिनः ॥ २७ ॥ 
उन महात्माके कयि हुए वे सव यक्च अकरूर-यज्ञोके नामसे 
परसिद्ध ई उनम बहूत-सा अन्न ओर बहुत-सी दक्षिण्यैः दी 
गयीं तथा उन सभी यज्ञेमिं ऋत्विर्जोकी सव प्रकारकी कामन, 
पूण की गयीं ॥ २७॥ 
अथ दुयोधनो राजा गत्वा तु मिथिलां भसुः। 
गदाशिक्षां ततो दिव्यां वभद्रादवाप्तवान्‌ ॥ २८ ॥ 
इसी समय पराक्तिदाटी राजा दुर्योधनने भिथिलपुरीमे 
जाकर वृल्देवजीसे दिव्य गदा-बियाकी रिक्षा गहण की ॥२८॥ 
परसाद्य तु तते समरे बृष्ण्यन्धकमहारथैः । 
आनीतो द्वारकामेव कृष्णेन च महात्मना ॥ २९॥ 


तदनन्तर इष्ण ओर अन्धकरवंसी महारथी तथा महात्मा 
श्रीकृष्ण बरुयामजीको प्रसन्न करके द्वारकमिं ही ल रये ॥ 


सक्ररस्त्वन्धकेः साधंमपायाद्‌ भरतषभ । 
हत्वा सत्नानितं सुप्तं सहबन्धुं म्ाबखम्‌ ॥ २० ॥ 
क्षातिमेदभयाव्‌ कष्णस्तमुपेक्षितवानथ । 
अपयाते तथाक्ररे नावपंत्‌ पाकशासनः ॥ ३१ ॥ 
भरतश्रेष्ठ [ रात्रिम सये हुए महाबली साजित ओर 
उनके भादयोको शतधन्वाके द्वारा मरवाकर अक्रूर ( अपने 
कुटुम्बी कतिपय ) अन्धकवंरिर्योको साथ लेकर माग गये 
येः विंतु श्रीकृष्णने जातिये पएूट पड़नेके भयसे उनकी उपेक्षा 
कर दीः परं अक्रूरफे चले जानेपर इन््रदेवने पपा करना . 
संद कर दिया ॥ ३०-३१ ॥ 


अनाच्ष्श्या यदा राञ्यमभवद्‌ बहुधा छम्‌ । 

ततः प्रलादयामासुरक्रूरं कुकुरान्धकाः ॥ २३२॥ 
जब अनाघ्ष्टि होनेसे राज्यके मनुम्य प्रायः दुर्बरु होने 

रगे? तव कुकर ओर अन्धकवंरिर्योने अक्रूरो अमुनय-विनय 

करके ( द्वारका लौरनेके स्यि ) रजी कर छया ॥ ३२॥ 

पुनद्यौरवर्तीं श्रे तस्मिन्‌ दानपतौ ततः । 

प्रववषं सष्ठस्नाक्षः कच्छे जलनिधेस्तदा ॥ ३२ ॥ 


फिर कया था, उन दानपति अक्रूरे द्वारकापुरीरे वापस 
आति ही सहखाक्ष इन्द्रने. समुदरके तटवतीं प्रदेदापर जोरोसे वर्षा 
करनी आरम्भ केर दी ॥ ३२ ॥ 


कन्यां च वासुदेवाय खसारं शीरसम्मताम्‌ 1 

अक्रूरः प्रददौ धीमान्‌ प्रीत्य कुरुनन्दन ॥ २३४ ॥ 
कुरुनन्दन 1 बुद्धिमान्‌ अक्रूरनीने अपनी शीलवती 

बहिनकाः जो कुमारी 'थी, शरीकृष्णके साथ उनको प्रसन्न 

करनेके ल्ि विवाह कर दिया ॥ ३४॥ 

अथ विक्षाय योगेन रृष्णो बश्रगतं मणिम्‌ । 

सभामव्ये गतं धाह तमक्रूरं जनार्दनः ॥ २५ ॥ 
तदनन्तर जनार्दन श्रीकृष्णने योगके द्वारा यह जानकर 


करि मणि अक्रूरे पारद, समामे बैठे हृ अग्रे ( एक दिन) 
कहा--) ३५ ॥ 


यत्‌ तद्‌ रत्नं मणिवरं तव हस्तगतं विभो । 
तद्‌ भयच्छख माना मयिं मानार्यकं कथाः ॥ २६॥ 


१३८ 


श्रीमहाभारते खिभागे 


[ हस्वे 


ध्माननीय विमो | जो मणिर्न स्यमन्तक आपके पास दैः 
आप उसे दे दीज्यि;, अनार्यताका व्यव्हार न कीज्यि॥ 
बष्टिवपे गते काले यद्वोपोऽभून्ममानध । 
ख संरूढो ऽसरृत्पापतस्ततः कालात्ययो महान्‌ ॥ २७॥ 
“निष्पाप अनूरजी ! साठ वषं पले ( मणिके कारणते ) 
जो रोपर मुने चदा था; बही रोष बहुत समय व्रीतनेपर मी 
शरसे पिर चारबार आ रदा दै (अतः उस्र मणिको मुने 
दे दीनि); ॥ ३७ ॥ 
ततः कृष्णस्य वचनात्‌ सर्वसात्वतसंसदि । 
भवदौ तं मणि बश्ररकलेशेन महामतिः 1 ३८॥ 
इस प्रकार भरीकृष्णके कहनेपर महानुद्धिमान्‌ अकरूरजीनि 
सम्पूरणं साच्वतोकी समामे मह मणि विना क्ट पयिदी 
श्रीकृष्णको अर्पण कर दी ॥ ३८ ॥ 


ततस्तमाजवपापं वशरोह॑स्तादरिदमः। 
ददौ मनाः ङईष्णस्तं मणि बश्चवे पुनः ॥ २९॥ 


तदनन्तर अनरूहजीके हायते खरलतापू्वक मणि पा जाने- 


पर अरिदमन श्रीकणने मन्म प्रसन्न होकर वह मणि फिर 
अक्रूरजीको दे दी ॥ ३९ ॥ 
स कृष्णहस्तात्‌ सम्प्रा मणिरत्नं स्यमन्तकम्‌ । 
आबद्‌घ्य गान्दिनीपुत्रो विरयजांश्युमानिय-1-४०॥ 
तवर श्रीकृष्णकरे दाथसे मिटी हुई मणिर्न स्यमन्तक- 
मणिको -गले्म त्रोधकर गान्दिनीपुत्र अग्र वूर्यके नमान 
सुखोभित हुए ॥ ४० ॥ 
यस्त्वेवं शणुयान्नित्यं श्रुचिरभूत्वा समादितः। 
सुखानां सक्रखानां च फखभागीह जायते ॥ ४१॥ 
इस प्रकार जो मनुभ्य पवित्र होकर साबधानतापररक इस 
कथाको निव्यप्रति युनता रै, उसको फलस्पर्म सम्पूर्णं इल 
प्रा दते है ॥ ४१ ॥ 
आ ब्रह्मुवनाश्चापि यदाःस्यातिन संदायः। 
भविष्यति चरपथेष्ठ सत्यमेतद्‌ ब्रधीमि ते॥४२॥ 
प्रष्ठ | उसकी कीरति नद्मरोकतक पर्चती रै, इसमे 
कुछ संदेद नदीं है, यद मै आपसे सत्य कह रा हू ॥ ५२॥ 


इति श्रीमहाभारते विङमागे हरिवो रिवंहापर्वण्ये- 
कोनचत्वारदिदोऽध्यायः ।। ३९ ॥ 


इस प्रकार श्रीमह्यमास धिरुभाग दरिवेदके भन्तर्पत दखिशषपवमे ( बस्देवर्जकि द्वारा दुरयोधनमो 
गदावियाकी दिक्षागिषयक ) उन्तारीसर्वोः अध्याय पृरा हुमा ॥ ३९ ॥ 


चत्वारिंोऽष्यायः 
जनमेजयका भगवानूके वराह, मूरतिह, परशराम, श्रीकृष्ण 
आदि अनतार्का रदस्य पना 


अनमेजय उवाच 

प्राहुभौवान्‌ पुराणेथु षिष्णोरमिततेजसः। 
सतां कथयतामेष वारा ईति नः श्चुतम्‌ ॥ १ ॥ 

लनमेजयने कष्टा-नद्यन्‌ | मने कथा कषटनेवाछे 
सजर्मोके मुखसे अमिततेजख्वी विष्णुफे अवतारे वराद 
अवतारकी भी बात पुरार्णेमि सुनी रै (बराह शब्दका 
आध्यात्मिक अर्थं वर ओर अह अर्थात्‌ श्रेष्ठ यज्ञ है ) ॥ १ ॥ 
न जाने वस्य चरितं न विधि तब विस्तरम्‌ । 


न कमेगुणसखंतानं न हैतं न मनीषितम्‌ ॥ २॥ 

परंतु मँ उन वराह भगवानुके ८ सर्वकार्यं जनकस्वरूप ) 
न्रिप्रको, ( अपूव॑सखरूपका आविष्कार करनेकी ) विधिकोः 
( अनुष्टानकी आवक्यकता रूप ) दिस्तारको तथा उनके 
क्म ( अर्थात्‌ उसके कर्मसि ठृत होनेवाले देवता आदि ) 
तथा गुण-देश-दन्य-काठ आदि एवं संतान ( प्रयोगविधि ) 
कोः टेठ॒ अर्थात्‌ अधिकारको मौर वे किस अभिप्रायसे 
त्यागात्मक स्वरूपको ग्रहण करते हँ, उसे मँ ऊुख नहीं 
समन्नता ( अतः आप मुञ्चे ये सब बिं समक्नादये ) ॥ २॥ 


` हरिवेदापरयं ] 


न~~ ---- ~~ 


किमात्मको घराहः स का मूर्तिः का च देवता ! 
किमाचारः प्रभावो वा किंवा तेन पुरा रूतम्‌ ॥ २॥ 


( इस प्रकार वराहाबतारफे अधियज्ञस्वरूपकी बात 
पने अनन्तर अब राजा जनमेजय उनके आधिदेविक रूप- 
के विषयमे पूरते ई-) उन वराहका वास्तविक खूप क्या 
हे १ उनकी मूर्तिं ( बाहरी आकृति ) कैषी दै १ उनका 
(अिष्ठावर ) देवता कौन है { उनके कम॑ क्या हँ १ उनका प्रभाव 
केसा दै ओर उन्दने उस अवतार क्या करिया या १॥ ३॥ 


यक्षा समवेतानां मिषतां च द्विजन्मनाम्‌ 
भहावराहचरितं क्ृष्णद्धेपायनेसितम्‌ ॥ ४ ॥ 
मेने इष्णदधैपायनजीका कहा हुभा मदहावराह्का चरित 


यकम एकत्रित हुए ब्रह्मणोके वाद्-चिवादमे सुना ह ८ परव 
उसका तत्त्व मेरी समक्षम नहीं आया ) ॥ ४॥ 


यथा नारायणो जह्यन्‌ वाराहं सूपमाखिितः। 
दृष्या गां समुद्रस्थामुञ्जहररिस्टसनः ॥ ५ ॥ 


ब्रह्न [ मगनान नारायणने जिस प्रकार जरादरूप धारण 
किया ओर उन असिबूदन भगवान जिस प्रकार अपनी 
दिदिसे समुद्के गर्भम पड़ हु पृथ्वीका उद्धार किया, यदं 
सव मुञ्चे आप ततानेकी कृपा करे ॥ ५ ॥ 


विस्तरेणेव कमणि सवबौणि रिपुधातिनः। 
भोतुमिच्छाम्परोषेण हरेः कृष्णस्य धीमतः ॥ ६ ॥ 


मे शनरुसंशारक परम ज्ञानी इरिरूपम भगवान्‌ श्रीकृष्णके 
€ वराह आदि सव अवतारो कयि हुए. ) समी चस्विको 
विस्तारपूर्वक पूर्णरीतिसे खुनना चाहता हँ ॥ ६ ॥ 


कमेणामानुपू्यौश्च प्रादुभौवाश्च ये विभोः । 
या चास्य प्ररतिबरेहीस्तां मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ ७ ॥ 


ब्रह्मन्‌ | लीलाओकि क्रमसे इन सर्वव्यापी भगवान्फे 
जितने भी हुए ह अवतार उन सकी ओर (उन अवतासे- 
के समय उनकी ) जो प्रकृति थी उसकी आप छपा करके 
व्याख्या कीन्ि ॥ ७ ॥ 


कथं च भगवान्‌ विष्णुः सुरशखनिपूदनः 1 
सुदेव्ले धीमान्‌ वाशुदेवत्वमागतः ॥ < ॥ 


शअत्वारिशपे ऽन्यायः 
== 


१३९ 


फिर देवता्करि शघरुर्ओका नाश करनेमारे परम शहर 

मगवान्‌ निप्णु वसुदेवके कुमे उत्यनन होकर बायुदेन 11 

कलये ( अर्थात्‌ वे कर्मबन्धनसे रित होनेपर भी उत्तम 
स्थानसे नीचे स्याने म्यो अयि) १॥८॥ 


अमेदृतं पुण्यं पुण्यहृद्धिर्निषिधितम्‌ 1 

दरेवरोकं समुत्स्ल्य मर्त्यखोकमिष्टागतः ॥ ९ ॥ 
वे देवताति धिरे हुए एव पुण्याताओंद्रास सेबित पनित्र 

देवछोकको छोड़कर इ8 ग्युरोकमे स्यो अये १ ॥ ९॥ 


देवमाञरषयोर्नैतवा यो भुवः भ्रभवो षिसुः। 

किमर्थं दिव्यमात्मानं मानुष्ये संन्ययोजयव्‌ ॥ १० ॥ 
जो देवता ओर मतुष्येक्रे नेता द ओर जो वियु प्थ्णीकर 

भी उत्पत्तिष्यान हैः उन्हेनि अपने दिव्य आत्माको मनुस्य- 

शरीस्य क्यो ख्यापित किया १॥ १० ॥ 

यद्चक्र वर्तयत्येको माचुषाणामनामयम्‌ । 

मायुष्ये स कथं वुद्धि चक्रे चक्र्ेतां वरः ॥ ११॥ 
जो अकेङे ही स्र मनुर््योके ( कर्मसे जन्म ओर जन्मसे 

पुनः कर्मरूप ) चक्रको निर्विष्नतापूर्वक चलति ई, उन चक्र 

धारिय श्रेष्ठ श्रीकृष्णने मनुप्य॒बननेका बिचार क्यों 

करिया १॥११९॥ 

सोपध्यनं यः कुरुते जगतः सार्षलौकिकम्‌ । 

स कथं गां गतो देवो विष्ुगोंपत्वमागतः ॥ १२॥ 
जो जगते सम्पूणं लोकोकी रस्ता कसते हैः वे भगवान्‌ 

विष्णु पृथ्वीयर आकर गोप कैसे बन गये १॥ १२॥ 


महाभूतानि भवात्मा यो दध्र चक्रार च। 
श्रीगमेः स कथं गभं सिया भूचस्या धुतः ॥ १३॥ 
जो समस भूरतोके अन्तरात्मा प्रञ्ु स्वयं महामूर्तोको 
सचते ओर धारण करते ६, उन श्रीगर्भको-पृथ्वीपर विचरण 
करनेवाली ख्ीने अपने गर्भम किस प्रकार धारण 
करिया१।॥ १३ 
येन लोकान्‌ क्रमेर्बित्वा चिभिखीसिदसेन्सया } 
ख्यापिता जगतो मागौखिवर्गप्रमवास्रयः ॥ १४ ॥ 


१४० 


ध्िमहाभार्ते खिरभागे 


[ दरिचंदे 


जिन्दोनि देवतार्ओकी इच्छा पूर्णं करनेके ल्थि तीन वैडो- 
से तीनों लोकोको जीतकर जगतू्मे धर्म; अर्थं ओर कामसे 
प्रात होनेवाठे तीन मार्ग--तीन गतियो यापित कर दीं ( धर्म. 
से स्वर्गं अर्थात्‌ ऊर्ध्वगति, अर्थसे मर्त्यलोक अर्थात्‌ मध्यम- 
गति ओर कामते नरकादि अधोलोक अर्थात्‌ अधोगति 
मिती दै); ॥ १४ ॥ । 
योऽन्तकाले जगच्‌ पीत्वा छृत्वा तोयमयं वपुः । 
छोकमेकार्णवं चक्रे दद्यारदयेन वर्मना ॥ १५ ॥ 
जो भगवान्‌ प्रख्यका््मे दद्य एवं अद्य रीतिसे 
( कारणसद्टित ) सम्पूणं जगत्‌का पान ( भास ) करके अपने 
शरीरको जलमय बनाकर सम्पूण जगत्‌को एक जलमय ही 
कर देते दै, ॥ १५॥ 
यः पुराणे पुराणात्मा वाराहं रूपमासितः। 
चिषाणात्रेण वख्धासुजदासरिखदनः ॥ १६॥ 
प्राचीन समयम जिन पुराणात्मा अरिषूदन भगवानने 
वराहके स्पे अपने दोतिकि अग्रभागसे परथ्वीका उद्धार 
किथाः ॥ १६ ॥ 
यः पुरा ॒पुरुहृतार्थं ओरोक्यमिदमन्ययः 1 
ददौ जित्वासुरगणान्‌ सुराणां सुरसत्तमः ॥ १७ ॥ 
पठे जिन अविनाशी स॒रशरेष्ठने इनके च्यि असुरोकी 
सेनाको जीतकर देवतार्ओको तीर्न लोक ( वापस ) दित्र 
दिये, ॥ १७॥ 
येन संहं वपुः त्वा द्विधा छृत्वा च तत्‌ पुनः । 
पूर्य दैत्यो महावीर्यो हिरण्यकरिपुर्हतः ॥ १८ ॥ 
जिन्दनि पूर्वकाख्मै सिंहका सूप धारणकर ओर फिर 
उसको दो प्रकारका अर्थात्‌ नर्षंहरूम बमाकर महान्‌ परा- 
क्रमी दैत्य हिरण्यकशिपुको मार लः; ॥ १८ ॥ 
यः पुय छनलो भूत्वा ओरवः संवर्तको विभुः । 
पातालस्थो.ऽर्णवगतं पपौ तोयमयं हविः ॥ १९ ॥ 
जिन वियुने पहले ( प्ररख्यकाख्मे ) पाताख्मै जाकर 


ओवैवंशी संवर्तक अग्निका स्वरूप धारण कर समुद्रके जक- 
रूप हवि ( घी) कापान कर लिया; ॥ १९॥ 


सष्टस्ररिरसं व्रह्मन्‌ सहस्राक्षं सष्टसख्रदम्‌ । 
व देवं शै 
सदसरचरणं देवं यमाहुवं युगे युगे ॥ २०॥ 


ब्रह्मन्‌ | प्रसेक युगम जिन भगवानकौ सख अर्थात्‌ 
अनन्त सिरवालाः अनन्त अखोँबवाला; अनन्त दान क्ले 
वाला ओर अनन्त चरणोवाख कदा जाता ट, ॥ २० ॥ 


नाभ्यारण्यां समुत्पन्नं यस्य पैतामहं ग्रहम्‌ । 
पकार्णवजटस्यस्य नष्टे स्थावरजङ्गमे ॥ २१ ॥ 


स्थावर-जङ्गमात्मक जगते छीन होनेपर जिन एक 
समुद्रमय जतम सित पुरुपकी नाभितने प्रकर होनिवाठे कमल- 
नालरूप अरणि ( मन्थनदण्ड ) से पितामहका भवन (लोक- 
कमर ) उत्पन्न हज; ॥ २१ ॥ 


येन ते निहता दैत्याः संभ्रामे तारकामये । 
सवैदेनमयं शृत्वा सवौग्ुधधरं षयुः ॥ २२॥ 


जिन्दोनि तारकामय संमामर्मे अपने गरीरको सर्वदेवमय 
ओर सर्वायुधधारी बनाकर दैर्त्योको मार डाल; ॥ २२ ॥ 


गर्डस्थेन चोत्सिकः कालतेमिर्निपातितः। 
निर्जितश्च मयो दैत्यस्तारकश्च महासुरः ॥ २६ ॥ 


जिन्दोँनि गरुढ़पर वैठकर उद्रण्ड काल्नेमिको नष्ट कर 
दिया तथा मय दैत्य ओर मदान्‌ असुर तारकको 
मार रदः |॥ २३ 


उत्तरान्ते समुद्रस्य क्षीरोदस्याश्तोदधेः। 

यः शेते श्चाश्वतं योगमास्थाय तिमिरं महत्‌ ॥ २४) 
जो क्षीरसमुद्रके उत्तर तटपर खित अमृत-खमृद्रमे योग- 

मायार्प शदवतं योगक्ा आश्रय लेकर शयन करते, ॥ २५ 


खुरारणिगंभ॑मधत्त दिव्यं 
तपःप्रकपीददितिः पुराणम्‌ । 
शक्रं च यो दैत्यगणावरुद्धं 
गभीवसाने निभतं चकार ॥ २५॥ 
देवतार्जोको उत्पन्न करनेवाखी अरणिरूया अदितिने महा- 
तप करके जिन पुराणपुरुष ८ बामन ) रूपी ग्भकौ धारण 
किया ओर जिन्दनि गर्भसे निकल्नेके वाद दैत्यौके चक्रे 
फँसि हुए इन्द्रको दैत्योके चक्रसे सक्त करके पुणंकाम तना 
दिया, ॥ २५ ॥ 
पदानि यो रोकमयानि ङत्वा 
चकार देत्यान्‌ सलिले शयांस्तान्‌ 1 


हरिविशपर्वं ] 


कृत्वा च देवां सिदिवस्य देवां- 
श्चक्रे सखरेशं चिददाधिपत्ये ॥ २६॥ 
जिन्दौनि अपने उगेकर लोकमय करके अर्थात्‌ एक-एक 
डगसे प्क-एक लोकको नापकर द्येक पातार््मै भेज 
दिया, दैवतार्ओको स्वर्गका विहार करनेवाला वना 
दिया ओर देवराज इन्द्रको देवताओं सप्राट्‌-पदपर सापित 


कर दियाः ॥ २६॥ 
पा्नाणि दक्षिणाः दीक्षा चमसोद्ूललामि च । 


मादैपत्येन बिधिना अन्वाहार्येण कर्मणा ॥ २७ ॥ 

जिन्दनि चष्यसू््ेमिं कही हई विधि तथा अन्वादार्य- 
करम # के साथ ( योपयोगी ) चमत; उदूखल आदि पाजः 
दक्षिणा ओर दीक्षा आदिकी स्वना की, ॥ २७ ॥ 
श्निमादवनीयं च वेदीं चैव कुशं स्वम्‌ । 
प्रोक्षणीयं वां चैव आवभरथ्यं तथैव च ॥ २८॥ 

जिन्दौनि आहवनीय अग्निः वेदी, दुवा, कुशैः 
्रक्षणीपात्रः भुवा ओर अवश्य स्नानोपयोगी सामभ्रीकी 
कस्पना कीः ॥ २८ ॥ 


-- स्युधात्रीणि च यश्चक्रे हव्यकव्यप्रद्‌ान्‌ द्विजान्‌ । 


# 


हव्यादांश्च सुरन यक्षे ऋग्यादांस्तु पितृनपि ॥ २९ ॥ 


जिन्दने ( ऊर्ध्वं, मध्य ओर अधोगतिरूम ) सुधा आदि 
तीन भोग्य पदाथ ब्रनाकर ब्राहर्णोको हन्य-कन्य प्रदान 
करनेवाला, देवतार्ओको यकम हवि भक्षण करनेवाला ओर 
पितर्योको ( श्रादधादिम अर्पण क्रिये जानेवलि पिण्ड आदि ) 
कव्य भक्षण करनेवाखा वनायाः | २९ ॥ 
भागां मन्धरविधिना यश्चक्रे यक्षकर्षणि | 
यूपान्‌ समित्‌ स्च सोमं पिन्नान्‌ परिधीनपि ॥ २० ॥ 
` जिन्दनि ( देवताओंका ) भाग निकालनेफे ल्यि मन्त्रके 
मयोगकी विधिके सायन्छाथ यजकर्ममे यूप, समिषा, सुवा, 
सोमः पवि ( वती ) एवं परिधिर्योकी कल्पना की, ॥ २०॥ 


यक्षियानि च द्रव्याणि यक्षांश्च सचयानलान्‌ । 
सदस्यान्‌ यजमानाश्च मेध्याश्च क्रतूत्तमान्‌ ॥ ३१ ॥ 
विवभाज पुरा सयं पारमेष्ठ्ेन कर्म॑णा । 
युगानुरूपान्‌ यः त्वा छोकानञुपराक्रमत्‌ ॥ २२ ॥ 


# पितरोके निमित्तसे प्रति अमवस्याको क्रिया जानेवारा 
माक्िक भाद्ध ) 


चत्वारिदो ऽध्यायः 


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१४९१ 


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निन्दनि यन्ञोपयोगी द्रव्य, यक, ईटेकरि वने अग्नि- 
स्ापनके स्यान तथा आदइवनीय आदि तीन भ्रकारकी अनिर्योः 
सदस्य ( यजञकर्मका निरीष्चण कलनेवाले ब्राह्ण ); यजमाने? 
उत्तम यज्ञ एवं मेध्य आदि पदार्थोका व्रह्माजीकी प्रचलित 
करी हुई विधित विभाग क्रिया ओर जिन्न ठोर्केको युरगोकर 
अनुरूप बनाकर फिर अपना दाय दटा लिया, ॥ ३१-३२॥ 
ष्णा ख्वाश्च काष्ठाश्च कलाखकराद्यमेव च । 
मुह्टतौस्तिथगरो मासाः पक्षाः संदत्सरास्तथा ॥ ३२ ॥ 
ऋतवः कालयोगाश्च भ्रमाणं त्रिविधं जजिपु। 
वयुः स्षेबाण्युपचयो लक्षणं रूपसोष्ठवम्‌ ॥ ३४ ॥ 
जिन्दनि भण, खवः काष्ठा, कलः ( प्रातः, मध्या ओर 
सायंकालकूप ) तीन कालः मुहूतं, तिथि, मासः पर्ष, वर्षः 
छतु, कारके विविध योगः ८ नित्यः नैमित्तिक ओर काम्य 
दन ) तीन प्रकारके ( प्रमेय ) कर्मोमिं ( श्रुति, स्पतिः दिष्टा 
चाररूप ) तीन प्रकारका प्रमाणः आयु, क्षेत्र ( खावर- 
जङ्गम रारीर ), ब्रद्धि, ( दो पैर, चार पैर आदि ) ल््ण 
ओर आङ़तिकी सुन्दरता रची, ॥ ३ २-३४ ॥ 
प्रयो वणयो खोकाखेवियं पावकरास्रयः। 
कार्यं घ्रीणि कमीणि ्रयोऽपायाल्रये गुणाः ॥३५॥ 
जिन्न तीन वणं ( श्रुद्रको यज्ञ करनेका अधिक्रार नीं 
हेः अतः उसका ग्रहण नहीं किया); (भू आदि ) तीन लोकः 
( कः यजुः, सामरूप ) तीन विवर, ( गार्हपत्य, आहव- 
नीय एवं दक्षिण नामकी ) तीन अभियो, ८ मूतः मविप्यत्‌) 
वर्तमानरूप ) तीन कालः ( साल्वक, राजख ओर तामखरूप ) 
तीन कर्म, ( पुमरषणाः विततेमणा ओर लेकैप्रणारूप ) तीन 
अपाय ओर ( सत्व, रज, तमरूप ) तीन गुण स्वे, | २५॥ 
घ्रयो लोकाः पुरा खं येनानस्येन कर्म॑णा । 
सर्वभूतगणसखषएा सवेभूतगुणातसकः ॥ ३६ ॥ 
जिरन्दोनि ( जीरवेकि ) अनन्त कर्मौके कारण तीन लोर्कोौकी 
रचना कीः (साय ही) जो सवर प्राणिर्योको स्वनेवाठे ई ओर 
जिनमे सव भूरतोके गुण रहते ईः ॥ ३६ ॥ 
चरृणामिन्द्ियपूर्वेण योगेन स्मते च यः। 
गतागताभ्यां यो नेता सर्वत्र जगदीश्वरः ॥ ३७ ॥ 
जो जगदीश्वर समसत ब्रदयाण्डम जीवात्साको जन्ममृत्यु 
देनेके कारण सवक नेता द ओर जो ( जीवल्पते ) इद्ि्योका 
विपरयोके साय संयोय करफे सर्वत्र रमण कसते ‰, ॥ ३७ ॥ 


१७२ 


यो गतिधर्मयुक्तानामगतिः पापकर्मणाम्‌ । 
यातुर्वै्यस्य भपभवश्नातु््रस्य रक्षिता ॥ ३८ ॥ 


जो धर्म करनेनार्लोकरी गति ( गन्तव्य स्थान ) ह ओर 
पापकर्म कसेवार्लोक्री अगति दै अर्थात्‌ प्रापकमं करनेवाले 
जिनके नदीं पा सक्ते जो चारो बर्णोके उदयत्तिखान ईद 
( यह बात श््राह्यणोऽस्य मुखमासीत्‌, आदि श्रुतिको ल्य 
करफ़ कही गयी दै ) ओर जो ( जिसमे चार ऋत्विज इमन 
करते ई एेसे ) चातुर्होत्र ( यज्ञ ) > रक्षक ई, ॥ ३८ ॥ 


चातुर्दिधस्य यो वेत्ता चतुराभम्यसंश्रयः। 
दिगन्तसे नभोभूतो वायुरापो विभावः ॥ ३९॥ 


जो ( आन्वीधिकरी, तरयी, वार्ता ओर दण्डनीतिरूप ) 
चार विघाकरि शता ई जो ( ब्रघ्मचर्यः गस्य; वान- 
प्रस एवं संन्यासरूप ) चासो आश्रमेफि आश्वय ई ( अर्थात्‌ 
जिनकी प्रा्निकरे लियि चार्यो आश्नमेक्रि धर्मोकरा पालन किया 
जाता है) ओरदिवारे जिनके गर्भम रहती ६ (अर्यात्‌ जे 
दिगाभोको भी अवक्रागदैतेर्ह) तथा जो वायु, आकाशः 
जल, अग्नि ओर प्रथ्वीलूप ई ॥ ३९ ॥ 


यश्न्द्रसूर्थयोर्योतिर्यागी्चः क्षणद्‌न्तकः । 
यत्‌ परं श्रूयते ज्योतिर्य॑त्‌ परं श्रूयते तपः ॥ ४० ॥ 


जो चन्द्रमा ओर सूर्य॑को भी व्योति देनेवाठे ईः योगीश्वर 
ह, ( मोहरूपी ) राचिका अन्त करनेवाले द, जो परम च्योतिः- 
स्वरूप सुने जति ह अर्थात्‌ जिनका ज्योतिःखरूप नेन्न सर्वत्र 
सव्र कुछ देखता है ओर जो प्रम तपःखरूप सुने जते द 
अर्थात्‌ जो परम तपश्याके द्वारा प्राप होते ईः ॥ ४० ॥ 


यं परं श्राहुरपरं यः परः परमात्मवान्‌ । 
नारायणपया चेदा नारयणपसः क्रियाः ॥ ४१॥ 


जिनको पर ( सूत्रात्मा ) ओर अपर ( विराट्‌) भी 
कते ईह ओर जो परात्पर ६ अर्थात्‌ सृद्ात्मति भी पर माया 
सम्पन्न मदेश्वर सगुण त्र्य ईँ, आत्मवान्‌ ह अर्यात्‌ आत्माके 
समान ही मायारूपी शरीरवलठे ई। वेद नारय्रणका दही 
निरूपणकरतेह। समी करियार्थोका पर्यवसान भी नारायणमे 
ही हेता ६॥ ४१॥ 


नारायणपते 
नासश्रणपरं 


धमं नारायणपरा गतिः 
सन्य नारायणपरं तपः ॥ ४२॥ 


धरम॑करा लक्ष्य भी नारयग्र दैः सम्पूर्ण गतिर्योकी परम 


भरीमहाभारते खिलभागे 


{ श्स्षिदो 


गति नारायण ई नारायण द्वी सत्यके आधार ६ ओर नारायण 
ही तपकरे द्वासय प्राप्य ६॥ ५२॥ 


नारायणपरो मोषो नारायणपरायणम्‌ 
आद्वित्यादिस्तु यो दिव्यो यश्च दैत्यान्तको विभुः॥ ४२ ॥ 
नारायण ष्ठी मोक्षके आधार ६। नारायण द्वी परम आश्रय- 
स्प । जो प्रभु आक्रादामे विचरण करनेवाटे आदिल 
आदि प्रहकि खर्प खित ६ ओर दैर्योका संहार कणे- 
बले द ॥ ४३ ॥ 
युगान्तेष्वन्तक्रो यश्च यश्च छोकान्तकान्तकः। 
सेतो रोकसेदूनां मेध्यो यो मेध्यकर्मणाम्‌ ॥ ४४ ॥ 
जो प्रल्यके समय काटकां रूप धारण कर ठेते ई, संसार. 
क्रा चन्त करनैवठे यमके मी यम मृल्युरी मी मल्यु 
लो्कौरी मर्यादा मँधनेवाठे ८ मनु आदविके मी) सेतु 
अर्थात्‌ मनु आदिको भी मर्यादामें रखनेवलि ह ओर पवित्र 
करनेवाले ८ गङ्गा आदि तीर्थो) को भीं पवित्र करनेवरं ६॥ 
वेयो यो वेद्रविदुषां प्रसुयैः प्रभवात्मनाम्‌। 
सोमभूतस्तु सीम्यानामधिभूतो ऽभिवचंसाम्‌ ॥ ४५॥ 
जो वेदके श्ातार्ओद्वारा जानने योग्य & प्रभुत्व सभाव- 
वाले ( मरीचि आदि )केभीप्रमु द ओर जो सौम्य पुव्पो- 
मे चन्द्रमाकी भति प्रियदर्शन द. जो अग्निक नमान तेजस्वी 
पुर्भोमि अग्निखररूप ह ॥ ४५ ॥ 


मयुध्याणां मनोभूतस्तपोभूतस्तपखिनाम्‌ । 
विनयो नयव्ृ्तीनां तेजस्तेजस्विनामपि । 
सगोणां सर्गंकार्च लछोकदेतुरञुत्तमः ॥ ४६॥ 
जो मनुरप्योकि मनरूप है तपखि्योकरि तपस्म £, जो 
नीतिमान्‌ पुरम नप्नतारूपते विराजमान रदते ई ओर तेज. 
सियो तेजःस्वस्प ह ओर जो खष्ियोके स्वनेबाले तथा 
संसारके सर्वश्रेष्ठ कारण ई ॥ ५६ ॥ 
विंप्रहो विग्रहाणां गतिर्गतिमतामपि। 
आकाशप्रभवो बायुर्बायुभ्राणो हुताशनः ॥ ४७ ॥ 
जो दइयरीर धारण करके अवतार ठेनेवाठे देवताकि 
विग्रदरूप दं, गत्तमार्नोक्धी गति है, आकायमे उयन्न होने- 
वले वायु ह तथा वायुस जीनिवाले अग्निस्वरूप दै ॥४५७]] 
देवा हुतारनप्राणाः प्राणोऽम्ने्मधुसद्नः । 
रसाद्‌ वे शोणितं जातं शोणितान्मांसमुच्यते॥ ४८ ॥ 


हसि्वश्शपवं ] 


चत्वारिंशो ऽध्यायः 


१४२ 


(नव~ 
----------------------((नन ~~~ 


अग्नि देवताओंके प्राण है ओर मधुसूदन अग्निक भी 
ग्राणरदै! (चे अग्निक प्राण वनक्रर अग्निके द्वार क्या करते 
हैः इसको स्पष्ट करते हुए कदते दैः अग्निके द्वार थक्‌ कयि 
हए अन्नके साररूप ) रसते रक्त बनता है ( ओर उससे क्रमाः 
जीरं ब्रनकर गर्म रहता दै, इस ग्रकार वह अग्निके प्राण वन- 
कर्‌ अग्निक द्वारा सारा खषटि-का्यं चलते ई ) ओर रक्तसे 
मोस ब्रनता है ॥ ४८ 


मांसात्तु मेदसो जन्म मेदसो ऽस्थीनि चेव हि । 
सरथ्नो मजा समभवन्मज्नातः श्युक्रमेख च ॥ ४९ ॥ 
मांससे मेद ( चर्वी ) की उत्पत्ति होती है ओर मेदसे 
अख्िर्योकी उत्पत्ति दती ह, दृधयोसि मजा बनती है ओर 
मासि वीर्यकी उत्यत्ति होती है ॥ ४९ ॥ 
शुक्राद्‌ गर्भः समभवद्‌ रसखमूटेलन कमणा । 
तत्रापां परथमो भागः स सौम्यो राशिरुच्यते ॥ ५० ॥ 
गभोँष्मसम्भवोऽग्नियों विनीयो राशिरुच्यते । 
दयक सोमात्मकं विद्यादार्तवं विद्धि पावकम्‌ ॥ ५१ ॥ 
रसम कर्मके द्वारा वीर्यसे गर्भं रहता है, उस्म प्रथम 
माग जलका अंश ( वीर्यं होता है, वह वेत होनेसे ) सौम्य 
रोता है, जल्प्रधान सोमक्रा अंशा होता दै ओर गर्भकी गरमी- 
से अर्थात्‌ जठराग्नि उत्यन्न हुआ ( रक्तरूप ) जो दूसरा 
माग उसमे रहता है, वद ८ रक्त-रादि ) अग्निका यंशा 
कहत्मता है 1 ( इस प्रकार ) वीर्यकरो सोमका अं ओर रज- 
को अग्निका थय समञ्चना चाद्ये ॥ ५०-५१ ॥ 


भागौ रसात्मकौ ह्येषां कीर्य॑ च हाशिपावको । 
कफवगं भवेच्छुक्रं पित्तवगें च शोणितम्‌ ॥ ५२॥ 


कफस्य इदयं ख्यानं नाभ्यां पित्तं प्रतिष्टितम्‌ । 


( पूर्वोक्त रीतिषे ) ये दोर्नो रसके ही भाग ई रर्योकि 
शशि ओर पाक्क अर्थात्‌ शुक्र ओर शोणित इन रस आदिके 
दी सार ई।८( अव्र जगतके अग्निषोमात्मकस्वरूयको सिद्ध 
करते ह ) शुक्र ( वीर्यं ) कफवर्ममै हे ओर रक्त पित्तवर्गभ 
हे । ८ वीर्यके आभ्रयसे रहनेवाठे ओर जिसका देवता सोम रै, 
एते ) कफका स्यान हृद्य है । ( रक्तके आश्रयसे रहनेवे 
ओर जिश्का देवता अग्निदहैः रेते ) पिच्तका सान 
नामि हे ॥ ५२९ ॥ 


देहस्य मध्ये हव्यं स्थानं तन्मनखः सृतम्‌ । 
नाभिकोष्ठान्तरं यत्‌ तु तत्र देवो हुताशनः ॥ ५३ ॥ 


देहके मध्यमे जो हृदय हैः वही मनक्रा स्थान कहरातां 
है ओर नायिकोष्ठके भीतर ८ गणीका अधिष्टाव-देवता ) 
अग्नि रहता है ॥ ५३ ॥ 


मनः प्रजापतिक्षंयः कफः सोमो विभाभ्यते । 
पित्तमन्निः स्मृतं शेतदग्नीषोमात्मकं जगत्‌ ॥ ५४॥ 


( मनका अधिष्ठात्-देवता प्रजापति रोनेके कारण ) 
मनक्ो प्रजापति समन्चना चाहिये, कफ़को सोम समन्चना 
चाहिये ओौर पित्तको अग्नि कहा गया है । इस प्रकार मम्पूर्ण 
जगत्‌ अग्रीषोमात्मक रै ॥ ५४ ॥ 


पवं प्रवर्तिते ग्म वद्धितेऽम्बुदसंनिभे। 
वायुः प्रवेशं संचक्रो सङ्गतः परमात्मना ॥ ५५ ॥ 


जैसे धुप ज्योति, जल ओर पवनते मेष व्रदता है, उसी 
प्रकार गर्भ॑ भी अन्न, अग्निः जल ओर प्राणसे बरदता रै, 
अतएव अचेतन दहै, उसके बद्नेपर ( प्राणवायुक्रा सहचर 
होनेसे जीवरूप >) वायु ईश्वरे साथ उसमे प्रवेश करता दै 
( ओर उसीकरे साथ उक्रमण करता है ) ॥ ५५ ॥ 


ततो.ऽज्ञानि विखजति बिभति परिवद्धंयन्‌ । 
स पञ्चधा शरीरस्थो भिद्यते वदधते पुनः ॥ ५६॥ 


देहम प्रवेद करनेकरे अनन्तर वह ८ प्राणोपाधिक ) जीव 
( सिर आदि ) अङ्गोको स्वता है ओर उनको बदाता हु 
उनको पुष्ट भी करता रहता है । वह ८ प्राणके पाच प्रकारका 
दोनेसे स्वयं मी) पोच भागम त्ैटकर बढता रइता हे ॥५६॥ 


प्राणोऽपानः समानश्च उदानो व्यान एव च 
प्राणः स प्रथमं स्थानं वद्ध॑यन्‌ परिवर्तते ॥ ५७ ॥ 


वे पचि मेद इस प्रकार ईदै- प्राणः अपानः उमान, 
उदान ओर व्यान । इनमे प्राण प्रथम-सखान ८ इस्‌-पिष्ड- 
हदय ) को पुष्ट करता हभ चख्ता रदता र ॥ ५७ ॥ 


अपानः पश्चिमं कायमुवानेोष्यं शरीरिगः। 
व्यानो ज्यायच्छ्ते येन समानः संनिव्तयेध्‌। 
भूतावाक्तिस्ततस्तस्य जायतेद्द्रिथगोखरात्‌ ॥ ५८ ॥ 


अपान प्राणीके ( जघ्चासे लेकर चरणतक ) अधः-ररीर- 
को ओर उदान प्राणीके ( जद्खाअसि उपरके ) ऊर्ध्व-शरीरको 
व्राता है ओर व्यान व्यायाम अर्थात्‌ बल-खाध्य कर्म करता 
है ( अतएव वह शरीरकी सव संधिर्योमि वर्तमान रहता दै ) 
ओर समान (नाभिमे रहकर) खायी ओर पीयी हुई बस्तुर्ओको 


१४४ 


श्रीमष्ःभार्के लिरुभागे 


` { हरिवंशे 


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समान करता है ( यथास्थान परहुचा देता दै ) । इस प्रकार 
प्राणे कर्मोकरा विभाग होनेकरे अनन्तर जीवको इन्दरर्योकरे 
विप्रय ( रूप आदि ) के द्वारा उनकरे आश्रय (अग्नि मादि) 
भूर्तोका साक्षात्कार होता रै ॥ ५८ ॥ 


पृथिवी चायुराकाशमाफो ज्योतिश्च पञ्चमम्‌ । 
तस्येन्द्रियाणि विष्टानि स्वं स्वं योगं प्रचक्रिरे ॥५९॥ 


( इसका कारण यह है किं ) प्रथ्वीः जल, तेज, वायु 
ओर पोचर्वो आकाग--ये सव इन्द्र्यो रूपमे परिणत 
होकर शरीरके अन्तर्गत अपने-अपने नेत्र-गोलक आदि स्थानो 
म प्रविष्ट हो जति है इस प्रकार वे अपने-अपने सजातीयको 
ग्रहण करते ह ( अर्थात्‌ पार्थिव धागेन्धिय पूथ्वीके गुण गन्ध- 
को ग्रहण करती दै, जलीयं रसनेन्दरिय जले गुण ॒रसको 
ग्रहण करती दै, तेजस चक्षु तेजके गुण रूपको ग्रहण करती 
है, वायवीय त्वगिन्दरिय वायुके गुण स्पर्को ग्रहण करती 
है ओर आकारीय श्रोमरेन्दिय आकारके गुण शब्दको महण 
करती है )॥ ५९ ॥ 


~ 


पार्थिवे द्रेदमाडुस्तं भ्राणात्मानं च मारुतम्‌ । 
लिद्राण्याकाश्योनीनि जलात्‌ स्रावः प्रवर्तंते ॥ ६० ॥ 


देदको अर्थात्‌ दके हुए कठिनांशको प्रथ्वीका विकार 
कहते है, प्राणको वायुका, शरीरम खित नौ चिद्रोौको आकारा- 
का विकार कहते दै ओर शरीरे निकल्नेवाठे ( मूत्र 
पसीना वीरय, आदि ) समी साव जलके विकार ६॥ ६० ॥ 


ज्योतिश्वश्चुश्च तेजात्मा तेषां यन्ता मनः स्मृतः। 
ग्रामाश्च विषयाश्चैव यस्य वीर्यात्‌ प्रवर्तिताः ॥ ६१ ॥ 


चषुरिन्द्रिय तेजःस्वरूप है, इन सव पृथ्वी आदिके 
(खम्मिलित) तेजका अंश मन दहै यद समी इन्दिर्योका नियामक 
है--न सव्रको वर्मे रखता है ( मनके संयोगे ही ये सव्र 
कार्यक्षम होती ई ) ] इस मनक वीरयःदक्तिते (रूप आदिके 
आश्रय ) प्रथ्वी आदिका समूह यर गन्ध आदि विपय प्रत्यक्ष 


होते ई अथवा ग्राम-नगर आदि सव मनके खगनेपर्‌ द्वी वरन 
जति ई ॥ ६१ ॥ 


येषं पुरुषः सर्वान्‌ सजक्छोकान्‌ सनातनान्‌ । 

कथं रोके नैधने ऽस्मिन्‌ नरत्वं विष्णुयगतः ॥ ६२ ॥ 
पुस्परोत्तम भगवान्‌ विष्णु दस्र प्रकार दनं सनातन 

ठोर्को करो स्ते रदते ई । रेते विष्णु भगवान्‌ इस मरणस्रीट 

संसारम मनुप्य क्यों वने १॥ ६२॥ 


पच मे संदायो ब्रह्मन्नेव मे यिस्यो महान्‌ । 

कथं गतिगंतिमतामापस्नो मायुर्पी तुम्‌ ॥ ६३ ॥ 
ब्रह्मन्‌. | मुचचे यदी संदेह ओर बदा मारी विस्य ष्षेरदा 

ह किं गतिमाेको मी गति देनेवाके भगवान्ते मतष्य-शरीर 

करंसय््यि धारण किया १॥ ६३ ॥ 

श्रुतो मे स्वस्य वंशस्य पूर्वेषां चैव सम्भवः । 

शोतुमिच्छमि विष्णोस्तु चरष्णीनां च यथाक्रमम्‌ ॥ 
मनि अपने वंशकी ओौर अपने पूर्वजोकी उत्पत्ति चुन लीः 

अव्र म विप्णुकी ओर ब्रष्णिवंदिर्योकी उत्यत्तिको क्रमानुखार 

सुनना चाहता ट ॥ ६४ ॥ 

याश्चर्य परमं विष्णु्दैधे्देत्यैश्च कथ्यते । 

विध्णोसत्पच्विमाश्चयं ममाचक्व महापरुने ॥ ६५॥ 
महामुने ¡ देवता ओौर दैत्य विष्णुको परम अचरनमर 

वतति ईं अतः आप पिष्णुकी अचरजसे भरी हुई उवत्तिका 

मुद्चसे वर्णेन कीज्यि ॥ ६५ ॥ 

पतदाश्चर्यमाद्यानं कथयस् खुश्लावहम्‌ । 

भ्यातवलवी्ंस्य  िष्णोरभिततेजसः। 

क्म चाश्च््॑भूतस्य विष्णोस्तच्वमिदोचथताम्‌ ॥६६॥ 
आप वल ओर वीर्ये स्थि प्रसिद्ध अमित तेजखी 

भगवान्‌ विग्णुके इस सुख देनेवाले आश्चर्यजनक आख्यानको 

सुनादये ओर आश्वर्यस्वरूप विष्णुके कर्मोको तथा तच्वको 

मी अनने उनाद्ये ॥ ६६ ॥ 


हति श्रीमष्टाभारते सिरुभागे दरिवंदो हरिवंदापवणि वराष्टोप्पसतिवर्णने चत्वार्रिदीऽध्यायः ॥ ४० ॥ 


` इस प्रकार श्रीमहामारत खिरमाग हरिवेकतेः अन्तत दरिवंशपर्वमे वरादोत्पततिवर्णनव्रिषयकर 
चारीसरवो अध्याय पूरा दुभ ॥ ४० ॥ 


----<= ~ध्4यनट---- 


दरिवंशपवं 1 पकचस्यारिदोऽभ्यायः १४५ 
एकवतारिदोऽ्यायः 
भगवान्‌ विष्णुरे वाराह, चृविह, पामन, दत्तात्रेय, परराम, श्रीरामः श्रीटृष्ण, 
व्यास तथा कल्कि-अवतारोकी संधिप्त कथा 


देद्रम्पायन उवाच 


प्रश्चभारो म्ास्तात त्वयोक्तः शाङ्कधन्वनि 1 
यथादाक्तिं तु वक्ष्यामि श्रूयतां वेष्णवं यक्षः ॥ १ ॥ 
वैशम्पायनजीने कदा-- तात | तमने सङ्खं धनुष 
धारण करनेवलि मगवान्‌ विष्णुके विष्रयमे यह्‌ प्ररनका महान्‌ 
भार मेरे ऊपर रख दिया । तथापि मेँ यथाशक्ति तुग्र 
परद्नोका उत्तर दुगा । ठम श्रीहरिकी यशोगाया--छीलकथाका 
श्रवणं करो ॥ १ ॥ , 
विष्णोः प्रभावश्चवणे दिष्रचा ते मतिशूत्थिता । 
हन्त विष्णोः प्रवृत्ति च शर्णु दिष्यां मयेरिताम्‌ ॥२॥ 
भग्वान्‌ विष्णुके प्रभावको सुननेमे जो वम्हारे मनकी 
प्रहृत हुई दै, यह बड़े सौमाम्यकी बात है| अर्तः गँ हर्षः 
पूर्वक श्रीहरिकी दिव्य छील-कथाका वर्णन करता हूँ | ठम 
ध्यान देकर उसे सनो ॥ २॥ 


सहस्राक्षं सदस्नास्यं सहस्रचरणं च यम्‌। 
सहस्रशिरसं देवं सहसख्रकरमव्ययम्‌ ॥ २ ॥ 
सहस्रजिद भाखन्तं सदस्ममुकुरं प्रथुम्‌ । 
खखदं सहस्राद सहसखरमुजमव्ययम्‌ ॥ ४ ॥ 
सवनं हवनं चेव हव्यं होतारमेव च। 
पाश्राणि च पवित्राणि वेदि दीक्षां चरं वम्‌ ॥ ५ ॥ 
खफ्सोमं शापमुसट पोक्षणं दक्षिणायनम्‌ । 
अध्वयुं सामगं विप्र सदस्यं सदनं सदः ॥ ६ ॥ 
यूपं समित्कुशं दर्वी चमसोदूखखानि ख । 
भाग्वशं यक्षभूमि च होतारं चयनं च यत्‌ ॥ ७ ॥ 
इस्न्यतिप्रमाणानि चसणि स्थावराणि च । 
प्रायधित्तानि चाथं च स्थण्डिखानि कुशांस्तथा ॥८॥ 
मनं यक्षवदं वहि भागं भागव च यत्‌ । 
अप्रेथजं .सोमसुजं घतार्सिषमुदायुधम्‌ ॥ ९ ॥ 
आहुर्वेदविदो विप्रा यं यक्षे शाश्वतं विभुम्‌ । 
. तस्य विष्णो; सुरेशस्य ध्रीवत्छाङ्कस्य धीमतः ॥ १०॥ 
प्रादुभौवसहस्राणि अतीतानि न संडायः। 
भूयश्चैव भविष्यन्तीत्येवमाह धभजापतिः ॥ ११ ॥ 
वेदवेत्ता ब्राह्मण जिन्ं सहसमुख; सहने, सदस- 
चरण, सदस-शिर+ सदख-करः अविनाशी देवः, सहो 
जिङ्ाओंसि युक्त प्रकाशमानः सदसो मुङकुटेति खुरोमितः पसु 
सदसौका दान करनेवाले, सदखो प्राणियोके आदिष्टाः 
सहसबाहु, अविकारी, स्वन ( यशेपयोगी कार ), इवनसूप 


कर्म॑, हव्य ८ हवनीय पदां ), होता ( यजमान ) यशपात्रः 
पविच्रकः वेदी, दीक्षाः चख, खवाः खकः सोमः सूपः मूलः 
प्रोक्षणी (पात ), दक्षिणायन, अध्वयुं ( यजु्वदी ) साम गान 
करनेवाला बराह्मणः सदस्य, पत्नीशालयः समा, यूपः, समिधाः 
कुरा दर्वी, चमस, ऊख, प्राग्वंश ( यज्ञमण्डपर्म यित 
यजमान-ग्ह ), यक्षभूमिः होता ( ्रुतविज ), चयन ( ईरयैकी 
वनी हुई बेदी ), छोये-वदे चराचर जीवः प्रायधिकत्तः प्रयोजनं 
या फल; खण्डिक ( वेदी ); कुक; मन्त; यञ्चवाहक अभ्रिः 
देवतार्ओका भाग, भागवा्कः अग्रासनभोजीः सोममोक्ता, घीकी 
आहुतिषे उठनेवाली ज्वाला, उदायुध ( यज्च-समापिके समय 
की जानेवाटी उदयनीय नामक इष्टि ) तथा यर्म विद्यमान 
सनातन प्रयु कते दै, उन श्रीवत्सचिहविभूष्रित देवेश्वर 
बुद्धिमान्‌ भगवान्‌ विम्णुकरे सखो अवतार दो चुके है ओर 
भविष्यमे भी समय-समयपर बारंबार रोते रदगे--दस्मे संशय 
नदीं है | एेखा प्रजापति ब्रह्माजीका कथन ३ ॥ ३--११॥ 
यत्‌ पृच्छसि महाराज पुण्यां दिव्यां कथां द्युभाम्‌। 
यद्‌थं भगवाम्‌ विष्णुः खुरेखो रिपुसूदनः । 
देवल्येकं समुत्खज्य वघुदेवङ्कङेऽभवत्‌ ॥ १२॥ 
तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि श्णु सर्वमशेषतः! 
वासुदेवस्य माहात्म्यं चरितं च मदाद्युतेः ॥ १२ ॥ 
महाराज !{ तरुम जिस पवित्रः दिव्य एवं मङ्खल्मयी 
कथाको पृष्ठ रदे हो, उसका तया जिस उदेश्यकी सिद्धिके ल्थि 
देवताओकि खामी शत्नुनाशक मगवान्‌ विष्णु देवलोककोत्याग- 
कर वसुदेवके कुर्म अवतीर्णं हुए ये, उसका भी मँ तुमसे 
मली्मोति वणन कर गाः तुम वह सवर प्रसङ्ध पर्णरूपसे सुनो । 
साय ही महातेजस्वी वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णका माहात्म्य एवं 
वेरिति भी श्रवण करो ॥ १२-१३ ॥ 
हितां सुरमत्यौनां लोकानां प्रभवाय च । 
बहुशः ` स्व॑भूतात्मा प्रादुभंवति कार्यतः ॥ १४॥ 
समस्त भूतेः आत्मा भगवान्‌ श्रीहरि देवतां ओर 
मतु्योका कल्याण तथा रोकौका अभ्युदय करनेके ल्यि 
आवश्यकतावरा बारंबार अवतीर्णं होते है ॥ १४ ॥ 
प्रादुभोवाश्च वक्ष्यामि पुण्यान्‌ दिव्यगुणै युतान्‌ । 
छन्दसीभिर्दायभिः श्वुतिभिः समलंकृताम्‌ ॥१५॥ 


म भगवान्के उदार वेदिक भुति्योदारा वर्णित दिव्य 
गुणवारे पवित्र अवतार्योका वर्णन करसगा ॥ १५ ॥ 


श्युखिः भयतकाग्‌ भूत्था निबोध अनमेजय ! 


१४६ 


भरीमषह्टाभारते खिखभागे 


द्‌ पुराणं परमं पुण्यं वेदश्च सम्मितम्‌ ॥ १६॥ 
हन्त ते कथयिष्यामि विष्णोर्दिव्यां कथां श्टणु 1 
जनमेजय { यद पवित्र एवं शरेष्ठ पुरा वेदक समान 
सम्मानित है! ठम पवित्र एवं मौन होकर इते सुनो । 
मै बडे दर्षके साथ तुमसे भगवान्‌. विष्णुकी यह दिन्य 
कथा कहता हू । इसे श्रवण करो ॥ १६ ॥ 
यदा यद्‌ हि धर्मस्य ग्ानिभेवति भारत । 
धर्मसंस्थापनाथोय तदा सम्भवति प्रभुः ॥ १७॥ 
मारत ! जव-जव्र धर्मका हाष होता हैः तवर-तव प्रभ 
धर्मको द्द्‌ रूप सखापित करने य्यि अवतार ग्रहण 
करते ह ॥ १७ ॥ 
तस्य छेका महाराज मूर्विभवति सत्तमा । 
नित्यं दिविष्ठा या राजंस्तपश्चरति दुश्चरम्‌ ॥ १८॥ 
राजन्‌ ! महासज ! उनकी एक श्रेष्ठतम साच्िकी मूर्ति 
६, जो दिग्यलोके रटकर सदा दुष्कर तप करती दै ॥ १८ ॥ 
द्वितीया चास्य शयने निद्धायोगसुपाययौ । 
प्रजासंहारसगौ्यं करिमध्यात्मविचिन्तकम्‌ ॥ १९ ॥ 
उनकी वसय मूतं प्रन संहार ओर खष्टके र्थि 
योगनिद्राका आश्रय ठे शेपशय्यापर शयन करती है | वह 
योगनिद्रा अध्यात्मचिन्तकौँकी समाधिते मी उक्कृषट दै ॥ १९॥ 
खुप्त्वा युगख्टसं स प्रादुभवति कार्यवान्‌ । 
पूणं युगखदखे तु देवदेवो जगत्पतिः ॥ २० ॥ 
पितामहो खोकपाङाश्चन्द्रादित्यौ हुताक्षानः 1 
ब्रह्मा च कपिलश्चैव परमेष्ठी तथैव च ॥ २९॥ 
देवाः सत्यश्चैव व्यस्वक्श्च महायश्चाः। 
वायुः खभुद्राः शैकश्च तस्य दें समाश्रिताः ॥ २२॥ 
एक सख चतुयंगतक शयन करके वे खटि-संचाखनके 
कार्यस पुमः विभिन्न (देवता आदिके ) रूपम भक्ट रोते ई । 
सहख युग पर्णं हो जानेषर वे देवाधिदेव जगदीश्वर विष्णु ही 
पितामह ब्रह्म, इन्द्रादि रोकपालः चन्द्रमाः सूर्य; अग्नि 
कपिलः परमेष्ठी ( दक्ष ) देवताः सर्पि ओर महायदास्ी 
त्रिनेत्रधारी गिव आदिके रूपमे प्रादुर्भूत दते | वायुः 
समुद्र ओर पव॑त--ये सव-के-व उर्दि विराट्‌ रूपका 
आश्रय टेकर सित हँ |; २०-२२॥ 
सनत्छुमाख्छ महानुभावो 
मु्महात्मा भगवान्‌ प्रजाकरः । 
पुरणदेवोऽथ पुराणि चक्रो 
प्रदीप्वरेभ्वानरतुस्यतेजाः ॥ २३॥ 
महान्‌ प्रभावद्याटी सनच्छुमार जौर प्रजाकी सृष्टि करने- 
वाटे पेश्वर्यशाटी मद्यत्मा मनु भी उर्दि स्वरूप द । प्रदी 
अग्निके समान तेजस्वी उन पुराणदेव श्रीदरिनि द्यी समस्त 
देदधियकि शरी्योकी स्वमा की ६ ॥ २३ ॥ 


[ दिवश 
येन चा्णवमध्यस्थौ नष्टे स्थावरजङ्गमे । 
नष्टे देवासुरगणे प्रणष्ठोरगर क्षसे ॥ २४॥ 


योद्धुकामौ खदुर्धरषौ दानवौ मधुकैटभौ । 
हतौ भ्रमवता तेन तयोदत्वामितं वरम्‌ ॥ २५॥ 
म्टाप्रलयकरे समय जव करि देवताः यसुरगणः नाग तथा 
राक्षस आदि. समस्त चराचरं प्राणी नष्ट हो गये ॐ, एकरर्णवके 
जरम प्ते अत्यन्त दुर्धषं दानव प्रकट हुए 1 उनके नम ये 
मधु ओर कैयम | वे दोनो युद्धः चाहते ये । सर्वशक्तिमान्‌ . 
भगवान्‌ विष्णुने दी उन दोर्नौको मोक्षका अनुपम वर्‌ देकर 
मार डाला था २५२५ ॥ 
पुरा कप्रखनाभस्य स्पतः सागराम्भक्ति । 
पुष्करे गज सम्भूता देवाः सर्षिगणाः पुय ॥ २६॥ 
पूव॑फाल्मे जव कमलनाभ भगवान्‌ विप्णु समुद्रके जसम 
दयन कर्‌ रदे थे, उनकी नाभिसे एक कमल प्रकट दुभा; जिने 
पटले ऋपिर्योदित सम्पूर्णं देवतार्थोका प्रादुर्भाव हुगा ॥२६॥ 
पप ॒पौभकरको नाम प्रादुभौवो महात्मनः। 
पुराणे फथ्यते यन्न वेदः श्युत्तिखमादितः ॥ २७॥ 
पुराणम यह्‌ पप्मात्मा विष्णुका पौष्कर नामक्रा अवतार या 
सर्ग कहा जाता है । पुराण वह्‌ विना रैः जिसमे मन्त्र पं 
ब्ाह्ण-भागकरी श्रुतियेपि सम्पन्न सम्पूणं वेद ही प्रतिष्ठित दै 
( पुरारे बेदार्थका दी विस्तार क्रिया गया है ) | २७॥ 
वारादस्तु श्रुतिुखः प्रादुभौवो महात्मनः । 
यत्र विष्णुः खुररेष्ठो वादं रूपमास्थितः 1 
मरही सागरपर्यन्तां सरोरवनक्राननाम्‌ ॥ २८॥ 
उन परमत्माका जो वाराह नामक अवतार है, वह ्चतिमे 
वर्णित है ! उस अवतारे समव सुरभे भगवान्‌ विष्णुने 
वाराहरूप धारणकर पर्वत ओर यनसदित समुद्रतककी सारी 
पृथ्वीका जल्से उद्धार क्रिया था ॥ २८ ॥ 
वेद्पादो युपदृष्ः क्तुदन्तश्चितीमुखः 1 
अथिजिहे। दर्भरोमा नक्षदीषों मदातय्राः ॥ २९ ॥ 
चासं वेद्‌ उनके चार चरण ओर यूप उनकी दादे ह । 
यज्च दोत ओर ्थेनचित्‌ आदि चिति ( इिका-चयन ) मुख 
है । साक्षात्‌ अग्नि ही उनकी निहाः कुशा रोमावलि ओर 
ब्रह्य मस्तक है { उनका तप महान्‌ है ॥ २९॥ 
अहोरावेक्षणो दिव्यो वेदाङ्ग शरुतिभूषणः। 
आज्यनालः स्युवातुण्डः सामघोपस्रनो महान्‌ ॥३०५ 
दिन ओर रारि उनके नेच रैः वरे दिव्यस्ररूप है | 
वेद उनका अङ्ग ओर्‌ शरुतियो आमूपण दै । हविष्य ( धृत ) 
नासिका खुवा धूथन ओर सामवेदका गम्भीर घोष ्टी उनका 
खरदे। वे मदान्‌ ॥ ३० ॥ 


शसिवंशपवं ] 


पकसत्वारिदो ऽज्यायः 


९.) । 


[थाक गन 


धर्मसत्यमयः श्रीमान्‌ ऋमविक्रमसव्छतः। 
प्राय्ित्तनखो धीरः 
धर्म ओर सत्य उनका खरूप है ! वे भ्रीसम्पन्न तथा 
क्रम ( गति ) ओर विक्रम ( पराक्रम ) के द्वारा सम्मानित 
ह । प्रायश्चित्त उनके नख ओर पञ्च उने धुटने है । वे धीर 
तथा विशाल थुजाओखि युक्त ह ॥ २१ ॥ 
उद्रात्रन्नो होमलिङ्गः फठ्वीजमषहोषधिः। 
वाय्बन्तरात्मा मन््रस्फिग्बिरूतः सोमख्णेणितः ॥२२॥ 
उद्राता अन्तर ( ओत), होम लिङ्ग तथा बड़ी-बड़ी 
ओषधिर्यो उनके अण्डकोश ओर वीं ह । वायु अन्तरत्माः 
मन्त नितम्ब ओर निचोडकर निकाल हुआ सोमरस दी 
उनका सक्त है ॥ ३२॥ 
वेदिस्कन्धो हविर्ग॑न्धो हव्यकव्यातिवेगवान्‌ । 
प्राग्वंशकायो युतिमान्‌ ननादीक्षाभिरायिनः ॥ ३२ ॥ 
वेदी दी कंधा, इविष्य गन्ध तथा हव्य भौर कव्य 
उनका प्रचण्ड वेग हे। प्राग्वंश ( यजमान-एद ) उनका 
. रीर है ¦ वे परम कान्तिमान्‌ ओर नाना प्रकार्की दीक्षासि 
सम्पन्न द ॥ ३३ ॥ 
दृश्चिणाहदयो योगी महासत्रमयो महान्‌ । 
उपा कमोषठस्चकः प्रवग्यांवतभूषणः ॥ ३७ ॥ 
दक्षिणा दी उनका दद्व दै । महान्‌ सत्र ( वै काल 
तक चख्नेवाठे यन्न ) उन महान्‌ योगीका स्वरूप दै । वेरदोका 
स्वाध्याय उनके ओटोका आभूषघण दहै ओर प्रवर्ग्यं नामक 
कर्मकी आदृत्ति ही उनक्रा भषण हे ॥ ३४॥ 
नानाछन्दोगतिपथो शुद्योपनिषदासनः । 
छायापत्नीसहायो वै मेरुब्धङ्ग ्वोचिच्रूतः ॥ २५॥ 
अनेक प्रकारे छरन्दोकी गति उनका मार्महै ओर वे 
गोपनीय उपनिषरद्रूपी आसनपर विराजमान रहते द । जलम 
पद्नेवाी छाया ( परख ) ही पत्नीकी भति उख समय 
उनकौ सहायिका थी ओर वे मेख्पर्व्के रिखरके समान 
ञवे जान पडते ये ॥ ३५ ॥ 
मीं सागरपर्यन्तां सकशेखवनक!{ननाम्‌ । 
पकाणवजले च्रष्टमेकार्णवगतः शरुः ॥ ३६ ॥ 
दृष्या यः समुदधुत्य छोकानां दितकोस्यया । 
सहस्रशीषों देवादिश्चकार पृथिवीं पुनः ॥ ३७॥ 
उन सदो िरवाठे भगवान्‌ वाराहने, जो देवतार्थके 
आदिकारण दै, एका्णवके ल्मे प्रवेश करके उसमे छत्री 
हुई पर्व॑तः वन ओर कानरनौसहित समुद्रतककी सार प्रथ्वीको 
अपनी दादुसे ऊपर उठाकर सम्पूर्णं लोकोकि हितकी कामनासे 
पुनः उसे जलके ऊपर सिरतापूर्वक खापित कर दिया ॥ 


पड्ुजालमेहासुजः ॥ ३१ ॥` 


पवं यक्षधराहेण भूत्वा भूतदिकार्थिना । , 
उद्धृता पूथिवी सौ सागराम्बुधरा परा ॥ ३८ # 
इस प्रकार प्रकर होकर षमसत प्राणिर्योका दित चादनेवाले 
यज्ञात्मा मगवान्‌ वारान समुद्र-जल्को धारण करनेवाखी 
समूची प्रथ्वीका पूर्वकास्मे उद्धार क्रिया था ॥ ३८ ॥ 


वाराह पष कथितो नारसिष्टमतः श्णु 1 
यत्न भूत्वा सूगेन्द्रेण हिरण्यकश्िपुतः ॥ २९ ॥ 
यह वाराह-भवतारकी कथा कही गयी । इसके वाद्‌ 
नरघिह-भवतार हुआ; उसक्रा वर्णन सुनो । उस अमता 
भगवान्‌े नरसिंहरूप धारण करके हिरण्यकरिपु नामक दैत्य 
कावधकियाथा॥ ३९॥ 
पुरा छृतयुगे राजन्‌ खुरारिव॑ख्दर्पिंतः 
दैत्यानामादिपुरुषश्चचार तप॒ उत्तमम्‌ ॥ ४०॥ 
दृद वर्षसहस्राणि शतानि दहा पञ्च च । 
जपोपवासनिरतः स्थानमोनटडनतः ॥ ४१ ॥ 
राजन्‌ } पहले सत्ययुगमे देवतार्ओका शत्रु दिरण्यकरिपु 
समस्त दैत्योका आदि पुरुष था ! उसे अपने वर्का बड़ा 
घमंड था । उसमे सादे ग्यारह हजार वर्पौतकर बड़ी मारी 
तपस्या की { वह सदया जप ओर उपवासमे संरगन रहता था । 
द्‌ आसन लगाकर मौनावलम्बनपू्वक इदृताकरे साथ उत्तम 
त्रतका पालन करता था | ४०-४१ ॥ 


ततः शमद्माभ्यां च बद्यचर्येण चानघ ॥ 
ह्या प्रीतो ऽभवत्‌ तस्य तपस! नियमेन च 1॥४२॥ 
निष्पाप नसे | तदनन्तर उसके इन्दिय-संयमः मनो- . 
निग्रहः ब्रह्मचर्य, तपस्या ओर शौच-संतोषादि नियमे 
पालनसे ब्रह्माजी उसके ऊपर बहुत प्रसन्न हुए ॥ ४२॥ 
तं वै खयम्भूभंगचान्‌, खयमामत्य भूपते । 
विमानेनाक॑व्णेन हंखयुकतेन भाखता ॥ ४३॥ 
भूपा { स्वयम्भू भगवान्‌ ब्रह्माजी दंससे युक्त सूयक 
समान तेजस्वी विमानद्वाया स्वयं वहो पधारे ॥ ४३ ॥ 
आदिल्ये्वख॒भिः साष्यै्मरद्धिर्दैवतैः सह । 
सद्ररविभ्वसहायेश्च यक्षराक्षसरकिनरेः ॥ ४४ ॥ 
दि्णाभिरविदिशनिश्च नदीभिः सागरैस्तथा । 
नक्षथेश्च सुहरतंश्च खेचरेश्च महाग्रहः ॥ ४५॥ 
देव्षिभिस्तपोचद्धैः सिद्धैः सप्तपिभिस्तथा । 
राजपिभिः पुण्यतमैगंन्धरवश्चाप्छसेगणैः ॥ ४६ ॥ 
उनके साथ आदित्यः वसुः साध्य, मुद्रण, अन्य देवगण, 
सटरगणः विच्ेदेवः यक्षः राक्षसः किनरः दिगा, विदिशा 
नदिरयोः समुद्रः नक्षनः हूतः आकागचारी महान्‌ रह, 
तपस्या ब्रदे-चदे देवः ' सिद्धः सप्र, परम पुण्यात्मा 
राजिः गन्धव तथा अप्ठर्टः मी यीं ॥ ५५-४६ ॥ 


१४८ 


चराचस्युरः धीमान्‌ चतः सर्वैः सुरैस्तथा 1 

घ्या ब्रह्मविदां श्रेष्ठो दैत्यं वचनमव्रवीत्‌ ॥ ४७॥ 
सम्पण देवता्सि भिरे हए. यद्वेत्ताओ्ि शरे चराचर 

गुष श्रीमाम्‌ व्रह्मा उख दैत्ये इस प्रकार वोरे--॥ ४७ ॥ 


प्रीतोऽसि तब भक्तस्य तपसानेन सुत । 

चरं वस्य भद्रं ते यथेष्टं काममाप्रहि ॥ ४८ ॥ 
'उनत्तम॒बतकरा पालन करनेवाले दैत्यराज } तम मेरे 

भक्त हो । उम्दारी इस तपस्यासे गँ ब्रहुत प्रसन हूः दमदार 

भलर हो । दुम कोई वर मोग ओर मनोवाञ्छित भोग प्राप्त 

करोः ॥ ४८ ॥ 

हिरण्यकथि पुरुषाच 

भ ॒देवासुरगन्धवौ न यक्षोरगराश्चसाः 1 

न मानुषाः पिशाचाश्च निहन्युर्मा कथंचन ॥ ४९॥ 

चऋपयो वा न मां श्ापैः क्रुद्धा खोकपितामष 

शपेयुस्तपसा युक्ता वर्मेतं च्रणोम्य्टम्‌ ॥ ५० ॥ 
हिरण्यकशिपु वोला-लोकपितामह ¡ सन्ने देवताः 

अयुरः गन्धव, यः नागः राख, मनुष्य ओर पिाच 

किसी तरह मार न स । तपस्वी छषि-महर्पिं कुपित होकर 

सन्ने शापन देः म अपच यही षर मोगता हर ४८९-५०॥ 

न शल्ेण न चाखरेण गिरिणा पादपेन वा । 

न शयुष्केण न चा्द्रंण स्यान्न चान्येन मे वधः 1 ५९ ॥ 
न रासे, न अलसे, न पर्व॑त अथवा बक्षः म सृखे- 

सेन गस्ि ओरन वरे ही क्षी आयुधसे मेरा 

वधदहो॥ ५१॥ 

पाणिप्रहाररणैकेन सभत्यवङवादनम्‌ । 

यो मां नाशयितुं शक्तः स मे दत्युर्भविष्यति ॥ ५२॥ 
जो मेरे सेवकः सेना ओर वाहनोँसदित सुद्धे एक ही 

यप्यडुस्े मार उाल्नेमे समर्थं होः उसीके हाथसे मेरी 

मव्युदो॥५२॥ 

भवेयमदमेवाकः सोमो वायुताशनः 1 

सिरं चन्तरिक्षं च नक्षुघ्राणि दिद्यो द ॥ ५३॥ 
म ही सूर्य, चन्द्रमाः बायु, अग्नि; जर, आकार 

नक्षत्र ओर दसो दिशा्ओकि रूपमे खित रूं ॥ ५३ ॥ 

अहं फ्रोधश्च कामश्च वरूणो वासवो यमः 1 

धनदश्च धनाध्यक्षो यक्षः किपुरूषाधिपः ॥ ५७ ॥ 
मै दी काम ओर क्रोधकाअधिष्ठाता दयँ । मे ही व्ण 

इन्द्र, यमः धनाघ्यक्ष कुररः यक्ष एवं किम्पुद्पोका स्वामी 

हों ॥ ५४ ॥ 


पवमुक्तस्तु दैत्येन स्यम्भूरभगवांस्तदा 1 
उवाच दत्यसज तं प्रहसन्‌ चपसत्तम ॥ ५५ 


श्मिमहाभारते सिलभागे 


{ हरिवत 


वरपश्रेष्ठ { उस दैत्यके यो कमेपर स्वयम्भू मगवान्‌ 
ब्रह्मा ठाकर ख पड़े ओर उख समय उस दैत्यराज इस 
प्रकार योठे ॥ ५१५ |! 

वरेह्मोवाचर 

पते दिव्या वसस्तात मया दत्तास्तवाद्धुताः 1 
सवीन्‌ कामानिमां स्तात प्राप्स्यसि स्वं न संद्ायः ॥५६॥ 

बरह्माजीने कहा-तात ¡ये दिव्य ओर अद्भुत वर्‌ 
यनि ठ््देदेदियि) ठम इन सम्पूर्णं अमीर्णैको प्राप्न कर 
लगे, इसमे संशय नदी दै ॥ ५६ ॥ 


पवमुक्त्वा तु भगवाञ्चगामाक्रारमिव दि । 

वैराजं वह्मसदनं चद्यपिंगणसेवितम्‌ ॥ ५७॥ 
यो कहकर भगवान्‌ बरह्मा आका सितः बरहयर्षिगर्णौ 

से सेवित व्ैराजपद नामक ज्यधामको चले गये ॥ ५७ || 

ततो देवाश्च नागाश्च गन्धी सुनयस्तथा । 

घरभ्रदानं श्रुत्वा ते पितामदसुपस्थिताः ॥ ५८ ॥ 
तदनन्तर देवता; नाग, गन्धव ओर मुनि वद वरदान 

सुनकर पितामह बद्याजीके पास गये ॥ ५८ ॥ 

वियु विक्षापयमाञुद॑वा इन्द्रपुरोगमाः ॥ ५९॥ 
वरहो पहुंचकर इन्द्र आदि देवत(ओनि भगवान्‌ ब्रह्य 

अपने मानसिक भयको इस अ्रकार दचित किया ॥ ५९ ॥ 

देगा ऊचुः 

चरेणानेन भगवस्‌ वाधयिन्यति नोऽखुरः1 

ततः प्रसीद भगवन्‌ वधो ऽप्यस्य विचिन्त्यताम्‌ ॥ ६० ॥ 

भवान्‌ टि सर्वभूतानां खयम्भूरादिकूद्‌ विभुः 1 

खटा च ₹इव्य्रकन्यानामन्यक्तप्रङूति्धुवः ॥ ६१ ॥ 
देवता योके--भगवन्‌ ! इख वरफे प्रभावे तो वद्‌ 

असुर दमरोगोको सदा टौ महान्‌ कष्ट ॒पर्हुचाता रहेगा । 

अतः आप प्रसन्न दोदये ओर उसके वधका भी कोई उपाय 

सोचिये; क्योकि आप दौ सम्पूर्णं भूतेकि आदिखष्टाः स्वयम्भूः 

सर्वव्यापी, हन्य-कध्थके निर्माताः, अब्यक्तपकृति ओर 

्ुवस्वस्प द ॥ ६०-६१ ॥ 

ततो खोकदितं वाक्यं श्रुत्वा देवः प्रजपततिः। 

प्रोवाच भगवान्‌ वाच्यं सवौन्‌ देवगणां स्तदा ॥ ६२ ॥ 
उस समय देवतार्भकां यद रोकरटितकारी वचन सुन- 

कर उन प्रजापतिदेव भगवान्‌ ब्रह्मने समस्त देवताते इव 

प्रकास्की वात कदी} ६२ ॥ 

अवद्यं चिदेशास्तेन प्राप्ठव्यं तपसः फम्‌ । 

तपसो ऽन्तेऽस्य भगवान्‌ द्धं बिप्णुःकरिष्यति॥ ६३ ॥ 
द्देवताओ { उस अबुरको अपनी तपस्याका फर अवद्य 


हरिवंशपवं ] 


प्राप्त होगा । ( फल-भोगके द्वारा ) जव तपस्याकी समति हो 
जायगी, तव भगवान्‌ विष्णु खयं दी उसका वध करेगे ६२॥ 
पतच्छुत्वा णः सवं वाक्यं पड्कजसम्भवात्‌। 
खानि स्थानानि दिव्यानि जग्मुस्ते वे सुदान्विताः॥ ६७॥ 
कमल्योनि व्रह्माजीके मुखसे यह ब्रात सुनकर समस्त 
देवता प्रसन्नतपूर्व॑कं अपने-अपने दिष्य स्ा्नौको चठे 
गये ॥ ६४॥ , 
छन्धमाने षरे चपि सवौः सोऽवाधत पजाः। 
दिरण्यकशिपुेत्यो वरदानेन दर्पितः ॥ ६५॥ 
वह वर पाते ही दैत्य हिरण्यकशिपु समसत प्रजाको कष्ट 
देने खगाः कर्यो व्रह्माजीके उस परदानसे उसका घमंड बहुत 
बद्‌ गयाथा॥ ६५॥ 
आश्रमेषु महाभागान्‌ सुनीन्‌ वै शंसितत्रतान्‌। 
सत्यधमेरतान्‌ दान्तान्‌ पुरा धषितवांस्तु सः ॥ ६६ ॥ 
सव्रसे पहले आश्रमम रदनेवाके उत्तम ब्तके पाटकः सत्य- 
धूर्मपरायण तथा जितेन्द्रिय महाभाग भ्ुनिर्योको उसने पीडा 
देना आरम्भ किया ॥ ६६ ॥ 
देवांखिभुषनस्थास्तु पराजित्य महासुरः । 
शेरोक्यं वरामानीय सर्गे वसति दानवः ॥ ६७॥ 
तीर्न ोकोमिं रहनेवारे देवतार्ओेको हराकर चिरोकीके 
राज्यको अपने वर्मे करके वह महान्‌ असुर दानव खर्म 
रहने ख्णा ॥ ६७ ॥ 
यदा वरमेन्मत्तो न्यवसद्‌ दानवो दिवि । 
यक्षियान्‌ कृतवान्‌ दैत्यान्‌ देवाश्चेवाप्ययश्षियान ॥६८॥ 
वरदाने मदसे उन्मत्त हुआ वह दानव जब्र देवरोक- 
म निवास करता था, उन दिनों उसने दैर््योको तो यत्तका 
मागी बनाया ओर देवतार्भको उससे वञ्चित कर दिया ॥ 


आदित्याश्च ठतो रुद्रा विद्व च मरुतस्तथा । 
शरण्यं शरणं विष्णुसुपाजमग्मुमहाबरम्‌ ॥ ६९ ॥ 

वेदयश्शमयं नह्य ॒ब्रह्मदेवं सनातनम्‌ । 

भूतं भग्यं भविष्यं च भसु खोकनमस्कतम्‌ । 
नारायणं विं देवाः श्चरणं शरणागताः ॥ ७०॥ 
तब आदित्यः इद्रः विद्वेदेव ओर मस्द्रण आदि मिलकर 
शरणागतवत्सकः वेद एवं यज्ञस्वरूपः रह्याजीके मी आरध्यदेव; 
सनातन ब्रह्मरूप महावली भगवान्‌ विष्णुकी शरणमे गये । 
भूतः वर्तमान ओर भविष्य जिनका स्वरूप ह, जो सव कुछ 
करनेम समर्थ तथा समस्त लोकोदयारा वन्दित ई उन्दी सव॑ 
व्यापी नारायणकी उन शरणागत देवता्भेनि शरण टी॥६९-७०॥ 

देवा अधुः । 

श्रायस्व नोऽ देवेश हिरण्यकशिपोर्भयात्‌ । 
त्वं हि नः परमो धाता ब्रह्मादीनां सुयोस्तम ॥ ७१॥ 


१४९ 


देवता बोे--देवेदवर ! आय ॒दिरण्यकरिपुके भयसे 
अब हमारी रक्षा करं | सुरश्रेष्ठ ! आप हम ब्रह्न आदि 
दैवता्ओफि भी परम पालक दै ॥ ७१ ॥ 
त्वं हि नः प्रमो देषस्त्वं हि नः परमो युः । 
उत्ुछाम्बुजप्ाक्षः शुपक्भयंकरः । 
क्षयाय दिति्वश्चस्य श्रण्यस्त्वं भवस नः ॥ ७२॥ 
आप ही हमारे परम देवता ओर आप ही हमारे परम 
गुख है । आपके नेच प्रु कमल्दल्के समान शोभा पाते 
ह । अप शतुपक्षको भय देनेवलि है । प्रमो } अप दैत्योकि 
विनाशक लि हमारे शरणदता दो ॥ ७२ ॥ 
किष्युल्काच 
भयं त्यज्ञध्वममया श्यभयं बो ददास्यहम्‌ । 
तथैवं निदिचं देवाः प्रतिपत्स्यथ माचिरम्‌ ॥ ७३ ॥ 
भगवान्‌ विष्णुने कहा--देवताओ ! भय खोड दो । 
म उमे अभय देता ह | दम शीघ्र ही पहठेकी मेति स्वर्ग- 
लोक प्राप्त कर लोगे ॥ ७३ ॥ 
पष तं सगणं दैत्यं वरदानेन दपितम्‌ । 
अवष्यममरेन्द्राणां दानवेन्द्रं निहन्म्यम्‌ ॥ ७४ ॥ 
जो वरदान पाकर घमंडमे भर गया है तथा जो देवेश्वरो 
के स्यि अवध्य हो गया है, उस दितिपुत्र दानवराज हिरण्य- 
कशिपुको उसके सेवकोंसहित मार डालता हू ॥ ७४ ॥ 
वे्नम्पायन उवाच 
पवसुक्त्वा स भगवान्‌ विखज्य बिदश्तेश्वसान्‌ । 
हिरण्यकशिपो राजन्नाजगाम हरिः सभाम्‌ ॥ ७५॥ 
वैदास्पायमेजी कदे है--एजन्‌ ! यौ कहकर 
भगवान्‌ विष्णुने उन देवेश्वरोको तो विदा कर दिया ओर 
स्वयं दिरण्यकशि पुके सभामवनमे पधारे ॥ ७५ ॥ 
नरस्य  छत्वार्धतलुं सिदस्यार्धतयुं प्रयुः 1 
नारसिहेण पुषा पाणि निष्पिष्य पाणिना ॥ ७द्‌ ॥ 
उस समय उन प्रभुने अपना आधा शरीर मनुष्यका-सा 
वना छया था ओ आधा सिंहक-त्ा ! इस पकार नृसिंहरूपं 
धारण करके वे एक हाथसे दूसरे ह।थकरो रगड़ते हुए. व 
अवि ॥ ७६ ॥ 
जीभूतघनसंकाशो जीमूतघननिःसखनः। 
जीमूतघनदी्तौजा जीमूत इव वेगवान्‌ ॥ ७७ ॥ 
उनके शरीरका वणं सजल मेषकरे समान शयाम्‌ थौ | 
उनका शब्द्‌ भी जल्मूरणं मेष गर्जनाकरे समान ही गम्भीर 
या ¦ उनके उदी तेन ओर मेग भी बरसनेवाछे वादखकरे 
ही वुल्य थे ॥ ७७ ॥ 
तय्‌ सोऽतिवरं दीं टप्तशदरविकमम्‌ । 
दपेदत्यगणेुे हतवानेकपाणिना ॥ ७८॥ 


१५० 


भीमदप्भारते किङभागे 


{ शिवे 


व्न्य ~~~ ~ 


यपि दैत्य हिरण्यकशिपु अत्यन्त वल्वाब्‌? तेजस्वी, 
दर्थम भरे हुए सिंहे समान पराक्रमी तथा बलामिमानी देयो 
द्वारा सुरक्षित था, तो मी भगवान्‌ रूर्धिहने उ एकी 
थप्यद्ते मारकर यमलक पर्हूचा दिया ॥ ५७८ ॥ 


शसि एप कथितो भूयोऽयं वामनो. ऽपरः । 

यत्र वामनमाधित्य रूपं दैत्यविनाडङृत्‌ ॥*७९॥ 
यह दृषिंहावतारकी कथा कही गयी } अव दूसरे वामन- 

अवतारका वर्णन सुनो, जिसमे वामनरूप धारण करे 

मगवान्‌ने दैरयोका विनाश करिया था ॥ ७९ ॥ 


घलेर्बलवतो यक्षे वलिना विष्णुना पुरा 1 
धिक्रमैखिभिरस्नोभ्याः क्चोभितास्ते महासुराः ॥ ८० ॥ 
पूर्वकाले सर्वशक्तिमान्‌ भगवान्‌ विष्णु (वामनरूप धारण- 
कर ) र्वान्‌ वलिक यक्ते गये ओर वह उन्दोनि भपने तीन 
ही पगेखि ( निरोकीको नापकर ) किससे शुन्ध न होनेवले 
यद्धे असुर्योको क्षुव्ध कर डाला ॥ ८० ॥ 
विप्रचित्तिः शिविः शङ्कुप्यशरङ्कस्तथैव च । 
अयःश्िसः शङ्कुशिरा दयप्रीवश्च वीर्यवान्‌ ॥ ८१ ॥ 
वेगवान्‌ केतुमालः सोमव्यग्रो महासुरः । 
पुष्करः पुष्कलश्चैव वेपनश्च महारथः ॥ ८२ ॥ 
बृहत्कीतिर्मदाजिहः स्वो ऽश्वपतिरेव च । 
प्रहादोऽश्वशियः कुम्भः संहादो गगनग्रियः। 
अचुद्ादो हरिहरौ वराहः शंकरो खजः ॥ ८२॥ 
श्वरभः श्षरुभश्चैव कपनः कोपनः कथः । 
इत्कीरतिरमहाजिद्धः राङ्ककर्णो मदासखनः ॥ ८४७ ॥ 
दीधंजिद्धोऽरकनयनो सृदुचापो सदुपरियः। 
यायु विष्टो नसुचिः द्ाम्बसे चिञ्वरो महान्‌ ॥ ८५॥ 
चन्द्रहन्ता क्रोधहन्ता क्रोधवर्धन एव च। 
कालकः कालकरेयश्च वचः क्रोधो पिसेचनः ॥ ८६॥ 


गरिष्ठश्च परिष्ठश्च प्ररम्बनरकाघुभौ । 
शन्द्रतापनवातापी केतुमान्‌ वल्दर्पितः ॥ ८७॥ 


ससिरोमा पुखोमा च वाक्षकः प्रमदो मदः) 
खखमः काटवद्नः कराः कैडिकः शारः ॥ ८८ ॥ 
पकाष्चश्न्द्रह। राहुः सहाद्‌ः खमरः खनः। 
शतघ्नीचक्रहस्ताश्च तथा - परिघपाणयः ॥ ८९ ॥ 
महारिखप्रहरणाः शलदस्दाश्च दानवाः । 
अदमयन्त्रायुघोपेता भिन्दिपालयुधास्तथा ॥ ९० ॥ 
शजोदखखदस्ताश्च  परद्वधधसस्तथा । 
पादामुदरष्टस्ता वै तथा मुसरुपाणयः ॥ ९९ ॥ 
नानाप्रहरणा धोरा ननाचेपा महाजवाः! 
शूरमकुकडुटवक्चानश्च इशोूकमुखास्तथा ॥ ९२ ॥ 
खोषट्वदनाङ्चैव वरादवद्‌नास्तथा । 
भीमा मकरवक्चाश्च कोष्टुवस्चष्च दानवाः । 


आखुददुंरवक्घाश्च धोख॒घकमुखास्तथा ॥ ९३ ॥ 
माजौरगजवक्धाश्च महात्रक््नास्तथापरे । 
नक्रमेधाननाः शस गोऽजाविमहिपाननाः ॥ ९४ ॥ 
गोधाहारयकवषनाश्च क्रौञवक्त्राख्च दानवाः । 
गरुडाननाः खद्भसुखा मयूरवदनास्तथा ॥ ९५ ॥ 
गजेन्द्रचमेवसनस्तथा रष्णाजिनाम्बः। 
चीरसंदवदेदाश्च तथा दत्कटवाससः ॥ ९६॥ 


` उष्णीपिणो सुङटिनस्तथा कुण्डलिनोऽ सुराः । 


किरीरिनो लम्यशिखाः कम्बुघ्रीवाः खुवचंसः । 
नानवेषघरा दैत्या नानामाल्याद्युरेपनाः ॥ ९७ ॥ 
खान्यायुधानि संगृष्य॒प्रदीप्तान्यतितेजसा । 
छममाणं दपीकेशसुपावतेन्त सर्वशः ॥ ९८ ॥ 
जिख समय भगवान्‌ हषीके अपने डग वदा रदे ये, उष 
समय विप्रचिक्तिःचितव्रि, दुख ओर ग्रद्भुःअयःरिरा तथा शङ्ध- 
शिराः पराक्रमी हयग्रीवः वेगवान्‌ केठमान्‌ उग्रः महान्‌ असुर 
सोमव्यग्र, पुष्कर मर्‌ पुप्कड तथा महारथी वेपन, बृहत्कीर्तिः 
महाजिह तथा अश्वसदित अस्वपत्ति, प्रहादः अश्वरिराः कुम्भः 
सहाद, गगनप्रियः अनुहाद्‌, हरि ओर हर, वराह दंकरः खजः 
दरम तथा शरम, कुप्नः कोपनः क्रथः बृहत्कीर्तिः मदाजिह्, 
शङ्कुकर्णः महास्वनः दीरघनिहः अकनयनः खदु चापः यदुप्रियः 
वायु) यविष्ठ, नमुचिः शम्बर, मद्यकाय विल्वर, चन्द्रहन्ताः 
क्रोधहन्ता एवं क्रोधवर्षनः कारक तथा कालकेय; त्रत्रः क्रोधः 
विरोचन, गरिष्ठ जीर वरिष्ठः प्रलम्ब जर नरक नामक दो दैत्यः 
इन्द्रतापन ओर वातापिः बलाभिमानी केतुमान्‌ अषिलेमा तथा 
पुलोमा, वाक्षलः प्रमद्‌, मद्‌, खश्वभः कार्वदन कराः 
कैरिकः शरः एकाक्षः चन्द्रदा, राहु, संहाद, वमर ओर खन 
आदि दैत्य चायो ओरसे मगवानूो घेरकर खडे दो गये । 
उनमैते किसीके दाथ रातध्नी ( वेदूक ) थी ओर किसी- 
के हाथमे चक्र । वहुतेरे अपने दा्थभिं परिघ व्यि खडे ये । 
कुर दानव वदी-वदी हिलर्ओँमि प्रहार करते थे } कितनेकि 
हा्थेमिं शूल ये । कितने ही पत्थरके गोले फँकनेवलि यन्त्र- 
रूपी आयुधसे सम्पनन ये । ब्रहुतेरे भिन्दिपार नामक अलका 
प्रयोग करते ये} कितने दी दैत्येनि अपने दार्थ शूल, ऊखलः 
पारे, पारा, मुद्गर ओर मुख ठे रखे ये 1 इस प्रकार 
वे मति-भोतिके आयुध धारण कयि हुए ये 1 उनके वेष मी 
करर तरद ये । वे सव्र-के-सव मदान्‌ वेगगाली जर मयंकर ये | 
किन्दीफि सुख कद्यं ओर सुर्गोके समान ये तो किनन्दकि 
खरदे ओर धू्ुभकि सद्या | कितने ही दानवोके भुख 
गदे, ऊट, सूअर, मगर. मौर सियारोके समान ये । वे समी 
वदे भयानक जान पढते भे । कुर घोर रूपधारी दैत्योके मुख 
चहो अर मेढककि सभान ये । करित्नकि मुख भेडयोखे 
मिलते-जुर्ते ये ! किन्दीके मुखं विलाव-सैसे ये तो किन्दीके 
हाधियेति समान । कोर्द-कोई इसते भी बडे मुखवाले थे | 


हरिविंशपवं ] 


पकचत्वारि द्रो ऽध्यायः 


९५१ 


बहुतकि मुख नक्र ( नाके )› मेदे, येल, वक्रे मेह. मसे; 
गोदः साहीः कच ( कुरर )४ गरड, गेडे ओर मोयोषे मिलते. 
युरते ये । कु देत्योनि गजराजके चमड़ ओद्‌ रखे थे ओर 
कित्नोनि वज्की जगद्‌ कठे मृगचर्मको ही ल्येट एला था! 
वहुतेक्रि शरीर चीरसे ठके थे, ओर कितने द्यी वस्कट वच पहने 
थे; किन्दीके मग्तकपर पगड़ी शोमा पाती थी ओर 
विन्द्र मुकुट । कितने ही अमुर किरीर ओर. करुण्डसि 
खयोमित ये; करिन्दीके सिरपर छंकी रिखार्पैः सोभा पात्री थी । 
बहुत-ते दै्यौकी गर्दन द्धक समान थीं । वे अत्यन्त तेजस्वी 
दैत्य नाना प्रकारके वेष धारण क्रिये मति-मोनिकी मालं 
ओर चन्दने . अलङ्घत थे ! वे अव्यन्त तैजसे चसकते 
हए अपने-अपने आयुध च्थि खड़े थे ॥ ८१--६८॥ 
प्रमथ्य सर्वान्‌ दैतेयान्‌ पाददस्तवलैः परमुः । 
रूपं कृत्वा महाभीमं जक्षाराद्यु स मेदिनीम्‌ ॥ ९९॥ 
उन स्व॑शक्तिमान्‌ भगवान महाभयानक रूप धारण 
करके समस्त द्योको स्तो ओर थपड़ोतसि मथ डाला ओर 
सीध ही इस प्रथ्वीको उनते छनि दिया ॥ ९९ ॥ 
तस्य विक्रमतो भूमि चन्द्रादि्यौ स्तनान्तरे । 
नभः प्रक्रममाणस्य नाभ्यां किर समास्थितो ॥१००॥ 
कहते ई जव वे भूमिको नाप रदे थे, उस समय 
चन्द्रमा ओर सुय उन विरार्‌रूपधारी भगवान्‌ स्तने 
वरीचमे आ गये ये ओर जवर वे आका (खर्गलोक) को नापमे 
लो, तव चन्द्रमा ओ सूर्य॑ उनकी नामि आ गये ॥ १००॥ 
परं प्रक्रममाणस्य जचिदेश्े स्थितावुभौ । 
विष्णोरतुखवीर्यस्य वबदन्त्यैवं द्विजातयः ॥१०१॥ 
वे अवुलपराक्रमौ मगवान्‌ विष्णु जवर सखरगगसे मी ऊपर. 
के (मह, जनः तप ओौर सत्य नामक > लो्कोको नाप रहे थे, 
उस समय सूर्यं रौर चन्द्रमा उनके दोनो धुटनोमि लित 
दिखायी दिये--इस प्रर बाद्मणल्येग कदते हैँ ॥ १०१ ॥ 
देत्यास पृथिवीं छृत्स्नां जित्वा चाञ्रपुंगवान्‌ । 
ददौ हाक्राय तरिदिवं विष्णुवंवतां वरः ॥१०२॥ 
इस प्रकार बरल्वार्नौमि शरेष्ठ भ्रीविष्णुने साये प्रथ्वीका 
अपहरण करे वरड़े-वडे अटुर्यौको दाकर सखर्गलोकका राज्य 
इन्द्रको दे दिया ॥ १०२॥ 
पप ते वामनो नाम प्रादुभौवो महात्मनः। 
वेदविद्धिदिजैरेवं कथ्यते वैष्णवं यदा; ॥१०३॥ 
* जनमेजय ] इस प्रकार मनि वरं पटमात्मा श्रीहरकि 
वामन नामक अवतास्की कथा घुनायी । वेदवेत्ता गहण इसी 
तरद्‌ भगवान्‌ विष्णुके ग्रा ( ठील-जस्ति } ऋ वर्णन 
करते है ॥ ९०३॥ 


भूयो भूतात्मनो विष्णोः भ्रादुभौवो महात्मनः 1 
दत्ताश्रेय इति ख्यातः क्षमया धरया युतः ॥ १०४ ॥ 
इसफे घाद भूतात्मा परमात्मा विष्णुका फिर जो अवतार 
हआ; चह दत्ताघरेयके नामसे विख्यत्त है । भगवाम्‌ दत्तात्रेथः 
क्देहीक्षमाशीर ये| १०४॥ 
तेन नष्टेषु वेदेषु क्रिया मखेषु च। 
चातुर्वण्यं तु संकीर्णे धरम शिथिलतां गते ॥१०५॥ 
अभिवर्तति याधम सव्ये नष्टेऽरते स्थिते। 
प्रजासु श्ीयंमाणादु धम चाङुछतां गते ॥१०६॥ 
उस समय वेद्‌ ठप हो गथ थे; वैदिकी प्रक्रिया ओर 
यज्ञ भी नष्ट्राय हो गये येः चार्य वणमि संकरता आ गयी 
थी? धम्मं ्विथिल हो चलम था, अधमं वदे जोरौके साथ बद 
रहा था } सत्य भिटता जा रहा या ओर स ओर असत्यका 
बोल्वाल् शा | प्रजा क्षीण हो रही थी गौर धर्म पाखण्डपै 
मिश्रित दौ गया था | १०५-१०६ ॥ 


सहयकषक्रिया वेदाः प्रत्यानीता हि तेन बै । 
चातु्षण्यंभसं कीणं कतं तेन मदात्मना ॥ १०७॥ 
एसे समयमे भगवान्‌ दत्तत्रेयने यज ओर क्रियाओंसदित 
वेरटोक्रा पुनश््धार क्रिया ओर चारों वणे पृथक्‌ पथक्‌ करके 
उन व्यवेश्थित रूण दिया ॥ १०७ ॥ 
तेन दैदयराजस्य कातंवीर्य॑स्य धीमतः। 
वरदेन वये दत्तो दच्चाञ्रेयेण धीमता ॥१०८॥ 
वरदायक एवं जाननिष्ठ॒ मगत्रान्‌ दत्तात्रेयने हैदयवंरी 
बुद्धिमान्‌ राजा कार्तवीयंको यह वर दिया था-॥ १०८ ॥ 
प्तव्‌ बाहुद्धयं यत्ते सधे मम तेऽनघ । 
शतानि ददा बाहूनां भविष्यन्ति न संरायः ॥१०९॥ 
“निप्याे नरेश !ये जो वुम्दारी दो जै है, मेरे बर- 
दानक प्रमारो युद्धे समय निस्सदेद एक हजार भुजाओंकि 
रूपर्मे परिणत हो जर्येगी ॥ १०९ ॥ 
पाकयिष्यलि कृत्स्नां च वद्धं वद्ठुधाधिप । 
इनिसक्योऽरिदृन्दानां धर्मक्ष्च भविष्यसि ॥११०॥ 
धृथ्वीनाय { ठम सारी पर्वीका पान करोगे, शनुओंकि 
समुदाय दम्दारी ओर ब्रड़ी कठिनतसे देख सकेगे तथा दुम 
धर्मके ज्ञाता होभगेः ॥ ११० ॥ 
पष ते वैष्णवः श्रीमान्‌ घादुभौवो ऽद्धृतः इभः । 
कथितो वै महारज यथाश्रुतमरिंदम ॥१११॥ 
शलुरभोका दमन करनेवलि महाराज ! मैने जैसा सुना 
थ( उसके अनुसार ठेमसे भगवान्‌ विष्णुके इस अद्भुतः 
छम यवं तेजस्वी अवतारका वर्णन किया है ॥ ११२९ 


यश्च जामद्ग्म्योऽयं प्रादुभीवो मष्टातमनः 


१५२ 


शीमहाभास्ते खिटठभागे 


[ दरिषंशे 


यप्र बाहुसहस्रेण विसितं दुर्जयं रणे । 
शमो ऽजुनमनीकस्थं जघान चचपति पुः ॥९१२॥ 
फिर परमात्मा श्रीहरिका जमदग्निनन्दन परद्यरामके 
रूपम अवतार हुआ । उस अवतार्सम भगवान्‌. परश्चरामने 
सेनाके वीचम खड हुए. उस राजा अर्जुनका वध किया याः 
जो अपनी सस्त भुजाओंके कारण धमंडमे भरा रता था 
ओर समराद्धणमे रातरुओंके च्वि दुर्जय वना दुआ या ॥ 
रथस्थं पाथिवं रामः पातयित्वाज्ञुनं भुवि। 
धर्षयित्वा यथाकामं करो्मानं च मेघवत्‌ ॥११३॥ 
कृत्स्नं बाुसदस्ं च चिच्छेद अशुनन्दनः 1 
परभ्यधेन दीपेन क्षातिभिः सहितस्य वें ॥१९४॥ 
राजा अर्युन रथपर वैा था, परंतु भयुनन्दन परश्चराम- 
जीने उसे धरतीपर गिरा दिया ओर इच्छानुखार छातीपर 
चेद्कर चमकत हुए फरसेसे उसकी सम्पण सदस युजार्प 
कार डाली | यद्यपि वह जाति-मादर्यो एवं कुटुम्बीजनेकि 
साथ थाः तो भी उसकी यह दा ्ो गयी | उस समय 
कर्तवीयं मेघके समान गम्भीर खरम जोर-जोरसे चीखता- 
चिस्छता रदा ॥ १२३-११४॥ 
कीणी क्षनियकोरीभिर्मेरुमन्द्रभूषणा। 
धिःसप्तरृत्वः पृथिवी तेन निशक्षक्निया रता ॥११५॥ 
उन्होने मेर ओर मन्दराचलते विभूषित समस्त पएृष्वीपर 
करोड क्षत्रिर्योकी ख विछा दीं तथा दक्षीस बार भूतलको 
क्षत्िर्योसे शल्य कर दिया ॥ ११५ ॥ 
द्त्वा निशश्वनियां चैव भगवः सुमहातपाः । 
सचैपापचिनाश्ताय वाजिमेधेन चेध्वाम्‌ ॥११६॥ 
परथ्वीको क्षचियहीन करके महातपस्वी भगुनन्दन 
परशुरामने अपने सम्पूर्णं पापोका नाश ( प्रायधित्त ) करनेके 
स्यि अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान किया 1 ११६ ॥ 
तस्मिन्‌ यक्षे महादाने दक्षिणां शगुनन्दनः। 
मासेचाय ददो प्रीतः करयपाय वसुंधराम्‌ ॥११७॥ 
जिसमे वडा भारी दान दिया जाता दैः उस अश्वमेध 
यरे ्रगुनन्दन परजुरामने प्रसन्न होकर मरीचिङ्कमार कद्यप- 
को दधिणार्पसे यह्‌ सारी परथ्वीदेदी थी) ११७॥ 
वाख्णास्तुरगाञ्छीघान्‌ स्थं च रथिनां वरः । 
दिरण्यमक्षयं धघेनूग॑जेन्द्रौश्च महामनाः । 
दवौ तस्मिन्‌. सहप्यक्षे विसे, महायद्याः ॥११८॥ 
महायशस्वी, महामनस्वीः रथिरयोमिं श्रेष्ठ परश्यरामने उस 
अश्वमेध नामकं महायज्ञम वरणके यहेसि प्रास्त हुए शी्रगामी 


षोदेः र्थः अक्षय सुवरणरक्ति, येन ओर गजराज भौ दानमे 
दिये ११८॥ 


अधापि च हिताथौय लोकानां भृगुनन्दनः । 
चरमाणस्तयो दीं जामदग्न्यः पुनः पुनः। 
तिष्ठते देववद्‌ धीमान. महेन्द्रे पर्वतो्मे ॥११९॥ 

आज भी समस्त छोकेकि तके च्यि वारर तीष 
तपस्या करते हुए भरगुङकुख्नन्दन जमदग्निकुमार बुद्धिमान्‌ 
परशुराम उत्तम महेन्द्रपर्वतपर देवताकरि समान निवास 
करते दे ॥ ११९॥ 


पष विष्णोः सरेदास्य श्याश्वतस्यान्ययस्य च । 

जामद्रन्य इति स्यातः प्रादुभीवो महात्मनः ॥१२०॥ 
जनमेजय ! समस्त देवता्क्रि स्वामी सनातन एवं 

अविनाशी पुरुष परमात्मा विष्णुके दस पररुराम नामक अव- 

तारका वणन किया गया ॥ १२० ॥ 

चतुर्विधे युगे चापि पिश्वामिष्रपुरस्सरः1 

राज्ञो दशारथस्याथ पुघः पद्मायतेश्षणः ॥१२१॥ 
्ोवरीसवं प्रेतायुगमे भगवान्‌ विष्णु राजा दशरथके पुत्र 

कमलनयन श्रीरामके स्परे प्रकट दए. ओर कुछ कारतक 

विश्वामिन्नके अनुयायी रदे ॥ ९२१ ॥ 

रत्याऽऽत्मानं मदायादुश्चतुधौ परसुसैश्वरः । 

रोके सम इति ख्यातस्तेजसा भास्कसेपमः ॥१२२॥ 
उस समय सर्वसमर्थं महवह भगवान्‌ अपनेको 

ववार सू्पमिं प्रकट करङे स्वयं श्रीराम नामते विख्यात हुए | 

वे श्रीराम सूर्यके घमान तेजस्वी ये ॥ १२२ ॥ 

भ्रसाद्ना्थं लोकस्य रक्षसां निधनाय च । 

धर्मस्य च विवृद्धः्यथं जक्षे तत्र महायशाः ॥ १२३॥ 
महायरस्वी श्रीराम सव्र रोर्गोको प्रसन्न रखने, रक्षर्ख- 

को माले ओर धमकी बृद्धि करनेके घ्य उस समय अवतीर्णं 

हु ये ॥ १२२ ॥ 


तमप्याुमयुष्येन्द्रं संभूतपतेस्नजुम्‌ 1 
यस्मै दत्तानि च।खाणि विश्वामित्रेण धीमत। ॥ १२४॥ 
वधार्थं देवशत्रूणां दुर्धराणि सुरेरपि। 
जानी पुपर उन नरेन्द्र श्रीरामको समसन भूर्तोकरे स्वामी 
भगवान्‌ विष्णुका अनतारःविग्रह वताते ई जिर परम 
बुद्धिमान्‌ विश्वामिरजीने देवद असुर्येका वध करमेके ल्यि 
पसे दिव्याल्न प्रदान कयि थे, जिन्दं धारण करना देवतार्भ- 
के ब्यिमी कठिन या॥ १२५१ ॥ 
यक्षविष्नकसे येन सनीनां भावितात्मनाम्‌ ॥ १२५) 
मारीचश्च सुवाहश्च बठेन बलिनां बरौ । 
निहतौ च नियारौ च कृतौ तेन मष्टात्मना ॥१२६॥ 
महात्मा श्रीरामने पवित्र अन्तेःकरणवाङे सुनियोके यंशमे 
बिष्न डालमेषाे बलवानेमिं भेष्ठ मारीच ओर्‌ सुबाहुको अपने 


हरिवंदापवे ] 


बा्णोका निशाना वनाया ओर उनकी आश्चा पूर्ण देने नहीं 

दी ॥ १२५-१२६॥ 

वतमाने मसे येन॒ जनकस्य महात्मनः। 

भग्नं मदिश्वरं चापं क्रीडता खीखया पुरा ॥१२७॥ 
पूर्वकाये जव महात्मा राजा जनकके यर्हो यज्ञ हो रहा 

था, उस समय उन्हीं श्रीरामने खेल-सा करते हुए महा- 

देवजीके धनुषकरो अनायास दी तोड़ डाल थ। | १२७ ॥ 


यः समाः सवेधमेश्दघतु्शा वने वसत्‌ । 
लक्ष्मणानुचयो रामः सर्बभूतद्िते रतः ॥ १२८ 
- वे सम्पूर्णं धमक ज्ञाता तथा समस्त प्राणिर्योफे दितमे 


तत्पर रहनेवाछे थे । उन्दने लक्ष्मणको साथ ठे चौदह वर्ष 
तकं व्मर्मे निवास जिया | १२८ ॥ 


रूपिणी यस्य पादर्व॑स्था सीतेति पथिता जनैः। 
पूर्वाचिता तस्य॒ टक््मीर्भ॑तौरमयुगच्छति ॥१२९॥ 
उस समय उनक्रे साथ मूतिंमती लक्ष्मी भीर्थीःजो 
लोगो प्सता" के नामते प्रसिद्ध थीं वे उनकी पूर्वौचित 
पत्नी थी ओर परतिकर पीरे-पीछे वने गयी थीं | १२९ ॥ 
चतदेश तपस्तप्त्वा वने वषौणि राघवः। 
जनस्थाने वखन्‌ कार्यं रिदरानां चक्रार ह ॥१२०॥ 
नयौदह वर्तक वनम तपस्या करके जनस्थानमे निवास 
करते हुए रघुनन्दन श्रीरामने देवताभका अभीष्ट कार्यं सिद्ध 
भरिया ॥ १३० ॥ 
सीतायाः पदमन्विच्छक्ष्मणाञ्चचरो विभुः । 
वियधं च कवन्धं च राक्षसो भीमविक्रमौ । 
जघान पुरूषभ्याघौ गन्धर्वौ शापवीश्चितौ ॥१३१॥ 
उन भगवान्‌ श्रीरामने (रावणे द्वारा अपहत ) सीताका 
पता क्गाते हुए ल्क्मणके साथ जाकर भयानक-पराक्रमी 
रास विराध ओर कवन्धको मार डास्र | वे दोनों वास्तवमे 
पुरुपर्सिह गन्धर्वं ये, किंतु शाप-ग्रस्त होकर राक्षस हो 
गये ये| १३१॥ 
इताशनाकेन्दुतडिद्घनामैः 
प्रतप्तजाम्बरूनदचिजयुङ्कै। 
मटेन्द्रवस्राश्नितुस्यसारैः 
दारः शरीरेण वियोजितौ वलात्‌ ॥१२२॥ 
इन राक्नसोँपर श्रीरामचन्द्रजीने रसे बारणद्वारा प्रहार 
क्रिय, जो अग्निः सूर्यः चन्द्रमाः व्रिजली ओर मेध्रके समान 
परक्रादित होते थे, जिनके विचित्र पह तपाये हुए जाम्बूनद 
नामक सुबण्के बने हुए ये ओर जो इन्द्रके व्र तथा विदयुत्‌- 
के समान यक्तिसाली ये \ उन वाणेदारा उरन्दोनि वबल्ूर्वक 
उन दोनों राक्षसोको शरौरसे विख्ग कर दिया ॥ १३२॥ 


धकचत्वारिदोऽध्यायः 


श्ण 


क -----~---------------------------------------- 


सु्रीवस्य छते येन वानरेन्द्रो महावलः । 

वाली विनिहतो युद्धे खुधीवश्वाभिषेचितः ॥१२२॥ 
श्रीरामने अपने मित्र सुग्रीव(की भलाई )के च्वि युद्धम 

महाबली वानरराज वालीकौ मार डाखा ओर उसके राज्यपर 

सुम्रीवक्रा अभिषेक कर दिया ॥ १३२ ॥. 


देवासुरगणानां दहि यक्षगन्धर्वभोगिनाम्‌ । 
अवध्यं राक्षसेन्द्रं तं रावणं युद्धदुमदम्‌ ॥१२७॥ 
युक्तं  राक्चसकोटीभिर्नीखाञ्जनचयोपमम्‌ । 
जैरोक्यरावणं घोरं रावणं शाक्षसेश्वरम्‌ ॥१३५॥ 
दुजयं दुर्धरं टं शाुखसमविक्रमम्‌ | 
दुनिसीक्यं सुरगणैर्वरदानेन दर्पितम्‌ ॥१२६॥ 
जघान सचिवैः सारद ससैन्यं रावणं युधि । 
महाभ्रघनसंकाशं महाकायं महावरम्‌ ॥ १३७॥ 
उन दिनों सक्षसराज रावण देवता, असुर, यक्षः गन्धव 
ओर नागरे व्यि अवध्य हो रहा था ! युद्धमै बह उन्मत्त 
होकर छ्डता था । करोड राक्षस उसके सहायक थे । उसका 
शरीर काठे अ्जनके ठेरके समान था | चिलोकीको इलने- 
वाला वह भयंकर राक्षसराज रावण दुर्जय ओर दुर्दषं॑था | 
उसका पराक्रम सिंहके समान था । उसक्रा घमंड बहुत ब्रम 
हुआ या | वरदानके कारण्र वह ओर भमी पमंडी हौ गया 
था । देवतार्थोके ल्यि उसकी ओर देखना मी कठिन था | 
उसका शारीर मेधोकी घटके समान काला था। भगवान्‌ 
श्रीरामने उस महाकाय महाबली रावणका युद्धम मन्नियों 
तथा सेनाभोसदित संहार केर डाला ॥ १३४-१३७॥ 
तमागस्कारिणं घोर पौलस्त्यं युधि दुर्जयम्‌) 
सथ्राठपु्रसचिवं ससैन्यं कररनिश्चयम्‌ ॥ १३८॥ 
राचणं निजघानाद्यु रामो भूतपतिः पुरा । 
पुरस्य रावण भयानक अपराधी था, उसका प्रलेक 
निश्चय क्रूरतासे पूर्णं होता था; युद्धम उसपर विजय पाना 
कठिन था । तो भी सम्पूर्ण भूरतोके पालक भगवान्‌ श्रीरामने 
ू्कख्यै उसे माई पुत्रः मन्त्री ओर सेनाओःसहित शीघ्रता- 
पूर्वक मार ला ॥ १३८३ ॥ 
मधोश्च तनयो रतो वणो नाम दानवः ॥१३९॥ 
हतो मधुवने वीरो वरदो महासरः । 
समरे युद्धशौण्डेन तथा चन्येऽपि सक्षसः ॥१४०॥ 
उन्हीं दिनो मधुवन ( मथुरा ) म वण नामक्र दानव 
रता था, जो मधुका पुत्र था । वह मदान्‌ असुर वीर तो 
था हीः मनोवाञ्छित वर पा जनिके कारण ओर मी घमंडमे 
भर गया था । वह भ्रीरामके दी. स्वरूपभूत शनुष्नके हाथसे 
मारा गया । युद्धकरुशर श्रीराम ( तथा उनके मायो ) 
ने समराञ्गणमे ओर भी बहुत-से रा्चसोका सहार 
किया ॥ १३९-१४० ॥ 


१५४ 


पतानि छृत्वा कमीणि रामो धर्मश्रतां वरः । 
दलाश्वमेधानारूध्यानाजहार निरग॑खन्‌ ॥१४१॥ 
इन सवर (पराक्रमपू्ण) कर्मोका सम्यादनक्रके धर्मालिार्ओ- 
मै श्रेष्ठ श्रीरामने तीनगुनी दक्षिणासे युक्तं दस अदवमेध यश्च 
क्य, जो विना किसी विघ्न बराधाके पूरणं दो गये ॥ १४१ ॥ 
नाश्रूयन्ताद्युभा वाचो नाङ्गं माख्तो दवौ । 
न वित्तहरणं त्वासीद्‌ रामे सज्यं प्रशासति ॥९४२॥ 
श्रीरानचन्द्रजी जव राज्यक्रा शान करते येः उन दिनों 
कष अश्युम बातें नदी सुनी जाती थी, वायु प्रचण्ड वेगसे 
नहीं चरती थी तथा कोर किंसीके धनक्रा अपहरणं नदीं 
कर्ता था | १४२ ॥ 
पयंदेवन्न विधवा नानथौस्वाभवंस्तदा । 
सर्वमासीज्गद्‌ दान्तं रामे साज्यं प्रशासति ॥१४३॥ 
श्रीरामके राज्य-श्ाघनकाल्ये कमी व्रिधवा्ओंका कष्ण 
क्रन्दन नहीं सुना गया 1 कीं भो अनर्थपूर्णं प्रन नदी 
घटित हुई ¡ सारे जगत्के छोग ( मन ओर इद्धिर्योका संयम 
रलकर ) विनीत एवं अनुशासित रहते थे ॥ १४३ ॥ 
न प्राणिनां भयं चापि जखानटनिघातजम्‌ 1 
नच स्र चधा वारानां प्रेतकार्याणि कुर्वते ॥९४९॥ 
श्रीरामके राज्यकार्मै प्राणिरयोक्तो जल ओर अभ्िसे 
मृत्युका भय कमी नही देता या ओर वृर्दौको बाखकोकी 
प्रेतक्रिया नहीं करनी पडती थी ॥ १४४ ॥ 
बह्म प्य॑च्रत्‌ क्षं विहः क्षघ्रमयुयताः। 
दद्राश्चैव हि वर्णोस्रीजदुधपन्त्यनदंरताः । 
नाया नात्यचरन्‌ भवृन्‌ भायां नात्यचर त्‌ पतिः॥९४५॥ 
क्षत्रिय ब्राह्मगोकी परिचर्या करते येः वेश्य क्षत्रिरयोकर 
प्रति श्रद्धा रखते भे ओर चयुद्र अहंकार छोड़कर ब्राह्मण आदि 
तीनों व्णोकी सेत्रा करते ये । श्रीरामके राच्ये छिर्यो अपने 
पतिक छोड़कर दूसरे किसी पुरुषे आसक्त नदीं होती थीं 
ओर पुरुप्र भी अपनी पतनीके सिवा दूसरी की खीपर 
आसक्तिपु्णं दष्ट नदीं डारते ये ॥ १४५ ॥ 
सखव॑मासलीलजगद्‌ दान्तं निरद॑स्युरभवन्मही । 
राम पकोऽभवद्‌ भक्त रमः पाटयिताभवत्‌ ॥१४द्‌॥ 
उ समय सारा जगत्‌ जितेन्द्रिय था । प्थ्वीपर 
उक्रर्ओका कदी नाम मी न्दी था। एकमाने श्रीराम ही सवके 
खामी ओर संरप्रकं थे ॥ १५६ ॥ 
आयुवेपैसहस्राणि तथा पुत्रसहस्रिणः । 
अयोगाः प्राणिनश्चाखन्‌ रामे राज्यं पदासति ॥१४७॥ 
श्रीरामकरे ाननकाल्मे मनु््योक्री आयु हजारो वर्की 
होती यी । वे सदर्खो पु्रक्रि पितादोतेये ओौरक्रिसीभी 
प्राणीको रोग नहीं सताता था ॥ १४७ ॥ 


श्रीमहाभारते खिखुभागे 


[ दरिषरो 


द्रेववानासूष्ीणां च मसुप्याणां च सर्वेशः । 

पृथिभ्यां लमवायोऽभूद्‌ रामे राज्यं प्रशासति ॥ ६४८॥ 
मगवान्‌ श्रीराम जवर यदो राव्यासन करते ये, उन 

दिने इस भूतल्परर देवताः पि जर मनुरप्योका सव्र ओर 

समागम होता रहता था ॥ ६४८ ॥ 

याथा अप्यत्र गायन्ति ये पुराणविदो जनाः 

रामे निवद्धतस्वाथौ माहात्म्यं तस्य धीमतः ॥१४९॥ 


श्रीरामके विष्य "वे ही परम तख ई! देखी टद्‌ आसया 
रखनेवाटे पुराणयेत्ता पुरुष दस प्रक्रमे निम्नाद्धित गाये 
गाया कसते ई, जो उन बुद्धिमान्‌ श्रीरघुनायजीके माहासम्यको 
खचित करती ६--॥ १४९ ॥ 
श्यामो युवा रोदिताक्ो दीप्तास्यो मितभापिता । 
आजानुबाहुः सुमुखः सिंहस्कन्धो महायुजः ॥९५०॥ 
दश्च वप॑सहस्राणि ददा वर्पदातानि च। 
अयोध्याधिपतिर्भत्वा रामो राज्यमकारयत्‌ ॥ १५५१॥ 

शश्रीरामचन्द्रजीका वर्णे ध्याम यावे सदा तरण दिखायी 
देते थे, उनके नेच ( कुख-कुख ) सलिमा चि दए ये, मुखते 
तेज वरसता रहता था, वे बरत कम बोर्ते ये, उनकी ची 
युजा ुरनोतक पर्हुचती थी, उनका मुख बड़ा सुन्दर था 
कपे तिंदके-से जान पढते ये, महात्राहु भ्रीसमने अयोध्यकर 
अधिपति रोकर ग्यारह जार वर्मी राग्य किया 
था | १५०-१५१ ॥ 


चछकसामयजुपां धोरो ज्याघोपशच महात्मनः । 
अब्युच्छिन्नोऽभवद्रज्ये दियतां अुज्यतामिति ॥ १५२॥ 


'उनके राज्यमे सदा ग्येद) सामपरेद ओर यजुवंदका 
घोष सुनायी देता या । धनुपकी प्रत्यश्चा रखीचनेते उसकी 
टंकारध्वनि भी सदा श्रवणमोचर होती रती थी तथा दान 
देने ओर भोजन करानेका उपदेशं कमी वंद नदी 
होता था ॥ १५२ ॥ 
सत्यवान्‌ गुणसम्पन्नो दीप्यमानः स्वतेजसा । 
अति चन्द्रं च सूयं च रामो दाद्यरयिवंभो ॥१५३॥ ` 

'द्रारथनन्दन श्रीराम सत्ववान्‌ ओर गुणवान्‌. होनेके 
साय दी षदा अपे तेजते देदीप्यमान रहते थे । उनकी धुर्यं 
ओर चन्द्रमसे भी अधिक शोमा होती यी ॥ १५३ ॥ 
रेजे कतुदातैः पुण्यैः समाप्तवरदक्षिणैः । 
हित्वायोध्यां दिवं यातो राघवः समदायः ॥ ९५४॥ 

'भीरयुनाथजीने पर्याप्त एवे उत्तम दक्षिणाओसि युक्त 
सैको पवित्र यरशोका अनुष्ठान किया था । अन्तम वे अयोध्याके 


मदान्‌ जन-समुदायको साय ठे अपनी उस पुरीको छोडकर 
साकेत भामको परे, ॥ १५४ ॥ 


हरिवेरापवं ] 


पकचत्यारिदो ऽध्यायः 


१५५ 


"-------------- ज 


एवमेष महाबाहुरिक््वकुकुखनन्दनः । 
रावणं सगणं हत्वा दिवमाचक्रमे प्रययुः ॥ १५५॥ 

इस प्रकार दष्ष्वाकरुक्ुख्का आनन्द बदानिवलठे ये 
मबा मगवान्‌ श्रीराम दल्वलसहित रावणका संहार करके 
अपने परमधामको चले गये ॥ १५५ ॥ 


वैशम्पायन उवाच 


अपरः केशवस्यायं प्रादुभौवो मष्टात्मनः । 
विख्यातो माथुरे कल्पे सर्वलोकहिताय वै ॥९५६॥ 
वैशम्पायनजी कहते है--( जनमेजय ] ) इसके वाद 
परमात्मा भगवान्‌ केशवक्रा श्रीङप्णः नामक अवतार मधुर 
कदय ( मथुरामण्डल ) मे हुआ, जो सर्वत्र विख्यात है । 
भगवान्क्रा यह अवतार सम्पूण जगत्‌के दिके व्यि हुञा था 
यत्र शाल्वं च मैन्दं च दविविदं कंसमेव च । 
अरिषटग्रपभं कदि पूतनां दैत्यदारिकाम्‌ ॥१५७॥ 
नागं कुवखथापीडं चाणुरं सुष्टिकं तथा । 
दैत्यान्‌ माचुषदेहस्थान्‌ सुद्रयामास वीर्यवान्‌ ॥१५८॥ 
दस अवतार परम पराक्रमी इरिने शास्वः मेन्द, द्विविदः 
कंस, अरिष्टः ऋूषम, केशी, दैत्य-कन्या पूतना; कुवल्यापीड 
हाथी, चाणूर तथा सुटिक आदि मनुष्य-शरीरधारी दत्यो 
संहार किया था ॥ १५७-१५८ | 
छिन्नं बाहुसहस्रं च वाणस्याद्धतकमणः। 
नरकश्च हतः संख्ये यवनश्च महावङः ॥१५९॥ 
इसके अतिरिक्त उन्दोनि अदधत कम॑ करनेवाले वाणा- 
सुरकी सहख भुजर्पे काट डार्टी, युद्धम नरकाुरका नाश 
किया ओर महात्रली काल्यवनकौ भस्म करा दिया ॥ १५९॥ 


हतानि च महीपानां सर्वरत्नानि तेजसा । 
दुराचाराश्च निहताः पार्थिवार्व महीतले ॥१६०॥ 
इतना ही नदी, उन्होने अपने तेजते भूमिपारोके समी 
रल छीन ल्यि ओर भूतले दुराचारी राजार्ओंको मतके 
घाट उत्तार दिया ॥ १६० ॥ 
नवमे दवापरे विष्णुर्वि पुराभवत्‌ । 
चेदन्यासस्तथा जक्षे जातूक्य पुरस्सरः ॥१६२॥ 
( यर्शोतकं जो सात अवतार वताये गये, उन्म मत्स्य. 
कच्छपं अवतारोका भी अन्तमाव करके अन्द नौ समन्षना 
चाये । ) असवे द्वापर भगवान्‌ विष्णुका यह 
( भीकृष्ण नामक ) नवम अवतार हुआ था । इश्से कुछ 
पे ही उनका द्वे अवतार भी हो गया था, जो जातूकर्ण्य 
फे साय प्रकट हुआ था । वह वेदव्यासके नामे प्रसिद दै ॥ 


को वेवश्चतुघौ तु रतस्तेन मदात्मना 1 
जनितो भारतो वंशः सत्यवत्याः सुतेन च ॥१६२॥ 


उन सत्यवतीपुत्र महाप्मा व्याने एक वेदके चार 
विभाग क्ये ओर उन्न दही भरतवंशकी उक्त हुई परम्परा- 
को पुनः प्रचित किया ॥ १६२॥ 
पते रेोकदिताथौय प्रादुभीवां महात्मनः । 
अतीताः कथिता राजन्‌ कथ्यन्ते चाप्यनागताः॥ ९६३॥ 

राजन्‌ ! समस्त जगत्‌क्रा कल्याण करनेकरे च्यि प्रकट 
हए परमात्मा श्रीहरे जो उक्त (दस) अवतार रीत गये ई 
उनकी चर्चा या की गयी । अव॒ उनङ़े भविष्य होनेवाठे 
अवतार बताये जाते ह ॥ १६३ ॥ 
कर्किर्विष्णुयशा नाम रशाम्भखे ध्रामकरे दिजः 
सर्वंरोकदिताथीय भूयश्चोत्पत्स्यते प्रयुः ॥१६९॥ 

(भावी अवतारोरमे पहले 'वुद्धग्का प्राक्रख्य होगा |) इसके 
वाद विण्णुयस्चा नामे परसिद्ध कल्कि अवतार हेनेवाल दै। 
भगवान्‌ विप्णु शम्भल नामक ्रामर्मे सम्पूर्णं जगते हितके 
चि पुनः एक ब्राह्मणक रूपे प्रकट हौगि ॥ १६४ ॥ 
द्रमे भव्धसम्पन्ने य्ञवस्स्यपुरस्सरः ! 
क्षपयित्वा च तान्‌ सवौन्‌ भाविनार्थन चोदितान्‌ १६५ 
गङ्गायसुनयोर्मध्ये निष्ठां भरा्स्यति साुगः। 

पृक्त ददाम अवतारका समय वीत जानेपर याशवल्क्य 
ऋधिक्रो साथ लेकर प्रकट दोनेवाख यह अवतार भावी 
प्रयोजन ( दु्टके संहार ओर धर्मकी संखापना ) को सिद्ध 
करनेकी शक्तिसे सम्पन्न होगा । भगवान्‌ कर्कि भवितन्यतासे 
प्रित होकर अधर्मे प्थपर चल्नेवाले उन समस पापा- 
चारिका संहार करके अपने अनुयायिर्योसहित गङ्गा ओर 
यमुनाके मध्यवर्ती देशम अपने अवतारकार्यक्रो समाप्त करेगे ॥ 


ततः कुले व्यतीते तु सामत्ये सहसेनि के ॥१६६॥ 
चपेष्वय प्रणष्टेषु तदा त्वप्रय्रहाः प्रजाः। 
तदनन्तर मन्त्री ओर सैनिर्कोित राजवंशक विनष्ट टो 
जानेपर जत्र कोई शासक नरेदा नहीं रह्‌ जायगा, तव सारी 
परजा ब्रेखगाम होकर स्वेच्छाचारये प्ररत दो जायगी || १६ ६९॥ 
रक्षणे विनिदृत्ते च हन्वा चान्योन्यमादवे ॥१६७॥ 
परस्परहतस्वश्च निराक्रन्दाः सुदुःखिताः । 
र्ताकी राजकीय व्यवस्था समाप्त हो जानेपर लेग 
(आपरसमे ल्डेगे ओर) उसयुद्धमे एक दुसरेको मारकर नष्ट हो 
जा्ेगे । आपस्मे एक-दूसरेका धन दटकर अशदाय एवं 
अव्यन्त दुखी दो जायेगे ॥ १६७१ ॥ 
पव कएटमञुप्रा्ताः कलिसंध्याराके तदा । 
भजा; क्षयं प्रयास्यन्ति सार्धं कलियुगेन ह ॥१६८॥ 
उस समय कलियुगका संध्यांश यौत रहा हयेगाः उन 
दिनो शष प्रकार कष्टम पड़ी हुई सारी प्रजा कचियुगके साथ 
दी नष्ट टो जायगी-रेसी वात कही जाती हे | १६८ | 


१५६ 


क्षीणे कछियुगे तस्मिस्ततः ऊतयुगं पुनः । 


भौमहाभारते सिखभागे 


[ सिविद | 


पनः भगवान्‌्रे अवतार्योका यह्‌ वर्णन संकनेपसे ही किया गया 


प्रपत्स्यते यथान्यायं स्वभावादेव न्यथा ॥१६९॥ 
कलियुगे समा हो जानेपर फिर स्वभावे दी सत्ययुगक्री 
यथोचितरूपसे प्रदृत्ति दोगी, दुसरे क्रिसी प्रकारसे नहीं ॥ 
पते चान्ये च वहवो दिव्या देवगुणेयुंताः। 
प्रादुभौवाः पुराणेषु गीयन्ते बह्यवादिभिः ॥१७०॥ 
राजन्‌ !ये त्था ओर मी भगवान ब्रहुत-ते दिव्य 
अवतार हुए ई, जो देवोचित रुणे सम्पन्न ये ! ब्रह्मवादी 
मुनिरयोनि पुराणोमे उनका गान किया रै ॥ ९७० ॥ 
यत्न देवाश्च युद्न्ति प्रादुभौवारुकीतने । 
पुराणं वतैते यत्न ॒वेदश्वतिसमादितम्‌ ॥९७१॥ 
भगवान्‌ इन अवतारोका वर्णन करने्मे देवता भी 
चकरा जति दहै--इस विषयमे पुराण ही प्रमाण दहै जिसका 
वेदिक श्रतिये दाया समर्थन दोता है ॥ १७१ ॥ 
पतदुदे शमातरेण प्रादुभौवादुक्री्तेनम्‌ । 
तितं कीर्तनीयस्य सर्वलोकणुसेः प्रभोः ॥१७२॥ 
सम्पूणं जगत्‌ गुद तथा कीर्तन कसेयोग्य सर्वशक्तिमान्‌ 


दे ॥ १७२ ॥ 
भ्रीयन्ते पितरस्तस्य परादुभौवालुकीर्वनात्‌ 
विष्णोरतुखवीर्य॑स्य यः श्छणोति ऊताञ्चलिः ॥१७२॥ 
अनुपम-दक्तिशाटी मगवान्‌ विप्णुके अवतारोकी वारं्ार 
चर्चा करनेसे पितर्योको प्रसन्नता होती है । ज हाथ जोड़कर 
आदरपृवंक इस अवतार-कथाको सुनता दैः उसके पितररोको 
भी अक्षय वृत्ति प्रप्त होती है ॥ १७३ ॥ 
एतास्तु योगेश्वस्योगमायाः 
र्वा नसे सुच्यति सर्वपापैः । 
ऋद्धि सशद्धि त्रिपुलांश्च भोगान्‌ 
प्रामनोति सर्वं भगवत्रसादात्‌ ॥१७४॥ 
जो मनुष्य योगेश्वर भगवान्‌ श्रीदरिकी योगमाया 
दवारा प्रकट हुए अवतर्योकी इन टीलख-कथाभोंकरो सुनता दै, 
वह सव्र पापौसे मुक्त हो जातारै तथा भगवान्ी कृपते 
शीघही उसे ऋद्धिः समृद्धि एवं प्रचुर भोग--सव्रकी प्राति 
हे जाती दै ॥ १७४ ॥ 


इति श्रीमहाभारते खिरमागे हिंे दरिवंशपवेणि प्राहुभौवानुसंग्रहो नामैकचस्वरिंदोऽध्यायः ॥ ४१ ॥ 


इस प्रफार श्रोमदभारतेके सिरभाग हचिवंशके अन्तेत दरिनेशपवमे अवतार्ोका संग्रहनामक शूकतालीस्वे। अध्याय पूरा हुमा ॥ ४९॥ 
1 | मे 


दविचलारिशोऽध्यायः 
भगवान्‌ षिष्णुके ईश्वरत्वका वणन एवं अद्धुततारकामय संग्रापकी कथा 


व्चम्पयन उवाच 

विश्वत्वं शु मे विष्णोदेरित्वं च छृते युगे । 
वैङुण्टत्वं च देवेषु छृप्णत्वं मायुषेपु च ॥ १ ॥ 
ईश्वरत्वं च तस्येद गहनां केणां गतिम्‌ । 
सभ्प्रत्यतीतां भाव्या च श्छणु राजन्‌ यथातथम्‌ ॥ २ ॥ 

वैशम्पायनजी कहते है--राजन्‌ ¡ अव तुम मुसचसे 
सत्ययुगमे विप्णुके विश्वत्वको ( उनके अभयदायक 
आश्वासक सूपो ); हरित्वको ( पापहारी सूपको ); 
देवताओमे भगवान वैकुण्ठत्वको ( सर्वसमर्थताको ) ओर 
पुरुषो उनके श्रीक्ृप्मत्वको ( सचिदानन्दताको ) तथा 
उनके ईश्वर्वको ( दण्ड देने ओर कृपा करनेकी सामर्थ्यको ) 
ओर उनके भूतः मविप्य एवं वर्तमान करमो ( खील्मरो )की 
गहन गति ( दुर्बोध खूप ) को यथाथसूयसे सुनो ॥ १-२ ॥ 
अव्यक्तो व्यक्तलिङ्गस्थो यत्रैव भगवान्‌ घञ 
नारायणो शछयनन्तात्मा प्रभवो ऽव्यय एव च ॥ ३ ॥ 


वे सवदक्तिमान्‌ प्रमु अव्यक्त होनेपर भी ८ अवतार.चिग्रह 


धारण करते समय ) अपनी मूर्तिको प्रकट कयि रहते ई, वे 


नारायणः अनन्तखरूपः सवके उत्पत्तिखान ओर अव्यय 
( अविनाशी ) द ॥ ३॥ 
पष नारायणो भूत्वा हरिसिसीत्‌ रते युगे 1 
ब्रह्मा शक्र सोमश्च धर्मः शुक्रो वृहस्पतिः ॥ ४ ॥ 
कृतयुगमे ये नायायणूप टोकर हरि--मोक्षदायक्र वने 
ओर ये ही ब्रह्माः इन्दर, चन्द्रमा, धर्म, जुक्र ओर वृहस्पति 
के सूपोमे प्रकट हुए ॥ ४ ॥ “ 
अदितेरपि पुचत्वमेत्य यादवनन्दनः । 
पष विष्णुरिति स्यात इन्द्रादवरजो ऽभवत्‌ ॥ ५ ॥ 
इसके अनन्तर ये यादवनन्दन ( शरीङकप्णरूपसे अवतार 
लेनैव भगवान्‌ ) दी विष्णुके नामसे अदितिकरे पुत्र बनकर 
उत्पन्न हुए 1 उस जन्ममे ये इन्द्रके छोटे भाई वने थे ॥५] 
प्रसादजं ह्यस्य विभोरदित्याः पुत्रजन्म तत्‌ । 
वधाथ सुरशच्रणा दत्यदानवरश्तसाम्‌ ॥ ६ ॥ 
देवताकि यान्नु दैत्यः दानवे ओौर राक्षसोका संहार 
करनेके स्यि मगवान्‌ विष्णु अदितिके यह पुत्र बनकर उत्यन्न 
हृ । यह उन विमुका प्रखाद (वरदान) सूप जन्स था ॥ ६ ॥ 


हरिवंश्षपवं 1 


दिचत्वारिशोऽध्यायः 


१५७ 


प्रधानात्मा पुय देष ब्रह्माणमसटजत्‌ प्रभुः 1 
सोऽख्जत्‌ पृचपुरुषः पुरा कल्पे प्रजापतीन्‌ ॥ ७ ॥ 
खष्टिके आदिमे इन प्रधानात्मा--प्रकृतिके संचालक प्रयुने 
ही व्रह्माको उत्पन्न किया ओर इन्दी पुराण पुखुषने पूवंक्ल्यमे 
( मरीचि आदि ) प्रजापतिर्योकी खष्टिकी ॥ ७ ॥ 
ते तन्वानास्तनूस्तत्र बह्मवंशानयुत्तमान्‌ । 
तेभ्योऽभवन्महात्मभ्यो वहुधा जह्य राश्वतम्‌ ॥ ८ ॥ 
उन प्रजापतियोने ( कदयप आदिके रूपसे ) अपने 
स्वसूपक्रा विश्तार करके शष्ठ व्रहमवंशों (गोत्रो) को 
उन्न किया ओर उन महात्मा्ति सनातन वेद अनेक 
साखाओमे विभक्त हो गधरा | ८ ॥ 
पतद्ब्धरयभूतस्य विष्णोनौमायुकीर्तनम्‌ 1 
कीर्तनीयस्य ठोकेषु कीत्य॑मानं निवोधमे ॥ ९ ॥ 
` छोकोमे कीतनीय आश्चर्यमय विप्णुकरे इस ( वेदरूप ) 
नामकीर्तनका उष्टेख मेरे दारक्रिया जा रहा ह, त॒म इसे सुनो ॥ 
वृत्ते वृत्रवधे तात वल्माने छते युगे। 
आसीत्‌ बेखोक्यविख्यातः संघ्रामस्तारकामथः ॥१०॥ 
तात ! वतमान सत्ययुगे उतरासुरका वध हो चुकनेपर 
त्रिलोरीमे प्रसिद्ध तारामय संग्राम हुआ ॥ १० ॥ 
तत्रासन्‌ दानवा घोराः स्वँ संम्रामद्रपिताः। 
घ्नन्ति देवगणान्‌ सवौन्‌ सयक्षोरगराक्षसान्‌ ॥ ११ ॥ 
उस समयं सव-के-सव दानव संग्रामम दर्पं भरे एवं 
भयकर दिखायी देते थे । उन्होने "यः राक्षस ओर सपौ- 
सहित समस्त देवतामको मारना आरम्भ कर दिया था॥१२१॥ 
ते वध्यमाना विमुलाः क्षीणप्रहरणा रणे। 
त्रातारं मनसा जग्मु्ष्वं नारायणं हरिम्‌ ॥ १२॥ 
मार खति-खाते जव उनके आयुध क्षीण हो गये, तव वे 
रणसे विमुख हो गये ओर सवकी रभा करनेवाले नारायणदेव 
श्रीहरि ही मनसे रारण हो गये ॥ १२॥ 
पतसिन्नन्तरे मेधा नि्वणाङ्धारवर्षिणः। 
साकंचन्द्रयहगणं छद्यन्तो नभस्तलम्‌ ॥ १३॥ 
इसी व्ीचमे मेध तपे हुए रोदेके समान अ्याखरहित 
अगारे वरसने चे | वे सूर्यः चन्द्रमा आदि रहौँसदहित 
आक्रागको ढक्ते हुए दिखायी देते थे ॥ १३ ॥ 
चश्चद्वियुद्णाविद्धा घोरा ॒निहौदकारिणः। 
अन्योन्यवेगामिहताः प्रववुः सप्त मारुताः ॥ १४॥ 
कोधती हुई वरिजलियोसे व्याप्त हो वे भयृकर बादल 
बड़े जोरसे गर्जने ओर परस्पर वेगसे कराने लगे; स्योकि उस 
समय प्रवह्‌ आदि सात प्रकारकी हवा चर रही थी] ९४॥ 
दीप्ततोयाशनीपातै्वच्रवेगानिखाङुः । 
ररास  घोरैरत्पातेर्दहयमानमिवाम्बस्म्‌ ॥ ९५॥ 


व्रिजली जौर तपे हट जले गिरने तथा वञ्चक समान 
वेगवाली वायुके चलने आदि भयंकर उत्पातोसे जलता हुजा-सा 
आकाश मानो कराने ङ्गा ॥ १५ ॥ 


पेतुरुस्कासदसख्रणि मुहुराकारशागान्थपि । 
न्युऽ्जानि च विमानानि प्रपतन्त्युत्यतन्ति च ॥ १६॥ 
उस समथ हजारो उल्क गिस्ती ओर फिर आकाशम 
प्हुच जाती थी तथा विमान नीचेको सुख करे गिरते ओर 
प्रिर उष्टे ही उड जते ये ॥ १६ ॥ 
चतुरयुंगान्तपथौये खोकानां यद्‌ भयं भवेत्‌ । 
तारशान्येव रूपाणि तस्िन्युत्पातलक्षणे ॥ २७॥ 
हजार चतु्युंगोके अन्तमे दोनेवलि प्रल्यके समगर लोके 
कोजो भय प्रात होतादैः इक्त उत्पातके समयमी वैते 
चिह दीखने खगे ॥ १७ ॥ 
तमसा भिष्मं सर्वं न प्राक्षायत किचन । 
तिमिसेधपरिक्षित्ता न रेजुख रक्षो दश्च ॥ १८॥ 
सारा संसार अन्धकारसे व्याप्त हो जनेके कारण प्रमादीन 
प्रतीत होने खगा; कुछ मी सूञ्धता न था । अन्धकारसमूहुसे 
आच्छादित हुई दसो दिया श्त ही नदीं होती थी १८] 
निशेव रूपिणी काटी कालमेधावगुण्ठिता । 
दयौनं भात्यभिभूताकौ धोरेण तमसा चृता ॥ १९॥ 
जसे काले मेघोके धिर आनेपर अमावस्याकी रात्रि मूति- 
मती-सी दीख पडती दैः वैते दौ अन्धकारे सूर्यकरे तिरोहित 
होनेपर घोर अन्धकास्ते भरा हुआ आकार शोभायमान 
नहीं खता था | १९ ॥ 
तान्‌ घनोधान्‌ सतिमिरान्‌ दभ्यौसुस्कषिप्य स प्रयुः 1 
वपुः संदशेयामास दिन्यं ङष्णवपु्हरिः ॥ २० ॥ 
उस समय दयामवर्णं भगवान्‌ श्रीदरिने अपनी दोनों 
सुजा्ओद्वारा अन्धकारसे ग्या उन मेघसमूहोंको ऊपरकी 
ओर ठेखकर अपने दिव्य स्वरूपका साक्षा्तार कसया ॥ २०॥ 


रलाहकाञजननिमं वखादकतनूरुहम्‌ । 
तेजसा वपुष! चेव कृष्णं कृष्णमिवाचलम्‌ ॥ २९ ॥ 
दीप्तपीताम्बरधरं तप्तक्िनभूषणम्‌। 


धूमान्धक्रारवपुषा युगान्तािमिवोत्थितम्‌ ॥ २२॥ 
चतुद्धिशुणपीनांसं वककःपङ्कतिभूषरणम्‌ । 
चामीकरकराकारेरायुधेरुपशोभितम्‌ ॥ २३॥ 
चन्द्राकंकिरणोद््योतं गिरिकूट शिरोव्चयम्‌ । 
नन्दकानन्वितिकर शरारीविपधारिणम्‌ ॥ २४ ॥ 
शक्तिचितरं हरदं शङ्कचक्रगदाधरम्‌ । 
विष्णुर क्षमाम श्रीच्षं शा्गधन्विनम्‌ ॥ २५ ॥ 
हर्यश्वरथसखंयुक्ते खुपणध्वजरोभिते । 
चन्द्राकंचक्ररूचिरे मन्द्राक्षधतान्तर ॥ २६॥ 


१५८ 


शीमहाभारते सिख्भागे 


~~~ 


अनन्तरद्िमिसंयुकते दर्यो मेरकरूयरे। 
सारकाचिजकुखुम ग्रहनक्षत्रवन्धुरे ॥ २७ ॥ 
भयेष्वभयदः व्योन्चि देवा दैत्यपराजिनाः 
ददुस्ते स्थितं देवं दिन्यरोकमये र्थे ॥ २८ ॥ 
भगवान्‌के भीविग्रहका वर्णं मेघ ओर अञ्जनके समान 
या | उनके केरा मी मेके समन ( कले ) ये । उनक्रा 
शारीर तो काले पर्वतके समान कृष्णवर्णं था ही, उससे तेज 
भी इष्णवर्णं निकलरहा या । वे चमकता हुमा पीताम्बर 
धारण कयि हुए ये ओर तये हुए सुवर्णे मभूषघण पहने ये। 
उस समय वे से लगते थे, जैसे धूमके समान अन्धकारमय 
शरीरसे अविषटित होकर प्रर्यकाख्की अग्नि प्रकट हुई हो । वे 
( अष्टञुज होनेके कारण ) आठ मांसल वाहुमूछसि सुशोभित 
ये | चमकते दए. आभूष्रणोसे युक्त उनका श्रीविग्रह एेसी सोमा 
देता था, जैते व्गुरखकी पेक्तिसे विभूषित मेष दौ । वे सुवर्णकी 
वनौ मूढवले आयुषे सुशोभित तथा चन्द्रमा ओर सू्॑की 
किरणेसि दमकते हुए पर्वतक्रे समान अचल ये । कटिप्रदेमें 
मैनसिरके समान पीठे रेगकरा नार वेपि दुष्ट ये ।* 
उनका एक दाय नन्दक नामके खङ्गसे युशोमित थाः 
वे दुसरे हाथमे स्पाकार ( शदरदार ) बाण 
धारण कयि हुए ये 1 सक्तिसे उनी विचित्र यामा 
टो रही थी । तीसरे हाथमे दल ल्यि रहनेके 
कारण वे वहूत ऊँचे दिखायी दे रहे ये । अन्य तीन हार्थो 
भ उरन्देनि शङ्कु, चक्र ओर गदा धारण कर रखी थी ! एक 
हाथमे उनके शा्गं ( सीगका वना ) धनुष था | भगवान्‌ 
विष्णु एक पर्वते समान दीख रदे थे । उनके अङ्गम जो 
श्रीदः वे ही ब्र खानीय थीं । जेते पर्वतका मूलमाग क्षमा 
८ पृथ्वी ) पर प्रतिष्ठित है, उसी तरह श्रीहरिकी पा्िका मूल 
क्षमामावे है | मयक्रे अवसरोपर अमयदशन देनेवाले पर्वतकरे 
समान अटर मगवान्‌ विष्णुकौ दै्योसि हारे हुए देवतानि 
आकाररके वीच दिव्यलोकमय रथम त्रेठे देखा । उस स्थमे हरे 
रंगके धोद जुते हुए थे । वह्‌ गस्ड़की ध्वजासे दोमित था । 
सर्य ओर चन्द्रमारूपी पद्यसे वह सुन्दर दिखायी देता था । 
उसके भीतरी मागको मन्दराचलकूपी धुरेनै धारण कर रसा 
था | भगवान्‌ शेष ही उसमे रद्रि ( लगाम ) वनै हुए ये। 
मेर पर्व॑त उसका कूवर ८ अगेका माग )था | तरे दी 
उसमे रंग-विरगे पूोके स्पमे स्ने थे तथा ग्रहःनक्षत्र 
उसे डोरीके सूपमे खो ये ॥ २१-२८ ॥ 
ते रतास्खयः सवे देवाः हक्रयुरोगमाः1 
जयदाब्दं पुरस्कृत्य शरण्यं शरणं गताः ॥ २९ ॥ 
उस्र समय इन्द्र आदि समस्त देवतानि जय-जय 


# यु नीर्कंठजीने शिलाका अथं मैनसिरु ओर्‌ उच्वथका अर्थं 
नीकौवन्ध या नारा किया दै | 


भवणभ 


शन्दका उच्चारण किया ओर हाथ जीद्कर शरण देनेवाले 


विष्णु-भगवान्‌की शरण ग्रहण की ॥ २९ ॥ 

ख तेषां ता गिरः श्रुत्वा विष्णुदयितदेवतः। 

मनश्चक्रे विनाशाय दानवानां मदाख्धधे ॥ २० ॥ 
विग्णुको देवता प्रिय दैः अतएव उन्दौनि देवतार्ओकी 

उस वाणीको सुनकर मदायुद्धमे दान्वेकरि नाया केका 

अपने मन्म विचार किया | ३० ॥ 

आकाशो तु स्थितो विष्णुः सोत्तमे पुरुयोत्तमः। 

उवाच देवताः सवीः सप्रतिक्षमिदं वचः ॥ ३१ ॥ 
उत्तम आका विराजमान उच पुरुषोत्तम भगवान्‌ 

विप्णुने स देवतापि प्रतिचूर्वक यद वात कटी--॥ २१॥ 

छ्याभ्ति भजत भद्रं बो मा चैष मरुतां गणाः1 

जितः मे दानवाः सर्वे ्ैलोक्यं प्रतिगता ॥ ३२ ॥ 
ष्रेवतामो ! वम्दारा कल्याण हो { अव ठम शान्त हो 

जाओ, ढसे मत ! मेरे दाय खरे दानव जीत च्यि गवे-- 

यो समश्षना चादिये । (अवर ) ठम त्रिलोकीका राज्य अपना दी 

मानो ओर उसपर अधिकार करो» ॥ ३२॥ 

ते वस्य सत्यसंघस्य विष्णोवीच्ये न तोपिताः । 

देवाः श्रीति परां जग्मुः प्रप्येवाखतसुत्थितम्‌ ॥ ३३ ॥ 
सत्यप्रतिश्च भगवान्‌ विप्णुक्रे वाक्ये आश्वासित दो 

देवता अत्यधिक प्रसन्न हुए, मानो उनको क्षीस्ागरते प्रकट 

हुआ अग्रत मिरु गया ॥ २३॥ 

ततस्तमः सषटियते विनेद्यु्च वादकाः 1 

भ्रवबुश्च शिवा वाताः प्रसन्नाश्च दिशो दशा ॥ ३७ ॥ 
उस समय अन्धकार दूर्‌ दो गयाः मेष विलीन हो 

गये, सुखदायक वायु चलने क्गी ओर दसो दिशर्ण निर्मल 

हो गयीं ॥ ३४] 

खुपभाणि च ज्योर्तीपि चन्द्रं चकुः पक्षिणम्‌ । 

दीप्तिमन्ति च तेजांसि चक्रुरकं प्रदक्षिणम्‌ ॥ ३५ ॥ 
सुन्दर प्रमावाठे नक्षत्र चन्द्रमाकी ओर प्रकाशमान अ्रह 

सूर्यकी प्रदक्षिणा क्से ख्गे ॥ ३५ ॥ 

न विग्रहं श्रदाश्चक्रः प्रसनाश्चापि सिन्धवः! 

नीरजस्का वथुमीयौी नाकमागौद्यस्मयः ॥ ३६ ॥ 

~ भरहोनि आपसर्मे टकराना छोड दिया, नदिर्योका जल 

निर्मलो गया तथा देवयानः पिव्रयान ओर मोक्षमागं 


\ 


नामक तीनो मार्गं भी रज ( धूल या रजोगुण )से ररित हो ` 


गये ॥ ३६ ॥ 
यथार्थसू हुः सरितो नापि चुश्चुभिरेऽर्भवाः . 
आसञ्छुभानीन्हियाणि नराणामन्तरात्मद्धु ॥ ३७ ॥ 


॥ 


शरिषंदाप्वं ] 


त्रिचत्थारिदो ऽध्यायः 


१५९. 


नदिर्यो ठीक दगसे ब्रहने टी स्मुदरका श्ुग्ध दोना प्रकृ धमः संवृत्ता टोकरा मुदितमानसाः । 
चरेद ष्टौ गयाः मनुप्येकि मनमि इद्धिर्योको श्म कामेमि प्रीत्या परमया युता देवदेवस्य भूपते ! 


द्गानेकी इच्छा ष्टेने लगी ॥ ३७ ॥ 

भहपयो चीतद्ोका येदायुख्यैरधीयते । 

यक्षेषु च हविः खादु दिचमद्नाति पावकः ॥ ३८ ॥ 
मदं शनोक्रदित होकर उशचस्वरसे वेदध्वनि करने त्मोः 


अग्निदेव मी य्ेर्मि पवित्र ओर स्वादु विका मक्षण करने 
लगे} ३८ ॥ 


विष्णोः स्त्यप्रतिक्षस्य श्रत्वारिनिधने गिस्म्‌ ॥ २९ ॥ 


पर्वीनाय [ स्यी प्रतिक्चा करमेवले देवपूज्य भगवान्‌ 
पिष्णुके द्वस की गयी शच्ुनाद्चकी प्रतिशा सुनकर 
प्राणी अपने मनम प्रसन्न देकर परम प्रीतिते यज आदि 
धरमानुष्ठानमे प्रदत्त दो गये | ३६ ॥ 


इति श्रीमहाभारते चिरुभगे हचिंरो हरिवेशपर्वणि आश्वयैतारकामये द्धिचत्वारिकोऽध्यायः ॥ ४२॥ 
द प्रक्‌ परीमहामासतके लिरुभाग हखिशेके अनतमैत दरिवंशप्वमे माश्चयेतारकामय संमरामधिषयक वय सवे{ अध्याय पृराहुमा ॥४२॥ 


षि प) 


त्रिचत्ारिशोऽ्यायः 


देवताओके साथ युद्धके छ्य उद्यत हुई दत्यसेनाका धर्णन 


वैश्रम्पायन उषाच 
ततो भयं विष्णुमयं श्रुत्वा दैतेयदानवाः । 
उचछोगं विपुरं चक्ठयदधाय शुधि दुर्जयाः ॥ ९ ॥ 
वेशम्पायनजी कहते है--जनयेजय !} तदनन्तर 
मुरुयतः मगवेन्‌ विष्णुी ओरसे भय प्राप्त हुमा है, यद 
सुनकर रणददुर्जय दैत्यो ओर दानवेनि युद्धके स्यि वड़ा भारी 
उग्रोग क्रिया) १1 


मयस्तु कान्चनमयथं 
खेतुश्यक्र विक्रमन्तं 
किद्धिणीजालनिर्धोपं 


भरिनस्वान्तस्मव्ययम्‌ । 
शुकेदिपतमदहायुघधम्‌ ॥ २ ॥ 
द्धीपिचर्मपरिष्कृतम्‌ । 
खचितं रत्नजाटै्च हेमजारैश्च भूपितम्‌ ॥ ३ ॥ 
सक्ष र्यवरोद््रं सपस्थानममोपमम्‌ । 
शृहासगरणाकीर्णं पक्षिभिश्च विराजितम्‌ । 
दिव्यस्रदूणीरधरं  पयोधरनिनाद्ितम्‌ ॥ ४ ॥ 
गदापरिषसम्पूणं मूर्तिमतमिवार्णवम्‌ } 
हेमकेयुरलयं ख्णेमण्डलक्रूचरम्‌ ॥ ५ ॥ 
सयत(कप्वजेद्रं सादित्यमिद मन्दरम्‌ । 
गजेनदराम्भोदसददां लेम्बकेसरव्चंसम्‌ ॥ ६ ॥ 
: युक्तरक्षसहसरेण  सदस्राम्बुदनादितम्‌ ! 
दीप्तमाकागं दिव्यं रथं पररथास्जम्‌ ॥ ७ ॥ 
अध्यतिषठद्रणाकाङ्की परर दीपमिरवाश्चमान । 
मयुर एक सुवर्णमय रपर आरूढ हु, जिसका 
विस्तार बारह सो हाथ या ] उस चार पदिये लगे भे। यह 
र्य दटने या वरिगडुनेवलय नहीं था। कैश ही विषम मूमि क्यो 
न हो, उत्त वद अगि वद्‌ जाता था। उस रथम वदे-चडे आयुध 
सन्दर ठंगसे सजाकंर रखे गये ये । उसमे रोर-छोरी 
भगो यु सारं र्गी था, भिनते मधुर भ्वनिका 


विस्तार होता रहता या । प्यके ऊपरी भागम उसकी रक्षाके 
च्य चीतेकी खाल मदी गयी थी | उस रथे मेति-मेत्िके 
रत्न जदे गये ये तथा रेने नालि उत्की शोभा बदा रदी 
थी | उख्का धुय ब्रत अच्छा था { वह रथ अच्छी श्रेणीके 
र्थो भी सप्रते अच्छा या | उसकी परैठक़ व्रद्ी चुन्दर थी। 
बद देले पर्वत-जेसा जान पड़ता था । उसमे जीव-जन्ुभकि 
चित्र अङ्कित ये। भोति मोतिके पक्षिक चित्र भी उसकी 
ोमा वदा रदे ये ! उर्फ भीतर दिव्यान अर तरकख रवे 
गय थे । उस र्यते मेधगर्जनाके समान गम्भीर वर्थरशन्द 
होता रता या । गदारओं भौर परिषि प्रसरणं थह विदाठ 
रथ मूतिमान्‌ समुद्र-स्ा जान पड़ता था | उस रथम जरह 
जहां संधिखलोको वेधे र्खनेफे लिथि पिरयो चमी थी, 
वो -वदो वे पदविका सुवर्णं निमित केयूर गौर बल्यके स॒दा 
शोमा पाती थीं | उसका कूवर सौनेका मण्डल-सा जान पडता 
था ! ष्वजाते सुदोमित वह ऊँचा रथ सूर्यमण्डटते 
विमित मन्दराचल-सा जान पड़ता था । दूरसे देखनेपर 
उसका रग बडे बढ़े गनरा्ज" मरोर घटाथ तथा भाटक 
समान जान पता था ! उस्म एक हजार री लुते हुए ये। 
उसकी घरथगाश्ट खदरी मेर्धोकी गर्जनाको तिरस्कृत श्रि 
देती थी । वह्‌ दीस्िमान्‌ दिव्य रय आकाशम मौ चर सकेता 
या जोर सतु-पकषके रथोंको तोद-फोद़ डालने समर्यं या । 
युदधकी आकांक्षा रखनेबाल्य मयादुर उस रथपर सवार टमा 
मानो अंञमाल चं दीपिमाय्‌ मेर पर्वतपर्‌ आरूढ हय दे॥ 
तारस्तु कोद्राविस्तारमायस्तं चायसष्वरजम्‌ ॥ ८ ॥ 


होटोत्करसखमाकीर्ण नीलाञ्जनचयोपमम्‌ । 
फाररोदाष्टचस्णं रोदेषायुगकरूयरम्‌ ! 


तिमिराङ्मरकिरणं गर्जन्तमिव तोयदम्‌ ॥ ९ ॥ 
खोहजाठेन महता सगवाक्षेण दंक्षितम्‌ 1 


१६० 


भ्रीमहाभार्ते सिरभगे 


[ दरिवंशे 


आयसैः पस्विः कीर्ण श्षेपण्मियेस्तथादमभिः ॥ १० ॥ 
भ्रासैः पादौ विततैरवसकतैश्च भुद्ररैः। 
श्योभितं आसनीयेश्च तोमरैः सपरण्वधैः ॥ ११॥ 
उद्यन्तं द्विपतां देतो्दिवीयमिव मन्दरम्‌ । 
युक्तं खरसदस्रेण सोऽध्यारोदद्वथोचमम्‌ ॥ १२ ॥ 
तारनामक् दत्य लोहके बने हुए उत्तम र्थपर आरूढ हुआ, 
जिका विस्तार एक कोसक्रा था; उसे ऊपर कौपएफे चिते 
सुशोभित ध्वजा फटा रही यौ । उसके भीतर शिलाखण्डोक 
समूह भरे हुए ये। वद नीखी कञररादिके समान प्रतीत 
होता था] उम कलि ठोदेके आठ पिये लगे ये । उसके 
ईषादण्ड ( हरसे या वम ), ज्ुभा ओर वरूवर भी छेके दी 
वने हुए थे! उसकी कान्ति काले कोयलेके समान काटी थीः 
वह अपनी घरथरादय्से गरजत्ता हुआ मेष-सा जान पड़ता 
था] उसके ऊपर लोहेकी ब्रहुत वदी जाली ख्गी हुई थी 
जिखमे च्रोखे जोभा पति ये । वद रथ केके परिधं तथा 
फौकने योग्य पस्थररोकरे गोरसि भरा था । बहूत-से मादे विस्तृत 
पाहा, बृहुसंख्यक ख्यकते हुए मुद्रः उशवने तोमर ओर फरपे 
उसकी शोभा बदाते थे । वह शतु व्यि दूसरे मन्दराचल- 
की ति उदित हुमा याः उख श्रेष्ठ रथम एक हजार गघे 
छते हुए ये ॥ ८-१२॥ 
विरोचनस्तु संक्रुद्धो गद्‌पपाणिरवस्थितः। 
प्रसुखे तस्य सैन्यस्य दीनधङ्ग इवाचलः ॥ १३ ॥ 
क्रोधे भरा हुआ विरोचन नामक दैत्य हाथमे गदा 
स्यि उस सेनारे मुद्रानिएर खड हो गया । वड देखनेर्मे एेसा 
जान पडता थाः मानो कान्तिमान्‌ दिखस्ते युक्त कोद पर्व॑त 
खड़ा दो ॥ १३ ॥ 
युक्तं दयसदस्रेण हयग्रीवस्तु दानवः। 
स्यन्दनं वादयामास सपत्नानीकमददर॑नः ॥ १४ ॥ 
दानव दवप्रीव यतुर्ओकी सेनाको कुचर डालनेर्मे समर्थं 
था | उखने एक दनार धोस जते हुए सथक्रो अपना वादन 
नाया ॥ १४॥ 
व्यायतं वहुसादस्रं धनुरविंस्फारयन्‌ महत्‌ । 
वराहः प्रमुखे तस्थौ सावरोह इवाचलः ॥ १५ ॥ 
वराह नामक दानव कटु हजार द्य द्रा विशाल 
धनुष टंकारता हुमा दैत्य-सेनाफ़े अग्रमागमे खड़ा दो गयाः 
उस समय वह बयो ( जयारओं ) से युक्त व्ररगदके समान 
प्रतीत होता या 1 १५॥ 
खरस्तु विक्षरन्‌ दपौन्नेनाभ्यां योषं जलम्‌ । 
ˆ स्फुरदन्तौवदनः संरमं सोऽभ्यकराह्कुत ॥ १६॥ 
-खर नामक दैत्य अयने नै सेषरजनित ओषु वहात 
हुमा मदे दर्पे साथ आया ओर युद्धकी इच्छसे टट गयाः 


उस्र समय उसके दत, ओट ओर मुख क्रोधतते फक 
रदेये॥ १६॥ 


त्वा त्वष्टाद्द्यदयं यानमास्थाय दानवः । 
व्यूहितो दानवैन्यूेः परिचक्राम वीर्यवान्‌ ॥ १७ ॥ 

त्वष्टा नामक बटशाटी दानवे अरारद धोढति चते हुए 
रथपर सवार होकर आया ओर वयूहमे खदे' हुएट दानव 
साथ स्वयं भीन्यूहृका एक अद्ध वनक्रर सव्र ओर घूमने खगा ॥ 
विप्रचित्तिखुतः दवेतः रवेतकुण्डलभूष्रणः। 
द्वेतदौलग्रतीकादो युद्धायाभिमुखः स्थितः ॥ १८ ॥ 

विग्रचित्तिका पुत्र श्वेत सफेद कुण्डनेसे विभूपितदहो 
युद्धके स्थि सामने आक्रर उट गया, वद्‌ ध्वेत-पर्वेतके समान 
दिखायी देता था ॥ १८ ॥ 


अरिो वचिपुच्रस्तु बरि्टोऽद्िदिलायुधैः। 
युद्धायातिष्ठदायस्तो धरधर द्वापरः ॥ १९ ॥ 

चलिकरा ज्येष्ठ पुत्र अरि पर्वतीय निटाख्डोको यआयुधके 
रूपमे धारण किये शनु्ओका सामना कनके व्यि खद हुभाः 
उसने युद्धकी क्र्म विद्येष परिथ्रम क्रिया था । बद्‌ दुसरे 
पवंतके समान प्रतीत द्येता था ॥ १९ ॥ 


किदोरस्त्वतिसंदर्पात्‌ भिदोर इव चोदितः! 
अभवद्‌ वैत्यसैन्यस्य मध्ये रविसिविोद्रितः ॥ २० ॥ 
किशोर नामक दैत्य चाद्रुकसे दकि गये वेके समान 
ब्रह हं ओर उत्वाहके साय आकर दत्यतेनके मध्यभागे 
खडा दो गया । वह नवोदित सूर्ये समान सोभा पारदा थ॥ 
ऊम्वस्तु ठस्वमेधाभः प्रङम्वाम्बरभूषणः। 
दैत्यभ्यूदगते भाति सनीदार शवांशचुमान्‌ ॥ २९ ॥ 
ठम्ब नामक दानव बररसनेके च््यि छे हुए मेर्ेकरी 
काटी घटकरि समान काल्य दिखावी देता था; उसके व्र 
ओर आमूप्रण वदे -वडे थे । दैत्य-तेनाे व्यूहे खड़ा होकर 
वह कदय ठंके हुए सूर्यके समान सुशेमित दता था ॥ . 
स्वभीयुर्वक्रयोधी तु ददानौष्टेक्षणायुधः। 
हसंस्तिष्ठति दैत्यानां प्रसुखे स॒ महाग्रहः ॥ २२ ॥ 
वक्र रीतिठि युद्ध करनेवाला राह नामक्र महान्‌ 
मह खता हभ आकर दैतय-तेनाफे मुनेर इट गया । 
वह अपने दति, नेतरं ओर ओढोसे भी आयुधक्रा काम 
ठेता था] २२॥ 
अन्ये हयगता भगिति नागस्कन्धगताः परे । 
सिह्याघ्गताश्चाग्ये वरादरध्वरताः परे ॥ २३॥ 
कछ दानव धोड़ौपर सवार दिखायी देते ये ओर कु 
गजरर्जोकी पीठपर । दूसरे बहुत-ते दैव्य पिह, उराघ्र, सूअर 
खर रीरखोपर चदे हृष्ट ये ॥ २३ ॥ 


-हरिवशपवं ] 


केचित्‌ खरोष्टयातारः केचित्‌ तोयदवाहनाः । 
नानापश्चिगताश्चान्ये केचित्‌ पवनवाहनाः ॥ २४ ॥ 
कोई र्पो ओर ऊँर्योपर चद्कर जा रहेथे, तो को 
वादको ही अमना वाहन व्रनयि हुए ये ! दूसरे दैत्य नाना 
प्रकारे पक्ियोपर व्रैठे ये ओर कितने ही दानव वायुकर 
सहारे टी उड्‌ रहे थे | २४ ॥ 
पत्तयश्चापेरे दैत्या भीषणा विशृताननाः। 
एकपाद्‌ द्विपादाश्च नदन्तो युद्धकाङ््चिणः ॥ २५॥ 
दूसरे विक्रा मुखवाडे भीष्रण दैत्य पेदल ही चर रहे 
थे | विन्दे एक पैरथेतो किर्हीके दौ पैरःवे समी युद्धकी 
अमिखषासे गरज रहे ये ॥ २५॥ 
परष्वेडमाना वहवः स्फोटयन्तश्च ते भुजान्‌ । 
टप्तशादृलनिघो्र ने दुदीनवपुङ्गवाः ॥ २६॥ 
वहुत-से दानवराज उछर्ते-कूदते ओर ताल ठोकते हु 
वलोन्मत्त पिहोके समान ददाड रहे थे ॥ २६॥ 
ते गदापरिपैरुग्रेधैचुन्यीयामरालिनः। 
बाहुभिः प्रिधाकरेस्तर्जयन्ति स देवताः ॥ २७॥ 
धनुर खीचनेके परिभ्रमसे सुशोभित दोनेवे वे दैव्य 
अपनी गदाओंः भयंकर परिषो तथा परिघ जैसी मोरी एवं 
बचिष् भुजाओंद्वारा देवतार्ओकों ट चता रहे थे ॥ २७॥ 


परासः पारोश्च शङ्खैश्च तोमराङ्कशपद्धिदोः। 


चतुख्चत्वारिदेऽच्यायः 


१६१ 


चिक्रीडस्ते शातश्नीभिः शतधारेश्च मुदररेः ॥ २८ ॥ 
वे भाले, पर्णो, शङ्खो, तोमर्यो, अंकुशोः पर्योग 
शतव्नियौ ओर सौ धारवलि मुद्ररोते खेर रहे थे ॥ २८ ॥ 
गण्डदोकैश्च दोडैश्च परिधिश्चोत्तमायुधेः। 
चक्रैश्च दत्यप्रवणश्चक्रु रानन्दितं वलम्‌ ॥ २९. ॥ 
वे श्रेष्ठ दैत्यवीर पहाड़से द्रूटकर गिरी हुई बड़ी बड़ी 
चदान; रोल-हिखर्यो, परिषोः चक्री तथा अन्य उत्तमोत्तम 
आयुधौ अपनी सेनाको आनन्दित कर रहे थे ॥ २९ ॥ 
पवं तद्‌ दानवं सैन्यं सर्व युद्धवरोत्कटम्‌ । 
देवताभिमुखं तस्थौ मेधानीकमिवोत्थितम्‌ ॥ ३० ¶ 
इस प्रकार युद्धे च्थि बलाभिमानसे उन्मत्त हुई वद्‌ 
दानवोकी सम्पूणं सेना मेर्घोकी धिरी हुई घटके समान 
देवताओके सम्मुख उटकर खड़ी थी ॥ ३० ॥ 
तद्धृतं दैत्यसदस्रगादं 
वाय्वथितोयाम्बुदहोरकंदपम्‌ । 
चलं रणोघाभ्युदयावकीर्णं 
युयुत्सयोन्मत्तमिवावभासे ॥ ३९॥ 
वह अदभुत देस्य-सेना सहसो दैत्यवीरोखे ठसाठस भरी यी | 
वायु अग्नि, जर, मेष एवं पवंतमालओंके समान दिखायी 
देती थी । युदक प्रवाहको बदृनिके लि पव ओर पैली हुई 
थी ओर र्डनेकी इच्छापि उन्मत्त हुई-सी प्रतीत होती थी ॥ 


इति श्रीमहाभारते खिरुभागे हरिवंशे हरिदशवंणि चतिचत्व रिंशोऽध्यायः ॥ ४३ ॥ 
इ प्रर श्रीमहाभारतके दिरभाग इसिंशके अन्तरत इिंशपरवमे तेतारीसरवे{अध्याय पूर! भा ॥ ४३ ॥ 
~+: - 
चतुश्रत्वारियोऽध्यायः 
आश्वयेतारकामय संग्राममे देवसेनाकी युद्धके हिये तैयारी 


वैश्नस्पायन उवाद 

श्रुतस्ते दैत्यसेन्यस्य विस्तर स्तात वित्रे । 
खुराणां सवैसैन्यस्य विस्तरं वैष्णवं श्ण ॥ १ ॥ 

[1 

वेशभ्पायनजी कहते है--तात ! उस युद्धके समय 
दतय-तेनाकाः जो विस्तार था, वह तुमने सुन ल्या | अव 
देवताओंकी सम्पूर्ण सेनाका विस्तार, जो भगवान्‌ विष्णुके 
आधित हैः सुनो ॥ १॥ 
आदित्या बरसवो रुद्रा अश्विनौ च महावले । 
सवसा: सलुगाश्चेव संनह्यन्त यथावरम्‌ ॥ २ ॥ 

आदित्यः वसु, सद्र ओर महाव्रटी अधिनीकमार-- 
ये अपने दल ओर अनुयायियोकरो साथ छे यथाखा्नः 
युद्ध करनेके ल्व क्वच आद्भते सुसजित हो पथे 7 २१ 


मण ह° €&~ 


पुरुहतस्तु पुर्तो रोकपालः सहसखटकः । 

ग्रामणीः सवेदेवानामारुयोष् सुरद्विषम्‌ ॥ ३ ॥ 
सत्रेसे पठे समस्त देवताओं नेता सहख नेत्रधारी इन्द्र 

देवताओके हाथी एेरावतपर आरूढ हुए ॥ ३ ॥ 

सन्ये चास्य रथः पाच्च पक्षिप्रवरवेगवान्‌ । 

सुचारुचक्रचरणो देमवञज्जपरिष्टरतः ॥ ४ ॥ 
उनकी बायीं ओर वहत ही सुन्दर चक्ररूपी चरणोसे 

गरुड्के समान वेगपूर्व॑क चलनेवाखा सुवर्णं ओर हीरोसे जड़ा 

हुआ उनक्रा रथ चल रहा था | ४॥ 

देवगन्घर्वयक्षौेर यातः सहसाः । 

दीप्तिमद्धिः सदस्यैश्च व्रह्मपिभिरमिष्टतः ॥ ५ ५ 
उनके पीछे देवता; गन्धर्वं ओर यक्षोको भण्ेखियों चख 


१६२ 


श्रीमहाभारते खिलभागे 


[ हरिवंश 


रषी थीं तथा यज्ञम सहायता करनेवले सदसो दीतिमान्‌ ब्रह्मपरं 
स्तति करते हुए चल रदे थे ॥ ५॥ 
वजविस्पूर्ितोदधतेविंदुदिन्द्रायुधाग्वितैः । 
शु्तो वलाहकगणेः कामरैसिव पर्वतेः॥ ६॥ 

वन्न ( गाज ) की गड़गड्ादटसे फते हए तथा व्रिजली 
एवं इन्द्रधनुषपे युक्त मेघसमूह देवराजके साथ चल र्ट ये । 
वे एषे लगते थे मानो इच्छानुसार चटनेवले पर्वत ट| 
षन्द्रका वह रथ उन मेर्घोद्वारा सुरक्षित था ॥ ६॥ 


समारूढः स भगवान्‌ पर्येति मघवा गजम्‌ । 
हविधौनेषु गायन्ति विप्राः सोमम स्थिताः ॥ ७ ॥ 
सगे दाक्राजुयानेषु देवतुर्यनिनादिषु । 
श्रं समुपद्त्यन्ति शतशो शछष्सरोगणाः ॥ ८ ॥ 
सोमयागे भाग ठेनेवलि ब्राह्मण हविष्य रखनेके यानो 
मे हविष्य रखते समय जिनकी स्तुति करते हैः सवगम जिनकी 
सवाररिरयोके अवसरपर देवतार्ओकी तुरदियो बजती ह ओर जिनके 
साय अप्सराओकी सेको मण्डलयो नाचती हुई चलती £ 
वे टी भगवान्‌ इन्द्र हाथीपर सवार होकर चछ रदे थे ॥७-८॥ 
केतुना घंाजातिन राजमानो यथा रविः। 
युक्तो हरिसदखेण मनोमारुतरंदसा ॥ ९ ॥ 
रोको ्वजासे बुद्योमित तथा मन ओर वायुकरे समान 
वेगवले हजार घोेसि खीचा जानेवाला इन्द्रका रथ सूर्यकी 
तरह दमक रहा था॥ ९॥ 
स स्यन्धृनवये भाति युक्तो मातलिना तदा । 
छृत्खः परिदतो मेसुभौरस्करस्येव तेजसा ॥ १०॥ 
€ इन्द्रे सारथि ) मातलि युक्त वह रथ सूर्य तेजसे 
धिरा हुआ सम्पूणं मेर्पर्व॑त-सा दीखता था ॥ १०॥ 
यमस्तु दण्डमुद्यम्य कालयुक्तं च मुद्धरम्‌ । 
तस्थौ स्ुरगणानीके दैत्यान्‌ नादेन भीषयन्‌ ॥ ११॥ 
यमराज गर्युदेवताक्रे द्वारा अपिष्ठित दण्ड तथा मुद्र 
को धारण कर अपने सिंहनादसे दैत्योको भयभीत करते हु 
देवतार्मोकी सेनाके मुहानेपर उट गये ॥ १९ ॥ 
चतुभिः सागरे टेकिदानेश्च पन्नगः । 
शद्धमुक्ताङ्गदधरो विभ्रत्तोेयमयं वपुः ॥ १२॥ 
काटपाशं समाविध्य दयैः रारिकरोपमेः। 
वाय्ीरितजलोद्रारेः छर्वह्टीलाः सदखदाः ॥ ९३ ॥ 
पाण्डुयोद्ध तवसनः प्रचाटरुचिराधरः । 
मणिद्यामोत्तमवपुहौरभारा्पितोदरः 1 १४ ॥ 
वरुणः पादाथन्मध्ये देवानीकस्य तस्थिवान्‌ । 
युद्धवेखामभिकुपन्‌ भिन्ने ईइवाणेवः ॥ १५॥ 
युद्धका अवसर चाहते हुए पाद्यधारी वरुण किनारेको 


तोड़कर अगे बद्नेवटे समुद्रकी मोति रेवतार्थोकी सेनाके 
चीच्मे आक्र उट गये । वे वर्यो समुर्यो ओर जीम ल्यल्पति 
हुए सपेखि सुरक्चित थे । उन्दने शद्ध ओर मोतिरयोे बाजु. 
चन्द धारण कर रखे ये । उनफरा शरीर जख्मय था । वे काल- 
पाशक्रो धुमाते हुए चन्द्रमाकीं करिरणेकि समान देत रंगके 
घोसि ओर वायुकर द्वाया उदछटे जानेवलि जले उदुगारोसि 
सदर्लौ प्रकारक करडा कर रषे ये | उनका दवेत वन्न फदरा 
रषा था । उनके सुन्दर ओठ मूग एवं नूतन पल्लवे समान 
सल-खा ये| मणिमय आभूष्ेति विभूपित दु उनके द्याम 
अद्घोकी वदी उत्तमशोभाद्टोर्ी थी तथा द्यर्रोका भार 
उनके उद्रपर पड़ रहा था । १२-१५ ॥ 
यक्षरक्षससैन्येन गुह्यकानां गणैरपि । 
मणिदयामोत्तमवपुः कुवेरो नस्वादनः ॥ १६॥ 
युक्तश्च शङ्कुपद्याभ्यां निधीनामधिपः प्रभुः । 
राजराजेश्वरः ध्ीमाच्‌ गदापाणिरदृद्यत ॥ १७ ॥ 
नवो निधि्योकि स्वामी, महान्‌ राक्तिगाटीः राजरनिश्वर 
श्रीमान्‌ कुवेरः जिनक्रा उत्तम दासीर नील्मणिके समान ग्याम 
कान्तिते सुशोमित या ओर जो मनुप्यकि द्वारा ढोयौ जनेवाटी 
पालके सवार होते है मूर्तिमान्‌ उद्भ ओर पद्म नामकी 
निपिर्योको साय लेकर हाथमे गदा धारण क्रिये दिखायी दविये। 
उनके साय य्न ओर राक्षसौकी सेना तथा गुष्य्के गण 
विद्यमान ये ॥ १६-१७ |] 
विमानयोघी धनदो विमाने पुष्पके स्थितः। 
स राजराजः शद्युभे युद्धार्थी नरवाहनः । 
म्क््यमाणः शिवसखः साक्षादिव हिवः स्वयम्‌ ॥ १८ ॥ 
विमाने त्रैठकर युद्ध करनेवाले, शिवजीके मित्र, 
राजाधिराज नरवाहने कुवेर युद्धके च्वि पुष्पक विमाने 
खित हो बद्धी दोभा पारहे ये । उस समय वे साक्षात्‌ भगवान्‌ 
शिवके समान रषटिगोचर दते ये ॥ १८॥ 
पृ पक्षं सस््ाक्षः पितराजस्तु दक्षिणम्‌ । 
वरुणः पथ्िमं पक्चसुत्तरं नरवाहनः ॥ १९॥ 
चतुषु युक्त श्चत्वारो छोकपालां वल्ोत्तराः । 
स्वासु दिक्ष्वभ्यरक्तन्‌ वै तस्य देववलस्य ह ॥ २०॥ 
उस देवसेनाके पू्वपक्षकी देखभाल सदखटोचन देवराज 
इन्द्र क्र रदे ये । दक्षिण-पक्षकी देखभाल्का भार परितूराज 
यमने सम्हाला । पश्चिम-थक्षकी देख-रेख वरुणदेवने की ओर 
उत्तर-पक्षका निरीक्षण नसवाहन छुतरेसे किया । इस प्रकार 
चारों दिद्ाओंमि सावधानके साथ खड़े हुए चारो उत्कट 
चर्शाखी ठोकपार अपनी-अपनी दिराक्ी ओरसे उस सेनाकी 
रक्षा कर रहे थे ॥ १९-२० ॥ 
सूयः सप्ताश्वयुक्तेन र्थेनाम्बरगामिना । 
भिया जाज्वल्यमानेन दुप्यमानेश्च रस्मिभिः ॥ २१॥ 


खतुश्चत्वारिशोऽन्यायः 


१६३ 


------------------------ ~ -----ज-ज-------- 


हरिषंदापर्षं 1 
उदयास्तमयं चक्रे मेरुपर्यन्तगामिना । 
त्रिविबद्वास्चक्रेण वपता रोकमन्ययम्‌ ॥ २२॥ 


सूर्यदेव खत षोडंसि युक्त आकाशगामी र्थके दवार 
युद्धभूमिमे अयि ये । उनका वद रथं उत्तम योभातया 
दी्तिमान्‌ किरणेसि जगमगा रहा था । बह मेर पर्वतकरे चारों 
ओर चक्कर टगानेवाखाः स्वर्गके दवार्पर चक्रकी मेति धूमने- 
वाल ओर जे प्रवादरूपसे अक्षय वने रहते दैः उन समस्त 
लोकोको प्रकाशित करनेवाला था। उसी द्वारा सूर्यदेव संसार- 
म उदय ओर अस्तकी क्षौरी करते द ॥ २१-२२॥ 


सहख्रपिमियुकेन भ्राजमानः खतेजसा । 
चचार मध्ये देवानां द्वादशात्मा दिनेश्वरः ॥ २२ ॥ 

सदर्चो किरणेषि सम्पन्न अपने ही तेजते प्रकाशित दोने- 
वले, द्राददा रूपधारी भगवान्‌ दिनेश ८ सूयं ) पूर्वोक्त रयकरे 
द्वारा आकर देव-सेनाके ब्रीचमे विचरे खो ॥ २३ ॥ 


सोमः दवेतहयेभीति स्यन्दने शीतरिमिवान्‌ । 
हिमतोयप्रपूणोभिभौभिराहादयश्जगत्‌ ॥ २४॥ 
शीतल किरर्गोवलि चन्द्रमा &वेत धोर्दोसि युक्त रथम 
बैठे हुए बड़ी सोमा पारहैये। वे दिम ओर जल्से मयी 
हई अपनी प्रभाओद्रार सम्पण जगत्को आहाद प्रदान 
करतेये ] २४॥ 
तस्क्षयोगालुगतं रििरंद्यं दिजेश्वरम्‌ । 
जगच्छायाङ्किततयु' नैदास्य तमसः क्षयम्‌ ॥ २५॥ 
ज्योतिषामीश्वर व्योल्नि रसानां रसनं भरमुम्‌ । 
ओषधीनां परित्राणं निघानमसरुतस्य च ॥ २६॥ 
जगतः प्रथमं भागं सौम्यं दितमयं रसम्‌ । 
दशुदीनवाः सोमं हिमप्रहरणस्थितम्‌ ॥ २७ ॥ 
न्त्र ओर योग जिनका अनुखरण करते दै, जो शीतक 
किरणेव सुशोभित दै, बाह्रणोकि राजा है जिनका शरीर 
नीले धन्वेके रूपमे प्रथ्वीकी छाया अङ्कित रहता $, जो 
रात्रिके अन्धकारक नाश करनेवले टैः आकाशम लित 
व्योतिमयी तारिकराओके अधीश्वर है रसोके आश्रय एवं 
भभु ई ओषधिर्योके रष्क तथा अमृतकी निपि ई, ( भग्नी- 
घोमात्मक् ) जगत्‌के प्रथम ८ मुख्यं ) माग दै ओर सौम्य 
तथा शीतल रख ई, उन्दी चन्द्रमाको दैत्येनि दिमका आयुध 
अर्ण करके खड़ा हु देखा ॥ २५२७ ॥ 
यः प्राणः सर्वभूतानां पञधा भिदे चथु । 
सप्तस्कन्धगतो ङोकां सखीन्‌ दधार चराचरान्‌ ॥ २८॥ 
यमाहुरमनर्यन्तारं स्॑प्रभवमीष्वरम्‌ । 
सप्खरगता यस्य॒ योनिर्गीतिरदीयेते ॥ २९ ॥ 
य बदन्त्युखमं भूतं यं वदृन्त्यद्यसीरिणम्‌। 
यमाहुराकाहागमं श्ीघ्रयं शष्दयोनिजम्‌ ॥ २०॥ 


स वायुः सर्वभूतायुख्ध तः ` स्वेन तेजसा । 
ववौ प्रन्यथयन्‌ दैत्यान्‌ प्रतिलोमः सतेयद्‌ः ॥ ३१॥ 
जो समस्त भूतेकरि प्राण है मनुष्य आदिं जीवोके भीतर 
माणः अपानः व्यानः समान ओर उदान--इन पोच सपो 
विमक्त लेकर निवास करते ई, आवहः प्रवह आदि सति 
सखन्धमिं दित दो त्रिलोकीके चराचर जीवको धारण कसते 
ह, जिन्हे अग्निक्रा सारथि कदा जाता है, जो सत्रके उत्पत्ति. 
खान ओर ईश्वर ई जिनक्रे करणभूत आकाशकी शब्द्‌ 
तन्मात्रा निषाद ऋ्रुप्रम आदि स्वरम उतर अआनेपर गीति 
कटलाती है; जिन पोच महामतिं उत्तम तथा शरीररहित 
ब्रते है, जिनको आकाद्यचारी ओर शीघगामी भी कते द 
तथा शब्दयोनि ( आकरादय ) से जिनक्री उत्पत्ति वतायी गयी 
हेः वे समस्त प्राणियेकरि जीवनरूप बयुदेव अपने तेजवे दर्यौ- 
को व्ययित करते हुए. वरहो मेधो साय प्रतिकूक एलं प्रचण्ड 
गतिसे प्रवाहित होने खगे ॥ २८-६१ ॥ 
मरुतो देवगन्धत्री विाघरगणैः सह । 
चिक्रीडुरस्िभिः शरुरनिसकतैरिव पक्नगैः ॥ ३२॥ 
उनचास मखतः देवता ओर गन्धर्व, विद्याधरगणेकि साय 
आकर कुरुसे निकले हुए सपो समानः म्यानसे बाहर 
निकाटी हुई चमचमाती त्वरसे खेलने खगे ॥ ३२॥ 
खजन्तः सर्पपतयस्तीवरं रोप्रमयं विषम्‌ । 
शरभूताः सुरेन्द्राणां चेसुव्यौच्सुखा दिवि ॥ ३३॥ 
देवेश्व्ौके वाण वने हु ब्रहुसंल्यक नागसंन अपने 
मुखको फैटाकर तीव्र रोष्रमय विष उगल्ते हूए आकारे 
घूमने त्तमो ॥ ३३ ॥ 


पर्वतास्तु रिलाग्धङ्गैः शतश्चासैश्च पादपैः 
उपतस्थुः खुरगणान्‌ प्रदतं दानवं वलम्‌ ॥ ३४ ॥ 

परवरतोक अधिष्ठाता देवता भी बहुत-सी चदान, शिखरो 
तया सी-सौ डलि्योवले वृर्भोद्वारा दानवदल्पर प्रहार करनेके 
य््ि देवगर्णोक्री सेवे उपयित ये | ३४॥ 


यः स देवो हपीकेहः पद्मनाभसिविक्रमः। 
₹ष्णवत्मौ युगान्ताभो विश्वस्य जगतः प्रयुः ॥ ३५ ॥ 
सखसुद्रयोनिर्मघुदा हव्यभुक्कतुसत्छतः। 
भूरपोन्योमभूतात्मा समः शान्तिकसोऽरिहा ॥ ३६॥ 


जगद्योनिर्जगद्रीजो जगहरुरुदारधीः। 
सोऽक॑मद्निमिवेोयन्तसुम्योचमतेजसम्‌ ॥ २७ ॥ 
अरिघ्रममरानीके चक्रं चक्रगदाघधरः। 
सपरीवेपसु्न्तं सघितुर्मण्डरं यथा ॥ ३८॥ 


जो दपीकेशङ़े नामे प्रसिद्ध ई समके आराष्यदेव + 
खषटिके आरम्मर्भ जिनकी नामिसे कमल प्रकट हुजा था, जो 
अपने तीन ढगेि सम्पण निटोकीको नाप चुके £ प्रख्यकाल- 


१६४ 


श्रीमहाभारते सिकः 


[ हरिवंशे 


म प्रकरादित होनेवाठे अग्मिदेवफ समान जिनका सहज तेज हेः 
जो सम्पण जगत्‌ खामी है, नारायगणररूयसे समुद्रमे शयन 
करते ह, दषय्ि समुद्र जिनकी रयनखटी है जिन्दोने मधु 
नामक दैत्यका नाद्रा किया है, ज हविष्यफर भोक्ता ओर यज्ञो 
म पूनित एवं सम्मानित दोनेवहै,ए्वीः जल, आकारा तथा 
अन्यान्य भूत जिन विराटृरूपधारी प्रसुके अङ्ग दैः जो सर्वत्र 
समभावसे रहते ओर समता रखते है, जो गान्तिकरा विस्तार 
करनेवाले ओर शन्रुनादाक है, जगत्‌की योनि ( उत्पत्तिखान); 
जगते बीज ८ आदि कारण ) तथा जगत्‌के गुस दै, जिनकी 
बुद्धिम सदा उदारता भरी रहती है, वे चक्र ओर गदा धारण 
करनेवलि भगवान्‌ विष्णु अग्नि तथा उगते हए सूर्य समान 
उत्तम तेजसे सम्पन्न शरुनाराक चक्र उखये हुए देवसेनाफे 
मध्यभागमे विराजमान थे । उन्हे देखकर एसा क्गता था 
मानो वे परिधिसदित उगते दए. सूर्यमण्डल्को ही पकड़कर 
ठे अयि हों ॥ ३५३८ ॥ 


सम्येनारम्न्य महती सर्वासुरविनारिनीम्‌ । 
करेण काटी वयुषा शछरकालप्रदां गदाम्‌ ॥ २९॥ 
दोषैः प्रदीप्तानि सुजगारिष्वजः प्रसुः । 
दधारायुघजाखानि राद्धौदानि महायशाः ॥ ४० ॥ 
सकि शरु गरुड़ जिनक्रे ध्वज दै, उन महायरास्वी 
भगवान्‌ श्रीहरिने अपने वाये हाथमे समस्त असुरोका विनाग 
करनेवाली तथा शत्रुमोको कालके गाख्मे भेजनेवाखी कले 
रंग्की विशार गदा ठे रखी थी ओर शेष धुजाओमे वे अत्यन्त 
दीषिमान्‌ शाङ्ग आदि आयुध धारण क्रि दए ये ॥ ३९-४०॥ 


स कद्यपस्यात्मथवं द्विजं अुजगभोजनम्‌ । 
पवनाधिकसखम्पातं गगनक्षोभणं खगम्‌ । 
भुजगेन्द्रेण वदने निपिष्डेन विराजितम्‌ ॥ ७९॥ 
अग्धतारम्भनियुं्तं मन्दरद्धिमिवोच्दूतम्‌ । 
देवासुरविमर्देषु शतक्षे दष्विक्रमम्‌ ॥ ४२ ॥ 
महेन्दरेणाखतस्या्थं वज्रेण रृतलक्षणम्‌ । 
्िखिनं चूडिनं चैव॒ तक्तङुण्डलभूषणम्‌ । 
विचिश्पक्मवसनं  घातुमन्तमिवाचलम्‌ ॥ ४२ ॥ 
स्फोतक्नोडावदस्बेन शीतांशुसमतेजसा । 
भोभिभोगावसक्तेन मणिरत्नेन भाखता ॥ ४४ ॥ 
पश्चभ्यां चारुचिजाभ्यामावृत्य दिवि रीलया । 
युगान्ते सेन्द्रचापाभ्यां तोयदाभ्यामिवाम्बरम्‌ ॥४५॥ 
नीरुखोहितपीताभिः पताकभिरलंछृतम्‌ । 
केतुषेषप्रतिच्छग्नं महाकायनिकेतनम्‌ ॥ ४६ ॥ 
अरुणावरजं श्रीमनारुद्य समरे हरिः । 
चणं स्वेन चवुपा सुपर्ण खेचरोत्तमम्‌ ॥ ४७ ॥ 
सवके पाप ओर दुःखका अपहरणं करनेवाठे श्रीमान्‌ 
मगवान्‌ नारायण सर्पोका भक्षण करनेवाले, कदयपकुमार एवं 


अरुण छोटे भाई पक्षिशरेष्ठ गरुडपर सवार होकर वहं अये 
थे | गर्ड़जीके पंख बड़े सुन्दर ये तथ। वे अपने सुन्दर 
ारीरसे सुवर्णे समान मनोरम क्रान्ति फैखा रहे ये । आकाश- 
मे विचरनेवारे पक्षिगप्रवर गरुड़ वायुकी अपेक्षा भी अधिक 
वेगसे उडते थे; उनके वेगतूर्वके चलट्ते समय आकाशम 
खल्रटी सच ' जाती थी | वे अपने मुखमे एक नागराजको 
द्वये हए येः इसते उनकी वड़ी सोभा दोरहीथी। 
अमृत मिकाल्नेके व्यि प्रारम्भमे दी क्षीरसागरमे छोड गये 
मन्दराचर्के समान वे ऊँचे दिखायी देते थे। देवासुर 


संग्रामके अवसरौपर सैको वार उनका पराक्रम देखा जा 


चुका था। जव वे स्वर्गमे अग्रत लेने गये थे; उस समय 
इन्द्रनै उस अमृतकी रक्षाके लिये उनपर व्रते प्रहार 
क्रिया था] जिसकी चोटका चह उस समय मी दख 
रहा थाः उनके सिरर मोरकी-सी कर्टेगी ओर चोरी थी 
तथा वे तपे हुए सुवर्ण कुण्डलोसे विभूषित ये । रंग-विरंगे 
पंख ही उन्न वस््रूप्रमे धारण कर रखे थे; जिनके 
कारणं वे विविध धातु्ओंसि मण्डित पत्र॑तक्रे समान प्रतीत 
होते थे । उनक्रा बक्षःखल चौड़ा थाः उसपर ८ मुखम आधे 
निगल हुए ) सर्पफे मस्तकरमे चिपक हुई शरेष्ठमणि ठ्ट- 
कती थीः जो अपने तेजसे शीतल किरणवाठे चनद्रमाकी 
भोति उदूभारित हो रही थी । वे अपने मनोहर एवं विचित्र 
पंखोसे टीखापूर्बक आकाशकरो परेरकर इस तरह खड़े थेः 
मानो प्रल्यका््मै इन्द्रधनुषसे युक्तं हुए दो मेघखण्डौसे 
आकार धिर गया हौ । श्रीहरिकी ध्वजमे चिहके स्पे 
चि हए पक्षिराज गख्ड नीखी, परी ओर द्रु रंगकी 
परताकाओंसे अलंकृत ये | उनका आधारभूत ध्वजदण्ड 
बहुत विद्याल था ॥ ४१-४७ ॥} 
तमन्वयुरदेवगणा = सुनयश्च तपोधनाः । 
गीर्भिः परममन्जाभिस्तुष्टुवुश्च गदाधरम्‌ ॥ ४८॥ 
उस समय समस्त देवता ओर तपोधन मुनि भगवान्‌ 
गदाधर पीके-पीके चलने ओर श्रेष्ठ मन्नमयी स्त॒तियो- 
दारा उनका सवन करने लगे ॥ ४८ ॥ 
तद्चैश्रवणसंन्छिष्टं वैवखतपुरस्सरम्‌ । 
बारिरिजपरिक्िक्तं देवरजचिसाजितम्‌ ॥ ४९ ॥ 
चशद्रधभाभिविमटं युद्धाय समुपस्थितम्‌ । 
पवनाव निर्घोषं सम्प्रदीप्तहताद्नम्‌ ॥ ५० ॥ 
देवताओंकी वह सेना कुवेरफे द्वारा घुसह्रित की 
गयी थी | यमराज उसके अगे-गगे चल्नैवाले सेनानायक 
थे } जल्करे श्वासी वर्णने समुद्ररूपसे उसको सत्र आओरसे 
धैरर्लाथा तथा देवराज इन्द्र खयं उपध्थित होकर 
उसकी शोमा बदा रहे थे ] चन्द्रमाकी प्रमा्ओसि बह सारा 
सेन्यसमूह्‌ उज्ज्वर एवं निर्मङ दिखायी देता था | बायुके 


हरिवंदापरव 1 


पेञ्चचत्वारिोऽध्यायः 


१६५ 


नवव 


वेगपूर्घक चलनेसे उस्म वड़ा गम्भीर शव्द होता था 

ओर. उस सेनामे खड़े हुए. अग्निदेव वदे वेगसे प्रज्वलित 

हो र्हेये। रेसी देवसेना वर्यं दैक साथ युद्ध करनेके 

स्यि उपसित हुईं ॥ ४९-५० ॥ 

विष्णोर्जिष्णोः सदहिष्णोश्च ्राजिष्णोस्तेजसा घृतम्‌ । 

बरं वलबदुद्धूतं युद्धाय सप्रवतंत ॥ ५१॥ 
जो नित्य विजयशीटः सर कुछ सदन करल समर्थं 


जर नित्य ॒प्रकारामान है, उन भगवान्‌ विष्णुके तेजते 
व्यान हुई देवताथकी वह बरल्वती सेना उत्साहसम्पन्न 
हा युद्धके ल्यि तैयार हो गयी ॥ ५२१ ॥ 
खस्त्यस्तु देवेभ्य इति स्तुत्वा तत्राज्िरा ऽवर्वीत्‌। 
स्वस्त्यस्तु दैव्येभ्य इति उशना वक्यमाददे ॥ ५२ ॥ 
उस समगर अद्बिरकरे पुत्र देवगुरु वृहस्पतिने स्तुति 
करके कदा--ध्देवतार्थोका कल्याण हौ ।; फिर दैत्योके गुर 
शुक्राचार्य भी बोल उटे--दै्योकरा मङ्गल दोः ॥ ५२ ॥ 


इति श्रीमहाभारते खिकरूमागे हरिवंशे हरिवंशापवंणि आश्व्यतारकामये चतुश्वत्वारिंडोऽप्यायः ।॥ ५४ ॥ 


इस प्रफार श्रीमदहाभास्तके लिसभाग हरिवंशे अस्तम ररि शुपमे आश्वर्य॑तारफामय संग्रामविषयर्‌ 
चौबालीसर्वौ अध्याय पुरा हुभा ॥ ८४ ॥ 


सन्नी -ीषकिष्की- ~ 


` प्ञचचत्वारिरोऽध्यायः 
देवासुर-संग्राम एवं ओव अग्निकी उत्पत्ति 


वश्चम्पायन उवाच 
ताभ्यां वाभ्यां संजक्षे तुमुसखे विभ्रदस्तदा । 
खुराणामसुराणां च परस्परजयैषिणाम्‌ ॥ १ ॥ 
. , वैशम्पायनजी कहते है--जनमेजय ! एक दूररेपर 
विजय पनिकी इच्छावाले देवता्थ ओर असुरोकी उन 
सेनाम उस समय घोर युद्ध आरम्भ होगया॥ १॥ 
: दानक दैवतैः सार्द्धं नानाप्रहरणोदयताः। 

समीयुयध्यमाना वै पर्व॑ताः पर्वतैरिव ॥ २॥ 

दानव-ैनिकर नाना प्रकारे हथियार उठाये देवताओं 
के साथ युद्ध करते हुए उनसे भिड गये, मानो एक 
भेणीके पर्वत दूसरी भेणीक पर्वतोसे एकरा रदे है ॥ २ ॥ 
तत्‌ सुराखुरसंयुक्तं युदधमत्यद्धतं वभौ । 
धमोधमेसमायुक्तं दपण विनयेन च॥३॥ 

देवताओ ओर असुरोक्रा दह वमल युद्ध अत्यन्त 
अद्भुत प्रतीत होता थाः मानो धर्म॑ ओर अधर्म परस्पर 
जूह्ष रहे हौः दपं ओर विनय एक दूसरे खड्‌ 
रहैदो॥३॥ 

` ततो रथैः प्रजविभिकौहनैश्च प्रचोदितैः। 

उत्पतद्धिश्च गगनं सासिदस्तैः समन्ततः ॥ ४ ॥ 
विक्षिण्यमाणेसुंसलैः सम्मरेष्यद्धिश्च सायकैः । 
चपि्विस्फार्यमाणेश्च पात्यमनिश्च मुद्रः ॥ ५ ॥ 
तद्‌ युद्धमभवद्‌ घोरं देवदानवसंकुलम्‌ । 
जगतस्मासजननं युगसंवर्तकोपमम्‌ ॥ ६ ॥ 

तदनन्तर रथोके वेगपूर्वकर दौडनेः धोरढक रठड ख्गा- 
कर भगवये जाने, चारौं ओर तलवार हाथमे च्वि योद्धा्मो- 


के आकाशमे उछरनेः मूसर्छोक पके जनेः वाके चलने, 
धनुरषोकरे खीचे जने ओर मुद्ररोके गिराये जनेते देवताओं 
ओर दानवोसे भरा हुआ वह घोर युद्ध प्रख्यकाल्की 
अग्निके समान सम्पूर्णं जगत्‌को त्रास देने खगा ॥ ४-६ ॥ 
खहस्तमुक्तैः परिघैः किष्यमाणेश्च पर्वतैः । 
दानवाः समरे जष्युदंवानिन्द्रपुरोगमान्‌ ॥ ७ ॥ 
उस समराद्गणमे समस्त दानव अपने हाथोते खड़े 
गये परिधो ओर के जाते हुए. पर्वतशिखर्रोकी चोय्से 
इन्द्र॒ आदि देवताओको घाय करने टे ॥ ७ ॥ 
ते वध्यमाना वलिभिदौनवैजितकाशिभिः। 
विषण्णमनसो देवा जग्मुरार्तिं परां सखधे॥<॥ 
युद्धस्थल्मे अपनी विजयसे उ्टसित एवं सुशोभित 
होनेवाले महावली दानवोकी मार खाक्रर समस्त देवता मन- 
ही-मन खिन्न दो उठे उन्द बड़ी पीडा हुई ॥ ८ ॥ 
तेऽखरजारेः प्रमथिताः परिेभिन्नमस्तकाः । 
भिननोरस्का दिति्ठतेवेमू रक्तं तरणे ॥ ९ ॥ 
द्येन अपने अस्रसमूहोसे देवताओोको मथ डाला; 
परिधोकी मास्से उनके मस्तक फोड़ उलि ओर वक्षःखल 
विदीर्ण कर दिथे | उस समय देवता अपने धावति बहुत रक्त 
वहा रहे ये॥ ९॥ 
स्पन्दिताः पारजाेच्च निर्य॑तनाश्च रारे: कताः । 
भरवि्ठा दानवं मायां न शेकुस्ते षिचेितुम्‌ ॥ १० ॥ 
देत्योने फन्दोके जार विछाकर देवताओंको निरुषाय 
कर दिया ओर वारणो परहारसे उन्हं इतना धराय कर्‌ दिया 
फि वे अपने अड्धषि रक्तकी धारा बहाने त्म । दान्वोकी 


१६६ 


श्रीमहाभारते खिखभागे 


[ हस्वे 


मायके वशीभूत होकर वे दिल्ने-इु्नेकी भी शक्ति 
, खौ ब्रेट ॥ १०.॥ 
संस्तम्भितमिवाभाति. - निष्प्राणसदटदाङूति । 
वलं सखुराणामसुरैर्निप्थयत्नायुधं इतम्‌ ॥ ११॥ 
असुर्न देवतार्थकी सेनाके सरे प्रयत्न ओर आयुध 
निष्फल कर दिये । उस समय वद्‌ सेना मन्त्रक्तिसे सम्मित 
की हूर्द-सी प्रतीत दोत्ी -थी, प्राण्य मूरदजैते दिवायी 
देती यी ॥ ११॥ 
मायापादगन्‌ विकपश्च भिन्दन्‌ वस्रेण ताड्डारान्‌ । 
दाक्रो दैत्यवलं घोरं चिवेश वहुरोचनः ॥ १२॥ 
तवर ब्रहुसंख्यक नेसे सुशोभित दोनेवाठे देवराज 
श्न्द्रने अपने वज्से दैत्योफे माया-पार्गोको दयति ओर उनके 
चलाय हु बार्णोको कारते हुए उनकी धोर सेनाम प्रवेशं 
करिया ॥ १२॥ 
स दैत्यान्‌ भरसुखे हत्वा तद्‌ दानववलं महत्‌ । 
तामसेनाल्रजाछेन  तमोभूतमथाकसेत्‌ ॥ १३ ॥ 
उन्न सामने खद हए दैत्योको मारकर दानर्वोकी 
उस विशार वािनीपर तामसाल्रका जाल-सा विदा दिया 
ओर उसे अन्धकारे यभिभूत कर डाल ॥ १३ ॥ 
तेऽन्योन्यं नाववुध्यन्त देवान्‌ चा दानवानपि ! 
घोरेण तमसाऽ.ऽवि्ठः पुरुहतस्य तेजसा ॥ १४॥ 
इन्द्रके प्रमावसे घोर अन्धका द्रे हए दैत्य नतो 
आप दी किसीको जान पाते ये ओरन देवताओं अथवा 
दानर्वोको ष्ट पटचान पते ये ॥ १४॥ 
मायापादोविमुक्ताश्च यत्नवन्तः खुरोत्तमाः। 
वपूपि दैत्यसंधानां तमोभूतान्यपातयन्‌ ॥ १५ ॥ 
दत्येकि मायापाकषसे मुक्त हए श्रेष्ठ देवता्येनि प्रयकशीक 
होकर उन दैत्यघमू्ौे अन्धकारमे आच्छन्न हुए 
श्वरीर्यको धर्तीपर गिरना आरम्भ किया ॥ १५ ॥ 
अपष्वस्ता धिसंक्षख तमसा नीखवयंसः। 
पेतुस्ते दानवगणादिखन्नपक्षा इवाचलाः ॥ १६॥ 
अन्धकारे नीटी कान्ति धारण करनेवाले वे दानव 
दैवतार्ओकी मार खाकर मूर्ित हो पंख कटे ए पर्वतेकि 
प्रमान धराद्यायी होने लो ॥ १६ ॥ 
वैत्यानां तदूघनीभूतमन्धकारमदाणैवम्‌ । 
परविष्टं वलमुत्जस्तं तमोभरूठमिवावभो ॥ १७॥ 
अन्धकारक महासागर वरी हुई दैर्योकी वह धनीभूत 
सेना अत्यन्त मयमीत हो गयी ओर स्वयं तमोमयी-खी प्रतीत 
षने स्री ॥ १७॥ 
तदाखजन्महामायां मयस्तां तामसीं ददन्‌ । 
युगान्ताग्निमिवत्युघ्रां श्ामौरवेण वक्धिना ॥ १८॥ 


तव मय नामक दानवने दइन्द्रके दवाय फैखयी दुई उस . 
तामसी मायाको नष्ट करते दुष्ट एक महामायाकी खि कीः 
जो ओव नामक अग्नि वद़वानल }) के द्वार स्वी 
गयी थी ओर प्रख्पकालकी अग्निकरे समान अत्यन्त 
भयंकर थी ॥ १८ ॥ 


खा दृद्राह तमः सर्च माया मयविकदिपता। 
दैत्याश्च दीततवपुपः सद्य उन्तस्थुरादवे ॥ १९॥ 
मयके दारा फेखायी हू उक मायाने सरे अन्धकार 


को जखाकर भस्म कर दिया; किर तो दैत्यो दारीरद्रमक .. 


उटे ओर वे तत्कान युद्धे स्यि खदेदोग्ये॥ १९॥ 
मायामोर्वा समासाय दह्यमाना दिवौकसः 1 
भेजिरे चन्द्रधिपयं श्ीतांद्यसलिदे शयात्‌ ॥ २०॥ 
अव तो दैवतालोग ओर्व मायक्रे सम्परमे आकर ` 
दग्ध होने खगे ओर ठे जलम शयन केके न्य्यि चन्द्रमा- 
के समीप गये ॥ २०॥ 
ते वृषामाना हयी्वंण तेजसा श्रष्रतेजसः। 
शाशंसुर्वञ्िणे देवाः संतत शरणेपिणः ॥ २१॥ 
वे सत्र देवता यीर्वफे तेजसे श्रुलकर अपना तेज खो बैटे। 
उर्होनि अत्यन्त संतप्त टोकर गरण पनेकी इच्छसि इन्द्रके 
पास जाकर पुकार की ॥ २१ ॥ 
संवक्ते मायया सैन्ये दष्यमाने च दानदैः। 


चोदितो देवरजेन वरुणो वाक््यमव्रवीव्‌ ॥ २२॥ 


जग्र॒ मयासुरकी मायासे खारी सेना संतत दो उदी भौर 
दानव भी उसे जलनि त्रो, तवर देवराजके दवाय उसकी 
श्यान्तिके चये प्रेरित ्टौनेपर चरणने इस प्रकार कष्टा ॥२२॥ 
वरण उवाच 
पुरा अह्यपिंजः शक्र तपस्तेपेऽतिदाख्णम्‌ । 
ऊर्वो मुनिः स तेजस्वी सदो प्रह्यणो राणः ॥ २३॥ 
वरूण योले-देवेन | पूर्वकर्म ऊर्वं नामे प्रषिद 
प्क तेजस्वी मनिः जो ब्रहि भगुके पुत्रे! वे 
गरणेमिं ब्रह्माजीके समान ये । उन्टेनि अच्यन्त दारुण तप 
करना आरम्भ किया ॥ २६ ॥ 
तं तपन्तमिवादित्यं तपसा जगदव्ययम्‌ । 
उपतस्थुरुनिगणा देवा बरह्पिभिः सद ॥ २८॥ 
जसे वूर्य॑षटस अन्यय ८ प्रवादरूपते सद्‌ा रहनेवाठे ) 
जगत्‌को सदा तपाते रहते है, उसी प्रकार वे भी अपनी 
तपस्यासे सबको तापदेने स्मे ] तवर ब्र्िर्योखदित देवता 
ओर मुनिगण उनके पाख अये ॥ २४॥ 


हिरण्यकरिपुश्चैव दानवो दानवेश्वरः । , 
चपि विकषापयामास पुरा परमतेजसम्‌ ॥ २५४ 


हरिवंशपवं | 


पञचथत्वारिदोे ऽश्यायः 


१६७ 


नन 


दानव दिरण्यकथिपु भी, जो समस्त दानवोक्रा स्वामी 
था, किसी खमय उन परम तेजस्वी मदर्पिकरे पास आया ओर 
उनसे शान्ति च्वि प्रार्थना करता र्दा; यह प्राचीन काल- 
की बातत हे॥ २५॥ | 
तमूबष्य ययो वचनं बह्मसम्मितम्‌ । 
` ऋऋषिवंरोचु भगवञ्छिन्नमूरमिष् कुलम्‌ ॥ २६॥ 
ब्रह्मपियेनि उनपे यह वेदतरुल्य बात कदी-“भगवन्‌ ! 
करपरियेकरि वं्षम पङ स करकी जड़ क्रर-सी गयी 
दै॥ २६॥ 
पकस्त्वमनपत्यश्च गोघ्रं यन्नाञ्ुबतंसे । 
कमार वतमास्थाय दछेदामेवादुवर्तसे ॥ २७॥ 
(एकमात्र आप ही अपने कुमे बचे है ओर आपके 
कोई संतान नहीं हैः तो भी आप योत्रका अनुसरण नी 
करते है--उसकी परभ्पराकरो बनाये रखनेके ल्ि कोद प्रयत 
नही करते दै । केवल नैष्ठिक ब्रह्यचर्यंका बत धारण करके 
तपस्याजनिते क्टेदाका हयी अनुगमन कर रदे दै ॥ २७॥ 
चह्नि विप्र गोत्राणि मुनीनां भवितात्मनाम्‌ । 
प्कदेहानि तिष्ठन्ति विभक्तानि विना प्रजाः ॥ २८ ॥ 
श्विधरवर ¡ विशुद्ध अन्तःकरणवाले मुनिर्योके वहुत-से 
एसे गोत्र याकरुलर्हैः जो एक शरीर ८ एक व्यक्ति ) पर 
ही अवलम्बित रहे दै ओर संतान न होने कारण जड़से 
अल्ग होकरनष्ट हो गये द ॥ २८ ॥ 


इुटेषूच्छिक्नमूखेथु तेषु नो नास्ति कारणम्‌ । 
भवांस्तु तपसा शेष्ठः प्रजापतिसमदयुतिः ॥ २९॥ 
'मूलकरे ही न हौ जानेस उन दुर्छकी बृद्धिका हमारे 
देखनेमे कोई कारण नीं रह गया है, पर्व॒ आप तो (अपनी 
भावी वंशपरभ्यरके भूलकरूपम विद्यमान ही दै । आपके रदते 
इस कुलकरा उच्छेद नहीं होना चाहिये । आप ) तपकी दृष्िसे 
भे है ओर तेज एवं कान्तिमे भी ग्रजापतियोकरे तल्यं है ॥ 
तत्‌ प्रवतैख वंशाय वद्धयात्मानमात्मना । 
त्वमाधत्स्वोजितं तेजो द्वितीयां वै तुं कूर ॥ ३० ॥ 
“अतः आप अपने वंशको चखनेका उद्योग कीजिये 
ओर अपने द्वारा अपने आपको म्रद । अपने ओजस्वी 
तेज ( वीयं ) क्रा (योग्य पर्न ) आधान कौनिये ओर 
रसा करे पुनेरूपमे अपने दृक्रे गरीर्को प्रकट कीजिये" ॥ 
स पवसुक्तो सुनिभिरनिर्मनसि ताडितः) 
जगहे तादरुपिगणान्‌ वचनं वेद्मव्रवीत्‌ ॥ २१ ॥ 
उन मदपियोके एेसा कटनेपर ऊर्वं मुनिके हृदयमे गहरा 
ध्ाल्गा ।वे उन श्रृष्रियकोी निन्दा क्रमे तपो ओर 
षस प्रकार वोदे--॥ ३१॥ 


यथायं शाश्वतो धमं सनीनां विदितः पुरा । 
सदा ऽऽ सेवतां कमे वन्यमूखफलारिनाम्‌ ॥ ३२ ॥ 
धमहात्माभो } जो वनकरे प्रल-मूल खाकर रते ह ओर 
सदा आर्षशाक्षेमिं वताये हुए सत्कर्मका सेवन करते ई उन 
हम-जेते छषि-सुनिवोके च्वि तो प्राचीन काटसे इस तप एवं 
ब्रह्मचर्य॑रूप सनातन धर्मका ही विधान क्रिया गया है ॥३२]॥ 
ब्रह्मयोनो प्रसूतस्य ब्ाह्यणस्यायुवतिंनः। 
ब्रह्मचर्य सुचरितं ब्रह्माणमपि चाख्येत्‌ ॥ ३६॥ 
श्राह्यणङ्कर्खये उत्पन्न दयोकर बाद्यण-धर्मका अनुसरण 
करनेवाले द्विके द्यारा इस व्रह्मचर्यत्रतका यदि भलीर्भोति 
आचरण करिया जाय तो यह व्रह्माजीको भी विचलति कर 
सकता दै ॥ ३२ ॥ 
दिजानां दृत्तयस्तिस्ो ये गृदाश्रमवासिनः। 
अस्माकं तु वनं चर्तिव॑नाश्रमनिवासिनाम्‌ ॥ ३४ ॥ 
धजो गृरहस-आश्रममे निवास करते है, उन बाह्य्णोके 
स्यि ह्य शाम यज्ञ करानाः षेद पदाना ओर दान ग्रहण 
करना--ये तीन द्तियो बतायी गयी ह । हम-जैते ऊर््वरेत\ 
उनवासिर्योके च्ि तो बनके फल-मूल दी जीविकाके साधन १॥ 


अम्वुभक्षा वायुभक्षा दन्तोदूखछिकास्तथा 1 
अद्मकुटा दज्लनपाः पञ्चातपतपश्च ये ॥ ३५ ॥ 
(कुछ ग केवल जल या वायु पीकर ही रहते ह, कुछ 
दतिषि ही ओखली ओर मूसल्का काम रेते ईै--धर्थात्‌ 
दति रहनेपर भूसीसदित नीवार आदिको चवा लते द । येही 
ष्दशनप' कहते ह | परंतु जिन दोति नहीं ई, वे पत्थरयेते 
ही कूट-पीसकरर वन्य वस्तुर्ओको खाते दै । कुछ पञ्चाग्निके 
तापका सेवन करते दै ॥ ३५ ॥ । 
पते तपसि तिष्ठन्तो वकतैरपि सुदुष्करः । 
बरह्यचयं पुरस्कृत्य प्रार्थयन्ते परां गतिम्‌ ॥ ३६ ॥ 
धये अत्यन्त दुप्कर वर्तोका आचरण करते हुए मी 
तपघ्या्मे खगे रते ओर मुख्यतः बहचर्य-बतका पाटन करे 
उत्कृष्ट गतिको पाना चादते द ॥ ३६ ॥ 
बह्मचयौद्‌ बाह्यणस्य ब्राह्मणत्वं विधीयते । 
पवमादुः परे लोके व्रह्म ब्रह्मचिदरो जनाः ॥ २७ ॥ 
'्र्यचर्यकरे पालनसे ही शादणको ब्रा्यणरत्वकी प्राप्ति 
होती है । इसी तरह बहयेत्ता पुदर्पोका कहना है कि ब्रह्मचर्य. 
का पाटन दी परलोके त्रहमकी प्रापिका मुख्य साधन है ॥ 
ब्रह्मचयं स्थितं धेयं ब्रह्मचयं स्थितं तपः । 
ये स्थिता ब्रह्मचर्यषु ब्राह्मणास्ते दिवि स्थिताः) ३८ ॥ 
'्र्मचर्थमे पेर्यकी सिति रै ओर बरह्मचर्यम ही तप 
प्रतिष्ठित दै । जो ब्रामण बहषचर्यम दृदृतापूर्वक सित £, वे 
ब्रह्मलोके हयी विराजमान ईह ॥ ३८] 


१६८ . 


नास्ति योगं विना सिद्धिनीस्ति सिद्धि विना यद्यः। 
नास्ति खोके यदोमूलत्रह्मचयौत्‌. परं तपः ॥ ३९॥ 
ध्योगके विना सिद्धि न्दी मिलती अर सिद्धिके चिना 
यश्च नीं प्रात होता है ] दाका मूल कारण दै तप; परंतु इस 
जगते ब्रहमचर्यसे बदृकर दूसरा कोई तप नदी ६ ॥ ३९॥ 


तक्निगृयेन्द्रियव्रामं भूतप्रामं च पञ्चमम्‌ । 
ब्रह्मचय॑ण वतत किमतः परमं तपः ॥ ४०॥ 
'अतः इन्दिय-समुदायको तथा शाब्द आदि सुक्ष्म भृत- 
रूप उसके विपयसमूहको वदा करके ब्रहमचर्यपाटनपूर्वक 
रहे । इससे ब्रदृकर ओर कौन-खा तप हो सकता दहे १ ।४०॥ 


अयोगे केदाहरणमसंकल्ये यतक्रिया । 
अब्रह्मचयं चयौ च ध्यं स्याद्‌ द्म्भसंक्षितम्‌ ॥ ४१॥ 
'अवदयकर्तेव्य ध्यानरूप योगके अमावर्मे भी सिर मुडा 
लेना, परोक्र सुधारनेका संकल्प न रहनेपर भी केवट रोक्र- 
रंजनकर व्यि कृच्छं आदि वर्तोका आचस्ण करना तथा ब्रह्की 
प्रा्तिको रश्षय वनाकर नियमित वेदाध्ययन पिना ही ब्रह्मचर्ये 
निय्मोका आश्य छेना--ये तीनो दम्भ कहते ६ ॥ ४१ ॥ 


क्त यः क्च संयोगः क च भावविपयेयः। 
यदेयं ब्रह्मणा खष्ठा मनसा मनसी प्रजां ॥ ४२॥ 


४जव्र व्रह्माजीने मनके दारा मानक्ती प्रजा ( सनच्छुमार 
अदि) कीखष्टिकी थी) उस समय खी कर्टौयीएल्री- 
पुरुषका योग करट था १ ओर चित्तकी विकृति (कामातुरता) 
भीकर्दोथी!॥५२॥ 


यद्यस्ति तपसो वीयं युष्माकममितात्मनाम्‌ । 
खजध्वं मानसान्‌ पुरान्‌ प्राजापत्येन कर्मणा ॥ ४३ ॥ 


भ्महूर्धियो | आपलोग अमेय आतव्रलते सम्पन्न ४, 
यदि आपरमे तपस्याकी शक्ति हो तो आप परजापतिकरे समान 
कर्मं करफे मानसिक पुत्र उलन्न कर ॥ ४३ ॥ 
मनसा निमित! योनिराधातव्या तपसिना। 

न द्ार्योगं बीजं वा बतमुक्तं तपखिनाम्‌.॥ ४४॥ 

'तपस्वीको तो अपने मनसे कद्पित योनिम ही मानसिक 
संकद्पसे गर्भाधान करना चादिये। खरीक साथ संयोग अथवा 
वीरयका आधान--यह तपस्वी पुरर्पोका नियम नहीं वरताया 
गर्या है ॥ ४४ ॥ 
यदिदं दु्तधरमौथं युष्माभिरिह निर्भयैः। 
व्याहतं सद्धिसत्यर्थमसद्धिरसिव मे मतिः ॥ ४५॥ 

'आपलोग सजन रतो भी निरे अखजनेकि समान 
अपने निःगङ्क होकर यहो यह धमं ओौर अर्थे चतय व्रात 
कह डाटी दै, एसा मेरा विचार दे ॥ ५५ ॥ 


श्रीमष्टाभारते खिलभगे 


[ हरिवो 


वयपुरदीपरान्तरात्मानमेप न्वा मनोमयम्‌ । 
हार्योगं चिना सख्ये पुत्रमात्मतनूरुदम्‌ ॥ ४६ ॥ 


'अच्छा | देखिये; ओं अभी मनोमयवपु (योनि) करा 
निर्माण कसे स्रीषदयासके विना दही अपने यसीरसे उत्न्न 
दोनेवले एसे पुतच्रकी खष्टि कर रदा हू जिनकी अन्तगत्मा 
अत्यन्त उदीप होगी ॥ ५६ ॥ 
पवमत्मानमत्मा मे द्वितीयं जनयिष्यति । 
वन्येनानेन विधिना दिधक्षन्तमिव प्रजाः ॥ ५७ ॥ 

श्त प्रकार मेरा यष शरीर वनवामीके चयि उचित इस 
विधानके द्वारा दी मेरे दूसरे खरूप ( पुत्र ) कौ जन्म देगाः 
जो समघ्ठ प्रजक्रो जखकर्‌ भस्म॒ करर दरैनैकी इच्छा रखता 
होमाः | ४७ ॥ 


अवस्तु तपस्षाऽऽविष्ठो निवेदयीसं हुतादाने । 
ममन्येक्रेन दर्भेण पुत्रस्य शधमवारणिम्‌ ॥ ४८॥ 


रेखा ककर तपफ़े अवे्र्मे भरे ए ऊर्वं मुनिने अयनी 


, जेषिको अन्नम टार दिया यौ पुत्रकी उतसक्तिके लिये यरणि- 


रूप उस जोधकरो एक कुटसे मथने स्ये ॥ ४८ ॥ 


तस्योरं सदसा भित्वा ज्वाखामाद्धी निरिन्धनः । 
जगतो निधनाका्की पु्रोऽधधिः खमपद्यत ॥ ४९॥ 


उस समय सदणा उनके ऊर (जेषि) का भेदने करके 
प्क अग्निख्ठल्प पुन उचन्न हयाः जो विना इधनके ही 
ज्वालामालि अंशत या । वट्‌ समसन उंसारके विनादाकी 
इच्छा रखता था ॥ ४९ ॥ 


ऊर्ब॑स्योरं विनिर्भिद्य गौव नामान्तकोऽनलः 1 
रेकांसी क 
दिधक्षन्निव लोकांसीश्चकषे परमकोपनः ॥ ५०॥ 
ऊर्वकी-जधिको चीरकर जो वह लोक-विनादाकर परमं 
क्रोधी अनल प्रकट हुभा था, वह ओर्ेकरे नामे पि्वात 
हुजा । उसे देखकर एेणा प्रतीत होता थाः मानो वह तीनो 
खोकोको दग्ध कर डाटना चाहता हो ॥ ५० ॥ 
उत्पन्नमाञ्रशोवाच पितरं श्रीप्ठया~ गिय। 
छ्चुघा मे वाघते तत जगद्‌ भक्षे त्यजस्व माम्‌ ॥ ५१ ॥ 
उसने उन्न होते दी प्रदीतत गर्गरम अपने पतति कदा-- 
तात ! सुत्ने भूख सता रदी है» मेरे आदार व्यि यद सभ्ूर्ं 
जगत्‌ मुन्ञे अर्पित कर दीजिये, ॥ ५१ ॥* 
त्िदिवारोहिभिज्वौठेजु म्भमाणो दिशो देश्य! 
निर्दहन्निव भूतानि ब्धे सोऽ तक्रोऽनलः ॥ ५२ ॥ 
वह्‌ काल्प अग्नि समस्त प्राणिर्धोक्रो दग्ध-सा करता 
हुभा वदने ठ्गा । अपनी खर्गतक 'पहुचनेवाली ज्वाला अकि 
द्वारा वह दसो दिशा्ओमि केल्ता जा रहा था ॥ ५२ ॥ 


हरिवशपव ] ` 


पञ्चचत्वरटिशिऽध्यायः 


१६९ 


न ~~~ ~~ 


पतसिन्नन्तरे ब्रह्मा .स्वैखोकपतिः परुः 1 
आजगम मुनियं् व्यखजत्‌ पुत्रसुचमम्‌ ॥ ५२३ ॥ 

इसी गरीचमे सव खोकोके स्वामी भगवान्‌ ह्या उस 
स्थानपर आ परहुचिः जो ऊर्व सुनिने अपने शरेष्ठ पुजको उलन्न 
किया था॥ ५३॥ 
स ॒ददुर्शोसमू्वस्य दीप्यमानं सखुतान्चिना । 
ओर्वकोपधिसंत्तोहलकांश्च ऋषिभिः सह ॥ ५४ ॥ 

उन्दनि देखा कि उव॑की जथ पुत्ररूप अग्निसे देदीप्य- 
मान हो रही है ओर ओ्वंकी करोधाग्निसे ऋषरियोसहित तीनों 
लोक संततं दो उढे ह ॥ ५४ ॥ 
तमुवाच ततो बह्मा मुनिम सभाजयन्‌ । 
धावतां पुत्रजं तेजो छोकानां हितकाम्यया । 
सस्यापत्यस्य ते विप्र करिष्ये साह्यमुत्तमम्‌ ॥ ५५ ॥ 

तव व्रह्मा ऊर्वं मुनिका सत्कार करते हए. उनसे कहने 
र्गे--भ्चिप्रवर | त॒म लोकौका हित करनेका इच्छासे अपने 
युतक तेजको रेके रहो । मे तम्हरे इस पुत्रकी उत्तम सहायता 
कर्गा ॥ ५५ ॥ | 
वासं चयस्य प्रदास्यामि पारनं चास्रतोपमम्‌ 1 
तथ्यमेतम्मम वचः श्णु त्वं चदेर्तां वर ॥ ५६॥ 

ध्वक्ताओमि श्रेष्ठ ¡ वम मेरे इस तथ्य व्चनकौ भी घनो | 
म इसे अगतके समान भोजन ओर रहनेके व्यि खान भी 
दूगाः ॥ ५६ ॥ 

उर, उवाच 

धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यन्ममाद्य भवान्छिशोः। 
मतिमेतां ददातीह॒ परमाचु्रहाय वै ॥ ५७॥ 

उवे कहा--भआन मँ धन्य हूँ ! मेरे ऊपर आपका 
वड़ा अनुग्रह है, जो आप यँ पधारकर मेरे युत्रपर परम 
अनुग्रह कसनेके चयि एेसी सल्ह दे रह है ॥ ५७ ॥ 
प्रभावकाले सम्पाते काङ्क्षितव्ये समागमे । 
भगवंस्तरपितः पुः कैरव्यैः प्राप्स्यते सुखम्‌ ॥ ५८ ॥ 
छख चास्य निवासे वै भोजनं च किमात्मकम्‌ । 
विधास्यति भवानस्य वीर्य॑तुल्यं महौजसः ॥ ५९॥ 

भगवन्‌ ¡ जव इसका यौवनकार उपयित होगा ओर 
इसके व्यि भोजनकी व्यवस्था वाञ्छनीय दोगी, तब यह क्रिस 
विसे वृक्ष दोकर सुख पायेगा १ इसका निवासस्थानं कहो 
होगा १ इस महान्‌ शक्तिसाटी पुच्रकी सक्तिफे अनुरूप आप 
किंस भोजनकी व्यवस्था करगे १॥ ५८-५९ ॥ 

क्रह्मोकाच 

वडवासुसखे ऽस्य वसतिः समुद्रास्ये भविष्यति) 
सम योनिजेखं विध्र तच, तोयमयं वपुः ॥ ६० ॥ 


जह्याजीने कह्ा--विप्रवर ¡ जिसकी आकृति घोड़ीके 
मुखकरे समान दैः समुद्रके उस सुखम इसका निवार होगा । 
जल मेरी योनि ( उत्पत्तिका खान ) दै ओर उस ( समुद्र , 
एवं उसके मुल ) करा खर्प मी जलमय हीह ॥ ६० ॥ , “ 
तद्धविस्तव पुरस्य विखजाम्याकयं तु तत्‌.1` 
तश्नायमास्तां नियतः पिवन्‌. वारिमयं. हविः ॥ ६१॥ 
उसी जलको मँ वुम्हरि पुत्रके चि हविष्यरूपमे अपिं 
करता हूं ओर उसके छि रहनेका- स्थान भी वही होगा । 
यह जलमय हविष्यका पान करता हआ षदा वहीं 
रहे ॥ ६१ ॥ । । 
ततो युगान्ते भरूतानामेष चाहं च सखुबत । 
खषितौ विचरिष्यावो रोकानिति पुनः पुनः ॥ ६२.॥ 
सुत्रत [ तदनन्तर प्राणिर्योका प्रख्यकाल आनेपर यह 
ओर भे दोनों साथ-साथ सम्पूणं लोक्गौमे वारंवार 
विचरेगे ॥ ६२॥ 
पषोऽचचिरम्तकाठे तु सलिलाशी मया ङतः। 
दहनः सर्वभूतानां सदेवासुररक्चसाम्‌ ॥ ६३ ॥ 
इस अग्निको मेने जलहारी बना दिया | यह प्रल्यके 
समय देवता, रक्षस ओर असुर आदि समस्त प्राणिर्योको मख 
करनेवाला होगा ॥ ६२ ॥ 
पवमस्त्विति सो ऽप्यग्निः संचतञ्तालमण्डलः । 
पविवेशार्ण॑वमुखं निक्सिप्य पितरि प्रभाम्‌ ॥ ६४ ॥ 
तथ '्एवमस्तु" ककर उस ओवं नामक अग्निने अपनी 
ऽवारओंको समेट ख्या ओर पिताके सरीर यशरूपी तेन- 
को स्थापित करे उसी क्षण समुद्रके मुखमे परवेद करिया ॥ 
भ्रतियातस्ततो चर्या ते च सर्वै महर्षयः । 
ओर्वस्याग्नेः परभावक्षाः खां खां गतिमुपाधिताः ॥६५॥ 
तव ब्रह्माजी लौट गये तथा ओ्वं अग्निक प्रमावको 
जाननेवले वे स्म महर्षिं मी अपने-जपने खानकरो 
चङे गये | ६५ ॥ 
हिरण्यकशिपु तद्‌द्भतमपूजयत्‌ 1 
उवं भणतसवोद्ञो वाक्यं चेदमुवाच ह ॥ ६६ ॥ 
इत अद्धुत घटनाको देखकर दिरण्यकरिपुने ऊर्व॑को 
साष्टज्न प्रणाम करफे उनका पृडय करिया ओर्‌ यह बात 
कदी-!| ६६ | 


भगवन्न्धुतमिवं नित्तः लोकसाक्षिकम्‌ । 
तपसा ते सुनिधेष्ठ॒परितु्ः पितामहः ॥ ६७ ॥ 
(भगवन्‌ [ आपने समस्त लोकेकि सामने यह्‌ अद्भुत 


वराते कर दिखायी । सुनिश्रेष् ! आपकी तपस्यासे पितामह 
नद्या मी बहुत संवर्ट द ! ६७ ॥ 


१७० 


श्रीमहाभारते सिलभागे 


[ दसिविंशे 


अहं तु तव पुरस्य तव॒ चैव महाच्रत । 
शत्य इत्यवगन्तव्यः च्छाष्यो ऽसि यदि कर्मणा ॥ ६८ ॥ 
धमात्‌ ] यदि आप मेरे कर्मकरो देखकर सुञ्चे प्रदांसाकरे 
योग्य समन्चते हो तो -सञ्े अपने पुत्रका ओर अपना किङ्कर 
समनं 1.६८ ॥ 
तन्मां पद्य समापनं तवेवाराधने रतम्‌ । 
यदि सीदे मुनिरेष्ठ तवैव स्यात्‌ पयज्ञयः ॥ ६९॥ 
(अतः मुनिश्रेष्ट ! मेँ रारणमे आकर आपकी ही आराधना- 
मे तपर हूं । आप सुक्चपर कृपादृष्टि कीजिये । यदि मै कष्टम 
पड़ा तो यह आपकी ही पराजय होगी | ६९ ॥ 
उषं उवाच 
धन्यो ऽस्म्यचुग्रदीतो ऽस्मि यस्य ते ऽदं गुसमतः । 
नास्ति ते तपसानेन भयमयेद सुव्रत ॥ ७० ॥ 
उवं मुनिने कहा--सुतरत ! तम शुक्ते अपना गुर या 
पिता मान रहे हो, अतः मै धन्य हू यह वम्हाया मुद्चपर 
महान्‌ अनुग्रह है । मेरी इस तपस्य प्रभावतसे अव तुर 
यहां कोई भय नहीं होगा ॥ ७० ॥ 
इमां च मायां गृह्णीष्व मम पुरेण निमितम्‌ । 
निरिन्धनामच्निमयी दुःस्पर्ा पावकेरपि ॥ ७१॥ 
साथ दही तुम मेरे पुत्रे द्वारा स्वी हुई इस मायाको 
ग्रहण करो । इस ईधनरहित अग्निमियी मायाका स्पर्शं करना 
साक्षात्‌ अग्निकरे व्यि भी कठिनदोगा | ७१॥ 
पषा ते खस्य वंशस्य वशगारिविनिग्रदे । 
रक्षिष्यत्यात्मपक्षं सा परांश्च प्रहरिष्यति ॥ ७२॥ 
यह्‌ ( माया ) वुम्हरि जीवनकार तक सदा तुम्हारे 
वंशजेकि वदाम होकर रहेगी ओर शतरुओका दमन करते 
समय यह अपने पक्षवार्लकी रघा तथा शघ्रुजौक्र संहार 
करेगी ॥ ७२॥ 


पवमस्त्विति तां गृह्य प्रणस्य मुनिपुंगवम्‌ । 
जगाम जिदिवं दृष्टः ताथ दानवेश्वरः ॥ ७३ ॥ 
तवर "एवमस्तु" कहकर दानवराजने उस मायाकं, ग्रहण 
कर लिया ओरं प्रसन्न हो कृतार्थताक्रा अनुमव कर॥ हुमा 
उन मुनिवरको प्रणाम करक स्वर्गको चल गया ॥ ७३ ॥ 
वरेण उवाच 
सेषा दुर्विष माया देवैरपि दुरासदा । 
ओवेण निर्मिता पूर्वं पावकेनो्वैख चना ॥ ७४॥ 
वरुण कते है--इस प्रकार प्राचीन काल्प ऊर्व ्रषि- 
के पुत्र ओर्वनामक अग्निने इख मायाको स्वा थाः जो देवता 
ओकर च्वि मी दुःसह एवं दुर्जय है ॥ ७४ ॥ 
तिस्तु व्युत्थिते दैत्ये निर्वीयंषा न संशयः । 
कषापो चस्याः पुरा दत्तः खटा येनैव तेजसा ॥ ७"\॥ 
दैत्य अव संसारे उठ गया है । अतः यद माया 
निर्बल हो गयीदहैः इसमे को संदेह नहीं है; क्योकि 
जिन्देनि अपने तेजसे इसको स्वा था, उन्होने दी इसको 
शाप भीदिय। था (कि यह माया दिरण्यकरिपुके जीवनतक 
ही बल्वती रहेगी ) ॥ ७५ ॥ 
ययेषा प्रतिहन्तव्या कतंन्यो भगवान्‌ खुखी । 
दीयतां मे सखा शाक्र तोययोनिर्निंशाकरः ॥ ७६॥ 
इन्द्रदेव ! यदि आपको इसत मायाक्रा संहार करना है 
ओर अपनेको प्रसन्न करना ह तो आप मुञ्चे जलक्रे उत्पत्ति 
स्थान चन्द्रमाको मेरी सहायताके व्यि दीन्यि ॥ ७६ ॥ 
तेनाहं सह संगम्य यादोभिश्च समावृतः । 
मायामेतां हनिष्यामि त्वल्पसादान्न संशयः ॥ ७७ ॥ 
म चन्द्रमके सहयोगते ओर (अपने अधीनस ) जलचर 
जीवसे धिसा रहकर आपकी कृपासे इस मायाक्रा अवश्य ही 
नाश कर डद्धूगा ॥ ७७ ॥ 


इति श्रीमहाभारते खिलभागे हिवंये हरिवंशपवणि ओववा्निसम्भवो नाम पञ्चचस्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४५ ॥ 


इस प्रकार श्रोमहाभ। स्ते दिसभाग हसिवशके अन्तत सिप 


ओवै अग्निक उत्पतित पेतासीखर्य अध्यायपुरा हुमा ॥ ४५ ॥ 


प्टचत्वारिदऽध्याय 
हनद्रद्ारा चन्द्रमाकी स्तुति, चन्द्रदेव ओौर वरुणदेवके ढारा दैत्यसेनाका संहार, 
मयदानवहारा मायाका प्रयोम, पवन ओर अग्निदेवका दत्यसेनाके 
साथ संग्राम ओर ाठनेमिका रणमे आगमन 


वैश्चम्पायन उवाच 
पवमेरित्वति संदृष्टः राक्रसिदशवदद्धंनः 1 
संदिदेश्लाय्रतः सोमं युद्धाय रिष्दिसयुधम्‌ ॥ ९ ॥ 
वेशाम्पायनजी क्ते दै--जनमेजय ! तव! देवतार्थं 
की उन्नति करनेवाटे इण्द्र अति प्रसम होकर बोड उ" अच्छा; 


णेता ही होगा । तदनन्तर वे अपने समने दी सितः हिमसे ` 
आयुधका काम ठेनेवाठे चन्द्रमाकरो समन्नने ल्मे ॥ १॥ . 
ग्रक उवाच | 
गच्छ सोम सहायत्वं ऊुरु पाराधरस्य वै । 
असुराणां विनाश्य जयाय च दिवोकसाम्‌ ॥ २॥ 


हरिवदापवं 1 


पर्‌चत्वारिशोऽध्यायः 


१७९१ 


हन्द्रने कदा--सोम ! आप जाइये ओर पाशधारी 
वरुणकी सहायता कीन्यि ! एेला कंरनेसे असुरोका संहार 
ओर देवतार्ओकी विजय होगी ॥ २ ॥ 


त्वमपतिमवीर्यश्च ज्योतिषां चेश्वरेदवरः । 
त्वन्मयं सबैखोकानां रसं रक्तविदो विदुः ॥ २ ॥ 
आपका पराक्रम अनुपम है ! आप ग्रहनक्ष्रोके अधि- 
पतिरेक भी अधिपति ह । रस ( के तच्च ) को जाननेवि 
विद्वानोका यह्‌ अतुभव दै किं सव प्राणियोमे जो स्ख दै, वहं 
आपकाद्ीहै॥३॥ 
क्षयच्रुद्धी तवान्यक्ते सागरस्येव मण्ड 1 
परिवतंस्यष्टोरघ्रं कां जगति योजयय्‌ ॥ ४ ॥ 
समुद्रके समान आपके मण्डलकी क्षय-दृद्धि सदा अन्यक्त 
रहती दै । आप संसारमे कालको प्रवर्तित कसते हुए दिन ओर 
रात्रिका पसििर्तन करते रहते ह ॥ ४॥ 


रोकच्छायामयं लक्ष्म तवाङ्गे श्ाशासंशितम्‌ । 

न विदुः सोमदेषाऽपि ये च नक्षत्रयोगिनः ॥ ५ ॥ 
सोम ¡ आपके अङ्क ( मण्डले म्य ) मे पृष्वीखोककी 

छाया ( प्रतिषिभ्व ) ही शश नामक चह रै । नक्ष््रीका 

विचार कएनेवलि विद्वान्‌ ओर चन्द्रोपासक भी आपको (वास्त- 

विक रूपमे ) नही जान सकते ॥ ५॥ 


त्वमादित्यपथादूर्ध्व ज्योतिषां चोपरि स्थितः। 
तमश्चोत्सायं बपुषा भाखयस्यखिलं जगत्‌ ॥ ६ ॥ 
आप आदित्यपथसे भी उ्वदेदमे भौर सम्पूरणं ज्योति- 
मण्डलक भी ऊपर खित रहते है । आप अपने ( तेजोमय ) 
यरीरके दवारा अन्धकारको वृर कर समसत संसारक प्रकारित 
करते ह ॥ ६॥ 
. चवेतभायुर्दिमवचुज्योंत्िषामधिपः शी । 
न्दत्‌ काल्योगात्मा ईज्यो यक्षरसोऽन्ययः॥ ७ ॥ 
आपकी किरणे शवेतवर्णकी है । आपका षरीरं॑दिममय 
दे । आप नक्षत्नोके खामी, शाशाके चिदुसे युक्त, संवत्सररूप 
(काल) के रचयिता; कारयोगस्वरूप, पूजनीयः (वर्षा आदिक 
सूपे ) यज्ञके रस ओर अम्य ( प्रवादरूपसे नित्य ) 
द६॥ ७॥ 
ओषधीशः क्रियायोनिरम्भोयोनिर नुष्णभाक्‌ । 
शीताश्चरयुताधारग्धपटः इवेतवाहनः ॥ ८ ॥ 
आप ( अन्नादि ) ओप्रधियोके स्वामी, क्रियाओं ओर 
जलकरे उत्पच्न्ान तथा स्वभावसे दी शीतलता धारण करने- 
वे है । आपकी किरण शीतल दै । आप अमृते आधार ह 
चपल ह । आपका बादन देतवर्णका हे ॥ ८ ॥ 
त्वं कान्तिःकान्तवपुषा त्वं सोमः सोमदृत्तिनाम्‌ । 
सौम्यस्त्वं सर्वभूतानां तिमिरशनस्त्व्सरराद्‌ ॥ ९॥ 


आप दी कान्तिमान्‌ शरीरबारे नरनारियो ओर देवताो- 
की कान्ति ह ओर सोमसे जीविका चल्मनेवछे देवतमूह- 
केल्यिआपदहीसोमरहै। आप सभी प्राणियोके च््िसीम्य 
है, अन्धकारक नाश करनेवाले दै तथा नक्च्रोके राजा है ॥ 


तद्‌ गच्छ त्वं सहानेन वरुणेन वरूथिना । 
शमयस्वासुरी मायां ययः द्याम संगरे ॥ १०॥ 
अतः आप सेना ठेकर ( युद्धे व्यि ) तैयार खड़े हुए 
इन वरुणदेवकरे साथ जाइये ओर समराद्नणमे जिससे हम 
जल रहे है, उस आसुरी मायाको शान्त कीन्यि | १० ॥ 


सोम उवाच 
यन्मां बदसि युद्धाथं देवराज जगत्पते । 
एष वर्षम शिशिरं दैत्यमायापकर्षणम्‌ ॥ ११॥ 
सोमने कदा--देवरान { जगते । भप युद्धके 
लि मुद्यसे जो कुछ केह रहे रै, उसफे अनुसार मै अमी 
दैत्योकी मायाको नष्ट केके ल्थि हिमकी वर्षा 
करता हू ।॥ ११॥ | 


पतान्‌ मच्छीतनिदभ्धान्‌ पद्य त्वं हिमवेष्टितान्‌। 
विमायान्‌ विमदांश्चैष दानवांस्त्वं महास्रधे ॥ १२॥ 
देखिये दस महाखम॒रमे ये दनव किस प्रकार मेरे 
ब्ररखाये हुए ओलेसे दग्ध होते हँ । हिमसे अवेष्टित होनेपर 
केसे इनकी साया नष्ट होती दै ओर किस तरह इनका सारा 
मद्‌ उतर जाता दै ।॥ १२॥ 
वैशम्पायन उवाच 
ततो हिमकरोत्खश्ः सवाप्पा हिमदृष्टयः । 
वेष्टयन्ति स तान्‌ घोरान्‌ दैत्यान्‌ मेघगणा इव॥ १२ ॥ 
वैशम्पायनजी कहते है--राजन्‌ } तदनन्तर चन्द्रमा. 
की छोडी हुई सुन्दर भमापसहित ओर्लोकरी वषनि मेधोकी 
भोति उन भर्यकर दर्योको जकडना आरम्भ कर दिया ॥ १३॥ 
तौ पाराश्यु्काश्चधसै वरुणेन्दू महारणे । 
जश्नवर्दिमपातेन्य पाराघातैश्च दानवान्‌ ॥ १४॥ 
उस महायुद्धमे पाशधारी वरुण ओर श्वेत किरणोद्गाछे 
चन्द्रमा पाश्रसे मार ओर ओके गिराकर दान्वोका "संहार 
करने ख्ये ॥१४॥ , १ 
दावम्बुनाथौ समरे तौ पाडादिमयोधिनो । 
खधे चेरतुरस्भोभिः श्चुग्धाविव ` महार्णवो ॥ १५ ॥ 
पारा ओर हिमका प्रहार करनेवाले वे दोन जलै स्वामी 
वरण ओर सोम जलरी वर्षा करते हुए क्षोभे भरे हुए दो 
समुद्रके समान संग्राममे विचरने ल्म ॥ १५ ॥ 


ताभ्यामाऽपरवितं सेन्यं तद्‌ द्यानवमदश्यत । 
जगत्‌ संवतंकाम्भोदैः अवृ्ैरिव संवृतम्‌ ॥ ९६ ॥ 


१७२ 


उन दोनो दवारा की गयी जल्वपरति आश्मवित हुई 
वह दानरवोकी सेना प्रलयकाल प्रचल वर्प करनेवाले संवर्तक 
मेषेकि द्वारा अनन्त जलरादिम इवाये गये जगत्‌ समान 
दीखने ख्गी ॥ १६ ॥ 
ताबुद्यतांद्युपारौ द्धौ श्याङ्कवरुणो रणे 1 
शमयामासतुमौयां देवौ देतेयनिर्मिताम्‌ ॥ १७॥ 

( इस प्रकार ) चन्द्रदेव ओर वरुणदेव दोनों उस 
युद्धम अपनी क्रिरणो ओर पार्शाका प्रयोग करके दैत्योकी स्वी 
हुई मायाका शमन करने लगे ॥ १७ ॥ 
श्ीतांड्युजलनिर्दग्धाः पदोश्च प्रसित! रणे 1 
न शेङ्श्चलितं दैत्या विशिरस्का इवाद्रयः ॥ १८ ॥ 

सीतल किरर्णोवाठे चन्द्रमाके ८ हिम )जलते अक्डे हु 
ओर ८ वरखुणकर ) पाशेति जकडे हुए दैत्य रणमे रिखरहीन 
पर्वर्तोकी भोति दिक-इकू भी न स्के | १८ ॥ 


श्ीतादयुनिहतास्ते तु पेतु्ैत्या हिमादिताः । 
दिमप्राबृतसरवीज्ञ॒निरूष्माण इवाद्रयः ॥ १९॥ 
सीतरदिम चन्द्रमाकी मार खाकर दिमसे पीडित दए 
दैत्य पृरध्वरीपर गिरने ल्मो । उनके सारे अङ्ग वफ॑ते ठकं गये 
थे } उस समय वे उप्णतारहित अग्निकरे समान जान 
पढते थे ॥ १९॥ 
तेषां तु दिवि दैत्यानां विपरीतप्रभाणि च । 
विमानानि विचित्राणि निपतन्त्युत्पतन्ति च ॥ २० ॥ 
किर तो खर्गमिं देत्येकि विचित्र विमान प्रमादीन होकर 
गिरने ओर गिरकर उखछल्ने स्मो ॥ २० ॥ 


तान्‌ पाशाद स्तथ्रथिताञ्च्छादितान्‌ हिमरद्िमना । 
भयो दद्य मायावी दानवान्‌ दिवि दानवः ॥ २१ ॥ 
मायावी दानव मयने देखा किं स्वरम ब्रहुत-से दानवोको 
पादाधारी वसणने जकड़ छवा है ओर बहुतौँकरो शीतर 
किर्णोवाठे चन्द्रमाने वर्फ॑से ठक दिया हे'॥ २१॥ 


स शिखाजालविततां गण्डहेखाटदासिनीम्‌ ! 
पादपोत्करकरुटा्रां कन्दराकीणेकाननाम्‌ ॥ २२॥ 
सिहन्याघ्रगजाकी्णो नदन्तीमिव यूथपैः । 
शदासगगणाकीणीं  पवनाघूर्णितद्भुमाम्‌ ॥ २३॥ 
निर्मितां स्वेन पुत्रेण क्रौञ्चेन दिवि कामगाम्‌ । 
प्रथितां पार्वतीं मायां सखजे द्‌नवोत्तसः ॥ २९॥ 
तव उस दानव-शिरोमणिने स्वर्गमे अपने पुत्र करौञके 
दारा निर्मित सुप्रसिद्ध पार्वती मायाको प्रकट किया; जे 
इच्छानुसार सर्वत्र पर्हुच जनेवाटी थी । वह शिलार्ओका 
विशार जाल-सा वरदा देती थी, मारी-भारी चद्नकरो गिरा- 
कर उनके धमकेकरी आवाजके रूपमे मानो अड्हास करती 
थी । उन रिलकि रिरोमाग बृष्षौके कारण खुरदरे हो रे 


श्रीमहाभारते लिलभागे 


[ हरिवंशे 


ये | उस पार्वती मायके कानन-प्रान्त रुफा्ओसि व्याप्त थे । 
वरदो सिंह, व्याघ्र ओर बदे.वदे गजराज मरे दए थे । यूय- 
पति्योके चिग्घाडने या दहाड़नेके शब्दसे मानो वह माया 
सिंदनाद-सा करती प्रतीत दोती थी | उस मायामयी पक्त- 
मासर्मे सव ओर भेदिये भरे थे । वेकि क्ष प्रचण्ड वायुक्रे 
स्के खाकर शम रहे ये ॥ २२--२४॥ 
साद्मरब्दैः रिखारवर्ैः सम्पतद्धिश्च पादपैः । 
निजघ्रे देवसंधास्तान्‌ दानवाश्चाप्यजीवयच्‌ ॥२५॥ 
उस पार्वती मायाने चद्धर्नोकि टकरानेकी आवाज, 
पर्थरोकी वपसि ओर गिरते हुए इश्षसमूसे देवसमुदायको 
मारना आरम्भ किया इसे दैत्येकरि ओीर्मे-जी आया ॥ २५॥ 
नैराकसयै वारुणी च मायेऽन्तर्दधतस्तसः 1 
अद्मभिख्ायसघनेः कीणै देवगणा रणे ॥ २६॥ 
उस दैत्यकी मायके प्रमावे वरुण ओर चन््मा-दोन- 
की मायात अद्वय दो गयीं । रणभूमिनमे देवतार्थोपर प्रस्तर - 
ओर रोके घन वरसने लगे २६ ॥ 


सद्रमसंघातविपमा द्ुमपर्व॑तसंकटा 1 
अभवद्‌ धोरसंचार पृथिवी पर्वतैरिव ॥ २७7 


जेते पर्वतेकरि कारण वदहोकी भूमिपर चलना कठिन द 
जाता है, उसी प्रकार वों गिरे हुए शिलाखण्डौ समूहे 
विषम ओर बच एवं पर्वतोक व्रि जानेसे. संकीर्णं हुई उस 
रणभूमिमे चल्ना-किरना दभर दो गया था ॥ २७ ॥ 


नानाहतो ऽर्मभिः कथिच्छिराभिश्चाप्यताडितः। 
नानिरुद्धो द्वुमगणेदेवोऽदश्यत संयुगे ॥ २८॥ 
उस युद एेसा कोई देवता नहीं दिखायी देता थाः 
जिसके दारीरपर पत्थरोषे चोट न आयी होः जिख्पर दिर. 
कीमारनपड़ी दहो तथा जो स्व ओर गिरे हुए इक्ष- 
समूहसि अवरुद्ध न हो गवा दो ॥ २८ ॥ 
तदपश्रष्टधयुषं भस्चप्रहरणाविरूम्‌ । 
निष्प्रयत्नं सखुरानीकं वर्जयिन्वा गक्ाधरम्‌ः ॥ २९ ॥ 


उस समय मगवान्‌ गदाधरको छोड़कर शेष देवतार्ओकी 
वद्‌ सारी सेना निरुपाय एवं निश्चेष्ट ष्टो गयी थी | सवके 
हाथसे धनुष नीचे गिर गये ये ओर आयुर्धकरे टट जनेसे 
सवके मुखपर मलिनता छ गयी थी ॥ २९ ॥ 


स हि युद्धगतः ध्रीमानीशो न स्म व्यकम्पत । 
सदिष्णुत्वाज्ञगत्खामी न चुक्रोध गदाधरः ॥ २३० ॥ 


अवदय ही युद्धमे विराजमान श्रीमान्‌ भगवान्‌ विष्णु 
उस समय भी कम्पित नहीं हुए ओर सहनी दोनेने कारण 


हरिवंशपवं ] 


षटचत्वारिदोऽध्यायः 


१७ 


उन॒ जगत्यति भगवान्‌ गदाधरको क्रोध भी नहीं 
आया ॥ ३० ॥ 
कालक्ञः काठमेघाभः समेक्चत्‌ कारमाहवे 1 
देवाश्चुरविमष्र स दषुकामो जनादनः ॥२९॥ 
दयाम मेघकी-सी कान्तिवाठे ओर समयको पहचाननेवाठे 
भगवान्‌ जनादन युद्धम समयक्री बार देखने स्मो । वे देवता 
ओर अयुर्योकी मुठमेड देखना चाहते थे ॥ ३९१ ॥ 
ततो भगवताऽदिष्ठौ रणे पावक्रमारुतौ । 
दामनाधं भर्रृद्धाया मायाया मयखष्टया ॥ २२॥ 
उधर मयदानक्की स्वी हुईं माया रणभूयिमे उत्तरोत्तर 
वद्‌ रही थी । उसे गान्त करके च्ि भगवान्‌ने अग्नि ओर 
वायुकों अका दी (करि ठम दोनों इस मायाको नष्ट 
करो )॥ ३२॥ 
ततः प्रदृद्धावन्योन्यं भ्रवुद्धौ ज्वारुवादिनौ 1 
चोदितो विष्णुवा्येन तां मायां व्यपकर्षताम्‌ ॥ ३३ ॥ 
तव एक दु सरे सहयोगसे वदे दए तथा प्रबुद्ध होकर 
ज्वाल्ओका मार वहन करनेवाले वे दोनो देवता भगवान्‌ 
विष्णुकी भाञ्चते प्रेरित होकर उस मायाशनो दूर कखे लगे ३३ 
ताभ्यासुद्‌ ्रान्तवेगाम्यां भ्र्रद्धाम्यां महाहवे । 
दग्धा स पार्वती माथा भस्मीभूता नना ट ॥ ३४ ॥ 
प्रहृ होकर मदायुद्धमे ववंडरकी तरह वेगसे धूमते 
हुए पावक ओर पवनदेवमे उस पार्वती मायाकरो भस कर 
डा | अतः वह न्ट हो गयी | ३४॥ 
सोऽनिरो.ऽनलसंयुक्तः सोऽनरश्चानिकाङ्लः । 
दैत्यसेनां दददलुयुंगान्तेष्विव मूच्छितौ ॥ ३५॥ 
प्रल्यकाख्की मोति वाञ्ुका संयोग पाकर प्रबल हुए 
अग्निदेवने ओर अग्निका संयोग पाकर वदे हुए वायुदेवने 
दानवसेनको मस्म करना आरम्भ किया ॥ ३५ ॥ 
वायुः प्रधावितस्तत्र पश्चादच्चिश्च मारुतात्‌ । 
चेरतुदीनवानीके क्रौडन्तावनलानिलोौ ॥ ३६ ॥ 
रणमूमिमे पके तो वेगसे ओंधी चली ओर फिर वायुसे 
प्रज्वलित होकर अग्नि वेगपूर्वक फैठने ठगी । ( इत प्रकार ) 
अग्निदेव ओर पवनदेव दोनों दानर्वोकरी सेनामें क्रीड़ा करते 
हुए विचरे चे ॥ ३६ ॥ 
भस्मावयवसूतेषु प्रपतत्सूत्पतत्सु च । 
दानवेणु विनष्टेषु रतकर्मणि पावके ॥ ३७॥ 
{ष्िरिक्याथा १) दानवलोग भस हो-होकर गिरे 
रगे ओर ८ बायुके वेगसे ) उनकी राख उड्ने ख्गी ! इस 
प्रकार ऊग्निकरा काम पूरा हया ॥ ३७ ॥ 
वातस्कन्धापविद्धेषु विमनेपु समन्ततः । 
भायावन्धे विनि स्तूयमाने गद्ाधेरे ॥ ३८॥ 


( इधर ) वायुकरे प्रचण्ड वेगसे आहत हो विमान सव 
ओर रदटकर गिरने टो । मायाका बन्धन नष्टो गया 
तथा भगवान्‌ विप्णुकी स्तुति हने ख्गी ॥ ३८ ॥ 
निष््रयत्नेषु दैत्येषु चैरोक्ये सुक्तवन्धने । 
सम्प्रहृटेु देवेषु साधु साध्विति सर्वशः ॥ ३९॥ 

दानवोके प्रयत्नं निष्फल हो गयेः त्रिटोकीका वन्धन 
जाता रहा ओर देवता सव ओर अच्यन्त दर्षमे मरकर भ्ाधु- 
साधु” कहने लगे ३९ ॥ 
जये दृश्द्ताक्षस्य मयस्य च पराजये । 
दिक्ु सवोखु शद्दासु प्रवृत्ते धर्मसंस्तरे ॥ ४०॥ 

सदसनेत्रधारी इन्द्रकी विजय हई ओर मय ॒दानवकी 
पराजय ! सम्पूणं दिदर्े चद हो गयीं ओर सव ओर धम 
का विस्तार होने ल्गा॥ ४० ॥ ~ 


अपाद्त्ते चन्द्रपथे अयनस्ये दिवाकरे । 


. भ्रङूतिस्थेषु रकेषु खेषु चारि्नन्धुषु ॥ ४१॥ 


चन्द्रमाका मा्ग॑ प्रशस्त हो गया} सूर्य अपने मार्ग 
मे सित हए । तीनों लोक अपनी स्वामावि स्थिति स्थित 
दो गये ओर मनुष्य सदाचारको ही अपना वन्धु ( सहायक) 
मानने ल्मे ॥ ४१ ॥ 
अभिन्नवन्धने सत्यौ हयमनि इताशने । 
यक्षभागिषु देवेषु खगौ द्यत च ॥ ४२ ॥ 
गृद्युकी मर्यादा नियत हो गयी । अमिदोत्रका कार्यं 
ठीक ठंगते चलने लगा । देवता यज्ञोम भाग पाने तथा स्वरम 
का मार्गं दिखने सो ॥ ४२॥ 
खोकपारेषु स्वेषु दि संयानवर्तिषु । 
भावे तपसि छद्धानामभवि दु्टकरंणाम्‌ ॥ ४३ ॥ 
समस्त लोकपाल अपनी-अपनी दिदामि निर्म होकर 
विचरन रगे । शुद्धात्मा पुरुप्र तपस्यामे प्रदत्त हो अभ्युदय- 
के मागी होने सगे तथा दुराचार मनुष्यौका पिनादा होने 
खमा ॥ ४३२॥ 
देवपक्षे पसुदिते दैत्यपक्षे विषीदति । 
त्रिपादविभ्रदे धमे अधमे पाद्विप्रदे ॥ ४४ ॥ 
देनताओंका दल प्रसन्न रहने रगा । दैत्यौके समुदाय- 
पर्‌ विप्राद्‌ छा गया । धर्मक तीन पैर जम गये ओर अधर्म. , 
काणक दही देर शेष रह गया | ४४ | 
अपाढ़ृतमहाद्वारे वतमाने च सत्पथे । 
खधमेस्थेषु चरणेषु कोकेऽसमि्नाथमेषु च ॥ ४५॥ 
जिसपर चल्नेवले पुर्षे ल्थि मोक्षका महान्‌ 
दार खुल जाता दहै, वह सत्पुरु्षोका मर्य पुनः चाद्धू हौ 
गगरा । इख जगतूमे चरँ वर्णों ओर चारो आश्रमोके खोग 
अपने-अपने धर्मक पालन करने ल्मे ॥ ४५ || ` 


१७४ 
भजारष्चणयुक्तेषु श्राजमानेषु रजस 1 
गीयमानाखु गाथासु देवसंस्तवनादिषु ॥ ४६॥ 
समी नयेदा प्रजापालने तत्पर रहकर च्दरिप गोमा 
पाने स्मो । देवतार्ओंकी स्व॒तिते युक्त गाथार्ओंका सवर ओर 
गान होने लगा ॥ ४६ | 
प्रहान्तकलदुपे छोके शन्ते तपसि दारुणे । 
अत्निमारुतयोस्तस्सिन्‌ चृत्ते संभ्रामकरममंणि । 
तन्मया विमला खोकास्ताभ्यां जयकरूतप्रियाः ॥ ४७ ॥ 
सत्र छोर्गोका कंटषर छान्त हो गया । दाद्ण या कठोर 
तपस्या शान्त एलं मदु तपकरे रूपमे परिणत हो गयी । 
अग्नि ओर वायुदेवकरा वह युद्धविषयक मदान्‌ पराक्रम जव 
पूणं ह्ये गयाः तव निर्मल ( प्रसन्न ) हए जगत्मे उर््दकी 
प्रधानता हो गयी; क्योकि उनकी विजथने रो्गोकरा प्रिय 
कर्यं किया था॥ ४७ ॥ 
पूर्वदेवभयं श्रुत्वा मारुताभिरूतं महत्‌ । 
कालनेमिरिति ख्यातो दानवः भ्रत्यरश्यत ॥ ४८ ॥ 
अग्नि ओर वायुने दै््योपर महान्‌ भय उपस्थित, केर 
दिया है--यद्‌ सुनकर “कालनेमिः नामते विख्यात दानव 
उनके सामने आया ॥ ४८ ॥ 
भास्कराकारसूुकुडः शिकिताभरणाङ्गदः 1 
मन्द्राचरुसखंकादो महारजतसंदतः ॥ ४९ ॥ 
उसे मस्तक्रपर सूरये समान वेजखी सुक्रुट शोभा दे 
रहा था । उसने पैर आदिम खन-खन शब्द्‌ करनेवाले बरपुर 
आदि आमभूपण तथा भुजां वानुत्न्दं धारण कर स्वे ये। 
वहुमूर्य रचोदीके कवचे आद्रत होनके कारण वह मन्दराचल- 
सा प्रतीतदोरहाथा॥ ४९॥ 
दातप्रदरणोदश्रः शतवाहुः शताननः । 
हातरषिषौ खितः भीम(न्छतश्धङ्ग इवाचलः ॥ ५० ॥ 
उखने अपनी सौ मुजा्भेमि उतने दी आयुध धारण 
किये येः इसल्ि वह अत्यन्त भयंकर जान पहता था | उस- 
के मुख मी सौ द्ीये। सौ मस्हकति युक्त वद तेजस्वी दानव 
जव खडा दोता था, उस समय सौ शिखरोसे सुशोभित 
पवतके समान जान पड़ता था ॥ ५० ॥ 
कदो महति संवृद्धे हिमान्त इव पावकः ॥ ५१॥ 
इतना दी नर्दीः वह प्रीप्म तमे सूखे वक्षि भरे हु 
विश्चार वनके भीतर प्रञ्वछित हए दावानख्के समान देदी- 
प्यमानं दो रदा था ॥ ५१ ॥ 
धुप्नकेशो दरिच्खमश्रधष्रलोषठपुराननः । 
्रैलोक्यान्तरविस्तारो धारयन्‌ विपुलं वपुः ॥ ५२ ॥ 
उसके केरा धूम्रवर्णके ये; ठु भि इरे रेगकी 


्रीम्टाभारते खिलभारे 


[ हरिवंशे 


दिखायी देती थीं । उसकी दाद ओठोसि बादर निकली दुरः 
थी जिसे उसके मुखक्री यद्धुत ोमा होती थी 1 उस 
रेरा विशाल शरीर धारण कर रखा थाः, जो तीनो लोकमि 
केला हृआ-सा प्रतीत होता था ॥ ५२ ॥ 
वाहुभिस्तुलयन्‌ व्योम क्षिपन्‌ पद्धश्चां महीवरान्‌ 1 
ईरयन्‌ मुखनिःवासैवष्टिमन्तो वलादकान्‌. ॥ ५२ ॥ 
वद अपनी भुजा्थौसि आकायको ती रहा थाः वैरयोकी 
ठोकरोसे कितने ही पर्वतोको दूर्‌ फक देता था शीर सुखकर 
निःश्वासेि वर्प करनेवले बादर्लको उड़ा देता था ॥ ५३॥ 


तियमायतर्कोक्षं मन्वयेव्‌्रवचंसम्‌ । 
दिधक्चन्तमिवायान्तं स्न्‌ देवगणान्‌ श्चुधे ॥ ५४॥ 
उसके नेत्र विशाल ओर लख्य | वह तिरछी दृधटति 
देखा करता था । मन्द्र अर्थात्‌ स्वर्गलोके सर्वश्रेष्ठ देवता 
देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी जान पड़ता था } उसे देखकर 
रेखा लगता थाः मानो वह युद्धे  सम्पर्णं देवतार्थको भस 
कर डाल्नेक्ी इच्छसे आ रहा हौ ॥ ५४ ॥ । 
तजजयन्तं सखुरगणांद्खादयन्तं दिदो दश । 
संवर्तकलि श्चुधितं दसं ख॒त्युमिवोत्थितम्‌ ॥ ५५ ॥ ` 
वह देवताओकि ईट वताता ओर दख दिशार्जोको 
आच्छादित करता आ रहा था { रेता जान पड़ता था मानो 
प्रल्यक्राल्मे दपसे भरा हु भ्खा करार उठ खड़ा 
हज हे 1 ५५॥ 
खुतखेनोच्््तिवता विपुखाङ्कुटिपर्वणा । 
माल्याभरणपूर्णेन  किञ्चिञ्यटितवमंणा ॥ ५६॥ 
उच्छितेनाप्रहस्तेन दक्षिणेन चपुष्मता । 
दानवान्‌ देवनिष्टतायुतिष्टष्वमिति दयन्‌ ॥ ५७॥ 
-जिकी हथेली बहुत सुन्दर थीः अगुखियोके पं पुष्ट येः 
जो मालाकार आभूप्रण ( वख्य ) से सुशोभित था तथा 
जिसका कवच कुछ खिसक गया था, एते ऊंचे उटाये हुए 
मोटे-ताजे दाहिने हाथके अग्रभागे वह देवतार्ओकी मार 
खाकर गिरे हुए. दानरवोकरो उटनेक्रा संकेत करके कड रहा 
था; किं ( वीरो !) उठकर खड़े हो जाञ ॥ ५६-५७ ॥ 
तं कार्नेभि समरे दिषतां कारुसंनिभम्‌ । 
वीक्षन्ति स खुराः स्वं भयविङ्कवमनसाः ॥ ५८॥ 
शघ्ुओकि ल्थि कालके समान भयंकर वह कालनेमि 
नामक दानव जव समरमभूमिमे आया, उस समय वरहो खड 
हपट समस्त देवता भयभीत चित्तसे उसकी ओर्‌ “देखने 
रे ॥ ५८ ॥ 
तं स वीक्षन्ति भूतानि क्रमन्तं कालनेमिनम्‌ । 
धिविक्रमं विक्रमन्तं नारायणमिवापरम्‌ ॥५९.५ 
ऊचे-ङेचे पग उठाकर आक्रमण करते हुए उस कार- 


हरिवंशपवं ] 


सप्तचत्वारिंशो ऽध्यायः 


१५७५ 


मेमिको समस्त प्राणिर्योने व्रिविक्रमरूपसे तीनों लोरकोको 

नापनेे स्थि पैर व्दति हुए दूसरे नारायणे समान 

देखा ॥५९ ॥ 

सोच्छयन्‌ प्रथमं पादं मारताधूर्णिं ताम्रः 

पक्रमदमुरो युद्धे जआासयन्‌ सवेदेवताः ॥ ६०॥ 
सम्पू देरताओंको जास देते दए उस असुरे जव्र 

युद्धमे अपना पटला कद्रम उटाकर रखा, उस समय हवाके 

सकरेसे उसमे व्र फहरने खो ॥ ६० ॥ 

स मयेनासुरेद्रेण परिष्वक्तः क्रमन्‌ रणे । 


[1 


कालनेमिर्वभौ दैत्यः विप्णुनेव पुरंदरः ॥ ६१ ॥ 
रणभूमिमे विचरते दए उस दानवराजको अयुस्यज 

मयने आगे बट्कर दयते लगा लिया । उस समय मयक्े 

साथ कालनेमि दैत्यक्री वैसे दी ोमा हुई, जसे भगवान्‌. 

विष्णुस देवराज इन्द्र सुयोमित दोतते ह ॥ ६२॥ 

अथ बिव्यथिरे देवाः सव शशक्रपुरोगम।ः । 

दृष्ट्रा कार्मिवायान्तं कारनेमि भयावहम्‌ ॥ ६२॥ 
कालके समान भयंकर कालनेमिको अति देख " इन्द्र 

आदि सव देवता भसे व्यथित दौ उठे ॥ ६२.॥- 


इति श्रीमहाभारते खिरुभागे हरिवंशे हरिवंशपवेणि कारनेमिप्रक्रमणे षट्चत्वारिशोऽध्यायः ॥ ५६ ॥ 


इस प्रफार श्रीमहाभरतके खिरभाग दरिवैशषके न्तत दिशपर्वमे कारनेमिका 
आक्रमणविष्यक छियारीसर्गो अच्यःय परा हुजा 1 ४६ ॥ 


सप्तचतारिंशोऽध्यायः 
काटनेमिका युद्ध ओर प्रभ 


वैराग्पायन उव.च 
दनवश्चापि पिप्रीषुः कालनेमिर्महासुरः, 
व्यवर्धत महातिजास्तपान्ते जख्दो यथा ॥ १९॥ 
वेशम्पायनजी कते है जनमेजय ! जैसे गरमीकर 
अन्तम वर्णक्राल आनेपर मेध व्रदता दै उदी प्रकार 
भहतेनखी महान्‌ असुर कालनेमि दानवोको पुष्ट करनेकी 
इच्छसे बद्ने खगा ॥ १॥ 
बेरोक्यान्तगगतं तं तु दष्ट ते दनवेदवराः । 
उत्तस्थुरपरिश्रान्ताः प्रण्यिवामतसुत्तमम्‌ ॥ २ ॥ 
उसे तीनो लोकम पेखा हुमा देखकर वे सभी दानवराज 
इस प्रकार सदसा उठ खड़े हुए मानो उन्द उत्तम अग्रत मिल 
गया हौ } उस समय उनकी सारी यक्रावर दूर हयो गयी थी ॥२॥ 


ते वीतभयन्तनासा मयतारपुरोगमाः । 
तारकमयसं्रमि सततं जयकाङ्क्षिणः 1 
रेजुरायोधनगता दानवा युद्धकाङ्क्षिणः ॥ ३ ॥ 
वे मग्र ओर तार आदि सभी दानव कालनेमिके आ 
जनिते मय अर चासते रहित हो गये, अतः उस तारकामवं 
संप्राममे निरन्तर विजयकी अभिलपा रखते हए युद्धकी 
आकाह्वुसे रणभूमिमे ख्डेहो गोमा पनेन्तरो ॥३॥ 
अह्लमभ्यस्यतां तेपां व्युदं च परिधावताम्‌ । 
प्रक्षतां चाभवत्‌ प्रीतिदौमवं कानेमिनम्‌ ॥ ७ ॥ 
उस समय अलोका अभ्यास करते ओर व्यूह सत्र 
ओर्‌ दौड़ ठगति हुए उन दैव्योको कालनेमि दानवके 
- दर्शने वदु प्रसन्नता दुई ॥ ४ ॥ 


ये तु त्न मयस्यासन्‌ सुख्या युद्धपुरस्सराः। 
तेऽपि सवभय त्यक्त्वा ढा योद्ुसुपस्थिताः ॥ ५ ॥ 
वहो जो भी मयक्रे मुख्य-मुख्य सेनापति उपसित येः 
वे सभी मय छोड़कर दषं ओर उत्साहे साथ युद्धके चयि 
ट गये ॥ ५॥ 
मयस्तासो वरादश्च हयग्रीवश्च वीर्यवान्‌ । 
विप्रचित्तिखुतः यवेतः खररूस्बाबुभावपि ॥ ६ ॥ 
अरिष्टो वपुस्तु किरोयेष्टौ तथेव च । 
खभौयुश्चामरप्रख्यो वक्रयोधी महासुरः ॥ ७ ॥ 
पतेऽखविदुषः सवं स्वँ तपसि खुनताः 
दानवाः कृतिनो जग्मुः कारनेमिनसुत्तमम्‌ ॥ ८ ॥ 
मयः तारः वराहः पराक्रगी हयग्रीव पिप्रचित्तिकुमार 
दयेत तथा खर ओर लम्ब-ये दो दानव एवं बलिपुत्र अरिष्ट, 
किशोरः, उष्‌ तथा देवता समान तेजस्वी एवं कुरिङतापूर्वक 
युद्ध करनेवास महान्‌ असुर सखर्भानु-ये सभी अख्नवेत्ता ओर 
तप्यामि नियमपूर्वकं सित रहनेवाले विद्वान्‌ ओर कुशल 
दानव उस उत्तम असुर काल्नेमिकरे पास जा पर्हुचे || ६-८॥ 


ते गदाभिश्च शु्वीभिश्चकरैश्च सपरश्वधैः । 


जदमभिश्चाद्िसददोगंण्डशोकेश्च दंशितैः ॥ ९ ॥ 
पटिदोभिन्दिपारङेश्च  परिचेश्वोत्तमायुधेः 


घातनीभिश्च रार्वीभिः रतषघ्नीभिस्तथेव च ॥ ९०॥ 
कारुकल्पेश्च सुसटेः क्षेपणीयेश्य सद्धरः 
युगेयन्ते्य निमुंकैर्गैश्चाग्रताडितेः ॥ १९॥ 
दोर्भिश्चायतपीनांसेः पारः प्रासैश्च मूच्छतिः 
सपेरुलिह्यमानेश्च विस्पद्धिश्च सायकतेः.॥ १२ 


१७६ 


श्रीमहाभारते सिखभागे 


[ हरिवंशे 


जैः प्रहरणीयैश्च दीप्यमननश्च तोमरः! 
विकोरोश्वासिभिस्तीक्षणेः श्ूलैश्च दितनिर्मकैः ॥ १२३॥ 
ते वै संदरप्मनसः प्रगरदीतेचमायुधःः। 
कालनेमि पुरस्कृत्य तस्थु; संग्राममूर्धनि ॥ १७॥ 
वे सव्र हर्षसे उक्छृष्छ ह्ृदयवक़े दानव दानं उत्तम 
आयुध धारण क्रिये, काटनेमिको अगे स्लकर उसके 
सेनापतित्वम युद्ध करनेकरे चियि.संग्रामकरे मुहानेपर ठट गये । 
क्रितने दी दानव अपने चौद ओौर पुष्ट कंधेति युक्त 
हाथेति दी अयुर्धोका कामल्ते थे तथा ब्हुतेरे दै भारी 
गदा, चक्रः फरसा, पर्वतेकफि समान िलार्थोकी व्रदी-बड़ी 
चदान) वज्र आदिके आघ्रातसे द्ूटकर गिरे हुए शिखखण्डः 
प्टिदा, भिन्दिपाटः परिघः, अन्यान्य उत्तम युधः संहार 
करने समर्थं यर सेकडकि प्राण लेनेवाटी बड़ी भारी तोर्प 
कालके समान भयंकर मूसलः छेपणीय ( गुले आदि ) 
मुद्रः युग ( जुभा ), खुले हुए यन्त, जिसके रेको दथीडसे 
पीटकर तेज क्रिया गया दो एेसी अर्गला ( डंडेद्य ), कैठे 
हुए पाश, प्रा (भाल); जीभ च्प्रख्पति हए सप 
तीध्रगततिते डश्यकी ओर वद्नेवाले बाणः प्रहार करने योग्य 
व्र, दीप्तिमान्‌ तोमरः, नंगी तीखी तलवार ओर तेज क्रिये 
हुए चमक शूल आदि अल्र-शरखसि सम्पन्न हो युद्धके च्य 
ट गये ॥ ९-१४॥ 
सा दीत्तशखप्रच्रय दैत्यानां शुद्धभे चमूः । 
चौरनिमीलितनक्षचा  सधनेवाम्ुदागमे ॥ १५॥ 
जदो चमकते हुए शरेष्ठ अख्र-रश्न विद्युत्की भति 
प्रकाित हो रदे थे, वह दानवसेना वर्षाकाल चपि हुए 
नक्ष्नवले मेष ओर पिजकीते युक्त आकरादाके समान रोभा 
पारदीथी॥ १५॥ 
देवतानामपि चमू रुसख्े शकपालिता 1 
दीप्ता श्ीतोष्णतेजोभ्यां चभ्द्रभास्करवर्चंसा ॥ १६॥ 
दधर चन्द्रमा ओर सूर्यकी प्रभासे उद्धासित 
तथा उनक्रे रीतछ ओर उष्ण तेजके दवारा देदीप्यमान 
हुई वह इन्द्रपाटिति देवसेना भी अनुपम शोमासे सम्पन्न 
हरदी थी॥ १६॥ 


वायुवेगवती सौम्या तारागणपताकिनी । 
तोयदाविद्धवसखना ्रहनक्षत्रह्टासिनी ॥ १७॥ 
यमेन्द्रधनदैर्णुता वर्णन च धीमता। 
सम्प्रदीप्ताग्निपवना नारायणपरायणा ॥ १८॥; 
सा समुद्रौघसदशी दिव्या देवमदाचमूः । 
रराजास्वती भीमा यक्षगन्धर्वदालिनी ॥ १९ ॥ 
वायुर समान वेगवती तथा सौम्य भावते सम्पन्न 
देवतार्ओकी वह दिष्य प्वं विशाल सेना _ तारागर्णोको 
पताकास्पर्मे धारण करती थीः मेपमय वन्नेसि आस्टन थी 


तथा ग्रह ओर ननन मानो उसके शुभ्र दास ये [र्यमः 
इन्द्र, कुवेर ओर बुद्धिमान्‌ वर्णक द्वारा उसकी राकी 
जारी थी | उस्म प्रकाशमान अग्नि ओर वायुदेव भी 
विद्यमान ये । वह्‌ भगवान्‌ नारायणे आधित थी । देखन 
उमढे हए समुद्रकी अगाध जलराशिक्रे समान जानं पडती 
थी | विविध प्रकारे अघखरेसि सम्पन्न दोनेके कारण 
भयंकर प्रतीत होती थी तथा यश्च ओर गन्धर्वं उसकी शोमा 
वरदा रदे थे ॥ १८-१९॥ 


तयोश्चम्बोस्तदा तत्न वभूव स समागमः । 
द्यावापृथिन्योः संयोगो यथा स्याद्‌ युगपयंये ॥ २०॥ 
जै प्रज्यकालम बुलोक थर पृथ्वी--दोनौँ एक दूसरे 
करते दै, उसी प्रकार उन दोर्नौ सेनाम उस समय वरहो 
गहरी भिदंत हई ॥ २० ॥ 
तद्‌ "युद्धमभवद्‌ घोरं देवदानवसंकुलम्‌ । 
क्षमापरक्रममयं दर्पस्य विनयस्य च ॥२९१॥ 
देवताओं ओर दानवो भरा हुआ वह युद्ध वड़ा 
भयंकर हो चल । एक ओर उदारतापूर्ण क्षमा थी तो 
दूसरी ओर करूरतापूरण पराक्रम | यद दर्पं ओर विनयका युद्ध 
था॥ २१॥ ि 
निश्चक्रमुर्वछाभ्यां तु ताभ्यां भीमाः सुरासुराः । 
पूचौपसभ्यां संरब्धाः सागसभ्यामिवम्बुदाः ॥ २२॥ 
उन दोनों सेनाओसि रोम भरे हए मयंक देवता ओर 
असुर निकले ( तथा युद्धके व्यि अगे वरदे); टीक उसी 
तरद जैसे पूर्वं ओर पश्चिमके समुद्रेति क्षुग्ध मेघ प्रकट 
हुए दौ ॥ २२॥ 
ताभ्यां वलाभ्यां संह ्ास्चेसस्ते देवदानवाः। 
वनाभ्यां प्व॑तीयाभ्यां ध्रुष्पिताभ्यां यथा गजाः ॥ २६ ॥ , 
उन दोर्नो सेना्थेसि दं ओर उत्वाह् भरे हए देवता 
ओर दानव युद्धके ल्ि निकटे, मानो पलति सुद्ोभित 
दो पर्वतीय वरसि व्रहुसंख्यक हाथी निकल अये हौ ॥ २३॥ 
समाजघ्युस्ततो भेरीः शद्भान दध्मुश्च नैकशः। 
स शब्दो चां भुवं चैव दिदाश्च समपूरयत्‌ ॥ २४॥ 
उस समय दोनो देकर सैनिक वार्ार नगादे पीटने ओर 
सद् चजाने लो । वार्घोका वह तुमुल नाद परथ्वी, आकादा 
तथा सम्पूर्णं दिरार्ओमिं भर गया ॥ २४॥ 
ज्याघाततलनिघोंषो धयषां क्रजितानि च. 
दुन्दुभीनां निनदतां दैत्यानां निदधुः स्वनान्‌ ॥ २५॥ 
परत्यखा खीचनेसे जो शब्द होता था, धनुर्ोकी जो 
टंकार-ध्वनि दोती थी तथा वजती हुई दुन्दुभि्योका जो 
गम्भीर नाद होत्रा था, उन सवने मिलकर दैत्यो गर्जन- 
तर्जनकी जावानको चषा दिया ॥ २५॥ 


॥ 
[0 


कै 


रिपदाप्यं 1 


सप्तचत्वारि दहो ऽध्यायः 


ही 


१७७ 


~ वव वव~ ~ 


तेऽन्योन्यपभिसम्पेतुः पातयन्तः परस्परम्‌ । 
व्रभव्ुबीटुनिर्कहन्‌ उन्दमन्ये युगरुत्सवः ॥ २६॥ 
वे देवता गौर दानव एक दूसरेपर द्ट पदे ओर अपने- 
अपने प्रतिद्नद्रीको धरादाथी कसे को † इन्दरयुद्धकी इच्छा 
रखनेवाले अन्यान्य योद्धार्भेनि अपनी भुजार्थोद्वार शतुर्भोकी 
भुजे चोड ड्द ॥ २६॥ 
देवतास्त्वशनीरघोसः परि्घारवोत्तमायसान्‌ । 
ससर्जुराजौ निखिश्ान्‌ गदा गुर्बी्च दानवाः ॥ २७॥ 
देवताटोग युद्धम भयंकर वज्र तथा अच्छे टिके वने 
हुए परिविका प्रयोग करने गे ओर दानव उनक्रे ऊप्रर 
तलवार र मारी गदा चटने स्रो ॥ २७ ॥ 
गदानिपातैर्भग्नाङ्गा चणैश्च शकरीरताः। 
परिपेतभरशं केचिनन्युघ्जाः केचित्‌ ससर्जिरे ॥ २८॥ 
गदा्ओकरे आघातसे कितने दी योद्धाओकि अञ्ज चूर- 
चूर हो गयेः करितनेक्रि गरीर वार्णोकी चोट खाकरटुकडे- 
ट्क्डे दो गयः क्रितने ही गहरी चो्से पाड खाकर 
प्रध्वीपर गिर पदे ओर कितने दही पीठ ऊपर क्रि ओष 
मुद ढद्क गये ॥ २८ ॥ 
ततो स्थैः सतुरगर्विमानेश्चा्नुगामिभिः। 
समीयुस्ते तु संरव्धा रोपादन्योन्यमाहये ॥ २५.॥ 
तदनन्तर उस समराङ्गणम रोपावेसे भरे दए उनय- 
पप्करे सैनिक घोडे जते हुए रथो अद ्षीघगामी विमार्नौ 
द्वारा आगे वदट्कर एक दूससेमे भिड़ गये ॥ २९ ॥ 
संवर्तमानाः समरे विवर्तन्तस्तथापरे। 
रथा रथैर्निरुष्यन्ते पद्(ताश्च पदातिभिः ॥ ३०॥ 
रणभूमिमे करिनने दी रथी ओर वैदल योदा ग्तुके 
सामने आति ओर कितने दी पीठ दिखाकर भागने लभते 
ये | उस समव उन रथि्रोको रथी ओर वैद्यो कैद 
योद्धा सामने आकर रोक लेते ये ॥ ३० ॥ 
तेषां स्थानां तुमुलः स राब्दः दाब्दवादिनाम्‌ । 
वभूवाथ प्रसक्तानां नभसीव पयोमुचाम्‌ ॥ ३९॥ 
घरघरादृटकी आवाजके साथ अगे वदृनेवाले, उन 
रथियोके रर्थोका तुमुल नाद आकाशमे परस्पर टउकरानिनटे 
बादर्छकी गड़गड़ादटके समान जान पडता था ॥ ३१ ॥ 
वभचिरे रथान्‌ केचित्‌ केचित्‌ सम्मूदितास्थैः। 
सम्बाधमेके सम्प्राप्य न रोकुश्चलितं रथाः ॥ २२ ॥ 
कितने दी र्थोनि विपक्षियेकरि रथोको तोड़ उ ओर 
भतन ही शुक्तके रथो रदे जाकर धूम भिक गये। 
दूरे ब्रहूतसे रथ अन्यान्य रथोदारा मार्ग अवरद्ध दो जनेके 
कारण अगि यद्नेमे असमर्थं दो गये ॥ ३२॥ 


अन्योन्यस्थाभिसमरे दोस्यमुरिक्तप्य दर्पिताः! 
संहादमानाभरणा जच्युस्तत्रासिचर्मिणः ॥ २२३ ॥ 
क्तिनि दी दर्पं भरेहुए योद्धा समयाद्चणमे एक दृसरे 
के द्रारीरको अपनी दोर्नौ भुजोओमि दूर दृयाकर अगे बद 
जति ये| वरहो ढाल भोर तख्वार टि हृ ठैनिक जव शतु 
पर्‌ प्रहार कसते येः उस समय उनके आभृप्रण श्चंछृत हो 
उठतेये॥ ३३॥ 
असैरन्ये विनिर्भिन्ना रक्तं वेमुर्ह॑ता। युधि । 
क्षस्ज्ञकनां सद्शा जखूद्‌ानां समागमे ॥ ३५ ॥ 
दृसरे बुति सिपाटीः जो युद्धस्थले मदि जक्रर अर्ल 
से विदीर्णेहो गये ये, उसी प्रकार रक्त वमन करते ये, जेते 
वर्पाक्रा्म मेर्घोकी घय चिर अनिषर वर्प करनेवठे बादल 
जटकी धारा गिरते ई ॥ ३४ ॥ 


तदखरादश्रयितं क्िपोच्छिप्तगदाविलम्‌ । 
देवदयनवसंधुन्धं सकुलं युदखमावभौ ॥ २५॥ 
वह संग्राम अल-र्रसि रथ गया था, दोनो ओरसे 
फेकी ओर उदछाटी जानेवाखी गदाओसि मलिन दरहा थातथा 
देवता ओर दानवेकि धौते व्याप्त होकर अत्यन्त भयानक 
प्रतीत दोता था ॥ ३५ ॥ 
तद्‌ दानवरमहमिघं देवायुधतडित्परभम्‌। 
अन्योन्यवा(णव्ं तद्‌ युद्धं दुर्दिनमावभौ ॥ २६॥ 
वई युद्ध एक दुर्दिनके समान जान पडता या } उस्म 
दानव ही महान्‌ मेघोकीं घटके समान धिर जयि ये, देवता. 
के चमकीठे अल्ल-जखर विदयुत्‌की-सौ प्रमा चिखेर रहे ये तथा 
दोनो दलकी ओससे एक दृस्ययर जो वबाणोक्री ब्रौार्‌ हो 
रही थी; वदी मानो वर्पा थी | ३६ ॥ 
पएतसिन्नन्तरे क्रद्धः काठनेमिर्महासुरः। 
व्यवैदध॑त ससुद्रौषेः पूर्यमाण शवाम्तुदः ॥ २७॥ 
इसी दीचमे कुपित हुमा महान्‌ असुर कालनेमि समुद्रकी ' 
जलरागिते परिप दौकर वद्नेदटि मेषे समान अपना 
विदा स्प प्रकट करने खण || ३७ ॥ 
तस्य॒ विद्युखरपीडाः पर्द्रारानिवर्पिणः। 
गाते नगक्षिरःग्रल्या विनिष्ेयुर्वलाहकाः ॥ २८ ॥ 
मसत कप्‌ व्रिजखीके चल आभेण धारण क्रिये, प्रज्वलित 
वञ्चक वर्षा करगेवदटे पर्वतदिखरोे समान विशाटकराय 
वादल उसके शरीस्से टकराकरर चूर्चूर दौ जति 
थे ॥ ३८ ॥ 
क्रोधान्निःर्वसतस्तस्य भ्रभेदस्वेदवर्पिणः । 
साग्निनिप्पेपपवना मुखानिश्वेरुरयिपः ॥ २९ ॥ 
जय वह क्रोधयपूरवक वी सौम खचिता या, उस्र छमय 
उखकी भर्मिं वर पढ़नेसे पठीनेकी भूदं दमक्ने त्गती थी 


१७८ 


श्रीमहाभारते खिलभागे 


[ हरिवंशे 


ओर मृखसे वज्र॒ तथा प्रचण्ड वायुसे युक्त आगकी ल्पे 

निकल्ती रहती ्थी ॥ ३९॥ 

तिर्यगृध्यं च गगने वल्रधुस्तस्य वाहवः। 

पञ्चास्याः रप्णवपुपो लेलिहाना इवोरगाः ॥ ४०॥ 
उरुकी भरुज आकाशम तिरी ओर ऊपरकी दिशम 

चने गी । वे एसी जान पड़ती थी, मानो पोच मुखवाले 

चाके सपं अपनी जीम ट्पल्पा रहं द ॥ ४०॥ 


सोऽखजर्वहुविधेधवुर्भिः हि परैरपि । 
दिव्यैसकाश्चमावत्रे पर्वतैरुच्िप्रतैरिव ॥ ४१॥ 


जसे उचि पर्वत आकारको घेररेतेरईैः उसी प्रकार 
उसके चलये हए नाना प्रकारे दिव्य अलर-शखः धनुष 
अओौर परिघोने व्योम-मार्गकौ ढक दिया ॥ ४१॥ 
सोऽनिलोद्‌धूतवसनस्तस्थौ संश्रामसूधनि । 
संध्यातपम्रसततक्िखः साध्विर्मरुरिवापरः॥ ४२॥ 
वह युद्धके मृहानेपर खडा थाओर वायुके वेगसे 
उसके वल उपरकीं ओर फस रहे थे 1 उस समय वह 
संध्याकालकी धूपे व्याप्त रिखसवाछे प्रकारयुक्त दुसरे मरके 
समान सोभा पाताथा॥ ४२॥ 
उरुवेगप्रतिक्षिपेः शेरम्धङ्गाश्रपादपेः। 
अपातयद्‌ देवगणान्‌ वज्रेणेव महागिरीन्‌ ॥ ४३ ॥ 
अपनी जोधोके वेगसे फँके गये शैल-शिख्यो ओर वडे- 
बढ़ द्ृक्षोद्वारा वह देवतार्थोको उसी तरह धराश्रायी करने 
लगा; जैसे इन्द्रे वच्रसे महान्‌ पर्तको परथ्वीपर भिरा 
दियाथा॥ ४३॥ 
वाहुभिः शसखरनिखिदोदिखच्भिन्नरिसेरसखः । 
न शोङुश्चलितंँ देवाः कालनेमिदता युधि ॥ ४४॥ 
उस युद्धम काटनेमिक्री मार खाकर घायल दए देवता 


चलने -किरनेकी भी शक्ति खो वटे । उसकी भजामि आघात- 


से तथा शखर एवं खड्धोकी चोरसे उनके मस्तक ओर वक्षः- 

स्थल छिन्न-भिन्न हो गये ये| ४४ ॥ 

मुष्िभिर्निंहताः केचित्‌ केचिच षिदखीकृताः। 

यक्षगन्धर्वपतयः पेतुः सह मदोररौः ॥ ४५॥ 
क्रितने ही यक्नः गन्धर्वराज ओर वहे-बडे नाग उसके 

मर्ोकी मारसे मर गये ओर कितने दी विदीर्ण होकर प्रथ्वी- 

पर गिर पदे ॥ ४५ | 

तेन धिच्रासिता देवाः समरे कारनेमिना । 

न शोङर्यत्नवन्तोऽपि भतिकं विचेवसः ॥ ४६॥ 
उस युद्धम काल्नेमिने देवताओंको इतना भवभीत कर 

दिया किवे अपनो युधबुध खो वैडे ओर ब्रूत यत्न करके 

भी उसका कोद प्रतीकार न कर सके ॥ ४६ ॥ 


तेन शक्रः सदस्राक्षः स्तम्भितः श्रवन्धनैः । 
प्वतगतः संख्ये चलितुं न श्द्याक ह ॥ ४७॥ 
उसने रणमूमिमै ेरावतपर व्रेठे हए सदखनेत्रधारी 
इन्द्रको वार्णोके घन्धनमे बोधिकर्‌ सन्ध कर दिया । वे वहसि 
चल्नेमे भी असमर्थ हो गये ॥ ४७ ॥ 
निर्जलाम्भोदसद्डो निर्जखाणेवसप्रभः। 
निव्यीपारः छतस्तेने विपाशो वरूणो सधे ॥ ४८॥ 
समराद्धणर्मे काल्नेमिने वरुणका पार छीनकर उन्द 
उससे वञ्चित कर दिया; अतः उनका युङेपिपयकर सारा 
व्यापार ठप हो गया | वे निरज ब्राद ओर धिना पानीके 
समुद्रकी भोति श्रीहीन दो गये ॥ ४८ ॥ 
रणे वैश्रवणस्तेन परिधेः काटरूपिभिः। 
व्यरपट्ोकपालेदास्त्याजितो धनदुक्रियाम्‌ ॥ ४९ ॥ 
उस रणक्षेत्रे उसके कार्यी पररिर्धोकी मार खाकर 
ठोकपाटेश्वर कुवेर विखाप करने चमो | उसने उनसे धनाध्यक्ष 
कुवेर कार्येका वल्पूर्वक त्याग करा दिवा ॥ ४९ ॥ 
यमः सर्व॑हरस्तेन दण्डप्रहर्णो रणे। 
याम्यामवस्थां समरे नीतः स्वां दिशमाविरात्‌॥ ५० ॥ 
सत्रके प्राण लेनेवाले दण्डधारी वमको भी उसने रणभूमि- 
म याम्यदशा ( अचेतनावस्या ) को परहुचा दिया; सतः 
वे भयमीत होकर अपनी दक्तिण दिने घुस गये ॥ ५० ॥ 
ख उोकपालायुत्सा्य छत्व तेर्पा च कर्म तत्‌ । 
दिक्षु सवौखु दें स्वं चतुधौ विदधे तदा ॥ ५१॥ 
इस प्रकार समस्त ल्येकपार्छेको दूर भगाकर उसने उन 
सवके कार्यका सम्पादन अपने हाथमे ले लिया ओर समरणं 
दिश्चार्थ्म स्थापित करनेके लि अपने रीरको चार प्रकार 
कावना लिया ॥५२१ ॥ 
स॒ नक्ष्रपथं गत्वा दिव्यं खभोलुदितम्‌ । 
जहार रक्ष्मीं सोमस्य तं चास्य विषयं महत्‌ ॥ ५२॥ 
उसने राहुके दिखाये हए दिव्य नक्षत्रपथमे जाकर राजा 
सोमकी राजलक्ष्मी तथा उनके विश्चाठ राग्यका भी अपहरण 
कर छया ॥ ५२ ॥ 
चाख्यामास दीप्रं खग॑द्वारात्‌ स भास्करम्‌ । 
स्ययनं चास्य विषयं जहार दिनक च ॥ ५३॥ 
उसने उद्दीप्त किरणोवाटे सूर्यको सखर्गद्वारसे हय दिया 
तथा अथनसद्ित उनके सारे राज्य ओर दिन-सम्बन्धी कर्मको 
भी उनसे छीनकर अपने अथिकारमे कर ल्यि। || ५३ ॥ 
सोऽचि देवसुखे दष्ट चकारात्मसुखे खयम्‌। 
वायं च तरसा जित्वा चकारात्मवश्चानुगम्‌ ॥ ५४ ॥ 
काल्नेमिने अग्निको देवता्ओकि मखमे रिथत देख 


दरिवंदापर्वं } 


खयं व्मूर्क उन्द अपने मुखम स्थापित किया ओर वायुको 
भी वेगसे पराजित करफे अपनी अश्षक्रे अधीन कर 
च्या ॥ ५४॥ 
ससमुद्राः समानीय सवौश्च सरितो वरद्‌ । 
चकारात्मवशे चीयौद्‌ देह मूला सिन्धवः ॥ ५५॥ 
समु्रोहित सम्पुर्ण सरितार्ओंकौ ब्पूर्वकं ठे आक्र 
काल्नेमिने अपने पराक्रमसे उन सवको वर्मे कर लिया । 
समस्त सागर उसे शरीरर्प हो गये थे ॥ ५५] 
अपः खवदगाः कृत्वा दिविजा याश्च भूमिजाः 1 
स्थापयामास जगतीं सखुयुप्रां धरणीधरे; ॥ ५६॥ 
उसने आकाश ओर प्रथ्वीके जछको अपने वर्म करके 
उसके ऊपर पवर्तौदासा सुरक्षित पथ्वीको स्थापित 
क्रिया ॥ ५६॥ 
स॒ सख्वयम्भूरिवाभाति महाभूतपति्महान्‌ । 
सर्वलोकमयो दैत्यः सर्वलोकभयावहः ॥ ५७ ॥ 


यवस्य 


ककत 


अश्टचत्वारिश्यो ऽध्यायः 


१७९ 


क्वि 
०११००००१०१५.०५७ 7 


समस्त खोकोको भय देनेवाला वद महान्‌. दैत्य प्रच 
मदामूर्तोका अधिपति एवं सर्वंलोकरमय होकर स्वयम्भू. मद्या 
कै समान सोभापाने ल्णा ॥ ५७ ॥ 
स॒ लोकपाङैकवयपुश्चन्द्रसूर्यरहात्मवान्‌ । 
पावकःनिखखंघातो रराज युधि दानवः ॥ ५८ ॥ 

उस युद्धस्थल्मे दानव कालनेमि एकमात्र सख्यं द 
मस्त लोकपा रूप्मे प्रतिष्ठित हुमा था । चन्द्रमाः सुं 
ओर अन्य अ्रह सवके रूपमे उसका शरीर डी काम. कर रहा 
था | अगि जर वायु भी उसके शरीर्‌ वन गये ४ दस 
प्रकार उसकी बद्धी शोभा हो रदी थी ॥ ५८ ॥ 
पारमेष्ट्य सितः स्थाने रोका प्रभवाप्यय । 
तुष्टुवुस्तं दैत्यगणा देवा इव पितामहम्‌ ॥ ५९॥ 

समस्त खेरकोकी उत्पत्ति ओर प्रख्यके कारणभूत बद्य- 
लोकम स्थित होकर बह ब्रह्मा बन वैडा था | उस समय 
दैत्यगण उक उसी तरद स्वति करते येः जैसे देवता ब्रह्या- 
की क्से ॥५९॥ 


इति श्रीमदामारते खिलूभागे दरिं हरिवंदापव॑णि आश्च्प॑तारकामये सप्तचत्वारिशोऽध्यायः ॥ ४७ ॥ 


दस प्रफार श्रीमदाभारतके दखिरमाग दिके अम्तमत हखिंशपवमे आश्चर्यतारकामय 
संग्रामबिषयक संतारीसर्वो अध्याय पूरा हुमा ॥ ४७ ॥ 


4 


अष्टचत्वारिरोऽध्यायः 
कारनेमि ओर भगवान्‌ षिष्णुका संवाद, श्रीवरिष्णुद्रारा कारनेमभिका वध 
तथा देवताओंको आ्ास्तन देकर ब्रह्मलोकको प्रान 


वैद्यम्पायन उवाच 
पञ्च तं नाभ्यवर्तन्त विपरीतेन कर्म॑णा! 
वेदो धर्मः श्चमा सत्यं श्रीश्च नारायणाश्चया ॥ ९ ॥ 


वैशम्पायनजी कहते है--जनमेजय ‡ कल्नेमिके 
द्वारा शाल्नविपरीत कर्म किये जानिके कोएण वेदः धर्मः क्षमाः 
सत्य ओर भगवान्‌ नारायणके आश्रये रहनेवारी रकष्मी-- 


ये पचि उस पास नदीं अयि ॥ १॥ 

स तेपामदुपस्थानात्‌ सक्रोधो दानवेदवरः। 

वेष्णवं पदमन्विच्छन्‌ ययौ नारायणान्तिकम्‌ ॥ २ ॥ 
उनके उपस्ित न हौनेसे दानवराज काल्नेमिको बड़ा 

, क्रोध हुआ ] वह भगवान्‌ विप्णुके पद्‌ एवं वैक्ुण्ठधामको 

अपने अधीन कर्‌ लेनेकी इच्छसे उन श्रीनाराय्णदेवके 

निकट या ॥ २॥ 

- ` सष ददश _ सुपर्णस्थं राहू्चक्रगदाधरम्‌। 

दानवानां विनाशाय श्रामयन्तं गदां शुभाम्‌ ॥ ३ ॥ 
उसने देखा--शद्ध, चक्र ओर गदा धारण करनेवाले 


भगवान्‌ नारायण गरुडकी पीटपर विराजमान दै ओर 
दानर्वोकरा विनाश करनेके ल्ि अपनी कस्याण्मयी कौमोदकी 
गदाको घुग रहे ई ॥ ३॥ 
सजलाम्भोदसदरां विदयुत्सटशवाससम्‌ । 
स्वारूढं खर्ण॑पनादधं हिखिनं कादयपं खगम्‌ ॥ ४ ॥ 
उनके श्रीञ्जोकी कान्ति सज जख्धरके समान च्याम 
३ । उनपर विचुत्करी-सी दीतिसे दमक्ता हा सेमी 
पीताम्बर शोभा पा रहा है । वे भगवान्‌ विष्णु जिन कयप- 
कमार आकाशचारी गरुड़पर आरूढ है उनके दोनो पंख 
सुवणंके समान सुशोभित ईह ओर्‌ मस्तकपर शिखा शोभा 
देरदीदै॥४॥ | 
दष्टा दैत्यत्रिनाशाय रणे सस्थमवस्थितम्‌ । 
दानवो विष्णुमक्षोभ्यं वभापे श्चुज्यमानसः ॥ ५ ॥ 
जिन्दं कोई भी क्षोभमे नदीं डाल सकता, उम भगवान्‌ 
विष्णुकरो दैत्योकि विनादाके द्वि रणक्षिचभे सखस्यभावसे खदा 
देख दानव काल्नेमिका हृदय भसे मर गया ओर वट्‌ 
स प्रकार कहने स्गा--] ५॥ | 


* ~» ~< ~. 


१८० 


~~~ ~~~ ~~~ 


अयं सख रिपुरस्माकं पूर्वां दानवर्पिणाम्‌ । 

अर्णवावासिनश्चैव मरधोर्वै कैटभस्य च ॥ ६॥ 
ध्यदी हमारे पूर्ववतीं दानवश्रर्योकरा तथा एका्ेववासी 

मधु एवं कैटभका सुप्रसिद्ध यातु दै ॥ ६ ॥ 

भयं स विग्रहोऽस्माकमद्ाम्यः किल कथ्यते । 

येन नः संयुगेप्वायया वहवो दानवा नाः ॥ ७ ॥ 
(कहते हः यही हमलोर्गो्ना बद्‌ मूर्तिमान्‌ विग्रह ( युद्ध ) 

हैः जिते तान्त करना सर्वथा असम्भव है } इसने अनेक 

संग्रामं हमारे बरहुत-चे पूर्वज दानर्वोका वध क्रिया है ॥ ७॥ 

अयं स निघंणो युद्धेऽखी वाखनिरपत्रपः। 

येन॒ दानवनारीणां सीमन्तोद्धरणं कृतम्‌ ॥ ८ ॥ 
व्यद चही निर्दयी दै, जो युद्धमे अघन धारण करक 

बाखकोकरे समान निर्लल होता है| इसीने दानचनारियेकर 

सीमन्तका सौमाग्यचिह सदार व्यि उतार दिया है ॥ ८ ॥ 

अयं स विष्णुर्देवानां वेक्ण्टश्च दिवौकसाम्‌! 

अनन्ते भोगिनामप्ु खयम्भूश्च सखवयम्भुवः॥ ९ ॥ 
'्यही वह देवताओका पक्षपाती विष्णु ओर खर्गवासियोका 

वेकुण्ठ है । यही जरम रहनेवलि स्पौका अनन्त ओर खयम्भू 

ब्रह्चाका मी ब्रह्मा रै | ९॥ 

अयं स नाथो देवानामस्माकं विप्रिये स्थितः| 

अस्य क्रोधेन मता दहिरण्यकरिपुर्हतः ॥ १० ॥ 
ध्यही वद देवता्ओंका रक्षक हैः जो खदा दमाय अग्रिय 

करनेमे ही र्गा रहता है । इसीकरे महान्‌ क्रोधसे दैत्यराज 

हिरण्यकदिपु मारे गये ये|} १०} 

अस्यच्छायां समासाय देवा मखमुखे सिताः 1 

आज्यं मदर्पिभिशत्तमय्ुवन्ति जिधा हुतम्‌ ॥ १९॥ 
(सीकरी छायाम रहकर देवता यज्ञे मुखमभागमे दित 

हो महर्पिरयोद्यारा तीन प्रकारसे हवन करे अपित क्रिये गये 

हविष्यका उपभोग करते ई ॥ ११ ॥ 

अयं स निधने हेतुः सर्वेषां देचविद्धिषाम्‌ 1 

यस्य॒ तेजःप्रवि्टानि कुडान्यस्माकमाहये ॥ १२॥ 
ध्यही समन्त देवद्रोदी दैत्योकी सत्यमे प्रधान कारण ३ । 

समरा्गणमे हमरि कितने ही कुर इसके तेजमे प्रविष्ट होकर 

मस्मदहो गये॥ १२॥ 

अयं स किर युद्धेषु खरां त्यक्तजीवितः \ 

सवितुस्तेजसा तल्यं चक्रं क्षिपति श्चुषु ॥ १३॥ 


= 
१. अन्न होमः प्रधान होम भौर प्रायश्चित्त होम-ये होमके 


तीन भ्रकार दै! कुछ लोग निय, सैमित्तिक भौर काम्य मेदस 
उसे तीन प्रकारका वतति दं | ङुछ दूरे विद्वान्‌ आदवनीय, 
गा्पत्य तथा दक्षिणाग्नि रूप उपापिक्रे मेदसे उसकी ननिविधताका 
भ्तिपादन करते दै । 


छ्षीमहाभारते स्िकभागी 


| हरिवंशे 


(कहते है यदह वदी सुविख्यत विष्णु दैः जो युम 
देवताओं छिये अपना जीवन निदछठावर क्रिये रहता दै । यद 
दातुभपर सये समान तेजसी चक्र चलाया करता दै ॥ १३॥ 
अयं स कालो दैत्यानां काठभूते मयि स्थिते । 
अतिक्रान्तस्य कालस्य फं प्राप्स्यति दुर्मतिः ॥ ९४ ॥ 

ध्यही वह द्यो का काक दै, परं आज इसका भी कार 
होकर मै खडारहू | मेरे रहते दए दी यह दुद अपने 
पूवं काकी करूतोका फल पयेगा ॥ ६४ ॥ 
दिष्येदानीं समक्षं मे विष्णुरेष समागतः । 
अद्य मद्वाणनिष्पिषो मामेव प्रणम्निप्यति ॥ १५॥ 

भ्सोमाग्यकरी व्रतत है क्रि इस समय यद्‌ विष्णु मेरे 
सामने आ गया | आज यह मेरे वाणि पिंस्त जायगा ओर 
धरतीपर गिरकर मुच्ये दी प्रणाम क्ररेणा | १५ ॥ 
यास्याम्यपचिति दिष्टया पूर्वषामय संयुगे । 


इमं नारायणं दहत्वा दानवानां भयावहम्‌ ॥ १६॥ . 


क्िपमेव वधिष्यामि रणे नारायणाधितान्‌ } 
आज समराद्धणमे दानवोँको भय देनेवाटे इस नारायणक्रा 
वध करके सीध दी इसके आश्रित रहमेवले देवतार्ओंका 
भी संहार कर उरगा । पे करे अपने पूर्वजोके ऋछणते 
उरण हो सक्रुगा, यह्‌ मेरे चिवि बडे सौभाग्यकी ब्रात्त 
होगी ॥ १६९ ॥ 
जात्यन्तरगतो ऽप्येष सधे वाधति दानवान्‌ ॥ १७ ॥ 
पपोऽनन्तः पुरा भूत्वा पद्मनाभ इति स्तः 
जघनिकार्णवे घोरे ताद्ुभौ मधुकैटभौ! 
विनिवेद्य स्वके ऊस निहतौ दानवेश्वरौ ॥ १८॥ 
५८ मत्स्यः वराह आदि ) दूसरी-दूरी योनिर्योमि जन्म 
धारण करफे भी यह युद्धे दानवोको दी सताया करताहे । यथपि 
य अनन्ते ( आक्रायकी भोति असीम एवं व्यापक ) है तो 
भी. पूर्बुकाल्मे मूतिमान्‌ होकर प्रकर हु | उस समय इसकी 
पञ्चनाम नामे प्रसिद्धि दुद । शने श््वेकर एकापेवमे 
विचरनेवले दोनो भाई दानवरान मधु ओर कैटभको अपनी 
जोधपर सुलकर मार डाल था | १७-१८ ॥ 
द्विघाभूनं वयुः कृष्वा खिदाधं नरसंस्थितम्‌ । 
पितरं मे जधानैको हिरण्यकररिपुंः पुसा ॥ १९॥ 
‹इसीने पूर्वकारमे आधे नर यर आष सिंहके रूपमे 
दो प्रकारका रीर धारण करफे करल दी मेरे पिता 
दिरण्यकटिपुका वध क्रिया था] १९॥। 
दयुम गैमधत्तेममद्ितिदैवतारणिः } _ .. 
यद्वकारे वल्ते्यां वै छृत्वा चामनरूपताम्‌ 1 
जीँ लोकानाजदहारेकः क्रममाणस्िभिः कमै; ॥ २०॥ 
भ्ञो देवतारूपी अग्निको प्रकट करनेके च्वि अरणिकरे - 


, 


हसि्वरापर्व 1 


स 4० ००५ 0 


सप्त्वादिद ऽध्यायः ५८ 


५ 


नि षी ५ 
# # 


ममान ठन सदिति द्र्य दुभ सरमे स्य दम पारणरगिया 
था | समं विरि यक्चके समय लप्रनेको वागनस््प 
प्रमदे करः आया | उम समय द्वमन अकले शी तीन पर्मधि 
तीनो घरक नापकर बरन्छिं अधिद्नरसे रीन 
न्प] २० ॥ 
भूयस््विदान समरे सम्प्राप्ते तारकामये । 
मया स्ट समागम्प्र सद देवैर्विनद्कष्यति ॥ २१ ॥ 
ध्यव पुनः टम समगर इस तारकामय संप्रामक्रा अवेसर्‌ 
प्रपि नैपर इसने पदार्पण करियादः रितु अव्र मेरे साथ 
भिरकर यट देवतार्थमदित नष्ट हो जायगा! ॥ २१ ॥ 
स प्वपुफ्त्या ब्रहुधा क्षिपन्नासयणं रणे । 
वाभ्भिररतिरूपाभियुंद्धमेवाभ्यसेचयत्‌ ॥ २२॥ 
पेता कृकर रणभूमिमे भयवान्‌ नारावणपर्‌ अयोग्य 
वचरनद्वाश नाना प्रकारके अप कसते हए. काटनेमिने 
उने खाय युद्ध करना दी पद्‌ किया 1 २२॥ 
क्षिष्यमाणोऽसुयेनद्रंण न चुकोप गदाधरः । 
क्षमावलेन प्रहता ससितं धाप्यम्रवीत्‌ ॥ २२ ॥ 
अपुरराजन कार्नेमिके इस प्रकार अक्षिपं करनेपर 
भी भगवान्‌ गदाधरने उसपर्‌ क्रोध नदी किया; क्योकि वे 
मदान्‌ क्षमावलमे सम्पन्न थे । उन्दनि मुसकरते हुए 
फट--) २३ ॥ 
अस्पद्यसो दत्य स्थितः क्रोधादसददन्‌ । 
हतस्त्वमात्मनो दोः क्षमां योऽचीत्य भाषसे ॥ २४॥ 
्ेत्य | तषमे दपं ओर वल तो बहुत थोद्ठादैः ङ 
त्‌. रोधे करारण्र ओष्टी व्रते वकता हुधा वरहो ख्य है । 
अरे! वक्षसा अथवा सहनक्षीटताका उव्टदन करके चद्‌- 
गरदकर ब्रातं वना रही हैः पसल अपने दी दोपेपति मास 
जा चुकादै।॥ २४॥ 
अधमस्त्वं मम मतो धिरोनत्‌ तन वश्बलम्‌ । 
न तच्च पुरुगाः सन्ति यत्र गर्जन्ति चोपनः ॥ २५ ॥ 
प्मरे विचारे नोन्‌ अधम्‌! तर्‌ इम वाग्वरक। पिएर्‌ 
६।अे [अगो पुरुप नोः केवल लि दष्क त्येग इम 
तर्द गजना क्ते ६ जह चोर पुरप हौ वदं मी 
(मथि व सर्जना करनेमे वे उन उीर पृ्ोद्यारा मार्‌ 
खले जति ‡ ) ॥ २५ ॥ 
अक्‌ त्वां दैत्य पद्यामि पूरं मायंगामिनम्‌ 1 
प्रजापतिरुतं सेतुं फो भिस्वा खस्तिमान्‌ भवेद्‌ ॥ २६॥ 
द्य | मतो देप्रता हूः न्‌ अदने पूर्वहि मार्गपर 
निवल} यसा! व्रनावतिद्ाय नियत का र्‌ मर्दये 
भङ्धपन्े फन सदम र्ट्‌ ष्यकदे ॥ २६॥ 


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+ [1 


लद त्यं नादापिष्यामि देचभ्यापारकर्फम्‌ । 
स्थेषु स्वपु च स्ानेषु स्यापयिप्यामिद्रेवनाः ॥ २७ ॥ 
तू दानव ्ेरर् देवनाम केयं म्व दर स्द् 
तून उन्न अधिक्रार उन्न टिवादैः दननियिआआयभ तय 
धिना कर दा्धगा अर देक्तार्थीदो पुनः अपनै-जपने 
न्ने ( पदं ) परग्धापित कर दगाः | २७ ॥ 
सद्नम्पायन उवाच 
णवं व्रवति तद्‌ बाष्पं सचे श्रीवत्सधारिणि 1 
जष्टास दानवः करोधाद्धस्तश्िकरे च सायुधान्‌ ॥ २८ ॥ 
येद्राम्पायनजी दहते हु--जनमेजय | चक्नः्यर्दम 
श्रीवत्सचिद्ध धारण क्रसेघाे मगान्‌ नासयण जवर उस 
रणभूमिमे एेमी बाते कट रदे भे) उम समय चद्‌ दानव वदो 
प्रोधपूर्वक सने सता 1 उसने वरन दी भफने दार्थ द्थियार 
ठे चयि ॥ २८॥ 
स॒ चालुदातमुद्यम्य स्वीसग्रहणं र्णे 1 
क्रोधाद्‌ द्वियुणर्काक्षो विष्णुं वक्नम्यत्ताडयव्‌ ॥ २५. ॥ 
उसने समर्भूमिमे सव प्रकारके अर्को अष्टम करने- 
वाटी अपनी री श्रुजार्थो उपर उठाकर भगवान्‌. विष्णुके 
चक्षःखलमे श्रहयार करिया 1 उस समव उनकी यर्खिं प्रोधके 
करिण दुरुनी स्टदोरदीर्थी॥ २९॥ 
दानवाश्चापि समरे मयतारपुसेगमाः । 
उद्यतायुधनिरखिध्ता द्र विष्णुमथरद्रवन्‌ ॥ ० ॥ 
मय ओर तार आदि दानव भी रणभूमिं "भगवान्‌ 
विप्णुको उपखित देख दामि भति-भोलहे आयुध ओ. 
तलवार घि उनकी ओर्‌ दीदे ॥ ३० ॥ । 
स ताड्यमानोऽतिवरैदस्यैः सवायुधोधतैः 
न चउचाट रस्युद्धेऽकम््यमान ध्वाचखः ॥ ३१॥ 
सव प्रकारके आयुध लेकर उगत दए अव्यन्ते व्रटशारी 
दैन्य प्रदयर कसेषर भी भगवान्‌ श्रीहरि युद्धभूमिरमे कभी 
कम्पित न ्ौनेवान पवने समान यिचटिन नरी दए 
( अमिखटः भावने सदे र) ३१॥ 
संसक्त खपणेन फटनेर्मा मद्‌(सुरः । 
सर्यप्राणेन मर्ता गदामुद्यम्य चाहुभिः ॥ ६२ ॥ 
मुमोच ज्वलितां योगां संरन्धो गरुडोपरि । 
कर्मणा तेन दैत्यस्य विप्णुरविसमयमागतः ॥ २२॥ 
दतेन मदयन्‌, भतुर्‌ सानमेमि मच्द्मे नाभ उन 
गया उनने अनी श्रनाद्रद्धाय मदी यन्धि दमास्रे प्क 
वियाट गदा उखायी. ज वेमे प्रम्दनति शच ग्म थी 
उस भग्र गद्माओे उन्मने गोप् सरक्ं गद्दुमः प्मषट 
पका 1 उन दयत इर यमम्‌ मग्न भिष्यामे भीय 
विस्मय दुधा ॥ ३२.३३ ॥ 


१८२ 


यदा तस्य खुपणैस्य पतिता मूर्धि खा गदा । 
तदाऽऽगमव्‌ पदा भूमि पशप व्यथितविग्रहः ॥ २४ ॥ 
जिस समय गरड्के-मस्तकपर वह गदा गिरी, उस समय 
वह पंजंक्रि व्ररसे पृथ्वीपर आकर चिकि गये | उनका सारा 
छरीर व्यथित दौ गया था ३४॥ 


सपर्ण व्यथितं दृष्ट्रा श्वतं च वपुरात्मनः । 

क्रोधात्‌ संस्कनयनो वेङ्कण्डश्चक्रमाद्दे ॥ ३५ ॥ 
गरुड़्को गदाके आघातसे पीडित ओर अपमे शरीरको 

भी क्षत-विध्त देखकर भगवान्‌ विष्णुके नेत्र क्रोधसे खक 

हो गये । उन्हनि चक्र हाथमे ठे लिया ॥ ३५ ॥ 

व्यवर्धत च वेगेन खुपणेन समं प्रभुः । 

भुजाश्चास्य व्यवर्धन्त व्याप्तुबन्ते दिद्यो दश ॥ ३६ ॥ 
तदनन्तर भगवान्‌ नारायणका वेग गव्ड्के समानदी 

व्रद्ने गा | उनकी चारो भजर दसो दिदा्मको व्याप्त 

करती हुई वदने ठगी | ३६ ॥ 

स दिशः प्रदिशश्चैव खं च गां चेव पूरयन्‌. । 

चच्रघे ख पुनलोकान्‌ कान्तुकाम धवौजसा ॥ ३७ ॥ 
वे दिार्ओः अवान्तर दिदार्गो, आकारा ओर ृरथ्वीको 

पिणं करते हुए इस ग्रकार वदने रोः मानो पुनः 

वल्पूर्वक तीर्नो लोर्कोकि आक्रान्त करना चाहते दौ ॥ ३७ ॥ 


तं जयाय सुरेन्द्राणां वर्धमानं नभस्तङे । 
ऋषयः सह॒ गन्धर्वस्तुषबर्मघुखदनम्‌ ॥ २८ ॥ 
देवेश्वर्योकी विजयके च्यि अक्रायार्म वदते हुए उन 
मगवान्‌ मधुचूदनकी गन्धर्वोसदित शुषि स्तुति करने 
ल्मे ॥ ३८ ॥ 
स यां किरीटेन लिखन्‌ सास्रमम्बरमम्बरेः । 
पद्श्चामाक्रम्य वसुधां दिदाः प्रच्छाद्य वादुभिः॥२९॥ 
वे अपने मन्तकके क्रिरीय्ते स्र्गलोककी भूमिपर रेखा- 
सी खीचते, फदटराते हृषः वच्रद्वारा ब्रादर्छसदित आकाराको 
ढकते यौर चारो बादेसि सम्पूरणं दिशार्ओको आच्छादित 
करते हुए अपने दोन वैसे प्वीको दाकर ख्डे दो 
गये ॥ ३९ ॥ 
ख्यस्य रद्िमितुल्यामं सदहख्रारमरिक्षयम्‌ । 
दीताग्निसद्शं थोर दर्शनीयं खुदरख॑नम्‌ ॥ ४० ॥ 
खुवर्णनेमिपरन्तं चच्ननाभं भयावहम्‌ । ` 
मेदोमजास्यिरुचिरेर्दिग्धं  दानवसम्भवेः ॥ ४९ ॥ 
अद्धितीयं प्रहारेषु क्षुरपर्यन्तमण्डरम्‌ । 
सग्दाममालाविततं कामगं कामरूपिणम्‌ ॥ ४२॥ 
खयं खयम्भुयाः खरं भयदं सवविद्धिषाम्‌ 1 
महर्पिरोषैराविषं नित्यमादवदर्पितम्‌ ॥ ४३॥ 
छषेपणाद्‌ यस्य सन्ति लोकाःसस्थाणुजङ्गमाः । 


आ्रीमष्टाभारते सिलभागे 


[ हरिशे 


क्रव्यादानि च भूतानि ठति यान्ति महादवे ॥ ४४॥ 
तमप्रतिमकमरीणं समानं सू्य॑वच॑सा ! 
चक्रमुद्यम्य समरे ोधदीक्षो गदाधरः ॥ ७५॥ 
जिसकी प्रभा सूर्यकी किर्णेकि समान उद्धासित दोती 
हः जिसमे एक सदश्च अरे लगे हए दै, जे द्ुभकः दिनार 
करनेमे समर्थं दै, जिते प्रज्वलित अग्निके समान तेजसी 
ताया गया है जो भयंकर होनेपर भी दर्शनीय हैः इसीलियि 
जिते सुदर्शन कहते दैः जिसक्रे करिनारेपर बुवर्णमयी नेमि 
( हाल ) लगी हुई है, जिसकी नामि वञ्चक समान बुद्द्‌ हैः 
जो शचुर्बौकरो भय देनेवाला दै, दानवोके मेदः मलाः, अखि 
तथा खधिस्ते जिसकी पुष्टि हर्द दै, जो प्रहारे साधरि 
अद्ितीय ८ अनुपम ) हैः उसके प्रान्तभाग मण्डलाकार 
छुरेखो हृणरदैः जो पर-माखाकी रदर्योके समान विस्तृत 
है, इच्छानुसार चख्ने ओर मनमाना रूप धारण करने 
समर्थं है, समस्त गातुरओको भय देनेवलि जित दिव्य 
अस्रकी साक्षात्‌ बह्माजीने दष्ट की है, अव्याचारी अदुर्के 
प्रति महूर्पियोके मनम जो रोष होते दैः उनसे जो सदा 
आविष्ट रहता है, युदधके अवसर्योपर जो दपि मरा होता है, 
जिसके प्रहरसे चराचर प्राणि्योखहित तीनों लोक मोहम पद 
जाति द ओर महासमर जिसके प्रमावसे मांसभक्षी प्राणिर्योको 
ठति प्रात होती हैः उस अनुपम कम॑ करनेवाले सूर्ठ॒व्य 
तेजसी चक्रको हाथमे उठाकर भगवान्‌ गदाधर समराङ्गणमे 
क्रोधे उदीप्त हो उठे ॥ ४०--४५ ॥ 
खम्मुप्णन्‌ दानवं तेजः समरे स्वेन तेजसा । 
चिच्छेद्‌ बाहुं चक्रेण श्रीधरः काठमेमिनः ॥ ४६॥ 
छश्ूमीको वक्षःखलमे धारण करनेवाले श्रीदसिने समरभूमि- 
म अपने तेजसे दानर्वोके तेजकरा अपहरण करके उस चक्रसे 
काल्नेमिकी भुजाओंको कार डाला ॥ ४६॥ 
तच्च वक्शतं घोरं साधिचूणीटहासिनम्‌ । 
तस्य दैत्यस्य चक्रोण भ्रममध्थ वलाद्धरिः ॥ ४७ ॥ 
साथ दी जिने अद्ृदास करनेपर अग्निच्रं प्रकट 
होते ये, उस दैत्यके उन सौ भयंकर मुखोकि भी -भगवान्‌ . 
विष्णुने उस चक्रके द्वारा बल्पूर्वक मथ डाल ॥ ४७ ॥ 
स च्छिनिवाहूविंशिस न भाकम्पत दानवः । 
कवन्धोऽवस्थितः संख्ये विशाख इव पाद्पः ॥ ४८॥ 
मुजा्ओं ओर मस्तकोके कट जानेपर भी वह दानव 
कभ्पित नहीं हया । उखक्रा धड़ युद्धखल्म शाख।रहित वृष्ष- 
के समान खड़ा रहा ॥ ४८ ॥ 
तं वितत्य महापश्षी वायोः कृत्वा समं जवम्‌ । 
उरसा पलयामास गरुडः काटनेमिनम्‌ ॥ ४९ ॥ 
तव महापन्षी गर्ड्ने अपने पंख फेलाकर वायु समान 


हरि्षदापवं ] 


वेग प्रकट करफे काट्नेमिको अपनी खतीकरे धर्करेसे गिरा 
दरिया ॥ ४९ ॥ 
स तस्य देहो विमुखो विद्याखः खात्‌ परिभ्रमन्‌ । 
निपपात दिवं त्यक्त्वा क्षोभयन्‌ धरणीतटम्‌ ॥ ५० ॥ 
उसका वह मस्तक ओर भुजाअंसि रदित शरीर खर्गलोक- 
को लगकर आकाद्रासे चक्र काटता ओर भूतल्को ष्ुग्ध 
करता हुआ पृथ्वीपर गिर पडा ॥ ५० ॥ 
तस्मिक्निपतिते दैत्ये द्रेवाः सर्पिगणास्तदा । 
साधु साध्विति वैकुण्ठं सगेताः प्रत्यपूजयन्‌ ॥ ५१ ॥ 
उस दैत्यके धरारायी हनेपर ऋषि्योसदित सम्पूरणं 
देवता साधु-खाधु कहते दए वरहो अये ओर भगवान्‌ विष्णु- 
कौ पूजा एवं प्रशंसा करने चग ॥ ५१ ॥ 
अपरेये तु दैत्या वै युद्धे दुष्रपराक्रमाः । 
वे सवं बाहुभिव्यौत्ता न श्चेकुखलितं रणे ॥ ५२॥ 
ससक सिवा जो दूसरे दु परक्तभी दैत्य ये, वे सत्र 
` भवान्‌ विष्णुकी भुजाअंसि अवसरुद्र दोकर रणभूमिमे दिल. 
इल भीन स्के ॥ ५२ ॥ 
काथित्केरोषु जग्राह कांश्चितष्टे ऽभ्यपीडयत्‌। 
पारयत्कस्यचिद्‌ चक्रं मध्ये कांध्िदथाय्दीत्‌ ॥५६॥ 
भगवानने किन्दीके केदा पकड़कर उन्दँ यंग चया, 
किन्दीमे गले दवा दिये किन्दके मुख फाड़ दिये ओर कुछ 
-दै्योकी करमर प्रकड़कर तोड़ डारी ॥ ५३ ॥ 
"ते गदू(चक्रनिदग्धा गतसरवा गतासवः । 
गगनाद्‌ शर्टसचोङ्गा निपितुर्धंरणीतद्े ॥ ५७ ॥ 
वे दैत्य गदा ओर चक्रके तेञसे द्ध हो अपने धैय ओर 
प्राण खो ब्रेठे | उनके सरि अद्ध आकारसे ष्ट देकर भूतल- 
पर गिर पडे ॥ ५४ ॥ 
तेषु स्वेषु दैत्येषु हतेषु पुरुषोत्तमः । 
तस्थ शाक्परियं कृत्वा छइतश्मी गद्एधरः ॥ ५५॥ 
उन सव्र दैत्यो मारे जनेपर हन्दरका प्रिय करके कृत- 
कृत्य हुए गदाधारी भगवान्‌ पुरपोत्तम वर्ह चुपचाप खदे 
हो गये ॥ ५५॥ 
तस्मिन्‌ चिमदं निदत्त संत्रमि तारकामये । 
तं देदामाजगामाल्यु बह्मा रोक्तपितामहः ॥ ५६॥ 
सर्व्रह्र्पिभिः सार्धं गन्धर्वैः साप्सरोगणैः 1 
देषदरेषो हरि देवं पूजयन्‌ वाक्यमग्रवीत्‌ ॥ ५७ ॥ 
तारकामय संप्रामकी वेह मार-काट तमाप्त होनेपर देवा- 
पिदेव लोकपितामह ब्रह्मा समस्त ब्रहमर्पियो, गन्धर्वो ओर 
अप्सराओकरे साथ शीघ्र दी उस प्रदेशमे आ पहुचे ओर 
भीनारायणेवको पूना करते हुए बोले †} ५६५७ ॥ 


अष्चत्वारिशो ऽध्यायः 


~~~ 


१८२ 


व 


ब्रह्मोवाच 
ङतं देव महत्कर्म सुराणां शल्यमुद्ुतम्‌ । 


` वेनानेन दैत्यानां चयं हि परितोपिताः ॥ ५८ ॥ 


जह्माजीने कहा--देव ! आपने यह वहुत बडा कार्यं 
किया । देवतार्ओंका कय निकालदिया । दै््योके स वधते 
हमै वड़ा संतोष हुमा दै ॥ ५८ ॥ 
योऽयं ्तस्त्वया विष्णो काटनेमी महासुरः । 
त्वमेको ऽस्य सधे हन्ता नान्यः कश्चन विद्यते ॥ ५९. ॥ 
विष्णो | आपकर द्वारा जो यदह कालनेमि नामक महान्‌ 
असुर मारा गया द, इसे एकमात्र आप दी युद्धे मार सकते 
ये; दूरा कोद एेसा नदीं है ॥ ५९ ॥ 
पष देवान्‌ परिभर्वेहोकाश्च सचराचरान्‌ । 
श्षीणां कदनं छृत्वा मामपि प्रतिगर्जति ॥ ६०॥ 
यह देवताओं तथा चराचर प्राणिर्वौसदित समस्त ठेर्को- 
का तिरस्कारकरता था ओर ्रष्रियोका संहार करकेभेरे 
सामने मी गर्जना किया करता था ६० ॥ 
तदनेन तवोग्रेण परितुष्टोऽसि कर्मणा । 
यद्यं काटतुल्याभः काठनेमी निपातितः ॥ ६९ ॥ 
अतः आपने जो काठके समान प्रतीत होनेवाले इस 
कालनेमि नामक दैत्यको मार गिराया रै आपके इस उग्र 
पराक्रमसे मेँ बहुत सतषट हँ ॥ ६१ ॥ 
तकागञ्छसर भद्रं ते गच्छाम दिवसुत्तमम्‌ । 
बरहर्षयस्त्वां तश्रस्थाः परतीक्षन्ते सदोगताः ॥ ६२ ॥ 
हसय्यि आईये, आपका कल्याण हो } अच हमरोग 
उत्तम दिव्य लोकको चले । वरहो दिव्य सभामे वैठे हु वरह 
के निवासी ब्रह्मि आपकी प्रतीक्षा कसते ह ॥ ६२ ॥ 
अहं मदरषयच्चैव तथ त्वां वदतां वर । 
चिधिवञाचैयिष्वामो गीभिंदित्याभिर च्युत ॥ ६३॥ 
वक्तार्जमिं रेष्ठ अच्युत ! बर्हो मेँ तथा महपिगण दिव्य 
वाणीदारा आपकी विधिवत्‌ अर्चना करेगे | ६३ ॥ 
फिं चाहं तव दास्यामि वरं वरभतां वर । 
स्रेप्वपि सदैत्येषु वराणां रदो भवान्‌ ॥ ६७ ॥ 
वर धारण करनेवारलम शरेष्ठ नारायण ! मै आपको 
क्ण वर दूणा 1 दर्यो मौर देवतार््मि भितने भी बर (भरे 
मनोरथ ) £ उन सवके दाता तो आप दी १ ॥ ६५ ॥ 
नियौतयैतच्‌ धैर्यं स्फीतं निहतकण्टकम्‌ । 
असिक्नेव सधे विष्णो शक्राय सुमहात्मने ॥ ६५ ॥ 
विष्णो | इस युद्धस्यलमै दी आप महात्मा इन्द्रको 
त्रिलोकीका यह स्मद्धिशाटी ओर अकण्टकं राज्य लीय 
दज ॥ ६५. ॥ 


१८४ 


पवसुक्तो भगवता बष्यणा हरिरव्ययः । 
देवाञ्छक्रसुखान्‌ सवीलुवाच शुभया गिख ॥ ६६॥ 
भगवान्‌ व्रह्मके एेखा कडनेपर अधिनाशी श्रीदरिने 
अपनी कल्याणमय वाणीद्धारा इन्द्र आदि समस्त देवताओं 
से इस प्रकार कहा ॥ ६६ ॥ 
रिष्णुरुवाच 
श्रूयतां निदशाः सवं यावन्तोऽत्र समागताः । 
श्रवणावहितैदैदेः पुरस्छत्य पुरंदरम्‌ ॥ ६७ ॥ 
भगवाम्‌ विष्णु वोले--जितने देवता य्दा अयि दैः 
वे स्व लोग अपने यरीर ओर इन्िर्योको मेरी ब्रात सुननेफे 
स्मि सावधान रखते हुए. ₹न्द्रको अगि करके जो कुर 
कहता हूः उत सुन ॥ ६७॥ 
अस्मिनः समरे सवं काटनेमिमुखा इताः 
दानव विक्रमोपेताः शकद्पि मत्ताः 


1 ६८ ॥ 


इस युद्धम हमने दन्द्रसे भी वहत वदे-चटे पराक्रम 
शाटी काठनेमि आदि समस्त दानर्वोकरो मार डाल रै ६८॥ 


तस्मिन्‌ महति संक्रन्दे दावे तु चिनिस्खृतौ । 
वैरोचन दैत्येन्द्रः खभौनुश्च महाग्रहः ॥ ६९ ॥ 
इस महासंग्रामते दो दी दैव्य वचक्रर निकले ई 
विरोचनकुमार दैत्यराज वलि ओर महान्‌ ग्रह राहु ॥ ६९ ॥ 
तदि भजतां रखक्रो दिशं बरूण प्व च । 
यास्यां यमः पार्यतासरुतच्तयं च धनाधिपः ॥ ७०॥ 
अतः इन्द्र ओर वरुण अव अपनी-अपनी अभीष्ट एिशा- 
को पुनः अ्रहण कर । यम दक्षिण दिशाका जौर धनाष्य् 
कुतरेर उत्तर दिगाका पाटन करं ॥ ७० ॥ 
शैः सह यथायोगं कलि चरतु चन्द्रमाः । 
अब्दं चतुसुखं सूयो भजतामयनेः सह ॥ ७१॥ 
चन्रमा स्मयानुसार नधक्रोके साथ यथायोग्य विचरे 
ओर सूय अयनोसहित ऋतपधान वर्पका आश्रय ठ ७१॥ 
आज्यभागः प्रवर्तन्तां सद्स्यैरमिपूजिताः 1 
हयन्तामन्नयो विचवेदद्णेन कर्मणा ॥ ७२॥ 
( यज्ञम ) सदस्योद्धारा सव॒ ओरसे पूजित आग्यभाग 
देव्ताओंको अर्पित व्यि नार्य ओर ब्राह्मणटोग वेदोक्त 
विधिसे अगिर्धम आहूति दे ॥ ७ 
देवाश्च वलिद्येमेन स्वाध्यायेन महषयः । 
राद्धेन पितरश्चैव ठति यान्तु यथा पुरा ॥ ७३ ॥ 
अव पुनः पदलेकी ही भोति व्रि ओर होमकर्मके द्वारा 
देवताओकोः खाध्यायके द्वार मदूर्िर्योको तथा श्राद्धकर्म 
सम्पादने प्रितरोको संवष्ट किया जाय ओर वे पूर्णः 
वरस ्॥ ७२॥ 


~ 


धीमहाभारते खिकभागे 


[ हरिवंशे 


वायुशचरत भाग॑स्यखिधा दीप्यतु पावकः । 
श्रयो वणौश्च खोकांस्मीन्‌ वरद्धयन्त्वात्मजै्गुणेः ॥ ७४॥ 
वायुदेव अपने मार्गपर रहकर विचरण करर, सग्निदेव 
( माहपत्यः दक्षिगरागिनि तथा आदवनीय-इन) तीन-तीन स्यमि 
सदा मकाशित दते रहै तथा तीन वर्णकरे ठोग अपने (छ्रमः 
दमः तप एवं सौच आदि ) सहन गुणेसि तीना लोर्कोकी 
वृद करर ॥ ७४ ॥ 
क्रतवः सम्प्रवतन्तां दीक्षणीयेर्दिजातिभिः। 
दक्षिणश्चोपवर्त॑न्तां यथा सर्वसक्निणाम्‌ ॥ ७५॥ 
य॒रदीक्च्रे अधिकारी द्विजातिरयोदयारा य्ञेका अनुष्ठन 
ह्येता रहे ओर समस्त यजमानेकरि यशचर्मि यथायोग्यं दपिणा् 
दी जर्यै ॥ ७५॥ 
गाश्च सुधां रसान सोमो वायुः प्राणश्च प्राणिषु । 
त्प॑यन्तः भवर्तन्तां किवः सोम्येश्च कर्मभिः ॥ ५६॥ 
सूयदेव स्पूं इन्धि्योकीः चन्द्रदेव ससौकी तथा वायु- 
देव प्राणिरयोके प्रार्गोक्री वृति एवं पुष्टि करते हुए अपने 
कत्याणकरारी एवं सौम्य कर्मोद्वारा टोकदित्म प्रहृत्त हँ ॥ 
यथावदायुपू्यैण  मटेन्द्रसलिल्ेद्धवाः। 
्ेखोक््यमातरः सवः सागरं यान्तु निम्नगाः ॥ ७७ ॥ 
देवराज इनदरदवारा पवर्तोपर चरसाये दए जल्से प्रकट 
होनेत्रारी सम्ृशं सरितार्ये, जो सवो जटस्परी दुग्ध पिलनेके 
कारण तीना टोक्रङि प्राणि्ोके च्थि माताके समान हैः 
यथोचित गतिसे वदती हु क्रमनः समुद्रम मि ज्ये ॥७७] 
दैव्येभ्यस्व्थज्यतां भष शारिति रजत दरेवताः। 
खस्तिचोऽस्तु गमिष्यामि ब्रह्मलोकं सनातनम्‌ ॥ ५८ ॥ 
देवताओं ! अव तुम दैप्योसे दोनेवाटे भवकरो व्याग दो 
ओर मनमे आन्ति धारण करो । ठम सव लेर्गोका * कल्याण 
हयो । अवर मै सनातन बह्टोकरकरो जागा ॥ ५८ ॥ 
खगे .सर्व॑रेके बा संभ्रमे वा विरोषतः | 
विभरम्भोवोन मन्तन्यो नित्यं शद्रा हि दानवाः॥ ७९॥ 
अपने घरमे अथवा समसत जगत्तमे यां विहेषतः 
संग्राममे ठम दानवोका कभी विश्वा्त नहीं करना चाष्ठिये; 
क्योकि वे सदा दी नीचतापूर्णं वर्ताव करनेवठे दते 
ह॥७९॥ 
चिद्रेषु प्रहरन्त्येते न चैषां संस्थितिर्धवा : 
सौम्थानासुभावानां भवतां चाजेवे मतिः ॥ ८० ॥ 
ये मौका पति ही प्रहार कर बैठते हे । इनकी मर्यादा 
सदा सिर रनेवाटी नहीं होती । ठमटोग सौम्य ओर सरल 


सवभावे हयो, अतः वुम्हारी बुद्धि सरठ्तापणं वर्तावम 
लगती द ॥ ८० ॥ 


हरवंशपवं 1] 


एकोनपश्चारशन्तमो ऽध्यायः १८५ 


अहं तु दु्टभावानां युष्माक दुरात्मनाम्‌ 1 
असम्यर्वर्तमानानां मोहं द्यामि देचताः ॥ <१॥ 


देवताओ ! वम्हर प्रति दुर्भाव रखकर अनुचित वर्ताव 
कसनेवाले दुरात्मा देर््योको म अवदय ही मोदर्म डाक 
दगा ॥ ८१॥ 
यदा च खुदुराधधं दानवेभ्यो भयं भवेत्‌ । 
तदा समुपगम्या्यु विधास्ये चस्ततोऽभयम्‌ ॥ ८२॥ 
जवर दानर्वोकी ओरसे ठमलोगोको दुर्निवार्यं भय प्राप्त 
होगा, तव सीघ्र ही आक्र म ठम्दे उनकी ओससे निर्भय 
करर्दगा॥८२॥' 


वैशम्पायन उवाच 

पवसुकत्वा सुरगणान्‌ विष्णुः सत्यपयक्रमः। 
जगाम ब्रह्मणा सार्धं बरह्मटोकं मदायदाः ॥ ८२ ॥ 

वैशम्पायनजी कहते है--जनमेजय | देवता्से 
रेख! कहकर महायगसखी तथा सत्यपराक्रमी भगवान्‌ विष्णु 
व्रह्माजीके साथ ब्रह्मलोकको चले गये | ८३ ॥ 
पतदाश्चर्यमभवत्‌ संग्रामे तारकामये । 
दानवानां च विष्णोश्च यन्मां त्वं परिप्रच्छसि। ८४ ॥ 

राजन्‌ ! तमने मुभसे जो वात पू थौ, उसका उत्तर मेने 
दे दिया । तारकामय संग्रामकरे अवस्तसर दानवो ओर भगवान्‌ 
विप्णुके वीचमे यदी आश्चयंजनक्र घटना घटित हुईं थी || ८४॥ 


इति श्रीमहाभारते खिरुभागे हरिवंशे हयिवंदापर्वणि काटनेमिवधेऽषटचत्वारिशोऽध्यायः ॥ ४८ ॥ 


दस्‌ प्रकार श्रीमहाभारते लिरुमाग दखििंदके अन्तगत हसिशपरवमे कागनेमिका वध्िषयक 
अद्तासीस्नेः अध्याय पुरा हुजा ॥ ४८ ॥ 


एकोनप्ाशत्तमोऽध्यायः 
ब्रह्मलोकं भगवान्‌ विष्णुका सत्कार 


जनमेजय उवाच 
ब्रह्मणा देवदेवेन साधं सकिटखयेनिना । 
परह्मरोकगतो ब्र्यन्‌ वैङकण्टः कि चकार ह ॥ २॥ 
जनमेजयने पूा-वरह्न्‌ ! देवाधिदेव कमल्योनि 
बरह्माजीके साथ ब्रह्मलोकम जाकर मगवान्‌ विष्णुने क्या 
किया ?॥ ९॥ 
किमर्थं चादिदेवेन नीतः कमख्योनिना 
विष्णु्दत्यवधे वृत्ते देवैश्च छतसत्कियः ॥ २ ॥ 
देवयो संहारा कार्य पूर्ण हो जनेपर देवता्ओद्रारा 
जिनका भखी्भोति सत्कार करिया गया थाः, उनं भगवान्‌ 
विष्णुको आदिदेव ब्रह्माजी ब्रह्मलोकमे किस्यि ले गये १।२॥ 
अह्यशोके च किं स्थानं कं वा योगसुपास्त सः । 
कं वा दधार नियमं स विभुभंतभावनः॥ ३॥ 
ब्रह्मलोकमे उनका कौन-सा स्थान है? वहं उन्दोने 
किंस योगका आश्रय लिया अथवा उन भूतभावन सवेव्यापी 
श्रीहसिनि किंस नियमको धारण किया ?॥ ३ 
कथं तस्याऽऽसतस्तत्र विष्वं जगदिदं महत्‌ । 
धियमाप्नोति विपुलां खुराखुरनराचिताम्‌ ॥ ४ ॥ 
वरहो रहते हुए. भगवान्‌ विष्णुकी विपुल सम्पत्तिकोः 
जिसकी देवता, असुर ओर मनुष्य सभी पूजा करते है, यह 
सारा विशाल जगत्‌ कैते पाता दहे १॥ ४॥ 
कथं खपिति धमौन्ते बुध्यते चाम्बुदप्टवे । 
कथं च ब्रह्मरोकस्थेो धुरं वटति खोकिकीम्‌ ॥ ५ ॥ 


प्म तुके अन्तम (आपाद मासकरी शका एकादरीको ) 
भगवान्‌ कंसे दायन करते ह १ वर्पाक्राल ग्रीतनेपर ( कार्तिक 
की छ्क्टा एकरादगीको ) क्रिस प्रकार जागते द तथा 
तरसलोक ( नारायणाश्रम) म रहकर वे सम्पूर्णं जगत्‌की 
रक्षाका भार कैसे वहन करते हं १ ॥ ५॥ 


चरितं तस्य विपरनद्र दिव्यं भगवतो दिचि। 
विस्तरेण यथातत्वं सर्वमिच्छामि वेदितुम्‌ ॥ ६ ॥ 


विप्रवर ! दिव्य धाममं खित भगवान्‌ विष्णुका जो 
दिव्य चरिव दैः वह्‌ सव वयर्थरूपते विासूर्वक मै सुना 
चादता हू ॥ ६ ॥ 


# यहो कुरु माठ प्रम ह 1 पष शोकम जे प्रयम्‌ प्रशन १, 
उत्तका उत्तर शी भध्याय्े छोक १२ से लेकर १७ तक देखना 
चादिये । दूसरे शेके दूरा परश्च अद्धित ई 1 इसका उत्तर शती 
अध्याये २५ से २८ तक्के कोम गूढ़ मावते दिया गया ह । 
तीरे शोकम तीन पश्च ६--तीपरा, चौया ओर परचर्वो । उनमेसे 
तीरे मशका उत्तर अध्याय ५० के से ६ तक्के टोकेमिं 
उपर्य टोता दे । चये जर पचे अरभोका उन्तर-उपी मध्याय 
७से९ तक्म श्ोकोमे देस । चीये शोकम ज र्डा मन्न अद्धि 
६, उसका उत्तर रूढ मावसे अध्याय ५० के शेक १२ से २२ 
तकम ९ । स्ातवा जर आरव प्रच पनरव, छटे शोके मद 
८।, घनन पातवा उर अध्याय ५० कै २२ से ४२ तकत 
शोको वणित ६ आर चरित्र-बिपयक आवै भश्वका उत्तर अध्याय 
५० के ४४ क्से जारन्म होकर मगेके समी अध्याया ६1 


१८६ 


भीमहाभारते सिखभागे 


[ शरि्ंशे 


व॑द्म्पायन उवाच 
श्टूणु नारायणस्यादौ विस्तरेण प्रूत्तयः। 
ब्रह्मलोकं यथारूढो ब्रह्मणा सह मोदते ॥ ७ ॥ 
वैदाम्पायनजीने कका--जनमेजय ! भगवान्‌ नारायणके 
जो कर्म है ओर जित प्रकार वे व्र्मलोकर्मे सित होकर 
ब्रहमाजीके साय आनन्दका अनुभव करते ई, वह्‌ सव पदृके 
मुद्चसे खनो ॥ ७ ॥ 
कामं तस्य गतिः खमा देवैरपि दुरासदा । 
यच्‌ तु वक्ष्याम्यहं राजंस्तन्मे निगदतः श्टणु ॥ ८ ॥ 
राजन्‌ | उनकी गति ८ रीदख या चरित्र) उन्दीकी 
इच्छाके अनुरूप दोती है वह सूक्ष्म दै, उसके तस्वको ठीक- 
ठीक समन्त पाना देवताओं ल्यि भी अत्यन्त कठिन ६ । एस 
समय म भगवान जिस चरका वर्णन कसे जारहारह 
उसे तुम मेरे कथनानुसार सुनो ॥ ८ ॥ 
पप लोकमयो देवो लोकाश्चैतन्मयाखयः। 
पप देवमयश्चैव देवास्रैतन्मया दिवि॥ ९॥ 
ये श्रीनारायणदेव सर्व॑लोकमय दह ओर ये तीनों लेक 
भी इर्दीफे खर्प ( विण्णुमय) ह| ये दी सर्वदेवमय ओर 
सर्गे सम्पूणं देवता एतन्मय ( इरन स्वरूप अर्थात्‌ 
विष्णुमय ) ई ॥ ९ ॥ , 
तस्य पारं न पश्यन्ति वहवः पारचिन्तकाः। 
पप पारं परं चेव रोकानां वेद्‌ माघदः ॥ १०॥ 
प्रत्येक वक्लुके पार तत्व ( अन्त, इयत्ता या चरम सीमा ) 
का चिन्तन करनेवाले वहूत-से विचारक उन भगवान्का पार 
नही देख पाति ई, परंतु ये भगवान्‌ माधव सम्पूर्णं जगत्‌ 
परम पार ८ अपने आप ) को मरीर्भोति जानते ई ॥१० ॥ 
अस्य देवान्धकारस्य मार्गितन्यस्य देवतैः । 
श्णु मै यत्‌ तद्‌ वृत्तं ब्रह्मखेके पुरातनम्‌ ॥ १९॥ 
ये इन्््योके अविषय हं ओर सम्पूर्णं देवता इ्दीका 
अनुसंधान करते रहते ई । इन्दी. भगवान्‌ विष्णुका उस 
समय ब्रह्मठेकर्मे षयित हआ जे प्राचीन इत्तान्त है, उसे 
सुनो ॥ ११ ॥ 
स गत्वा बरह्मणो खोक षट पैतामहं पदम्‌ । 
ववन्दे वाचरषीन्‌ स्वौन्‌ विष्णुरप॑ण कमणा ॥ १२॥ 
उन भगवान्‌ विष्णुने ब्रह्मलोकर्मे जाकर पितामहके 
निवासस्ानका दर्शन करफे वेदोक्त विधिसे वदहोके समस्त 
श्रुषिर्योको प्रणाम किया ॥ १२॥ 
सो.ऽग्नि प्राक्छवने दष्ट यमानं महपिभिः। 
अवन्दत महातेजाः कृत्वा पौ्वादिकी क्रियाम्‌ ॥ १२३॥ 
उन मदातेजसवी श्रीदरिने पूर्वाह्काल्की क्रिया पूणं 


करके प्रातःखवनफे समय महर्ियोकी दी दुं भाहि ग्रहण 
करनेवाठे अग्निदेवका दर्गन करके उरन्दे प्रणाम करिया ॥१३॥ 
स ददश मवेप्वाज्यैरिज्यमानं मदर्पिभिः। 
भागं यक्षियमयनानं खदरे्मपरं सितम्‌ ॥ १४॥ 
उन्दनि वरहो अपने ष्टी दूमरे विग्रहको विराजमान देखा, 
जिसका यजेम मदर्पिगण श्रीकी अआहुतिरयेद्ासा यजन 
(पून ) कर रदैये ओर जोप्राप्त दए यञ्नभागकरो स्वयं 
टी रहण कर रा या ॥ १४॥ 
अभिवाधाभिवायानासृ णां व्रह्यवर्चसाम्‌। 
परिचक्राम सोऽचिन्त्यो ब्ह्यखोकं सनातनम्‌ ॥ १५॥ 
उन अचिन्त्यस्वरूप भगवानूनै त्रद्यतेजमे सम्पन्न 
एवं वन्दनीय शऋ्छपरियेकि प्रणाम करफे उस सनातन 
ब्रह्मलोकर्मे घूमना आरम्भ करिया ॥ १५॥ 
स ददुर्शाच्द्रूतान्‌ यृपांश्चपराटात्रविभूपिताम्‌ । 
मलेयु च चह्यपिभिः शतशः एतटक्षणान्‌ ॥ १६॥ 
उन्दनि वदो यमि स्घापित कयि गये ब्रहूत-से ऊचे 
ऊंचे यपो ८ यक्ञ-लम्भो) कोटे) जो चिरेपर कारके 
चने हुए च्ल्टेति विभूषित ये । ब्रदर्पियेनि उनमें रैकं 
प्रकारके चिह्‌ अद्धि क्रि ये | १६ ॥ 
आज्यधूमं समाघ्राय शण्वन्‌ वेदान्‌ द्विजेरितान्‌। 
यकतेरिज्यन्तमात्मानं पद्यंस्तत्र चचार ह ॥ १७॥ 
वे धीकी आहूति प्रकट दए धूमकरी सुमन्ध चेते, 
ब्रारणेद्वास उचारित वेदमन्घ्रको सुनते ओर यक्षद्वास 
होती हुई अपनी ही याराधनागो देखते हुए वद सव जोर 
विचरने तमो | १७ ॥ 
ऊचुस्तमरपयो देवाः सदस्याः सदसि स्थिताः । 
अर्ध्योद्यतभुजाः स्वं पयिच्रान्तरपाणयः ॥ १८ ॥ 
जो वकशमण्डप्म सद्रस्यरूपसे विराजमान येवे से 
देवता ओर शपि दां पविद्धी धारण करे अर्व्यं देनेके 
ल्यि दोनों युजा ऊपर उठाकर उन भगवान्‌ चिप 
परस्पर इस पकार कह रदे थे-1} १८ ॥ 
देवेषु वर्त॑ते यद्‌ वै तद्धि सर्व जनार्दनात्‌ 
यत्‌ प्रवृत्तं च देवेभ्यस्तद्‌ विद्धि मघुखद्नाव्‌ ॥ १९ ॥ 
ष्देवताओंमि जो भी याक्ति-सामथ्यं आदि दै, वह उव 
उर भगवान्‌ जनार्दनसे दी प्राप्त हज दे । देवताअंसि भी 
जो कु प्रास दता है, उसे भगवान्‌ मधुखूदनका ही प्रसाद 
समल्नो । १९ ॥ 
अग्नीपोममयं रोकं यं विदुविदुषो जनाः। 
तं सोममभि छोकं च वेद विष्णुं सनातनम्‌ ॥ २०॥ 
(संसारे मनुप्य विद्धानेकफरि मुखे जिस जगत्‌को अग्नि 


हरिवंशपवं ] 

ओर सोमका कायं जानते है; उसके कारणभूत वे सोम 

-ओर अग्नि तथा यह कार्यभूत जमतत्‌ भी सनातन विष्णुरूप 
ही हैः यह बात दम्दे भी विदित दै॥ २० ॥ 

छीराद्‌ यथादधि भवेद्‌ दधः-सपिंमवेद्‌ यथा ! 

; मथ्यमानेषु भूतेषु तथा छोको जनार्दनात्‌ ॥ २२॥ 
‡ ठ दूधसे दही बनता है ओर ददीसे मन्थन कएनेपर घी 
धकर होता है उसी प्रकार भूतौ ( देह ओर इन्द्रिय आदि ) 
के मथे जानेपर अर्थात्‌ चित्तको एकाग्र करके सृष््म तत्वका 
चिन्तन कसेपर यह ज्ञात हो जाता दै किसारा संसार 
भगवान्‌ जनाद॑नवे दी प्रकट हआ है ॥ २१९ ॥ ` 
यथेद्ियेश्च भूतैश्च परमात्मा विधीयते । 
तथा देवैश्च वेदैश्च सोकैश्च विहितो हरिः ॥ २२॥ 

शेते चेतनासे व्याप्त भूतो ( शरीरो ) ओर इन्धरयो- 
द्याया उनफे नियन्ता परमात्माका खतः ज्ञापन या प्रतिपादन 
हयो जाता हैः उसी प्रकार अनुग्रह आदि गुोसे युक्त 
देवताओं, वेदौ ओर लोकरौद्यारा ( उनके अन्तर्यामी आत्मा- 
रूपसे ) श्रीहरिका बोध हो जाता है ॥ २२॥ 

यथा भूतेन्द्रियावापिर्विहिता सुति देहिनाम्‌ 
तथा प्रणिभ्वरावाप्तिदेवानां दिवि वैष्णवी ॥ २३॥ 

नेते भूतल्पर देदधार प्राणि्योको जो देह ओर इन्दरियो- 

, की प्राति हई है, उनका सम्बन्ध पाथिव भूरसि है उसी 
प्रकार खर्गलोकमे देवतार्ओको जो बर ओर एेश्र्य प्राप्त हुए 
हैः उनका सम्बन्ध भगवान्‌ विष्णुसे ही है ॥ २२ ॥ 
स्िणां सत्रफलद्‌ः पविन्नं परमात्मवान्‌ । 
रोकतन््रघरो द्येष मन््रमन्न इवोच्यते ॥ २९ ॥ 

ध्ये भगवान्‌ विष्णु ही यज्ञ करनेवाले यजमार्मोको उसके 
यजोका फल प्रदान करते ई ।ये प्रम पवित्र ओर 
खतन्न ह । सम्पूणं खोकोका संचालनसूत्र इन्दीफे हाथमे है । 
जेसे वाणीके माधु्य॑का वर्णन वाणीदारा दी सम्भव होता हः 
उसी प्रकार श्रीविष्णुके सरूपका प्रतिपादन सख्यं विष्णु ही 
कर सकते है, दूसर्ौके ल्थि इनकी महिमा अनिर्वचनीय दैः ॥ 


पञ्चादात्तमो प्यायः 


१८७ 


कपय उचुः 
खागतं ते सुरश्रेष्ठ पद्मनाभ मदादयुते । 
दृष्टं यक्लियमातिथ्यं मस्ञतः प्रतिगृह्यताम्‌ ॥ २५॥ 
तदनन्तर भगवान्‌को देखकर षि वोटे-- 
सुरश्रेष्ठ ! आपका खागत रै, महातेजली पद्मनाम {. जप 
वेदमन्तरोद्वास यह यश्षसम्बन्धी आतिथ्य-सत्कार अहण करं । 
त्वमस्य य्षपूतस्य पात्रं पाद्यस्य पावनः । 
अतिथिस्त्वं हि मन््रोक्तः स दष्टः संततं मतः॥ २६ ॥ 
इस यह्पूत पा्यके जप ही उत्तम पातर क्योक्रि आपदी 
वेदमन्त्र द्वारा पावन अतिथि बत्तयि गये रह । जिनके विप्रयमे 
हम सदा सुनते ओर जानते अयि दै उन्दीका आज प्रत्यक्ष 
दर्शन हुआ ८ यह हमारे च्यि सोमाम्यकरी बात दै ) ॥ २६॥ 
त्वयि योद्धं मते विष्णौ न प्रावन्त नः क्रियाः । 
अवेष्णवस्य यक्षस्य न हि कमं विधीयते ॥ २७ ॥ 
आप सर्वव्यापी श्रीहरि जव युद्धके स्यि चले गये येः, तव 
हमरे यज्ञकर्म ठीक तरहसे हो नहीं पते थे । जिसका सम्बन्ध 
भगवान्‌ विष्णुस न हो अर्थात्‌ जिसमे वे उपित नरह 
उस यक्ञका कार्य टीकते सम्पन्न नहीं होता है | २७ ॥ 
सदक्षिणस्य यक्षस्य त्वत्प्रसतिः फट लभेत्‌ । 
अदात्मानमिरहपससभिर्ज्यिमानं निरीक्षसे ॥ २८ ॥ 
(आज आपकी उपद्थितिसे हमारा यज्ञ सफर हो गया |) 
आपका प्रकट होना दी दक्षिणाओंसे सम्पन्न येका प्रमुख 
फल है । आज आप यहो अपने आपको हमरिद्रारा पूजित 
देखेगे ॥ २८ ॥ 
एवमस्त्विति ताम्‌ सर्वान्‌ भगवान्‌ प्रत्यपूजयत्‌ । 
सुसुदे ब्ह्मखोकस्थो ब्रह्मा रोकपितामहः ॥ २९॥ 
तव “एवमस्तु कहकर भगवान्‌ विष्णुने उन सवका 
सम्मान किया ! उनके दास सम्मानित हौ शऊोकपितामह 


ब्रह्मा भी अपने छोकमे सित हो परम आनन्दका अनुभव 
करने ङो | २९॥ 


दति श्रीमहाभारते खिरुभागे दरिवंगो इरिरवरापर्वणि रोकवर्णनं नामैकोनपच्चाशत्तमोऽध्यायः ।॥ ४९ ॥ 


इस प्रकार श्रीमहाभारते खिरुभाग दसिविदके अन्तर्गत दरिवंशपर्वे ब्रह्मलोककाः यर्णननामक उनचासरव 


0 -9~-~ 


६ अध्याय पूरा हुजा ॥ ८९. ॥ 


प्चारात्तमोऽध्यायः 


नारायणाश्रमे भगवान्‌ विष्णुका शयन ओर उत्थान तथा पास आये हए ब्ल्ञा 
आदि देवताओंसे उनके आगमनका प्रयोजन पूना 


` वैश्चस्पायम उकराच 
ऋषिभिः पूजितस्तैस्तु विवेश हरिरीश्वरः । 


पौराणं ब्रह्मसदनं दिव्यं नारायणाश्रमम्‌ ॥ १ ॥ 
वेशस्पायनजी कहते ह--जनमेजय } उन कषि्योखे 


१८८ 


पूजित होकर सरकर्वर भगवान्‌ विष्णरुने पुराणश्रसिद्ध दिव्य 
बद्यधाम ( वैकुण्ठ ) मे, जौ उन श्रीनारायणदेवका आश्रम 
८ विश्रामस्ान ) है, प्रवेद क्रिया ॥ १ ॥ 
स तद्‌ विवेश हण्मत्मा तानामन्छय सदोगतान्‌ । 
प्रणस्य चाद्विदरेवाय व््यणे पद्मयोनये ॥ > ॥ 
स्वेन नाच्च! परिक्ञातं स तं नारायणाश्रमम्‌ । 
भ्रविराच्ेव भगवानायुधानि व्यसजयत्‌ ॥ ३ ॥ 
उरन्दोनि प्रसन्नचित्तसे उस यक्ञखभामे एकत्र हुए उन 
सव महरपिेसि विदा ले आदिढेव पद्मयोनि व्रद्माजीकौ प्रणाम 
करके अपने ही नामते प्रसिद्ध हुए उस नारायणाश्रमे प्रवे 
किया । उस्र परवेदा करते दी भगवानूने सम्पूर्णं आयुर्धेको 
त्याग दिया ॥ २३ ॥ 
स॒ तच्राम्बुपतिप्रस्यं ददशीटयमात्मनः । 
सखधिषठितं देवगणेः शाश्वतैश्च महर्धिभिः ॥ ४ ॥ 
वरहो उन्हं अपना गयनागार दिखायी दिया, जो समुद्रके 
समान नोभा पा रदा था ¦ उसमे सनातन देवगण ओर गाश्वत 
मद्रि निवास करते ये ॥ ४॥ 


संवर्तकाम्बुदोपेतं नक्षचस्थानसंकुलम्‌ । 
तिमिरौघप्रिश्िक्तमप्रधुण्यं खुराख॒रैः ॥ ५ ॥ 


संवर्तक ( प्रट्यकारी ) मेघोक्रे अभिमानी देवता व्हा 
विद्यमान ये | वह स्यान नघत्रोके आश्चयभूत ज्योतिर्मण्डट्से 
व्याप्त था ! जो वहो जनके अपिक्रारी नहीं द, उनके लि वद्‌ 
दिव्य धाम अन्धकारसे आत है अर्थात्‌ उनकी वर्होपर परहुच 
नहीं हो पाती दै । देवताओं ओर असुरोके ल्ि भी वहं 
पर्हुचना अत्यन्त कठिन है ॥ ५॥ 
न तत्रं विपयो वायोर्नन्दोन च विवस्वतः । 
वपुषः पद्मनाभस्य स देरास्तेजसाऽ.ऽघृतः ॥ ६ ॥ 

वर्होन तो वायुकीः न चन्टरमाकी जर नसूर्यकीदी 
प्च दो पाती दै वह दिव्य टे मगवान्‌ पञ्चनाभके सचिदा- 
नन्दमय श्रीविग्रहकी तेजोरागिते दी आडत एवं प्रकारित दै ॥ 
स तजर प्रविरान्नेव जटाभारं समुद्ठन्‌. । 

खरस्य भूत्वा तु शयनायोपचक्रमे ॥ ७ ॥ 

जो पदले सखो मल्तक्रति विभूषित विराटरूमधारी हकर 
होमा पते येः उन्दी भगवान उस दिव्य धाममे प्रवेद करते 
ही जगते प्राणि्योकी कर्मवासनामयी जयका भार सिरपर 
धारण चि वरहो सोनेकी तैयारी की ॥ ७ ॥ 
छोकानामन्तकाटना काटी नयनशाछिनी । 
उपतस्थे महात्मानं निद्रा तं 

तदनन्तर लोककरि अन्तकार्को जाननेवाटी कृष्णवर्णा 
कालरूपिणी निद्रा; जो ने्वका आश्रय लेकर शोभा पाती हैः 
उन परमात्मा श्रीहरिकी सेवम उपसि दुई ॥ ८ ॥ 


महाभारते, खिकभागे 


तं काटरूपिणी ॥ ८ ॥ . 


[ हस्वे 


स दिये शयने दिव्ये समुद्राम्भोदरीतले । 
हरिरेकार्णवोकेन चतेन बतिनं वरः॥ ९ ॥ 
व्रतधासिमिं श्रे श्रीदेसिि समुद्र अर मे्धोकि जलवे 
जीतल दिव्य शय्यापर दायन किया । प्र्यकरार्मे सरे जगतुकरे 
एकार्णवमग्न हौ जनिपर जिस नियमसे भगवानके यनक 
वर्णन पुराणम मिलता है, उसीके अनुसार उस स्मयभी 
भगवान्‌ यन क्या था ९ ॥ 
तं शयानं महात्मानं भवाय जगतः धसुम्‌ । 
उपासाश्चक्रिर विष्णुं देवाः सर्पगणास्तथा ॥ १० ॥ 
जगते अभ्युदयकरे लिय ययन करनेवलि उन सर्वसमर्थ 
महात्मा विष्णुर वहो र्हनेवले देवता आर ऋपि उपासना 
करने ल्गे ॥ १० ॥ 
तस्य सुप्तस्य श्ुद्युभे नाभिमध्यात्‌ समुत्थितम्‌ । 
आद्यं तस्यासनं पद्यं बद्यणः सूर्यवच॑सम्‌ । 
सदस प्नं चणीद्यं कुमारं खुुष्पितम्‌ ॥ ११ ॥ 
सोये दए भगवानकी नाभिके मध्यमागसे एक कमल 
प्रकर होकर शोभा पाने लगा । उसकी कान्ति सूर्यकरे खमान 
थी | वही ब्रह्माकरा आदि आसन है | उसमे सदत दलैः 
वह बीलरूमी विभिन्न वर्णेति अद्धित, अत्यन्त कोमल णवं 
अच्छी तरह चिल हुधा है ॥ ११॥ 
बह्यसू्ोद्यतक्ररः सखपन्नेव महायुनिः । 
आवर्तयति छोक्रानां सर्वेपां कारपर्ययम्‌ ॥ १२॥ 
व्रस्ाजीकी जे पूर्वजर््मोकी वासना ८ कर्म॑-संस्कार ) दैः 
वही सूत्ररूपते मानो भगवानूका उठा हा श्य दहै, उसके 
द्वारा वे खष्टि आदिक व्यि संकेत करते रहते द । इस प्रकार वे 
महामुनि श्रीहरि सोते दए ही समस्त लोर्कौके काल्जनित 
उल्ट-फेर ८ खष्टिसंहार ) की आश्त्ति क्रिया करते ई ॥१२॥ 
विचतात्‌ वस्य वद्ना्चिशश्वासपवनेरिताः । 
भरजानां पड्न्तयो दयच्चे्निप्पतन्त्युत्यतस्ति च ॥ १३॥ 
उनके खुले दए मुखसे जो निःश्वास वायु निर्गत होती 
द, उससे प्रेरित दोकर्‌ प्रजार्ओकी विभिन्न रेणिरयो बे वेगसे 
निकल्ती ओर उन्न दोती रहती दं ॥ १३ ॥ 
ते खष्ठाः प्राणिनो मेध्या विभक्ता बह्यणा खयम्‌। 
चतुघी खां गति जग्मुः छृतान्तोक्तेन कमेण ॥ ९४॥ 
धे उसन्न हुए पवित्र प्राणी साक्षात्‌ ब्रह्माजीके द्वारा 
ब्रामण क्षत्रिय, वेभ्य ओर शुदररूपसे चार भा्गोमिं विभक्त 


# यरा माचायं नीलकण्डने शयनका अथं समापि किया ई, 
उनके मतम यहो समुद्रसे निर्विकरप समापि जौर मैषसे सविकर्प 
समाधि परिलच्ित होती ई ौर शीतलका अथं वे तापरित करते 
है, जो समभाधिका विदषण दै । श्सी तरह वे एकाणंवोक्त तका 
अथं नि्विंकप समाधिके छवि बताया गया (संयम, मानते रै । 


हसिविदापर्वं 1 


करिये जति ह । फिर वे चा वर्णौके छोग॒ अपने-अपने लि 
वताये गये वेदोक्त कर्मका ( निष्काममावते ) अनुष्ठान करके 
अपनी प्म गति ( पस्मात्मा ) को प्राकर छेते है ॥९४॥ 
न तं वेद्‌ खयं बह्मा नापि ब्रह्यषैयोऽव्ययाः । 
विष्णोर्िद्रामथं योगं भविं तमसावृतम्‌ ॥ १५ ॥ 
~~, योगनिग्राका आश्रय ठेकर शयन कसेवास जो भगवान्‌ 
विषुका योगमायासे समृत सरूप हैः उसे स्यं बह्माजी 
तथा ( ब्रह्यलोकके ) अविनारी ब्रह्मि भी नदी जान 
पति द ॥ १५ ॥ 
ते त॒ ब्रहय्षयः स्वै पितामहपुरोगमाः । 
न विदुस्तं कचित्‌ सुं कचिदासीनमासने ॥ १६ ॥ 
चे ्क्ञा आदि सभी त्रदं किसी देश-काल्मे सोये ओर 
किसी देरा-काठमे आसनपर्‌ बरैठकर जागते हुए भगवान 
खरूपको यथार्थरूपसे समन्च नदीं पते द ॥ १६ ॥ 
जागतं कोऽच्न कः शेते कश्च शक्तश्च नेते । 
को भोगवान्‌ को युतिमान्‌ ₹ृष्णात्‌ छृष्णतरश्च कः॥ १७॥ 
उन यह ज्ञात नहीं होता कि यहो कौन जागता है 
दौन सोता है १ कौन सर्वशक्तिमान्‌ होकर भी कोई चेष्ट 
नहीं करता है १ कन भोगवान्‌ दै १ कौन परम कान्तिमान्‌ 
हे तथा कौन ष्ण (लदम) से भी कृष्णतर (अत्यन्त च्म) 
दे १॥ १७॥ 
विमृदान्ति स्म तं देवा दिव्याभिरुपपत्तिभिः 1 
न चैनं रोक्करन्वेष्टं कमतो जन्मतोऽपि वा ॥ १८ ॥ 
“ , देवता दिव्य युक्तियोद्धाया इनके विषयमे विचार करते 
रहते दै; परं वे अवतक इन जन्म ओर कर्मके रहस्यका 
पत्रा नहीं ल्गा स्के द॥ १८ ॥ 
गाथाभिस्त्पदिष्रभियं तस्य चरितं विदुः । 
पुराणास्तं पुराणेषु पयः सम्प्रचक्षते ॥१९ ॥ 
उन परमात्माने अपने निःश्वासभूत वेदमन्त्रौके द्वारा 
{नका उपदेश किया दै, उन वैदिकी गाथाओद्राया जो 
उनके चरको जानते येः, उन पुरातन ऋषि्योने ही 
पुरर्णोम उन पसमेश्वरके खरूपका विशद विवेचन 
कियादे॥ १९॥ 
श्रयते चास्य चरितं देवेष्वपि पुरातनम्‌ । 
मदापुराणात्‌ प्रभति परं तस्य न विद्यते ॥ २०॥ 
देवताओके यहो भी महापुराण आदिसे इनके पुरातन 
चरित्रका श्रवण किया जाता है । उनका कहीं अन्त 
नदी है॥ २० ॥ 
यच्चास्य देवदेवस्य चरितं खप्रभावजस्‌ 1 


तेनेमाःश्ुतये उथसत वैदिक्यो लोकिकाश्च याः॥ २९॥ 
~~~ 


१. यौ कृष्णका अयं कुश अर्थीत्‌ च्म हे । 


पश्चाश्त्तमोऽध्यायः 


१८९. 


उन देवाधिदेव परमात्माका उनके प्रमावसे ( पराक्रम 
आदिक दवारा ) प्रकट हुमा जो टीला-चरि्र है, उसीते ये 
वैदिकी ओर छोकिकी श्रुति्यो भरी इई द ॥ २१ ॥ 
भवकाले भवत्येष छोकानां लोकभावनः 
दानवानामभावाय जागति मधुसूदनः ॥ २२॥ 

लोकोकी खि समय ये खोकभावन मधुसूदन सगुणर्प- 
से प्रकट होते है ओर दानवे विनारके लि सदा जागरूक 
रहते ह ॥ २२ ॥ 
यत्रेन ` वीक्षितं देवा न शेकुः खुक्तमन्ययम्‌ । 
ततः ख्पिति ध्मौन्ते जागतिं जखदक्षये ॥ २६ ॥ 

जरह सो जनेपर इन अविनाशी प्रशुको देवता भी न्दी 
देख सक्र थे; वहीं ये वर्षाकराल्मे ( आपाद शङ्का एकाद्शीसे 
कार्तिक शङ्का एक्तादीतक ) सोते ओर वर्षा व्यतीत होनेपर 
जागते द ॥ २३॥ 


स हि वेदाश्च य्ञाञ्च यज्ञाङ्गानि च सर्वशः । 
या तु यक्षगतिः प्रोक्ता स पष पुरुषोत्तमः ॥ २४ ॥ 
भगवान्‌ विष्णु दी वेद) यक तथा समस्त याज्ञ 
( यज्के उपकरण ) दै । यजञोदवारा प्राप्त होनेवाटी जो परम 
गति बतायी गयी हैः बह भी ये भगवान्‌ पुरषोत्तम 
हीई॥ २४॥ ` 
तस्मिन्‌. सुस न वर्तन्ते मन्वपूताः कतुक्रियाः । 
शरत्प्चृत्तयक्षोऽयं जागतिं मधुसूदनः ॥ २५ ॥ 
भगवान शयनकाल्मे मन्त्रपूत य्चकर्मेकरा अनुष्ठान 
नदीं होता है। शरद्ठ्मे जव ये मधुसूदन जागते है 
उस समय वाजपेय आदि यर्ञोका अनुष्ठान आरम्म हो 
जाता हे ॥ २५॥ 
तदिवं वार्पिकं चकर कारयत्यम्बुदेश्वरः । 
वेष्णवं कमं छुबौणः सुपे विष्णौ पुरद्रः ॥ २६॥ 
भगवान्‌ विष्णुके शयन करनेपर मेघोकरे स्वामी देवराज 
इनदर स्वयं ही प्रजापालनरूप वैप्णवकर्मका सम्पादन करते 
ह ओर वे ही छोगोसे वर्णां ऋतुमे होनेवाले जलसम्बन्धी कर्मं 
( उपाकर्म एवं श्राद्धतपंण आदि ) का अनुष्ठान करवाते 
है ॥ २६॥ 
या छ्येपा गहण माया निद्रेति जगति स्थिता । 
साकस्माद्‌ द्वेषिणी घोसा काठरा्चिमेहीक्षिताम्‌॥२७॥ 


यह जो गहन तमोमयी माया है, वही खंसारम निद्रारूप- 
से सित है! वह आकारण ही सवसे देप रखनेवाटी ओर 


२. श्रुति कदती दै--“ररदि वाजपेयेन यज्ञेत॒। भथौत्‌ 


{शरद तुमे वाजपेय यके द्वारा भगवानूकी अराधना करे ।* 
(न ०) 


१९० 


धीमद्यभारते सिखभागे 


[ हरिशे 


~~~ --------~--~----~--~--~--------~--~----------~-----~--ˆ~--------~------- ~~ ------------------------~----~ 


भ्यकर है तथा युदधभरवरम उतरे दए राजा्ओकि ल्य काठ- 

रात्रिक समान दै २७ ॥ 

तस्यास्तचुस्तमोद्धासा निखा दिवसनादिनी । 

जीवितार्धंहय धो सर्वप्राणश्रतां भुवि ॥ २८॥ 
उस तामसी मायाका शरीरदै रात्रि; जिसक्रा द्वारे 

अन्धकार । बह दिनका नाग करनेवाटी तथा निद्राद्वारा भूतल- 

के समसत प्राणियेकरि आधे जीवनको हर ठेनेवाटी है । उसका 

सरूप भयंकर है ॥ २८ ॥ 

नैतया कथि्ाविष्टो जम्भमाणो समुहुम॑दु । 

शक्तः प्रसहितुं वेगं मजन्निव महार्णवे ॥ २९॥ 
दस निया एवं निद्रारूपिणी मायासि आचिष्ट हया कोई 

भी प्राणी वारंघार जमाई ठेने खता दै भौर महाषागर्स 

हवते दु मनुष्यके समान विवदा होकर उसके वेगको सहन 

नदीं कर पाता है॥ २९॥ 

अन्नजा सुचि मत्यौनां श्रमजा वा कथंचन 1 

सैषा भवति लोकस्य निद्रा सर्वस्य लोकरिकी ॥ २० ॥ 
पृथ्यीपर रहनेवाठे मरणधर्मा मनुर्प्योकरो यह निद्रा मोजन 

अथवा किखीं प्रकारके परिश्रमके कारण प्राप्त दोती है । इस 

प्रकार यह छोकिकी निद्रा जगत्करे उमी प्राणिर्योको 

आतीदे | ३० ॥ 

खम्नान्ते क्षीयते द्येपा भ्रायद्यो भुवि देषिनाम्‌ । 

सत्युकाठे च भूतानां प्राणान्‌ नायते शरश्षम्‌ ॥ ३१॥ 
पृथ्वीपर देहधासि्ेकि जो निद्रा आती हैः वह प्रायः 

सो लेनेकरे वाद खयं दी न्ट दौ जाती दै, परंतु जव प्राणियोका 

मृत्युकाल उपयित होता है, उस समय यह उनके परार्णोका 

परव्रल वेगसे नाल कर डाल्ती दै ॥ १ ॥ 

देवेष्वपि द्धारेनां नान्यो नारायणाद्ते ! 

खखी सर्वंहरस्यैपा माया विष्णुदासीरजा ॥ ३२ ॥ 
देवतार्मिं भी भगवान्‌ नारवणक्रे षिवा दसरा करई 

हसे धारण नदीं कर स्का(ओरन इसपर कावृूही पा 

सका दै ) । भगवान्‌ वि्णुके शरीरे प्रकट हुई यद माया 

सर्वघंहारकारी कार्की सी ( सहायिका ) दै ॥ ३२ ॥ 

सेपा नारायणसुखे डा कमरुटोचना । 

खोकानस्पेन काटेन श्रसते छोकमोष्िनी ॥ ३३ ॥ 

वही यह माया भगवान्‌ नारायणके मुखमण्ड्म उनके 

नेत्रकमटेकि भीतर सित देखी गयी है | यही कमल्नयनी 

नारक स्परमे मी प्रकट दती दै । सम्पूरणं विश्वको मोदे 

डालनेवाली निद्रामयी माया अलयकाल्मे द्यौ समस लोकोकि 

मस ठेती दै ॥ ३३॥ 

एवमेषा हितार्थाय लोकानां छृष्णवर्त्मना । 

भधियतते सेवनीया दि पत्येव च पतिवत! ॥ ३४॥ 


जिनका मार्ग सृष्चम है, उन परमात्मा श्रीदरिने समस्त 
खोकेकि दितके लि ८ अर्थात्‌ उन्दै विश्चामयुखका अनुभव 
कृरानेकरे च्ि ) इस निद्राक्रो . धारण क्रिया ह| जेते पति 
पतिता चीका सेवन करता दै, उसी प्रकार विश्राम-घुखकी 
इच्छावाठे प्रत्येक व्यक्तिको समय-समयपर इसका सेवन करना 
-चादिये ॥ ३४॥ 
सख तया निद्रया च्छन्स्तस्मिन्‌ नारायणाश्रमे । . 
स्पिति स्म तदा विष्णुमोंहयञ्जगदन्ययः ॥ ३५॥ 
इस तरद अविनास्ी भगवान्‌ विष्णु उस्न योगनिद्रासै 
आच्छन हो सम्पूणं जगतूकरो मोदर्मे लते दूए उस खमय 
नारायणाश्रमे दयन करने ख्ये ॥ ३५ ॥ 
तस्य वर्पसहस्राणि इयानस्य मद्ाव्मनः । * 
जग्मुः छतयुगं चेव घेता चैव युगोत्तमम्‌ ॥ ३६॥ 
वर्दो सोते हुए महात्मा नारायणफरे हजासे वर्पर॒॑ब्रीत 
गये । सत्ययुग तथा उत्तम त्रेतायुग भी समाप्त दो 
गये ॥ ३६ ॥ 
स तु दापरपर्यन्ते क्लात्वा लोकान्‌ खदुःखितान्‌ 1 
भरावुध्यत महातेजाः स्तूयमनि महर्पिभिः ॥ ३७ ॥ 
द्वापरे अन्तम समस्त लोकको अत्यन्त दुःखसे पीडित 
जान मदर्ररयोद्वासा अपनी स्तुति सुनते हुए वे मदातेजस्वी 
भगवान्‌ श्रीहरि जाग उठे ॥ ३७॥ 
क्षय ऊनः 
जदीहि निद्रां सदजां भुकपूवौमिव खजम्‌ 1 
दमे ते ब्रह्मणा सार्घं देवा दरशशनकाङ्क्षिणः ॥ ३८ ॥ 
छ्रृपि वोे-भगवन्‌ ! जैसे पहठ्के उपभोगमे स्गी 
हर्द कएूटमालको त्याग दिया जाता दै, उसी प्रकार आप 
अपनी इख सदज निद्राक्रो त्याग दीजिये | ब्रह्माजीके साथ 
ये समस्त देवता आप दर्जनकी अभिलयपरासे खड ई ॥३८॥ 
इमे त्वां ब्रह्मविद्धांसो ब्ह्यसंस्तववादिनः. । 
वर्धयन्ति हपीकेड ऋषयः संरितव्रताः ॥ २९ ॥ 
हषीके ! ये उत्तम त्रतका पालन करनेवाले व्रह्ेत्त 
महपिं वेदोक्त सोर्वोका पाठ करते हुए आपका अभिनन्दन 
करते ८ आपको बधाई देते) ॥ ३९॥ 
पतेपामात्मभूतानां भूतानां भूतभावन । 
म्णु विपणो ञ्चुभा वाचो भूव्योमास्यनिलास्भसाम्‌॥४०॥ 
भूतभावन विष्णो | ये जो आपके दी सरूपभूत प्रथ्वीः 
जट, अग्नि, वायु अर आक्राशरूय महाभूतेकि अथिष्ठाता 
देवता है इनके जुभ॒ वचन आप सुनें ॥ ४० ॥ 
दमे त्वां सप्त मुनयः सदिता मुनिमण्डलैः । 
स्तुवन्ति देव दिन्याभिगेयाभिर्गीभिंरञ्जसा ॥ ४१॥ 


हरिवंशपवं ] 


पकपञ्चाश्चमो ऽध्यायः 


१ ५ (4 


नच्च 


देव { ये मुनि-मण्डलीसदित सपर्पि गाने योग्य दिव्य 
वा्णीद्ारा खभावतः आपकी स्तुत्ति करते दे | ४१ ॥ 
उच्तिष्ठ॒शतपच्राक् पद्मनाभ मष्ादयुते 1 
कारणं किचिदुत्पन्नं देवानां कार्यगौरवात्‌ ॥ ४२ ॥ 

कमलनयन [ उवे । महातेजस्ी पद्मनाम | देवतार्ओ- 
के गुरुतर कार्य॑वश आपको जगनेके स्यि कुक कारण 
उत्पन्न हो गया है ॥ ४२ ॥ 

वैद्म्पायन उवाच 

स संक्षिप्य जटं सर्वं तिमियेघं विदारयन्‌ 1 
उदतिष्ठदुषीकेशाः धिया परमया ज्वलन्‌ ॥ ४३ ॥ 

वेशास्पायनजी कहते है--जनमेजय ! तव सरि जल- 
को समेटकर तथा अनधिकासिर्येकरे व्यि योगमायने जो 
तमोमय आवरण लगा दिया थाः उसको भी दूर करके 
भगवान्‌ षीके अपनी उक्कृष्ट शोभति प्रकारित होते 
दए उठे ॥ ५३ ॥ 
स ददश सुराम्‌ सर्बीन्‌ सयेतान्‌ सपितामहार्‌ । 
विवक्षतः परश्ुभिताञ्चगदथ समागतान्‌. ॥ ४४ ॥ 

उन्दने देखा; ब्रह्याहित॒ समस्त देवता उपस्ित 
है| इनके मनम भोभ उत्यन्न हुमा है ओर उसीके सम्बन्धरमे 
ये कुछ कहना चाहते ई । उन्हे यह भी त्त हो गया 
किये लोग जगते दिते ल्थि ही यहो पधारे दै ॥५४॥ 
तानुवाच हरस्दिनौ निद्राविश्रान्तलोचनः । 
तत््वदष्टर्थया वाचा धमंहत्वर्थयुकतया ॥ ४५ ॥ 


निद्राके दाय जिनके नेर्तोको विश्राम मिल चुका थाः 
उन भगवान्‌ श्रीहरे धर्मसम्मतः युक्तिसंगत तथा ताच्विक 
अर्थते युक्त वाणीद्वारा उस समयं उन देवतांसि इख 
प्रकार कहा ॥ ४५ ॥ 

अभियवाडवाच 

कुतो घो वि्रहो देवाः कुतो बो भयमागतम्‌ । 
कस्य वा केन वा कार्यं कि वा मयि न वर्त॑ते ॥ ४६॥ 

श्रीभगवान्‌ वोले--देवताओ ! ठम्दाया किससे युद्ध छिड़ा 
हआ दै १ करसि ठमपर भय आया है १ अथवा किंस देवता- 
को किंस वस्तुकी आवश्यकता पड़ गयी है १ वताय; कौन 
ेसी कस्तु हैः जो मेरे पास नहीं है १ ( अर्थात्‌ मेरे पास 
सव कुछ दै ओर मै ठम्दे सव्र कुछ दुगा ) ॥ ४६ ॥ 
कि खल्वङुशं लोके वर्त॑ते दानवोस्थितम्‌ । 
श्रणामायासजननं शीघ्रमिच्छामि वेदितुम्‌ ॥ ४७॥ 

दानवोकी यस्ते कौन-सा ेसा कार्यं किया गया हैः 
जो रोकके ल्मि अमद्धल्कारी ओर मनुष्योके  ल्ि कष्ट 
जनक सिद्ध हु है १ यह मै शीघ्र जानना चाहता हूँ ॥५७॥ 
एष ब्रह्मविदां मध्ये विहाय शयनोत्तमम्‌ । 
दिवाय भवतामथं सितः कि करवाणि वः ॥ ४८ ॥ 

आप समी व्रहमवेत्ता्जके वीचमे इस उत्तम शय्याको 
त्यागकर यह म आपके कस्याण-साधनके चि तैयार खड़ा 
ह । वतादये; आपकी क्या सेवा कर ॥ ४८॥ 


इति श्रीमहभिारते लिरूभागो हरिवंशे हरिवंशाप्ैणि विष्णीर्योगदायनोत्याने पञ्चादात्तमोऽध्यायः ॥ ५० ॥ ` 


दस प्रकार श्रौमहामारतके खिरुभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंलपमे भगवान्‌ विष्णुका 
योगय्यति उत्थोनविषयक प्यारे; अध्याय पुरा हज ॥ ५० ॥. 


एकपञ्चारत्तमोऽध्यायः 


ब्रह्माजीका भगवान्‌ विष्णुस जगत्‌की वतमान अबरखाका वर्णन करते हुए 
पृथ्वीका भार उत्तारनेके खये मन्रणा करनेका थसुरोध 


व्नम्पायन उवाच 
तच्छ्रत्वा विष्णुगदितं ब्रह्मा खोकपितामहः। 
उवाच परमं वाक्यं हितं सर्वदिवौकसाम्‌ ॥ १९ ॥ 
वैराम्पायनजी कदते है--जनमेजय ! भगवान्‌ 
विप्णुका वह कथन सुनकर लोकपितामह बह्याने समस्त 
देवताओंके लिये हितकारक उत्तम बात कदी--॥ १९ ॥ | 
नास्ति किचिद्‌ भयं विष्णो सुराणमसुरान्तक । 
येषां भवानभयदः कर्णधारो रणे रणे ॥ २॥ 
'अयुरोका संहार करनेवाले विष्णुदेव ! युद्धके अवसररोपर 


जिनके आप-जेसे अभयदायक कर्णधार हौ, उन देवताओंको 

कोई भय नहीं ॥ २॥ 

शाक्रे जयति देवेशे त्वयि चासुर्सुदने । 

धमे प्रयतमानानां मानवानां ङतो भयम्‌ ॥ २ ॥ 
'जवतक देवराज इन्द्र विजयी है ओर असुोकरा संहार 

करनेवाले आप र्ताके च्यि उयत रै, तवतक धर्मक्रे व्ि 

प्रयत्नरील रहनेवारे सनुष्योको भी किंससे भय हो सकता 


है॥३॥ 


सत्ये धमे च निरतान्‌ मानवान्‌ विगसज्वरान्‌ । 
नाकाले धर्मिणो खन्युः शक्नोति परसमीश्षितुम्‌॥ ४ ॥ 


१९२ 


ध्जो मनुष्य सत्य ओर धर्मम तत्पर रहकर चिन्तारहित 
दो धम॑के अनुष्ठाने छो हुए, उनकी ओर अकालयु 
ओख उठाकर देख भी नदीं खकती है ॥ ४॥ 
मानवानां च पतयः पार्थिवाश्च परस्परम्‌ । 
पड्भागयुपमुज्ञाना न भयं कुचेते मिथः ॥ ५ ॥ 
'मनुष्येकरे अधिपति जो पृथ्वीपार्क नरेश ईैऽवेभी 
प्रजाकी आयकरे छठे भागका करके रूपम उपभोग करते हुए 
आपे कभी मेद या कठह नदीं कसते द ॥ ५॥ 
ते प्रजानां श्चुभकराः करदैरविगर्िताः। 
खुकरैर्विधयुकाथोः कोद्ामपूरयन्त्युत ॥ ६ ॥ 
धवे सदा दी प्रजाकी भलाई करते ई इसल््यि कर देन- 
वले लोग उनकी निन्दा नदीं कसे । राजार्यकरो जवर अर्थकी 
कमी पड़ती है, तव बे न्यायोचित करर यारा दही अपना 
खजाना भसे ई ॥ ६ ॥ 
स्फीताञ्जनपदान्‌ सवीन्‌. पाठयन्तः क्षमापराः। 
अवीक्ष्णदण्डांश्चतुरो चणीज्जुगुपुरञ्चसा ॥ ७ ॥ 
वे क्षमापरायण दो अपने समस्त समृद्धिशाटी जनपदौ 
का पाठन करते | कभी किसीको कठोर दण्ड नदी देते दै 
तथा चारो वर्णेक्री यथोचित रीतिंते रक्रा कसते ई ॥ ७ ॥ 
नोद्धेजनीया भूतानां सचिवैः साधुपूजिताः। 
चतुरद्गवलेशु्ाः पड्गुणाञुपयुञ्जते ॥ ८ ॥ 
५(वे सवं किसीको उद्विग्न नद करते हैः इस्य्यि ) 
कोई भी प्राणी उन्दै उदेगमे नदीं डारते ६। मन्निर्यो- 
द्वार वे भली्मोति सम्मानित होते ह तथा चतुरद्धिणी देनार्थो- 
से सुरक्षित होकर ८ सन्धि, विग्रहः यान, आसनः दैधीमाव 
ओर समाश्रय--इन ) छः गुर्णोका यथावखर उपयोग करते 
रहते द ॥ ८ ॥ 
धुरवेदपसः सर्वे सवे वेदेषु निष्ठिताः । 
यजन्ते च यथाकालं यत्ै्िपुखदक्िणेः ॥ ९ ॥ 
'सभी नरे धलुर्वेदके अभ्यासम तत्पर दै, सभी वेर्दोके 
परिनिष्ठित विद्वान्‌ ई जीर यथासमय प्रचुर दश्चिणायुक्त यजो- 
दवारा भगवानक्वी आराधना करते रहते द ॥ ९ ॥ 
वेदानधीत्य दीक्षाभिर्मदर्पीन्‌ जक्मचर्यया। 
्राद्धेश्च मेध्यैः शतशचस्तर्पयन्ति पितामहान्‌ ॥ १० ॥ 
धवे दीक्षा ग्रहण एवं त्रह्मचयंके पालनपूर्वक वेर्दोका 
अध्ययन करफे महपियोको तथा पवित्र श्राद्ध-करमद्योरा 
सैको वार पितर्योको वृत्त करते रहते ह ॥ १०॥ 
नेपामविदितं किचित्‌ चिविधं अवि टदयते । 
वेदिकं लोकिकं चैव धर्मशास्रोकतमेव च ॥ १९१॥ 
'भूतट्पर जो वेदिकः छेःकिक तथा धर्मदास्रकथित- 


॥ 


शरीमहाभास्ते छिरुभागे 


[ सविं 
तीन प्रकारके कर्म॒दृण्िगोचर देते ईः उनमते कोद भी 
काम॑ इन राजार्थोको अन्ञात नदीं है ॥ ११ ॥ 
ते परावरट्ाथी म्पिंसखमतेजसः। 
भूयः छृवयुगं करतमुत्सहन्ते नराधिपाः ॥ १२ ॥ 
` 'उन्दं परावर-तस्वका साक्चात्कार हो चुकादै। वे समी 
नदा महर्षियोकरे समान तेजसी ईद ओर पुनः इस पएृथ्वीपर 
सत्ययुगको यनेका उत्वाह रखते द ॥ १२॥ 
तेषामेव प्रभावेण दिवं वपेति वासवः 
यथाथं च वबुवौता विरजस्का दिद्छो दश ॥ १३ ॥ 
४८उर्न्हकरि प्रभावसे देवराज इन्द्र जगत्‌मे कस्याणकारी 
जल्की वर्षा करते ह, वायु यथोचिते गतिसे प्रवाहित दती 
है ओर दसो दियार्ण खच्छ रहती ई ॥ १३ ॥ 
निरत्पाता च वसुधा सुप्रचारश्च खे अ्रहाः। 
चन्द्रमाश्च सन्तः सौम्यं चरति योगतः ॥ १४ ॥ 
धृथ्वीपर कोई उत्पात नदीं होताः आक्रादामे समी अह 
समुचित गतिते विचरण करते ई तथा नक्ष्वोसदित चन्द्रमा 
मी उनके साथ संयुक्त टोकर सौम्यगतिसे विचरण कर 
रदे ई ॥ १४॥ 
अन्ुखोमकरः सूर्यस्त्वयने द चचार द्‌ । 
हव्येश्च विविधेस्त्तः श्युभगन्धो इतादानः ॥ १५॥ 
(्जगत्‌के च्यि अनुकूल किरणो युक्त हुए भगवान्‌ 
सूर्यं दोनो अयमि विचरते ह तथा उत्तम गन्धे सुवासित 
अग्निदेव नाना प्रकारे हविष्योकी आहूति पाकर वप्त 
होते द ।॥ १५ ॥ 
प्वं सम्यक्‌ प्रवृत्तेषु बिव्रदधेषु मखादियु । 
त्पयत्छु मर्दी छृत्स्नां चणां कारभयं कुतः ॥ १६॥ 
भज दस प्रकार राजाटोग भमरीमोति सत्कर्म प्रवृत्त 
हैः यज्ञ आदि करम दिर्नोदिन वद्‌ रहै द ओर वे नरे समस्त 
भूमण्डल्को निरन्तर वप्त एवं सं॒ष्ट कर रटे टै, तव मलुर््यौ- 
को काठ्कराभय कैते हयो सकता है ॥ १६ ॥ 
तेषां ज्वछितकीर्तनामन्योन्यवशवर्तिनाम्‌ 1 
राक्षां वदधैर्वख्वतां पीड्यते चखुधातलम्‌ ॥ १७ ॥ 
(परंतु जिनकी कीति सव ओर जगमग हो र्हीहैतथा 
जो एक दूसरेके वदयवर्ती होकर मेल-मिखापसे रहते दैः उन 
चल्वान्‌ रजाओंके पाच जो असंख्य सेनर्ण् है, उनके मास्ते 
प्रथ्वीको वड़ी पीडां दो रदी है ॥ १७ ॥ 
सेयं भारपरिश्रान्ता पीड्यमाना नराधिपेः। 
पृथिवी समनुप्राप्ता नोरिवासन्नविष्ठवा ॥ १८ ॥ ` 
धस प्रकार भारसे थकी हुई यह प्थ्वी उन नेरंसि 
पीडित दोकर आपकी शरणमे आयी है ! इसकी दना उस 


== ~~ 


हरिवंशापरवं ] 


पकपश्चादलमो ऽश्यायः 


#- 


१९ 


„__ ___ ` __ ___ ____----------------------------------------च्- 


नवकरी-सीदहो रही दैः जिसके वनेका समय अच्यन्त 

निकर हो ॥ १८ ॥ 

युगान्तखद्शै स्यैः रोखोच्लितवन्धना । 

जलेोत्पीडाङुला स्वेदं धारयन्ती सुहर्डः ॥ ९९ ॥ 
(उन राजाओकरे रूप प्रख्यक्रालकी अग्निक्रे समान तेजखी 

ह । उनसे पीडित दोनेके कारण इस पृरथ्वीकरे पर्वतरूपी बन्धन 

दलि पड़ने लतो द अर्थात्‌ इस नोकारूपिणी प्र्वीमे जो 

कीटे इकी हुई थी, वे अव उखड़ने लगी ई; अतः वह रखातल- 

की जलरारिमे इ्वनेकी आगङ्कसि व्याकु दो उदी है ओर 

इसके रीरमे वारंवार पसीना आ रहा है ॥ १९ ॥ 

क्षत्रियाणां वपुर्भिश्च तेजसा च वेन च । 

खण च रषटर्विस्तीरमैः श्राम्यतीव वसुन्धस ॥ २०॥ 
त्रिके शरीरः तेज ओर व्ये तथा मनु्योक दूर- 

तक पले दए. राज्योसे यह प्र्वी थक्रतीसी जा रदी 

है॥ २०॥ 

पुरे पुरे न्यतिः कोटिसंख्येवलेच॑तः 1 

राष्ट राष्ट्रे च वहवो ध्रामाः ह तसहसखरश्ाः ॥ २१ ॥ 
ध्नगर-नगर वर्होका नरेश एक-एक करोड सैनिकोसे 

सुममन्न है तथा प्रक राज्यम कर्द द्यख भ्राम द ॥ २१॥ 

भूमिपानां सदश्च तेषां च वलिनां वकैः। 

भ्रामयुताढये रषटश्च भूमिनिंर्विवरारूता ॥ २२ ॥ 

स्ह भूपालो उन वलवान्‌ भूपाटोकी सेना्ओं तथा 

दस-दस हजार गर्वसि युक्त उनके रष्टूसे यह भूमि इतनी 

भर गयी दै क्रि कहीं थोडी-सीमी जगह खाटी नदीं 

है॥ २२॥ 

सेयं निरामयं रत्वा! निश्चेष्ठा काठमग्रतः। 

प्राप्ता ममयं विष्णो भर्वाश्चास्यःः पसा गतिः ॥ २३ ॥ 
पविष्णुदेव | यह पृथ्वी निश्चेष्ट होकर निरामय काल्को 

अगे करफ मेरे निवासस्यानमे आयी थी ! अव आप इसकी 

धरम गति द ॥ २३॥ 

कंमभूमिमनुल्याणां भूमिरेषा व्यथां गता । 

य्था न खीदेत्‌ तत्‌ कायं जगव्येषा हि शादवती ॥२४॥ 
ध्जगत्‌की आधारभूता यदह सदा रहनेवाटी भृमि, जो 

मनुर्योकी कर्मभूमि दैः वड़ा कष्ट पा रदी है । यह अधिक 

मारे कारण दवकर्‌ व्रिखर न जायः एेसा कोद उपाय करनां 

चाद्य | २४॥ 

अस्या हि पीडने दोषो महान्‌ स्यान्मधुसूदन । 

क्रियारोपश्च लोक्रानां पीडितं च जगद्‌ भवेत्‌॥ २५॥ 


'मधुसूदन | इसके पीडित होनेपर महान्‌ दोष प्रात्र दो 


मण्ह्ण० ॥ षि 


खकता हे । सव रोगोकी सारी करिवर लत दय जायेगी ओर 
सारा जगत्‌ पीडित होने रगेशा ॥ २५ ॥ | 
भ्राम्यते व्यक्तमेवेयं पार्थिवौधप्रपीडिता । 
सहजां या क्षमां स्यक्त्वा चटत्वमचला गता ॥ २६ ॥ 
धनिश्चय ही यह राजाओक भारी सैन्यसमुदायसे पीडित 
होकर थक्रती चली जा रदी हे । यह वात इसीसे सट हे किं 
यह अचल भूमि अपनी स्वाभाविक क्षमाको च्यागक्रर विच- 
ल्तिहोउटीरहै॥ २६॥ 
तदस्याः श्रुतवन्तः स्म तच्चापि भवता श्रुतम्‌ । 
भारावतरणार्थं हि मन्याम सह॒ त्वया ॥ २७ ॥ 
ष्टमने इसीसे इसी सारी बते खुनी है ओर आपने भी 
उन्हे सुन लिया; अतः हम इसका भार दूर करमेके चयि 
आपक्रे साथ मन्त्रणा ( विचार ) करना चाहते दै ॥ २७॥ 
सत्पथे हि खिताः सर्वँ राजानो रटवर्धनाः । 
नराणां च चयो वणौ ब्राह्यणानयुयायिनः ॥ २८॥ 
'भूतल्के समस्त राजा सन्मार्गे खित हो अपने राट 
की व्द्धि कररहै दै । मनुष्ये क्षत्रिय आदि तीनों वण॑ 
ब्राह्मणौके अनुगामी द | २८ ॥ 
सवं सत्यपरं वाक्यं वणं धर्मपरास्तथा । 
स्वँ वेदपया विप्राः सवं विप्रपरा नराः ॥ २९॥ 
प्मनुष्योकी सारी वतिं सत्यक दी आश्रित है । सभी वर्णं 
अपने-अपने धर्मम तत्पर दै। समसत बाह्मण वेदक खाध्याय- 
मेको हुए द तथा समी मनुष्य ब्राह्म्णोकी सेवामे संल्न 
रहते दै ॥ २९॥ 
पएवं जगति वर्तन्ते मचुपष्या धर्मकारणात्‌ । 
यथा धमेवधो नस्यात्‌ तथा मन्तः प्रवत्य॑त(म्‌॥ ३० ॥ 
ष्टस प्रकार संसारके सभी मानव धर्मूर्वक वर्तव करते 
द । अतः एसी कोई मन्त्रणा की जायः जिसे पृथ्वीका भार 
तो कम हो जायः परंतु धर्मको हानिं न पहुचे ॥ ३० ॥ 
सतां गतिरियं नान्या धर्मश्चास्याः सुखाधनम्‌ । 
राक्षां चैव व॑धः कायां धरण्या भारनि्णये ॥ २१ ॥ 
ध्यदी सत्पुख्योकी गति हैः दूसरी नहीं ओर ध्म ही 
इसका उत्तम साधन है । इस प्रथ्वीका मार दूर करनेके व्यि 
राजाओक्रा वध आवदयक कार्यं है | ३१ ॥ 
तदागच्छ महाभाग सह वै मन्त्रकारणात्‌ । 
जामे मेरुशिखरं “पुरस्कृत्य वसुंधराम्‌ ॥ ३२॥ 
"अतः महाभाग ¡ आइये; हम सवर रोग इस विष्रयपर 
एकर साथ विचार करनेके व्यि प्रथ्वीको आगे करे मेस 
पर्वतके रिखरपर चेः ॥ ३२ ॥ 


एतावदुक्त्वा राजेन्द्र ब्रह्मा खोकपिताम्ः! 


१९४ श्रीमहाभारते खिकभागे 


[ हरिवंशे 


पृथिव्या सह विश्वात्मा विरराम महाद्युतिः ॥ ३३॥ कोकपितामह नद्याः जो पृथ्वीके साथ अयि येः भगवानसे 
महाराज जनमेजय ! सम्पूणं विद्वकरे आत्मा मदातेजखी - इतनी ब्रात कहकर चुप हो गये ॥ ३६ ॥ 
इति . श्रीमहाभारते लिरुभागे हसि हरिवंशपरवेणि भारावतरणे एकपन्वादातमोऽध्यायः ॥ ५१ ॥ 


दस प्रकार श्रीमहाभरतफे लि मभाग दशके अन्तमेत दयिवशपवमे (पुध्वी-) मारावतरणव्रिषयक 
स्व्यविनर्गो अध्याय पुरा हया ॥ ५९१ 
---<उ2--~ 


दविप्ारात्तमोऽध्यायः 
भगवान्‌ विष्णु तथा सव देवतार्ओका मेरूपव॑तकी दिव्य सभाम उपथित होना 
ओर वँ पृथ्वीका भगवानृते भार उतारनेके सिये प्रार्थना करना 


वै्चम्पायन उवाच 


यादमित्येव सह ते दर्दिनास्भोदनिःखनः। 
प्रतस्थे दुर्दिनाकारः सदुर्दिन इवाचखः॥ १ ॥ 
वैशम्पायनजी क्रते है--जनमेजय ! तवर ष्वहुत 
अच्छा कहकर भगवान्‌ विष्णु उन सवके साथ वसे चठ 
दिये । उनकी वाणी वर्पाकाल्के मधकरी मोति गम्भीर थी 
उनका श्रीविग्रह मेघके समान द्याम था तथा वे मेघ्रयुक्त 
पर्वतकरे समान जान पड़ते भे ॥ १॥ 
खमुक्तामणिविद्योतं सचन्द्राम्भो्व्चसम्‌ । 
सजयामण्डले त्स्नं स विथ्रच्न्रीधये हरिः॥ २ ॥ 
उनका जटामण्डलमण्डित उदरभाग मुक्तामणिर्योकी 
मारसे उद्ीन होकर चन्दरमाकी प्रभासे युक्त मेधकरे समान 
कान्ति धारण करता था । उस उदस्को धारण करनेवाके 
भगवान्‌ श्रीहरि अपूर्वं योमासे सम्पन्न दिखायी देते थे ॥२॥ 
स चास्योरसि विस्तीणें सेमाश्चोद्धतराजिमान्‌ । 
श्रीवत्सो राजते श्रीमांस्तनद्यमुखाञ्चिवः ॥ २ ॥ 
उनके विस्तृत वश्नःख्र्मे उडी हई रोमावलियोसे युक्त 
शोभाशाली श्रीवत्स दोनो स्तनोके मुखतक्र कैलकेर 
उद्धासित होरदाथा॥३॥ 
पीते वसानो वसने छोकानां गुरुरव्ययः । 
हरिः सोऽभवदारक््यः स संध्या इवाचरः॥ ४ ॥ 
दो पीत वलन धारण क्रिय सम्पर्णं जगते गुर अविनाशी 
भगवान्‌ विष्णु संध्याक्रालिक्र मेधसे युक्त पर्व॑तकरे समान 
मनोहर दिखायी देते ये ॥४॥ 
तं चजन्तं सुपर्णेन पश्रयोनिगतायुगम्‌ । 
अदुजग्मुः खुराः सवं तद्रतासक्तचश्चुषः ॥ ५ ॥ 
वरस्ाजीकर परे पीछे गरड्पर बैठकर यात्रा करते हए 
उन भगवान्‌ नारायणक्रा समी देवता अनुसरण कर रहे थे । 
उन सथके नेत्र उन्दीकी मरली हुए्ये॥५॥ 
॥ 


नातिदीर्घेण कालेन सम्पाता रत्नप्च॑तम्‌ ! 
ददृदु्देवतास्तन्न तां सभां कामरूपिणीम्‌ ॥ ६ ॥ 
थोडे ही समयमे सव देवता र्नमय मेस पर्वतपर आ 
पहुचे । वरहो उन्दोने ब्रह्माजीकी उस समाको देखाः जो 
इच्छानुसार रध धारण करनेवाली थी 1॥ ६] 
मेरोः शिखरविन्यस्तां संयुक्तां सूर्यवचंसा । 
काञ्चनस्तम्भरचितां वञ्जसंधानतोरणाम्‌ ॥ ७ ॥ 
मेर पर्वतकरे दिखरपर खापित हुई वह्‌ दिव्य सभा सूयक 
समान तेजते सम्पन्न थी । उसमे सोनिके खंभे लगे थे तथाडउसकङ़े 
फाटक रन जडे हुए ये ॥ ७॥ 
मनोनिमौणचिताख्यां विमानशातमालिनीम्‌ । 
रत्नजालान्तरव्ती कामगं रत्नभूषितम्‌ ॥ ८ ॥ 
मानसिक संकस्पकरे अनुसार खतः निमित हुए विचित्र 
चित्र उसकी गोभा वदति ये | सैकडो विमार्नोकी पक्तिरया 
वह विराजमान थी । उसमे रतनोके नने रोख स्मे थे। 
वह इच्छानुसार विचरण करनेवाली सभा नाना प्रकरे 
दिभ्य ल्नोसे सजी हुई यी ॥ ८ ॥ 
कलृप्तरत्नसभाकीणां स्र्व्त॑खमोत्कटाम्‌ 1 
दवेवमायाधरं दिव्यां विदितां विभ्वकेणा ॥ र ॥ 
उसमे ब्रहुमूल्य रन जडे दए थे । समी ऋतुओके पूलोसे 
वह व्यात्त थीं। उत्त दिव्य सभाक निर्माण सानात्‌ विश्वकर्मा 
ने क्रिया था। वह्‌ देवतार्ओकी माया धारण करनेवाली 
थी] ९॥ 
तां हृषएमनसः सवं यथास्थानं यधाविधि । 
यथानिदेशं द्या विविद्युस्ते सभां द्युभाम्‌ ॥ १०॥ 
समस्त देवता ब्रह्माजीकी आज्ञाके अनुसार प्रसन्नतपूर्वक 
उस कलस्याण-मयी समामे प्रविष्ट दए. ओर यथायोग्य स्ानपर 
विपिपूर्वक बैठे ॥ १० ॥ 
ते निपेदुर्यथोक्तेषु विमानेष्वासनेपु च । 
भव्रासनेथु पीटेचु कुथाखास्तरणेषु च ॥ ११॥ 


हरिघंदापवं 1 


वे वरहो योग्यतानुसार बताये हुए विमानौ, आसनो, 
भद्रासनो, प्ट, काटी तथा दूरदूरे विकौरनोपर 
विराजमान हुए ॥ ११ ॥ 
ततः प्रभञ्जनो बायुर्बह्यणा साधु चोदितः। 
मा शब्दमिति सर्व प्रचक्रामाथ तां सभाम्‌ ॥ १२॥ 
तव ब्रह्माजीके भटीर्भोति आक्ना देनेपर अपने वेगसे 
ब्रव बृ्तोको तोड़ देनेवाले वायुदेव उटे ओर भकोई एक 
्राष्द मी महसे न निकाठे ! सवर लोग मोन रहै ।' ेसा कते 
हुए सारी समामे सव ओर धूम अयि | १२ ॥. 
निःाब्दस्तिमिते तस्मिन्‌ समाजे निदिवौकसाम्‌। 
वभाषे धरणी वाक्यं खेदात्‌ करुणभापिणी ॥ १३॥ 
जव देबताक्रा वह समुदाय भटीमोति नीरव तथा 
निसन्ध हौ गया; तच वहां करूणाजनक वचन बरोख्नेवाली 
पृथ्दीने दुःखपुर्वक यह व्रात कही | १३॥ 
धरण्युवाच 
त्वया घायी त्वहं देव त्वया वै चार्यते जगत्‌ । 
त्वं धारयसि भूतानि भुवनानि विभि च ॥ १४॥ 
पृथ्वी वोली--देव { (मे रसातले धसी जा रदी हँ 
अतः ) आप मुञ्चे धारण करं; क्योक्रि आपे आधारपर 
ही यह सम्पूणं जगत्‌ टिका हु है । आप दी समसत मूर्तोको 
धारण ओर समी शुवनोका मरण-पोपृण करते है ॥ ९४॥ 
यत्‌ त्वया घायते क्रिश्चित्‌ तेजसा च बटेन च । 
ततस्तव प्रसखदेन मया ' यत्नाच धायते ॥१५॥ 
आप अपनेहीतेज ओर वलते जो कुक भी धारण 
करते है उसीको आपकर प्रसादसे मे भी यत्नपूर्वकर धारण 
करती टू ॥ १५ ॥ 
त्वया धृतं धार यौमि नाघृतं धारयाम्यहम्‌ 
न हि तद्‌ विद्यते भूतं यत्‌ त्वया नाञ्चुधार्य॑ते ॥१६॥ 
आपके धारण क्रिये हुएको ही मँ धारण करती हूं । जिसे 
आपने धारण न कर रखा हये, एेसौ किसी वस्तुको मै धारण 
नहीं करती । एेसा कोई भूत नदीं ३, जिषे आप निरन्तर 
धारण न करते हो | १६॥ 
त्वमेव कररुषे देव॒ नारायण युगे युगे । 
मम॒ भारावतरणं जगतो हितकाम्यया ॥ १७॥ 
देव ¡ नारायण ! आप ही प्रयेक युगमे जगत्‌के हितकी 
कामनासे मेरा भार उतारते है ॥ १७ ॥ 
तवैव तेजसा ऽऽ कान्तां राततं गताम्‌ । 
घ्रायसख मां सुरश्रे त्वामेव हरणं गताम्‌ ॥ १८॥ 
सुरभे ! आहरे तेजसे आक्रान्त होकर भ रसातल- 
को जा पर्टुची हू ओर अपने उद्धारफे ल्यि आपकी ही शरणमे 
आयी हूं ! जप मेरी रस्ता करे ॥ १८ ॥ 


दिपञ्ारत्तमो ऽध्यायः 


१९५ 


दानैः पीड्यमानां राक्षसैश्च दुरात्मभिः । 
त्वामेव शरणं नित्यमुपयास्ये सनातनम्‌ ॥ ९९ ॥ 
दानवो तथा दुरात्मा राश्नसोसे पीडित दोकर मे सदा 
आप्र सनातन पुरुपकी ही शरणमे आती हू ओर आती 
रहूगी ॥ १९ ॥ - 
तावन्मेऽस्ति भयं भूयो यावन्न स्वां कङकञ्चिनम्‌ । 
दारणं यामि मनसा शातशो द्यपलक्षये ॥ २०॥ 
मुञ्चे तमीतक अधिक भय रदता दहै जवतक करि मेँ 
अपना भार धारण करनेवे आप परमेदवरकी मनसे दारण नहीं 
लेती हूं । इस वातकरो मेँ सैकड़ो वार देख चुकी हू ॥ २० ॥ 
अहमादौ पुराणस्य संक्षिप्ता पद्मयोनिना । 
मां च वद्ध्वा छृतौ पूरव खन्मयौ दे महाखरो ॥ २९॥ 
पुरातन युगक्रे प्रारम्भकाख्मे कमल्योनि व्रह्माजीने सुनने 
जलके ऊपर स्थापित क्रिया था ओर मेरी ग्र्तिकाको मुद्धीमे 
बोधकर उसके द्वारा पदे दौ बडे-वडे असुरोकी मूतिर्यो 
व्रना्यीं ॥ २१ ॥ 
कर्णस्रोतोद्धवौ तौ हि विष्णोरस्य महात्मनः। 
महार्णवे प्रखपतः का्ठकुण्डयसमो स्थितौ ॥ २२॥ 
वे दोने। पदटे-पहर महासागस्म सोति हुए इन महात्मा 
भगवान्‌ विष्णुके कार्नोकरी मेल्ते उघन्न हए ये जर काठ 
एवं दीवारफे समान अचेतन अवस्थामे सित ये ( इन्दीकी 
आङृतियोको भगवान्‌ने मिद स्वारा था ) ॥ २२ | 
तो विवेश खयं वायुर्जह्यणा साधु चोदितः। 
दिवं ध्रच्छादयन्तौ तु वत्रधाते महासुरे ॥ २३॥ 
फिर ब्रह्माजीकी उत्तम प्रेरणसि स्वयं वायुदेवने उनके 
भीतर प्रवेद क्रिया । इसके ब्राद वे दोनो महान्‌ असुर 
आकाराको आच्छादित करते दए ब्रह्न च्छे ॥ २३ ॥ 


वायुप्राणो तु तौ य्य व्रह्मा पर्यसराच्छनैः । 

पक स॒दुतरं मेने कठिनं वेद चापरम्‌ ॥ २४ ॥ 
वायुरूपी प्राणते युक्त हुए उन दोनो असुरोको गोद 

लेकर ब्रह्माजीने उनके अङ्खोपर धीरे-धीरे दाथ फेरा । उनमेसे 

पकका रीर तो उन अवन्त कोमल प्रतीत हुमा ओर दूस 

का कठोर ॥ २४॥ 

नामनी तु तयोश्चक्रे स विभुः सलिलोद्धवः। 

खदुरतवयं मधुनौम कटिनः कैटभोऽभवत्‌ ॥ २५॥ 
तत्र जलजजन्मा भगवान्‌ ब्रह्मान उन दोनोका नामकरण- 

संस्कार किया ओर कदा-यह जो गदु ८ कोमल ) द, इसका 

नाम प्मघुः होगा ओर जो कठोर दैः वह "कैटभः 

कहटयेगा ॥ २५ ॥ 

तो दत्यो करतनामानौ -चेरतुरवलदपिंतौ । 

सर्वमेकार्णवं खोक योद्धकामो सटुजंयौ ॥ २६॥ 


१९६ 


श्रीमहाभारते निकभागे 


[ हरिवते 


नाम निश्चित श्च जनेपर वे दोर्नौ अत्यन्त दुर्जय दत्य 
व्ररङ़े ध्रमंडते मनवे दक्र युद्धकी दन्छापे समस्त एकार्णव 
जगते विचरन सो ॥ २६ ॥ 
तावागतौ समालोक्य ब्रह्मा ठोकपितामहः । 
पकाणंवाम्बुनिचये तत्रैवान्तरधीयत ॥ २७॥ 
उन दौनेकि युद्धे च्ि आया देख खोकपितामह्‌ 
नर्या वहीं एकार्णवकी जटरदिम अद्दयं हो गये ॥ २७ ॥ 
स पदमे पद्मनाभस्य नाभिमध्यात्‌ समुत्थिते । 
रोचयामास वसति गुद्यां व्रह्मा चघुमंलः ॥ २८॥ 
उन चतुमुख ब्रह्याने भगवान्‌ पद्मनामकरी नामिके मध्य 
मागसे प्रकर हुए कमल्पर दी गुप्तरूपमे निवास करना पद 
किया | २८ ॥ 
तावुभौ जलगर्भ॑स्थौ नाराय्रणपितामहौ । 
वहम्‌ वर्थगणानप्छु हायनो न चकम्पतुः ॥ २९॥ 
वे दोन मगान्‌ नारायण ओर व्र्मा जले भीतर स्थित 
हो बहुत वर्पातक सेते रदे । कमी दिटेतक नदी ॥ २९ ॥ 
अथ दीर्घस्य कालस्य तावुभौ मघुकैथ्भौं । 
आजग्मतुस्तसुदेदो यत्र॒ व्रह्मा व्यवसितः 1 ३०॥ 
तदनन्तर दीर्भकार व्यतीत होनेके पश्चात्‌ वे दोन माई 
मघु ओर कैटभ उस स्धानपर अयि, जरह व्रह्माजी तचरिराजमान 
ये ॥३०॥ 
ट्र तचखरौ घोरौ महाकायौ दुरासदौ । 
अह्मणा ताडितो विष्णुः पद्मनष्ेन रै तद्‌ 
उत्पपाताथ शयनात्‌ पद्मनाभो मदादुतिः ॥ ३१॥ 
उन दुजयः विदा्काय एवं भयंकर असुोकन देखकर 
बर्माजीने कमी नाटमे भगवान्‌ विण्णुको टोका ( उर 
जग जानिके ल््यि संकेत क्रिया ) । तवर मदतेभस्वी भगवान्‌ 
पद्मनाभ गय्यासे उख्च्कर खड दो गये }} ३१} 
तद्‌ युद्धमभवद्‌ घोरं तयोस्तस्य च षै तदा । 
पकाणंवे तदा रोके घरैटोक्ये जतां गते ॥ ३२॥ 
उस एकार्णव जगतूरमेः जव करि तीन लोक ज्य मिट 
गये येः उन दोनों असुरो तथा भगवान्‌ विष्णुमै वोर 
युद्ध हज ॥ ३२ ॥ 
तदाभूत्‌ वमु युद्धं व्॑संख्या स्खदाः। 
न च तावद्धरो युद्धे वदा श्रममवापतुः।॥ ३३ ॥ 
उख समय सदो वर्पोतिक वह तुमु युद्ध चलता रहाः 
करित वे दोन अवर युद यकर नही ।॥ ३३॥ 


अथातो दीर्घंकाटस्य तौ दैत्यौ युद्धदुर्मदौ । 
ऊचतुः प्रीतमनसौ देवं नारायणं दसिम्‌. ॥ ३४॥ 
दीर्घकाट्तक युद्ध करै वे दोना रणदुर्मद दैत्य मन- 


दी-मन व्रई प्रसन्न हुए ओर भगवान, नासयण दसि दस 
प्रकार व्रेटे-|॥ ३४ ॥ 
परीत खस्तव युद्धेन दत््यस्चं मृव्युसावयो; । 
आचां जिं न यघोवीं सल्दिन परिप्टुता ॥ ३५ ॥ 
षेव ¡ वुग्दरि युद हम दोनो भार ब्रह प्रसन्न ६} 
छम हमारे स्वि स्पृहणीय मल्युष्रःर्ितु म दोर्नेको वद 
मारो, जदोकी प्रथ्वी जम ह्वी हद न चये ॥ २५ ॥ 
हतौ च तय पुरत्वं प्रापु्राचः सुसत्तम । 
यो धावा युधि निर्जेता तम्यावां विदितौ सुती॥ ३६॥ 
भमुरशरे् ! मारे जनिपर्‌ दम दोनो! आपके पुध्रमावको 
प्राप्त देमि; क्यं व्रह्मा्जाने विधान वनाद्वियादैकरिजो ष 
युद्धम जीत ठे, हम उसके पुत्रो ॥ ३६॥ ` 
सतु गर्य खये दभ्या दैत्यौ तावभ्यपीडयत्‌ । 
जग्मतुर्निधनं चापि वावुभौ मधुकैटभौ ॥ २७॥ 
उनक्री वात सुनकर सगवानू विष्णरुने उष युद्धस्य 
उन दै दोन हयथेमि पकदकर दवाया | द्यते मधु ओर 
कैटभ दोर्नोकी मषु षो गवी | ३४॥ 
ती तौ चप्यृतौ तेये चपुभ्यौमिकतां गतौ । 
मेदो सुसुचतुद॑त्यौ मध्यमानौ जलो्भिभिः ॥ ३८॥ 
मेसा तञ्लं व्याप्तं साभ्यामन्तर्दधे सवः। 
नाययण्श्च भगवन्छ्छजत्‌ सख पुनः प्रजाः ॥ ३९ ॥ 
मरनैपर उन देोर्नोकी यँ ज्म द्रयङेर्‌ एक हो गर्वी । 
पिर जन्शटी लदरेसि मयिन दक्र उन दोनो दैव्येन जो मेद्‌ 
खोदा, उससे अच्छादित द्येक्रर वदेव जल अंदयय हो गया। 
उसीपर भगवान्‌ नारवणने नना प्रकारे जीवक चष्ट 
की॥ ३८-३९॥ ॥ 
दैत्ययेमेदसाच्छन्ना मेदिनीति तवः स्दरता । 
प्रभावात्‌ पश्चनाभस्य श्चण्वती जगती रता ॥ ४०॥ 
उन दैत्यो फे मेदसे सारी पृर्वी दक गयी, इसस्थि 
'ेदिनी" नामस विख्यात हई । भगवान्‌ पद्मनाभङे प्रभावसे 
यह्‌ जगत्तकरे वि श्चन आधार चन गयी | ४० ॥ 
वराहेण पुस भूत्वा माक॑ण्डेयस्य पदयतः। 
विपणेनाहमेकेन तोयमध्यात्‌ समुद्धृता ॥ ४९॥ 
पूर्वकालमे वारादस्य धारण करे इन्दी भगवान्‌ 
नारायणने मारकेण्डेयजीके देखते-देखते मुसने एक दादृपर उठाकर 
पानी भीतरसे वाहर निकाला था | ४१॥ 
हृतां क्रमता भूयस्तदा युष्माकमध्रतः। 
चले: सक्रादाद्‌ दैत्यस्य विष्णुना प्रभविष्णुना ॥ ४९ ॥ 
फिर उस्र दिन आपलोगोके सामने दी प्रमावदाटी 
भगवान्‌ चिप्णुने अपने पग उदाकर भिलोकीको नापते हुए 
भभ दैत्यराज बलिक पासे छीन लिया ॥ ४२॥ 


हरिवंशपवं 1 


द्विपश्चारत्तमो ऽध्यायः 


१९७ 


णि 


साम्प्रतं विद्यमानादमेनमेव गदाधरम्‌ । 
अनाथ! जगते नायं शरण्यं द्रारणं गता ॥ ४३॥ 
दूस सम्य भी यत्यन्त कषम पडुकर अनाथ-सी दौ 
र्दी ओर इन्दी शरणागतवत्सल जगन्नाथ रदाधर्ी 
दारणे आयी दहर ॥ ४३॥ 
अभगिनिः सुवर्णस्य गुर्गवां सथां गुखः स्मरतः। 
नष्टत्राणां गुरुः सोमो मम नासयणो गुखः ॥ ४३॥ 
अग्नि सुवर्णका रुख दै! सूयं समस्त किरणोके गुरु माने 
गे ह | नक्ष्नौफे २२ चन्द्रमा दैः परु मेरे गुरु ये भगवान्‌ 
नारायण दी द ॥ ४४ ॥ 
यदहं धा(र्याम्येक्रा जगत्‌ स्थावर्जद्भमम्‌ । 
मया धतं धार्यते सर्वमेतद्‌ गश्ाधरः ॥ ४५॥ 
अक्रेखी मै जिस चराचर जगत्को धारण करती हूः मेरे 
द्वारा धारण क्रिये गप्र इस समस्त जगत्‌को ( तथा मुञ्चे भी ) 
मगवान्‌ गद्माधर्‌ दी धारण कसे ई ॥ ४५॥ 
जामदग्न्येन रामेण भारावतरणेष्सया। 
रोषात्‌ श्िःसघरृत्वो ऽदं क्षतरियैर्विप्रयोजिता ॥ ४६॥ 
इन्दनि ही जमदभ्निनन्दन परयुरामके रूपमे प्रकट 
होकर मेरा भार उतारनेकी . इच्छसे. रोपपू्वक मुसते दीस 
चार भ्रियत रहित किया थ| ४६ ॥ 
सासि वेद्यां समायेष्य तर्पिता चपरोणितैः । 
भार्गवेण पितुः अद्ध कड्यपाय निवेदिता ॥ ४७॥ 
मे वदी हँ, जिते रणयर्की वेदीमे प्रतिष्ठित करके 
भरगुनन्दन परञ्चरामने राजाओकि रक्तसे वृक्षक्रिया था ओर 
पिताकरे श्राद्धमे महपिं कव्यपकरो मेरा दान कर दिया था ॥४७॥ 
मांसमेद्यऽस्थिदु्गन्ध। दिग्धा क्षनियन्लोणितैः। 
रजखलेव युवतिः कश्यपं समुपस्थित ॥ ४८॥ 
मे भन्निर्ोके रक्तसे मीमी हुई थी । मेरे णरीरसे ( मरे 
हुए राजा्ओक ) मांसः मेद ओर अचिरवोकरी दुर्गन्ध फैलरदी 
थी । उसी दशाम रजस्ल युवतीकी भोति मै महर्पिं कदयपकी 
सेवामे उपल्ित हुई ॥ ४८ ॥ 
स मां ब्रहमरपिरण्याह किसुविं त्वमवाङ्‌ सुखी 
वीरपत्नीवतमिदं धारयन्ती विषीदसि ॥ ४९॥ 
उस समय व्रह्मपिं कश्यपे सुद्यसे कहा--वसुधे ! क्या 
कारण दै तू नीचे मुख कि वीरपत्नी इस व्रतको धारण 
` करे विषादम वी हुई है ? ॥ ४९॥ 
साष्टं॑विक्षापितवती कर्यपं छोकभावनम्‌। 
पतयो मे हता ब्रह्मन्‌ भागवेण महात्मना ॥ ५०॥ 
। उस समय मैने लोकपिता कद्यथजीको यदह सूचित किया-- 
'्मन्‌ | महात्मा परशुरामने मेरे पतियोको मार डाला द।५०॥ 


च 


साहं विद्यीना विकान्तैः क्षत्रियैः शखवृ्तिभिः। 

विधा श्रुल्यनगरा न॒ धारयितुभुन्सहे ॥ ५१॥ 
'ठसरप्रहण दी जिनी जीविकराकरा साधन थाः उन 

पराक्रमी क्षत्रिये दीन दोकरमें विधवा होगग्रीहूं | मेरे 

सरि नगर राजासि शल्य दो गये दै, अतः अव मुदम 

जीवितं रहनेका उत्साह नदीं र गय। ह ॥ ५१ ॥ 

तन्मह्यं दीयतां भती भगवंस्त्यत्समो चपः। 

रक्षेत्‌ सग्रामिनगसं यो मां सागरमलिनीम्‌ ॥ ५२ ॥ 
"अतः भगवन्‌ ! मुश्चे एसा कोई नरेद पति दीजिपरे, जो 

आपके समान ही शक्तिदाटी हो यौर समुतरसेधिरी हू मेरी 

आम ओर नगरोसहित रक्षा कर सर ॥ ५२॥ 

स श्रुत्वा भगवान्‌ वाक्यं वाटमिव्यत्रवीत्‌ पमुः। 

ततो मां मानवेन्द्राय मनये स प्रदत्तवान्‌ ॥ ५३॥ 
प्रमावक्षाटी भगवान्‌ कदयपने मेरी यह व्रात सुनकर 

कहा व्वहुत अच्छाः 1 भिर उन्होने मुञ्चे राजा मनुके हाथमे 

देदिग्रा॥५३॥ 

सा मयुप्रभवं दिष्यं पाप्यक््वाङुङुटं सृप्‌ । 

विपुेनासि किन पार्थात्‌ पार्थिवं गत।(॥ ५४॥ 
हस प्रकार मे वैवस्वत मनुते प्रकट हुए. दिव्य इष्वाकर- 

कुलमे आ! पर्हुची । उस करुल्करे समी रोग नरेश ये । वर्हौ 

दीर्षक्रारतक शक राजाते दुसरे राजा अधिकारे आती 

रदी ॥ ५४ ॥ 

एवं दत्त सि मनवे म(नवेन्द्राय धीमते। 

भुक्त राजसहश्चेश्च मदहर्िदुलसम्मितैः ॥ ५५॥ 
इस प्रकार मे बुद्धिमान्‌ राजा मनु हाथमे सप गयी 

ओर मह्ंमुदायफरे तुद्य तेजी सदसो राजा्मौके 

उपभोगे आयी ॥ ५५ ॥ 

वहवः क्षत्रियाः श्रय मां जित्वा दिवमाधिताः। 

ते च काठब्रहलं प्राप्य मय्येव भरखयं गताः ॥ ५६॥ 
बहुत-पे शूरवीर शन्निय सुने जीतकर सखर्गलोकको चे 

गये । वे कारके अधीन दोकर मुके ही टीन हुए थे ॥५६॥ 

मत्ते विग्रहा खोके वृत्ता वर्तन्त एव च। 

क्षत्रियाणां वलवतां संग्रमिष्वनिवर्तिनाम्‌ ॥ ५७॥ 
जगते मेरे ही च्थि युद्धस्यसम कभी पीठ न दिखने. 

वलि व्रल्वान्‌ कनिर्योके परस्पर युद्ध हुए द ओर दो रे 

्॥ ५७ ॥ 

पतद्‌ युष्मस्रदृचेन दैवेन परिपास्यते । 

जगद्धितार्थं छुरत राक्षां देत रणक्चये ॥ ५८ ॥ 
आपरोगोके द्वारा परिचालिति दैवे दाया दी इस 

जगत्का परिपालन होता दै, अतः आप जगते दित चि 


१९८ 


श्रीमहाभारते लिलभागे 


[ सविते 


ता कोद उपाय कीञज्िः जिससे रणभूमिभै राजाओका 

संहार दो॥ ५८ ॥ 

यद्यस्ति मयि कारुण्यं भारदोधिलस्यकारणात्‌ । 

पकश्चक्रधरः श्रीमानभयं मे प्रयच्छतु ॥ ५९ ॥ 
यदि मुञ्चपर भगवान्की दया हो तो यहं एकमात्र 

चक्रधारी श्रीमान्‌ मगवान्‌ विष्णु मेरा भार रिथिट करनेके 

ल्ि सन्ने अमयदान दे ॥ ५९ ॥ 


यमहं भारसंतत्ता सम्पतता शरणार्थिनी । 

भासे यद्यवयोक्तव्यो विष्णुरेष वीतु माम्‌ ॥ ६० ॥ 
म॑ भासते संतक्च होकर गरण खोजती हुई जिनकी 

शरणमे आयी हू वेष्टी ये भगवान्‌ विष्णु यदिमेराभार 


उतारना उचित समक्षे तो इसके ल्यि युन्ने आदवासन 


द ॥६०॥ 


इति श्रीमहाभारते खिलभागे एरिवंदो हरिवंशपवंणि धरणीचाकये द्विपन्चाशत्तमोऽप्यायः ॥ ५२ ॥ 
स प्रकार श्रीमहाभारत लिरुमाग हरिवंशे अन्तमैत हरिवंशपवमे पृथवीफा वक्यविषयक वायन्वे{ भव्याय पूरा हुमा ॥ ५२ ॥ 


त्रिपश्चारात्तमोऽध्यायः 
ब्रह्माजीकी आज्ञासे देवतार्ओका अंशाबतरण 


वैशम्पायन उवाच 
ते श्ुत्वा पृथिवीवाक्यं स्वं पव दिवौकसः । 
तदर्थरूत्यं संचिन्त्य पितामहमथाघ्रुवन्‌ ॥ १ ॥ 
वेदाम्पायनजी कते ह--जनमेजय ! प्रथ्वीकी यह 
वात सुनकर वे सभी देवता उस प्रयोजनको सिद्ध करनेवाले 
कर्तन्यका चिन्तन करते हुए बह्याजीसे इस प्रकार बोटे-॥ १॥। 
भगवन्‌ हियतामस्या धरण्या भारसंततिः। 
श्सैरकती लोकानां त्वं हि लोक्तस्य ब्रे्वरः ॥ २ ॥ 
ध्भगवन्‌ | आप इस प्रण्वीफे वदे दए भारो उतास्यिः 
क्योकि आप ही सव छोगोके शरीरकी खष्टि करनेवाठे तथा 
सम्पूर्णं जगत्‌के ईश्वर दँ ॥ २ ॥ 
यत्‌ कर्तव्यं महेन्द्रेण यमेन चरुणेन च । 
यद्‌ वा कय घनेदोन खयं नारायणेन चा ॥ २ ॥ 
दरस विप्रयमेँ देवराज इन्द्रः वरुण॒ ओर यमृकरो क्या 
करना चाहिये १ धनाध्यक्न क्रुेर अथवा साक्षात्‌ भगवान्‌ 
नारायणका भी क्या कर्तव्य दै१॥ ३॥ 
यद्‌ वा चन्द्रमसा कार्य भास्करेणानिटेन चा । 
आित्येवसुभिवौपि र्दवेवौ लोकभावनैः॥ ४ ॥ 
ध्चन्द्रमाः सूर्य, वायुः बारह आदित्य, आढ वसु तथा 
लोकौका कल्याण करनेवाले ग्यारह सद्रौको भी इत विपयमे 
-क्या करना च्य १॥ ४ ॥ 
अभ्वि्यां देववैचाभ्यां साध्यैवा चिद्दराट्यैः। 
बहस्पत्युरानोभ्यां वा कालेन कलिनापि वा ॥ ५ ॥ 
ष्दोनौ देवव अश्विनीकुमारः खर्गवासी साध्वगणः 
वृहस्पतिः शुक्राचार्य कार तथा कलिका भी इस समय क्या 
कर्तव्य है १ ॥ ५॥ 
महेश्वरेण वा यद्यन्‌ विदाखेन गुदेन चा । 
यक्षराक्षसगन्धर्वश्चारणेवौ महोरगैः ॥ ६ ॥ 


ध्रह्यन्‌ ! भगवान्‌ महेश्वरः विद्याः स्वामिकार्तिकेयः 
यक्षः रास, गन्धर्वः चारण तथा बेदे-बहे ना्गेको भी दस 
कायक सम्बन्धम्‌ क्या करना दै १॥ ६ ॥ 
पतद्धैः पर्वतैश्वापि सागरेव मदोर्मिभिः। 
गङ्गासुखाभिदिन्याभिः सरिद्धिवी सुरेश्वर ॥ ७ ॥ 

भुरेधर 1 पी, पवतः बड़ी-बड़ी ट्रे युक्त समुर 
तथा गद्धा आदि दिव्य सरिते भी दस विषयमे क्या कर 
सकती ई १॥ ७॥ 
श्ीध्रमाक्षापय विभो कथमंशः प्रयुज्यताम्‌ । 
यदिते पार्थिवं कायं कायं पार्िवविग्रहे॥ ८ ॥ 

प्रमो ! गीघ्र आचा द हम अपने अंयाका प्रयोग किस 
ग्रकार करं १ यदि आपको पर्वे हितका कार्यं अवश्य 
करना दै तो वताश्ये, राजार्थमिं युद्धकी ज्वाला जगानेके ल्ि 
हम सव किंस उपाये कामले ?॥८॥ 


कथमंशावतरणं कुमः सये पितामष् 
अन्तरिक्षगता ये च पृथिव्यां पाथिवश्ये॥ ९ ॥ 
सदस्यानां च विप्राणां पार्थिवानां ङुटेघु च । 
अयोनिजाश्वेव तनुः खजामो जगतीतङे ॥ १०॥ 
ध्पितामह ! हम सव्र रोग किस प्रकार अंधावतार्‌ ग्रहण 
कर । हभमेसे जो देवता अन्तरिक्षे रहते दँ तथा जो प्रथ्वीपर 
पाथिवरूपते विराजमान दैः वे सव सदस्य ( ऋत्विज) ब्राहमणो 
तथा राजाओके कलमे अवतीणं हों तथा हमलोग॒भूतलपर 
अपने अयोनिज दारीरोकी मी खष्टि करे" | ९-१० || ` 
खुराणामेककायौणां श्ुत्वेतन्निधितं मतम्‌ । 
देवैः परिवृतः प्राह वाक्यं लखोकपितःमहः ॥ १९॥ 
एक कार्यकर ल्यि यतनस्ील हुए. देवताओका यह निशित 
मत सुनकर उन देवताति धिरे दए. लोकपितामह बह्माजीने 
यद- वात कदी) ११९ ॥ 


| 


हरिवंशं 1 


निपश्चाश्त्तमोऽध्यायः 


१९९. 


व 


रोचते मे खरेष्ठा युष्माकमपि निश्चयः । 
खजध्वं खरारीरांहास्तेजस।ऽ.ऽत्मसमान्‌ सुवि ॥१२॥ 

भुरशरेषगण | ठुमोगोका जो निश्चय है, वह सुनने भी 
अच्छा लगता है । त॒मलोग भूतल्पर अपने ही समान तेस 
अपने शरीरे अंशको प्रकट करो ॥ १२॥ 


सव॑ एव॒ सुरश्े्ठस्तेजोभिरवयेहत । 
भावयन्तो भुवं देवीं छज्ध्वा निुवनश्चियम्‌ ॥ १३॥ 


श्रेष्ट देवताओं ! त॒म समी लोग अपने-अपने तेजसे 
अवतार खे ओर तीनो जेकरोकौ शश्मीकरो पाकर मदेवीकी 
र्षा करते हुए वहा रदो ॥ १३॥ । 
पार्थिवे भारते वंशे पूर्वैव व्रिजानता । 
पृथिव्यां सम्ध्रममिमं श्रूयतां यन्मया कतम्‌ ॥१४॥ 

धम परथ्वीपर अनेवाठे इस भयको पहख्ते दी जानता 
ण } अतः भूत्प्र खित भरतवंयके च्िमेने जो कुछ 
( विचार ) क्रिया है, उत्ते सुनो ॥ १४ ॥ 


समुद्रेऽहं पुर पृं वेखमासाय पञ्िमाम्‌ । 
आखं सार्धं तनूजेन कङ्यपेन महात्मना ॥ १५॥ 
कथाभिः पूचैवृत्तभिर्क्वेदायुगामिभिः । 
इतिवृत्तेश्च बहुभिः पुराणप्रभवेशगेः ॥ १६॥ 
'्पहटेकी बात हैः मे पूवं समद्रके पश्चिम तटपर अधने 
पुत्र महात्मा कश्यपकरे साय बैठा था ! उस समय छोक ओर 
वेदका अनुसरण करनेवारी प्राचीन कथायो तथा ब्रहुत-से 
उत्तम गुणवाले पौराणिक इतिहार्सोकी चर्वाद्वारा मै समय 
तरिता रहा था] १५.१६ ॥ 
कुतस्तु कथास्तास्ता; समुद्रः सह गङ्गया । 
समीपमाजगामाशु युक्तस्तोयदमारुतेः ॥ १७॥ 
'उन-उन कथावातांओंको कहते-खुनते हुए मेरे समीप 
मूर्तिमती गङ्गाके साथ मूर्तिमान्‌ समुद्र॒ शीघतापूर्वक्र आया । 
उसके साथ मेधोकी घ्या तथा वायुक्रा भी आगमन 
हुआ था ॥ १७ ॥ 


स॒ वौचिषिपमां कुवन्‌ गति वेगतरङ्धिणीम्‌ । 
यादोगणविचित्रेण संच्छननस्तोयवाससा ॥ १८ ॥ 
"वह ऊची-नीनची लहरौके कारण वेग एव तरज्ञोते युक्त 
अपनी गतिको विपम बनाता हुजा आया था । जलजन्तुओक 
कारण विचित्र दिखायी देनेवाले जलरूपी वससे उसक्रा 
शरीर ठका हुआ था ॥ १८.॥ 
हाङ्कपुकामलतसुः प्रवारखुमणिभूष्रणः। 
युकश्चन्द्रमसा पूर्णैः साश्रगस्भीरनिःस्नः ॥ १९॥ 
'उसके दारीरकी कान्ति शद्ध ओर मुक्ताओसे अत्यन्त 
निर्मल दिखायी देती थी } बह मँगे जौर मभियोके आभूषणो 


वे विभूषित तथा पूरणं चन्द्रमासे संयुक्त होनेके कारण उद्वेठित 
हो मेषे समान गम्भीर गर्जना कर रदा था ॥ १९ ॥ 
स मां परिभवन्नेव खां वेलां समतिक्रमन्‌ । 
्ेव्यामास चपटी वणैरम्बुविसखवेः ॥ २० ॥ 
८उसने मेरा तिश्स्कारसा करते हुए अपनी मर्यादाका 
उष्हन करके अपने चखल एवं नमकीन जलविन्दुञेसि सुमे 
भिगोदिया | २० ॥ 
तं च देशं व्यव्ितः समुद्रो ऽद्धिविमर्दिवम्‌ 1 
उक्तः संरघ्यया वाचा शान्तोऽखीति मया तद्‌ ॥ २९॥ 
(जव समुद्र अपने उमृ द्ुए जक्ते उस स्थानको 
नष्ट-रष्ट करने च्यि उघ्रत हया, तव मने क्रोधमरी 
वाणीरमे उसे कदा---“नू दान्त हो जाः |॥ २१ ॥ 
दान्तो ऽसीत्युन्छम।चस्तु तत्वं सागसे गतः। 
संहतोर्मितरङ्ञोघः स्थितो राजश्चिया ज्वलन्‌ ॥ २२॥ 
““्रान्त हो जाः इतना कहते ही समुद्र ततुता ( सृष्षमता) 
को प्राप्त हो गया] उसकी ऊर्मिं ओर तरङ्कोका प्रवाह द्र 
गया ओर वह राजलक्ष्मीसे प्रकारित होता हुआ मेरे समीप 
खड़ा हो गया ॥ २२॥ 
भूयश्चैव मया शप्तः समुद्रः सह॒ गङ्गया । 
सकारणां मति कृत्वा युष्माकं हित काम्यया ॥ २३॥ 
धफिर मनि मन-ही-मन पृध्वीकरे भार उतारनेकरे देठका 
विचार करके तमस्येगोफे हितकी कामनसे गङ्खासहित समुद्र- 
को पुनः शाप देते हुए कदा ॥ २३ ॥ 
यस्मत्‌ त्वं राजतुल्येन वपुषा समुपस्ितः। 
गच्छार्णव महीपालो राजैव त्वं भविष्यसि ॥ २४ ॥ 
'समुद्र ! तू राजाक्रे समान शरीर धारण करके मेरे 
निकट आया है, अतः जाः तू इस प्रध्वीका पालन करमेवाल्म 
राजा दी होगा| २४ ॥ 
तत्रापि सहजां छीलां धारयन्‌ स्वेन तेजसा । 
भविष्यसि णां भत भारतानां कुखोद्धदः ॥ २५॥ 
'वहों मी अपनी सहज लीलाको धारण किये अपने तेजसे 
तू मनुरप्योका भरण-पोपग करनेवाला तथा भरतवंशाका भार 
वहन करनेमे समथ होगा ॥ २५ ॥ 
शान्तोऽसखीति मयोक्तस्त्वं यच्ासि तुतां गतः। 
सखुतवुर्य॑शसा छोके शान्तनुस्त्पं भविष्यसि ॥ २६॥ 
ष्शान्त हो जाः मेरे इतना कहते दी जो तू शान्त 
होकर तनुता ( सृक्ष्मता ) को प्राप हुमा है, इसल्मि तू 
सुन्दर शरीरसे युक्त एवं रस होकर संसारम गान्तनु, नामते 
विख्यात होगा ॥ २६ ॥ 
इयमप्यायतापाक्ी गङ्धा सवीद्द्ोभना । 
रूपिणी च सरिच्दूष्ठा तन्न त्वामुपयास्यति ॥ २७॥ 


०० 


ध्यह विशाललोचना, सर्वाद्धस॒न्दरी, सरितार्ओमि शरेष्ठ 
मूर्तिमती गङ्गा भी वरहो व्दारी सेवा उपसित होगी ॥२७॥ 
पवमुक्तस्तु मां श्रुग्धः खो ऽभिवीक्ष्यार्णवो ऽचरत्‌ । 
मां प्रभो देवदेवानां किमर्थं दाप्तवानसि ॥ २८ ॥ 
"मेरे ठेसा कहनेपर घम्म भरा हुआ सद्र मेरी ओर 
देखकर बोख--ददेदेवेश्वर ! आपने मुन्ने शाप र्यो 
दिया !॥ २८ ॥ 
अहं तव विधेयात्मा त्वत्छतस्त्वत्परायणः) 
अदापोऽसददोवीक्यैरात्मजं मां किमात्मना ॥ २९.॥ 
प्मेरा यह्‌ शरीर तो आपकी आज्ञाका पालक दै । आपने 
ही इसक्री सचना की है ओर यह सदा आपकी सेवर्म ही तत्यर 
रहता हे । मेँ आपक्रा पुत्र हू । आपने खयं ही मुन्ने त 
वचनोदायः जो आप ओर मेरे अनुस्प न्दी हैः शप 
कैसे दे दिया १॥२९॥ 
भगवंस्त्वत्प्रसापरेन वेगात्‌ पर्वणि वर्धितः। 
यद्यहं चलितो ब्रह्मन्‌ कोऽ दोषो ममात्मनः ॥ ३०॥ 
ध्मगवन्‌ ! आपकी ही कृपते पूर्णिमफरे दिन मेँ वदे 
वेगसे वद जाता हह । ब्रह्मन्‌ ! इस सहज नियमते प्रेरित 
होकर यदि मँ अपनी मर्यादासे विचलित दौ गया तो दस्मै 
मेरा अपना दोपक्मा है१॥३०॥ 
क्षिप्ताभिः पवनैरद्धिः स्पृष्टो यद्यसि पर्वणि । 
अघन मे कि यु भगवन्‌ विद्यते श्षापकारणम्‌ ॥ ३१॥ 
'मभगवन्‌ ! आज पृणिमाक्रे दिन प्रबल वायुद्वाया कके 
गये मेरे जख्ते यदि आपकर स्पशं दो गया, आप भीग गये 
तो इसमे मुने काप पराप्त होनेका क्या कारण है १॥ ३१॥ 
उद्धतैश्च महावातैः परच्रदधैश्च वलाहकः । 
पर्वणा चेन्दुयुक्तेन निभिः श्चुव्धोऽस्मि कारणेः॥ ३२॥ 
'उटी हुई प्रचण्ड ्ओंधी, वरद हुए मदान्‌ मेष ओर 
उगे टुए चन्द्रमसे युक्त पूणिमाका पर्व-दइन तीन कारेसि 
मे श्चुव्य ( उद्ेलित ) हे उठा था ॥ ३२॥ 
पवं यथपराद्धोऽहं कारणैस्त्वत्परकरिपतैः । 
क्चन्त॒म्द॑सि मे ब्रह्मन्छापोःऽयं विनिवर्त्यताम्‌ ॥ ३३ ॥ 
ध्रद्यन्‌ | इस तरद आयकरे बनाये हुए कारर्गो (नियमों) 
सेदीश्ुव्धहोकरयदि मैने अपराध क्रियादहैतो अप 
उसके व्यि मुषे ध्मा कर देः ओर दस गापकौ छोटा ठे ॥ 
पवं मयि निरालम्बे शापाच्छिथितां गते । 
कारण्यं कुर देवेशा प्रमाणं ययवेशक्चसे ॥ २४ ॥ 
"देवेश्वर ! मुन्ने दूसरा कोई सहारा देनेवाव्म नहीं है । मँ 
शापसे दिथिल दो गया हँ । यदि आप शरणागतकी रक्षाका 


प्रतिपादन करनेवाले प्रमाणपर दृष्टि रखते र॑ तो भुन्षपर 
अवद्य दया करं ॥ ३४॥ 


भीमहाभारते खिठभागे 


[ शसिविंशे 


अस्यास्तु देवगद्ाया गां गतायास्त्वदाक्षया । 
मम दोषात्‌ सदोप्रायाः प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥ ३५॥ 
८यद देवनदी गङ्गा आपकर ही आश्ञसि इस भूतट्पर 
अवतीर्णे दई है । ( दक्का कोई दोपर नीडे ) इसे मेरे दोष- 
से दी दोप्रकी भागिनी द्येना षडा हैः अतः आप इसपर कृपा 
करं | २५॥ 
तमहं श्छक्ष्णया चाचा महाणैवमधाव्रचम्‌ । 
अकारणक्षं देवानां घ्रस्तं शापानखेन तम्‌ ॥ २६॥ 
(महासागर देवताभकि भूमारदरणस्य उदेष्यको नदीं 
जानता था; अतः मेर शापाग्निमे भयमीत ह्य उठा था | उक्ष 
समय मैन मधुर वाणीद्यारा उसे सान्त्वना देते हुए कहा-॥ 
शान्ति धज न भेतव्यं प्रसन्नोऽसि महोदधे। 
हापेऽसिन्‌ सरिता नाथ भविष्यं श्रृणु कारणम्‌ ३७] 
(महोदये | शान्त हो जाभो । तुह उरना नदीं च्िये। 
य तुमपर प्रसन्न हू । नदीश्वर | इस शपर्म जो मावी कारण 
( उदय ) है उते व्रताता हूः सुनो-- ॥ ३७ ॥ 
त्वं गच्छ भारते वंशे स्दं दें स्वेन तेजसा । 
आधत्ख श्रितां नाथत्यक्त्येमां साग्र तनुम्‌॥ २८॥ 
प्सरितार्थे्रि स्वामी समुद्र | ठम अपने तेजसे स 
सागर-शरीरको खोदकर अर्थात्‌ योगवरते अगने-यपिको दो 
रू्पेमि बिभक्त करके (कसे ते यरो रह जाय ओर दूसरे रूपे) , 
जाओ अर भरतवंदमे अपने यरीसको गर्भम सापि करो ॥ 
महोदधे महीपाटस्तत्र राजध्रिया वृतः। 
पाठ्यंश्चतुरो वणौन्‌ रंस्यसे सिलेश्वर ॥ ३९॥ 
(जल्के स्वामी महासागर { उस मरतवंश्मे भूपाल 
बनकर राजगगक्ष्मीसे सम्यन्न द्यो ठम चारो वर्णका पाल्न 
करते दए डे सुस रदोगे ॥ ३९ ॥ 
द्यं च ते सरिखरेष्ठा विभ्रती रूपमुत्तमम्‌ । । 
तत्कालं रमणीयाङ्की गङ्धा परिचरिष्यति ॥ ४०॥ 
ष्यह नो तुम्हारी प्रिवा सरिताओमि श्रेष्ठ गङ्खा 2, यहं 
मी उक्त समय रमणीय अङ्गौसि सुजोमित परम सुन्दर रूप 
धारण करके वरहो वुग्दारी सेवा करेगी ॥ ४० ॥ 
अनया स्ट जाहन्या मोदमानो ममाऽऽक्षया । , 
शमं सलिलसंकलेदं विरूमरिपष्यसि सागर ॥ ४१॥ 
ध्सागर [ तुम मेरी आश्ञासे व्हा दक्त जाहवीके साथ 
आनन्द्पू्वक रदति हुए सुद्चे जलख्ते भिगोनेकरे कारण 
मिले हुए इस शापक दुःखम भूल जाओगे ॥ ८१ ॥ 
त्वरता चैव कर्तव्यं त्वयेदं मम शक्षासनम्‌ । 
प्राजापत्येन विधिना गुह्या सह॒ सागर ॥ ४२॥ 


हसविंशपवं 1 


न्समुद्र | तर्ग्े ब्रहुत शीघ्र मेरी इस आश्चका पाटन 
, करना चाहिये । वो इस गद्धक्रे साथ ठश्दार प्राजापत्य 
विधित विवाह देगा ॥ ४२॥ 
वसवः प्रच्युताः सख्गौत्‌ भ्विषएठाश्च रसातलम्‌ 1 
तेषाभुत्पादनाथीय त्वं मया विनियोजितः ॥ ४३ ॥ 
"या वसु खर्गते भ्रष्ट होकर रसातलम जा पूवि दै । 
उन्दं मनुष्यस्य उत्पन्न करनेके व्यि मेने वुम्दे नियुक्त 
कियादे॥ ४२॥ 
यष्टौ ताक्चाहवी गभौनपत्यार्थं दधात्वियम्‌ । 
विभावसेस्तुल्यगुणान्‌ खराणां भ्रीतिवध॑नान्‌.॥ ४४ ॥ 
'अग्निदेवकरे समान शुणश्ाली तथा 'देवतार्ओंकी 
प्रसन्नताको वदानेवाले उन आरो वसुरथको संतानरूपसे 
उत्पन्न करनेके ल्ि यह गज्ञा ठ॒मसे गर्भं धारण करे ॥४४॥ 
उत्पाद्य त्वं बसृन्खीधं रत्वा फुरुकःरं मदत्‌ । 
प्रवे्टासि तं त्यक्त्वा पुनः सागर सागरीम्‌ ॥ ४५॥ 
{सागर ! तुम वपुओ्रो शीघ्र ही जन्म देकर कुरकुख्की 
महत्ता ्रदानेके अनन्तर उस मानवहरीरका त्याग करके 
पुनः; अपने समुद्ररूपमे प्रवे करोगे ॥ ४५ ॥ 
पवमेतन्मया पूर्वं दहिताथ वः सुरोत्तमाः । 
भविष्यं परयता भारं पृथिव्याः पार्थिवात्मकम्‌॥ ४६॥ 
पसुरशरेष्ठगण | इस प्रकार मैने भविष्ये होनेवटे 
पृध्वीके राजसमूहरूपी भारफो देखकर वतम्हारे हितके ल्यि 
पके ही यह कार्यं कर दिया है ॥ ४६ ॥ 
तदेष ॒श्ान्तनेोर्वराः पृथिन्यां रोपितो मया 1 
चसबो ये च ग्ञायासुत्पनाखिदिवौकसः ॥ ७७ ॥ 
अद्यापि भुवि गाद्धेयस्तत्रैव वस्ुर्टमः। 
सेमे वसवः प्रात्ताः स पकः परिलम्बते ॥ ४८॥ 
"इस तरह भूतल्पर शान्तनुके वंशाका वीजारोपण मने कर 
दिया द । सर्गे रहनेवले जो वसु ये, वे गद्धक्रे गर्भ॑से उसयन्न 
हो चुके भौर उन्मेस ये सात वसु यहो आग्ये, परंतु 
एकमात्र आ्र्वो वसु गङधाका पुत्र होकर अवतक वरहो 
परथ्वीपर ही ठक रहा है ॥ ४७-४८ ॥ 
द्वितीयायां स खष्टायां द्वितीया शान्तनोस्तञ्ः 1 
विचिध्रवीर्यो दयुतिमानासीद्‌ राजा प्रतापवान्‌ ॥ ४९॥ 
'्शान्तनुकी दूरी पत्नी सत्यवतीके साथ पतिका समागम 
दोनेपर भीप्मकी अपेक्षा जो दुसरा पु उत्पन्न हु थाः 
उसका नाम विचि्रवीयं था । वह कुरकुखका तेजखी एवं 
प्रतापी राजा था ४९ ॥ 
वैचि्रवीयो द्वावेव पाथिवौ वि साम्प्रतम्‌ 1 
 धृतरषटश्च पण्डुश्च विख्यातौ पुरूपप॑भो ॥ ५० ॥ 


तरिपश्चादात्तमोऽध्यायः 


-------------------------------<-----------------~--------------------------~- 


२०१... 


'विचिव्रवीर्थके दो ही पुत्र इसत समय पृरथ्वीपर वर्तमान 
ह । वे दोनो दी रजा एवं पुरुपरोमे श्रेष्ठ ई । धृतरा ओर 
पाण्डु नामसे उनकी ख्याति है ॥ ५० ॥“ 
तघर पाण्डोःधिया जुष्टे ढे भायं सम्बभूवतः। 
शमे क्न्ती च मद्व च देवयोषोपमे तुते॥ ५१॥ 
'उनरमैते पाण्डुरे दो शोभासम्पन्न सुन्दरी पलिया ई, जो 
देवाङ्गना्ेकरि समान रूपवती दै ! उनके नाम ईै-ङन्ती यर 
माद्री ॥ ५१ ॥ 


धृतराष्टस्य रक्षस्तु भार्यैका तुल्यचारिणी । 
गान्धारी भुवि षिख्याता भरतरनित्यं बते स्थिता॥ ५२॥ 
ध्याजा धृतराष्रकी एक ही पत्नी दहै, जो इस भूतल्पर 
गान्धारीके नामते विख्यात दै । वह पिके समान आचारसे 
रहनेवाटी ओर सदा पातित्रत्यधर्मका पाटन करनेवाटी 
हे ॥ ५२॥ 
तत्र वरा विभज्यन्तां विपक्षाः पक्ष एव च। 
पुत्राणां हि तथो राक्षोभ॑विता चिग्रहो महान्‌ ॥ ५२॥ 
“उन दोनों राजाओके पर्व महान्‌ युद्ध देनेवाल ३े। 
त॒मलोग उन्दीके पक्ष ओर विप्षमे पएरथक-पृथक अपने वंश 
उत्पन्न करो ॥ ५३ ॥ ` 
तेषां विमर्दे दायादे पाणां भविता क्षयः। 
युगान्तभ्रतिमं चैव भविष्यति महद्‌ भयम्‌ ॥ ५४ ॥ 
८उनके पैतृक राज्यकरे वटवे सम््न्धमे विवाद होनेपर 
वड़ा भारी संग्राम छिड़ जायगा ओर उसमे बहुत->े मरेशोका 
विनाश होगा । वह महान्‌ युद्ध प्रल्यकाख्के समान भयंकर 
एवं संहारकारी होगा ॥ ५४ ॥ 
सवठेषु नरेन्द्रेषु शान्तयत्खितरेतरम्‌ । 
विविक्तपुरराीधा क्षितिः श्ेधिल्यमेष्यति ॥ ५५ ॥ 
(नव सेनासहित राजारोग उस युद्धम उपथित हेग; 
उस समय एक दूसरेसे ठड़-मिड़कर उन सवकी शान्ति 
( मत्यु ) हो जायगी । उस दसाम इत भूतले समी नगर 
ओर रर निर्जनते हो जा्येगे ओर यद पृथ्वी शिथिख्ताको 
प्राप्त दो जायगी ॥ ५५! 
द्वापरस्य युगस्यान्ते मया ष्टं पुरातनम्‌ । 
क्षयं यास्यन्ति शसेण मानवैः सह पार्थिवाः ॥ ५६॥ 
श्वापरयुगके अन्तम घटित होनेवले इस भावी विनादयको 
मैने पहले ही देख लिया है] उस समय अपने सैनिक 
मनुप्योसित समस भूपाल र्द्रा विनष्ट दो 
जयंगे ॥ ५६ ॥ 
तश्रावशि्टान्‌ मचुजान्‌ सुप्तान्‌ निरि विचेतसः। 
घ कष्यते शाङ्करस्यांशाः पावकेनाखतेजसा ॥ ५७ ॥ 


एः 


श्रीमहाभारते खिरभागे 


[ हरिवंशे 


(उसे युद्धसे जो लोग वच जर्पगे, उन्दं रतम अचेव 
होकर सोते समय भगवान्‌ शङ्करा अंयभूत अदवस्थामा अभि- 
यस्य अखकरे तेजते जाकर भस्म कर डलक्ेमा ॥ ५७ ॥ 
अन्तकप्रतिमे तस्मिन्‌ निवृत्ते कररकर्मेणि 1 
समातमिदमाख्यास्ये तदीयं द्वापरं युगम्‌ ॥ ५८ ॥ 

'्रल्यकालके खमान वह च्रूरतापूर्ण विनादकाण्ड जव 
समाप्त दो जावगाः तत्र मै यह्‌ कर्हुगा करि तीसरा द्वापर 
युग समाप्त दो गवा ॥ ५८ ॥ 
महे्वरशिऽपखते ततो मादेश्वरं युगम्‌ । 
रिष्यं प्रवर्तते पश्चाद्‌ युगं दारुणदश्नम्‌ ॥ ५९ ॥ 

'्परमेदवर विण्णुके पूर्णतम अंशस्वरूप मगवान्‌ श्रीकृष्णकरे 
परमधामको पधारनेपर अव्यन्त मयंकर अन्तिम युग कल्कि 
प्रदरत्ति दोग, जो देखने वड़ा दी दारुण दै ॥ ५९ ॥ 
सधर्मप्राययुरषं खल्पधमेभ्तिग्रहम्‌ । 
उत्सन्नसत्यसंयोगं वर्धितादरतसखंचयम्‌ ॥ ६० ॥ 

'्उस समय मनुप्यंमिं प्रायः अधर्मकी सिति टोगी | 
ध्मेको बहुत कम छोग मर्ण करगे उनम सत्यका सयोग 
नदीं रहेगा जर सवे भसत्यका संग्रह वदेगा । ६० ॥ 
महेश्वरं कुमारं च द्धौ च देवौ समाधिताः। 
भविष्यन्ति नराः सवै छोके न स्थविरायुपः ॥ ६१ ॥ 

"बद्र ओर ऊुमारकार्पिकेय इन्दी दो देवतार्ओका प्रायः 
सव लोग आश्रय रगे ¦ संसारम बृद्धावस्ातक जीनेवाले 
( अधिक ) न गे ॥ ६१ ॥ 
तदेष निर्णयः श्रेः पूथिन्यां पार्थिवान्तकः | 
अंशावतरणं सवं खुराः ऊुरुत मा चिरम्‌ ॥ ६२॥ 

द्देवतायओ | अतः यही निर्णय सव्रते श्रेष्ठ टै कि 
परथ्यीपर रहनेवाढे राजाओंका अन्त कर दिया जाय । इसि 
छम सत्र खोग अपने-यपने अंदासे अवतार छो, देर न 
करो ॥ ६२ ॥ 
घमैस्यांशस्तु न्त्यां वै माद्र च विनियुज्यताम्‌ । 
विग्रहस्य कछिमटं गान्धार्या विनियुज्यताम्‌ ॥ ६२ ॥ 
ध्धमके पक्षम जो देवता ह, उन्दे कुन्ती ओर माद्रे 
मर्म॑ उत्पन्न दोनेकी आद्या दी जाय | विवाद या युद्धका 
मूल दै किः उखे सदाय्कोरदित गान्धारीके गर्म॑खे उघ्त्न 
हेनेके च्य प्रसिति क्रिया जाय | ६३ ॥ 
धत पश्च भविष्यन्ति राजानः काड्चोदिताः । 
जातयागाः पृथिन्यथं सवं संग्रामखाखसाः ॥ ६४॥ 

"काल्घे प्रेरित हुए. राजा इन दोनों पकषमिषे किसी 
कका यश्रय गे ओर प्रथ्यीके राज्यकी प्रा्तिके व्यि 
छोमासकत होकर ये खव-के-सव्र संम्रामकी खल्खा रगे ॥६५॥ 


-गच्छत्वियं वसुमती खां योरि ठोकघारिणी 1 


खषटोऽयं नैष्ठिको राक्षामुपाये रोकविश्चुतः ॥ ६५ ॥ 

(सम्पूर्णं जगतूको धारण करमेवाछी यह पश्व अव 
अपने खानको चटी जाय } इसके भारभूत राजार्थोकर 
विनाङ्कर च्वि इस लेक्रप्रसिद्ध उपायका अनुष्ठान आरम्भ कर 
दिया गया दहै ॥ ६५ ॥ 


श्रुत्वा पितामहवचः सा जयाम यथागतम्‌ । 
पृथिवी सह काठेन वधाय पृथिवीक्षिताम्‌ ॥ ६६ ॥ 
व्रह्चाजीकरी यदह वात चुनकर पर्वी भूमिपारकरि वधके 
व्यि काठके चाथ जैते आयी थीः वैते दी छोट गयी | ६६ ॥ 
देवानचोदयद्‌ बह्मा निग्रहा खुरदिषाम्‌ । 
नरं चैव पुराणर्पिं शेपं च धरणीधरम्‌ ॥ ६७॥ 
सनत्कुमारं साध्याश्च खुरांश्चाग्निपुयेगमान्‌ । 
वरुणं च यमं चैव सूयौचन्द्रमसो तदा ॥ ६८॥ 
गन्धौण्सरसश्चैव सद्रादित्यांस्तथाभ्विनौ 1 
ततौऽशानवरनिं देवाः सर्व॑ पवाचतारयन्‌ ॥ ६९. ॥ 
तदनन्तर त्रह्माजीने देवद्रोदी दानर्वोका दमन कृरनेके 
य््यि देवतार्ओको भेरि किया ! उन्दने पुरातन आष नरः 
पृथ्वीको धारण करनेवाठे शेषनागः सनत्कुमारः साध्यगणः 
अग्नि आदि देवताः वरुणः यम; सूर्य, चन्द्रमाः गन्धर्वः 
अप्राः सद्र, आदित्य तथा दोर्नो अश्चिनीक्रुमार--इन सको 
अवतार लेनेके लि प्रेरणा दी । तद्पश्वात्‌ समसत देवतानि 
पृथ्वीपर अपना-अपना अंश उत्पन्न किया ॥ ६७--६९ ॥ 


यथा ते कथितं पूमंशावतरणं मया। 
अयोनिजा योनिजाश्च ते देवाः पृथिवीतले ॥ ७० ॥ 
दैत्यदानवहन्तारः सम्भूताः पुर्पेभ्वराः। 
राजन्‌ ¡ मैने ठम्द पदटे ( आदिपर्व ) अंशावत्तरणकरे 
प्रसञ्गमे जैसा चताया है, उसके अनुखार दैत्यो ओर दानघोका 
विनाश करनेवाले वे देवत्रा योनिज ओर अयोनिजसूपते 
एृथ्वीपर राजा होकर उचनन हुए ॥ ७०९ | 
क्ीरिकावृक्षसंकादा वज्जसंहननास्तथा ॥ ७१ ॥ 
नागायुतवलाः केचित्‌ केचिदोघवलान्विताः। 
गदापरिघशक्तप्नां सहाः परिघबाहवः ॥ ७२॥ 
उनक्रे शरीर पिण्डखनूरफे समान पु ओर वक्रे 
ठस्य सद्द थे । उन्मेस कितने ही दस हजार दाथि्योके 
समान वल्वान्‌ थे । कितने दी वल्के अद्ूट प्रवाते सम्पन्न 
थे | वे गदा, परिषि ओर शक्ति्योके आधात सह केनेमे समर्थं 
ये | उनकी अना परिेकि समान मोरी एवं सुद्‌ 
थीं ॥ ७१-७२॥ 
गिसिनधङ्प्रहवौरः स्वै परिधयोधिनः। 
बृण्णिवंशसमुत्पघ्नाः इचशगेऽथ सरसाः ॥ ७३॥ 


दरिवंदापवं 1 


चतुप्पश्चादासतमो ऽघ्यायः 


२०द 


ननन 


कुर्वंति च ते देवाः पञ्चाटेषु च पार्थिवाः । 
, याक्षिकानां समरद्धानां बाह्मणानां च योनिपु ॥ ७४॥ 
वे सवके-सव्र पर्वत-दिखरों दासा प्रहार करनेवाले तथा 
परिधेसि युद्ध करम कुशल ये 1 उनमेते सैकडदजारों वीर 
देवता दृष्णिवंशाः कुखवंडा तथा पाश्चालवंशषमे यजा एवे राज- 
कुमाोके रूपमे उत्पन्न हुए ये । कितने ही देवता समरद्धिाटी 
धालिक त्राक्षणेकि ऊुठेमिं प्रकर हुए ये ॥ ७३-७४ ॥ 
सवौखक्षा महेष्वासा वेदबतपरायणःः ! 
सर्वद्धिगुणसम्पत्ना यज्वानः पुण्यकर्मिणः ॥ ७५॥ 
वे सम्पूर्ण अर्के ज्ञाता, महाधनुर्धरः वैदिक नतक 
अनुष्ठान तत्पर, समसत सम्रद्धिकारी गुणेति सम्यन्नः यकत 
तथा पुण्यकर्मौका अनुष्ठान करनेवठे थे ॥ ७५ ॥ 
आचाल्येयुरये शेलान्‌ कछद्धा भिन्युम॑हीतलम्‌ । 
उत्पतेयुरथाकाशषं . क्षोभयेयुर्मदोदधिम्‌ ॥ ७६॥ 
वे कुपित होनेपर पर्वतोको भी हिला स्केते थे। 
प्रथ्वीको विदीर्ण कर सकते थे आकाशम उङ्‌ सकते 


थे ओर समुद्रोको {मी विक्षुव्ध कर सक्ते थे ॥ ७६ ॥ 
पवमादिद्य तान्‌ सवौन्‌ भूतभव्यभवत्प्युः। 
नारायणे समावेद्य रोक्राञ्छान्तिसुपागमत्‌ ॥ ७७ ॥ 
भूतः भविष्य ओर वर्तमगनके खामी नरह्याजी उन 
देवतार्भोको उपरक्त आदेश दे भगवान्‌ नारायणको 
समस्त छोकौँकी रक्षाका भार सोपकर शान्त हो गये ॥ ७७॥ 
भूयः श्ण यथा विष्णुरवतीणों महीतले । 
प्रजानां वे हिताथौय प्रभुः भ्राणिष्ितेदवरः ॥ ७८ ॥ 
जनमेजयं ! समसत प्राणिरयोका दित-साधन क्रमे समर्थं 
भगवान्‌ विष्णु प्रजावर्गकरे हितके ल्थि इस भूतलपर जिस 
प्रकार अवतीणं हुए ये, वह प्रसंग फिर सुनो ॥ ७८ ॥ 
ययातिवंशजस्याथ ` वदेवस्य घीमतः। 
ङे पूज्ये यशस्कमो जक्षे नारायणः प्रञुः ॥ ७९॥ 
राजा ययातिके वंशज बुद्धिमा वसुदेवके आदरणीय 
लम यशोवर्धंक कर्म करनेवाले भगवान्‌. नारायणने जन्म 
ग्रहण किया था ॥ ७९ ॥ 


दति श्रीमहाभारते खिरूभागे हयिवशे हरिवंशप्वणि देवानामंदाचतरणे निपच्वाशसमोऽध्यायः ॥ ५३ 1 


इ प्रकार श्रीमहामारतके खिकभाग हसिवशके अन्तर्मत दरिवंरपर्वमे देवतार्भेका 
अंशावतरणतिषयक तिरपन्वे अध्याय पूरा हुभा ॥ ५३ ॥ 
ज्व) 


चतुष्पश्चाशत्तमोऽध्यायः 
भगवान्‌ विष्णुके प्रति देवपिं नारदका षचन-भूरोककी वर्तमान अव्याका 
परिचय देकर भगवानूको अवतार ग्रहण करनेके सिये प्रेरित करना 


वैशम्पायन उवाच 

छतकायं गते काठे जगत्यां च यथानयम्‌ 1 
अंदावतरणे चृत्ते सुराणां भारते ऊठ ॥ १ ॥ 
भगेऽवतीर्णे धर्मस्य राक्रस्य पवनस्य च । 
अदिवनोदंवभिपजोभगि वै भास्करस्य च ॥ २ ॥ 
पूवमेवायनिगते भागे देवपुरेधसः। 
चसूनामण्मे भागे प्रागेव धरणीं गते ॥ ३॥ 
सस्थोभौगे क्षितिगते कठेभौगे तथेव च । 
भागे शुक्रस्य सोमस्य वरुणस्य च गां गते ॥ ४ ॥ 
शङ्करस्य गते भगे मित्रस्य घनद्स्य च । 
गन्धर्बोरगयक्ार्णा भागेषु गतेषु च॥ ५॥ 
भागेष्वेतेषु गगनादवतीणेु मेदिनीम्‌ । 
तिष्ठन्नारायणस्यादि नारद्‌ः समदद्यत ॥ ६ ॥ 

वैडास्पायनजी कहते है--जनमेजय्‌ ! जव पृथ्वी 
ओर काल दोनो कृतक्त्य होकर चठे गये ओर देवतार्ओंका 
भरतवंशम यथोचितरूपते अंशावतरणका काय॑ सम्पन्न हो 
गराः धर्मः इन्द्रः वायुः देववैय अश्चिनीकुमार तथा 
सेवका यक्‌ क्‌ माग जब्र भूतरुपर अवतीर्णं हो 


गयाः देवतार्थके पुरोहित बृहस्यतिजी ज्व उनसे भी 
पले ही प्रथ्वीपर आ गये, वसु्ओकि अष्टम भाग भीष्म मी 
पले ही पएरथ्वीपर अवतीणं हो गयेः मृ्यु (यम) ओर ककिकि 
भाग मी जव प्रथ्वीपर आ गये, शुक्रः सोम ओौर वसणके 
अंश भी भूतलपर अवतीर्णं हो , गये भगवान्‌ शङ्धरः मित्रः 
कुवेरः गन्धर्वे नाग ओर यक्षोके मागं भी जत्र पृथ्वीपर 
आ गयेः उपर्युक्त समी भाग जवर आकाशते पृथ्वीपर उतर 
अयः तवर देवपक्षमे खित रहनेवाले देवर्षिं नारद भगवान्‌ 
नारायणके निकट अते हु दिखायी दिये ॥ १-६॥ 
ज्वङिताग्निप्रतीकाशो वाखाकंसदरोश्चणः। 
खन्यापदत्तं विपुलं जखामण्डकसुदधहन्‌ ॥ ७ ॥ 
उस समय उनका" तेजस्वी शरीर प्रज्वलित अग्निक 
समान प्रकारित हो रहा था) दोन नेत्र प्रभातकाले 
सूर्यकी भोति छल थे] वे वामावर्तं विशार जामण्डल धारण 
क्यिहुएरथे॥७॥ 
चन्द्रा्॒दयष्छे वसने वसानो सक्मभूषितः। 
चीणां गृहीत्वा महतीं कक्षासक्तां सखीमिव ॥ ८ ॥ 
उन्दोने अपने शरीरको चन्द्रमाकी किरणेकरि समान 


२०४ 


~~ 


श्वेत वर्णे दो वचि आच्छादित कर रखा था । वे सोनेक्रे 
आभूषगक्ति विभूषित ये । उर्देनि महती नामक्र वीणाले 
रखी थी, जो उनकी सदह्चरीकी मति वरग सटी हुई 
थी|॥८॥ 
रष्णाजिनोत्तरासद्ये दहेमयत्नोपीतवान्‌ । 
दण्डी कमण्डलुधरः साक्षाच्छक्र इवापरः ॥ 2 ॥ 
उनके कंधेपर उत्तरीय वक्क्रे रूपमे काला मृगचरम॑ 
द्रोभा पारदा था।वे सुवर्णमय यज्ञोपवीतसे सुगोमित ये। 
हार्थमिं दण्ड-कमण्डद् धारण क्रिये हुए ये तया देखनेमे 
साक्षात्‌ दूसरे इन्द्रके समान जान पडते थे ॥ ९ ॥ 
भेत्ता जगति गुह्यानां विग्रहाणां ध्रदोपमः। 
गावा चतुर्णां वेदातामुद्वाता प्रथमरत्विजाम्‌ । 
मदपिर्विप्रदरुचिर्बिद्यान्‌ गान्धर्वकोचिदः ॥ १०॥ 
जगन्म गुप्त व्रा्तौका भंडाफोड करनेवाले नारदजी 
युद्ध या विवादकी सूचना देनेवाले प्रहोके समान माने जाते 
है ये चारों बेदकि गायक तथा मुख्य क्रूचिजँमि उद्राता 
ये, महरि कचेनेपर भी युद्ध देखनेकी खचि रखते थे ओर 
विद्वान्‌ हयोनैके साय हयी सद्धीतवि्यके मर्म थे॥ १०॥ 
वैरिकेलिकिखो विभो बाह्यः कलिरिवापरः। 
देवगन्धर्वलोकानामादिवक्ता मदासुनिः ॥ १९॥ 
वूसर्रोको छ्डा देना उनके व्यि लिल्वाड यावे 
त्राद्मण तथा ब्रह्लाजीके पुत्र होकर भी दूसरे कलक समान 
माने जाते थे । महामुनि नारद देवलोक तथा गन्धर्वटोकके 
परमुखे वक्ता ( उपदेशक ) ये ॥ १९ ॥ 
सख नारदोऽथ वह्र्पिर्ह्यखोकचसेऽन्ययः। 
स्थितो देवसभामध्ये संरब्धो विष्णुमव्रवीव्‌ ॥ १२ 
ब्ह्यरोकर्मे विचरनेवाठे वे अविनासी बरह्रपिं नारद 
उस समय देव-समामे खड़े दो रोपवेदामे आकर भगवाम्‌ 
विष्णुते इस प्रकार ब्रोटे-1 १२ ॥ 
अंदावतरणं विष्णो यदिदं िद्ौः कृतम्‌ । 
क्षयार्थं पृथिवीन्द्राणां सर्वमेतदकारणम्‌ ॥ १२॥ 
ससर्वन्यापी नारायण ! देवता्मौनि भूतले राजा्भौका 
विनाश करनेकरे स्यि जो यह अंश्चावतार ग्रहण क्रिया दै, वह्‌ 
सवनिष्फलदे॥१३॥ , 
यदेतत्‌ पार्थिवं श्चं सथितं त्वयि यदीदवर । 
नरनारायणयुक्तोऽयं कायैः प्रतिभाति मे ॥ १४॥ 
'परमेइवर ! यह जो भूतल्के राजार्ओका युद्ध दै वह 
तो आपपर हीनिर्मरहै। मुक्नेतो रेस प्रतीत द्योता है किं 
देवता्मेकि इस प्रयोजनकी सिद्धि नर ओर नारायणके 
सटयोगसे दी सम्भव है ॥ १४॥ 
न युक्तं जानता देव त्वया तत््वार्थदर्थिंना । 


देवदेव परथिन्यरथे प्रयोक्तु, कार्यमीददाम्‌ ॥ १५॥ 


धरीमष्टाभारते खिदभागे 


[ शरिवंशे 


देव ! देवाधिदेव | आप तादी द खव कुट , 
जानते ई; अतः प्रध्वीका भार उतासेके स्यि चसे उपायका 
प्रयोग करना, जिस्म आप दोर्नौका सदयोग न दोः यापक 
व्यि उचित नदीं है ॥ १५ ॥ 
त्वं हि चश्चुप्मतां चश्चुःद्टाध्यः ्रभवतां धञुः। 
श्रेष्ठो योगवतां योगी गति्गतिमतामपि ॥ १६॥ 

ववरयोक्रि आप दी नेत्रवानोे नेर ईः प्रमावली 
पुकि द्यहणीय प्रथु  योगवा्टमि शर्ट योगी ६ तथा 
गतिशील प्राणिर्योकी गति ई ॥ १६॥ 
देवभपगान्‌ गतान्‌ दष्र किलं सवौश्रयो विभुः। 
वसुन्धरायाः सादार्थमंसं स्वं नाञयुञजसे ॥ १७ ॥ 

प्याप सव्रके याश्रयभूत पस्मेश्वर & किर देवतायेकि 
अंशेकि प्थ्वीपर गया हुा देखकर भी आप वयुधाकरी 
सष्टायताफ़रे च्ि अपने अंदकरो क्यौ नरं नियुक्त करते 
६॥ १७॥ 
त्वया सनाथा देवांश्चास्त्वन्मयासत्वत्पययणाः 
जगत्यां संचरिष्यन्ति कायीत्‌ कायन्तरं गताः॥ १८ ॥ 
्ेवता्कि अंश आपके दी खर्प तथा आपके दी 
आधिन ई । वे आपते सनाथ दोर दी प्रच्वीपर एक कासे 
दूरे कार्यम खंलग्न रहते दुएट विचरण कर सकेगे ॥ १८ ॥ 
तदहं त्वस्या विष्णो पापतः सुरसभामिमाम्‌ 1 
तव संचोदनार्थं वै श्णु चप्यज्र कारणम्‌ ॥ १९॥ 
ध्विप्णो! मै जो आपको परेस्ति कलेकेल्यि कड़ी 
उतावलीके साथ इस देव-समम आया हू इखका मी एक 
कारण दै; उमे सुनिये ॥ १९॥ 
ये त्वया निहता दैत्याः संग्रामे तारकामये । 
तेषां श्टणु गति विष्णो ये गताः पृथिवीतलम्‌॥ २०॥ 
ध्विप्णो ! ताकामय-छंतराममे आपके दास जे दत्व मे 
गये थे, वे सव-के-सव्र परथ्वीतल्पर जा पहुचे द; उनकी क्या 
अवस्या दै, सुनिये ॥ २० ॥ 
पुरी प्रथि्यां सुदिवा मधुसानामतः श्रुता } 
निवि यमुनातीरे स्प्तीता जनपदायुता ॥ २१॥ 
ृथ्वीपर मथुरा नामते प्रसि एक पुरी दै, जो परमा- 
नन्दमयी है । चह समृद्धिलाटिनी नगरी यसुनाकरे तटपर बसी 
हई है । उक सब्र ओर बहुत-से जनपद द ॥ २१ ॥ 
मधुनौम महानासीद्‌ दानवो युधि दुजेयः। 
श्रासनः सर्वभूतानां वलेन महतान्वितः ॥ २२ ॥ 

'उस पुरीमे पटले मधु नामते प्रसिद्ध॒एकर महादानव 
रहता था, नित युद्धमे जीतना बहुत दी कठिन था । समस्त 
प्राणिर्योको चास देनेवाला वह दानव महान्‌ वल्ते सम्पन्न 
था| २२॥ 
वस्य तत्र महश्वासीन्महापादपसंकुरुम्‌ । 


हरिवंदापवं ¡ 


चतुप्पश्चाद्चमोऽभ्यायः 


{ ॥ | 


२०५ 


-~--------------------------------------------------- ल ---------- ~ ~~~ ~ क्का ~ = ~ ` ~---*----~~-----~----- -- ˆ - 


घोरं मधुवनं नाम यासौ न्यवसत्‌ पुरा ॥ २३॥ 
भवी उसक्रा विया एवं भयंकर मधुवननामक वन 
या, जो ब्रेड ब्त दरा-भरा रदता था । पर्वेकार्मे वदं 
दानव उत मधुबन ही निवास कसा था ॥ २३ ॥ 
तस्य पुरो मदानासीवणो नाम दनवः। 
घासनः सर्वभूतानां मदावरपराक्रमः ॥ २४ ॥ 
(उसका पुत्र लवण नामे प्रसिद्ध महाम्‌ दानव था। वह 
मी समस्त प्राणिरयोको भयमीत करनेवात्म ततथा मद्रान्‌ चल- 
पराक्रमसे सम्पन्न था || २४ ॥ 
स तत्ने दानवः क्रीडन्‌ वप्रपूगाननेकदयाः। 
स॒ दैधतग्णोोकानुद्वासयति दर्पितः ॥ २५॥ 
'वहं दानव बहुत वर्पौतक्र वहो करडा करता रहा | फिर 
यस्के धमंड भरकर देवतार्जीसहित समस्त ॒लेोर्कोको 
उजाडने या उद्धिगन करने खगा ॥ २५॥ 
अयोध्यायामयोध्यायां रामे दाद्रारथौ स्थिते । 
राज्यं शासति ध्ेक्षे राक्षसानां भयावहे ॥ २६॥ 
स दानवो वल्द्टाधी घोरं बनसुपाधितः। 
प्रेपयामास रामाय दूतं परुषथादिनम्‌ ॥ २७ ॥ 
भजिष्षपर आक्रमण करना किसीके च्थि मी असम्भव थाः 
उस्न अयोध्यापुरीमे जवर रक्षसोको मय देनैवाटे धर्मज्ञ 
दटरारथनन्दन श्रीराम राज्य-शासन र्सते थे उस समय अपने 
वर्की प्रशंसा कसनेवठे उस छ्वण नामक दानवने धोर 
मधुवनका सहारा छे श्रीरामचनद्रजीके पास एक कटुमापरी दूत 
भेजा ॥ २६-२७॥ 
विपयासन्नभूतोऽसि तथ सम रिपुश्च ह। 
न च समन्तमिच्छन्ति यजानो वलकटर्पितम्‌ ॥ २८॥ 
८( उसके उस दूतने मगान्‌ श्रीरामते इस प्रकार कहा--) 
साम | मँ व्हा राज्यकर निकट रहता हूँ जौर ठम्दाय श्र 
भी हू | प्रायः राजा लोग एते सामन्तको जीवित रखना नदीं 
चादते, जो ब्ररके घमंड भरा रहता हौ 1 २८1 
राक्षा राज्यवरतस्थेन प्रजानां हितकाम्यया । 
जेतभ्य। रिपवः स्वँ स्फीतं विपयमिच्छता ॥ २९॥ 
ध्राजोचित तम सित रहकर अपने राज्यको समृद्धि 
शाटी वरनानेकी इच्छा रखनेवाले राजाको उचित है कि 
वद प्रजाकरे दितकी कामनासे अपने समस्त ॒शवु्ओको 
जीतकर कावूमे कर ठे ॥ २९ ॥ 
अभिपेकाद्रंकेशेन राक्षा रञ्नकाम्यया 
जेतव्यानीन्द्रियाण्यादौ तये हि धुवो जयः ॥ ३०॥ 
“जिसके मस्तक्के केश राञ्यामिपेक्रसे आद्र हुए 
हौ तथा जो प्रजाको प्रसन्न रखना चाहता दौ, उस राजाका 
कर्तव्य है क्रि वह सतवसे पटले अपनी इन्दियोपर विजय 
प्रात करे; ` क्योकि उनको जीत लेनेकरे वाद राच्र्योपर 
विजय पाना निचित दै ॥ ३० ॥ 


सम्यग्‌ वतितुकामस्य विशेषेण _ मदीपतेः। 
नयानासुप्देदेन नास्ति रोकसमो शुरूः ॥ ३१ ॥ 
ध्जो उत्तम वर्तावकी इच्छा रखता होः एसे पुरुष 
विशेषतः पृथ्यीपाखक नस्यको नीतिका उपदेश करनेके च्ि 
लोकके समान दूसरा कोद गुर नदीं है ॥ ३९ ॥ 
व्यसनेषु जघन्यस्य धमेमध्यस्य धीमतः । 
वछज्येष्ठस्य यपतेनीस्ति सामन्तजं भयम्‌ ॥ ३२॥ 
धो य॒त ओर मृगया आदि दु्व्यसनोमि दूसरोकी अपेक्षा 
निष ह ( अर्थात्‌ जो व्यसनेहि दूर रहता दै ); धर्ममे 
जिसकी मध्यम कोटिकी खिति है परंठ जो वस्मे दूस्ेकी 
अपेक्षा बद्-चदकर दै, उस बुद्धिमान्‌ नरेशको कभी सामन्ते 
भय नीं प्राप्त रोता है ॥ ३२ ॥ 
सदजेवौध्यते सर्वः भरबरद्धैरिन्दियादिभिः। 
अमित्राणां भियकरैमेषिरधृतिरीर्वरः ॥ २३३ ॥ 
'अपने शरीरके साय ही उत्पन्न हुए ये इन्धियरूपी शप्र 
जव्र वद्‌ जाते दै, तव मोहं उत्पन्न करनेवाले हो जते है ओर 
शर्ओका प्रिय साधन करने काते द; उस दामे उनके ढारा 
सभी ररयीन पुरषो अथवा राजाभोको सदा ही वाधा प्राप 
होती है ॥ ३३ ॥ 
यत्‌ त्वया सीते मोदात्‌ सगणो रावणो हतः । 
नैतदौपयिकं मन्ये महद्‌ वै कमं कुत्सिनम्‌ ॥ ३४॥ 
(तुमने जो मोहवशं एक नारके स्थि दल-वल्सहित 
रावणका वध कर्‌ डाला है, इसे मँ न्यायकगत नहीं मत्तता । 
यद्यपि पराक्रमकी इष्टिते वह महान्‌ कर्म दहै तो भी वास्तवे 
वह निन्दित दी दै ॥ ३४ ॥ 
वनवासप्रवृत्तन यत्‌ त्वया बतद्ाछिना। 
प्रहतं ाक्चसानीके नेव दष्टः सतां विधिः ॥ ३५॥ 
(तुम वनवासमे प्रहरत्त हुए थे । वनवासी मुनि्ोके 
नियर्मोका पाटन केम ही दम्दारी शोमा थी। फिर भी वमने 
जो राक्षरसोकी सेनापर प्रहार किया, एेखा वतव कमी. किन्ीं 
सत्पुरषेनि किया हो--यह कभी नीं देखा गया है ॥ ३५॥ 
सतामक्रोधजो धमः श्युभां नयति सद्गतिम्‌ 
यत्‌ त्वया निहता मोद।द्‌ इपिताश्चाश्रमौकखः।॥ ३६ ॥ 
क्रोधका परित्याग कररे खाधुपुरुष जिस धर्मका पालन 
करते है वह्‌ उन्दैँ शुम सद्रतिकी प्राप्ति कराता दै। तुमने जो 
मोहवश राक्ष्तोकरा वध किया दैः इसते समी आध्रमवासी 
कलकित हो गये ( वुम्हारे द्वारा ब्त नियमका उलस्टरुन देख- 
कर दूसरे भीषा दी करने ल्गेगे; अतः तुम ॒दुखचारके 
प्रवर्तक हो गये ) ॥ ३६ ॥ 
ख एप रावणे घन्यो यस्त्वया तचारिणा । 
सख्रीनिमित्ते हतो युद्धे घाम्याय्‌ धमौनयेक्चता ॥ ६७ ॥ 
भ्यह रावण धन्य था, जो युद्धम माम्य धर्मपर ही दृष्टि 


२०६ 


श्रीमहाभारते खिकभगे 


[ शिवे 


रखनेवे व्न-जैते व्रतधारीके दायते एकर लीके कारण मारा 
गयां | ३५७ ॥ 
यदि ते नितः संख्ये दुघद्धिरजितेन्दरियः। 
युभ्यखादय मया साधं गधे यद्यसि वीय॑वान्‌ ॥ ३८ ॥ 
ध्यदि दमने खोरी बुद्धिवाठे उस अनितेन्िय सवणको 
युद्धम मारा है ओर एेखा करके ठम पराक्रमी वन रदेदोतो 
आयः आन रणक्षेत्रमे मेरे खाथ युद्ध करो ॥ ३८ ॥ 
तस्य दुतस्य तच्छ्रुत्वा भाषितं रूख्षवादिनः। 
धेयौदसम्धरान्तवपुः सस्मितं राधवो.ऽघ्रवीत्‌ ॥ ३९ ॥ 
(उस कटुवादी दूतक्रा वह भषणं सुनकर रघुनन्दन 
श्रीराम अपने स्वाभाविक धै्यंके कारण विचलित नदीं हुए 
अपितु मुख्कराते हुए वोञ-।॥|३९॥ 
असदेतत्‌ त्वया दूत भापितं तस्य गौरवात्‌ । 
यन्मां क्षिपसि दोषेण वेदात्मानं च सुस्िरम्‌॥ ४०॥ 
धूत [ तूने उस दानवकरे प्रतिं गोरवुद्धिके कारण ज 
कुछ कदा है, वह सव ओद्ी वात है; क्योकि तू मुस्चपर तो 
दोपारोपण करके आक्षेप करता दहै ओर अपनेको न्यायमार्गमे 
भखीर्भोति सित सम्मता है ॥ ४० ॥ 
यदयदं सत्पथे मूढो यदि चा सवणो हतः। 
यदिवामे हता भायौ का तत्र परिदेवना ॥ ४१॥ 
ध्यदि मँ सन्मार्मपर चलनैका विवेक खो वैा थाः यदि 
मेरे दारा रवण मारा गया था अथवा यदि मेरी ख्रीका अप- 
इरण हुआ था तोत र्यो इन स्व वार्तोकारोनारौ 
रदा दै १॥ ५१॥ 
न वाङ्मात्रेण दुप्यन्ति साधवः सत्पथे स्थिताः। 
जागर्ति च यथा देवः सद्‌ा सत्खितरेषु च ॥ ४२॥ 
“लन्मार्गपर सित रहनेवछे साधरुपुखष किसीके कहनेमाच- 
से कल्कित नहीं होते ई । सत्‌ ओर असत्‌ पुरुपरके भीतर 
येठे हु मगवान्‌ सदा जागते रहते है ( कौन दुरा है ओर 
कोन मला--यह उनकी दषते छिया हमा नदी हे ) ॥*२]] 
छतं दतेन यत्त कार्य गच्छ त्वं दूत मा चिरम्‌। 
नात्मन्छाधिपु नीचेषु प्रहरन्तीह मद्धिघाः ॥ ४३॥ 
दूत !} त॒द्ल-जेते दूतको जो कुछ करना चाहिये, व 
कार्यं तूने कर छिया । अब यदसि चला जाः वरिरम्ब न कर । 
मेरे-जैसे पुरुप यरो अपनी छठी प्ररोसा करनेवाठे नीच जना 
पर प्रहार न्दी करते ॥ ४३ ॥ 
अयं ममाजजो शाता राघरुघः; शाच्ुतापनः। 
तस्य॒ दैत्यस्य दुवुद्धेमये प्रतिकरिष्यति ॥ ४४॥ 
ध्यह्‌ मेया छोय माई यातुष्नः जो यानरु्क पूर्णं संताप 
देनेवाला है युद्धम उख ॒दुर्ुद्धि दैत्यको उस कु्र्तयोका 
मरपूर्‌ बदला देगा? ॥ ५५ ॥ 
पवमुक्तः स. दृतस्तु ययौ सौमि्निणा सह्‌ । 
अयुक्षातो नरेन्द्रेण राघवेण मदात्मना ॥ ४५॥ 


"महात्मा राजा रघुकुल्नन्दन श्रीरामने रेखा कहकर जत्र 
उसे जानकी आन्ञा दी, तव वह दूत युमित्रकरुमार शातरुष्नकरे 


साथ चला गया ॥ ४५॥ 


ख शीघ्रयानः सम्प्रसस्तद्‌ दानवपुरं महव्‌। . 
चके निवेशं सौमिनिर्वनान्ते युद्धखासः ॥ ४६॥ 
धुमित्रानन्दन शत्ुव्न यीघ्रतापूर्वक स्थ देक्ति हुए 
छ्वणासुे उस विदा नगस्म जा पर्ुचे 1 वर्ह युद्धकी 
लाख्ा छेकर उन्देनि उसके वनके समीप दी पडाव डाल 
दिया ॥ ४६ ॥ 
ततो दतस्य वचनात्‌ स दैत्यः क्रोधमूर्छितः । 
पृष्ठतस्तद्‌ वनं इत्वा युद्धायाभिमुखः स्थितः ॥ ४७॥ 
(तदनन्तर दूतकी वाते खव कुछ जानकर वह दैत्य 
क्रोधे अचेत-सा दो गया ओर उस वनको पीछे करक युद्धके 
लि शत्रुघ्नकरे सामने आकर खडा दो गया ॥ ४७ ॥ 
तव्‌ युद्धमभवद्‌ घोरं सौमिषेदौनवस्य च । 
उभयोरेव वकिनोः श्रयो रणमूर्धनि ॥ ४८॥ 
शसुमित्राक्ुमार रचन तथा दानव ल्वणासुर दोर्नोँ दी 
वदे बख्वान्‌ ओर शूरवीर ये । युद्धके सुदानेपर उन दोर्मि 
घोर संग्राम हुआ ॥ ४८ ॥ 
ती शरैः साधु निदितैरन्योन्यमभिजध्तुः। 
न च तौ युदधवैसुख्यं श्रमं वाप्युपनग्मतुः ॥ ४९॥ 
श्वे तीखे वार्णोद्याया एक दुसरेको भलीरमोति चोट 
परहुवने सो । दोनो ही न तो युद्धसे विमुख दए ओौरन 
उन्दँ थकावर ही हुई ॥ ४९ ॥ 
अथ सौमित्रिणा वाणेः पीडितो दानवो युधि। 
ततः स श्ुररहितः पर्यदीयत दानवः ॥ ५० ॥ 
(तदनन्तर उस युद्धस्थ्छ्मे सुमित्राकुमारने दानव ठ्वण- 
को वराणोद्भारा अधिक पीडित करियाः इससे उसका शूल हाथवे 
दूटटकर गिर पड़ा ] अव्र वद्‌ सर्वथा कमजोर पड़ने र्गा ॥ 
स ॒गृरदीत्वाङ्क्धं चेव देवै्दंत्तवरं रणे। 
कर्षणं सर्वभूतानां क्वणो विररास ह ॥ ५९॥ 
(व्र उसने युद्धम अङ्कुश उठाया, जिसके स्यि उसको 
देवताओं वर प्राप्त हो चुका या । बह अङ्कुश समस्त प्राणिर्यौ- 
को आक्र्पित करनेवाला था । उसे ठेकर ठवणासुर जोर-जोर- 
से गर्जना कसे र्गा ॥ ५१ ॥ 
दिखेधरायां जग्राह सोऽङ्करोन चकं ह । 
प्रवेरयितुमारन्यो ख्वणो राघधवाञुजम्‌ ॥ ५२॥ 
“उसने वह अङ्कुश श्रीरामके छोटे माई शचुध्नके गर्लर्मे 
कैसा दिया ओर खींचकर उसे उनके कण्ठे धुसाना आरम्भ 
किया ॥ ५२॥ 


, स स्क्मत्सर्मुद्यस्य रशावुघ्ः खङ्धमुतमम्‌ 1 


शिरश्चिच्छेद खदधेन खवणस्य महास्रधे ॥ ५३॥ 


हरिवश्षपवं ] 


चतुप्पश्चादयचमो ऽध्यायः 


२२०५७ 


[णामा दनक न्नव) 


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“वद्‌ देख उस महासमसमे तरुष्नने सोनेकरी मूढवाटी 
अच्छी तलवार उठा छी ओर उसके द्वारा उस दानवका 
मस्तक काट गिराया ॥ ५३ ॥ 

स हत्वा दानवं संख्ये सौमििर्मि्रवत्सलः 

तद्‌ चने तस्य दैत्यस्य चिच्छेदास्रेण वुद्धिमान्‌ ॥५४ ॥ 
पमित्रौपर सेद्‌ रखनेवाछे बुद्धिमान्‌ शतरुव्नने युद्धसखल्ं 

उस दानवक्रा वध करके उसक्रे उस वनको भी अपने अर्ल्ला- 

द्वारा काट उलि ¦ ५४॥ 

छिस्वा वनं तत्‌ सौमिभ्रिनिवेरां सोऽभ्यसेचयत्‌ । 

भवाय तस्य देशस्य पुयीः परमधर्मवित्‌ ॥ ५५ ॥ 
ध्वनको काटकर परम धर्मज्ञ सुमिघ्राुमासे उस देकर 

अम्युदयके चि वह एक नगर वसनेकी इच्छ को ॥ ५५५ 


तसिन्‌ मधुवनस्थाने मथुरा नाम सा पुरी । 
शातुष्नेन पुरा खरा हत्वा तं दानवं रणे ॥ ५६॥ 
'्णभूमिभे उस दानवका वध करके ात्रु्नने पूर्वकाल 
उसी मधुवनकी जगह उस परीका निर्माण किया, जिसका 
नाम मथुरा ॥ ५६ ॥ 
खी ` पुरी परमोदारा साद्धधाकार्तोरणा। 
स्फीता राष्टलमाकीणी समुद्धवल्वाहना ॥५७ ॥ 
"वह मथुरापुरी बहुत बड़ी है। उसमे ऊंची अद्टाच्छिर्पैः 
चहारदीवारी तथा फाटक यथाखान चने हुए द । वह समृद्धि- 
शालिनीपुरी समूचे रष्टके सोगोसे भरी रहती दै तथा सेना 
ओर सवारियोसे सम्पन्न दे ॥ ५७ ॥ 
उद्यानवनसस्पन्ना सुसीमा खप्रतिष्ठिता। 
पराट्ुप्राकारवसना परिखाङुरमेखखा ॥ ५८॥ 
धनाना प्रकारके उद्यान ओर वन उसकी शोमा वदते 
द| उसकी सीमा सुन्दर दै ! वह अच्छी तरदसे वसायी तथा 
दृद्तपूर्वक स्थापित की गयी है । ८ वह नगरी एक नारके 
समान जान पडती है ) ऊँच-ऊंची चहारदीवारी उसके लि 
साद़ीका काम देती हे । चारो ओसते खुद हुई खाई मेखला 
( करधनी ) के समान जान पड़ती है ॥ ५८ ॥ 


` चयाद्धालककेयूरा  भ्रसादवरकुण्डटा 1 
खुखंडतद्ारमुखि चत्वरोद्वारहासिनी ॥ ५९॥ 
ध्नगरदयार ओर अश्मलिकर उसके केयूर (युजवंद )-सी 
प्रतीत होती ह । श्रे प्रासाद घुन्दर कुण्डले समान शोमा 
देते ई । विंवाडरूपी अश्चरेसे अच्छी तरद ठका हा प्रधान 
द्वार्‌ मानो उसका मुख है तथा मीतरके ओंगनक्रा उदपान 
उसकी रहैसीका प्रकाश हे ॥ ५९ ॥ 
,अरोरवीरपुरूपा दस्त्यश्वरथसंकुला । 
अर्धंचन्द्रपरतीकादग यमुनातीरोभिता ॥ ६० ॥ 
'उख पुरीम नीरोग वीर पुरर्षोका निवास है । हाथी 


घोदे तथा रथ आदि वाहनंसि वद भय रहती है । यमुनाजीके 
तटपर वसी हुई बह रोमागरालिनी पुरौ अधंचन्द्राकरार प्रतीत 
होती है ॥ ६० ॥ 
पुण्यापणवती दुग रनसंश्रयगर्विता। 
क्षेजाणि शस्यवन्त्यस्याः काटे देवश्च वति ॥ ६१ ॥ 
{इस भीतर सुन्दर एवं पवित्र हाट दै । दसम प्रवेश 
करना दूसरोकरे च्य कठिन दै तथा इसे अपने रनरदि-संग्रह- 
पर गवं॑दहै । इसके पादर्ववर्ती जनपदे खेत अनाजके 
हृरेभरे पोदोसे मोमा पति ई ओर वरहो पर्जन्यदेव समयुपर 
वर्पा करते द ॥ ६१॥ 
नरनारसीप्रसुदिता सा पुरी स्म प्रकाशते। 
निविषिपयश्चैव शुरसेनस्ततो ऽभवत्‌ ॥ ६२ ॥ 
ध्र-नारियोके आमोद्-परमोदते पूणं मथु<पुरी सदा अपनी 
शोमा प्रकादित होती रहती है ! इस पुरी ओर प्रदे 
किसी समय राजा श्रुरसेन निवास करते ये ॥ ६२ ॥ 
तस्य पुर्यां महावीयों राजा भोजकुलोद ष्टः । 
उग्रसेन इति ख्यातो मदयसेनपराक्रमः ॥ ६३ ॥ 
(उसी पुरीम इस समय महावल्टी राजा उग्रसेन हैः जो 
भोजवंदाका भार वहन करते ह| उनका पराक्रम कुमार 
कार्तिकेयके समान है ॥ ६३ ॥ 


तस्य पुत्वमापन्नो योऽसौ चिप्णो त्वया हतः । 

कालनेमिर्मदादेत्यः संग्रामे तारकामये ॥ ६४ ॥ 
ध्विष्णो | आपने तारकामय संग्राममे जिस कालनेमि 

नामक महादेस्यका वध करिया था; वह अव उन्दी राजा 

उग्रसेनका पुच्र होकर प्रकट हुआ दै ॥ ६४ ॥ 

कंसो नाम विरालाक्षो भोजवंराविवर्धनः। 

राजा पृथिव्यां विख्यातः खिहविस्पण्रविक्रमः ॥ ६५ ॥ 
(उसका नाम है कंस । उसके ने बडे.वड़ ई | वह 

मोजवंरकी वृद्धि करनेवात्म दै । उसकी चाल-ढा जीर 

पराक्रम रषिहके समान दै । राजा कंस भूतच्पर सर्वत्र विख्यात 

दे ॥ ६५ ॥ 

राक्षां भयंकरो घोरः शाङ्कनीयो मदीक्चितम्‌। 

भयदः सवभूतानां सत्पथाद्‌ चाह्यतां गतः ॥ ६६॥ 

राजाअकरि ल्थि अत्यन्त भयंकर है । मृमिपारके 

लिये ाङ्कनीय हो गया है । समस्त प्राणि्योको भय देनैव 

कंस सदाचारपे गिर गवादे ॥ ६६॥ 

दारुणाभिनिवेरोन दारुणेनान्तसत्मना । 

युकूस्तेनेव दर्पेण प्रजानां रोमहर्षणः ॥६७॥ 
ष्दास्णर ्रछृति ओर करूर अन्तरात्मा युक्त हो बह कंस 

अपने पूरवजन्मके दस टौ उन्मत्त हो इस समय प्रजावर्म- 

के ल्ि रोमाश्वकारी वन गया है } ६७ ॥ 


०८ 


श्रीमहाभारते खिलभागे 


[ हरिवंशे 


न॒ यजघमीभिर्तो नत्मपक्चसुखावहः | 
नात्मयज्ये श्रियकरथण्डः कररुचिः सदा ॥ ६८॥ 
ष्व्‌ न तो राजधर्मम अनुराग रखता दै न अपने पक्षक 
छेर्गोको दी इख देता है ओर न अपने रामे ही किंसीका 
प्रिय करता है । सदा दी अत्यन्त क्रोधने भरा रहता है ओर 
केवल प्रजसे कर वसू करनेकी हयौ उचि रखताहे ॥ ६८ ॥ 
स कंखस्तच्र सम्भूतस्त्वया युद्धे पराजितः । 
क्रव्यादो वाघते लोक्रानाखुरेणान्तसयत्मना ॥ ६९ ॥ 
धआयने जिसे युद्धरमे पराजित क्रिया थाः वह कालनेमि 
ही वरहो “कंस वनकर प्रकट दुभ रै | उसकरी अन्तरात्मा 
आयुरभावते युक्त है, जिसके दारा वह मांसमक्षी राक्षस समस्त 
ठोकको पीड़ा देता टै ॥ ६९ ॥ 
योऽप्यसौ हयविक्रान्तो हयग्रीव इति स्ष्तः। 
केरी नाम दयो जातः स तस्यैव जघन्थजः ॥ ७०॥ 
'्पठे जो घोडेके समान चल्नेवाला अथवा पराक्रमी 
हयग्रीव नामसे विख्यात दैत्व था, वदी पकेशीः नामक अश्वके 
रूपमे भूतट्पर उत्पन्न हआ है । इस समय केशी मानो कंस- 
का छोटा माई वना हु है॥ ७०॥ 
ख दुरे हेषितपटुः केखरी निरवग्रहः। 
चृन्द्रावने वसत्येको चरणां मांसानि भक्षयन्‌ ॥ ७१॥ 
ष्वह दुष्ट केरी हीने या हिनदिनानेमे वड़ा पटु है । 
उसक्री गर्दनपर्‌ बरदे-वदे वाक द । वह सर्वथा उच्छृ दै। 
वह मनुप्येकि माषका ही आदार करता हुआ इन्दव 
अकल ही निवात करता है ॥ ७१ ॥ 


अरिष्टो वदिपुच्श्च ककुश्ची चषरूपधुक्‌ । 
गवामरित्वमापन्नः कामरूपी महासुरः ॥ ७२॥ 


व्वलिका पुत्र अरिष्ट ऊँचे पुरषे युक्त वरेल्का स्प. 


धारण करके प्रकट हा है । वह कामरूपी मदान्‌ असुर 

गोरथका स्न्ु वन गया दै ॥ ७२॥ 

रिषो नाम दितेः पुत्रो वरिष्टो दानवेघु यः 

स कुञजरत्वमापो दैत्यः कंसस्य वाहनः ॥ ७३॥ 
व्दानर्वोमिं श्रेष्ठ दितिपरत्र रि नामक दैत्य दाथीके 

रूपमे उत्मन होकर इष समय कंसका वाहन वना 

हया दे ॥ ७३॥ 

खम्बो नामेति विख्यातो योऽसौ दैत्येषु दरपितिः 

प्रलम्बो नाम दैत्योऽसौ घटं भाण्डीरमाधितः ॥ ७४॥ 
दैविं अभिमानी जो रम्व नामघे विख्यात दैत्य था; 


वद इस समय प्रटम्व नामसे प्रसिद्ध हो भाण्डीर वय्का आश्रये 
कर्‌ रहता है ॥ ७४॥ 


खर इत्युच्यते दैत्यो घेनुकः सोऽखुरोचमः 
घोरं तषनं दैत्यश्चरत्युद्धासयन्‌ प्रजाः ॥ ७५॥ 


ध्जो खर नामक दैत्य कदा जाता था; वही दऽ समय 
-अयुरम प्रष्ठ धेनुक वना हसा है । वह॒ दैतेय प्रजाजर्नोको 
उजाडता हआ भयानक ताट्वनमे विचरता रहता है ॥ ७५॥ 
वाराहश् किदोरश्च दानवौ यौ महाव । 
मो स्ङ्गगतौ तौ त जातौ चाणुरसुष्रिको ॥ ७६॥ 
धूर्वकराख्मे वाराह ओर किमोर नामवले जो दो मदा- 
वली दानव येवे ही चाणूर ओर मुष्टिक नामसे उतवन्न हुए 
दै वे दोनों इस समय कसक अखडिके प्रमुख मट्ट (पदल- 
वान ) द ॥ ७६ ॥ 
यौ तौ मयश्च तारश्च दानवौ दानवान्तक। 
धराग्ज्योतिषे तौ भौमस्य नरकस्य पुरे रतौ ॥ ७७॥ 
ष्दानव-विनादाक नारायण ! मय ओर तार नामसे 
ग्रसिद्धलजोदो दानव ये, वे इख समय प्राग्न्योतिपपरैः जो 
भूमिपुत्र नरकासुरका नगर दैः निवास कसते ई ॥ ५७ ॥ 
पते दैत्या विनिहतास्स्वया विष्णो निराकृताः । 
माषं चपुसस्याय वाधन्ते भुवि माचुप्रान्‌ ॥ ७८॥ 
धविप्णो { आपके द्वारा पराजित ओर निदन हृएये 
दैत्य मानव-शरीर धारण करफ भूत्प्र मनुर्पयोक्रो पीडा दे 
रहे ई ॥ ७८ ॥ 
त्वत्कथाद्धप्रिणः सवं त्वद्रक्तान्‌ श्रन्ति मानुषान्‌ 
तव भ्रसादात्‌ तेषां वे दानवानां क्षयो भवेत्‌ ॥ ७९॥ 


ध्ये सव-के-सव्र आपकी कथावातसि देर रखते ईजीर 
आपये मक्ति रखनेवाठे मन्‌र्प्योको मार उठते द । आपके 
कृपा-प्रषादसे ही इन दानर्वोक्रा संहार हो सकता दहै ॥७९॥ 
त्वत्तस्ते विभ्यति दिवि त्वत्तो विभ्यति सागरे । 
पृथिव्यां तव विभ्यन्ति नान्यतस्तु कदाचनं ॥ ८० ॥ 

ध्वे आकार यास्मि तोभमी आपसे उरते । 
समुद्रम रद तो मी आपे ही भयभीत होतेह ओर प्रध्वीपर रद- 
कर भी केवल आपसे ही भय खति ई, दूसरे किंसीसे कदापि 
नहीं उरते ई ॥ ८० ॥ 


दुतस्य हतस्यापि त्वया नान्येन श्रीधर । 
दिव्च्युतस्य दैत्यस्य गतिभंवति मेदिनी ॥ ८१॥ 
श्रीधर | जो आपके दी दारा मारा जता दैः दूरे 
द्वारा न्दी, उस देत्यको, वह दुराचारी ही क्योनरदादहः ` 
अपह प्राप्त हते । परंतु जो दूसरे द्वारा मारागयादैः 
वह्‌ दैत्य खर्गसे श्रष्ट होनेषर प्रथ्वीपर ही जन्म लेता है ॥ 
व्युत्थितस्य च मेदिन्यां हतस्य चृशरीरिणः। 
दुभं सखगंगमनं त्वयि जाग्रति केशव 1 ८२॥ 
^केदाव | जव्रतक्र यमराजसे अप पापिर्योक्रो नस्क 
गिरानेके स्वि जागरूक दै, तवतक पथ्वीपर सो दूसरे दाय- 
से मारा जाता दै उसे खम॑की प्राप्तिभी दुर्लभ रहती है; 


हरिवंरापवं ] 


पञ्चपश्वाशासमो ऽध्यायः 


२०९ 


दच्च ~ 


( र मापकी प्राप्ति तो वृस्की व्रात है 1 अतः आप द्या 
करके दै्यौको मारकर उन सद्रति प्रदान कसेके च्थि दी 
भूतरपर अवतार ग्रहण करं ) 1 ८२ ॥ 
तदागच्छ खयं विष्णो गच्छामः पृथिवीतलम्‌ । 
दानवानां विनाशाय षिसृजात्मानमात्मना ॥ ८३॥ 
“अतः विष्णो { आप खयं आइये । चव्यि पृथ्वीपर 
पठे । वरहो दानवोके विनारके स्थि आप खयं ही अपने- 
अपक प्रकट करे ॥ ८३ ॥ 
मूतयो हि तवाव्यक्ता खदयाडद्याः सुरोत्तमैः । 
ताछ सृ्स्स्वया देवाः सम्भविष्यन्ति भूतले ॥ ८४७ ॥ 
"आपकी वहुत-सी मूर्वर्यो दैः जो व्यक्त नहीं होती ई। 
रेष्ठ देवता भी आपकी कुर मूर्तियोको देख पते ह ओर 


कुछको नहीं देख पति ई । आपके दवारा सवे गये देवता उन्दी 
मूर्तियोमे भूतल्पर प्रकर होगि | ८४ ॥ 
तवावतरणे विष्णो कंसः सं धिनरिन्यति। 
सेत्स्यते च स कायौथो यस्यां भूमिगता ॥ ८५॥ 
धविष्णो ! आपके अवतार ल्नेपर ही कंसका विनाश 
होगा ओर जिसके लि प्रश्वी यर्हो आयी थीः वह सारा 
प्रयोजन सिद्ध हो सकेगा ॥ ८५ ॥ 
त्वं भारते काय गुरुस्त्वं चक्षुस्त्वं परायणम्‌ । 
तदागन्छ हपीकेदय क्षितौ ताश्चहि दानवान्‌ ॥ <६॥ 
टुक्रा ! आण्को भारतवर्षे महान्‌ कार्य करना दै । 
आप ही सबके नेत्रै (नेर्बोकी मति सन्मार्गका दर्शन 
कराते द ) ओर आप ही संकरे परम आश्रय दहै; अतः आदये 
भूत्प्र अवतार छेकर उन दानर्वोका वध कीनियेः ॥ ८६ ॥ 


इति श्रीमहाभारते लिभागे हरिविशे हरिवंशापर्वणि नारदवाक्ये चतुप्पञ्चादात्तमोऽध्यायः ॥ ५४ ॥ 
इस प्रकार श्रीमहभस्तके लिरुभाग्‌ हरिवंश्के अन्तभेत हयिपमे नारका बादयग्रिषयक चोवनर्वे( अध्याय पुरा हुमा ॥ ५६ ॥ 
+ड >+ 
पचचपन्चारात्तमोऽध्यायः 


भगवान्‌ विष्णु हारा नारदजीके कथनका उत्तर तथा ब्रह्मजीका भगवानूसे उनके 
अबतार रेने योग्य खान ओर पिता-माता आदिका परिचय देना 


वेदयम्पायन उवाच 
नारदस्य वचः श्ुन्वा सस्मितं मधुखेद्ठनः 1 
परत्युवाच शुभं वाक्यं चरेण्यः प्रभुरीश्वरः॥ १९ ॥ 
वैशस्पायनजी कहते ईहै--जनमेजय { भोग ओर 
मोक्षकी अभिलखप्रा रखनेवे पुषे द्वारा जो एकमात्र 
वरण करने योग्य है, वे सर्वशक्तिमान्‌ परमेश्वर मधुसूदन श्रीहरि 
नारदजीकी पूर्वोक्त व्रात सुनकर सुस्कराये ओर अपनी 
कल्याणमयी वाणीदारा उन्हे उत्तर देते हुए वोठे-॥ १॥ 
त्रैलोक्यस्य दिताथीय यन्मां वदसि नारद्‌ 
तश्य सम्यक्प्रदृत्तस्य श्रूयसायुत्तरं वचः ॥ २॥ 
(नारद्‌ | तम तीनों लोकरकि हितकरे ल्थि समुञ्चसे जो कुछ 
कहं रहे होः तुम्हारी वह वात्र उत्तम प्रटरत्तिकरे छि प्रेरणा 
देनेवाली है, अव तुम उसका उत्तर सुनौ ॥ २॥ 
विदिता देहिनो जाता मयैते भुवि दानवाः । 
यां च यस्तचुमादाय दन्यः पुप्यति चिग्रहम्‌\॥ २ ॥ 
अबे सुन्ञे भरीमोति विदित है किये दानव भूतल- 
पर मानव-शरीर धारण करके उव्पन्नदो गये मेयहमी 
जानता हू किं कौन-कौन दैत्य करिस-किस शारीरो ग्रहण 
करके वैरमावकी पुष्टि कर रहा है ॥ ३॥ 
जानामि कंसं. सम्भूतसुप्रसेनखटं भुवि । 
केहिनं चापि जानामि दत्यं तुरगविग्रहम्‌ ॥ ४ ॥ 
मुषे यह भी ज्ञात दै किं कालनेमि उम्रसेनपुन 


कंसके रूपमे इस पृथ्वीपर उन्न हभ है । घोडेका शरीर 


धारण करनेवाले केशी नामक दैत्ये भी मै अपरिचित 
नहीं हू ॥ ४ ॥ 
नागं कुबख्यापीडं महो चाणुरसुषटिकौः । 
अरिष्टं चापि जानामि देत्यं वृषभरूपिणम्‌ ॥ ५ ॥ 
धुचलयापीड्‌ हाथी; चाणूर ओर मष्क नामक म्ल 
तथा इषभरूपधारी दैत्य अरिष्टो भी मै अच्छी तरह 
जानता हूं | ^ ॥ 
विदितो मे खस्शेषव प्रलस्वश्च महासुरः । 
साच मे विदिता विप्र पूतना दुहिता बलेः ॥ ६ ॥ 
धविप्रवर } खर ओर प्रलम्ब नामक मदान्‌ असुर मी 
मु्चसे अज्ञात नही ह । राजा बलकरी पुत्री पूतनाको मी 
जनता हू | ६॥ 
कालियं चापि जानामि यमुनाहदगेष्चरम्‌ । 
वेनतेयभयाद्‌ यस्तु यमुनाहदमाविरात्‌ ॥ ७ ॥ 
ध्यमुनाके कुण्डमे रहनेवाले काल्ियिनागको भी ओं 
जानता हूः जो गद्ड़के मयते उस कुण्डे जा घुसा ३॥ ७ ॥ 
विदितो मे जरासंधः स्थितो मूध्नि मदीकिताम्‌। 
प्रागज्योतिपपुरे वापि नरकं साधु तक्ये॥ ८ ॥ 
भ उस जरासंधसे मी परिचिं द जो इस समय 
समस्त भूमिपालक मस्तकपर खड दै । प्राण्योतिषपुसं 
रहनेवाठे नरकासुरको मी मै मलीर्मोति जानता हु ॥८॥ 


९१० 


शीमष्टाभारते सिलमागे 


| क 


मादुपे पार्थिवे ठो मायुषत्वमुपागतम्‌ 1 
वाणं च शोणितपुरे गुहपतिमतेजसम्‌ ॥ ९ ॥ 
दतं वबह्ुसदस्रेण देवैरपि सुदुर्जयम्‌ । 
मय्यासक्तां च जानामि भारतीं महतीं धुरम्‌ ॥ १० ॥ 
भभूतच्करे मानवटेोकर्मे जो सनुप्यल्प धारण करे 
उन्न हया दै जिसका तेन कुमार कार्तिकेये समान दैः 
जो गोणितपुरमे निवासत करता है ओर भपनी सदश्च युजा्ओकि 
कारण देवतार्थे च्वि भी अव्यन्त दुर्जय दयो रहा ड, उतस् 
चद्यमिमानी दैत्य वाणाघुरको भी मँ जानता हूँ तथा यह मी 
समद्यता हू करि प्ष्वीपर जो मारती सेनाकरा मदान्‌ मार 
वदा हु दै, उसे उतासनेका कार्यं मुक्षपर ही अवलम्बित 
है ॥ ९-१०॥ 
सर्वं तच्च षिज्ञानामि यथा योत्श्यन्ति ते चृपाः। 
क्षयो भुवि मया दष्टः दाक्ररोके च सत्किया । 
पपं पुरुपदेहानामपराच्रत्तदेहिनाम्‌ ॥ १२॥ 
र उन सारी त्रातेसि परिचित हू करि किस प्रकार वे 
रजाटोग आपिसमे युद्ध करे, भूत्पर उनका क्रिस तरद 
संहार होगा थौर पुनर्जनमसे रदित दिव्यं पुखपदेह धारण 
करनेवाले इन नरर्गोको इन्द्र्यो किस प्रकार सत्कार प्राप्त 
दोगा--यद स्र कुट मेरी अष्कि सामने है ॥ ११ ॥ 
सम्प्रवेकष्याम्यहं योगमात्मनश्च परस्य च। 
सम्प्राप्य पार्थिवं खोक्रं माञुपत्वमुपागतः ॥ १२॥ 
म भूलोके पर्हुचकरर मानवदयारीर धारण कखे खयं तो 
उद्ोगक्र याश्रयर्दगा ही, दूसरयोको भी इसके चि प्रेरित 
कग ॥ १२॥ 
कंसदीश्चापि तान्‌ सतरीन्‌ वधिष्यामि मदासुरान्‌ 1 
तेन तेन परिधानेन येन यः दाम्तिमेप्यति ॥ १३॥ 
"जिस-जिस विभिसे जो-नो अमुर मर सकेगा, उष-उस 
उपग्रह म उन समी कंस आदि वडे-दे असुर्योका वध 
कस््गा ॥ १३ ॥ 
अनुप्रिय योगेन तास्ता हि गतयो मया । 
अमीपां हि खुरेनद्राणां हन्तव्या स्पिवो युधि ॥ १४॥ 
धय योगसे इनके मीतर प्रवेद करके इनकी अन्तर्धान 
आदि गतिर्योको नष्ट कर दगा जीर इस ग्रकार युद्धम इन 
देवेश्व्के यचरुर्भोका सदार कर उर्टेगा 1} १४ ॥ 
जगत्य छते योऽयमंगोत्स्गां दिषौकसैः। 
खुरुदरवर्पिगन््वैरितश्चालुमते मम ॥ १५॥ 
विनिश्चयो धरगेव नरदायं छतो मया । 
ध्नारद ! पएध्वीकरे दितक्रे चयि खर्गवात्ती देवतार्थः 
देवपिर्यो तथा गन्धरवेनि वहति जो अपने-मपने अंका 
उत्सग क्रमा दैः यद्‌ सव्र मेरी अनुमतिते हु 2; क्योकि 
मने पदञ्डेहौ णेता निश्वव करचि था॥ १५१] 


निवासं ननु मे ब्रह्मन्‌ धिदधातु पितामहः ॥ १६॥ 
यत्र देशे यथा जातो येन वेपेण वा वसन्‌ 1 
तानहं समरे हभ्यां तन्मे बरूहि पितामह ॥ १७॥ 
ध्रह्मन्‌ ! अव्र यह ब्रह्माजी मेरे स्यि निवाससानकी 
व्यवस्था करे । पितामद ! अवर आप दी मुञ्चे वताद्येकरि मेँ 
क्रिस प्रदे केते प्रकट दौकर अथवा कंस वेदाम रहकर 
उन सत्र असुरयोक्रा समरमूमिमे संहार करूंगा १॥ १६-१७ ॥.- 
नक्षोकाच 
नारायणेमं सिद्धार्थसुपायं श्णणुं मे विभो) 
भुवि यस्ते जनयिता जननी च भविप्यति ॥ १८ ॥ 
यत्र त्वं च महावाहो जातः कुरकसे भुषि । 
यादवानां महद्‌, वंशमलिखं धारयिष्यसि ॥ १९ ॥ 
तांश्चाखुरान्‌ समुत्पास्य वंशं कृत्वाऽत्मनो महत्‌] 
स्यापयिष्यसि मयादा चरणां तन्मे निशामय ॥ २०॥ 
ब्ह्मजीने कद- सर्वव्यापी नारायण आप मुश्चसे इस 
उपायको युनिये, जिष्वक द्वार सारा प्रत्रोजन सिद्ध हयो जायगा। 
महावराह | भूतल्पर जो अपकरे पिता होगे, जो माता गी 
ओर जहो जन्म लेकर आप अपने कल्की बृद्धि कसते दूए 
यादर्वोके सम्पूर्णं विद्राल वंटाको धारण करे तथा उन 
समस्त असुर्योका संहार करफे अपने वंयाक्रा महान्‌ विस्तार 
करते हए जिस प्रकर मनुप्योके वि धर्मकी मर्यादा 
सखापित करये, वह सव वताता हू; उनिये ॥ १८-२० ॥ 
पुरा हि क्यपो विप्णो वरुणस्य महात्मनः । 
जहार यक्षिया गा वै पयोदास्तु महामखे ॥ २१॥ 
विष्णो { पहली वात दैः मदर्पि, क्यप अपने मदान्‌ 
यज्ञे अवक्षसर महात्मा वर्णक वहेति कु दुधार गर्णे 
मोगल्येयेः जो अपने दध आदिके दवारा य्ञकार्यम 
बहुत दी उयथ्रोगिनी थी ॥ २९१॥ 
अदितिः सुरभिश्चैते दे भ्ये कदयपस्य तु । - 
भ्रदीयमाना गास्तास्त॒ नेच्छतः वरुणस्य चे ॥ २२ ॥ 
यह-कार्य पूर्ण ह्यो जनेपर भी कदयपक्की दो पली 
अदिति थर जुरभिने वश्णकरो उनकी गौ टौ देनेकी 
दच्छा नदीं की॥ २२॥ 
ततो मां वरुणो ऽभ्येत्य प्रणम्य रिरसा ततः) 
उवाच भगवन्‌ गाचो गुरुणा मे हता इत्ति ॥ २३॥ 
तव दरुणदेव मेरे पा अयि ओर मस्तक द्ुकाकर 
मुद्चे प्रणाम करने पश्चात्‌ बोठे--"मगवन्‌ { पिताजीने मेरी 
ग्ट सकर स्व टी ६॥ २३॥ 
कृवका्यो हि गास्तास्तु नाुजानाति मे गुरूः 
अन्वधर्तत भ्ये द्वे अदितिं सुरभि तथा ॥ २४॥ 
ध्यद्परे उन गौमि जो कार्य लेना था; वड पूरा हो यया 


हरिवंशापवं ] 


पञ्चपञ्चादात्तमोऽभ्यायः 


[यकि 


है, तौ यी पिताजी मुम उन वापस छे जनेकी आज्ञा नहीं 
देते द । इस विषयमे उन्न अपनी दो पलियों यदिति ओर 
सुरमिके मता अनुसरण किया दै || २४ ॥ 


मम ता ह्यक्षया भावो दिव्याः कामदुहः भरभो 1 

चरन्ति सागरान्‌ सचौन्‌ रश्चिताः स्वेन तेजसा॥ २५॥ 
प्रमो [मेरी वे गौ दिव्यः अभय एवं कामधेनु है तथा 

अपने दी तेजते सुरक्षित रहकर समस समुद्रोम विचरण 


करती ह ॥ २५॥ 
कस्ता धर्षयितुं शक्तो मम गाः कर्यपादते । 
अक्चयं घा श्षरन्त्य्यं पयो देवाखतोपमम्‌ ॥ २६॥ 
ष्देव ! जो अगरृतके समान उत्तम दूधक्रो अविच्छिन्न 
रूपरसे देती रती है, मेरी उन गौर्थोको पिता कड्यपजीके 
सिवा दूसरा कौन बस्ूर्वक रोक सकता दे १ ॥ २६ ॥ 
भरभुवौ व्युत्थितो ब्रह्मन्‌ गुरुवौ यदि वेतरः] 
त्वयः नियम्याः स्वे त्वं हि नः परमा गतिः ॥ २७॥ 
श्रह्मन्‌ } कोई क्रितना दी चक्तिशारी होः गुखजन दों 
अथवा ओर कोई हो, यदि वह्‌ मर्यादाका व्याग करता है तो 
आप दही ेसे सव छोगोपर नियन्बण कर सक्ते है; क्योकि 
आप हम सव द्धोगोके परम आश्रय ह| २७॥ 
यदि प्रभवतां दण्डो शोके कार्यमजानताम्‌ । 
न बिद्यते लोकगुरो न स्यु रोकसेतवः ॥ २८॥ 
"लोकगुरो ! यदि संसास्मे अपने कर्तव्ये अनमिज्ञ 
-रहनेवलि ाक्तिारी पुरुपरेरि च्थि दण्डकी व्यवखान दहो 
-तो जगन्‌की खारी मर्यादा नट हये जर्वेगी ॥ २८ ॥ 
यथा वास्तु तथा वास्तु कर्तव्ये भगवान्‌ धमुः। 
मम गाघः प्रदीयन्तां ततो गन्तासि सागरम्‌ ॥ २९॥ 
श्त कार्थका जैसा परिणाम होनेवादयदो वेषा 
कर्तव्यका पाटनं करने या करनिमे आप ही हमर प्रमु दै। 
मन्न मेरी गौर्दे दिल्वा दीनि, तभी मै समु्रको 
जाऊंगा ॥ २९ ॥ 
या भात्मदेवतः गावो या गावः ससवमव्ययम्‌ । 
छोकाना त्वत्परचृत्तानामेकं गोग्राह्मणं स्सृतम्‌॥ २० ॥ 
(न गौेकि देवता साक्तात्‌ परत्य परमात्मा है तथा ये 
अविनाशी सखदयुणका साकारस्य दै । आपसे भरकर हुए जो- 
जोलोक दैः उन सवक दृष्टिमि गौ तथा ब्राह्मण एक समानं 
मनि गवे ईह॥ ३०॥ 
वातव्यः प्रथमं गावसलराताश्चायन्ति ता छिजान्‌। 
गोाह्यणपरित्राणे परितरातं जगद्‌ भवेत्‌ ॥ २१॥ 
पपदके गोर्योकी रा करनी चाये । फिर सुरक्षित हूर्द 
गौ बाह्मण रा करतो दै । गौभो जौर बा्र्णोकर रक्रा 
दोनेपर सम्पुर्ण जगत्की रक्षा हो जती दैः \। ३१ ॥ 


इत्यम्बुपतिना भोक्त वरुणेनादमच्युत । 
गवां कारणतच्वक्षः कश्यपे दापमुत्खजम्‌ ॥ ३२॥ 
अच्युत ! जले स्वामी वरुणे एेसा कहनेषर गो ओक 
कारण-तस्वकरो जाननेवल मेने कदयपकरो दाप देते हुए 
कृह्‌ा--॥ ३२ ॥ „ , 
येनांशेन हता भावः. कद्यपेन महर्पिण(। 
स तेनांश्चेन जगतीं गत्वा गोपत्वमेष्यति ॥ २२३॥ 
(महर्षिं कदयपने अपने जि अंसे गोर्ओंका अपहरण 
क्रिया दहै, उस अंशे वे पृथ्वीपर जाकर गोप गि ॥ ३२ ॥ 
याच सा सुरभिनोम अदितिश्च खुरारणिः। 
तेऽप्युभे तस्य भां वै तेनैव सह यास्यतः ॥ ३४ ॥ 
श्वेजो सुरमि नामेवाटी देवी है तथा देवतारूपी अभ्नि- 
को प्रकट करनेवाली अरणीके समान जो अदिति देवी हैः 
दोनो पलिया कदयपकरे साथ दी मूरोकमे जार्येगी ॥ ३४ ॥ 
ताभ्यां च सह गोपत्वे क्यपो भुवि रस्यते । 
स तस्य कद्यपस्यांशस्तेजसा कद्यपोपमः ॥ २५ ॥ 
चसुदेव इति ख्यातो गोधु तिष्ठति भूतले । 


ध्गोपयोनिमे प्रकट दए. कश्यप ॒भूतखपर अपनी उन 
दोनों पत्नि्योके साग्र युखमूंक रदेगे । कदयपका जो दूसरा 
अंश कदयप्के समान ही तेजस्वी है, वह॒ भूतल्पर वसुदैव 
नामसे विख्यात हो गौ ओर गोर्पोके अधिपति रूपते 
निवास करेगे ॥ ३५२ ॥ 


गिरिगोवधनो नाम॒ मथुरायास्त्वदुरतः ॥ २६ ॥ 
ततासौ गोषु निरतः कंसस्य करदायकः । 
तस्य भायौदयं जातमदितिः सुरभिश्च ते ॥ ३७॥ 
देषकी रोहिणी चेमे बद्ुदेवस्य धीमतः । 
खुरभी रोहिणी देवी चादितिर्देवकी त्वभूत्‌ ॥ ३८॥ 
'्मुरसते थोडी दूरपर गोवर्धन नामक पर्वत है, जं वे 
गौओंकी रामे तत्पर रहैगे ओर कंसको कर देनेवाले हगि । 
वरहो अदिति ओर्‌ सुरमि नामक्र इनकी दोनो पलयो बुदधि- 
मान्‌ वसुदेवकरी देवकी ओर रोहिणी नामक ही दो मार्य 
होगी; उनमे मुरमि तो रेदिणोदेवी कदलयेगी ओर अदिति 
देवक्री ॥ ३६-३८॥ ` 
तत्न त्वं शिश्युरेबादौ गोपालछृतटक्षणः। 
वधय मदहावारो पुरा वेविक्रमे यथा ॥ १९॥ 
"महावाहो ¡ वरदो आप पले रि्धरूपमे ही रहकर गोप- 
बालका चिह धारण करके क्रमशः बडे रोश्ये ! ठीक वैसे 
ही; जते त्रिविक्रमावतारफे समय आप वामनसे ब्ट्कर विराट्‌ 
होग्येये॥ ३९॥ ` 


छ{दयित्वाऽ.ऽत्मना ऽ ऽत्मानं मायया योगरूपया। 
चघ्रातेवर लोकानां भवाय मघुखूदन ॥ ४० ॥ 


॥ 


| 
४ 


२१२ 


'्मधुसूदन { योगमायाके द्वारा खयं ही अपने स्वरूपकौ 
आच्छादित करके आप ठोकदितके च्य वर्ह अवतार दीजिये॥ 
जयादीरवचनेर्त्वेते वर्धयन्ति दिधौकसः। 
आत्मानमात्मन। हि त्थमवतायं मरीतटे ॥ ४१॥ 
देवकीं सोदि्णीं चैव ग्भाभ्यां परितोषय । 
गोपकन्यासदस्नाणि रमयंश्चर मेदिनीम्‌ ॥ ४२॥ 

धये देवताटोग विजयसूचक्र आरीर्वाद देकर आपके 
अभ्युद्यकी कामना करते ह | आप प्रथ्वीपर सयं अपने-आप- 
को उतारकर दो गभे रूपमे प्रकट हो माता देवक्री तथा 
रोहिणीको संदष्ट कीजिये । साथ ही यथासतमय सदसत गोप- 
कन्यार्थको आनन्द प्रदान करते दए व्रजभूमिर्मे विचरण्र 
कीजिये ॥ ४९-४२ ॥ 
गश्च ते रक्षतो विष्णो वनानि परिधावतः। 
वनमाखपरिक्षित्तं धन्या द्वक्ष्यन्ति ते पुः ॥ ४३॥ 

धविप्णो } वर्हौ गौर्ओोकी र्षा करते हुए जव आप वन- 
यनम दौड़ते फिरेगे, उस समय आपके वनमालविभूपित 
मनोहर स्पा जो लो दर्णन करेगे, वेधन्यदो 
जार्येगे ॥ ५३ ॥ 
विष्णौ पद्मपखदाक्षे गोपाटवसति गते । 
वाङ त्वयि महावाहो खोक्रो वाछृत्वमेप्यति ॥ ४४॥ 

(महावराहो ! विकसित कमल्दल्के समान नेच्रवठे आप 
सर्वव्यापी परमेश्वर जव ग्वाख्रार्के स्पर्मै वजत निवास 
कर, उस समय सव्र खोग आपके बालस्पकी क्षोकी करके 
स्वयं भी बालक ब्रन जारयेगे ( व्राकटीटकफरे रसात्रादनम मग्न 
हो जर्वेगे ) ॥ ४४॥ 
त्वद्भक्ताः पुण्डरीकाक्ष तच चित्तव्ादुगाः। 
गोपु गोपा भविष्यन्ति सहायाः सततं तव ॥ ४५॥ 

कमलनयन | आपके चित्तके अनुकूठ वल्नेवलठे आप- 
के मक्तजन वरहो गौर्थोी सेवाक्रे ट्य गोप बनकर प्रकट 
गि ओर सदा आपके साथ-साथ रदहैगे ॥ ५५ ॥ 
चने चारयतो गाश्च गोष्ठेषु परिधावतः । 
मजो यमुनायां च ररि प्राप्स्यन्ति ते त्ववि ॥ ४६॥ 

(जव आप वनम गौ चरति टेगि, वरजमे इधर-उधर 
दी दोग तथा यमुनाजीकरे जलमे गोते रगत रोगि, उन 


शीम्ाभारते खिलभागे 


सभी अवसर्योपर आपका दर्गन करके वे भक्तजन यप्र 
उत्तरोत्तर अनुराग प्राप्त करेगे ॥ ४६ ॥ 
जीधितं चसुदेवभ्य भविप्यति सुजीवित्तम्‌ । 
यस्त्वया तात दव्यु्तः से पुघ्र द्रति द्यति ॥ ४७॥ 
ध्वसुदेवक्रा जीवम वासवम उन्तम जीवन होगा, जो 
आपके द्वार (तात ककर पुकररे जापर आपे धेयः 
कटुकर बरोटगे ॥ ४७ ॥ . 
अथवा कस्य पुरत्वं गनेथाः कदयपारते 1 
काच धारयितुं क्तात पिष्णो यद्रिति विना ॥ ४८ ॥ 
धविप्णो [ यवा आप कदयपके षिवा दूसरे किंष्ठे पुत्र 
गि १ दैवी अदिततिके वरिन्‌। दुसरी कोन-सी खी आपको गर्भम 
धारण कर सप्रेगी | ४८८ ॥ 
योगेनात्मससुत्थेन गच्छ त्वं विजयाय वै। 
वयमप्याटयान्‌ खान्‌ खान. गच्छामो मधुखटद्न॥ ४९॥ 
भपरधुसूदन † आप यपे स्वामाविक योगवरसे असुर- 
पर पिजय पने स्थि यर्हेप प्रान कीजिये ओर अवर म 
लोग भी अपने-अपने निवासस्यानको जा रे ६" ॥ ८९ ॥ 
वैशपायन उवाच 
ख देधानभ्यनुक्षाय विषिते चिदिवाख्ये | 
जगाम विष्णुः स्वं देशं श्रीयेद्रस्योत्तसां दिशम्‌ ॥ ५० ॥' 
वैशर्पायनजी कते ह--जनमेजय } देव्योकके; 
उस पुण्यप्रदेशभे वरैटे हए मगवान्‌ विष्णु देवतार्भेको जनि- 
की आना देकर श्षीरसागस्ये उत्तर द्रि दित अपने 
निवासस्यानको चठे गये ॥ ५० ॥ 
तघ्र वै पार्वदी नाम गुहा मेरोः खदुर्गमा 1 
निभिस्तस्यैव धिक्रान्सर्निन्यं पर्व॑सु पूजिता ॥ ५९॥ 
वदो मेख्पर्वतकी पार्वती नामसे प्रमिद्ध एक श्रत्यन्त 
दुर्गम गुप £ जो भगवान्‌ विप्णुकरे तीन चरणचिहुंसि 
उपलभित दोती है; दसीटिये पर्वके अवसर्ोपर सदा उसकी 
पूजा की जती दै ॥ ५१ ॥ 
पुराणं तत्न धिन्यस्य दें हरिख्दारधीः। 
आन्मानं योजयामास वस्देवगरहे प्रभुः ॥ ५२॥ 
उदारघुद्धिवाटे भगवान्‌ श्रीदरिने अपने पुरातन विग्रद- 
को वहीं खापित करफे अपने-आपकरो चसुदेव्जीकरे धरं 
अवतीर्णे हनेके कार्यम लगा दिया ॥ ५२ ॥ 


इति श्रीमहाभारते शिरमागे हरिवंशे हत्विंदापर्थणि पितामहवाक्ये प्चपन्चादात्तमोऽध्यायः ॥ ५५ ॥ 


दस प्रफार श्रीमहाभारते खिरुभाग्‌ हचिण्के अन्तर्गत दरिवशपवमे ब्रह्मना 
वचनविपय पचपन! अध्याय पुरा हुमा ]। ५५ ॥ 


दरिवंशपर्वं सम्पू । 


"न्नर तरितिविकिकन न 


४५ 


[८४ 


| श्रीपरमात्मने नमः 
श्रीमहाभारतम्‌ 
तस्य विलमागे हिः 
( तत्र विष्णुपर्व ) 


प्रथमोऽध्यायः 


मङ़लाचरण, नारदजीका मथुरामे आकर कंसको आनेदाले भयकी रचना देना 
ओर कंसका अपने सेवके सामने धटृ-दृकर वाते बनाना 


नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नयोत्तमम्‌ । 
देवीं सरखतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्‌ ॥ 
दरिकाश्रमनिवासी प्रसिद्ध पि श्रीनारायण ( अथवा 
अन्तर्यामी नारायण }, नर ( नासयगसखा अर्जुन अथवा 
आदि जीव हिरण्यगर्भं ) तथा नरोत्तम ( इन हिरण्यगर्भ एवं 
अन्तर्यामीसे भी श्रे जुद्ध सचिदानन्दघ्नन पुरभत्तन श्रीकृष्ण) 
के, यर ( इन नरनारायण तथा नसोत्तमक्रे तत्त्वको प्रकर 
करेवाटी ) देवीं सस्खतीको एवं ( देवी सरखखतीने सतारपर 
अनुपद करनेके स्यि जिनके गरीरमै प्रवेश किया है, उन ) 
व्यासजीको प्रणाम क्रे अचि्यारूपी अश्नानान्धक्ारफो जीतने- 
वलि इतिह।स-पुराण आदि प्र्योका पाठ आरम्म करे ॥ 
वेश्नम्पायन उवाच 
्षात्वा पिष्णुंक्षितिगतं भार्गाशच चिदिवौकसाम्‌ । 
विनाशदंखी कंसस्य नारदो मथुरां यौ ॥ १ ॥ 
वैशग्पायनजी कहते ह--जनमेजय ! भगवान्‌ 
षिष्णु ओर्‌ देवतार्यौके अं भूतप अवतीर्ण हो कके दैः 
यह्‌ जानकर ठेवर्परिं नारद्‌ कंसको उसके निकयवर्ती विनायकी 
रचना देनेके ट्ि मथुराको गयं} १॥ 
त्रिषि्पाद्‌पतित्तो मथुसेपवने स्थितः। 
परपयामास कंसस्य दूतं स सुनिपुद्गवः॥ २॥ 
खरग्सि उत्तरकर वे मथुरफ्रे उपवनमे ख्डे हो गये ओर 
वर्हृसि उन मुनिशरष्ठने कंसकरे पास पक दूत मेजा॥ २॥ 
सख दूतः कथयामास सुनेरगमनं चने । 
स॒ नारदस्यागमनं श्रुत्वा त्वरितविक्रमः ॥ ३ ॥ 
निजंगामाशुरः कंसः स्वयुयीः पद्मरु्चनः । 
उस दूतमे कंस पाख जाकर वताया कि मगरे उपवन- 


भ देवि नारद पधार ई  नारदजीके आगमनका समाचार 
सुनकर कमललोचन असुर कंस जस्दी-जल्दी वैर ब्रढाता हुआ 
अपनी पुरीसे बाहर निकला | २९३ ॥ । 
स दद्रीतिधि "छाघ्यं दवेवर्षिं वीतकर्मषम्‌ ॥ ४ ॥ 
तेजसा स्वटनाकारं वपुवा सू्यवचेसम्‌ । 
सोऽभिवाद्यर्षये तस्त पूजां चक्रे यथाविधि ॥ ५॥ 

उपवनमे पर्हुचकर उसने वहां अपने स्पृहणीय अतिथि 
देवपरं नारदका दर्शन क्रिया; जो पाप-तापते रहित ये । उनका 
तेज ग्रज्वलिते जग्निके समान जान पड़ता थाः वे शरीरे 
सूर्ये समान दीिमान्‌ दिखायी देते ये । कंसने देवर्षिको 
प्रणाम करके उनक्रा विधिपूर्वकर पूजन किया ॥ ४-५ ॥ 
आसनं चाध्रिवणौमं विखज्योपजहार सः। 
निषसादासने तस्मिन. स वैं शक्रसखो मुनिः ॥ ६ ॥ 

उसने उनके व्यि अग्निक्रे समान कान्तिमान्‌ सुवर्णमय 
आसन देकर क्रमशः अर्य, पाद्य आदि उपहार प्रस्त क्रिय 4 
तत्पश्चात्‌ इन्द्रके सखा नारद मुनि उस आसनपर वैठे ॥६॥ 
उवाच चोग्रसेनस्य सुतं परमकोपनम्‌ 
पूजितोऽहं त्वया वीर विधिर्षेन कर्मणा ॥ ७ ॥ 
गते त्वेवं मम चचः श्रूयतां गृद्यतां त्वया । 

वैठनेके वाद वे परम क्रोधी उग्रसेनपुत्र कंसते बोले-- 
ध्वीर ! तुमने मेरा शालीय विधिसे पूजन किया है, इसच्यि 
भ तर्द एकं आवश्यक चात वताता हू, तुम मेरे उस वचन- 
को पुनो ओर ग्रहण करो ॥ ७९ ॥ 


अलुखत्य  दिषोलोकानहं ब्हयुर्तेगमान्‌ ॥ ८ ॥ 


गवः सू्॑सखं तात ॒विपुरं मेरपर्वतम्‌ । 
ॐ „०, (4 1] 
सनन्दनवनं चेव दषट्र चै्ररथं वनम्‌ ॥ ९ ४ 


२१४ 


श्रीमहाभारते सिलभागे 


[ शिवे 


आप्लुतं सर्व॑तीर्थु सरित्सु सदह दैवतैः । 
दिव्या तिघरा दृठ मे पुण्या त्रिपथगा नदी ॥ १५॥ 
स्मरणद्रिव स्वेपामंदसां या विभेदरिनी। 
स्तात | मँ व्रस्मरोकर आदि समी स्वर्गीय लोकमि धूमता 
हुआ उस विज्चाट मेष्पर्वतपर जा पर्हुचाः जो सूयदेवक्रा रखा 
है 1 फिर नन्दनवन. ओर चै्ररथवनका दर्ठानि करे ओने 
देवतार्भके साय सप्पूर्णं तीथा यौर सरिताओंम.स्नान करिया ] 
उसके वराद तीन धारार्थं रैटी दुद दिव्य तरिपयगा नदी 
पुण्यसलिख गद्भाकरा दर्दान फिया, जो स्मरणमात्रसे दी समस्त 
पार्पोकः विनाश कर देनेवी ह ॥ ८-१०९ ॥ 
उपस्पृष्टं च रीर्थ॑घु दिव्येषु च यथाक्रमम्‌ ॥ ११॥ 
एं मे ब्रह्मसदनं व्रह्म्पिगणसरेचितम्‌। 
देवगन्धर्वनिघोषिरण्ससेमिश्च नादितम्‌ ॥ १२॥ 
(तत्पश्चात्‌ क्रमः दिव्य तीर्थम स्नान एवं आचमन करे 
मेनि व्रद्मियेसि सेचिन व्रह्माजीके भवनक्रा दर्गन क्रियाः जो 
देवगन्धर्वोके वायोषरे नूँजता ओर अप्सराथेकि मधुर गीर्तौ- 
से निनादित दयेन रहना दे ॥११-६२ ॥ 
सोऽहं कदाचिद्‌ देवानां समाजे मेसमूधंनि । 
संग्रद्य वीणां संसक्तामगच्छं ब्रह्मणः सभाम्‌ ॥१३ ॥ 
व्वहसि दोक्रर में किमी समय हाथमे वीणा व्यि मेदक 
रिखरपर विराजमान ब्रह्माजीकी समाम गयाः जर्दौ देवतार्ओ- 
का समाजचयदहूयाथा॥ ६२॥ 
सोऽहं तत सितोष्णीपान्‌ नानारलबिभूपरितान्‌ । 
दिन्या(सनगतान्‌ देवानपस्यं सपित(महान्‌ ॥९४॥ 
वव्हो देखा किं दयेत पगदी धारण कयि नानां रत्नैसि 
विभूषित व्रह्मा आदे समी देवता दिव्य भिंदासनपर व्रैठे हुए 
ह॥ १४॥ 
तत्र॒ मन्यतमेवं द्रेवतनां मया श्रुतः। 
भवतः सलुगद्येव वधोपायः सुदाख्णः ॥१५॥ 
भ्उस सममि देवतार्थोकी जो युत मन््रणा दो रदी थी, 
उपमे मने सुना फि तेवक्रोऽदित तुम्हरे वधे अयन्त 
दारण उपावका दी विचार दो रदा टे १५॥ 
तत्रैषा देवकी या ते मथुरायां कघुखसा । 
योऽस्यां गर्भोऽमः कंसल स ते त्यु्भविष्यति ॥१६॥ 
कंस [वर्योजो कुछ मैने सुना दै, उरु अनुसार 
मथुरामे जो वुग्दारी यह्‌ छोटी वदिन देवकी है, दषक्रा आटवों 
गरम वुम्दरि ल्थि ग्सयुल्प होगा ॥ १६ ॥ 
देवानां स तु सर्वस्वं विद्विवस्य गतिश्च सः। 
परं रस्यं देवानां स ते अत्युर्भविप्यति ॥ १७॥ 
५व्‌ गम देवताओका सर्वस्व तथा खर्गटोकका आश्चय 


टयोगा | वह्‌ देवतार्थोश्ना परम गोपनीय रद्य द । वष्ट ठम्दारी 
मृत्युक्रा कारण द्येगा ॥ १७ ॥ 
परश्चैवापरस्तेां स्वयम्भूश्च दिवौकसाम्‌ । 
ततस्ते तन्महद्धतं दिव्यं च कथयाम्यदम्‌ ॥ १८॥ 
ध्वही देवताओंका पर ओर अपर ( मोश्च थीर स्वर्ग) 
| वटौ उन स्वमवातिरयोका खयम्भू जह्य द 1 दसीप्पि्म 
तमसे कृता ह करि वद मदान्‌ दिव्य भूत १॥ ५८ ॥ 
"छाष्य् स हिते स्र्युभंतपूर्वश्च तं सर । 
यल्श्च क्रियतां कंस देव्या गर्म॑रृन्तने ॥ १९॥ 
कंसं { वदी पटे मी वु्दारी मलय शा अर्‌ इख 
समय भी तुष्दि ल्ि प्रसंवनीय मृद्युम्प द्यगाः, अतः तुम 
देवकीके गर्मका उच्छेद करनैके ्यि प्रयल कयो ॥ १९ ॥ 
पपा मे तद्वता प्रीत्तियंद्थं च्हमागतः। 
भुज्यन्तां सर्वकामायीः स्थस्ति तेऽस्तु जाम्यदम्‌। २०1 
ध्य्‌ मेरा तुन्दे ऊपर प्रम दै" जिशक़ च्वि मं यतक 
आया ह| मच्छाः अत्र तुम सम्पूर्णं मनोवाज्छिति भोर्गोक 
उपभोग करोः वुम्दाय कल्याण ष, म जता ह ॥२०॥ 
श्त्युक्तया नारदे यति तस्य वद्यं विचिन्तयन्‌ । 
जहासोच्चैस्ततः कंसः श्रकादादटानश्चिरम्‌ ॥ २९॥ 
रेसा ककर जवर नारदजी चले गयेः तव कृ बेहूत 
देरतफ़ उन्नी वातेपर विचार कला ददा फिर वह्‌ दति 
दिखाकर जोर-जोरसे अब्दा करने ट्गा ॥ २१ ॥ 
प्रोवाच ससितं चेव भृन्वानामग्रतः स्थितः। 
हास्यः खलु स सवेषु नाप्य न विश्चार्दः॥ २२॥ 
ओर अपने सेवके सामने खड़ा हो भुखकराकर योदा- 
ध्यह नारद मुनि स्वसापारणर्म उपदात्मे ही पाच्च ६, विरेप 
चुर सदी दह ॥ २२॥ 
नाहं भीषयितुं शशयो देवैरपि सवासवैः। 
आसनस्यः ह्ययने चा प्रमो मत्त एव च ॥ २३॥ 
शँ बैठा अथवा सोवा रह, असावधान या मतवाल 
हॐ किसी भी दशमे इन्दरसदित सम्पूणं देवता भी भन्ने दरा 
नहीं सकते ॥ २३ ॥ 
योऽहं दोभ्यामुदासभ्यां क्षोभयेयं धसमिमम्‌। 
कोऽस्ति मां मालि रोके यः क्चोभयितुमुन्सदेत्‌॥ २४॥ 
भम अपनो दोर्नौ विनाल भुजाओति इस धरातलकरो क्षुन्ध 
कर सकता हूं । मनुध्यसेत्मे कौन पेना पुद्प दैः जो मुत 
क्षोभे उाट्नेका साहस कर सङॐ़ ॥ २४ ॥ 
अदयप्रथृति देचानमिर देवद्धुवर्तिनाम्‌ । 
खपक्षिपद्यसंघानां कसेमि कदनं महत्‌ ॥ २५॥ 
भ्यह्‌ ख, माज्छे म देवतारभा तथा उनका अनुखरण 


विषयपव] 


दितीयीऽष्यायः , 


२१५ 


करनेवाले मनुष्यो, पक्षि ओर पञचसमू्हौका मदान्‌ संहार 
करूंगा ॥ २५ ॥ - 
आज्ञाप्यतां हयः केरी प्रकम्बो धेद्धकस्तथा । 
अरिफरे वृषभश्चैव पूतना काछियस्तथा ॥ २द॥ 
अभ्वं पृथिवीं कृत्स्नां यथेष्रं कामरूपिणः । 
प्रहरध्वं च सर्वषु येऽस्माकं पक्षदुषक(: ॥ २७॥ 
'अश्वरूपधारी केशी परठम्ः घेनुक्रः इपमरूपधासी 
अरिष्ट पूतना ओर काच्ियनागकरो आक्ञादेदोकि तुम सव 
. लछोग इच्छानुसार सूप धारण करे सारी प्रथ्वीपर अपनी 
मोजवे धूमो ओौर जो हमरे पक्ष ए निन्दा करमेवाले हो, उन 
सपर प्रहार करो ॥ २६-२७ ॥ 
गर्भ॑स्थानामपि गतिर्धिज्या चैव देहिनाम्‌ । 
नारदेन हि गेभ्यो भयं नः समुदाहतम्‌ ॥ २८॥ 
ध्जो प्राणी गर्भम निवात करते हो, उनका भी पता खगा 
टना चादियेः क्योकि नार्दर्जीने मेरेच्यिगममौसि ही मय 
चताया टै ॥ २८ ॥ 
भवन्तो हि यथाक्रमं मोदन्तां विगतज्वराः। 
मा च वो नाथमाधिन्य नास्ति देवरूतं भयम्‌ ॥ २९॥ 


व्ुमलोग निशित होकर इच्छानुसार आनन्द भोगो । 
ओँ वम्हारा खामी ओर सरक हू । मेरा आश्रय केकर व॒ 
देषतार्ओकी ओससे कोई भय नदीं है ॥ २९ ॥ 
खतु केिक्रिखो धिप्रो भेदशशीरश्च नारदः । 
सखुन्छि्ठानपि लोकेऽस्मिन्‌ भेद्ये भते रतिम्‌ ॥ २० ॥ 
नारद वबाब्ा तो युद्ध करानेका ही खेर खेलते है । 
लोग पट डाल देना उनक्रा स्वभाव है । दस संसारम जो रोग 
बरद स्नेहसे मलीरमोति मिल-जुरकर रहते है, उनम भी पट 
डाल्नेमे इन्दे आनन्द आता ॥ ३० ॥ 
कण्डयमान; सततं लोकानटति चञ्चलः। 
घटमानः नरेन्द्राणां तन्तैवराणि चैव हि ॥३१९॥ 
भये वद्धे चञ्चर ई ओर ठोगोमे सदा संघर्षं वेदा करते 
हुए घूमते रहते ई । विभिन्न उपा्योद्रारा राजामि वैर 
वदा देनेके लि ये सर्वदा सचेष्ट रदते हैः ॥ ३१ ॥ 
यवं स विखपन्नेव वाङमत्रेणेव केवलम्‌ । 
विवेदा कंसो भवनं दद्यमनिन चेतसा ॥ ३२॥ 
इस प्रकार केवर वाणीमात्रसे प्रलप कस्त हुआ कंस 
अपने भवनमे चख गया । उस समय उप्षक्रा चित्त चिन्ता- 
की आगमे जलरहाभा] ३२॥ 


इति श्रीमहाभ।रते विरमे हशि विष्णुपर्वणि नारदागमने कंसवाक्ये प्रथमोऽध्यायः ॥ ९ ॥ 


इस प्रकार श्रमहामतकरे लिरमाग दततिशके अन्तत तिष्ु पमे नासदजौका आगमन 
तथ, कका यक्यनिषयक प्सा अध्याय पुर हुमा ॥\ ९ ॥ 
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द्वितीयोऽध्यायः 
कंसदरारा देधकगोके सर्भके पिनाक प्रयल, भगवान्‌ प्रिष्युकषा पाताररोकमे धित 'वडगर्म' नामकं 
दैत्यकि जीर्योक अकर्ण करके उन्दं निद्रा देवीके हाथमे देना जर देवफके गर्भे 
क्रषरे; स्थापित कनेक। आदेश्च देर अन्य कर्तव्य बताना तथा कार्यसाधनके 
अनन्तर वद्नेवाली उस्र देवीकी महिमाका उर्टेख 


कै्चम्यायन उकवाष 
सोऽक्ञापयत संरब्धः सचिवानान्मनो हि तान्‌ । 
यत्ता भवत सवे चे देवक्या गर्भ॑ङन्तमै ॥ १९ ॥ 
वैशम्पायमजी कहते हँ--जनमेजय ] करोधमे भरे 
हए कंसने अपने हितेषी मन्ति्योको आक्षा दी करि तुम सव 
ऊोग देवकीके गर्भक्रा उच्छेद करने व्यि उदयत हो जाओो ॥ 
प्रथमादेव हन्तव्या मभौस्ते सक्त षव हि। 
मूलादेव तु हन्तव्यः सोऽनर्थं यत्र संशयः ॥ २ ॥ 
पठे गर्भसे ही आरम्भ करे पे सातौ गभ॑ नष्ट कर 
देने चाये । जरह संगाय दो, उस अनर्थका मूर्ते द्यी उच्छेद 
कर देना आवद्यक है ॥ २॥ 
देवकी च गहे गुत्ता पच्छन्नेरभिरक्षिता । 


स्वैरं चरतु विश्रग्या गर्भकारे तु रक्ष्यताम्‌ ॥ २ ॥ 
देवकी अपने मवनमे गुप्त रकनर्कोदयारा सुरश्चित रहकर 
अयनी इच्छकरे अनुसार निर्मप विवरे; परंतु जघ्र वह 
गर्मवती हो जाय, उस समय उसे विदो नियन्तरणमे रखना 
चादिये | ३॥ 
मरालान्‌ वै पुष्पमासादीन्‌ गणयन्तु मम खियः। 
परिणमे तु गभेस्य रोषं क्षास्यामहे वयम्‌ ॥ ४ ॥ 
मेरी लियो रजसखल्वश्याते ही आरम्भ करके उसके गर्भ॑ 
धारणक मार्ली गणना करती रह । जव गर्भ॑के परिक 
होकर प्रकट होनेका समय आ जाय तथ जो शेष कृतय दै, 
उसे हमलोग सख्यं ही समञ्च ठग } ४॥ 
वछदेवस्तु संर्ष्यः सीखना भूमिषु । 
प्रमत्तेर्म॑म दिते रा्ावहनि चै दि। 


२९६ 


सीभिर्वय॑वरेष्वैव वक्कव्यं न ठु कारणम्‌ ॥ ५॥ 
मेरे दितैपी सेवक रात-दिन खावधान रहकर चिर्योखि 
खनाय अन्तःपुस्मे वदुदेवजीकी मलीभेति रधा ( देखभाल ) 
करे । छियो ओर दिंजडे मी उनपर कड़ी दृष्टि रख, परंतु 
सकरा कारण उन्दं नदीं वताना चाद्ये ॥ ५ ॥ 
पप मायुण्यको यत्नो मालुषैरेव साध्यते । 
श्रूयतां येन दैवं हि मद्िधैः परतिदन्यते॥ ६ ॥ 
मनुर््योद्रारा किया जानेवाल यद उपाय उर्दि वाभ्य 
हो सक्रता दै, परंतु मेरे-जैषे शाक्तिदाली पुख्य जिस उप्रायसे 
दैवको मी प्रतिहत ८ निप्फर ) कर देते है उसे सुनो ॥६॥ 
मन्वग्रपैः सुषिदितैरौपयेश्च सखुयोनितेः। 
यतेन चानुक्टेन दैवमप्युलोम्यते ॥ ७ ॥ 
मली्ोति कि हुए मन््रसमू्हके जप; अच्छी तरह 
उपयोगमे खये हए ओपर्ोके सेवन तथा अनुकूल प्रयलनसे 
दैवकी मी अपने अनुदूल वना लिया जता है ॥ ७ ॥ 
वैश्रम्पायन उवाच 
धवं सं यत्नवान्‌. कंसो देवकीगभंकृन्तने । 
भयेन मन्यामास श्रुताथो नारदात्‌ स वै॥ ८ ॥ 
वैदाम्पायनजी कते है-- राजन्‌ ! इख प्रकार कंस 
देवकीके गर्भका विनाग करनेके यत्नम छग गया । नारदजीते 
सायै वाते वह सुन चुका था दस्य मये प्रेरित कर 
अपनी रश्ठाके ल्म मन्तरियोकरि साथ मन्वणा करने खगा ॥८|] 
पर्वं श्रुत्वा प्रयत्नं वै कंसस्यारिएसंक्षितम्‌ 
अन्तघौनं गतो विष्णुशिन्तयामास वीर्यवान्‌ ॥ ९ ॥ 
कंखका चारा प्रयत्न जगत्‌के स्यि उदयातर्प ही थाः 
उसे सुनकर अद्द्य भावसे वहां सित्त दए परम पराक्रमी 
भगवान्‌ विप्णुने इस प्रकार विचार किया-!! ९ ॥ 
सतेमान्‌ देवकीगभौन्‌ भोजपुखो वधिष्यति । 
अणएमे च मया गमं कायंमाधानमात्मनः ॥ १० ॥ 
"मोजकूमार कंस देवकीके इन सात ग्मौको सार 
उठेगा । अथवा आठ गर्भम मन्चे अपने खसूपका आधान 
करना चादियेः ॥ १० ॥ 
चस्य चिन्तयतस्त्वेवं पातारखमगमन्मनः। 
यत्र ते ग्भ॑शयनाः पड्गभा नाम दानवाः ॥ ११॥ 
इस प्रकार सोचते दए भगवान्का मन सदसा पाताल्की 
ओर गया, जदो वे गर्भे शयन करनेवलि पडगर्मं नामक 
दानव विद्यमान ये| ११॥ 
विक्रन्तवपुपो दीप्तास्तेऽखतप्रारानोपमाः। 
अमरप्रतिमा युद्धे पुत्रा वै काठनेमिनः॥ १२॥ 
उनके शरीर दर-विक्रममे सम्पन्नं ये | वे अगरृतमोजी 


श्रीमहाभारते खिलभागे 


[ शरिषंसे 


देवताओं समान तेजस्वी ये ओर युद्धम देवता्कि ठस्य 
पराक्रम प्रकट करते थे | वे सवृ-के-सव कालनेमि नामक 
दैत्यके पु ये ॥ १२॥ 
ते ताततातं संत्यज्य हिरण्यकदिपुं पुरा । 
उपासां चक्रिरे दैत्याः पुरा लोकपितामहम्‌ ॥ १३॥ 
पदलेकी बात हैः वे दैत्य अपने पिताके भी पिता हिरण्य- 
करिपुको शरोडकर लोकपितामह बह्याजीकी उपासना 
क्शने ल्मे ॥ १३॥ 
तप्यमानास्तपस्तीवं  जसामण्डरुघारिणः) 
तेषां भ्रीतोऽभवद्‌ बह्मा पद्भीणां वरं ददौ ॥ १४॥ 
सिरपर जयका भार धारण किये वे तीव्र तपरस्यर्मे ल्ग 
गये । तवर वरहयाज्ी उन श्डगर्म* नामक दे््योपर प्रन हो 
गये ओर उन वरदेने स्तो ॥ १४॥ 
ब्रह्मोवाच 


भो भो दानवशादंखास्तपसाहं खुतोपितः। 
ब्रूत बो यस्य यः कामस्तस्य तं तं कसेम्यदम्‌ ॥ १५॥ 
ह्माजीने कदा--दानवकुल्मे सिंहे समान पराक्रमी 
वीरो ! मै ठम्दारी तपस्यति बहुत संतुष्ट ह| ठममेते जिसे 
जि वस्तुकी इच्छा दो, उसे वताओः मेँ वद सव पूरणं करगा ॥ 
ते तु स्वं समानाथौ दैत्या बह्माणमन्रुचय्‌ । 
यदि नो भगवार्‌ प्रीते दीयतां नो वरो वरः ॥ १६॥ 
उन सतव दैर्योका प्रयोजन या मनोरथ एक-खा ही था । 
ने ब्रह्लाजीसे ब्रोले--“मगवन्‌ | यदि आप हमपर प्रसन्न ह 
नो हमे यह श्रेष्ठ वर दीन्यि ॥ १६ ॥ 
अवध्याः स्याम भगवन्‌ दैवतैः समहोरगैः1 
कापप्रहरणश्चैव स्वस्ति नोऽस्तु महर्थिभिः'॥ १७॥ 
“भगवन्‌ ¡ हम देवतार्थं तथा बडे.वडे नागेसिभी 
अवध्य हो | ओ शापद्रारा प्रहार करनेवले दै उन महर्षि्योषि 
भी हमारा सदा कल्याण ही हो ॥ १७॥ 
यक्षगन्धरवेपतिभिः सिद्धचारणमानयैः ` 1 
भा भूद्‌ चघो नो भगवन्‌ ददासि यदिन वरम्‌॥ १८॥ 
भ्मगवन्‌ | यदि आप ह्म वर दे रहे हतो यक्ष, गन्धर्व. 
पतिः सिद्धः चारण तथा मनुर्योद्वारा हमारा वधन दोः ॥ 
तादुवाच ततो बद्या सु्रीतेनान्तरात्मना । 
भवद्धिय॑दिद्‌ं प्रोक्तं ॑सर्वमेतद्‌ भविष्यति ॥ १९॥ 
तव ब्रह्माजीने उनके प्रति अव्यन्त प्रवन्नचि्तते कदा-- 
ध्ुमले्गनि यह जो कुछ कंडा दैः वह सवर पृश होगाः ॥१९॥ 
पड्गभीणां वरं दत्वा खयम्भूखिदिवं गतः। 
ततो हिरण्यकर्िपुः खरोषपो वाक्यमब्रवीत्‌ ॥ २० 


~ ---- 


विष्णुपवं ] 


दितीयोश्ध्यायः 


२१७ 


८उन (्वद्गभेः नामव देत्योको इस प्रकार वर देकर 
सयम्मू ब्रह्माजी ब्रह्लोकको चङे गये । उधर दिरण्यकरिपुने 
रोषरमे भरकर उनसे कहा- २० ॥ 
मामुत्खज्य वसे यस्माद्‌ धरतो वः पद्मसम्भवास्‌। 
तस्माद्‌ वस्त्याजितः स्नेष्टः शाघरुभूतांस्त्यजाम्यष्म्‌॥२९॥ 
८अरे ! वमने सुनने छोड़कर कमख्योनि ब्रह्माजीसे चर 
अ्रदण किया दै; अतः अपने प्रति मेरे स्नेहका व्याग करा 
दिया । अब तुमलोग मेरे श्ुभूत टो, दस्य तमद त्याग 
देताहूं॥ २९॥ 


षङ्गभौ हति योऽयं चः शब्दः पित्राभिवर्धितः। 
स एव वो गर्भगतान्‌ पिता सौग वधिष्यति ॥ २२॥ 
“निस पिताने ठं 'घडगर्भः नाम दिया ओर पारपोस- 
कर बड़ा कियाद वदी र्मम खित दहोनेपर ठम सव 
छोगोका वध कर उिगा ॥ २२॥ 
षडेव देवकीर्भे षद्वर्भां वै महासुराः । 
भविष्यथ ततः कंसो गर्भस्थान्‌ घो वधिष्यति ॥ २३ ॥ 
धुम छ द्गर्भः नामक महान्‌ असुर देवकीके गर्भम 
यित होगे । तव कंस ( जो ठम्हरे पिता काल्नेमिका 
ही खरूप होगा ) वरम गर्मख्य बाररकोका वध कर डलेगाः ॥ 
वैशम्पायन उवाच 
जगामाथ ततो विष्णुः पातारं यत्र तेऽखराः । ' 
षङ्गभांः संयता; सन्ति जरे गर्भगृेद्रायाः ॥ २७ ॥ 
वेश्षम्पायनजी कहते है--राजन्‌ ! उनकी याद अति ही 
भगवान्‌ विष्णु पातारुरोकम गये, जहो वे (षड्गर्मः नामक 
असुर संयमनिष्ट होकर जल्के भीतर गर्भग्रह शयन कसते थे ॥ 
संददद जले सुप्तान्‌ षद्धभौन्‌ गर्म॑संसितान्‌ । 
` निद्रया कारुरूपिण्या सवौनन्तर्हितान्‌ स घे ॥ २५॥ 
उन्दने देखा, सव (्वड्ग्भैः नामक दैत्य कारुरूपिणी 
निद्रासे तिरोहित दोकर जख्के मीतर गर्भगरहमे सो रदे है ॥ 
स्वप्नरूपेण तेषां वै विष्णुदेहानथाविशत्‌ । 
प्रणिभ्वरंश्च निष्छष्य निद्रायै प्रददौ तद ॥ २६॥ 
तत्र भगवान्‌ विष्णु स्वप्नरूपसे उनके शरीरम भरविष्ट 
हृष्ट ओर उने जीवको खींचकर उन्हेनि निद्राकी अधिष्ठात्री 
देवीके हाथमे दे दिया ॥ २६॥ 
तां चोवाच ततो निद्रां विष्णुः सत्यपराक्रमः । 
गच्छ निवे मयोत्खष्टा देवकीभवनान्तिकम्‌ ॥ २७ ॥ 
इमान्‌ प्राणेभ्वरान्‌ गह्य षङ्गभौन्‌ दानयोन्तमान्‌ । 
वञ्जञभौन. देवकीगभें योजयस् यथाक्रमम्‌ ॥ २८॥ 
तयश्रात्‌ सत्यपरक्रमी मगवान्‌ विष्णु उस निद्रासे बोले- 
निद्रे | तुम मेरी प्रेरणासे श्न जीवको टठेकर देवकीके घरक 


निकट जा । ये सव-के-सव वड गर्भः नामवले श्रेष्ठ दानव 
है । इन. खव धडगर्मोको क्रमशः देवकीके गर्भम. स्थापित 
करती रहो ॥ २७-२८ ॥ 

जतेष्वेतेपु गर्भेषु नीतेषु च यमक्षयम्‌ । 
कंसस्य विफले यतने देवक्याः सफले श्रमे ॥ २९॥ 
भ्रसादं ते करिष्यामि म्मभावसमं मुवि। 

येन सर्व॑स्य छोकस्य देवि देवी भविष्यसि ॥ २० ॥ 


धजव ये गर्भं जन्म केकर कंसद्रारा यमखोक पर्हुचा दियि 
जर्येगे, जव कंसका प्रयत्न निष्फल ओर देवकीका परिश्रम 
सफर हो जायगा; तव मै उमपर विशेष कृपा करेगा । 
देवि ! उ समयसे भूतल्पर ठम्हारा प्रमाव मेरे प्रभाक्के 
समान ही हो जायगा, जिससे तुम सम्पूर्णं जगत्की आराध्य 
देवी बन जागी ॥ २९-३० ॥ 


सप्तमो देवकीगभों योऽरः सौम्यो ममा्रजः। 
स संक्रामयितन्यस्ते समे मासि सेहिणीम्‌ ॥ ३१ ॥ 
ष्देवकीका जो सातर्वो ग्भ होगा, वह भेरा ही सौम्य 
अंस होगा ओर भुञ्षसे पले अवतीर्णं होनेके कारण मेरा बडा 
भाई शषेगा । वह गर्म जव सात महीनेका हौ जायः तेव उस 
सातवे मासमे ही तम उपै खचकर रोदिणीदेवौके ग॑म 
स्थापित कर देना ॥ ३९ ॥ 
संकर्षणात्तु गर्भस्य स तु स्कर्षणो युवा। 
भविष्यत्य्रजो श्राता मम शीतांश्युदरनः ॥ ३२॥ 
'गर्भ॑का संकर्षण होनेसे बह तरण वीर (संकषणः नामसे 
प्रसिद्ध दोगा, चन्द्रमाकरे समान गौर पर्णसे सुरोभित दिखायी 
देगा तथा वह मेरा बड़ा भाई दोगा ॥ ३२ ॥ 
पतितो देवकीग्भः सप्तमोऽयं भयादिति । 
अष्टमे मयि गर्भस्थे कंसो यत्नं करिष्यति ॥ ३२ ॥ 
(उस समय रोग यही करेगे कि ष्देवकीका सातो गभ॑ 
कंसके भयते गिर गया !' आठवें सिश्युके रूपमे जव मँ गर्भम 
आकञंगाः तव कंस मुने भी मारमेका प्रयास फरेगा ॥ ३२३ ॥ 
या तु सा नन्दगोपस्य दयिता भुवि धिश्चुता । 
यदोदा नाम भद्रं ते भायौ गोपकूखोद्दा ॥ ३४ ॥ 
देवि { व॒म्दारा भला दो, इस समय भूतर्पर ्यशोदा? 
नामठे विख्यात जो नन्दगोपकी प्यारी पल है, वे गोपकुरू- 
की खामिनी ह ॥ ३४ ॥ 
तस्यास्त्वं नवमो गर्भः कुेऽस्माकं भविष्यसि । 
नवम्यामेव संजाता ऊप्णपक्षस्य वै तिथौ ॥ ३५॥ 
धुम उन्दीके नवमं मर्भ॑के रूपम हमारे कुर्म उत्यनन 


जानकि 
१. यष्ट नवम संख्या देवकीके आठ पूर्वोकी अपेक्ासे कष्टौ गयी 


है 1 जान पड़ता हेः श्रीकृष्णके वाद कुछ कारके चियि योगनिद्राका 
मी देवकीके उदरे अवेश हमा था 1 


२१८ 


होभगी । भाद्रपद कृष्णपक्षकी नवमी तिथिक्रो ही ठम्दारा 
जन्म होगा ॥ ३५ ॥ 
अष्टं त्वभिजिते योगे निराया यौवने स्थिते । 
अर्धरात्रे करिष्यामि गभमोक्ं यथासुखम्‌ ॥ २६॥ 
{जत्र रात्रि युवावस्या्म खित दोग, उस आधी रातके 
समय अभिजित्‌ युहूतके योगमे मेँ सुखपूर्वक गर्भ॑वासका त्याग 
करेगा ( अर्थात्‌ माताके उद्रसे बाहर निकल आऊंगा ) ॥ 
अष्टमस्य तु मासस्य जातावावां ततः समम्‌ । 
प्राप्स्यावो गर्भव्यत्यासं प्रापे कंसस्य नादराने ॥ २७॥ 
ष्टम दोनो माई-वदिन गर्भे आटवें मर्हनिम जन्म 
गे | फिर कंसकरे भावी विनादशका कारण प्राप्त दोनेपर दम 
दोनो साथ दी गर्मन्यत्यासको प्राप्त हेगि ( बदल दिये 
जार्यगे ) ॥ ३७ ॥ 
अहं यदोदां यास्यामि न्वं देवि भज देवकीम्‌ । 
आवयो्ग॑भ॑संयोगे कंसो गच्छतु मूढताम्‌ ॥ ३८॥ 
देवि ! मेँ तो यशोदा माताके पास पर्ुच जाऊंगा ओर 
तुम देवकीका आश्रय ठेना । हम दोक परिवर्तित गर्भसंयोग- 
के विषयमे कंस मूढभावको दी प्रात दो (वद. इत अदल वदली- 
के रस्यते अनभि दी रदे ) ॥ ३८ ॥ 
ववस्त्वां गृह्य चरणे रिलायां पातयिष्यति । 
निरस्यमाना गगने स्थानं पराप्स्यति शाभ्वतम्‌॥ २९ ॥ 
(तदनन्तर कंस तुम्हारे पैर पकड़कर वु शिलापर परक 
देगा, परंतु ठम उसके हाथसे निकल्कर आकाशम शाइवत 
खान प्राप्त कर रोगी ॥ ३९ ॥ 
मच्छवीसदशी छष्णा संकपंणसमानना । 
विश्रती विपुलो वाह मम वाहपमौ दिवि ॥ ४० ॥ 
(तुम्हारी अङ्ग-कान्ति मेरी ही छविके समान दयाम होगी; 
प्रतु मुख मैया संकर्षणके समान गौर दोगा । तुम आक्रास- 
म मेरी दी भुजा्थकि समान दोनो ओर दो-दो दृष्ट-पष्ट विशा 
बर्हि धारण करोगी ॥ ४० ॥ 
निरिखं शूलमुयम्य खल्व च कनकत्सरुम्‌ । 
पार्थी च पणां मधुना पङ्कजं च छनिर्मलम्‌ ॥ ४१॥ 
ध्चार भजामि तीन रिखाओंषे युक्त शूल ( चिद्य); 
सोनेकौ मूढ लगी हुई तलवार, मधुसे भरा भा पात्र तथा 
अत्यन्त निर कमल धारण करके सुशोमित दोभओगी ॥५९१॥ 
नीलकौदोयसंवीता पीतेनोच्तरवाससा । 
हाशिरदविमप्रकाशेन हारेणोरसि राजता ॥ ४२॥ 
धतम्दारे श्रीभद्धमे नीले रगकी रेशमी साड़ी सोभा पयेगी 
१.५ दी रामे अष्टमीके वाद नवप ठग जानेपर्‌ देवीका 
यशोदे गस प्राकट्य हुमा थासा समन्ना चाय । 


श्रीमहाभारते खिरुभागे ` 


[ हरिवो 


जर ठम रेशमी पीताम्बर चादर ओद रदोगी । तुम्दारे 
वक्ःखर्ने चन्द्रमाकी किरर्णोके समान प्रकाशमान श्वेत हार 
रोमा दे रहा दोगा ॥ ४२॥ 
दिव्यकुण्डलपूर्णी्भ्यां श्रवणाभ्यां धिभूषिता । 
चन्द्रसापत्नभूतेन मुखेन त्वं विराजिता ॥ ४३॥ 
प्दिव्य कुण्डलि मण्डित कर्णयुगर वम्ड विभूपित करेगे 
ओर चन्द्रमाकी मी शोमाको छीन ठेनेवाले अपने मनोरम 
मुखसे ठम अव्यन्त शोभायमान शोओगी ॥ ४२ ॥ 
मुकुटेन विचिश्रेण केरावन्धेन शोभिना । 
सुजद्धभे्जेरभनिभूपयन्ती दिको दरा ॥ ४४॥ 
(तुम्हारे मस्तकपर विचित्र युक्कुट ओर शोभागाटी केश- 
वन्ध फवते गि । शजर्खोकी-सी आभावाटी अपनी भयानक 
भुजा्थसि तम॒ दको दिशओंकी शोमा वदाओमी॥४४] 


ध्वजेन रिखिवर्हेण उचितेन विराजता । 
अद्भजेन मयूराणामद्गदेन च भास्वता ॥ ४५॥ 
'मोखंखसे विभूषित ऊँचे ध्वज तथा म॑नुरपिच्छके दी 
यने हुए प्रकादामान अद्धद ८ युजव्रंद ) से ठम्‌ प्रकत 
हओगी ॥ ४५ ॥ 
कीणौ भूतगणेरेमन्नियोगायुर्तिनी । 
कामारं बतमास्थाय चिषिविं त्वं गमिष्यसि ॥ ४६॥ 
"भयंकर भूतगर्णोसि पिरकर मेरी आश्चके अधीन रहती 
हु्ई॑त॒म सदा कुमारी रहनेका बत केकर खर्गखोकको चली 
जागी ॥ ४६ ॥ 
तत्र त्वां हातदक्छकरो मल्पदिष्टेन कर्मणा । 
अभिपेकेण दिव्येन दैवतैः सह योक्ष्यसे ॥ ४७॥ 
धवा देवतार्ओंसदहित सदस ने्रधारी इन्द्र मेरी आराके 
अनुसार सवर कारयोका सम्पादन करनेके कारण ( अथवा मेरी 
वतायी हुई पद्धतिकरे अनुसार) ठम्दारा दिव्य विधिसे अभिषेक 
करेगे ॥ ४७ ॥ 
तन्नैव त्वां भगिन्य्थे ्रहीष्यति ख वासकः। 
कुरिकस्य तु गोभरेण कौरिकी त्वं भविष्यसि ॥ ४८॥ 
षव इन्द्र अपनी बहिन वनानेके च्वि वम्र सादर म्रहण 
करेगे | कुदिकऱे गोसे सम्बन्ध होनिकरे कारण तुम ष्कौरिकीः 
नामसे प्रसिद्ध दोओगी ॥ ४८ ॥ 
स ते विन्ध्ये नगश्रेष्ठ स्थानं दास्यति दान्वतम्‌। 
ततः स्थानखहलनस्त्वं पृथिवीं शोभयिष्यसि ॥ ४९॥ 
धवे देवराज इन्द्र॒ पर्व्तोमिं श्रेष्ठ विन्ध्यगिरिपर तुश्द 
शाद्वत स्थान प्रदान करेगे । तत्यश्वात्‌ ठम अपने सद 
स्था्नेद्वारा सारी ए्रथ्वीको सुशोभित करोगी ॥ ४९ ॥ 
बेरोक्यचारिणी सा त्वं भुवि सत्योपयाचना ¦ 
चरिष्यसि महाभागे वरदा कामरूपिणी ॥ ५०॥ 


विष्णुपवं ] 


तृतीयो ऽध्यायः 


२१९ 


प्महामगि ! घुम इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली ओौर 
वरदायिनी होकर तीर्नो कोको विचरोगी तथा तमसे की हुई 
उपयाचना ( मनौती ) अव्य सफल होगी ॥ ५० ॥ 
तत्र श्चम्भनिषम्भौ ढौ दानवौ नगचारिणौ । ` . 
तौ च रत्वा मनसि मां सुगो नादायिष्यसि ॥ ५९१॥ 

धव मुञ्चे मनम सान देकर ठम विन्ध्यपर्वतपर विचरने- 
चलि घ्यम्म ओर निद्यम्भ नामक दानर्वोको उनके अनयायि्यो- 
सदित नष्ट कर डालेगी 1 ५१ ॥ 
छृत्वायुयाधां भूस्त्वं खुरामांसवटिपरिया ! 
तिथौ नवम्यां पूजां त्वं प्राप्स्यसे सपदुत्रियाम्‌ ॥ ५२॥ 

ध्व तुम्हे मधुयुक्त एवं मासरहित वलि ( उपहार- 
सामग्री) प्रिय होगी जौर सव छोग वारंवार ठम्दारे तीर्थकी यारा 
करके नवमी तिथिको पञ्ुपूजन कर्मकरे साथ तुमह पूजा दैगेः 
जिते तुम प्रषन्नतापर्वक रहण करोगी ॥ ५२ ॥ 
ये च त्वां मत्प्रभावक्षाः प्रणमिष्यन्ति मानवाः। 


तेषां न दुर्छभं किञ्चित्‌ पुत्रतो धनतोऽपि वा ॥ ५२ ॥ 
मरे प्रभावको जाननेवाठे जो मनुष्य तुम प्रणाम करगे? 
उनके ल्यि पुत्र अथवा धन आदि कोई भी वस्तु दुलभ 
नदीं होगी ॥ ५३ ॥ , , 
कान्तरेष्ववसन्नानां मानां च महाणेवे । 
दस्युभिकी निरुद्धानां त्वं गतिः परमा णाम्‌ # ५४ ॥ 
कोई दुम स्थानम कस जार्यै, महासागस्मै द्भवने गे 
अथवा टेर या उङ्कअकि दारा कैद कर स्यि ज्ये उन 
सभी संकटग्रसत मनुरप्योके च्यि तुम सवरसे बड़ा सहारा 
दोओगी ॥ ५४ ॥ 
त्था तु स्तोष्यन्ति ये भक्त्या स्तवेनानेन वे शुभे । 
वस्याहं न पणदयामि ख च मे न प्रणद्यति ॥ ५५॥ 
श्युमे | जो लेग मक्तिपू्वैक इस ( आगे वतायै जने- 
वाले ) सतोत्रे तुम्दारी स्तुति करेगे, उनके ल्यिनतो मँ 
अव्य रगा ओर न वे ही मेरी दष्टिसे ओन्नठ रदैगे।५५॥ 


इति श्रीमहाभारते खिरभागे हरिवंशे षिष्णुपवैणि भारावतरणे निद्रासंवि्ाने द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ 


इस प्रकार श्रीमद्छभारतक्े िसमाग इरिविशके अन्तर्गत विष्णुपवैमे पृष्वीके भारको उतास्नेके प्रसंगे 
` भगवानट्वारा निद्रतो कर्तव्यका शषापनविषयक्‌ दूर अध्याय पुरा हुमा ॥ २॥ 


०4० 


तृतीयोऽध्यायः 
आ्याकी स्तुति 


वैशम्पायन उवाच 
आयौस्तवं प्रवक्ष्यामि यथोक्तसपिभिः पुरा । 
नारायणी नमस्यामि देवीं जिुवनेश्वरीम्‌ ॥ १ ॥ 
वैदास्पायनजी कहते है--जनमेजय ! पूर्वकारूये 
जैसा ऋषिर्ौनि वताया है उसके अनुसार यै आर्या देवीकी 
स्ुतिका वर्णन करता ह| मै तीनो लोकोकी अधीश्वरी 
नारायणी देवीको नमस्कार करता हँ ॥ १] 
त्वं हि सिद्धितः कीर्तिः श्रीर्विद्या संनति्मतिः। 
स्या रध्रिः प्रभा निद्रा काटरातिस्तथेव च ॥ २ ॥ 
देवि ! व॒म्दीं सिद्धिः धृति, कीरति; श्रीः विद्याः संनि 
मतिः संध्या, रात्रिः प्रमा, निद्रा ओर कालरात्रि हे ॥ २॥ 
आय कात्यायनी देवी कौरिकी बह्मचारिणी । 
जननी सिद्धसेनस्य उग्रचासै मदाचला ॥ ३ ॥ 
आया, कात्यायनी, देवी, कौरिकी, ब्रह्मचारिणी; 
सिद्धसेन ( कुमार कार्तिकेय ) की जननी, उग्रचारिणी तथा 
महान्‌ व्ये सम्पन्न हो ॥ ३॥ 
जया च विजया चैव पुष्िस्तुषटः क्षमा द्या । 
ज्येष्ठा यमस्य भगिनी नीलकौशेययासिनी ॥ ४ ॥ 


जया; विजयाः पुष्टिः तुष्टिः क्षमा, दयाः; यमकी ज्येष्ठ 
बहिन तथा नीठे रंगकी रेशमी साड़ी पहननेवाटी दो ॥ ४॥ 
वहुरूपा विरूपा च॒ अनेकबिधिचारिणी । 
विरूपाक्षी विश्णाखष्षी भक्तानां परिरक्षिणी ॥ ५ ॥ 
ठम्दारे ब्रहुत-से रूप ई, इसथ्यि तुम बहुरूपा हो । 
विकरार रूप धारण करनेके कारण तुम विरूपां हो 1 अनेक 
प्रकारकी विधि्योको आचरणमे खनेवाली हो ] तीन हनेके 
कारण तुम्हारे नेच विरूप प्रतीत रोति ई, दस्थि तुम 
विरूपाक्षी हो । तम्दारे नेन बड़े-बड़े है, इस कारण विशालाक्षी 
हो । ठम सदा अपने मक्तौकी रक्षा करनेवाली हौ ॥ ५॥ 
प्वैताघ्रेषु घोरेषु नदीषु च गुदाखु च। 
वासस्ते च महादेधि वनेषूपवनेषु च ॥ ६ ॥ 
महादेवि ! पवतोके घोर शिखरोपर, नदिय, ुफा्मि 
तथा वनो ओर उपवने भी वम्हारा निवास है ॥ 8 ॥ 
शवर्ववेरेश्वैव पुिन्देश्च सुपूजिता । 
मयूरपिच्छप्वजिनी रोका्‌ कमसि सर्वशः ॥ ७ ॥ 
शवर वर्वर ओर पुलिन्दोने भी वुम्दारा अच्छी तरसे 


पूजन किया हे । तुम मोरपट्वकी ध्वजठे युखोभित हो ओर 
क्रमश; सभी लोकौमिं विचरती रहती हे ॥ ७ ॥ ९ 


२२० 


कुकरेदडागकलैमेषेः सव्यः समाङका 1 
घंण्टानिनादवदुखा विन्प्यवासतिन्यभिश्वुता ॥ ८ ॥ 
मुगे, बकरे, भेडः सिंह तथा व्याघ्र आदि पञ्-पक्षी ठम्दं सदा 
चेरे रहते द । वम्दारे पाष धण्यकी ध्वनि अधिक दोती है । 
तुम श्विन्ध्यवासिनीः नामस विख्यात दो ॥ ८ ॥ 
त्निूलपदिदधर सूर्यचन्द्रपताकिंनी । 
नवमी छृष्णपक्चस्य शुङ्कस्येकादश्षी तथा ॥ ९ ॥ 
देवि ! त॒म जिच ओर पिदा धारण करनेवाली हो । 
ठम्हारी पताकापर सूयं ओर चन्द्रके चिह ई । ठम ्रयेक 
मासके कृप्णपक्षकी नवमी ओर युक्ल्पक्षकी एकाद्री द्ये ॥ 
भगिनी वरदैवस्य रजनी फलठदप्रिया । 
आवासः स्वंभूतानां निष्ठा च परमा गतिः ॥ १०॥ 
वल्देवजीकी बहिन हो । रात्रि ठम्दारा खरूप दै ! कलह 
ठर प्रिय रूगता है । तुम सम्प भूरतोका आवासस्थानः मृत्यु 
तथा परम गति हो ॥ १० ॥ 
नन्व्गोपखुता चैव देवानां विजयावहा । 
चीरवासाः सुवासा रोद्री संभ्याचरी निदा ॥ ११॥ 
ठम नन्दगोपकी पुत्रीः देवताओंको विजय दिलनेवाखी 
चीर वस्रधारिणी, सुवासिनीः रौद्री, सं्याकाल्म विचरने- 
वाटी ओर रानि हे ॥ १९॥ 
प्रकीणकेली सत्युश्च सखसमांसवदिप्रिया । 
छक्ष्मीरलक्ष्मीरूपेण दानवानां वधाय च ॥१२॥ 
ठम्दारे केश विखरे दु. द । ठम प्राणिर्योकी सत्यु दो ] 
मघुते युक्त तथा मासते रहित बलि दम प्रिय है | ठम्दीं 
रक्मी टो तथा वुम्दीं दानर्वोका वध केकरे स्थि अलक्ष्मी 
बन जाती दो ॥ १२॥ 
स्ाविघ्री चापि देवानां माता भूतगणस्य च । 
कन्यानां ब्रह्मचर्यं त्वं सौभाग्यं प्रमदादु च ॥ १२॥ 
दम्दीं साविग्री, देवमाता अदिति तथा समसन भूर्तोकी 
जननी हो ! कन्यार्जोका बदाचर्यं दुमद हो ओर विवादित 
युवतिर्योका सौमाग्य भी ठम्दीं हे ॥ १३ ॥ 
अन्तर्वेदीं च यक्षानासत्विजां चेव दक्षिणा । 
कषकाणां च सीतेति भूतानां धरणीति च ॥ १४॥ 
द्द यर्ञोकी अनतवेदी तथा श्रृविर्जोकी दक्षिणा हो | 
किसानोंकी सीता ( दर जोतनेसे उभरी हृद रेखा ) तथा 
समस प्राणिर्योको धारण करनेवाटी धरणी मी म्द हो ॥ 
सिद्धिः सांयाध्रिकाणां तु वेखा त्वं सागरस्य च। 
यक्षाणां प्रथमा यक्षी नागानां खुरसेति च ॥ १५॥ 
, नीका या जदाजसे यात्रा करनेवाले व्यापारियोको भ्रा 
ह्ोनेवाली विद्धि भी ठर दे। व्ही समुद्रकी तट-भूमिः 


 /^ 


शरीमष्टाभारते खिखभागे 


[ दरिविशचे 


यरक्षोकी प्रथम यक्षी (तरेसकी माता ) तथा नार्गोकी जननी 
खुरा हो ॥ १५ ॥ 
ब्रह्मवादिन्यो दीक्षा शोभा च परमा तथा । 
ज्योतिषां स्वं धभा देवि नक्षत्राणां च सेदिणी ॥ १६॥ 
देवि | ठम ब्रह्मवादिनी दीक्षा तथा परम शओोमाष्टे। 
ज्योतिम॑य ग्रहों एवं तारिकार्ओकी प्रभा दो तथा नक्षत्रम 
रोदिणी दो ॥ १६ ॥ 
राजद्वारेषु तीरथ॑षु नदीनां सङ्गमेषु च। ` 
पूण च पूर्णिमा चन्द्रे छृत्तिवासा इति सरता ॥ १७॥ 
' राजद्वार, तीर्थो तथा नदि्योकि संग्मोमिं ठम पूर्ण ल््मी- 
रूपसे सित हो । तुम्दीं चन्द्माम पूर्णिमा रूपसे विराजमान 
दोती दो तथा वम्दीं त्तिवासा दो ॥ १७ ॥ 
सरखती च वादमीके स्सतिर्देपायने तथा । 
च्छूपीणां धमेवुद्धिस्तु देवानां मानसी तथा ॥ १८॥ 
ठम महर्षि वाव्मीकिम सरखती-रूपये, श्रीकृष्णदरेपायन 
व्यासे स्द्ृतिरूपसे तथा ऋषि-पुनिर्योमि धर्मुद्धिरूपते , 
स्थित हो । देवता्भेमिं सत्यसंकस्पात्पक चिन्तश्ृत्ति भी 
दरद हो ॥ १८ ॥ 
खरा देवी ठ भूतेषु स्तूयसे त्वं स्वकर्मभिः । 
इन्त्रस्य चारुदषिस्त्वं सदसखनयनेति च ॥ १९॥ 
दम समस्त मूर्तमि खरा देवी हो ओर अपने करमोदार 
सदा प्रशंपित होती हो । शन्द्रकी मनोहर दष्टि मी द्द हे; 
सदो नेत्रोसि युक्त नके कारण 'सहखनयनाः नामे 
म्हारी स्याति है ॥ १९॥ 
तापसानां . य देवी त्वमरणी चायिदोधिणाम्‌ । 
क्षुधा च स्वेभूतानां ठसिस्त्वं दैवतेषु च ॥ २०॥ 
तुम तपसी मुनि्योकी देवी दो । अग्निहोत्र करनेवाले 
बराक्षणोकी अरणी हो । समस प्राणियोकी क्षुधा तथा देवतारभेमिं 
सदा वनी रहनेवाटी वृति दो ॥ २०॥ 
स्वाहा ठक्िश्तिर्मधा वसनां त्वं घसूमती । 
आदा त्वं मायुपाणां च पुष्टिश्च रृतकमंणाम्‌ ॥ २१॥ 
दम्दीं खाहाः तरपि, धृति ओर मेधा दो | वसुर्ओकी 
वसुमती मी ठम्दीं टो | दन्द मलुर््योकी आशा तथा कतक , 
पुरुषोकी युष्टि दो ॥ २१ ॥ 
दिश्य विदिशश्चैव तथा ह्ाचिरिखा प्रभा। 
श्क्ुनी पूतना त्वं च रेवती च सुदारुणा ॥ २२ ॥ 
वदी दिर; विदिशा, अग्निशिखा, प्रभाः शकुनी; 
पूतना तथा अत्यन्त दासण रेवती दो ॥ २२॥ 
निच्रापि सर्वभूतानां मोनी क्षत्रिया तथा। 
विद्यानां ब्रह्मविदा त्वमोद्गासोेऽथ वषट्‌ सथा ॥ २३ ॥ 


विष्णपर्व ] 


वतीयोऽध्यायः 


२२१ 


- समस प्राणिर्योको मोदे डल्नेवाटी निद्रा भी वुरम्हीं ह। 
तुम क्षत्रिया होः विदाम बहमविद्या दै तथा ठम्ही 
ॐकार एवं वषट्कार हो ॥ २३ ॥ 
नारीणां पार्वतीं च त्वां पौराणीख्धषयो विदुः । 
असन्थती च साध्वीनां प्रजापतिवचो यथा ॥ २७॥ 

क्रूषि व्ह नारियेमि पुराण-परसिद्ध पार्वती देवीके 
रूपम जानते द । ठम घ्ाघ्वी चिरि अरन्धती हो, जैसा 

कति प्रजापतिका कथन है ॥ २४॥ 
पयोयनामभििव्यैरिन्द्राणी चेति विश्वुता । 
त्वया व्याप्तमिदं सर्य जगत्‌ स्थावरजङ्गमम्‌ ॥ २५॥ 

दम अपने पर्यायवाची दिव्य नामोदयारा इन्द्राणीके रूपमे 
विख्यात हो । तुमने इस समस्त चराचर जगत्को ग्याप्त कर 
रखा हे ॥ २५ ॥ 

संप्रामेषु च स्वषु अश्चिप्रज्वलितेषु च। 
नदीतीरेषु चौरेषु कान्तारेखु भयेषु च ॥ २६॥ 
भरवासे राजवन्धे च शाधरुणां च भ्रमर्दैने। 
प्राणत्ययेषु सर्वैयु त्वं हि रक्षा न संशयः ॥ २७ ॥ 

समस्त संग्राममे, आगे जल्ते हए षोः नदीके तरटो- 
परः चोरो ओर लटेरोके द्कमि दुर्गम खानेमि, भयके समी 
अवसरोमिः परदेदारमे राजाके द्वारा बन्धन प्राप्त होनेपरः 
शनुर्ओका मर्दन करते समय एवं सभी प्राणसंकटकी धदि्येमि 
तदं सवकी रक्षा करनेवाली हो, इस संशाय नही है ॥ 
स्यि मे हृदयं देवि स्वपि चित्तं भनस्त्वयि । 

रष मां सर्वपापेभ्यः प्रसादं कतमर्द॑स्ति ॥ २८॥ 
` - देवि मेय दय ठम ख्या हुआ है । मेरा चित्त ओर 
मन मी उम्दारे दी चिन्तन एवं मनने तत्पर है । ठम समस्त 
पार्पोसि मेरी रक्षा करो । ठम मुस्षपर कृपा करनी चाहिये ॥ 
हमं यः सुस्तवं दिव्यमिति व्यासप्रकल्पितम्‌ । 
यः पठेत्‌ प्रातरत्थाय शुचिः प्रयतमानसः ॥ २९ ॥ 
भ्िभिमौसेः काङलतितं च फलं वे सम्पयच्छसि । 
षड्भिमीसेर्वरिषठं॑तु वरमेकं भयच्छसि ॥ २०॥ 

जो मनुष्य मेरे ( विष्णु ) रा क्यि गमे तथा व्यास 
जीके दारा पमे आव्रदध किये हए. इस खुन्दर दिव्य सोघका 
प्रातःकाल उठकर शुद्धभावसे संयतचित्त होकर पाठ करता है, 
उखे तुम तीन ही महीर्नमि मनोबाञ्छित फल प्रदान कर देती 


हो तथा जो छः महीरनोतक' छ्गातार पाठ करता रदः उसे 

कोई एक विचिष्ट वर देती टौ ॥ २९-३० ॥-. 

अचिता तु बिभिमीसर्दिव्यं चक्षुः प्रयच्छसि । 

संवत्खरेण सिद्धि तु यथाकामं प्रयच्छसि ॥ २१॥ 
तीन महीनौतक पूजित दोनेपर ठम. उपासकको दिव्य 

हृष्टि प्रदान करती हो ओर एक वरध॑तक आराधना करनेपर 

उसे उखकी इच्छके अनुसार सिद्धि देती हो ॥ ३१९ ॥ 


सत्यं जहम च दिव्यं च देपायनवचो यथा । 
चरणां बन्धं वधं घोरं पुजननाश्चं धनक्षयम्‌ ॥ २२ ॥ 
व्याधिसत्युभयं चेव पूजिता शमयिष्यसि । 
भविष्यसि मष्टाभागे वरदा कामरूपिणी ॥ २३ ॥ 
शीङ्ष्णद्वैपयन ग्यासजीने जैसा बताया दै उसके अनुसार 
तुम्दीं सत्य एवं दिव्य ब्रह्म हौ ! महाभागे ! तुम पूजित हेनेपर 
मनुष्येकि बन्धनः भयानक वधः पुत्र ओर धनके ना तथा 
रोग ओर भ्या भय दुर कर दोगी ओर इच्छातुखार रूप 
धारण करके उपाखकेके सि वरदायिनी होओगी ॥२३२-३३॥ 


भेदयित्वा च तं कंसमेका त्वं भोक्ष्यसे जगत्‌। 

अदमष्यातमनेो इत्ति विधास्ये मोष गोपवत्‌ ॥ २७४ ॥ 
इतना ष्टी नही, ठम उस कंसको मोदमे डाख्कर अकेरी 

ही सम्पूणं जगत्‌का उपमोग करोगी ¦ मँ भी जम गौओकि 

बीम र्टकर गोपके समान ही अपना न्यवहार वनार्जँगा ॥ 

खचृदधथर्थमदहं चैव करिष्ये कंसमोपताम्‌ । 

पवं सां स समादिश्य गतो ऽन्तर्थानमीश्वरः ॥ ३५ ॥ 
म सपनी पुष्टिके ल्ि कंखके गोओंकी चरवाही करगा | 

योगनिद्राको णेस अददा देकर भगवान्‌ विष्णु अन्तर्धान 

हो गये ॥ ३५ ॥ 

सा चपितं नमररूत्य थास्त्विति च निश्चिता ॥ २६॥ 
उस समय उस देवीने भी उन नमस्कार करके "वहत 


अच्छ" कहकर उनकी आङ्के पाटन करनेका निधित विचार 
कर ख्या ॥ ३६॥ 


यच्चैतत्‌ पठते स्तोत्रं शण्ुयाद्‌ षाप्यभीष्णशाः 
सवो्थत्तिद्धि रभते नयो नास्त्यघ्न संरायः ॥ २७॥ 
जो मनुष्य बारंबार इस सतो्रकां पाठ अथवा भरवणं 


करता दैः वद्‌ अपने सम्पूरणं मनोस्थोकी सिद्धि प्राप्त कर केता 
दै, इसमे कोई संशय नदीं द ॥ २७ ॥ 


इतिं श्रीमहाभारते लिरुमागे इरिवंरो विष्णुपर्वणि खप्नगर्भविधाने आर्यास्तुतौ तृतीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ 


इस प्रकार श्रीमहनिस्तके छिरुभाग इरिवंरके अन्तमैत विष्णुपर्व स्पनगरम-दिधान तथा आरयदिवीकी 
सतुतिनिषयक तीसरा भ्याम्‌ पूरा हुमा ॥ ६ ॥ 


२२९ ~ 


श्रीमहाभारते सिखभागे 


[ दसिवंदो 


चतुर्थोऽध्यायः 
क॑सद्वारा देवकीके नवजात विशुओकी हत्या, योगमायादरारा सार्वे गर्भका संकर्षण, श्रीरप्णका 
प्राकट्य ओर नन्दभवनमे प्रवेश, कंसद्मारा नन्दकन्याको मारनेका प्रयत्न ओर उसका 
दिव्य सपमे दर्चन देना, कंसदारा धमाप्रार्थना ओर देवयीदारा उसे क्षमा-दान 


क्नम्पायन उवाच 
कृते गर्भविधाने तु देवकी देवतोपमा। 
जग्राह खप्त तान्‌ गभोौन्‌ यथावत्‌ ससुश्हतान्‌ ॥ १ ॥ 
वेदाभ्पायनजी कहते है--जनमेजय | तदनन्तर पति- 
द्वार गभाधान किये जनेपर देवत्ताके समान तेजसिनी 
देवकीने पठे बताये हुए सात गर्भाकरो क्रमशः यथोचिवरूप- 
से ग्रहण क्या ॥ १॥ 
वज्गभोन निस्खतान कंसस्ताञ्चघान शिलातले! 
आपन्नं सत्तमं गम सा निनायाथ सेहिणीम्‌ ॥ २ ॥ 
पले जो छः गर्म क्रमशः प्रकट हुए, उन स्वको कंसने 
पत्थरपर पककर मार डाला । जवर सतर्वा गर्म प्राप्त हुभाः 
तब योगमायाने उसे रोदिणीके उदर्मे सापित कर दिया ॥ 


अर्धंराघ्रे स्थितं गर्म पातयन्ती रजखला । 
निद्रया सहस्ाऽ ऽवि पपात धरणीतले ॥ ३ ॥ 
रजखटा रोदिणी आधी रातके समय अपने भीतर स्थापित 
दए. उस गर्भको गिरानेकी चेष्ट करने र्गी; पस्तु सदसा 
निद्रासे आविष्ट होकर वह स्वयं प्रथ्वीपर गिर पड़ी ॥ ३ ॥ 


सखा खषप्नमिवतं हृष्ट गर्म निःखतमात्मनः। 
अपदयन्ती च तं गर्म मुहर्तं व्ययथिताभवत्‌ ॥ ४ ॥ 
उसने अपने पेरसे निकले हुए उस गर्भको खप्नकी 
मति देखकर फिर नीं देखा ( क्योकि योगमायाने उसे 
अदृश्य कर दिया था ); इससे दो धड़ीतक उसके मन्म वदी 
व्यथा हई ॥ ४ ॥ 
तामाह निवा संविस्नां नैरो तमसि रोहिणीम्‌ । 
सोहिणीमिव सोमस्य वसुदेवस्य धीमतः ॥ ५ ॥ 
राके अन्धकार बुद्धिमान्‌ वसुदेवकी पतली रोणी 
चन्द्रमाकी प्यारी भायां रोिणीके खमान दिखायी देती थी | 
वह उस गर्भे व्यि उद्भिन हयो रही थी 1 उस समथ निद्राने 
उससे कदहा--॥ ५ ॥ 
कर्पणेनास्य गर्भस्य खगे चाहितस्य वै। 
संकर्यणो नाम खुतः शुभे तव भविष्यति ॥ ६ ॥ 
शमे ¡ इम्दारे उदर्स स्थापित हुआ जो यह गर्भ॑दैः 
इसका आकर्षण हु दै, इस कारण द्दारा यह पुत्रे संकर्षण 
नाममे प्रसिद्ध दोगाः ॥ ६ ॥ 
सा तं पुश्रमवाप्यैवं दा किञ्चिदवाङ्सुखी । 
-विवेदा रोदिणी वेदम सुप्रभा रोहिणी यथा ॥ ७ ॥ 


स प्रकार उत्त पुत्रको पाकर रोदिणी मन-दी-मन प्रसन्न 
दरदः कंठ कुज्ज उसका शु कुछ नीचेको शवक गया। फिर 
ती वह्‌ उत्तम प्रमासे युक्त रोदिणीके समान अपने भवनकरे 
भीतर चटी गयी [ ७ ॥ 
तस्य गर्मस्य मागण गर्भ॑माघत्त देवकी । 
यद्धं सप्त ते गभौः कंसेन विनिपातिताः ॥ ८ 1 

उधर देवकीके उस सार्वे गर्भकी खोज होने स्परीः 
इतनेहीमे उषे आर्नो गर्भ धारण क्रिया; जिक्र 'ल्ि कंसः 
ने उसके पटठेके छात गर्भं मार गिरयेथे ॥ ८ ॥ 
तं तु गर्म प्रयत्नेन ररश्चुस्तस्य मन्विणः। 
सोऽण्यघ्न गर्भवसतौ वसत्यात्मेच्छया हरिः ॥ ९ ॥ 

कंसे मन्त्री उस माव गर्भकी रक्रमि यलनपूर्वक लग 
गये । इधर भगवान्‌ विष्णु भी खेच्छासे दी उस गमम निवास 
कलेल्मो॥९॥ 
यदोदापि समाधत्त गभ॑॑तददरेव वतु । 
दिष्णोः श्रीरजां निद्रां विष्णुरनि्दिदाकारिणीम्‌॥ १० ॥ 
उसी दिन ( गोक्ु्ख्म )यशोदनि मी भगवान्‌ विष्णुकी 
आज्ञाका पाटन करनेवाली तथा उरन्दफि शरीरमे प्रकट हुं 
योगनिद्राको अपने गर्भम धारण क्रिया ॥ १०॥ 
गभेकाले त्वसम्पूर्ण अष्टमे मासि ते खियौ । 
देवी च यश्लोद्ा च सखुघुवाते समं तदा ॥ ११॥ 
गर्भका समय पूर्णं होनेसे पहले दी आटे मासम उन 
दोनो िर्यो--यदोदा ओर रोदिणीने प्रायः एक दी स्नाय 
प्रसव किया ॥ ११॥ 
यामेव रजनी रुप्णो जके चृष्णिकुलोदधहः । ; 
तामेव स्जर्नी कन्यां यल्तोद्धापि व्यजायत ॥ १२॥ 
दृणिकरुलका भार वहन करनेवाले मगवान्‌ श्रीकृष्ण जिख 
रात प्रकट हुए, उसी रातर्मे यसोदाने मी एक कन्याको जन्म 
दिया ॥ १२॥ 
नन्दगोपस्य भायैका वसुदेवस्य चापर । 
वल्यकालं च गर्भिण्यो यदोदा देवकी तथा ॥ १२३॥ 
एक यदोदा नन्दगोपकी भार्या थी ओौर दूसरी देवकी 
वसुदेवकी ¡ वे दोनो प्रायः प्क दी समयमे गर्म॑वती हुई ॥ 
देवक्यजनयद विष्णुं यद्योद्‌ा तें त॒ दारिकाम्‌ । 
सुतं ऽभिजिति प्रापे सार्धंराश्रे विभूषिते ॥ १४॥ 


विष्णुपर्व ] 


चतुथ ऽध्यायः 


२२३ 


( आठवें मासमे ) आधी रातकरे समय सुन्दर अभिजित्‌ 
सुहूर्तका योग प्राप्त दोनेपर देवकीने भगवान्‌ विष्णुकरो पुत्र- 
रूपे जन्म दिया ओर यशोदमि उस कन्याको | १५४ ॥ 
सागयाः समकम्पन्त वचेदुश्च धरणीधराः । 
जज्वलुश्चाग्नयः शान्ता जायमाने जनार्दने ॥ १५॥ 

मगान्‌ श्रीकष्णके जन्म ( अवतार ) ग्रहण करते समयं 
समुद्रम ऽ्वार सा उठने खगा | प्रथ्वीको धारण करनेवठे शेष 
-आदि विचलति हौ उठे ओर बुद्ची हुई अग्निर्यो अपने-आप 
प्रज्वलित हो गयीं ६५ ॥ 
रिवाश्च प्रवबुधोताः प्रह्यान्तमभवद्‌ रजः। 
जयोर्तीप्यतिव्यकारन्त जायमनि जनादन ॥ १६॥ 

श्रीकृष्णफरे अवतार ठेते समय शीतट मन्द सुखदायिनी 
हवा चलने लगी । उडती हुई धूल शान्त हौ गयी तथा अह 
ओर नक्षत्र अत्यन्त प्रकाशित होने सगे ॥ १६ ॥ 
अभिजिन्नाम नक्षत्रं जयन्ती नाम दार्वसी। 
महतं विजयो नाम यत्र जातो जनादन: ॥ ९७ ॥ 
जव भगवान्‌ श्रीकृष्ण प्रकट हुए? उच समय अमिनित्‌ 
नामक सुदूतं थाः रिणी नक्षत्रका योग होनेसे अष्टमीकी वद 
रात जयन्ती कहलाती थी ओर विजय नामक विशिष्ट मुहूर्त 
व्यतीत ह्येरहा था] १७॥ 
अन्यतः शग्वतः सुष्षमो हरिनौरायणः भुः । 
जायमानो हि भगवान्नयने्ोहयन्‌ पुः ॥ ९८॥ 
` अव्यक्त सनातन सूक्ष्मखरूप पापहारी तथा सवसमर्थं 
भगवान्‌ नारायणने प्रकट होते ही अपने नेनोसे सवका मन 
मोह ल्या ॥ १८ ॥ 
अनाहता दुन्दुभयो देवानां प्राणदन्‌ श्रिवि । 
आकारात्‌ पुष्पच्ष्ि च वषे चिदशेभ्वरः ॥ १९॥ 
खग॑लोकमे विना वनय ही देवतार्ओकी इन्दुमिर्यो बज 


उठी] देवेश्वर इन्द्र आकाशसे पएूर्छोकी वर्षां करने 
ल्गे॥ १९॥ 


गीभिमह्लयुकाभिः स्तुवन्तो मधुसूदनम्‌ । 
महषयः सगन्धवौ उपतस्थुः सदाभ्सराः ॥ २०॥ 
गन्धरवं ओर अप्सराओंसहित महरषिंगण अपने मद्धलमय 
वचरनोद्यारा भगवान्‌ मधुसूदनकी स्वति करते हुए उनकी 
सेवामे उपल्ित हुए ॥ २० ॥ 
जायमाने हपीकेदो प्रृ्टमभवसजगत्‌। 
इन्द्रश्च अिदेक्षैः साधं तुव मधुसूदनम्‌ ॥ २१९॥ 
भगवान्‌ श्रकप्णका प्राक्् होति ही सम्पूणं जगते 
हर्पास्लस छ गया । देवताओक्रे साथ इन्द्रमे उन मगवान्‌ 
मधुसूदनकी स्वति की ॥ २१॥ 


वसुदेवश्च तं राध जातं पुत्रमधोक्षजम्‌ । 
श्रीवत्सरक्षणं दृष्टा युतं दिव्यैश्च लक्षणैः । 
उवाच वसुरेवस्तु रूपं संहर वैं प्रभो ॥ २२॥ 

वसुदेवने मी राम प्रकट हुए अपने पुत्ररूप भगवान्‌ 
अधोक्षजका सवन किया । उन्हे श्रीवत्सके चिह्न ओर दिव्य 
लक्षणोसे सम्पन्न देखकर वसुदेवने कदा--प्रभो | आप अपने 
सखसूपको समेट खीजिये ॥ २२॥ 


भीतोऽहं देव कंसस्य तस्मदेवं चवीम्यहम्‌ । 

मम पुत्रा हतास्तेन तव ज्येष्ठम्बुजेष्षण ॥ २३ ॥ 
षेव ] मे कंसफे-मयसे डरा हुआ दहः इसीष्यि ेसी 

बात कहता हूँ । कमलनयन | उसने मेरे वहुतते पुत्र मार 

उलि दै, जो ठमसे जेठे येः ॥ २३ ॥ 


वै्यम्पायन उवाच 
वसुदेववचः श्रुत्वा रूपं चादरदच्युतः। 
अजुक्षाप्य पित्त्वेन नन्दगोपगर्ं नय ॥ २७॥ 
वैशम्पायनजी कहते है--जनमेजय | वघुदेवका यष 
वचनं सुनकर भगवान्‌ अच्युतने पिता होनेके कारण उनकी 
आज्ञा खीकार कर खी ओर उनसे कहाः (आप मुन्ने नन्दगोप- 
के घर पर्हुचा दीजिये ८ तथा उनकी नवजात कन्याको यद्य 
उठा लादये ) }* एसा ककर उन्होने अपने चतुरभन रूपका 
उपसंहार कर छलिया ॥ २४ ॥ 
वसुदेवस्तु संगृह्य दारकं क्षिप्रमेव च। 
यशोदाया गृहं राघो विवेश सखुतवत्सछः ॥ २५॥ 
तबे पुत्रवत्सलः बुदेव शीघ्र दही उस वाल्कको गोदरमे 
लेकर रातके समय यशोदाके घरमे घुस गये ॥ २५॥ 
यश्षोदायास्त्वविक्षातस्तन्न निक्षिप्य दारकम्‌ । 
भरगृ्य॒द्‌/रिकां चेव देवकीदायने न्यसत्‌ ॥ २६॥ 
यशोदाको उनके अनिका कुछ पतान चल । वों 
उन्दने अपने बाल्कको रख दिया ओर उस कन्याको ठेकर.अपने 
निवासखयानमे आनेके वाद उसे देवकीकी शय्यापर सुला 
दिया ॥ २६॥ 
परिवते छते ताभ्यां गभौभ्यां भयविङ्कवः 
वसुदेवः तार्थ वे निर्जगाम निवेश्चनात्‌ ॥ २७ ॥ 
' इस प्रकार उन दोनों नवजात व्रालकोकी अदल-बदी 
करके तार्थं हुए वसुदेवजी भये व्याकुल हो उस घरे 
वाहर निकर गये | २७ ॥ 
उग्रसेनसुतायाथ कंक्तायानकटुन्दुभिः। 
निवेदयामास तदा तां कन्यां वरवर्णिनीम्‌ ॥ २८ ॥ 
आनकदुन्दुभि नामसे प्रसिद्ध वसुदेवने उग्रसेनपुत्र कंख- 
के पासं जाकर उते अपनी सुन्दरी कन्याके जन्मका समचार 
निवेदन किया ॥ २८ ॥ 


२२६ 


इत्युकवन्तं कंसं सा देवी वाक्यमन्रवीत्‌ 1 
साश्रुपूर्णमुखा दीना भतौरसमुपवीक्षती । 
उत्तिष्ठोचिष्ठ वत्सेति कंसं मातेव जद्पती ॥ ५७ ॥ 
ज्र कंसने एेखी वातत कदी) तव देवकीके मुखपर 
्ओपुर्ओोश्गी धारा वद चली । वह पतिकी ओर देखती दूर 
अत्यन्त दीन होकर कंससे माताके समान कटने कगी--ध्वेयं | 
उठो ! उठो ! ॥ ५७ ॥ 
देवकयुदाच 
ममाग्रतो हता गभी ये त्वया कामरूपिणा । 
कारणं त्वं न वै पुत्र रतान्तो.ऽप्यघ कारणम्‌ ॥ ५८ ॥ 
देवकीने फिर कहा-वत्स } ठम तो इच्छानुसार 
रूप धारण करमेवले हो । ठमने मेरे सामने दही जिन-जिन 
ग्मख रिशयुर्भकी त्या की है, उसमे केवर तम्दीं कारण 
हो--फेसी बात नदी है, काल भी इसमे कारण है ॥ ५८ ॥ 
गर्भकर्तनमेतन्मे सहनीयं त्वया ऊतम्‌ । 
पादयोः पतता मूध्नी स्वं च कम॑ जुगुण्सता ॥ ५९॥ 
परंतु आज तुम अपने कर्मकी निन्दा करते हुए जो 
मेरे वै्योपर सिर रखकर पड़ गये, ससे तम्दरि द्वारा कयि 
गये हस गर्मोच्छेदरूप असह्य कष्टक भी मँ किसी तरह सदं 
देगी ॥ ५९ ॥ 
गभं च नियते त्यु वौल्येऽपि न निवर्तते । 
युवापि सत्यो्वश्चगः स्थविये टत प्व तु ॥ ६० ॥ 
गर्भम मी मृत्यु निधित रूपसे होती ३ । बास्यावसमे 
भी वह्‌ टलती नदीं है } जवान मनुष्य मी मृल्युके अधीन 
होता ह ओर वृद्ध पुरुष तो मश हुआ है ही ॥ ६० ॥ 
काटपक्षमिदं सर्वं॑देत॒भूतस्तु त्वद्विधः । 
अजते दर्शनं नास्ति यथा वायुस्तथैव च ॥ ६१॥ 
इस सम्पूर्णं जगत्‌को काल ही पका देता है (मार 
डालता है ) तुम्हाररजैसे लोग तो केवल निमित्तमाच होते ६ै। 
जिसका जन्म नहीं हुजा दैः उसका दर्शन्‌ नदीं होता । जेषे 
वायुक्री सत्ता होनेपर भी वह दिखायी नदीं देती, उषी 


धीमहाभारते खिटभागे 


` [ हरि 


प्रकार जीवकी सत्ता ्ोनेपर भी जन्मसे पदले वद टष्टिगोचर 
नहीं देता दै ॥। ६१ ॥ 
जातो.ऽप्यजाततां याति विधाधरा य्न नीयते । 
तद्‌ गच्छ पुत्र मा ते भून्मद्वतं सुल्युकारणम्‌ ॥ ६२ ॥ 

जो जन्म ठे चुक्रा है वह भी मृल्युकरे वाद अजात- 
भावको दयी प्राप्तो जाता है ( अर्थात्‌ उसका भी दर्दन 
नदीं होता ) । विधाता उसे जर्दा ठे जते ईः वर्दो वह च्य 
जाता है; अतः पुत्र | तुम जाओ। मुष्ने जो पुर्वोकरी म्यक 
कारण दुःख हो रहा है, उसके लवि वुम्दारे ददयमे विचार 
नद्ो॥ ६२॥ 
सत्युना रहते पूर्वं॑रोो देतुः प्वतैते । 
विधिना पूर्वट्ेन प्रजासर्गेण तत्त्वतः ॥ ६३॥ 
भातापिघ्रोस्तु कार्येण अन्मतस्तुपपद्यते 1 

पठे मौत प्रहार करती दै, उसके वाद मृद्युकरे शेष 
देवकी प्रडृ्ति होती है । विधि ( संस्कार ), पूवद कम 
( जन्मान्तरीय क्म या प्रार्य ); प्रजाकी खष्टि करनेवाले 
कालः वास्तव्म घटित हुए तात्कालिक कारणः माता-पिताके 
दूप्रित अन्न-मक्षण आदिं कायं तथा जातिगत खमावे 
मी मृत्यु सम्भव होती है ( नन्दीं सव्र कारणेति मेरे वच्चे 
मारे गये भौर तम सरमे निमित्त वनैः अतः इसमे वुम्दार 
कोर दोप नदीं दै ) ॥ ६३६ ॥ 

वैशम्पायन उवाच 

निरम्य दरेवकरीवा्त्यं ख कंसः स्वं निवेरानम्‌ ॥ ६४॥ 
प्रविवेश ससंरन्धो दष्टमानेन चेतसा । 
कृत्ये प्रतिष्ठते दीनो जगाम विमना भदाम्‌ ॥ ६५॥ 

वेशम्पायनजी कहते है--जनमेजय ¡ देवकीका 
यद वचन सुनकर कंस अपनी असफकतापर क्षुग्ध हो मन-दी-मन 
जलता हुआ अपने भवनम चला गया । अपने विये प्रयत्नके 
प्रतिहत ( विफट ) दौ जानेप्र वह मनम वहत दही खिन 
ओर दीन हो गया था, अतः वसे चुपचाप चला 
गया ॥ ६५६५ ॥ 


हति श्रीमहाभारते सखिकमागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि श्रीृप्णजन्मनि चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ 


¶स प्रकार श्रोमहाभारतके खिरुभाग दिं शके भन्तमैत विष्णुपवमे श्रृष्णजन्मविषयक चौथा अष्याय पुरा हुभा ॥ ४॥ 
। + @ क~ 


पञ्चमोऽध्यायः 
घसुदेवजीका नन्दको व्रजमे लौटनेकी सम्मति देना ओर नन्दजीका 
गोत्रजकी सोभा निहारते हए वरहा पधारना 


वेश््पायन उवाच 
प्रागेष घस्ुदेवस्तु बजे शुश्राव रोदिणीम्‌ । 
प्रजाता पुभमेषाप्रे बण्द्राद्‌ कम्दवसाननम्‌ ॥ ९ # 


सख नन्दगोपं त्वरितः भरोवाच शुभया गिरा । 
गच्छानया सषटैव त्वं बजमेव योदया ॥ २ ॥ 


बेदाम्पायमजी कष््वे ई--जममेजय | यघुदेवर्जने 


विष्वं] 


पञ्चमो ऽच्यायः 


२.९७ 


जज 


प्रसवे पटले दही रोदिणीको वरजम भेज दिया्था) जव 
उन्दने सुना कि रोहिणीने पले ही एक एेसे पुत्रको जन्म 
दिया दै जिसका सुख चन्द्रमासे मी अधिक कान्तिमान्‌ दैः 
तवर वे व॒रंव ही कंसका कर चुकानेके लिये पत्नीसदित मथुस- 
म अयि हए ) नन्दगोपकरे पास जाकर मङ्गलमयी वाणीरमे 
बरोले--'मित्र | तुम हन यशोद्राजीरे साथ दी शीघधर व्रजको 
छोट जाओ ॥ १-२॥ 
तत्र तौ दारकौ गत्वा जातकमादिभिरुेः 1 
योजयित्वा चजे तात संवधेय यथासुखम्‌ ॥ २ ॥ 
ह्तात | वँ जकर उन दोनों बाटर्कोको जातकर्म आदि 
संस्कारो सम्पन्न करके वरजम ही सुखपूव॑क उनक्रा पालन 
पोषण ओर सवरधन करो ॥ ३ ॥ 
रौहिणेयं च पुतं मे परिरश्च शिष्यं तजे । 
अदः वाच्यो भविष्यामि पितपक्षेषु पुक्षिणास्‌ ॥ ४ ॥ 
यो ऽदमेकस्य पुत्रस्य न पश्यामि रिशो खम्‌ । 

ध्रजमे रोषहिणीके गम॑से उत्पन्न हभ जो मेरा रिद पुत्र 
है उसकी भी रक्षा करना । माई ! मै तो पिव्पक्षोमि पुत्र- 
वानेकि द्वारा निन्दनीय दही शेञगा; क्योकि मे रेसा भाग्य- 
हीन हू कि अपने प्कमात्र शिद्पुत्रका भख नहीं देख पातारहू ॥ 
दियते हि वखात्‌ प्रक प्रा्षस्यापि सतो मम ॥ ५ ॥ 
अस्माद मे भयं कंसान्निधणद्‌ वैँ शिशोर्वधे । 

"यद्यपि सुनने इस वातका शान दै कि सुखदुःख ओर 
संयोग-वियोग आदि प्रारग्धकरे दी अधीन दै; तथापि निरन्तर 
यना रदनेवाला भय मुञ्च बुद्धिमान भी बुद्धिको बस्मूर्वक इर 
ठेता है । इस निर्दय कसे मुञ्चे सदा यह डर लगा रहता दै 
किं कहीं यद मेरे इस रिद्यका भी वध न कर ङे ॥५३॥ 
तद्यथा रौहिणेयं त्वं नन्दगोप ममात्मजम्‌ ॥ ६ ॥ 
गोपायसि यथा तात तच्न्वेषी तथा कुर्‌ । 
विप्रः हि वद्यो रोके, चालासुत्वासयम्ति हि ॥ ७ ॥ 

'अतः तात | नन्दगोप | तम मेरे पुत्र रोदिणंकुमार 
की जित उपायसे भी रक्षा कर सको, करो 1 बार हियके 
खस्पका यथावत्‌लूपसे विचार करफे जैसे घने, उसङ़े जीवन- 
की रक्ता करो; क्योकि जगते बहुत-से एसे विध्न खदे हुए 
है, जो चालकौको जास दे ररे है} ६-७॥ 
सच पुरो मम ज्यायान्‌ कनीयांश्च तवण्ययम्‌ । 
उभावपि समं नाम्ना निरीक्षस यथासुखम्‌ ॥ ८ ॥ 

भ्मेरा वद पुनर भड़ा दै जौर वुम्दारा यदह वाटक छोय ! 
ठम इन दोर्नौको दी सुखपूव॑क समान रिषे देखो | जेषे इनके 
नाम एक-ते ( एक अर्थवाले ) ६# उसी तरह इनपर वुम्हारा 
वात्सल्य भी एक-सा दी दोना चादिये ॥ ८ ॥ 

# जसे छष्णका अथं है सपनी ओर खीचनेवाला, उक्तौ तर 
संकर्य॑णकं भी ६। 


वर्धमानादुभावेतौ समानवयसौ यथा] 
श्लोरेतां मोचते तस्मिन्‌ नन्दगोप तथा कुर ॥ ९२ ॥ 

धनन्दगोष ¡ इन दोनो अवसा श्रावः तमान देये 
दोनो जिस तरह साथ-साथ वष्टि उस व्रज बदृतते दप 
श्षोमा पा सके; वैसा यत्न करो ॥ ९ ॥ 


वाद्ये केलिकिलः खरं बाल्ये सुद्यति मनवः। 
वाल्ये चण्डतमः सरवैस्तत्र यत्नपसे भव ॥ १०॥ 
श्वारयावस्थामे सवर छोग सेल-कूदसे मन ब्रहते है । 
वालकपनमे प्रायः समी मनुष्य मोहय्रस्ते रदते ह । उन 
कर्तव्याकर्तव्यका बोध नदीं रहता तथा वचपनमे समी बत- 
वातपर बहुत चिदे ओौर रूखते दै; अतः क्चोको इन समी 
दशार्थमिं संभाखते हुए. उनके लटन-पाटनके लि प्रयत्न 
शीर रहो ॥ १० ॥ 


न च वृन्दावने कार्यां गवां घोरः कथंचन । 

मेतव्यं तत्र वस्ततः केरिनः पापददविनः ॥ ११॥ 
व्देखो, बृन्दावनमे किसी तरह भी गौओङि ठदस्येका 

स्थान न चनाना । वहो निवास करनेवाले पाप्रदुर्मीं केशी 

तुम सदा डरते रहना चा्ठिये ॥ ११ ॥ 

ससीखपेभ्यः कीटिभ्यः शाक्ुनिभ्यस्तथेव च । 

गोष्ठेषु गोभ्यो वत्सेभ्यो र्यौ ते द्वाविमौ शिशु. ॥ १२॥ 
ध्वनमे सपि.वरिच्चू कीडे-मकोदधे तथा पक्ष्यति ओर 

गोत्रजमे गौरभा तथा वड इन दोन रिर्य वमद सदा 

रक्षा करनी चाहिये । १२] 

नन्दगोप गता रानिः शीघ्रयाने नजाघ्युगः। 

हमे त्वां व्यादरन्तीवं पक्षिणः सव्यदक्षिणाः ॥ ९३ ॥ 


(नन्दगोप | रात बीत गयी } त॒म तेज चल्नेवाटी सवारी- 
पर्‌ ब्रेखकर श्चीघतापूर्वक यरे पधारो । ये दाये-वाये उड्ने- 
वलि पक्षी मानो दम्दे जानेके ल्यि कद रहे है--बिदा दे 
रदे ई" ॥ १२॥ 


रहस्यं वस्ुेवेन सोऽनुक्षातो महात्मना) 
यानं यशोदया सार्ध॑मारतेह मुदान्वितः ॥ २४ ॥ 


महात्मा वसुदेवके द्वारा किसी गुप्त रहस्यका ज्ञान करां 
दिये जानेपर नन्दवावा यरोदाजीके साथ प्रसन्नतपूर्वक 
खवारापर बं ॥ १४ |} 


क्ुमारस्कन्धवाद्यायां शिविकायां समाहितः । 
संवेश्यामास शिष्य. शयनीयं मदामतिः ॥ ६५॥ 

तदनन्तर सदा सावधानं रहनेवाठे परम दुद्धिमान्‌ नन्द- 
जीने छोरे-खोटे बाठक जिसे केधेपर ठो स्र, देसी निचिका 
(डोली ) मै अपने दायन करने योग रिघ्ुको सुल 
दिया ॥ १५ ॥ 


महाभारते सिखभागे 


२२८ [ हरिवंशे 
जगाम च विषिक्तेन रीतलानिरसर्पिणा 1 शकटाव्तविपुलं कण्टकीवारसंकुरम्‌ 1 
बहदकेन म्ण यरुनातीरगामिना ॥ १६॥ पर्यन्तेष्वादृतं चन्ये्ैदद्धिः पतितैद्ुमैः ॥ २३॥ 


फिर यमुनाजीके किनरि-करिनारे जानेवाठे एसे एकान्त 
माग॑से वे चले, जहो जरी बहुतायत थी ओर ठंडी-ठंडी 
हवा चल रही थी ॥ १६ ॥ 
स ददर श्युमे देशे भोवर्धनसमीप्गे। 
यसुनातीरसम्यद्धं शीतमारुतसेधितम्‌ ॥ १७॥ 
गोवघ॑नके निकयवतीं शम प्रदे पर्हुचकर उन्न 
गौर्जका बज देखा, जो यमुनाजीके तरसे जड़ा हु था ओर 
शीतल वायु उसी सेवा करती थी ॥ १७॥ 
विखतश्वापदै रम्यं लतावद्धीमहाद्रुमम्‌। 
गोभिस्वृणविखग्नाभिः स्यन्दन्तीभिरखङृतम्‌ ॥ १८ ॥ 
विषष प्रकारक बरोटी बोख्नेवाटे शिकारी जीर्वोके रहनेसे 
उस प्रदेशकी रमणीयता बद्‌ गयी थी । वहो टता ओर वस्छ- 
"रिषि लिपटे हुए बड़े-बड़े इक्ष शोभा पा रहे ये । घास 
चरती ओर थनेसि दूध स्लरती हुई गौभि वह सथान अलंकृत 
था॥ १८॥ 
समप्चारं च गवां समतीर्थजटाङ्यम्‌। 
दृषाणां स्कन्धघातिश्च विष्राणोदृघ्रृएटपादपम्‌ ॥ १९॥ 
वहं गौरि चरने-फिरमेके व्यि सम भूमि थी, विषम 
नही; जल्राशर्येिं उतरकर ल्यि जो मार्ग येवे भीस्म दी 
थे | बेल या सेदि कर्धोकी रक्षरसे तथा उनके सीरगोक्री 
रगढसे बहक करई इ पिते हुए दिखायी देते थे ॥ १९॥ 
भासामिषदाचुखतैः च्येनेश्चामिपयष्युभिः। 
खगारुगगसिदैश्च  वसमिदाश्िभिर्बतम्‌ ॥ २०॥ 
वर्हो गीष ओर मांसमक्ची वनविखाव आदिक पीछे 
मांसकी इच्छा र्खनेवाठे चाज तथा वसा ओर मेदा खानेवाले 
गीदड़, चीते एवं वाव-सिंह आदि ल्मे हुए ये । इनसवरके दः 
वह प्रदेशा धिरा हुआ था ॥ २० ॥ 
श्यदलशब्दाभिरुतं नानापर्षिसमाङ्‌कम्‌ 1 
ख्ववृक्लफलं रभ्य पयौत्ततणवीरुधम्‌ ॥ २९॥ 
विहेके ददोडनेसे वरदोका वन-प्रान्त गजता रहता था । 
माना प्रकारके पक्षी वर्धो खव ओर व्यक्त ये | उस तरजमेजो 
बृक्षोम फल ल्गेये वे बडे खादिष्ठ ये । वहो धास-पात ओर 
छता-वर्छकी वहुरुता थी ॥ २१९ ॥ 


मोव्रजं गरुतं रम्यं गोपनासभिराच्रतम्‌ । 
हम्भारवेश्च वत्सानां सवतः कृतनिःखनम्‌ ॥ २२॥ 
दइठ-प्रक्रार वह गोत्रज गौओंके रभानेके शब्दस मुखरित 
~ था । गोपाङ्गना विर हुआ वह भूमाय वड़ा रमणीय 
दिखायी देता था ।"वछडकर बोटनेसे वर्का खान सव ओर- 
खे गूंजता रहता था ॥ २२॥ 


छकर्डोकी गोलाकार श्रेणि्सि वर्होकरा भूभाग ब्रूत 
विशा जान पड़ता था} व्हा चारो ओर कर्टोकरे वाड्‌ 
रगे थे | सीमार्भोपर जंगल्के गिरे हृष्ट वडधवदे वृक्ष एवे 
गयेथे॥ २३॥ 
वत्सानां रोपितैः कौठेदौमभिच् विभूषितम्‌ । 
कसीषाकीणवसुधं करच्छन्नकुरीमटम्‌ ॥ २४॥ 

चड़ व्यि गाढे गये सूय ओर वोधनेकी रस्सिर्यो 
उ रजकी बरी शोभा दो रही थी । वरहा धरतीपर सव्र ओर्‌ 
घे कंडे (या करसी )केढेर षडे थे। कुटी ओरमठ 
नचटाइयौ अथव वृण-समूहते छाये गये ये ॥ २४॥ 
क्षम्यप्रचारवहरं हष्पुष्जनावृतम्‌ । 
दामनीपाशबहुलं गर्ग॑योद्रारनिःखनम्‌ ॥ २५॥ 

कुशलपूर्वक धूमने-फिरनेके लिय वदां बहुत-से स्थान ये 
८ अथवा उत्तम लक्षणे युक्त भर्टोकरे प्रचारसे वह चर 
समृद्धिशाली प्रतीत होता थार) } वह भूमाग दष्ट-पुष्ट मनुर्ष्यो- 
से भरा था । वर्धो मोटी ओर पतली रस्सिर्योकी बहुतायत 
थी । दुध-ददी मथनेके लिये जो वदध-बदे माट या धड़े होते 
है उनमख मन्थन समय जो शव्द प्रकट होता थाः वह्‌ 
वरहो सव ओर कैला हुम था ॥ २५॥ 


तक्रनिःलाववहुटं दधिमण्डादरंखत्तिकम्‌ । 
मन्थानवलयोद्वारैर्गो पीनां जनितसखनम्‌ ॥ २६॥ 


वरहो तक ( मा ) बहानेके लि वहुत-सी नार्यो 
वनी थीं। दहीके ऊपरका जो सारभाग ८ मण्ड ) होता है, 
उससे वरहोक्री मिद्ध गीली दो रही थी। मथानी चलनेके 
समय गोपियोके हार्थोके कंगन खन-खनाते रहते थे } उनकी 
मधुर नकार वर्हो सव्र ओर गूजती रहती थी ॥ २६ ॥ 
ककपक्षधरेरवाढैर्गोपालक्रीडनाङ्लम्‌ | 
सार्गङद्धारगोवारं मध्ये गोस्थानसंकुटम्‌ ॥ २७॥ 

उस त्रजमै काकपक्ष ( पीछेकी अर ˆ सिरपर बडे-वडे 
बराल ) धारण करनेवले वाल्क खेर रहे थे] ग्वा्लकर 
अखाड़े वर्होका भूमाग भरा था । गोओंकि व्राडौ ८ रहनेके 
स्थान ) के दरवार्जोपर काठके कुंडेरूो दए थे] वीच 
गौभकि ठहरने, विश्राम करने आदिके व्यि पर्याप स्थान 
था } एेसी गोक्षालओंसे वहं व्रज भरा हुआ था ॥ २७ ॥ 


सर्पिषा पच्यमानेन सखुरभीरूतमा।रुतम्‌। 
नीलपीताम्बसयाभिश्च तरूणीभिररङूतम्‌ ॥ २८॥ 


आगपर खौलाये जति हुए. धृतक्री मनोरम गंधसे वहोकी 
# पसा भयं नीरकण्ठजीने किया दै । 


विष्णुपर्व ] 


षष्ठोऽध्यायः 


२९९ 


वायु सुवासित दो सही थी | नीटी-पीटी सद्वियोसे सुशोभित 
तरुणी च्िर्यो उग्र ्रजकरो अछृत क्रिय हुए थी २८ ॥ 
वन्यपुष्पावत्तंसाभिमोँपकन्याभिरावृततम्‌ । 
शिरोभिषतक्कम्भामिवद्धेरथ्रस्तनाम्बरः ॥२९॥ 
यमुनात्तीरमागंण जलहरीभियाचरृतम्‌ । 

वनके पूरछोका कर्णभूप्रण धारण क्रिये वहती मोप- 
कन्या वों सिरपर षद स्थि आती-नाती थी । उनकर सरन. 
के अग्रमाग चो मेधे थे ओर उनपर अंचल पड़ा हुभा 
था । यमुनाजीके तरर गये हुए मार्गसे जर लखनेवाल्मी उन 
गोपदुमारि्ेसि वड ब्रज भिरा हुभा-खा जान पदता था २ ९१ 


स तस्र प्रविशन्‌ हृष्टो गोचजं मोपनादिवम्‌ ॥ ३०॥ 


=== ~~. 


भरत्युद्रतो भपवृद्धैः सखीभिदृद्धाभिरेव च । 

निवेशं रोचयामास परिवते सुखाश्रय ॥ ३१॥ 
ग्वालेोके शब्दसे गूजते दए. उस गोचजमे प्रवेशं करते 

समय नन्दरय्रजीको बडा दरं हुमा । बद्ध गोपो तया बरही 

बूट छि्योने अगि वदुकर उनका खागत किया | तपश्वात्‌ 

उन्होने चारौ ओरखे ग्रे दए उस छखदायक आवासस्यानमे 

रटनेके चयि रुचि प्रकट की ॥ ३०-३१ ॥ 

सा यत्र रोदिणी देषघी घसुेवुखावहा । 

तत्र तं वाटक्ूयीभं र्णं गूढं न्यवेशयत्‌ ॥ २२.॥ 
वसुदेवजीको सुस देनेवाटी रोहिणी देवी जर्ष रहती थीः 

व्ही उन्दने व्रजेम रगुक्तरूपते रदमेव्राठे बाल्पूर्यके समान 

तेजस्वी श्रीकृष्णक्रो सुल दिया ॥ ३२॥ 


इति श्रीमहाभारते लिरुभागे हरिवते चिष्णुपर्वणि गोव्रनगमनं नाम पच्चमोऽध्यायः ॥ ५ 1 


दस प्रकार श्रीमहामारतके दिरभाग हसि्के अन्त्पत विष्णुपर्व नन्दजीका मे्रजमें 
गमनेदिषयक परच्वो अध्याय पुरा हुजा ॥ ५॥ 
न वदि 


पषठोऽष्यायः 
शकट-मञ्ञन ओर पूतना-वध 


वै्म्पायन उवाच 
तत्र तस्यासतः कालः सुमहानत्यवर्तत । 
गोतरजे नन्दगोपस्य वह्वत्वं परर्वतः ॥ १ ॥ 
वैशस्पायनजी कहते ह--जनमेजय ! उस गोबजमे 
रहकर गोपकरमं॑ करते हुए नन्दगोपक्रे बहुत दिन बीत 
गये ॥ १॥ 


- द्{स्करो हतनामानौ ववृधति खखं च तौ । 
ज्येष्ठः संकर्षणो नाम कनीयान्‌ छृष्ण एव तु॥२॥ 
वहां उन दौरनौ बारठ्कौक्रा उन्दोनि नामकरण-संस्कार 
कर दिया । तदनन्तर वे दोनो भाई वदँ बे सुले रहने 
ओर दिनोदिन बद्ने ल्मे । उनमे बहेका नाम श्रमणः था 
ओर खोरेका छृप्णः ॥ २ ॥ 
। मेधरष्णस्तु छष्णोःऽ भूद्‌ देहान्तरमतो हरिः 1 
च्यवधत गवां मध्ये सागरस्य इवाम्बुदः ॥ २ ॥ 
दूसरे शरीरम आये हुए भगवान्‌ श्रीहरि ही शटृप्ण? 
नामसे विख्यात इए । उनकी अङ्गकान्ति श्याम मेषकी भोति 
साविली थी । जेते समुद्रम मेधी वद्धि होती हे, उसी प्रकरार 
वे गोर वरीचमे गहकर ब्रदने ल्गे ॥ ३ ॥ 
-राकटस्य त्वधः खुं कदाचिव्‌ पुचगरद्धिनी । 
यदोद। तं समुल्डन्य जगाम यमुनां नदम्‌ ॥ ४ ॥ 
यशोदा अपने पुत्रको दयसे चादनेवाली थी । एक 


दिनकी वात ह, लाला कनदैया छकडेके नीचे सोया था, उसे 
उसी अवस्यामे टोढकर यदोदा येया यमुनाजीमे नानक 
ल्ि चली गयीं ॥ ४॥ 
शि्युलीखां ठतः कुर्वन्‌ स हस्तचरणौ क्षिपन्‌ । 
रुरोद मधुरं रप्णः पादाव प्रसारयन्‌ ॥ ५ ॥ 
फिरतो खल्या कन्दैया बालखीला करता हआ अपने 
दोनो हाथ-पैर फेकने खगा । पैरो ऊँचितक फैराकर मधुर 
स्वस रोने ख्गा॥५॥ 
स त्रैकेन प्रन शकटं पर्यवर्तयत्‌ । 
न्युव्जं पयोधराकाद्की चकार च श्येद्‌ च ॥ ६ ॥ 
( अव उसके मनम मेयाके दू पीनिकी इच्छ जाग 
उठी, किर तो ) उसने वहां एक ही वैरे धक्केते छकदेको 
ओषा उच्ट दिया । यह सव उसने स्तन-परनकी इच्छसे 
ही क्रिया था । यह अद्भुत लीला करे वह रोने ल्गा ॥ ६ ॥ 
पतस्िन्नन्तरे प्राप्ता यशोदा भयविक्डवा । 
स्नाता प्रस्रवदिग्धाङ्गी बद्धवत्सेव सौरभी ॥ ७ ॥ 
इती बीचमे भयते व्याकुल हई यशोदा मैया नदाकर 
रोट आयी । उसके सतति दूध ररा था, ओ उसके अन्य 
अर्म भी फेकता जा रहा या ¡ जितकरा वड़ा भेभा हुआ 
‡ उ गायकौ भोति वह अपने व्रच्चेकमो सन पिखनिक्े 
लि उत्सुक थी ॥ ७ | 


२३० 


धीम्ाभारते सिरुभागे 


[ हिवि 


सा ददतं विपर्वस्तं श्वकः वायुना बिना । 


हष्टेति रत्वा त्वरिता दारकं जगदे तदा ॥ ८ ॥ ` 


उसने देखा, विना ओधी-पानीके दी यह छकड़ा उलट 
पड़ा दै | फिर तो (हाय | दाय | करके तरंढ ष्टी खलको 
गोदमे उठा ख्या ॥८॥ 
नसा घुवोध तच्वेन शकर परिवर्तितम्‌ । 
स्यस्ति मे दारकफायेति प्रीता भीता च ,साभवत्‌॥ ९ ॥ 
वह्‌ इस ब्ातको न जान सकी क्रि छकरदेके उलट 
जनिका वासवम क्या कारण है ! (भगवान्‌ मेरे लालाको 
सक्रुराल रक्खे--एेसा कहकर मेया पुचमरेममे मग्न हो गयी 
ओर ध्वच्चेको कीं चोट तो नदीं ल्गी--दइस आशद्कासे 
उसको भय मी हय ॥ ९ 1 
किंतु वक्ष्यति ते पुत्र पिताः परमकोपनः। 
त्वय्यघभशाकटे सुपे अकस्माच विरोडिते ॥ १०॥ 
८ वह वच्चेकी ओर देखकर बोली-- ) ध्येय ! 
दुम्शरे पिता बडे क्रोधी दह । तम छकदेके नीचे रोये ये 
ओर वष्ट अकसमात्‌ उल्ट गया | यहं सुनकर वे न जाने मु 
क्या-क्या करदैगे १ ॥ १० ॥ 
कि मे स्नानेन दुःस्नानं कि च मे गमने नदीम्‌ । 
पयंस्ते शकटे पु या त्वां पर्याम्यपाचृतम्‌ ॥ १९ ॥ 
ष्लला ! मुने ग्ानेसे क्या मिक्ता १ यदि वम्दे कुक 
हो जाता तो मेरा बह स्नान तो दुःखान दी था । यष नदी 
तटपर जनिकी भी क्या आवदयकता थी । वदेसि रोरकर 
देखती हँ तो छकड़ा उख्टा पड़ा है ओर तुम खुले आकाशके 
नीचे सेये हे ! ८ हाय ! हाय | यदह सव्र कैसे 
हुआ १) ॥ ११ ॥ 
पसस्मिन्नन्तरे गोभिराजगास वनेचरः । 
काषायवासी विश्न नन्दगोपो व्रजान्तिकम्‌ ॥ १२॥ 
इखी समय गोभेकि साथ वनम विचरकर नन्दजी 
त्रजके निकट अयि  उरन्हनि गेरुए रंगके दो वस्र धारण 
कर रखे थे ॥ १२॥ 
स द्द धिपय॑स्तं भिन्नभाण्डघरीघरम्‌ 1 
अपास्तधूरविंभिन्नाक्षं ` शाकटः चक्रमोखिनम्‌ ॥ १३॥ 
उन्नि देखा, छकड़ा ओंधा पड़ा दै । उस्पर र्दे हुए 
सारे वतन षडे, मोट ओर मरके चनाचूर हो गये । जुजा 
निकृख्कर दूर जा पड़ा दै । धुरा द्ट गया है ओर पहिया 
मुकुटे खमान ऊपरको उठ गया है ॥ १३॥ 
भीतस्त्वरितमागत्य सष्टसा साश्ुखोचनः। 
शपि मे खस्ति पुधरायेत्यसङृद्‌ चयनं वदन्‌ ॥ ९४॥ 
य देखकर वे डर गये ओर ज्दी-जल्दी वैर वदते 


हुए सदसा धर्‌ आ पर्वे । उस समय उनके नेत्रम ओंवु 
भरे हुए ये। वे वार्वा पूषने खो, (मदर } मेय लल 
कुदल्ते तो दै न ॥ १४॥ 
पिबन्तं स्तनमारष््य पुत्रं खस्थोऽव्रवीत्‌ पुनः। 
पयुद्धं विना केन पर्यस्तं शकटं मम ॥ १५॥ 
फिर बरेयेको सनपान करते देख उनके जीर्मे जी जाया । 
उन्देनि पुनः पाः "मदर ¡ वैलमिं च्डाई तो हुई न्दी, किर 
यद्‌ छकद़ा कैसे उलट गया १ ॥ १५॥ 
पत्युवाच यद्ोदा तं भीता गद्रद्भापिणी । 
> विजानाम्यहं केन श्वकरं परिवर्तितम्‌ ॥ १६॥ 
अदं नदीं गता सौम्य चैखग्रक्षाटनाधिनी । 
आगत च विपर्यस्तमपद्यं दाकर भुवि ॥ १७॥ 
यशोदाने भयमीत्‌ होकर गद्गद वाणीरमे कदा--पनाय | 
म नदीं जानती कि किसने छकड़ा उलट दिया। रम्यम 
तो कपदे धोनेके स्मि यमुनाजीके तटपर गयी यी । टीटक्र 
देखती हू तो छकड़ा धरतीपर ्ओौधा पडा दै" ॥ १६-१७॥ 
तयोः कथयतेरेवमदरुवंस्तच दारक: । 
अनेन दिद्युना यानमेतत्‌ पदेन रोडितम्‌ ॥ १८॥ 
अस्माभिः सम्पतद्धिश्च दएमेतद्‌ यद्च्छया । 
वे दोनौ जव इ प्रकार वार्तालाप कर रदे ये) उस 
समय वरहो अयि हूए. चजके बाट्कनि कदा--्वाया [ तुम्हारे 
इस लालने दौ अपने पैरसे मारकर यद गाड़ी द्द्का दी है । 
हमलोग अकस्मात्‌ यदा दोडे हुए अयि ये । दमने अपनी 
षि यद घटना देखी हैः ॥ १८१ ॥ 
नन्दगोपस्तु तच्छुत्वा विस्मयं परमं ययो ॥ १९॥ 
प्रहृपएटस्चेव भीतश्च किमेतदिति चिन्तयन्‌ । 
वालको वह वात सुनकर नन्दगोपको वरदा विक्मय 
हुआ । वे पहले तो प्रसन्न हुए परंतु एेसा सोचते हुए कि 
यह क्यार वे फिर डर गये॥ १९३ ॥ 
नच ते रदघुगोपाः सदं मायुष्रबुद्धयः॥ २०॥ 
आश्च्य॑मिति ते सव षिसयोत्ुलरोचनाः 1 
स्वे स्थाने शाकटः स्थाप्य चक्रश्न्धमकारयन्‌ ॥ २९॥ 
वो जो बदे-वडे गोप थे, उन सवरको इस बातपर 
विश्वास नदीं हज; क्योक्रिं वह उस वच्येको साधारण 
मनुम्यका टी बालक समदते ये फिर मी वे सव्र-के-ठवर इस 
घटनासे आश्चयं करने खगे ये } उनके नेत्र विस्मयते खिल उठे 
ये } वे छकडेको अपनी जगहपर खड़ा करके उसमे पिय 
ओदने रो ॥ २०-२९॥ 
वे्म्पायन उवाच 
कस्यचिस्वथ काठस्य शङनी वेषधारिणी । 
घाघ्ी कंसस्य भोजस्य पूतनेति परिता ॥ २२॥ 


विष्णुपवं ] 


सत्तमोऽध्यायः 


भद 


<== 


पूतना नाम शाकुनी घोण प्राणिभयंकरी । 

माजगामाद्धंरात्रे वै पक्षौ क्रोधाद्‌ विधुन्वती ॥ २३॥ 
वैश्भ्पायनजी कहते ह--जनमेजय ! कु कारके 

. वाद प्रजम आधी राते मव क्रोधपू्वक अपने दोना पंख 

दिखती हुई पक्षिणोका वेष धारण विये एक राक्षसी आयी । 

वह भोजराज कंसकी धाय थीः उसक्रा नाम पूतना था । 

पूतना नामवाटी वह घोर पक्षिणी समस्त प्राणियोके व्यि 

भर्यकर थी 1 २२२२ ॥ 

ततोऽधेराश्रसमये पूतना प्रत्यदृश्यत । 

व्याघ्रगम्भीरनिर्धापं उथादरन्त पुनः पुनः ॥ २४ ॥ 
आधी राततके समय जब्र पूतना दिखायी दी, उस समय 

वहं ्याधके दहाढ़नेके-ते गम्भीर घोषम बारंबार गजना कर 

रदीथी॥ २५ 

निलिल्ये शशकटस्याक्चे प्रस्चवोत्पीड वर्षिणी । 

ददौ स्तनं च ष्णाय तसन्‌ सुपे जने निशि॥ २५॥ 
वहं मानवी स्रीका वेष्र धारण करे छकडेके धुरेके नीचे 

चिप गयी । उस समय उसके स्तरनोमे इतना दूध बद आया 

था कि उनम पीड़ा होने र्गी थीः इसील्यि वद दुधी वर 

सी क्से ल्गी । उस निशीथ-कार्मे जवर स्र रोग सो गये 

येः. उसने कृष्णकरे मुखम अपना स्न दै दिया ॥ २५॥ 

तस्याः स्तनं पपौ ष्णः प्राणैः सह विनद्य च । 

छिन्ञस्तनी तु स्सा पपात शकुनी युधि ॥ २६॥ 
लला कन्दैया उख सनको उसके प्राणेके साथ दीपी 

गया, उसका स्तने कट गया ओर वह पक्षिणी घोर चीत्रार 

` करे सदसा प्रथ्वीपर गिर पड़ी ॥ २६ ॥ 

लेन शष्दरेनं विप्रस्तास्ततो वुचुधिरे भयात्‌। 

स नन्दगोपो गोपा वै यश्षोदा च सुदिक्छवा ॥ २७॥ 
उसके उस शब्दसे संचस्त होकर नन्दगोपः दुसरे 

गोप तथा अत्यन्त व्याकुल हुई यरोदा--ये सवर के-खव भयके 

मारे जाग उठे ॥ २७॥ 

ते तामपश्यन्‌ पतितां विसंकषां विपयोधराम्‌। 

पूतनां पतितां भूमौ बज्रेणेव बिदारिताम्‌ ॥ २८ ॥ 


उन्न देखाः पूतना पष्वीपर अचेत होकर पड़ी है ` 


उसका सन कट गया है ओौर बह एसी प्रतीत होती हैः 
मानो वज्रे विदी्ण.कर दी गयी दहो ॥ २८॥ 
दं कि त्विति संत्रस्ताः कस्येदं कर्म चेत्यपि । 
नन्दगोपं पुरस्छृत्य गोपास्ते पर्यवारयन्‌ ॥ २९॥ 
यह क्या ट १ किसका यद कर्मद पेषी बरतें कसते 
हए वे गोप मयभीत हो गये ओर नन्द्जीको आगे करके 
पूतनाको पेरर खडे हो गये ॥ २९ ॥ 
नाध्यगच्छन्त च तदा हेतुं तत्र कदचन । 
आश्चर्यमाश्च्यमिति द्ववन्तोऽदुययुगहान्‌ ॥ ३० ॥ 
वे उस समय उस घटनाके कारणका पता कदापि न 
र्गा सके ौर आश्रयं है} आश्चयं है || रेस क्ते ए 
अपने-अपने धरयोको चले गये ॥ ३० ॥ 
गतेषु तेयु गोपेषु विस्ितेषु यथागृहम्‌ । 
यशोदां नन्दगोपस्तु पप्रच्छ गतसरम्श्रमः ॥ ३१ ॥ 
उन विस्मित हुए गोर्पोके अपने-अपने घर चे जनेपर 
सम्भ्रमरदित हुए नन्दगोपने यशोदाते पूञा--॥ ३९ ॥ 
कोऽयं विधिनं जानामि विसयो मे महानयम्‌ । 
पुरस्य ये भयं तीरं भीरुत्वं समुपागतम्‌ ॥ ३२ ॥ 
'विधातक्रा यह कैषा निधान है, यह मेस समश्च नहीं 
आता। इस घटनासे मुक्ते महान्‌ विस्मय हो रहा है ¦ यह मेरे 
युत्रके च्ि तीतर भय उपल्ित हुआ है, जिसे हमलोगोमि 
मीरखता आ गयी दै" ॥ ३२ ॥ 
यदयेदा त्वव्रवीद्‌ भीता नायं जानामि कि त्विदम्‌ । 
दारकेण सहानेन खुरा शाब्देन बोधिता ॥ २३॥ 
यह्‌ सुनकर यशोदाने भथमीत होकर कदा-- (आयं ! 
मै भी नद्यं जानती कियद क्यादै मै तो शस बच्चेके 
साथ सोयी थी | इस राक्षसीके चीकरारसे ही जग गयी ह ॥ 
यशोदायामजानन्त्यां नन्दगोपः सवान्धवः । 
कंसाद्‌ भयं चकारोभ्रं विस्मयं च जगाम ह ॥ ३४ ॥ 
जवं यशौदाने भी अपनी अनभिकशता प्रकट की; तम्र 
यन्धु-बान्धरवसहित नन्दगोप कंससे अत्यन्त भय मानने खगे 
ओर मन-दी-मन विस्मयको प्राप्त हए ॥ ३४॥ 


इति श्रीमहाभारते खिरुमागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि शिडचर्यायां शकटभङ्कपूतनावधे षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥ 
दस प्रकार श्रीमह्यभार्तके लिरुभाग हसििकके अन्तर्मत विष्णुपवैमे श्रीकृप्णकौ वारसीसके प्रसद्घमे 
शकटभद्ग भौर पूत॒नाफा यधविषयङ छठा अध्याय पुरा हु ॥ ६ ॥ 
नदन 


सप्तमोऽध्यायः 
श्रीृष्ण ओर वरुरामका व्रजमे घुखनेकि वल चलना तथा श्रीकृप्णका 
उच्खरं धकर यमराजुन-भङ्कवी रीरा करना 


वैशम्पायन उवाच 


कारे शरुछदति तो सोस्यो द्वत इतनामक्ै । 


ङष्णसंकर्षणो चोभौ रिङ्गिणौ समपधताम्‌ ॥ १ ॥ 
बैदाम्पपनजी कते ह--भनमेजय | छ काक 


२६२ 


शीमहाभारते सिखभागे 


[ हरिवंशे 


वीतनेपर वे दोनों सौम्य वारकः जिनके नामकरण-संस्ार दहो 
चुके थे ओर जो कृष्ण ओर संतर्पण नामते प्रषिद्ध ये, घु्नो- 
के वल चल्ने-किरेष्े॥१॥ 
तावन्योन्यगतौ वाकी वाल्यदपैकतां गतौ । 
पकमूर्तिधसे कान्ती वालचन्द्रार्कवच॑सौ ॥ २ ॥ 
चचपनसे ष्टी वे दोनों व्रच्वे एक दृससम अन्तर्भूत-से 
होकर एकताको प्रास द्यो गये थे । णेता जान पड़ता था किये 
दोनों एक दी रीर धारण करते द । वे दोनों भाई वार्चन्दर 
ओौर यालसूर्यके समान कान्तिमान्‌ ये ॥ २॥ 
पकनिमीणनिुकावेकशय्यासनारानौ । 
एकचेपधरावेकं पुष्यमाणो रिद्रुमतम्‌ ॥ ३ ॥ 
वे दोनो मानो एक दी संचिक्रे दले थे (अथवा अभिन्न 
ओर जन्मरहित ये ) 1 एक-सी शय्या, आसन्‌.यौर भोजन- 
का उपमोग करते ये । एक समान वेष धारण कसते ये ओर 
एक ष्टी िद्युधतकरा पार्न करनेवाञे थ ॥ ३ ॥ 
एक्षकार्यान्तस्गतावेकेष्ौ द्विधारृतो । 
प्कचयौ महावीयौवेकस्य रिश्चुतां गतौ ॥ ४॥ 
वेएकष्टी कार्यम संल्नये जौर कदी ररीरकेदो 
भागते प्रतीत होते थे] उनकी दिनचर्या एक-खी थी । वे महा- 
पराक्रमी वाच्क एक ही पित्रे रिद्युथे॥४॥ 
पकप्रमाणी लोकानां देववृत्तन्तमादुपौ । 
त्सस्य जगतो गोपौ संवृत्तौ मोपदारके ॥ ५ ॥ 
लोर्गोकी दृष्टम वे एक-जेते कटके ये । उन्दनि देवतार्भी- 
 '्ुषटदमन ओर धर्मखापनः रूप सिद्धान्तके पालनके ल्थि 
मानव-दारीर अरण क्रिया था । वे सम्पूर्णं जगत्‌ संरक्तक हो- 
कर भी गोपवाख्क बन गये ये ॥ ५॥ 
अस्थोन्यन्यतिपकाभिः क्रीडाभिरभिदोभिती । 
अन्योन्यकिरणग्रस्तौो चन्द्रस्यीविवास्बरे ॥ ६ ॥ 
वे दोनो माई एक दृसरेषे मिली हुई क्रीदार्यदरारा 
यु्ोभित दोते थे, जे आकाशम चन्द्रमा ओर र्यं एक 
दूसरेकी किरणेसि वेधकर एक साथ हो गये हँ ॥ ६॥ 
विसर्पन्ती तु सर्वत्र सर्पभोगभुजाबुभौ । 
रेजतुः पांखुदिग्धाद्धौ दौ कलभकाविव ॥ ७ ॥ 
उन दोर्नोश्री भुज्यै सपकि शरीरे समान जान पड़ती 
थी | वे उनके दवारा सव्र ओर चल्ते-फिरे ओर सरक्ते थे । 
उस समय धूठ्ते भरे हृष्ट दरीरबठे वे दोनो भाई दर्षमरे 
वो हस्नि-शावकंकि समान रोमा पते थे ॥ ७॥ 
कचिद्‌ भम्मप्रदीताद्गौ करीपपरोक्षितौ चित्‌ । 
तौ तञ्च पर्यधवितां कुमाराविव पावकी ॥ ८ ॥ 
कटी तो उनके दीप्तिमान्‌ अन्नम सात ल्पिर जाती मर 


कही वे करपी (कंडकरि चृ्)षे नहा उठते धे । वे वरदो अग्नि. 
केदो कुमार शाख ौर विाखकरे समान सुशोमित्त होत दए 
सव्र ओर दौड स्पराति ये ॥ ८॥ 
कचिस्नयुभिखदृधूष्टैः स्पमाणौ विरेजतः। 
क्रीडन्तः चत्सशशालाख शरृदिग्धाद्गमूर्धजो॥ ९ ॥ 
कमी पिते दृष धुट्नोे वल सरक्ते दुष्ट श्रीकृष्ण- 
वट्राम बड़ी सोभा पातेये | कमी वे व्र्ठृक्रि स्थानेमि 
जाकर खेखने खगते ओर सरे अङ्गं तथा सिरर वार्लँम गो 
यरल्पेयकेतेये॥९॥ 


धद्यभति धिया जु्ावानन्दजननौ पितुः। 

जनं च विप्रकुवीणौ विसन्ती कचित्‌ कचित्‌॥ १०॥ 
कान्तिरूपिणी श्रीसे सेवित ह्येकर वे दोन माई अनुपम 

शोमा पते ओर पिताको आनन्द प्रदान करते ये । कमी-कमी 

वाख्स्वमाववस रिसी-किसीके विपरीत कार्थ कर ब्रैते अर 

जोर-जोरसे सने ख्गते थे ॥ १० ॥ 


तौ तत्र कौतूदलिनौ मूर्धजन्याङुलेक्षणौ । 
रेजतुच्छन्दरवदनौ दारकौ सखकुमारकी ॥ ११॥ 

वे सदा क्रौद-कौनृ्ये ही लगे रहते ये | उन तिरक 
चं षराटे वार नेर्नोपर ट्टक्रकर उर व्याकुल एवं चश्चल कर 
देते थे । उन दोनेकि मुख चन्द्रमाके समान सन्दर ये, अतः 
वे सुकुमार चाख्क बद सुहावन खाते ये ॥ ११ ॥ 


अतिप्रसक्तौ तौ शटा सर्वैवजविचारिणौ । 
नाशकत्‌ तौ व(रपितुं नन्दगोपः सुदुमदो ॥ १२॥ 

वे क्रीडे ही आसक्त दो सरि ज्म विचरते रहते ये। 
उन दोनों अत्यन्त मत्वे वाठर्कोक सर्वत्र जते देखकर मी 
नन्दगोप सेक नरह पते ये ॥ १२॥ 


ततो यदयोद्‌ा संक्रुद्धा रूष्णं कमलटोचनम्‌ 1 
आनाय्य शकरीमूले भत्संयन्ती पुनः पुनः ॥ १३४ 
दाच्ला चैवोदरे वद्ध्वा भ्रत्यवन्धदु्ूखले । 
यदि शक्तोऽसि गच्छेति तमुक्त्व(कमं साकसेत्‌॥१४॥ 
तव एक दिन यशोदा मैया अव्यन्त कुपित हो कमल- 
नयन श्रीकृष्णको एक गाद्ीके पस ठे जाकर वार्वा ग्नि. 
फटकारने ख्गी । इतना हौ नही, उसने उनके पेट ओर कमर 
भ रस्सी बोधकर उस रस्सीको ओखलीम कस दिया ओर 
कदा--अव जा सको तो जाओ ।› इतना कष्टकर वह धरे 
काम-घंधोरमि ठग गयी ॥ १३-१४॥ 
व्यग्रायां तु यशोदायां निज॑गाम ततोऽङ्गणाव्‌! 
रिद्युरीलां ततः कुवन्‌ कृष्णो विस्मापयन्‌ बजम्‌। 
सोऽङ्गणाननिःखतः ष्णः कर्पमाण उदुलरम्‌॥ १५॥ 
यमखाभ्यां भ्रचृद्धाभ्यामञ्जुनाभ्यां चरन्‌ वने । 
मध्याक्िश्मक्राम तयोः कर्माण उत्छललम्‌.॥ १६ ॥ 


विष्णुपर्व ] 


यशोदाके कारय तत्यर हते ही सल कन्हैया वालटीला 
करता ओर व्रजे लेर्गोको विसमे डरता हुआ ओगनसे 
निकट । बद ओखलीको घसीरता हुआ वनक्री ओर चला । 
मार्गमे एक साय उत्पन्न हए दो अ्जुनके ब्रृक्ष थे, जो ब्रूत 
बडेदो शये ये। कन्हैया अपनी ओखलीको खीचता हुआ 
उन्दी दोर्नौ वृक्षो बीचसे होकर निकला ॥ १५-१६ ॥ 
तत्‌ तस्य॒ कषैतो बद्धं ति्यग्गतमुटुखलम्‌-। 
लप्मं ताभ्यां समूलाभ्यामजचैनाभ्यां चकष च ॥ १७ ॥ 
खचिते दप, कन्दैयाके उदरे वैधी हई बह ओखली 
टेदी शकर उन दोनों अर्जुन-वरषौकी जद जा ठगी अर वहीं 
अयक गयी | फिर तो उक्षने उन बृरकषोसहित ओख्खीकरो जोर- 
से खीचा | १७॥ 
तावन ङष्यमाणौ तेन वाछेन रंहसा 1 
समूलव्रिटपौ भग्नो स तु मध्ये जहास षै ॥ १८॥ 
निदर्शनार्थं गोपानां दिव्यं स्ववरमास्थितः । 


चालक कनदैयाद्वारा वेगसे लीचि गये वे दोन अर्जुनश्च 
जड़ ओर साखार्ओोसदित दरूटकर भिर पदे ओर वह अपने 
दिव्य वलकरा आश्य ले गोरपौको दिखानेकरे व्ि उन दोनौं 
दृष यीचमे खड़ा-लद्ा हंसने खगा ॥ १८३ ॥ 
तददाम तस्य चलस्य प्रभावाद्‌भवद्‌ श्डम्‌ ॥ १९ ॥ 
यघ्रुनातीरमागंस्या गोष्यस्तं दद्दयुः दिश्यम्‌ 1 
कन्दन्त्यो विस्मयन्त्यश्च यशोदां ययुरङ्गनाः ॥ २० ॥ 

उस वालके प्रभासे वह्‌ रस्सी ओर भी दृद हो गयी । 
यमुनातीरे मागंपर खड़ी हुई गोपिर्योने जव बालङ्ृम्णको 
उरू अवश्या देखाः तव वे आश्रय॑चकित हौ करुणक्रन्दन 
करती हुई यशोदाजीके पास गर्यौ )} १९-२०॥ 
तारतु सम्श्रान्तवदना यशोद(भूचुरङ्नाः । 
पद्यागच्छ यशोदे त्वं सम्भ्रमात्‌ कि विलम्बसे ॥२९॥ 
यौ तावर्जुनवरक्षौ तु वजे सत्योपयाचनौ । 
पुषरस्योपरि तवेतौ पतितौ ते महीरहौ ॥ २२ ॥ 

उन सगरके भुखपर घवरादट छायी हुई थी । उन गोपाङ्ग- 
ना्जनि यरोदासे कहा--्यओोदाओी { वेगसे आभो आमो !! 
सम्भ्रमके कारण त॒म विलम्ब क्यो करती हो | ब्रज वे जो 
दोनो अशनबर् येः अरदो हमारी ्तयेक याचना सौर मनोती 


सफल होती थीः वे दोनौ चक्ष वुश्हारे पु्रके ऊपर 
गिर पदे ॥ २९-२२ ॥ 


द्ठेन दाम्ना तत्रैव बद्धो वत्स इवोदरे ! 
धो्मर 
जहास चृक्षयोमेध्ये तत्र पुरः स वालकः ॥ २३॥ 


नेत वेधा हुआ बच्डा हो, उसी प्रकार उदरस्य मजनूत 
रस्सीपे वधा हुभा तुम्हारा वह वालक उन वृष्क चीचमे 
खड़ा-खड़ा हसरदाथा॥२३॥ 


रततिष्ठागच्छ दुमे मूदधे पण्डितमानिनि 


सप्तमोऽध्यायः 


२६३ 


पुमानय जीवन्त मुक्तं भत्युसुखादिष ॥ २७ ॥ 
“अनेको पण्डिते माननेवाखी मूढ दुर्बुद्धि योद {उरो । 

चलो हमारे साथ ओर अयने जीवित पुत्रको, जो मानो 

मतके मुखले बेचक्र निकल है, षर ठे आओः ॥ २४॥ 

ख। भीता स्टसोत्थाय हाकारं पङ्र्वती । 

तं देशमगमद्‌ यत्र॒ पातितौ ताबुभौ द्रुमौ ॥ २५॥ 
यशोदा भयभीत हो सहसा उठी ओौर हाहाकार करती 

हुई उस स्यानपर गयीः जहो उखे ललने उन दोर्नोब्षौ- 

को धरासायी कर दिया था ॥ २५ ॥ 

सा ददु तयोमंध्ये दुमयोरात्मजं शिष्यम्‌ । 

दाम्ना निबद्धसुदरे कष॑माणसुटल्लम्‌ ॥ २६॥ 
उने अपने पुच्रको उन दोन वृषो वीचमे खड़ा देखाः 

जो रस्सीते पेमे वैभी हुई ओखलोको अपनी ओर खींच 

रदा था] २६॥ 


सगोपीगोपवृद्धश्च समुवाच वजस्तदा । 

पयोगच्छन्न ते दष्टः गोपेषु महदद्धतम्‌ ॥ २७॥ 
गोपिरयो जौर देवृ मोदित सारे वरजम उस समय 

इसी घटनाकी चचां होने ठगी गोपौके यक्षं जो 

यह मदान्‌ ओर अद्भत घटना घटित हुई थी, इसे देलनेके 

व्यि चात ओसपे खेग अने लगे ॥ २७॥ 

जजच्पुस्ते यथाकामं गोपा वनविचारिणः । 

केनेमौ पातितो बृक्षौ धोषस्यायतनोपमौ ॥ २८ ॥ 
वनम विचरमेवारे वे गोप अपनी इच्छाके अनुसार वरह 

अकर कहने खगो--*अदहो { जके वे दोनो दृक्ष देवमन्दिरं 

समानं थे, इनको क्रिसने गिरा दिया ॥ २८ ॥ 

विना वातं विना श्प विदयुत्पपतनं विना । 

विना हस्तिकूतं दोष केनेमौ पातितौ द्रुमौ ॥ २९ ॥ 
न्न धी चली न वर्मा हुई, न व्रिजली गिरी जौर 

न की हाथीने ही आकर टक्कर मारी, इन सतै दोरक 

विना ही ये दोनों शृ किस द्वयस भिराये गे ॥ २९ ॥ 

अहोवत न शोभेत विपरूल(वजुनाधिमौ । 

भूमो निपतितौ ब्क्ौ वितोधौ जटद्‌ाविव ॥ ३०॥ 
अहो ! जडसे अख्ग हो जनिङे कारण एथ्वीपर गिरे 


हए ये दोन अजुन इक्ष जरहीन बादल सपान शोभारहित 
हो गयेहै॥ ३०॥ 


यदीमो घोषरचितौ धोषकट्याणकाणी । 
नन्दगोप प्रसन्नौ ते द्रुमावेवं गतावपि । 


यश्च ते दारको सुकते बिपुराभ्पामपि शितौ ॥ ३१॥ 


“नन्दगोप ¡ यदि ये दोनों इ्च रस-मोञमे खाये गत्र 
ये शौर. खमख योषदा कस्यभ्‌ भरतेये तो अज 


, हस अवस्यामं प्हुचकरर भी ये दोनो आपपर प्रसन्न दी ई! 
जिसे विश्चाल दोनेपर मी इन ब्र्रेनि प्रथ्वीपर गिरते समय 
व॒म्दारे वाल्कको जीवित ठो दिया दै ॥ ३१ ॥ 
ओत्पातिकमिदं धोचे ततीयं वतते त्विह । 
पूतनाया विनाशश्च द्रुमयोः शकटस्य च ॥ २२॥ 
धट चरमे यड तीसयी बरार ओत्यातिकर घटना हूर दै । 
पूननाका विनाशः चकदेका उर्टना जीर वृरौका धरागयायी 
-होना--ये तीन उपद्रव यरो हो चुके ॥ ३२॥ 
अस्मिन्‌ स्थने च वासोऽयं घोपस्यास्य न युज्यते। 
उत्पाता यत्र दयन्ते कथयन्तो न श्षोभनम्‌ ॥ २३ ॥ 
(दरस स्थानपर हमरे दस व्रजक्रा रदना अव उचित नष्ट 
जन पदता; क्योकि य्ह अञ्युम परिणामी सूचना 
देनेवाले उत्पात द्िखागरी देने रे ईः ॥ ३३ ॥ 
नन्दगोपस्तु सहसा मुक्त्वा रुप्णमुटखखात्‌ 1 
निवेक्षय चाद्रे चिर गरतं पुनरिवागतम्‌ ॥ ३४ ॥ 
नादप्यव्‌ प्रेक्षमाणो वै छप्णं कमललोचनम्‌ । 
इतने नन्दगोध्रने सहसा बन्धन खोटकर श्रीकृष्णको 
ओखलीसे मुक्त कर दिगा ओर मानो वह्‌ वाल्क मरकर 


महाभारते सिखभागे 


[जनायानान्या्ोेणाोनमाा्णोगनयानागानभोयागान म 


[ हरिते 


पुनः जी उठा टो, एला मानते हुए वे देरतक उसे मपनी 
गोदरमे चिपकाये रटे । उस समय वे कमलनयन श्रीकृष्णक्री 
ओर देखते-देखते वृत नहीं हेते ये ॥ ३४९ ॥ 


ततो यशोदां गर्ह॑न्‌ वै नन्दगोपो धिवेदा ह ॥ ३५॥ 
स च गोपजनः स्वां वजमेव जगाम ह |. 
तदनन्तर नन्दगोप यशोदाकी निन्दा करते हए षे 
गये, साय ष्टी अन्य सव्र गोप मी ब्रज ही पधरे ॥ ३५१ ॥ 
सख च तेतरैव सास्ना तु कृष्णो येदामवन्धनाय्‌ 1 
गोष्ठे दामो इति गोपीभिः परिगियते ॥ ३६ ॥ 
उख दाम अर्यात्‌ रस्वीवे उदर योधि जनेके कारण 
श्रीूप्णका नाम दामोदर दो गया } बज मोपिर्यो उसी 
नामते उनश्ची दीटार्ओक्रा गान करने स्गी ॥ ३६ ॥ 
पतद्वर्यभूतं हि वाख स्यासीद्‌ विचेष्टितम्‌ 1 
ष्णस्य भरवश्रष्ठ॒घोपे निवसतस्तद्ा ॥ २७ ॥ 


भरतभेषठ | प्रर्मे निवा करते समयं वाक्‌ कृष्णक 
खी षौ आश्र्यमयी टीटर्पे छेदी रदती थी ॥ २७ ॥ 


इति श्रीमहाभारते लिकमागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि िश्ुचर्यायां यमटार्युनमङ्गो नाम सक्ठमोऽप्यायः ॥ ७ ॥ 


इस प्रकर श्रोमदभस्ते दिरभग दरवद अन्तर्मत ्रिष्ुपईमे बार्लरके प्रसङ्गे 
यमजाुनमङत्रिपमक सत्यौ मध्याय पूरा हुमा ॥ ७ ॥ 
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अष्टमोऽध्यायः 
श्रीकृष्ण-वलरामकी वार्चया, शरीरृष्णके दारा तरजक्रो अन्यत्र ठे जानेकी चेष्टा ओर 
अपने शरीरसे भेदियोको उत्पन्न करे उनका समूचे वजको उराना 


वद्भ्यायन उवाच 

पवं तौ बाल्यमुच्तीर्णो छप्णसंकर्पणादुभौ । 
तस्मिन्नेव बजस्याने सपतवर्पौ वभूवतुः ॥ १ ॥ 

दैश्षम्पायनओी कहते है--जनमेजय !¡ व अकार 
श्रीकृष्ण स्रीर संकषण दोनो माई उसो वरजम वास्यावस्थाको 
पार कफे सत कणे दो गये॥ १॥ 
नीरपीत(म्बर्धसे पीतद््ेत्चठेपनौ । 
यभूवतुर्ब्॑सपाछै क(कपक्षधराज्भौ ॥ २ ॥ 

इनमे एक ( वराम ) तो नील वस्र धारण करते 
थे जीर दूसरे ( श्रीरृष्ण ) -पौत वचर । दोनेकि चन्दन ओर 
अद्नराग मी क्रमशः पीठे जौर दयेत ये । दोनों ही कक्पक्ष 
धारण करते ये। अव वे दोनो भाई बच्डे चरने त़्े ॥ २॥ 
प्णवाथं श्चुतिषुखं वाद्यन्तौ वरानन । 
दश्यभंति चनगतौ शिशीषौविव पन्नगो ॥३,॥ 


उन दोनेकिं मुख वे सुन्दर य} वे वनम जाकर 
कार्नोको खख देनेवाले पर्चोके वरजे ( पिपीदरी या सीरी) 
वनते हुए तीन सिरवले सपकि समान शोमा पते 
ये*॥२॥ 


मयूराङ्दकर्णोौ तु पलबापीडधारिणौ । 
षनमालङलोरस्को दुमपोताविवोद्रतौ ॥ ४ ॥ 


मोखद्धके टी यानजुचरंद ओर कर्णेभूषण पहने तथा 
प्तक ही मुकुट धारण क्रिि वे दोनो भाई श्रक्षके निकठे 


# ताड भादिके पत्तेको मोढकर्‌ उप्तके धिरेषर छोय-ता छेद 
रछकर उते दोनो हायसे पके हर वच्चे हमे टालकर्‌ रक्ते 
रै, उससे सीरी, मियुरु या मेपिरी-तैषी मावाज निक्क्ती ह। 
उसे वजवि समय दोनो हाय नौ पिर चापर रष्वे रै) 
इरीदी सैके तीन दिते उपमा दी गवी 1 


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श्रीकृष्ण ओर बलरामका वन-विहार (पृष्ट-संख्या २३४) 


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अटमीऽच्यायः 


९३५ 


हृएट-नये पौरपोकि समान दिखायी देते थे । उनका वक्षःखर 


वनमालसे व्याप्त था ॥ ४॥ 
अरविन्दरृतापीडो रज्जुयक्षोपचीतिनो । 
सशिक्यतुम्बक्षर्के गोपवेणुप्रवादकौ ॥ ५ ॥ 


कमलपु्येके दिसेभृष्रण ओर्‌ रस्छीफे यज्ञोपवीत धारण 
करके वे दोना वाल्वालके समान परली बजाया करते ये। 
उनके खाय छकरा, दुम्ब ओर करक ८ कड या पुरा ) 
मीये।॥५] 
छचिद्धसन्ताचन्योन्यं क्रीडमानौ कचित्‌ कचित्‌ । 
पणशय्यासु ससुतो कचिनिद्धान्तरेश्चणौ ॥ ६ ॥ 
कदी एक दृरेकी ओर देखकर हसते-ईसातेः कीं मोति- 
मोतिके खेल खेलते ओर कीं पत्तोफे विदछौरनोपर सोकर 
ओखिमिं नीद भरस्ेते थे ॥ ६ ॥ 
पवं वत्सान्‌ पारयन्ती शोभयन्तौ मद्टावनम्‌ । 
चन्चूयन्तौ रमन्तौ स्म किरोेराविव चश्चलो ॥ ७ ॥ 
इस प्रकार वदे चराते, महावनकी सोमा वदति 
वारंवार उव ओर चद्छर छ्गाते ओर चञ्चल गतिवाे 
अश्वदावकोके समान वनेम विहार करते थे ॥ ७॥ 
अथ दामोद्रः श्रीमान्‌ संकर्षणमुवाच ह । 
आयं नास्मिन्‌ वने शक्यं गोपाछः सह क्रीडितुम्‌ ॥८॥ 
अवगीतमिदं स्व॑मादाभ्यां भुक्तकाननम्‌ । 
प्रक्षीणतणकाषएटं च गोपे्मयितपादपम्‌ 4 ९ ॥ 
तदनन्तर शक दिन सओओमाषम्पन्न दामोष्टर श्रीङृप्णने 
अपने माई संकर्थणसे कदा--भआयं ] अव इस वने ग्वाट- 
बाखेकि साय खेलना सम्भव नदीं है । हमलेरगोने इस सरे 
वनको अपने उपमोग्मे लाकर इसकी शोमा-सम्पत्ति नष्ट कर 
दीह । य्ह घास चर ली गयी ओर काठ भी तोड़ ल्मि गये 
। गोपनि येकि एक-एक इृष्षको मय डाल द ॥ ८-९ ॥ 
घनीभूतानि यान्यासन्‌ काननानि चनानि च । 
तान्याकाशनिकाशानि दद्यन्तेऽयय यथाऽसुखम्‌॥ १०॥ 
“जो व ओर कानन सवन ये वे अत्र आकारशकरे समान 
सूले दिखायी देती द । इन्द देखकर अव सुख नहीं मिलता | 
गोवेप्वपि ये उक्ताः परिवृच्चा्गेषु च । 
सवं गोष्ठाग्निघु गताः क्षयमक्षयवर्चसः ॥ १९॥ 
"जिनके फाटक गोखाकार कुंडे ल्मे ह, उन गो- 
शालां भी अमिट दोमावके जो वृक्ष थे, वे सव गोष्की 
आगमे जल्कर नष्ट हो गये ॥ ११॥ 
सनिरुष्टानि यान्यासन्‌ काष्ठानि च दृणानि च । 
तानि दूराबरृ्ाु मार्ितव्य्‌नि भूमिषु ॥ १२॥ 
“जो चूण ओर काष्ठ बहुत निकट थे, वे दूरतककी जती. 
इई भूमिर्योमे अवर ददनेके योग्य रह गये है ॥ १२॥ 


अरण्यमिदमस्योदमद्पकक्चं निसयश्चयम्‌ } ` ` 
अन्वेपितन्यविध्रामं दारुणं धिस्खद्रुमम्‌ ॥ १३॥ 
५इस वनम जक ब्रूत थोड़ा दैः सूच काठ ओर वृण मी 
बहूत कम दै, यहो आश्रय ठेनेयोग्यं कोई शान नदीं दैः 
यर्हो विश्ामकरे लिय भूमि खोजनी पडती है विरले ही दृष्च 
बच गये ह, अतः इसकी वरड़ी दारण अव्रखा दो गयी है ॥ 
अकमेण्येघु वर्षेषु स्थितविग्रसितद्धिजम्‌ । 
संवासस्याच्य महतो अनेनोत्सादितद्रुमम्‌ ॥ १४7 
ध्यहेकि श्क्ष अव कामके नहीं रदे ( इने फल-पलका 
अमावदहो गया टै) } इनपर जो पक्षी रदतेये, वे अय 
अन्यत्र प्रान कर चुके है । इस विशाल ब्तोके ठोगेनि 
यदेकि बृक्षोको उजाड़ कर दिया दै ॥ १४॥ 
निरानन्दं निराखादं निष्प्रयोजनमारुतम्‌ । 
निर्विदङमिद्‌ं द्रर॑यं॒निव्य॑सनमिवादानम्‌ ॥ १५॥ 
धयो कोई आनन्द नदीं रहा; फेंका आखाद्‌ दुभ 
दो गया । यर्दा वायुका चलना भी निष्फल है ( क्येक्रिन तो 
वह्‌ सुगन्ध देती है ओर न फर दी गिराती है--इन दोर्नो 
वस्वर्ओंका वर्ह सर्वथा अभाव है ) | पक्षियोसि रहित गह 
सना वन त्रिना व्यञ्जनके भोजनक भोति अच्छा नहीं ख्गता ॥ 
विक्रीयमणैः काष्ठैश्च शाकैश्च वनसम्भवः । 
उच्छिन्नसंचयतृणेर्धोषोऽयं नगरायते ॥ १६॥ 
ध्यहकि सूखे काठ ओर इस नमे होनेवाठे शाक यति. 
दिनिवेचे जारे । यहयो जो देस्करेेर वरण ये, उनका 
उच्छेद हौ गया; इसते यद घोष ( रज ) नगरे समान 
जान पड़ता है ॥ १६ ॥ 
शोकानां भूष्रणं धोषो घोषाणां भूधणं बनम्‌ । 
वनानां भषणं गावस्ताश्चास्माकं परया गतिः॥ १७॥ 
“वतोका भूषण दे घोष ( गोष्ठ ), घोरपोका भूप्ण ह वन 
ओर वर्ना आभूप्रण दै गौरे । वे मै दी हमलेर्गोकी 
परम गति ( सत्रसे वड़ा सहारा ) ६ ॥ १७ ॥ 
तस्मद्न्यद्‌ चनं यामः भ्रस्यग्रयवसेन्धनम्‌ । 
श््छन्त्यदेपुक्तानि गावो भोक्त दणानि च ॥ १८॥ 
“अतः अव इम दूसरे वनम चरँ, जरो नयी-नयी धा ओर 
देधनकी अधिकता हो । हमारी गर्द उन नयीनयी धासोक्ञे 
चरना चाहती है जो अत्रत्र चरी नदीं गवो है ॥ १८ ॥ 
तस्माद्‌ वनं नवठणं गच्छन्तु धनिनो नजा: 1 
न द्वारवन्धावरणा न गृह्सेचिणस्तथा | 
प्रशस्ता वै नजा लोके यथा वे चक्रचारिणः ॥ १९ ॥ 
'अतः जो व्र॑ज धने सम्पन्नः वे उस वनम चट 
जदा नयी-नयी पास उपरब्ध हो | जिनमे दरव ैभ.गये ई 


५ 


१३६ 
ओर चारो ओरे बाड़ लग गये दै, जदो स्यायी धर चन रये 
ओर खेत कर स्वि गये; एसे बज लोकम अच्छे नटी माने 
लाते । उन्मुक्त विचरनेवाछे दंसेक्रि समान व्न्धनरदित दोकर 
विमित्न स्थानम धूमते रहमेवलि व्रज ही श्रेष्ठ ६ ॥ १९ ॥ 
शछृन्सूश्रेषु तेष्वेव जतक्षाररसायनम्‌ । 
न वणं युते गावो नापि तत्‌ पयसे हितम्‌ ॥ २०॥ 
“उन्दी गोवसमू्रोकि देरपर जो वृण वैदा हते ई 
अथवा अन्यत्र पैदा हुए तूरणोपर जत्र गोप्रर-गोमूत्र पड़ जाति 
दैः तव उनम क्षार एवं रसायनके रुण आ जति ई; अतः 
गोरथ उन घार्सोको चादसे नदीं खाती ई तथा वे वरण दूधके 
स्यि मी हितकारी नदीं दते ई ॥ २० ॥ 
स्यटीप्रायास्ु रथ्यासु नवास वनराजिषु! 
चरावः सहितौ गोभिः क्षिपं संवाद्यतां नजः ॥ २९ ॥ 
"मानक दस वनकी सारी गर्यो खल-सी दो गयी ह। 
उनम घातर्फरसक्रा नाम मी नदीं रह गया है; अतः चच; 
हम दोनो गौ्ेकि साय नूतन वन-शरेणियमिं विचरं ! अव 
शीघ्र दी यदसि त्रनको अन्यत्र, ठे जाना चाद्ये ॥ २१॥ 
श्रूयते हि वनं रम्यं पयोक्षदणसंस्तरम्‌ । 
नाम्ना दृन्दावनं नाम खादुवृक्षफटोदकम्‌ ॥ २२॥ 
युना जाता दै क बृन्दावन नामक वन वड़ा दी रमणीय 
दै । वहो पर्या घास फटी हई दे । वदकि बर्मिं खादिषट 
पल तमो ई ओर वहोका जल मी युखादु है ॥ २२॥ 


अश्चिलिकण्टकवनं सरवर्वनगुणैर्युतम्‌ । 
कदुम्बपादपध्रायं यमुनातीरसधितम्‌ ॥ २३ ॥ 


उख वनम न शिलया ( श्रगुर ) ई न कटि । उर्समे 
समी वनसम्बन्धी युर्णोका संयोग है वरहो अधिकतर 
कदम्बैः शृक्ष है तथा वह वन यमुनाके तय्पर दी खित दै ॥ 
लिग्धशीतानिखवनं स्वतुनिखयं शुभम्‌ । 
गोपीनां सखुखसंवारं चारुचिववनान्तरम्‌ ॥ २४ ॥ 

(उस्र सदा स्निग्ध ' एवं शीतर वायु चलती रदती है । 
वर्ह समी दर्मा निवास दै । वद वन वड़ा सुन्दर एवं 
खुखद द । वदा गोपिर्यो बड़े सुखे स्व ओर विचर सकती 
द । बन्दावनके मीतरी मागम ओर भी बरहुत-खे विचित्र प्यं 
मनोहर वन ई ॥ २४॥ 
तश्च गोवधैनो नाम नातिदुरे गिरि्मदान्‌। 
राजते दीर्धदिखये नन्दनस्येव मन्द्रः ॥ २५॥ 

षव्हौ गोवर्धन नामक महान्‌ पर्वत हैः जो उख वनसे 
, अधिक दुर नहीं दै । उसके वदे-बे दिखर द [ जेते नन्दन- 
वनके पास मन्दराचल्की ओौमा होती है, उसी प्रकार अन्दः 
घनके निकट गोवर्धन सुद्ोभित रोता ई ॥ २५ ॥ 


म्येचास्य मद(शालो न्यग्रो योजनोचदूतः । 


शीमष्टाभासते लिठभागे 


[ हरिवंरि. 


भाण्डीसे नाम शद्धे नीलमेध श्वाम्बरे ॥ २६॥ 
(उस वनके मध्यभागर्मे विशार याखा्थेति युयोभित एक 
चरगदका व्रक्षदैः जो एक योजन ऊँचा ६।उस्का 
नाम है माण्डीर वट । वह अकरा द्याम मेते समान 
शोमा पत्ता दै ॥ २६ ॥ 
मध्येन चास्य किन्दी सीमन्तमिव कुर्वती 1 
श्रयाता नन्दनस्येव नलिनी सरितां षरा ॥ २७॥ 
नते नन्दन वनके वीम सरितार्थमिं शरेष्ठ नलिनी 
प्रादित रोती है, उशी प्रकार बृन्दावनके मध्यभागं सीमन्त- 
सा बनाती हद काडिन्दी बहती दै ॥ २७ ॥ 
सत्र गोवर्धनं चैव भाण्डीरं च वनस्पतिम्‌ । 
कालिन्दी च नर्द रम्यां द्रक्ष्यावश्चरतः सुखम्‌ ॥ २८ ॥ 
प्टमलोग वरहो चक्छनेपर गीवर्धन पर्वतः भण्डीर वट 
तथा रमणीय कालिन्दी नदीका सुखपूर्वक दर्शन करगे ॥२८॥ 
तवायं करप्यतां घोषस्त्यज्यतां निर्गुणं वनम्‌ । 
संत्रासयावो भद्रं ते किञ्चिदुत्पाद्य कारणम्‌ ॥ २९. ॥ 
धवी चलकर इस बजको वस्राया जाय जीर इस गुणद्ीन 
वनको छोड़ दिया जाय | मैया { आपका मल हो, कोर 
नवीन कारण उत्यन्न करके हम इन वजवाधिर्योको दयर्वे" | 
पवं कथयतस्तस्य वासुरेवस्य धघीमतः। 
प्रदुर्वभूुः शतशो र्रमांसवसाशनाः ॥ २० ॥ 
घोरश्चिन्तयतस्तस्य  स्वतनूरुदजास्तद्‌ा 1 
विनिष्येतुभयकसः सर्वषः शतशो वृकाः ॥ ३१ ॥ 
बुद्धिमान्‌ वसदेवनन्दन श्रीकृष्ण एसा कद दी रदेये किं 
उनके रोम-रेमसे सकद भयानक भेदिये उस्न दने ख्ये, 
जो स्कः मांख यर वाका आदार करनेवाठे ये । उनके 
चिन्तन करते ह्य सव ओर सैकड़ों भयंकर धृक निकठ 
पदे ये ॥ ३०-३१ ॥ 
निप्पन्ति स्म वहयो व्रजस्योत्सादनाय वै। 
दकान्‌ निष्पतितान्‌ दष्टा गोपु वत्तेष्वथो चु ॥ ३२ ॥ 
मोपीयु च यथाकामं चज चासोऽभवन्महान्‌ । 
त्रजकरो वद्यँति उजाडनेके च्वि जव श्रीकूण्णश्री इच्छाके 
अनुखार वहूत-से मेद्धिय प्रकट दने लगे, तव उन्हें देखकर 
गौ्ओं, व्र, मनुष्यो तथा गोपाङ्गना्थमिं अथवा-्यो कषये 
सम्पूरणं बजने महान्‌ त्रास छा गया ॥ ३२३ ॥ । 
ते वृकाः पञ्चवद्धाश्च दरावद्धास्तथा परे ॥ दरे 
निदाद्विद्यतिवद्धाश्च शतवद्धास्तथा परे।, 
निश्चेरस्तस्य गारेभ्थः श्वीवत्सङृतलक्षणाः ॥ २४ ॥ 
भे मेदिये पोच, दसः वीस, तीस तथा सीसके चंड. 
वनाकर्‌ श्री्ृप्णके अङ्गसि निकल रदे थे । ये सभी श्रीवत्छके 
चिते बुगोमित ये ॥ ३३-३४ ॥ 


| वषयप 1] 


नवमोऽध्यायः 


= ऋ ~+ 


२२२७ 


"न ---------------------------=-----------~- 


छृष्णस्य ष्णवद्ना गोपानां भयवर्धनाः। 
भक्षयद्धिश्च तैवैत्ताखासयद्धिश्च मोवजान्‌ ॥ ३५ ॥ 
निरि वालान्‌ हरद्धिग्ध इकैरुःसायते बजः 1 

श्रीकृष्णके अङ्खोसे प्रकट हए व काले मुखवाले वृक 
गोर्पोका भय वदा रदे थे । वे वख्ड़ँको खा -जति, गौभेकि 
्ुंडको चास देते तथा रातमे वाटर्कोकरा अपहरण कर लेते 
ये | इस प्रकार मेडियोदाया वह ब्रज उजाड़ा जने ख्या ॥ 
न वते हाक्थते गन्तुं न गाश्च परिरक्षितुम्‌ ॥ २६॥ 
न चनात्‌ किविदादर्तु न च वा तरितुं नदीम्‌ । 

उस समय वनम जाना, गौर्ओंकी रक्षा करना; वनसे 


कोई वस्तु ठे आना अथवा नदीको पार करना असम्भव 

हो गया ॥ ३६४ ॥ 

श्रस्वा हाद्धि्रमनसो ऽगतास्तस्सिन्‌ वनेऽवसन्‌॥ २७ ॥ 

पवं इृकैव्दीर्भस्त॒ न्या्रतुल्यपराकरमैः । 

जो निष्पन्दचेष्टः स पएकस्थानचरः शृतः ॥ ३८ ॥ 
वे सवर-के-सव मयमीत ये, उनका चित्त उद्विग्नष्टो 

गयाथा) वे कदं मी आ-जा न सके ¦ उरके मरि केवर उस 

वर्म हयी व्रैठे रहे । इस प्रकार वदे हए ग्याप्रवुल्य पराक्रमी 

मेदिनि सारे वरजक्रो निर्चेष्ट तथा एक स्थानमे ही सीमित 

रदनेवाला वना दिया ॥ ३५७-३८ ॥ 


इति श्रीमहाभारते खिरुमागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि शिश्चचयौयां दृकदशंनेऽष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ए 
इस प्रकर श्रीमहाभारते छिरभाग दखििके भम्तम॑त विष्णुषवने बारूसीरुक प्रस्नमे वुकदर्शनवरिषयफ आवे अध्याय पुरा दुभ ॥८॥ 
-----ग्त्कीषनकी0---- 
नवमोऽध्यायः 
मेडियोके उत्पातसे बजबासि्योका उस खानको छोडकर श्रीबन्दावनममे जाना 


वैद्म्पायने उवाच 


पवं वृका तान्‌ षट वध॑मानान्‌ दुरासदान्‌ । 
सस्मीपुमान्‌ स घोपो वे समस्तोऽमन्नरयव्‌ तदा॥ १ ॥ 
वैशम्पायनजी कहते है--जनमेजय ¡ इस प्रकार 
उन दुर्जय मेदिर्योको बदृते देख समस्त रजके खी पुरुप एकन 
ष्टो उस समथ इस प्रकार मन्नणा कणे स्मो-॥ १॥ 
स्थानेन न मः कायं बजामो.ऽन्यन्मदद्धनम्‌ । 
यच्छिवं च सुखोष्यं च गवां चैव सुखावदम्‌॥ २ ॥ 
अर र्मे इष स्यानपर्‌ रहनेकी कोई आवदयकता नहीं है । 
हम लोग दूसरे किसी विशा वने चले चर्ले, जो दमारे थि 
कल्याणकारी, सुपूर्वक रहने योग्य तथा गौओके स्थि मी 
सुखदायक दो ॥ २॥ 
अथैव फ चिरेण स्म जजामः सह्‌ गोधनैः 
यावद्‌ दृरकेर्वधं धोरं न नः स्वो बजे जजेव्‌ ॥ ३ ॥ 
धविन्भ्तर करनेसे क्या छम १ हम आज दही अपने गो- 
धर्मक साय यहेसि चठ द | मेडिरयोधे हमारे सारे वरजका 
भयंकर वध न हो जाय-दस्के पहले ही दर्म यदसि प्रस्थानं 
कर देना चये ॥ ३ ॥ 
पषां धूम्रारुणाङ्गानां दष्टिणां नखकर्षिणाम्‌ 1 
घृकाणां छृष्णवक््राणां विभीमो निशि ग्जताम्‌॥ ४७ ॥ 
“न भेदियेकरि सरे अङ्ग धूमिरु ओर त्र रंगके 
इनके वदी-बड़ी दाद ह । पे नखि वकोट लेते ई । इनके 
मृख कलि ह ओर शतके समय ये मीषण गर्जना करते है] 
हमं एनसे बङा भय गत्ता हे ॥ ४ ॥ 


मम पुरो मम खाता मम वत्सोऽथ गौर्मम । 
घृकैव्योपादिता शेवं क्रन्दन्ति स्म गृहे दे ॥ ५॥ 
'वर-घरकी लिर्यो करणक्रन्दन करतो हई यो कहती ई कि 
हाय | इन मेडि्योने मेरे पुत्रको, मेरे मार्ईको, मेरे वकृडेको 
ओरमेरी गायको मार डाला रैः ॥ ५॥ 
तासां रुदितश्न्देन गवां हंभारवेण च। 
नजस्योत्थापनं चक्ुर्घोषवृद्धाः समागताः ॥ ६ ॥ 
उनके रोनेके शब्दसे ओर गर्यो रमानेते चिन्तित हो 
एकत्र हुए. त्रजके बद्ध पुरर्पोने ्रजक्रो बहति उछ देनेका ही 
निश्चयक्रिया।६॥ 
तेषां मतमथाक्षाय गन्तुं बृन्दावनं भरति। 
जस्य विनिवेदाप्य गयां चैव हिताय च ॥ ७ ॥ 
इन्दावननिवासाय ताञ्ज्ञात्वा ङतनिश्चयान्‌ । 
नन्दगोपो दृहद्ाफ्यं वृहस्पतिरिवाददे ॥ ८ ॥ 
जव नन्दजीने इन्दावनमे जनके व्यि उनफरे मतकरो जान 
लिया तथा नजकरो नयी जगह वणाने एवं मौभकि हितके स्थि 
हन्दावनमे निवास करके निमित्त उन स्के दद्‌ निश्वयको 
समञ्च छया, तव वे वृहस्पतिके समान यह मह्पूरणं वचन 
बोले-) ७-८ ॥ 
अधैव रिश्वयपािर्यदि गन्तन्यमेव नः। 
शी्रमाक्षाप्यतां घोषः स्गीभवत मा चिरम्‌ }! ^ ॥ 
'यदि यह बात निश्चित हो गयी ओर हयै जाना ही 
होगा तो आज दही याना कर देनी चाहिये | सीघही सरे 
न्रजमे यह अदद दे दिया जाय कि तुम सव लोग शीघ ही 
यहि परस्थानके व्थि तैयार दो जोओ, देर न करोः |९ ॥ 


२३८ 


आीमदाभारते खिछभागे 


ततोऽवघुष्यत तदा घोपे तत्‌ प्राकृतैर्जनैः! 
शीघ्रं मावः प्रकटप्यम्तां भाण्डं समभिसेष्यताम।॥ १०॥ 
चत्सयूथानि काल्यन्तां युज्यन्तां शकटानि च । 
घृन्दावनमितः श्यानान्निवेराय च गम्यताम्‌ ॥ ११॥ 
फिर तो भ्राक्रेत जनोद्वारा त्रजमे यह घोणा करा दी 
गयी कर ध्रजवासियो ¡ शीघदी गौञोको तैयार करलो। 
अपने वत्त॑न-मोडको छकडपर खद लो । बरखडके समूर्दोको 
अभी दक दो | गाडि्यो जोतो ओर यदेषि वृन्दावन रहनेके 
च्ि प्रस्थान करोः ॥ १०-११ ॥ 
तच्छुत्वा नन्दगोपस्य चचनं साधु भाषितम्‌ । 
उदतिष्ठद्‌ व्रजः सवः शीघं गमनलखालसः ॥ १२॥ 
नन्दगोपका कदा हुमा यह उत्तम वचन सुनकर सारे 


व्रनके लोग जानिके ल्वि उस्सुक दयो शीघ्र ही उर खेदे 


हुए ॥ १२॥ 
प्रयाद्यत्तिष्ठ गच्छामः कि दोषे याहि योजय 1 
उधिष्टति चजे तसिन्‌ गोपकोखाहटे दभूत्‌ ॥ १३॥ 


इस प्रकार जव वह वरज वर्हे उठने ठ्गाः तव गोपोका , 


कोला इस तरह युनायी देने स्गा--अरे ! चलो, उटठोः 
हम सव्र रोग चख र्दे ई+क्यासोरदे दो, जाओ, छकड़ा 
जोतोः ॥ १३ ॥ 
उच्तिष्ठमानः शमे शक्रटीदाकरस्तु सः। 
व्या्रथोपमदाघोपो घोपः खागरघोपवान्‌ ॥ १४॥ 
गादिर्यो ओर छकख युक्त वह वरज जव्र वदेसि उठकर 
चला, उस समय एेसा भयंकर कोलाहल हआ; मानो वर्हे 
न्याघेकि ददाड्नेकी भारी आवाज दो रयै दो अथवा समुद्रकी 
गर्जना सुनायी देती हो ॥ १४॥ 
गोपीनां गर्गरीभिश्च चोत्तम्भितेर्षटेः। 
निष्पपात जात्‌ पक्तिस्तारापंक्तिरिवाम्बयत्‌ ॥ १५॥ 
सिरपर माट ओर घड़े उठये गोपिरयोकी पक्ति जवर त्रन- 
से निकली; उस समय एेखा जान पड़ा; मानो आकाश्यसे 
तारार्ओंकी पति उतर आयी दो ॥ १५ ॥ 
नीरुपीतारणेस्तासां = वस्ैरम्स्तनोच्चतेः । 
श्यक्रचापायते पंक्ति्गापीनां मार्गगामिनी ॥ १६॥ 
उनके नीरे, पीठे जर दाल वल सतनौके अग्रमागपर 
ऊँचे दिखायी देते थे | उन व्ल॑सि सुयोभित हो मार्गपर 
चरती हुई गोपिर्योकी पक्ति इन्द्रधनुषके समान शोमा 
पाती थी ॥ १६॥ 
दामनीदामभारेश्च केचित्‌ कायावरुम्विभिः। 
मोपा मागंगता भान्ति सावयोहा दव द्रुमाः ॥ १७॥ 
कछ गोष मोरी ओर पतली रस्सियेकि बोघ ल्यि मार्म- 
म चरु रे थे । वे रस्िर्यो उनके अ्गोपर ठ्टक रदी थीं | 


५ 
| 


उनसे उपलक्षित होनेवाङे वे गोपः बयोर्टौसे युक्त व्धृक्चके 


समान प्रतीत होते थे ॥ १७ ॥ 


ख वजो वजता भाति श्षकटौधेन भाखता । 

पोतैः पवनविक्षिपरनिष्पतद्धिरिवार्णवः ॥ १८॥ 
अगि वदते हुए सीमाशाखी नकटोके खमूहसे उस त्रज- 

कीणेखी रोभादो री थीः मानो प्रवनकी प्रेरणासे 

वेपपू्वक चरते हुए असंख्य जल्पो ( जहा्जो ) से 

युक्त मष्टासागर सुशोभित हदो रहा दो ॥ १८ ॥ 

क्षणेन तद्‌ बजस्यानमीरिणं समपद्यत । 

दरन्याचयवनिधूंतं कीणं चायसमण्डलेः ॥ १९॥ 
शक ही क्षणम नजका वह स्थान ऊसरभूमिके समान 

सूना हो गया ! वहो जो अन्न आदि द्रव्येकि कण विद्रे 

हुए ये, उनके कारण उस स्यानपर कौर्जौकी मण्डटी छा 

गयी थी ॥ १९॥ 

ततः क्रमेण घोषः ख प्राप्तो बृन्दावनं वनम्‌ । 

निवेत्तं विपुलं चक्रे गवां चैव हिताय च ॥ २०॥ 
तदनन्तर क्रमशः अगे वदता हुआ वह्‌ व्रज इन्दावन- 

म जा पर्हूचा ओर मौेकरि दितके स्यि वदत दूरतक फैख्कर्‌ 

वस्त गया 1 २० ॥ 

श्कावतंपय॑न्तं चनद्राद्धीकारसंस्थितम्‌ । 

मध्ये योजनविस्ती्णं॑तावदृद्धियुणमायतम्‌ ॥ २१॥ 


सीमापर छक्के बाड खगा दिये गये । सारा त्र. 


अर्धचन्द्रकी आङ्तिमे स्थित दौ गया।| त्रीचके भूभागकी 
चौड़ाई एक योजन अओौर ठंबाई दो योजनकी थी " २१ ॥ 
कण्टकीभिः पद्ृद्धामिस्तथा कण्टकितद्रुमेः 
निखातोच्ितदणखाग्रैरमिगुरतं समन्ततः ॥ २२॥ 

वदी हुई कण्टकी ( नील्कटि आदि) तथा लाखाग्रमागः 
को चि रखकर गाढे गये कोट्दार वृक्षक द्वारा वह वरन 
चारो ओस्ते सुरक्षित था ॥ २२॥ ` 


मन्धैरायेप्यमाणेश्च  मन्थवन्धायुकर्पणेः। 
अद्धिः पक्चाल्यमनाभि्गंगं रीभिरितस्ततः ॥ ५२॥ 
कीलैरायेप्यमाणेश्च दामनीपाश्पारितेः। 
स्तम्भनीभि ताभिश्च शाकटः परिवर्तितैः ॥ २४॥ 
नियोगपादरासकतरगगेसीस्तम्भमूरथखु । 


खादनार्थं प्रकीणेश्च करकैस्दणसंकरटैः ॥ २५ ॥ 
दाखाविरङ्धर्बक्षाणां क्रियमाणेरितस्ततः 


श्ोध्यमनि्ं वां स्थानैः स्थाप्यमनेरुद्टखखैः-॥ २६॥ ` 


प्राङ्मुखैःसिच्यमानैश्च संदीप्यद्धिश्च पावकः । 
सवत्सचर्मीस्तरणे पयङकेश्चावरोपितेः ॥ २७ ॥ 
तोयमुन्तास्यन्तीभिः प्े्न्तीभिश्च तद्‌ वनम्‌ । 
हाखाग्चाक्पषेमाणाभिर्गोपीभिश्च समन्ततः ॥ २८॥ 


[ हरिवंशे 


॥ 
1) 
} 


विप | 


दकशामोऽन्यायः 


२३९ 


युवभिः स्थविरे्ैव गेै््यध्रकरेशशम्‌ । 
विदसद्धिः कुटारेश्च काष्ठान्यपि तरूनपि॥ २९॥ 
तद्‌ वजस्थानमधिकं शुद्युमे काननावतम्‌ । 
रम्यं वननिवेशं वे स्वादुमूरुफलोदकम्‌ ॥ ३० ॥ 
_कदीं ददी-दूधके मामे मयानी डाली जा रही थी 
कीं मथानीमे वधी दं रस्मी खच जाती यीः कदी इधर 
उधर गसि या मार्योको जक्षे धोया जाता थाः करटी कीठ 
या टे गाढे जाते ये जिनमे मोरी-पतद्ी रस्ियो वैधी होती 
थीः कदीं ब्रहुत-सै खम्भे ख्डे किये जा रदे येः कीं छक्डे 
धुमायि जाते ये, कीं मन्थनपात्र या मार्य डले गये थम्भके चिरे 
पर रस्पर्यो बोधी जाती ्थोः कीं घर छानेके च्य संचित 
चयद्यो तथा तिनकोके समूह व्रिखरे पड़े येः कही यत्-तन 
दृरक्षोकी शाखार्ओपर पशिर्योके रहने योग्य स्थान वनाये जाते 
थे, कीं गौर्ओके रहनेयोग्ध स्थार्नोकी शोध हौ रही थीः 
कदी ओख्िया रखी जाती यीः उन्दै पर्वामिमुख करके धोया 
जा रहा था, कदी आग जटायौ जाती थी, करीं छकरडौपरसे 
( अपनी मौतसे मरे हुए ) वख्डेकि चर्मसे निमित विक्नो- 
सदत पटंग उतारे जा रदे थे, कीं गोपिर्यो अपने सिरसे 
जलका षडा उतारती हुई उस वनक्री शोमा देखती थी, ङुछ 
गोपाज्ञनार्णँ स ओर धूम-धूमकर दृ्षौकी ड्या खीच रही 
थीः क्रया वृह, क्या जवान, समी गोपेकि दाथ कायरम अयन्त 
व्यस्त ये, वे कुटारोखि काठ ओौर बकषोको भी काट रदे थे। इन 
सवके कारण वनसे धिरा हुआ वद व्रजका स्थान अधिक 
शोमा पारदा था । ब्रन्यावनका वह रमणोय प्रदेश स्वादिष्ठ 
फल, मूख ओर जल्ते सम्पन्न था ॥ २३-२०॥ 
तास्तु कामदुघा गावः सर्वपक्षिरुतं वनम्‌ । 
चृन्यावनमयुप्राप्ता नन्द्नोपमकाननम्‌ ॥ ३१॥ 


जजकी वे समी कामधेनु गौर समसत पश्ि्योके कलरवेि 
मुखरित ओर नन्दन-ए् कानि युक्त बृन्दावन ' पुव 
गयीं ॥ ३१ ॥ 
पूर्वमेव तु कृष्णेन गवां वै हितकारिणा । 
शिवेन मनसा दष्टं तद्‌ वनं वनचारिणा ॥ ३२ ॥ 
वनम विचरनेवाऊेः गौ्भकि हितकारी श्रीकृष्णने पके 
दी अपने मनसे कल्याणचिन्तनपूर्वक उस वनको देखा 
था ३२॥ 
पश्चिमे तु ततो रूक्षे धमे मासे निरामये । 
वर्ष॑तीवाखतं देवे तृणं त्न व्यवर्धत ॥ ३३ ॥ 
अतः यथपि उस समय वहत ही रूखे गमींके महीनेका 
अन्तिम भाग ( अग्राद्‌ ) व्रीत रहा थाः तो भी वरहो धास- 
पात ब्रहुत ब्रदने ल्गाः मानो इन्द्रदेव वहां अमृतकी 
वर्षा कररदेर्ह॥ ३३॥ 
न तत्र वत्साः सीदन्ति न गावो तेतरे जनाः । 
यत्न तिष्ठति लोकानां भवाय मधुसूदनः ॥ ३४ ॥ 
जर्हो भगवान्‌ मधुसूदन सम्पूणं ॒विदवके हितके ल्ि 
विराजमान थे, उस इन्दावनमे न तो वख्डे कमी शिथिल 
दोतेथेः न गौण कष्ट पाती थींओरन दूरे दी सेर्गोकौ 
कमी दुःखका अनुभव होता था ॥ २४ ॥ 
ताश्च गावः स घोषस्तु स च संक्पंणो युवा । 
छरष्णेन विदितं वासं तमध्यासत निर्दता; ॥ ३५॥ 
वे गौर वह व्रज तथा वे तरण वीर वलरामजी सव-के- 
सव श्रीकृष्णद्वारा विहित उस निवाघस्थाने वदे आनन्दसे 
रहने ल्ग ॥ ३५॥ 


इति श्रीमहाभारते खिरुभागे हरिव विष्णुपर्वणि बृन्दावनप्रवेदो नवमोऽध्यायः ॥ ९ ५ 
रस प्रका श्रीमहामारतते दिरमाग हरिवंशे अन्तमेत विष्णुपवमे श्रीवृन्दाजन-परेशतरिषयक नवे; अध्याय पूरा हुमा ॥ ९॥ 
[यि \ 


द्रामोऽध्यायः 
वपा छतुका वर्णन 


वैश्रम्पायन उवाच 
तौ व॒ बृन्दावनं प्राप्तौ वसुदेषद्धताढभौ । 
चेरतुर्वत्सयुथानि चारयन्तौ सखरूपिणो ॥ १ ॥ 


वेशम्पायनजी कहते है--जनमेनय. ¡ इन्दाव््म 
परुचकर वयुदेवजीके वे दोनो पुत्रः जो वृहत ही खुन्दर ये 


बछर छंडोको चरते दए वरहो सव ओर विचरन. 


स्मो ॥ १॥ 


पूर्णस्तु धर्मसमयस्तयोस्तत्न. वने सुखम्‌! 
करीडतोः सद गोपयंञुनां जावगादवोः ॥ २ ॥ 


ठृन्दावनमे रहकर ग्वाल-बारछोके साथ क्रीडा नौर 
यमुना-स्लान करते हुए उन दोनो मादूर्योका ओीप्म-मांस 
सखपूर्वक वीत गया ॥ २ ॥ 
ततः प्राङृडनुभ्राक्षा मनसः कामदीपिनी । 
भववपुमहामेधाः शक्रचापा्कितोद्राः ॥ ३ ॥ 

तदनन्तर मनकी कामनाको उरीणित करनेवाटी वर्षा 
रू आ परहुची । मे्घोकी भारी घटा पिर आयी ओर वर्षा 
करने लगी 4 उन मेर्षौके मध्यभाग इनद्रधनुषसे अङ्कित 
दिस्नायी देते ये ॥.३॥ 


२४० 


शीमदाभास्ते सिखभागे 


[ एव 


वभुवादरनः सुयो भूमिश्चादरशना दणेः । 
पतता मेघवातेन नवतोयायुकर्षिणा ॥ ४ ॥ 
सम्मार्जिततखा भूमिर्यौवनस्थेव लक्ष्यते ॥ ५ ॥ 
( मैधोकी आद्भे छि हुए ) सूर्यक्रा दशन नदीं हो 
पाता था । घास इतनी बद्‌ गयी कि धरती भी अदृश्यो 
रायी । नूतन जखरारिको वीच लछनेबाठे मेषरूपी वायुने 
भूतल्को क्षाड्-बुहार ओर भोकर साफ कर दिया । उस 
समय भूमि एेखी दिखायी देती थी? मानो उसकी युवावस्था 
आ गयी हो 1 ५५॥ । 
नववपौवसिक्तानि शक्रगोपफुखानि च 1 
नष्टदावाग्निधूमानि वनानि भ्रचकादिरे ॥ £ ॥ 
इन्द्रगोप नामक कीट नूतन वषकि जल्पे मीग रदे ये। 
वनप्रान्तके दावानल ओर धूम नष्ट हो गये येः इषस उन 
घर्नोकी बड़ी दोभाद्ो रदी थी॥६॥ 
चत्यव्यापारकार्श्च मयुराणां कलापिनाम्‌ । 
मदरक्ताः प्रवृत्ताश्च केकाः पटुरवास्तथा ॥ ७ ॥ 
वढे-वडे प्॑खो ८ कल्पो ) से विभूषित मयूरौके खत्य- 
व्यापारका समय आ पर्हुचा था; अतः उनकी मदमत्त दशाकी 
मधुर वाणी बड़ी पटुताके साथ श्रवणगोचर होती थी ॥ ७ ॥ 
नवप्रादृषि कान्तानां पट्‌ पदाह।रदायिनाम्‌ । 
यौवनस्यकदम्बानां नवाभ्रैश्रीजते वपुः ॥ ८ ॥ 
नूतन वर्म जिनकी कमनीयता वद्‌ गयी हैः जो 
श्रमरोको आदार प्रदान करते तथा युवावस्थार्मे आ पर्हचे 
हैः उन कदम्ब-इरकषोका आकार नये बादरटैकरि अनिखे अधिक 
शोमा पने ल्गा॥८॥ 
हसितं कुटजेवदः कदम्बैवौसितं वनम्‌ । 
नादितं जक्दैरप्णं तोषिता वसुधा जैः ॥ ९ ॥ 
कुरजके वृरकषोनि अपने पूछत वरहो सव्र ओर दास्यकी 
छख्यचिटका दौ । कदर्म्बोनि उक्ष वनर्मे सुगन्ध भर दी। 
चादखनि गर्मी मिया दी ओर जल्की धारा्ओनि वसुधाको 
पूर्णतः वृक्त कर दिया ॥ ९ ॥ 


संतप्ता भास्करकरेरभितप्ता दवाग्निभिः। 
जंेर्वरादकोत्रुच्खवसन्तीव पर्वताः ॥ १०॥ 


जो सूर्य॑कौ क्रिरणेखि संतप्त तथा दावानल्वे दग्ध दो 
गये येः वे पर्वत मेर्धरके चरसयि हए जल्ते अभिषिक्त ष्टो 
पुनः सखोषसीलेनेस्मे॥ १०॥ 
महावातसमुदधतं महामेघगणार्पितम्‌ । 
महीमदाराजपुरैस्तुल्यमापद्यते नभः॥ ११॥ 
उठी हुई प्रचण्ड वायु पताकक्रे समान फदर रष्टी थी 
अे-बदे मेषघोके समुद्राय प्राखादों ( म्ल ) के समान्‌ प्रतीव 


होते थे ¡ इत पकार आकाश भूतल्के महारा्जोके नगरके 
समान खर्प धारण क्यिथा॥ ११॥ 
कचित्‌ कटम्बहासाठ्थं शिरीन्धाभरणं कचिद्‌। 
सम्प्दीप्तमिवाभाति फुल्टनीपद्रुमं चनम्‌ ॥ १२॥ 
कहीं कदम्बका विक्रास हासकरी-सी छ्य व्रिखेर रहा 
था} कही भदफोड या गोत्रर-छत्ता आभूष्रणके समान होमा 
देता था । जगह-जगह नीपके शकष खिले हृष्टये। हन 
सवके कारण वृन्दावन अत्यन्त दीपिमान्‌-सा प्रतीत होता 
था॥ १२॥ | | 
पेन्द्रेण पयसा सिक्तं मारुतेन च ॒षिस्ठतम्‌ । 
पार्थिवं गन्धमाघ्य खोकः श्ुभितमानसः ॥ १३॥ 
इन्द्रदेवके वराये हए जल्से अभिषिक्त तथा वायुसे 
विन्लारको प्राप्त हुई प्रथ्वीकी सधी सुगन्ध सधरकर लोर्गोका 
मन श्षुन्ध ( कामविक्रारसे युक्त ) हो उठता था ॥ १३॥ 
हत्तसारङ्गनदेन दरदुरव्याहतेन च। 
नवैश्च दिखिविक्ठैरवकीणौ वयुन्यसा ॥ १४॥ 
मतवा भ्रमरोके गुंजारव, मेटकोँकी ध्वनि तथा मोर्योकी 
मूतन केकावा्णीवे वहोकी मृमि गज रदी थी ॥ १४॥ 
आरमत्ृणंमहावतौ वकपराप्तमहारयाः। 
हरन्त्यस्तीरजान्‌ श्ृक्षान विस्तारं यान्ति निम्नगाः॥ १५॥ 
नदिरयमिं तीव गति ब्रड़ी-बड्ी वरे उठरहीर्थी। 
वर्षाके कारण उनका वेग महान्‌ हयो गया था वे तट्वर्ती 
दृरकषोको बहटा ठे जाती थीं जीर क्रमशः विस्तारको प्राप्त शे 
रहीथी॥ १५1 
संततासारनिर्यत्नाः द्िन्मयत्नोत्तरच्छदाः । 
न त्यजन्ति नगाध्राणि श्रान्ता इवं पतत्त्रिणः ॥ १६॥ 
निरन्तर जल्की धारा वररनैके कारण जो उद्मक 
प्रयल्न्मे असफल दो गये येः भिनक्रे ऊपरी पंख रिथिल- 
प्रयास होकर काम नहीं दे पतियेः वे पक्षी थकरे-मेदिके 
समान वृर्घोकी शाखा्भेकि छोड़ नहीं रहे थे ॥ १६ ॥ 
सोयगम्भीरलम्बेषु खवत्सु च नदत्सु च । 
उदरेषु नवाश्राणां मञनतीव दिवाकरः ॥ १७॥ 
सूर्यदेव नूतन जल्धारयौके उन्मि, जो जल्के कारण 
सघन ओर फेरे हुए ये तथा वषि खाय गजना मी करते ये 
दभबते-से जा रहे ये ॥ १७ ॥ . 
महीरुदैरुत्पतितैः  सलिखोत्पीडसंकुला । 
अन्विष्यमागौ वसुधा भाति शद्वकमाटिनी ॥ १८ ॥ 
भूमि एक तो घ्राहते ठकी हुई थीः दुरे जल्के प्रवादमे 
द्भव गयी थी; रस्तोका पता चलना कठिन हो गया याः 
मगर किनारे उगेष्ुए वृष्षपि दी उन मार्गोकोरदरदाया 
पाया जा.सकता था ॥ १८ ॥ 


+ 


विष्णुपवे ] 


दशमो.ऽन्यायः 


२५१ 


न्द =------- 


वज्रेणेवावरुग्णायां नगानां नगदालिनाम्‌। 
स्नोसोभिः परिषृश्वानि पतन्ति शिक्लसयाण्यघः ॥ १९ ॥ 
बृक्षौसे शुशोमित होनेवाठे पवर्ते शिखर जलकरे 
श्ोतेसि करकर नीचे गिर रदे थे; रेता जान पडता थाः 
मानो वे पर्वत वरे प्रहारे विदीर्ण हो गये] १९॥ 


पतता मेधवर्ेण यथा निस्नाुसारिणा 1 
पल्वलेोत्कीर्णमुकेन . पूर्यन्ते वनराजयः ॥ २०॥ 
मर्घोकी करपाका जर नीचे गिरकर नीची भूमिका 
अनुसरण करता दुमा ग्म जाता था { उऽके भर जानेषर 
उससे निकटकर बरहर फैक्ता था ओर सारी सनपरेणियोको 
आप्लावित कर देत था ॥ २० ॥ 
हस्तोचद्तमुखा घन्या मेधनादायुसारिणः । 
आन्तातिवृष्ट्या मातङ्गा गा गता इव तोयदाः॥ २९॥ 
अस्यन्त वपौति भ्रान्त हुए जेगटी हाथी सूंड ओर्‌ महको 
ऊपर उठायि मेघकी गर्जनाका अनुकरण करते ( गर्जति >) थे। 
उस समय वे एृथ्वीपर उतरे हए मूर्तिमान्‌ मेधके समान जान 
पडते थे ॥ २१॥ 
भावृट्भदृि संशय दष्टा चम्बुधरान्‌ घनान्‌। 
सैदिणेयो मिथः काले कृष्णं वचनमव्रवीत्‌ ॥ २२॥ 
वषा ऋतु आ गयी ओर आकराशमे चादर प्रिर अयि 
यह देकर रोहिणीनन्दन व्रलरामजीने श्रीङकप्णसे यह्‌ 
सामयिक वात कटही--\ २२॥ 
पय छृष्ण घनान्‌ कृष्णान्‌ व्ररकोञज्वङमूषणान्‌ ] 
गगने तव गाक्रस्य वर्ण॑चोरान्‌ खमुचिद्ूतान्‌. ॥ २३ ॥ 
शरीहृष्ण [ भाकारामे उन ऊचे उठे हुए काठे बादर्ल- 
कोतो देखो; जो वकप॑क्तिरूपी उज्ज्वल हार्सि विभूषित 
2 ! वे वुम्हारी अङ्गकान्ति चुराे ठेते दै ॥ २३॥ 
तव ॒निद्राकरः कालस्तव यश्रोपमें नभः। 
त्वमिवाक्षातवसति चन्द्रो वसति वार्षिकीम्‌ ॥ २७॥ 
ध्य्‌ वुम्हरि नदि ठेनेका समय है# । काले मेके 
कारण आकारा वु्हारे अर्के समान दयामवर्णक्रा दिखायी 
देता है तथा वर्षा श्रतर्मे चन्द्रमा मी दम्दारी तरह अज्ञात- 
वास कर रे है ॥ २४॥ 
पतन्नीङाम्बुदश्यामं नीरोत्पखदलप्रभम्‌ । 
सम्पाते दुर्दिने के दुर्दिनं भाति वै नभः ॥ २५॥ 
“जो काठ मेके छा जानेसे इयाम दिखायी देता है तथा 


जिसकी अभा नीर कमलदलकरे समान हो. गयी है, बह 
[यि जज ० 


& वर्षाकि नार्‌ मौनम मगवान्‌ विष्णु दायन करते रै-- 
यद पुरःणप्रिड बात है तथा दपः दरि्॑श्मे भो श्सवी चनी 


भा जक दि) 


माकाश दुर्दिन ८ वर्षाकरा समय ) अनिपर खयं भी दुर्दिन 
८ मेघाच्छन्न दिवस ) -सा प्रतीत दोता है ॥ २५ ॥ 
पद्य छृष्ण जन्रोदैः छृष्णैखुद्भ्रयितेधेनेः । 
गोवधनो यथा रम्यो भाति गोवधेनो गिरिः ॥ २६१ 
श्रीकृष्ण ¡ देखो, जल्ते भरकर परस्पर गुथ हुए इन 
काले बादलसे मौर्मकी वृद्धि करनेवाल् गोवर्धन पर्वत कैसा 
रमणीय प्रतीत होता दै ! ॥ २६ ॥ | 
पतितेनाम्भसा छेते समन्तान्मदद्पिताः । 
भ्राजन्ते छृष्णसारदङ्गाः काननेषु मुदान्विताः ॥ २७ ॥ 
शये छृष्णमृग चारो ओर जल गिसनेसे मदमत्त हो उटे 
है ओर आनन्दमग्न होकर काननीमे विचरते हुए शोभा पा 
रदे दै ॥ २७ ॥ 
पतान्यम्बुपरहष्टानि हरितानि मृदुनि च। 
तृणानि रातपत्राक्ष पत्रैगहन्त मेदिनीम्‌ ॥ २८ ॥ 
कमलनयन ! जल्ते अभिषिक्तं होकर दर्षोस्ल्णसमे भरे 
हुए. ये कोमल हरित तरण अपने पर्तेसि प्र्वीको ठक्ते जा 
रदे द ॥ २८ ॥ . 
क्षरज्जखानां शकानां वनानां जखदागमे । 
ससस्यानां च सीमानां न लक्ष्मीर्व्यतिरिच्यते ॥२९॥ 
भेर्घोके आनेपर जठ्के अरम ब्हानेवठे पर्व्तोकीः 
वर्नोकी तथा स्य ( दरी-भरी खेती ) से सम्पन्न सेतौकी 
ल्मी (शोमा ) एकन्खी हो र्दी दै । कीं न्यून या अधिकं 
नहीं है ( अथवा इन तीरनोकी शोभा इनसे प्रधक नदीं 
हेती है ) ॥ २९॥ ` 
रीघ्रवातसमुद्धूताः परोषितौत्छुक्यकारिणः । 
दामेपदरोद्दामरवाः प्रागर्भ्यं यान्ति तोयदाः ॥ ३० ॥ 
'्दामोद्र ! शीघ्रगामी बाधे प्रेरित दो ऊपर उठे हूए 
तथा परदेशे रदनेवाले पुरर्पौको धर्‌ आनिके स्यि उत्सुक 
तरनानेवले ये बादल प्रचण्ड गर्जना करते हुए अपनी 
प्रगद्मताका पर्िविय देते है ३० ॥ 
हरे हर्यद्ययापेन वर्णेन ननिविक्रम। 
विश्ाणज्येन रचितं तवेद्‌ मध्यमं पदम्‌ ॥ ३१॥ 
श्रिविक्रमसूप धारण करनेबाठे हरे ! बाण भोर प्र्ञ्चा- 
से रहित तिरंगे इन्द्रधनुषसे तुम्दारे मध्यम पद्‌ ( अन्तरिश्च ) 
का श्ृ्धार्सा क्रिया गया हे ।॥ ३१ ॥ 
नभस्येष नभश्चक्षुनं भवत्येव चरन्नभः ! 
मेधैः शगितातपक्षरो चिरद्िमरिव रद्विमिवान्‌ ॥ २२ ॥ 
“श्रावण मासमे आकराशके नेनखरूप ये अंशचमाली सूर्यं 
मभाहीनत दोकर आकाशम विचरते हुए अधिक रोना नहं 
पारदे द तथा वदरते आच्छन्न दोनेके कारण इनको 
तापशापिनी किरण शीषर षो गयी द ॥ ३९] 


4 


२४२ 


चावाप्रथिब्योः संसर्गः सततं विततैः ऊतः। 
अव्यवच्छिल्ञवारोधेः समुद्रौ धंसखमेधनैः ॥ २२॥ 
'आकायर्मे फौलकर समुद्रके जलप्रवाह-ते प्रतीत दोनेवलि 
इन वादेन अविच्छिन्नरूपसे जल्की धारा गिराकर अक्राश 
ओर प््वीको मानो स्के व्यि एक दूसरेके साय जोद़ 
दियाहे॥ ३३ ॥ 
नीपांनकदम्बानां पृथिव्यां चातिब्रृष्िभिः। 
गन्धः कोलादला वान्ति वाता मदनदीपनाः ॥ २४ ॥ 
८पृथ्वीपर अत्यन्त वर्षा होनेके कारण नीपः अर्जुन जर 
कदर्म्बोकी गन्धसे वासित हूर कोलाहट्युक्त वायु कामिर्योका 
कामोदीपन करती हुई बह रही दै ॥ ३४॥ 
सम्प्रवृ्तमष्टाव्षं टम्बमानमहाम्बुदम्‌ 1 
भत्यगाधमप्यन्तं ससागरमिवाम्बरम्‌ ॥ ३५॥ 
त्रदे जोरसे वर्धा आरम्भ हौ गयी है| व्दे-बदे मेष 
अरसनेके चि नीचेकरो छक अयि ह; जिनसे यद आकाश 
अथाह अनन्त महासागरते संयुक्त-खा प्रतीत होता दै ॥२५॥ 
धारानिर्मखनाराचं विदुत्कवचवर्मिणम्‌। 
शक्चपायुधधरं युद्धसज्मिवास्वरम्‌ ॥ २६॥ 
(जक धारा्ओका निर्मल नाराच, विद्ुत्रूपी कवच 
तथा इन्द्रधतुषरूपी आयुधको धारण विये हुए यह भक्राश 
युदधके स्थि सुसजित हुभा-्ा जान पढ़ता है ॥ ३६ ॥ 
शोखानां च वनानां च द्रुमाणां च वरानन । 
प्रतिच्छन्नानि भासन्ते दिखराणि धनेर्धनैः ॥ २७॥ 
“सुमख श्रीङृण्ण ! पर्वतौके शिखर तथा वनां ओर 
वष्ट दृरक्षोकी रिख घने बादर्लोसे आच्छादित होकर 
कैसी शोमा पा रही ई ॥ २७ ॥ 
गजानीकैरिवाकीर्णं - सलिछोद्वारिमि्धैनेः। 
व्ण॑सारूप्यतां याति गगनं सागरस्य च ॥ ३८॥ 
“अपनी सःोसि जर छोड्नेवाठे गजसमूटोकी भति इन 
काठे घने बादलोते आच्छादितं हुआ आकाश रंग-रूपरमे 
समुद्रके समान दो गया है ॥ ३८ ॥ 


धीम्ाभारते खिरभागे 


[ हरि्वंसे 


ष्य 


समुद्रोद्धतजनिता खोखशाद्खकम्पिनः 

शीताः सपृपतोदामा; ककैशा चन्ति मारुतः ॥ ३९ ॥ 
(समुद्रके दिख ठेनेसे उत्पन्न हो चखल घासोको कम्पित 

करती हु जलव्रिन्दुर्ओखदित उद्दाम गतिंसे चलनेवाटी 

शीतल एवं कर्कया वायु बह रही है ॥ ३९ ॥ 

निरासखु सुप्तचन्द्ासु मुकतोयासु तेयदैः। 

मग्रसूयंस्य नभसो न विभान्ति दिच्छो दश ॥ ४०॥ 
“जिनमे चन्द्रमा भी सये दुएे समान अद्द्य हो गये 

हैः बादरि पानी वरसाना आरम्भ कर दिया दै ओर 

आकादारे पूर्य मी दव चुके दै, एसी वरसाती ररत दो 

दिशार्ओौका कुछ पता नदीं चल्ता दै ॥ ४० ॥ 

चेतनं पुष्करं कोदौः श्चुधाध्मातैः समन्ततः । 

न धुणीनां न स्म्याणां विवेकं यान्ति कषयः ॥ ४१॥ 
प्सव्र ओर वायुतते मेर्ोद्ारा उपलक्षित आका चेतन-ख 

प्रतीत होता है किंसा्नोको न दिनका पता चल्ता दै 

नं रातका ॥ ४१॥ 

धर्मदोधपरित्यकतं मेधतोयविभूपितम्‌ । 

पद्य ब्रन्दावनं छृष्ण वनं चेरथं यथा ॥ ४२॥ 
श्रीकृप्ण | देखी, धामरूपी दोषे रहित ओर मेक 

ब्ररसयि हुए. जले विभूषित हमा दृन्दावन चै्रथ वनके 

समान शोमा पारहादैः ॥ ४२॥ 

पवं प्रबृदगुणान्‌ सर्वाज्रीमान्‌ कष्णस्य पूर्वजः। 

कथयन्नेव वङवान्‌ मजमेव जगाम ह ॥ ४३॥ 
इस प्रकार श्रीकृप्णके वदे भ्राता महावरटी श्रीमान्‌ 

चलराम वर्पाकालके गुणोका वर्णन करते हुए द्यी उनके खथ 

वरजम चठे गये | ८३ ॥ 

अन्योन्यं रममाणौ तु इ.प्णसंकर्पणावुभौ । 

तत्कालक्षतिभिः साद्धं चेरतुस्तद्‌ वनं महत्‌ ॥ ४४॥ 
एकं सरके साय खेलते ओर धूमते हुए दोर्नो भाई 

श्रीकरप्ण ओर संकर्परंण उस समयक भाईवन्धुञकि साथ उस 

विद्याल वनम विचरने ल्मे ॥ ४४॥ 


इति श्रीमहाभारते खिरुभागे हरिवंदो विष्णुपर्वणि भ्राव्रदवर्णने दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ 
शस प्रकार श्रीमहाभारते लिरभाग हसिदके अन्तर्गत ्रिष्णुणर्मे वर्का वणंनविषयक दसर्वे/ अध्याय पुर्‌ हुआ ॥ ५० ॥ 


॥ । ~---*००9६०~-- 


एकाददोऽ्यायः | 
भ्रीकृभ्णकी अङ्गच्छटा, भण्डीर वट, यमुना ओरं कारङियदहका वर्णन . - 
तथा भ्रीकृष्णद्वारा काडियनागके निग्रहका विचार ८ 


के्म्पाश्रन उवाच 
कदाचित्‌ तु तदा कृष्णो विना संकर्षणेन वै । 
चखार ठद्‌ वनं रम्यं कामक्पी वामनः ॥ १ ॥ 


वैश्म्पायनजी कहते ह-- जनमेजय ! एक दिन 
इच्छानुसार रूप धारण करनेवले सुमुख श्रीकृष्ण अपने माई 


खंकमरंणके ्रिना ही उस स्मणीय कृन्दावनरमे विचरन स्मे ॥१॥ 


विष्णुपर्व ] 


पकादसो ऽध्यायः 


२५६ 


नवव 


काकपश्वधरः श्रीमान्छ्थामः पद्यदलेष्णः। 
श्रीवत्सेनोरसा युक्तः शाशाडु इव लक्ष्मणा ॥ २ ॥ 
उन्होने मस्तकके पिले भागमे काकपक्ष ( वडबे 
कें ) धारण कर रखे ये । उनके नेत्र कमल्दल्के समान 
सुन्दर एवं विशार ये | वे इयामसुन्द्र छव्रिसे युक्त एवं 
श्रीसम्पन्न ये तथा वक्षःस्लमै श्रीवत्सचिह्न धारण करके 
शचि संयुक्त चन्द्रमके समान शोमा पते थे ॥ २॥ 


साङ्भदेनाग्रहस्तेन पट़्जोद्धि नवयंसा । 
खुकुमाराभिताच्रेण क्रान्तविक्रान्तगामिना ॥ २ ॥ 
वाजून्दते विभूपित हुए उनके हार्थोका अग्रनाग 
विकसित कमलके समान कान्तिमान्‌ था; उनके पैर सुकुमारः 
लमल ओर क्रान्त-विक्रान्त गतिसे चलनेवाे थे, जिनसे उनकी 
अनुपम शोमा होती थी ॥ ३॥ 
पीते प्रीतिकरे नृणां पडकिञ्चल्कसप्रभे । 
खुष्मे वसानो वसने सखसखंध्य इव तोयदः ॥ ४ ॥ 
वे कमल-केसरफे समान पीठे रगके दो महीन वश पहने 
हुए थः जो मनुप्योके आनन्दको बदानेवाटे थे { उन वस्रेको " 
धारण कसरनेबठे श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण संध्यक्राख्की खर्णिम 
आभासे युक्त मेधके समान सुशोभित होते ये ॥ ४ ॥ 
वत्सन्यापारयुकाभ्यां व्यग्राय यण्डरज्जमिः। 
भुजाभ्यां साधुदृत्ताभ्यां पूजिताभ्यां दिवौकसेः॥ ५ ॥ 
उनकी दोनो भजर खुन्दर, गो तथा देवतार्ओद्याय 
पूजित ्थी| वे त्रके व्यापार सैलग्न थीं ओर उनके गलते 
घँ धुर वोधनेकी रस्सियोसे उलश्ची दुई र्थी, एेसी भुजा्षि 
शरीङृणकी बडी शोमा दहो रही थी ॥ ५॥ 
खददां पुण्डरीकस्य गन्धेन कमखस्य च । 
रराज चास्य तद्‌ वाद्ये रुचिरौष्ठुरं सुखम्‌ ॥ ६ ॥ 
बास्य ( पोगण्ड ) अवश्यम सुन्दर ओटोते खुद्योभित 
उनका मुख कमलके सद्दा सुन्दर ओर उसीके समान गन्धे 
सुवाधित होकर अपनी अद्भुत योभा फैला रहा था ॥ ६ ॥ 
दिखाभिस्तस्य मुक्ताभी रराज मुखपङ्कजम्‌ । 
दतं ्रर्पदपंकतीभियंथा स्यात्‌ पञ्ममण्डलम्‌ ॥ ७ ॥ 
उनका सुखारविन्द खे अलकंसि आइत होकर एसी 
शोमा पा रहा थाः मानो भ्रमरावलि्योते युक्त कमलमण्डल 
सुशोभित हो रहा हो ॥ ७॥ 
तस्याज्युनकदस्चास्या नीपकन्द्लमालिनी । 
रराज माला शिरसि नक्षजराणां यथा दिवि॥ < ॥ 
उनके मस्तकरपर अर्जुन ओर कदम्बक पूति युक्त एक 
माल शोभापारही थी; जो नीपके पुष्पो तथा नूतन 
अंङकरोे सुशोभित थौ । वेह आकारर्म  तारिकार्ओक भोति 
अपनीख्यचिटकारदीथी॥८॥ ` 


\ 


स तया मालया वीरः श्युद्मे कण्टसक्तया । 
मेधमालाम्बुददयामो नभस्य इव मूतिमान्‌ ॥ ९ ॥ 
वैस ही माल उनके कण्ठमे मी पड़ी इईं॑थी, जिसते 
वीरवर धनश्याम श्रीकृष्ण मेषमालर्ओंकरी श्यामकान्तिते सम्पन्न 
मूर्तिमान्‌ माद्रपद मासकी मेति योभाषारदेथे ॥९॥ 


पकेनामरूपरेण कण्टसुत्रावरम्बिना । 
रराज वर्हिपत्रेण मन्दमारुतक्स्पिना ॥ १० ॥ 
उनके कण्ठगत सूरन एक निर्मल मोरपङ्क ख्यक रहा 
था; जो मन्दगतिसे बहनेवाटी वायुक्रे हर्के आधातसे हि 
रहा था । उस मोरपद्से भी उनके श्रीअङ्गोकी शोभाब्द्धि दो 
रही थी॥ १०॥ । 
कचिद्‌ गायन्‌ कचित्‌ क्रीडंश्चञचूयश्च कचित्‌ कचित्‌। ` 
पणैवायं श्रुतिखुखं वादयश्च कचिद्‌ वने ॥ ११॥ 
वे बनभ कहीं गते, कीं खेलते कहीं भ्रमण करते 
ओर कहीं कानोको सुख देनेवाला पत्तौका भाजा बजाते थे ॥ 
गोपवेणं खमधुरं कामात्‌ तमपि वादयन्‌ । 
श्रहमाद्नार्थं च गवां कचिद्‌ वनगतो ` युका ॥ १२॥ 
किसी समय वनमे जाकर तरूणरूप धारण करके गौर्भोको 
आनन्दित करनेके स्यि इच्छानुसार अच्यन्त मधुर खसे 
सुरटी बजाया करते थे जो उस समयक गोर्पोकरा प्रमुख 
वाद्य थी॥ १२॥ 
गोले ऽम्बुधरद्यामश्चचार धुतिमान्‌ पुः । 
रेमे च तत्र रम्यासु चिन्नास्ु वनराजिषु ॥ १३॥ 
नूतन जलुधरके समान श्याम एवं कान्तिमान्‌ भगवान्‌ 
श्रीकप्ण गोक्कुरूके आसपास विचरन तथा रमपीय एवं 
विचित्र वनश्रेणिर्योमे विहार करे ल्मे ॥ १३ ॥ 
मयूररवधुष्टाख . ` मदनोदीपनीषु च। 
मेधनाद्पतिव्यूदेनौदिताु समन्ततः ॥ १४॥ 
वहा ममूौकरी केकाध्वनि भूजती रहती थी. वे वन- 
पक्तियां कामी पुरर्पोके मनमे कामभावका उद्दीपन करनेवाली 
थं । येर््रोकी गजंनाकी प्रतिष्वनिर्सि वहो सवर ओर कोलाहल ` 
मचा रहता था ॥ १४॥ । 
चशाद्लच्छन्नमागौखु शिलीन्ध्राभरणासु च। 
कन्दरामक्पन्राञ्ु खवन्तीषु नवं जलम्‌ ॥ १५॥ 
उनके मार्ग घासंसि ठक गये थे । जगह-जगह उगे हष 
छच्नाक उनके आमूप्रण-से प्रतीत होते थे | उनमे नये-नये 


-परख्व अंकुरितं हो रदे थे तथा वे नूतन जल टपक्रा रही थी | 


केसराणां नवेगन्धेमंदनिःश्वसितोपमेः । 
अभीक्ष्णं निःष्वसन्तीघु कामिनीष्िव नित्यशाः ॥ १६॥ 
मदजनित निःश्वासके समान केसरोकी नूतन गन्धे वे 


२४४ 


धीमहाभारते लिकभागे 


| [ हिवि 


वनश्रेणियां कामिनिर्योकी मोति प्रतिदिन वारंवार उच्छवास 
छ रही थीं॥ १६॥ 
सेत्यमानो नवैवौतेद्ुंमसंघातनिःखतेः 
तासु छष्णो मुदं रेमे सौभ्यासु वनराजिषु ॥ १७॥ 
वृकि समूहसे निकली हुई नूतन ` वायुस ' सेवित हुए 
श्रीकृण्ण उन सौम्य वनराजि्येमिं वदे अनन्दका अनुभव 
कृरने लगे ॥ १७ ॥ 
ख कट्राचिद्‌ वने तस्मिन गोभिः सद परिश्रमन्‌ । 
दद्द विपुरोदश्रं चाखिनं शाखिनां चरम्‌ ॥ १८॥ 
एक दिन उस वनमे गौओकि साथ भ्रमण करते हए 
शीकरष्णने वरहो एक ब्रश्षको देखा; जो वहुत ही ऊचा तथा 
सभी वृक्षम वडा था ॥ १८ ॥ 
स्थितं धरण्यां मेघाभं निविडं पत्रसंचयेः । 
गगनार्घोचद्िताकारं पर्वताभोगधारिणम्‌ ॥ १९ ॥ 
अपने पत्तोकरे संचयसे अत्यन्त धना प्रतीत होनेवाला वह 
वृक्ष प्रृथ्वीपर मूरतिमान्‌ मेघे समान खड़ा था | अपनी 
ऊचाईसे उसने आकादाके आधे भागकरो रोक ल्वा"था ओर 
वह पर्वते समान विस्तरेन आकार धारण करता था ॥१९] 
नीरयिजाङ्गवर्गेश्च - सेवितं वद्भिः खगैः । 
फरटैः प्रवारेश्च घनैः सेन्द्रचापघनोपमम्‌ ॥ २० ॥ 
नीटे एवं चितक्रवररे रंगवाले बहुत-ते मोर उस इक्षका 
सेवन कप्ते थे | वह मूंगक उमन लल-लल घने फर्छके 
द्वास इन्द्रधनुपतदित मेधक्रे समान जान पडता था ॥ २० ॥ 
भवनाकारविखपं लतापुष्पमण्डितम्‌ । 
विशछमूल्ावनतं पवनाम्भोदधारिणम्‌ ॥ २१॥ 
उसकी एक-एक शाखा विशाल गृहके समन प्रतीत 
होती थौ | ठता ओर फू्टोते वई अच्छी तरह अलङृत 
था । उसक्री विगाल जद बहुत दूरतक फैली हुई थीं । वह 
अपने ऊपर वायु ओर मेघतो भी धारण करता था ॥ २१॥ 
आओधिपत्यमिवन्येषां तस्य दक्षस्य हालिनाम्‌। 
कुबीणं द्ुभकर्माणं निरावपमनातपम्‌ ॥ २२॥ 
एसा जान पदता था किं वह दृक्ष उस प्रदेशके दूसरे 
सभी वृर्षोकरा आपिपत्य-सा कर रहा दै । उफ कर्म वदे ञ्चुम 
ये । वह वर्प ओर धूपका निवारण करता था ॥ २२ ॥ 
न्यग्रोधं पवेताश्राभं भाण्डीरं नाम नामतः। 
दषा तत्र मति चक्रे निवासाय ततः परभुः ॥ २२॥ 
वद्‌ वरगदका दक्ष था जीर पर्वत-दिखरफे समान प्रतीत 
होता था । उसश्ना नाम था भाण्डीर वट | उसे देखकर 
भगवान्‌ वहीं निवास करनेका विचार करिया ॥ २३ ॥ 
सं॑तत्र चयसा तुच्येर्बत्सपाङेः सदानघ । 
रेमे वै वासरं ष्णः पुरा स्वर्गगतो यथा ॥ २8 ॥ 


निष्ाप जनमेजय { उस वटके नीचे समान अवसथावाले 
वत्छपाल्क मित्रक साय श्रीकृष्ण दिनमर वदे खसे र्दे । 
पदे अपने धाममे रहते समय उर जेते युखक्ा अनुमव 
होता था, वेना ही वहो भी हुमा ॥ २४॥ 
तं कीडमानं गोपालाः ष्णं भाण्डीरवासिनम्‌। 
रमयन्ति स्म वहवो चन्यैः ऋडनकौस्तदा ॥ २५॥ 
वरहो खेलते हए भाण्डीरवासी श्रीकृष्णो उस समय 
वहुत-ठे ग्वाखवा जंगी लिने देकर प्रसन्न करनेकी चे 
करते ये.॥ २५॥ 
अन्ये स्म परिगायन्ति गोपा मुदितमानसाः! 
गोपालाः रृष्णमेवान्ये गायन्ति स्म रतिप्रियाः ॥ २६॥ 
दूरे खाट्वाल मन-दी-मन प्रसन्न दौ यनेक प्रकारके 
गीत गति भरे । अन्य गोप-वालक जिन्द श्रीकरप्णक्री वह्‌ मधुर 
क्रीडा बहुत दी प्रिय थी अथवा जो श्रीकृप्णतरिपयक अनुराग- 
को दही अपनी प्रिय वस्तु मानते येः वे श्रीकृप्णकरा दी 
यग्रोगान करने खो ॥ २६ ॥ 
तेषां स गायताभेव वादयामास वीर्यवान्‌ । 
प्णवादयन्ते वेणुं तुम्बीं चीणां च तच € ॥ २७॥ 
उन ग्वाल्वारखके गाते समय बट्यान्‌ श्रीङ्कप्ण प्तौ 
नये हुए वाके वीच-बरीचमे सुरी; दम्ब ( तवरा ) तथा 
बीन बजति ये ॥ २७ ॥ 
कद्राचिच।रयन्मेव गा; स गोबुपभेक्षणः। 
जगाम यप्रुनतीरं ठताटंरुतपाद्पम्‌ ॥ २८ ॥ 
गायतर्छोके समान विशाल नेर््रौवाले श्रीक्रप्ण क्रिसी 
समय अपनी गौर्ओक्रो चरते हए दी यश्ुनाजी$े यपर जा 
पहुचे । जर्होका प्रवेक दृक्ष कताथेसि अक्कृत था ॥ २८ ॥ 
तरद्नापाङ्गकुटिखां वरिस्पर्छसखानिलाम्‌ 1 
तां च पद्मोत्पल्वतीं दद्य यञुनां नदीम्‌ ॥ २९॥ 
जो अपनी चञ्चल तरङ्गरूपी कुटिल कयि कुछ वक्र 
दिखायी देती थी; जिसके जलका स्पा कर्के सुखदायिनी 
हवा चल रदी थी तथा जित्तमे कमर ओर उल सिरे 
हए ये, उस्र यमुना नदीको श्रीङ्ष्णने देखा ॥ २९ ॥ 
सतीथां खादुसलिलखां हदिनीं वेगगामिनीम्‌ । 
तोयवातोदयतेर्वैगेरवनामितपाद्पाम्‌ ॥ ३०॥ 
उमे उतरनेकरे व्यि उत्तम मागं थे ! उसका जल खादिष्ट 
था | उसके भीतर कद्‌ कुण्ड थे तथा वह वदे वेगे प्रवाहित 
हो रदी थी । जल ओर वायुकर द्वारा ग्रकट हुए वेगसे उसने 
करिनरिके इर्भेक्रो छका दिया था ॥ ३० ॥ 
दंसकारण्डवोद्‌घु्टं सारसैश्च निनादितम्‌ । 
अन्योन्यमिथुनैश्चैव सेवितां मिधुनेचरेः.॥ २१४ 


वष्णुपर्वं ] 


पकाद्श्ोऽध्यायः 


२४५ 


हंसों ओर कारण्डवोके उद्घोष तथा सारसोके कलनादसे 

वरहो सदा कोलाहर होता रहता था । अपने जोड़ेके साथ 

विचरमेवाले चक्रवक्र आदि प्री परस्पर मेधुनमे प्रदत्त हो 
यमुनातरका सेवन करते थे ॥ ३१ ॥ 


जलजः प्राणिभिः कीर्णो जलनभूपितां णेः 
जलजैः ऊुखुमैधित्रां जलनजैर्दरितोदकाम्‌ ॥ ३२॥ 
ˆ जरम उन्न होनेवल प्राणी ( मत्स यादि ) यमुना- 
जीमे मरे दए थे । वे जलजनित शीतलता आदि गुणेति 
विभूष्रिव थीं । जलम होनेवलि कमल आदि पुष्प उने 
विचित्र दोभाका आधान करते थे तथा जलजनित सखेवार 
अआदिके कारण उनका जक हरा दिखायी देता था ॥ ३२॥ 
अतसोतचरणा , पुलिनशरोगिमण्डलाम्‌ । 
आवर्तनाभिगम्भीरं पद्मरोमानुरञ्ञिताम्‌ ॥ ३२॥ 
फैले हुए खोत ही उनके चरण ये । दोनों तट नितम्ब- 
मण्डली चोमा धारण करते थे ¡ उठती दूद्‌ भवर उनकी 
गम्भीर नमि थी] वे कमलल्पी रोमावल्सि अनुरञ्जित थी ॥ 


तर्च्छेदोदसं कान्तां चितरद्गवलीधसम्‌ । 
पफोनप्रहषवदनां प्रसन्नां ₹दंसदासिनीम्‌ ॥ २४ ॥ 


तके निक्रट जो प्रवादी कृशता थीः वह उनका सुक्ष्म 
उद्र अथव! करश्च क्रटिमाग थी | वे अपनी मनोहर कान्तिसे 
कमनीय प्रतीत होत्ती थीं | वे तरङ्गमयी त्रिवखी धारण करती 
थ| फेन द्यी उनका इषेक्छुह्छ मुख या | वे सदा प्रसन्न 
( खच्छ ) रदती थीं जौर हंस ही उनके दास ये ॥ ३४ ॥ 
रुचिरोत्पलरक्तोरएठ नतश्र' जलजेक्षणाम्‌ । 
हददीघंल्ाखन्तां कान्तां होवलमू्धंजाम्‌ ॥ ३५ ॥ 

सुन्दर खल कमल. उनके खल्-लर ओष्ठोकी सकी 
करति थे । जलका नीचेकी ओर जाता हया प्रवाह दी उनकी 
छकी हुई भेह थीं | नील कमल ही उनके नेत्र थे । जलका 
कुण्ड दी उनक्रा विस्तृत छलार-प्ान्त था तथां सेवार 
दी उनके मन्द्र केश थे | उनकी कान्ति बडी ही 
कमनीय थी | ३५ ॥ । 
चक्रवाकस्तनत्टां तीरपाश्वीयतननाम्‌ । 
दीधेख्मोतायतभुजामाभोगश्चवणायताम्‌ ॥ ३६॥ 

चकवा-चकर्दफे जोदे उनके मानो युग उरोज ये। 
उनका विस्तृत मुख दोनो तरयोपर फेला हुआ था | लवे 
सोत दी उनी विशाख युजाओके समान ये । दोनों तर्येकी 
पणता दी उनके विस्तृत कान ये ॥ ३६ ॥ 


कारण्डवाकुण्डलिनीं श्रीमत्पङ्कजख््वनम्‌ ! 


तरजाभर्णेपेतां मीननिर्भलमेखलाम्‌ ॥ ३७ ॥ 
वारिष्ठवश्रुवक्लौमां  सारसारावनृ पुरम्‌! 


कादाचामीकरं वासो वसानां हंसलक्षणम्‌ ॥ ३८॥ 


वे कारण्डर्वोके करडण्ठ पने हए. थीं । उनके मील 
कमलरूपी लोचन अनुपम श्लोभासे सम्पन्न थे | तटपर उत्पन्न 
हुए उक्ष आदि हौ उनक्रे आमरणं थे । मछलिरयोकी पक्ति 
उनक्री उञ्ज्वर मेखल ( करधनी )-ती प्रतीत दती थी । 
उनॐ जलका कैत्य हुआ पाट दी पाटम्बरका काम देता था! 
सारसोकी मी बोटी ही उनके नृपुरोकी मधुर ध्वनि थी। 
वे कारापुष्पः, हंस एवं सुवर्णैके समान सुन्दर स्वच्छ जठमय 
व्र धारण करती थी ॥ ३५-३८ ॥ 
भीमनक्रायुदिक्ताङ्गी कूमरक्चषणभुषिताम्‌ । 
निपानश्वापदापीडां शभिः; पीतपयोधसम्‌ ॥ २३९ ॥ 

भयंकर मकरे उन अङ्गम छे हुए चन्दन-से प्रतीत 
होते थे । वे कच्छपर्पी लक्षणो ( हाथ-पैरोकी रेखाओं ) से 
विभूषित थीं । पद्युओकि पानी पीनेके घाटपर अये हुए श्वापद ' 
( हिखक जन्तु ) उनके शीपूर ये । मनुष्यं आदि प्राणी 
इन पयोधर ( जलपूर्णं स्न ) का पान करते ये ॥ ३९ ॥ 


भ्वापदोच्खिष्टसटिखमाश्रमस्यनसंकुलाम्‌ । 
तां समुद्रस्य महिषीमीक्षमाणः समन्ततः ॥ ४० ॥ 
चचार रुचिरं ष्णो यस्ुनामुपश्ोभयन्‌ । 
यमुनाके जलको र्िसक जन्त ओने पीकर जटा कर दिया 
था ओर उनके दोनों तट विभिन्न अश्रमोते भरे दए ये । 
रेख समुद्रकी परटरानी यमुना योभा निहारते ओर 
वदति हुए श्रक्ृष्ण अपनी मनोहर गतिते वर्हे चारौ ओर 
विचर्‌ रदे थे | ४०१ ॥ 
तां चरन्‌ स नदीं श्रेष्ठां ददशे हदमुत्तमम्‌ ॥ ४९१ ॥ 
दी योजनविस्तारं दुस्तरं जिद्वलेरपि। 
गम्भीरमक्षोभ्यजलं निप्कम्पमिव सागरम्‌ ॥ ४२॥ 
नदिर्थमिं शरेष्ठ यसुनाके तयपर विचरते हए श्रीकृष्णे 
एक उत्तम हृद (जल्करुण्ड) देखा जो ब्रहुत बेड़ा था । उसका 
विस्तार एकर योजनका था । देवतायेके ल्ि मी उते पार 
करना कठिन या । वह ब्रहुत हो गहरा, ्ोभरदित जल्ते परिपूर्णं , 
तथा प्रशान्त समुरफे समान हट्चल्ते दूत्य था ॥ ४८१-४२॥ 
तोयज्ञैः श्वापदैस्त्यकतं शुन्यं तेयचरैः खरैः । 
अगाधेनाम्भसा पूर्ण मेधपूणमिवास्बरम्‌ ॥ ४३ ॥ 
जल्मे पैदा होनेबाडे मगर आदि ईिंसक जन्तुभेनि मी 
उस हृद्को त्याग दिया था । जलचर पक्षियोते भी वहं' सूना. 
ही था तथा मेषेसि आच्छादित दए. आकारक्री मति वह 
अगाध जले पूर्णं दिखायी देता था ॥ ४३ ॥ 
इःखोपसरप्य तीरेषु सस्पैरवियुडेविखैः। 
विप्रारणिभवस्याग्नेधूमेन परिवेषितम्‌ ॥ ४४ ॥ ` 
उसे तरयोपर बद-वडे परिल ये, जिनमे सयं रहते थे । 
उनके कारण उष छऊुण्डतक पर्हुचना बहुत हौ कष्टदायक 


२४६ 


या । सर्पो विप्ररूपी अरणिते उत्यत्न दूर आकरे धूमसे 
वष साय कुण्ड ग्प्राप्त रहता था ॥ ४४] 
भोग्यं तत्‌ पशुनां हि अपेयं च जलार्थिनाम्‌ । 
उपमोनैः परिन्यक्तं सुर खिपवणार्थिभिः ॥ ४५॥ 
वद पञु्थेके उपभोगे आनेकरे योग्य न्दी रह गया 
था | जला्थीं प्राणियेकरे ल्थि उसका जठ अवेयदो गया था। 
तीनों समय स्नानकी इच्छा रखनिवलि देवतार्मोनि भी उसे 
व्याग दिया था। वद्‌ हृद उनके उपमोग्मे भी नदीं 
आता था॥ ४५ ॥ 
आकाश्यादप्यसंचार्यं श्वगैसकाडयोचरेः। 
ठणेप्वपि पतःस्वप्छु ज्वलन्तमिध तेजसा ॥ ४६॥ 
उस कुण्डके ऊपर-ऊपर आकाशचारी पक्षिक च्वि 
आकारमारसि मी जाना असम्भव या | उसके जम तिनके 
मी पड़ जार्यै तो वह्‌ कुण्ड अपनी विपाग्नकरे तेजसे प्रज्वलित 
ह्यो उठता था ॥ ५६॥ 
समन्ताद्‌ योजनं स्रं देवैरपि दुससदम्‌ । 
विषानटेन घोरेण ज्वाखाग्रज्वसितद्रुमम्‌ ॥ ४७॥ 
उसके चार्यो ओर एक-एक योजनते अधिक भूमाग एेसा 
थाः जिखपर्‌ चलना देवतार्भोकि लियि मी ब्रहुत कठिन था । 
वरद फटी हद भयानक विषागनिसे जो ल्पट उठती थीः 
उसने आत-पारके वृरभोको भी जलाकर भस्म क्रदियाथा॥ 
मजस्योत्तरतस्तस्थ कछोदामाते निरामये । 
तं दष्ट चिन्तयामास रृष्णो वे विपुलं हदम्‌ ॥ ४८॥ 
अगाधं यतमानं च कस्यायं महतो हदः । 
व्रनके उत्तर भागम केवट एक कोरी भूमि रखी रह 
गयी थी, जो उसकी विषग्निकरे प्रभावे बची रहनके कारण 
योग-गोकसे रदित थी ¡ उस विशाल एवं अगाध ङुण्डकोः 
जो अपने तेजसे दीप्तिमान्‌ था, देखकर श्रीकृष्णने मन-दी-मन 
सोचा, क्रिस महान्‌ प्राणीका वद कुण्ड है ॥ ४८६ ॥ 
अस्मिन्‌ स कालियो नाम कालाञ्जनचयोपमः ॥ ४९ ॥ 
उरगाधिपतिः साक्षाद्‌घदे वसति दारूणः। 
उतृज्य सागरावासं यो मया 'विदितः पुरा ॥ ५० ॥ 
भयात्‌ पतगराजस्य सखुपर्भस्योरगा्िनः। 
इस हदर्मे काटी अज्ञनसयरिके समान काल तथा 
अत्यन्त दारण वह साक्षात्‌ नागराज कालिय निवाख करता 
हैः जो पूर्वकाले मेरी जानकारीरभ ही .सर्पमोजी पक्षिराज 
गख्डके भयसे समुद्रका निवा चोदक यर्दो आ गया या ॥ 
तेनेयं दूपिता सवौ यमुना सागरद्गमा ॥ ५१॥ 
भयात्‌ तस्योरगपतेनौयं देश्चो निचेव्यते। 
उसीने इख सारी समुद्रगामिनी यमरुनाको विषते दूषित 
किया दै । उस नागराजके भयपे ही को प्राणी इस देशका 
सेवन नदीं करता ॥ ५११ ॥ 


शीमहाभारवे विरुभागे 


[ रिंश 


तदिदं दाख्णाकारमरण्यं रूढराद्वटम्‌ ॥ ५२॥ 
सावरोदट्भुमं घोरं कीर्ण नानाटताद्ुमैः। 
रक्षितं सर्पराजस्य सचिचेराक्तकारिभिः ॥ ५३॥ 
दसीच्ि चद़ी-वद़ी पाससि भरा दूजा वह वन मयानके 
हये गया दै । वरोद ओर वर्हि यह थोर वन नाना 
ग्रकास्की रतार्थं तथा पादर्षो परिपूर्णं दै तथा सर्यराज 


कालियके विश्वासी सन्नी दख भूमागक्री रक्रा करते ई ॥ . 


वनं निर्धिपयाकारं विपान्चमिव दुःस्पृश्म्‌। 
तैराप्तकारिभिनित्यः सर्वतः परिरक्षितम्‌ ॥ ५४॥ 
यदह वन आकाशकी भोति अवलम्ब्य हो गया ६ै। 
विपरभिश्नित अन्नके समान इसका स्यो मी दुःखदायक ६ । 
काटिग्रके उन विश्वसनीय सचिर्वौद्यारा यद सदा सत्र ओरमे 
सुरक्चित दै }} ५४} 
होवालनलिनिश्चापि बक्षैः शरुद्रलताकटैः। 
कर्तज्यमार्मौ श्राजेते हदस्यास्य तटाुभौ ॥ ५५॥ 
इस हृदे दोनो तट शिवारः कमल तथा ओोगी-खोरी 
तासि भरे हए ब्रक्षमि सुग्नोभित दते दं । सुज्ञ यर्दोतकर 
परहुचनेके लियि मार्गं बनाना होगा ॥ ५५ ॥ 
तदस्य सर्पराजस्य कर्तव्यो निग्रहो मया। 
यथेयं सस्दिम्भोदा भवेच्छिवजलादाया ॥ ५६॥ 
दी टृटिते सन्ने इस नागराजका दमन करना दैः 
जिससे जल देनेवाली यह नदी कल्याणकारी जलका आश्य 
दोसे ५६॥ 
व्रजोपभोम्या च यथा नागे च दमिते मया : ~ 
सर्वत्र सखुखसंचारा सर्वतीर्थसुखा्चया । ५७॥ 
इस नागकरा मेरे दवार दमन हो जनेपर य्की नदी 
समू जके उपमोगमे आने योग्य हो जायगी । यहो सवर 
ओर सुखपूर्वक विचरण करना सम्भव हौ जायगा तथा यह्‌ 
नदी समस्त तीर्थ ओर सुलोका आश्रय हो जायगी ॥ ५७॥ 
पतद्थं च वासोऽयं बजेऽस्मिन्‌ गोपजन्म च । 
अमीषासुत्पथस्थानां निग्रहार्थं दुरा्मनाम्‌ ॥ ५८॥ 
इसीच्यि व्रजमे मेरा यह निवासि हुआ ह ओर इसील्ि 
मने गोमि अवतार रहण क्रिया हे | इन कमार्मपर लित 
हुए दुरात्मार्जोका दमन करके च्वि द्यी यर्हो मेरा अवतार 
हुमा दै ॥ ५८ ॥ 
पनं कदस्बमारुह्य तदेव शिद्युखीलया । 
विनिपत्य हदे घोरे दमयिप्यामि काल्यम्‌ ॥ ५९ ॥ 
मं ब्राटकोके खेल-सेल्मे ही इस कदम्बपर चदृकर 


उख घोर हदमे कूद परटूगा ओर कालियनागका दमन क्म ॥ 


पवं रते बाहुवीर्यं लोके ख्याति गमिण्यति ॥ ६० ॥ 
एसा करनेपर संसारम मेरे बराुवख्की ख्याति योगी ॥ 


इति श्रीमहाभारते खिरुमागे हरिवो विष्णुपर्थेणि बाङचरिते यमुनावर्णनं नामैकादुदयोऽध्यायः ॥ ११ ॥ 
शस प्रकार श्रीमहाभासतके खिरभाग हसिंशके अन्तत व्िष्णुपर्वमे वारलीरकि प्रसंगे युनाव्र्णननामक स्यार मध्यायपुरा हुमा ॥९९॥ 


(ररी को 


॥ 


विष्णुपर्व | 


शदो ऽध्यायः 


१५७ 


दादशोेऽध्यायंः 


, श्र्ृष्णद्रारा कालियनागका दमन, उसक्रा सथुद्रको प्रस्थान तथा 
गोर्पोको आरीकृष्णकी महत्ताका अनुभव 


वैश्चस्पायन उवाच 
सोपरत्य नदीतीरं वद्ध्वा परिकरं टम्‌। 
आरोहच्चपः. रृष्णः कदम्बरिखरं सुदा ॥ १९ ॥ 
वैराम्पायनजी कहते है--जनमेजय | चञ्चल 


श्रीङृष्णते नदीके तरपर पर्हुचकृर च्टतापूरवक अपनी कमर - 


कस री ] फिर प्रतन्नतापूर्वक वे कदम्बक्री शाखापर चद्‌ गये ॥ 
कृष्णः कटुम्बरिखरार्छम्बमानो धनारतिः। 
हदमध्येऽकरोच्छब्दं निपतन्नम्बुजेक्षणः ॥ २ ॥ 
मेघकरे समान श्याम शरीरवाले कमलनयन श्रीष्ष्णने 
कदम्बकी शाखासे लट्ककर कालियददके बीचमे दू दते समय 
बडे जोरक्न शव्द क्रिया ॥ २॥ 
कृष्णेन त्न पतता क्छुभितो यञ्ुनाहदः। 
सम्प्रासिच्यत देगेन भिद्यमान इवाम्बुदः ॥ २ ॥ 
श्रीकृष्णके वर्यो कूदनेसे यमुना उस कुण्डम हलचल 
वेदा हो मथी | वह वड वेगसे जर उछारकर तय भूमिसदित 
सिच उठा । एेखा जान पड़ा; मानो वहो जल्से भरा हुआ 
मेष फ्ट्पड़ाहो॥३॥ 
तेन शब्देन संश्चुग्धं सर्पस्य भवनं महय्‌। 
उदृतिष्ठज्जलात्‌ सपो रोषपयौकुङेश्षणः ॥ ४ ॥ 
उस शब्दसे नागराजका विशाल भवन क्षुन्ध दहो उठा 


ओर वह सर्गं जल्पे ऊपरको उडा । उस समय उसके नेत्र 
करोधसे भरे हुए थे | ४॥ 


स॒ चोरगपतिः छरद्धो मेघरयरिसमपरभः। 
ततो स्कान्तनयनः कालियः समदद्यत ॥ ५ ॥ 
मपोकी धटे समान कले रंगवाला वह नागराज 
कालिय जव कुपित होकर उठा, उस समय उसके नेत्रपरान्त 
रक्तवर्णे दिखायी देरहे ये ॥ ५॥ 
पञ्च।स्थः पञकोरड बासश्चलज्िदधो नलननः । 
पृथुभिः पञ्चभि्घोरेः -शिरोभिः परिवारितः ॥ ६ ॥ 
उस पोच म्र थे ओर उनके उरव्छवासकर साय आगकी 
ल्पट उठती थी । उसङ्गी जीम चञ्च गतिसे लपल्पा रदी 
यी ओर मुखम आग भरी थी । वह्‌ पोच मयंकर एवं स्थूल 
पिरे धिर रहता था 1 ६ ॥ 
पूरयित्वा हदं . सर्ब भोगेनानलवच॑सा । 
` स्फुरन्मिव च रोषेण ज्वरन्निव च॒ तेजसा ॥ ७" 
भपने मन्तिके समान नेगी विद्याक धडरके द्राण कदे 


हदको पूणं करके वह क्रोधसे कोपिता तथा तेजसे जलता 
हज-सा प्रतीत होता था ॥ ७ ॥ 
क्रोधेन ज्वरुतस्तस्थ जं श्यतमिवाभवत्‌। 
प्रतिस्नोताश्च भीतेव अगाम यमुना नदी॥८॥ 
क्रोधसे-जल्ते हुए उस सपंकी विषाग्निकषे काठियङ्कण्डका 
जक खौल्ने-सा खगा तथा यसुनाका प्रवाह पीछेकी ओर 
रट पड़ा । मानो कह नदी भयभीत-सी होकर पीडे भाग 
रदीहो॥८॥ 
तस्य करोधाग्निपूर्णेभ्यो वकेभ्यो ऽभूच्च मारुतः 
षट कृष्णं हदगतं क्रीडन्तं दिद्युटीलया ॥ ९ ॥ 
सधूमाः पन्नगेन्द्रस्य सुखाग्निश्चेरूरचिषः । 
श्रीकप्णको अपने हद आकर बाररकौके समान खेरते 
देख कालिय नागके क्रोधाणनिपूणं सुखोसि उच्छवास वायु प्रकट 
हई । उस नागराजे मुखे धूमसहित आगकी ल्प 
निकल्ने ख्गी ॥ ९ ॥ 
खजता तेनं रोषाग्नि समीपे तीरजा द्रुमाः ॥ १०॥ 
क्षणेन भस्मसान्नीता युगान्तप्रतिमेन वे। 
अपनी क्रोधागि प्रकट करते हुए उस प्रयेकर-जेते सपने 
उस कुण्डके आस-पास उगे. हुए तीरवर्ती दृरक्षौको क्षणम 
जखकर भस्म कर दिया ॥ १०१ 
तस्थ पुच्राश्च दाराश्च सत्याश्चान्ये महोरगाः ॥ ११॥ . 
वमन्तः पावकं घोरं वक्त्रेभ्यो विषसम्भवम्‌ । 
सधूमं॒पन्नगेन्दरास्ते न्पितुरमितीजसः ॥ १२॥ 
उस$े खरी? पुत्रः सेवकं तथा अन्य ॒वेडे-चडे नाग एवं 
नागराजः जो अनन्त बलशाली ये, अपने मुखस विषजनितः 
धूममिभ्रित्त भयंकर आग उगल्ते हए. उनपर दू पडे ॥ 
भरवेरितश्च तैः सर्पैः स ष्णो भोगवन्धनम्‌ । 
नियैत्नचरणाकारस्तस्थी भिरिस्विचलः ॥ १३॥ 
उन समी सपनि श्रीकृष्णको अपने शरीरो बन्धने 
बोध ज्या । उनके हाथ-पैर एवं सारे अङ्ग निश्चेष्ट हो गये। 
वे पर्वती मति अविच भावे खडे रह गये ॥ १३ ॥ 
अदशन्‌ ददानैस्ती्णेर्विषोर्पीडजखाविङैः 1 
ते रृष्णं सर्पपतयो न ममार च वीर्यवान्‌ ॥ १७॥ 
उने समस्त नागरार्जोनि विष्के प्रवादसे मिधित जख्के 
दवीय मलिन हृष्ट अपने तीखे दोतिति श्रकृष्णको ईखना 
आरम्य किया; परतः दक्ति्याली श्रीकृष्ण मर न सके ५१४५ 


२४८ 


श्रीमहाभारते खिकभागे 


[ हरिशे 


पतस्मिन्नम्तरे भीता गोपालाः सर्वं पव ते। 
क्रन्दमाना बजं अग्मुयीप्पगद्वदया गिरा ॥ १५॥ 
इसी वीमे समस्त ग्वाटनाल भयभीत हो रोते हुए ब्रम 
गये ओर अश्रुगद्रद वाणीमे इस प्रकार व्रोठे ॥ १५ ॥ 
गोपा ऊचुः 
पष मोहं सतः छष्णो मग्नो वैं कालि ददे 
भक्ष्यते सपंसजेन तदागच्छत मा चिरम्‌ ॥ १६॥ 
गोर्पोमे कहा- ये श्रीकृष्ण काटीदहम इयकर मूच्छित 
हयो गये ह ओर नागराज इन्द खाये जाता दै; अतः जस्दी 
आभो, देरन क्रो | १६ ॥ 
नन्दगोपाय वै क्षिप्रं सबलाय निवेदताम्‌ । 
एष ते छृष्यते छृष्णः सपंणेति मदाहदे ॥ १७ ॥ 
दल-बलसदित नन्दगोपसे कोई शीघ्र जकर कद दो क्रि 
(तुम्हारे कृप्णको स महान्‌ कुण्डम खचि च्ि जाता दैः ॥ 
नन्दगोपस्तु तच्छरप्वा चञ्रपातोपमं वचः । 
आर्तः स्लछितविक्रन्तस्तं जगाम हदोत्तमम्‌ ॥ १८ ॥ 
वह वज्रपातके समान दारुण वचन सुनकर नन्दगोप 
शोकसे व्याक्रुल हो ल्डखडति हुए उस विद्ाल दके पास 
जा पर्ुचे ॥ १८ ॥ 
सबाखयुवतीचद्धः स॒ च संकर्पणो युवा । 
आक्रीडं पन्नगेन्द्रस्य जखस्थं समुपागमत्‌ ॥ १९. ॥ 
उनके साथ रजक बहुत-से वार्कः चृद्ध ओर युवतिरयो 
भी थी । रोहिणीके युवक पु संकर्षण भी आ पहुचे थे । 
ये सव-के-सवर नागराजकी जलस्थ क्रीडाभूमिके पास अयि ॥ 
नन्दगोपसुखा गोपास्ते सवं साशुखोचनाः। 
हाहाकारं प्रङ्र्वन्तस्तस्थुस्तीरे हदस्य वै ॥ २५ ॥ 
नन्द आदि वे समी गोप्र ने्रेसि ओष वहाते ओर 
हादाकार करते हए कालियदहके तटपर खडे हो गये ॥२०॥ 
वोडित। विस्सित(श्चेष शोकतीश्च पुनः पुनः 
केचित्‌ ठु पुत्र दा हेति हा धिगित्यपरे पुनः ॥ २९॥ 
वे अपनी विवशतापर टजित ये । भीक्कप्णका साहस 
देख-पुनकर आश्चर्यम पड़े थे ओर उनक्रे जीवनक्री आशङ्कसे 
वारघरार योक्त हो जति ये। कोई ष्टाव वेय] दाय | 
कहकर रो देते ओर दूसरे दाय ¦ धिकार दे हम सवके 
जीवनक” े्ा कहते हए चिन्तामग्न हो जते ये ॥ २१ ॥ 
अपरे हा हताः स्मेति ररुदुभंशदुःखिताः 
ल्ियश्चैव यशोदां तां हा हतासोति चुक्रुशुः ॥ २२॥ 
या परयसि पियं पुत्रं सपेराजवश्षं गतम्‌ । 
स्पन्दितं सप॑भोगेन कृष्यमाणं यथा सुतम्‌ ॥ २३॥ 
दूसरे खोग भध्यन्त दसी दो ष्टाय | हम मरे गे ।' 


ेसा कहते हूए जोर-जौरे रोते थे । व्रजकी छिर्यो यशोदा 
की ओर देख चिस्छा.चिष्टाकर कती थी--ष्टाय यन्ोदे | 
तू व्रेमौत मारी गयी, ेर्योक्रि अपने प्यरि लाल्कौ आज 
इस नागराजके वामे पदा हु देख रही हो । दाय | वहं 
सर्पे शरीरसे आब्र हौ मृतक्रकी भोहि घषीया जा रहा ६ ॥ 
अद्मसारमयं नूनं दृदयं ते धपिलशक्ष्यते । 
पुत्रं कथमिमं दृष्टा योरे नावदीयंसे ॥ २४॥ 
ध्यदोदे ¡ निश्चय दी वम्दार दय लेदेकरा बरना हुआ 
दिखायी देता दै । अरी ! पुत्रको इस दामे देखकर हम्दारी 
छाती फट क्यो नदी जाती दै १॥ २४॥ 
दुःवितं वत पञ्यामो नन्दगोपं हदान्तिङके। 
न्यस्य पुत्रमुखे टट निश्चेतनमवस्थितम्‌ ॥ २५॥ 
ष्टाय [ दम देखते ई नन्दववा अच्यन्त दुखी हो 
काखियिदष्टके निक्रट लत कन्दैयकरे मुश्वपर अपनी दृष्टि 
जमाये अचेत.से खडे द | २५॥ 
योदामचुगच्छन्त्यः सपौवासमिमं हदम्‌ 
प्रविरो न यास्यामो विना दामोदरं जम्‌ ॥ २६॥ 
ष्टम सत्री सव यशोद जीके पीचे धी सर्पीकरे निवास 
स्थान इस हदर्म प्रवेद कर जर्येगी, रितु दामोदर 
(श्रीकृप्ण ) के साय ल्पि ग्निना बजकरोनदीं टैेगी ॥२६ 
दिवसः को विना सय विनः चन्द्रेण का निद्ा। 
चिना चरेण क! गावो धिना रष्णेन को वजः। 
विना रुष्णं न यास्यामो विवत्सा दव धेनवः ॥ २७॥ 
पूर्यकरे विना दिन कैसा १ चन्द्रमा विना रावि 
केसी १ सेके व्रिना गौ क्या १ तथा श्रीकृस्णके त्रिना नज 
केसा १ पिना वच्डेकी धेनुओके समान हम श्रीकरप्णफे चिना 
त्रजको नदी छेरटेगी" ॥ २७ ॥ 
तासां विरूपितं श्चुस्वा तेषां च बजवासिनाम्‌। 
विरपं नन्दगोपस्य यश्चोदारुदितं तथा ॥ २८॥ 
पकभावशसरीरक्ष पकदैरो द्विधा रतः 
संकपंणस्तु संक्द्धो वभाषे रृप्णमन्ययम्‌ ॥ २९॥ 
उन गोपिकाः तरजवासि्ोका तथा नन्दवावाका विलप 
ओर यसोदाजीका करुणापूर्ण रोदन सुनकर श्रीकृप्णकरे साथ 
अपने एक भाव ओर एक शअ्रौरफे सम्बन्धको जाननेवाके 
संक्र्थणः जो वास्तवमे एक ही देहके दो भागोमेते एक 
ऊुपित दो अविनाशी श्रकृप्णते इस प्रकार बोटे--|॥२८-२९॥ 
कष्ण ष्ण महावाहो गोपानां नन्दवरद्ध॑न | 
द्म्यतामेव वे क्षिप्रं सर्प॑राजो विपायुधः ॥ ३०॥ 
'नोपौक्ा आनन्द बदनिवले महाग्राहु श्रीकृष्ण कप्य 
विषदी जिसफा अच्ल-गल्न दै, उत्त सर्पराज अव शीघ्र 
मतं शये ॥ ३० ॥ 


विष्णवं ] 


दादे ऽध्यायः 


र - ९. 


दमे नो वान्यवास्तात त्वां मत्वा मासुषं विभो 1 
परिदेवन्ति करुणं सवं * मालुपवुद्धयः ॥ २९ ॥ 
प्तात ! प्रभो } ये हमरि समस्त वन्धु-यान्धव तुमे 
मानवन्ुद्धि दी स्खते ई.ओर उ्े मनुष्य मानकर दी 
करुणाजनक.विखपं करते दैः ३१ ॥ 
तच्छुत्वा रौहिणेयस्य वाक्यं संक्ञासमीरितम्‌ । 
विक्रम्यास्फोटयद्‌ वाह भित्वा तन्नागवन्धनम्‌ ॥ २२ ॥ 
रोहिणीनन्दन संकर्घणका यह्‌ सकरेतिक्र वचन सुनकर 
श्रक्ृष्णने स्पौके उस वन्धनको तोड़ डाल ओर पराक्रम 
दिखाति हुए अपनी वोयपर तार टोकरा ॥ ३२ ॥ 
तस्य पद्धःचामथाक्रम्य भोगयाहि जरोत्थितम्‌। 
शिरस्तु रष्णो जग्राह खहस्तेनावनाम्य च ॥ ३३ ॥ 
तत्पश्चात्‌ जर्के ऊपर उठे हए उस सर्पे मारी शरीर- 
को अपने दौर्नो पैरोते दवाकर श्रीक्ृष्णने अपने हाथसे ही 
उसके मसतक्रको छकाकर पकड़ छलिया | ३३ ॥ 
तस्यार्रोह सहसा मध्यमं तन्महच्छ्िरः । 
सोऽस्य मू्चिं सितः कृष्णो ननर्त रुचिराङ्कदः ॥ ३९ ॥ 
फिर श्रीङ्प्ण सहसा उसके चिचटे विदार सिरपर चद्‌ 
गये मौर उसीपर खड़े दो रत्य करने लगे ! उरू समभर उनकी 
सुनाम सुन्दर वानूत्ंद शोमा पार्देये। ३४ ॥ 
म्यमानः स रष्णेन खान्तमूधौ भुजङ्गमः! 
आस्यैः सरुधिसेद्रारेः कातसे वाक्यमनरवीत्‌ ॥ २५ ॥ 
श्रीकृष्णके द्वारा मस्तकके चट दिवे जानेपर उस 
स्का दिमाग ठंडा हो गया--उसकर मस्तिष्की रमी शान्त 
हयो गयी । वह॒ अपने मुखस खूल उगल्ता हा कातर 
भावे बोख--॥ ३५ ॥ 
अविक्ानान्मया कष्ण रोषोऽयं सम्प्रदधितः। 
दमितोऽहं हतविपो वरागस्ते वरानन ॥ ३६॥ 
सुमुख श्रीकृष्ण ¡ मैने अन्ञानवश आपके सामने इस 
करोधक्रा प्रदर्दन क्रिया है। आपने मेरा दमन कर दिया। 
मेरा सारा विप्र नष्टो गया | अव मै आपके अधीनर्हु॥ 
तदाक्षापय किं इर्यो सदा सापत्यवान्धवः। 
कस्य दा वहतां यामि जीवितं मे पदीयताम्‌ ॥ ३७ ॥ 
(अतः आज्ञा दीजिये; मै सदा दी अपने पुत्र ओर 
बन्धु-बान्धर्वोसदित आपकी स्या सेवा कल १ अथवा किसके 
अधीन हो जाँ १ मुञ्चे जीवन-दान दीन्िः] ३७ 
पञ्चमद्धोनतं दष्टा स्प सपौरिकेतनः 
अक्छद्ध॒ पव भगवान्‌ प्रत्युवायोरगेष्वरम्‌ ॥ ३८ ॥ 
उस सप॑को अयने पचिँ मस्तकरसि प्रणत हुम देख 
भगवान्‌ गरडध्वजने क्रोध न करे नागराज कालियसे इस 
रकार केडा-1! ३८ ॥ 


तवास्मिन्‌ यञुनातोये नेव स्थानं द्‌शम्यदहम्‌। 
गच्छा्णवजटं सपं सभार्यः सहवान्धवः ॥ ३९. ॥ 

भ्यो सपं ] मे तुम्हे इष यसुनाजीक्रे जल्मे नीं रहने 
दगा । तुम अपनी पत्नी तथा मार्ई-बन्धुभोके साथ समुद्रके 
जल्मे चे जाओ ॥ ३९ ॥ 


यश्चेह भूयो ददयेत स्थाने वा यदि वा जले । 
तव शत्यस्तनूजो वा क्षिप्र चध्यःस मे भवेत्‌ 1 ४० ॥ 
८अव पिर य्ह इ खानपर या जल्मे वदि कोई भी 
सपं दिखायी देगा तो वह वुम्हास श्त्यदहो या पुत्रः मेरे 
हाथ शीघ्र मार डाय जायगा । ४० ॥ 
शिवं चास्य जरस्यास्तु त्वं च गच्छ महाणवम्‌। 
स्थाने त्विह भवेद्‌ दोषस्तवान्तकरणो मदान्‌ ॥ ४१॥ 
४इक्त जठकी शुद्धि हो जाय--यह खोगोके च्ि मङ्खल- 
कारी होः इसल्यि उम महासागर चठे जाओ । यहो रहनेपर 
दम्हारे जीवनका अन्त कर देनेवाला महान्‌ दोष प्राक्च दोगा ॥ 
मत्पदानि च ते सर्पं ष्ट मूर्धसु खरे । 
गरुडः पन्नगरिपुस्त्वधि न॒ प्रहरिष्यति ॥ ४२॥ 
(सयं ! समुद्रम रदते समय भी ठम्दारे पचि मस्र्कोपर 
मेरे चरण-चिह देखकर सपोके शत्रु गरुड़ तुमपर प्रहार नहीं 
करेगेः || ४२॥ 
गद्य ॒मूध्री ठु चरण छप्णस्योरगयुङ्गवः। 
पद्यतामेव गोपानां जगामादर्शनं हदात्‌ ॥ ४३ ॥ 
तव नागप्रवर कालिय भगवान्‌ श्रीकृष्णे दोनो चरणोमे 
मस्तके छकाकर गोपोकरे देखते-देखते उस कुण्डसे अद्य 
हो रया ॥ ४३ ॥ 
निजिते तु गते सपं रष्णसुत्ती्यं धिष्ठितम्‌ । 
विस्ितास्तुबु्गोप ष्वेव प्रद्चिणम्‌ ॥ ४४॥ 
जव वह सपं हार मानकर चला गया ओर श्रीङृष्ण 
जख्ते निकछकर किनारे खडे हो गये, तव सव गोप आश्चर्ये 
चक्रित हो उनकी स्तुति ओर परिक्तमा करने रो ॥ ५४ ॥ 
ऊचुः सर्वे च सम्प्रीता नन्दगोपं वतेचराः। 
धन्योऽस्यनु ग्रदीतोऽसि यस्य ते पञ ईशाः ॥ ४५॥ 
समस्त बनचारी गोपोने अत्यन्त प्रसन्न होकर नन्दगोपसे 
कदहा--भ्गोपराज ¡ आप धन्य है, आपपर भगवान॒की बडी 
भारी कग हैः जिते आपक्रो णेता पुत्र मिला ॥ ४५ ॥ 
अयप्रभृति गोपानां गवां गोष्ठस्य चानघ ] 
आपत्सु क्षरणं कृष्णः घभुश्चायतल्छेचनः ॥ ७६ ॥ 
“निष्पाप नन्द्‌ ! आजसे सभी आपदाओके समय गोपो, 
गोओं ओर गोष्ठ ( बज ) के ल्थि ये विगराटलोचन भगवान्‌ 


, श्रीकृप्म दी शरणदाता जर स्वामी ई ॥ ४६ ॥ 


२५० 


श्रीमहाभारते खिलभागे 


[ श्यिविद्रो 


जाता रिवजखा सयौ यमुना मुनिसेविता 1 .. 

तीरे चास्याः सुखं गावो विचरिष्यन्ति नः सदा ॥ ४७॥ 
धमुनि्योसि सेवित समस्त यमुनाका जल अव सचे लिये 

सुखद एवं मद्धल्मय षो गया । अव्र हमारी गौ षदा इसके 

तटपर चरती-फिरती र्गी ॥ ४७ ॥ 

व्यक्तमेव वयं गोपा चने यत्‌. शृष्णमीदश्म्‌ । 

महद्ृतं न जानीमद्छनमग्निमिव चजे ॥ ४८॥ 
श्टम वनम रहनेवाले रगैवार ग्वारि्यो ६*--यष्ट व्रात 


स्प्टद्टी सत्य दिखायी देती दै; क्येकि पसे मदान्‌ आत्मा 
श्रीकृष्ण राखे टिपरी हदं आगकी तरद वर्जमे विद्यमाने ४ 
परंतु हम इनके मदत्वको समद्यते ष्टी नट ई ॥ ४८ ॥ 
एवं ते विस्मिताः सये स्तुवन्तः एृष्णमभ्ययम्‌ 1 
जग्मुर्गोपगणा घोषं देषाद्ैधररथं यथा ॥ ४९॥ 
दरस प्रकार वे विस्मिते दृठ समसन गोपगण अविनायी 
भगवान्‌ श्रीक्कप्णकी स्तुति करते हुए गोष्टे चटे मयै, मानो 
देवता चैत्रस्य वर्मे गये हो ॥ ४९॥ 


, इति श्रीमहाभारते खिरुभागे हरिव विष्णुपर्वणि श्रिशुच्यायां फाटियदमने द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ 


इस प्रकर श्रीमहाभारते खिरभाग हरितक मन्तभ॑त विष्णुपवमे वाररीरकरप्रसामे कानियदमनबिययक बारह; भध्याय पृ हु ॥५२॥ 
नवषर = 


त्रयोददोऽष्यायः 
वरामदारा धेलुकासुरका वथ आर भयरहित तारुवनमे मीं तथा मोर्पोका पिचरण 


व्म्पायन उवाच 
दमिते सर्पराजे तु रुष्णेन यसुनाहरे । 
तमेव चेरतुर्देशं सदिती समकेशवौ ॥ ९॥ 
वैराम्पायनजी फते है--जनमेजय | जवर श्रीकृष्णे 
यमुनाजीके कुण्डम रहनेवाठे नागराज काठियका दमन फर 
दियाः उसके यादसे वे दोना भाई वलयम ओर श्रीकृष्ण प्रायः 
उसी प्रदेशमे खाथ-खथ विचरा करतेये | १॥ 
आजग्मदुस्तौ सहितौ गोधनैः सद गामिनौ । 
भिरि गोवर्दनं रम्यं वसदेवघ्ुतावुभौ ॥ २ ॥ 
एक दिन वपुदेवकरे वे दोनों पुत्र गोधनक्रे षाथ विचरते 
ह्य पसम रमणीय गोवर्धन पवतके निकट आये ॥ २ ॥ 
गोवर्नस्योचचस्ते यमुनातीरमाधितम्‌ । 
ददद्शाते च तौ वीरौ रम्यं ताङवनं महत्‌ ॥ ३ ॥ 
वहो उन दोनों वीरोनि देखा-गोवर्धनसे उत्तर दिया 
यमुनाके तटका आश्रय लेकर एक विशाल एवं रमणीय ताल- 
वनशोमापार्हादै॥३॥ 
तौ ताख्पर्णप्रतते रम्ये तालवने स्तौ। 
चेरतुः परमप्रीतौ वृषपोताविवोद्धतौ ॥ ४ ॥ 
ताडके पर्तत विस्तारको प्राप्त हए उस रमणीय ताल्वन- 
मै क्रीडापरायण हो वे दोर्नो भाई दो उदण्ड वदे समान 
वदी प्रसन्नताक्रे साथ विचरने लगे ॥ ४ ॥ 
स तु चेन्लः खद्‌ सिग्धो लो्रपाप्राणवर्नितः। 
दभंप्रायस्थखीभूतः खुमदान्‌ कृष्णसुत्तिकः ॥ ५ ॥ 
वह विशाल प्रदेय सदा दी स्निग्ध ( चिकना ) रहता 
थाः वरह ठेले ओर पत्थरसोके रोडे नदीं थे । बदरि खर्पर 


प्रायः दर्भं (कुटः दुर्वा आदि ) षटि हपट ये । उख खान- 
कीमिद्टीकटठेरंगकीथी॥५॥ 
तटैस्तैविपुटस्कन्धेदचिदयतैः दयामपर्वभिः। 
फलाय्रराखिभिभौति नागदस्तैरिवोचिद्धूतः ॥ ६ ॥ 
वर्ह जो ताद्के वृक्ये, उनकरेतने मोटेये|वेरमी 
दृक्ष बहुत ऊँचे ये । उनके पर्वस्यान ( गंठि ) काठे रंगके 
थे ओर उनकी गाखार्पे फलोसे भरीनूसी धी + उन ताव्दृर्ौ 
से उस खानकीरेषी दोभाद्ोद्ी थीः मारो बर्हा अपनी 
सड ऊपरको उठये बटु्र-से हाथी खदे द ॥ ६॥ 
तत्र दामोद्ररो चाक्यमुवाच वदत्त वरः। 
अदो ताफढैः पफवैवसितेयं वनस्थली ॥ ७ ॥, , 
खादून्यार्यं सुगन्धीनि द्यामानि रसवन्ति च। 
पकछतालनि सहितौ पातयावो लघुक्रमौ ॥ ८ ॥ 
वरहा वक्ताओमिं श्रे दामोद्रर ( श्रीकृष्ण ) ने संकर्पणसे 
कहा--“आ्यं ! यर्होकी वनखली तो इन पके टु तालफरछो- 
की सुगन्धसे महक उटी है! ये कले आर सुगन्धित ताठ 
फल अवद्य दी खादिषट ओर सरस देगि ! हम दोनों मार 
साथ-साथ रहकर नीधतापूर्वकर कदम उठत्ि हुए इन फलौको 
यदा गिरे ॥ ७.८ ॥ 
यदेषामीदे गन्धो माधुयंघ्राणतर्पणः। 
रसेनाधतकस्येन भवितव्यं च मे मतिः॥ ९॥ 
ध्यदि इनकी गन्ध शेसी है, जो अपनी मधुरतासे हमारी 
घ्राणेन्र्योको व्ृप्तकियि देती है तो मेरा विश्वास दै कि श्न 
फरलको अमृतस्य रसे युक्त दोना चाद्ये, ॥ ९ ॥ 
दामोदरचचः श्चुत्वा सैदिणेयो हसन्निव । 
पातयन्‌ पक्ततारानि चालयामास तांस्तरून्‌ ॥ १०॥ 


-.विष्णुपवं 


दामोदरकी यद्‌ बात सुनकर रोहिणीनन्दन वराम हेसते 
हुप-पे पके दए ताल्फलोको गिरानेके उदेद्यसे उन वृक्षौको 
हिलने स्र ॥ १० ॥ 
तत्तु तावनं तृणामसेन्यं दुरतिक्रमम्‌ । 
निमीणभूतमिरिणं पुरुषाद्राल्योपमम्‌ ॥ ११॥ 
उस ताल्वनका सेवम मनुर्योके ल्य असम्भव हो गया 
था | उत बनकर इख पारसे उ पारतक सकुशल छे जाना 
अत्यन्त कठिन था । यत्यपि वह सारभूत स्थान था, तथापि 
राक्षसके घरकी भोति मनुष्येसि दयूल्य दिखायी देता था ॥११॥ 
दारुणो धेनुको . नाम दैत्यो गर्॑भरूपधुक्‌ । 
खरयेन महता चतः समदुसेवंते ॥ १२॥ 
गर्दभरूपधारी धेनुक नामक दारण दैत्य विकार गदो 
की टोरीसे धिय हुमा उस वनमे रहता था ॥ १२ ॥ ` 
स॒ तु. तार्वनं घोरं गदभः परिरश्तति। 
खपक्षिश्वापदगणांखासयनः खदुमंतिः ॥ १३॥ 
वह गदहा असुर उस ताख्वनकी सव्र ओरसे रक्षा करता 
था | उसकी बुद्धि वहुत दी खोटी थी | वह मनुष्यो, पिरयो तथा 
दिंसक जन्तुर्ओको भी आत्ङ्कित कियि रहता था ॥ १३ ॥ 
तालराब्दं स तं श्रुत्वा संुण्ं फरपातनात्‌ । 
नामषैयत्‌ स संक्रद्धस्तारुखनमिव द्विपः ॥ १९॥ 
उन ताल्फलोके गिरनेसे जो धमाकेकी आवाज होती थीः 
उसे सुनकर धेनुका्ुर सहन न कर सका । जैसे ताल ठोकने 
की आवाज सुनकर हाथी कुपितो उट्तादहैः उसी प्रकार 
वह भी अत्यन्त क्रोधमे भर गया ]॥ १४॥ 


शब्दाठुसारी संक्द्धो दर्पाविद्धसटाननः। 
स्तम्धाक्षो हेपितपडः खुरर्निदौरयन्महीम्‌ ॥ १५॥ 
आविद्धपुरछो हृषितो व्यात्तानन इवान्तकः। 
आपतन्नेव ददे रौ्िणेयसुपस्थितम्‌ ॥ १६॥ 
वह उस धमकरेके शब्दका अनुसरण करता हुआ वदे 
रोषकरे साथ चला । घमंडमे भरकर अपने अया ओर सिर- 
को घुमाता आ रहा धा ] उसकी अखं सन्ध हो गयी थीं । 
वह ब्दी पटुताक्रे साथ रैक रहा था ओर अपनी यर्पेसि प्रथ्वी- 
को विदी्ैनसा कि देता था। उसकी पठ घूमरही थीः 
रोगे खुडेहो गये ये, वह्‌ मंद वाये हुए कालके स्मान जान 
पड़ता था | उसने अति ही रोहिणीनन्दन ब्लरामको वरहो 
उपचित देखा ॥ १५-१६ ॥ 
ताखानां तमधो दृष्टा स ध्वजाकारमन्ययम्‌। 
सोहिणेयं खरो दुष्टः सोऽदशद्‌ दरानायुधः ॥ १७ ॥ 
ध्वजाकरी-सी आक्रतित्राले अविनाशी रोदहिणीक्रुमारको 
ताके नीचे खडा देख दोसे ही श्रका काम लेनेवाले 
उस दुष्ट गददैने उन दोतते काट न्या | १७॥ 


त्रयोदशोऽध्यायः । २५१ 
च्च =---------------- 


पद्धश्यासुभाभ्यां च पुनः पश्चिमाभ्थां पयङमुखः । 

जघानोरसि दैत्येन रौहिणेयं निरायुधम्‌ ॥ १८ ॥ 
फिर दूरी ओर सह करे उस दैत्यराज धेनुकने बिना 

हथियार च्यि खड़े हए रोहिणीकुमारकी छतीमे अपने पिचले 

दो वैर्तद्ारा चोर पर्हुचायी ॥ १८ ॥ 

ताभ्यामेव स जग्राह पद्धश्यां तं दैत्यगर्दभम्‌ । 

आवर्जितमुखस्कन्धं प्रेरयंस्तामूर्धनि ॥ १९॥ 
तव बलरामजीने उस गर्दभरूपधारी दैत्यके उन्दी दोनों 

वैरौको पकड छया तथा उसके मुद्‌ ओर कंको धुमाते 

हुए उसे ताडवृक्षके ऊपर दे मारा ॥ १९ ॥ 

सम्भगचोरुकरि ग्रीवो भश्चपृष्टठो दुरा्ृतिः। 

खरस्तारुफङेः साधं पपात धरणीतखे ॥ २०॥ 
उसकी दोनों जोम, कमर ओर गर्दन टूट गयीं । पीठकी 

दड़ी भी चूरचूर हो गयी । उसकी आकृति बहुत वरिगड़ गयी 

ओर व्ह गदभासुर ताल्फ्लके साथहीप्रथ्वपर भिर 

पड़ा ॥२०॥ 

तं गतासुं गतधीकं पतितं वीक्ष्य गरदभम्‌। 

क्षातींस्तथापर्सास्तस्य तणराजनि सो ऽक्षिपत्‌ ॥ २१९ ॥ 
घेनुकासुरको ्राणद्रूल्य ओर श््टौन होकर प्रथ्वीपर पड़ा 

देख बरलरामजीने उसके दते मार्ई-बन्धु्ओको भी उसी प्रकार 

ताइव्रक्षपर दे मारा ॥ २९ ॥ ॥ 

सा भूगर्दभदेदेश्च तादः पषवैश्च पातितैः। 

वभासरे छन्जल्दा . चौरिवाग्यक्शारदी ॥ २२॥ 


वहोकी भूमि गधोंकी लो तथा गिराये गये परिपक्व - 


तालफरषि आच्छादित होः जिसमे शरद्‌ ऋुकरे लक्षण प्रकट 
नहए हँ ओर बादर छा रदे दयँ, ेसे आकारके समान 
सुयोमित होने र्गी ॥ २२॥ 
तस्मिन्‌ गर्दभदैत्ये तु साकुगे विनिपातिते । 
रम्यं तारूवनं तद्धि भूयो रम्यतरं वभौ ॥ ६३॥ 
सेवर्कोषदित उस ग्दभस्यधारी दैत्यकरे मारि जानेपर वह 
खुरम्य ताल्वन ओर अधिक रमणीय प्रतीत होने लगा ॥२३॥ 
विप्रसुक्तभयं शुश्ं विविक्ताकारदरशनम्‌ । 
चरन्ति स्म सुखं गावस्तत्‌ ताकवनमुत्तमम्‌ ॥ २९ ॥ 
उत भ्र ताल्वनका सास भय दूर दो गया । उसके 
एकान्त प्रदेशका भी सरको दर्शन होने क्गा तथा उस उत्तम 
वनमे गौठ सुखपूव॑क चरने लगीं ॥ २४ ॥ 
ततः प्रविष्टास्ते सवं गोपा वनविचारिणः। 
वीतशोकभयायासाश्चञ्चू्यन्ते ` समन्ततः ॥ २५॥ 
तदनन्तर वनमे विचगनेवाठे समी गोप उस ताख्वनमें 
जा शुसे । उनका शोकः मय ओर आवा दूर हो गया था; 
अतः वे वरहो सवर ओर व्रारेवार विचरण करने स्मो ॥ २५ ॥ 


# 
१ 


२५२ 


ततः सुखं प्रकीर्णीसु गोपु नगेन्द्रधिकमो । 
दुमपणीसनं छया तौ यथार्ह निपीदतुः ॥ २६॥ 
तदनन्तर जग गौर सुखपूर्वकर सप्र ओर फैलकर चर 


श्रीमहाभारते सिकभागे 


[ शस्ये 


छ्गी, तवर गजराजके समान पराक्रमी श्रीटरप्ण ओौर व्रटरम 
वु्धोके प्तोका आनन लगाकर यथोचित रीतिसे त्रेः 
गये ॥ २६ ॥ 


इति श्रौमदाभारते खिलभगे हरिव विष्णुपर्वणि शिद्युचर्यायां परेरुफवपे त्रयोदकोऽध्यायः ॥ ५३. ॥ 


दस प्रफार श्रीमहाभारते व्िरभाग दसिंएके अन्तरगत पिष्णुपप्रमे वास्रीरति प्र्मगमे 
धेनुकासुरका वथेविषयफ तेर्दवे{ मध्याय पूरा दुभा † ५३ ॥ 


चतुर्दशो £ # 
चतुदराोऽध्यायः 
वटरामरहयस प्ररम्वरासुरका वध 


वैशग्यायन उवाच 
अय ती जातद्पौ तु वसुदेवसुतावुभौ । 
तत्‌ ताल्वनसुर्ख्ज्य भूयो भण्डीरमा।यतौ ॥ ९ ॥ 
वैशम्पायनजी क्ते है--जनमेनय ¡ तदनन्तर दर्- 
म भरे हुए मे दोर्नो वञुदैवकरुमार उस ताख्वनको छोडकर 
पुनः भाण्डीरवरके पास आ गये ॥ १ ॥ 


चारयन्तौ चिचद्धानि गोधनानि श्युभानि च । 
स्फीतस्रस्यपरूढानि वीक्षमाणौ वनानि च ॥ २ ॥ 

वरहो वे ृट-पुष्ट ओर सुन्दर गोधर्नोको चरते तथा 
वदी हू खेतीसे सम्पन्न वनस्यलिर्योकी शोभा निदहास्ते हुए 
विचरने लगे ॥ २॥ 


क्वेडयन्तौ प्रगायन्तौ प्रचिन्वन्तौ च पादपान्‌ 1 
नामभिन्यीदरन्तौ च सवत्सा गाः परंतपौ ॥ ३ ॥ 

शघ्रुओको संताप देनेवले वे दोनों भाई कमी ताल 
ठोक्तेः कभी गीत गाति, कमी वघ फल-पूक ओर पत्ते 
तोड़ते ओर कमी बछ्डेवाटी गौ्ओंको उनके नाम ञेन्लेकर 
पुकारते थे ॥ ३॥ 


नियो गपाहोरासक्तैः स्कन्धाभ्यां शुभलक्षणौ । 
वनमाखाङखोरस्कौ वालम्ङ्ाविवप॑भौ ॥ ४ ॥ 

कंधेपर गौ बंधनेकी रस्सी उलि; सुन्दर रक्षणेसि 
सम्पन्न तथा वनमाखसे विभूषित वक्ःस्थल्वाले वे दोनों वीर 
नये सीरगोवाठे वुकि समान शोभा पाते थे ॥ ४ ॥ 


खवगीस्जनचूणोभवन्योन्यसदशम्वरो _ । 
महेन्द्रायुधसंसक्तौ श्॒ङ्ककृष्णाविवाम्बुदौ ॥ ५ ॥ 
उन दोनेमिंसे एकके शरीरकी कान्ति सुवणे-चूणैक़े समान 
गौर थीः तो दूसरेकी अज्ञन-चणेके समान द्याम । वे दोना 
- एक दूसरेके अज्खोके समान रंगवले वख धारण करते थे 
( अर्थात्‌ गोरे वलमद्रका वलन श्रीकृप्णकी अज्ञकान्तिके समान 
नील था ओर क्यामयुन्दर श्रीकृष्णका'यस्र वलभद्रकी अङ्ग- 
प्रमाके समान सुनदस एवं पीला था ) । वे दोन इन्द्रधनुपसे 


सटे दए दवेत ओर काटे शंगकरे दो व्रादकि समान जान 
पढते थे ॥ ५ ॥ 
कुदयाग्रङ्खुमानां च कर्णपूरो मनोरमौ । 
वनमर्गेघु क्वणो चन्यवेषधरावुभौ ॥ £ ॥ 
वे दोनों बनके मार्गापर कुशेकरि अग्रभाग तथा पूरके 
मनोरम कर्णपूर बनाकर धारण करते यर यन्य वेप ग्रहण 
करफे ठोभा पतेये॥६॥ 
गोवर्धनस्याजु चसौ वने सलुचयौ तु तौ। 
चेरतुटोंकसिद्धाभिः क्रीडाभिरपराजितौ ॥ ७ ॥ 
वनम उन दोनो पीटे चटनेवलि ब्हुत-से गोप-वाटक 
थे । उर साय चकर वे दोनों भाई गोवर्धनके आखया 
विचरा करते थे । वे कभी किससे पराजित दोनेवलि नरी 
ये । भाण्डीरवरके पास खोक-प्रचलित ब्राख्करीडार्थीद्वास 
मन ब्रहलते हु श्रीकृणा ओर व्रलराम विचरण करने रगे ॥ 
तावेवं मालं दीश्ां चहन्तौ सुर पूजितौ । 
तस्नातिगुणयुक्ताभिः कीडाभिश्चेरतुवेनम्‌ ॥ ८ ॥ 
इस प्रकार दैवताओंद्वाा पूजित दोनेपर भी वे दोर्ना 
मानवी दीक्ना अहण करफे मनुप्य-जातिके गुणो युक्त क्रीडे 
करते हए वनम घूमने स्मे ॥ ८ ॥ 
तौ तु भाण्डीरम!धित्य वालक्रीडायुवर्तिनौ । 
म्रात्तौ पर्मश्षाखाद-चं न्यघ्रोचं इएखिनां वरम्‌ ॥ ९ ॥ 
भाण्डीरके निकट आकर व्राटोचित क्रीडामि सो हुए 
वे दोना भाई उस उत्तम राखि सम्पन्न एवं इषम श्रेष्ठ 
वरे नीचे आ गये॥ ९॥ 
तज त्वान्दोलिक्राभिच्च युद्धमार्मविक्षारदौ । 
अर्नभिः क्षेपणीयेश्च तौ उायाममङ्कर्वताम्‌ ॥ १०॥ 
युद्धकी प्रणार्छीमे परम चतुर वे दोनो भाई वरहो कमी 
शला चलकर ओर कमी फेकनेयोग्य पत्थर पककर व्यायाम 
करने लगे ॥ १०॥ 
युद्धमर्गँश्च विविधे पाक्ैः सदिताबुभौ । 
सुदितौ सिदविक्रान्तो यथाकामं विचेरतुः ॥ ९१॥ 


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विष्णुपवे ] 
. नाना प्रकारे युदक पैतरे दिखते हु बे दोनो सिंहके 


, समान पराक्रमी वीर ग्वालारेके साथ रहकर अपनी इन्छाके 
अनुसार सानन्द विचरने रगे ॥ ११ ॥ 


तयो रमयतोरेव तर्धिष्खुरसुयोत्तमः। 
प्रछस्बोऽभ्यागमत्‌ तज च्छिद्रान्वेषी तयोस्तदा ॥ १२॥ 
गोपाल्वेषमास्थाय वत्यपुष्पविभूषितः। 
खोभयानः ख तौ वीस हास्यः कीडनकेस्तथा ॥ १३॥ 
वे दोनो जव इस प्रकार खेला आनन्द ठे रहेथेः 
उसी स्मय उन्द उठा ठे जानेकी इच्छते असुरोमि श्रेष्ठ 
प्रलम्ब एक गोपनाटकका वेष धारण करके वर्हा आया । 
उसने वन्य-पर्पोसि अपने-आपको विभूषित कर रखा था । वह उस 
समय उनका छिद्र (उन्हं उठा ठे जनेका अवसरो रहा 
था ओर उन दोनो वीर्यौको अपने हसी-खेरते छमा रदा था॥ 


` सोऽवगाहत निदा्कस्तेषां मध्यममायुषः । 
माषं वपुरास्थाय प्रखम्यो दानवोत्तमः ॥ १४॥ 
दानवप्रवर प्रलम्ब मनुष्य न होनेपर भी मनुष्यका हरीर 
धारण करे निःशङ्धमावते उन व्राठकोके वीच घुस गया ॥ 
प्रकरीडिताश्च ते सवै सह तेनामरारिणा । 
गोपाठवपुषं गोपा मन्यमानाः सखवान्धवम्‌ ॥ १५॥ 
वे सव्र वाल्क उस देवद्रोहीके साथ खेख्ने खगे । वह 
ग्वाछ-बालका वेष धारण करके आया था, हससि समस्त 
गोप उत्ते अपना मार्ई-बन्धु दी मानते ये ॥ १५॥ 
स तु च्छिद्रान्तरपेप्सुः प्रम्बो गोपतां गतः। 
हृषि प्रणिदधे छष्णे सैहिणेये च दारुणाम्‌ ॥ १६॥ 
परंतु गोपवेशमे आया हगा प्रलम्ब उन दोनों वीर्यौकी 
“ दुत्रैख्ताक्रा अवसर द्वद रदा था, इसस्थि उसने श्रीकृष्ण 
ओर वख्यमपर कूरतापूरणं दृष्टि डाली ॥ १६ ॥ 
अविषह्यं ततो मत्वा छृष्णमद्धुतविक्रमम्‌ । 
रौहिणेयवधे यत्नमकरोद्‌ दानवो्तमः ॥ १७ ॥ 
श्रीकृष्णका पराक्रम अद्भूत था, इपस्यि उन्हे अजेव 
मानकर उस दानवराजने रोहिणीकूमार बल्रामजीको मारनेका 
प्रयन्न किया ॥ १७ ॥ 


हरिणाक्रीडनं नाम वाखक्रीडनकं ततः। 
परक्रीडितास्तु ते सवे दौ द्धौ युगपदुत्पतन्‌ ॥ १८॥ 

` तदनन्तर वे सव॒ ग्वाल-व्ाल हरिणाक्रीडन नामक 
बाखोचित खेर खेखने रमो । उस्म दो-दो वाल्क एक साथ 
उरते हुए कु दुर जति थे ॥ १८ ॥ 

१. पक निश्चित लक्षयके पास पक साय दो-दो वालक हिरनकी 
भति उचछल्ते हए जाते द । जो दोनोमिं पे पच जाता रै, वह 
बिजयी होता रै । हारा हुआ वारक जीते हृपएको अपनी पीठपर 
चढाकर मुख्य स्थानतकं ठे आता दै, यष्टी हरिणाक्रीडन ई । 


२५ 


कृष्णः श्रीदामसदहितः पुष्टये ` गोपस्‌ खना । 
संकर्षणस्तु प्टुतवान. प्रलम्बेन सहानघ ॥ १९॥ 
गोपालास्त्वपरे दन्द गोपाैरपरैः सह । 
्रदुता ल्यन्तो वै तेऽन्योन्यं छघुविक्रमाः ॥ २०॥ 
निष्पाप जनमेजय ! श्रीदामाके साय श्रङष्ण ओर 
ग्वारवालके वेषमे आये हुए प्ररम्बके साथ संकरेण कूद-कूद्‌- 
कर चलने कमो इषी तरह दुसरे गबाल्बाल अन्य ग्वालवा्कि 
साथ दो-दोकी जोड़ी वनाकर एक-दूसरकों खंषि जनेका 
प्रयल कसते हुए. शीघ्र गतिते उचछरते हुए चलने रगे ॥ 
श्रीदाममजयत्‌ कृष्णः प्रभ्वं रो्िणीखुतः । 
गोपाठैः रष्णपश्चीयै्भोपाखास्त्वपरे जिताः ॥ २१ ॥ 
उस खेल्मे श्रीङृष्णने श्रीदामाकोः रोहिणीनन्दन 
ब्ररुरामने प्ररुम्बको तथा अन्यान्य `ङष्णपक्षीय गोपने दूसरे 
पक्षके गोपोको पराजित कर दिया ॥ २१ ॥ , 
ते वाहयम्तस्त्वन्योन्यं संहषौत्‌ सदसा द्रुताः । 
भाण्डीरस्कन्धमुदिदय मयौदां पुनरागमन्‌ ॥ २२॥ 
जो-जो चालक हरि थेः वे भपने साथके विजयी बालक 
को पीठपर ढोति हुए दर्षकरे साथ सहसा दौड़े ओर भाण्डीर बृक्चके 
तनेतक पर्हुचनेकी नियत सीभापर पर्हुचकर फिर लौट आधे ॥ 
संकर्षणं तु स्कन्धेन हीघ्रमुत्क्िप्य दानवः । 
दुतं जगाम विमुखः सचन्द्र इव तोयदः ॥ २३॥ 
परंतु दानव प्रलम्ब वररामजीको खी दी अपने कधे- 
पर चाकर वहसि विमुख हो तीव्र गतिसे आकाशकी ओर 
चल दिया । उस समय वह. ऊपरी मागम चनद्रमाको धारण 
किये काटे मेप्रके समान जान पड़ता था ॥ २३॥ 
स॒ भारमसदंस्तस्य रौिणेयस्य धीमतः। 
चवृघे सखुमहाकायः' श्ाक्राक्रान्त दवाम्बुष्‌ः ॥ २७ ॥ 
उद्धिमान्‌ रोहिणीनन्दन बलरामके, भारको सहन म कर 
सकनेके कारण वह दानव बद्ने लगा । बदते-बदवे वह 
विशारकराय दो इन्द्रका वाहन वने हए मेधके समान प्रतीत 
होने रगा ॥ २४॥ 
स॒ भाण्डीरवरधस्यं -दग्धाञ्जनगिरिग्रभम्‌ । 
स्वं वपुर्दशेयामासर प्रलम्बो दानवोत्तमः ॥ २५॥ 
दानवराज प्रलम्बने वर्हो अपने शरीर्को भाण्डीरवर तथा 
जले हुए कजलगिरिके समान दिखाया ॥ २५॥ 
पश्चस्तवकयुक्तन मुङ्टेनाकौवच॑सा । 
दीष्यमानाननो दैत्यः सुगरकान्त इवाम्बुदः ॥ २६ ॥ 
उस देत्यका मुख पोच पुष्पगुच्छेसे युक्त सूरय-व॒ल्य 
तेजस्वी मुक्ते देदीप्यमान था । उस मुक्कुरको धारण करके 
वह सूर्यते आक्रान्त हुए काले मेषे समान जान पड़ता था ॥ 


२५४ धीमहाभारते सिलभागे [ शसि 
महाननो महाग्रीवः सखुमद्ानन्तकोपमः। तवर रोदिषीनन्दन वटरामके चरि भौर वल्को मली- 


रौद्रः शाकरर्चक्राक्षो नमयंश्चस्णैर्महीम्‌ ॥ २७ ॥ 
उसका मुख बहुत बडा था गरदन भी चैसी ही यी। 
वह्‌ महाकाय दैत्य यमराजके समान भयंकर दिखायी देता 
था 1 उसकी अविं गादीक पदिये-ती घूम रदी थीं । वह अपने 
वैरि पृरथ्वीको छकरा देता था ॥ २७॥ 
सग्दामलम्बाभरणः प्रम्वाम्बरभूपणः । 
वीरः प्रलम्बः प्रययौ लम्वतोय इवाम्बुदः ॥ २८॥ 
उष्करे ग्म एकी खी म्य दोभादे रदी यी। 
उसके वल ओर आभूप्रण मी व्रूहुत व्रदे-बडे थे । वह वीर 
प्रलम्ब नीचेको गिरते हए जलवाल मेधे समान तीव्र गतिषे 
चला जा रहा था॥ २८॥ 
स॒ जहाराथ येगेन रौहिणेयं मदासुरः। 
सागसोपश्मुवगतं त्स्नं लोकमिवान्तकः ॥ २९ ॥ 
उस महान्‌ असुरने रोहिणीनन्दन व्रख्यामको वदं वेगसे 
हर छियाः ठीक उसी तरह जैसे प्रख्यंकर कारु एकार्णवमे 
द्धे हुए समस्त छोकका अपहरण कर ठेता है ॥ २९ ॥ 
हियमाणः प्रलम्बेन स तु संकर्पणो वभौ 1 
उष्टामान इवाकारो काल्मेधेन चन्द्रमाः ॥ २०॥ 
प्ररम्वासुरकरे दवाय दस्कर ले जयि जति हुए संकर्षण 
आकारे रेते जान पड़ते थे; मनो कोई काला मेष 
चन्द्रमाको अपने ऊपर वरिठाकर ल्यिजारादो॥ ३०॥ 
ख॒ संदिग्धमिवात्मानं मेने संकपंणस्तदा । 
दैत्यस्कन्धगतः श्रीमान्‌. र्णं चेदसुवाच ट ॥ ३९॥ 
उस समय व्रलरामने अपने आपको प्राण-संश्चयक्री 
सतिम पड़ा हुआ समक्न । तव दैत्यके केषर वरै हुए 
उन भ्रीमान्‌ संकप्र॑णने श्रीकरप्णसे दस प्रकार कह्‌।---॥ २१॥ 
हवियेऽह रृष्ण दैत्येन पर्वतोद्रग्मवष्पणा । 
प्रदर्शयित्वा मद्टती मायां मानुपरूपिणीम्‌ ॥ २२॥ 
श्रीकृष्ण | यह देखो | मन्न कोद पर्च॑तके समान 
विशालकाय दसय हर्कर लि जात। है । इसने मनुष्यरूप- 
धारिणी महती मायाक्रा प्रदर्शन करके मुने भ्रमे डाल 
दियाथा॥३२॥ 
, कथमस्य मथा कायं दांसनं दुष्चेतसः। 
\प्रलमस्बस्य पनरदस्प्र वुपौद्‌ द्विगुणवचसः ॥ २३ ॥ 
४ ९१ दुता दैत्य बकर बहुत छवा दो गाहे बलके 
“इसकी कान्ति दुगुनी दो गयौ है । मुञ्चे किस तरद 
इसका दमन करना चाषहियेः ॥ ३३ ॥ 
तमाह सस्मितं ष्णः साम्ना दपीकुटेन वै । 
सभिको रौहिणेयस्य दत्तस्य च वलस्य च ॥ २४॥ 


भोति जाननेवाल श्रीकरृष्णने मुसकरक्रर दपमरी सान्त्वना- 
युक्त वाणीम उनते कद।--॥ ३४ ॥ 
अद्ये ऽयं मानुषो भावो व्यक्तमेवरायुपास्यते । 
यस्त्वं जगन्मयं देवं गुद्याद्‌ गुद्यतरं गतः ॥ ३५॥ 
स्मर नारायणात्मानं लोकानां त्यं विपर्यये 
अवगच्छान्मना.ऽऽ त्मानं ससुद्धाणां समागमे ॥ २६॥ 
(अरौ [ आपतोस्य्ट दी मानव-मावक्रा अवटम्बन 
एवं पाटन करते जा द्द द। आपका स्वरूप तो अखि 
विश्वमय है । आप दिव्यस्वरूप तथा रुद्यते भी गुद्यतर ई। 
आप ही समस्त टोर्कोका संहार दोनेपर नासयणरूपसे सिते 
होते द । आप अपने उस सखरूपका स्मरण तो कीन्ि। 
प्र्यकार्ल्मे जव्र सरि समुद्र मिलकर एक दो जाते ई, उस 
समय आप जिस रोधाय नारायणरूपसे विराजमान दते 
है, उसका सख्यं दी अनुभव कीञिये ॥ ३५-३६ ॥ 
पुरातनानां देवानां ब्रह्मणः सलिलस्य च । 
आत्मवृत्तप्रभावाणां संसदं च वै वपुः ॥ २७॥ 
पुरातन देवता; ब्रह्मा; जल तथा अपने चरित्र ओर 
प्रमाव--दन थका आदि कारण तथा जो आपका शाश्वत 
खस्य है, उसका सरण कीजिये ॥ ३७ ॥ 
शिरः खं ते जटं मूरसिः पादौ भूर्द॑दनो सुखम्‌ । 
वायु्खोकायुरुछवासो मनः सोमो भूत्‌ तव ॥ ३८॥ 
'आकराश आपका सिर हैः जल मूरति टै, पृथ्वीं वैर दै, 
अग्नि मुख दै, ठोरकोो जीवन दैनैवाली वायु आपका 
उच्छास दै ओर चन्द्रमा आपका मन है ॥ ३८ ॥ 
सहस्रास्यः सदस्धः सहस्रचरणेक्षणः) 
सदसखपद्मनाभस्त्वं  सहस्नाद्युधसोऽरिदा ॥ २९॥ 
आपके सदस मुखः सदसो शरीर, सदो दाथ-पैर 
ओर सहसो नेत्र ई । आपकी नाभिसे सहर्खो कमल प्रकटं हो 
चुकरे द । आप सदख क्रर्णोवले सूर्य॑को चक्ररूपते धारण 
करफे दात्रर्ओका संहयर कसते ट ॥ ३९ ॥ ` 
यत्वया दितं लोके तत्‌ पश्यन्ति दिवौकसः । 
यत्‌ त्वपरा नोक्तपूर्वं ॑हि कस्तदन्वेष्टुमर्हति ॥ ४० ॥ 
'आपने पूवेकालमे जो कुख दिखाया है, संसारम उग्ीको 
देवता खोग देखते ई । अगपरने पदले जिसकी च्चा नदी की 
है, उसका अनुसंधान कौन कर सक्ता है १॥ ४० ॥ 
यद्‌ वेदितव्यं रोकेऽस्सिस्तर्वय। समुद्‌।हतम्‌ । 
विदितं यत्‌ तवैकस्थ देवा अपि न तद्‌ विदुः ॥ ४९॥ 
प्जग॑तूमे जो क्रु जानने योग्य है, उसक्रा आपने 
प्रतिपादन कर दिया है । एकमात्र आपको जो तख ज्ञातदै, 
उसे देवता भी नदीं जानते ॥ ४९ ॥ 


विष्णुपवं ] 


आत्मजं ते वपुञ्योम्नि न प्यन्त्यात्मसम्भवम्‌ । 
यत्‌ तु ते कृत्रिमं रूपं -तवर्चन्ति दिवौकसः ॥ ४२॥ 
पापका जो सहजः आकाशम भी व्यापक एवं खयम्भू रूप 
द, उस ( विशय सनातन एवं निरुंण-निराकार सूप ) को 
देवता भी देख या समश्च नदीं पाते दै । मरक्तोपर अनुग्रह 
करनेके चयि भाप जो सरुण-साकार रूपसे अवतार अ्रहण 
करते रै, उसीकी देवता रोग पूजा एवं आराधना कसते दै ।।४२॥ 
देवेन दध्शचान्तस्ते तेनानन्त इति स्मरतः 
त्वं हि सुक्ष्म महानेकः खुक्तवैरपि दुरासदः ॥ ४३॥ 
ददेवताओनि भी आपका अन्त नही देखा है, इलि 
आप अनन्त मने गये ई । आप दी सूक्ष्म, महान्‌ ओर एक 
ह} सष्षम बुद्धि-दन्दरियादिके द्वारा मी आपको जानना या 
पाना अव्थन्त कठिन है ॥ ४२ ॥ 
त्वय्येव जगतः स्तम्भे शाश्वती जगती स्थिता । 
अचला प्राणिनां योनिधौरयत्यखिरं जगत्‌ ॥ ४४ ॥ 
'ञाप ही इस जगत्‌ॐ ्धार्सम्भ ह । आपपर 
प्रतिष्ठित होकर ही यह सनातन पृथ्वी अविचठ भावसे 
सम्पूणं जगतो धारण करतो है ओर समस्त प्राणिर्योकी 
उत्यत्तिका खान वनती है ॥ ४४ ॥ 
चतुःसागरभोगस्व्वं चातुर्वण्य॑धिभागवित्‌। 
चतुगेु कानां च।तुं्हौचफल।दानः ॥ ४५॥ 
ध्चारो समुद्र आपके स्वरूध है । आप चारों वणक 
विभागको जननेवले है । चास युगोमे लोकोके चातुर्होत्र 
यक्तकाजो फर हैः उसक्रा उपभोग करनेवले भी आप 
ही दै ॥ ४५॥ 
यथाहमपि छोकनां तथा त्वं तच मे मतम्‌। 
उभवेक्रशरीर सखो जगदृर्थं द्विधाकूतौ ॥ ४६॥ 
“जैसे मँ समस्त ठोकोका अन्तर्यामी आत्मा हूः वैसे दी 
आपमी ईः यदा मेरा मत है। हम दोनो दी एक शरीरबले दैः 
केवल जगत्के हितके ल्थवि दो रूपोमे प्रकट हुए दै ॥ ४६॥ 
अहं वा शाश्वतः रृष्णस्त्वं वा दोषः पुरातनः । 
- रोकानां शाश्वतो देवस्त्वं हि शोषः सनातनः। 
आवयोदेहमातेण द्विधेदं धार्यते जगत्‌ ॥ ४७॥ 
भम सनातन विष्णु हँ ओर आप पुरातन शेष है; तीनों 
लोकोके सनातन देवता तथा सनातन शेष आपही दैः 
हमारा चिन्मय शरीरमात्र ही ( विप्णु या अनन्तरूपसे ) 
इस जड चेतनमय द्विविध जगत्‌फौ धारण करता है ॥ ४७॥ 
अहं यः स भवानेव यस्त्यं सो ऽहं सनातनः । 
द्विव विदितौ ह्यावमेकदरेदौ महावलौ ॥ ७८॥ 
"जोम वह आपदयी है। जो आप हैः वह सनातन 


चतुददोऽध्यायः 


नरज व्व्य् 


पुखष मँ ही हू | हम दोनों ही एकर आत्मा है रितु इस 
समय दो महाबली सरूपो प्रकट "हुए दै ॥ ४८ ॥ 
तदास्से मूढवत्‌ त्वं कि प्राणेन जहि दानवम्‌ । 
मूध्नि देवरिपुं देव वज्रकङ्पेन सुष्टिना ॥ ४९॥ 
ष्देव ! आप किंकतेव्यत्रिमूदकी मति ` क्यों चुपचाप 
बेठे है १ ब्पू्वक इस दानवको मार डालि । अपने चज्ञ- 
वस्य सुक्करेसे इस देवद्रोदीके मस्तकपर प्रहार दीजिये, | ४९॥ 
वेश्नम्पायन उवाच | 
संस्मारितस्तु छृष्णेन रौहिणेयः पुरातनम्‌ । 
बलेनापूय॑त तद्रा शेरोक्यान्तरचारिणा ॥ ५०॥ 
वैशस्पायनजी कते हैँ--जनमेजय ! भगवान्‌ 
भ्रीकृष्णने जबर इस प्रकार पुरातन रहस्यका स्मरण दिखाया 
तवर रोहिणीनन्दन वलराम त्रिलोकीके भीतर व्याप्त दए 
अनन्त ब्रलते परिपूर्णं हो रये ॥ ५० ॥ 
ततः प्रखुम्वं दुवत्तं स वद्धेन मदाथुजः। 
सृष्टिना चञ्जकट्पेन मूधिनि चैनं समाहनत्‌ ॥ ५९१॥ 
तवर उन महाबाहु वीरने- दुराचायी- प्रम्बासुरफे 
मस्तकपर अपनी र्वेधी हुईं वन्रतुस्य , मुष्टिकासे प्रहार 
क्रिया ॥ ५१ ॥ 
तस्योत्तमाङ्गं स्वे काये विकपाटं विवेश्च ह । 
जाञुभ्यां चादतः देते गताघुदरनवोत्तमः ॥ ५२॥ | 
इस्त उसको खोपड़ी उड़ गयौ ओर शेष मस उसङ्क 
धडम ही धेस गया | फिर वह घायल हुमा दानवराज 
परथ्वीपर घुटने टक्कर गिर पड़ा ओर प्राणहीनं होकर 
सदाके च्यि सो गया | ५२॥ । 
जगत्यां विप्रकीर्णस्य तस्य रूपमभूत्‌ तदा । - 
प्रङम्बस्याम्बरस्थस्य मेधस्येव विद्यत. ॥ ५३ ॥ 
जेते आकारामे रिथत हुए मधकरी घटा जग्र छिन्न मिन्न 
होकर वरिखर जाती दै उस समय उसका जैसा रू्प.दिखायी 
देता है, प्रथ्वीपर टूक-टूक टोकर विखरे हुए प्ररुम्बासुरका 
रूप भी वैषा दी दष्टगोचर हुआ ॥ ५३ ॥ 
तस्य्‌ भसनत्तमाङ्गस्य देत्‌ खुखाव शोणितम्‌ । 
बहुगरिकसंयुक्त दोखम्शङ्गादिवोदकम्‌ ॥ ५४ ॥ 
कटे-फटे मस्तकवले उस असुरॐ शरीरसे खूनकी धारा 
वह चली, मानो पवतके रिखरसमर अधिक ओर मिला हुआ 
जल प्रवाहित हो रहा हो ॥ ५४ ॥ 
तं .निरत्य लम्बं तं . संहत्य वमात्मनः] 
पयंष्वजत वं ऊष्णं रौहिणेयः प्रतापवान्‌ ॥ ५५ ॥ 
इस प्रकार मरलम्बासुरको ,मारकर अपने वल्को पुनः 
समेट ठेनेके याद प्रतापी रोदिणीक्रुमार वलरामने श्रीकृष्णकरो 
हदयस खगा लिया ॥ ५५ ॥ 


२५६ 


श्रीमहाभारते खिकभागे 


[ हरिवंशे 


तं तु छष्णश्च गोपाश्च दिविस्थाश्च दिवौकसः । 
व॒ष्टुबुर्निदते दैत्ये जयाीभिर्महावलम्‌ ॥ ५६॥ 
उस समय उस दैत्यके मारे जानेपर श्रीकृष्ण, गोपगण 
तथा आकाशम खद्धे हए देवता विजयसत्चक आखीर्वाद 
देते हए महावरली वल्रामजीकी स्वति करने खो ॥ ५६ ॥ 
वठेनायं इतो दैत्यो वाखेनाङ्धिष्टकर्मणा । 
विवदन्त्यश्यैरिण्यो वाचः सखुरसमीरिताः ॥ ५७ ॥ 
'अनायास दी महान्‌ कम॑ करेवाले इस वाल्कने एेसे 
महान्‌ दैत्यको ब्रलमू्वंक मार गिराया› इस प्रकार देवतार्ओकी 
ककी हई आकारावाणी वारंवार प्रकट दोने र्गी ॥ ५७ ॥ 


वल्देवेति नामास्य देवैरूकं दिवि स्थितैः । 

वं तु वख्देवस्य तदा भुवि अना शिवुः ॥ ८८ ॥ 
उस समय आकारा्मे खड हए देवार्भनि उनका नाम 

वल्देव रख दिया । तमीसे भूतलके मनुभ्य भल्देवजीके 

वको जानने क्रो ॥ ५८ ॥ 

कर्मजं निहते दैत्ये देवैरपि इुयसदे ॥ ५९॥ 
जो देवता्येकि च्वि भी दुर्जय थाः उस प्रलम्ब नामक 

दैस्यके मारे जानेपर वख्रामजीको उनके प्राक्रमके अनुखार 

वह ( वल्देव ) नाम प्राप्त हया था ॥ ५९ ॥ 


दति श्रीमहाभारते धिरुभागे हरिवंशे विष्णुपवैणि शिद्युचयोयां प्रखम्बवधे चतुदशोऽप्यायः ॥ १४ ॥ 


दस प्रकार श्रीमहाभारते सिरुमाग हरिवंशे अन्तत व्रिष्युपतैमे बारुलीरके प्रसङ्गमे 
प्रर्वापुरका वधवरिषयक चौद; भघ्याय पृस हुमा ॥ ६४ ॥ 
9 । 3 


पञ्चदशोऽध्यायः । 
हनदरोत्सवके विषयमे श्रीकृष्णकी जिज्ञासा तथा एक बद्ध गोपके द्वारा उसकी आवश्यकताका प्रतिपादन 


वैश्चम्पायन उवाच 
वयोः घचृत्तयोरेवं ष्णस्य च वरस्य च । 
वने विचरतोमीसौ व्यतियातो स्म वापिकौ ॥ १॥ 
वैशम्पायनजी कहते ह--जनमेजय | श्रीकृष्ण 
जीर वख्राम दोरनौकि इस प्रकार वाललीका्मे प्रवृत्त होकर 
वनम विचरते हुए. वकि दो मास व्यतीत हो गये॥ १॥ 
व्रजमाजग्मतुस्तौ तु चजे शुश्चुवतुस्तदा । 
प्राप्तं शक्रम वीरौ गोपश्योत्सवलारुसान्‌ ॥ २ ॥ 
एक दिन जत्र वे दोन वीर त्रजमे येः तव उन्हेनि उना 
कि इन्द्रयागके उत्छवका समय आ गया है ओर समस्त गोप 
उख उत्वको देखनेके ल्यि ल्खायित ह ॥ २॥ 
कौतूहटाषिदं वात्य ष्णः प्रोचाच तत्र तान्‌ । 
कोऽयं दाक्रमह्यो नाम येवषो हर्षं मगतः॥ ३ ॥ 
तव श्री्घम्णने कौनूहृल्वश्च उनके यड व्रात पूटी--भयह्‌ 
इन्द्रयागका उन्सव क्या है ? जिससे व॒मखोर्गोक्रो इतना हर 
्ोरदादैः॥३॥ 
तत्र बृद्धतमस्त्वेको गोपो वाक्यमुवाच द्‌ । 
भ्रयतां तात शक्रस्य यदुं ध्वज इज्यते ॥ ४ ॥ 
उनके इस प्रकार पूनेपर उन गोरपि सत्रे बरडे-वृढे 
एक गोपने इस प्रकार कदा--“तात | सुनो ! दमारे यर्दा 
इनद्रके घ्वजकी पूजा क्िखच्यि की जाती ३, यह 
वताता हूं ॥ ४ ॥ 
देवानामीम्वरः शक्रो मेधानां चारिसूदन । 
तस्य चायं महः ष्ण लोकनाथस्य शाण्वतः ॥ ५ ॥ 


'्तुसूदन कृष्ण | देवतार्ओं ओर मेर्षोक खामी देवराज 
इन्द्र ह ! वे ही सम्पूणं जगत्‌करे सनातन. रक्कद । उना 
यह उत्व मनाया जाता है ॥ ५ ॥ 
तेन संचोदिता मेघास्तस्य चायुधभूषिताः 
तस्येवाक्षाकराः सस्यं जनयन्ति नवाम्बुष्निः ॥ ६ ॥ 

“उदि प्रित हो उर्न्हकि आयुष ( इन्द्रधनुष ) षे 
विभूषित हुए मेष उनकी दी आश्ाका पाठन करते हुए नूतन 
जलकीं वर्षा करके खेतीको उपजति है ॥ ९ ॥ 
मेघस्य पयसो दाता पुखटरतः पुरंदरः । 
सम्प्रहृष्टः स भगवान्‌ प्रीणयत्यखिखं अगत ॥ ७ ५ 

'अनेक नारमोसि विभूषित मगवान्‌ पुरन्दर ८ इन्द्र ) मेष 
ओर जलके दाता द। वे प्रसन्न होनेपर सम्पूर्णं जगत्‌को वष 
करते ह ।॥ ७ ॥ 
तेन सम्पादितं सस्यं वयमन्ये च मानषाः। 
वतंयामोपयुञ्ञानास्तपैयामश्च देवताः ॥ ८ ॥ 

(उनके द्वारा सम्पन्न की हुई खेतीसे ज अन्न वैद होता 
है, उसीको हम तथा वृसरे मनुप्य खःते है, उसका धर्मके 
कार्यम मी उपयोग करते हृ देवतार्थको यज़् आदिके द्वारा 
तृप्र करते दै ॥ ८ ॥ 
देवे वर्प॑ति रोक्रेऽस्मिस्ततः सस्यं परबर्धते । 
पृथिव्यां तपितायां तु सामतं टक््यते गत्‌ ॥ ९ ॥ 

"दस संसारम जवर इन्दरदेव वर्षां करते हैः तब उसीसे 
सेतीकी उपज बद्ती है । वर्षामि ही प्रथ्वीके तृत होनेपर 
सम्पूणं जगत्‌; खजल दिखायी देता दै ॥ ९ ॥ 


विप्णुपवं ] 


पोडश्मो ऽध्यायः 


२५७ 


नवस 


क्षीरवत्यस्त्विमा गावो वत्सवस्यश् नि्ंताः 1 

तेन खंवर्धितैस्ताव दणैः पुष्टाः सपुङ्गवाः ॥ १०॥ 
ध्तात | उस वपति वदी हुई षासद्यार ही सोडोंसदित ये 

गै दुष्ट होकर वच्डे देतीं ओर दृध देनेवाखी 

होती द ॥ १०॥ 

नासस्या नात्रणा भूमिं वुखश्चर्दितो जनः। 

खद्यते य्न टद्यन्ते च्ृष्टिमन्तो वलादक(: ॥ ११] 
(जहौ वर्षां करनेवले मे दिखायी देते ह, उस भूमिपर 


कभी अनाज ओर वणका अभाव नहीं होता तथा वदकि लोग - 


कमी भूखे पीडित नहीं देखे जति ह ॥ ११ ॥ 
दुदोह खवितुगी वै श्तक्रो दिव्याः पयखिनीः। 
ताः श्रन्ति नवं क्षीरं मेध्यं मेघोधधारितम्‌ ॥ १२॥ 
शपूर्यदेवकी दिव्य किरणे एरथ्वीका जल सोखकर पयस्िनी 
(गौ अथवा जल्वती ) दौ जाती ईै तव इन्द्रदेव उनका 
दोहन करते ह 1 उनके दोहन करमेपर वये क्रिरणमयी मौर 
नूतन एवं पवित्र जलरूपी दूध प्रकट करती रैः जिते मेर्घोकी 
घटारूम दुग्धपानमे संचित किया जाता ई ॥ १२॥ 
वाय्वीरितं तु मेधेषु कसेति निनदं महत्‌ । 
जवेनावर्तितं चेव गर्जतीति जना विदुः ॥ १६॥ 
“वही वायु प्रसित होकर वेगसे आवर्तत होनेपर मेधेकि 
भीतर अत्यन्त गम्भीर शब्द्‌ उस्पन्न करता दहै, जिते लोग 
समद्चते दँ कि मेघ गर्जना कर रहा है ॥ १३ ॥ 
(4 (प 
तस्य॒ चैवोहयमानस्य वाधरयुक्तैर्वलादकेः। 
वज्रारनिसमाः राब्दाः श्रूयन्ते नगमेदिनः ॥ १४॥ 
ध्वायुयुक्त मेघोद्रारा ठोयी जाती दृद उस जल्राशिका 
पर्वतमेदी शब्द ही वन्न एवं परिजलीकी गड़गड़ादटके समान 
सुनायी देताहे ॥ १४॥ ` 
तं वञ्जनिष्पेवेर्विसुञ्ति नभोगतः । 
वहुभिः कामगैमेधेः शक्रो भूत्थैरिवेश्वरः ॥ १५॥ 


तैत राजा अपने सेवसे कामल्ेता दै, उसी प्रकार 
देवराज इन्द्र आकाशम फैले हए तथा इच्छानुसार सर्व॑ जा 
सकनेवाठे वदुसंख्यक मेषोंदासा वञ्रकी गङ़्गडादटकी आवाज- 
के साथ उस जल्को इख भूतख्पर ब्ररसति दै ॥ १५ ॥ 
कचिव्‌ दुर्दिनसंकादोः कचिच्छिन्नाभ्रसंनिमेः। 
कचिद्‌ भित्नाक्जनाकारेः कचिच्छीकरवर्पिभिः ॥ १६॥ 
मण्डयतीव देवेन्द्रो विश्वमेवं नभो धनैः। 
कचिच्छीकरसुक्ताभं करुते गगनं धनः ॥ १७ ॥ 
“कर्ही वे मेध दुर्दिन-पे होकर सारे आकादमे छा जाते ईै। 
कहीं फटे हुए बादरछके स्प्मे दिखायी दैते ई । करदं खानसे 
काटकर निकाठे गये कोयलेकरे समान काले होते है ओर कर्दी 
जलरी छोरी-खोरी वदं बरखाते रहते ह । इस तरह विभिन्न 
प्रकारके बादलंदारा देवयजं इन्द्र आकाश वं विश्वको 
अलंकृत-सा करते रहते है । कहीं कष्टं तो वादक पानी बरसा- 
कर आकाश्षको जलव्रिन्दुरूपी मोतियोसे प्रकारित कर 
देता है ॥ १६-१७ 1 
पमेतत्‌ पयो दुग्धं गोभिः सूर्यस्य वारिदैः । 
पजन्यः सर्वभूतानां भवाय भुबि वर्ष॑ति ॥ १८ ॥ 
“इस प्रकार पर्जन्यदेव ८ इन्द्र ) इस पृथ्वीके जलको 
सूर्यकी किरणेदयारा खींचकर सम्पण ्राणिषोकी बृद्धिके च्ि 
उसे मेोद्यारा भूतल्पर बरसा देते द ॥ १८ ॥ 
यस्मात्‌ पराचरडियं कृष्ण राक्रस्य सुषि भाविनी । 
तस्मात्‌ प्राचृपि राजानः सवं शक्रं सुदा युताः। 
महैः सरेशमर्च॑न्ति वयमन्ये च मानवाः ॥ १९ ॥ 
धश्रीकृप्ण | इसील्यि यह वर्पां ऋदु भूतल्पर इन््रदेवकी 
पूजाका समय हे; अतएव समस्त रजा वर्षा करतुम बड़ी 
परसन्नताके साथ नाना प्रकारके उत्सवोदवारा देवराजकी पूजा 
करते दं । हम तथा दूसरे मनुष्य भी एेसा ही करते है" ॥१९॥ 


इति श्रीमहाभारते खिरुमागे हरिव विष्णुपर्वणि किडुचर्यायां गोपवाक्ये पञ्चद्दोऽध्यायः ॥ १५ ॥ 


इस प्रकार श्रीमहाभारते खिकभाग हरिवंदके अन्तरत विष्णुपवमे श्रीडष्णकी वार्टीककि 
रसगे मोपफा वास्यरिषयक पद्रह्ो भध्याय पूरा हुभा ॥ ९५ ॥ 


षोडरोऽ्यायः 
भीकरप्णके दारा गिरियज्न एवं मोपूजनका प्रस्ताव करते हए शरद्‌ तुका वर्णन 


व्रम्पायन उवाच 
गोपद्द्धस्य वचनं श्ुत्वा॒शाक्रपरिग्रहे । 
प्रभावोऽपि शक्रस्य वाक्यं दामोदसोऽबरवीत्‌ ॥ १॥ 
वैशम्पायनजी कहते है--जनमेजव } इन्द्र-महोत्सव- 
को खीकार करनेके सम्बन्धमे उस वदे-वूटे गोपका वचन 


मृ०्दू% ९ -- 


सुनकर इन्द्रके प्रमाककरो जानते हुए भी शरीङृष्णने यह्‌ वात 
कटी) १ ॥ 


वयं वनचरा गोपाः सदा नोधनजीविनः। 
सावोऽस्मद्‌दैवतं विद्धि भगिग्यशथ दनानि च ॥ २॥ 
४आरय ! हमलोग वनमे रहनेवल्े गोप है आर सदा 


२५८ 


गोधनसे अपनी जीविका चलति दै; अतः आपको माद दोना 
चादि कि ग्ट पर्वत ओौर वन-ये दी हमरे देवता ई ॥२॥ 
कुकाणां छमि्त्तिः पण्यं त्रिपणिजीविनाम्‌ । 
गावोऽस्माकं परा घरृचिरेतत्‌ नैवि्यमुच्यते ॥ ३ ॥ 
(करिसार्नोकी जीविका है खेती; व्यापारसे जीवननिर्वाहि 
करनेवाठे वै्योकी जीविका-दृत्तिहै खरीद्-विक्री ओर हमलेगो- 
की सर्वोत्तम वत्ति टै गौर्योक्ा पालन । ये वार्तार्प वियाकरे 
तीन भेद कदलति द ॥ ३॥ 
विद्या यो यया युक्तस्तस्य खा दैवतं परम्‌ । 
सेव पूज्यार्चनीया च सैव तस्थोपकारिणी ॥ ४ ॥ 
धजो जि विधसे युक्त दै, उनके स्यि वही सर्वोत्तम 
देवता दै, वदी पूजा-अर्चकफ़ि योग्य है ओर वदी उसके चयि 
उपकारिणी है ॥ ४ ॥ 
योऽन्यस्य फलमश्चानः करोत्यन्यस्य सच्कियाम्‌। 
द्वावनर्थौ स लभते मव्य चेद च मानवः ॥५॥ 
ध्जो मनुष्य एक व्यक्तिसे फ़ल पाकर उखे भोगता दै ओर 
दूसरी पूजा ( आदर-खत्कार ) करता है, वह इष रोक ओर 
परलोक दो अनर्थका भागी होता टे ॥ ५॥ 
छष्यन्ता प्रथिता खीम। सीमान्तं श्रूयते वनम्‌ । 
वनान्ता गिरयः स्वँ ते चास्माकं गतिर्धुंक ॥ ६ ॥ 
४जर्होतक खेती होती हैः वरहोतक बजकी सीमा विख्यत् 
दे । सीमाके अन्तम बन सुना जाता दै ओर वनकरे अन्तम 
समसत पर्वत दह । वे पर्वत दी दमारे अविचठ आश्रय द ॥६॥ 
श्रुयन्ते गिरयश्चापि चनेऽसिन्‌ कामरूपिणः । 
प्रवद्य तास्तास्तनवो समस्ते स्वेषु सादषु ॥ ७ ॥ 
भुना जातादै क्रं इस वने रहनेवलि पर्वेत मी इच्छानुसार 
रूप धारण करनेवाले ईह । वे मिन्न-मिन्न शरीरोमि प्रवेश करके 
अपने रिखरयोपर मीजसे धूमते-फिसते द ॥ ७॥ 
भूत्वा केसरिणः सिंहा व्याघ्राश्च नयिनां वयः । 
चनानि खानि रक्षन्ति चासयन्तो नच्छिदः ॥ ८ ॥ 
शवे ही अयालोते विभूषित सिंह ओर नखधारी जन्तुम 
भ्रेष व्याध वनकर वनको कायने या हानि पर्हुचानेवले र्गो 
को चास देते हुए अपने-अपने वनोकी रक्षा कसते द ॥ ८ ॥ 


यदा चैषां विक्ुर्बन्ति ते वनार्यजीविनः। 
घ्नन्ति तानेव दुर्बत्तान्‌ पौरुपादेन कर्मणा ॥ ९ ॥ 
धजव वनके आश्रये रदूकर जीवननिर्वाद करनेवाले लोग 
इन वनौ या वनदेवतार्ओकरो हानि पर्चति ईद, तव चे कामरूपी 
देवता राक्षसो चित िंखाकर्मके द्वार उन दुराचारी मनुर्प्योको 
निश्चय दी मार डल्ते दह्‌ ॥ ९॥ । 
मन्बयक्षपस विध्राः सखीतायक्षाश्च कपुंकाः। 
गिरियक्षास्तथा गोपा इञ्यो.ऽस्माभिमिरिर्ने ॥ १०॥ 


श्रीमहाभारते खिकभगि 


[ हरिवंशे 
ध्राह्मणलेग मन्त्रम तत्पर रते ई, किसान सीता- 
यज्ञ करते ई धर्थात्‌ खर्तोको अच्छी तद जोततै ओर दृठ 
जोतनेसे जो रेखा घन जाती दे, उसकी तथा दट्की पा 
करते द तथा गोपगण गिरियन करते ई; अतः दमलो्गको 
दख वनम गिरियश्ञ करना चादिये ॥ १० ॥ 
तन्मयं रोचते गोपा गिस्यिक्षः प्रचर्त॑ताम्‌ | 
कम॑कृत्या छुखेस्याने पाद्पेप्वधवा गिसै ॥-११॥ 
तत्न हत्वा पद्यम्‌ मेध्यान्‌ धितत्यायतने द्ुभे । 
सर्व॑घोपस्य संदोहः क्रियतां कि विचार्यते ॥ १२॥ 
ध्गोपगण | मुन्चे तो यदी अच्छा ख्गता 2 फ गियिल- 
का आरम्भ दलो | खस्तिवाचन आदि कर्म करफे दवो नीचे 
अथवा पर्वतकरे समीप किसी सुखद खानपर पवित्र पुर्ओकी 
पक्र करे उनके पाञ्च जाकर ` उनका विस्तारपूर्वक पूजन 
फिया जाव ओर एक ज्म मम्दिस्मे खरे जके दूधकरा संग्रह 
कर लिया जाय } इश्च विप्रयमे आपलोग क्या विचार कर 
रदे द ॥ ११-६२॥ | 
तं दारत्छकखुमापीडाः पसिवायं प्रदक्षिणम्‌ । 
गाघो गिरिवरं सवौस्ततो यान्तु पुन््रजम्‌ ॥ १३॥ 
धिर शरद्‌ ऋतुके लसि जिन मस्तक्का श्द्वारकिया 
गया दो; सी समस्त गोद गिरिवर गोवर्धनङी दक्षिणाव्तं 
परिक्रमा करके पुनः वरजम ज्ये ॥ १३ ॥ 
पराप्ता करिटेयं हि गर्वा खाद्ुतोयदणा गुणैः । 
दरत्‌ प्रमुदिता रम्या गतमेधजङाद्यया ॥ १४॥ 
श्त समय प्रमोदपू्णं रमणौय श्रद्‌ आ गयी हैः 
जवर क्रि जठ ओर्‌ प्रा गौर्मे लि खादत युगेसि सम्पत्न 
दयो जति ई। अव जलदा्ोरमि पानी व्ररसानेवाठे बादल 
छट गये ॥ १४ ॥ 
प्रियकैः पुष्पितमरं दयाम वाणाक्तनैः कचित्‌ । 
कटोरतृणम(भाति नि्ंयूरर्तं चनम्‌ ॥ १५॥ 
शचि दए कदम्ब-पुर्ोके कारण वन गौरवर्णश्न प्रतीत 
ह्येता दै । कदी कीं वाणासर्नो--स्ाङ्-क्ंखाहोके कारण वह 
द्याम रंगक्रा दिखायो देता है ! अव बां कोमल नहीं रदी- 
कुछ कठोर हो गयी ह| वनमे मोर्योकरी मधुर वाणी नेहीं 
सुनायी देती दे ॥ ९५ ॥ 
विजटा विमला व्योर्नि विवलाका विविदयुतः। 
विवर्धन्ते जखधरः विदन्त इव छऊुञसः ॥ १६॥ 
भआकायमे जः मकः ब्रलका थर विद्युतूसे रहित बादल 
दन्तदीन हाथि्धेकि समान चद्‌ ररे ई ॥ १६॥ 
पटुना मेधवातेन नवतोयालुकर्पिणा । 
पर्णोत्करधनाः सवं प्रसादं यान्ति पादपाः ॥ १२७॥ 
५( वर्धा छदम ) नून चछम्ने खच खनव शक्ति- 


विष्णुपर्व ] 


पोडशषोऽध्यायः 


२२५९ 


जज वव 


शाटी मेघयुक्त वायुसे अभिप्रिक्तं होनेके कारण जो प्तक 
चाहुस्यसे धने दिखायी देते थे, वे समी बृ अव पततो 
धिरल द्ये जनेते प्रसादको प्रात दो रहे है ( पदे वदा 
अन्धकार छया रदता था अव प्रकाश हौ गया दै ) ॥ १७॥ 
सितवणीम्बुदोप्णीपं दंसचामरवीजितम्‌ । 
पू्णचन्द्रामलच्छनं साभिपेकमिवास्बरम्‌ ॥ १८॥ 
(दस समय आकाशा मूर्धामिविक्त राजाके समान जान 
पड़ता है । सफेद वादल ही उसकी वेत पगड़ी या उज्ञ्वल 
मुकुट दैः हंसरूपी श्वेत चैवे दारा मानो उसके व्यि हवा 
की जाती है तथा पूर्णं चन्द्रमा दी उसका निर्मल छन्न बनकर 
दोमा पाता है ॥ १८ ॥ 
सैः प्रहसितानीव समसुत्छृ्टनि सारसेः। 
सवीणि तनुतां यान्ति जलानि जलदक्षये ॥ १९ ॥ 
१वर्षाकाल चीत जानेपर सारे जखासयोके जल क्रमसः 
क्षीण होते जा रे है, मानो हंसनि उनकी हसी उड़ायीहो 
ओर सारसोनि उनकी निन्दा की हो ( इसी खेदसे उनमें 
कृशता आ गयी है ) ॥ १९॥ 
चक्रवाकस्तनतटाः पुटिनश्रोणिमण्डलाः। 
हंसलक्षणदासिन्यः पति यन्ति समुद्गाः ॥ २० ॥ 
'समुद्रगामिनी नदिया हंसरूपी हासते सुशोभित हो अपने 
पति ( समुह ) के पास जा रही द । चक्रवाककरे जेोद़े उनके 
युग उरोज-से जान पडते है ओर दोनों तट नितम्ब-मण्डल- 
की रोमा धारण करते द | २० ॥ 


ऊमुदोत्फुर्छमुदकं ताराभिश्िघमम्बरम्‌ । 
सममभ्युत्सयन्तीव ` श्र्वरीप्वितरेतरम्‌ ॥ २९॥ 


ध्रातकरे समय ( जला्यौमके ) जख्मै अगणिन कुमुद 
खिल उरते ह ओर आकाश असंख्य तारिका्भसि चित्रित 
हो जाता है । वे दोनों मानो एक-दूसरे प्रति गर्व-खा प्रकट 
करते हुए कहते ह किं भ्मेरी शोभा तमसे कम नहीं है ॥ 
मत्तकौश्चावघुषु कलटमापक्पाण्डुषु 1 
 निर्विष्ररमणीयेु वनेषु समते मनः॥ २२॥ 
४जिनमे मदमत्त पुरर्पोकी भोति क्रौञ्च पक्षि्योकी मधुर 
बोरी गूजरी दै जशो पके हुए धानकी बले पीली साङ्मे 
तजी हई सुन्दरी बालओंकी भोति अपनी दवेत-पीत प्रभा 
वरिखेरर ह जीर इस प्रकार जो विवादित स्री-पुरषोके 
कौठकागारके सदश रमणीया धारण कम्ते ई उन वमि 
मनको अधिक आनन्दका अनुभव होता दै ॥ २२ ॥ 
पुष्करिण्यस्तडागानि घा्यश्च विकचोत्पलाः। 
केदारः सरितश्चैव सरांसि च धियाज्वलन्‌ ॥ २३॥ 
'्पोख्िरयोः पोखरे, खिले हए कमर्लसे सुयोभित 
इावदर्यो, खेतोकी क्यार नदिरयो ओर सरोवर--ये सव- 


के-सव्र अनुपम योभा-सम्पत्तिसे प्रकारित हो उठे द ॥ २३॥ 
पड्कजानि च ताराणि तथान्यानि स्ितान्यपि । 
उत्पलानि च नीलानि भेजिरे दारिजां धियम्‌ ॥ २४॥ 
धार कमलः अन्यान्य शवेत-पीत आदि कमल तथा नी 
उत्पल भी जलजनित ोभके भागी हूए ह ॥ २४ ॥ 
मदं जहुः सितापाद्ा मन्दं ववृधिरेऽनिलाः। 
अभवद्‌ व्यश्रमाकारामभू्च निभृतो ऽणेवः ॥ २५॥ 
भमोोका मद उतर गया है । वायु मन्दगतिसे आगे बद्‌ 
रही है ! आकारा बादरि श्ूल्य हो गया है ओर समुद्र भर- 
पूरा दिखायी देता हे ॥ २५॥ 
पपतुपयीयशिथिकै्च्तयत्यसमुज्छितैः । 
मयुराङ्गरुदैभूमिर्वडुनेचेव लक्ष्यते ॥ २६॥ 
ववर्षा ऋतु वीत जानेसे ज यत्र-तत्र शिथिल होकर 
विखरे पड़ है, दत्यका कायं ओर उत्साह समाप्त हौ जानेके 
कारणजोव्याग दिये गये है उन मोर-पंखोकि कारण यद 
भूमि मानो वहते ेत्रोवाटी दिखायी देती हे ॥ २६ ॥ 
स्वपङ्कमलिनेस्तीरेः काडापुष्पकताकुैः । 
हंससारसविन्यासैर्यसुना भाति शोभना ॥ २७॥ 
"जो अपने ही पड्कसे मलिन दौ रदे दै, जहो काश खिले 
हुए है ओर रता फटी हुई दै तथा जिनपरर यत्र-तत्र 
हंस जौर सारसौके बेठनेके यान है, एेते तसि यसुनाकी 
बड़ी शोभा हो रदी है ॥ २७॥ 
कटमापाकरम्येषु केदारेषु जलेषु च। 
सस्यादा जर्जादाश्च मत्ता विररुवुः खगाः ॥ २८॥ 
भ्धानकी वालके पक जानेस रमणीय दिखायी देनेवाटी 
खेतोकी क्यारियमि अनाजके दाने ब्रीनकर सानिवाटे सारस 
आदि पक्षी तथा जलरर्योके जलम मत्स्य आदि जल्जन्तुर्थ- 
का भक्षण करनेवले चक आदि पक्षी कल कररदे द ॥ 
सिपरिचुर्यानि जख्दा जलेन जलदागमे । 
तानि सस्यानि चाखनि कठिनत्वं गतानि वै ॥ २९॥ 
'वर्षाकाख्यै बाद्लोने अपने जठ्से जिन्हे सीचा था, वे 
अनाजके कोमल पौदे वास्थावस्यासे प्रोढावस्यामे आकर कटोर्‌ 
हो गयेद॥ २९॥ 
त्यक्त्वा मेघमयं वासः शरदूगुणविदीपितः। 
पष वै विमले व्योम्नि ह्रे घसति चन्द्रमः; ॥ २० ॥ 
ध्वे चन्द्रदेव बाद्रलकूपी बल्न उतारकर शरद्‌ तुके 
गुणेसि ओर भी प्रकारित दो इस निर्मल माकादामे 
हरपरौह्छसके साय निवास करते ह ॥ ३० ॥ 
क्षीरिण्यो दविशणं गाचः पमत्ता द्ियुणं वृषाः । 
वनानां दिगुणः लक्ष्मीः सस्यैयुणवती मदय ॥ ३१॥ 


२द० 


श्रीमहाभारते सिकभागे 


| [ हरिवंशे . 


श्रद्‌ ऋतम गौर पेते दूना दृध देने र्गी ई । सेड 
दगु मतवले दो उठे ह | वनोकी शोभा-सम्पत्ति दुगुनी 
वद्‌ गयी है यौर पकी हुई खेतीफे कारण यह पृथ्वी अनन्त 
गुणेषि सम्पन्न दो गयी दै ॥ २३१ ॥ 


ज्योर्तीपि घनमुक्तानि पञ्मवन्ति जलानि च । 
मनांसि च मदुष्या्णां परसाद्रसुपयान्ति वै ॥ ३२ ॥ 
श्राद्लेकि आवरणे मुक्त दूए ग्रह-नक्षचर; कमल- 
मण्डित जल तथा मनुर््योके मन प्रसाद्‌ ८ खच्छता एवं 
प्रसन्नता ) को प्रा्तहोरेई॥३२॥ 
असृजत्‌ सविता व्योम्नि निर्मुक्तो जलैर्भराम्‌ । 
शरत्प्रज्वलितं तेजस्तीक््णरदधिमर्विदोपयन्‌ ॥ २२ ॥ 
“आकारा मेवमुक्त हुआ सय॑ शरद्‌ क्रृठके प्रमावसे 
अधिक प्रव्वलित तेज (धूप) की खष्टि करतादैतथा 
अपनी किरर्णेको ओर मी तीखी करके वसुधा रका 
दोपण कर रहा दै ॥ ३३ ॥ 
नीराजयित्या सैन्यानि प्रयान्ति विजिगीषचः | 
अन्योन्यराष्राभिमुखाः पाथिवाः पृथिवीक्षितः ॥ ३४ ॥ 
“भूतल्के नरेद अपने सैनिके उनके अर्का मार्जन 
करवाकर ( उन्दं सथले ) विजयकी इच्छसे एक दूसरेके 
गट्की ओर जा र्दे ई ॥ ३४ ॥ 
चन्धुजीवाभितात्रा्ु चद्धपड्कवतीपु च। 
मनस्तिष्ठति कान्तासु चित्रा चनरजिपु ॥ २५॥ 
ध्न्धुजीव ( बन्धूक ) के लाल पूरसि सुशोभित हो जो 
सव्र ओरते लल-लल दिखायी देती ह तथा जिनकी कीचड़ 
सख गयी टै, एसी विचित्र एवं कमनीय वनत्रेणियमि 
( उनकी गोमा निदासक्रे च्ि) मन आसक्त हरहा 
द॥ ३५ ॥ 
वनेणु च विराजन्ते पादपा वनदोभिनः। 
अखनाः सप्तप्णीश्च कोविदाराश्च पुष्पिताः ॥ ३६॥ 
दयुखाद्धा निकुम्भाश्च प्रियका: खर्णकास्तथा | 
खमराः पेचकाश्चैव केतक्यश्च समन्ततः ॥ ३७॥ 
ध्वनकी गोमा वद्निवाठे असनः चितवन, कोविदारः 
वाणासनः निकुम्भः पियक ओर खर्णक्र नामवले वृष्च वर्नर्ि 
फूट लदकर अधिक जओभा पा रै ह | केतकी ८ केवदे ) के 
वृश्न भी सव्र यर चिकले दृषद्‌] खमर ( एक प्रकारके 
मृग ) ओर उच्छ मी सर्वत्र सानन्द विचरते ई ॥ २६-३७॥ 
जेषु च विरेपेण गर्गयेद्गारहासिपु । 
हारस्पकाशयोपेव गोष्टेष्वदति रूपिणी ॥ ३८॥ 
धदूध"ददीके मारयो या षद््ि जो माखन आदि ढे 
जतिर्ःवेद्ी जिनकी देखी ई उन त्र्जो एवं गोरठमितो 


यद शरद्‌ ऋत मूतिमती सुन्दरी युवतीकी मेति धूम 


-रदी टै ॥ ३८ ॥ 


नूनं चिद्द्यभूयिष्टः मेघकारखुखोपितम्‌। 
पतत्विकेतनं देवं वोधयन्ति दिवौकसः ॥ ३९ ॥' 
धनिश्चय ही देवताखोग इस समय देवश्रे्र भगवान्‌ 
गरडध्वजकरो, जो वर्पाकाल्मे सुसखतपूर्वक यन कर्‌ चुके ई 
जगा रहे द ॥ ३९॥ 
शस्येवं खसस्यायां प्राप्तायां प्रा वृपः क्षये । 
नीटचन्द्रा्कवणश्च रचितं वहभिर्दिजेः॥ ४०॥ 
फटेः प्रवारेश्च धनमिन्द्रचापघनोपमम्‌ । 


भवनाकारविटपं खतापस्ममण्डितम्‌ ॥ ४१॥ 
विराटमूावनतं पवनाभोगमण्डितम्‌ । 


अर्चयामो गिरिं देवं गाश्चैव च विरोपतः ॥ ४२॥ 


धव्पा वीत जानेपर एेसी खुन्दर खेतीसे छयोभित शद्‌ 
ऋका य्ुभागमने हुधा ई 1 इस समय ( मेके समान) 
नीटेः चन्द्रमाके समान दवेत तया सूर्य॑ सदय सुनदृरे रंगवाठे 
चहुत-से पक्षि्योनि जिते बहुरंमा वना दियादैः जो विविध 
प्रकारके फर्य ओर नूतन पल्लवि घना हो रहा है घौर 
इसय््यि जो इन्द्र धतुप्से युक्त ययाम मेधकी-री शोभा धारण 
करता है, जिसके टरषौकी एक-एक ग्ाखा धरके सभान जान 
पड़ती ह, जो ख्ता ओर बल्टरिवेति भटी्भोति भवंकृत 
जिसक्रा वि्नार मूल्माग बहुत दूरतक फसा हज है तथा 
जो वायुके विस्तारसे सुशोमित शेता दै वह गोवर्धन पर्वत 
ही हमारा देवता ह ! हम उष्करी तया इन गौर्भोक्री विशेष 
रूपते पूजा करं ॥ ४८०--४२॥ 
सावतंसेर्विपाणैश्च वरदीपीडश्च दंरितैः। 
घण्टाभिश्च प्रलस्वाभिः पु्पैः शरदि कस्तथा ॥ ४३॥ 
शिवाय यावः पूज्यन्तां गिसियक्षः प्रवर्त्यताम्‌ 1 
पूज्यतां चिदद्चैः शक्रो गिरिरस्माभिरिज्यताम्‌ ॥ ४४॥ 

"गाये सीमिर्मिं मुकुट ओर मोरपंखके समान वने हुए 
आभूषण वधि जार्यै । उनके गेम वड़ी घ्य ल्टका दी 
जर्ये र त्रजके कल्याणक ल्थि गरदुम॑खुट्म दोनेवाठे 
परपद्य गौर्योकी पूजा की जाय | साय दी "गिसियज्ञः 
आरम्भ कर दिया जाय । देवतालोग इन्टरकीं पूना कर ` 
ओर मलोग गिरिराज गोवर्धनक्री ॥ ४३-४४ ॥ 
कारयिष्यामि गोय्षं वखादपि न संशयः। 
यदस्ति मयि वः प्रीतियैदि वा खुदो चयम्‌ । 
गावो हि पूज्याः सततं स्वे ना संशयः ॥ ४५॥ 

ध्यदि आपटोर्गोका मक्षपर प्रेम है ओरं यदि हमलोग 
एक वसे दितेी सुद्‌ ई तो म आपके दवारा हठ एवं 
चलपूर्वक गोयज्ञ करा्छगा । गौण सदा ही स्वके ल्थि 
पूजनीय ईद--दसमे संगय नदी दे ॥ ४५॥ 


थ 4 भन ~ ˆ` ` 


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9० 


ना ण न न ८2. 


चि 2 
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विष्णुपवं ] 


यदि साम्ना भवेत्‌ प्रीतिर्मवतां वैभवाय च । 
एतन्मम वचस्तथ्यं क्रियतामविचारितम्‌ ॥ ४६॥ 


ध्यदि मेरे समद्चानेसे आपकौ प्रसन्नता होती हो तो 


सप्तदशो ऽध्यायः | 
न -वववववव्व्--------- 


२६१ 


आपलेग अपने ही वैभव { अभ्युदय ) के लियि मेरी दसं 
सची वातको विना विचारे मान छ ओर इसके अनुसार 


कायं करः | ४६ ॥ 


इति श्रीमहाभारते खिरुभागे हरिर विष्णुपर्वणि शरद्रणेने षोडरोऽभ्यायः ॥ १६ ॥ 
इस प्रकार श्रीमहाभारते छिर्भाग रिरश अन्तत विम्णुपमे शरदू्रणनविषयक सरदो अध्याय पूरा हुमा 1 १६॥ 


--~~ज्वीष्नो०-- ~ 


सप्तदशोऽध्यायः 
गोपोदारा श्रीकृष्णकी बातको खीकार करके गिरियज्ञका अनुष्ठान तथा भगवानूका 
दिव्य रूप धारण करफे उनकी पूजा ग्रहण करनेके पथात्‌ उन्दं बर देना 


सै्म्पायन उवाच 
दामोदरवचः श्रुत्वा हृष्टास्ते गोपु जीविनः । 
तद्वागसतमासाद्य पर्यूच्ुरविदराडया ॥ १ ॥ 
वैशम्पायनजी कहते है---जनमेजय दामोदर 
( श्रीकृष्ण ) की घात सुनकर गौ्ओंपर ही अपनी जीविका 
निर्मर करनेवले वे गोपगण प्रसन्नतापूर्वंक उनके वचनापरतका 
आस्वादन करफे निःशङ्क दोकर गोटे--) १ ॥ 
तवैषा वाक महती गोपानां दहितवर्दिनी। 
भ्रीणयत्येव नः सबौन्‌ बुद्धिवृदधिकरी गवाम्‌ ॥ २ ॥ 
"हमारे बार-गोपार ! ठुम्हारी यह बुद्धि--यदह बिचार्‌- 
धारा मह्वपू्णं होनेके साथ ही गोपक व्यि हितकर तथा 
गोओंकी वद्धि करनेवाली दै । यह हम सब लोगौको वृति ही 
प्रदान कसती है ॥ २॥ 
त्वं गतिस्त्वं रतिश्चैव त्वं वेत्ता त्वं परायणम्‌। 
भयेष्वभयद्स्त्वं नस्त्वमेव खददां खत २ ॥ 
तुम्हीं हमारी गति होः ठम्हीं रति (८ अनन्द ) होः 
-वम्दीं सर्वज्ञ ओर तम्हीं हमारे सवसे बडे आश्रय हो । भयके 
अवसर्यपर ठुमदीं हमै अभय देनेवलि हो तथा ददी हमारे 
व्यि ख॒दृदोके मी सुद्‌ हो ॥ ३ ॥ 
त्वत्कृते रष्ण घोषोऽयं श्षेमी मुदितगोकुलः । 
रूत्स्रो चस्ति शान्तारिर्यथा खरग गतस्तथा ॥ ४ ॥ 
श्रीकृष्ण [ वुम्हरि कारण दही यह गोष्ट सक्ुशङ ह । 
यर्होकी गोर्भौका समुदाय प्रसन्न है । सारे शत्र शान्त हो गये 
ह तया समस्त रजः जैसे सर्गम रह रा होः इस तरह यहो 
खखपू्॑क निवास करता दै ।। ४॥ 
जन्मपरशृति क्मतद्‌ देवैरसुकरं वि । 
बोद्धव्याञ्चाभिमानाश्च विस्सितानि मनांसि नः ॥ ५ ॥ 
-“जन्मकारते ही तुमने जो यद शकट-मंग ओर पूतना 
. वध आदि कार्यं किया दैः यह इस भूतलपर देवता्ओंके 
ल्मि भी सुकर नदीं है । यह सव देखकर तथा सममे आने 


योग्य तुम्हारा जो अभिमानपूर्णं वचन दै ( कि मँ बलपूवंक 
गो-य्च आदि कराञमा ) उसपर ध्यान देकर हमारे चित्त 
चक्रित हो उठे दै ॥ ५॥ 


वछेन च परार्ध्येन यदसा विक्रमेण च। 
उन्तमस्त्वं मयुष्येषु देवेष्विव पुरंदरः ॥ ६ ॥ 
(तुम अपने परम उक्ष वलः सुय ओर परक्रमदारा 
मनुर््योमिं सवरसे उत्तम हो । ठीक उसी तरह जैसे देवतार्ओेमि 
इन्द्र सवसे श्रेष्ठ ह ॥ ६ ॥ 
प्रतपिन च तीक्ष्णेन दीप्त्या पूर्णतयापि च ! 
उत्तमस्त्वं च मरत्येयु देवेष्विव दिवाकरः ॥ ७ ॥ 
ध्वुम अपने तीक्ष्ण प्रतापः अलुपम दीप्ति तथा पूर्णता 
की दृष्टिते मी मनुष्योमे उसी प्रकार सर्वश्रेष्ठ हो, जैसे देवताओं 
म दिवाकर ८ सूर्यं ) ॥ ७ ॥ 
कान्त्या लक्ष्म्या प्रसेन वदनेन सितेन च । 
उत्तमस्त्वं च मर्त्येषु देवेष्विव निदाकरः ॥ ८ ॥ 
मनोरम कान्ति, रोभा-सम्पत्तिः प्रसाद; सुन्दर भुख 
ओर्‌ मुसकराहटके कारण भी ठुम-देवताओंम चन्द्रमाकी भोति 
मनुरप्योमिं सवसे उत्तम हो ॥ ८ ॥ 
बलेन वपुषा चैव वाद्येन चरितेन च । 
स्यात्‌ ते शक्तिधरस्तुल्यो न तु कच्धन मायुषः ॥ ९ ॥ 
यत्‌ त्वयाभिदहितं वाकयं शिरियक्ं घरति प्रभो! 
कस्तल्छङ्धैयितुं शक्तो वेखामिव महोदधिः ॥ १०॥ 
धवल, शरीरः वचपन ओर मनोहर चरकी दष्टिसि भी 
तम्हारे समान राक्तिशाटी मनुष्य दूसरा को नहीं है । प्रमो ! 
उमने भिरिवक्षफे विषयमे जो बात कही है, उसका उछछद्वन 
कौन कर सकता है क्या महासागर कमी तटभूमिको ष 
सका है ॥ ९-१० ॥ 
स्थितः शाक्रमहस्तात श्रीमान्‌ भिरिमहस्त्वयम्‌। 
त्वत्मणीतोऽद्य गोपानां गवां हेतोः परवर्त्य॑ताम्‌ ॥ ११॥ 
(तात [ आजते इन्द्र-यागका उत्सव स्थगित हो गया | 


गदर 


धीमहाभारते चिकभागे 


[ हरिवंशे 


---------- ~~ ~~ ~~ ण त स ज जनना ज 


अव यद्‌ शोभासम्पनन गिरियज्ञ, जिसे तमने चाद करियादः 
गो्ओं जर गोपो दितफे ल्ि सम्पादित दो ॥ ११॥ 
भाजनान्युपकरप्यन्तां पयसः पेशखानि च । 
कुम्भाय विनिवेदयन्तासुदपनेघु शोभनाः ॥ १२॥ 
पूर्यन्तां पयसा नयी द्वोण्यश्च विषुायताः । 
भक्ष्यं भोज्यं च पेयं च तत्‌ सर्व॑सुपनीयताम्‌ ॥ १३॥ 
भाजनानि च मांसस्य न्यस्यन्तामोदनस्य च । 
त्रिरात्रं चेव संदोहः सर्वधोपस्य गृहाताम्‌ ॥ १४॥ 
विशस्यन्तां च पशवो भोज्या ये महिपादयः। 
प्रवर्त्यतां च यज्ञोऽयं सर्वगोपस्ुसंकटः ॥ १५॥ 
"दधते भरे हुए. युन्दरयुन्दर पात्र एकत्र क्रिये जये । 
ऊुर्ओंपर सन्दर-युन्दर घडे स्थापित विये र्ये । नयी व्रनायी 
हुई नहरों तथा बद-वद़े कुरण्ठोको दधसे भर दिया जाय । 
भक््य-मोज्य ओर पेय सव कुछ तैयार कर चिणि जाय । फल- 
के गदो तथा भातसे भरे हए पात्र रखे जाथे । सरे चजकरा 
तीन दिर्नोका खारा दृध संग्दीत कर लिया जाय । भोजन 
करानेयोग्य जो भमस-गाय आदि बजे पद्य ई, उवद 
आद्रके खाथ उत्तमोत्तम पदार्थं लिलये जा्यँ ओर इस प्रकार 
समस्त गोपो सहयोगे सम्पन्न होनेवठि इस यश्चका 
आरम्म दोः ॥ १२-१५ ॥ 
आनन्दजननो पोषो प्रदान्‌ अदितगोककलः 
तू्॑श्रणादधेोषेश्च दृपभाणां च गर्थितैः ॥ १६॥ 
हम्भारवेशथ् घत्सानां गोपानां हषवर्धनः। 
फिर तो वरजम आनन्दजनक महान्‌ कोलदट होने 
ल्ग | खारा गोकु दषौष्छासमे मग्न है गया । वायेकि 
गम्भीर घोष, सेर्दौकी गर्जना ओर वचढके रभानेसे जो 
सम्मिठित शन्द प्रकट हुमा वह गोर्पोका दषं वदानि र्ण ॥ 
दधो हदो धृतावर्तः पयःकरुल्यासमाङुटः ॥ १७॥ 
मांखरारिः प्रभूताढ्यः पका्तीदनपर्धतः। 
सम्प्रावतंत यक्षोऽस्य गिरेगोभिः समाकुखः। 
तुष्टगोपजनाकीणों गोपनारीमनोष्टरः ॥ १८ ॥ 
ददीके ण्ड ऊपर-ऊपर घी छा रहा था] दूधकी 
अनिर्को नदर वहने लगीं । फलि गूर्दोकी बड़ी भारी रादि 
जमा दो गयी । वहुत-ते संस्कारक द्रव्य संचित हयो गये ओर 
उज्ञ्वेल भारतोकरा पवंताकार पुञ्ज परकाक्ित दने लगा । इस 
` प्रकार गौओंसि भरा हया श्रीकृणक्रा गिरिवज्ञ चाद हो गया | 
संव॒ष्ट टुएट समस्त गोपगण उसमे सम्मिलित होकर आवश्यक कार्य 
करते ये । गोपाङ्गनार्भनि अपनी उपलितिते उस मदत्सवकौ 
मनोदर बना दिया था ॥ १७-१८॥ 
¦भक्ष्याणां राद्रायस्तत्र शातदाश्चोपकटिपताः । 
गन्धमार्यैश्च षिविधेधूैस्यावचैस्तथा ॥ १९॥ 
वर्ह भक्ष्य पदाथोकि सैका ठेर गये गये थे | नाना 


प्रकारे गन्ध; माल्य तथा मति भेतिके धपोनि वह्‌ य्‌ 


सुदोमित होता शा ॥ १९ ॥ तसंनिधो 
अथाथिन्धरतपर्वन्ते सम्प्रति य । 


यत्तं गिरेस्तिथौ सौम्ये चक्लर्गोपा हिजैः सह ॥ २०॥ 
अग्निर समीप जो आज्यस्थाटी र चरुस्ाटी आदि 
रखी गयी थी, ये उस यका विधान आरम्म ्टोते दी आग- 
पर चटा दी गयीं । ब्राद्य्णोसहित गोपेनि किसी शुम तिथिको 
उस यजक्रा अनुष्ठान आरम्भ करिया था|| २०॥ 
यजनान्ते तदन्नं तु तत्‌ पयो दधि चोत्तमम्‌ 1 
मांसं च मायया रष्णो गिरिर्भत्वा समद्रनुते ॥ २९॥ 
यजके अन्तर्मे श्रीकृष्ण स्वयं ही मायासे पर्व॑तके अधिष्ठाता 
देवता बनकर उस अन्न, वृधः .ददी ओीर फक गृर्दोको 
मोग लगनि ल्मे | २१॥ 
तर्पिताश्चापि विप्राम्यारतु्ठः सम्पूणेमानसाः। 
उत्तस्थुः परीतमनसः ससित वाच्यं यथाद्ुखम्‌ ॥ २२॥ 
उस यज प्रे व्राद्यणोको अन्न-पानते तृप्त अर दक्षिणा 
से संवर क्रिया गया था] उन सवके मनोस्थ पूर्णं हो गये 
थे । वे सुखपू्वंक सखसिवाचन करके प्रसन्नचित्त ोकर 
उठेये॥२२॥ 
भुक्त्वा चावश्चथे छृष्णः पयः पीत्या च कामतः। 
संद्तोऽस्मीति दिष्येन रूपेण प्रजहास यै ॥ २३॥ 
यशचान्तस्नानके समय गिरिदेवके सूप प्रकेट हुए 
श्रीकृष्ण अपनेको अर्पित क्रिये गये भोच्य-पदार्थीको खाकर 
ओर इच्छानुसार दघ पीकर बोले पूर्णतः वप्त दो गया 
णखा ककर वे उस दिव्यरूपके दारा जोर-जोर्छे हसने सो ॥ 
तं गोपाः पव॑ताकारं द्विव्यस्रगनुदेपनम्‌ । ` 
गिरिमूध्न स्थिवं दष्टा र्णं जग्मुः प्रधानतः ॥ २४॥ 
दिम्य माला ओर अनुटेप धारण कयि उन पर्व॑ताकार 
देवताकी पर्वतकरे शिखरपर खड़ा देख स्मर छोगनि उर 
प्रधानतः श्रीकृप्ण दी समद्यकर उनकी शरण टी ॥ २४ ॥ 
भगवानपि तेनैव रूपेणाच्छादितः प्सुः 
खदिततैः प्रणतो गोपैर्ववन्दात्मानमात्मना ॥ २५ ॥ 
प्रभावश्चाटी भगवान्‌ श्रीकृप्णने भी उश्वी रूपे मपनेको 
छिपाये रखकर वरहो एकत्र हुए गोर्धो फ साथ नतस्तक हों 
स्वयं ही अपने-भापकेो प्रणाम किया | २५ ॥ 
तमूयुरविंसिता गोपा देवं भिरिवरे स्थितम्‌ । 
भगवंस्त्यद्रशषे युक्ता दासाः किं कुम किद्धराः ॥ २६॥ 
गिरियजके दिखरपर खड हुए. उन पर्वत देवतासे समस्त 
गोरपोनि विसित होकर कदहा---भगवन्‌ | हम आपके वराम 
६; आपके दास एवं सेवक ई बताइये | हम आपकी स्या ` 
सेवा करे ॥ २६॥ 


विष्णुपव | 


अष्टादश्पेऽध्यायः 


२६३ 


----------------------न-न--न जय्य व == 


स उवाच ततो गोपान्‌ गिरिप्रभवया गिसा। 
अयप्रभृति चेज्यो ऽदं गोषु यस्तु चो दया ॥ २७॥ 
तव उन्होने पर्वतसे प्रकट हुई वाणीदयारा उन गोसे 
कहा--भ्यदि तुसलोगोम दयाभाव विमान ह; तो आजसे 
वम्दै गौओके भीतर मेरी पूजा कस्नी चाहिये ॥ २७ ॥ 
अहं वः प्रथमो देवः सवेकामकरः द्युभः। 
मम भावाच्च गवामयुतान्येव भोक्ष्यथ ॥ २८॥ 
मै त॒मलोर्गोका प्रथम देवता हू उम्दारी सम्पू 
कामना्ओको पूर्णं करनेवाला ओर शुभचिन्तक हू ¦ ठम मेरे 
ग्रभावसे दस हजार गौोके स्वापी एवं (उनके दूध-ददी आदि 
के ) उपभोक्ता वने रदोगे ॥ २८ ॥ 
दिवश्च वो भविप्यामि मद्भक्तानां वने वने । 
रस्ये च सह युप्माभिर्यथा दिषिगतस्तथा ॥ २९॥ 
भुद्यमे भक्ति रखनेवठे ठम गोपोके चि मै प्रत्येक 
वनम कल्याणकारी दोगा ओर ठमलोगोके साथ मै उसी 
प्रकार आनन्दयरवक रगा; जेते दिव्य धाममे रहा करता हू 
ये चेमे प्रथिता गोपा नन्दमोपपुरोगमःः। 
पयां प्रीतः प्रयच्छामि गोपानां विपुर घनम्‌ ॥ २० ॥ 
ध्ये जो नन्द आरि विख्यात मोप दहै मे प्रसन्न होकर 
इन सव्रको प्रचुर धनःसम्पत्ति प्रदान करेगा | ३० ॥ 
पयोप्लुषन्तु क्षिप्रं मां गावो दत्ससमाङरः | 
पवं मम॒ परा भरीतिभैविष्यति न संरायः ॥ २९ ॥ 
'अव वछड़ोसदहित गौरैः शीघ्र मेरी परिमा करे । इससे 
युञचे बडी प्रसन्नता होगीः इसमे संशय नहीं हेः ॥ ३१1 
ततो नीराजनार्थं हि चृन्दशो गोङ्कखानि तम्‌ 1 
परिवनुर्गिरिवरं सदृषाणि समन्ततः ॥ ३५॥ 
फिर तो छंड-की-शंड गोर्पेँ सेडोके साथ आक्र परि 
क्रमक स्यि गिरिराजको सव ओरते ब्रेकर खड़ी द गयीं ॥ 
ता गावः प्रद्रुता हृष्टाः सापीडस्तवकाङ्गद्‌।; । 
सस्जापीडग्डङ्गायाः शतसोऽथ सदसखदःः ॥ ३३ ॥ 
उनके म्तकपर पुरोकरे आभूपण रवेधे हए येः चास 
पेसमे पुष्पगुच्छकरे दी वने हुए वाजुघैद॒ पहनये गये येः 
सगिके अग्रभागे पूकोके गजरे ओर दिरोभूषण दोभा पा 


` मयूरपन्र्न्तानां केशवन 


रदे थे, एेसी सैकड़ों ओर हजारो गौणे हमे भरकर एक साय 
परमके पथपर दौडीं ॥ ३३ ॥ 
अुजग्मुश्च गोपाखाः काठयन्तो धनानि च । 
भक्तिच्छेदाचुलि्ताङ्गा रक्तपीतसिताम्बरः ॥ ३४॥ 

गोपगण, अपने उन गोधनोको हकिते हुए. उनके पीछे- 
पीछे चठे उन गोपोके विभिन्न अङ्गोमि विभागपूर्वक नाना 
स्गोके अनुखेप खगे थे । वे ख, पीठे ओर सफेद कपडसि 
सुशोभित थे ॥ ३४ ॥ 
मयूरचिव्ाङ्गदिनो भुजैः ्रहरणात्रतैः । 

स्ुयोजितैः ॥ ३५ ॥ 

वश्चाजुरधिकं गोपाः समवाये तदाद्धुते । 

उनकी भरुजाओमे मोरपत्रके विचित्र बाजूवंद बधे हए 
ये ओर उन्दी हाथोमे उडेमी शोभाषा रहेये। उनके 
सन्दर टंगते वेषे इष केशेमे मोरपंखकफे इन्त खसे गये ये । 
इन सवके कारण उस अद्भुत समुदाय या मेखेमे उन गोर्पो- 
की अधिक शोभा दोरदी थी | ३५१ ॥ . 
अन्ये बृषानारखटुत्यन्ति सख परे मुदां ॥ ३६॥ 
गोपालास्त्वपरे ग्ध जगृहु्वेगगामिनः । 

ङु अन्य गोप बेलोपर चे थे। वुसरे ग्वाल हमे भर- 
कर नाच रटे थे तथा अन्य ब्रहुत-से गोपाल वेगपूर्व॑क भागी 
जाती हुई गौओकरो पकडते थे ॥ ३६१ ॥ 
तस्मिन्‌ पयीयनि्त्ते गवां नीराजनोत्सवे ॥ २७ ॥ 
अन्तधौनं जगामा्यु तेन देहेन सोऽचलः। 

गौजंद्वारा नीयजना ( परिक्रमा ) का वह उत्व वारी. 
वारौते सम्पन्ने हो जनेपर चे पर्वतदेवता अपने उस दिव्य 
सरीरसे शीघ्र ही अन्तान हो गये ॥ २७९ ॥ 
कृष्णोऽपि गोपसदहितो विवेश जजमेद इ ॥ २३८ ॥ 
गिरियक्षपचुत्तन॒ तेनाश्चर्येण वसिताः 
गोपाः सवाठचद्धा वै त॒ष्वुमंधु सदनम्‌ ॥ ३९ ॥ 

इधर श्रीकृष्ण भी गोपक साथ बजमे .हौी चले गये | 
गिरिके अनुष्ठनपे प्रात हुए उस महान्‌ आश्रयते चकित 
हो बालको ओर इद्धौसहित सम्पूणं गोष मधुसूदन श्रीकृष्णकी 
स्तुति करने रगे } ३८-३९ ॥ 


इति श्रीमहाभारते खिरुभये हरिवंशे चिव्णुप्॑णि गिरियज्प्रवतंने स्तदशोऽध्यायः ॥ १४ ॥ 
इस प्रकार श्रीमहभासतके छिरमाण दसििंरके अन्तरगत विष्णुपर्व निियक! अनुटानतिषयक सत्रहपे{ अध्याय पुर हुमा ॥ ९७ ॥ 


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न यं ) 
। अष्टयदद्चाऽध्य 
इन्द्रका संवतेक मेषोढारा षा कराकर गौं ओर मोपोको कमे डालना, श्रीरृष्णद्रारा 
गोवधनधारण तथा उसके नीचे गोओ ओर सोपोसहित चरजवासिथोका जाना 


यैसरम्पायने उवाच 
महे प्रतिहते शक्रः सन्रेधस्िद्दोश्वरः ! 
संवतंकं नाम गणं तोवद्‌नामथाद्रवीत्‌ ॥ १॥ 


वंराम्पायनजी कहते ह--जनमेजय ! अपना उत्सव 
रोक दिये जनेके कारण देवराज इनद्रको बड़ क्रोध हभ! उन्होने 
मेषो संवर्तक नामक्‌ गणको बुलकर इस प्रकार कहा) ९॥ 


गद 


श्ीम्रहाभारते लिरभागे 


{ स्वंशे 


भो वखाहकमातङ्गाः श्रूयतां मम भाषितम्‌ । 
यदि घो मघ्मियं कायं राजभक्तिपुरस्छतम्‌ ॥ २ ॥ 
भ्मतवाठे हायियो्रे समाने श्रेष्ठ मेषगण | यदि वुम्द 
गरजभक्तिको सामने रखते हए मेरा प्रिय कार्य करना उचित 
जान पदेः तो मेरी यह वातत सुनो ॥ २॥ 
पते बन्दावनगन्य दामो्रपसयणाः । 
नन्द्गेपादयो गोपा यिद्िपन्ति ममोत्सवम्‌ ॥ २ ॥ 
धे ब्रन्दावनमे गये दए जो नन्द आदि गोप ईव 


दामोदर श्रीकृष्णको दी सवसे बड़ा सदाय मानकर मेरे उत्सव- . 


से देष रखने ल्मे ६॥३॥ 
आजीचो यः परस्तेषां गोपत्घं च यतः स्पृतम्‌ । 
ता गावः खत्तरत्रेण पौच्य्वां वर्षमासपैः ॥ ४॥ 
"अततः मेरी आका दै किंउनरौर्पोकी जोस्वसेव्ी 
आजीविका है तथा जिनका पालन करमेके कारण उनका 
गोप्य सार्थक माना गया हैः नन्द आदिकी उन गौ्ओंको 
त॒म ख्गातार सात गार्पोतक्त मारी वर्षा ओर बायुके द्याया 
पीडित करो + ४॥ 
फेरवतगतश्चादं स्वयमेवामस्त्ु दारुणम्‌ । 
खक््यामि चषि चातं च वच्नारानिसमप्रभम्‌ ॥ ५॥ 
भमै भी एेयवठपर आरूढ दौ चलता हू ओर खयं दही 
वञ्र एवं विजठीके स्राथ-साय प्रकादित हौनेवाठे भयानक जल- 
की वर्प एवं वायुकी खट कर्गा ॥ ५॥ 
भवद्धिख्ण्डवर्पण चरता मारुतेन च । 
दतास्ताः स्रजा गावस्त्यक््यन्ति मुवि जीवितम्‌॥ ६॥ 
धवुमलोग प्रचण्ड वायुकरे साथ विचरते हुए जव धोर 
वपां करोगे, तव उससे आहव प्वं पीडित हुई गौर भूतलपर 
व्रजवासिर्योसदहिते अपने प्राण व्याग देगीः ॥ ६ ॥ 
पवमाक्ञापयामास सर्वाक्जरुधरान्‌ भसु । 
भरत्याहते बे ङष्णेन शासने पाकरासनः ॥ ७ ॥ 
श्रीकृष्णद्वास्‌ अपने उत्सव एवं शाखनका विघात दौ 
जनेपर प्रभावगाली पाकशासन इद्रे समस्त जरूषसोको 
इस प्रकार अपनी आज्ञा सुना दी ॥ ७॥ 
ततस्ते जख्शाः रृष्णा घोरनादा भयावहः । 
कादं छदयामासुः सर्वतः पर्वतोपमाः ॥ ८ ॥ 
तवर वे घोर गर्जना करनेवाले पर्वताकार भयंकर के 
मेष आकादरमे खव ओर छा गये ॥ ८ ॥ 
विद्युत्सम्पातजननाः श्चक्रचाप्तिभूषिताः। 
, तिभिसवतमाका्तं चक्रस्ते जख्दास्तद्‌ा ॥ ९ ॥ 
उस समय इन्द्रधनुप्रसे विभूषित दो चिजटी गिराते हुए 
उन मेधोने आकाशको अन्धकारपूर्णं कर दिया ॥ ९ ॥ 


गजा हवान्यखंयुक्ताः केचिन्भकरवचंसखः । 
नागा हषास्य गगने वरेस्जखदपुद्धवाः ॥ १०॥ 
क मेष दूसरे हाधिर्योे सटकर चलते हुए दाधिरयो- 
के समान प्रतीत होते ये । दूसरे मगरो खमान प्रकाशित 
होते थे तथा अन्य वदे-वदे बादल आकाद्नमे नागेकरि समान 
विचरने खगे ॥ १० ॥ 
तेऽन्योन्यं चपुपा बद्धा नागयुथायुतोपमाः। 
दुर्दिनं पिपुरं चक्रुदखाद्यन्तो नभस्तखम्‌ ॥ १९॥ 
जैषे टज दाथियेक्र श्ंड एक दूसरेसे अपने श्रीरको आवद 
करके चल रटे वैसे दी प्रतीत दौनेवाटे उन जटधरनि 
आकाश्षको आच्छादित करफे वरहो श्रढा भारी दुर्दिन उपसित 
कर दिया ॥ ११ ॥ 
छदस्तनागहस्ताभ्यां वेणूनां चैव सर्वतः । 
धारभिस्तुर्यरूपाभिरवंचपुस्ते वलाहकाः ॥ १२॥ 
मनुष्यो दाथः हदयिर्योकरे युण्डदण्ड तथा बके तुद्य 
मोटी धारा प्रकर कखे वे मेध वरहो सव ओर वर्षा करने 
रतो ॥ १२॥ 
समुद्रं मेनिरे तं हि खमारूढं दचश्चुपः। 
दुविंगाद्यमपर्यन्तमगाधं ददनं मदत्‌ ॥ १३॥ 
मनुर्प्योकी ओखेनि आकाशम खाये हुए उस दुरवगाद 
अनन्त अगाध एवं महान्‌ दुर्दिनको समुद्रके समान ही 
माना ॥ १३॥ ^ 
नैवापतन्‌ वे खगमा दुदधुघुखेगजातयः। 
प्वताभेषु मेधेषु खे नन्दत्छु समन्ततः ॥ १४॥ 
आकादामे चारों ओर पर्वताकार मेष गजना कर रहै ये| 
उस समय पक्षियोने उना वंद कर दिया तथा विभिन जाति- 
के पद्यु इधर-उधर भागने स्मो ॥ १४॥ 
नएटस्यन्दुसदशैमधेनभसि दारुणैः । 
अतिदृषटेन लोकस्य यिरूपमभवद्‌ वपुः ॥ ९५॥ 
चन्द्रमा ओर सूर्यकरो मी नष्ट कर देनेवले प्रख्यकाल्के 
समान आकारा छाये हुए उन भयंकर मे्वेनि अपनी अति- 
दृष्टिके कारण समस्त॒पाथिव जगतुके रूपको विजत कर 
दिया ॥ १५ ॥ 
मेधौधे्निप्प्रभाकारमदद्यग्रहतारकम्‌ 
चन्द्रसूरयोद्युरदितं खं वभूवातिनिष्प्रभम्‌ ॥ ९६॥ 
मर्घोकी धट धिर आने व्योम-मण्डल प्रभाश्चूल्य हो 
गया । अह अर तारे दष्टिपथसे ओश्चर हो गये । चन्रमा ओर 
सूर्यकी किरणोका पता नहीं चरता था { अतः सारा आकाल 
अन्धकारते आच्छन्न हो गया ॥ १६ ॥ 
वारिणा मेधसुकतेन सुच्यमामेन चासरृत्‌ । 
आवभौ सर्वेतस्तच. भूमिस्तोयमथी यथा ॥ १७॥ 


दि"णुपर्व 1 


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~~~ ~ ~ 


अणएदरो ऽध्यायः 


२६५ 


~न ज ववचव्-~ 


मेक वरये हुए तथा वारंवार वरखाये जाते हए 
जस्त आद्रृत हौ वहो सव्र ओसकीं भृमि जलर्मवी-सी प्रतीत 
होने क्गी ॥ १७ ॥ 
विनेदुरवर्हिणस्तच तोककपरताः खगाः । 
विन्रद्धि निन्लगा याताः प्लवगाः सम्प्ठवं गताः ॥१८ ॥ 
उस समद्‌ वरहो मोर जोर-जोर8 बोल्ने ख्ये । पक्षि्योकी 
आवाज बहुत कम दो गयी । नदिर्मि वाद्‌ आ गवी ओर 
किनरेके वृक्ष प्रबाहमे वह रये | १८ ॥ 
रजिंतेन च मेघानां पजंन्यनिनदेन च। 
तर्ञितानीव कम्पन्ते दृणानिं तसरभिः सह ॥ १९॥ 
मर्घोकी शर्जना तथा पर्जन्यदेवके गम्भीर नादसे डि 
गयेकी भोति वबृक्षोसदित तृण कपिने खगे | १९ ॥ 
प्राते ऽन्तक्ाछो खोकाना व्यक्तमेकार्णवा मही 1 
इति गोपगणा वाक्यं व्याहरन्ति भयार्दिताः ॥ २०॥ 
उस समव भवसे पीडित हुए गोप आपसमे कहने लगे 
कि भ्िश्वय दही समसत ल्येकका अन्तकाल आ पर्हुचा दै ओर 
पृथ्वी एकार्णवमे मग्न हो रही है ॥ २० ॥ 
तेनोत्पातास्बुवर्धेण गावो विग्रहता श्वराम्‌ 1 
हम्भारवैः क्रन्दमाना न चेद्दुः स्तम्भितोपमाः ॥ २९॥ 
उस उत्पातस्वरूप जल्करी भारी वपसि अत्यन्त ताडित 
एवं पीडित हुई गैथ रभानेकी ध्वनिमे करुणक्न्दन करती 
हुई दिल-इर भी न सकं ! एेसा जान पड़ता था, उनके सरे 
अङ्ध अकड़ गयं दहं] २९१॥ 
निष्कम्पसक्िथचरणा निप्प्रयलखुराननाः 1 
द्येमा््रतनवः क्षामङ्कक्षिपयोधयः ॥ २२॥ 
उनकी जिं ओर वैर दिर नदीं पाते थे; खुर ओर मुख 
निद्चेष्टथेः भीगे हुए शरीरमे रोगे खडेहोगये ये अर 
पेट तथा थन अत्यन्त दुवले होकर सिक्ुड गये ये ॥२२॥ 
काधित्‌ प्राणाञ्चहुः घान्तानिपेनुःकाश्िदातुसः। 
काधित्सवन्वाः पतिता गावः श्चीकरदेनिदाः ॥ २३॥ 
कख गो्ओनि पीड़ास श्रान्त ह्यकर अपने द्राण त्याग 
दिये) कुछ यतुर होकर गिर पडा ओर कितनी दी गै 
जल्के छीर्येते उद्विग्न दोकर वखृडसदित धराश्नाविनी हयो 
गयीं || २३॥ 
काश्चिदाक्रम्य क्रोडेन वल्सांस्तिष्टन्ति मातरः। 
विुलाः धान्तसक्थ्यखच निरादाराः छ शोदयः। 
पेठुसतौ वेपमाना गावो वर्पपराजिनाः ॥ २४ ॥ 
कछ गोमातर बरौ करो अपने अङ्कमे चिपाकर खड 
थी, करितनो ही क्छ ओरमे विपरुख दो गफ थ, उनकी 
जेधरि रिथिल दो रदी यी, छ्ुछ दाना-वाठ न मिल्नेके कारण 


उनके पेट भीतरको धस गये ये । वप्रसि परास्त होकर पीडित 
ई गौ थरथर कोपती हई पृथ्वीपर गिर पद्वती थ ॥ २४॥ 
चत्साश्चोन्मुखका बाला दामोदस्सुखाःखिताः 
घ्रा्येति वदनैः छष्णमूचुरिवादिंताः ॥ २५॥ 
छोरे-छोटे वख मुह ऊपर उठाकर दामोदरकी ओर 
देखते हुए खड़े थेः मानो वे पीडित वरदे अपने दीन मुखो 
से श्रीकृष्णक्रो सम्पोधित करके कह रहे थे कि श्रमो { हमारी 
र्ना कीजिये" | २५ ॥ 
गवां तत्‌ कव्नं दष्ट दु्दिनागमजं महत्‌ । 
गोपांश्चासन्ननिधनाय्‌ कृष्णः कोपं समादधे ॥ २६॥ 
इस दुदिनके आनेसे गौर्ओंकरा वह महांहार होता देख 
ओर गोर्पौको भी मौतके निकट पर्चा हुआ जान श्रीङ्ृष्णने 
इन्द्रके प्रति महान्‌ कोप धारण किया ॥ २६ ॥ 
स चिन्तयित्वा संरब्धो श्ट योगो मयेति च । 
आत्मानमात्मना वक््यमिदमूचे भ्रियंवद्‌ः ॥ २७ ॥ 
प्रिय वचन बोट्नेवाठे श्रीकृष्णे कुछ देर ॒सोच- 
विचारकर रोषरवरेशसे युक्त दो खयं ही अपने-आपसे इस 
प्रकार कहा--ष्टस वर्षसि व्रचनेका उपाय ने देख 
च्या ॥ २७ ॥ 
अद्याहमिमसूुत्पारश्च सक्राननवनं गिरिम्‌। 
कटपयेयं गवां स्थानं व्षाणाथ दुर्धरम्‌ ॥ २८ ॥ 
‹आज म वन ओर काननोकहित इस दुर्धर गोवर्धन 
पर्वतकरो उखाइकर मौ ओंको वषि वचानेके च्ि भुरक्चित 
खानक निर्माण कङ्गा ॥ २८ ॥ 
अयं धृतो मया शेः पृरथ्वीगहतिभोपमः। 
त्रासयते सजा गा वै मदवद्यश्च भविष्यति ॥ २९ ॥ 
भरे दारा धारण करिया हुआ यह पर्वत प्ृथ्वीपर वने 
हए षरे समान होकर बजकहित समूची गौओंका परित्राण 
करेगा ओर मेरे अधीन द्यो जायगाः ॥ २९ ॥ 
पचं स चिन्तयित्वा तु ष्णः सत्यपराक्रमः । 
वाडवं दश्षधिष्यन्‌ समीपं तं महीधरम्‌] 
दोभ्परमुत्पाटथामास रष्णो गिरिरिवापरः ॥ ३० ॥ 
इस प्रकार सोच-विचारकर सव्यपराक्रमी श्रीङ्प्णने 
अपनी दोनों मुनाओंका वल दिखते हए उस निकटवर्ती 
पवतक्रो दोन हाथेति पकड़कर उखाड़ चछया । उस समय 
श्रीदप्ण दूमरे पवंतके समान दही जान पड़ते थे ॥ ३० ॥ 
स धतः संगतो मेघर्गिरिः सव्येन पाणिना । 
गरदभावं गतस्तन गृष्टाकारेण धच॑सा ॥ ३१ ॥ 
मगवान्के वाये दाथसे धारण क्रिया गया भौर मेधौसे 
सया दुभा वड पवत उन ग्रहाकारक तेज या 'संकर्पसे बर्ह 
ृदमावको प्राप्त दो गया ॥ ३१ ॥ 


२६६ 


श्रीमहाभारते छिखभागे 


[ हस्वे 


भूमेरत्पास्यमानस्य तस्य शलस्य सायुपु । 
शिकाः प्रिथिलाश्वेटुर्चिनिष्पेतुश्च पादपाः ॥ ३२ ॥ 
जिस समय वह्‌ पर्व॑त प्रथ्वीते उखाड़ा जाने ठगाः उस 
समय उसके दिखरोपर जो द्टी-दरटी शिल र्थी? वे खिसककर 
गिरने लगीं ओर ब्रहूत-ते इक्न भी धरादायी हो गये ॥ ३२॥ 
शिल्रेघूंणमानैश्च सीदमानैश्च  पादपैः। 
विधूतैश्योच्दतैः शद प्गमः खगमोऽभवत्‌ ॥ ३३॥ 
उस समय चकर काटते दरुए गिखर्योः खण्डित होते 
हुए वृक्षो तथा केपिती हुई ऊंची चोिरयोके कारण वद 
अविच पर्व॑तं आक्राशचारो पीके समान प्रतीत दने 


ल्गा॥३३॥ ताकत हि 
चलल्परस्लवणीः पादर्व्मेधोरधेरेकतां गतैः। 
भिदयमानाद्मनिचयश्चचार धरणीधरः ॥ ३४॥ 


पादर्ववतीं चल श्चरने मेक समू्सि मिलकर 
एकताको प्राप्त हो गये । वह्‌ पर्वत दिखने ठ्गा ओर उसक्री 
प्रसरराशि विदीणरं होकर व्रिखरने ठगी ॥ २४॥ 
न मेधानां प्रचरषएठानां न शौलस्यादमवपिणः। 
विचिदुस्ते जना रूपं चायोस्तस्य च ग्जंतः ॥ ३५॥ 
उस पर्वतके नीचे गर्भश्हमे वैठे हुए वे स्वरलेगन 
तो वरस्ते हुए मर्घोका, न पत्थर वरसानेवाटे पर्वतकरा ओर 
न गरनती हुई वायुका ही खरूपं जान से ॥ ३५ ॥ 
मेधैः सकेलसंस्थानेनीरिः प्रस्लवणार्पितेः । 
मिधीरूत ्वाभाति गिरिरुदामवर्दवान्‌ ॥३६॥ 
श्रनेसि मिले हु पर्व॑ताकार नीर मेधेति मिश्रित हुभा 
वह पर्वेत पंख उखयि हए मोरे समान प्रशन होता 
था | ३६॥ 
आप्ठुतोऽयं गिरिः पक्षेरिति विद्याधसोरगाः । 
गन्धकीप्सरसश्चेव वाचो मुञ्न्ति सर्वशः ॥ २७॥ 
विाधरः नाग गन्धर्वं ओर अम्र सत्र ओर एेसी 
चर्चा करते थे किं यह पर्वत अपने मेधरूपी पंखंमि 
ऊपरको उड़ने के व्यि उद्यता प्रतीत होता दे ॥ ३७ ॥ 
सदस्ततविन्यस्तो मुक्तमूलः क्षितेस्तदात्‌। 
रीतीनिवतेयामास  काञ्चनाञ्जनराजतीः ॥३८ ॥# 
. वह पर्वत श्रीकरप्णकी हयेटीपर टिकरा हुा था । भूतर्ते 
उसके मूल-भागका सम्बन्ध दूर चुका था । उस ददाम वह 
सोने, कोयले, चोदी तथा गेरू आदि धाठुर्ओक प्रकट करने 
खगा ॥ ३८1 
कानिचिच्छिथिलानीव संच्छिन्नाद्धौनि कानिचित्‌। 
गरिरमघप्रविएटानि तस्य शद्भाणि चाभवन्‌ ॥ २९ ॥ 
उस पर्वत्तके कुछ शिखर रिथिल्ते हौ गये येः कुछ 


आधे भागते द्रूट गये थे ओर कितने द्यी दिखर्‌ ब्राद्टेकरि 
भीतर घुस गये थे॥ ३९॥ 
गिरिणा कम्पमानेन कम्पितानां तु श्रालिनाम्‌ । 
पुप्पमुचावचं भूमौ व्यशीर्यत समन्ततः ॥ ४०॥ 
पर्वतके दिल्मेके साथ दी उसके उपरे वृश्च कम्पितो 
उठे ओर उनक्रे नाना प्रकारे पल प्रध्वीपर सव्र ओर 
व्रिखर गये ॥ ४० ॥ 
निःखताः पृथुमृधौनः स्वस्तिकाधेविभूपिताः। 
दविमिद्टपततः क्रुद्धाः खेचराः खे समन्ततः ॥ ४१॥ 
उस समय मोटे-मोटे मस्तकवे सर्गराजः जो आकरादर्मे 
उड्नेकी शक्ति रखते भे, छुपित द्ोकर आकाशम स्र ओर 
निकल पद | उनके शरीर आपे स्सिक्रसे विभूषित 
ये ॥ ४१॥ . 
आर्ति जग्मुः खगगणा चपंण च भयेन च। 
उत्पत्योत्पत्य गगनात्‌ पुनः पेतुरवाङ्मुखाः ॥५२॥ 
पधि्योक समदाय वर्षां ओर भयते चदे कष्टम प्रद गये | 
वे उड़-उढ्कर आक्रागमे जति ओर वदेसि पुनः नीचे मुख 
किये गिर पड़ते थे ॥ ४२॥ 
रेखुरायोपिताः सहाः सजखा इव तोयदाः। 
गर्ग इव मथ्यन्तो नेदुः क्ादुंलपुङ्गषाः ॥ ४२॥ 
वहुत-से सिंह रोपे भरर सजल जल्धररोके 
समान दहाड्‌ रदे ये व्रहे-वहे वाघ मथे जानेवलि मरयोके 
समान गम्भीर घोप करते थ | ४२३॥ 
विषमैश्च समीमूतैः समैश्यात्यन्तदुर्गमः । 
उप्ात्तदेदः स॒ भिरिरन्य पवोपलक््यते ॥ ४४॥ 
उस पवंतकरी विषम भूमि स्म हो गगरी ओर समभूमि 
विषम दोक्रर अयन्त दु्म॑म हयो गयी, इससे उत्ते खस्पमे इतना 
उलटफेर ह्यो गया किं वद फ्रिसी ओर ही पर्वत 
दिखायी देता था ॥ ४४॥ 
अनिचृष्टस्य तेरमेधेस्तस्य रूपं वभूव ह । 
स्तम्भितस्येव स्द्रेण निपुरस्य विहायसि ॥ ४५॥ . 
उन मेघोत दस अतिषष्टि हदोनेसे उस पर्व॑तका रूप 
वैसा दी हयो गयः, जैषा कि आकाशम भगवान्‌ सद्र दारा 
स्तम्भित कयि गये चरिपुरका रूप दिखायी देता था ॥४५॥ 
वाडुदण्डन रुष्णस्य विधृतं खुमदत्‌ तदा । 
नीलाश्रपटखच्छनं तदुभिरिच्छनमावभौ ॥ ४६॥ 
भगवान्‌ श्रीकृप्णकरे ब्राहुदण्डसे धारण किया गया तथा 
काले मेघ्र-समूर्दौते आच्छादित हुजा बह पर्व॑तरूपी छत 
वड़ीशलोभापारहाथा] *६॥ 


विष्णुपवं | 


अष्टदश्षो ऽध्यायः 


२६७ 


----------------------- ~= 


स्वभ्रायमानो ` जखैरनिंमीलितगुहामुखः। 
बाहपधाने रष्णस्य प्रुत इच खे गिरिः ॥ ४७ ॥ 
सोनिकी इच्छा-सी स्तनेवास वह पर्वत आकारे 
श्रीकुष्णकी र्योहका तक्रिया ख्गाकर सोया हुआ-सा जान प्रडता 
था | उख समव उसक्रा गुफारूयी मुख ब्रादलेकी चादरसे ठका 


हुआ था ॥ ४७॥ 
[~| 


निविहदरुतेडुनिंमेयुरश्तेवैनेः । 
निरालम्ब इवाभाति गिरिः खशिखरव्रतः ॥ ४८ ॥ 
उस पर्वतपर जो दृक्ष थे, उनपर पक्षियोकी वोटी नहीं 
सुनायी देती थी । येकि वन मयूर्रोकी केका-ध्वनिसे शयूत्य हो 
गये थे ! रसे बौ ओर वनसे धिर हुमा वह पर्वत अपने 
रिखरोकि साथ निरालम्ब-सा प्रतीत होता था ॥ ४८ ॥ 


५. ~ 


पर्स्तधुणंमानैश्च प्रचलद्धिश्च साचभिः। 
सञ्यराणीव दौटस्य वनानि दिखराणि च ॥ ४९ ॥ 

उसके श्यंग असत-व्यस्त होकर चक्छर कारते, ओर जोर- 
जोरसे हिरते थे । उनके कारण उस पर्वतक्रे वन ओर शिखर 
ज्वरे पीडित हुए-से प्रतीत होते थे ॥ ४९ ॥ 
उन्तमाङ्गगतास्तस्य मेघाः पवनवादनाः। 
त्वर्यमाणा महेन्द्रेण तोयं शुमुचुरक्षयम्‌ ॥ ५० ॥ 

उस पर्वतके मस्तक ८ शिखर ) पर पर्हुचि हुए वायुरूपी 
वाहनवाले मेष दैवराज इन्द्रके दारा शीघ्रता करमेकरे स्यि 
प्रेरित दोनेपर अक्षयं जठ्की वर्षा करने सो ॥ ५० ॥ 


ख छम्बमानः रष्णस्य भुजाग्रे सधनो गिरिः । 
चक्रारूढ इवाभाति देशो चपतिपीडितः ॥ ५१॥ 
भगवान्‌ शरीरृप्णकी सुजकि अग्रमागमे ठटकता ` हुआ 
मर्घोखटित वह पर्वत किसी रातु रजके द्वारा पीड़ित हुए 
देशकी मति चक्रपर चदा हुञ-्ा प्रतीत होता था# ॥५१] 


स मेधनिचयस्तस्धौ गिरिं तं परिवार्य ह। 

पुरं पुरस्कृत्य यथा स्फीतो जनपदो महान्‌ ॥ ५२ ॥ 
वह्‌ मेधौका समुदाय उस पर्वतकौ चारौ ओरते येरकर 

उसी तरह खड़ा थाः जते समृद्धिाटी महान्‌. जनपद नगर 

या राजधानीको अपने सामने रखकर चारौ ओर निवास 

करता है ॥ ५२ ॥ 


निवेदय तं करे शरं तोलयित्वा च सस्मितम्‌ । 
प्रोवाच गोत्ता गोपानां प्रजापतिरिव स्थितः ॥ ५३ ॥ 


# छन्न राजद्वारा याक्रान्त देदके लोग रथ; ज्ञकट आदि 
वाहर्नोपर आरूढ दोकेर जन परायन करने लगते है, उस समय 
उर चकरारूद कटा जाता है; उसी प्रकारं चन्द्रमे पोडिति पर्वन 
भग्वान्‌ श्रीङृष्णके हायरूपी चक्रप्र आरूढ हुआ दिखायी 
देता या। 


उस पर्वतको अपने हाथपर रखकर उसे संत॒लितं रखते 
हुए प्रजापतिके समान खड़े हुए गोपरक्चक भगवान्‌ श्रीकृष्णने 
मुसकराते हए कदा--) ५२ ॥ | 
पतद्‌ देवैरसम्भाव्यं दिव्येन विधिना मया । 
रतं गिरिगृहं सोपा निवीतं शरणं त्राम्‌ ॥ ५४ ॥ 
ध्मोपगण ] मैने (व्य विधित यह पर्वतका घर व्रनादिया 
है, जिसे बनाना देवता व्यि भी असम्भव था । इसमे 
वर्षां जर वायुका प्तरेश नदी दै! यद गौओकर ल्थि उत्तम 
आश्रय है ॥ ५४ ॥ 
कषिप्रं विशन्तु यूथानि गवामिह हि शान्तये । 
निरतेषु च देरोथु निवसन्तु यथासुखम्‌ ॥ ५५॥ 
व्यौ शान्ति पानेके स्थि ग्ज यूथ वीध प्रवेश करं 
ओर इन वायुरहित स्थानम सुखपूर्वक निवास करं ॥ ५५॥ 
यथाश्रेष्ठं यथायुथं यथासारं यथासुखम्‌ । 
विभज्यतामयं देशः कृतं वर्पनिवारणम्‌ ॥ ५६॥ 
जो जैसे बङेनछोटे हे, जिनके जैसे युथ हो, जिनके 
पास जैसी साधन-सामग्री हो, उसके अनुसार तवम सव्र खग 
सुखपू्वंक इस स्थानका वटवारा कर छो । मैने वर्षका भली. 
मति निवारण कर दिया है ॥ ५६ ॥ 
होरोत्पारनभुरेषा महती निर्मिता मया । 
पञ्चकोराध्रमाणेन क्रोरोकविस्तरो महान्‌ । 
भेरोक्यमप्युत्सहते रक्षितुं किं पुनन॑जम्‌ ॥ ५७ ॥ 
धमनि पर्वतको उखाइकर यदय रहने योग्य विशाल भूमिः 
कानिर्माणकर दिया दै। इसकी बाई र्पोच कोस ओर 
चौडाई एक कोसकी है । यह महान्‌ भूभाग तीनों लोकोकी 
ओधी-पामीते रक्ता कर सकता है, फिर त्रजकी तो वातं दही 
क्या हे ॥ ५७ ॥ 
ततः. किरुकिखाञन्दौो गवां हम्भारवैः सह । 
गोपानां तुसुरो जक्षे मेघनादश्च बाह्यतः ॥ ५८ ॥ 
यह सुनकर मीतरकी ओर गोओके रभानेके साथ ही 
गोर्पौकी किलकारिरयोका वमु नाद भून उठा ओर ॒बादरकी 
ओर मेषोँकी गम्भीर गर्जना होने लगी ॥ ५८ ॥ 
भराविशरत तती गायो गेेयुंथभरकटिपिताः। 
तस्य दलस्य विपुलं पदर महरोदरम्‌ ॥ ५९॥ 
तदनन्तर गोपोद्यार एक-एक युथके रूपमे विभक्तं की 
हई गौण उस पर्वतकी विशार गुफमि, जिसका भीतरी भाग 
बहुत वडा थाः प्रवेश करने लगीं |} ५९ ॥ 
ङष्णोऽपि मजे शेलस्य शैलस्तम्भ इवोचति 
द्धरिकेन हस्तेन हौं प्रियमिवातिथिम्‌ ॥ ६० ॥ 
मगवान्‌ श्रीकृष्ण भी उस पर्वतके मूकमागमे प्रसरनिर्भित 
ऊवे खम्भकरे समान खड़े दो गये । उन्होने उस्र पहाड़को 


२द८ 


श्रीपष्टाभारते विकभागे 


[ हरिवंरे 


अपने प्रिय अतियिकी मेति एक 

था | ६०॥ 

ततो जस्य भाण्डानि युक्तानि शकटानि च । 

विविद्युर्वपैभीतास्ते तद्‌ गरदं गिरिनिर्मितम्‌ ॥ ६१ ॥ 
तदश्चात्‌ वपसि डरे हए रजके गोपर॒ अपने वर्तन-भेदि 

ओर युते हुए छकंडे ठेकर उस पर्वतनिर्भित गम प्रविष्ट 

होगये॥ ६१॥ 

अतिदैवं तु ष्णस्य दशा तत्त्‌ कम वञ्भ्रत्‌ । 

मिथ्यप्रतिन्नो जलदान्‌ चारयामास वैं विसु; ॥ ६२॥ 


हाथमे पकड रखा 


श्रीकृप्णक्रे उस कर्मकोः जो देवताओके यि भी असम्भव 


हैः देखकर वच्रधारी भगवान्‌ इन्द्रने उन मे््रौको रेक दिया। 
रजको नष्ट कर देनैकी उनकी प्रतिञ्चा टी दो मयी ॥६२ ॥ 
सप्तरात्रे तु निने धरण्यां विगतोत्सवः। 
जगाम संवृतो मेचेवंहा खर्गसुत्तमम्‌ ॥ ६३ ॥ 
सात राततक्र प्रथ्वीपर र्था कररनेकरे पश्चात्‌ मेषति धिरे 
हुए. इचनाश्चक इन्द्र उत्सवदीन (आनन्दयून्य ) दो ( अथवा 


वरजम मनवे जानेवाले अपने उत्सवये वचित दो ) उत्तम 
स्वर्गलोको टोर ग्वे ॥ ६३ ॥ 
निचृत्ते सप्तपच्रे लु निप्प्रयन्ने दातक्रतौ | 
गताश्रे विमले व्योम्नि दिवसे दीप्तभास्करे ! ‰£ ॥ 
गावस्नेनैव मार्गेण पस्जिग्युर्य्रागतम्‌ । 
स्वं च स्थानं ततो घोषः प्रत्ययात्‌ पुनरेव सः ॥ ६५॥ 
सात रात चीन जानिपर जव इनका सारा प्रयल निष्फड 
हौ गयाः वादक नष्ट हो रवेः आकाश निर्मदो गया ओर 
दिनम सूरधदेव देदीप्यमान दो उटे+उस समय सारी रौर 
फिर उसी मागमे जैमे आथी थीं, उसी तरद्‌ द्य गयी । सारा 
व्रज पुनः अपने निवासखानको चल गया ॥ ६४.६५ ॥ 
छष्णोऽपि तं गिरिश्रेष्टं स्वस्थाने स्थावरत्मवान्‌ 1 
प्रीतो निवेदयामास रिवाय चस्दो विभुः ॥ ६६॥ 
सिर भावसे खद हुए. वरदायक्र भगवान्‌ श्रीकृण्णने भी 
प्रसन्न होकर फिर जगते कल्याणक च्वि उस श्रे पर्वतकर 
अपने सखनपर स्यापि कर दिया ॥ ६६ ॥ 


दति श्रीमहाभात्ते लिरूभगे ददिरे विष्णुपर्वणि गोवर्ध॑नधारगेऽष्टदशोऽध्यायः ॥ १८ ॥ 


दस प्रकार श्रीमहाभारते छिरमाग हरिवंदके अ"तः विष्णु पवमे श्रीडृप्णफा गेवर्धनषारणविषयक अररग्हे{ अध्याय्‌ पुरा हुमा॥ ९८ ॥ 


एकोनविदोऽष्याय 


देवराज इन्द्रका आगमन, श्रीकृष्णका गोविन्द्‌-पदपर अभिषेक तथा इन्द्रका भ्रीकृप्णको भावी 
¢ लिये 
कायं वताकर अजेनकी देख-भारके ठिये कहना ओर श्रीढृष्णका उसे खीकार करना 


वैशम्पायन उषा 

धतं गोधर्दध॑नं दष्टा परिजरातं च गोकुलम्‌ । 
छरप्णस्य दरछनं राक्रो सोचयामास विस्मितः ॥ १ ॥ 

वेशम्पायनजी कहते ह--जनमेजय ¦ जव इनद्रने 
देखा कि श्रीकृप्णने गोवर्धन धारण क्रे गोकुखकी रभा 
करली, तवय वड़े विस्मये पडे! अव उन्दै श्रीङष्णका 
दर्शन करनेकी इच्छ दुई ॥ १ ॥ 
स॒ नि्जंलाम्बुदाकारं मत्तं मदजटोक्षितम्‌ । 
आरुलयैरवतं नागमाज्ञगाम म्धीतलम्‌ ॥ २ 

चे जल्टीन वादल्करे समान पवेत वर्णदा ओर मद 
जले मीगे हुए रावत नामक मदमत्त दाथीपर चदट्कर्‌ 
भूतख्पर अये ॥ २॥ 
सख ददर्शोपविष्टं वै गोवरदधनदिलातटे। 
कृष्णमक्रिकष्टकमोणं पुरुहतः पुरदरः ॥ ३ ॥ 

अनिक नामेसि पुकार जनेवाठे पुर्द्र इन्द्रे वों 
आकर देखा, अनायास ही महान्‌ कर्म करनेवाले श्रीकृष्ण 
गोवर्धन पर्वतकी एक विलाप वरेडे हु. ६ ॥ ३ ॥ 


तं वीक्ष्य वारं बहत। तेजसा दीपमव्ययम्‌ । 
गोपवेषधरं विष्णु प्रीति लेभे पुरदरः॥ ४॥ 
महान्‌ तेजमे उद्धामित होनेवठे गोपतरेपधारी विष्णु 
स्वरूप उन अविनाशी वालछृप्णको देखकर देवराज इन्द्रको बढी 
प्रसन्नता हुई ॥ ४ ॥ 
तं सोऽस्बुजदकदयामं छृष्णं श्रीवत्सलक्षणम्‌ । 
पयौप्तनयनः राक्रः सवरनवेस्मैक्षत ॥ ५॥ 
नील्करमल्दलफे समान श्यामसुन्दर एवं श्रीवत्स.चिह- 
विमृपितत उन श्रीकृष्णको देखकर इन्द्रो अपने नेर्चोका 
फाल प्रप्त हो गया । उरन्ोनि अपने सम्पूर्णं नेति जी भरकर 
उन्हे देखा ॥ ५॥ 
दृष्टा चैनं धरिया जुष्टं मर्त्यलोके मयोपमम्‌ 
सूपविष्ट शिलपृष्डे शक्रः स वीडितोऽभवत्‌॥ ६ ॥ 
मर्त्यलोकमे र्ट्कर भी देवोपम गोभासे सम्पन 
श्रीकृप्णकरो धिलप्षटपर खखपुर्वक वैठा देख इन्द्रयो त्रडी 
कजा हुई ॥ ६ ॥ 
तस्योपविष्टस्य सुखं पक्षाभ्यां पक्षिपुङ्गवः। 
अन्तद्धीनं गतदछायां चकूरोरगभोजनः ॥ ७ ॥ 


विष्णुपवै 


पएकोनर्चिरो ऽध्यायः 


२६९ 


~ ग्र 
--------~-------------- 
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वह बैठे हुए श्रीहरिके मुखपर सरप॑भोजी पक्िराज 
गरुड अदृदयं रहकर अपने दोनो पंखोसे छाया किये 
दु थे॥७॥ ॥ 
तं विविक्ते वनगतं -रोकचरृत्तान्ततत्परम्‌ । 
उपतस्थे गनं हित्वा कृष्णं वखनिषुद्दनः ॥ ८ ॥ 
वलसूदन इन्द्र हाथी छोडकर उतर पड़े ओर एकान्तम 
वने भीतर रहकर लोक-न्यवदास्मै तत्पर हूए श्रीकष्णकी 
सेवामे उपसत हुए ॥ ८ ॥ 
स॒ समीपगतस्तस्य दिव्यख्रगयुदेपनः। 
रराज देवराजो वै वञ्जपूर्णकरः प्रभुः ॥ ९ ॥ 
श्री्ष्णके समीप जाकर दिव्य पुष्पके दार ओर अनुटेपन 
धारण करमेवठे प्रभावश्याटी देवराज इन्द्र वड़ी शोभा पारद 
थे | उनका हाथ वज्रसे परिपूणं था ॥ ९ ॥ 
किरीटेनाकैतुल्येन वियुदुदयोतकारिणा । 
कुण्डलाभ्यां स दिव्याभ्यां सततं श्ोभिताननः ॥ १० ॥ 
विद्युत समान प्रकाशर फैल्मनेवलि सूर्यस्य तेजस्वी 
किरीटतथादो दिव्य करुण्डलोसे उनके श्रीमुखकी ष्दादही 
वड़ी शोभा होती थी ॥ १०॥ 
पञ्चस्तवकलम्बेन दारेणोरसि भूषितः। 
सदस्रपत्रकान्तेन देहभूषणकारिणा । 
देश्षमाणः सहस्रेण ने्ाणां कामरूपिणाम्‌ ॥ १९१॥ 
वे अपने वक्षःस्लपर एक एेसे हास्से विभूषित ये 
जिम एलोके पोच गुच्छे लटक रहे ये । खिले हुए कमल- 
दके समान कान्तिमान्‌ सम्पूणं शरीरको विभूषित करनेवलि 
तथा इच्छानुसार स्प धारण करनेवाले एक सहल ने्रोसे वे 
भगवान्‌ श्रीङकृष्णकी ओर देख र्दे थे ॥ ११ ॥ 
चिदराक्षापनार्थेन मेघनिर्घोधरकारिणा । 
अथ दिन्येन मधुरं व्याजहार खरेण तम्‌ ॥ १२॥ 
उन्होने देवता्ओको आज्ञा देनेके ल्यि अभ्यस्त ओर 
मेष-गजनाके समान गम्भीर घोष करनेवकले दिव्य खसे 
मधुर वामे भगवानूसे इस प्रकार कहा ॥ १२ ॥ 
इन्द्र उवात्त 
कृष्ण छृष्ण महावाहो क्षातीनां नन्दिवर्धन । 
अतिदिन्यं कृतं कमं त्वया प्रीतिमता गवाम्‌ ॥ १३ ॥ 
इन्द्र॒ वोङे-कृप्ण ! कष्ण ॥ महावाहो !! आप 
सजातीय बन्धुभौके अनन्दकौ ब्रद्धि करनेवलि ह । गे ओके 
प्रति प्रीति रखकर आपने जो कर्मं किया है वह अति 
दिव्य हे ॥ १३॥ 
मयोत्छष्टेणु मेघेषु ` युगान्तावर्तकारिषु। 
यस्वया रक्षिता माचस्तेनासि परितोषितः} १४१] 


मेरेदाया छोड गये प्रख्य पुनराधृत्ति करनेवाठे मेषोके 

वर्षा करनेपर भौ अपने जो मौओकी रभा की दैः उसते 

मँ बहुत संव हू ॥ १४॥ 

स्वायम्भुवेन योगेन यश्चायं पर्वतोत्तमः। 

धतो वेद्मवदाकारो क शयेतेन न ्िस्मयेत्‌ ॥ १५॥ 
यह जो उत्तम पर्वत है इसे आपने स्वायम्पुंव योगसे 

आकारमे घरी भति धारण कर छया था | अपकरे इस 

अलौकिक करमते किसको आश्वर्यं नदीं होगा ॥ १५ ॥ 

प्रतिषिद्धे मम महे मयेयं रुषि्त॑न वे। 

अतिवचष्टिः कृता कृष्ण गवां वै साप्ततिकी ॥ १६॥ 
श्रीक्प्ण { जय मेया प्रचित उत्सव रोक दिया सयाः 

तव मैने सोषमे भरकर गैर्ओोपर अपना क्रोध उतारकर 

चयि सात राततक अतिद्ष्टि की | १६ ॥ 

स्रा त्वया भ्रतिषिद्धेयं मेघबृष्टदुंरसदा । 

देवैः सदानवगणेदु्निवायी मयि स्ते ॥ १७॥ 
उस दुर्जय मेधरह्ृ्टिका आपने निवारण कर दिया । मेरे 

रहते दानवोसदित सम्पूरणं देवताकि ल्थि भी उस वर्पाकरो 

रोकना वहत ही कठिन था ॥ १७ ॥ 

अहो मे सुप्रियं कृष्ण यत्‌ त्वं मालुषदे्ट बान्‌ 

समध्रं वेष्णवं तेजो विनिमृष्टसि रोषितः ॥ १८॥ 
श्रीकृष्ण ! यह एक आश्वय॑मयी घटना इई दै । मेरे 

च्ि यह बहुत प्रिय है क्रि आप मनुष्यशरीरं धारण 

करके भी अपने भीतर सम्पर्णं वैष्णव तेजको छिपाये रखते 

है ओर रोष दिये जानेपर उसे प्रकट कर स्करते है ॥ १८ ॥ 

साधितं देवतानां हि मन्येऽहं काय॑मव्ययम्‌ ¦ 

त्वयि माचुष्यमापन्ने युक्ते चैव खतेजसा ॥ १९ ॥ 
आप मानव-शरीरको प्रात होकर भी अपने वैष्णव तेजसे 

सम्पन्न है, इसल्यि भै देवताओं कार्यको सिद्ध हुआ ही 

मानता हूं । अव्र हमारा कोई कार्य व्रिगड़ नहीं सकता ॥१९॥ 

सेत्स्यते सर्वकायीथों न किचित्‌ परिहास्यते । 

देवानां यद्‌ भवान्‌ नेता सर्व॑कायपुरोगमः ॥ २० ॥ 
जव आप देवताथेके नेता ह ओर सी कार्यौमे अग्र 


१. स्वयम्भुवे योग कते दै दैरण्यगभो ( व्ल 
सम्बन्धिनी ) धारणाको, उफ करनेसे भारी-से-मारी वस्तु भी हन्की हो 
जाती है । जसे श्रीष्णङे उठते समय नोवध॑न पर्व॑त इल्का हो गया 
था, इसी तरह उक्त योग या धारणाका अश्यय केनेये वद-ते-वडी 
यस्तु भ बहुत छोटी या अस्प हो जाती दै । जैसे भगतत्यके समुद्रपान 
कते समय उनके व्यि सारा समुद्र तीन टौ अ चमनम सीपित 
होकर आ गया था। 


२७० 


गामी रहते ई, त्र हमार सव्र कार्य, कमसत प्रमोजन निट 
हो जायगा, करु मी विगदुनै नरी पयेषा | २० ॥ 
पकस्त्वमसि देवानां टोक्रःनां च सनाततनः। 
दवितीयं नाच पद्यामि वरस्तेषां च धुरं वरेत्‌ ॥ २१॥ 
प्रमो | एकमान्र आप दी सम्पूर्णं देवता तथा ल्कके 
सनातन रक्षक ६। मँ आपे शिवा दूसरे ्रिषीको यर्हो पेता 
नदीं देखता, जो उन छोर ओर देवताथौकी सधाक भार 
वदन कर सके ॥ २१ ॥ 
यथा हि पुवः श्रेष्ठो ग्रे शवुरि नियोञ्यते 1 
पवं त्वमसि देवानां मग्नानां द्विजवादनः ॥ २२ ॥ 
जेते श्रे त्रे मार दोन च्वि ससे आगे जोता जाता 
द, उसी प्रकार आप संकटे द्भ हुए देवनार्भोका उद्वार 
कसक नि ससे अगे रष्वे ६ | पक्षिराज गवदु आपके 
वादन द ॥२२॥ 
त्वच्छसैरगतं कृष्ण जगत्पकरणं त्विदम्‌ । 
ब्रह्मणा साघु निर्दिष्टं धातुभ्य श्व फाञ्चनम्‌ ॥ २३॥ 
श्रीकृप्ण | यदह जो संषारकी सि, वह सव आपके 
शरीरे भीतर दी र] बह्याजीने तो उसका मटीरमोति निर्देश 
मान क्रिवादै। ससे खव पातुर सुवर्ण श्रेष्ठ ६, उसी प्रप्र 
समस्त देवतार्ओमिं आप ई ॥ २३॥ 
खयं खयम्भूभेगवान्‌ बुद्धाय वयसापि वा । 
न त्वाचुगन्तुं शक्नोति पद््ुतगति यथा ॥ २७ ॥ 
साक्नात्‌ स्वयम्भू भगवान्‌ ब्रा भी अपनी बुद्धि यवा 
अवस्थाकरे द्वारा आपका यनुसरण न्दी कर सकते--आपके 
खाय-साय नष्टं चल सक्ते । ठीक उषी तर जते पदु मनुप्य 
शीघ्रगामी पुरुषक्रा पीछा न्दी कर सकता--उसफरे साय नरी 
जा सकता ॥ २४॥ 
स्थाणुभ्यो दिमवाज्दरैष्टो हदानां वरुणालयः । 
गरुत्मान्‌. पक्षिणां श्रेष्टो देवानां य भवान्‌ वरः ॥ २५॥ 
समस्त पर्व्तेमिं हिमवान्‌ श्रेष्ट ट । सरोवरयेभ समुद्र उत्तम 
ह । पक्षि्योमि गरुड़ तथा देवतार्थेमि आप धरे ६ ॥ २५॥ 


अपामधस्ताल्टोको घै तस्योपरि मदहीधसः। 
नागनामुपरिषएटद्‌ भूः पृथिव्युपरि मादुषाः) २६॥ 
सचसे नीचे जलटोकः ई, उसके ऊपर पर्वत यद्‌ 
पृथ्वी नागेकि ऊप्रर स्थित दै अर प्रथ्यीपर मनुष्य निवास 
करते द ॥ २६॥ 
मनुप्यङोकाद्वं तु खगानां गतिरुच्यते । 
आकादास्योपरि रविद्धीरं खर्ग॑स्य भादुमान ॥ २७ ॥ 
मनुप्यलोकमे उपर आकार्मे परिरयोकीं गति बतायी 
जाती है । भाकरादाते ऊपर अंशमारी सूर्य है जो सखर्गओककरे 
द्वार्‌ कदे गरे ह ॥ २७ ॥ 


धीमहाभारते विखभागे 


[ स्वये 


देवत्येकः परस्तस्माद्‌ धिमानगमनो महान्‌ । 

यत्राहं छूष्ण देवानामेन्दे धिनिदहिवः पे ॥ २८॥ 
सूथटोकमे ऊपर देवता्कि मष्टान्‌ लोक £, अरदो 

विमानमे याच्ना की जानी ट| श्रीच्रप्ण | वदी मुपे देवेन्द्र 

दपर स्यापि किया गया ॥ २८ ॥ 

खगोदुध्यं ््मटोको ब्रह्मर्पिगणसेवितः 

तत्र सौममतिश्चेव ज्योतिपां च महात्मनाम्‌ ॥ २९॥ 
स्वगे ऊपर ब्रह्मलोक ५, ज ब्रदमर्पिगणेति सेवित १। 

यनक चन्द्रमाकी तया मद्रातमा अर-नक्ष््रो्ी गतिद॥ 

तस्योपरि गा सेकः सध्यास्तं पाटयन्ति हि । 

ख हि सर्वगतः कष्ण मदाक्राश्चगतो महान्‌ # ३०॥ 
च्रछषटोकसे ऊपर गोशरोकर £ जिनका साध्यगण् पटन 

करते ६ । श्रीरृष्ण | वद्‌ महान्‌ टोक़ सर्वन्याषी £ 1 मदाक्नश- 

म व्यापकरूपसे छिन १ ॥ ३० ॥ 

उपयुपरि तत्रापि गतिस्तव ॒तपोमयी। 

यां न विद्मो षयं सर्व पृच्छन्तोऽपि पितामहम्‌ ॥ ३१॥ 
उसमे भी आपकी नपोमयी गति सर्वेपि 1 हम 

पताम पृते रदूनेपर मी अव्रत आप्री उम गतिक 

नर्द जान स्मे ६॥ ३१॥ 

खोकस्त्वधो दुष्कृतिनां नागखोकस्तु दारुणः 

पृयिदी कर्मदीटनां श्चेधं सर्वस्य कर्मणः ॥ ३२॥ 
मयेकर नागलोक सदसे नीये £ । व पापाचािवनि 

प्रात नवाया टोकयास्थान रै! जो न्वमावमे दी कर्मट 

£ उनके दिम यह्‌ भूर ६ 1 यद समसल कर्मफ क्षेत्र द॥ 

खमस्थिसणां विषयो चायुना तुस्यदृ्तिनाम्‌ । 

गतिः श्मदमाद्यानां स्वर्गः सरुतकर्मणाम्‌ ॥ २२६ ॥ 
जो अखिर & निनी दृत्ति वायुके समान है, उनका 

आश्रय आकाटा या थन्तरि्टोक है 1 जो शम-दमते सम्य 

द्र पुण्यकर्म लने रदत टै, उन मतुर््ोफी गति स्वर्गटोक दै॥ 

व्राह्ये तपति युक्तानां ब्रह्मटोकः परा गतिः। 

गचामेव तुं गोरोक्रो दुरासदा दि सा गतिः ॥ २४ ॥ 
जो ब्राह्म-तपम संटग्न रटनेवलि लोग द, उनङ्ी परम 

गति ब्रह्मलोक दै \ गोलोक तो गौेकि दी सखन होनिवाल 

रोक ट । वद गति दूसररोफे लिय दुरारोह ८ दुर्म ›) ६ ॥ 

सतु टोकस्त्यया कृष्ण सीश्रमानः छृत्तात्मना । 

धृतो धृतिमता वीर निश्वतोपद्रवाम्‌ गवाम्‌ ॥ ३५॥ 
वीर श्रीकृष्णं { इस समय (मेरे द्वारा व्रि कारण ) 

चद्ी ओं छखोफ संकयमै पड़ गया था, जिते आपसे 

वर्यगारी पुण्यात्मा पुरुपने उन गौर्बोपर अयि हुए उपदर्वौ- 

करा नाश करफे वचा्या है ॥ ३५॥ 


विष्णुपर्व ] 


तदहं समनुप्राप्ते गवां वाक्येन चोदितः, 
ब्रह्मणश्च . महाभाग गौरवात्‌ तव॒ चागतः ॥ ३६॥ 
अतः मदामाग ! मै ८ दिव्य कामधेनु आदि ) गोभोके 
तथा ब्रह्माजी भ वचनेसि प्रेरित होकर यर्हो आया दू । आपके 
प्रति मेरे मनमेजो गौरव दैः उसते भी मुञ्चे यहो अनिमे 
प्रणा मिटी है ॥ ३६ ॥ 
अहं भूतपतिः छ्ष्ण देवराजः पुरंदरः । 
'अदितेर्गर्भपयौये पूर्वजस्ते पुराङृतः ॥ २७ ॥ 
श्रीकृष्ण | मेँ वही समस्त मूर्तोका अधिपति देवराज 
इन्द्र हः जिते आपने पूर्वकाये माता अदितिकरि गरम॑मे 
आकर अपना वड़ा भाई व्रनाया था 1 ३७ ॥ 
खतेजस्तेजसा चैव यत्‌ ते दृर्रितवानहम्‌ । . 
देवरूपेण तत्‌ सर्य क्षन्तुमर्हसि मे विमो ॥ ३८॥ 
प्रो ! मने जो देवरूपसे उपस्थित होकर तेजसे अपना 
तेज प्रकट कफे आपको दिखाया दैः भरे उस सारे अपराधको 
आप क्षमा करदं ॥ ३८ ॥ 
पवं क्ान्तमनाः कष्ण स्वेन सौम्येन तेजसा । 
ब्रह्मणः श्णु मे वाक्यं गवां च गजविक्रम ॥ ३९] 
हाथीके समान परक्रमी श्रीकृष्ण [ दत प्रकार आप 
अपने सौम्य तेजसे मनने क्षमामाव लाकर ब्रह्माजी तथा गौओ- 
के कटे हुए इस वचनकरो मेरे मुखसे सुनिये--॥ ३९ ॥ 
आह त्वां भगवान्‌ चद्या गावश्चाकारागा दिवि । 
फर्म॑भिस्तोपिता दिन्यैस्तव संरक्चषणादिभिः ॥ ४०॥ 
भगवान्‌ ब्रह्मा तथा युलोकम खित दुई आकारगामिनी 
गोेनि अपको यह संदेश दिया है कि ष्टम अपके 
'गोसंरक्षणः आदि दिव्य कर्मोसि बहुत संवष्ट द ॥ ४० ॥ 
भवता रक्षिता गावो गोलोकश्च महानयम्‌ । 
यद्‌ वयं पुङ्गवः सद्धं बद्धीमः भ्रस्ेस्तथा ॥ ४१॥ 
'आपने जो गौरखकी र्ना की दहै, उससे इस महान्‌ 
गोलोकका संरक्षण . हूया है; क्योकि अव हम अपने सेड 
ओर संतानोरे साय दिनदिन बद ण्डी दहै॥ ५१॥ 
कप॑कान्‌ पुद्गवैवौशमेध्येन विपा ससान । 
धरियं राषस्पदृत्तेन तर्पयिष्याम कामदाः ॥ ४२॥ 
ष्टम गोटे सम्पूर्णं कामना्ओंको देनेवाल है । अव हल 
या गाड़ीमे जोतने योग्य बचलिष्ठ वैल देकर हम किसार्नोक 
संदु्ट करेगी । दूध-घीफे दाय पवित्र हविष्य प्रस्तुत कफ 
 देवतार्ओंकी वृति करगी ओर गोवर देकर साक्षात्‌ श्रीदेवीको 
संतुष्ट करती रहेगी ॥ ४२ ॥ 
तदस्माकं गुरस्त्दं हि भाणदश्च महावङः। 
अयप्रभृति नो राजा त्वमिन्दो वै भव परभो ॥ ४३ ॥ 


\ 


~“ पएकोनर्विद्यो ऽध्यायः 


२७१ 


शरभो | आप महान्‌ बल्माटी प्रभु हमारा परित्राण 
करनेकरे कारण हमारे गुखरूप दै; अतः आजसे आप दम 
गौ्ओकरे राजा इन्द्र हो ज्ये? ॥ ४२ ॥ 
तस्मात्‌ त्वं काञ्चनैः पूर्णैर्दिव्यस्य पयसो घटैः । 
पभिस्याभिषिश्चख मया हस्त'चनामितेः ॥ ४४॥ 
अतः ( गौ्मेकि इस अनुरोधकरे .अनुसार ) मेरे दवाय 
हाथपर रखकर प्रस्तुत करे गये इन दिव्य जले भरे हुए 
सोनेकरे कलसोद्याया आप अपना अमित्रेक करे | ४४॥ 
अहं किदेन्द्रो देवानां चं गवामिन्दतां गतः। 
गोविन्द्‌ इति छोकास्ूवां स्तोष्यन्ति भुवि इाश्वतम्‌।४५। 
म देवताओंका इन्दर हूँ ओर आप गजके इन्द्र 
दो गये ¡ आजसे इस मूतल्पर सव ॒छोग आप^सनातन 
प्रभुको "गोविन्द कहकर आपका सवन करेगे ॥ ४५॥ 
ममोपरि यथेन्दरस्त्वं स्थापितो गोभि्सन्वरः। 
उपेन्द्र इति छृष्ण त्वां गास्यन्ति दिवि देवताः ॥ ४६ ॥ 
श्रीकृष्ण | गौ्ओनि आप परमेश्वरको जो मेरे ऊपर इन्द्र 
बनाकर प्रतिष्ठित क्रिया हैः उसके अनुार देवतालोग 
आपको धउपेन्द्रः नाम देक द्युलोकमे आपकी कीर्तिका गान 
करेगे ॥ ४६ ॥ 
ये चेमे वार्षिक्रा मासाश्चत्वारो विहिता मम । 
पप्रामद्धं प्रयच्छामि इारत्काटं तु पश्चिमम्‌ ॥ ४७॥ 
मेरी आराधनक्रे ल्ि जो ये वर्षाके चार महीने विहित 
हुए है, इनका पिल आधा भागः जिसे शरत्कार कहते दै, 
मे आपकोदेर्हाहू॥४७॥ 
अप्रभूत मासौ दौ क्षास्यम्ति मम मानवाः । 
वषपद्धं च ध्वजो मद्यं ततः पूजामवाप्स्यसि । 
ममम्बुप्रभवं द्वै तदा स्यक्ष्यन्ति वर्हिणः ॥ ४८॥ 
सव॒ मनुष्य अआजसे शध्राचण ओर भाद्रपद, इन दो ही 
महीनोको मेरे ट्ि नियत मानेगे । इनके साथ वर्पाका आधा 
भाग व्यतीत दो जानिधर इन्द्रवतक्री समासिकरे चिहुभूत मेरे 
ध्वजकी स्थापना दोगी ¦ उसके वाद्‌ अपक्री पूजा हनि 
लगेगी । उस समय मोर मेरे द्वारा वरसाये गये जल्से उत्पन्न 
हए मदकरो त्वाग देगे ॥ ४८ ॥ 
अल्पवाचो गतमदा ये चान्ये मेघ्नादिनः | 
शान्ति सवं गमिष्यन्ति मम कारविचारिणः ॥ ४९॥ 
उनक्री बोली क्मदहो जायगी ओर उनक्रा सारामद 
उतर जायगा । मेषोको देखकर गर्जना करनेवाल जो दूसरे 
प्राणीरदैः वे सव्र मी मेरे समयका विचार करके दान्ति 
( मोन ) धारण कर्‌ ठेगे ॥ ४९ ॥ * 
निशङकगस्त्यचरितामाच्छं च प्रचरिष्यति । 
सहस्ररदिमरादित्यस्तापयन्‌ स्वेन तेजसा ॥ ५०॥ 


६. 
॥१ 


२७२ 


भीमहाभारते खिलभागे 


[ शिवदो 


--~~---~ 


वरषरमिं ही सदस्ष किर्णोवाछे सूर्यदेव अपने तेजसे 
जगतूको ताप देते हुए प्त्िशङ्धु ओर (अगस्त्य पुनिः के 
द्वारा उपभोगमे लायी हुई दक्षिण दिशा संचार करेगे ॥५०॥ 
ततः शारि युक्तायां मौनकासेयु वर्दिु। 
याचमाने खगे तोयं विष्टयुतेयु पवेषु च ॥ ५१॥ 
दंससारसपूर्णेु नदीनां पुलिनेषु च । 
मत्तक्रोश्चप्रणदेषु प्रमत्तवृषमेषु च ॥ ५२॥ 
गोपु चेव प्रहास श्चरन्तीघु पयो वहु । 
निचत्तेयु च मेघेषु नियत्य जगतो जलम्‌ ॥ ५३॥ 
आका्ठे शाख्रसंकाे हंसेषु च चरत्सु च । 
जातपद्यषु तोयेषु बापीषु च सरस्छखु च ॥ ५४॥ 
तडागेषु च कान्तेषु तोयेषु विमलेषु च । 
कलमावनताप्राु दृष्णकेदारपडक्तिघु ॥ ५५ ॥ 
मध्यस्थं सलिलारम्भं कुर्वन्तीपु नदीधु च । 
खुखस्यायां च सीमायां मनोदर्या मुनेरपि ॥ ५६॥ 
पृथिन्यां पृथुराट्रायां रम्यायां वर्षसंक्षये । 
भ्रीमत्खु पंकतिमगंयु कङ्वलत्छु उणु च । 
द्चुमत्छु च देशेषु प्रचत्तेपु मखेषु च ॥ ५७॥ 
ततः प्रवरस्यते पुण्या शारत्‌ खुप्ोत्थिते त्वयि । 

तदनन्तर जवर शरद््रदका योग प्राप्त होगा, मोर मौन 
रहनेकी इच्छा करेगे, पपीहे जककी याचना करने ल्गेगेः 
नदिर्योमे नावे चल्ना वंद दो जायगा ( अर्थात्‌ नदियों 
जलकी बाट्‌ नदीं रह जाय्रगी ); सरिताओेकरि तट षसो ओर 
सारसौसे भरे रगे, मदमत्त क्रौञ्च पक्षी वरहो कलरव करते 
देगिः सड मतव होकर धूमे, गौ हर्षम भरकर बहुत 
दुध गीः संसारके ल्थि जख्की वर्षा करके व्रादरू विलीन हो 
जा्येगे, आका श्लोकी भोति चमक उङेगा -निर्मरहयो 
जायगा, हंस सव्र ओर विचरे ठगेगे, वावड़ी ओर सरोवरोके 
जर्खोमि कमल उन्न हो जा्येगेः ( उने खिलनेसे ) 
तडर्गोकी शोभा वद्‌ जायगी- तरे कमनीय हो उरे; 
समी जलाशयके जल निर्मल हो जर्यैगे, खेती श्रीद 
कालो-काटी केपारिेतिं धार्नोकी पकी वा अग्रमाणकी अस्ते 
ल्टकती दोगा, नदिर्यो अपने जलका वह व वरीचर्मे कर ठगी 
व्रजो अथत्रा गरविँकी रीमार्टु ( खेरतोकी भूमि) सुन्दर 
सरस्य ( अना ) वे सम्पन्नद्यो मुनेर्गके भी मनक मोह 
लेनैवालो हो जायेगी, वर्था व्रं त जनेपर जव्र बहुत संख्पक 
राष्टसे युक्त प्रथ्वी रमणीय दिखाग्री देने स्मोगीः पक्तिवद्ध 
मार्ग शोभाय्रमान दो जयेगे, वृर वेल तथा ओषयेर्योमे कल 
स्रा ज्येगेः स्यान-खयानपरर दख पौ खेती ठहराती दिखायी 
देगीः ( आग्रायण ओौर वाजपेय आदि ) यज्ञ आरम्भ होने 
ल्मेंगे तया आप (भगवान्‌ विष्णु) जव सोक्रर जाय 
उटेगेः उष समय पुण्यनयी च्रद्‌ छुकरी प्रवृत्ति 
होगी ॥ ५१-५७१ ॥ 


लोकेऽस्मिन्‌ ष्ण निखिले यथेव निदिवे तथा ॥ ५८॥ 
नरास््वां चेव मां चैव ध्वजाकारासु यष्टु । 
महेन्द्रं चप्युपेन्द्र॑ च म्टयन्ति महीतले ॥ ५९ ॥ 
श्रीकृष्ण { वह शर्कार प्राप्त होनेपर खर्गलोककी 
ही भोति इस समस्त जगतूरमे रहनेवके मनुष्य भी भूत्पर 
ध्वजाकार ङंडोमिं सुद्च महेन्द्रकी तया आप उपेन््रकी पूजा 
करेगे ॥ ५८-५९ ॥ 
ये चावयोः स्थिरे इत्ते महेल्द्रोपेन्द्रसंक्षिते 1 
मानवाः प्रणमिष्यन्ति तेपां नास्त्यनयागमः ॥ ६० ॥ 
जो मानव हम दोनेसि सम्बन्ध रखनेवाठे इस सनातन 
आचार ( मदेनद्रोपेन्द्रमख नामक उत्सव )मे हमे प्रणाम करेगे; 
उन्हे कमी अनीतिका सामना न्दी करना पेमा ॥ ६० ॥ 
ततः शक्रस्तु तान्‌ गृ घटान्‌ दिव्यपयीघरान्‌। 
अभिषेकेण गोविन्दं योजयामास योगवित्‌ ॥ ६९॥ 
तदनन्तर योगवेत्ता इन्द्रने दिव्य ( मन्दाक्रिनीका ) जल 
धारण करनेवाले उन कलर्सोको हाथमे लेकर यवान्‌ 
श्रीकृष्णका “गोविन्द ८( गौर्ओकि इन्द्र )*-पदपर अभिषेक 
करिया ॥ ६९ ॥ 
दृष्ट्रा तमभिपिक्तं तु गावस्ताः सह यूथैः । 
स्तनैः प्रज्वयुकतैश्च सिषिचुः कृप्णमन्ययम्‌ ॥ ६२ ॥ 
( इन्द्रदयारा ) उनका अभिषेक हज देख यूथपतिरयो 
( सों ) सित उन दिव्य गोओने भी दुधकी धारा वहाते 
इए अपने यर्नोद्वारा अविनारी श्रीकृष्णका अभिषेचन 
किया | ६२॥ 
मेधाश्च दिवि युक्त भिः साखतभिः समन्ततः । 
सिपिचुस्तोयधाराभिरभिपिच्य तमव्ययम्‌ ॥ ६२॥ 
इसके वाद मेर्घनि भी आकारामे छोडी दुई अमरतयुक्त 
जकधाराओंद्वारा ॒श्रीकृष्णको सव्र ओरसे नहलक्र उन 
अविनारी ईश्वरा अमिषेक-कमं सम्पन्न क्रिया ॥ ६३ ॥ 
वनस्पतीनां सर्वं . खुस्विन्दुनिभं पयः। 
ववुः पुष्पवपद्रं च नेदुस्तू्याणि चाम्बरे ॥ ६७॥ 
तदनन्तर समी वनस्तियेकी डालियौसे चन्द्रमाके समान 
दवेत दुग्ध टपक्रने. लगा ( इस तरह उन वनस्पतिर्योने भी 
मगवान्‌का अभिषेक किथा ) । देवतानि पूली वर्षा की 
तथा आकारराम दिव्य वाजे अपने-आप ब्रज उदे ॥ ६४ ॥ 
अस्तुवन्‌ सुनयः सवं वभ्भिमेन्नपसयणाः । 
पकार्णवे विविक्तं च दधार वुधा चपुः ॥ ६५॥ 
तत्पश्चात्‌ समी मन्त्रपरायण मुनिर्घेनि मगवान्‌ श्रीङ्प्ण- 
का स्तवन किया । पर्व॑ने अपने उस खरूपकरो धारण क्रियाः 
जो एकार्णवसे एथक्‌ दोनेपर उसे प्राप्त हज था ॥ ६५ ॥ 


-=~------------------------------ =-= 


प्रसाद्‌ सागरा जग्मुर्ववुवीता जगद्धिताः। 
माग॑स्थोऽपि वभौ भादुश्वन्द्रो नक्षत्रसंयुतः ॥ ६६ ॥ 
समस्त समुदरोके जट प्रसन्न ८ खच्छ-निमंर ) दौ गये 
वायु जगत्‌के लि दितकारक होकर वहने ल्गी । सूर्यदेव 
अपने समुचित मार्गपर स्थित रहकर प्रकादित होने लगे । 
चन्द्रमा नक्षति संयुक्त होकर सुद्रोभित होने द्मे ॥ ६६ ॥ 


ईतयः धकशमं जग्मुनिरवैरर्चना सृषाः। 
्रवाखपत्ररायखाः पुष्पवन्तश्र पादपाः ॥ ६७ ॥ 
अत्िष्ष्टि आदि ईतिर्यो शान्त हो ग्य । यजाकि सभी 
कार्यं वैरभावसे ररित होने लगे । वक्ष पूलोति मर गये ओर 
नूतन पर्ल्वो तथा हरे हरे पत्तेपि विचित्र दोभा धारण करने 
ल्त ॥ ६७ ॥ 
मदं प्रसुखबुनौगा यातास्तोपं ' वने खगाः । 
अटंरुता गात्रस्टैधतुभिभौन्ति पर्वताः ॥ ६८ ॥ 
हाथी मद्‌ वहानि टो । बनमे मृग आदि ष्च संतोप्र 
पराप्त करने सपो । पर्च॑त अपने ऊपर उमे दए इषो तथा 
विभिन्न धातुओसे शोभा पने खो ॥ ६८ ॥ 
देवरोकोपमो छोकरस्ठप्तोऽमरतरसेरिव । 
आसीत्‌ छृष्णाभिषेको हि दिन्यखग॑रसोक्षितः ॥ ६९ ॥ 
सम्पूर्णं जगत्‌ देवलोकके समान खुली हो गया, मानो 
उसे अमृत-रससे तृप कर दिया गया हो | इस प्रकार दिव्य 
सर्गाय रस ( जल ) से सिक्त होकर श्रीकृष्णक्रा वह अभिपेक- 
कर्म सम्पन्न हुआ ॥६९॥ 
अभिषिक्तं तु तं गोभिः राक्रो गोषिन्दमग्ययम्‌ । 
दिन्यमाल्याम्बरधरं देवदेवो. ऽरवीदिदम्‌ ॥ ७०॥ 
गो्ओददारा अभिषिक्त होकर दिञ्य माला ओर दिव्य 
वस्र धारण करनेवाठे अविना गोविन्दसे देवदेव इन्द्रने इस 
प्रकार का~ ७० ॥ 
पय ते प्रथमः र्ष्ण नियोगो गोपु यः ऊतः। 
श्रूयतामपर छष्ण  ममागमनकारणम्‌ ॥ ७९॥ 
'्रीदप्ण [ यह्‌ मने आपक्रो अपने आगमनका प्रथम 
देतु बताया हे, जिसक्रे अनुसार गौ्ओंकी आज्ञाका पालन किया 
गया है । अव भरे अनेका जो दूसरा कारण दै, उसे भी सुन 
लीन्यि ॥ ७१ ॥ 
क्षिप्रं प्रसाध्यतां कंसः केशी च तुरगाधमः। 
यरिष्श्च मदाविष्टो राजराज्यं ततः कुर ॥ ७२॥ 
भुञ्े यह कहना है फि आप सीघ ही केस तथा अश्र 
अधम केशीका मी वध कर डालि । मदमत्त अरिष्टसुरकौ 
यमलोक मेज दीज्यि । तदनन्तर राजाओपर दासन 
कीनि ॥ ७२ ॥ | 
पितृष्बसरि जातस्ते ममांहो.ऽहमिव सितः । 
स ते रक्ष्यश्च मान्यश्च सस्ये च विनियुस्यताम्‌ ॥ ७३॥ 


पकोनविो.ऽध्यायः 


२७३ 


र 


'आपकी बुआ कुन्तीके गभस मेरा अंश उद्यन हुमा 
हैः जो मेरे ही समान है] आप उसकी रघा ओर आदर करं 
तथा उसे अपना सखा चना ठे ॥ ७३॥ 
स्वया दानुगृदीतः स तव चृन्तासुषर्तकः। 
तवदवसे वतंमानश्च प्राप्स्यते विपुर यश्चः ॥ ७७ ॥ 

'आपसे अनुगहीत होकर षह आपके बताये हुए आचार- 
का पालन करेणा ओर सदा आपकी आज्ञाक्रे अधीन रहकर 
भूमण्डले महान्‌ यद प्राप्त कर ठेगा ॥ ७४ ॥ 
भारतस्य च वंशस्य स चरिषटो धञुधैरः। 
भविष्यत्यनुरूपश्च त्वदते न॒ च रंस्यते ॥ ७५॥ 

'्वह भरतवंशका सवशे धनुर्धर होगा । आपकी इच्छ- 
के अनुरूप बनकर रहेगा ओर आपे विना.कमी कहीं भी 
उसका मन नहीं स्येगा ॥ ७५ ॥ 
भारतं त्वयि चायत्तं तस्मिश्च पुरुपोत्तमे 1 
उभाभ्यामपि संयोगे यास्यन्ति निधनं सपाः ॥ ७६॥ 

'आप ओर उस पुखपप्रर छुन्तीक्ुमारपर दी महाभारत 
युद्ध अवलम्नित होगा । अप दोनोका संयोग प्राप्त होनेपर 
राजारोग युद्धे मरि जर्येगे ॥ ७६ ॥ 
प्रतिज्ञातं मया रष्ण ्षिमध्ये सुरेषु च । 
मया पु्रोऽज्ञैनो नाम खः कुन्त्यां कुखोदहः ॥ ७७॥ 

श्रीकृष्ण [ मेने ऋषियों तथा देवता्ओंके बीचमे इस 
बातका विज्ञापन कर दिया है कि करुन्तीके गसि मेरे द्वारा जिस 
कुरदीपक पुत्रकी उदत्ति हुई हैः उसका नाम अर्जुन है ॥ 


सोऽख्राणां पारतच्क्षः श्रेष्ठश्चापविकर्षणे। 

तं परवेष्यन्ति वै सँ राजानः शास्रयोधिन; ॥ ७८ ॥ 
'वह अस््नौकी विनामे पारंगत रहै । धनुपको खींचनेभे 

सरसे शरेष्ठ है । यखोद्रारा युद्धः करनेवाटे सव नरेश उसीमे 

विलीन हो ज्येगे ॥ ७८ ॥ 


अक्षौदिणीरतुश्ुरणां राक्षां संग्रामशालिनाम्‌ 

स पकः क्षनधमेण योजयिष्यति श्च्युना ॥ ७२॥ 
(संग्राममे शोभा पनेवले शूरवीर राजाभकीं करई अक्षौ. 

हिणी सेनार्ओको वह अकेला ही कषत्रियधर्मके अनुसार युद्ध 

करके मौके घाट उतार देगा ॥ ७९ ॥ 


तस्याखचरितं मागं धटुषो ङाघवेन च। 

नाजुयास्यन्ति राजानो देवा वा त्वां विना भ्रमो ॥ ८०] 
“प्रभो | आपको छोडकर दूसरे कोई देवता अथवा 

भूतले नरेश अजने अख-मा्गका अनुसरण नहीं कर सकर । 

उसमे जो धनुर चरनेकी फुर्ती है, उसके द्वार भी कों 

उसकी समानता नहीं कर सकता | ८० ॥ 

स ते यन्धुः सहायश्च संप्रामेु भविष्यति । 

तम्य योगो विधातस्यस्त्वया गोमिन्द मत्छते ॥ ८१ ॥ 


२७४ 


्रीमष्टाभारते खिकभागे 


[ दस्विंरे 


ध्गोविन्द्‌ ! युद्धे अवर्तोपर अर्जुन आपका सचा बन्धु 
एवं सदायक हौगा । मेरे चि अथा मेरे कदनेसे आपको 
उसे अध्यात्मविघाका उपदेश अवध्य करना चाद्ये ॥ ८१॥ 
दरष्व्यश्च यथां वै त्वया मान्यश्च नित्यशाः 1 
श्राता त्वमेव टोकानामञंनस्य च नित्यश्यः ॥ ८२॥ 
(अप अर्जुनको उसी तरह अपनापनकी टद्ष्िसे देखे 
जसा मृन्ने देखा करते ह । प्रतिदिन उसक्रा आदर करते रद । 
आप ही सम्पूर्ण छोकेकि शाता दैः अतः अर्जुनका मी सदा 
ध्यान स्वं | ८२ ॥ 
त्वया च नित्यं संरक्ष्य आहवेयु महत् सः। 
रक्चितस्य त्वया तस्य न स्युः प्रभविप्यति ॥ ८३ ॥ 
ध््दे-वद युद्धके अवसरोपर भी आपको नित्यप्रति उसकी 
रभा करनी चाहिये । पते सुरस्नित हए अर्जुनपर शल्युकरा 
वद नही चट सकेगा ॥ ८३ ॥ 
अजुनं विद्धि मां प्ण मां चैवात्मानमात्मना । 
आत्मा तेऽहं यथा शश्वत्‌ तथैव तव सो.ऽज्गुनः ॥ ८४ ॥ 
शश्रीकरप्ण | आप अर्जुनको मेरा दी खरूप समरन ओर मुप्ने 
भी दयसे अपना आत्मा स्वीकार करे । जते मे स्दादी 
आप्रका आत्मा हू उसी प्रकार वह्‌ अर्जुन भी आपक्रा आत्मा 
ही दै॥ ८४॥ 
त्वया टोक्रानिमाश्चित्वा वटेर्दस्तात्‌ त्रिभिः क्रमैः 
देवतानां छतो राजा पुरा ज्येष्टक्रमादहम्‌ ॥ ८५॥ 
ूरवक्राखमे आपने तीन पर्गोद्वासा इन तीनों लेकोको 
नापकर व्रि दाथते अपने अधिक्रासमे ठे ट्या ओर मुप्ने 
दी अपना वड़ा भाई मानकर देवतार्ओक्र राजा धना दिया ॥ 
त्वां च सत्यमयं क्षात्वा सव्येष्ं सत्यविक्रमम्‌ । 
सत्येनोपेत्य देवा वैं योजयन्ति रिपु्षये ॥ ८६॥ 
धप सव्यमयव ई सव्यरूपी यजञदवारा आपका यनन हभ 
दै तया आप सखत्यपरक्रमी दै, रेखा जानकर देवताछोग सलय- 
भावसे हौ अपकर शरणमे अति ओर भापको शतर-संदारके 
कार्यम ख्गति ई ॥ ८६ ॥ 
सोऽदुनो नाम मे पुत्रः पितुस्ते भगिनीश्चुतः। 
इद॒ सौदादमायातु भूत्वा सहचरस्तव ॥ ८७॥ 
(अजुन नामसे प्रसिद्ध मेरा पुत्र आपके पिताक्री ब्रहिनि 
(शुभा)का वैय दै। वह्‌ दस जगत्‌मे आपका सद्चर 
दोकर आयकरे साथ पूर्ण सदार्द खापित करे ॥ ८७ ॥ 
तद्य ते युध्यतः कृष्ण खस्थाने ऽपि यदे ऽपि वा । 
वोढव्या , पुद्गवेनेव धूः सदा रणमूर्धनि ॥ ८८॥ 
श्रीकृष्ण ! वह्‌ युद्ध कररदा दो, अपने खानपर हौ 
अथवा त्रस वरे दोः आपको बलिष्ठ वृधभकी भति सदा 
उसका भार सेभाख्ना चादिये । युद्धके गुहानेपर तो सदा 
आपको उखकी रश्वाका बोक्च उठाना ६ ॥ ८८ ॥ 


कंसे विनिहते छृष्ण त्वया भाव्यर्थदर्दिना! 
अभितस्तन्महद्‌ युद्धं भविप्यति मीक्षिताम्‌ ॥ ८९ ॥ 
श्रीकृष्ण [ आप तो मविष्य्मे होनेवाटी घटनार्थको 
भी प्रत्यश्चकी भोति देखनेवाठे है ८ अतः आप्ते कुछ भी 
अजात नदीं है ) | जव कंस आपकर द्वारा मार डाल जायगा; 
तत्र स्व ओसरसे अवि हुए राजार्थीका वह मदान्‌ युद्ध 
( मदाभारत >) दोगा | ८९ ॥ 
तच तेषां चरचीरणामतिमानुपकर्मणाम्‌। 
विजयस्याजंनो भोक्ता यशसा त्वं च योक्ष्यसे ॥ ९०॥ 
(उस युद्धम अतिमानव ( अलीक्रिक ) `कर्म करनेवे 
उन नरवीर राजार्ओको जीतकर अर्जुन विजय-सुखक्रा उपभोग 
करेगा ओर आप महान्‌ सुयदके भागी दैगि ॥ ९० ॥ 
एतन्मे छृप्ण कात्स्येन कर्तुमर्हसि भाषितम्‌! 
यद्दं ते खुरश्चैव सत्यं च भरियमच्युत ॥ ९१॥ 
‹अपनी मदिमासे कमी च्युत न, होनेवाले श्रीकृष्ण ! 
यदि मः सम्पूर्ण देव्ता तथा सत्य आपक्रो प्रिय र्दैतो न 
जो कुछ वरदो कदा दै, वह स्र काव आपक्रो पर्णं करना चाियिः॥ 
हाक्रस्य घचनं श्रुत्वा कृष्णो गोचिन्दनां गतः । 
प्रीतेन मनसा युक्तः प्रतिवाक्यं जगाद ह ॥ ९२॥ 
इन्द्रका यह वचन सुनकर "गोविन्दः भावकरौ प्राप्त हए 
श्रीक्रप्णने प्रसन्न-मनसे युक्त होकर दस ग्रकार उत्तर दिया 
प्रीतोऽसि दर्शनाद्‌ देव तव दराक्र दाचीपते। 
यत्‌ त्वयाभिद्ितं चेदं न क्रचित्‌ परिहास्यते ॥ ९३ ॥ 
देव ! दाचीवछछम चक्र ! मेँ तो आपके दर्खनसे दी 
प्रसन्न दो गवाह | आपने यदटजो कु कदा दैः वह्‌ सव 
पूरा क्रिया जायगा; कुछ भी छाडा नदीं जायगा ॥ ९३ ॥ 
जानामि भवतो भावं जानाम्ययुनसम्भवम्‌ । 
जाने पिद्ष्वसारं च पाण्डोर्दृत्तां महात्मनः ॥ ९४॥ 
'आपकरा मेरे प्रति जो भाव दै, उसे मै जानता हू । मुन्न 
अ्जुनके जन्मकरा भी प्रता है मदात्मा पाण्डुके साथ जिनक्रा 
विवाह हुआ उन अपनी बुआ कुन्तीको भी मेँ अच्छी तरह 
जानता हू | ९४॥ । 
युधिष्ठिरं च जनामि कुमारं घर्मनिर्मितम्‌ 
भीमसेनं च जानामि वायोः श्तंतानजं सतम्‌ ॥ ९५॥ 
ध्ध्मकरे द्वारा उन्न हुए ऊन्तीकरुमार युथिष्ठिसे भी मँ 
परिचित द्र । वायुक्री संतान होकर उत्पन्न हुए अपनी बुभके 
टे मीमसेनको भी मँ जानता दह || ९५ ॥ 
अभ्विर्भ्या साधु जानामि खष्टं पुत्र्यं श्युभम्‌। 
नकुं सहदेवं च माद्रीकुक्षिगतादुभौ ॥ ९६॥ 
ष्दोनों अध्िनीक्रुमारोने जिन दो यभलक्ण् पूर्वोकी 
ख्षटिकीदेतथाजो माद्रे गमम रह चुके दैः उन दोनों 
माई नक्रुक ओर सहदेवके विपये भी मे भटीभोति जानकारी 
स्वता, ॥ ९६ ॥ 


विष्णवं ] 


कानीनं चापि जनामि सवितुः प्रथमं संतम्‌ \ 
पितृप्वसरि कर्णं वै ध्रसतं सूततां सतम्‌ ॥ ९७ ॥ 
ध्यु छुन्तीके गर्भसे सूर्यदेवका संयोग पाकर कन्या- 
वसामि जो प्रथम पुत्र उत्यनन हसा था तथा जन्म लेनेकरे वाद्‌ 
जो सूत-मावको भप्त हो गया दै, उस क्ते भी मै अपरिचित 
नही हू ॥ ९७ ॥ 
धार्तराष्ट्राश्च मे सवं विदिता युद्धकाङ्क्षिणः । 
पाण्डोरुपरमं चैव शापादानिनिपातजम्‌ ॥ ९८॥ 
शयद्धकी इच्छा रखनेवालठे समसत धृतराष्टू-पुोको भी 
स जानेता हूं । शरापरूपी वज्रपातके कारण राजा पाण्डुका जो 
निधन हु है, वह भी सुश्षसे छिपा नीं दे ॥ ९८ ॥ 
तद्‌ गच्छशरिदिवं शक्र सुखाय चरिदिवौकसाम्‌ । 
नाजुंनस्य रिपुः कश्िन्ममा्े भरभविप्यति ॥ ९९ ॥ 


“अतः देवराज इन्द्र ! आप देवतार्भको सुख देनेकरे 


विद्यो ऽष्थायः 


७५ 


नवव 


च्य खर्गलेकको पधास्ि । मेरे सामने अनका कोई भी 
यतु उते परास्त नही कर्‌ सकेगा 1 ९९ ॥ 
अज्ुनाथं च तान्‌ स्न्‌ पाण्डवानक्षतान्‌ युधि । 
कुन्त्या नियौतयिष्यामि निवृत्ते भारते स्घे ॥ १००) 
'अर्जुनकरे व्यि ही मै महाभास्त-युद्ध समाप्त दोनेपर 
उम समसत पाण्ड्वा फो कुन्तीकी सेवामे सकुशल रया दूंगा ॥ 
यश्च वक्ष्यति मां श्राक्र तनूजस्तव सोऽखुनः। 
भृत्यवत्‌ तत्‌ करिप्यामि तच रमेदेन यश्श्रितः ॥१०१॥ 
वदेषेन्द्र ! अपकर पूत्र अजुन गुस्से जो ऊख कर्ैगाः 
उसे यै आपके स्नेह-पारते धकर आश्ञाकारी सेवककी भेत्ति 
पूर्णं करगाः ॥ १०१॥ । 
सत्यसंधस्य तच्छुत्वा प्रियं प्रीतस्य भाषितम्‌ 1 
ष्णस्य साक्षात्‌ चिदिवं जगाम चिददचेश्वरः ॥१०२॥ 
सत्यप्रतिज्ञ श्रीटप्णकर प्रसन्नतापृर्वंक कदे गये इस भिय 
चचनको समकर देवर इन्द्र साक्षात्‌ खग॑लोकको चले गये ॥ 


इति श्रीमहाभारते खिरुभगे हरिवंशे विष्णुपर्वणि गोविन्द भिपेके एकोनयिरोऽध्यायः ॥ १९ ॥ 
इस प्रकार श्रीमहाभारते सिरमाग दरिवंरके अन्तमेत विष्णुपरवमे गोचिन्दका अभ्तिफवरिषयक उन्नोस अध्याय पूरा हुमा ॥ ९९॥ 


विरोऽध्यायः 
श्रीृष्णका अलोक्रिक चरि देखकर आशङ्कित हए गोपोका उनसे प्रश्न ओर 
[| ¢ 
श्रीृष्णद्वारा उत्तर तथा उनकी रासलीङाका संक्षेपसे वणेन 


वैशम्पायन उकाच 

गते दर्रे ततः छृष्णः पूज्यमानो चजाल्यैः । 
गोवर्धनधर श्रीमान्‌ विवेदा चजमेव ह ॥ १॥ 

वेरस्पायनभी कहते है--जनमेजय ! देवराज इनद्र- 
के चले जानेपर बजवासियोद्रारा पूनित एवं प्ररंसित होते 
हए गोवर्धनधारी श्रीमान्‌ कृष्णे त्रजमे ही प्रवेद किया ॥१॥ 
तस्य बृद्धाभिनन्दन्ति क्षातयश्च सदोपिताः। 
धन्याः सोऽसुग्रीताः स्मस्त्वद्ध सेन नयेन च॥ २ ॥ 
गावो व्पभयात्‌ तीणौ वयं तीर्ण महाभयात्‌ 
तव प्रसादाद्‌ गोविन्द्‌ देवतुल्यपराक्रम ॥ ३ ॥ 

वरहा बडे-बृदे गोप ओर साथ रहनेवाठे जाति-भाई उनका 
अभिनन्दन करते हुए. बोले--षदेवदस्य पराक्रमी गोविन्द ! 
हम धन्य ह । तुमने अपने व्यवहार ओर नीतिसे हमखोरगोपर 
महान्‌ अनुमह कयां है । ठम्हारे सादते गोर्भका वप्र 
मयते उद्धार हआ ओर हमरोग भी महान्‌ भयते पार 
षो गये ॥ २-३॥ 
अमानुषाणि कमीणि तव पद्याम गोपते 1 
धारणेनास्य शेखस्य विश्वस्वं रष्ण दैवतम्‌ ॥ ४ ॥ 

४्गोपते ¡ हम दग्रे समी कर्म अलौक्रिक देख रदे ६ । 
श्रीकृष्ण { इस गोवर्धन पव॑तको हाथपर धारण करनेसे हम 


यह यच्छी तरह स्मद्च गयेैक्रि ठम मनुष्य नी 
देवता हो ॥ ४॥ 
कस्त्वं भवसि सद्राणां मरुतां च महावलः । 
वसूनां चा क्रमधं च वसुदेवः पिता तव ॥ ५ ॥ 
्ुम्हारा बरु महान्‌ है । वताओः ठम स्द्रो, मरणो 
अथवा वेसुभसेकौन दो १ये नरन्दजी ठम्दारे पिता कैसे 
होगये१॥५॥ 
वरं च वाल्येन्रीडा च जन्म चास्मासु गर्हितम्‌। 
रूण्ण दिन्या च ते चे शङ्कितनि मनांसि नः॥ ६ ॥ 
“श्रीकृ ! बचपन ही वु एसा अरीकरिकि वल है, 
तुम्हारे खेर भी अरीकिक द तथा तम्दार सारी चेष्ठा दिन्य 
है । परु हमलों जे तम्दारा जन्म हआ, यदी निन्दित 
दै ।( ठम रेखा निन्दित जन्म कैसे प्राप्त हुभा १ ) इस 
वातोँकरो सोचकर हमरि हृदय शंकित दो उठे हं ॥ ६ ॥ 
किमधं गोपवेषेण रमसेऽस्मा गर्दितम्‌ 1 


लोकपारोपमश्चैव गास्त्वं किः परिरक्षसि ॥ ७ ॥ 


१. हरिवंशपवं के ५५ वँ अध्यायमे वसुदेव भौर नन्दको भमिश्न 
बताया गया ६ । पके हो फरयपके दो सूप है वघुदरेव ओर नन्द्‌। 
अतः कीकटं नन्द्के दिये भी वसुदेव नामका प्रयोग हुमा £; 
शसीदिये यदद “वसुदेवः पएदका नन्द्‌ अर्थं किया गया ६ 1 


२७६ 


नुम करंसच्यरि गोपे धारण करके हमलोगेमि सम रे 
दो । यद कार्यतो तुम्दरि चि गर्हित दै। ठम टोक्रपालेरे 
समान दक्तिदाठी होकर भी वरदो क्थ गौरथ चर्वी ओर 
रखबाटी करते हो ॥ ७ ॥ 
देवो व। द्ानघः वा स्वं यक्षो गन्धर्वं एव च(। 
अस्माकं बान्धवो जातेयोऽसि सोऽसि नमोऽस्तुते ॥८॥ 
शुम देवता दयो या दानव य्न हो अथवा गन्धर्वे १ जो 
हमि बन्धु-वान्धवके सूपे उत्पन्न हए हो १ छृष्ण [ हरम जो 
होसो द्योः ्े हमारा नमस्कार रै ॥ ८॥ 
केनचिद्‌ यदि . क्येण धस्लसीह यरच्छया । 
चयं तवालुगाः सवे भवन्तं शरणं गताः ॥ ९ ॥ 
ध्यदि किसी कायं विोपते तुम स्वेच्छपूर्वक यदो रद रदे 
दौतोरदौ | हम खव लोग वुम्ारे अनुगामी सेवक टै ओर 
ठम््ारी शरणमे अयिर्दे' ॥ ९॥ 
वैश्चम्पायन उवाच 
गोानां वचनं श्रुत्वा ष्णः पद्मदलेक्षण 
भ्रस्युवाच स्मितं कत्वा क्षातीन्‌ सषौन्‌ समागतान्‌॥ १०॥ 
वंखम्पायनजी कहते है--जनमेजय { मोर्पोकरी यद 
चात सुनकर विकसित कमल्दछके समान नेत्रवाले श्रीकृष्णे 
खंसकराकर उन समस्त समागत ब्रन्धु्ओंको इस प्रकार उत्तर 
दिया-1 १० ॥ 
मन्यन्ते मां यथा खं भवन्तो भीमविक्रमम्‌ । 
तथाहं नवमन्तन्यः खजातीयोऽसि वान्धवः ॥ ११॥ 
, भआपस्व्र लोग मब्ने जैसा मयानकर पराक्रमी समञ्च रदे 
€ वैखा मानकर नेरा अनादर न करे । मे सो आपलो्ोका 
सजातीय मर्दरजन्धुदीरहर॥ ११॥ 
यदि त्ववद्यं श्रोतव्यं काकः सम्परतिपाल्यताम्‌ 1 
ततो भवन्तः ्नोष्यम्ति मां च द्वक््यन्ति तत्वतः ॥ १२॥ 
ध्यदि मेरे विपय्मे अआपलेोर्गोकौ यथार्थं बात अवदय ह 
ननी दै तो इसके च्य उपयुक्त समयक प्रतीक्षां करे, 
फिर आप मेरे विषयमे सुमे ओर मँ वास्तवे कैसा हू, यद 
देख ओर समश्च स्वगे ॥ १२॥ 
यद्ययं भवतां "छाष्यो चान्धवो देचसप्रभः 
परिक्षानेन कि कर्यं यदयेपोऽनुग्रहो मम ॥ ९२॥ 
भ्यदि देवोपम कान्तिसे युक्त यह व्राठक आपलरेगोका 
स्मृदणीय भार्ई-बन्धु दै तो इसके विषयमे विरे छनव्रीन 
करमेकी क्या आव्रयकता है । यदि आप मीन ही रहत यद 
मेरे ऊपर आपका महान्‌ अनुग्रह्‌ दोगाः ॥ १३ ॥ 
प्वमुक्तस्त॑ते गोपा वसुदेवसुतेन वै। 
द्धमौना दिवः सर्व मेभिरे पिरितवाननाः ॥ १४ ॥ 
वष्ुदेवनन्दन श्रीङ्ष्णङ़े एेखा कदमेपर उन गोपेनि अपना 
मद वंद कर ल्या ओर मौन रौकर वे सव-के-सव्र विभिन्न 
दिदार्थमिं चले गये ॥ १४॥ 


श्रीमहाभारते सिरुभागे 


कृष्णस्तु यौवनं षा निरि चन्द्रमसो वनम्‌ । 
शर्य च निक्ष स्म्यां मनश्चक्रे रति प्रति ॥ १५॥ 
दधर्‌ श्रीकृप्णने पूर्थिमक्री समे चन्द्रमाक्रा यौवन 
८ अधिक कान्तिमान्‌ रूप )› रमणीय वन त्था यरतू-काट्क्री 
सुरप्र रजनीको देखकर मन्म रमण करने सी इच्छा की ॥१५॥ 
स कथीपाद्गसगासु वजरथ्याञ्यु वीर्यवान्‌ । 
चवाणां जतदपौणां शुद्धानि समयोजयत्‌ ॥ १६॥ 
पराक्रमी श्रीकृष्णने सूद्खे गोव्ररफे चूर्णक्रा अद्धराग-सा 
धारण करनेवाली बजी गलि्ेमिं ब्रखोन्मत्त सहो युटका 
आयोजन किया ॥ १६ ॥ 
भोवालंख वद्ध्रान्‌ योधयामास वीयवान्‌ । 
चने स वीरो गाश्धैव जघ्राह श्रादवद्‌ विभुः ॥ ९७॥ 
उने बट्दाटी वीर भगवान्‌. गोविन्दने वर्मे वदे-चदे 
गोपेमिं परष्यर मस्ठ्युद्ध मी करवाया आर वनै धूम्ती हुई 
ग्योकतो माहकी भोति पकडनेकी मौ खील ऊी ॥ १७ ॥ 
युवतीगीपकन्याश्च यानौ संकाल्य कारवित्‌ । 


ऊैयोरकं मनयन्‌ वै सह तभिर्मुमोद्‌ ह ॥१८॥ ` 


* [ हस्वे 


=+ = 


समयकरो प्टचानमेवाले वे श्रीहरि अपनी क्रिंयोरवसाका ` 


आदर कसते हुए युवती गोपकरन्यार्भको रातके समय वनम 
ठे गये यर उन सवके साथ आमोद-प्रमोद कसे खो ॥१८॥ 
तास्तस्य वदनं कान्तं कान्ता गोपल्चियो निदि । 


क 


पिवम्ति नयनाक्चेपेरगा सतं श्दिनं यथा ॥ १९॥ , 
निदाका्टमे वे कान्तिमती गोपाड्नारपै प्रियतम श्रीकृप्णके . 


कमनीय मुखक्रा, जो भूतदटपर उतरे दए द्वितीय चन्दरमाके 
समान प्रतीत हेता था, अपने नेर्वोदारया कक्षपत्तपूर्कर 
पान कसे द्ग ॥ १९॥ 
हस्तिखद्रपीतेन स कौशेये वालतसा। 
वसनो भद्ववसनं कृष्णः कान्ततसे ऽभवत्‌ ॥ २०॥ 
उस समय दरितारकरे पद्की मेति पीठे रेनमी 
पीताम्बरे अपने अर्द्धोकीो आच्छादित करमेवले मादस 
चल्लपारी श्रीङ्प्ण जीर मी अधिक मनोहर प्रतीत ह रहे ये।२० 
स॒ वद्धाह्नदनिव्यदधिच्रया चनमाल्या) 
श्योभमानेो हि गोधिन्दः छोभयामासतद्‌ चजम्‌ ॥२९॥ 
बर्हम मुजवंद व्रोधे ओर मस्तकपर्‌ मुकुर धारण त्रिय 
विचित्र वनमाटसे सुद्नोभित गोविन्द्‌ उस व्रजकी कोमा 
बदारदे ये ॥२१॥ 
नाम दामोदरेत्येचं गोपकन्यास्तदाद्रवन्‌ । 
विचि चरितं घोषे दद्रा तत्‌ तस्य भाखतः ॥ २२॥ 
गोष्ठमै उन तेजघ्वी श्रीक्रप्णके विचित्रे चरित्रोको 
देखक्रर गोपक्रिशोसियों उस समय उन (दामोदरः कहकर 
पुकारती थीं ॥ २२॥ 
तस्तं पयोधयेत्तद्घैरुरोभिः समपीडयन्‌ । 
आआमितादीश्च वद्नर्निसीष्पन्ते वराङ्गनाः ॥ २३॥ 


विष्णुपर्व 


पकर्वि्तोऽष्यायः 


>,७ॐ 


न = 


वे सुन्दरी गोपिर्या उन्द पीन पयोधततँसे युक्त ऊंचे 
वक्षःखट्ते लगाकर गाद आलिद्धन करतीं ओर व्रारार 
अंखिं धुमाकर उरन्दीकी ओर भरद करे उनका सूप निदासती 
रती थ| २३॥ 
ता वार्यमाणाः पतिभिमीतभिश्रीठभिस्तथा । 
ङष्णं सोपाना सत्र सखृगयन्ते रतिप्रियाः ॥ २ ॥ 
पत्तिः पिता-माता तथा मादर्योक्रि मना करनेपर भी वे 
गोपाङ्खनार्द रात्रि समय श्रीकृष्णकरो हदती फिरती र्थी; 
क्योकि श्रीङृप्णवेपयक रति उन्हे बहुत प्रिय थी ॥ २४॥ 
तस्तु पडङ्क्तीरताः सवौ रमयन्ति मनोरमम्‌ । 
गायन्त्यः कृष्णचरितं इन्दो गोपकन्यकाः ॥ २५॥ 
वे सारी गोपकरिगोरियों मण्डलाकार पक्ति वनाक्रर 
खडी हो जातीं ओर उनमेषे प्रत्येक गोपीके दोन ओर 
शीकृप्णं विराजमान होते ये इस प्रकार गोपी-कृष्णकी 
युगल-गोदी बनाकर वे सुन्दरि्यो श्रीकृप्णकरे चरितरका गान 
करती दुद उन्दं आनन्द प्रदान करती थीं | २५॥ 
रष्णलीलादुकारिण्यः रप्णप्रणिहितेश्चणाः। 
रष्णद्य गतिगामिन्यस्तरुण्यस्ता चराद्धनाः ॥ २६॥ 
उनकी अखे श्रीङ्कष्णकी ओर दही स्गी रदती थीं | वे 
तरुण-अवस्थावाटी सुन्दस्य श्रीकप्णक्री टील्का अनुकरण 
करतीं तथा उन्दीके समान चेल्ती थीं ॥ २६ ॥ 
वनेषु तालदस्तात्रैः करूजयन्त्यस्तथापसाः। 
चेस्वैँ चरितं तस्य ङप्णम्य चजयोपितः ॥ २७॥ 
रजकी दूसरी गोपिर्यो हाथोके अग्रभागसे तार दे-देकर 
भ्रीङप्णकी लीलार्ओका गान करती हई वनम विचरती थीं । २७। 
तास्तस्य वृत्य गीतं च विखासरिमतयीक्ितम्‌। 
मुदिताश्चाज॒क्ुर्बन्त्यः क्रीडन्ति चजयोपितः ॥ २८ ॥ 
वे बजाङ्गनर्ण वदी प्रस्तके साथ श्रीकृष्णके त्यः 
गीतः विखस, मुसकरादट तथा चञ्चरु चितवनकी नकल 
करती हुई भोति-भेत्तिकी क्रीड करती रहती थी ॥ २८ ॥ 
भावनिस्पन्दमधुरं गायन्त्यस्ता व्रराद्नाः। 
यजं गताः खुखं वचेरुदीमोदरपरायणाः ॥ २९॥ 
वे गोपसुन्दरि्यो व्रजमण्डल ( वन आदि) म जाकर 
रसे गीत गाती थी जिनसे उनका श्रीकृप्यविपरयकर प्रगाद 
अनुराग स्प्तः प्रकट होने लगता था ओर इसीते उन 
गीतोका माधुर्य बट जाता था! इस प्रकार दामोदर दी 


चिन्तन तप्पर रहकर वे वो सुखमुर्वक विचरती थी ॥२९॥ 
करीपपांसुदिग्धाद्गवस्ताः कृप्णमुवचिरे । 
रमयन्त्यो यथा नायं सम्परमत्तं फरेणवः ॥ १०} 
उनके अद्धमिं अङ्गरागकी जगद गोवर चूर्णं को होते 
ये । वे श्रीकरप्णशनो आनन्द प्रदान करती हदं उर उसी तरह 
वेर रहती थी, ॐ दथिनिवो सश्मत्त गजयाजक्रो | ३०॥ 
तमन्या भावविकचैरते्ैः प्रदक्तिताननाः। 
पिवन्त्यठप्तवनिताः रष्णं ` रप्णस्ुगेक्षणाः ॥ ३१९ ॥ 
कुप्णसार मृगकरे सदश ने्रोवाटी कितनी दी अन्य 
गोपवनिता अनुरागे उक्ल ने्ोद्वास प्यारे दयामयुन्दरकी 
रूपसुधाका पान क्रिवा करती थ, रितु उरपि वक्त नर्दी 
होती थीं } उनके मुलपर सदय दही 6 खेटती रहती थी) ३९॥ 
मुलमस्यन्नसंकराश्यं वरिता गोपशन्यकाः। 
रत्यन्तरगता रात्रौ पिवन्ति रसलखाकसाः ॥ ३२॥ 
वे गोपकन्या श्रीकग्ण-रस्करे स्थि प्यासी रहती ्थी। 
उनके मनम उस रसक़रे आखादनक़े व्यि निरन्तर लालक्ष 
चनी रहती थी; अतः चे राच्रिके समद रासलीरर्म 
सम्मिलित दो उनफे मखारविन्दकी मकरन्द-सुधाका पान 
करती थीं ॥ ३२ ॥ 
हा हेति कुर्वतस्तस्य प्रहस्त वसाद्धनाः। 
जग्रर्निस्खतां वर्णी नाम्ना दमोदेरेरिकाम्‌ ॥ २३ ॥ 
जवे ष्टा रषे] हा व्रजगोपियो {› इत्यादि कहकर 
उन्दे पुकरारतेः उस समयं उनका आहन सुनकर वे गोप- 
स॒न्दर्ियो दषे खिल उठती थीं । दामोदर मुखस निकटी 
हुई उस मधुर वाणकरो वे सदर अदण करती थी ॥ ३३॥ 
तासां ्रथितसीमस्ता रति नीत्व(ऽऽङुटीकूताः। 
चार विखंसिरे केश्चाः कूचाप्रे गोपयोपिताम्‌ ॥ २७॥ 
उनके यथे हुए सोमन्तवलि केश राषदी्य्गे 
पईुचकर अक्रुरता ग्री अवस्थामे लुक जति ओर गोपिगकि 
ऊुचाग्रभागपर व्रिखर जाते ये उस समयरभीवे मनोहर 
दी ल्गते ये ॥ ३५ ॥ 
प्वं स छृप्णो गोपीनां चक्रवादैरटङूतः । 
शारदीषु सचन्द्रा निशा मुमुदे खली ॥ ३५ ॥ 
इस प्रकार शरत्राङ्की रचोदनी र्ति मोपीमण्डल्ते 
अकृत हुए श्रीरृप्ण सुखवृवक रासक्रीडा करफे आनन्द- 
मग्नदहोजतेये।॥ ३५॥ 


इति श्रीमहाभारते लिकभागे हरिं विष्णुपर्वणि रासक्रीडायां विदोऽप्यायः ॥ २० ॥ 
इस प्रकार श्रीमहाभारते खिरुभाग दसिविधके अन्तरगत विप्णुपथमे रासक्रौडातरिषय वीरे अध्याय पु हम ॥ २०1 
र नि 


एकविदोऽध्यायः 
अरिासुरका सघ 


, वैशमायन उवाच 
भ्रदोषाद कदाचिद्‌ ठ रुष्णे रतिपसरायणे । 


घ्रासयन्‌ समदो गोटमरिष्टः प्रत्यद्द्यत ॥ १॥ 


(~ ॐ 
वशम्पायनजी कते है--जनमेजय ! एदि 


२७८ 


श्रीमहाभारते लिखभागे 


[ हरिवंशे 


आधा प्रदोष ( अर्यात्‌ उद्‌ घंट रात ) वीतनेपर जव्र भगवान्‌ 
श्रीङृप्ण रासक्रीडर्मिं खंट्न ये, उसी समय सरे व्रजको त्रास 
देता हुमा मतवाला अरि्टुर वर्ह दिखायी दिवा ॥ १॥ 
निर्वाणद्भास्मेधाभस्तीक्ष्णण्धद्धो ऽकंरोत्चनः । 
धुरतीक्ष्णाद्रचरणः कालः काठ वापरः ॥ २ ॥ 
वह धुत्ने हुए अङ्गार ( कोयले ) तया मेधो समान 
काल्य थाः उरक सीग तीखे ये ओर भिं सूर्यकरे समान 
तेजखिनी दिखायी देती थीं । उसके चरणेकि अग्रमाग अथवा 
खुर चरके समान तेज ये । वह कालय दैत्य दूसरे कालके समान 
जान पडता या | २॥ 
छेलिदानः सनिष्पेपं जिहयोषठौ पुनः पुनः। 
गर्विताविद्धखाङगूलः कठिनस्कन्धवन्धनः ॥ २ ॥ 
वह दति ओर्ठोको चेताता ओर जिहाते उन्हं वारंवार 
चाटता था 1 उसने वल्के धमंडर्मे आक्रपूछ उठा स्वी थी 
तथा उसके कधेक्रा कुव्चड़ हूत ही कठोर था ॥ ३ ॥ 
ककुदोदञ्ननिमौणः प्रमाणाद्‌ इरतिक्रमः। 
चरृन्मूोपलिक्ताङ्घो गवासुद्धेजनो शरदाम्‌ ॥ ४ ॥ 
वह्‌ अपने केकरे कुव्वड़से चोट करके वने-वनाये महल 
अआदिको धराशायी कर देता या। उसकी ऊंचाई इतनी यी कि 
उसे लोघकर जाना किसके लि मी बहुत कठिन था | उसके 
पिख्ठे अङ्ग गोवर ओर मूतसे ल्पि होरे ये तथा वह 
गो्ओंको अत्यन्त उद्वेगे गरू देता था ॥ ४॥ 
महाकटि; स्थुलमुखे €्ढजायुमैहोदरः । 
विप्राणाचरिगितगतिछम्बता कण्डचर्मणा ॥ ५ ॥ 
उसक्रा कटिभाग विश्नार था गौर मख स्थूल था; दोनों 
रटने खुदृद्‌ थे ओर पेट बहुत वडा था ! उसके गलका केवल 
लटक रहा था ओर बद सग नीचे विये उदक्ता-कूदता अगे 
वद्‌रहाथा॥५॥ 
गवारोहेषु चपटस्तरघावाङ़्िताननः। 
युद्धसजविपाणाभ्रो द्विपद्चुषभसूद्नः ॥ दे ॥ 
वह गौफि पिछले भागपर चद्नेके व्यि चखल दो 
रदा था । वृक्ष॑सि य्दर ठेनेके कारण उसके मस्तकर्मे करई 
जगह धटे पड़ गये ये | वह अपने सीमोकरे अग्रभागको सदा 
जृक्षनेके व्यि उग्रत रखता था तथा विपी प्रैरछोको मार 
डाल्तां था॥६॥ । 
अरिष्टो नाम हि गवामसि दारुणाङकूतिः। 
दैत्यो इूषभरूपेण गोष्ठान्‌ विपरिधावति ॥ ७ ॥ 
मयानक्र आकारवाला वद अख्घिसुर गौ्करि चि अरि्- 
कारक ग्रह वन गया था । वह दैत्य व्रैह्के स्पर्मे आकर समी 
गोठ दौड़ ख्गाया करता था | ७] `. 
पातयानो गवां गभौन्‌ रतो गच्छत्यना्त॑चम्‌ । 
भजमानश्च चपटो गृ्ठीः सम्परचचार ह ॥ ८ ॥ 
वह्‌ गौओकि गर्भं गिरा देता<या ! मदमत्त होकर विना 


~~~ ~~~ --- ~~~ ~ 


क्रतु ही उनसे समागम करता तथा वद चञ्चल दैत्य तुरत- 
की न्यायी हुई गौर्ओोका भी उपभोग करलेकरे चि उन्करे पीछे 
पड़ा रहता था ॥ ८ ॥ ॥ | 
शङ्गपहरणो रौद्रः प्रहरमू गोचु इुमदः। 
गेष्टेणु न रति ठेभे धिना युद्धेन गोद्रषं; ॥ ९ ॥ 
सग ही उरुके आयुध थे । वह वड़ा भयंकर 
दुर्मद प्रतीत होता था। गौर्थोपर प्रहारं करना उसका नित्यका 
काम था] वह्‌ वृषरमल्यधारी दैत्य ग्मि पर्हुचकर युद्ध क्रि 
विनां संतुष्ट न्दी होता था| ९ |! 
कस्यचित्‌ त्वथ काटस्यं स च्रषः केद्ावाय्रतः। 
आजगाम वलोदप्रो वैवस्वतवदशे स्थितः ॥ १०॥ . 
किसी समथ यमराजकरे वामे पदधा ' हुया वह उत्कटं = 
बल्दाटी वरृषमरूपधारी अयुर भगवान्‌ श्रीकृष्णे सामनेर 
आया ॥ १० ॥ ~ 
ख त्र गास्तु प्रसभं बाधमानो मदोत्कटः । 
चकार निचैपं गोष्ठं निर्व॑त्सशियुपुद्धवम्‌ ॥ १९ ॥ ` 
मदमत्त अरिुर वरहो अति दी वल्यूर्वक गौर्योको 
सताने छ्गा ¡ उसने उस गोष्ठको वैक, यश्ठद्धो तथा वाल्केसि 
सूना कर दिया ॥ ११ ॥ 
पतस्मिन्नेव काठे तु गावः रृष्णसमीपगाः। 
त्रासयामास दुश्रात्मा वैवखतवदे सितः ॥ १२॥ 
इसी समय काठके वदाम पड़ा हूभा वह दुष्टात्मा दैत्य 
श्रीकष्णकरे पास खडी हुई गो्ओंको चास देने खगा ॥ १२॥ 
सेन्द्रारानियिविाम्भोदो नदमानो महासुरः । 
तालरब्देन तं रृष्णः सिहनारैश्च मोहयन्‌ ॥ १३॥ 
उस. समय गर्जना करता हुआ वह महान्‌ असुर इन्द्रके 
यञ्जकी गढ़गड़ाहरफे साथ आकारा्मे छये हुए मेध्रके समान 
जान पडता था 1 उखे मोहम डालनेके ल्ि श्रीकृष्णने ताक 
ठका ओर सिंहनाद किया ॥ १३ ॥ 
अभ्यघावत भमोधिन्दो दैत्यं इृषभरूपिणम्‌ । 
स छृष्णं गोबयो दष्टा दणलाङ्गूलखोचनः ॥ १४॥ 
` र वे मगवान्‌ गोविन्द उस वृपमरूपधारी दैभ्यकी 
ओर दौड़े । शरीकृप्णको देखते हौ उघव्रैलने दर्षम भरकर 
अपनी पूछ उठायी ओर उसके नेत्र मी खिल उढे ॥ ९४॥ 
रोषितस्त्राखराब्देन युद्धाकाष्रुमी ननद ह । 
तमापतन्तं दुर्॑त्तं दृष्टा इषभरूपिणम्‌। 
तस्मात्‌ स्थानान्न व्यचरत्‌ छृष्णो गिरिरिवाचलः॥ १५॥ ` 
उनके ताल ्ठोकनेके गब्दसे वह रोषमे भरा हआ थाः 
अतः युद्धकी इच्छसे गर्जना करने ठ्गा | वल्क रूपं धारण 
करफे अपनी ओर अपि हुए उख दुराचारी दैत्यकौ देखकर 
मी श्रीकृप्ण उस स्थानसने तनिक्र भी इधर-उधर नहीं हूणः 


प्तक समान अविचलमावले खड़े रह गये ॥ १५ ॥- 


विष्णवं | 


द्ावि्योऽन्यायः 


स कुक्षौ घुषभो दष प्रणिधाय धुताननः। 
कृष्णस्य निघधनकाष्कौ तूणेमभ्युत्पपात इ ॥ १६॥ 
उस वृपभने श्रीकृष्णे पेयम दृष्टि जमाकर उधरदही 
` मस्तक भिडाया ओर उनके वधकी इच्छा रखकर तुरत दी 
उदख्ल | १६॥ 
तमापतन्तं वेगेन प्रतिजग्राह दुर्धरम्‌! 
कृष्णः कृष्णाञ्जननिभो चप प्रति वृपोपमः ॥ १७॥ 
काठे अन्ञनके समान द्याम-शरीरवे श्रीङृप्ण॒ उस 
्रैलका सामना कसनेमे लि विपश्ची सीड़करे समान प्रतीत दते 
ये । उन्दने वेगते अपरनौ ओर अति हए उस दुर्धर दैत्यको 
पकड़ लिया | १७ ॥ 
स संसकस्तु ष्णो वै वृषेणेव मदाव्रृपः। 
मुमोच वक््मजं फेनं नस्तश्चाथ सशब्दवत्‌ ॥ १८॥ 
फिर तो श्रीकृष्ण उसक्रे साथ इस तरह उल गये, जैसे 
एक सोदक साथ दूसरा महारसोड मिड़'गया हो । अर्टसुर 
हफता हुआ अपनी नाक ओर मुखस फेन छोडने ठ्या ॥ 
तावन्योन्यावरुद्धद्गौ युद्धे छृष्णश्चपादुभौ । 
रेजतुमेधसमये संखक्ताविव . तोयदौ ॥ १९॥ 
श्रीकृष्ण ओर अरिशसुर दोननि उस युम एक वूसरेके 
गरीरको अवसद कर लिया था | उस समय वे दोनो वर्प 
कारम परसर सटे हुए दो मेघोकि समान योमा पारदे ये ॥ 
तस्य दुप॑वटं हत्वा त्वा श्यङ्कान्तरे पदम्‌ 1 
आपीडयदरि्टस्य कण्ठं क्िछिन्नमिवास्वरम्‌ ॥ २० ॥ 
इस प्रकार उसके बलो क्षीण करके घमंड चूर कर 
देनेके बाद श्रीङृप्णने उसके दोनो सीरगोकरे बीचमै एक पैर 
रखा ओर जैसे भीगे हुए कपड़ेको निचोड़ा जाता है उसी 


ननन 


प्रकार अरिसुरके गलेको दवाकर मरोड दिया ॥ २० ॥ 
शद्ध चास्य पुनः सव्यसुत्पाठ्य यमदृण्डवत्‌ । 
तेनैव प्राहरद्‌ वक्त्रे स ममार भशं हतः ॥ २९ ॥ 
तव्पश्वात्‌ उसे वाये सींगको जो यमदण्डके समान जान 
पडता था, उखाड़ च्या ओर उसीके द्वारा उसके मुखपर 
प्रहार किया । उखकी गहरी चोट खाकर अरिटायुरमर गया ॥ 
स भिन्नश्श्ड्धो भस्मास्यो भच्चस्कन्धश्च दानवः 1 
पपात शथिरोद्रारी साम्बुधार इवाम्बुदः ॥ २२॥ 
उसक्रा सींग उखड़ गयाः मुख कुचल दिया गया ओर 
गर्दन द्ूट गवी, उस दशमे वद दानव जलकी धाय वरसाने- 
वाले मेघ समान अपने मुखसे रक्तवमन करता हुभा गिरपड़ा॥ 
गोविन्देन हतं दष्टा दत्तं चषभदानवम्‌ । 
साधु साध्विति भूतानि तत्कमस्याभि तुष्टुवुः ॥ २३ ॥ 
मदे उन्मत्त रहनेवाले उस वृषभरूपी दानवको भगवान्‌ 
गोविन्दके हाथसे मारा गया देख सव प्राणी साधु-साधु कहकर 
उनके उस कर्मकी भूरिभूरि प्ररत करने खगे ॥ २३॥ 
स चोपेन््रो वृषं त्य! कान्तचम्द्रे निशामुखे । 
अरधिन्दाभनयनः पुनरेव ररास दह ॥२९॥ 
उस प्रदोपकराटमे जव क्रि चन्द्रमाकी कमनीय कान्ति 
वदी हद थीः कएलनयन भगवान्‌ उपेन्द्र बृपभासुरको मार- 
कर पुनः रासक्रीडामे संलग्न दो गये ॥ २४॥ 
तेऽपि गोदृत्तयः सर्वे कृष्णं कमललोचनम्‌ । 
उपासांचक्रिरे दष्टाः सवं राक्रमिवामसाः ॥ २५॥ 
गौ ही जिनकी आजीविका हैः वे समस्त गोपभी 
दरपम भरकर कमलनयन श्रीकृप्णकी उसी तरह उपासना कसे 
रगे, जेते सम्पू देवता इन्दरकी आराधना करते द ॥ २५॥ 


इति श्रीमहाभारते खिरभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि धृषभासुरवधे एकविक्नोऽध्यायः ॥ २१ ॥ 


इस प्रकार श्रमराभाख्के लिरुभाग हखिंशे अन्तम विषणुप्वमे वृषभासुरका वधविषमक इरः अघ्याय पुरा हुमा ॥ २९ ॥ 
[णी ~ -:" 


दराविदोऽष्यायः 
कंसकी आशङ्का, उसका रात्रिके समय यदुवंशियोको बुलाकर भरी सभाम श्रीकृष्ण ओर 
विष्णुके प्रमावको वताना, वसुदेवपर कठोर अक्षे करना तथा अक्रूरको 
श्रीकृष्ण आदिको बुला लानेके लिये घनम जानेकी आज्ञा देना 


वे्चम्पायन उवाच 

ङृष्णं बजगतं श्रुत्वा वधेमानमिवानलम्‌ । 
उद्धेगमगमत्‌ कंसः शङ्कुमानस्ततो भयम्‌ ॥ १९ ॥ 

{4 श 

वेशम्पायनजी कहते ह--जनमेजय ! भगवान्‌ 
श्रीङप्ण बरजमे जाकर अग्निकी भोति वदतेः उत्तरोत्तर 
प्रज्वलित होते जा रहे है यह सुनकर कंसको वडा उद्वेग 
हा 1 उसके मनम श्रीकृप्णसे भय प्राप्त टोनेकी र्का टद 
हने ख्गी॥१॥ 


पूतनायां हतायां च कालिये च पराजिते । 
धेुके भ्रखयं नीते प्रलम्वे च निपातिते ॥ २॥ 
धृते गोवर्घ॑ने रटे चिफटे हाक्रदशासने । 
गोपु ताता च तथा स्पृदणीयेन कर्मणा ॥ २ ॥ 
ककुञ्चिनि हतेऽरिष्टे गोपेषु मुदितेषु च । 
द्यमाने विनाशे च संनिरृष्टे महाभये ॥ ४ ॥ 
कर्णे वचृष्छयोश्चैव राकरस्य तथैव च ] 
अचिन्त्यं कमे तच्छत्वा च्धंमानेषुः शयु ॥ ५ ४ 


२८० 


प्रा्तारिएटमिवात्मानं मेने स मधुरेश्वरः । 
विसके््रियभूतात्मा गताछुप्रतिमो वभौ ॥ ६ ॥ 
पूतना मारी गयीः कालिय नाग परान्ते हुआ, धेनुकासुर 
कालके गाख्मै मेज दिया गया प्रठम्बासुरको मार गिराया 
गया, गोवर्धन पदाडकरो श्रीकरृष्णने हाथपर उठा चिरा, इन्द्र 
का शासन निप्फ दो गया, वैते सदृकणीय कर्मक द्वासा सम्पूर्ण 
ग्ओकी रक्षा कर टी गगरी, ऊँचे ककरुदधरलि अरि्टसुरको 
मार डाला गयाः गोपगण्र आनन्दम मग्न रहते द ओर अप्रना 
( कंसा >) महाभयंकर विनादकाल संनिकट दिखायी 
देने ठ्गा दैः यमलार्जुन दृरकषेक्रा ओली लींचते समय रूट 
जना, दकया भद्ध दो जाना आदि अमम्भव कार्थं सम्भव 
टो गयेः रात्र निरन्तर बद्‌ रे द ओर उनके द्वारा अचिन्त्य 
कर्म सम्पादित होने लगा दै, यह सव्र सुनफ़र मथुरापति कंखने 
यह मानयियाक्रि अव मेरे ऊपर अरि आयादी दता 
द । इसत उसकी इन्द्र्यो; शरीर ओर मन-वुद्धि सरके सय 
अचेत दो गये तथा वह प्राणदीन-सा प्रतीत दने ट्गा॥ 
ततो क्षातीन्‌ समानाय्य पितरं चोध्रश्लासनः। 
निशि स्िमितसूकायां मथुरायां जनाधिपः ॥ ७ ॥ 
तदनन्तर भयंकर शासनवले राजा कंसने रात्रिक नीरव 
एवं निस्तन्ध-कामे मथुरापुरीके भीतर रहमेवठे समस्त 
चन्धु-बान्धरवो तथा अपने पिता उग्रतेनको मी बुल्मया ॥ ४ ॥ 
वसुदेवं च देवाभं कड चाहिय यदवम्‌ | 
सत्यकं दारुकं चेव क्द्धावरजमेव च॥ ८ ॥ 
भोजं बैतरणं चैव विकटं च मदावलम्‌। 
भवदा च धर्मक विप्रं च प्ृथुधियम्‌ ॥ ९ ॥ 
भ्रु दानपति चेव रतवमीणमेव च। 
भूरितेजसमध्योभ्यं भूरिश्रवसमेव च ॥ १०॥ 
पतान्‌ स यादवाम्‌ सवौनाभाष्य श्णुतेति च । 
उग्रसेनखुतो राजा रोवा मथुरेध्वरः ॥ १९१॥ 
देवताके समान तेजघ्ठी वसुदेव, यदुक्ुखनन्दन कद्कः 
सत्यक, दासकः क्के छोटे भाई मोजः वैतरण, महावरटी 
विक्र, धर्मच भयशद्धः प्रथुल राजलक्षमीसे सम्पन्न विप्रः 
दानपति बभ्रु (अकरूरोःकृतवर्माअक्रोम्य भूरितेजा शौर भूरिथिवा- 
इन सव्र यादरवोक्रो वुखकर सव्रको सम्बोधित करे मथुराके 
स्वामी उग्रसेनक्रुमार राजा कंसने कहा--च्वन्धुओ ¡ अआप- 
लोग सुन ॥ ८-११ ॥ 
भवन्तः सर्वकार्यक्षा वेदपु परिनिष्ठिताः) 
न्यायदृच्चान्तङुरलास्िवगंस्य प्रवर्तकाः ॥ १२॥ 
कर्तव्यानां च कतौरो रोक्रस्य विवुधोपमाः। 
तस्थिवांसो महाचृत्ते निष्कम्पा इव पर्वताः ॥ १३॥ 
'अआप समस्त कर्तन्य-करममेकि ल्ञाता, वेदोके परिनिष्ठित 
विद्वान्‌ न्यायोचित वर्तावमे कुगल, धर्म, अर्थं ओर कामके 
सप्तक, करतव्य-पाखकः जगत्‌ स्मि दैवता, समान 


शीमदाभार्ते खिखभागे 


[ हरिवंशे 


माननीय; महान्‌ आचारःविचारम दृदृतापूर्वक छिर रहनेवारे 
ओर पर्वतके समान अविचल द ॥ १२-१३ ॥ 
अदम्भवृत्तयः सधे स्वै गुखकुटोषिताः। 
राजमन््रधणः सरव स्वे धलुषि पारगाः ॥ १४॥ 
८अआप सव्र लोग पाखण्डपू्णं दृ्तिते वृर रदते ह । समरन 
गुखकुखये रहकर रिता पय दै । अप स्वर लोग गजाकी गुप 
मन््रणक्रो घुरक्नित स्खनेवलि तथा धनुर्वेदमे पर्त ६ ॥ 
यदःप्रदीपा टोकानां वेदा्थीनां विव्तवः। 
आश्रमाणां निसगेक्षा वणीनां क्रमपारगाः ॥ १५॥ 
धआपकरे यदारूपी प्रदीप सम्पुणं जगतूर्मे अपना प्रादय 
फेखा रटे ह । आपटोग वेदक तार्यकरा प्रतिपादन करम 
सर्य ह| आश्रमेकि जो खाभाविक कर्म ६, उन्दँं आप जानते 
ह| चरे वेके जो क्रमिक धर्म र उनके धापलोग पारड़्त 
विद्धान्‌ रद॥ १५५ 
्रवक्तारः सुनियतं नेताये नयदश्िमाम्‌ । 
मेत्तारः परराष्रणां चतारः हारणार्थिनाम्‌ ॥ १६॥ 
'आपल्येग उत्तम विधियेकरि वक्ताः नीतिदर्णी पुष्पे 
मी नेता, शरुरष््क गुप्त रदस्येक्रा भेदन करनेवाले तथा 
दारणािर्योफे संर्तक द ॥ १६ ॥ 
पवमक्षतचास्तिः धीमद्धिरुदितोदितैः। 
चीरप्युगरृ्दीता स्याद्‌ भवद्धिः कि पुनर्मही ॥ १७ ॥ 
ध्यापके सदाचासमे कभी अचि नहीं आने पायी है ! 
आपलोग श्रीसम्पन्न ईह तथा शरे पुर्पोकी चर्चा होते समय 
आपरोगेक्रि नाम वासार च्ि जति है| आपटोम चर्हतो 
खर्गरोकपर भी अनुग्रह कर सकते है, फिर इस भूतल्करी तो 
ब्रात ही स्या है १?॥ १७॥ 
चऋरपीण।मिव वो वृत्तं प्रभवो मरुतामिव । 
रुद्राणामिव वः क्रोधो दीतिरद्विरसामिष ॥१८॥ 
४आपरका आचार ऋपियोकेः प्रमाव मद्द्गणेकरि क्रोध 
स्द्रेकि ओर तेज या दीति अग्नियेकरि खमान है ॥ १८ ॥ 
व्यावर्तमानं सुमहद्‌ भवद्भिः ख्यातकीरतिभिः। 
धृतं यदुकुटं बीरैभरतलं पर्वतैरिव ॥ १९॥ 
ध्यह महान्‌ यदुकुख जव अपनी मर्यादासे भ्रष्ट हो रदा 
थाः उस समय विख्यात कीर्िवाठे आप-नैषे वीरनि ही इसे 
मर्यादरमे स्ापित क्रिया, ठीक उसी तरह सैपे पर्व॑तेनि इस 
भूतल टृदतपपूर्वक धारण कर रखा है ॥ १९॥ 
पवं भवत्छु युक्तेषु मम चित्ताुवतियु। 
वर्ध॑मानो ममन्थ भवद्धिः किसुपेक्षितः ॥ २० ॥ 
 भआपरोग से सुयोग्य ह ओर सदा मेरे अनुकूल चरते 
ह" परंतु इस समय आपलोगोकरे होते टुए भी मेरे अनर्थ 
( संकट ) की च्रदधि हये रही दै, पता नहीं आपने उसकी उपेक्षा 
कैसेकरदीदै॥२०॥ 
पपर्ष्ण इति ख्यातो नन्दगोपसतो घजे। 
वधमान द्वम्मिधिमूं न! परिरेन्तति ॥ २१ ॥ 


विष्णुपयं 1 


दार्विशोऽध्यायः 


२८१ 


(त्रम कृष्ण नामसे विख्यात जो यह्‌ नन्द गोपका वेट 
हैः वह्‌ ( मर्यादाको सेरकर ) बरट्नेवले समुद्रकी भोति 
वद्कर हमारी जड़ कार रहा है ॥ २१ ॥ 
अनमात्यस्य हशुल्यस्य चारान्धस्य ममैव तु । - 
कारणान्नन्द्गोपस्य स सुतो ोपितो गे ॥ २२॥ 

पमेरे पास कर्द सुयोग्य मन्त्री नदीं है यै दद्य एं 
विचारते चयूल्य हू तथा गुप्तचररूपी नेत्रसे दीन दौनेके कारण 
अधा हौ गया हूं | मेरे इसी दोषके कारण नन्द्‌-गोपकां वद्‌ 
पुत्र अपने धसे सुरक्षित रह सकरा है ॥ २२॥ 
उपेक्षित इव व्याधिः पूर्य॑माण इवाम्बुदः । 
नद्स्मेध इवोप्णन्ते स दुखत्मा विवधेते ॥ २६३॥ 

“वह दुरात्मा उपेक्षित रोग तथा वर्पां दुमे निरन्तर 
जल्ते भरनेवाले गरजते हए मेधकी मेति वदृता जा रहादै॥ 


त्य नाहं गति जने न योगं न पराक्रमम्‌ । 
नन्दगोपस्य भवने जातस्याद्भूतक्र्मणः ॥ २४ ॥ 
“नन्दे घरमे उत्पन्न हुए. उख अदूभुतकर्मा बालकका 
आश्रय क्या है १ यह मे नहीं जानता । उसे वशम करनेका 
उपाय क्या है, इसका भी सुनने पता नदीं तथा उस्म कितना 
पराक्रम दैः यह भी अच्छी तरह कात नदीं हो सजना 1 २४॥ 
करि तद्धूतं समुद्धृतं देवापत्यं न विद्ये 1 
यतिदेवैरमातुष्यैः कर्म॑भिः सोऽघयुमीयते ॥ २५॥ 
"पता नदीं कोन-सा भूत उक स्यम उलन्न हभ है । 
वह कंसो देवताकी संतान दै, यदह बात भी मेरी समक्षम नहीं 
आती । उसके जो कर्म हः वे देवताओं ओर मनुप्योँके लि 
असाध्य ह | उन करमो दी यह अनुमान दोता है कि वह 
देवताओंसे भी अथिक शक्तिशाली है । २५ ॥ 
पूतना शङ्नी वाल्ये श्िद्यनोत्तानश्चायिना । 
स्तनयनेमप्छुना पीता प्रणैः सह दुरासदा ॥ २६ ॥ 
पूतना नामवाखो पकिणी एक दुर्जय राभसी यी 1 वह 
जघ्र इसे वाल्यावस्थामि दूध पिलाने गयी, उस समय यह 
खाय्पर उत्तान सोनेवाला शिष्चमाच्र था, परंतु उसका स्नन- 
पान करनेकी इच्छसि जव इसने मह ठगाया, तव उसके 
प्राणोक्रे साथ यह उसे ही पी गया ॥ २६॥ 
यमुनाया हदे नागः कालियो दमिवस्तथा । 
रखातल्चरो नीतः क्षणेनादशनं हदाद्‌ ॥ २७॥ 
भ्यमुनाके कुण्डम जो काञिय नाग रहता था, उसका 
भी इसने दमन कर्‌ दिया ओर क्षणभसमै उस कुण्डसे उखको 
अद्य करके रसातल्चारी वना दिया ॥ २७॥ 
नन्द्गोपसुतो योगं कृत्वा स पुनरुत्थितः! 
धेचुकस्ताखरिखयात्‌ पातितो जीवितं विना ॥ २८॥ 
(उस नारके हट जानेका उचित उपाय करफे नन्द्-गोप- 
का यह्‌ पुत्रं पुनः जले व्ाहर निकर आया । घेनुकासुरको 
ताड़के शिखरसे गिराकर प्राणञ्च्यं कर दिया ॥ २८ ॥ 


प्रलम्बं यं सधे देवा न दोकुरतिवतिंतुम्‌ । 
वलेन सुष्िनेकेन स॒ हतः भाकतो यथा ॥ २९॥ 
युद्धम देवता मी जिस प्रखम्बासुरका सामना कश्ने या 
उसे हरा देनेकी शक्ति नदीं रखते थे, उसे इक्त ऋलक्रने केवर 
एक सुक्कसे मारकर साधारणं मनुप्यकी भोति कारके गार्मे 
भेज दिया ॥ २९॥ 
वासवस्योत्सवं भङ्क्त्वा वधं वासवयेपजम्‌ । 
निर्जित्य गोग्रह्ाथीय धृतो गोवधेनो गिरिः ॥ ३० ॥ 
'इनद्रके उत्वको भङ्ग करके उनके रोषते हनिवाली 
वर्षापर भी काबू पा लिया ओर गौ्थोके स्यि सुरक्षित घर 
प्रस्तुत करनेक्रे ल्ि गोवध॑न पर्व॑तको हाथपर उठा लिया ॥ 
हतस्त्वरि्रो यख्वान्‌ निशयङ्गश्य कृतो बजे । 
अवारो वास्यमास्थाय रमते रिद्युटीखया ॥ ३९ ॥ 
ध्रजमे बख्वान्‌ अरिषसुरो मार डाल ओर उसक्रा 
सींग उखाड़ ख्या । यह वास्तवे याक नहीं है, केवल 
बाल्यावस्ाक्ा आश्रय लेकर बा्को-जेसा सेर कर रहा 
है॥३९॥ , भवं . 
प्रवन्धः कमेणमेवं तस्य गोच्जवासिनः । 
संनिरृष्टं भयं चैव केनो मम च धुवम्‌ ॥ ३२॥ 
'गौ्भोकि नजमे निवासं करनेवाले इस बाटकके कर्मीकी 
जो इस प्रकार परम्परा च रही है, उसे देखते हुए भुस 
एता जान पड़ता दहै कि सुद्यपर ओर केशीपर भी निश्वय 
दी भय अनिवाल्र दै ओर वह भय दूर्‌ नदीं अत्यन्त 
निकट दै ॥ ३२॥ 
भूतपूर्वश्च मे स॒त्यः सततं पूवदैहिकः। 
युद्धाकाष्की च स यथा तिष्ठतीह ममाग्रतः ॥ ३३ ॥ 
'ू्वजन्ममे इस शरीरके ल्य ज भूतपूव मृत्यु था; 
वही इस समय मी युद्धकी अभिखप्रा रखकर सदा मेरे 
सामने खडा रहता दे | ३२॥ 
क च गोपत्वमद्ुमं मानुभ्यं श्युदुरवखम्‌ । 
कछ च देवप्रभविण कऋीडितव्यं चज्ञे मम ॥३४॥ 
“करदा तो अद्म गोपत्व ओर सौतकी दुव॑रुता धारण 
करनेवाला मनिव-शरीर तथा कष्टा उसका मेरे चजमे रहकर 
देवस्य प्रमावसे अद्भुत क्रीडा करना ॥ ३४॥ 
अहो नीचेन वपुपाच्छाद्यित्वाऽऽत्मनो वपुः । 
कोऽप्येष रमते देवः दमश्ानस्थ इवानलः ॥ ३५ ॥ 
"अहो ! कितने आश्वयैकी वात है किं यहं कोई देवता 
अपने सखरूपको नीच गोपवेशमे चछिपाकर श्मशानमे खित 
इई अग्निके समान यदह रम रहा है ॥ ३५ ॥ 
श्रयते दि पुरा विष्णुः खुखणां कारणान्तरे 
वामनेव त रूपेण जदार परथिवीभिमाम्‌ ॥ ३६ ॥ 
सुना जाता है कि पूर्वकर्म विष्णुने देवता्ओंका 
कायं सिद्ध करनेके स्मि वामनरूप धारण करके राजा बलिक 
हाथसे इस प्रथ्वीको छीन च्या था | २३६ ॥ 


२८२ 


श्रीमहाभारते खिकभागे 


[ व 


कृत्वा केसरिणो रूपं धिष्णुना प्रभविष्णुना । 
हते हिरण्यकरशिपुदौनवानां पितामहः ॥ ३७॥ 
“उन्दी प्रभावशाटी विप्णुने सिंहका-सा रूप बनाकर 
दानवेक्रि पितानह दिरण्यक्रयिपुका वध कर डाला था ॥ २३७ ॥ 
अचिन्त्यरूपमास्थाय वेतशेलस्य मूर्धनि 1 
भवेन च्याविता दैत्याः पुरा तत्त्रिपुरं श्चता ॥ २८ ॥ 
सी तरह पूर्वकार्खम रद्र (रूपधारी विष्णु ) ने अचिन्त्य 
स्पका आश्रय केकर श्वेताचच्े दिखरपर सित दहो 
त्रिपुरा नाच करके दैत्योको वदेसि नीचे गिर दिया 
था ३८॥ 
चाछितो शुख्पुभेण भागवोऽद्गिरसेन वै । 
प्रविश्य दार्दरीः मायामनाव्रृ्रि चकार ह ॥ ३९॥ 
'ृहस्पतिके पुत्र कने दार्दुरी मायामे प्रवि होकर 
शुक्राचार्यको अपनी प्रति्ासे विचलति कर दिया था। 
उन्दनि दी दैत्योके जगते “अनाद्ष्टिः उत्पन्न कर दी थी । 
( जिते दैर््योकी बड़ी भारी हानि हुई | ये कचमी 
विष्णुकी ही विमूति थे) ॥ ३९॥ 
अनन्तः शाश्वतो देवः सदखशिरस्रो ऽव्ययः । 
वाराहं रूपमास्थाय प्रोज्ञदायर्णवान्महीम्‌ ॥ ४० ॥ 
ध्वे विष्णु अनन्त, सनातन देव, सदरखो मस्तकं विभूप्ित 
ओर अविनारौ ह । उन्दोनि वागहदरूप धारण करफ़ समुद्रसे 
दस पृथ्वीका उद्धार क्रिया॥ ४०॥ 
अम्रृते निर्मिते पूं विष्णुः ख्रीरूपमास्थितः। 
खराणामघुराणां च युद्धं चक्रे खुदाखुणम्‌ ॥ ४१ ॥ 
पूर्वकर्म जव ~ अग्रत प्रकट हुभा थाः तव विप्णुने 
ही मोहिनी खीका रूप धारण करके देवताओं ओर असुरो 
ऊत्यन्त भयंकर युद्ध करवाय) था ॥ ४१ ॥ 
अमृतार्थे पुरा चापि देवदैत्थसमागमे । 
दधार मन्द्रं विष्णुद्रपार इति श्युतिः ॥ ४२॥ 
अमृत निालनेकरे स्थि सम्मिखितरूपते प्रयत्न करनैके 
उद्यसे जत्र देवता ओर दैत्य परस्पर मिले येः उख समय 
श्रीविप्णुने द्यी कच्छपरूप धारण करफे समुद्रकरे भीतर 


# चैते मेटक वास्वार मरकर उत्यन्न होते दै, उक प्रकार 
कच भी दीर्त्ोद्वारा वारंवार मरि जानेपर जीवित हए । यही 
उनका दारहुरी मायामे प्रवेश हे । पकं वार दानर्वोने कचको मारकर 
युक्तिसि शयक्राचार्यके पेट पर्हैचा द्विया । उनकी जीवन-रक्षाके 
स्यि विव्य दोक श्ुकराचारयेको प्ंजीवनी विया किसीको भी 
नदीं सिखार्जगा" अपनी यह परनिश्ना दछोडनी पडी ओर उन्हनि कचको 
विद्या क्िखा दी1 उसके प्रमावते कच युर्जीका पेट फाडकर्‌ 
निक भये । फिर ॒उन्दोनि गुरुजीको भी जीवित कर्‌ दिया । 
दै्योनि ओ ब्रह्महत्या की; उसी पापसे उनके राज्यम वरषा बंद 
ष्टो गयी । , 


मन्दराचरुको अपनी पीठटपर धारण क्रिवा था-एे्ा सुना 

जाता दै ॥ ४२॥ 

वयुकबीमनमास्याय नन्द्नीयं पुरा वरेः। 

धिभिः कमेस्तु जीटोका्चदार चिदिवालयम्‌ ॥ ४३॥ 
{उन्दने द्यी पठे अभिनन्दनीय वामनल्प धारण 

करके तीन पर्गोद्वारा चिखोकीको नापकर वलिक दाथसे 

खर्गटोककरा.राज्य ठे लिया था ४२॥ 

चतुधौ तेजसो भागं कृत्वा दाद्यस्थे गृहे । 

स पव रामसंश्षो वै रावणं व्यनरत्‌ तद्रा ॥ ४४॥ 
श्वे ही राजा दशरथकरे घरमे अपने तेजकरो चार भागम 

विभक्त करके अवतीर्णं हुए यीर (रामः नामसे प्रषिद्ध दए 

जिन्दोनि उस समगर रावणक्रा वध किया था ४४॥ 

धवमेष निरृत्या वै तत्तद्रूपसुपागमतः। 

साधयत्यात्मनः कायं सुराणामर्थ॑स्िद्धये ॥ ४५॥ 
टत प्रकार ये विष्णु छल्ते भिन्न-भिन्न रूप धारण 

करके देवताओक्रा मनोरथ षिद्ध करनेके ट्य अप्रना काम 

चना लेते दै॥ ५५ ॥ 

तदेष नृनं विप्णुवी शको वा मरतां पति; । 

मत्साधनेच्छया भाप्रो नारदो मां यदुक्तवान्‌ ॥ ४६॥ 
अतः यह श्रीकृप्ण निश्चय दी विष्णु है अथवा देवराज 

इन्द्र | यह मेरा वध करनेकी इच्छसे ही त्रजभूमिमे आया 

दै; जैसा त्रि देवपिं नारदने सृ्चे-वताया रा ॥ ४६ ॥ 

अन्मे शते बुदधि्वंसुदेवं प्रक्ति धुवा। 

अस्य बुद्धिविशेषेण चयं कातरतां गताः ॥ ४७॥ 

इस विप्रय्मे मेरी बुद्धि निश्चय ही वसुदेवकरे प्रति 

संदेह करने ल्गी है| इत वसुदैवक्ी विष्ट बुद्रिसे टम 

अवश्य कातर हो उठे ह ॥ ४७ ॥ 

अदं हि खट्वाद्गवने नारदेन समागतः 1 

दवितीयं ख दि मां विप्रः पुनरेवाव्रवीद्‌ वचः ॥ ४८॥ 
धमरे खटूवाज्चवनममे जव दूसरी बरार नारदसे मिल थाः 


' तवर उस ब्राहाणन मुद्धसे पुनः इतत प्रकार कदा--- ४८ ॥ 


यस्त्वया हि ङतो यलः कंस गर्भ॑ङृते महान्‌ । 
चस्ुदेवेन ते रा्नौ वतत्कर्म॑विफरोरृतम्‌ ॥ ४९॥ 
न्कंस ! तुमने जो देवक्रीका ग्भ नष्ट कर देनेके लवि , 
महान्‌ प्रयत्न आरम्भ क्रिया थाः वुम्हरि उक्त कर्मको रातकरे 
समय वसुदेवने निष्फल कर दिया ॥ ४९ ॥ “ 
दारिका यात्वयार नौ शिखायां कंस पातिता । 
तां यश्चोदाखुतां विद्धि ष्णं च वसुद्रैवजम्‌ ‡ ५०॥ 
ध्वंस | तुमने रात्रे समय निस कन्याकरो गिल्लपर दे 
मारा था, उसे ययोदाकी पुत्री समन्नो जर वर्दो जो श्रीकृष्ण 
हैः वही वसुदेव ( तथा देवकी ) का पुत्र है ॥ ५० ॥ 
रान्न व्यावरतितावेतौ गर्भौ तव वधाय वै। 
वसुदेवेन संधाय मिचरूवेण श्घ्रुणा ॥ ५९॥ 
तुम्हारे मिन्र-रूपधारी रात्र वसुदेवने रातके समय 
छल्यूर्वक वम्हरि वधके व्यि इन दोनो नचोकी अदल 
बदली कर टी थी॥ ५१ ॥ 


दिष्णुपवं ] दाविश्लोऽध्यायः २८ 


सा तु कन्था यशोदाया विन्ध्ये प्व॑तसत्तमे । 
हत्वा श्चम्भनिद्युम्भौ दवौ दानवौ नगचारिणौ ॥ ५२॥ 
ध्यदोदाकी वह कन्या पर्वतो्ये श्रेष्ठ विन्ध्यगिरखिपर 
जाकर रहती है । वर्ह उस ॒पर्वतपर विचरनेवलि जो ञ्यम्भ 
ओर निनुम्भ नामक दो दानव येः उनक्रा वध करे 
प्रतिष्ठित हई है ॥ ५२ ॥ - 
ताभिपेका वरदा  भूतसंधनिपिविता । 
अर्च्यते दस्युभिधोरेमदावङिपद्युप्रिया ॥ ५३२ ॥ 
श्राणि्थोके समुदायद्वारा सेवित्र वह देवी उपासकोको 
अभीष्ट वर देनेकाटी है] उ महती पृजन-सामग्री ओर 
वरो विचरनेवल पृद्य॒ प्रिय ह | वरहो भयानक दस्यु उस 
देवीका अभिषेक करके पूजन करते हँ ॥ ५३ ॥ 
सखुरापिरितपूणोभ्यां कुम्भाभ्यापुपश्षोभित।। 
मयू रह्वद्चिवरश्च वर्दभरेविभूषिता ॥ ५४॥ 
ध्वह मधु तथा फर्क गूदोते भरे हए दो कलशेसि 
सुरोमित होती है । मोरणंखकरे चने हुए विचित्र भुजदण्ड 
तया मोरोकी पोखते ही अनये गये दूर-दूरे आमूषण 
उस देवीके अल्कार ई ॥ ५४ ॥ 
हण्रकुक्कुटसनादं चनं वायसनादितम्‌ । 
खगसधैश्च सम्पू्णमविरुदधश्च पर्षिभिः ॥ ५५॥ 
द्िहव्या्रवराहदाणां नादेन प्रतिनादितम्‌ । 
बक्षगभ्भीरनिविडं कान्तारः स्वतो चतम्‌ ॥ ५६॥ 
यभृङ्धारुचमरेणदर्शैरुपशोभितम्‌ । 
देवतूर्यनिनादैश्च शतशः अतिनादितम्‌ ॥ ५७॥ 
स्थानं तस्या नगे विन्ध्ये निर्मितं स्वेन तेजख। । 
रिपूणां जासजननी नित्यं तन्न मनोरमे ॥ ५८ ॥ 
वसते परभभ्रीता देवतैरपि पृजिता। 

(उस विन्ध्यपर्वतपर उसके अपने ही तेजसे निर्मित 
हुआ खान एक सुन्दर वन है, जरो दर्म मरे हुए सूर्गोका 
कलनाद सुनायी देता है  कौओकि कवि-कबिकी आवाज 
भी सूजती रहती दै ¡ खरग आदि पञ्चके समुदाय भी वरो 
भरे रहते दै तथा मने अनुकूर पक्षियोपि भी वह सान 
सुशोधित रदता है । वरहो सिह, व्याभों ओर वरार्होकी गर्जनाका 
गम्भीर शब्द्‌ प्रतिध्वनित होता रहता दै । इ्षौके ाहुल्यसे 
बह गम्भीर एवं गहन प्रतीत होता है ! सव ओरसे दुर्गम 
खानोदारा ` बह धिरा हुआ दै । दिव्य गड्आः चर्वैर ओर 
दपण देवीके उस सखानकी सोमा बदति ह । सैकड़ों देववादोः 

प्वनियोसि वह वन भजता रहता है । रातुर्ओको त्रास 
देनेवाटी वह देवी सदा उसी मनोरम वनमे प्रसप्रताूर्वक 
निवास करती है । वर्ह देवता मी उसकी पूजा करते 
द ॥ ५५--५८९ ॥ 
यस्त्वयं नन्दगोपस्य छृष्ण इत्युच्यते सुतः ॥ ५९ ॥ 
अन्न मे नारद्‌ः प्रा खुमषत्कर्मकारणम्‌ । 


द्वितीयो वखुदेवाद्‌ वै वासुदेवो भविष्यति ॥ ६० ॥ 
स दिते सहजो सव्युबोन्धवश्च भविष्यति । 
कृष्ण नामसे प्रसिद्ध जो नन्दगोपका पुत्र चताया 
जाता है, उसके विषयमे नारद जीने मुद्यते कडा रै कि श्रमे 
जो पूतनावध आदि ब्रदे-वड़े कर्म हो रदे हैः उनका पधान 
कारण वदी रै । वह वसुदेवसे उन्न होनेवाटय दूसरा पुन 
रै, इसल्यि वासुदेव नामसे विख्यात दोगा । वह ठम्ारी 
सहज ग्रत्यु तथा वान्धव भी होगा ॥ ५९-६०३ | 
स पव वासुदेवो वै वसुदेव्धतो वली । 
बान्धवो धर्मतो महयं दमेनान्तको रिपुः ॥ ६९१ ॥ 
ध्वसुदेवका वह वलवान्‌ पुत्र बासुदेव ही धर्मतः मेरा 
वान्धव है; कंठ हृदयसे विनाशकारी रात्र बना है ॥ ६१ ॥ 
यथा हि वायद्ो सूर्धि पद्भ्यां यस्थाचतिष्ठति । ` 
नेत्रे तुदति दस्यैव वक्नेणमिष्रयुद्धिना ॥ ६२ ॥ 
चसुदेवस्तथेवार्यं सपुतरक्षातिवान्धवः 1 
छिनत्ति मम भूखानि भुङ्कते च मम पारवेतः ॥ ६३ ॥ 
नेसे कौवा जिसके सिखर दोनौँ पंजे रखकर तरैठता दहेः 
अपनी मांसलोदधप चोँचसे उसीके दोनों नेतरोपर प्रहार करता 
है; उसी प्रकार ये वसुदेव भी अपने पुत्र ओर मार्द-बन्धुओं- 
सहित मेरे दी पास खति है ओर मेरी ही जड काटते 
है ॥ ६२-६२ ॥ 
श्रणहत्यापि संताय गोवधः खीवधोऽपि वा ! 
न ईतश्नस्य लोको ऽस्ति वान्धवस्य विश्षेषतः ॥ ६४ ॥ 
“भ्रणहत्याके पापते मनुप्य तर सकता है, गोवध अथवा 
सीवधके पापको मी प्रायश्चित्त आदि द्वारा लखंषाजा 
सकला है; परंतु जो कृतघ्न दैः विशेषतः अपने भाई-बन्धुपर 
ृतव्नता करता है, उसके स्यि कोडई रोक. नहीं है--उसका 
कीं भी रिकाना नदीं लगता | ६४ ॥ 
पतिताद्ुगतं मार निषेवत्यचिरेण सः। 
यः तश्च ऽचुचन्धेन प्रीति-वहति दारुणाम्‌ ॥ ६५ ॥ 
(जो भीतस्से कृतघ्न रहकर अपना काम वनानैके चि 
ऊपरसे मयानक प्रीतिका बोच्च ठोता दैः वह शीघ्र ही पतितौके 
पथका आश्रय लेता है ॥ ६५ ॥ 
नरकाध्युषितः पन्था गन्तव्यस्तेन दारुणः । 
अपपि पापहृदयो यः पापमयुतिष्ठति ॥ ६६॥ 
धजो पापहीनकरे प्रति अपने हृदयम पापपुणं भाव लेकर 
पापका ही वर्तय करता है; उसे नरके भयंकर मार्गपर 
जाना पडता है ॥ ६६ ॥ 
अदं षाखजनःग्छाष्यः ख वा श्छघ्यतरः सुवः 
नियमेगुणच्रत्तेन त्वया वान्धवकाम्यया ॥ ६७ ॥ 
ध्नियमः गुण ओर आचार--इनको सामने रखकर वु्हं 
किंसीको मित्र बननेकी इच्छा करनी चाहिये ¡ वतलओः 
पुम मुञ्च सखजनकौ स्पृणीय मानते हो अथवा अपने उस 
पुत्रको मुद्चसे भी अधिक्र इष्य समक्षते दो १॥ ६७ ॥ 


# 


२८४ 


,हस्तिनां करदे घोरे वधम्रच्छन्ति वीख्धः । ` 


युद्ब्गरुपस्मे ते च सदाश्चन्ति महावने ॥ ६८॥ 
वान्धवानामपि तथा मेदकाडे समुत्थिते । 
वध्यते यो ऽन्तरपरेष्छुः सजनो यदि वेतरः ॥ ६९ ॥ 
ष्टाथियोमे भयंकर युद्ध दछिड जानेपर घास-पात ओर 
कतान्रेटे नष्ट होती ई; फिर युद्धका विराम होनेपर 
वे हाथी उस , महान्‌ वनम साथ-साय खति-पीते ईः 
उसी प्रकार भाईबन्धुओमि मेद उपचित होनेपर जो दद्र 
ददनेवाखा होता है, वही मारा जाता दहै; मठे ही वह खजन 
हयो या ओर कई | ६८-६९ ॥ 
कारस्त्वं हि विनाश्य मया पुष्टो विजानता । 
वसुरेव इुखस्यास्य यद्‌ विरोधयसे शरष्टाम्‌ ॥ ७० ॥ 
ध्वसुदेव ! ठम इस कुक कार हो। मने अपने विनाके 
च्ि ही ठम्हं जान-बूक्षकर पाल-पोखा है | तमी तो ठम 
मद्वत अव्यन्त विरोध ब्दारदे दहो ॥ ७०॥ 
अमषीं वैरद्छीलश्च सदा पापमतिः शठः । 
स्थने यदुकुखं मूढ शोचनीयं त्वया ऊतम्‌ ॥ ७२ ॥ 
"ओ मूढ ! ठम अमर्पदील (असदहिप्णु ) ओर सभावतः 
वैर रखनेवटे हो । ठम्हारी बुद्धि सदा पपे ही खगी रहती 
है| तमखट दयो तमने जो इस यदुक्ुट्की शोचनीय 
अवस्था कर दी दहै, वह उचित ही हे ॥ ७१ ॥ 
चसुदरैव चथा च्द्ध यन्मया त्वं पुरस्छतः। 
दवेततेव शिरसा चरद्धो नैव वर्षशतेभवेत्‌ ॥ ७२ ॥ 
यस्य बुद्धिः परिणता ख वे बृद्धतसे शरणाम्‌ ॥ ७२ ॥ 
शुदे वसुदेव ¡ मने जो ठम्हं पुरस्कृत करिया--सदा 
अगुआआ बनाकर रक्खाः वह्‌ सव्र व्यर्थं हौ गया । तिरे बराक 
सफेद हो जाये ओर सौ वर्पौकी आयु दो जाय--इतनेसे ही 
कोई वृद्ध ( श्रेष्ठ ) नदीं दो सकता जिसकी बुद्धि परिपक्र दो; 
वदी मनुय वृद्धतर ( श्रे्टतम या व्डा-बृदा ) 
माना गया दै ।। ७२-७३ ॥ 
त्वे च ककंराश्चीरश्च बुद्धश्ा च न वहुशरुतः। 
केवलं वयसा बद्धो यथा श्लरदि तोयदः ॥ ७४ ॥ 
शुम्हारा खभाव तो ककय ( क्रूर ) दहै। ठम बुद्धिस भी 
बहुश्रुत ( अधिक वारतोकरे जानकार ) नदीं हये 1 जरद्‌ ऋतुके 
चादल्की भोति केवर अवसाने ही वृढ हो (अनुभवे न्दी) ७४। 
कि च त्वं साधु जानीषे वसुदेव चथामते। 
स्ते कंसे मम खतो मथुरां पारयिष्यति ॥ ७५॥ 
(तना ही नदी, च्यरथ बुद्धिः रखनेवाछे वसुदेव ! तुम वह्‌ 
अच्छी तरद्‌ समन्चने खगे हो क्रि कंसकरे मर जनिपर मेरा वेय 
मथुसका पाटन करेगा--वही यर्दोका राजा होगा ॥ ७५॥ 
छिन्नालस्त्वं ब्रथाव्रदधो मिथ्या त्वेवं चिचारितम्‌। 
जिजीविषुन सोऽप्यस्ति योऽवतिष्ठेन्ममाय्रतः ॥ ७दे ॥ 
"परंतु वम्दारी यह आदा चछिन्न-मिन्न हो जायगी । तुम 
व्य्थही दृद हुए । ठमने च्छे दी एसा व्रिचार क्रिया| 
यरे { जो मेरे खामने प्रतिद्वन्दी. बनकर खडा हो, उसके 


श्रीमहाभारते लिकभागे 


[ हसे 


` विधयमे यदह समश्चना चाहिये किं वद जीवित रहना 


नदीं चाहता | ७६ ॥ 

प्रतु कामो विश्वस्ते वस्त्व दुन चेतसा! 

तत्‌ ते प्रतिकरिष्येऽदं पुत्रयोस्तव पर्यतः ॥ ७७॥ 
शमने सदा तम्दाय विश्वास क्रिया ओर मने दुटतार्णं 

चित्तसे मुक्चपर प्रहार करनेकी अभिलप्रा की 1 इसका बदला 

म ठम्दरे दोनों प्रेस दगा ओर उम उसे अपनी 

अखि देखो ॥ ७७॥ 

न मे बृद्धवधः कश्चिद्‌ ह्िजक्लीवध पव च । 

कृतपूवैः करिष्ये वा विशेषेण तु वान्धवे ॥ ७८॥ ` 
समने पट्टे कभी भी किसी वृकाः बाद्यणका अथवा 

स्रीका वध नहीं क्रिया है तथा न अगे ही रेता 

कङ्गा; विशेषतः अपने बन्धु-वान्धवपर तो मँ हाय 

उटाजगा दी नदीं ॥ ७८ ॥ 

इद त्वं जातसंचरृद्धो मम पिज विवर्धितः। 

पितरप्वखुश्च मे भती यदूनां प्रथमो गुरः ॥ ५९॥ 
ध्वसुदेव ! वम यदीं पैदा हुए यी बदर जीर मेरे पितने 

ही ठम्दं पाल -पोसक्रर वड़ा करिया । तुम मेरी चचेरी बहिनक पति 

हो मौर यदुवंधिरयेमिं सर्वश्रेष्ठ रुखंख्प माने जाते हो ॥ ५९॥ 

कुले महति विख्यातः प्रथिते चक्रवर्तिनाम्‌ 1 

शु्थं पूजितः सद्धिर्मदद्धिर्धरमवुद्धिभिः॥ ८०॥ 
ध्यक॑वतियकि सुविख्यात एवं मदान्‌ कुलम तुम्हारा जन्म 

हज, ठम स्वयं मी प्रसिद्ध हो तथा धर्मृवियरक युद्धि स्खने- 

वल श्रेष्ठ महापुरर्पैनि उसी गौरवके कारण ठम्दारा पूजन, 

आदर-सःकार क्रिया दै ॥ ८० ॥ 

किं करिष्यामहे सव सत्सु वक्तव्यतां गताः । 

यदूनां यूथमुख्यस्य यस्य ते चृत्तमीदश्षम्‌ ॥ ८१॥ 
ध्वम यद्ुवचिर्योके समुदाये मुख्य ह्यो । जव वुम्हारा 

आगचारग्यवदार एसा है ( तो ओका क्या कडा जाय १ ) | 

क्याकरेः दम सव छोग केवल ठुम्हरि कारण सत्पुदपोकरे 

समाजमे निन्दाक्रे पात्र वन गमे | ८१॥ 

मद्धो चा जयो वाथ वसुदेवस्य दुर्नयः । 

सतु यास्यन्ति पुरुषा यदूनामवगुण्ठिताः ॥ ८२॥ 
'्वसुदेवकी दुनीतिसे मेरा वध दहो अथवा चिजवः 

आजते यदुकरुख्के पुरुप सजनोकरे समाजम अपना मह 

दैककर जार्येगे ॥ ८२॥ 

त्वया हि मद्धधोपायं तर्कमाणेन वे भ्रधे। | 

अविश्वास्यं छृतं कमं वाच्याश्च यद्वः कताः ॥ ८२ ॥ 
ध्वसुदैव ! तुमने युद्धम मेरे वधका उपाय सोचते-सोचते - 


~~~ -__-~----~-- 
१. ययपि ययातिकरे सापसे यदुकुटका कोई भी पुरुप चक्रवती 


राजा नहीं हमा तवापि यदो चक्रवतीके लक्षण-विरोपसे सम्पन्न 
पुरपेको ही चक्रवतीं कहा गया है ! वृह रक्षण शस प्रकार ६-- 
यस्य मूधनि दु्येत विना चछ््रेण भूपते; । पद्मानुकारिणी छया 
तमाहुशक्रवतिनम्‌ ॥ अर्थात्‌ जिस राजाफे मस्तकपर विना छनन र्गये 
ही कमल-जैसी छाया दिलायी दे, उते चनवतीं कहते ह ¦ 


विष्थुपवे | 


, दा्विकषोऽष्यायः 


२८५ 


सा कर्म कर डस्य; जिषके कारण यादर्वेकि ऊपरसे सव्रका 
श्वास उट गया } तुमने यद्ुवंरियौको कल्ड्धित करके 
निन्दाके योग्य बना दिया ॥ ८३ ॥ 
अशाभ्यं वेप्सुत्यन्नं मम छङष्णस्य चोभयोः । 
श्ान्तिमेकतरे शान्ति मते यास्यन्ति यादवाः ॥ ८४ ॥ 
'अव तो हम दोनेमि--सुन्च कंस ओर कष्णमेकमी शन्तन 
होनेवाल् वैर उत्पन्न हो गया हे । हममेसे किंसी एक व्यक्तिके 
शान्त हने--मर जनेपर्‌ दी यादर्वौको गान्ति मिलेगी ॥ ८४॥ 
गच्छ दानपते क्षिप्रं ताविहानयितुं बनात्‌ 1. 
नन्दगोपं च गोपांश्च करदान्‌ मम शासनात्‌ ॥ ८५ ॥ 
ष्दानपते अक्रूर | चुम मेरे अदेगसे वसुदेवके उन दोनो 
पु्रोको, नन्दगोपको तथा मुञे कर देनेवाठे अन्य गोपोको 
भी व्रजसे यहो घुल खनेके ्थि शरीध जाओ ॥ ८५ ॥ 
चाच्यश्च नन्दगोपो वै करमादाय वार्षिकम्‌ । 
शष्िमागच्छ नगरं गोपैः सह समन्वितः ॥ ८६ ॥ 
(नन्दगोप कह देना कि तुम हमार वाधिकर कर ठेकर 
गोपोके साय यीघ्र ही मशरुरापुयीको चले } ८६ ॥ 
कृष्णसंकर्षणौ चैव वसुदेवसुतावुभौ । 
द्रष्ुमिच्छति वै कंसः सशरत्यः खपुसेितः ॥ ८७ ॥ 
'वसुदेवके ये दोनों पुत्र जो श्रीकृष्ण ओर संकर्षण हैः 
इन्हे सेवकौ ओर पुरोदितपहित महाराज कंस देखना 
चाहते द ॥ ८७ ॥ 
पतो युद्धविदौ स्द्वे कालनिमीणयोधिनौ । 
टौ च कृतिनो चैव श्णोमि व्यायतोदयमो ॥ ८८ ॥ 
"सुनता हू किये दोनों अखाडेमे ट्डना जानते है ओर 
सामयिक युद्धकी कमे क्रुश द } इन्दि दीर्भकाटसे इसके ल्यि 
विदोषं यत्न ओर परिध्रम किया है तथा ये दोनों माई सुद्‌ 
जीर चतुर दै ॥ ८८ ॥ 
अष्ाकमपि महौ दौ सञ्जो युद्धकृनोत्सवोौ । 
ताभ्यां सह नियोत्स्येते तौ युद्धङुदालाद्चभौ ॥ ८९॥ 
'्दमारे यटा भी दो पहट्वान लड़ाईके व्यि तैयार है । 
इन्द ल्ड्ने-मिडनेरमे वडा आनन्द अता है । वेदोनोदी 
युद्धम कुशल दैः जो उन दोनो श्रीकृष्ण सौर संकर्पणके 
साथ युद्ध करेभे ॥ ८९ ॥ 
दण्न्यो च मयावद्यं वारौ तावमसेपमौ 1 
पिचिष्वघुः खतो मुख्यौ जवास . बनेचसे ॥ ९० ॥ 
„ वे दोनो देवोपम वारक मेरी चचरी वहिनके प्रधान पुत्र 
हैः जो दस्र समय वरजम रहते ओर वनमे विचरते है । सुञ्च 
अवश्य उने दोनोको देखना चाहिये ॥ ९० ॥ 
वक्तव्यं च जजे तिन्‌ समीपे बजवासिनाम्‌। 
जा धलुमखं नामं कारयिष्यति वै खखी ॥ ९१॥ 
उस व्रजमे जाकर त्रजवासिवोके समीप तम्हे यह कहना 
चादिये करि सुखी राजा कंस धनुर्य्ञका उस्सव्र करायेगे ॥९१॥ 
संनिकृष्टे चने ते तु निवसन्तु यथासुखम्‌ । 
जनस्यामन्त्रित्या्थं यथा स्यात्‌ सर्वमन्ययम्‌ ॥९२॥ 


१ 


“इस उत्सवमे आमन्तित हुए ठेोगोको जिस प्रकार र 
तरसे आराम मिक, उसके ल्मि ठम सवर व्रजवासी मथुराके 
समीपवर्ती वनमे आकर युखपूर्वक रदो ॥ ९२ ॥ 
पयसः सर्पिषश्चैव दधो दध्युत्तरस्य च) 
यथाक्रामप्रदानाय भोज्याधिश्चयणाय च ॥९३॥ 

ध, धी, दही जौर तक्र आदिको अतियिर्योकी इच्छाके 
अलसा ज॒यकर देना ओर खीर आदि बनानके ल्य जवर 
जितने दूधकौ आगपर रखना आवश्यक हो, तवतव उस 
आवद्यक्रताकी पूक्कर स्थि पर्याप्त दृध प्रस्तुत करना--दसी 
उदेदयसे वुग्द नगरके निकट निवास कसना है ॥ ९३ ॥ 
अक्रूर गच्छ शीध्रं त्वं 'तावानय ममाज्ञया । 


संकर्षणं च छृष्णं च द्रष्टं कोतूदटं हि मे ॥ ९४॥ 


“अक्रूर { शीघ्र जा । मेरी आज्ञसे उन दोनों संकर्षण 
ओर छष्णफो यहो के आज । मुने उन्दे देखनेके च्ि 
बड़ी उक्कण्ठा है | ९४ ॥ 
तयोरागमने पीतिः परमा मत्ता भवेत्‌ । 
दषा तु तौ महावीर्यौ तद्‌ विधास्यामि यद्धिवम्‌ ॥ ९५ ॥ 

ध्उनकरे आ जानेसे मुञ्चे बड़ी प्रसन्नता होगी; ( जिसका 
शरेय तुम्हे मिेगा । ) उन दोनो महापराक्रमी वा्कोको 
देखकर यै वही करसैगा, जिम मेय हित दोगा ॥ ९५॥ 
शासनं यदि वा श्रुत्वा मम तों परिभाषितम्‌ । 
नागच्छेतां यथाकारं निप्राह्यावपि तौ मम ॥ ९६॥ 

भेरी यह आश्ञा तथा बार्ते सुनकर यदि वे दोनों य्ह 
ठीक समयपर अनिको तैयारमदहौ तो मेरी रायमैवे वंदी 
बना लेनेके भी योग्य है ( अर्थात्‌ ठम उन कैदकरकेभी 
ला सकतेद्ो)}; ९६॥ 
सान्त्वमेव तु वारेषु प्रधानं परथमो नयः। 
मधुरेणेव तौ मन्दौ खयमेवानयाञ्यु वैं ॥ ९७॥ 

'समञ्चा-बुञ्चाकर काम लेना ही बा्कोके प्रति प्रधान 
एवं प्रमुख नीति है; इसल्ि त॒म उन दोनों मूरखोको मीरी 
वातोसे खयं ही राजी करे यहो गीध ठे आभ ॥ ९७ ॥ 
अक्रूर करु मे प्रीतिमेतां परमदुरंभाम्‌। 
यदि चा नोपजक्षोऽसि वसुदेवेन सुनत। 
तथा क्त॑व्यमेतद्धि यथा तावागमिष्यतः ॥ ९.८ ॥ 

(उत्तम व्रतका पाटन करनेवाले अक्रूर | यदि वसुदेवने 
ठम्दरेभीकाननभरदियेहोंतो त॒म मेरी हस परम दुर्लम 
पीतिका सम्पादन करो । वुम्दे वैषा दी प्रयत्न करना चाहिये; 
जिससे वे दोन खतः यहो आ जाये" | ९८ ॥ 
प्वमा्षिप्यमाणेऽपि चसुदेवो वसपमः। 
सागराकारमात्मानं निष्प्रकस्पमधारयत्‌ ॥ ९९. ॥ 

कंसक्रे इस प्रकार आक्षेप करनेपर भी वसुर्मकि समान 
शक्तिराली वखुदेवने अपने खमुद्र-जैसे दयक ्षुव्ध या 
कम्पित नदीं हने दिया । उते धैर्यपूर्वक कावूरमे रखा ॥९९॥ 
वाच्छल्यैस्ताङ्यमानस्तु कसेनादीर्घदिना । 
क्षमां मनसि संधाय नोत्तरं - प्रत्यभापत ॥१००॥ 


२८६ 


श्रीमहाभारते सिरभागि 


[ स्वे 


अदूरदशीं कंसने उन्दं वाग्वाणेति बार-बार घायल क्रिया| 
फिर मी उन्दनि मनये क्षमाभाव रखकर उसे उसकी वार्तोका 
फो उत्तर नदीं दिया ॥ १०० ॥ 
ये तु तं दद्ट्युस्तज्र क्लिप्यमाणमनेकधा। 
धिग्धिगित्यसकृत्‌ ते वैँ रनेरुचुरव!ङखुखाः ॥ १०१॥ 
जिन लगन वहो वबुदेवजीपर बरवार आक्षेप दता 
देखा, वे अपना मुंह नीचे किये धीरे-धीरे अनेक वार बोर 
उठे किं धिक्छार दैः पि्छार है ॥ १०१ ॥ 
अक्रूरस्तु महातेजा जानन्‌ दिव्येन चश्चुपा । 
जलं दृष्टैव ठृपितः प्रेपितः प्रीतिमानभूत्‌ ॥१०२॥ 


मदातेजस्वी अक्रूर अपनीं दिव्य दृटिसे सत्र कुछ जानते 
ये ८ किं मगवान्‌ श्रीकृष्ण कौन ई ओर करिखलियि अवतरं 
हुए द ); अतः जे प्याता मनुष्य पानीकेो देखते ही प्रसन्न हो 
उठता दै, उसरी अकार उन कंसके भेजनेपर बड़ी प्रसन्नताका 
अनुभव हु ॥ १०२॥ 
तस्मिन्नेव सुहत तु मथुरायाः स निर्ययौ । 
भरीतिमान्‌ पुण्डयकाक्षं द्रष्टं दानपतिः सख्यम्‌ ॥ १०२॥ 

दानपतति अक्रूर मनःदी-मन प्रसन्न हो स्वयं जाकर कमल- 
नयन श्रीकृप्णक्रा दर्यन करने ल्य उसी पुहूर्तमे मथुराति 
निकल पदे ॥ १०३॥ 


इति श्रौमहाभा।रते लिरूभने हरिंशे विष्णुपर्वणि अक्रएस्थने दार्विशोऽध्यायः ॥ २२ ॥ 
इस प्रकार श्रीमहाभारते छिरमाम दसद अन्तम॑त विष्णुम भकृस्का प्रस्थानव्रिषयक वर्दिसर्वे; अध्याय पूरा हुमा ॥ २२॥ 


~> ००० 


त्रयोविदोऽध्यायः 


अन्धकका कंसको भेहतोड उत्तर 


वे्यम्पायन उवाच 
क्षितं यदुचरपं चष्ट सर्वे ते यदुपुङ्गवाः। 
निपीड्य श्रवणान्‌ हस्ते्मेनिरे तं गतायुपम्‌ ॥ १९ ॥ 
वैद्यम्पायमजी कहते है--जनमेजय { यदुकुले उन 
सभी श्रेष्ठ पुरनि यदुक्कुरतिख्क वसुदेवपर आक्षेप होता 
देख शीघ्र ही हार्थोसे अपने-अपने कान वंद कर ल्य | उन 
सवको यह निश्चय हो गया कि कंसक्री आयु समाप्त हो 
चटी है ॥ १॥ 
अन्धको.ऽनुद्ि्यमना धैयादविरूतं वचः । 
प्रोचाच चदतां श्रेष्टः समाजे कंसमोजसा ॥ २ ॥ 
उसी समानमे वक्ताओ्मे श्रेठ अन्धक भी येः जिनके 
मन्म कंसे निक मी भय नहीं था । उन्दनि धैर्यसे अपनी 
वाणीको विकराररदित रखते हुए कंससे ओजस्वी खसे कदा-॥ 
अच्छाच्यो मे मतः पुन्न तवायं वाक्पर्थिमः। . 
अयुक्तो गर्हितः सद्धिवीन्धवेयु विरोपतः ॥ ३ ॥ 
, ववे | तुमने जो इतनी देरतक भाषण देनेका कष्ट 
उठाया है ठम्हारा यह परिश्रम मेरे मतमे आद्र या प्रलंखा- 
के योग्य नहीं दहे । यह सर्वथा अनुचित हे | शरेष्ठ पुरषेनि 
इसकी सद। निन्दा की है । विनेपतः अपने वन्धु-वान्धरववके 
भरति रेखा अश्षिप सर्वथा निन्दित है ॥ ३॥ 
अयाद्बो यदि भवन्छृणु तावद्‌ यदुच्यते । 
न हि त्वां यादवं वीर वलात्‌ छुर्वन्ति यादवाः ॥ ४ ॥ 
"वीर ! अव इस समय ओँ जो कुछ कहता हू उसे 
ध्यान देकर सुनो । यदि चम यादव नरहीदह्यो या अपनेको 
यदिव नदीं मानतेदोतोये यदुवंशी व्ह जवरदसती यादव 
नदीं वना रहे ई ( यौर न वनाना चाहते दै)॥४॥ 
अच्छाघ्या चृष्णयः पुत्र येषां त्वमचुशासिता । 
दक्ष्वाकवंशजो राजा विनिचत्तः खयं सूत्‌ ॥ ५ ॥ 
ध्वत्स } जिनके शासक त॒म दो, वे बरष्णिवंशी आदर थर 


प्रयासे योग्यदो दी नदीं सकते ६ | इश्वाङ्कवंशमे एक 
प्रजापीडक राजा उत्पन्न हा धाः जो खयं दी किरी समयं 
राज्य छोडकर भाग गगरा अथवा मिट गथा ( इस यदुकरुल्मे 
ठम भी वैसे ही जान पडते दो, अतः वम्दारी भी वैषीदही 
दशा हेनेवाटी दै ) ॥ ५॥ 
भोजो वा यादवो वासि कंसो वासि यथा तथा। 
सहजं ते शिरस्तात जटी सुण्डो.ऽपि चा भव ॥ ६ ॥ 
(तात ¡ ठम भोज द्यो, यादव हो अथवा कंसो या 
जेखा-तेषा कोई मी हो, व॒म्दारा मस्तक वुम्दारे साय ही उसन्न 
हुआ र ( ओर वह्‌ अभीतक मौजूद है ) । ठम उस्पर ड़- 
वड़ी जये रखा ठो अथवा मूड मुडा लो ( यदि त॒म यादव 
रहना नँ चादते तो जो चाहो, वदी चन जाओ ) ॥ ६ ॥ 
उग्रसेनस्प्वयं श्षोच्यो यो ऽस्माकं कुलपांसनः) 
दुजौतीयेन येन त्वमीदशो जनितः सुतः ॥ ७ ॥ 
भमेरी द्मे तो यह उग्रसेन शोचनीय दै, जो हमलोरगेभिं 
ऊुखज्ञार पैदा दो गया ओर जिस दुर्जातिने ठम्दारे जेते बेदे- 
-को जन्म दिय। ॥ ७ ॥ 
न चात्मनो गुणांस्तात प्रवदन्ति मनीषिणः 
परेणोक्ता गुणा गौण्यं यान्ति वेदार्थसम्मिताः ॥ ८ ॥ 
(तात } मनीपी पुरुप अपने मुखते अपने रुर्मोका 
वखान नदीं करते ह । दूसरेके दवारा वर्णित या प्रमंसित हुए 
गुण ही सफल होते ओर वेदार्थके तल्य प्रामाणिक माने 
जति द ॥८॥ 
पृथिव्यां यदुवंशोऽयं निन्दनीयो मदीक्षिताम्‌ । 
वालः कुकान्तकृन्मूटो येषां त्वमयुरासिता ॥ ९ ॥ 
“भूमण्डले यह यदुवंश समस्त भूपालोके चयि निन्दनीय 
वन गया; क्योकि ठ॒म्हारे समान ऊुलनाशकः मूख ओर 
अविवेकी वारक इन यादर्वोका दासक है ॥ ९ ॥ 


विष्णुपचं 1 


घयोविह्यो ऽध्यायः 


२८७ 


~~~ ननन 


असाधुमद्धिर्वीक्यैश्च त्वया साध्विति भाषितैः। 

न चाप्यासादितं कार्यमात्मा च विवृतः ङतः ॥ १०॥ 
(तुमने निन्दायुक्त. वचनो उत्तम मानकर जो यहो 

कहा है, उनसे कोई कार्यं तो सिद्ध हया नहीं; केवल त॒म्दारे 

सवस्पका स्पष्टीकरण दो गया हे ( इन बा्तोसे सवर लेग यद 

जान गये करि तेम ज्रितने ओखे हो ! ) ॥ १० ॥ 

गुरोरनवदिप्तस्य ` मन्यस्य महतामपि । 

क्षेपणं कः शुभं मन्ये दविजस्येव वधे रते ॥ ९१॥ 

` भजो अहृक्राररदित तथा महापुसपोके ल्यि भी माननीय 

गुखजन है, उनपर आक्षेप करना ब्रह्महत्याके समान है । उसे 

करके कौन अपने लि कर्याणकी आशा कर सकता है ॥ 

मान्याश्चैवाभिगम्याश्च बृद्धास्तात यथाञ्चः। 

क्रोधो हि तेषं प्रद्देछोकानन्तर्मतःनपिं ॥ १२॥ 
ध्तात | बद्ध पुरुष अग्निर्योके समान आदरणीय तथा 

सेव्य होते दै, उनका क्रोध आन्तरिकं साधनाओँचे प्रात हुए 

सकको भी जलाकर भसम कर सक्ता दै ॥ १२ ॥ 

बुधेन तात दान्तेन नित्यमभ्युचिन्तात्मना । 

धर्मस्य गतिरन्वेष्या मत्स्यस्य गतिरप्लिव ॥ १३॥ 

ˆ (तात ¡ निसक्रा अत्मा उन्नतिके पथपर अग्रसर है तथा 

जो जितेन्द्रिय एवं विवेकी विद्वान्‌ है उस पुरुप्रको धर्म- 

की गतिका सदा दी अन्वेषण करना चादयः जते जस्मे 

मछृलीक्रौ गति अघ्यन्त सूक्ष्म या अव्यक्त दोषी है उसी 

प्रकार धर्म॑की गति भी वृक्षम दहै | १३॥ 

केवरं त्वं तुं दर्पेण बृद्धानधिसमानिह। 

वाचा तुदसि मर्मध्न्य। अमन्ोक्ता यथाऽ.ऽइति १४। 
धुम तो केवल अहंकार यदो त्रेढे हए अग्निक समान 

तेजसी वद्ध पुरषौको अपनी ममभेदिनी वाणीदयारा पीडा दे 

रदे रो । जसे मन्वका उचारण कथि चिना दी हर्द आहूति 

व्यथं होती दै, उसी प्रकार तुम्हारी यदह अक्षिपपूर्णं वात 

निष्फल ह ।॥ १४ ॥ 

वसुदेवं च पुत्रां यदिमं परिगरैसि । 

तच मिथ्या प्रखपं ते निन्दामि कृपणं वचः ॥ १५॥ 
'वसुदेवने अपने पुच्रकी रक्षाके स्थि जो ङुछ किया हेः 

उसके ल्थि जो तुम दनपर आक्षेप करते हो, वह सव तुम्दाया 

मिथ्या प्रप है] उस्र विषयमे कही गयी तुम्हारी इन 

कायरतापृणं वातोकी मे निन्दा करता दह|| १५॥ 

दारूणे च पिता पुत्रे नैव दारुणता जेत्‌ । 

पुत्राथें ह्यापदः कणठः पितरः प्राप्युवम्ति हि ॥ १६॥ 
“पुच रूर खभावक्रा हो जाय तो भी पिता उसके प्रति 

निष्डुर नदीं ह्ये सक्ता; क्योकि पुत्रेकि व्यि पितार्ओको 

कितनी ही कष्टदायिनी विपत्तिरयो स्चेखनी पड़ती ई ॥ १६ ॥ 

खादितो वसुदेवेन यदि पुजः शि्युस्तद्‌। । 

मन्यसे यदयकरव्यं तत्‌ पृच्छ पितरं खकम्‌ ॥ १७॥ 
ध्यदि वसुदेवने उस समय अपने शिष्य पुत्रको उसकी 

रक्षके च्यिदधिपादिया था तो यह कोई अनुचित कर्म 


नहीं क्रिया | यदि ठम इसे न करनेयोग्य बुरा कम मानते हो 
तो इस विमयमे अपने पितासे ही पृषो ॥ १७ ॥ 
गता वसुदेवं च यदुवंशं च निन्दता । 
त्वया यादवपुच्ाणां वरजं विपमर्जितम्‌ ॥ १८॥ 
ध्वसुदेवपर आक्षेप ओर याद्वकरुखकी निन्दा कस्के तुमने 
यह यादवक्रुमारोक वैरजनित विपक्ा ही उपार्जन किया है ॥ 
अक्घर्तव्यं यदि छतं वसुदेवेन पुचजम्‌ । 
किमर्थमु्रसेनेन रि्ुस्त्वं न विनाशितः ॥ १९॥ 
ध्य॒दि वदुदेवने अपने पुज्नफे प्राण वचयचाकर अनुचित 
कर्म किया है तो उग्रसेनने यौशवावस्थमि व्ह क्यो नदीं मार्‌ 
डाखथा॥ १९॥ 
पुत्नाञ्चौ नरकात्‌ पुत्रो यस्मात्‌ जाता पितृ स्तदा । 
तस्माद्‌ च्रवम्ति पुरेति पुं धर्मविदो जनाः ॥ २०॥ 
पुत्र पुत्‌ नामक नरक्से पितयेकी रक्षा करता है, इस- 
स्यि धर्मज्ञ पुरुप पुत्रको पुच वदते दै ॥ २० ॥ 
जात्यां हि यादवः कृष्णः स च संक्पणो युवा। 
त्वं चापि विधृतस्तःभ्यां जातवैरेण चेतसा ॥ २१ ॥ 
श्रीकृष्ण ओर नवयुवक संकर्मण भी यादवदहीदहैः श्रित 
तमने उनके उत्यन्न होते दी उनसे वैर वध छिया; फिर उन 
दोनो मनम वैरभावको खान देवर तुमसे शरुता योध ली 
दे (अतः इस वैरमावमे प्रथम अपराध वुम्हारा ही है)।।२१॥ 
उद्धूतानीह सवषां यदूनां हृदयानि वै। 
चखदेवे त्वयाऽक्षिप्ते वाद्ुदेवे च कोपिते ॥ २२॥ 
वुमन वसुदेवपर आक्षेप करिया ओर वसुदेवपुच श्रीक्कप्ण- 
के मने अपने पति क्रोध उखन्न कर दियाः इससे समस्त 
यादर्वोके दय यहो कम्पित हो उठे दै ॥ २२ ॥ 
कृष्णे च भवतो द्वेष्ये वसुदरेवविगर्हणात्‌ । 
दंसन्ति चेमानि भयं निमित्तान्यश्चुभानि ते ॥ २३॥ 
ध्यक तो श्रीकृप्णङ़े रति ठम्दारदेष था ही, दूसरे 
तमने चसुदेवकी भरपूर निन्दा भी कर डाली; इससे ये 
अद्यभसूचक अपरक्कन प्रकट होकर ठम्दारे च्वि भयक्री 
प्राति वतारे ह ॥ २३॥ 
सर्पणं दर्शनं तीव दुःखपराना निशाक्षये । 
~ श्ंसी (3 
पुय .वैधञ्यरशंसीनि ` कारणैर लुमीमदे ॥ २४॥ 
धनव रात समाप्त हो रदी होः उस समय सर्पो ओर सुर 
स्प्नोका दर्शन अव्यन्त कष्टदायक दोता है । ये जो चकरुन 
दिखायी देते है, वे इस नगरीकरे भावी वैधव्धकी "सूचना देनेवारे 
है । अव्रत जो कारण प्रात्र हुए दैः उने हमे रेषा दही 
अनमान दता दै ॥ २४ ॥ 
एप घोरो श्रदः खातीमुष्टिखन्‌ खे गभस्तिभिः। 
वक्रमङ्गारकश्चके चिघ्ायां घोरदर्शनः ॥ २५ ॥ 
प्यह्‌ भयेकर अह्‌ राहु आकाशम अपनी किरणोदारा 
स्वातिका वेध कररहादै' तथा भयानक दिखायो देनेवाला मंड 


सवंतोमद्रचक्रमे वक्री मून दोकर चित्रा नक्षत्रपर सितै ॥ 


योति =. `~ 
# ज्योततिषके अनुसार सवेतोभद्र नामक चरमे सृगदिरा कंसफा 
जन्मनक्षत्र हेः उनते दरम नक्षत्र चित्रा हैः जो उसका कनक - 


२८८ 


श्रीमष्ाभारते खिलभागे 


[ हरिवंशे 


बुधेन पश्चिमा संध्या व्याप्ता घोरेण तेजसा । 
वैश्वानरपथे द्युक्तो द्यतिचारं चचार ह ॥ २६॥ 
शवुधने भयानक तेजसे पश्चिम संध्याको व्याप्त कर रखा 
दै ( अर्थात्‌ वह पश्चिम दिवा उदित दो रदे ई एषा दोना 
राज्यभंगक्रा चूचक्र है ) तथा जुकरने वैश्वानरपथ (सूर्यमागं >) 
पर अतिचार गतिसे चलना आरम्भ कवा है ( सूर्यक्रो कघ- 
कर जाना ही अतिचार है ) ॥ २६ ॥ 
केतुना ॒धूमकरेतोस्तु नक्षत्राणि जयोद्दा 
भरण्यादीनि भिन्नानि नचयान्ति निशाकरम्‌ ॥ २७॥ 
धूमकेतु नामक उव्ात-गरहे पुच्छभागसे भरणी आदि 
तेरह नक्षत्र विद्ध हो गये है, दसच्यि ने चन्द्रमाका अनुसरण 
नीं करते ई ॥ २७॥ 
प्राक्संध्या परिघय्रस्ता भाभिवीधति भास्करम्‌ । 
भ्रतिखोमं च यान्त्येव भ्याहरम्तो सखुगद्धिजाः ॥ २८ ॥ 
पूर्वकाठ्की संध्या परिषते प्रस्त दै । वह अपनी प्रमार्ओ- 
द्वारा सू्यदेवकरो वाधा प्हुचाती है तथा पयु ओर पक्षी अपनी 
चोली बोरते हए प्रतिकूल दिद्ासे होकर जति द ॥ २८ ॥ 
हिवा इमशानान्निष्कस्य निःश्वासाद्भरवर्पिणी। 
उभे संध्ये पुरी घोर पर्यति वहु वाराती ॥ २९॥ 
ष्दोनौ सं्याओके समय एक भयानक गीदड़ी दमन्ान- 
भूमिते निकल्कर अपने निःद्वासते मद्धारङी वर्प करती ओर 
वहत बोखतो हुई मथुरायुरीके चसे ओर चकर लगाती ।२९। 
उठा निधौतनादेन पपात धरणीतले । 
चङ्त्यपर्वणि भदी गिरीणां शिखयणि च ॥ ३० ॥ 
“कुछ ही समय पहले वज्पातक्री-सी ध्वनिफे साथ प्रथ्वी- 
पर उस्कापात हुआ दै । यह पर्व तथा पर्वतो शिखर 
अकसमात्‌ केषने लगते दह ॥ ३० ॥ 
श्रस्तः खर्भायुना स्यो दिवा नक्तमज(यत । 
धूमोत्पातैर्दिशो व्यासाः शयष्काद्यनिसमादताः ॥ ३१ ॥ 
“अमी पिछले दिनों साहे सूर्यपर महण कणा दिया था, 
जिसे दिनम दी रात दो गगरी थी । धूम ओर उलातंसिसम्पू्ं 
दिद व्याप्त ह । सृलेमे दी विज्य गिस्ती ई ॥ ३२॥ 
प्रस्रवन्ति धना रक्तं सारानिस्तनयित्नवः। 
चलिता देवताः स्थानाद्‌ त्यजन्ति विहगा नगान्‌ ॥३२॥ 
“मेघ व्रिजखी ओर गड़गड़ाहरके साथ रक्तकी वर्षा करते 
दै। देवतार्थोकी प्रतिमा अपने खानसे हट जाती ई ओर पक्षी 
ृ्षोको त्याग देते दै ॥ ३२॥ 
यानि राजविनाराय दैवक्षाः कथयन्ति ह्‌ । 
तानि सर्वाणि पर्यामो निमिच्तान्यद्ुभानि बै ॥ २२३॥ 


ध्वयोतिप्रीटोग राजक विनाशक सूचना देनेवलि जो- 
जो अञ्युम निमित्त ( अपदान ) बताते दैः उन सरको दम 
लोग देख रदे ई ॥ ३३॥ 
त्वं चापि खजनद्धेषी राजघर्मपराङमुखः। 
१४ 
अनिमित्तागतोधः संनिकृप्रमयो ह्यसि ॥ ३४॥ 
तुम मी स्रजनेसि देष रखते होः राजधर्मे विमुख हो 
चक्रे हो ओर अकारण दी व्ह करोथ आ जाता है, इससे जान 
पड़ता दैः निकर-मविप्य्मे ही तुभ्दारे ऊपर भय आनेवाख है ॥ 
यस्त्वं देवोपमं वद्धं चसुदरेवं वसपमम्‌। ` ` 
मोहात्‌ क्षिपसि दुद कुतस्ते शान्तिरात्मनः ॥ ३५॥ 
'दूचुद्ध ! ठम जो दैवतार्मो तथा वचुर्भकरे समान तेनखी 
वृदे वसुदेवपर मोहवदय आघ्तेप करर्दे हो, इतसे दुम्हरि 
आहमाको शान्ति कैपे मिक सकती है ॥ ३५ ॥ 
व्वद्रते यो हि नः ्नेदस्तं त्यज्ञामोऽद् वै चयम्‌ । 
अहितं खस्य वंशस्य न त्वां क्षणसुपास्मे ॥ २६॥ 
ुम्दरि प्रति ज हमारा स्नेह रदा हैः उसे दमसखेग 
आज त्याग देते है । तुम अपने वंशका अदित करनेवले दो, 
अतः अव हम एक क्षण भी तुम्हे पास नदीं रैटेये॥ 
स हि दानपतिर्धन्यो यो दक्यति चने गतम्‌ । 
पुण्डरीकविदालाक्षं ङष्णमक्िकिरकारिणम्‌ ॥ २७ ॥ 
ववे दानपति अकर धन्य है जो आज वनम गये हए 
अनायास ही महान्‌ कम करनेवाले कमलनयन श्रीढप्णको 
अपनी अखंसि देखेगे ॥ ३७ ॥ 
छिन्नमूले दयं दंशो यदूनां त्वत्छृते छतः । 
छृष्णो क्षातीन्‌ समानाय्य स संधानं करिष्यति ॥ ३८ ॥ 
शुम्हरे कारण इस यदुवंदारी जड़ कट गयी है । अव 
श्रीकृष्ण ही आक्र समस्त ॒मार्द-बन्धुओको जय्येगे ओर 
उनमें मेड करयेगे ॥ ३८ ॥ 
क्षान्तमेव तवानेन वसुदेवेन धीमता - 
काटखम्यकपरिक्ञानो बूहि त्वं यदयदिक्छसि ॥ ३९ ॥ 
(इन वुद्धिमान्‌ वघुदेवने तो ठम्दारे अपराधको क्षमा ही 
कर दिया है ] काटने बुम्हारी विवेकदाक्ति न्ट कर दी, अतः 
ठम जो-जो चाद्यः वकते रद ॥ ३९ ॥ “ 
म्यं तु सेचते कंस चसुदेवसदायवान्‌ 1 
गच्छ ष्णस्य निरयं संधिस्तेन च रोचताम्‌ ॥४०॥ 
भकस { सुद्धे तो यदी अच्छा लगता हैः किं तुम वसुदरैव- 
को सायं ठेकर्‌ श्रीकृष्णे खानपर जाओ ओर उनके साथ 
संधि करना स्वीकार करोः | ४० ॥ 


इति श्रीमहाभारते लिलभागे हरिवंदो विष्णुपर्वणि अन्धकवचने त्रयोविंदोऽध्यायः ॥ २२ ॥ 
इस रकार श्रीमहाभारपके सिरूमाग हरिते भन्तरमत विशुप्मे अन्धका वचनवरिषयफ तेस अध्याय पूरा हुमा ॥ २३ ॥ 


~~~ -~--~- मा ााकम 
द 1 वहीं म्यक यट राः जो क्रूर यह माना गया दै, सित है । मंगर भी वक्रगतिसे वही आ गयां है । ध्न दोनोनि कर्मनकषनको व्या 
करके जन्भनकश्रको विद्ध कर दिया है 1 इ्सक। फल बताते हए भन्धक कडठे है---‹कंस तुम्दारा जीवित्त रहनेके व्यि जो भ्रयत्न ई, 


बह निष्फल होगा गौर वन्हारे देदका भी नाश श्ये जायगा । 


( नीरकण्टी ) 


१. स्यमण्ठल्मँ उगा इमा तिर उंडा परिष कदरता ६ । 


1 


विष्णुपर्व ] 


चतुर्विरो ऽभ्यायः 


२२८९, 


नन्वव 
चतुविंशोऽध्यायः 


केलीके अत्याचार ओर श्रीकृष्णदवारा उसका वध 


वैद्म्पायन उवाच 
अन्धकस्य वचः श्रुत्वा कंसः संरक्तरोचनः 
न किंचिदब्रवीत्‌ क्रोधाद्‌ विवेका स्वं निकेतनम्‌ ॥ १॥ 
वैदाम्पायनजी कते है--जनमेजय ! अन्धकदी 
घरति सुनकर कंसकी अखं रोधसे खट हो ग्रीं | वह उनसे 
कुक नदीं बोल ओर रोष्पूर्वैक उठकर अपने महरम 
चख गया | १ ॥ 
दे च सवं यथवेदम यादवाः श्ुतविस्तसाः 1 
जग्ुर्विगतसंकररपाः  कंसवैरृतशंसिनः ॥ २ ॥ 
किरि वे सव यादव, जो वर्होकी सारी वातं विस्तासपरव॑क 
सुन चुके थे, निराश होकर अपने-अपने धरको टीट गये । वे 
"मार्गमे -यह चर्चाकररहे करि कंसक्रा मस्तिष्क खरा 
हो गया ३ै॥२॥ 
अक्रूरोऽपि यथाऽ ऽक्षघ्तः ऊष्णदशंनलालसः। 
जगाम रथसुख्येन मनसा तुल्यगामिना ॥ ३ ॥ 
अन्रूफे मन्म भगवान्‌ श्रीकृप्णके दर्शनी लक्सा 
जाग उसी थीः अतःवे भी कंसकी आशक्चके अनुसार उठे 
ओर मने खमान सीप्रगामी श्रेष्ठ रथपर आरूढ हो 
वहसे चरु दिये ॥ ३ ॥ 
छष्णस्यापि निमित्तानि श्ुभान्यङ्गगतानिं वै । 
पिवतुस्येन शंसन्ति बान्धवेन समागमम्‌ ॥ ४ ॥ 
उधर श्रीकृप्णक्रो भी अपने अधम ही ङक एते इम 
, लक्षण दिखायी देते ये, जो पित्ता-जेते बरान्धवते भट हेनेकी 
स्त्वनादेरदेये॥]४॥ 
भ्रगिव च नरेन्द्रेण माथुरेणौग्रसेनिना। 
केशिनः प्रेषितो दूतो वधायेपिनद्रफारणात्‌ ॥ ५ ॥ 
, (अनरूसको भेजनेसे ) पे दी मथुराके राजा उग्रसेन- 
मार कंसे केशीफे पा दूत भेजा ओर कहल्यया कि 
तेम श्रीकप्णका वध कर डालो ॥ ५॥ 
स च दूतवचः श्ंत्वा केरी क्लेशको चणम्‌ । 
देन्दावनगतो गोपान्‌ वाधते स्म दुरासदः ॥ ६॥ 
॥ दूतकी बात सुनकर मलुर््योको क्ठेरा प्रदान करनेवात्म 
दनय दैत्य केशी इन्दावनमे जाकर गोपौको सताने ख्या ॥६॥ 
माुय मांसमश्चानः छृद्धो दुष्टपराक्रमः। 
गोन्तो वाजिदैत्योऽसावकरोत्‌ कदनं महत्‌ ॥ ७ ॥ 
केशी धोड़े स्पमे रनेवाल दुर्दान्त दैत्य था ओर 


मनुप्यका मांस खाता था | उस दु पराक्रमी असुखे कुपित 
होकर वहां महान्‌ संहार आरम्म कर दिया ॥ ७ ॥ 


` मन्हर 4. 


निघ्नन्‌ गा बै समोपाखान गवां पिरितभोजनः। 

दुर्मदः कामचारी च स फेशी निरवग्रहः ॥ ८ ॥ 
वह्‌ ग्वार्खोषहित गौर्ओोको मार डल्ता ओर गीर्ओंका 

मांस खाया करता था ¡ मदमत्त केशी खच्छन्द विचरमेवाखा 

ओर उच्छ्र था 1८ ॥ 

तदरण्यं दमदानामं नृणां मासखिमिद्ंतम्‌ 1 

यत्रास्ते स हि दुष्टात्मा केशी तुरगदानवः ॥ ९ ॥ 
अश्वरूपधारी दुष्टात्मा दानव केशी जदो रहता थाः बह 

चन मनुष्योकि मांस ओर दडियोसि व्याप्त टोक्रर इमरान- 

भूमिके समान प्रतीत होता था॥ ९॥ 


खुरैदौरयते भूमि वेगेनाख्जते द्रुमान्‌ । 
हेषितैः स्पर्दते वायुं प्ठुतैटेद्धयते नभः ॥ १०॥ 

वह ट्पौसे परथ्वीको विदीर्ण कर देता ओर वेगसे 
वृक्षक भी तोड़ डाक्ता था, हसिते "या हिनहिनाते समय 
प्रचण्ड वायुके कोलादरमे होड लगाता था ओर उछलकर 
आकारशको भी छध जाता था | १०॥ 


अतिप्रवृद्धो मत्तश्च दु्टोऽभ्बो वनगोचरः । 

आकम्पितसटो रौद्रः कंसस्य चरितायुगः ॥ ११॥ 
वह वनम विचरनेवाला दुष्ट अश्च ब्रहुत बड़ ओर 

मतवाल्य था। उसके अग्रा कुछ हिते रहते ये। वह, भयेकर 

दत्य कंसके चरितिका अनुसरण करनेवाला था ॥ ११ ॥ 

ईरिणं तद्‌ वनं स्वं तेनासीत्‌ पापकर्मणा । 

कृतं तुरगदैत्येन सवौन्‌ गोपा्चिधांसता ॥ १२॥ 
समस्त गोपोको मार डालनेकी ईच्छावाके उस पापाचारी 

अश्वरूपधारी दैत्यने वह सारा वन मनुप्यसि सूना 

करदियाथा॥ १२॥ 

तेन॒ दुटप्रचारेण दितं तद्‌ वनं महत्‌ । 

न चछभिर्गोधनैवापि सेन्यते वनवृ्तिभिः ॥ १२३॥ 
उस इुराचारीने वह विडार वन दूषित कर डाला था | 

वनसे ही जीवन निर्वाह करनेवठे मनुप्य ओर गोधनमी 

कभी उस वनका देवन नहीं करते थे ॥ १३ ॥ 

निःसम्पातः ऊतः पन्थार्तेन सतद्धिषयाधयः। 

मदाश्चयितदृत्तेन यमांसान्यश्चता भूदाम्‌ ॥ १४॥ 
मदके कारण बह सदाचारे भ्रष्ट हो चुका था ओरं 

अधिकतर मनुष्येकि ही मांस खाता था। उसक्रे निवास-सखानमे 

होकर जो राक्ता जाता था, उसे उसने अगम्य वना दिया था [१४५ 


दमु क करदः स कदाचिद्‌ धनागमे । 
अगाम घोषसंवासं चोदितः कारुघर्मणा ॥ १५॥ 


२९० 


श्रीमहाभारते सिलभागे 


[ हरक 


एक समय मनुष्येकि शब्दका अनुसरण करता हा 
केडी क्रोधमे भरकर बृन्दावने मतर गोरपोकी वस्तीमे गयाः 
उख समय उसुपर कारु स्वार था | १५ ॥ 
तं ष्ट दद्रुढगोपाः लियश्च शिखाभिः सह । 
क्रस्द्माना जगन्नाथं छृष्णं नाथमुपाधिताः ॥ १६॥ 
उसे देखते ही गोप ओर गोपड्धना् दिद्यर्योको साथ 
लेकर भागीं तथा करण करन्दन करती दुद जगतके रकरः 
अपने स्वामी श्रीक्गष्णकी दारणमे आ पर्हुचीं | १६ ॥ 
तालां रुदितदाब्देन गोपानां कन्दितेनं च । 
द्वाभयं तु ष्णो वै केशिनं सोऽभिदुद्धवे ॥ १७॥ 
गोपा्गना्भके रोदन गौर गोपक क्रन्दनते द्रवित होकर 
श्रीकृष्णने उन अभय कर दिया । फिर वे केशीपर द्र पडे ॥१७॥ 


केही चाण्युन्नतग्रीवः प्रकाशदशनेक्षणः 
हेषमाणो जयोदग्रेः गोविन्दाभिसुखरो ययौ ॥ १८॥ 


केशी भी अपनी गर्दन ऊपर उठयि हीसता टया वदे 
बेगसे श्रीकृष्णकी ओर चला । उस समय वह दोत दिखाता 
दुआ अखि फाड-फाडकर उनकी ओर देख रहा था ॥ १८॥ 


तमापतन्तं सम्पेक््य केहिनं दयदानवम्‌ 1 
प्रत्युजगाम गोविन्दस्तोयदः शिनं यथा ॥ १९॥ 
उस अश्वर्पधारी दानव केशीको अपनी ओर आति देख 
भगवान्‌ श्रीङृष्ण उसका सामना करनेके ल्ि अगे वदेः 
मानो श्याम मेव चन्द्रमाकी ओरजारहादहो॥ १९॥ 


केशिनस्तु तमभ्यान्ञे दष्ट कृप्णमरस्थितम्‌ । 
मवुष्यवुद्धपरो गोपाः कष्णमूचुर्दितेषिणः ॥ २०॥ 
श्रीकृष्णकरो केशीके निकट खडा हआ देख उनके पति 
मनुप्य-तुद्धि रखनेवाले हितैषी गोप उनसे इस पकार वोटे-1२०। 
कृष्ण तात न खल्वेय सहसरा ते दयाघमः। 
उपसर्या भवान्‌ वालः पापर्चैप दुखसद्‌ः ॥ २१॥ 
ध्तात श्रीकृप्ण ] त॒म सहसा इस नीच अश्वके पासन 
-चठे जाना; क्योकि ठम अमी वारक दौ ओर यह पापात्मा 
एक दुर्धषं दैत्य है ॥ २९ ॥ 
पथ कंसस्य सहजः प्राणस्तात वहिश्चरः। 
उसमश्च हयेन्द्राणां दएनवोऽप्रतिमो युधि ॥ २२॥ 
प्तात | यह कंसका वादर बिचसनेवाटा सहज प्राण ह 
बहे-वदे अव्वरा्जमि उत्तम है । युद्धम इस दानवकी समानता 
करनेवादय कोई नहीं दे | २२ ॥ 
आसनः सर्वभूतानां तुरगाणां महावलः 
अवध्यः ` सर्वभूतानां परथमः पापकर्मणाम्‌ ॥ २३॥ 
प्समस्त प्राणियंकि त्रात देनेवाला यह देध्य बो 
सत्ते अधिक वल्बान्‌ दै | सम्पूणं भूमने क्रिसीके च्वि मी वह्‌ 


वध्य नहीं है । पापाचारियोमि यह सव्रते अग्रगण्य हैः ॥ २३॥ 
गोपानां तद्‌ वचः श्रुत्वा वदतां मधुखदनः 
केदिना स्ट युद्धाय मवि चक्रे रिसि्टनः ॥ २४॥ 
उपर्युक्त बाते कहनेवटे गोरपोका वह - कथन्‌ सुनकर 
यात्रुसूदन भगवान्‌ मधुसूदने केणीके साथ युद्धके लि 
विचार करिया ॥ २५॥ 
ततः सव्यं दक्षिणं च मण्डलं स परिश्चमन्‌ । 
पद्भ्यासुभाभ्यां स हयः क्रोधेनारुजते द्रुमान्‌ ॥ २५॥ 
तदनन्तर बह अद्व दारयँ-वारे चक्कर कार्ता हुं अपने 
दोनो पैसे क्रोधपूर्वक बृक्नोको तोडने च्या ॥ २५॥ 
मुखे खस्बसटे चास्य स्कन्धे केशाधनादृते 1 
वलयोऽश्रतसङ्काभाः खसः करोचजं जलम्‌ ॥ २६॥ 
उस्र रवे अयाल्वले मुख ओर धने केशि ठक हुए 
कंथेपर जो मेर्घोकी लहरकरे समान वलि्यो ( चमक सिकरुढनेसे 
चनी हई रेखार्ए ) यी, वे क्रोधजनित जल ( पसीना ) खकाने 
लगीं | २६॥ 
स फेनं वकत्रजं चैव ववर्ष रजसादृतम्‌ । 
हिमकटे यथा व्योभ्नि नीहारमिव चन्द्रमाः ॥ २७॥ 
वह अपने मुखतसे पैदा दए. धूलमिभ्रित फेनक्री वपरौ 
करने छ्गा ! मानो हेमन्त ऋ चन्रमा आकारर्मे कुदासा 
गिरारदा दो 1 २७ ॥ 
गोविन्दमरविन्दाक्षं देपितोद्वारशप्किरेः। 
सख पेनेर्वस्जनिर्गर्णिः पोक्षयामास भारत ॥ २८॥ 
भरतनन्दन } उसने अपने हीसनेके साथ निकटे हुए 
जल्करणो तया मुखे गिते हुए केनोद्धारा कमख्नयन 
श्रीक्प्णकरो नहला दिया ॥ २८ ॥ 
खुरोद्धूतावसिक्तेन मधुकक्षोदपाण्डुनः 1 
रजसा स दयः कृष्णं चकारारुणमूर्ध॑जम्‌ ॥ २९॥ 
अपनी यपोते उठकर कैरी हई धूर्ते, जो मुलेठीके 
चूणकी मोति कुछ-कुक पीठे रगकी थी, उस घोडेने ध्रीकृष्ण- 
के मस्तकके वालको कुर खल-सा कर दिया } २९ ॥ 
प्टुतवद्गितपादस्तु तक्षमाणो धतं खुरैः 
दन्तान्‌ निर्दशमानस्तु केडी कष्णसुपाद्ववत्‌ ॥ २०॥ 
` केशीके वैर वहो उखल-कूद मचा रहे थे । वह॒ अपनी 
यपत प्रथ्वीको खोदता ओर दो्तको पीसता हआ श्रीकप्णकी 
ओर दौड़ा ॥ ३० ॥ 
स संखक्तस्तु रष्णेन केश्ची तुरगसचमः 
पू्ौभ्यां चरणाभ्यां चै रृष्णं वक्षस्यताडयत्‌ ॥ २१ ॥ 
जय्यो श्रेष्ट केरी श्रीङृष्णके साथ उलन गवा । उमे 


विष्णुपवं ] 


चतुर्विशोऽध्यायः 


२९१ 


=-= 


अपने दोनी. आगेवाले वरेति उनकी छत्तीमे प्रहार 
किया॥ ३१ ॥ 
पुनः पुनः स च बही प्राहिणोद्‌ पाद्वतः खुरान्‌ । 
कृष्णस्य . दानवो घोरं प्रहारममितोजसः ॥३२॥ 
उस बलवान्‌. दानेवने अगल्-बगर्से भी वारंवार अपनी 
खाप चल्ययी ओर अमित तेजी श्रीकृप्णपर पोर परदार 
क्रिया| ३२॥ । 
चक्रेण चास्य घोरेण ती््णदरायुधेन चै ! 
अदशद्‌ बाहुश्चिखरं छृष्णस्य रुपित्तो टयः ॥ ३२ ॥ 
तीखी दाद्‌ दही जिसका आयुध थीः उस्र भयानक 
मुखे द्वारा रोप्रमे मरे हुए उस घोढेने श्रीकरप्णकी भुजके 
अग्रभागकरो दोति गड़ाकर घायल कर दिया ॥ ३३ ॥ 
स टम्वकेसरसटः छष्णेन सह सङ्गतः । 
,र्णज केशी मेधेन संसक्तः ख दरवां्युमान्‌ ॥ ३७ ॥ 
लवे-ख्वे अयाक्ते सुशोभित केरी श्रीङ्प्णके साथ 
जूह्यता हआ उसी तरह दोभा पाने लगा, जसे आकाशम 
अयमाटी सूर्य मेषकरे साथ उलन्न गये हौ ॥ ३४ ॥ 
उरस्तस्योरसा हन्तुमियेष वरवान्‌ हयः। 
वेगेन वासुदेवस्य क्रोधाद्‌ दविशुणविक्रमः ॥ २५ ॥ 
उस बलवान्‌ धोदेका पराक्रम उसके क्रोधके कारण दूना 
वद गया था} उसने श्रीङृष्णकी छतीपर अपनी छतीसे 
वेगपू्वक चोट परहुचानेका विचार किया ॥ ३५ ॥ 
तस्योन्सिकतस्य वलवान्‌ छृष्णो एप्यमितविक्रमः । 
बाहुमाभोगिनं ईत्वा सुखे करुद्धः समादधत्‌ ॥ ३६ ॥ 
तव्र॒ अमित पराक्रमी वख्वान्‌ श्रीकृप्णने भी कुपित 
दोकर उस घंमडी देत्यकरे मुखम अपनी एक तोहिको बहुत 
बड़ी करके डाल दिया] ३६ ॥ 
सतं बदुमराक्तो वै खादितुं भेत्तुमेव च । 
दशनेमूखनिमुकैः सफेनं रुधिरं वमन्‌ ॥ ३७॥ 
वह उनकी उस रबोहिको अपने दोस चवनि या विदीर्ण 
करनेमे समर्थं न हो सका, उलटे उसे दत ही जङ़से उखड 
गये; साथ ष्टी वह मुखसे फेनसहित रक्त वमन करने स्मा ॥ 
विपारिताभ्यामोष्ठाभ्यां कराभ्यां बिदलीरूतः। 
अक्षिणी विवृते चक्रे विते सुक्तवन्धने ॥ २८॥ 
उसके ओर ओर गलूफर फटकर दो दलम विभक्त हो 
गये । स्नायुवन्धनके दील हो जनेसे केशीकी अखि फटकर्‌ 
बाहर निकर आर्य 1 ३८ ॥ 
निरस्तदलुराविष्टः शोणिताक्त विरोचनः । 
उत्कणों नषटचेतास्तु स॒ केरी बहचेष्टत ॥ २९॥ 


उसके होखोका निवस भाग फटकर निक्ष गया । उकं 


वहते आविष्ट हनेफे कारण उसके टे हुए दोनो नेत्रौसे स्त 
बहुन लगा । उसे कान भी उखद्कर गिर पड़ तथा चेतना 
नष्ट हौ गयी । उस अबस्थामि केरी वार्रार छटपटनि ल्गा ॥ 
उत्पतन्नसकृत्पदैः शाङृन्मूत्नं समुत्खजन्‌ \ 
खिश्नङ्गरोमा श्रान्तस्तु निर्यलचरणोऽभवत्‌ ॥ ४० ॥ 
वह वासवा वैरोको उचछछाल्ने ओर मलमूत्र छोडने 
खगा 1 उसका एक-एक अङ्ग ओर रोम-रोम खिन्न हो उटा था। 
अन्तमने वह थक गया ओर उस वैर निद्ेष्ट दो गये ॥४०॥ 
केदिवकश्नविलग्नस्तु = कष्णवादुरदणेभत 1 
व्याुञ्च इव धममौन्ते चन्दराधकिरणेधनः ॥ ४९ ॥ 
केके सुखम लगी हई श्रीकृष्णकी वह रवो उसके 
मखमण्डले आधी अविष्टित-सी होकर वर्षाकार्मे आधे 
चन्दरमाकी किरणोसि रिरे हुए वादके समान गोमा 
पाती थी ॥ ४१॥ 
केशी च ₹रृष्णसंसक्तः शान्तगात्रो व्यरोचत 1 
भ्रभातावनतश्चन्द्रः श्रान्तो मेरमिवाधितः ॥ ४२॥ 
्रीक्ृष्णसे से हुए केशीका शरीर शान्त हो गया था । 
उस समय वह उसी तरह ओभा पां रदा थाः जेते प्रभात- 
कल्म अस्ताचल्के दिखरपर पर्हुचा हुआ चन्द्रमा थकरकर 
मेरुका आश्रय ठेनेपर सुशोभित होता है ॥ ४२ ॥ 
तस्य ईष्णुजोद्धूताः केशिनो दशना सुखात्‌ 
पेतुः शरदिं निस्तोयाः सिताश्रावयवा इव ॥ ४३ ॥ 
श्ीक्ृप्णकी ुजासे टकराकर केशीके सारे दत मुखसे 
बाहर गिर पड़े ! वे एेते प्रतीत होते थे मानो यारदृत्र्के 
जल्ूल्य श्वेत बादलोके डके वरिखरे दए दौ ॥ ४३ ॥ 
सतु केशी शरदं शान्तः कष्णेन्धिष्टकर्मण। 1 
खञ्जं खायतं छृत्व्रा पारितो चलवत्‌ तदा ॥ ४४॥ 
जव्र केशी भरीर्मोति शान्त दो गया, तव अनायास दी 
महान्‌ कमं करनेवाले श्रीक्ृप्णने अपनी र्वोह्को वहत बड़ी 
करके उस दैत्यके शरीरको वल्पूर्वैक वीचसे चीर डल।।४४॥ 
स पाटितो भुजेनाजो रष्णेन विरूताननः। 
केहि नदन्महानाष्रं दानवो व्यथितस्तदा ॥ ४५ ॥ 
उस युद्धस्थर्मं श्रीकृण्णकी युजाद्रास फाडे गये केशीका 
सुख विकराल हो उखा । वह दानव व्यथित दोकर्‌ बडे जोर- 
जोरसे भआत॑नाद करने लगा | ४५ ॥ 
विधूणेमानस्त्रस्ताङ्गो सुखाद्‌ रुधिरमुद्धमन्‌ । 
शशं भ्यङ्गीरुतवपुर्निरुत्तद्धं दवाचखः ॥ ४६॥ 
उसके सरे अङ्ग िथिरु दौ ग्ये थे ] वह्‌ चक्कर कायता 
इजा शहर खून उगल रहा था । उसका शरीर कर्द अञ्गोते 


हीन हो चुका था } षह एेसा दिखायी देता थाः मानो किसी 
पर्षतको बीचसे चीर डाला गया ह ॥ ५६ ॥ 


२९२ 


व्यादितास्यो मदारौद्रः सोऽसुरः रष्णबाहुना । 
निपपात यथा रत्तो नागो हि दिद्खीकूतः ॥ ४७॥ 
श्रीङृप्णकरी भुजासे जिसका मह फट गया याः वह दो 
मागि त्रेय भा मदामयद्कर अमुर दौ दकर्रमि कटे हुए 
हाथीके समान ए्वीपर गिर पदा | ४७ ॥ 
वाहुना ङत्तदेहस्य केशिनो रूपमाचभौ । 
पशोरिव महाघोरं निदतस्य पिनाकिना ॥ ४८॥ 
श्रीकष्णकी सुजासे कटे हुए दारीरवि केकीका सूप 
पिनाकपाणि भगवान्‌. स्द्रद्वारा मरे गये पञ्च ( महिषासुर )के 
समान अस्यन्तं भयंकर प्रतीत टता था ॥ ४८ ॥ 
दिपादपृष्ठपुच्छद्धं श्रवणेकक्षिनासिके। 
केरिनस्तद्विधाभुते दवे चार्धं रेजतुः क्षितौ ॥ ४९॥ 
(केशीके शरीरके वे दोर्नो खण्ड दो पोव, आधी पीटः 
आधी पूछ तया एकनएक कान, अख ओर नासिकार्रसे 
युक्त दो प्रथ्वीपर पडे-पडे (अनुपम ) शोभा पा रदे २।४९॥ 
केशिदन्तक्षतस्यापि छृष्णस्य श्युद्युमे अजः । 
चृद्धः सार वारण्ये गजेन््दश्नाह्कितः ॥ ५०॥ 
केशीके दोति-घायल हुई श्रीकृष्णकी वद वोद एेसी 
सुरोभित शो रदी थी, मानो वने यजसजकरे दोतके आपात- 
चि्ठसे अङ्कित कोद बहुत बड़ा याख्का वृक्ष दो ॥ ५० ॥ 
तं हत्वा केशिनं युद्धे कपयित्वा च भागशः। 
कृष्णः पश्चपल दाक्षो हसंस्तव्रैव तस्थिवान्‌ ॥ ५९ ॥ 
इस प्रकार युदधर्भ केशीको मारकर उसके शरीरके टुकडे- 
कदे करके कमलनयन श्रीकृष्ण वीं हसते हुए खडे रदे॥ 
तं हतं केदिनं दष्टा गोपा गोपसियस्तथा । 
यभूवुसुदिताः सवे दतविघ्ा गतङ्कमाः ॥ ५२॥ 
उस केदीको मारा गया देख गोप ओर गोपाङ्गना बहुत 
प्रसन्न हु । सवके विष्न नष्ट हो गये; कष्ट दूर हे गये॥५२्‌॥ 
दामोदरं तु श्रीमन्तं यथास्थानं यथावयः । 
अभ्यनन्दन्‌ प्रियैवीत्यैः पूजयन्तः पुनः पुनः ॥ ५६ ॥ 
स्यान ओर अवस्थे अनुसार समी गोप वारेधार श्रीमान्‌ 
दामोदरका पूजन करते हुए प्रिय वचर्नौदारा उनका अभिनन्दन 
करने स्मो ॥ ५२ ॥ 
गोण उचुः 
अष्छो तात कतं फर्म हतोऽयं टोककण्टकः। 
दैत्यः क्षितिचरः ष्ण हयरूपं समास्थितः ॥ ५४ ॥ 
गोप योढे-तात | तमने अद्भुत कर्म करिया ह | यद 
समस जगतुके चयि कंटकसरूप दैत्य आज तुग्रे हासे मारा 


गया | श्रीकृष्ण ! यह एत भूतल्पर घोडेका रूप धारण करे 
निष्वरता था | ५४ ॥ 


भीमरहाभारते सिखभागे 


[ हस्वे 


च + 


फ़तं घुन्दाचनं क्षेमं सेव्यं चश्गपक्चिणाम्‌ । 

घ्नता पापमिमं तात केरिनं हयदानवम्‌ः॥ ५५॥ 
तात | इस अश्वरूपधारी पापी दानव केदीकाः वध कफे 

ठमने इन्दावनको मलुर््यो तथा पञ्ु-पक्षि्यकि चि सेन्य ओर 

क्ेमकारकर यना दिया ॥ ५५ ॥ 


हता ने चदवो गोपा गावो चत्तेषु वत्सखाः । 

नैके चान्ये जनपदा तानेन दुखत्मना ॥ ५६॥ 
दस दुरात्मने हमारे ब्रहत-ते गोप मार डले ये । वौ 

पर वात्सल्य रखनेवाली व्रहुत-सी गोर्थोका मी वध कर दन्य 

या; इसके चिवा भौर भी क्रितने दी जनपद्‌ इसके दार्थो 

नष्ट दो चक्रे थे ॥ ५६ ॥ 


पप संवत॑कं कतुमुयतः खसु पापरृत्‌ । 
सखोकं निन॑रं रत्वा चर्तुंकामो यथासुखम्‌ ॥ ५७ ॥ 
यह पापाचारी दानव निश्चय ही संसारका प्रलय करनेक 
चयि उद्यत हुआ या। मनुष्य-टोकको मनुप्येति सूना करे 
यरा सुलपू्ंक विचरनेकी च्छा रखता था ॥ ५७ ॥ 
नैतस्य भ्रमुखे स्थातुं कश्चिच्छको जिजीविषुः । 
यपि देवसमृहेषु किं पुनः पृथिवीते ॥ ५८॥ 
जीवित रटनेकी इच्छवाद्य कों मी पुर इसफ़े सामने 
खडा नरी हो सक्ता था देवताओंक्रे समृहर्मेसे मी कोई 
इसका सामना नदीं कर सकता या; फिर भूतल-निवा्ियोकी 
तोवातदीक्याटै१॥५८॥ ` 
वैद्यम्पायन उव। 
अथाहान्त्हितो विप्रो नारदः खगमो सुनिः। 
प्रीतोऽसि विष्णो देवेदया रुष्ण रृप्णेति चा्रवीत्‌ ५९ 
वैदाम्ायनजी कते ह--जनमेजय ! तदनन्तर 
आकाशचारी मुनि विप्रवर नारदजी आकादरमे अदस्य भावे 
खड़े दो बोठे--ष्देवेश्वर विष्णो ! कृष्ण ! कृष्ण |} म आपः 
पर ब्रहुत प्रसन्न हू | ५९ ॥ 
नारद्‌ उवाच 
यदिदं दुष्करं कम॑ रतं केरिलिधांसया । 
त्वय्येव केवलं युक्तं भिदिवे च्थम्बक्रस्य चा ॥ ६०॥ 
नारदजी फिर योले-प्भो ! आपने केशीको मार 
डाल्नेकी इच्छक जो यह दुष्कर कमं करिया दै, यदह केवल 
आपके ही योग्य या अयवा देवटोक्मे केवर चिने्रधारी 
सद्र द्यी ेता पराक्रम कर सकते थे ॥ ६० 1 ~ - 
अदं - युद्धोत्खकस्तात त्वद्रतेनन्तरात्मना । 
दृद नर्यं युद्धं द्रष्टुं स्वगौदिष्टागतः ॥ ६१॥ 
तात ! मेँ युद्ध देखनेको सदा षट उक्छुक रता हू । अतः 
अपी अन्तरात्माते न्नापका ही चिन्तन करता हभ यद 


विष्णुपर्व ] - 


-चदर्विशोऽध्याथः 


२९३ 


ध ५ 
व्व 


मनुष्य ओरःजश्वका संम देखनेके च्वि खर्गलोकसे य्ह 
अया थाः) ६१॥ ५ 


पृतनानिधनादीनि कमणि - तव दष्टवान्‌ । 
अहं त्वमेन गोविन्द्‌ कर्मणां परितोषितः ॥ देर ॥ 
गोविन्द ! आपके पूतनाधः आदि, कर्मक मी मँ 
देख चुका हू] किंत इस केदीके वधल्प कमसे मुस्े विरोष 
संतोष हुमा है ॥ ६२ ॥ | 
हयादस्मानमहेन्द्रोऽपि विभेति चङ्सूदनः 1 
कुवोणाश्च वपुधोरं केशिनो दुष्टचेतसः ॥ ६३ ॥ 
भयानक्र रूप धारण करनेवाले दस दुरात्मा अश्च केश्लीसे 
बलसूदन देधरान इन्द्र मी इसत थे ॥ ६३ ॥ 


यत्वया पाटितो देहो भुजेनायतपर्ेणा ! 
पषोऽस्य सूत्युरन्ताय विदितो विश्वयोनिना ॥ ६४ ॥ 
आपने अपनी हिक एक्‌ भागको वडा करके उसके 
दवारा जो इसके दारीरको फाड़ डाल दै, विश्वयोनि बद्या्जीनि 
इसकी ग्यक च्ि रेखा ही विधान बनाया या ॥ ६४ ॥ 


यमात्‌ त्वया दतः केशी वस्मान्मच्छासनं श्टणु । 
केटावो नाम नाम्ना तवं ख्यातो खोके भविष्यसि ॥६५॥ 
अव जाप मेरा यह अचुश्ाषन स॒नें--आपने केका 
वध क्रिया हे, इसव्ि संसारे “केशवः नामसे विख्यात देमि 
खस्त्यस्तु भवतो छोके साधु याम्यहमाद्युगः । 
छृत्यदरोषं च ते कार्य शक्तस्त्वमसि मा चिरम्‌ ॥ ६६ ॥ 
जगतूम आप्रा ( या आपसे जगत्क्रा ) कल्याण हो | 
आपको साघुवाद देकरं मै शीघ्र चलाजाता हू | अव जो (कंस- 
वध आदि ) इत्य दोप रह गये है उन्दे आपको पूर्णं करना 


, दहै। आप इसमे समर्थ, अतः गध कर ड्य; विर्म्नन 
हने दे} ६६॥ 


त्वयि कायौन्तरगते नरा व दिवौकसः! 
विडम्बयन्तः क्रीडन्ति छीलां त्वद्ररमाधिताः ॥ ६७ ॥ 

जव आप भूमारहरण आदि अन्य काके चि यर 
{ अवतार केनेके ध्य ) चले अति दैः तत्र आपके ही वलकरा 
आश्रय छेनेवछे देवता भी मनुप्यौकी भोति आपकी टीखकरा 
अनुकरण (अभिनय )करते हए ( नाटक आदि ) खरे ।६७। 
अभ्याशे वर्तते कारो भारतस्याहवोवघेः ! . 
हस्तप्रातानि युनि राक्षां लिदिवगामिनाम्‌ ॥ ६८ ॥ 

समृद्रतेस्य महाभास्तयुद्धका समय अव बहुत निकर 
हे! मकर सवर्गमे जनेवले राजा्ओक्रे च्ि युद्धके अवसर 
हाथमे. य गये ह 1.६८ 1 


पन्थानः शोधिता व्योच्चि बिमानःरोहणोर््वगाः 1 
अवकारा। विभज्यन्ते शाक्रकोके महीक्षिताम्‌ ॥ ६९ ॥ 


विमानेकि आरहणक्रे स्यि आकारामे ओ ऊर्वगामी 
मार्ग ह, उनका शोधन 'कर्‌ दिया गया है ( दकरावटे दूर कर 
दी सवी ह) । इन््रलेकरम अनेवाटे राजा्ओके' च्य परथक- 
पृथक अवकाश ( निवास-स्ान ) वनयि लते ई ॥ ६९ ॥ 
उग्रसेनखुते शन्ते पदस्थे त्वयि केशव । 
अभितस्तन्महद्‌ युद्धं भविष्यति महीक्षिताम्‌ ॥ ७० ॥ 
केदाव { उभ्रसेनकरुमार कंसके मारे जनेपर जत्र जप 
यादरवेक्रि संरक्षणकरे रूपमे मख्य पदपर प्रतिष्ठित होगे; तव 
सव ओर सजाओंका वह महान्‌ युद्ध आरम्भ हौ जायमा}७०) 
त्वां चप्रतिमकर्माणं संश्रयिष्यन्ति पाण्डवाः । 
सेद्कारे नरन्द्रणाः पक्षद्रषहो भविष्यसि ॥ ७१॥ 
आपके कर्म॑ ( या पराक्रम ) की कहीं वुख्ना नदीं हैः 
अतः पाण्डवलोग आपकी दी शरण खगे! राजामि मेदके 
अवसरपर जव युद्ध उपस्थित होगा; उसे समय आप 
पण्डवोका दी पक्ष खगे ॥ ७१॥ 
त्वयि राजासखनस्थे हि राजश्चियमयुत्तमाम्‌ ! 
शुभां त्यक्ष्यन्ति राजानस्त्वत््मभावान्न संशयः ॥ ७२॥ 
जव आप राजासनपर वै्ेगेः तव आपके प्रभावसे यजा 
लोम॒ अपनी उत्तम एवं शभ राज्यटक्ष्मीको त्याग देगेः 
इसमे संशय मही है ॥ ७२ ॥ 
एष मे र्ण संदेशः श्रुतिभिः स्यातिमेभ्यति। 
देवतानां दिविस्थानां जगतश्च जगत्पते ॥ ७३ ॥ 
` जगदीश्वर श्रीकृष्ण [ यह मेया तथा खर्गवासी देवताओंका 
संदेश दैः जो शरतियोदयारा गृ रूपसे प्रतिपादित है 1‰ अव 
यह जगतूमै भी विद्यात ह्ये जायगा ॥ ७३.॥ 
ष्टं मे भवतः कम ॒दष्श्यासि मया प्रभो ! 
कंसे भूयः समेष्यामि साधिते साधु यास्यहम्‌ ॥ ७४ ॥ 


# उन संदेशतिपादक श्ुतियेमिंसे एक , युति, जो 
महाभारतयुद्धपर प्रकाञ्च डालती दै? शस प्रकार ईै--“४अदश्च छृष्ण- 
मदसजुनं च विवर्तेते रजसी वेधाभिः ¦ यैश्रानये जायमानो म 
राजावातिर्ञ्योतिपाश्निस्तमांसि” अर्थात्‌ एक युदधयश्का सम्बन्ध 
श्रीङ्ृष्णसे, है ओर दूसरे युदधयश्चका अजुनसे । उन दोनोनि एक साथ 
होकर जव कायं किया, तव उनके द्वारा दो युद-यश् सम्पादित हए ! 
वे दोनो युद्यक्न रमोगुणी ये; र्योकरि प्राप्य पकक सम्पत्तिको 
निमित्त बनाकर करिये गये ये । वै्ानर अथाद ध्म संसारम जन 
यहण करके ( श्रीकृष्ण ओर्‌ अ्युनकी सहायतासे ) निश्चय ष्ट 
राजा हमा । उस्ने अकाशमान मध्िकी सहायत्ासे भसुतोका 
अन्धकार्‌ तिरोहित कर दिया धा ( अर्यात्‌ धर्मराजे खाण्डव-दाहके 
समय अक्षिके दिये इए चन्र ओर गाण्डोवकी सष्टायतासे श्ी्प्ण 
ओर भजुनके पराक्रमदारा असुररोका विध्वंस कराया । (नीरूकण्ठीसे ) 


२९४ 


, भ्रमो! मैने आपका पराक्रम देखा, यायक मी दर्शन 
किया | साधुवाद {अव्र प जाता हः कसक मारे जनेपर 
मै फिर आपतते मिद्रूगा ॥ ७४॥ 


पवमुक्त्वातु सर तदा नारदः खं जगाम ह। 
नारदस्य वचः श्रुत्वा देवसंगीतयोनिनः ॥ ७५॥ 
तथेति स समाभाष्य पुन्गोपान्‌ समासदत्‌ । 


श्रीमहाभारते चिरभागे 


. { दिवश 


गोपाः कृष्णं समासाय विविद्यु्ंजमेव ह ॥ ७६ ॥ 

रसा कहकर नारद जी तत्करा आकररा्मे चटे गये । 
देवसङ्खीतफ़े उव्यत्तिखान नारदजीका पूर्वोक्त वचन बुनकर 
श्रक्रप्णम (तथास्तु" ककर उनकी वात मान खी, फिरवै 
गोपि मिटे । गोपमण श्रीकृष्णसे मिरकर उनके साथदही 
पुनः वरजम प्रविष्ट हुए ॥ ७५-७६ ॥ 


इति श्रीमहाभारते विनाम हरिवते विष्णुपर्वगि केदिवधे चतुर्विोऽध्यायः ॥ २४ ॥ 
दस भ्रकार श्रीमहाभारते दिग्माग हरिके भन्तगत विष्णुपरमे केीका वधतरिषयक चौर्वीसत्रा अध्याय पूय हुमा॥ २४ ॥ 


पर्चविरोऽध्यायः | 
अक्रूरका वरजम आकर भगवान्‌ श्रीकृष्णको देखना ओर उनके व्रिपयमे अनेक प्रकरारकी घाते सोचना 


वैशम्पायन उवाच 

अथार्तं गच्छति तद्रा मन्दरदमौ दिवाकरे । 
संष्यारक्ततले भ्योन्नि शशाङ्के पाण्डुमण्डडे॥ २॥ 
नीडस्थेचु विहद्धेषु सत्छु प्रादुष्छतािषु । 
देषत्तमःसंदरताख दिश्चु सर्वासु सक्शः॥ २ ॥ 
घोपबालिषु सुत्तेषु वारान्तीपु शिबासु च। 
नकतचरेणु देप पिरितादानकाष्धिथु ॥ २ ॥ 
शक्रगोपाहयामोद्रे प्रदोपेऽभ्यासतस्करे । 
संध्यामयीमिव गुर्दां सम्पतिष्ठे दिवाकरे ॥ ४॥ 
अधिश्रयणवेखायां प्रात्तायां गृहमेधिनाम्‌ । 
वन्यर्ेखानसैर्मन्यमाने हुताशने ॥ ५ ॥ 
उपावृत्ताखु वै गोयु दुह्यमानासु च वजे। 
असखरृदृव्यादरन्तीणु बद्धवत्सा धेषु ॥ £ ॥ 
प्रकीर्णदामनीकेषु गास्तथैवाहयत्छु च । 
सनिनदेषु गोपेषु काल्यमनि च गोधने ॥ ७ ॥ 
करीपेषु प्रकटे दीप्यमनेघु सर्व॑शः। 
काछमारनतस्कन्धरगोविरभ्यागतैस्तथा ॥ ८॥ 
किचिदभ्युदयते सोमे मन्द्रद्मौ विराजति । 
ईंषदूविगाहमानायां रजन्यां दिवसे गते ॥ ९ ॥ 
प्राप्ते दिनव्युपरमे भघृत्ते क्षणदासुखे । 
भास्करे तेजसि गते सौम्ये तेजस्युपस्थिते ॥ १० ॥ 
अग्निहोत्राकुले काठे सौम्येन्दौ समुपस्थिते । 
अग्नीषोमात्मके संधौ वर्तमाने जगन्मये ॥ ११॥ 
पथ्िमेनागनिदीपेन पू्वेणोन्पर्वचंसा । 
दग्याद्विसरदो व्योच्चि #िचित्तारागणाङुङे ॥ १२॥ 
घयोभिर्बासमुशषतां चन्धुभिश्च समागमम्‌ । 
शंसद्धिः स्यन्दनेनाद्यु पराक्षे द्नपतिर््व॑जम्‌ ॥ १२३ ॥ 

वैशम्पायनजी कदते है--जनमेजय ! उस दिन जवर 
सू्ैदेव अस्ताचक्को जाने च्परो, उनक्री किरणै मन्द द्यो 
गयी, पश्चिमके आकारमे संध्याकी खली छा गयी, चन्द्रमाका 


दवेत-पीत मण्डल उदित टोने लगा; प्री अपने नीर 
( षोर्लो ) मे विश्राम क्रनेल्ो; शरे या्चिकंनि जवर 
अग्नि प्रज्वलति कर दी सम्ृणं दिदर्प सव्र ओसते ज्र 
कुछ-कुछ अन्धकारे आद्रत दो गर्यीः वजवसी सोनेकी 
तैयारी करने लगे, गीददर्यो बोल्ने लगी, मांसाहासकी 
अमिलाप्रा रखनेवल निदयाचर द्धम भर गये धूपे तपे हु 
इन्द्रगोप नामक कीड़को आनन्द देनेवाल ओर वेदक 
साध्यायको वंद॒करनेवात् प्रदोपकाल जव्र॒ अआ पर्चा 
जवर सूर्यदेव सं्यारूपिणी गुफामे प्रविष्ट हौ गये, जव 
गृदस्योके ल्यि दवनीय घृत या॒दुग्धक्रो आगपर रखनेकी 
बरखा आ पर्ची, वनवासी वैखानस ८ वानप्रस्य ) जव 
मन्वरद्वाय अग्निम आहूति देने स्मो, जव गौर वनते सीट- 
कर वरजम आ गर्यीं ओर उनका दूध दुह ल्या गयाः 
जिने वच्ेर्वेधेये ओर जोखयंभी लग्र रस्तर्ोमि 
आब्द थीः वे धेनु जव वास्वार रभाने समी, गौर्ओको 
बुखते दए गोपगण जव सब्र ओर कोल्यहल करने रगे; 
जवर वोधनेके च्यि गौओंको ककर ठे जाया जाने लगा, 
काष्ठके भारसे छके हृष्ट कोवा गोप जव घर आकर 
सव्र योर पले हुए सूपे गोवरफे चूको सखर्गाने या 
प्रज्वल्ति करने र्गेः र्रंचित्‌ उदित हूए चन्द्रदेव जव 
अपनी मन्द क्रिरणेसे ही प्रकारित हो रहेथेः दिन चे 
जानेपर थोड़ी-सी ही र॑तका आगमन हुआ थाः दिनकर 
पूणं समाति दक्र रात्िकरे प्रथम प्रहरका अमी आरम्भ 
ही हया थाः सूर्यका उष्ण प्रकारा अस्त होकर चन्द्रमाका 
शीतल प्रकार उपसित हुआ थाः जिस समय अग्नि 
होत्रकी सुगन्धि सव ओर व्याप्त हो रदी थीः स्वभावतः 
सौम्य चन्द्रदेव उदित हुए, जव सम्पूर्णं जगतमे अम्नीषो- 
मात्मक संधिकरा समय वर्तमान था, जवर पिमे अग्निके 
समान संध्याकरालका अरुण प्रकाश फेला या तथा पूर्व 
भी लट कमलके समान कान्तिवारे चन््रमाक्गी कुङ्कम- 


विष्णुपर्व, ] 


पञ्च्विक्षोऽघ्यायः 


२९५ 


~ - 


नेष्ठी प्रभाकैटी हृदं थी ओर उन दोनो दि्ाओक्र 
अरुण प्रकारसे जवर आकाश उमयपादवते दग्ध हुए 
पर्वतके समान धतीत दो र्दा था ओर उसमे कुकु 
तरे प्रकटो गये येः एसे समयमे घर टीरनेकी इच्छावले 
पथिर्कोको बन्धुओसि समागम दोनेक्री सूचना-सी देनेवाठे 
पक्षर्योके साय-साय दानपति अकर अपने रथकरे दवारा दीघ 
ही मजे आ पर्हुचे ॥ १-१३॥ 
प्रविदान्नेव पप्रच्छ सांनिध्यं केरावस्य सः। 
रौहिणेयस्य चाकरसे नन्दगोपस्य चासङृत्‌ ॥ १४॥ 
तरम प्रवेश करते दी अक्रूर वहि लोगेसि बारवार 
श्रीकृस्णः रोरिणीनन्दन वर्राम तथा नन्दगोपका निवास- 
स्यान पने खगे ॥ १४॥ 
स नन्दगोपस्य ग्ट घासाय विधुधोपमः। 
अवतीयं ततो यानात्‌ प्रविवेदा महावलः ॥ १५॥ 
ततश्वात्‌ देवोपम कान्तिसे युक्त मदावरटी अक्रूर उस 
रथसे उतरकर निवास्के ल्ि नन्दमोपके घरमे प्रविष्ट 
हुए ॥ १५ ॥ 
हरपपूर्णेन वक्त्रेण साश्चुनेतरेण चैव दि। 
प्रविशन्नेव च द्वारि ददश्षीदोहने गवाम्‌ ॥ १६॥ 
वत्समध्ये स्थितं रृण्णं सवत्समिव गोचृपम्‌। 

उस समय उनके मुखपर पूर्णं हषं छा रहा थ, नेति 
प्रेमे ओम्‌ वह रदे ये, नन्दके दवारपर पदार्षण करते ही 
उन्दनि देखा, गौओके टुहनेके स्थानम श्रीकृष्ण वहुत-से 
बछडुकरे ब्रीचमे खडे हँ । वे रेते जान पड़ते थे, मानो व 
सष्टित सड लड़ा दो ॥ १६१ ॥ 

स तं ह्षपरीतेन वचसा गद्वदेन वै॥ ९७॥ 
पहि केशवे ततिति पव्थाहरत धर्मवित्‌ 

उन्द देखते दी धर्मज्ञ अन्रूह हर्प॑भरी गद्रद॒वाणीदवारा 
योले--तात केशव ! यँ आथो { ॥ ९७३ ॥ 
उत्तानशायिनं दष्ट पुनरखटरा धिया इतम्‌ ॥ १८॥ 
अव्यकतयोवनं र्प्णमकरूरः प्रशंस ह । 

(कुछ ही वपं पदे ) जिन शैशवावस्थामे उत्तान 
सोते देखा-सुना थाः उन्दींश्रीक्ृप्णको पुनः अनुपम रोमासे 
सम्पन्न अव्यक्त योवन-अवसामे देखकर अक्रूर उनकी भूरि- 
भूरि प्रशंसा के रगे} १८४ ॥ 
अयं स पुण्डरीकाक्षः खिदशादुंखविक्रमः। 
सम्पूणेजलमेधाभः पवेतप्रवराछृतिः ॥ १९.॥ 

ये ष्टी वे सिंह ओर व्याघके समान पराक्रमी कमलनयन 
भीष्ण दिखायी देते, जिनकी अद्धकान्ति जल्ते भरे हुए 
जल्धरकी भानि द्वाम दै ओर गरीरकी ऊनां शरेष्ठ पर्व॑त 
समानं प्रतीत हेती है ॥ १९ ॥ 


सूधेष्वधर्षणीयेन सथ्चीवत्सेन चश्चसा। 
्विपतनिधनदक्चाभ्यां भुजाभ्यां साघु भूषितः ॥ २०॥ 
इनका श्रीवत्सविभूप्ित वक्षःखल युद्धम अजेय दै ओर 
भुजा शनुर्थोका संहार करम कुशल ई । इन ॒युना्ओं 
तथा वक्षःखलसे इनके श्रीविपरद्की वदी शोमा दोरदी दै ॥ 
मूर्निमान्‌ स रहस्यात्म जगतो ऽग्रयस्य भाजनम्‌ । 
गोपवेषघरो विप्णुरुद्रप्यतनूरुह्ः ॥२९॥ 
ये ही वे मूर्तिमान्‌, रहस्यात्म ( उपनिषदो प्रतिपादित 
पुरुषोत्तम ) टै, जो इस संसारकी अग्रपूजा पानेकरे प्रथम 
अधिक्रारी ह । वे भगवान्‌ विष्णु ही यँ गोपेश धारण करके 
प्रकट हुए दै । इनकी रोमावलि ऊपरकी ओर उठी हुई ओर 
परम पवि हे (अर्थात्‌ यह प्रेमी मर्तोको देखते ही रोमाशचित 
हो उरते द) ॥ २१॥ 
किसीटखाञ्छनेनापि कशिरसा छन्वचंसा । 
कुण्डलोत्तमयोग्याभ्यां धरवणाभ्यां विभूषितः ॥ २२॥ 
जिसपर क्रिरीर धारण करमेका चिह है तथा जर्हो चता- 
कार कान्ति प्रकारित हो रदी है, उस मस्तकसे ओर उत्तम 
कुण्डल पहनने योग्य दोनो कानोसे ये विभूषित दो रे ई ॥ 
हारर्हेण च पीतेन खविस्तीर्णेन वक्षसा। 
द्वाभ्यां भुजाभ्यां वृत्ताभ्यां दीघौभ्यामुपकषोभितः॥२२॥ 
हार पटनने योग्य ऊँची ओर चौड खछातीसे तथा गोल- 
कार दो विशाल सुजाअषि इनकी बड़ी गोभा द्यो रदी है ॥ 
स्रीषहखरोपचर्येण वपुषा मन्मथाधिना } 
पीते वसानो वसने सोऽयं विष्णुः सनातनः ॥ २४ ॥ 
इनका श्रीविग्रह उस यौवन ओर पौगण्ड अवसाकी 
संधिमे पर्हुचा हमा है, जहा कामदेवको आश्रय मिलता है । 
यह विग्रह सदो छियोंद्यारा परिचर्या प्राप्त करने योग्य रै, 
से दिव्य शरीरपर दो पीत-वल्न धारणक्यिये वे ही सनातन 
विष्णु यर्दा विराजमान दै ॥ २४ ॥ 
घरण्या्रयभूताभ्यां चरणाभ्यामरिदमः। 
रेरोक्याक्रान्तिभूताभ्यां भुषि पद्भ्यां व्यवस्थितः ॥ 
जो पृरथ्यीफे आश्रयमूत ई तथा तीनो लोकोको आक्रान्त 
करनेमे समथ है, दे संचरणगील युगल चरणेसि यह शवु- 
दमन श्रीङ्ृप्ण इस भूमिपर खडे ह ॥ २५॥ 
रुचिसाय्रकसश्चास्य चक्राद्धित इधेश्चते। 
द्वितीय उद्यतश्चापि गदासंयोगमिच्छति ॥ २६॥ 
इनका एक दायः जिक्षका अग्रभाग वहूत ही चन्द्र दै, 
चक्रे चिद्ित-सा दिखायी देता दै । दूख्प उठा हुमा दाय 
गदासे संयुक्त दोना चाहता दै ॥ २६ ॥ 
अवतीणां भवेद प्रथमं पुदरमात्मनः। 
श्षोभतेऽय्य भुवि श्ेषएटखिददयानां धुरधरः ॥ २७ ॥ 


२९६ 


श्रीमहाभारते सिकभागे 


[ हरिवंरो 


ये दी परतरह्य परमात्माके प्रथम पदं ८ तुरीय ब्रह्म ) दै, 
जो यरय जगते कस्याणके च्य भवतीरणं हुए द । देवतार्ओ- 
की र्षाका भार वहन करनेवाठे वे सर्वश्रेष्ठ परमेश्वर आज 
भूत्प्र अवतीर्णं होकर शोमा पति ई ॥ २७ ॥ 
अयं भविष्ये कथितो भविष्यङ्कशकैर्नरेः। 
गोपो यादवं वंशं क्षीणं विस्तारयिष्यति ॥ २८ ॥ 
इर्दीके विपये भविप्यकी बातत वताम कुश मनुष्योनि 
कहा है करि गोपाल श्रीकृष्ण भविष्यमे क्षीण हृष यादववंडका 
विस्तार करेगे ॥ २८ ॥ 
तेजसा यादवाश्चास्य हातशोऽथ सदखश्ः। 
चंशमापूरयिप्यन्ति दोधा इव महार्णवम्‌ ॥ २९ ॥ 
जैषे नदिय ब्रहुत-से जल्प्रवाद महासागरकरो पूणं करते 
रहते हैः उसी प्रकार सैकड़ों ओर हजारो यदुवंशी इनके 
प्रमावते अपने वंरकी बद्ध करगे ॥ २९॥ 
अस्येद्‌ शासने सर्व जगत्‌ स्थास्यति द्ाश्वतम्‌ । 
निहतामित्रसामन्तं स्फीतं कतयुगे तथा ॥ ३० ॥ 
यह्‌ सासा जगत्‌; जो सनातनकराख्वे चख आ रहा हैः 
इनके शासनम खित दोगा । उस समय इसको कष्ट देनेवाले 
श्रु ओर सामन्त नष्ट हो जर्येगे ओर यह विद्व सत्ययुगकी 
मति सुख-शान्ति एवं खमृद्धिसे सम्पन्न दो जायगा ॥ ३० ॥ 
अयमास्थाय वसुधां स्थापयिता जगद्‌ वदो । 
„ राक्षां भविष्यत्युपरि न च राजा भविष्यति ॥ ३९१॥ 
ये इतत वसुधापर रहकर जगत्‌को अपने वदाम स्थापित 
करे समस्त राजा्करि उपर प्रतिष्टित हौ जर्वेगे, परं 
खयं राजा नदीं वनगे ॥ ३१ ॥ 
नुनं निभिः क्रमर्जित्वा यथानेन पुः रुतः 
पुरा . पुरंदये राजा देवतानां भिविष्पे ॥ ३२॥ 
तथेव वसुधां भित्वा जितपूर्वा निभिः कमेः । 
स्थापयिष्यति राजानसु्रसेनं न संशयः ॥ ३२॥ 
निश्वय ही पूर्वकाले निस प्रकार इन्दोनि अपने तीन 
पर्गोद्यारा त्रिलेकीको जीतकर खरग पुरन्दर इन्द्रको देवता- 
अका राजा बनाया था, उसी प्रकार पहटेकी तीन पर्गोद्याय 
जीती हुई इस वसुधाको फिर जीतकर यद उग्रसेनको राजाके 
आलनपर्‌ बैठा्येगेः इसमे संशय नदीं है ॥ २२-३३ ॥ 


भख्वैरगाघोऽयं परदनैश्च वहुभिः श्रुतः । 
ब्राह्मणेत्रह्यवदेश्च पुराणोऽयं हिं मीयते ॥ ३४॥ 

यह्‌ फैले हट वैरा अन्त करनेवाले द, प्रश्नोपनिषद 
ब्रहूत-पे ( छः ) प्रद्नोद्वारा इन्दीकरि तच्वका प्रतिपादन सुना 
गया दै | ब्रह्मवादी ब्राहमणेदरारा ये पुराण-पुरष कदे जाते 
दै॥ ३४॥ 


स्पृहणीयो हि छोकस्य भविष्यति च केदावः। 

तथा ह्यस्योत्थिता बुद्धिमौचुष्यमुपजीवितुम्‌ ॥ २५ ॥ 
यह भगवान्‌ केव समस्त जगत्‌के यि स्प्रहणीय दहेगिः 

क्योकि इनकी बुद्धिम मानवताको नया जीवन देनेका विचार 

उठ खड़ा हु ॥ ३५॥ 


अदं त्वस्याद्य वसति पूजयिष्ये यथाविधि । 
विष्णुत्वं मनसा चैव पूजयिष्यामि मन्बवस्‌ ॥ ३६॥ 
आन मँ इनफ निवास्यानका विपिपूर्वक पूनन कर्हँगाः, 
फिर मन-दी-मन इनके विण्णुरूपकी भावना करे मन्त्रोच्चा- 
रणूर्वक उसकी अर्चना कर्गा ॥ ३६ ॥ 
यच्च ॒क्षातिपरिक्षानं श्रदुरभावश्च वै चषु। -- 
अमायुपं वेद्वि चेनं ये चान्ये दिव्यचश्चुषः ॥ ३७॥ 
इनमे जो अपने वन्धु-वान्धरववोको पहचाननेकी शक्ति है 
ओर जो इनका मनुष्यों अवतार हुभा है वह सव मेरे च्ि 
आद्रणीय दै । मेँ तो इन्द अमानव ८ अहोक्रिक परमात्मा ) 
समन्ता ही हूः दूसरे दिव्य नेत्रधारी महापुख्प भी इर रेता द्यी 
मानते द ॥ ३७ ॥ 
सोऽदं कृष्णेन वैँ रौ सम्मन्ञ्य विदितात्मना । 
सष्टानेन गमिष्यामि सवज यदि मंस्यते ॥ ३८॥ 
अतः मँ इन आत्मवेत्ता श्रीज्प्णकरे खय रात््मे मली्ोति 
सलाह करे यदि वरजवासियोँसदित ये मेरी चात मान ठेगे 
तो इनके साथ दी कर मथुराकी यात्रा करगा ॥ ३८ ॥ 
पं वष्ुविधं छृष्णं दृष्टा दत्वर्थकारणैः । 
विवेश नन्दगोपस्य छष्णेन -सह संसदम्‌ ॥ ३९॥ 
इस प्रकार युक्तियुक्त कारय-कारणका विचार करते हुए 
अक्रूरे शरीकृष्णको वारंवार देखा ओर उनके साय नन्दगोप- 
कौ बैठक प्रवेश किया ॥ ३९ ॥ 


इति श्रीमहाभारते लिकमागे हरिवंयो विप्णुपव॑णि अककूरागमने पच्विसोऽध्यायः ॥ २५ ॥ 


दस प्रकार श्रीमहाभ.सतके छि रुभाग इरिवंदके भन्तेत विष्णुपवमे अकरूरका आगमनव्रिवयक पच्चीसर्वे{ अध्याय पूरा हज! ॥ २५ ॥ 
---+--9+*- + -~ 


१. माण्डूक्य उपनिषदे गवी मात्रा्मोपर विचार करते हष ब्रहमकरे चार पाद वताये गये --विश्व, तैजसः आश ओर तुरीय । 
श्नमे तरोय साक्षात्‌ पूणं पर््चक्रा गोधफ़ द । उत्पत्ति-करभरसे गणना करनेपर यह तरीय दी प्रथम पदे हो कना है। इमरील्यि यहीं 


प्रथम पदका अथ॑ तुरीय ब्रह क्या गयाईै। 


~~ 
„~ 


विसय. ] 


वड्विेऽध्यायः 


२९७ 


पटविंरोऽध्यायः - 
अक्रूरका गोपकि शियि कंसका आदेश्च सुनाना ओर वसुदेव-देवकीकी दयनीय दशा वताकर 
श्रीकृ्ण-बलरामको मधुरा चरनेके सिपि ्ेरित करना, माम अग्रुरको यघुनाजीके जम 
आधर्यमय नागलोक एवं भगवान्‌ अनन्त तथा उनकी गोदरम शरीकृष्णका दर्शन 


वैशम्पायन उवाच 
स नन्दगोपस्य गृ प्रविष्टः सहकेशवः 
गोपदृद्धान्‌ समानीय प्रोवाचामितदक्षिणः ॥ १ ॥ 
छृष्णं चैवाचवीत्‌ प्रीत्या सौहिणेयेन सङ्गतम्‌ । 
श्वः पुरीं मथुरां तात गमिष्यामः सुखाय वै ॥ २ ॥ 
वे्शस्पायनजी कहते है--जनमेजय ! श्रीकृष्णके 
साथ नन्दफे ग्रहे प्रवेश करफे अनन्त दान-दस्चिणा देनेवाठे 
अक्रूरे बडे-बूदे गेोपोको बुलवाया ओर उनसे तथा वल्राम- 
सदित श्रीकृप्णसे प्रसनतपूर्वक यौ कदा-+तात ¡ कल सवैर 
हमोग मथुरापुरीको चरेगे। वरहो चरकर तम सुखी होओगे॥ 
यास्यन्ति च वजाः सवं गोपाखाः सपरिग्रदाः। 
कसाक्षया समुचितं करमादाय वापिकम्‌ ॥ ३ ॥ 
(समसत मजवासी गोप कंसकरी आज्ञासे समुचित वार्षिक 
कर लेकर सपरिवार वह चलेगे ॥ ३ ॥ 
सशृद्धस्तश्र कंसस्य भविष्यति धलु्महः। 
तं द्वक्यथ सखद्धं च सखजनैश्च समेष्यथ ॥ ४ ॥ 
"वहां कंसका धनुर्यज्ञ वदी धूस-धामसे सम्पन्न होमा | 
उस समृद्धिशाली यको ठमरोग देखोगे ओर खजनोसे भी 
मिेये ॥ ४ ॥ 
पितरं वछुदेवं च सततं दुःखभाजनम्‌ । 
दीनं पुत्रवधध्रान्तं युवामय समेष्यथः ॥ ५ ॥ 
धुम दोनो माई पुरब वधते अत्यन्त दीन दुर्बल होकर 
सदा दुःख ही मोगनेवारे अपने पिता वसुदेवजीसे वहौँ मिलेगे॥ 
सततं पील्यमानं च कंसेनाद्युभवुद्धिना 1 
दशान्ते शोषितं द्धं दुःखैः शिथिकतां गतम्‌ ॥ ६ ॥ 
“अशुभ बुद्धिवाठे कंषने उन्दं सदा ही पीड़ा दी है | इस 
बद्पिमे उनके शरौरका रक्त-मांस सूख गया ह । वृदे सुदेव 
अनेक प्रकारके दुःखि मी बहुत रिथिल ह गे है ॥ ६ ॥ 
कखस्य भयसंघरतं भवद्ध्वां च विना रतम्‌ । 
वह्यमानं दिवा रात्रौ सोत्कण्ठेनान्तरामना ॥ ७ ॥ 
ध्यक तो कंसका भय उन्दं अतङ्कित चये रहता हैः 
सरे चम दोनोति वे विदु गये दै; अतः तुम्हारे छथि 
उक्कण्ठितचित्त शोकर दिनरात चिन्ताकी आगे जलते 
रहते ह ॥ ७॥ 
तां च दुक्यसि गोषिन्द्‌ पुेरसरदितस्तनीम्‌ । 
देषां देवसंकाशं सीदन्ती विष्टतप्रभाम्‌ ॥ ८ ॥ 


पुज्रशोकेन शुष्यन्तीं स्वदर्शनपरायणाम्‌ 
वियोगदोकसंतक्तां धिवत्सामिव सौरभीम्‌ ॥ ९ ॥ 
“गोविन्द | तुम वहा चकर अपनी माता देवक्रीका भी 
दर्शाने करोगे, जिसके सनेसि उसके पुर्ननि कभी रमह नक्ष 
रगाया दै । वह देविर्यो-जैसी नारी स समय प्रभादीन होकर 
दुःख भोग रहय दै । च्रे दर्शनकी आशा लि पुत्रशोक्रसे 
सूखती जा रदी है । तिना व्देकी गायके समान वह पुत्र- 
वियोयके रोके संतप्त रहती है ॥ ८-९ ॥ 
उपप्ुतेक्षणां दीनां नित्यं मलिनवाससम्‌ । ' 
खभौलुवदनरस्तां शशाङ्कस्य पभामिव ॥ १०॥ 
(उस दुखियाके नेर््मिं निरन्तर ओष भरे रहते द। 
उसके वख मेरे हो गये ह । वह रुके मुखम पदी हृ 
चन्द्रमाक्री प्रभक्रे समान जान पड़ती है ॥ १० ॥ 
त्वदशनपरं नित्यं तवागमनकाङक्षिणीम्‌ । 
त्वत्मृत्तेन शोकेन सीदन्ती वै तपखिनीम्‌॥ ११॥ 
८्उसे सदा यदी चिन्ता रहती है कि कब तुम्हारा दर्शन 
होगा । बह प्रतिदिन ठम्हारे ञमागमनकी अमिलपषा रखती 
है । बह तपखिनी नारी तुम्हारे सोते रिथिल ह गयी हे ॥ 
त्वत््रलपिष्वङ्कशकां स्वया बाल्ये वियोनिताम्‌। 
अरूपक्ना तच विभो वक्स्यास्येन्दुव्चसः ॥ १२॥ 
शरभो { वाल्यावसाम ही वह्‌ तुमसे मिहयुद गयी, अतः 
उम्हयरी मीठी-मीठी बर्तर्मि क्या रख दैः इसको समश्नेकी 
चरता उसमे नदीं आ स्की है । वह ठम्डारे रूपक नहीं 
जानती, चनद्रमाकरे समान कान्तिमान्‌ इत मुखे दर्शने मी 
वञ्चित रह गयी है ॥ १२॥ 
यदि त्वां जनयित्वा सा देवकी तत त्यते । 
अपत्याथां जु कस्तस्था घरं शेवानपत्यता ॥ १३॥ 
श्तात | यदि तुमह जन्म देकर देवकी इतना संताप सह 
रीदे तो उसे संतानका म्या फल मितम ! इर्ते तो उसका 
संतानहीन होना दी अच्छा था | ९३ ॥ 
अपु्राणां हि नारीणामेकः शोको विधीयते । 
सपुश्रा त्वफले पुरे धिकप्रजतिन तप्यते ॥ १४॥ 
“जिन नारिोके पुघ नहीं दुभा है, उन्हे एक षी शोक 
रता दै; परंतु जो युवती होकर भी पुत्रका फल न पा 
सके, वह उस धिक्षार पानेके योग्य संतानसे सदा ष्टी संतत 
होती रती है ॥ १४॥ 


२९८ 


॥ श्रीमहाभारते सिरभागे 


[ हिवि 


त्वं त शक्रसमः पुत्रो यस्यास्त्वत्सदशो युणेः। 
परेप्रामणप्यवयदो न सा शोचितुमर्हति ॥ १५॥ 
भिक वम्ारे समान गुणवान्‌ ईन्द्रव॒स्य तेजघ्वी 
तया दूसर्तेको मी अभयदान देनेवाद्य पुत्र दो, उख माताको 
शोक्रकी भागिनी न्दी दोना चदय ॥ १५ ॥ 
चृद्धौ तवाग्चापितसौ परशरत्यत्यमागतौ । 
भत्सितो त्वत्कृते नित्यं कंसेनाद्युभवुद्धिना ॥ १६॥ 
भ्मैया | तुम्दरि वद्र माता-पिता दूसरेके दसभावको 
प्रप्र यो गये द 1 पापृरणं विचार रखनेवाला कंस उन परति- 
दिन वुश्ारे कारण डरता-फटकारता रहता है ॥ १६ ॥ 
यदि ते देवकी मान्या पृथिक्रीवात्सधारिणी। 
तां गोकसचिठेि मच्चामुत्तारयितुमर्दसि ॥ ९७॥ 
(तुम्हारे शरीरो अपने गर्भे धारण करनेवाली माता 
देवकी यदि टोक्रधारिणी प्रथ्वीकरे समान माननीय षे तो 
तुमने जेते प्रथ्वीका जक्ते उद्धार क्रिया था; उसी प्रकार 
योक-खागरफे जल्प द्ग्री हुई उ8 देवक्रीका मी ठम्दं उद्धार 
करना चाद्ये ॥ ४७॥ 
तंच बद्धं प्रियसुतं चखुदरेवं सुखोचितम्‌ 1 
पुच्रयोगेन संवोज्य रूप्ण॒ध्ममवाप्स्यसि ॥ १८॥ 
'श्रीकःण { जिन्हे अपने पुत्र ब्रहुत ही प्रिय ईैतथाजो 
सुख भोगनेके योग्य है, उन बुरे वसुदेवको पुतर-सयोगका 
सुख देकर तुम धर्मक भागी दोभोगे ॥ १८ ॥ 
यथा नागः खुदुद्ं्तो दभिवो य्ुनाहदे । 
विमूः स इतः शलो यथः वै भूघरस्त्वया ॥ १९॥ 
दुर्पोत्सिक्तश्च वट्वानरिटि विनिपातितः 
परध्राणदरः केरी दुश्रसमा च दयो इतः ॥ २०॥ 
पतेनेव प्रयत्नेन बृद्धादधुस्य दु खितो। 
यथा घर्ममवाप्चोपि तत्‌ छृप्ण परिचिन्त्यताम्‌ ॥ २९1 
शश्रीक्रप्ण ! जेते तुमने यमुनके कुण्डम रनेवाले उस 
दुराचारी नागका दमन क्रियाः जसे गोवर्धन पवतक्रो जसे 
उखा दिया; जिस प्रकरार बरल्वान्‌ एवं मदमत्त अरिष्टासुरको 
मार गिराया तथा जिस तरह दृसरोके प्राण छेनेवाले अश्वरूप- 
धारी दु्त्मा केशीका वध करियाः वे दी प्रयल्के दवारा 
उन दुखी एवं शद्ध माताःपिताका उद्धार के त्रम जैसे भी 
धर्मके भागी दो को, उस उपायको रोचो ॥ १९-२१ ॥ 
निर्भ॑त्स्यमानो येः पिताते कंखसंखदि । 
ते सर्वे चक्ररश्रूणि नेै्ु.खान्विता भूश्तम्‌ ॥ २२॥ 
ध्जिन ऊोगेनि कंकर सभाम वुम्हरि पितापर खोट पडती 
देखी यी, वे उव-के-सव्र अच्यन्त दुखी करर नेत्रंति 
ओवि. वहने कगे थे ॥ २२॥ 


गभौवकर्तनादीनि दुःखानि सुवहृन्यपि । 
माता ते देवकी कृष्ण कंसस्य सष्टतेऽवश्चा ॥ २२॥ 
(कृपण | तुम्हायै माता देवकी विवर्र दहौकर कंकर द्वारा 
दिये गये गर्मोच्छेद आदि बेदुत-से दुःख सदती चटी आ 
रही ट ॥ २३॥ 
मातापिदभ्यां सर्वेण जातेन तनयेन वे। 
ऋणं वै प्रतिक्र्तन्यं यथायोगसु्राहतम्‌ ॥ २४ ॥ 
ध्माता-पितासे उन्न हए सभी पूरको यथाग्रोग्य सेवा 
करके उनके श्रृ्णोको उतार देना चादिये, यद शाकी 
आश्ञा है ॥ २४॥ 
पवं ते कुर्वतः ष्ण मातापिन्रोरयुधहम्‌ । 
परित्यजेतां तौ शोकं स्याष्च धर्मस्तवानघ ॥ २५॥ 
भ्निष्याप श्रीकृष्ण { यदि इव प्रकार दमने माता-परितापर 
अनुग्रह कियातोवे दोनो अपने वीते हुए शोकको र्याग 
दैगे ओर हम्ह धर्मकी प्राति दोगीः ॥ २५॥ 
वैश्यम्पायन उवाच 
छष्णः सुषिदिताथां वे तमादामितविक्रमम्‌ 1 
वाढमित्येद तेजस्वी न च क्रोधवन्षं गतः ॥ २६॥ 
वैराम्पायनजी कहते है--जनमेजय ! इन सव्र वार्तो- 
क्रो अच्छी तरद जान लेनेपर तेजी श्रीकृप्णने अमित 
पराक्रमी अक्रूरे कदा -ध्वहुत अच्छा { मलोग आपके साय 
चलो । वे क्रोधकर वशीभूत नहीं हए ॥ २६॥ 
ते च गोपाः समागम्य नन्दगोपपुरःससः। 
अक्रूर्वचनं श्रुत्वा चेटः कंसस्य शासनात्‌ ॥ २७ ॥ 
नन्द आदि सभी गोप वरदो एकत्र हो अक्रूरजीक्री वरात 
सुनकर कं्षकी आज्ञासे मथुरा चल्नेको उयत हो गये ॥२७]॥ 
गमनाय च ते सजा वभूवु॑जवासिनः। 
सम्जं चोपायनं छृत्वा गोपन्रद्धाः प्रतस्थिरे ॥ २८॥ 
वे ्रजवासी गोप यात्रकि व्यि सुसञित हो गये! भेटकी 
सामग्रीको सजाकर व्रडे-वृदे गोप वदेति प्रित दए ॥२८॥ 
कर चानडुहः सर्पिमैदिपाश्चीपनायिकान्‌ । 
यथासारं यथायूथमुपानीय पयो दधि ॥ २९॥ 
तं सज्ञयित्वा कंसस्य करर चोपायनानि च 1 
ते सवै गोपपतयो गमनायोपतस्थिरे ॥ २० ॥ 
वार्पिक करः गादीका बोक्च ढोनेवलटे त्रे मरः धीः 
दुध ओर दी आदि उपहार-सामभ्रर्योको अपनी-अपनी शक्ति 
ओर युके अनुसार लेकर एकन करिया; फिर कंसकी उस 
उपायन-सामग्री ओर वार्षिक करको छकढेमे सजाकर वे सभी 
गोप सरदार यात्रा करने ल्ि नन्दके दारपर उपचित हुए ॥ 
अक्रूरस्य कथाभिश्च सह रष्णेन जाग्रतः । 
रैरिणेयवतीयस्य सा निदा भ्यत्यवर्तद ॥ ३२ ॥ 


विष्णुपर्व 1 


वडविदोऽण्यायः 


२९९. 


न= 


ध्रीटृप्णक्रे साथ व्रातचीत करनेमे अक्रूकी वहं सारी 
राति जागते ्ी ग्रीती । उनके साथ तीसरे व्यक्ति रेदिणीनन्दन 
रटसमजी ये ॥ ३१॥ 
ततः प्रभाते विमले पक्षिग्याहारसंुठे । 
नैश्ाकरे रदिपिजाठे क्षणदाक्षयसंदहते ॥ २२॥ 
नभम्यरुणक्षस्ती्णं पर्थ॑स्ते च्योतिषां गणे) 
्रत्यूघपवनासारेः क्लेद्विते धरणीतले ॥ २३ ॥ 
क्षीणाकारासु तायु सुत्तनिष्प्रतिभाष्ु च । 
नैशमन्तदंघे रूपसुद्रच्छति दिवाकरे ॥ ३४॥ 

तदनन्तर पक्षिरयोके कलस्वेपि व्याक्त निर्मल प्रभातकाल 
उपसित दुभा । रात्रिकी समातिके साथ ही चन्द्रदेवने अपने 
क्रिरण-जाटको समेट दिया । अकराशमे अरणोद्यकी खटी ख 
गयी । नन्नर्चोका समुद्राय अस्त दो गया । प्रतःकाल्की 
यायुकरे साथ भिरे हुए ओसकरणेति प्रष्वी गीरी-सी दौ गयी । 
ताकि छ्षीण हो गयीं । वे सोयी हूर्की भोति अपनी प्रभा 
खो बैट | सूर्योदय दोनेके साय ही निदयाका रूप अदृश्य 
हो गया ॥ ३२-३४॥ 
शीतांशुः शान्तकिरणो निष्प्रभः समपद्यत । 
पको नाशयते रूपमेको वर्धयते वपुः ॥ ६५॥ 

सीतरद्विम चन्द्रमाकी किरणे शन्त हो जनेके कारण वे 
प्रादीन हो गये । एकर ( चन्द्रमा ) अपने सूपको अद्दय 
कर्ने लमा ओर्‌ दूसरा ( मूयं ) अपने तेजको बरद्नि लगा ॥ 


गोभिश्च सखमक्रीर्णीसु वचजनिर््णभूमिषु । 
मन्यनाव्तपूरणषु ग्गरेयु नदल्छु च ॥ ३६॥ 
दामभिद॑म्यमनिषु चत्सेु तरुणेषु च। 
गोपेसपूर्यमाणासु धोपरथ्यारु सवशः ॥ ३७ ॥ 
तदैव गुरुकं भाण्डं शकटायोपितं वहु । 
त्वरिताः पृष्ठतः रत्वा जग्मुः स्यन्दनवाहनाः ॥ ३८ ॥ 
व्रजते ब्राहुर जनके मागे्री भृमिपर गौर्ण् सव्र ओर 
फेल गयीं । मयानी शुमानेसे ददीके भरे मटर्कोमि घर-घर 
ध्वनि होने छगी । नौजवान ग्रे रस्सियोमे वोधक्रर सधये 
जाने लगे । त्रजकी गिरयो सव्र ओसे गोपोदाया भर गयी 
भी | रेते समयमे छकदेपर रखे गमे ददटी-दूधङे भारी-भारी 
भाण्डको पीठे करफे गाड़ी देकिनेवके गोप तीत्र गतिसे 
चल दिये ॥ ३६-३८ ॥ 
कप्णोऽथ रौहिणेयश्च स ॒अैवामितदक्षिणः। 
धरयो स्थगता जग्मुस्िटोक्रपतयो यथा ॥ ३९॥ 
भ्रीकृप्ण, चर्सम ओर अमित दक्षिणा देनेवाले दानपति 
अक्रू-ये तीनो त्रिखोकपतियोकरे समान रथपर बैठकर चल 
स्देये॥३९॥ 
धाह रृप्णमक्रेये यसुनातीर्सशधितः। 
स्यन्दने चात्र रक्षख यत्नं च कुर वाजियु ॥ ४०॥ 


यमुनाओफे तपर पैचक्रर अकरणे श्रीहष्णते कदा-- 
मैया [ रथको र्दी खदा रवो भीर पेो्हेको कारम स्खनेका 
प्रयत करो ॥ ४० ॥ 
हयेभ्यो यवसं द्वा हयभाण्डे स्थे वया । 
प्रगादं यत्नमास्याय क्षणं तात प्रवीध्यतम्‌ ॥ ४९१॥ 
(तात ! पोर्न दानः-घास देकर, इनके आभूषरण ओर 
रथकी विदेप यल्नपर्वक देख-माट कसते हुए एक कछषणतक्र 
मेरी प्रतीक्षा करो ॥ «१॥ 
यमुनाया हदे दयस्सिन्‌ स्तोष्यामि भुजगेश्वरम्‌ । 
दिव्यैभागवतेर्मन्नैः सर्वरोकप्रभुं यतः ॥ ४२॥ 
(तवत्तक मै यमुनालीके इस कुण्डम प्रवे करे दिव्य 
भागवत मरन्त्र्रास समूर्णं जगते स्वामी नागराज अनन्तक 
स्वति करद्‌ ५२॥ 
गृह्यं भागवतं देवं सर्वलोकस्य भावनम्‌ । 
श्रीमत्खस्तिकमूदखनं प्रणमिष्यामि भोगिनम्‌ 1 
सष्टस्रशिरसं देवमनन्तं नीटवाससम्‌ ॥ ४३॥ 
ध्वे गुद्यसवरूप भागवत्त देवता ई, सम्पूर्णं छोकोके 
उत्पादक एवं उज्नायकर ह| उनकर) वसक कान्तिमान्‌ खस्िक 
चिहसे अटकरृत दै ] वे स्प॑-विग्रहधायी भगवान्‌ अनन्त देव 
सदस सिरो सुमोभित तथा नीर वचर धारण करवाल है । 
मै उने प्रणाम करेगा ॥ ४३ ॥ 
धमैदेवस्य तस्याथ यद्‌ विपं भविप्यति । 
सव॑ तदस्तश्रल्यमशिष्याम्प्रमरोे यथाप ४४॥ 
स्वस्तिकाशधतनं दष्ट दविजिहं श्रीविभूषि्तम्‌। 
समाजस्तन्न सपौणां शान्त्य वै भविष्यति ॥ ४५॥ 
स्स्वस्तिकके आश्रयमूत श्रीविभूपित नागराज शेषका 
दर्यान करे मँ उन धर्मदेवक्रा जो विप दोगा, उसे अमृतके 
समान मानकर पी जार्ञगा | ठीक उसी तरह, जैषे देवतारोग 
अमृत पीते है । वर्ह भगवान्‌ गेषके समीप सर्पी सपरुदाय 
शान्तिके व्ि उपस्थित दोगा ॥ ४४-४५ ] 
अस्तां मां समुदीक्न्तौ भवन्तौ सद्गतावुभौ । 
निव्त्तो भुजगेन्द्रस्य याषदस्मि हदेत्तमाद्‌ ॥ ४६॥ 
म नागराजकरे इस उत्तम हदे लौटकर जवतक थां 
न जाः तव्रतक ठम दोनो भाई एक माय मेरी राद 
देखते रदे 1 ८६ ॥ 
तमाह रष्णः संदृषटो गच्छ धर्मिष्ठ मा चिरम्‌ । 
आवां खलु न शक्तौ खस्त्वय। दीनाबुपाितम्‌ ॥४७॥' 
तव श्रीहृष्णने दर्पे भरकर उनसे कदा--ष्यर्मिषर महा- 
पुरप ! जब्दी नामो ओर ल्य । हम दोन ठम्हरे विना 
यरो ( देरतक ) नद प्ै2े र सकः ॥ ४५ | 


२०० 


श्रीमहाभारते खिकभागे 


[ र्षिंरे 


स हृदे यसुनायास्तु ममजामरितद्रक्षिणः। 
रखातले स दद्य नागलोकमिमं यथा ॥ ४८॥ 
त्र अमित दधिणा देनेवाले अकू यमुनाजीके ज्म 
जाकर गोता ल्गाया । वरहा उर इी लोककी मेति रसातल 
वतीं नाग-टोकका स्पष्ट दरदान होने खगा ॥ ४८ ॥ 
तस्य मध्ये सस्नास्यं देमतारोचद्ूतष्वजम्‌ । 
खाङ्गखासक्ष्टस्ताय्रं मुसटोपाधितोदरम्‌ ॥ ४९॥ 
उस छोकके मण्यमागमे सदत सिरे सुदोभित शेप्का 
दर्शन हुआ । उनके पास सुवर्णमय ताल-चिहते युक्त ऊँची 
प्वजा फदराती थी 1 उनके एक दायका अप्रभाग दले 
सया हुथा था ओर उदर मुसक्ते टिका हुमा था ॥ ४९॥ 
असिताम्चरसंवीतं पाण्डुरं पाण्डुयासनम्‌ । 
कुण्डठैकधरं मन्तं सुक्तमम्बुरुदेक्षणम्‌ ॥ ५० ॥ 
उनका शरीर गौर ओर आन दवेत वर्णका था । उनके 
श्रीअङ्ग नीट वद्मे आदत ये । उन्दोनि एक दी कानमे एक 
कुण्डल धारण कर रखा था 1 वे मतवाले-रे हकर रोये ये । 
उनके नेत विकषित कमल दल्के समान मनोहर ये ॥ ५० ॥ 
भोगोत्कयसने श्चभ्रे स्वेन देहेन कल्पिते । 
सखासीनं खस्तिकाभ्यां च वराहाभ्यां मदीघरम्‌ ॥५१॥ 
वे अपनी दही देदसे कितं सण्-गरीरमय विष्ठृत एवं 
युर आखनपर सुन्दर ठंगमे विराजमान ये । परथ्वीको धारण 
करनेवाले भगवान्‌ अनन्त दो खस्िक एवं वराह-चिहसे 
विमूष्रित ये ॥ ५१ ॥ 
किचिद्‌ सव्यापवृत्तेन मौलिना देमचूलिना । 
जातरूपमयैः पैमौरयाच्छन्नवक्षसम्‌ ॥ ५२॥ 
उनके मस्लकपर सोनेकी क्टगीसे विभूप्रित मुकुट वायीं 
ओर कु शका हुमा शोभा दे रहा था । वक्षःसखल सुवणेमय 
कमर्छो-की माटते आच्छादित था॥ ५२॥ 
रक्तचन्दनदिग्धाड्ं दीधैवाहुमरस्दिमम्‌ । 
पद्मनाभसिताश्राभं भमभिन्यटिततेजसम्‌ ॥ ५३ ॥ 


सरि अद्मि रक्त चन्दनका लेप ल्गा हा था | उनकी 


भुजे बदी-ब्रह्ी थी । वे यनुर्योका दमन कर्मे समर्थ ये । 
उनकी अद्धकान्ति च्वेत वर्णवाले विष्णुकी शुक्ट प्रभा तथा 
श्वेत बादर्छोकी आभाक्रे समान थी | अपने दी प्रकाशसे 
उनका तेन प्रज्वदित दो रदा था ॥ ५३॥ 
ददृक्ष भोगिनां नाथं स्थितमेकार्णवेश्वरम्‌ । 
पूज्यमानं दिजिहेन्द्ैवौसकिथसुखैः प्रमुम्‌ ॥ ५४॥ 
अकरुएे देखा, एकार्णवे स्वामी तथा सर्के रक्षक 
भगवान्‌ शेष विरा रहे ई ओर वाञुकि आदि नागराज उन 
प्रकी पूना कर रदे ६ ॥ ५४ ॥ 


कस्बङाभ्वतसो नागौ तौ चामरकरादुभौ । 
अवीजयेतां तं देवं धमौसनगतं प्रभुम्‌ ॥ ५५ ॥ 
कम्छ यर अश्वतर नाग हारय चवर ठेकर धर्मावन- 
पर विराजमान मगवान्‌ अनन्तदेवको हवा कर रदे थे ॥५५॥ 
तस्याभ्याद्ागतो भाति वासुक्रिः पन्नगेश्वरः । 
दृतोऽन्यैः सचिवैः सर्पैः करोटकपुरःसरेः ॥ ५६ ॥ 
उनके निकट कर्कीटक आदि अरन्यं स्प॑जातीय मन्ति्यैसि, 
धिरे हृ नागराज वादुक्रि युलोमित हो रदे ६ ॥ ५६ ॥ 
तं धरैः काश्चनैरवव्यैः पद्कजच्छनमस्तकैः। 
राजानं सापयामासुः स्नात्तमेक्रा्णवाम्बुभिः ॥ ५७ ॥ 
उन क्रमशः यद्‌ दिखायी दिया कि सेवकेनि कमच्े ठके हुए 
मुखवाले दिव्य सुवर्णमय पर्टोदवारा एकार्णवकरे जच्से नाये 
हए नागराज हेषको पुनः नहदाया ३ ॥ ५७ ॥ 
तस्योत्सद्टरे धनदयामं श्चीवत्साच्छादितोरसम्‌ । 
पीताम्बरधरं विष्णुं सूपविष्ट ददद इ ॥ ५८ ॥ 
उनश्चेषरजौकी गोदे उन्दनि पीताम्बरधारी भगवान्‌ विष्णु 
( श्रीकृष्ण ) को सखपूर्वक विराजमान देखा । उन्करे श्रीयङ्खौ- 
की कान्ति मेषके समन दयाम थी तथा उनका वक्षःख्यल 
भ्रीवत्सविदसे आच्छादित था ॥ ५८ ॥ ~ 
अपरं चैव सोमेन तुर्यसंहननं धुम्‌ । 
संकपणमिवाखीनं तं दिव्यं विष्रं चिना ॥ ५९ ॥ 
वीं चन्द्रमाके समान गौर विग्रहवाले दूसरे प्रमावमाली 
देवता दिखायी दियेः जो संकर्घणसे मिच्ते-जुट्ते थे । वे उस 
दिन्य विस्तर त्रिना दी वर्दो बैठे ये ॥ ५९ ॥ 
स कृष्णं तत्र सहसरा व्यादरतपुपचक्षमे । 
तस्य संस्तम्भयामास वाक्यं रृष्णः खतेजसखा ॥ ६० ॥ 
अक्रूरे सदसा वरदो भ्ीकृम्णते वातचीत करेकी चेष्टाकीः 
परंतु श्रीङष्णने अपने तेजते उनकी वाणीको स्तम्भित 
कर दिया ॥ ६० ॥ 
सोऽचुभूय भुजङ्गानां तं भागवतमन्ययम्‌ । 
उदतिष्ठत्‌ पुनस्तोः्याद्‌ विस्मितोऽमितदक्चिणः ॥ ६१॥ 
सरपोक्रि सवामी उन अविनाशी भागवत देवक्री मदहिमाका 
अनुमव करे अमित दक्षिणा देनेवाले दानपति अनूह आश्चर्य- 
चकित दोकर पुनः जलवे ऊपर उठे ॥ ६१ ॥ 
सख तौ स्थस्यावासीनौ तत्रैव वरकेदायौ। 
निरीक्ष्यमाणावन्योन्यं दददद्धतरूपिणो ॥ ६२॥ 
उठकर उन्न देखा क्रि बल्रम ओर श्रीङृप्ण दोनों 
वहीं रथपर्‌ व्रडे द ओर एक दृस्रेकी ओर देख रदे है; उन 
दोनेकि रूप अदूयुत ई 1} ६२ ॥ 
अथामञ्यत्‌ पुनस्तत्र ॒तदाकूरः कुतुहखात्‌ । 
श्ज्यते य्न देवोऽसौ नीलवासाः सिताननः ॥ ६३ ॥ 


चिष्णुप 1 


सप्त्विरो.ऽध्यायः 


३०१ 


तव अक्रूरे पुनः कौवूहल्वद्य वरहो जलम गोता लगाया 
ओर पुनः वे वदी जा पहुचे, जलो उज्ज्वल ( गौर ) मुख- 
चाले नीलाम्बरधारी भगनान्‌ अनन्तदेव पूजित दो रदे ये ॥ 
तथैवासीनमुत्सद्धे सहखरास्यधरस्य वै । 
ददश छष्णमकरूरः पूज्यमानं तदा प्रभुम्‌ ॥ ६४॥ 
फिर उसी प्रकार उन सहल युलधारी शेपनागकी गोदमे 
बैठे हए भगवान्‌ श्रकृष्णको भी अक्रूरने देखा; जो उस 
समय पूजित हो रदे थे ॥ ६४॥ 
भूयश्च सहसोत्थाय तं मन्त्रं मनसा जपन्‌ । 
रथं तेनैव मार्गेण जगामामितदक्षिणः ॥ ६५ ॥ 
तवर मन-दी-मन उसी मन््रका जप करते हुए पुनः सदसा 
उर कर अमित दक्षिण देनेवाले अक्रूर उसी मार्गते रथके 
समीप चले गये ॥ ६५ ॥ 
तमा केरावो देष्टः सितमक्ुरमागमत्‌ 1 
कीदृशं नागलोकस्य चन्तं भागवते हदे ॥ ६६ ॥ 
तवर दर्थे भरे हु श्रीकृष्ण वदो खद हुए अक्रूरे 
पास आये ओर पूछने लगो-“ किये, उस भागवत हृदे नाग- 
लोकका दृत्ान्त केसा रदा १॥ ६६ ॥ 
चिरं च भवता काटो व्याक्षेपेण विरुभ्वितः। 
भन्ये दृष्टं त्वयाश्चयं हदयं ते यथाचखम्‌ ॥ ६७॥ 
(अपने तो ध्यानके ही व्यासंगसे ब्रूत देर ठ्गा दी | 


समक्षता हू, आपको वर्ह कोई आश्वयैकी वात दिखायी दी 
ह, तमी आपकर दय खिरमावसे ध्यानम लगा रदा दै ॥ ` 
परत्युवाच स्त तं छृर्णमाश्चयं भवता विना । 
करि भविष्यति रोके स्थावरेषु चरेषु च ॥ ६८ ॥ 
तत्र अक्रूरे श्रीङृप्णठे उनकी बातका उत्तर देसे हृष 
कदा--दस चरचर जगतमे ठम्हारे सिवा दूसरा कौन सा 
आश्नर्यका विषय होगा १ ६८ ॥ । 
तत्राश्चर्यं मथा शष्ट छृप्ण यद्‌ भुवि दुरुभम्‌ । 
तदिष्टापि यथा तश्र पद्यामि च रमामि च ॥ ६९॥ 
श्रीङ्कप्ण | ओैनि वरह वद आश्वर्यं देखा है, जो भूतल- 
पर दुर्लम है । जता वर्ह देखा थाः वैसा ही आश्चयं यहो मी 
देखता हँ जीर उसी रम रहा हू ॥ ६९॥ 
संगतश्चापि छोकानामाश्चरयेणेष्ट॒ रूपिणा । 
अतः परतरं कृष्ण नाय द्रष्डुमुर्सष्े ॥ ७० ॥ 
“श्रीकृष्ण ! यहो तीनों खोकेकि मूर्तिमान्‌ आश्चर्ये मेरी 
भेट हो गयी है ¡ अच इससे बदृकर कोई आश्वर्यं मे नदीं देख 
सकता | ७० ॥ 
तदागच्छ . गमिष्यामः कंखराजपुर्यी प्रभो । 
यावन्नास्तं जत्येष दिवसान्ते दिवाकरः ॥ ७१॥ 
"अत्तः प्रमो { अव्र आओ. कंसराजकी मथुरा नगरी 
चरे | ये सूर्यदेव दिनके अन्तम जव्रतक अस्त न हौ, तभीतक 
दर्म वर्ह पर्हुच जाना चाये ॥ ७१॥ 


इति श्रीमहाभारते सिरुभागे हतिवंसे विष्णुपर्वणि अकरुरकृतनागोककथने षदूर्विंङोऽध्यायः ॥ २९॥ 


इस प्रफार श्रोमहाभ।रतके खिरभाग रसिके भन्तर्मत विष्णुप्ममे अकूरदारा नागलेोकके वृत्तान्तका 
कथनिषयक छव्यीसर्यः अध्याय पूरा हुभा ॥ २६ ॥ 
>-क9क- ^ 
स्वि एद * 
ष्यायः 
श्ीकृप्ण ओर वलरामका मथुरामे प्रवेश, उनकै दारा रजकका वध, मालीको 
वरदान, कुव्जापर कृपा ओर कंसके धनुषका भञ्जन 


+ वश्चग्पायन उवाच 
ते तु युङ्क्त्वा रथवरं स्वं प्वामितौजसः 
छृष्णेन सहिताः प्रायंस्तथा संफषणेन च ॥ १ ॥ 
` आसेदुस्ते पुरीं रम्यां मथुरां कंसपालिताम्‌ । 
बैशम्पायनजी कते ह--जनमेजय | वे समी अमित 
, तेजस्वी यात्री अपने शर रंथको जोतक्रर श्रीकृष्ण ओर संकर्षण- 
, के साथ राजा कंकर द्वारा सुरक्तित रमणीय मधुरापुरे जा 
„ पृहे ॥ १६ ॥ 
-"विविद्यस्ते पुरी रम्यां फलि रक्तदिवाकरे ॥ २ ॥ 
` - तौ तु खभवनं वीरौ छष्णसंकष॑णाबुभो । 
. भ्रवेरितौ बुद्धिमता द्यकूरेणाकव्चसौ ॥ ३ ॥ 


संध्याकाले जत्र कि सूर्यदेव ऊट हो गये ये, उन 

स्ने उस रमणीय मधुरा नगरी परवेद करिया । बुद्धिमान्‌ अक्रूर 
सू्ल्य तेजखी शरीङृष्ण ओर सकर्षण दोनो वीरको परे 
अपने षरमे ठे.गये ॥ २-३॥ 
तावाह वरवणौभौ भीतो दानपतिस्तद्ा । 
त्यक्तव्या तात ¦ गमने वसुदेवगृहे स्पृहा ॥ ४ ॥ 

` वे दोनो भाई उत्तम कान्तिते प्रकानित हो रहे थे | उस 
सम्रय दानपति अकू कंसठे मयमीत होकर उनसे कदा-- 
तात | ठम दोर्नोको अमी वसुदेवके घरमे जनेकी इच्छा 
त्याग देनी चद्धिये ॥ ४॥ 


- युवयो छते वृद्धः कंसेन स निरस्यते । 


३०२ 


धरीमदाभास्ते खिखभागे 


[दिवश 


भर्त्स्यते च दिवा सा्ौ नेदं स्यातव्यमित्यपि ॥ ५ ॥ 
भवर्योकि तुम्हरे कारण ही कंस वद यसुदेवक्रो धरते 
निकाल्ता दै भीर "म्द यहो नदीं रहना चाद्ये, एसा कह- 
कर उन दिन-रत टना रदता ३ ॥ ५॥ 
तद्‌ युवाभ्यां हि कर्तव्यं पिच्य सुखमुत्तमम्‌ । 
यथा सुखमवाप्नोति तद्‌ वै कायं दितन्वितम्‌ ॥ ६ ॥ 
'अनः तुम दोननौको पिते च्थि उत्तम सुखकरी व्यवस्था 
करनी चादिये । जिषठ तरद उन्दं सुख मिद, जसे उनका हित 
हो, वही कार्य करना चाहिये" ॥ ६ ॥ 
तमुवाच ततः द्ष्णो यास्यावावामतक्रितौ । 
र्न्तौ मयुं वीर यजमा च धामिक। 
तस्यैव तु गृहं साधो गच्छाव यदि मन्यसे ॥ ७ ॥ 
तव श्रीक्प्णने उनसे कदा--धधर्मनिष्र वीर { सधुपुरुष ! 
यदि आप स्वीकार करें तो हम दोनो माई मशरुरा नगर ओर 
दसके राजमार्गको देखते हुए यदेति जार्यै ओर अतरत रूपसे 
कंसे ही धर पहुंच ज्ये ॥ ७ ॥ 
केश्म्पायन उवाच 
अक्रूरोऽपि नमस्कृत्य मनसा रृष्णमनग्ययम्‌ । 
जगाम कसपादव तु प्रहटणेनान्तसात्मना ॥ ८ ॥ 
वैशम्पायनजी कदते ह--जनमेजय ¡ अक्रूर भी 
मनते ही अविनाशी भगवान्‌ श्रीकृप्णक्रो नमस्कार करे 
प्रसन्न चित्तसे कंस्के पास गये ॥ ८ ॥ 
अयुद्िष्टौ च तौ वीरौ प्रस्थितौ प्रक्षकाबुभौ । 
आलनाभ्यामिवोन्सुक्तौ कुश्चरे युद्धकाह्धिणौ ॥ ९॥ 
अक्रूरकी आना लेकर वे दोनों वीर धीङृप्ण ओर वल्सम 
नगर देखनेके ल्यि वहेसि इस तरह प्रसित हुए, मानो युद्ध- 
की इच्छा रखनेवाले दो गजराज आलाने चट निक्रठे द ॥ 
तौ तु मागंगतं दषा रजक्रं रद्धकारकम्‌ । 
अयाचतां ततस्तौ तु वासांसि रुचिराणि वै ॥ १०॥ 
उन दोर्ननि रास्ते एक रज्र (घोव्री) को देलाः 
जो कपडो स्गणकररहाथा। उतसे देखक्रर वे दोनो भाई 
उसे सुन्दर वल्र मोगने ट्गे ॥ १० ॥ 
रजकः स तु तौ धराद युवां कस्य वनेचरं । 
राजवा्लासि यौ मौढ्याद्‌ याचेथां निर्भयादुभौं ॥११॥ 
रजकने उन दोनेसि कहा-*अरे ! ठम दोन करिकर 
( ओर केकि ) वनचर दो १ जो मूर्खतावश्न निर्भय होकर 
" राजकरे कपडे मोग र्हेदो!॥ ११॥ 
अहं कंसस्य वासांसि नानटेखोदद्धवानि वै । 
कामरागाणि शतदो र्चयामि विदहोषतः॥ १२॥ 
१. जिस्म हाथी वोधा जाता दै, उम खम्भेको आलान कदते 


[1 


मतो विमिन्न देके चने दए राजा कंक सैको 
वर्को रगत हँ ओर उन वर्खोपर विक्षेपः उनकी इच्छा- 
करे अनुसार रंग देता हूं ॥ १२॥ । 
युवां कस्य वने जतौ श्गैः सद विवर्धित 1 
जातरागाविदं द्रा रक्तमाच्छादनं वहु ॥ १३॥ 
धुम दोनो किणकेबरेटेहोएटठम तो वनम पैदा हृए 
ओर बन्यपद्यु्थैफि साथ दी वरद हो । आज इन ब्रहुतचे 
रंगीन कपर्डोक्रो देखकर वुम्ारे मन्म इनके प्रति सेम उन्न 
हयो गयाहै१॥ १३॥ 
अदो वां जीवितं त्यक्तं यौ भवन्तापिहामतौ । 
मूर्खौ प्राङृतविक्षानौ वासो याचितुमिच्छतः ॥ १४॥ 
प्यहो | यह ब्द आश्चर्यकी वात है | जान पदता दै, 
तमने अपने जौवनक्ा मोह व्याग दिया दै, तमी तो यदो 
गमे । त॒म दोनो मूर्खं हो । वम्हारी बुद्धि गवेर-जैवी दैः 
इसीलियि तो राजक्रे कपदे मोगनेकी इच्छ कसते होः ॥१५] 
तस्मै चुकोप वे कृष्णो रजक्रायास्पमेधसे । 
प्रप्तारि्य मूखीय ख॒जते बाख्यं विषम्‌ ॥ १५.॥ 
यह सुनकर श्रीकृष्ण उस मन्दबुद्धि, अरिध्ग्रसः मूर्खं 
तया जहरीली व्रात ब्रोटनैवाले रजकपर क्रपित दो उरे ॥ 
तलेनाशानिक्रल्येन स तं मूर्धन्यताडयव्‌ । 
ख गतासुः पपातोर्व्यां रजको व्यस्तमस्तकः ॥ १६॥ 
उन्दने उसके माधरेपर एफ तमाचा जडं दिया | वह 
तमाचा क्या था; वच्च था | उसके लगते ही रजकरका मस्तक 
फट गया ओर वह प्राणदीन दोकरर प्रथ्वीपर गिर पड़ा ॥ 
तं हतं परदरिवन्त्यो भायौस्तस्य विचुकर्युः 
त्वरितं सुक्तकेदयश्च जग्मुः कंसनिवेरानम्‌ ॥ १७॥ 
उसे मारा गया देख उखकी निरो चीखने-चिह्ठाने 
लगीं | वे व्रा खोञे विलप करती हदं वरत राजा कंसकर 
दरवा्र्म गयीं | १७॥ 
तावध्युभौ खवसनौ जग्मतुमल्यकारणात्‌ । 
वीशीमास्यापणानां वै गन्धाघ्रतौ द्विपायित्र ॥ १८॥ 
इधर वे दोनो नाई सुन्दर वस्र धारण कफे पूर्लकी 
माया येने च्वि उस गरखीमे गये, जर्यो माले विकरती थी | 
वे एसे क्गते थे; मानो दो गजराज उन पूर्छकी सुगन्ध ` 
पाकर वरहो जा पहुचे हँ ॥ १८॥ 
गणको नाम तत्रासीनमास्यदृत्तिः भियंवदः। 
प्रभूतमाल्यापणर्वोलक्ष्मीवान्‌ प्रियदश्येनः ॥ १९ ॥ 
उस गर्छीमे गुणक नामसे प्रसिद्ध एक माली थाः नो 
माल वेचकर ही जीविका चलतां थां | उसकी बतं बड़ी 
प्रिय लगती थी | उसक्री दूक्रानरम बहुत-खी मालर्पे सजाकर्‌ 


विष्णुपर्व 1] 


सप्तविद्यो ऽध्यायः 


३०४ 


रखी गयी थी । वह्‌ धनव्रान्‌. ने साथ द्यी देखने सुन्दर 
भमीया॥१९॥ 
तं कृष्णः चछक्ष्णया कचा मादयायमभिखणएटया । 
देदीत्युवाच तत्कले मालाकारमक्रातस्म्‌ ॥ २० ॥ 
उस समय श्रीङरप्णने मार्करे च्ि दी मुखते निकटी 
दुई अपनी मधुर वाणोद्यसा उस निर्भय माद्यकासे कदा-- 
श्टम दोन व्यि मास्ये दे दो ॥ २० ॥ 
ताभ्यां पीतो द्दौ मास्यं प्रभूतं माट्यजीवनः। 
भवतोः खमिदं चेति प्रोवाच श्रियदरछनो ॥ २२॥ 
मापे दी जीवन-निर्वाह करसमेवठे उस मालीने प्रसन्न 
होकर उन दोनो मादर्योक्ो बरहुत-सी माल अपति कीं । वे 
दोनो देखने वदे प्रियं गते थे! मालीने उने कदा-- 
ध्य्‌ सव्र आपकी ही सम्पत्ति हैः ॥ २१ ॥ 
प्रीतः सुमनसा छृष्णो शुणकाय वरं ददौ 1 
श्रीस्त्वां मत्सम्भवा सौम्य धनौपेरभिपत्स्यते ॥ २२॥ 
उसक्री वात सुनकर श्रीकृष्ण बडे प्रसन्न हुए 1 उन्दने 
संतु्टचित्तसे गुणफको यह वर दिया--सोम्य ! मेरी प्रसत्नता- 
से प्रकट होनेवाटी खश्मी ठम्दे धन-रारिसे सम्पन्न कर देगीः॥ 
स ङन्ध्वरां चरमव्यग्रो माल्यचरत्तिरधोमुखः। 
कृष्णस्य पतितो मूध्नी प्रतिजघ्राह तं चरम्‌. ॥ २३॥ 
माली उस वसो पाकर शान्त-भावसे नतमस्तक हो 
गया | उसने श्रीकृप्णकरे चरमे मस्तक रख दिया ओर उस 
वरको सादर रिरोधायं करिया | २३॥ 
यक्षाविमापिति तदा स मेने मास्यजीवकः । 
स शशं भयसंविग्नो नोत्तरं प्रत्यपद्यत ॥ २४ ॥ 
उख समय मालीने यही समश्चाकरि ये दोनों यक्त ईः 
उसने कंपते अस्यन्त भयभीत होकर उन्हे कुः उत्तर नदीं 
दिया ॥ २४॥ 
वसुदरेवखुतो तौ च राजमार्गगतादुभौ । 
कुव्जां दटक्ातुभूयः सादुटेपनभाजनाम्‌ ॥ २५ ॥ 
तदनन्तर सड़कपर जाते हुए उन दोना वसुदेव-पु्रनि 
कुनव्जको देखा, जो हाथो अनुलेपन ८ अङ्गराग ) का पात्र 
व्यि हुए थी ॥ २५॥ 
तामाह कृष्णः कुब्ञेति कस्येदमचुरेपनम्‌ 1 
नयस्यम्बुजपन्राक्षि सषिप्रमाख्यातुमदंसि ॥ २६॥ 
सस्मिता सम्मुखी भूत्वा प्रत्युवाच्बुजेक्षणम्‌ । 
ष्णं जलदगम्भीरं विद्युत्कुटिखगामिनी ॥ २७ ॥ 
उसे देखकर श्रीकृष्णने कदा--(कमलनयने कुन्ने | 
तम यह्‌ क्रिस व्यि अनुलेपन ल्ि जा रट दोः शीघ्र वता ! 
यष्ट सुनकर कुज्जा मुसकराती हूरद उनके सामने दो गयी | वद्‌ 


वरिजटीकरे समान छुटि गति चलनेवाटी थी । उसने कमल- 
नयन प्रीङष्णसे मेघफ़ समान गम्भीर वाणीरमे कदा-- 11२६ २७॥ 
रालः स्नानग्रदं यामि तद्‌ गृदाणाचुनेपनम्‌ । 
दैव त्वारविन्दाक्ष िसितास्मि वरानन ॥ २८ ॥ 
यस्वमिच्छसि मे वीर त्वं गृहाणाजुटेपनम्‌ । 
स्थितास्म्यागच्छ भद्रं ते हदयस्यासि मे प्रियः ॥२९॥ 
“कमलनयन † मनोहर सुखवलि वीर ! म तो राजाके 
स्नान-ण्टको जा रदी हू । तर्मह अज्जराग चादियेतोकेरो। 
तम्दे देखते ही म विस्मथसे विमुग्ध दो उदी हूँ । वरद जेय 
अङ्गराग चाियेः वदी ग्रहण करो । मँ वम्हरि चयि ठहर गयी 
हू । ठम्द्यरा कल्याण दोः आथो मेरे घर । ठम मेरे दृदय- 
वभ दो ॥ २८-२६ ॥ 
कुतश्चागम्यते सौम्य यन्मां त्वं नावबुध्यसे । 
महाराजस्य दयितां नियुक्तामञुटेपने ॥ ३० ॥ 
“सोम्य ! तुम कहो अति दो कि सुस्रे नदीं जानते । 
मै तो महाराज कंसकरी प्यारी दासी हू । उन्दनि मते अज्धरागके 
ही कार्यमे ल्णा रखा दैः ॥ ३० ॥ 
तसुवाच हसन्ती तु ष्णः ऊुव्जामवस्थिताम्‌। 
आवयोगीत्रसदरं दीयतामयुरेपनम्‌ ॥२१॥ 
चयं हि देक्ञातिथयो महधा; प्राप्ता वरानने । 
दरं धलर्म॑दद्‌ दिव्यं रटे चैव मदद्धिमत्‌ ॥ ३२॥ 
वरहो खड़ी दोकर हसती हुई कुक्जसे श्रीकृप्णने कदा-- 
सुमुखि ! तुम हम दोनो भादर शरीरके अनुरूप अङ्खराग 
देदो। हम पहलवान द ओर इस देशम अतिथिके रूपमे 
अयि ह | श्स राज्यम जो अत्यन्त समृद्धिशाली, विदार दिन्य 
धनुपदहे, उसे ही देखनेके व्यि दमलोगोका यच आना 
हुमा दैः ॥ ३१-३२॥ 
प्रत्युवाचाथ सा छृष्णं प्रियोऽसि मम दर्शने । 
राजाहंमिदमव्य्रं तद्‌ गृहाणानुटेपनम्‌ ॥ २३ ॥ 
तव कुन्नानि श्रीकरप्णते कहा--भ्मेरी ट्टिमि तैम परम 
प्रिय हो, अतः गान्तमावसे यह राजोचित अद्धराग अहण करो ॥ 
ताुभावजुलि्ताङ्गौ चाख्यानौ विरेजतुः । 
ती्थंगौ पदरदिग्धाद्गौ यसुनायां यथा वृषौ ॥ २७ ॥ 
अद्धो अङ्गराग छग जानिपर मनोदर शारीरवठे वे दौर 
भाई बड़ी दोभा पाने लगे । उस समय वे एेते प्रतीत होते थे, 
जेते दो सड यमुनाजीकरे जल्मे गोता लगाकर सारे अङ्खमि 
कीचड़ ल्पेटे आरटे दह ॥३४॥ 
तां च कुच्जां स्थगोर्मध्ये द्वध ङ्कटेनाग्रपाणिना । 
खानः लम्पीडय।मास छृष्णो लीलाविधानवित्‌ ॥२५॥ 
नदनन्तर लील््विधिको जाननेवले श्रीङृप्णने अपने 


२०४ 


महाभारते सिकभारे 


[ हरिवंशे 


दाथकी दो अँगुल्ेचि फछरुठ्जाके वृूवड्के मध्यभागे धीरेसे 
दव्राया ( इसमे कूत्रड सीधा दो गया ) ॥ ३५ ॥ 
साच मग्नं स्थगु मत्वा खायताद्गी श्युचिसिता । 
जदासोच्चैः स्तनतटी ऋजुयष्टिर्कता यथा ॥३६॥ 
मेरा कूड्‌ बैठ गया, एेसा जानकर सुन्दर एवं उन्नत 
अङ्गवाली कुब्जा पवित्र सुस्कानसे सुशोभित हो हसने र्गी । 
उसके सन प्रान्त उमर ऊँचे ह गये ओर वह सीधी 
खकडीपर चदु हू ताके समान शमा पाने ठ्गी ॥ ३६॥ 
प्रणयाच्चपि कृष्णं सखा वभाषे मत्तकारिनी । 
क यास्यसि मया रुद्धः कान्त तिष्ठ गृदाण माम्‌ ॥२७॥ 
पिर ती मतवाखी-सी होकर वद श्रीकृष्णते प्रमपूर्वक 
वोटी--“प्रियतम | अव्र सुम कर्हो जाओगे १ मने वर्ग रोक 
लिया, यदीं रहो ओर मुञ्चे अंगीकार करोः ॥ ३७ ॥ 
ती जातदासावन्योन्यं सतटठास्मेपमव्ययौ । 
वीक्षमाणौ प्रसितौ कुब्जायाः श्रुतविस्तरौ ॥ ३८ ॥ 
यह्‌ सुनकर उन्द खी आ गयौ । फिर तो वे अविनारी 
बन्धु एक दूसरेकरी ओर देखते हुए ताली पीट-पीटकर्‌ जोर- 
जोरते हसने ल्म । कुब्जके कानि उन दोनो मादयेकि गुण 
विस्तासपर्वक सने ये ॥ ३८ ॥ 
कृष्णस्तु कुन्जां कामात सस्मितं श्रिससजं ह । 
ततस्तौ छव्जया मुक्तौ प्रविष्टौ राजसंसदम्‌ ॥३९॥ 
श्रीकृष्णे भुस्कराते हुए. कामपीडित कुन्नाको वदीं छोड 
दिया ओर उससे चुटकर वे दोनो बन्धु राज-मवन्मे प्रविष्ट 
इए ॥ ३९ ॥ 
ताबुभौ बचजसंचृद्धौ गोपवेपविभूपितौ । 
गूढचेष्टाननौ भूत्वा प्रविष्टौ दपवेद्रम तत्‌ ॥ ४० ॥ 
तरमै वदे होकर गोपवेशसे विभूप्रित दए. उन दोर्नौ 
वीर्योने जव उस राजभवनर्भे प्रवेरा किया; उस समय उनकी 
प्रक चेष्टा गुप्तर्पषे दती थी । उनके मुखक्रा भाव ही रेस 
गूढ था करं उससे आन्तरिक चेष्टका पता नदीं ख्गता था॥ 
धलुःशालां गती तत्र वालावपरितर्कितो । 
दिमवद्नसम्भूतौ सि्टाविव मदोत्कटौ ॥ ४१॥ 
हिमाख्यके वनम उसन्न हुए दो मदमत्त सिंह समान 
वे दोना वाल्क वर्ह धनुषशालम जा पर्ने । उस समय वरहो 
उनके पर्टुचनेकी सम्मावना किरीको नदीं यी ॥ ५१ ॥ 
दिदृक्षन्तौ महत्तञ्र॒ धलुरायोगभूपितम्‌ । 
पप्रच्छतुश्च तौ वीरावायुधागारिकं तदा ॥ ४२ ॥ 
वे वरँ र्खे हए विराल धनुषको, जो पुष्पमाखासे 
विभूषित थाः देखना चादते थे; अतः उन दोनो बीरोनि 
उस समय शख्रागारके संर्तकठे पूछ--॥ ४२ ॥ 


भोः कंसधटुषां पाल श्रुयतामावयोर्चचः। 
कतरत्‌ तद्‌ धुः सौम्य मोऽयं यस्य वतैते ॥ ४३॥ 
आयोगभूतं कंसस्य द्षंयसखर यदीच्छसि । 

धराज कंसकरे धनुर्ोकी रक्षा करनेवाले अख्र-संरक्षक | 
ठम हम दोनौकी चति सुनो । सौम्य [ जिखका यदह उत्सव 
होने जा रहा दै, वह धनुष कौन-सा है १ यदि ठम्दारी इच्छा 
हो तो कंसके इस उत्सवका जो प्रधान निमित्ते, उस धनुषका 
इम दरसन कराओः ॥ ४३१ ॥ 
स तयोदशयामास तद्‌ धुः स्तम्भसंनिभम्‌ ॥ ४४॥ 
अनासेप्यमसखम्भेयं देवैरपि सवासवैः, 

उखने उन दोनो मादर्योको वह खम्भ-जैसा मोया धनुष 
दिखा दिया ] उस धलुषपर प्रत्रा चदाना या उते तोड्ना 
इन्द्र सदित सम्पूणं देवता्ओके लिये भी असम्भव या [४४३॥ 
तद्‌ गरीत्वा तदा रष्णस्तोखग्रामास वीर्यवान्‌ ॥४५॥ 
दोभ्यां कमदखपन्राक्षः प्रह्ेनान्तरात्मना । 

पराक्रमी कमलनयन श्रीकरप्णने प्रसन्नचित्तसे दोनो दार्थो- 
द्वारा उस धनुरको उटाकर तौखा ॥ ४५१ ॥ 
तोखयित्वा यथाकामं तद्‌ धनुर्दैत्यपूजितम्‌ ॥ ४६॥ 
आरोपयामास वटी नामयामास चासङ्त्‌। 
आनाम्यमानं ङष्णेन प्रकथौदुस्गोपमम्‌ ॥ ५७ ॥ 
द्विधाभूतमभून्मध्ये धञुरायोगभूपितम्‌ । 

दयद्रार पूनित हुए उख धनुषको दच्छानुसार तौर- 
कर वलवान्‌ श्रीकृष्णने कर्द वार उसको छकाया भौर उखके 
ऊपर प्रत्यञ्चा चदायी । श्रीङृष्णके द्वारा हुतं अधिक ञ्ुक्रा 
दिये जनके कारण वह पुष्यहा्येसे विभूपरित सर्पाकार धनुष 
वीचसे द्ूटकर दो भागे विभक्त हो गया ॥ »६-४७२ ॥ 
भङ्क्त्वा तु तद्‌ धनुः ष्ठं ष्णस्त्वरितविक्रमः। 
निश्चक्राम महावेगः स च संकर्षणो युवा ॥४८॥ 

उस श्रेष्ठ धनुषको तोडकर श्रीकृष्ण तथा वे नवरयु्रक 
संकषण रीभरतपर्वंक कदम व्रदृति हुए रदे वेगसे उस भवन- 
से बाहर निकर गये | ४८ ॥ 
धलुषो भङ्गनादेन वबायुनिधोपकारिणा | 
चचालान्तःपुरं सवै दिशाङ्वैव पुपूरिरे ॥ ४९॥ 

उख धनुषक्रे दटनेसे जो धड़ाक्रा हुआ; बह सहसा उदढी 
हु प्रचण्ड अधिके समान गम्भीर घोष करनेवाला था | उस्र- 
से सारा अन्तःपुर कोप उठा ओर स्म्पूर्णं दिशार्भमिं वह 
आवाज भून उठी ॥ ४९ ॥ 
निग॑म्य त्वायुधागाराजग्मतुरगोपसंनिधौ । 
वेगेनायुधपाटस्वु गच्छन्‌ सम्भरन्तमानसः ॥ ५० ॥ 
समीपं शपतेगत्वा काकोच्छ्वासोऽभ्यभाषत । 


विष्णुपर्व ] 


शखरागास्ते निक्ररकर दोनो भाई व्रजते अये दुए गोर्पौ- 
कै निकट चटे गये । इधर आयुर्धोक्री रक्षा करतैवाला व्ह 
शिपाही मन-दी-मन घवरा उठा ओर ब्रडे वेगसे राजद्रवारकी 
ओर चरु दिया । राजे निक्रट जकर करौप्री तरह 
चकित हो ख्व्री सोसि खौचता हुआ वद इ प्रकरार 
वोट--॥ ५०१ ॥ 
श्रूयतां मम॒ विक्षाप्यमाश्चर्थं धनुषो गहे ॥ ५१॥ 
निर्वत्तमसिन्‌ काले यजञगतः सम्थ्रमोपमम्‌ । 
'्महाराज | मँ जो व्रात व्रताना चाहता दू उसे ध्यान 
देकर निय । इस समय धनुष-दालर्मे एक आश्चर्यजनक 
घटना घटित हई दै जो सम्पूणं जगत्‌के परल्यकी भोति प्रतीत 
होती दै ॥ ५११ ॥ । 
नरौ कस्याप्यसदरश्तौ श्विखाविततमूर्ध॑जौ ॥ ५२॥ 
नीरुपीताम्बरधरौ पीतद्वेताद्ङेपनो । 
ताबन्तःुसमक्षाती भविष्टौ कामवेषिणौ ॥ ५३ ॥ 
वहो दो -मनुप्य अये ये, जिनकी तलना क्रिसीसे मी 
नही दयो सकती । उनके मस्तकके सभी बार रिखा ( चोरी)के 
समान वरवे थे । एकने नीर वख पहन रला था ओर दूसरे 
ने पील । एकक अ्धौमिं पीला अङ्गराग था, तो दृसरेके अन्ग 
म उवेत । ३ दोनो इच्छानुसार वेष धारण कभ्नेमे कुशल थे 
सहसा अन्तःपुरे धुसञअयि ओर क्रिंसीको पता न चला५२-५३ 
देवपु्ोपमौ वीरौ वालाविव हुतारानो । 
स्थितौ धचुंदे सौम्यौ सहसरा खादिवागतौ । 
मया रषौ परिव्यक्त रचिराच्छादनस्रजी ॥ ५४॥ 
ध्वे दोनों वीर देवक्रुपारोके समान प्रतीत दोते थे। उनकी 
आङ्ति बड़ी सोम्य थी । उन्द देखकर एेसखा जान पडता याः 
मानो ब्राललूपधारी अगिन सहसा आकारसे आक्र धनुपरशाला- 
मैखडेदहो ग्ये हौ | उन दोन वल्ल ओर पुष्पहास बडे 
सुन्दर थे । मैने उनक्रो खष्टल्पते देखा है ॥५५॥ 
तयोरेकस्तु पद्माक्षः दामः पीताम्बरस्रजः। 
जग्राद तद्‌ धनूरत्नं दुरह्यं॒दैवतैरपि ॥ ५५॥ 
‹उन्मेते एककी अखि कमलके समान सुन्दर थी, शरीर- 
का वर्णं इयाम था । उसक्रे वस्र ओर हार पीठे रंगकरे ये ! जिसे 
हाये लेना देवताकि ल्थि मी कठिन दै, उसी धनुषरलको 
उख श्यामसुन्दर वौरने अनायास ही उठा लिया |॥ ५५ ॥ 
तत्‌ स बालो मश्वापं बलाद्‌ यन्तरमिदायसम्‌ । 
आरोपयित्वा वेगेन नामयामास रीखया ॥ ५६॥ 


त्पर्विशोऽप्याय; 


३०५. 


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(उस वाल्कने उस विदरार धतुषकरो लोयन्तरकी रोति 
वलात्‌ हाये लेकर वेगूर्वक़ उपर प्र्य्वा चदृी ओर 
येल-सेल्म द्यी उत्ते चछकाना आरम्भ किया ॥ ५६ ॥ 
आङ्ष्यमाणं वत्‌ तेन वित्राणं वाहुश्चालिना । 
सृष्टिश्च विक्रूजित्वा द्विघाभूतमभन्यत ॥ ५५ ॥ 

(उस ब्राहुखाटी वीरफे खीचनेपर वह ब्राणरहित धनुप 
मुदधी पकड़नेकौ जगहते धडकरेके साथ दय्करदो दकं दो 
गया ॥ ५७ ॥ 
ततः प्रचलिता भूमिरनेव भाति च भास्करः । 
धटुषो भद्गनादेन भ्रमतीव नभस्तम्‌ ॥ ५८ ४ 

धनुष दरूटनेकी आवाजये धरती हिलने लगी, सूर्यकी 
प्रमा फीकी पड़ गथी ओर आकाश धूमता-स्ा प्रतीत 
होने ल्गा ॥ ५८ ॥ 
तदद्‌ ुतं महद्‌ श्ट विस्मयं परमं गतः । 
भयाद्‌ भयदराभ्यस्तदिहाख्याठुमागतः ॥ ५९ ॥ 

ध्वह महान्‌ अदत दृश्य देखकर म अत्यन्त विसये 
पड़ गया ओर भयदायक शनर्ओंक्री ओस्ते भय प्राप्त होनिकी 
आशङ्कसे आपक्रो यह समाचार बरतानेके ल्ि यहो आ 
गया ॥ ५९ ॥ 
न जानामि महाराज को तावमितविक्रमौ । 
पकः कैलाससंकाश पकोऽञनगिरिप्रभः ॥ ६० ॥ 
ध्महाराज ! मै नदीं जानता, वे दोनो अमित पराक्रमी 
वीर कौन थे १ उन्मेते एक तो कैटासपर्वतके समान स्वेत 
वर्णका था ओर दूसरा अज्ञनगिरिफै समान इयाम | ६० ॥ 
स तु तञ्ापरलनं वै भङ्क्त्वा स्तस्भमिव द्विपः । 
निष्पपातानिरुगतिः सालुगो ऽमितविक्रमः । 
अगमनत्तं द्विधा रत्वा न जनि कोऽप्यसौ चप ॥६१॥ 

"हाथी वोधनेके खम्भेकी भोति अत्यन्त सुदृद्‌ उस 
धनुषरलनक्ो तोड़कर वह अमित पराक्रमी वीर अपने सहायकके 
साय दी वायु समान तीनगतिक्रा आश्रयके वर्हि 
निकर गया । नेरेदवर्‌ ! न जाने वह कौन था, जो धनुष्कर 
दो टुकड़े करफे चला गप्रा | ६१ ॥ 
शरुत्वैव धनुषो भद्ध कंसो विदितविस्तरः। 
विख्ज्यायुधपारं वै प्रविवेश गदयोत्तमम्‌ ॥ ६२॥ 

कंसकरो सव्र वातं विस्तारपूर्वक विदित थी। उस्ने धनुष- 
भङ्खका समाचार सुनते दी शख्ररक्षकको बिदा कर दिया ओौर 
स्वयं अपने उत्तम भवनम प्रवेश किया ॥ ६२] 


इति श्रीमहाभारते विरभगे हरिवंशे विष्णुपवैणि कंसधनुरभद्गे सपर्विशोऽध्यायः ॥ २७ ॥ 
शस प्रकार श्रीमहाभारते खिरभाग हरिवंशके अन्तम॑त बिष्णु पमे कंसंके धनुपका भद्त्िपयक सतताईस्ः अध्याय पूरा हु ॥ २७ ॥ 


"~~त रिरि रिरिकिकिकत 


भरीमहाभारते लिलभागे 


[ हसिवंशे 


अष्टाविद्योऽध्यायः 
कंसकी चिन्ता, उसका रंगश्षालाको देखना ओर उसे सुसञ्जित करनेका आदेश देना, चाणूर एवं 
अुष्टिकको तथा कुबलयापीडकै महावतको श्रीदृष्ण-वररामके वधफे सिये आज्ञा देना, महावत- 
स दरूमिरके दारा अपनी उत्पततिकी कथा कहना--उसकरी माताका सुयाएुन पवतपर 
द्रमिरके साथ समागम तथा उन दो्नोका परस्पर वरदान एवं शाप 


वै्नम्पायन उवाच 
स चिन्तयित्वा धयुषो भद्धं भोजविवर्धनः। 
वभूव विमना राजा चिन्तयन्‌ भृश्चदुःखितः ॥ १ ॥ 
वैशम्पायनजी कहते है--जनमेजव ! भोजवंशी 
वृद्धि कसेवाल राजा कंस धनुपरके दरूटनेकी घटनापर विचार 
करके मन-ही-मन खिन्न हो उठा । वह रज्यो-ही-व्यौँ उसका 
चिन्तन करता, त्यौ-ही-त्यौ अत्यन्त दुःखम निमग्न दोता 
जात्त। था ॥१॥ 
कथं बवाखो विगतभीरवमत्य मदहावलम्‌ । 
बे्त्यमणस्तु पुरषै्धनुर्भङ्क्त्वा विनिगंतः ॥ २ ॥ 
वड सोचने लगा, “अदो ! बह वाल्क कैसे निर्भय दो 
सहाव रष्क अव्रदेलना करके दूसरे लेर्गो$़ देखते देखते 
धनुषं तोदकर निक्रर गया ॥ २ ॥ 
यस्यार्थे दाख्णं कम छृतं लोकविगर्दितम्‌ 
पितृष्वस््ात्मजान्‌ वीरान्‌ षडेवाहं न्यपोथयम्‌ ॥ २ ॥ 
भ्य वदी बालक दैः जिते मारेके व्यि मेने खोक 
निन्दित क्ूरतापूणं कर्मं किया । अपनी चचेरी बहिनक छः वीर 
पु्चेको हिलापरदे मारा ॥ ३॥ 
दैवं पुरूपकरेण न॒ शक्यमतिवर्तितुम्‌ । 
नासो्तं च वचनं नूनं मद्यसुपस्थितम्‌ ॥ ४ ॥ 
“सचमुच दी पुखषार्थसे देवके विधानका उल्लवन नदीं 
करिय्राजा सकता । नारदजीनेमेरेय्यि जो वरात कही यीः वद 
भ्रव्द्य आकर उपथित दो गयं ॥ ४ ॥ 
वं राजा विचिन्त्याथ निष्कम्य सगरदोत्तमात्‌ 1 
ब्रेश्धागारं जगामाद्यु मञ्चानामवोककः ॥ ५॥ 
इस प्रकार चिन्ता करके राजा कंस अपने उत्तम भवनसे 
निकल ओर शीघ ही पराणः ( रङ्गशाल ) मे वहो रगे 
हुए मर््का निरीक्षण करनेके लि गया ॥ ५॥ 
, स षट सर्वनिर्य्तं प्रेक्षागारं च्रपोत्तमः। 
श्रेणीनां  चढनियुक्तैमेञ्चवटैर्निरन्तरम्‌ ॥ £ ॥ 
सोत्तमागारयुकताभि्वंखभीभिर्विभूषितम्‌ । 


छदीभिः सम्पदृद्धाभिरेकस्तम्भेरविभूषितम्‌ ॥ ७ ॥ 


१, धुरक उत्सव देखमेके लिये वना इमा विश्ञाङ खयान। 


उस श्रेष्ठ मरेशाने प्रेक्चादको सव प्रकारे सम्पन्ने हुआ 
देखा । वरहो एकमीत्र शिखखते जीवननिर्वाह्‌ करनेवाठे रिषि 
ने ख्गातार वहूत-ते मस्र बाड़ वना रखे थे! वे स्व-के-तव् 
दृदतापूर्वक ब्ेधि गये थे । उत्तमोत्तम ग्रहति ल्गे हुए छज्ज 
भी बनयि गये ये । उन छन्जौमे कीं तो छः-छः खम्भे एक 
साथल्गे थे, जिनसे उनकी विदयाट्ता वद्‌ गयी थी ओर 
कर्ही-कर्ही एक-एक संख्यावारे द्यी खम्मे ख्ये गये थे } इन 
खम्भोः छनो ओर मश्चवादोने उस पक्षायहको विभूषित कर 
रखा था ॥ ६७] 
सर्वतः सारनिन्यूंहं खायतं सुप्रतिष्ठितम्‌ । 
उदग्र्घिएटसुङ्धिएटमश्चारोहणसुत्तमम्‌ 7 ८ ॥ 
वर्हो स्र ओर दीवारोमे मजवूत सूर्ध्यो लगी थीं । वद 
भवन ब्रहूत विदा वना या । उसक्री अच्छी प्रकार प्रतिष्ठा 
की गयी थी | उसके भीतर मर्खखोपर चद्नेके व्यि ऊंची 
असंकीर्ण ( चोड़ी ) तथा परस्पर सटी इई सीदिर्यो तरनी 
थीं । इत्से वह रंगमवन ब्रूत हौ उत्तम दिखायी देता था ॥ 
नपासनपरिक्षिप्ं संचारपथसंकुरखम्‌। 
छन्नं तद्‌ वेदिकामिश्च मानुप्ौघभरक्षमम्‌ ॥ ९ ॥ 
वषो राजक वरैठनेके व्यि चारो ओर सिंहासन र्ते 
गये ये | उस रद्चशाखाम सवर ओर अनि-जनेके व्यि ब्रहुत-से 
मार्गे ये । सारा भवन बहुखंख्यक वेदिर्ोत व्याप्त था। उसमे 
मनु््योकर ब्रहुत बड़ी भीडको अपने भीतर सुगमतापूर्वक भर 
लेनेकी क्षमता थी ॥ ९॥ 
स दृष्टा भूषितं रङ्गमाक्षापयत बुद्धिमान्‌ । 
श्वः सचिजाः समाल्याश्च सपताकास्तथेव च ॥ १० ॥ 
सुवासिता वपुष्मन्तं उपनीतोत्तरच्छदाः। 
क्रियन्तां मञ्चवाटाश्च बवलभ्यो बीथयस्तथा ॥ ११॥ 
बुद्धिमान्‌ कंसने उख रज्ञभवनको सव प्रकारसे सजा 
हुआ देख कार्यकर्ता्ओंको इस प्रकार आज्ञा दी--“कल सवे 
यदेकि मञ्चवार्यो, छनों तथा गयको विनो, माल्ओं ओर 
पताकाओसि सजा दिया जायः सुगन्धित जल छिडककर इन 
सवको सुवासित किया जाय, मनोहर सूप दिया जायः मर्धो 
पर सुन्दर ्चोदनी विछा दी जाय ॥ १०-११॥ 
रङ्गवाटे करीषस्य करप्यन्तां राशयो ऽन्ययाः। 
परास्तरणदोभाश्च वख्यश्चाचुरूपतः ॥ १२॥ 


विष्णुपर्व ] 


स्थाप्यन्तां सुनिखाताश्च पानङ्स्भा यथाक्रमम्‌ । 
उदभागर्सहाः सवै सकाञ्चनघरोत्तमाः ॥ १२३ ॥ 
'अखादे गोमयचूर्णङे अधिकरते-अधिक देर्‌ व्ि्धा पि 
जाये । जिप्तसे उनकी कमी न पदे | जगद्‌-जगह शोभाके 
ल्ि चुन्दर.परदे गा दिये जाये] उनके अनुरूप खम्भे खड 
क्रिये ज्ये, जो भूमिम खूव॒ गहराई तक्र गदे खो | क्रमशः 
पानङुम्भ सखापिति करिये जार्यै वे स्रके-सव जलका 
भार सह लेनेमे समर्थ हँ । उनपर जल्पु्णं सोने उत्तम घडे 
रख दिये जाये ॥ १२-१२ ॥ 
बटयश्चोपकररप्यन्तां कषायाश्चैव कुम्भराः। 
प्राशचिकाश्च निमन्ञ्यन्तां श्रेण्यश्च सपुरोगमाः ॥ १४॥ 
(उपहारकी वरस्व भी एकत्र की जार्यै, घडमि रस भर- 
कर रखे जये मस्टयुद्धके नियर्मको जाननैवाले छग 
निमन्त्रित किये ज्ये व्यवसायो तथा कारीगर्यको उनके 
अगुर्जसिदित बुखया जाय ॥ १४ ॥ 
अक्षाचदरेया महानां प्क्षकार्णां तथेव च । 
समाजे मश्श्षोभाश्च कटप्यन्तां सूपकर्पिताः ॥ १५॥ 
'र्स्लो तथा प्रेक्षको ( युद्धम दारजीतके निर्णायको ) को 
ठीक समयसे आनेकी आज्ञा दे दी जाय । रङ्खशालमे सापित 
कयि गये मर्क सोभा बदानेके च्ि उन्द अच्छी तरह 
सजाया जायः ॥ १५ ॥ 
पवमान्ञाप्य राजा स समाजविधिमुत्तमम्‌ । 
समाजवाटान्निष्करम्थ विवेश स्वं निवेशनम्‌ ॥ १६॥ 
दस प्रकार रगशाखको अच्छी तरदसे सजनेकी उत्तम 
व्यवस्थाके स्यि आज्ञा देकर राजा कंस वहसि निकल ओर 
अपने महल्मे चख गथा ॥ १६ ॥ 
आह्वानं तत्न. संचक्रे तस्य मद्दयस्य वै। 
चाणुरस्याप्रमेयस्य सुष्िकस्य तथेव च ॥ १७॥ 
वहां उसने अपने दो मह्छौको बुटाया--एक तो अप्रतिम 
वलदयाटी चाणूर था ओर दूसरा मुष्टिक ॥ १७ ॥ 
तौ त॒ महो मदावीयै वलिनौ वादुािनो । 
कंसस्याक्षां पुरस्कृत्य हौ विविशतुस्तदा ॥ १८ ॥ 
अपनी शुजाति सुशोभित होनेवले वे दोनों महा- 
पराक्रमी बलद्यारी मल्क कंसकी आज्ञा रिरोधायं करके वड 
हर्षके साथ उसके भवनम प्रविष्ट हुए. ॥ १८ ॥ 
तो समीपगतौ दृष्टा महौ जगति विश्वौ । 
उवाच कंसो मपतिः सोपन्यासमिदं वचः ॥ १९॥ 
१. पानीते भरे षे या मर्यिको रखनेके लिये काठक 
वनी हुई चार या छः पायेभकौ टेचुल-नैसी एक चीज, जिते कुछ 
स्यानोप्र पर्दी कहते ह । श्सीका नाम पानकुम्म दै । नीरकण्ठने 
सका प्रयायवाची शब्द षटोच्छरायिका वृत्या दै 1 


अणएाविको ऽध्यायः 


-! । ७ 


उन दोनों विद्वविख्यात षदल्वानोको अपने. समीप 
आया देख राजा कंसमे यह युक्तियुक्त वचनं कदा--॥१९॥ 


भवन्तौ मम विख्यातौ महौ वीरध्वजोच्द्ती । `, 
पूजितौ च यथान्यायं सत्कारार्हो विशेषतः ॥ २० ॥ 
वम दोनो मेरे दस्ारके विख्यात मश्ठ हो ` ओर कीर 
ध्वन ८ शओौैसूचक सम्मान-चिह ) प्रात करके मर्छेमि 
उच्चतम स्थानपर प्रतिष्ठित हुए शो । ठम दोनों मेरे द्रास 
विदो सतार पिक योग्य रहे हो, इस्ल्यि मैने सदा ही 
वम्हारा यथोचित सम्मान कियाहै॥ २०॥ 
तन्मत्तो यदि सत्तारः स्यते सुरुतानि च 1 . ,. 
कर्तव्यं मे मष्टत्‌ कम्रं भवद्भःधां स्वेन तेजसा ॥ २१॥ 
अतः यदि वुम्हं मुद्रसे प्राप्त हुए सत्कार्योका स्मरण 
है, मेरे दवारा करिये गये उपकार ओर सद्व्यवहार भूठे नहीं टै 
तो आज तुम दोर्नोको अपने तेज ( बल्-परक्रम ) सेमेरा 
एक महान्‌ कायं सिद्ध करना होगा ॥ २१९ ॥ 
यवेतौ मम संबद्ध बजे गोपालकावुभौ । 
संकषेणश्च कृष्णश्च वालावपि नितध्मौ ॥ २२॥ 
धयेजोमेरेत्रजमे पठे हए संकर्षण ओर ष्ण नामक 
दो ग्वलि दैः बाख्क होनेपर भी परि्रमको जीत चुके ई 
( कमी थकते नही है ) ॥ २२॥ 
पतौ रङ्गगतौ युद्धे युद्धधमानोौ वनेचरौ । 
निपातानन्तरं शीध्रं हन्तव्यौ नात्र संरायः ॥ २३॥ 
ध्ये दोनों वनेचर जव अलादेमं उतरकर युद्धे । समय 
ठम छ्डने ल्ग? तवर तुम दोनो उन्हे नीचे गिरते दी शी 
मार डालना । इसमे कोई संशाय नदीं मानना चाद्ये ॥२३॥ 
बालाविमौ सुचपलावक्रियाविति सर्वथा । 
नावक्ञा तत्र कन्या कतंन्यो यत्न एव हि ॥ २४॥ 
धये चञ्चल बालक है, इन्दे युद्धकी शिक्षा नदी मिली दे 
सवथा रेखा समञ्चकर तुम उन दोननोकी अवदेल्ना न करना । 
वमह उन्हे मार डछनेके लि पृर-पूर यतन कला दी चादि ॥ 
ताभ्यां युधि निरस्ताभ्यां गोपाभ्यां रङ्गसंनिधौ । 
आयत्यां च तदात्वे च श्रेयो मम भविष्यति ॥२५॥ 
(यदि रगसखलकरे समीप युद्धमे वे दोनों गोप-बारक मार 
डके जयं तो वतमान ओर भविप्यमे मी मेर कल्याण दोगा? 
चपतेः स्ने्संयुक्तै्वचोभिदैएमानसौ । 
उचतुयुद्सम्मौ मधौ चाणूरसुशिकौ (.२६॥ 
राजा कंसके इन स्नेहयुक्त वचनोधे उन दोनो मल्लके 
छटयमे बेड प्रसन्नता हुई । युद्धे छथि खदा मतषाठे रहने 


वले वे दोनो पहल्वान चाणूर ओर मुष्टिक रानासे इस प्रकार 
वोटे--1 २६ ॥ 


२०८ 


श्रीमहाभारते खिलभागे । 


[ हरिवंशे 


यद्यावयोस्तौ भसुखे स्थास्येते गोयकिल्विपौ । 
हतावित्येव मन्तव्यौ प्रेतरूपौ तपसखिन ॥ २७ ॥ 
ध्यदि वे दोनो गोपक्रुल-कंक युद्धम '. दमरि सामने खद 
हो जार्येगे तो आप उरन्दं मरा हुआ ही. समक्षिये | वेक्ष्ट 
उठनिवलि ग्रेतरूप ही ईहै--णेसा मानिये ॥ २७ ॥ 


यद्यावां भ्रतियोस्सयेते ` तावरिष्रपरिष्टुतौ । 
आवाभ्यां सेपयुक्ताभ्यां पसुखे तौ वनेचसै ॥ २८ ॥ 

'यदि किसी अरछि-ग्रहसे ग्रस्त होकर वे दोर्नौ हमलेोग- 
से्गे तो हम रोष्रमे भरकर सवकरे सामने उन दोनों 
वनेचरोको अवश्य मार डटेगे ॥ २८ ॥ 


एवं वाण्विषमुन्खज्य तावुभौ मह्छपुङ्धवौ । 

अचुक्षातौ नरेन्द्रेण स्वे गृहे तौ प्रजग्मतुः ॥ २९ ॥ 
इस्त तरह वाणीरूप विषका वमन करके वे दोनों मस्ल- 

पुङ्गव राजा कंसकी आज्ञा ठे अपने घर चले गये ॥ २९ ॥ 


महामान्ं ततः कंसो व भु दस्ति हस्तिजीविनम्‌ 1 
हस्ती कुदलयापीडः ` तिष्ठतु ॥ २०॥ 
वख्वान्‌ मदरोलाक्षश्चपलः क्रोधनो नृषु । 
दानोत्करकरश्चण्डः प्रतिवारणरोपणः“॥ ३९ ॥ 
ख संनोदयितन्यस्ते तावुदिश्य वनौकस । 
वसुदेवसुतौ वीरो यथा स्यातां "गतायुपौ ॥ ३२॥ 
त्वया चैव गजेन्द्रेण यदि तौ गोजीविनौ। 
भवेतां पतितौ रदे पदयेयमदमुत्करौ ॥ २३॥ 
तत्पश्चात्‌ कंसने दाथीकी परिचयति दी जीविका चलने- 
वाले अपने महावतको बुखकर कदा--“कुवख्यापीड नामक 
हाथी रंगसाखकरे दासपर खड़ा रदे । वह व्र्वान्‌छ मदसे 
चश्च नेच्रवाद्यः चपर तथा मनुर््योके प्रति कुपित रहनेवाख 
है । उसे गण्डस्थल मदकी धारसे उत्कट दिखायी देते ई । 
वह किंसी विपक्षी हाथीको देखते ही रोप्रते भर जातादै 
तथा सभावसे ही अत्यन्त क्रोधी है । वसुदेवकरे जो ' बने 
रहनेवठे वीर पु है, वे यदि द्वारर आ जर्यै तो सुम उनके 
ऊपर उस हाथीको होकर देना, जिससे वहीं उनकी जीवन- 
टीका समक्त दो जाय । मेँ चाहता हर कि गोष्मे जीनेवाठे 
उन दोना मदमत्त वा्कोको ठम्दरे ओर गजराज कुवल्या- 
पीडके द्वारा रंगल्ञाकके द्वारपर धराशायीं क्रिया हुभा देखू ॥ 
ततस्तौ पतितौ चष्ट वशुदेवः सवान्धघ्ः। 
छिन्नमूखो निसखस्वः सभायां विनरिण्यति ॥ ३५॥ 
"उन दो्नाको प्रथ्वीपर पडा देख वसुदेवकी तो जडइदही 
कट जायगी । वे पली भौर वन्धु-बान्धरवौहित निरवलम्ब 
होकर खयं नष्ट दो जगे ॥' ३४ ॥ 
ये चेमे यादवा मूर्खः सवं छप्णपरायणाः । 
विनदिष्यन्ति च्छिनारा षट रृष्णं निपातितम्‌ ॥३५॥ 


(साथ ही ये जो-जो मूं यादव श्रीङ्ृप्णका भरोसा रखते 
है वे सवर श्रीक्ृप्णको मारा गया देल हतार ' होकर विनायके 
गतम गिर जयेगे | ३५ ॥ 


पतौ हत्वा गनजेन्द्रेण मदैव खयमेव वा । 

पुय निगोदर्वी रत्वा विचरिष्याम्यहं खुखी ॥ ३६ ॥ 
दोरनौको गनशज करुवल्यापीड अथवा मल्ल दरार 

मरथाक्रर यरा खयं ही मारकर मधुरापुरीको ' यादवेवि सूनी 

करे मे सुखपूर्वक विचर्तेगा ॥ २३६ ॥ 


पिता हिमे परित्यक्तो यादवानां कुरोः 

हेपाश्च मे परित्यक्ता यादवाः छृप्णपक्चिणः ॥ ३७ ॥ 
धमनि यादवक्ुख्का मार वहन करनेवल अपने पिताको दी 

त्याग दिया | कृष्णक्रा पक्त छेनेवले जो शेष यादवैः वे मी 

मेरे दयाय परित्यक्तं दये चके द ॥ ३७ ॥ 

न चाहमुप्रसेनेन जातः किर ` खुतार्थिना। 

सादुषेणाल्पवीयेण यथा ममाद नारदः ॥ ३८॥ 
यथार्थं व्रात यद है क्रिपुत्रकी इच्छा रखनेवाले इष 

अल्पपराक्रमी मानव उग्रतेनकर द्वारा मेय जन्म नहीं हुभा 

हैः जैसा कि नारदजीने मुध्चे बताया हे; ॥ ३८ ॥ ` 

महामात्र उवातच्त 

कथमुक्तं नारदेन राजन्‌ देषर्पिणा पुरा । 

आश्चर्यमेतत्‌ कथितं त्वत्तः श्युतमृरिदम ॥ ३९ ॥ 
महा्वतने पृा--राजन्‌ ! पूर्वकाल देवधिं नारदने 

केषी बात वतायी थी १ चन्रुदमन ! यह तो मने आपके मुख- 

से बे आश्वर्यकी वरात घुनी दे ॥-३९ ॥ 

कथमन्येन जातस्त्वमुध्रसेनात्‌ ` पितुविना । 

तव माजा, कथं यजन्‌ छतं कप्रदमीटशाम्‌ ॥ ४० ॥ 
यदि अपकरे पित्रा उग्रसेन नदी द तो उनके .दविना दुसरे 

से आपका जन्म केते दुखा दै १ महास { आपकी माताने 

य एसा कुत्सित कर्म केते किया १ ॥ ४० ॥ 

अन्यापि प्राकृता नारी न छूर्यीच्च जुगुण्सितम्‌ । 

विस्तरं श्रोतमिच्छामि छेतत्‌ कौतूहरं टि मे ॥ ४१॥ 
द्सरी साधारणस्री मी रेस -धृणित्त कायं न्दी कर 

सकती दहै; फिर उन्दौनि' केसे क्रियां १ मे .विस्तासपूर्वक इस 

प्रतगको सुनना चादता हरू । इमे जाननेके ल्य मेरे मनमे 

वड़ा कौतूहल रै .॥ ४१ ॥ 

` - कत्त उवाच 

यथा कथितवान्‌ विप्रो मदपरिनीरदः प्रभुः। 

तथाहं सम्प्रवक्ष्यामि यदि ते श्रवणे मतिः ॥ ४२॥ 
कस्ये कहा महावत ¡ यदि ठुम्दारा विचार इस 

रदस्यको सुननेका दी दै तो प्रमावली महिं नारद वाबरनि 


=== ~~~ ~ 


विष्णुं ] 


अर्व ऽध्यायः 


[ष । 


३०९. 


मुञ्घमे जैसा कटा था, उषी तरह' मेँ इसत प्रसंगका वर्णन 

करूगा | ४२॥ 1 

आगतः शाकसदनात्‌ स वै शक्रसखो मुनिः। 

चन्द्रागशचक्कबसनो जटामण्डलमुद्धदन्‌ ॥ ४३ ॥ 

“वे मुनि नारद देवराज इन्द्रे सखा दै । एक दिन 

च््रमाकी किरणोके समान द्वेत व्ल पहने ओर सिरर जय- 

मण्डलका-भार धारण कयि बे इन्द्रभवनसे मेरे यर्हो अवि ॥ 

कृष्णाजिनेोत्तरीयेण रक्मयक्षोपघीतवान्‌ 1 

दण्डी कमण्डदुधरः भ्रजापतिरिवापरः ॥ ४४॥ 
उनके कंयेपर काले मृगचर्मकी चादर पड़ी थी|वे 

सुव्ण॑मय यश्ोपवोतसे विमूपरित थे ओर दण्ड-कमण्डड़ धारण 

कयि दूसरे प्रजापतिके समान जान पड़ते ये ॥ ४४ ॥ 

गाता चतुर्ण चेदानां विद्धान्‌ गान्धर्वेदवित्‌ 1 

स नारदोऽथ देवर्षि्रह्यलोकनचरोऽव्ययः ॥ ४५॥ 
नारदजी वदो बिद्धाम्‌ तो दै दी; गान्धववेद ( संगीत 

विना) के भी पूणं पण्डित दै अतः चारो वेका गान. किया 

करते द । ब्ह्नटोकमे विचरनेवाके वे अषिनादी देवि नारदं 

ही मेरे यहो पधरे थे ॥ ४५ ॥ 

तमागतम्वि दष्ट पूजयित्वा यथाविधि 

पाया्घ्यपरासनं दसा सम्पवेद्योपविदय ट ॥ ४६॥ 
अपने यहो अये हुए उन मदरपिकरो देखकर मेने पाय- 


अर्यं ओर आसन समर्पित करे उनकी विधिपूरवक पूजा की ` 


ओर महल्फे मीतर ठे जाकर उन्हे विटावा ॥ ४६ ॥ 
खुखोपषिोऽथ समुनिः पृष्टा च शरं मम। 
उदवाच च प्रीतमना देवर्षिभौवषितात्पवान्‌ ॥ ४७ ॥ 
जवर सुखमूवक बरेढ गये तवर घुषते करुशल-प्रन करनेके 
अनन्तर प्रघन्नचित्त हुए. उन शुद्ध अन्तःकरणवाले देवषिने 
टस प्रकारे कटा | ४७ ॥ 
सरद उवाच 
पूजितोऽहं त्वया चीर विधिदृष्टेन कमणा 
ददमेकं मम वचः श्रुयतां प्रतिगृद्यतम्‌ ॥ ४८॥ 
नारदी योटे- वीर ! तमने लाल्रीय विथिकरे अनुसार 
मेरा पूजन क्रिया दे; अतः मेरी यद्‌ एक वात सुनो ओर दके 
ग्रहण केसे ॥ ४८ ॥ 
गतोऽहं देवसदनं सौवर्ण मेरुपर्वतम्‌ । 
सोऽदं कदाचिद्‌ देवानां समाजे मेरुमूर्धनि ॥ ४९॥ 
सुवर्णमय मेरपर्वन देवताओंका निवास-सयान है । उस 
पर्वत दि्ठरर एक दिन देवताओक्रा समाज जय हुआ 
था | उसीमिमेैमीगयाथा।॥ ४९॥ 
तन्न मन्त्रतामेचं नूवतानां मया श्रुतः] 
भवतः सालुगस्यैव घधोपायः सखुद्ारुणः ॥ ८० ॥ 


वरहा देवतालोग. अनुनर्योमदित वम्दारे वधक अत्यन्त 
दाखण उपायपर्‌ विचार कर रदे थे । वीं उनके मुखसे यद 
व्रात मैने सुनी यी ॥ ५० ॥ 
तत्र यो देवकीगभों विप्णुलोक्रनमस्छतः। 
योऽश्था मभोँऽषएमः कंस स ते मृत्युभ॑विप्यति ॥५९॥ 
` कंस ] इष देवकीका जो आर्वो गर्भ दै, उसमे दिश्चवन्दित 
भगवान्‌ विष्णु निवास करगे; अतः वह गम ठम्दारी मृल्युकरा 
कारण दोगा ॥ ५९ ॥ 
देवानां स तु सर्वस्वं चिदविवस्य गतिश्च सः। 
परं रहस्यं देवानां ख ते सव्यु्भविप्यति ॥ ५२॥ 
` वे विष्णु दही देवता्ओकि सर्वघ्ठ द| स्वर्गलोकके 
आश्रय ह तथा देवगणौके परम रदस्य दहै ।वे दी ठम्दारी 
मृत्युम कारण हग ॥*५२ ॥ 
यलश्च क्रियता, कंस गभीणां पातनं प्रति । 
नावक्षा रिपवे कायौ दुवे सखजनेऽपि वा ॥ ५३ \ 
कंस | तुम देवकीके गर्थौको मार गिरानेकरे च्ि यलं 
करो | रा दुख अथवा खजन हो तो भी उक्त प्रति उपेक्षा 
नदीं करनी चाहिये ॥ ५३ ॥ 


न चाथमु्रसेनेः स पिता तव म्हाचलः। 


द्रमिदो नाम तेजघखी सौभस्य पतिरूर्जितः ॥ ५७ ॥ 
ये उग्रसेन तुम्दरि पिता नदीं द । सीम विमानक्रा खामी 
ओज ओर तेजये सम्पन्न मदापरदी रमि ठम्दारा पिता है ॥ 
श्रुत्वाहं तद्‌ वचस्तस्य क्रिचिद्‌ रोषसमन्वितः 
भूयोऽपृच्छं कथं व्रह्मन्‌ दुमिशो नाम दानवः ॥ ५५॥ 
मम माना कथं तस्य बृहि धिप्र समागमः। 
पतदिच्छम्यदहं श्रोतुं विस्तरेण तपोधन ॥ ५६॥ 
नारदलीकी यह व्रात सुनकर सुत्ने कुठ रोष आ शया । 
मेने पुनः पूछा--श्रह्न्‌ ! दरुमिर नामक दानव किप तरह 
मेरा पिता हुमा १ तपोधन विप्र ! बताइये, भेरी माताकरे साय 
उसका समागम क्ते दधा नै यद स्व विसता साय 
सुनना चादता हू, ॥ ५५.५६ ॥ 
। नारद्‌ उवाच 
हन्त ते .कथयिष्यामि गणु राजन्‌ यथार्थतः । 
द्रुमिरुस्य च माना ते संवाद्‌ं च समागमम्‌ ॥ ५७॥ 
नार दजीने कदा--राजन्‌ ! वृहत अच्छा, हुमिट्का 
व्दारी माताके साथ जो संवाद ओर मागम हुमा था, वह्‌ 
सव्र म ठम्ह यथाथ सूपतसे ता रदा हू, नो ॥ ५७ ॥ 
सुयासुनं नाम नगं तवर माता रजखला। 
बेक्षितुं सहिता स्रीभिगेत। चै सा कुतूहलात्‌ ॥ ५८॥ 
एक समयकी वात टैः दम्शरी माता जव रजस्वला 


२९० 


श्रीमहाभारते सिखभागे 


[ शसि 


( होनेके पश्चात्‌ स्नान कर चुकी ) थी». कौतूहट्वया दूसरी 
लियेकरि साथ सुयामुन नामक पवंतका दर्शन करनेके चयि 
गयी ॥ ५८ ॥ 
सा तत्र रमणीयेपु रुचिर्ट्ुमसाुपु। 
चचार नगश्णङ्धेयु कन्दरेषु नदीषु च ॥ ५९॥ 
वह्‌ वरो पर्वतकरे रमणीय दिखर्सोपरः जो मनोदर वृक्षि 
सुशोभित येः विचरन गी । उसने वर्होकी कन्दरारथेमिं तथा 
नदियेक्रे तर्टोपर मी भ्रमण किया ॥ ५९ ॥ 
किन्नरोद्रीनमधुखः प्रतिश्चुत्यभिनादिताः। 
ञ्रण्वन्ती कामजननीवीचः श्रोत्रसुखावहाः ॥ ६० ॥ 
वदो उसे कार्नोको सुख देनेवाखी कुड ेसी वराते नने- 
को मिरी जो कामोदीषन करनेवाली थीं । वे वतिं किन्नर्यँ- 
के गाये हए गीतोँके रूपम उपकन्ध होनेके कारण बड़ी मधुर 
प्रतीत होती थीं यौर प्रतिध्वनिसे सव्र ओर गूंजती रहती 
थीं ॥ ६० ॥ 
वर्दिणां चैव विरुतं खगानां च विषूनितम्‌। 
अभीक्षणमभिग्दण्वन्ती स्ीघर्ममभिरोचयत्‌ ॥ ६१ ॥ 
मयूरोकी मधुर केकाभ्वनि तथा विदंगमेोकरि कलर्वोको 
निरन्तर सुनती हुई ठम्दारी माताके मनम खीधमं ( पुरुष- 
सहवास ) कौ सुचि जाग्रत्‌ हो उठी ॥ ६१ ॥ 
पतस्मिन्नन्तरे वायुवेनराजिविनिःखतः। 
ह्यः कुख॒मगन्धाट्यो ववौ मन्मधवोधनः ॥ ६२ ॥ 
इसी वीच चनश्रेणिर्वति निक्रलकर पूर्छकी सुगन्धक मरी 
हुई मनोरम वायु चलने गीः जो काममावको जगानेवाटी 
थी | ६२॥ 
दविरेपाभरणाश्चैव कदम्बा वायुधद्धिताः। 
मुसुचुग॑न्धमधिकं  संततासारमूर्ितःः ॥ ६२॥ 
खिले टुए कदर्म्योपर श्रमरछये हुएयेः जो उनके 
आभूषणते जान पड़ते थे । वायुके क्षेकि खाकर ओर निरन्तर 
गिरती हुई जक्धाराओैषि मूच्छित-ठे होकर वे कदम्ब अधिका- 
धिक गन्ध छोड्ने लगे ॥ ६३ ॥ 
केसराः पुष्पव्पैश्च वचूघुर्मदयोधनाः। 
नीपा दीपा इवाभान्ति पुष्पकण्टकधघारिणः ॥ ६४ ॥ 
मदनोन्मादको जगानेवाठे नागक्रेसर अपने परलोक वर्पा 
कर रदे ये । पुप्पमय्र कण्टक धारण करनेवाले नीप वीपे 
समान प्रकारित हो रदे ये ॥ ६४ ॥ 
मही नतव्रद्णच्छन्ना इक्रगोपविभूष्िता। 
यौवनस्थेव चनित। स्वं दधारार्त॑वं वपुः ॥ ६५॥ 
नयी-नयी षासोसि ठकी यर वीसहू्ीसे विभूषित हुई 
वसुधा नवयरुवती नारीके समान मानो रजखघल्-र्प धारण 
क्रि ईष्ट थी ॥ ६५ ॥ 


~~~ = न = न ~ नन 


अथ सौभपतिः श्चीमान्‌.द्रमिरो नाम दानवः 
भविष्यदूदैवयोगेन . विधात्रा तत्र॒ नीयते. ॥ ६६॥ 

ठेते समयमे सौभविमानका अयिति द्वुमिल नामक 
दीतिमान्‌ दानव भावी दैवयोगसे विधाताद्रारा प्रेरित होकर 
वर्दो आ पर्टुचा ॥ ६६ ॥ 


कामगेन रथेनाद्यु तख्णादित्यवर्चसा । 
यदच्छया गतस्तचन स्ुयामुनदिटश्षया ॥ ६७ ॥ 


इच्छानुसार चल्नेवादा उसका विमान प्रभातकाल्के 
सूर्यकी माति तेनःपुञ्चसे प्रकारित हो रहा या। उसके द्वार 
वष्ट वहा सुयामुन पर्वतकी शोमा देखनेकी इच्छसे शीधता- 
पूर्वक सहसा आ गया ॥ ६७ ॥ 
विष्ायसरा कामगम मनसो.ऽप्याद्युगामिना । 
स तं प्राप्य पर्वतेन्द्रमवतीयं रथोत्तमात्‌ ॥ ६८॥ 
` मनसे भी तीतर गतिवाठे उस विमानद्वास आकाश्मार्गषे 
इच्छानुसार चल्नेवाटा यह दानव पर्वतराज सुयामुनपर 
आकर उस श्रेष्ठ रथे नीचे उतरा ॥ ६८ ॥ 
पर्वतोपवने न्यस्य रथं .पररथारुजम्‌ । 
अथासौ सूतसदितश्चचार नगमूर्धनि ॥ ६९॥ 
शुके रथको तोड़ ढाल्नेवाले उख रथ ( विमान को 
उस पर्व॑ते उपवने खड़ा कर वह विमानचाल्करके साथ ` 
पर्वेत-शिखरपर विचरण कसे ट्गा | ६९ ] 
ततो वहून्यपश्येतां काननानि वनानि च। 
स््ठुगुणसम्पगनं नन्दनस्येव काननम्‌ ॥ ७०॥ 
उन दोनेनि वँ ब्रूहुत-ठे वन ओर कानन देखे । वरहो 
की वनसखली नन्दनवनके समान समी तुकि गुणंसि 
सम्पन्न थी | ७०॥ 


चेरतुर्नगश्ग्धेषु कन्दरे नदीषु च। 
नानाघातुपिनद्ेश्च शदैर्वहुभिरुचतेः ॥ ७१॥ 
नानारलविचित्रैश्च काश्चनाञ्जनराजताय्‌ 1 
नानाफुखमगन्धाद्यान्‌. नानासच्वगणे्तान्‌ ॥ ७२॥ 
नानाद्धिजगणेघंठान्‌ नानापुष्पफलद्धुमान्‌ । 


नानोपधिसमायुक्तादषिसिद्धाचुसेवितान्‌ ॥ ७२॥ 

वे दोनों उश पर्व॑ते शिखरयोपर, कन्दरा्थमिं ओर 
नदि्योकि किनरकिनारे घूमने छगे । उस पर्व॑ते बहुत 
ऊचे-ऊँचे शिखर नाना प्रकारकी धातु्भसि आदृत्त ये! भति- 
मोतिकर र्नौति उनकी विचित्र शोभा हो रदी थी] उन दोननि 
देखा पर्वतकरे विभिन्न दिखर सुवर्णमय, रजततमय तया 
अञ्नमय दिखायी दे रहे द । नाना प्रकारे पूर्लकी सुगन्ध 
वहो व्याप्त दो रदी दै । मोति-भोपिके जीव-जन्तु समुदाय 
वदो निवास करते ह । अनेक ग्रकारफे पक्षी अपने कलरवसि 
उन शिखरोको कोलादल्ूर्णं कर रदे ६ । मति-भोतिकरे पुष्य 


विष्व] _____ नणयः भ 


ओर फलि सम्पन्न दृक्ष वा रदरहा रदे द 1 नाना प्रकास्की 
ओधधियेधि संयुक्त उन दिखर्येपर ऋषि ओर सिद्ध पुर 
निवास करते ह || ७१--७३ ॥ " 
विद्याधरान्‌. . किम्पुरुषाचक्षवानरयक्षसान 1 
सिदान्‌ व्याघ्रान्‌ वराहाश्च महिषान्छरभान्छशाम्‌ ॥ 
खमराश्चमरान्‌ न्यद्कुन्‌ मातङ्गान्‌ यक्षराक्षसान्‌ } 
. एवं बहुविधान्‌ परयंश्चरमाणो नगोत्तमम्‌ ॥ ७६॥ 
विद्राधर, किन्नरः रीछः वानरः रभसः सिंहः व्याघ्रः 
वराहः तेः शरभः खरगोाः समर्‌ ( मृगविद्रोष ); चमर्‌ 
( चर्वैरी साव ) न्यद्ु ( बरदसिंगा ) हाथी, यल्तः निखाचर 
तथा रेस दी नाना प्रकासकी जातिके प्राणिर्योको देखता हु 
वह दानव उस उत्तम पवतपर भरमण्र कर रहा था ]]७५.७५॥ 
दुणद्‌ दद्॒॑दपतिरदैवीं देवसुतोपमाम्‌ । 
क्रीडमाना सखीमिश्च पुष्पं चेव बिचिन्वतीम्‌ ॥ ७६ ॥ 
इसी समय उस दानवयाजने वृरसे ही उग्रसेनकी रानीको 
देखा, जो सखियेकरे साय क्रीडा करती तथा पूर चुनती दुई 
देवकरन्याकरे समान सुदोमित हो रही थी ॥ ७६ ॥ 
` ततश्चरन्तीं सुश्रोणीं खखीभिः सह संततम्‌ 1 
दृष्ट सौभपतिर्दरद्‌ विस्मयम्‌ सूतम्वीत्‌ ॥ ७७ ॥ 
सिये धिरी हुई उस सुन्दर कय्प्रदेशावाली समणीको 
दूरे ही वर्षा विचरती देख सौम विमानका खामी ब्रुमिल 
क्रित हो उठा अौर अपने विमानचाल्कते इस प्रकार 
वोख---] ७७ ॥ 
कस्येयं सगशावाक्ती चनान्तरविचारिणी । 
रूपौदार्यगुणेयेताः मन्मथस्य रतिर्यथा ॥ ७८ ॥ 
भ्सूत { इस वनके भीतर विचरनेवाखी ग्रह॒ मृगनयनी 
चाल किसकी खी हैः जो सूप ओर उदारता आदि गुणि 
सम्पन्न होकर कामपत्नी रतिके समान शोमा पा रही है ॥७८॥ 
शचपैव ॒पुरुहतस्य उताहो वा तिरोत्तमा 
नारायणोरं निर्भिद्य सम्भूता बर्वणिनी 1 
पलस्य दयिता देवी योषिद्रत्नं किमुर्वशी ॥ ७९॥ 
'अदो | कया यह देवराज इन्द्रकी पत्नी शची है या 
तिखेत्तमा है अथवा जो भगवान्‌ नारायणके ऊख्का भेदन 
करके प्रकट हुई ओर पुरूपवयाकी प्यारी महारानी चनी थीः 
वह सुन्दर कान्तिवाली रमणीरत्न उर्वशी है १ ॥ ७९ ॥ 
क्षीरार्णवे मध्यमाने सखुरासुरगणेः सद 1 
मन्थानं मन्द्रं कृत्वासतार्थमिति नः श्रुतम्‌ ॥ ८० ॥ 
ततोऽश्तात्‌ ससुत्तस्थ देवी श्ीरलोकभाविनी । 
नारायणाह्टुछिता कि श्रीरेषा चरङ्गना ॥ ८१1 
'्हमने पुना है--देवतारओनि अयुरयके साय मिखकर अमृत- 
करी प्रािक्रे स्थि मन्दराचकको मेथानी बनाकर जव श्चीर- 


अषा्चिशोऽध्यायः 


~~~ , 


२११ 


सागरका मन्यन किया था, उस सप्नय उसके अशरतमय दुग्धसे 
सोकमाविनी र्मी देवौका ्राटर्माव हुजा था, जे मगवान्‌ 
नायायणके अङ्कमे रोमि होती दै यह सुन्दरी अङ्गना वदी 
ख्क्मी देवी तो नदीं दे 1 ८०-८१ ॥ 
भीलमेघान्तरगता `` . चोतयन्त्यचिर प्रमा । 
तथा योपिद्गणान्‌ मध्ये रूपं प्र्योतयद्‌ वनम्‌ ॥८२॥ 
ते थोद्ध-योड़ देर चमकनेवारी त्रिजटी नील मेधके 
भीतर रहकर अपना प्रकाश कैलाती दै उरी प्रकार यद 
सिये वीच रहकर अपने स्प ओर वनको प्रकादित 
करती हई यद विचर रही दे ॥ ८२ ॥ 


अतीव सुकुमासाङ्खी खप्रमेन्दुनिभानना } 
दष्टा रूपमनिन्द्ाङ्श्ा विश्रान्तो व्याङ्लेन्दरियः ॥८२॥ 
(इसके अङ्ग बडे ही सुकुमार ई मुख चन्दरमाके समानं 
सुन्दर कान्तिसे उद्धात हो रदा दै {शस निर्द्र अङ्गोबाटी 
समणीका स्प देखकर म पागल दो गया हू | मेरी सारी 
इन्द्र्यो न्याद्कुर दौ उढी ई ॥ ८२ ॥ 
कामस्य वरामापन्नो मनो विहलतीव मे)! ˆ 
शरां छन्तति मेऽङ्गानि सायकैः कुसुमायुधः । 
भिचा हदि शारान्‌ पञ्च निदैयं हन्ति मे मनः ॥ ८४॥ 
भम कामके अधीनदहो गया हूं) मेरा मन विहल्सा हो 
रहा हे । पुष्पधन्वा कामदेव अपने सायके मेरे अङ्गोको चड़ 
वेगसे छिन्न-भिन्न कर रहा है । मेरे ददयमे अपने पोच वार्णे- 
का प्रहार करे वह बड़ी निर्द॑यताकरे साथ उसे विदीर्ण कर 
रदा हे ॥ ८४॥ 
हदयाधिर्वर्धयति आच्यसिकतं इवानलः । 
कथमद्य भवेत्‌ कार्यं शमाथं मन्पथार्निना ॥ ८५ ॥ 
केनोपायेन करिः ऊमा भजेन्मां मचगामिनी । 
मेरे दयक भीतर कामाग्नि बद रदी है । वह धीकी 
आहुति पाकर वदी हुई आगणकरे समान प्रज्यञिति हो उरी 
है । इस कामागनिते शान्ति पनेकरे व्यि इस समय ते वौन- 
सा यत्न करिया जाय १ अहो ] किख उपायसे हम क्या करः 
जिससे यह मत्तवाखी चाक्ते चल्नेवाटी रमणी सुस्चे अङ्खीकार 
करदे | ८५३ ॥ 
प्यं वहु चिन्तयानो नोपलभ्य च दानवः ॥ ८६ ॥ 
खतमाद युहनं॑तु तिष्ठस त्वमिद्टानध । 
अहं स्यामि तां द्रष्टं कस्येयमिति भोपरि्तम्‌ ॥ ८७॥ 
इस प्रकार बहुत सोचनेपर मी जवर कोई उपाय नदीं 
सूषा तवर उस दानवने अपने सारथित्ते कहा--पअनघ } त॒म 
दो घड़ी यदीं उदरो, म खयं ही उसे देखने तथा यह्‌ किसकी 
खी है, इख वातकरा पता ट्यानैके लि जाता द ॥८६-८७] 
प्रतीक्षमाणत्तिष्ठस्व यावदागमनं मम । 
श्ुत्वा तु वचनं तस्य तथास्त्विति वचो ऽत्रवीच्‌ ॥८८॥ 


२१९ 


पजक मे लौय्कर न आऊँ, तवतक तुम यहीं मेरी 
प्रती्ना कसते हए खडे रदो) द्रुमिलकी यह चात सुनकर 
उसके सारयिने कंहाः ध्वहुत अच्छा ! एेसा ही होगा ८८॥ 
पवसुष्त्वा द्ःनवेन्द्रौ गमनाय मनो दधे । 
वायुपस्पृश्य रवान्‌ ध्यानमेवान्वचिन्तयत्‌ ॥ ८९ ॥ 

सारथिसे उपर्युक्त बात कहकर बलवान्‌ दानवराज दुमिल- 
ने उसके पास जनिका विचार करिया । फिर उसने जक्ते आचमन 
क्रिया ओर ध्यान कगाकर उसके विषयमे चिन्तन करने ल्गा 


भुतं ध्यानमात्रेण देष्रं क्षानबलत्‌ ततः 1 
उभ्रसेनस्य पत्नीति श्षात्वा हषेमुपागतः ॥ ९० ॥ 
दो घड़ीतक्र ध्यान करलनेमात्रसे उसने ज्ञानवलसे देख 
लिय) क्रि यह्‌ राजा उग्रसेनकी पत्नी है 1 यह जानकर उसे 
बढ़ा हर्ष हआ ॥ ९० ॥ 
उभ्रसेनस्य रूपं वे कृत्वा स्वं परिचत्यं सः 
उपासपन्मडावाहुः परहसन दृनवेश्वरः ॥ ९९१॥ 
स्मयमानश्च शनकैर्जश्रदामितवीयंवान्‌ । 
उग्रसेनस्य श्पेण मातरं ते व्यधषेयत्‌ ॥ ९२॥ 
फिर तो उसने अपना सूप वदल्कर उग्रसेनका रूप 
धारण कर लिया । तत्पश्चात्‌ वह अभितपराक्रमी मदावराहु 
दानवराज रखता हआ उसके पाठ गयाः फिर धीरे-धीरे 
मुसक्ररते हए दी उसने उसे अपनी भुजार्थमि कख लिया | 
दस प्रकार उग्रसेनके ही रूपतसे उसने तुम्हारी माताका सतीत्व 
मङ्ग किया ॥ ९१-९२॥ 
सा पतिलनिग्धहदया तं भवेनोपसपंती । 
श्त! चाभवत्‌ पश्चात्‌ तस्य गौरथदशषेनात्‌ ॥ ९३ ॥ 
पतिक प्रति दयम अच्यन्त स्नेह रखने कारण वद्‌ 
देवी बडे प्रेमे उसकी सेवा उपस्थित हुई । पीछे उसके 
शरीरके मारीपनका अनुमव करफे वह रउद्कित हो उटी॥ 
सा तमादोत्थिता भीता न त्वं मम पति्धवम्‌। 
कस्य त्वं विकताचारो येनासि मलिनीरता ॥ ९.४ ॥ 
उठकर भयमीत दो उसने उससे कदा--ननिश्चय दी त्‌ 
मेरा पति नदीं है; अतः वता, तू किंसका दुराचारी पुत्र दैः 
जिखने भुद्चे करुङ्कित कर दिया १॥ ९४॥ 
पकभदनतमिव्‌ मम संदूष्रितं खया । 
पत्युमे रूपमास्थाय नीच नीयेन कमणा ॥ ९५॥ 
भ्नीच { तूने मेरे पत्तिका रूप धारण करके अपने नीच 
कर्मसे मेरे पातितत्यको दू्रित कर दिया ॥ ९५ ॥ 
कि मां षक्ष्यन्ति रूषिता बान्धवाः कुरु्पांसनीम्‌ 1 
ञ्ुगाप्सिता च वत्स्यामि पतिपक्षर्निराङूता ॥ ९६॥ 
'अब रोषे भरे हुए मेरे बन्धु-बान्धव मृन्न कुल- 


अि्ाभारते सिखभागे 


[ हरिशे 


कलङ्किनीको क्या कगे १ मुञ्चे पतिपक्करे लोगो निन्दित 
ओर तिरख्छृत होकर रहना पडेगा ॥ ९६ ॥ 
धिक्लामीदशमक्षा्तं दुष्क गयुत्थितेद्दिपम्‌ । 
अविभ्वास्यमनार्य च परदाराभिमर्नम्‌ ॥९७॥ 
तू एेसा अक्षहनशीलः दूषित कुलम उत्पन्न अजितेन्द्रियः 
अविदवसनीयः अनार्यं तथा परल्ली्नो कलद्कित करनेवाला है, 
तत्ने धिक्छार है ॥ ९७॥ 
स तामाह प्रसजन्त क्षिप्तः क्रोधेन दानवः । 
अहं वैं द्रुमिटो नाम सौभस्य पतिरूर्जितः ॥ ९८॥ 
कि मां क्षिपति रोषेण मूढे पण्डितमानिनि । 
माञुषं पतिमाश्चित्य नीचं श्रत्युचस्े स्थितम्‌ ॥ ९९॥ 
जवे इस प्रकार धिक्तार देती हुई वह उसे उलच्च पड़ी; 
तव उसके अक्षिप सुनकर उस दानवने क्रोधपूर्वक कहा-- 
भूद्‌ नारी ! तू अपनेक्रो बड़ी विदु्री मानती है १ अरी! 
मै सौम विमानका अधिपति ओजस्वी दानव द्रुमिल हः त्‌ 
मत्युके वशम रहनेवके ठुच्छ मानव पतिक्रा आश्रय लेकर 
रोप्रूर्वक मेरे ऊपर अश्षेप कर्यो करती ३ १ ॥ ९८-९९ ॥ 
व्यभिचारान्न दुष्यन्ति लियः खीमानगर्विते 
न ह्यासां नियता बुद्धिमौचुषीणां विरोषतः ॥१९००॥ 
` स्लीकरे सम्मानपर गर्वं करनेवाली नारी ! ( देवताओं 
ओर दान्वोफ साथ ) विवशतापूवक व्यभिचार घटित होने 
चरथो दूषित नदीं दोती द । इन चिर्योकी विशेषतः मानती 
लि्ोकी बुद्धि निश्चल नदीं होती ॥ १०० ॥ 
श्रुयन्ते हि सियो वहम व्यभिचारब्यतिक्रमैः। 
प्रसूता देवखंकारान्‌ पुराम्‌ निश्वटविक्रमान्‌ ॥१०१॥ 
'सुननेमे आता है कि बहुतेरी धिर्यो व्यभिचाररूप 
दोष वरन जनेपर भी अविचरू पराक्रमी देवोपम पर्नोकी 
जननी हुई द ॥ १०१ ॥ 
अतीव हि त्वं सख्रीकके पतिधर्मवती सती । 
डुदा केशान्‌ विधुन्वन्ती भाष्रसे यदयदिच्छसि॥ १०२॥ 
"ी-नगतमर एकतर ही तो वदी पतिधर्मःपरायणा ओर दुधकी 
धोयी हुई दध सती है, जो अपने कैश-कठपोंको कम्पित 
करती हुई जो-जो चाहती है, चकती चली जा रदी ६ ।१०२॥ 
कश्य त्वमिति यश्चा त्वयोक्तो मत्तकानि । 
कंसस्तस्माद्‌ रिपुध्वंसी तव पुत्रो भविष्यति ॥१०३॥ 
'मतवाखी स्री ! तमने जो पुदयसे यह पूछा है कि-- 
कस्य त्वम्‌--तू क्रिसक्रा पुत्र हैः इससे वमह कंस नामक 
शुनाशक पुत्र प्राप्त होगा ।॥ १०३ ॥ 
सा सरोषा पुनभूत्वा निन्दन्ती तस्य तं वरम्‌ । 
उवाच श्ययिता देवी दानवं धृष्टवादिनम्‌ ॥१०४॥ 


यह्‌ सुनकर वह देवी पुनः रोपरमै भरकर उसके उस 
वरी निन्दा करने स्गी ओर टिटारईके साथ बाति करनेवाटे 
उत्त दानवसे व्ययित होकर बोटी--। १०४॥ 
धिक्‌ ते वृत्तं सुदुर्बत्त यः सवौ निन्दसि सिवः 
सन्ति सियो नीचव्रत्ताः सन्ति चेव पतिव्रताः ॥ १०५॥ 
ध्ुराचारी दानव | तेरे इस धृणिन आगचारको धिक्कार 
हैः ज तरू संखरक सारो लियौँशी निन्दा कर रहा है! मना 
करि जगतूमे नौच आचार-विचारवाली किर्या भी है परंतु 
पतिव्रते मी कम नही है ॥ १०५॥ 
यास्त्वेकपल्नयः श्रयन्तेऽरुन्धतीप्रमुखःः खियः 
धृता याभिः प्रजाः सवौ लोकश्चैव कुखाधम ॥१०६॥ 
कुलाधम [ अरन्धत्ती आदि जो पतिव्रता छियां सुनी जाती 
है, उनक। सरण कर ! जिरन्दोने समस्त प्रनाओं तथा सम्पूणं 
रोकौको अपने सतीत्वरे ब्रल्पे ही धारण क्रिया है ॥ १०६॥ 
यस्त्वय( मम पुत्रो वै दन्तो चन्तविनाशनः। 
न मे वहुमतस्त्वेप श्ण चापि यदुच्यते ॥१०७॥ 
तूने जो सुश्च तदाचारनाशक पुचर प्रदान क्रिया 
दरक परति मेरे मनमे अधिक, आदर महीं है । इस विष्य 
मजो कुछ कती हूः उसे सुन ठे ॥ १०७॥ 
उत्पत्स्यति पुमान्‌ नीच पतिवंशोे ममाद्य यः। 
भविप्यति स ते सत्युयंश्च दत्तस्न्वया सुतः ॥१०८॥ 
ध्नीच | अवर मेरे पतिके कुट्मे परमपुरप्र परमेश्वर 
अवतार ठेगेः जो तेरी तथा तूने जो पुत्र दिया है, उसकी भी 
मृत्युके कारण दोगेः ॥ १०८ ॥ 
दुमिलस्त्वेवमुक्तस्नु जगामाकाशम तु, 
तेनैव रथमुख्येन दिव्येनाप्रतिगामिना ॥१०९॥ 
उसके ठेसा कहनेषर द्रुमिक उसी अनुपम गतिवलि दिव्य 
निमानद्वारा पुनः आक्राशक्रो दी चल गया ॥ १०९ ॥ 
जगाम च पुरी दीना माता तदहरेव ते। 
मामेवमुक्त्वा भगवान्‌ नारदो मुनिसत्तमः ॥११०॥ 
दीण्यमानस्तपोवीयीत्‌ साक्षादध्चिरिव ज्वखन्‌ । 
वल्क वाद्यमानो हि सक्तख्वरविमूचछिताम्‌ ॥११९॥ 
गायनो लक््यवीथीं स जगाम ब्रह्मणो ऽन्तिकम्‌ । 
कम्दारी माता अच्यन्त दीन होक्रर उसी दिन मथुरापुरी- 
को ची गयी । मावत ! मुद्चते इस धकार कद्कर मुनिश्रषर 
भगवान्‌ नारद अपने तपो्रल्ते प्रफारित तथा साक्षात्‌ अगि- 


अष्विशोऽध्यायः ; 


२१२ 


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के समान देदीप्यमान हो, सात खररौकी मूच्छ॑नाका विस्तार 
करनेवाटी वीणां व्रजते ओर गति दए खश्यवीथी (अथवा 
अलक्षयवीथी ) देवयान मार्गसे ब्रह्माजीके प्रप्त चले 
गये ॥ १६०-१६१६ ॥ 
श््रणुष्वेदं महामा निवोध वचनं मम ॥११२॥ 
तथ्यं चोक्तं नास्देन बेलोक्यक्षेन धीमता । 
महावत ! मेरी बह बात सुनो ओर समक्ष । तीनों लेर्को- 
करी ब्रातं जाननेवाये बुद्धिमान्‌ नारदने सव कुछ ठीक दी कहा 
था॥ ११२१॥ 
अं वेन वीर्येण नयेन विनयेन च ॥११३॥ 
भमाणेवौपि दीर्येण तेजसा विक्रमेण च। 
सत्येन चैव दानेन नान्योऽस्ति सदशः पुमान्‌ ॥११४॥ 
अधिक कट्नेकी क्वा आवदयक्रता-- वलः वीयं, नयः 
विनयः प्रमाणः गक्तः तेजः पराक्रमः सत्य ओर दानकरे द्वारा 
मेरी समानता करनेवाला दूसरा कोई पुरप नदी ह। ११३-१९४ 
विदित्वा सवमत्मनं चचनं श्रदधाम्यहम्‌ । 
श्चेचजो.ऽहं सुतस्तस्य उग्रसेनस्य हस्तिए ॥११५॥ 
महावत ! अथनेको सर्वथा इन गुणोते युक्त समञ्चकर 
मै नारदजीकी वातपर श्रद्धा करता हू, इस संदेह नहीं 
कि मे उग्रसेनकरा क्च पुत्र हीह | ११५॥ 
मातापितृभ्यां संत्यक्तः स्थापितः स्वेन तेजसा 
उभाभ्यामपि विद्धिष्रो वान्यवेश्च वि्षेपतः ॥११६॥ 
माता-पिताने तो मुञ्चे याग द्यी दिया है) म अपने तेजसे 
ही इस िासनपर वेठा हूं } मेरे माता-पिता तथा विरेषतः 
समी बनधु-वान्धव मुञ्चते द्वेष रखते द ॥ ११६ ॥ 
पतानपि हनिष्यामि यादवान्‌ ईष्णपक्षिणः। 
तद्विमो घातयित्वा तु हस्तिना गोपकिरिवपौ ॥११७॥ 
ये समी यादव श्रीकृप्णके पक्षम मिल गेहैः अतः 
इन दोनों गोपक्ुलकरख्कोको दा्थीके दवार मरवाकर इन 
याद्वोक्रा भी व्र फर उरगा ॥ ११७ | 
तद्‌ गच्छ गजमारद्य सांङ्कशप्रासतोमरः । 
स्थिरो भव महामात्र समजद्वारि मा चिरम्‌ ॥११८॥ 
अतः महावन | ठम जाओ ¡ कुवल्यापीड हाथीपर 
आरूद्‌ हो अङ्यः भाला ओर तोमर चि रङ्वदालाकेद्वारपर 
दद्तापू्वक उट जाओः विलम्ब न करो ॥ ११८ ॥ 


इति श्रीमहाभ(रते खिरभागे दरिवेशे विष्णुपर्वणि कंसवाक्येऽ्ाविश्तेऽध्यायः ॥ २८ ॥ 


दस प्रकर श्रीमहाभास्तक खिरभाग हिंशके अन्तर्गत विष्णुपर्व कंसका चायमिपयक अद्यास्य 
अध्याय पूर्‌ हज ॥ २८ ॥ 


"गि @ कनद 


२३१४ 


श्रीमहाभारते सिलभागे 


¦ [ हरिवंशे 


एकोन््रिरोऽध्यायः ` ` . ` , 
नागरिकिसि भरी रडदारामे मश्वं तथा प्रे्षागर्हफी शोभा, कंस तथा मटका आगमन, 
श्री्प्ण ओर वहरामका रङ्दारपर पदा्पण, इवलयापीड, महावत तथा दाथीके `. 


पादरक्षकका वध ओर दोनों 
वैश्नम्पायन उवाच 


तसमिघ्नहनि निश्रँत्ते द्वितीये समुपस्थिते । 
आपूर्यत मसः पौरैर्यद्धदिर्चभिः ॥ ९ ॥ 
बैदाम्पायनजी कते ईहै--जनमेजय ! बद दिन 
समाप्त दोकर जवर दूसरा उपद्धित हुभा, तवर युद्ध देखनेकी 
इच्छावठे पुरवासिर्यौसि वह मदान्‌ र्नस्थल भर गया ॥ १॥ 
सचिव्राष्ठलिचरणाः सागलद्धासवेदिकाः+ 
सगवाक्चार्धचन्द्रच्य खतद्पोत्तमभूषिताः ॥ २ ॥ 
वर्यो जो मञ्चस्वेग्येयेः वे चित्रे सुल्लोमित तथा 
अट कोण्वाटे पावि अकत थे | जिन धर्मि वे मख्य; 
उनके द्वारोपर वरेदिर्धो चनी थीं यौर कुण्डके साथ करिव 
मी थी | उने रेखक स्पे अदं चन्द्राकार छिद्र र्खे गये 
ये ] वे मच्च ओर मच्रामार उत्तमोत्तम विद्धीति विभूषित 
ये॥२॥ 
प्रादुः सुसैश्वाखनिमुकतेमीस्यदामावतंसितैः । 
यदंछृतैर्विरज्द्धिः शारैरिव तोयैः ॥ २ ॥ 
मञ्चागरः खनिर्युकतरयंदाय खविभूषितैः। 
समाजवाटः शद्यमे समेधोध इवार्णवः ॥ ४ ॥ 
उन मध्वागारेक्रि दवार पूर्वामिगुख ये) वे सव-के-सव 
सुन्दर जीर खु दए ये ( अथवा उनम क्षीने सूतक्रे मनोदर 
परदे खमे ये ) | पर्लोक्री मालार्यी तया मोती आद्िकी र्दधिर्यौ- 
से उन सवकरौ सजाया गया था। वे चोभासम्यन्न एवं 
अकृत मञ्चागार शरद्‌ तुके वादरकरि समान शोमा पति 
शे ] उन्म घुन्दर मस्ठ दि यथाख्यान वैं ये, जिर 
युदधके च्ि मदीर्मोति विभूप्ित क्रिया गया था | उन सवरकर 
द्वारा वद समानवाट या रद्य मेर्घोकी धरटासे युक्त मदा- 
सागरे खमान गोभा पारदा या|| ३-४॥ 
सखकरम॑द्रव्ययुक्ताभिः पताकाभिर्निरन्तरम्‌ 
श्रेणीनां च गणानां च मञ्चा भान्त्यचटोपमाः।॥ ५ ॥ 
वरदो छ दही यिल्यते जीवननिर्वाहि ` करमेवाटे श्रेणी 
नामक कारीगररो तथा एक जातकं समुदार्योके च्य 
पयक-धरथक्‌ मश्च थे । उन मर््ोषर जो पताकारणुं निरन्तर 
फदराती रदती थी, उन्म उन कारीगररोके उपकरण-दग्यके 
चि अद्ित ये । उन पताका्यैठि वे मच्च पर्व्तकरे समान 
सोभा पते ये ॥ ५॥ 


वन्धुक रद्धखलम प्रवेकल' ` ' 
अन्तःपुराणां च॒ प्रेश्चागाराण्यनेकद्रः। 
रेजुः काञ्चनचिघ्राणि रत्नज्यालाङ्खलानिं च ॥ ६ ॥ 
अन्तःपुरकी चिकरि विये अनेक प्रक्नागार सुशोभित दो 
रै) जो सुवर्णसे चित्रित तथा र््नकी प्रभासे व्याप्त 
ये ॥ ६॥ 
तानि र्त्नोधक्लप्तानि ससायुपरग्रहमणि च। 
रेजुजचनिक्चेपेः सपक्षा इव खे नगाः॥ ७॥ 
रल्नराथिसे 'नि्मित उन प्रश्वामार्यँके ऊपरी भागने 
पताका फदरा रदी थीं ओर उनके निचले मागमे परदे पडे 
हुए ये | इक्तसे वे आक्रादाम पंखयुक्त पर्व॑तकरे समान शोमा 
पति ये ॥ ७॥ 
तत्र चामरदारे्च भूषणानां च सिक्ितैः। 
मणीनां च विचित्राणां विचिव्रा्धेदर्चिषपः ॥ ८ ॥ 
उन प्रक्षागार्सेम चामर्यौ, हर्योः नकारे दए भूधर्णो 
तथा विचित्र मणियोकी चिच-विचिच प्रभार्पँ स ओर फर 
रदी थीं॥८॥ 
गणिक्रानां पृथव्श्वाः ्युमैयस्तरणाम्बरेः । 
शोभिता वारमुख्याभिर्विमानथत्तिमौजसः ॥ ९ ॥ 
गणिका च्ि प्रथक्‌ मश्च वने थे, जो सुन्दर वीना 
ओर वघ ठेके दए ये! वे सव-के-सव्र विमानके समान 
कान्तिमान्‌ दिखायी देते ये ओर मुख्य-मुख्य वाराद्धनार्ै 
उनक्री योमा वदती ्थी॥९॥ 
तत्रास्तनानि ख्यातानि पर्यद्भाश्च हिरण्मयाः । 
प्रकीणीश्च कुथाश्चिाः सपुष्पस्तवक्ताः ॥ १०॥ 
वरदो विख्यात आसनः सेनिके पटंग तथा व्रि ए 
विचित्र एवं पुप्पगुच्छस युक्त काटीन बुोभितये ॥ १०॥ 
सौवण; पानकुर्भाश्च पानभूम्यश्च शोभिताः । 
फलावदृश्चपूुणोश्च चाद्भ्यः पानयोजिवाः ॥ ११॥ 
वा सोनेके घडमिं पीनेकरे च्थि जठ रवे गये ये  जल- 
पानक्रे जो खान ये, उरं भी सोमे सम्पन्न क्रिया गयाथा। 
वरहा फक्के ठकडंसि मरी दुद चैगेरिरयौ ( दोकर्स्यो ) रखी 
गयी थीः जिन्दं जलपान या कलवेके उपयोगके लि बीं 
स्थापित किया गयाथा| ११॥ 
अन्ये च मचा वहवः का्टसंचयवन्धनाः। 
रेजुः पस्तरणास्तत्र शतशोऽथ सदखशः ॥ १२॥ 


>^ 


विष्णुपनबं } 


प्कोनविदोऽघ्यायः 


३१५ 


~ ~ 


रीर भी बहुत. मख भर जो लकद्ियोकर देरसे आग्रद्र 
भे} उनपर मी अच्छ व्रिद्ावन डले गयेभे| दस तरध्फे 
सैकर्टो-हजये मच्च वरहो शोमा परदे ये ॥१२॥ 


उत्तमागारिकश्चैव सृक्ष्मजालाचलोकिनः। 
सीणां परष्चागरृहा भान्ति राजदंसा इवाम्यरे ॥ १३॥ 

धके ऊपर नो घर थे, उनम लि््रेकरे चयि प्रे्षाग्रह 
वने थे } उनके दरवार्जोपर मदीन जाटीदार परदा पड़ा थाः 
नित वर्ह वैे हु टोग व्ादस्की सारी वस्तु देख सकते 
थे | वे प्क्षामवन आकादामे राजदंसोके समान सुमोभित दो 
रहेभे॥ १३॥ 


प्राङ्मुखश्चारुनिसुंकतो मेरन्धङ्गसमप्रभः। 
रुफमपत्रनिभस्तम्भश्चिचनिर्योगदोभितः ॥ १४॥ 
्र्षागारः स कंसस्य प्रचकरारेऽधिकं धरिया । 
श्नोभितो मादयदामैश्च निवासङूतलक्षणः ॥ १५॥ 
कंसकेल्यिजो प्ेक्षागार ( टय्य देखनेका स्यान) 
रना थाः वदं अधिक गोभासे प्रकारित दहो रदा था! उसका 
दरवाजा पूवंकी ओर था | उसपर मनोहरं जालीदार पर्दा 
पड़ा था । वह भवन मेस्पर्वतके रिखरफे समान सुनहरी 
प्रमासे उद्धासित होता था । उसके खम्भे खर्णपत्रसे जयित 
होनेके कारण विशेष शोमासे सम्पन्न थे तथा वह भवन चार 
चितरेकि संनिवेशसे सुशोमित था ] माल्ओकी ल्ड्योसे भी 
उसे सनाया गया था | राजाकी वरैठक या निवास-स्थानके 


ल्य जो आवश्यक लक्षण होने चाहिये, उन सवसे वद सम्पन्न 
था] १४-१५ 


तसन्‌ नानाजनाकीर्णे जनौघप्रतिनादिते । 
समाजवाटे संस्तन्धे कम्पमानार्णवप्रभे ॥ १६॥ 
राजां कुवटयापीडः समाजद्धारि फुअरः1 
तिष्ठतविति समाशप्य पेक्षागारसुपाययौ ॥ १७॥ 


नाना प्रकारे मनुप्योसि भरपुरा ओर जनसमुदायके 
शब्दो प्रतिध्वनित होता हुया वह समाजवाट या रङ्गस्थल 
चश्वर ठदरोवाठे विक्षुन्ध महाषागरफे समान प्रतीत होता 
या । थोड़ी ही देर वरहो सन्नाय छा गया ओर 'कुबल्या- 
पीड नामक दाथी रङ्गशााके दवारपर खडा रदे--यद आश्चा 
देता हुभा राजा कंस अपने प्रक्षागासमे आ पटुचा ॥१६-१७]॥ 
स शुक्छे वाससी पिभ्रच्छखवेतन्यजनचामरः । 
श्ुद्यभे शवेतमुकुटः चेता इव चन्द्रमाः ॥ १८॥ 

उसने दो श्वेत वल धारण कर रये ये । उसपर वेत 
चवर ओर भ्यजन इलये जारहे थे तया उसके मस्तकपर 
श्वेत मुकुट प्रकारित होता था, अतः वह्‌ श्वेत वाद्लेति युक्त 
चन्द्रमके समान होभापा रदा था॥ १८ ॥ 


तस्य सिष्टास्नस्यस्य सुखासीनस्य धीमतः । 


रूपमप्रतिमं टरा पसः प्रोचुर्जयारिपः ॥ १९ ॥ 
जय बह सिंहासनपर युखपू्वक विराजमान हुआ, उत 
रमय उस बुद्धिमान्‌ मरेशके अनुपम सूपक्रो देखकर समस्त 
पुरवासी उसरी जव" योटते हुए उसे आशीर्वाद देने लगे ॥ 
ततः प्रविविध्र्मूा स्हमावलिताम्बराः। 
तिस्रश्च भागशः कक्षाः प्रविशन्‌ वल शालिनः ॥ २०॥ 
तदनन्तर मस्लेनि रद्धभूमिम प्रवे क्रिया | उनके कपदे 
फहरा रदे ये । वे बलशाली म्ल अलग-अलग तीन कक्रर्ओ 
मँ प्रविष्ट हुए ॥ २० ॥ 
ततस्तूर्यनिनादेन ्वेडितास्फोटितेन च । 
वखदेवखतौ षौ सङगदवारसुपस्थितौ ॥ २१॥ - 
तव्यश्वात्‌ वा्योकी तुमुल ध्वनिक्रे साथ मल्लक गजने 
ओर ताक कने श्रथ्द्‌ सुनायौ देने ठे । इसी समय दर्मं 
भरे हुए दोना बसुदेव-पुत्र रङ्शालाके द्वारपर उपस्ित 
हुए ॥ २१ ॥ 


बटवौ वखरसंवीतौ खुरचन्दनभूपितौ ! 
उर्ष्वपीडौ खगापीडौ बाहुशस्ररृतो यमौ ॥ २२॥ 
आरुफोरयन्तावन्योन्यं याह चसैवार्गरोपमो । 
वे दोनों बन्धु ग्वाख््ालकरे दी वपम थे | उनके अङ्ख 
सुन्दर वस्स आच्छादित एवं सुशोभित ये । वे दिव्य चन्दन 
( अङ्गराग ) से विभूषित ये । सिरके ऊपर पुष्पमाला ओर 
गे गञरे शोभा दे रदे ये] उन्होने अपनी भुजाओंकोदी 
आयुध बना रखा था । वे दोनों जुदुर्वे-से जान पडते ये ओर 
एक दुसरेकी अर्गखके समान मोी बदर ताल ठक रे 
ये ॥ २२९ ॥ 
तावापतन्तौ त्वरितौ परतिप्िद्धो वसननैौ। 
तेन मत्तेन नागेन चोदयमानेन वे भशम्‌ ॥ २२३॥ 
वे दर्म सुन्दर मुखवखे वीर बड़ उतावरीके साथ 
रङ्गश्चाखकी ओर आ रहे थे, कितु महावतके द्वास अत्यन्त 
प्रेरित किये गये उस मतवा गजराजे उन्दै सदसा रोक्र 
दिया ॥ २३॥ 
सं मत्तस्ती दु्त्मा सृत्वा कुण्डलिनं करम्‌ । 
चकार चोदितो यत्नं निहन्तुं वरूकेशवौ 1 २४॥ 
वह मदमत्त हाथी ब्दा दी दृष्ट था 1 महावतके रोकने 
पर उसने अपनी सडको धिकोडकर श्रीकृष्ण ओर व्रटरामकौ 
मार डख्नेका प्रयत्न क्रिया] २४॥ 
ततः पहक्ितः कृष्णस्रास्यमानो गजेन वै । 
फंसस्य तन्मतं चैव जगं स दुरात्मनः ॥ २५॥ . 
उस हाथीके त्रास देनेपर श्रीकृष्ण हस पदे ओर दुरात्मा 
कंके उस मनसू्रेकी निन्दा कले ख्गे ॥ २५॥ 


३१६ ४. 


श्रीमहाभारते लिलभागे 


। [ हरिवंशे 


~~~ ^~ ++ 


त्वरते खट कंसोऽयं गन्तुं वैवस्धतक्षयम्‌ । 
यां मामनेन नागेन प्रधपयिंतुमिच्छति ॥ २६॥ 
बर ब्रोठे--"निश्वय ही जान पडता है करि यह कंस यमल्येक- 
म जानिके ल्यि उतावद्य हो उट दै, इमील्ये इस दाथीके 
द्वारा वह मुञ्चे कुचल देना चाहता दैः ॥ २६ ॥ 
संनिषृटे ततो नगे गज॑माने यथा घने। 
सष्सोत्पत्य गोविन्दश्यक्रे तालस्वनं प्रभुः ॥ २७॥ 
तदनन्तर मेधके समान गम्भीर गर्जना करता हा वह 
हाथी जवर व्रहुत निकट आ गयाः तत्र॒ भगव्रान्‌ गोविन्द 
सा उछलकर ताली पीरने ल्मे | २७॥ 
क्वेडितास्फोटितरवं कृत्वा नागस्य चाग्रतः। 
कर ससखीकरं तस्य पतिजग्राह वक्षसा ॥ २८ ॥ 
हाथीके सामने ही गर्जने ओर ताल ठकनेकी आवाज 
करके उन्टनि जके फुहरे छोडइनेवाी उसकी तूडको अपनी 
खतीपर दवा लिया ॥ २८ ॥ 
विपाणान्तरगो भूत्वा पुनश्चरणमध्यगः । 
यवाघे तं गजं कृष्णः पवनसतोयदं यथा ॥ २९ ॥ 
पिर श्रीकृष्ण उसके दोनो दति बीचसे होकर वैरो 
मध्यभाग्मे आ गये ओर जेवा वादल्को इधर-उधर 
उड़ाती रहती है, उमी प्रकार वे उस हाथीको सताने ओर 
व्याकुल करने खो ॥ २९ ॥ ` 
स हस्ताग्राद्‌ चिनिष्करान्तो विपाणाय्राच्च दन्तिनः 
विमुक्तः पदमध्याचच ष्णो द्विपमपोधयत्‌ ॥३०॥ 
वे उप्त हाथीकी संडे अग्रमागसे निक्रखकरः दरति 
भी अग्रभागते वचफ़र तया वके भी वीचि चूटकर वार 
आ गये | फिर श्रीकरृण्णने उस हाथीको पेते ऊंचाईकी ओर 
खीचकर घसीटना आरम्भ क्रिवा ॥ ३०॥ 
सोऽतिकायस्तु सम्मूढो हन्तुं छुप्णमशक्युवन्‌ । 
गजः स्वेप्वेव गात्रेषु मथ्यमानो ररास ह ॥३१॥ 
वह विशालकाय हाथी व्याकर दौ उछा अओौर श्रीकृप्णकरो 
मारनेमे असफल दो अपने ही अगमि मथित होता टा जोर- 
जोरसे चिग्वाडुने ठ्गा ॥ ३१ ॥ “ 
पपात भमो जाखुभ्यां दशनाभ्यां तुतोद च । 
मद्‌ खुरा रोपाच्च घमौपाये यथा घनः ॥३२॥ 
फ़िर तो वह दोनो घुटनोके वर गिर पड़ा, दोनों दोति 
भूमिसे टकरा जडइसे दिक गये, जिससे उसक्रो डी व्यथा हुई । 
वह्‌ रोप्रते मदकी धारा वहनि च्गाः मानो पावक्षमे मेष 
पानी बरसा रदा दो ॥ ३२ ॥ । 
कृष्णस्तु तेन नागेन करीडित्व! दिंद्युलीलया । 
निधनाय मति चक्रे कंसद्धि्टेन चेतसा ॥ ३३॥ 


॥ 


श्रीकृष्णे "उस द्यथीक्रे साथ वाटकोके समान खिलवाड़ 
करे कंसफरे प्रति मनम द्वेष देकर कुवल्यापीडकरो मार डान 
का विचार किया.॥ ३३॥ । 
स तस्य प्रमुखे पादं कत्वा कम्भादनन्तरम्‌ । 
दोर्भ्यां विश्राणमु्पास्य तेनेव प्राहरत्‌ तदा ॥ २४॥ 
. उन्दनि उसके छले कुम्भस्यख्से नीचे पैर लगाकर 
दोनों हार्थो एक देन उख।!ड च्या ओर उम समय उसमे 
उसक्रो पीना आरम्भक्रिया ॥ ३४ ॥ -. - 
स तेन वञ्कल्पेन स्वेन दन्तेन कुञ्जरः 
हन्यमानः रारृन्ूत्रं सुमोचातां स्यस्त ह ॥ २५॥ 
उस वन्ठुट्य दते पीय जाता दया वह दाथी मलमूत्र 
स्यागने भौर आर्तभावक्ते चीत्कार कसे ल्गा ॥ ३५ ॥ 
छप्णजर्जरिताङ्गस्य क्रुञ्वरस्यातचेतसः। 
कटाभ्यामति स्राव वेगवद्‌ भूरि दीणितम्‌ ॥ ३६॥ 
श्रीकृष्णने जिसके अरदधोको पीट-पीटकरर जर्जर वना दिया 
या, उस्र आतंचित्त दाथीके दोनों गाठेखि वेगपूव॑क. मूरि-भूरि 
रक्तकी धारा वहने ठ्गी | ३६ ॥ 
लाङ्गूलं चास्य वेगेन निश्चकपं हटायुधः 
शकपृष्ठार्धसंखीनं वैनतेय दवोरगम्‌ ॥ २७॥ 
इधर वलरामजी उसकी पूँछ पकड्कर वड़े वेगसे खीचने 
करोः मानो शिलृषठमे आधे ्रीरसे चपि हए किसी सर्षको 
गरड छीचरदे दो ॥ ३७॥ 
तेनैव गजदन्तेन कृष्णो हत्वा तु दन्तिनम्‌। 
जघानेकप्रहिण गजारोदणमुर्वणम्‌ ॥ ३८ ॥ 
दाथीको मारकर श्रीक्रष्णने उसके उसी दोतते एक 
प्रहार करफे मतवाले मदावतको भी मौतके मुखम लः 
दिया ॥ ३८ ॥ 
सो ऽऽतनाद्‌ं मदत्‌ रत्य विदन्तो दन्तिनां वरः। 
पपात समदामाजो वच्रभिन्न इवाचलः ॥ ३९ ॥ 
तदनन्तर दोतवले हाधिरयोमि श्रेष्ठ वह कुवल्यापीड 
दन्तहीन दयो महान्‌ आर्तनाद करके वञ्रसे विदीर्ण हुए पर्वतकरे 
समान महावतसदित भिर पडा ॥ ३९॥ 
ततस्तौ तोरणाद्भानि प्रशृद्य॒रणककर । 
गजस्य पादरक्चश्च जघ्नतुः ` पुरूपषभौ ॥ ४० ॥ 
फिर उन दोनों पुरपप्रवर रणक्कंड वीरोने फारकके 
खम्भे आदि लेकर दाथीके पादरघरकरोक्रो भी मार डाल ॥४०] 
तश्च हत्वा विविद्यतुर्मध्यं रङ्गस्य ताबुभौ । 
नासत्यावश्विनौ सखगोदवतीणोविवेच्छया ॥ ४९॥ 
उन सवका संहार कफ वे दोनों भाई रद्घस्यल्म प्रविष्ट 
हुए मानो दोनो अश्चिनीकरुमार इच्छानुसार स्व्गसे _भूतल्पर 
उतर अये दा ॥ ४८९ ॥ 


॥ 


। विष्णुपवं ] 


. ति्लो ऽध्यायः 


न ^^ ~ ^~ 


^= ~~~ 


वृष्ण्यन्धकराश्च, भोजश्च दृद्य्यु्वनमाछिने । 
क्वेडितोच््रएनद्विन = वाहयोरास्फोरितेन च । 
सिंहनादैश्च , तेश्च दर्पयामासतुर्जनम्‌ ॥ ४२॥ 

उसःसमय श्रप्णिः अन्धक तथा भोजक्रुलकरे यादर्वेनि 
वनमालधारी श्रीह्प्ण-वलरामकरो देखा ! उन दोनो वीसेने 
गजनिः करिख्कारनेः अुजर्योपर ताल टोकनेः सिंहके समान 
दहाडने ओर. ताटी पीरने आदिक द्वा वके जनसपुदायको 
हर्षसे उत्फुरछ कर दिया ॥ ४२॥ 


तो द्रा भोजराजस्तु विपसाद .वृथामतिः। 


परीखणामनुरागं चः दर्पं चालक्ष्य भारत ॥ ४३ ॥ 


भारत ! व्यर्थं 'बुद्धिवाल भोजराज कंस उन दोनों 
मादर्योको उपसित देख; उनके प्रति पुरबाखियेकि अनुराग 


. अर दर्षको लक्ष्य करे विपरादमे दरब गया | ४३ ॥ 


तं हत्वा पुण्डसीकाक्षो नदन्तं दन्तिनां वरम्‌ । ¦ 

अवतीणांऽणेवाकारं - समाजं . सदहपुवेजः ॥ ४४॥ 
इस प्रकार कमलनयन श्रीकृष्णने गरंजते हुए ¦ गजश्ेषठ 

ुवल्यापीडकरो मारकर अपने पूर्वन वखरामजीकरे साथ 
समुद्रके समान विशाल जनसमुदायय्मे प्रवेश किया ॥ 


इति श्रीमहाभारते खिरख्भागे हरिवंगे विष्णुपर्वणि ऊबख्यापीडवधे एकोन त्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥ 


इस प्रकारं श्रीमहाभारते खिरमाग दरिवशके अन्तत शरिप्णुपिं 


कु परथानीड्‌ दाथीक्ना 


वधविषयफ उन्तौसर्वे{ अध्याय्‌ पुरा हुजा ॥ २९. ॥ 


नमै ® का 


| त्रिंशोऽध्यायः ` _ 
रङ्गराखमें मर्लयुद्धके पिपयमें श्रृप्णके बिचार, श्रीकृष्ण ओर षलदेवके दारा चाणूर ओर 
युक आदिका वध, कंसका संहार तथा पिता-माताके चरणों प्रणाम 
करके दोनों भाह्योका उनके घरमे जाना 


वे्स्धायनं उवाच 

विशन्तं तु वेगेन भारुतावल्गित्ताम्बरम्‌ । 
पूवेजं पुरतः छृत्वा प्णं कमलरोचनम्‌ ॥ १ ॥ 
गजदन्तकृतोस्डछेखं खुभुजं देवकीसुतम्‌ । 
रीकरृताङदं वीरं मप्रेन रुधिरेण च ॥ २॥ 
वलगमानं यथ सिदं व्युहमानं यथा घनम्‌ 
वाटुशाव्दग्रहरेण ` चाख्यन्तं वसंघरम्‌ ॥ ३ ॥ 
ओग्रसेनिः समालोक्य दन्तिदन्तोयतायुधम्‌ । 
कृष्णं भृदायस्तमुखः सरोषं समुदैक्षत ॥ ४ ॥ 

वैराम्पायनजी कते है--जनमेजय ! कमर्नयन 
श्रीकृष्ण अपने व्डे भाई बख्रामको आगे करके व्रड़े वेगसे 
रंगश्ाखम घुसे थे । उस समय उनके वस्ने हवाके सचोकेसे 
फदेरा उठे थे । ह्याथीका दत उनकी पहचान करानेवाल 
चिह या उप्श्वण चन गया था 1 उनकी श्ुजार्णे बड़ी सुन्दर 
यीं । देवकीनन्दन वीर श्रीक्ृप्णकी बादोमे दाथीके मद ओर 
रुभिर इस तरद्‌ लिपटे थे कि उनम लीलपूरवंक अङ्गद (बान्‌- 
वंद ) की स्वना दहो मयी थी | वे षिंहकी तरह उक्ते तथा 
कं्तवधकरी युक्ति सोचते ए आकाशम बादल्की मति रंग- 
शालमे विचर रदे, थे । भुजाओपर ताक टठोककर जव वे 
उसकी ध्वनि फौखते थेः तवर प्रथ्वीको मी दिखा देतेये । उन्दे 
हाथीक दोवको ही आयुध रूपते हाथमे व्यि देख उगरसेन- 
कुमार कंस अत्यन्त मलिन हो गया ओर वह बडे रोषये 
भरकर उनकी ओर देखने खा ॥ १-४॥ 


भुजासक्तेन शुद्युमे गजदन्तेन केश्षवः। 
चन्दरार्धविम्बसंसक्तो यथैकशिखसे गिरिः ॥ ५ ॥ 

अपने हाथमे सटे हए उस गजदन्तसे सुशोभित दहोने- 
वाले श्रीकृष्ण अर्धचन्द्रके विम्वसे संयुक्त दुए एक शिखर 
वाले पर्वतक्रे समान जान पडते थे ॥ ५ ॥ 


वर्गमाने तु गोविन्दे ' स रत्स्नो रङ्गसलागरः । 
जनोधप्रतिनदेन पू्य॑माण ' शवावभौ ॥ ६ ॥ 
श्रीकृप्णके उचछछल्ते-कूदते अति ही वह समुद्र-जेसा सम्पूर्णं 
रंगखल जनसमरदायके दर्पनादसे परिपूर्णं हुआ-सा प्रतत होने 
च्गा॥६ ॥ | 


ततः क्रोधाभितान्राक्षः कंसः पप्मकरोपनः। 
चाणुरमादिशद्‌ युद्धे ष्णस्य सुमदावलम्‌ ॥ ७ ॥ 
अन्धं मल्टं च निरृति युकं च महावलम्‌। 
वङ्दरेवाय सक्रोधो दिदेशाद्विचयोपमम्‌॥ ८ ॥ 

तदनन्तर क्रोधे खल अखं क्रिय परम क्रोधी कंसने 
महाबली अन्ध मल्छ चाणूरको जो कपरयुद्ध करनेवाख था 
श्रीकृप्णक्रे साथ ्ड्नेका अदेश दिया ओर जिसका शरीर 
प्रसरसमूहके समान सुध्द्‌ थाः उस कपटी महावली सुषटिक- 
को रोषरमै मरे हुए कंसने" ब्देवके साथ जुञ्चनेकी 
आज्ञा दी ॥ ७-८ ॥ 


कंखेनापि समाक्षपश्चाणूरः पूर्वमेव तु। 
योन्यं सह इङप्णेन त्वया यत्नवतेति तै ॥ ९ ॥ 


३९८ 


कंसने चाणुरको तो प्दच्से दी यह अन्नादे रखी थीः 
कि तम्दं श्रीकरप्णके साथ वल्नपू्ुक युद्ध करना चादिये ॥९॥ 
स रोपेण तु चापणुरः कपायीरृतलोचनः 1 
अभ्यावर्तेत युद्धार्थमपां पूणां यथा घनः ॥ १० ॥ 

अतः रोपसे टार ओं किये चाणूर युद्ध करनेके ल्यि 
श्रीक्प्णक्रे निकट आया । उस समय वद्‌ जसे भरेषु मेषके 
समान जान पड़ता था ॥ १० ॥ 


अवघुष्ट समाजे तु निद्शब्दस्तिमिते जने 
यादवाः सदहितास्तच दष्ट वचनमत्रुवन्‌ ॥ ११ ॥ 
राजाकी ओसरसे चान्त रहनेकी घोषणा होते दी व्हा 
का सारा जनसभुदाय नीरव तथा निश्वर दौ गयाः तवर वहो 
एक साथ वैठे हुए यादव इस प्रकार कने खो-॥११॥ 
वाहुयुद्धमिदं रगे सप्राश्चिकमक्रातरम्‌ | 
क्रियावलसमाक्षातमरास्रं निर्मितं पुरा ॥१२॥ 
पुकारे विधाताने मल्छयुद्धके विष्य प्रह नियम 
वनाया था क्रि यह युद्ध र्धस्थस्के अखदमे केवल 
भुजार्ओद्धारा दो । इसमे किसी प्रकारके असखर-शल्नका 
प्रयोग म क्रियाजाय। इसमे (दो व्यक्तिर्योका जोड़ निश्चित 
करनैके च्थि ) कोर्द-न-कोई परीक्षक रहना चादिये । इसमे 
क्रायर या उरपोकको सम्मिलित नही कसना चादिये | इसमे 
करिया ( दोबपैच आदि ) ओर वरर ( शारीरिक शक्ति ) 
के द्वारा ही विपधीको परास करनेकी आज्ञा दी गयी हे ॥ 
अद्धिश्ातिश्चमो नित्यं विनेयः काठददिभिः 1 
कर्सीपेण च मस्छस्य खततं सक्या स्ता ॥ १३ ॥ 
{समयोचित कर्तव्यो देखने ओर समञ्चनेवाठे पुर्षोको 
उचित दैकरिवे सदा योद्धाओकरे स्यि जल प्रस्तुत करके 
उनकी भारी थकावर दूर कर ओर गोवरका चूर्णं सुल्म 
करे पदटवानका सदा स्कार करना चाहिये ॥ १३ ॥ 
स्थितो मूमिगतेनेव य यथा मगंतः स्थितः । 
संयुज्यतश्च पयीयः प्रश्चिकैः समुदाहसः ॥ १४॥ 
शयुद्धपरीश्चकनि यद बताया है कि जो जिस मार्ग (दोव-पैच) 
से रदे, उसके साथ उसीके अनुरूप दोव लगकर भूमिपर 
खड़े एके साय खड़ा दोकर दी डना चादियि ओर एक-एक 
योद्धाको क्रमगः एक-एकके साथ ही छ्डाना चादिये॥ १४ ॥ 
चालो चा यदि बा वृद्धो मध्यो वापि छृचखोऽपि वा । 
वलस्यो वा स्थितो रगे क्षेयः कक्षान्तरेण वै ॥१५॥ 
कोद वाल्क दो, दृध हो, मध्य अवस्याका दोः दुरव॑छ 
हयो, अथवा चल्वान्‌ दो, वह यदि अखे उत्तरे तो उसके 
जोडका विचार उखीकी कक्षक्रे लोगेर्मिठे दी करना 
चादिये 1 १५॥ 


भ्रीमष्टाभारते खिलभाग 


[ 'श्यवंतते 


वरतश्च क्रियातश्च वाह्ुयुद्धविधिर्णुचि। ` 
निपातानन्तरं किंचिच्च कर्त॑न्यं विजानता ॥ १६॥ 
नारी वर यर क्रिया ( दोव-पेच ) से दी बाहुयुद्धं 
करनेका विधान है । विन्न पुखपको चाये कि प्रतिद्न्दरीको 
गिरा देनेके वाद उसके साथ ओर कुन करे) १६॥ 
तदिदं भ्रस्तुतं रगे युद्धं कृप्णान्धमल्ख्योः। 
चाः रृप्णो महानन्धः कथं न स्याद्‌ विचरणा॥ १७॥ 
"इस समय रंगखलमे श्रीङ्ष्ण यर अन्ध मल्ल चाणुर- 
का युद्ध प्रस्तुत हैः पर्व इनमे श्रीद्कण तो अभी वाल्क 
ह ओर यह चाणूर विदाल्कराय पहल्वान है, इस विपमतापर 
विचार र्यो नहीं किया जाता £ ॥ १७ ॥ 
ततः किटकरिखादाब्दः समाजे समवतंत । 
भ्रावद्गत च गोविन्दो वाक्यं चेदमुवाच ह ॥ १८ ॥ 
यह सुनकर उस जनसमाजमे कोला मच गया } तव 
भगवान्‌ श्रीकृष्ण उल पड़े ओर इस प्रकार बोटे-।॥१८॥ 
अदं वालो महानन्धो वपुषा पर्वतोषमः। 
युद्धं ममानेन सद॒ रोचते वाहुश्चाछिना ॥ १९॥ 
मँ वालक हूँ ओर यह महामल्छ अन्प्र शरीरे परव॑त- 
जसा दिखायी देता है, तथापि इस वाहुशाटी वीरे साथ मेरा 
युद्ध दोः यह सुद्ने पसंद दे ॥ १९ ॥ 
युद्धव्यतिक्रमः कश्चिन्न भविष्यति मत्कृतः । 
न दयं वाहुयोधानां दूषयिष्यामि यन्मतम्‌ ॥ २० ॥ 
भमेरी ओरसे युद्धसम्बन्धी नियमका कोई उल्टद्वन न्दी 
दोगा । वाहूयुदध करनेवले योद्धर्थका जो मत दै उसे 
करंकित नदीं करूंगा ॥ २० ॥ 
योऽयं करीपधर्मेश्च तोयधमेश्च रंगजः। 
कषायस्य च संसर्गः समयो ह्येप करिपतः ॥ २१ ॥ 
'गोवरके चुर्णको उध्रनके समान शरीरम मल्नाः जल- 
से धोना ओर गेरूके रंगका लेपन करना रंगखल ( अखे , 
उतरनेवाल ) का धर्महैः यह मर्लका वनाया दूय 
आचार है ॥ २९ ॥ 
संयमः स्थिरता शौर्यं ध्यायामः सत्किया वलम्‌ । 
रंगे च नियता सिद्धिरेतद्‌ युद्धविदां भतम्‌ ॥२२॥ 
'संयम ( एक दसरेको पीछे हटाना )› सिरता ( अपने 
खाने न हट्ना ) शौर्य, व्यायाम ( खिर रहते दए भी 
हाथ-पैर चलाना ), सक्या ( सद्‌ वर्ताव--मर्मस्था्ेमिं चोट 
न पर्ूचाना)ःअसद्‌ व्यवहारे वचते हूए. भी अधिक-ते-अधिक 
वल प्रकट करना; इन छः साधनेकि द्वारा रङ्ञभूमिपे विजय- 
रूप विद्धिका प्राप्त दौमा निश्चित है; यह मल्ल्युद्धके विद्वार्नौ- 
का मतद॥ २२॥ 


विष्णुपर्व ] 
अतरेस्मेवं . . यदयं स्परैरं कमु्यतः। 
अघर वै नि्रहः काययस्तोपयिप्याम्यदं जगत्‌ ॥ २३ ॥ 
यह ( चाणूर अथवा कंस ) इस वैररदित युद्धको भी 
वैरयुक्त करदेनेपर दला हा दै, अतः यदो इसक्रा निग्रह 
करना आवश्यक रै, एेखा करे मँ सम्पूणं जगतुको संत 
करगा 1 २२॥ 
करूपेषु प्रसूतोऽयं चाणूरो नाम नामतः । 
वाहुयोधी शयरेण कर्मभिश्चा्न चिन्त्यताम्‌ ॥ २९ ॥ 
ध्यह्‌ चाणूर नामक्र बाहुयोधी मल्छ करूप देशमे उत्यन्न 
हुआ है । इसके रीर ओर कर्मसे जो टना परित हुई ह 
उनपर भी आपलोग बिचार कर ठ | २४॥ 
पतेन वहवो मल्छा निपातानन्तरं हताः। 
रङ्गप्रतापकामेन मल्छमागंश्च दृपितः ॥ २५॥ 
स्टसने रगभूमिमे अपना प्रताप प्रकट करने या दवदवा 
जमानेकी इच्छसे ब्रहतेरे पदल्वानोको भूमिपर गिरानेके वाद 
मार उव्मि ओर इस प्रकार मल्ल-मार्गको कठंकित 
करिया है ॥ २५॥ 
शसख्रसिद्धिस्तु योधानां स्रामे शस्रयोधिनाम्‌। 
रद्गलिद्िस्तु महानां प्रतिमह्धनिपातजा ॥ २६॥ 
व्रस्रद्वारा युद्ध करनेवलि योद्धाओके च्ि संग्राममे 
शतको विदीणणं कर देना ही सिद्धि है, परंतु मस्लैको प्रति- 
दन्द मल्ख्को गिरा देनेमाचसे दी रंगस्थल्मे विजयरूप सिद्धि 
प्राप्त दो जाती है ॥ २६॥ 
रणे विजयमानस्य कीरतिर्भवति शाश्वती । 
हतस्यापि रणे रासरैनकपृषठं विधीयते ॥ २७ ॥ 
श्सल्रयुद्धमे विजय पनिवाटेको अक्षय कीर्तिं पराप्त होती 
ह । यदि बह रणकषि्रमे शखोद्यारा माया गया तो भी उसे 
खग॑लोककी प्राति होती है ॥ २७ ॥ 
रणे छयभयतः सिद्धिदतस्येह स्वतोऽपि वा । 
साहि प्राणान्तिकी यात्रा महद्धिः साधुपूजिता ॥ २८॥ 
शशख्रयुद्धमे मारे जनेवलेकौ तथा मारनैवले दौनकरी ही 
सिद्धि प्रात दोती है, क्योकि वह प्राणान्तक यात्रा हैः जिसकी 
महान्‌ पुरु्रोने भलीमेति पूजा ( प्रशंसा ) की है ॥ २८ ॥ 
अयं तु मारयो बलतः क्रियातश्च विनिःखतः। 
सतस्य रङ्गे क खगो जयतो वा छतो रतिः ॥ २९ ॥ 
- परंतु यह्‌ मल्छ-युद्धका मार्ग शासय वल ओर दोव- 
पचक कौशलते प्रकट हुआ है । अख।डेमे मरनेवाटेको करद 
खर मिलता है १ अथवा जीतनेवाटेकौ कर्दोका सुख प्रा 
दोतादै १॥ २९॥ 
ये तु केचित्‌ स्वदोचेण साक्षः पण्डितमानिनः । 
प्रतापाथे हता मल्ला मह्वहम्तुर्वधो टि सः ॥ २०॥ 


त्ि्तोऽध्यायः 


३१९ 


(किसी पण्डितमानी राजा प्रताप द्निकरे ल्मि जो 
कोई म मह किसी पहलवानके दवाय अपने अपराधसे मरे गये ई 
तदो उस म-दत्यरेको हत्याजनित पाप ही खगता दै१।२०॥ 
पवं संजटपतस्तस्य ताभ्या युद्धं खदारुणम्‌ । 
उभाभ्यामभवद्‌ घोरं चारणाभ्यां यथा वने ॥ ३१ ॥ 
जव श्रीकृष्ण रेखा कह रदे ये, उसी समगर उनम ओर 
चाणूरमे--दो्नमि दी अव्यन्त दारुण एवं भयानक युद्ध हेन 
खगाः जैते वनम दो हाथी कड पड ॥ ३९ ॥ 
छृतप्रतिरृतेशितेवौटुभिश्च सकण्डकषेः। 
सन्निपातावधूतैश्च  भ्रमाथोन्म॑थनैस्तथा ॥ ३२॥ 
उनमेसे जव एक-दूसेरेका कोई अद्ध जोरसे दाता, तव 
दूरा तुरंत उसका प्रतीकार कस्ता--उस अङ्गको उक्की 
पकढ्ते चुडा ठेता ' था । दोनों एक-दूसरे हाथोको सुष्टीसे 
पकड़कर विवश कर देते ओर विचित्र ठंगसे परस्पर प्रहार 
करते थे। दोनों दी एक-वूसरेको अपनी सुजाओमि वोधकरर रोक 
ठेते, कमी दोर्नौ आपसे गुथ जाते ओर फिर, धक्के देकर 
दूर हय देते ये । कभी एक दुसरेको जमीनपर पककर 
रगड़ता तो वुसरा नीचेसे ही ऊुर्लोचकर ऊपरवालेको' 
दूर फक देता, या ल्यि-दिये खड़ा हो अपने शंरीरसे दवाकर 
उसके अद्धोको भी मथ डालता था ॥२२॥ 
ताबुभावपि सं्छि्टौ यथा कलेखमयो तथा । 
्ेपणेयुष्टिभिश्रैव = वरादोद्धर्तनःखनैः ॥ ३३॥ 
वे दोनों ही एक-दूररेते सय्कर एेसे जान पडते थे, मानौ 
दो पवत परस्पर मिड़ गये हो । कमी दोनों दोरनोको वल्ूर्वक 
पीछे दटति ओर मुक्ोसे एक-दूसरेकी छातीपर चोट करते थे, 
कमी एकको दूरा अपने केधेपर उडा टेता ओर उसका 
मह नीचे कर धुमाकर पटक देता थाः जिससे एेषा शब्द 
होताः मानो किसी च्यूकसे चोट की हो | ३३॥ 
कीठैर्वत्रनिपतेश्च प्रखंश्टाभिस्तथैव च। 


(~प [4 [4 
शल करानखपतेश्च पादोद्पूतेश्च दारुणैः ॥ २७॥ 
[भ 


१ प्रमाय तया उन्मथने आदि मह-युद्धके दोव-पेचेकि नाम 
है । मल-शालके अनुसार नके ल््रण नोचे दरिये जाते ह 1 इनका 
माव मूरदलोकके अनुबाद भ गया दै-- 
निपात्य पेषणं भूमौ प्रमाय इति कष्यते। 
यत्‌ तूत्याया्नमथनं पदुन्मथनमुच्यते ॥ 
२. क्षेपणं कथ्यते यत्‌ तु स्थानाद्‌ प्रच्यावनं हटाव्‌ ॥ 
३, उभयोभुंजयोमंटिरूयेमध्ये निपात्यते 1 
सुष्टिसिस्युच्यवे तस्य मंहवियाविशाैः ॥ 
४, अवाड सुखं स्कन्यगतं भ्रामयित्वा तैव यः) 
क्षिप्तस्य शब्दः स भवेद्‌ वराहोयूतनिःखनः ॥ 
५. भसुल्यः प्रदतायास्ु ताः प्रसा उदीरिताः ॥ 


२२० 


श्रीमहाभारते सिकभागे 


[ हिव 


कमी वे दोनौँ योधा एक-दुसरेफे शरीरपर कोटनि्ों जौर 
ुटनेसि चोट करते थे, कमी हाथकी ओँगुखियोको कैलाक्रर 
एक दसरेको परते येः कभी आपस पंजे ठाति येः कमी 
रोषपू्ंक अशिक नखोसे बरकोट लेते थे कमी पेम 
उलक्षाकर दोनों दो्नेकरो गिरा देते । दत प्रकार भयंकर दोव- 
वेचक्रा प्रयोग करते थे ॥ ३४॥ 


जायुभिश्चादमनिघोषैः हिसेभ्यां चावघष्धितेः 
तद्‌ युद्धमभवद्‌ धोरमह्सखं वाहुतेजसा ॥ ३५॥ 
बलप्राणिन शूराणां समाजोत्सवसंनिधो । 
अरञ्यत जनः सवः सोत्छृटनिनदोत्थितः ॥ २६ ॥ 
कमी धुन भौर खिरसे टकर मारते येः जिससे पत्थरयौ- 
के टकरानेके समान शम्द होता था | जनसमुदायक्रे समक्ष 
श्रिय जनेवाटे उस उत्सवे श्रू रवीरोके निकट उन दोन 
केवल बाहुबल, शारीर चल तथा प्राणवल्षे किसी अख- 
शख व्रिना दी बड़ा भयंकर यु हुआ । उस युद्धे र्मे 
सव छोग रग गये । सभी दर्शक विजेताक्रा उत्साह वदनि 
ल्ि जर-जोरसे दरषनाद कर उठते थे ॥ ३५-३६ ॥ 
साध्ुवादांश्च मञ्चेषु घोपयन्त्यपरे जनाः। 
ततः परखिन्नवदनः छष्णप्रणिहितेक्षणः 1 
न्यवारयत तूर्याणि कंसः सव्येन पाणिना ॥ २७ ॥ 
दूसरे लोग मर्ोपर व्रड-वैठे ही साधु-साधु" ( बहुत 
अच्छा, वहत अच्छा ) की घोषणां करते थे } यह सव देख- 
सुनकर कंखके वदनसे पसीना दुटने गा । उसकी अखिं 
भ्रीङृप्णकी ओर ही ख्गी थीं । उसने वार्य हाथसे संफरेत 
करके व्रजे वंद करा दिये ॥ ३७ ॥ 
परतिषिद्धेयु तयेु खदङ्गादिषु तेषु वै। 
सखे संगतान्यवाद्न्त देचतूयीण्यनेकाः ॥ ३८ ॥ 
कंसने जव मृदङ्ग आदि वार्योक्रा व्रजाना रोक दिया; 
तत्र आकाशम देवतार्थोक्रे अनेक प्रकारफे वाय स्तः एक 
खाथ बज उटे ॥ ३८ ॥ 
युद्धशधमाने हषीकेरो पुण्डरीकनिभेक्षणे । 
खयमेव प्रवान्त तूयंघोषास्तु स्वंडाः ॥ ३९ ॥ 
केमलनयन श्रीकृष्णक्रे युद्ध करते समय सव प्रकारके 
वाय खयं ही बजने खो ओर उनकी ध्वनि सव ओर छा गयी।] 
अन्तधौनगतः देवा विमानैः कामरूपिभिः । 
चेरर्वियाधरेः सार्ध छप्णस्य -जयकाङ्भिणः ॥ ४०॥ 
देवता अदृदय होकर शरीङृप्णकी विजय चाहते हए. अपने 
कामरूपी विमार्नोद्वारा वियाधरग्णोकि साय व्ह आकारे 
विचर रदे थे ॥ ४० ॥ 
जयस्व कष्ण चाणूरं दानवं मह्छरूपिणम्‌ । 
इति खत्तपयः सवं ऊचुश्चैव (नभोगताः ॥ ४१ ॥ 


समस सत्थं षके आकायर्मे सित दो कटने च्न- 
श्रीकृष्ण | दुद्‌ इस मस्ललूपधारी दानव चाणृूरपर विजय 
प्राप दोः ॥ ४१॥ 
चाणुरेण चिरं कालं क्रीडित्वा देवकीखुतः 
यङमादार्यामास कसस्याभावद्राद्रावान्‌ ॥ ४२॥ 
कंसकी भृल्युको समीप देखनेवाठे देवकीनन्दन भगवान्‌ | 
श्रीकृप्णने चाणूरे साथ चिस्कालतक्र युदकी खीटा करके 
अपनेमे अनन्त वलकरा समविश क्रिया |} ५२॥ 


ततश्चचार वसुधा मश्वश्चेव जुधरूणिरे। 
मुकृटाचापि कंसस्य पपत मणिरुत्तमः ॥ ४२३॥ 
प्रिर तो धरती टोल्ने लगी | वदा वे हुए मञ्च श्चूमने 
ल्ग ओर कंसके मुकुटे भी उत्तम मणि गिर पदी | ४३॥ 
दोभ्यौमानम्य रृष्णस्तु चाणूर शी्णजीवितम्‌ । 
प्राहरन्मुषिना मूध्नि व्चस्यादत्य जानुना ॥ ५४॥ 
चाणूर जीवनीशक्ति अथवा आयुक्षीण दयो चुकी थी । 
श्रीकरप्णने अपनी दोनो भ्रुजाओपि चाणृूरको शचकाकर उसकी 
छाती घुरनेसे चोट करके उफ मसकपर मुक्फेस प्रहार 
किया ॥ ५८४ ॥ 
निःखते साश्ुरुधिरे तस्य नेघ्े सवन्धने । 
तापन्पियि यथा घण्टे कक्षोपरि विरभ्विते ॥ ४५॥ 
दसस स्नायु-वन्धन तथा ओषु. ओर रक्तक साथ उसकी 
दोनों अखिं बादर निकर आर्यी ओर ेसी दिखायी दैने गी 
मानो हाथीको कसनेवाटी रस्सी या जंजीरमे दो सोनेकी 
धियो कटक रदी टो ॥ ५५॥ 
पपातस तु रङ्गस्य मध्ये निःखतलोचनः। 
चाणूरो विगतग्राणो जीवितान्ते मष्टीतदे ॥ ४६॥ 
खं निकल जानेपर जीवनके अन्तम प्रणन्ूत्य हुञा 
चाणूर अखादढेरे व्रीचमे गिर पड ॥ ४६ ॥ 
देदेन तस्य महस्य . चाणूरस्य गतायुषः । 
सनिरुदधो मदारद्धः स शैठेनेव ठक्ष्यते ॥ ४७॥ 
जिसकी आयु समात द्ये गयी थी; उस चाणूर मके 
शरीरसे वद विशाल रंगखल इस प्रकार अवश्दध दिखाग्री 
देता थाः मानो किसी पर्वतते दध यया दो | ४७] 
रौहिणेयो हते तख्िश्चाणुरे वलबर्पिते। 
जगाद सुषिकं रंगे कृष्णस्तोदाकं पुनः ॥ ७८॥ 
बलाभिमानी चाणुरके मारे जानेषर सोरिर्गनन्दन वरख्यम- 
ने उस रगभूमिमे मुशटिकको पकड़ टिया तथा श्रीकरप्णने पुनः 
तोशल्को धर दवाया | ४८ ॥ 
सन्निपात तु तौ मह्धौ प्रथमे क्रोधमूचिछतं । 
समेयातां राम्ृष्णौ कालस्य वदावर्तिन । 
निधीतावनतौ भूत्वा रङ्गमध्ये चवस्गतुः ॥ ४९॥ 


विष्णुपवं ] 


चि ऽध्वायः 


३२१ 


युद्ध आरम्भ होनेपर पहले तोः कालके अधीन हुवे 
दोनौ अलुर मछ क्रोधसे मूच्छित हो बलराम ओर श्रीकृष्णसे 
भिड़ गये, परु जव उन दोनो वीरयौकी मार पड़ी; तव्रवे 
सिर शचकाकर अख।डेभे इधर-उधर उदछछल-कूद मचाने रुगे ॥ 
हष्णस्तोशलमुयम्य गिरिश्द्ोपमं वली । 
्रामयित्वा शतगुणं भिष्पिपेष्र महीतङे ॥ ५० ॥ 
चल्वान्‌ श्रीकुप्णने परवंतरिखरङे समान विशालकाय 
तोशल्को दोनो हा्थोति उठा लिया ओौर सौ बार धुमानेकर 
वराद प्ृथ्वीपर पटकरकर उसे पीत उव्य ॥ ५० ॥ 
तस्य रृष्णाभिपन्नस्य पीडितस्य वदीयसः 1 
शुखाद्‌ रुधिरमत्य्थमुलगाम सुमूषंतः ॥ ५१॥ 
श्रीक्प्णके दारा आक्रान्त एवं पीडित होकर मरणासन 
हुए उस महाबली मछ्छके मुखसे बहुत अधिक रक्त निकलने 
ल्गा | ५१ ॥ 
संकर्पणस्तु खचिरं योधयित्वा महावलः । 
अन्धरमद्टं महामहो मण्डलानि व्यद्श्तेयत्‌ ॥ ५२॥ 
इधर महापरली महामस्छ संकष्रण आन्ध्देशीय मस्ल 
मुष्टकके साथ देरतक युद्ध करके उसे कुदतीके अनेक पतर 
दिखने स्रो ॥ ५२॥ 
सुिनिकेन तेजस्वी साहानिस्तनयितनुना । 
शिर स्यभ्यदनद्‌ धीरो वञ्रेणेव महागिरिम्‌ ॥ ५३॥ 
फिर उन तेजम्बी वीरने उसके मस्तकरपर एक मुक्ता 
मारा! उससे वज्रपातके समान शब्द हुआ । मानो किसी महान्‌ 
पर्वतपर वच्रसे आधात शिया गया हो ॥ ५३ ॥ 
स ॒निप्पतितमस्तिष्को विख्रस्तनयनेो भुवि, 
पपात निहतस्तेन ततो नादो महानभूत्‌ ॥ ५७ ॥ 
इससे उसका मस्तक फटकर गिर पड़ा; अखं निकल 
आयीं ओर बलरामजीक द्वारा मारा गया वह मछ प्रथ्वीपर 
गिर पड़ा । उस समय क्डे जोरसे धमकरेका शब्द हुजा ॥ 
-अन्धताशखको हत्वा कष्णसंकषणाबुभौ । 
"क्रोधसंरक्तनयनो रंगमध्ये वघर्गतु; ॥*५५॥ 
आन्ध्रदेदीय मुष्टिक ओर तोश इन दोर्नोको मारकर 
श्रीकृष्ण ओर बल्याम दोर्नो भाई क्रोधसे लर अदिं कयि 
यअखाडेमे उदट्ने-कूदने ल्मे ॥ ५५ ॥ 
समाजवारो निम॑ह्छः सोऽभवद्‌ भीमदष्श॑नः। 
अन्धे तदा महामव्छे मुष्के च मिपातिते ॥ ५६॥ 
उस समय महामल्ल चाणूर ओर मुधिकिके मारे जानेपर 
वह समाजवाट ( रंगमवन ) मल्छंसि सूना हो गया ओर 
अत्यन्त भयंकर दिखायी देने खगा ॥ ५६ ॥ 
ये च सस्प्क्षका गोपा नन्दगोपपुरोगमाः। 
भयक्षोभितसवीङ्गाः सवे तत्रादतस्थिरे ॥ ५७॥ 
मम इण १ श । 


~ ~ ~ ~ ॥ 


नन्द आदि जो-जो गोप यह सव देख रदे थे, उनके सारे 
अङ्ग भयते क्षुन्ध द्यो उठेये। वे सवर लोग वरहो चुपचाप 
बेटे रदे ॥ ५७॥ । 
हर्षजं वारि नेत्राभ्यां वर्षमाणा प्रवेपती । 
भरख्रवोत्पीडिता कृष्णं देवकी ससुदैश्चत ॥ ५८ ॥ 
उधर देवकी थरथर करौँपती भौर दोनों नेत्रसि दर 
जनित ओसुर्ओकी वर्षा करती हुईं स्ने दुधकी बाद आ 
जनेसे पीडित हो श्रीकृष्णकी ओर देख रही थी ॥ ५८ ॥ 
रष्णदृश्शनजातेन वाप्पेणाङ्कलितेक्षणः। 
चक्ठुदेवो जरां स्यक्त्वा स्नेदेन तरुणायते ॥ ५९ ॥ 
श्री्कस्ण-ददनजनित अओपुओसे भरे हुए नेत्रौवले 
वयुदेवजी मनो अपनी ब्रद्धावस्ा व्यागकरर वात्सस्य-स्नेहसे 
परिपृष्टो तरुण हो रहे ये॥ ५९ ॥ 
वारमुख्याश्च ताः सौः कृष्णस्य मुखपङ्कजम्‌ । 
पपुर्दि नेचश्चमर्निमेषान्तरमामिभिः ॥ ६० ॥ 
वर्हो जो मुख्य-यु्य वाराङ्गनार्णे उपसित थीं, वे सव. 
की-सव निमेषके भीतर चल्नेवाटे नेवरूपी भ्रमरोदास 
श्रीकृष्णके मुखारविन्दका रस पान करने स्गीं ॥ ६० ॥ 
कंसस्याथ सुखे स्वेदो भमेदान्तरगोचरः। 
अभवद्‌ योषनियौसः छृष्णकंव्दनेरितः ॥ ६९॥ 
तदनन्तर श्रीकृष्णको देखनेसे कंसके मुखम दोनों भरिक्रे 
बरीच रोषवद् पसीना निकर आया ॥ ६१ ॥ 
केरावाय  सधूमेन रोरनिश्वासवायुना । 
दीतमन्तगंतं तस्य हदयं मानसायिनः ॥ ६२॥ 
भीकृष्णे प्रति कंस जो करोरता प्रकट करता था, वही 
जिक्षका धु्ओं था तथा रोषरूपी उच्छवास-वायु जि प्रज्वलित 
कर रदी थी, उस मानसिक चिन्तारूपी आगने कंसके आन्तरिक 
ददयको जलाना आरम्भ किया ॥ ६२ ॥ 
तस्य ॒प्रस्फुरितौष्ठस्य खिघ्नालिकतलस्य वै । 
कं्वक्त्रस्य रोषेण रक्तसूयीयते चपुः ॥ ६३ ॥ 
जिसके ओठ फड़क रदे थे ओर ललाम पसीना निकर 
आया थाः कंसकरे उस मुखमण्डल्का सरूप रोषे कारण 
लल सूर्यके समान प्रतीत होता था ॥ ६३ ॥ 
करोधरकान्सुखान्तस्य निःसृताः स्वेदविन्द्वः। 
यथा रविकरस्पृष्ा व्ष्यावस्यायविन्ध्वः ॥ ६४ ॥ 
करोधसे लल हुए कंसके मुखसे जो पसीनेकी वृदे निकी 
थी वे वक्षो पर्तोपर पडे हुए. उन ओसकरणोकि -समान 
उशोमित होती थी, भिन्द सूर्यकी किरणो स्प प्रात हुमा हे॥ 
सोऽक्षापयत खंक्द्धः पुरुषान्‌ व्यायतान्‌ बहन्‌। 
गोपवेतौ सखमाजोघाननिष्फराम्येतां वनेचरौ ॥ ६५॥ 


ररम 


भीमष्ठाभारते सिलभागे 


` [ हरिव 


उसने अत्यन्त कुपित दोकर वहुत-से व्यायामशाटी 
पुरप्रोको आश्ञा दी फ (इन दोनों वनेचर गोगोको इस जन- 
समुदरायसे वार निकार दो ॥ ६५ ॥ 
न चेतो द्रष्टुमिच्छमि विकृतौ पापदर्सनौ) 
गोपानामपि मे रज्ये न कश्चित्स्थातुमर्हति ॥ ६६ ॥ 
धये दोनो विक्त दो ग्येदहे। इन्दे देखना भी पापदै। 
म इनकी ओर दथ्िपात करना नहीं चाइता । गोरपेर्मिसे 
भी कोई मेरे इस राज्यर्मे नटँ रह्‌ सक्ता ॥ ६६ ॥ 
नन्दगोपश्च द्मधाः पपिष्वभिरतो मम। 
आयसेनिगडाकारेखांहपाशेनिय॒द्यताम्‌ ॥ ६७ ॥ 
श्ोटी बुद्धिवाला नन्दगोप सदा मेरे प्रति क्पृपूर्ण 
वरत्बिमि दीन्नयर रदा दै, अतः इसे ठोदेकी वरेद्धि्यो ओर 
हथकदिरयोमि बोधकर कैद कर ल्य ॥ ६७ ॥ 
वसुदेवश्च दत्तो नित्यं दवेपकरो मम। 
अनचृद्धार्देण दण्डेन क्षिप्रमयेव शास्यताम्‌ ॥ ६८ ॥ 
ष्ुराचारी यञुदेव सदा मुद्चसे देप रखता दै । 
आज ही शीघ्र-से-शीघ्र एेसा कटोर दण्ड दोः जो अबद्ध 
( नौजवान )) पुस्पके योग्य हो ॥ ६८ ॥ 
ये चेमे प्रारुता गोपा दामोदरपरायणाः। 
हिथन्तां गाव फएते्षां यचस्ति चसु किचन ॥ ६२ ॥ 
ध्ये जो दामोदर आश्रय ठेक्रर रहनेव ले गवार गोप 
हैः इन सवक्री गौओको तथा इनके पाष जों कु धन दोः 
उस्कोभीदखीन छो ॥ ६९॥ 
पवमराक्ञापयानं तं कंसं पर्पभा्रिणम्‌। 
दृदश्ौयस्तनयनः छृप्णः सत्यपराक्रमः ॥ ७० ॥ 
इस तरद आज्ञा रेते ओर कठोर वतिं कदते हुए उस 
कंसकी ओर सत्यपराक्रमी श्रीङकप्णने अखि फाडकर देखा ॥ 
क्षिप्ते पितरि चुक्रोध नन्दगोपे च केदाचः 
क्षातीनां च व्यथां रषा विसंश्नां चेव देवकीम्‌ ॥ ७१ ॥ 
ख सिह इव वेगेन केशवो जातविक्रमः 
आरखधर्मदावाडुः कंसखनाशा्थंमदयरुतः ॥ ७२॥ 
रद्मध्यादुत्पपात कृष्णः कंससनान्तिकम्‌ । 
असज्ञद्‌ चायुनाऽक्ित्तो यथा खसो घनाधनः। ७३॥ 
परिता वसुदेव तथा नन्दगोपपर अक्षेप होते दही 
केशव कुपित हो उटे। उन्दैनि बन्धु ्ान्धवोकी व्यथा 
ओर माता देवकीकी अचेत अवस्था देखकर कंसका बनाया 
करनेकरे चयि उसके मञ्चपर चद्नेक्रा विचार करिया उस 
समय केश्षवश़ा पराक्रम जाग उठा ओर अपनी महिमापि 
कभी च्युत न दोनेवले महावराह श्रीकृष्ण उस रंगस्थल्से 
सिदे समान प्रगपूर्वक उच्ले ओौर करंषके सिंहासनकरे पास 
जा पहुचे, ठीक उसी तरद जैसे आकादावतीं महामेध वायु 
का जाकर दुर पर्हुच जाता हे ॥ ७१-७३ ॥ 


ददद्युने हि तं सर्वे रदमध्यादवप्टुतम्‌। 
केवलं करं सपादवेस्थं द्युः पुस्वािनः ॥ ७४ ॥ 
वे कथ अखाद़से वदे दः इसका सवर लोगोनि नदीं देला। , 
पुरवासिर्योको वे केवल कंक्षके पास खदे दिखायी दिये ॥०५॥ 
सोऽपि कसस्तथाऽऽयस्तः परीतः कारुधर्मणा । 
आकादाद्विव गोविन्दं मेने तचागतं प्रभुम्‌ ॥ ७५॥ 
काख्धर्म ( मौत )से त्रिरा हुमा कंस भी व्याकुर दो 
उठा ओर उसने यदौ समन्ना रि मगवान्‌ गोविन्द आकादाते 
ही मेरे पास उतर अये द ॥ ७५ ॥ 
स छष्णेनायतं रत्वा वाहं परिघक्तनिभम्‌। 
भूधेजेषु पराश्र्टः कंसो वे रद्संसदि ॥ ७६॥ ` 
ध्रीष्कण्णने अपनी परिप-जेसी मोटो एक मोहि बदाक्र 
रगवालर्भे कंषक्रौ चोरी पक्र टी ॥ ७६ ॥ 
मुकूटश्चापतत्‌ तस्य काञ्चनो वञ्जभूपितः। 
दिरसस्तस्य छष्णेन पराम्रष्रस्य पाणिना ॥ ७७॥ 
उस समव श्रीक्प्णङे दायते पकडे गये कंसङ़े सिरस 
उसका यन्मे विभूपित सुवर्भमय मुकुट खिसककर 
गिर पड़ा ॥ ५८७ ॥ 
स ब्रहग्रस्तङेराश्च कंसो नियंलतां गतः। 
तथैव च विसम्मूढो वैकल्यं समपद्यत ॥ ७८॥ 
सते किसी ग्रहने के पकड़ ल्य ह, उस अवस्थामे 
पड़ा हुआ कंस निष्ट दो गया तथा क्रकर्तव्यव्रिमूट्‌ हो 
व्याक्रुलताम पड़ गया | ५८ | 
निगरुहीतश्च केदोघु गतासुरिध निःश्वसन्‌ । 
न शशाक मुखं द्रष्टं कंसः कृष्णस्य वै तदा ॥ ७९.॥ 
केश पकड़ च्थि जानेपर कंस मर्दासाद्यो गया | वह्‌ 
छवी सासि टेतां हुभा उस समय कृष्णकरे मूखक्री ओर दष्ट 
न डल सफ | ७९॥ 


-विकुण्डखभ्यां कणौभ्यां छिन्नदररेण वक्षसा । 


धम्ब्ास्थां च वषुभ्यां मातेरविखतभूषणेः ॥ <० ॥ 
श्रदितेनोत्तरीयेण सह सावलिताननः। 
चरेए्रमानः समक्षि्तः कसः कारप्णन तेजसा ॥ ८१ ॥ 
उसके कानोपे कुण्डल चिप्तक गये | वश्चःस्थल्का हार 
छिन्न-मिन दो गया। दोनों रुजा कटक गयीं । सरि 
अङ्के आभूघण भिर गये। चाद्र खिसक गयी ओर 
उसने सहसा उसके कण्ठको अविष्टित कर लिया । श्रीकृप्णके 
अनुपम तेजसे ्चरकके साथ नीचे डाटा गया कंस प्र्वीपर्‌ 
गिरकर छटपटनि छमा ॥ ८०-८१॥ 
चकं च महारद्धे मञ्चान्निष्कम्थ केदावः । 
केरोपु तं वाद्‌ गृह्य कंसं क्लेहा्हर्ता, गतम्‌ ॥ ८२॥ 


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विष्णुपवे 1 


पकचि्लोऽध्यायः 


२२३ 


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उस समय श्रीकृप्णं मख्से निकल्कर वाहर आ गये । 
कंस वलेदरायुक्त ओोचनीय अवसभ पड़ गया था । श्रीकृष्ण 
पुनः वलपूर्वक उसके सिरके वाल पकंडकर उस महान्‌ रंगखल्मे 
उसे घसीयने खगे ॥ ८२ ॥ 


कृष्यमाणः स कृष्णेन भोजयजो महाद्युतिः । 

समाजवाटे परिखां देदछृष्टं ' चकार ह ॥ ८३॥ 
श्रीकृष्णकरे द्वारा घसीटे जति हुए महातेजसख्री भोजराज 

कंसने उस स्गरालमे अपनी देक स्गड्से खादी बनादी ॥ 


समाजवटि क्रीडित्वा विष्ष्य च गतायुषम्‌ । 

कृष्णो षिसर्जयामास कंसदेहमदुरतः ॥ ८४॥ 
रंगशालारम खिलबाड करते हुए घसीटकर निर्जीव हुए 

कंके शरीरकरो श्रीकृणने पास ही डोड्‌ दिया 1 ८४॥ 

धरण्यां सृदितः शिद्ये तस्व देहः सुखोचितः । 

क्रमेण विपरीतेन पांुभिः परुषीरूतः ॥ ८५॥ 
उसका जो शरीर सुख भोगनेकरे योम्य थाः वह मर्दित 

होकर प्रथ्वीपर सो गया । द्यूरवीरोकरे व्यि अगोग्य विपरीत 

विधिसे धूलमे सुनकर वह्‌ कोमल अद्ध कठोरहो गया ॥८५॥ 


तस्य तद्‌ वदनं शयामं सुक्ाक्षं सकट विना। 
न षिभाति श्रिपयस्तं विरलां यथमस्बुजम्‌ ॥ ८६ ॥ 

गर्दन रूट जनेसे उसक्रा शरीर अस्त-व्यस्त हो गया था । 
उस्करेनेत्रवददहो गये ये तथा उसका द्याम मुख मुक्ुखके 
विना दलरहिंत कमलके समान सुयोभित नदीं द्यो रदा था॥८६॥ 
असंग्रामहतः कंसः स वाणैरपरिक्चतः। 
केशग्ाहानिरस्तासुबीरमागैन्निराङृतः ॥ ८७॥ 

कंस व्रिना युद्धके मारा गया था। उसके शरीरपर 
वार्णोसे धाव न्दी होने प्राया था! उसको केश पकरद्कर 
घसीय गया थाः इस अवद्थामिं उसके प्राण निके ओर 
वह वीरोचित मार्गसे भ्रट दो गया ॥ ८७ ॥ 


तस्य देहे पक्राशन्ते सदसा केदावार्पिताः । 
मांसच्छेदघनाः स्वँ नखाथ्र! जीवितच्िछिदः ॥ ८८ ॥ 


उसके शरीरम श्रीङ्कप्णद्वास सदसा गद्य गये उनके 
समी नखाग्र कंसकरे जीवनका उच्छेद करे प्रकरित दो रदे 
रे | वे उसके मांसको छेद-छेदकर सथन सूप्रसे वरहो 
अङ्कित हो गयेथे॥ ८८ ॥ 
तं हत्वा पुण्डरीकाक्षः प्रदषौद्‌ दविरुणप्रमः। 
ववन्दे वसुदेवस्य पादौ निहतकण्टकः ॥ ८९ ॥ 
उस्रा वध करके क्मख्नयन श्रीङ्ृप्णकरो इतना अपार 
हर्षं हुआ किं उनके अज्ञोकी भ्रमा द्विगुण दीसिसे प्रकारित 
दो उढी । उन्दने जगत्‌क्रे ल्ि कण्टकरूप कंसका विनाश 
करफे पिता वसुदेवके दोनों चरणोमे प्रणाम किया | ८९ ॥ 
मातुश्च क्िरसा पादौ निपीड्य यदुनन्दनः । 
सासिश्चत्‌ प्रखपोत्पीडेः रृष्णमानन्दनिःखतेः ॥ ९० ॥ 
तसश्वात्‌ यदुनन्दन श्रीकृष्णे माताके दोनो चर्णेमि 
अपना मस्तक रखकर उनी वन्दना की | उस समय देवकी 
अनन्दातिरेक्से निक्रठे हुए अपने स्तनोकि दधसे उन्हे 
सींचने र्गी ॥ ९० ॥ 
याद्वाश्चैव तान्‌. सवौन्‌. यथास्थानं यथावयः । 
पप्रच्छ कुदं ष्णो दीप्यमानः खतेजखा ॥ ९१॥ 
तदनन्तर अपने तेजते उदीप दए श्रक्ृप्णने वय ओर 
स्थितिकरे अनुसार उन समस्त यादर्वोक्री कुरर पृष्ी ॥९१॥ 
चट्देवौऽपि धमौन्मा कंखश्चातरमूर्भितम्‌ । 
बाहुभ्यामेव तरस सुनाम(नमपोथयत्‌ ॥ ९२ ॥ 
इधर धर्मात्मा वख्देवने भी कंसके ओजक्वी भ्राता 
सुनामाको अपनी दोनो भुजा्ओद्रारा ही वेगपूरवक 
मार निराया ॥ ९२ ॥ 
तौ जिताय जितकरोधौ चिरविप्रोपितौ जजे । 
सख्यपितुर्भवनं वीरौ जग्मतुद्ष्रमानसौ ॥ ९३॥ 
शत्रु ओर क्रोध दोनो जीतकर वरजम चिरकारतक 
रदे हुए वे दोनो वीर मन-दी-मन हरं ओर उर्लाससे भरकर 
अपने पिताक्रे मवनमे गये ॥ ९३ ॥ 


इति श्रीमहाभारते लिरभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि कंसत्रपे ्िंरोऽध्यायः ॥ ३० ॥ 
इस प्रकार ्रीमहाभार्तते दिर्माग हरिशे अन्तत विष्णुपव॑मे कंसदधतरिवयक तीस; अध्यय परा हुजा ॥ १० ॥ 


एकत्रिंशोऽध्यायः 


कंसकी सियो ओर माताका विरूप 


| वै्म्पाथन उवाच 
भतीरं पतितं दृष्ट श्ीणयुण्यमिव रदम्‌ । 
कंसपल्यो इतं कंसं समन्तात्‌ पर्यवारयन्‌ ॥ ९ ॥ 
वैशम्पायनजी कहते ह--जनमेजय ! जिरुका पुण्य 


क्षीण हो गया होः उस प्रहवैः समान भूमिपर भिरे हुए पतिको 
देखकर राजा कसरी पलिर्यो उसके मृतक शरीरको सब्र ओर- 
से घेरकर्‌ बैठ गयीं ॥ १ ॥ 

तं मदीशयने खं क्ितिनाथं गतायुषम्‌ ! 

भायौः स दष्ट शोचम्ति खुग्यो सगपति यथा ॥ २ ॥ 


२२४ 


भीमहाभारते खिरुभागे 


[ हरिवंशे 


जो कमी ध्थ्वीकरे स्वामी ओर संर्क ये, वे ही पतिदेव 
आयु समाप्त होनेषर भूमिमयौ शय्यरापर सो रदे दैः यद देख 
राजा कंसक्री ानिर्यो उसके ल्यि उसी तरह योक करने ठगी 
जते हरिणिर्थो यूथपति दरिणकर ल्थि शोकमग्न दो जाती ईद ॥ 
हा हतः स्म महावाहो हता हतवान्धवाः। 
वीरपल्न्यो हते वीरे त्वयि चीरवतप्रिये ॥ २॥ 

( वे विल्यप करती हुई कहने ठ्गी-- ) ष्टाय | महा- 
ब्रह वीर { आपको वीरव्रत प्रिय था । आपके मारे जनिपर 
हम सव्र वीर-पलिर्यो मारी गयीं । हमारी आदार्ओकी हत्या 
हो गयी । हमरि बन्धु-बान्धव भी ( अनाथ होनेके कारण ) 
मरेहीगये!॥३॥ 
दमामवस्यां पदयन्त्यः पश्चिमां तव नैिकीम्‌ । 
कृपणं राजशादृंल विरूपामः सवान्धव।ः ॥ ४ ॥ 

ध्राजदियोमणे | आपकी म्युसम्बन्धिनी इस अन्तिम 
अवेस्ाको देखती हई हम सव ८ आपकी पलिर्यो ) अपने 
बान्धवोँसदित दीनतापू्णं विल्यप कर रदी ई ॥ ४ ॥ 


किल्नमूलाः स्म संबत्ताः परित्यक्तास्त्वया विभो । 
त्वयि पञ्चत्वमापन्ने नाथेऽस्माकं महावले ॥ ५॥ 
प्रमो ! आप हमरे महाव्खी प्राणनाथ थे, अपके मरि 
जानेसे हमारी तो जड कट गयी । हाय { आपने हरमे त्याग 
दिया ! ॥ ५॥ 
को नः कोपपरीताङ्गी रतिखंसगंलालसाः। 
कतां इव विचेष्टन्तः शा प्रनीयानि मेष्यति ॥ £ ॥ 
श्ट प्राणाधार ¡ हम मन्म रतिसंसर्गकी लालसा रखकर 
भी ( मानावस्था्मे ) प्रणयक्रोपसे युक्त दो जब प्रध्यीपर 
कतार्भोकी मति खेरकर विपरीत चेष्ठा करने खगर्तीउससमय 
आप हमे प्रमपुर्वक मनाक्रर शय्यार्थोपर सुत्मते ये । अव हरमे 
क्रौन इस तरह उठाकर सेर्जोतक्र ठे जायगा १ ॥ ६ ॥ 
ददं तेऽसदरां सौम्य दयनिःष्वासमारुतम्‌ । 
दहत्यकों मुखं कान्तं निप्तोयमिव पङ्कजम्‌ ॥ ७ ॥ 
धौम्य ! जिसते मनोरम निःशात्त वायु निकला करती 
थीः आपके उख कान्तिमान्‌ मुखकरो सूयं जलरहित ( तालव- 
म उगे हुए) कमल मेति अपनी दुःसह किरणेति दग्ध कर 
रदे ह । यद दुरवस्था आपके योग्य न्दी है ॥७॥ 
हमे ते श्रवणे शून्ये न शोभेते विद्कुण्डठे । 
शियेधरायां संखीने सत्तं कुण्डरप्रिये ॥ < ॥ 
ध्ये आपके कुण्डलरदित सूने कानः जिन्दं सदा दी कुण्डल 
धारणं करना प्रिय रदा है इख स्मय कण्ठर्मे विलीन होकर 
दभा नर्दएपास्देर॥८॥ 
छते स मुकुखो वीर सर्वैरलबिभूपितः। 
अत्यथं शिरसो ठक्ष्मी यो दघाराकंसप्रभाम्‌ ॥ ९ ॥ 


ध्वीर ! सम्पण सेस विभूप्रित आपक्रा वह मुद्र करो 
हैः जो आपके मस्तकपर सूर्वकी प्रभाकर समान अतिशय मोमा 
का आधान करताथा]॥ ९॥ 
अनेन हि कटघेण तवान्तःपुरदोभिना । 
कथं दीनेन कर्तव्यं त्वयि टखोकन्तरं गते ॥ १०॥ 
धप्राणनाय | आपकी ये रानिर्यो जो अन्तःपुस्की योभा 
वदाती थीः आपक्रे टोकान्तरभे चे जनस अर दीन ओर 
अनाथ होकर कैसे निर्वाह करेगी ॥ १० ॥ 
नु नाम सियः साध्व्यः प्रियभोनेप्ववश्चिताः। 
पतीनामपरित्याज्याः स त्वं नस्म्यय्य गच्छसि ॥ ११॥ 
ध्नाय | सुना था, साष्यीन्निर्योन ते प्रिय भोगेति 
कभी वचित होती ह ओर न उनफरे पति उनका पस्त्याम दी 
करते दं; परंतु आपतेो ह छोडकर चये जा रे द ( दाव ! 


। यव हम कैसे रहेगी) ॥ ११॥ 


अहो कालो महावीर्यो येन पर्ययकर्मणा । 

काटतुल्यः सपल्लानां त्वं क्षिप्रमपनीयसे ॥ १२॥ 
"अदो ! काल मदान्‌ वक्त सम्पन्न दै, जो अपनी उट्ट- 

केकी क्रियाद्वाय जचरु्भोकरे लिये काट्फरे समान जआप्को मी 

शीव्रतापूर्वक यदसि ख्यिजार्दादै॥ १२॥ 

वयं दुःलेप्वनुचिताः खुखेष्येव त्वयेधिताः। 

कथं वत्स्याम विधवा नाथ कार्पण्यमाधिताः ॥ १२॥ 
धनाय | आपने हमे सदा सुखेमि दी रखकर पाल्य-पोसा 

ओर बड़ी क्रिया हे । दम दुःख भोगनेकरे योग्य महीं ईह जित 

आज आपदे विद्युडकर विधवा टकर दयनीय ददयाको पर्हुच 

गयी द । अव हम कैप यर्हो रद सकेगी ?॥ १३॥ 

सखरीणां चारिचद्धुव्धानां पर्तिरेकः पया गतिः । 

त्वं हिनः सा गतिदिखन्ना छतान्तेन चटीयसा ॥ १४॥ 
भजिनकरे मन्म सद्याचारफे पाटनका छोभ दयोः उन साध्वी 

खिरथोकरे व्यि एकमात्र पति दही परम गति दै--खयरते व्रडा 

सदारा दै, कितु महावरली काटने हमारे उस सदारेको काट 

डाला | १४॥ 

वेधन्येनाभिभूताः स्मः शओोकसंत्तमानसाः। 

सोदितव्यहदे मग्नाः क गच्छामसत्वया विना ॥ १५॥ 
ष्टम वैधन्यसे अभिभूत दो गयी ह । हमारा मन सोके 

संतत हो उठा है । हम विपत्तिके उस गहरे कुण्डे इब गयी 

है जदो केवल रोना-टी-रोना रह जाता रै ! अव हम आपके 

विना कदां जार्वगी १। १५॥ 

सह त्वया गतः कालस्त्वद्के कीडितं छतम्‌ । 

क्षणेन तद्धिदीनाः स्म अनित्या हि चरणां गतिः ॥ १६॥ 
श्ूमारा समय आयकरे साथ ही बीता दै । हमने जवतक 


विष्णुपर्व ] 


एकथिदो ऽध्यायः 


दमण 


नान 
=----------------------------------------------- ~~~ ~ ~ --------------- ~ 


आपके अङ्के ही क्रीडर्दैकी ई कंठ एक दी श्वणमे हम 
उख सोभाग्यते वञ्चित दो ग्य । सचमुच दौ मनुरप्योकी गति 
अनित्य है-श्षणमद्रुर ई ॥ १६ ॥ 
अहो वलविहीनाः स्म विपन्ने त्वयि मानद्‌ । 
पकदुष्नकारिण्यः सवौ वैघव्यरष्वणाः ॥ १७॥ 
ूससोको मान देनेवाठे महाराज | आपके निधनपे हम 
सवर-की-सव निल दो गयीं । जान पड़ताहै, हम सचने एक 
समान ही पाप करिया था, जिससे सव्रको वैधन्यक्रा चिद धारण 
करना पड़ा ॥ १७ ॥ 
त्वया स्वर्गप्रतिच्छन्दैीलिताः स्म रतिप्रियाः। 
त्वयि कामवरः सवौः स नस्त्यन्य क गच्छसि ॥१८॥ 
{आपने हम रतिप्रिया रमणिर्योको शवरि समान सुख- 
भोग देकर सदा हमारा ललन-पाटन कियाथा | हम समी 
आपकर प्रतिं कामासक्त रही है फिर आप हरम छोडकर करटा 
चले जारे दै॥ १८॥ 


अस्माकं स्वमनाधानां नाथो हलि सुरोपम । 
आसां विलपमानानां कुररीणामिव प्रभो । 
प्रतिवाक्यं जगन्नाथ दातुमर्हसि मानदं ॥ १९. ॥ 
्देवोपम प्रभो ! आप दीम अनाथांके नाथ ईै। 
जगन्नाथ ! मानद [ कुररीके समान विलाप करनेवाटी अपनी 
इन पलिनियोको कुछ उत्तर देनेकी कपा करे ॥ १९॥ 
पवमातंकलन्रस्य शाम्यमानेषु चन्धुपु । 
गमनं ते महाभाग दारणं प्रतिभाति नः ॥ २०॥ 
"महाभाग ] जवर फि आपके समी बन्धु मरे जारे द 
ओर छिर्यो गोकसे पीडित दै, एेे अवसरपर आपका परलोक- 
गमन हभ ब्रडा दारुण प्रतीत होता है ॥ २० ॥ 
नून कान्ततराः कन्त परलोके वरल्ियः। 
यतस्त्वं प्रस्थितो वीर विहायेमं गृहे जनम्‌ ॥ २१॥ 
प्रियतम ! वीर्‌ | निश्चय ही परछोककी सुन्दर्य बडी 
ही कमनीय दःजिसते आप अपने घरकी इन रानिर्योको छोडकर 
उनके पास जनेके च्ि प्रसित दो गये ॥ २९॥ 
किजुते कारणं वीर भायास्वेतासु भूरिव्‌ । 
आतंनाद्‌ रदन्तीषु यन्मोदान्नावयुध्यसे ॥ २२ ॥ 
` 'अषिकते-जधिक ८ सुख-षुविधा ) प्रदान करनेवाले 
महाराज ! क्या कार हैः जो अपनी इन पलिरयोक रोने ओर 
अतनाद्‌ करनेपर भी आप मोहवश इनके दुःखको समन्त 
नहीं पाते अथवा इस मोहनिद्रासे जाग नहँ उठते ई ॥२२॥ 
अहो निष्कस्णा यात्रा नराणामौ्ष्वदेदिक्ती । 
यत्‌ परित्यज्य दारान्‌ स्वान्‌ निरपेक्षा जन्ति हि ॥२३॥ 
अदो | पुर्षोकी य& पारलीकिक याचा बड़ी दी निदय 


होती 8; क्योकि वे अपनी पलिर्योको खडकर उनकी को 
अपक्षा न स्खते हुए. चर देते ६ ॥ २३॥ 
अपतित्वं सिया भेयो न तु क्रूरः पतिः खियाः । 
खर्गसखीणां प्रियाः शुसास्तेषामपि च ताः प्रियाः ॥२४॥ 
प्िर्योका नरिना पतिके दी रह जाना अच्छा; भिदु उनके 
टियि सयूरवीर पतिका दोना अच्छा नहीं है; क्योकि वे धरूरवीर 
खर्गखोककी सुन्दर्िर्वोको प्रिय होते ओर वे बुन्दर्स्यो मी 
उन शूरवीरेको भ्रिय होती ६ ॥ २४॥ 


अहो क्षिप्रमरद्येन नयता रत्वा रणप्रियम्‌ । 

प्रहतं नः क्तान्तेन स्वौसामन्तरात्मसु ॥ २५॥ 
०अहो { जिन युद्ध ही प्रिय था, उन आपको अदद्य- 

भावसे शीघतापूव॑क ले जानेवाठे काटने हम सवरकी अन्त 

रात्मार्ओपर एक साथ ही प्रहार करिया है ॥ २५ ॥ 


हत्वा जरासंधवलं जित्वा यक्षाश्च संयुगे । 

कथं माचुषमान्नेण तस्त्वं जगतीतले ॥ २६॥ 
ध्वीरवर | आप युद्धम जयासंधकी सेनाका विनाश करके 

यर्षोक्रो भी हराकर इस भूतख्पर एक मनुष्यमात्रके हायते 

किंस तरह मार उल़् गये १॥ २६ ॥ 


द्द्रेण सह संग्रामं कत्वा सायकविग्रदम्‌। 
अमर्तयैरजितो युद्धे मर्तयेनासि कथं हतः ॥ २७॥ 
'इन्द्रके साथ बर्णोद्वासा युद्ध करके जो समराङ्ञणमे 
अम्यते भी पराजित न हौ सके वे ही अप एक मरणधर्मा 
मनुप्यक्रे हाथसे कैसे मरि गये १॥ २७ ॥ 
त्वया सागरमक्षोभ्यं विक्षोभ्य दारवृषिभिः। 
रत्नसवंखदरणं जित्वा पाशधरं छतम्‌ ॥ २८ ॥ 
“आपने अपने बार्णोकी वषसि पाशषधारी वरुणो परास 
करे अक्षोभ्य महासागरको भी वि्षुम्ध करते दए उसके 
रत्नरूपी सर्व॑सखका अपहरण कर लिया था 1 २८ ॥ 


त्वया पोरजनस्याथं मन्दं वर्षति वासवे 

सायकैजैकद्‌ाश्जित्वा वाद्‌ चपर प्रवससितम्‌ ॥ २९ ॥ 
(एक व्रार इन्द्रने जव वप्रं कमी कर दी थी, तव 

आपने अपने सायकोसे बादर्छीको जीतकर पुरवासियेकि हितके 

ल्य बरल्पूर्वक वर्षा करवायी थी ॥ २९ ॥ 

भ्रतापावनताः सवं तवं तिष्ठन्ति पार्थिवाः। 

प्रेपयन्तो वराद्यणि रत्नान्याख्छादनानि च ॥ ३०॥ 
भभूमण्डलकरे समस्त भूषार आपके प्रतापसे नतमस्तक 

रहा कसते थे ओर उपहारफे रूपमे आपके पास बहुमूल्य रत 

एवं व्र भेजते रहते ये ]॥ ३०] 

तवैवं देवकल्पस्य टण्टवीर्यस्य द्रातुभिः। 

कथं प्राणान्तक घोरमीदश्षं भयमागतम्‌ ॥ २१॥ 


रेरे 


४हस प्रकरार आप देवता्कि मान तेजसी ये । रचुर्ओ- 
ने आपके वल-पराक्रमकरो प्रयक्ष देखा था तो भी आपके 
ऊपर णेव प्राणान्तकारी घोर भय केसे आया ॥ २१ ॥ 


प्रा्ताः सो चिघवाहाब्दं त्वयि नाथे निपातिते । 

अप्रमत्ताः प्रमत्तेन ऊतन्तेन निराङताः ॥ ३२॥ 
ष्टा नाथ } आयकरे मरि जानेसे आज ह्मे विधवाक्री पदवी 

प्रात हई हे । हम सदा प्रमादते दुर रहती थी; परंतु मतवले 

कृतान्ते हमको भी मिद्रीमे मिल दिया ॥ ३२॥ 

यदेवं नाथ गन्तव्यं यदि वा विस्रता वयम्‌ । 

वाद््ात्रेणापि यामीति वक्तव्ये कः परिथधरमः ॥ ३३ ॥ 
धनाथ | यदि इस प्रकार आपको जाना दी था अथवा 

यदि ह्मे थुखाद्यीदेनाथा ततो कणीमात्रसेमी भ्म जारहा 

हैषा कदकर विदा ले लेने आपके स्यि क्या 

परिश्रम था ॥ ३३ ॥ 

प्रसीद नाथ भीताः स्म पादौ ते याम सूर्धभिः। 

अं दुरप्रवासेन निवत॑सखर नराधिप ॥ ३8 ॥ 
प्राणनाथ ! प्रसन्न दोदये । हम भयभीत दहै | आप्के 

चरम मस्तक रखकर प्रार्थना कसती ई । नरेधर । दूर 

देशम जने ओर रहनेषे कोई लाभ नदीं | आप षो दी 

रोट चल्यि ॥ १४ ॥ 

अहो वीर कथं शेषे निपण्णस्तृणपांखपु 1 

शयानस्य हि ते भूमो कस्मान्नोद्धिजते वपुः ॥ ३५ ॥ 
ध्वीर ! हरमे आश्वर्यं हैः आप तिनर्को ओर धूमे लोर- 

करकसेसोरेर्द१ इस तरह प्रथ्वीपर सेये हुए आपके 

शरीरको उद्वेग को नदीं प्राप्त दोता दै १॥ ३५॥ 

केन॒ सुततप्रहारोऽयं दत्तोऽस्माकमतरकितः। 

प्रहतं केन सर्वा नारीपष्वेवं सुदारुणम्‌ ॥ २६ ॥ 
जैसे किंसीपर सोते समय आघात क्रिया जाय, उस 

ग्रकार किसने हमलोर्गोको यह अप्रत्याशित (जिनकी हमे 

कोई आशा नदी थी, रेखा) धोर दण्ड दियादै किस 

निष्डुरने हम सव नारिर्योपर इस्त तरह असपन्त दारुण प्रहार 

करिया है १॥ ३६ ॥ 

रुदितायुदायो नाया जीवन्त्याः परिदेवनम्‌ । 

कि वयं सति गन्तव्ये सह भौ रुदामहे ॥ २७॥ 
“अहो { विधवा नारौ जतव्रतके जीव्रित रहती है, उसे 

विलाप ही करना पड़ता दै । उसक्रा अन्तःकरण रोता रहता 

है| हमे तो पक्ति साथ दी चल्नादै, रेते अवसर हम 

रो क्यो रदी ह ॥ ९७ ॥ 

पतसिच्नन्तरे -दीना कंसमाता प्रवेपती । 

क मे वत्सः क मे पुन्न इति येरूयती शरश्चम्‌ ॥ ३८ ॥ 


ीमषहाभार्ते खिकभागे 


[ हरिवंशे 


इसी वी्च्मे कंसकी दुखिया माता कोपिती हुई वरदो आवी 
ओर षकर्हो है मेरा वचा? कर्मे वरे १ एेखा कहकर 
जोरजोरसे रोने ख्गी ॥ ३८ ॥ 
सापश्यश्निहतं पुतं निष्प्रभं दारिनं यथा। 
हदयेन विदीर्णेन श्राम्यमाणा पुनः पुनः ॥ ३९ ॥ 
उसने अपने मरे हुए पुत्रको देखा । वह कान्तिहीन 
चन्द्रमाके समान प्रतीत होता था | उसकरी एेसी दशा देखकर 
माताका हदय विदं हयो गया ¡ उसे व्रार-बार चक्र 
आनि ल्गा॥ ३९॥ 
पुत्रं समभिवीक्षन्ती हा हतास्मीति बादाती । 
स्मुव्राणामातन्ठिन विरुखाप रुरोद च ॥ ४०॥ 
वह पुत्रके मुलकी ओर देखती हुई चीखने ल्गी-- 
श्राय ! मँ मारी गयी [» पुत्रवधुओंके आर्वनादकरे खथ रोने. 
विख्खने ठगी ॥ ४० ॥ 
सा तस्य वदनं दीनसुत्संगे पुत्रगृद्धिनी । 
छृत्वा पुत्रेति कारुण्यं विरुलापातंया गिरा ॥ ४९॥ 
पुत्रके जीवनकी इच्छा रखनेवाली राजमाता उसे दीन 
यसको अपनी मोदमे रखकर आतं वार्णीमे ष्टा पुत्र ककर 
करुणाजनकर विलप करने ख्गी--। ४१ | 
पुज द्रवते युक्तं ॒क्षातीनां नन्दिवर्धन । 
किमिदं त्वरितं चत्स धरस्थानं इतवानसि ॥ ४२॥ 
श्रेय ! त॒म तो बीस्तरतम तलयर रते थे ओर अपने 
बन्धु-वान्धर्वोका आनन्द वदति थे । वत्स ! तुमने भ्यो इतनी 
जल्दी यहे प्रस्थान क्रिया है १ ॥५२॥ 
प्रसुत्तश्चातिविचूते कि पु नियमं विना, 
वत्स नैवंविधा भूमौ शेरते कृतलश्चणाः ॥ ४३॥ 
धुर तुम विना किसी नियम (नियन्त्रण) के इस अत्यन्त 
खुले हुए स्थानम क्यो सो रदे हो ए वत्य ! तम्दरि-जैते छम- 
लक्षण-सम्यन्न नरेश इस तरह भूमिपर नदीं सोते ई ॥ ५३ ॥ 
रावणेन पुरा गीतः शोकोऽयं साधुसम्मतः । 
वखज्येष्टेन छोकेयु राक्षसानां समगमे ॥ ४४॥ 
(तीनों लोकमि जो बल्मे ससे व्रदा-चदा था, उस 
रावणने प्राचीनकालमे राक्चसोके समुदायमे इस स्प्पुरुषोद्रार 
सम्मानित इ्टोकका मान करिय। था ॥ ४४ ॥ 
प्वमूर्जितवीयस्य मम देवनिध्ातिनः। 
वान्धवेभ्यो भयं घोरं दुर्निवारं भविप्यति ॥ ४५॥ 
धयै इस प्रकार बर ओर पराक्रममे वरदा हुधा हँ तया 
देवताओं वध करनेमे समर्थं हूतो भी सुञ्चे अपने दी 
माई-बन्धुओवि घोर एवं अनिवायं भय प्राप्त होगा ॥ ४५ ॥ 


५ 


विष्णुपवै ] 


तथेव क्षातिटुव्धष्य मम पुत्रस्य धीमतः। 
क्षातिभ्यो भयमुत्पन्नं शरीरान्तकर महत्‌ ॥ ४६॥ 
(उशी प्रकार मेया बुद्धिमान्‌ पुत्र अपने सजातीय बन्धुर्भ- 
पर लुभाया रदता था तो भी इते मार्ई-बन्धुषि दी यह देद- 
विनाग्रक महान्‌ मय मति हुभा हैः ॥ ५६ ॥ 
सा पतिं भूपति चृद्धसु्रसेनं विचेतसम्‌ । 
उघाच ख्दती वाक्यं विवत्सा हरिणी यथा ॥ ४७॥ 
णदयेदि राजन्छुद्धात्मन्‌ परय पुत्रं जनेश्वरम्‌ । 
शयानं यीरदायने चच्(हतमिचाचरम्‌ ॥ ४८ ॥ 
वह अपने पति वद्र राजा उम्रसेनसेः जो उक्त समय 
अचेत-से हो रटे ये, वछडेसे व्री हद हरिगीके समाने 
रोती हुई बोली--श्युद्ध अन्तःकरणवके महाराज { आश्य, 
आदये } अपने पुत्र साजा कंको देखिये, जो वञ्फरे मारे 
हुए पव॑तक्री भोति वीरशय्यापर सो रहा है ॥ ४७-४८ ॥ 


अस्य कुमो महारज नि्यीणसदशीं क्रियाम्‌ । 
प्रेतत्यसुपपन्नस्य गतस्य यमसादनम्‌ ॥ ४९ ॥ 
'महाराज ! अग्र॒ हमलोग दस ल्य मृत्युकाटोचित्त 
क्म॑कर; कपौकिं यद यमलोके जाक्रर्‌ प्रेतत्वको प्राप्त 
हुमा है ॥ ४९ ॥ 
वीरभोगम्यानि राज्यानि वयं चापि पराजिताः। 
गच्छ विक्षाप्यतां कृष्णः कंससत्कार कारणात्‌ ॥ ५० ॥ 
ध्ाज्यका उपभोग तो वीर पुख्प दयी करते है । इमलेग 
तो अव्र पराजित दो गये; अतः जाश्ये, कृष्णफरो यद सूचित कौजिये 
क्षि कसे अन्व्येष्टि-संस्कारकौ व्यवसा होनी चाहिये ॥ ५० ॥ 
मत्णान्तानि वैराणि सान्ते शान्तिर्भविष्यति । 
व्रेतक्यीणि कायौणि सुतः किंमपराध्यते ॥ ५९ ॥ 
शशन्रुके मरनेतक दही वैर रहता दै । उसे शन्त हो 
जनिपर अव्र वैरी भी शन्तिहो ही जायगी ] इसके परेत- 
चर्यं तोकरने दौ चाहिये । मरा हुभा क्या अपराध करता हैः ॥ 
पवसुकत्वा पति भोजं केश्षानारुञ्य दुःखिता । 
पुभरस्य सुखमीक्सन्ती विटेापैव सा शदाम्‌ ॥ ५२॥ 
अपने पति भोजराजसे एेसा ककर दुःखिनी राजमाता 


पुत्रका मुख निहारती हुई अपने केश खीच-खीचकर अत्यन्त 


विखाप करने ठगी | ५२] 


इमास्ते कि करिष्यन्ति भायौ रजन्‌ सुखोषिताः । 
त्वां पति सुपति भ्राप्य या विपन्नमनोरथाः ॥५२॥ 


पकथिशषोऽष्यायः 


३२७ 


(राजन्‌ ! ये सुखम पटी हई छम्डयरी रानिर्यो अव क्या 
करेगौ । तम्दारेजैते भे पतिको पाकर भी इन बेचारी बहुरओ- 
का सारा मनोरथ नष्ट हो गया ॥ ५२३ ॥ 
हमं ते पितरं बद्धं छृष्णस्य घदाघर्तिनम्‌ । 
कथं द्रक्ष्यामि श्रु्यन्तं कासारसङिलं यथा ॥ ५४ ॥ 

धये तुम्हारे वृदे पिता अवर श्रीकृष्णे अधीन हयो गये । 
सूते हुए पोखरेके जलरी मेति अध यै इन्दे परतन्ते दशामे 
कैते देख सदूंगी ॥ ५४॥ 


अहं ते जननी पुत्र क्रिमर्धं नाभिभापसे। 
भरिते दीैपष्यानं परित्यज्य प्रियं जनम्‌ ॥ ५५॥ 
धरे ¡ म दम्ड।री जननी हू ! युचसे भ्यो नदीं गोरे 
दो १ कर्यो आज अपने प्रिपजर्नोक्रा परित्याग करे ठुमने 
परलोकके विशार परथको ग्रान क्रिया है ? ॥ ५५] 


अहो वीरादपभाग्यायाः कृतान्तेनाभिवर्तिना । 
आच्छिव मम संदायो नीयसे नयकोविदः ॥ ५६ ॥ ! 

अहो वीर { चम नीतिक्कुङ नरेश ये, मेरी सम्पत्ति थे; 
कतु सदा समीप रहनेवाला कार आज तुम्हे मुच अभागिनी- 
की गोदसे छीनकर च्ि जा रदा दहै ॥ ५६ ॥ 


दानमानखृहीतानि तषन्येतानि तैगणैः। 
रुदन्ति तव बरत्यानां कनि कुखयूथप ॥ ५७॥ 
“कितने ही कुल ( परिवारो ) के समुदायका पालन 
करनेवाले मेरे वीर पुत्र ! त॒नने जिन्हं दान ओर मानसे 
अनुगृहीत कर रखा थाः जो दम्दारे उन शुणोसे अत्यन्त संतुष्ट 
येवे हीये ठम्हरि भर््योके कुक टोग आज तुम्हरे ल्यि 
रो रे दै ॥ ५७॥ 


उत्तिष्ठ नरशादरु दीरधवाहो मदावल | 

घराहि दीनं जनं सवं पुरमन्तःपुरं यथा ॥ ५८ ॥ 
'नरप्र् ! उढठो । महावाह्ये ! मदावली वीर ! इन दीन- 

दुखी रेगोकी ओर समस्त नगरकी अन्तःपुरके समान ही 

रक्षा करोः ॥ ५८ ॥ 


ख्दतीनां शररातीनां कंखस्रीणां सुधिस्तरम्‌ ! 
जगामास्तं दिनकरः संध्यारागेण रक्चितः ॥ ५९ ॥ 

अत्यन्त आतं होकर उसे विस्तृत गुर्णोको याद करके 
कंकर छियो ओर माता रोतेरोते संध्या हो गयी ओर 
संध्याकारीन अरुण-रागसे रंजित हुए दिवाकर ८ सूरं ) 
अस्ताचख्को चले गये ॥ ५९ ॥ 


इति श्रीमहाभारते विख्मगे हहं विष्णुपवैणि कंसखीविरपे एकमिोऽध्यायः ॥ ३१ ॥ 
दस प्रकार श्रीमहमभारतकरे दलिरुमाप हरिशे अन्तत विष्णुप॑मे कंसकी छियोका विसापपनिण्य 


ए 


~~~ 


श्कतीसमे{ अध्याय परा हुमा ॥ २९ ॥ 


४९८ 


आओम्रदाभारते सिरभारो । 


[ शरिव॑शे 


दािरोऽध्यायः 
्ीकृष्णका कमवभके सिये पशात्तापपू्॑क उसके ओचित्यका समर्थन, उग्रसेनका शरीकृष्णको सर्वख- 
समर्पणके पश्चात्‌ कंसका अन्त्ये्ि-संस्कार करनेके रिये अलुरोध, श्ीढृप्णका न्दे सम्ना-वद्ञ।कर 
राज्यपर अभिपिक्त करना भौर समस्त यादवकि साथ जाकर कंस आदिका अन्त्येषि-संस्कार कराना 


वैश्चम्पायनं उवाच 
उग्रसेनस्तु छरृष्णस्य समीपं दुःखितो ययौ । 
पुत्रदोकाभिसंत्तो विधपीत श्व श्वसन्‌ ॥ १॥ 
वैाम्पायनजी कहते ह- जनमेजय ! राजा उग्रसेन 
पुत्रयोकते संतप्त एवं दुखी होकर भीक्प्णके समीप गये | 
उख समय वे स प्रकार ठी सि खचि रहै ये, मानो 
उन्हनि विषपीचलियाद्ो॥१॥ 
स ददर्श - गृहे र्णं यादवैः परिवारितम्‌ । 
पश्चा्ुतापाद्‌ ध्यायन्तं कंसस्य निधनाविलम्‌ ॥ २ ॥ 
उरन्दनि देखा, पिते धर्म श्रीरृप्ण यादरवेसि पिरे हुए 
यैठे ३ ओर कंठ निधनसे मलिनि-सुख हो पश्वात्ताप करते 
हुए चिन्तामग्न हो रहे ६ ॥ २॥ 
कसनारीविरापांश्च श्रुत्वा स करुणान्‌ वहम्‌ । 
गरहमाणस्तथा.ऽ.ऽत्मानं तस्मिन्‌ यादवसंसदि ॥ ३ ॥ 
वे कंकी पलिनियोकि ब्रहुतैरे कर्ण विलाप सुनकर उस 
यादव-उमाज्मे अपनी निन्दा करते हुए बोटे--) ३ ॥ 
अदो "मयतिवास्येन रोषाद्‌ दोषावर्तिना । 
वैघन्यं खीसदसख्राणां कंसस्यास्य वधे छतम्‌ ॥ ४ ॥ 
'अददो | मनि अत्यन्त अविवेकके कारण रोपवद्य दोषका 
दी अनुसरण किया ओर शख कंखका वध करके जारो निरयो 
को विधवा वना दिया है ॥ ४॥ 


कारुण्यं खल्दु नारीषु प्रारृतस्यापि जायते । 
पवमात श्दन्तीपु मया भतंरि पातिते॥ ५॥ 
परिदेवितमापघ्रेण शोकः खलु विधीयते । 
साधारण मनुरप्योको भी क्िर्योपर दया टौ आती दैः 
परंतु मेरे दारा अपने पतिके मारि जनेपर जो इस प्रकार 
आतं होकर रो रही है उन रानि्येकि प्रति केवर पश्चाताप 
प्रकट करके मँ अपना शोक प्रकादित कर रदा टर ॥ ५१ ॥ 


छताम्तस्यानभिक्षानां स्मीणां कारुण्यसम्भवः ॥ ६ ॥ 
ध्न भोटी-माखी लियो विलपक्रो सुनकर तो यमराज- 
के दयम मी करणाका संचार दौ सकता है ॥ ६ ॥ 
कलस्य हि वधः श्रेयान्‌ प्रागेवाभिमतो मम । 
सतासुद्धेजनीयस्य पपेष्वभिरतस्य च ॥ ७॥ 
लोके धपतितवृष्वस्य परूषस्याल्पमेधसः । 
अक्लिष्टं मरणं श्रेयो न विद्धिष्टस्य जीवितम्‌ ॥ ८ ॥ 


धमन तो पदल्ते दी यह निश्चय कर च्या था कि! 
कंसका वध हयी श्रेष्ठ है । ओ सदा परपरम तत्पर रहमेके कारण 
साधु पुरर्पोकी दमि भी उद्वेजनीय ( उद्वेगे डाय्ने योग्य ) 
हो गया हो, संसारम सदाचारे गिर गवा दो तथादख्वलोग 
जिससे विदधे स्ने सगे हौः एेसे मन्ददुद्धि पुरुयक्रा मर 
जाना दी श्रेयस्कर द । वदी उसे क्टेदसे दुटकारां दिखने- 
वाला हैः जीवित रहमा नदीं ॥ ४-८ ॥ 


कंसः पापपरश्चैव साधूनामप्यसम्मतः 1 
चिकछब्दपतिवश्चैव जीविते चास्य का दया ॥ ९ ॥ 
(कंस सदा पर्पेमिं ही ल्गा रहता थाः साघु पुरषमी 
( उसे दुष्ट समञ्नकर ) उप्क्रा आदर नहीं करते ये तथा वद्‌ 
सवका धिष्छार पाकर पतित हो यया था, अतः उसके जीवन. 
परक्यादया ष्ये सकती है १॥ ९॥ 
खगे तपोरतं वासः फं पुण्यस्य कर्मणः । 
हापि यशसा युक्तः स्वर्ग॑स्थैरवधार्यते ॥ १०॥ 
ध्तपछी पुरर्पेक्रो जो खर्गलोकर्मे निवासत प्रात होता दैः 
वह उनके पुण्यकर्मका दी फ ह । पुण्यात्मा पुदप दस जगतूर्म 
मी यशसी होता है ओर स्वर्गवा्ठी देवता भी उसे खादर 
ग्रहण करते ह ॥ १०॥ 
यदि स्युरनिष्॑ता लोकाः स्युश्च धर्मपराः प्रजाः। 
नरा ध्मपरदृत्ताश्च न राक्षामनयः स्पृरोत्‌ ॥ ११॥ 
ध्यदि सव छोग संतु हो, सारी प्रजा धर्मम तत्पर रदे 
ओर मनुर्प्योकी केवल धर्मम ही प्रदृत्ति दो तो राजा्ओको 
अन्याय चू मी न्दी सकता ॥ ११ ॥ 
निग्रहे दु्वबरृत्तीवां कृतान्तः कुरुते फलम्‌ । 
दधर्ष खोकेषु कर्त॑भ्यं पारलौकिकम्‌ ॥ १२॥ 
१्यदि राजा इस लोकर्मे दष्ट इृत्तिवाठे पुरुषोक्रा दमन 
करे तो परलोकर्मे धर्मराज उसे उख्का फल देते ईै ! समूणं 
लोक्रोको धर्म ( उसके फल्खरूप सुखकरी प्रापि ) दी अभी 
हैः हस्य उन्म रहनेवाठे गुरर्पोको परटोक्रम सुख देनेवाले 
पुण्यकर्माका ्ी अनुष्ठान करना चाहिये ॥ १२॥ 
अतीव देवा रक्षन्ति नरं धर्मपरायणम्‌) .. 
कतीरः खुखभा सेके दुष्कृतस्य हि कर्मणः ॥ १३॥ 
देवता धर्मपरायण मनुष्यकी विरोषररूमसे र्वा करते द, 
क्योकि लोकम अधिकतर पाप कर्म करनेवाठे द्वी सुलम 
होते द ॥ ९३॥ 


विष्व | 


दाश्रिरो ऽध्यायः 


. ३२९ 


हतः सोऽयं मया कंसः साध्वेतद्वगम्यताम्‌ । 
मूलन्छेदः कृतस्तस्य विपरीतस्य कर्मणः ॥ १४॥ 
अतः मैने जो इस कंसका वध किथा है, इसे आपलोग 
ठीक समक्षं; क्योकि एेसा करफे मैने उसके पाप-कर्मका 
मूखोच्छेद कर डाल दै ॥ १४ ॥ 
तदैष सान्त्मयतां स्वैः शोकतः पमदाजनः। 
पौराश्च पुर्या श्रेण्यश्च सान्त्व्यन्तां सरव पव हि ॥ १५॥ 
इसलिये इन समसत रोकाक्रुल नारिरयोको आपरोग 
सान्न प्रदान करे ओर मथुरापुरीके नागरिके एवं रिस्पियो- 
तथा स्यवस्रायियौको भी समन्चाुञ्चाकर धीरज र्वरेधावेः ॥१५॥ 


वं वुवति गोविन्दे विवेसावनताननः । 
उग्रसेनो यदुन्‌ गृ पुञ्किरिचिषशद्धितः ॥ १६ ॥ 
जत्र श्रीकृष्ण इस प्रकार कह रदै थे? उसी समय राजा 
उभ्रतेन अपना ह नीचे कयि कुछ यादवोको साथ ले उस 
घर्म प्रविष्ट हुए । वे मन-दी-मन अपने पुच्र कंसे अपराधते 
डरे हुए े ॥ १६ ॥ 
स छृष्णं पुण्डरीक्लिमुवाच यदुस्तंसदि । 
बाष्पसंदिग्धया चाचा दीनया सजमानया ॥ १७ ॥ 
उरन्दोनि उस्र यादव-सभामे कमलनयन भगवान्‌ श्रीकरप्णसे 
असूमरी दीनः गद्रद तथा र्ड्खड़ाती हई वाणीम इस 
प्रकार कदा- १७ ॥ 
पुत्रो नियोतितः क्रोधान्नीतो याम्यां दिं रिपुः 
खधमोधिग्ता कीर्तिम विश्रावितं भुवि ॥१८॥ 
शशरीङकप्ण | तुमने मेरे पुत्रस उसके अपराधक्रा बदला छे 
च्या, अपने उस शान्रुको करोधपूर्व॑क यमलोक प्हुचा दिया; 
धमे अनुसार कीर्ति प्राप्त कर ली ओर भूमण्डलमे अपने 
नामका डंका पीट दिया ॥ १८ ॥ 


स्थापितं सत्सु माहात्म्यं दड्किता रिपवः इता; । 
स्थापितो यादवो वंदो गर्विताः खुदटदः कताः ॥१९॥ 
(सत्पुरुषे दयम अपनी महत्ता खापित कर दी ओर 


,शनुओको मयभीत कर दिया, यदुवंक्री जड जमा दी ओर 


सुद्दौको अपने ऊपर गर्वं करनेका अवसर दिय। ॥ १९ ॥ 


सामन्तेयु नरेन्द्रेषु प्रतापस्ते प्रकारितः। 

मिच्राणि त्वां भजिष्यन्ति संश्रयिष्यन्ति पार्थिवाः ॥२०॥ 
प्सामन्त यजाम तुम्हाय प्रताप प्रकारित दहो गयाः 

मिन्नगण तुम्हे अपनायेगे ओर भूमण्डल्के राजा तुम्हार 

आश्रयल्ेगे] २०॥ 

प्रतयो ऽजुयास्यन्ति स्तोष्यन्ति त्वाँ द्विजातयः । 

संधिविग्रदमुख्यास्त्वां प्रणमिष्यन्ति मम्निणः ॥२१॥ 
 प्ृतिर्यो ( प्रजाः मन्त्री आदि ) वम्दारा अनुसरण 


करेगी; ब्ाह्यणलोग तुम्हारी स्ति करगे--दम्दरि गुण 
गायेगे ओर संधि-विग्रहफे कारयोमि प्रभुखरूपते भाग लेनेवाले 
मन्त्री व्ह प्रणाम करेगे ॥ २१॥ 
हस्त्यश्वरथसम्पू्णं पदातिगणसकुरम्‌ 1 
प्रतिगरहाण कष्णेद्‌ कंसस्य बखमग्ययम्‌ ॥ २२ ॥ 
्रीकृण्ण } हाथी, घोडे, र्थ ओर पैदल सैनिकंषि भरी 
ददं कंस यद्‌ अक्षय सेना हण करो ॥ २२॥ 
धनं धन्यं च यत्‌ किचिद्‌ रल्ान्यारछादनानि च । 
प्रतीच्छन्तु नियुक्ता चै त्वदीयाः रष्ण पूरुषाः ॥२३॥ 
लियो हिरण्यं यानानि यदन्यद्‌ वसु किचन 1 
श्रीकृष्ण | जो कुछ भी धन; धान्यः सत्न ओर वचर 
आदि कंसके अधिकास्मै थे, उन सको तम्हारे आदमी संभाल 
ट । लिर्योः सुवर्णः वाहन तथा अन्य जो कुछ मी धनः रल 
आदि दै, उनपर मी वे अधिक्रार करट ॥ २३१ ॥ 


एवं हि विहिते योगे पापे रष्ण विग्रहे ॥ २४॥ 
प्रतिष्ठितायां मेदिन्यां यदुनां शत्रुसूदन । 
त्वं गतिश्चागतिश्वैव यदुनां यदुनन्दन ॥ २५ ॥ 
'्यदुवंरिर्योके शन्रुओंका सहार करनेवाले यदुनन्दन 
श्ीक्रृष्ण } जब्र इस प्रकार अप्राप्त वस्तुक प्रा्तिरूप योग 
सम्पन्न हो गयाः विग्रहकी समाप्ति हो मयी ओर इस पस्तीपर 
तुम्हारा पूर्णह्पसे अधिकार हदो गयाः तप्र हम समी याद्वोकी 
गति ओौर अगति एकमात्र तुम्ही दयो ॥ २४-२५ ॥ 
ग्णणुष्व वदतां कीर पणनामिदं वचः। 
अस्य त्वत्कोपद्ग्धस्य कंसस्याल्युभकर्मणः ॥ २६॥ 
तव प्रसादाद्‌ गोवि्द्‌ प्रेतकाये क्रियेत ह । 
वीर्‌ { हम दीनजन वुश्दारे सामने जो कुर कह रदे है- 
हमारी यह प्रा्थना स्वीकार करो । गोविन्द | यह पापकर्मा 
कंस तुम्हारे कोपते दग्ध हो गया | हम चाहते है कि वुम्ारी 
ही पासे अश्र इसका प्रेतकार्यं सम्पन्न कर दिया जाय॥२६१॥ 
तस्य छृत्वा नरेद्रस्य विपन्नस्यौर्ध्वदेदिक्रम्‌ ॥ २७॥ 
सस्युषोऽहं सभार्यश्च चरिष्यामि सरगैः सह । 
८उस मरे हुए नरेशका ओध्वंदेदिक सस्कार पूर्णं करे 
मै अपनी ण्त्नी ओर पुच्रवधुजोको साथ ठे वनम मृगे 
साथ विचरूगा ॥ २७१ ॥ 
प्रेतसत्कारमाभ्रेण कते वान्धत्रक्र्मणि । 
आनृण्यं छौक्रिकं कृष्ण गता; क्रिल भवम्ति हि ॥ २८॥ 
श्रीकृष्ण ¡ कहते हँ कि मरे हुए मनुष्यका प्रेत-संस्कार 
मात्र कतर देनेसे उसके वान्धवोका कर्तव्य पूरा हो जाता है 
ओर फिरने उसके लौकिक ऋणसे उण दो जते ह ॥ 
तस्याग्नि पश्चिमं कृत्वा चितिस्थाने विधानतः । 
तोयप्रदानमा्नेण कंसस्यान॒ण्यमाप्लुयाम्‌ ॥ २९ ॥ 


२२३० 


अआमदाभारते सिकभी 


[ हरिवंशे 


[> 


भयदः मै चितादखानयर विपिपूर्वक कखन अन्तिम 
अग्नि-चंत्कार करै उनको चलाञ्चटिमात्र देकर उसके ऋण 
उश्रण टो जाः यदी मेय श्च्छ६॥ २९ ॥ 
एतत्ते छरप्ण विपाप्यं सेदोऽच मयि युल्यताम्‌ 1 
प्राप्तेति सुगति ठन पणः पश्चिमां क्रियाम्‌ ॥ ३० ॥ 
श्रीद्धप्ण ! यदी तममे मेय निवेदन दैः इ विषयं 
मुद्पर यपना लेद्टमाव प्रक करो 1 सुना दैः चितापर अन्तिम 
संस्कार कर देनेमे बेचारा म्रतक्र प्राणी उत्तम गति प्राप्त कर 
च्वादै" | ३०॥ 
प्तच््ुत्वा वचस्तस्य छृप्णः परमविसितः। 
प्रत्युवाचोग्रसेनं वै सान्त्वपूर्वमिदं वचः ॥ ३१॥ 
उग्रेनक्ना यद वयन चुनकर श्रीङ्गप्णको वड़ा आश्चयं 
हुआ } उन्टनि सान्त्वनापूक उग्रहेनको खमन्चाते हुए उनकी 
चातका इच प्रक्र उत्तर द्विय्ा--1 ३१ ॥ 
काटयुक्तमिदरं तात तत्रैतद्‌ यत्‌ धरभापितम्‌ । 
सद्दा राजदयादुंख वृत्तस्य च कुटस्य च ॥ ३२॥ 
प्तात { आपने यद जो कुट कदा है, वह्‌ सव्र इश्च समव- 
के अनुर्य द} राजति ! आपकी धत्त आपके उत्तम 
आचार-विचार ओर भरे कुर्क अनुरूप दै ॥ ३२॥ 
यत्‌ त्वमिवंधिधं नपे गतेऽथं दुरतिक्रमे । 
प्राप्स्यते गृपसत्का(र कसः प्रेतगतोऽपि सन्‌ ॥ ३२३॥ 
प्ञो वात बीत गीः वह वैसीं दी दोनेवाटी थी । दैवकरे उस 
विधानको यवना करिरीकेच्िभी दुष्कर था; फिर भी 
उसे प्रभावित टकर जो याप रेसी वाति कह र्दे ट ( इससे 
मुस दुष्ख हुन); कंस मर जनेपर भी मेरे द्वारय राजोचित 
सत्कार पराम करेगा ( इस व्रातफे लवि म अपकरो विश्वा 
ददतां) ॥३३॥ 
छूटे महति ते जम वेदान्‌ विदितवानसि । 
कथं न प्षायने तात नियतिदरतिक्रमा ॥ ३४ ॥ 
श्तात [ आपकर मदान्‌ कख जन्म हुधा दै । आपने 
वेदक भान प्राप्त क्रिया दै, किरआप कैसे नदीं समन्नपारटे 
करि नियति ( दैवकरे विधान) का उल्ट्द्वन करना बहुत दी 
कटिन दै | ३४ ॥ 
स्यावराणां च भूतानां जद्धमानां च पार्थिव । 
पूवजन्मदछतं कम कारेन परिपच्यते ॥ २५॥ 
भ्रय्वीनाथ | न्धावर्‌ आर जद्वम समी प्राणिर्वोकरे पूरव 
ऊर्मि कि दए कर्म समयम परिक दते (८ ओौर उन्दे 
शुमाद्यम फटकी प्राति करते ) द॥ ३५ ॥ 
श्ुतवन्तोऽथवन्वच्य दातारः व्रियदुरनाः। 
ब्रह्मण्या नयसम्पत्रा द्रीनाचुग्रह््कारिणः॥ २३६॥ 


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लोकपारसमास्तात  महैन्द्रसमधिक्रमाः। 
क्षितिपालः छृनान्तेन नीयन्ते सखपसत्तम ॥ २३७ ॥ 
ध्तात ! नृपश्रेष्ठ | जो वेद-गाश्नोके विद्वान्‌? धनवान्‌ दाता; 
प्रियदर्यन ८ सुन्दर >) ब्राहणमक्तः नीतिसम्पन्नः दीर्नोपर 
अनुद करनेवारः लोकपालो के समान यदासी ओौर महेन्द्र 
वल्य पराक्रमी रजा ई उन भी काड उठा कले जता 
दे ॥ ३६-३७ ॥ 
धार्मिकाः सर्वभायघ्राः प्रजापालनतत्पराः 1 
क्ष्रधर्म॑पय दान्ताः कटेन निधनं गताः ॥ २८॥ 
धनो धर्मात्मा, सम्पूर्णं मारयो ज्ञाताः प्रजपाटनमे तवरः 
क्तरियधर्मपरायण तथा जितेन्द्रिय येः वे भी कारके गाल 
चले गये ॥ ३८ ॥ 
स्वयमात्मरूतं कर्म द्युभं चवा यदि चाद्युभम्‌ । 
परात्ते काले तु तत्कमे ददयते सर्वदेहिनाम्‌ ॥ २९ ॥ 
खयं अपना किया हुञा जो श्चभ या अञ्चम कर्म है 
वही समय आनेपर समस्त देहधारि्योक्रे समक्ष सुख-दुःखके 
रूपमे दिखायी देता है ॥ ३९ ॥ । 
पपा ह्यन्तष्टिता माया दुर्विक्षेया सुरैरपि । 
यथायं सुद्यते ल्येको दयत कमव कारणम्‌ ॥ ४०॥ 
भगवान्‌ अदटदयसूयते रहनेवाढी माया द्यी &, 
जिसमे यद जगत्‌ मोदित दो जाता दै, उसके सखरूपको जानना 
देवता ल्यि मी अत्वन्त कठिन है । बास्तवरमे दुख ओौर 
दुःखकी प्रा्तमे कर्म दी कारण है ( मनुष्य जो चिन्धित एवं 
व्ययित होता देः यद मायाजनित मोद दी है) ॥ ४० ॥ 
कालठेनाभिहतः कंखः पूर्वकर्मप्रचोदितः। 
न दाहं कारणं तत कालः कमं च कध्टणम्‌ ॥ ४१॥ 
“कंस अपने पूवं कमेत धरित दोकर दी काक्रे द्वार 
मारा गयादै। मे उसमे करार नदीं हूः काल जीर क्मही 
कारण दं ॥ ४१ ॥ 
सूर्यसोममयं तात छसनं स्थावरजद्नमम्‌ 1 
कलटिन निधनं गत्वा कटेनेव च जायते ॥ ४२॥ 
(तात | सारा चराचर जगत्‌ सूर्यं ओर सोममय (अग्नी 
पोमात्मकर ) है । वह काटे मृल्युक्रो प्राप्त दक्र फिर काल्पे 
दी जन्म प्रहण करतार} ४२ 
ख काटः सवभूतानां निग्रदायुप्रद रतः। 
तस्मात्‌ सवौणि भूतानि कटस्य वदागानि वै ॥ ४३॥ 
(करार ही समस्त प्राणिवेकि निग्रह भौर अनुम्रहमं तद्र 


द, इसच्मि सम्पूर्णं मूत काचर दी अीन द ॥ ४३ ॥ 


खदोपेणेव दग्धस्य सनो नराधिप । 
नादं वे करणं तत्र काटस्तत्र च कारणम्‌ ॥ ४४॥ 


विष्णुपर्व ] 


द्ाज्जिदेऽध्यायः 


३२१ 


~~~ 
वव 


(नरेश्वर | आपका पुत्र अपने दी दोपतनि दग्ध हु दे। 
उसकी मृत्युका कारण मँ नदीं, काल दहै ॥ ४४ ॥ 
अथवाहं भविष्यामि कारणं नाच संशयः। 
परयणपरः कारः करि करिष्यत्यक्रारणः ॥ ४५॥ 
अथवा मै इस्म' निमित्तकरारण हो सकता हू, इसमे 
संदाय नदीं है; क्योकि दूसरे निमित्तोका सदारा टेनेवाला 
काठ्यकेला दही क्या करेगा | ४५॥ 


कालस्तु वर षान्‌ राजन्‌ दुरविकषेया हि सा गतिः। 
परावस्धिदोषन्ञाः यां यान्ति समदनः ॥ ४६॥ 
गतिः कालस्य सायेन सर्वं काठस्य मोचरम्‌ । 
प्राजन्‌ ! काछ स्ते अधिक वख्वान्‌ है | कराच्सेपरेजो 
मोक्षरूपा गति हैः वह दुर्विज्ञेय दहै | उसे पर ओर अपर 
( पुख्प ओर प्रकृति ) के अन्तरको जाननेवाके समदर्शी 
पुरुष ही प्राप्त दोते दै । वही काटकी परम गति दैः 
जिससे सत्र कुछ कारके अधीन प्रतीत होता है ॥ ४६१॥ 
वीमि यदहं तत तद्दनुषएीयतां चचः ॥ ४७ ॥ 
न हि राज्येन मे कायं नाप्यहं छप काष्कितः। 
न चपि राञ्यद्ुग्धेन मय। कंसो निपातितः ॥ ४८ ॥ 
(तात ! अव मै जो कुछ कहता हूः मेरे वतयि हुए उस 
कार्यको आप करे । नरेश्वर ! मुञ्ञे राज्यसे कोई प्रयोजन नहीं 
है! नतो मै राज्यका अभिलपी हू ओर न राज्यके लोमसे 
मने कंसकरो मारा ही है ॥ ४७-४८ ॥ 
कि तु छोकदिताथीय कीत्य च सुतस्तव) 
व्यङ्गभूतः कुलस्यास्य साञुजो विनिपातितः ॥ ४९ ॥ 
भमैनै तो केवल छोकदितकरे च्ि ओर कीरति व्यि भाई 
सदित वम्हारे पुत्रको मार गिराया है, जो इस कुलका विङत 
( स्ड़ा हुआ ) अङ्ख था ॥ ४९ ॥ 
अहं सख एव गोमध्ये गोपैः सह वनेचरः । 


प्रीतिमान्‌ विचरिष्यामि कामचारी यथा गजः ॥ ५० ॥ ` 


शमौ वही वनेचर होकर गोर्पोके साथ गोर्थके बीच 
परसन्नतेपूर्वकं विचस्तंगाः जैसे इच्छानुसार विचरनेवाल हाथी 
वनम खच्छन्द्‌ धूमता ३ ॥ ५० ॥ 
पत्तवच्छतशो.ऽष्येवं सत्येनेतद्‌ व्रवीमि ते । 
न मे कार्यं नरपत्वेन विक्ञाण्यं क्रियतामिद्म्‌ ॥ ५१॥ 
ध्म सव्यकरी शपथ खाकर इन वतो सोखै वार 
हराकर आप्ते कहता हूः मुभे राज्ये कोई काम नहीं देः 
आप इसका विज्ञापन कर दीजिये ॥ ५१ ॥ 
भवान्‌. राजास्तु मान्यो मे यदूनामच्रणीः परुः । 
विज्ञयायाभिपिच्यस्य खराज्ये नृपसत्तम ॥ ५२॥ 
'आप यदुवंियोकरे अग्रगण्य स्वामी तथामेरेल्यि मी 


साननीय रै, अतः आप दी राजा दँ । पशरेष्ठ [ आप अपने 
राज्यपर अपना अभिषेक कराहये, प्रकी विजय हो ॥५२॥ 
यदि ते मस्ियं कार्यं यदि वा नास्ति ते व्यथा । 
मया निखष्ं राज्यं स्वं चियथ प्रतिगरद्यनाम्‌ ॥ ५२ ॥ 
ध्यदि आपको मेरा प्रिय कार्यं करना दो अथवा यदि 
आपके मनमे मेरी ओसरसे कोई व्यथान होतो मेरे दार 
रोटये गये इस राज्यको दीर्घकाले समि महण. करः ॥५३॥ 
वैचम्पायन उवाच 
पतच्छुत्वा तु वचनं नोत्तरं प्रत्यभापत । 
बीडिताधोसुखं तं तु राजनं यदुसंसदि । 
अभिपेकेन गोविन्दो योजयामास धर्मवित्‌ ॥ ५४ ॥ 
वैशाभ्पायनजी कहते है---जनमेजय ! श्रीद्प्णकी यद 
चात सुनकर उग्रसेनने कोई उत्तर नदीं दिया । वे छजित 
होकर सिर कराये चुपचाप खड़े रह रपे । उस समय ॒धर्मके 
ज्ञाता गोविन्दने राजा उग्रसेनकरो यादवौके राज्यपर अभिषिक्त 
कर दिया ॥ ५४ ॥ 
स॒ बद्धमुकुटः ीमालु्रसेनो महायुतिः। 
चकार सह छङृष्णेन कंसस्य निधनक्रियाम्‌ ॥ ५५॥ 
सिरपर मुकुट बधि महातेजसवी श्रीमान्‌ राजा उग्रसेनने 
श्रीकृष्णकरे साथ रहकर कंसका अन्वयेटि-संस्कार करिया था ॥ 
तं स्वे यादवा मुख्या यजानं रष्णश्षासनात्‌। 
अनुजग्मुः पुरीमागं देवा इव शतक्रतुम्‌ ॥ ५६ ॥ 
श्रीङ्ष्णके अदेशसे समस्त मुख्य-मुख्य यादवेनि मथुरा- 
पुरीके राजमार्गपर राजा उग्रसेनफा उसी प्रकार अनुसरण 
किया था, जते देवता देवराज इन्दरका अनुगमन करते ह ५६ 
रजन्यां तु निवृत्तायां ततः सूर्यं विराजते । 
पश्चिमं कससंस्कारं चक्लुस्ते यदुपुङ्गवाः ॥ ५७ ॥ 
जव रात ब्रीती ओर सूर्योदय हुआ, उस समय श्रेष्ठ 
यादवौने मिलकर कंसक्रे अन्येष्टि-संस्काररी तैयारी की ॥५५७॥ 
शिविकायामथारोप्य कंसदरेहं यथाक्रमम्‌ । 
नेष्ठिकेन विधानेन चक्तुस्ते कंससत्कियाम्‌ ॥ ५८ ॥ 
उन सवने कंसफे शरीरको शिविकामे रखकर क्रमशः 
अन्त्येष्टि-कर्मके विधानसे उसका दाह-संस्कार किया था ॥५८॥ 
स॒ नीतो यञुनातीरसुत्तमं शपतेः खतः। 
सत्छतश्च यथान्यायं नेधनेन चितायिना ॥ ५९ ॥ 
राजक्रुमार कंसका शाव पहले यमुनाजीके उत्तम तरपर 
लाया गयाः फिर यथोचित रीतिसे मूत्युकाल्कि चिताग्निके 
द्वारा उसका सादर अन्त्ये्ि-संस्कार किया गया ॥ ५९ ॥ 
तथेच भ्रातरं चास्य सनामानं महाभुजम्‌ । 
संस्कारं छम्भयामासुः सह षणेन यादवाः ॥ ६०॥ 


२२२ 


उसी प्रकार श्रीङृप्णसदित यादवेनि उस भाई महा- 

बराह सुनामाका भी दाद-संस्कार क्रिया ॥ ६०॥ 
ताभ्यां ते सिद्धं चकद्ष्ण्यन्धक्पुरोगमाः। 
अक्षयं चास्तु प्रेतेभ्यो भाषमाणाः पुनः पुनः ॥ ६१॥ 

वृणि ओर अन्धक्र आदि कुठे लयगेनि उन दोनकि 
न्धि जल्दान क्रिया ओर बास्त्रार्‌ यह कदय क्रि “यह जल 
्ररतकि व्यि अक्षय दोः ॥ ६९॥ 
हिरण्यस्य सुवर्णस्य दश्च कोरीस्तथा हरिः। 
गावो रलानि वासंसि ध्रामतन्‌ नगरसम्मतान्‌ ॥ ६२॥ 
ददौ कसं समुदिश्य वाह्यणेभ्प्रो सपोत्तमः। 
अक्षं चापि पिप्रेभ्यो भाषमाणाः पुनः पुनः ॥ ६३॥ 


धीमहाभास्ते लिलभागे 


{ हरिवेदो 


~~ = ~~~ ~ ~ 


हरि तथा ग्रपश्रेष्ठ उग्रसेनने श्रा कंतफे उदेद्यसे 

ब्राल्ोको दस करोड़ खर्णयुटार्ण्ः बरहुन-सी तीर्दर्नः वल तथा 
नगरौ-नेते सम्मानित ग्राम दिये ओौर व्रारत्रार विप्र॑सि यद 
कहा--दमारा द्विया हज यद दान उस दिवंगत आत्मके 
चि अकव दो ॥ ६२६३॥ 
तयोस्ते सिं दर्वा यादवा दीनमानसा; । 
पुरस्छृत्यो्रसेनं वै धिविदय्म्चरं पुरीम्‌ ॥ ६४ ॥ 

इस प्रकार फ ओर सनामाके च्वि जख्दान करके 
दीनचित्त यादव राजा उय्सेनकरो अगि विये मधथुरापुररीमे प्रविष्ट 
हुए ॥ ६४ ॥ 


=° == 


इति श्रीमहाभारते लिरुभागे दरिवंगे विष्णुपर्वणि उ्सेनभिपेककरससंस्कारकथने द्व्विदोऽध्यायः ॥ ३२ ॥ 
दस प्रकार श्रीमहाभारते छिरमाग दिं शके अन्तत विष्णुषवमे उग्रतेनका अभिक तथा कंस्के 
अन्लय्टि-संस्कापथनविषयक वत्तीसर अध्याय पुरा हभ ॥३२ ¶ 


न १) - ~^ 


त्रयसिरोऽष्यायः 
वलराम ओर भीडृष्णका गुरु सन्दीपनिके यहा जाकर भिद्या पदना अर गुरुदधिणामें 
उनके मरे इए पुत्रको उन्हे देकर मधथुरापुरीको छोट आना 


वश्नम्यायन उवाच 

ख छृष्णस्त् वलवान्‌. रौहिणेयेन संगतः। 
मथुरां याध्रवाकीर्णो पुरी तां खुखमावसखत्‌ ॥ १ ॥ 

वैदाम्पायनजी कहते है--जनमेजय ! बलवान्‌ 
श्रीक्प्ण वर्ह रोदिणीकरुमार बरसमजीकरे साथ यादवे भरी 
हुई उस मधुरापुरे स॒खपूरवक रहने लगे ॥ १ ॥ 
भराप्तयौवनदेदस्तु युक्तो राजधिया उवलन्‌ । 
चचार मधुरं वीरः ख रल्ाकरभूषणाम्‌ ॥ २॥ 

उनके शरीरो युवाच्या प्रात दुई । वे वीर धीकृप्ण 
राजश्रीसे प्रकारित दते दए रलनरारिमय आभृपोसे विभूषित 
मथुरापु्ैमे विचरण करने सगे ॥ २॥ 


कस्यचित्‌ त्वथ कालस्य सदितौ समकेशवौ । 
शुरं सान्दीपनि काद्यमवन्तिपुरवासिनम्‌ ॥ ३ ॥ 
कुड कालके अनन्तर बल्यम ओर्‌ श्रपण एक सय 
अवन्तिपुर ( उजयिनी ) ॐ निवाती गुरु ` सान्दीपनिके यदो 
गये, जो कारिदेशमे उस्न हृ ॥ ६ ॥ 
चलुवेदचिकीयौर्थमुभौ. = तावभिजग्मतुः 1 
निवेय सोत्र ` खाध्यायमाचरेण(भ्यलटंङृतौ ॥ ४ ॥ 
वे दुन -भाई वद धलुवेदकी शिक्ष ग्ररण कसेके लियि 
गये ये । अपना गोत्र ब्रताकर गुरक्रुरके आचारसे अपनेको 
अलक करके दोनो ही खाध्याय करने लगे ॥ ४॥ 


शयश्रषू निर्हकाराब्वभौ रामजनार्दनौ । 
प्रतिजग्राह तौ कादयो विचा प्रादाच्च केवखाः॥ ५ ॥ 
व्यम ओर श्रीकृष्ण दोनो ुख्करी सेमे नर रहते 
थे । अकार तो उन्दे छू भी न्दी सका था | काशिदेशीय रर 
ने उन दोनोकौ रिप्यरूपसे अहण किया ओर उर विशुद्ध 
विदर्पे प्रदान कीं ॥ ५॥ 
तौ च श्ुतिधसै चीसै यथावत्‌ प्रतिपयतःम्‌ 1 
अदोरानैश्तुष्यणया साद्वेद्मधीयताम्‌ ॥ ६ ॥ 
वे दोनो वीर श्रुतिधर ये-किसी भी वातक्रो एक बार 
खन लेनेमाच्रसे ही ग्रहण कर छेते थे, अतः उन्न यथावत्‌ 
रूपसे विद्या्ओेकरो प्राप्त किया | चौसठ दिन-रातम दी दँ 
अद्धोसहित सम्पूणं वेदका अध्ययन कर लिया ॥ £. ॥ 


चतुष्पादं धयुचेदं शखधरामं ससंग्रहम्‌ । 

अचिरेणैव कालेन शगुरस्तावभ्यसिक्षयत्‌ ॥ ७ ॥ 
गुरुजीनि उन्दं थोडे षी ' समयम दीक्षा, संग्रह सिदि 

ओर्‌ प्रयोग-दन चार पादोसि युक्त धनुर्वेदकी तथा रहस्यसदित 

दाखरसमूहोकी शिक्षादेदी॥ ७॥ 

अतीचामायुपीं मेधां चिन्तयित्वा तयोर्यः 1 

मेने तावागतौ वीरै देवौ चन्द्रदिवाकसे ॥ ८ ॥ 
उनकी अत्यन्त अटीकिक बुद्धिका विचार करे गुखने 

यही माना कि इन दोनो वीरयोकरे स्ये मेरे यदौ शक्षात्‌ 

चन्द्रदेव ओर सूर्यदेव पधरि ह ॥ ८ ॥ 


धिध्णुपवं ] 


[ककककृिििगि0 


दद्य च महात्मानाद्वुभौ तावपि पर्वसु। 

पूजयन्तो महः्रेवं साक्षाद्‌ विष्णु व्यवस्थिनम्‌ ॥ ९ ॥ 
उर्न्दनि पर्वे अवसर्सपर उन दोनों मदात्मार्थोक्ने 

अर्चाविग्रदमे प्रतिष्ठित मद्यान्‌ देवता सानात्‌ भगवान्‌. विप्णु- 

` की आराधना क्से दृएभीदेवा या॥९॥ 

गुरं सान्दीपचि दप्णः छृतद्रत्योऽभ्यभावत । 

गार्वथं कि ददानीति रमेण सह भार्त ॥ १०॥ 
भारत! विग्रा पट्कर कृनछ्त्य हो ब्रटरामसदहित श्रीकृष्ण. 

ने अपने गुर सान्दीपनिसे पूछा--^भगवन्‌ ! आपक्रो रुख- 

दधिणके रूपमे म क्या दू १॥ १०॥ 

तयोः प्रभावं स क्षावा गुरूः प्रोवाच हएवान्‌। 

पुत्रमिच्छाभ्यदं दत्तं यो स्तो छवणाम्भसि ॥ १९॥ 
उन दोना प्रभाव जानकर दर्पे मरे हुए गुरने कदा- 

भेरा जो पुत्र खारे पानीके समुद्रम द्ववकर मर गया था, उसे 

ही वम ठे आक्ररदे दोः वही मेरी इच्छारै॥ ११॥ 

पुत्र एकोऽपि मे जातः स चापि तिभिना दतः। 

प्रभासे तीर्थयात्रायां तं मे त्वं पुनरानय ॥ १२॥ 

ˆ पिरे एक ही पुत्र हा था। वह भी तीर्थयात्रा अवसर- 

पर प्रमापक्षेत्रमे तिमि नामक मत््यद्राय मार डाल गया, 

उसीको ठम फिर ठे आः ॥ १२॥ 

तथेव्येवाव्रवीच्‌ कृष्णो रामस्यायुमते स्थितः । 

गत्वा समुद्रं तेजसी विवेशान्तजरं हरिः ॥ १३ ॥ 
तवर बलयामजीक्री अनुमति लेकर श्रीद्धष्णमे उनसे कदा; 

` ` प्वहुतत यच्छा; फिर वे तेजी श्रीहरि समुद्रतरपर जाकर 

उसके जल्के भीतर घुस गये | १३ ॥ 


समुद्रः प्राञ्जलिभ्रत्वा दक्षयामास स्वं तद्या 1 


तमाह कृष्णः कासौ भोः पुचः सान्दीपनेरिति ॥ १४॥ ` 


, उस समय समुद्रने हाय जोड़कर उन्दै दर्य॑न दिया 
्रीृप्णने उसके पृ्ा--“अजीः सान्दीपनि सुनिका पुत्र 
कहा हे ¢ ॥ १४॥ 
समुद्रः प्रव्युवाचेर्द दैत्यः पञ्चजनो महान्‌ । 
तिमिरूपेण तं बाटं भ्रस्तवानिति माधव ॥ १५॥ 

समुद्रने उत्तर दिया--(माधव } पञ्चजन नामक्र महान्‌ 
दैत्यने तिमिरूपते उस वाल्कको अपना यास वना लिया 
याः | १५ ॥ 

स॒ पञ्चजनमासाथ जधान पुरुपोत्तमः। 

न चाससाद तं वां गुरुपुन्नं तदाच्युतः ॥ १६॥ 

तत्र जपनो महिमासि कमी च्युत न होनेवाले भगवान्‌ 
पुरुषोत्तमने पश्चजनके पास जाकर उसे मार डाल, परंतु उन्दँ 
वहा उने गुसुफा पुत्र नदी प्रात हुभा 1 १६ ॥ 


ज्रयसो ऽभ्यायः 


~ ~+ = ५ 
कनक 


सतु पञ्चजनं हत्वा शद्ुं ठेभे जनार्दनः । 
यरतु द्रेवमदुप्येषु पाञ्चजन्य इति श्रुतः ॥ १७॥ 
पञ्चजनको मारकर भगवान्‌ जनार्दने एक दाद दस्त 
गत प्रिया; जो देवताओं ओर मनु्योमे पाञ्चजन्य नामते 
विख्यात दै ॥ ६७ ॥ 
ततो वैवखतयपुरं जगाम पुरुषोत्तमः। 
ततो यमो ऽभ्युपागस्य चचन्द्रे तं गदाधरम्‌ ॥ १८ ॥ 
तदनन्तर भगवान्‌ पुरषोत्तम ववत यमकी परीमं 
गे । यमने आकर उन भगवान्‌ गदाधरकरो प्रणाम किया ॥ 
तमुवाचाथ वैं" छृष्णो शुरपु्रः प्रदीयताम्‌ । 
तयोस्तच तदा युद्धमासीद्‌ घोरतरं महत्‌ ॥ १९॥ 
तत्र श्रीङृप्णने उनसे कहा--“मुच्चे मेरे युरुका पुत्रदे 
दो ( परंतु ्रमने उसे देनेते इनकार क्रिया) तव उन 
दोन वर्धो महान्‌ षोरतर युद्ध हुआ ॥ १९ ॥ 
ततो वैवखतं धरं निर्जित्य पुरपोत्तमः। 
आसखसाद्‌ च तं बालं गुखपुनं तदच्युतः ॥ २० ॥ 
भयनक्र यमराजको जीतकर पुरुषोत्तम अच्युतने अपने 
चाक गुरुपुच्रक्रो प्राक्त कर लिया ॥ २० ॥ 
आनिनाय शुसोः पुतं चिरं नष्टं यमक्षयात्‌ । 
ततः सान्दीपनेः पुतः भरभावादमितौजसः ॥ २९ ॥ 
दौर्धकाटगतः प्रेतः पुनरासीच्छरसीरधान्‌ । 
जो दीर्धकाल्सेनष्टहो चुक्रा थाः उस गुसपुत्रको 
भगवान्‌ यमरोक्रसे यर्हो उठा ठे अयि । उन॒अमिततेजखी 
भगवान्‌ श्रीङृप्णके प्रमावते दीर््काल्का मया ॒हुभा सन्दी- 
पनिका पुत्र पुनः पूर्ववत्‌ शरीर धारण करके जी उठा २१४ 
तद्श्षक्यमचिन्त्यं च दष्टा सुमदद्धतम्‌ ॥ २२॥ 
सर्वंपामेव भूतानां विस्मयः समजायत । 
वह अराक्यः अचिन्त्य ओर अत्यन्त अदूुत कार्यं 
देखकर सभी प्राणि्योको वडा श्वय हुमा ॥ २२३ ॥ 
स शरोः पुत्रमादाय पाञ्चजन्यं च माघवः! 
रलानि च महाहौणि पुनरायाज्ञगत्पभुः ॥ २३॥ 
जगत्‌के स्वामी ख्मीपति भगवान्‌ शीचप्ण गुसपुत्रको 
खाय ठे पाञ्चजन्य शद्ध तथा ब्रहुत-ते बहुमूल्य रत्न लेकर 
पुनः ठट अयि ॥ २६ ॥ 
राक्सैस्तस्य रलानि मदाद्यणि वहनि च। 
आनास्यावेदयामास गुरवे वासवानुजः ॥ २४॥ 
इन्द्रके छोटे माई श्रीङृण्णने उन वहुसंख्यक एवं बहु 
मूल्य र्नोको राक्षसौदारा ( जो वमक परिकर ये > मेगवाकरर 
गुरुको नितेदन किया ॥ २४॥ 
गदरापरिघयुद्धेषु सकौसखेषु च तावुभौ । 
अचिरान्मुख्यतां पातौ सर्वलोके धुभृताम्‌ ॥ २५॥ 


५४ 


२४ 


दोनो माई तरट्यम ओर श्रीकृष्णे गदा ओर परिषके 
युर्दोमे तया समपृप्र अरखिं योघ्र दी प्रसुता प्रान करली । 
वे समम्त संघाते धनुधसेमि श्रे मने जने लगे] २५॥ 
ततः सान्दीपनेः पुं तद्रूपवयसं तदा । 
प्रादात्‌ छप्णः प्रतीतात्मा सह रत्नेख्दारधीः 1 २६॥ 
उदार बुद्धिवदि श्रीकृष्णे प्रसन्नचित्त होकर सान्दीपनिके 
पुत्रको उी रूप यौर अवचय र्वेकि साथ उन्दं रीय दिया॥ 


चिरनष्टेन पुरेण कादयः सान्दीपनिस्तद्‌ । 
समेत्य मुमुदे राजन्‌ पूजयन्‌ रामकेशवौ ॥ २७॥ 
राजन्‌ { काषिदेशर्मे उन्न हुए सान्दीपनिने चिरकाल- 
से नष्ट दए अपने पुच्रनने मिलकर व्रख्राम ओर श्रीकृणणश्गी 
भूरिभृरि प्रतर॑सा करते दए बडे प्रसन्न हुए ॥ २७ ॥ 
छृतास्रो तावुभौ वीरौ गुरुमामन्च्य सुरत 1 
आयातौ मधुरं भूयो चसरेवुताञ्भो ॥ २८ ॥ 
उत्तम व्रतका पाटन करनेवाले वे दोनों वीर वसुदेवपुच 
अ्न-विद्याकी धिघ्ना पाकर्‌ गुख्की आज्ञा ठे पुनः मथुरापुरी- 
को ल्यैट अयि ॥ २८ ॥ 
: भ्रत्यु्ययुः सर्वै यादवा यदुनन्द्नौ । 
सवला ृप्रमनस उग्रसेनपुसोगमाः॥ २९॥ 
उस समय उग्रसेन आदि समस्त यादर्वोने प्रसन्नचित्त 
दक्र सेनासदित आगे जा उन दोर्नो यदुनन्दन वीरयोकी 
अगवानी की ॥ २९ ॥ 
श्रेण्यः प्रकृतयश्चैव मन्निणः सपुरोहिताः । 
सचाट्बृद्धा सा चैव पुसी समभिवर्तत ॥ २३५ ॥ 
व्यवसायीवर्गः प्रजाव्गं॑ अथवा प्रक्रतिमण्डटः मन्त्री 
पुरोदित तया वाख्क अर वृरदोसदित वद सारी पुरी (श्ीकृष्ण- 
यटरामके दनके स्थि ) उमढ़ पड़ी ॥ ३० ॥ 
नन्दितृयीण्यवायन्त तुष्टश्च जनार्दनम्‌ । 
रथ्याः पताकामालिन्यो भ्राजन्ते स समन्ततः॥ ३९॥ 
आनन्दमूचक बाजे व्रजने लगे | सव्रखोग श्रीकुप्णकरी 
स्तुति कने लगे । मथुरापुरीकी गर्यो ओौर सद्व ध्वजा- 
पताकासि अच्क्रत दो सवर योरसे चुनोभित होने ट्गीं ॥ 
परदध्रसुदितं सर्वमन्तःपुरमश्ोभत । 
गोविन्दागमनेऽत्यथं यथेवेन्द्रमहे तथा ॥२२॥ 
मोविन्दके आगमने इन्दरोत्सवकरे समान सरे नगर ओर 
अन्वः्पुरम अत्यन्त दप एवं आनन्द दा गगरा । उसकी छोभा 
चद्‌ गयी | ३२॥ 
मुदिवाश्चाथ गायन्ति राजमार्गेषु गायकाः । 
तजासरीत्‌. प्रथिता गाथा यादवानां परियद्करा ॥ ३३॥ 
गोचिन्द्यामौ सम्प्राप्तौ खरातसै लोकविश्वुतो । 
स्वे पुरे निर्भयाः सर्वे क्रीडध्वं सह वान्धवः ॥ ३४॥ 


भ्रीमद्ाभारते सिलभगे 


[ दसविंशे 


राजमार्गोपर्‌ व्रहुतेरे गायक्र आनन्दित होकर गीत गाने 
लगे । उस्र समव यादर्वोकरो प्रिय स्प्ानेवाटी यद गाथा वहो 
सव्र ओर कटी-सुनी जने उगी--“नागरिक्ो ! विद्वविल्यात वीर 
श्रीङ्प्ण ओर वख्यम दोनों भाई मथुरामे आ पहुचे द 
अव तुम सवर लेग निर्भय दो अपने नगरमे बन्धु-वान्धवेकि 
साथ क्रीडा करे" ॥ ३३-३४ ॥ , 
न तत्र कथिद्‌ दीनो चा मलिनो चा विचेतनः। 
मथुरायामभूद्‌ राजन्‌ गोचिन्दे समुपस्थिते ॥ २५ ॥ 

राजम्‌ ! गोविन्दे मथुरामे उपखित दोनेपर वर्दोनतो 
कोई दीन थाः न मखिनि था जीर न चेतनत चूल्य दी था॥ 


वयांसि साधुवाक्यानि प्रहृष्टा गोहयद्धिपाः 1 
नरनारीगणाः सवे भेजिरे मनसः सुखम्‌ ॥ ३६ ॥ 
पक्षी मीटी-मीरी बोडी बोलते थे । गायः वैल घोदेः 
हाथी दृष्ट-पु्ट रहते ये ओर पुरषो तथा चि्योकि सभी 
समुदाय मनम सुखका अनुभव करते थे ॥ ३६ ॥ 
शिवाश्च वाताः प्रवघुर्विरजस्का दिसो दश्च । 
दैवतानि च हष्नि सर्वेष्वायतनेषु च ॥ २७॥ 
शीतल सुखद हवा चल्ती थी । दसो दिशा्अेमिं धूल 
नदीं उड़ती यी ओर समी मन्दिरोमि दर्पर्वक देवता निवास 
करते ये ॥ ३७ ॥ 
यानि लिङ्घानि लोकस्य चासन्‌ तयुगे पुरा । 
तानि सवौण्यद्दयन्त पुरी प्राप्ते जनादंने ॥ ३८॥ 
भगवान्‌ श्रीकृप्णके मधुरापुरीको रोर आनेपर व्हा 
सारे चिह्न वैसे दी दिखायी देने ल्मे; जो सत्ययुगफरे समय 
पटले जग्म प्रकट दोते ये ॥ ३८ ॥ 
ततः काङे शिवे पुण्ये स्यन्दनेनारिमदनः। 
हस्युक्तेन गोविन्दो विवेश मथुरां पुरीम्‌ ॥ ३९ ॥ 
तदनन्तर मद्धल्मयी पुण्यवेलम शततुमर्दन भगवान्‌ 
गोविन्दने धोडे जते टुएट. रथपर व्रैढकर मधुरापुरीमे प्रवेश 
किया ॥ ३९ ॥ 
विरान्तं मथुरां रम्यां तसुपेन््मरिंदमम्‌ । 
अजुजम्मु्यंदुगणाः शाक्रं देवगणा इव ॥ ४० ॥ 
रमणीव मथुरापुरीमे प्रवरेण करते समय समस्तं यादव 
उन ात्ुदमन उपेन्द्र श्रीङ्कण्णके पीछे-पीे उसी प्रकार चले, 
जैसे देवता देचेन्का अनुसरण करते ह ॥ ४० ॥ 
चसुद्रेवस्य भवनं ततस्तौ यदुनन्दनौ । ` 
प्रविष्ठौ दण्वदनौ चन्द्रादित्याविवाचलम्‌ ॥ ४१॥ 
परेण तेजसोपेतो खरेन्द्राविव रूपिणौ । 
ताचायुधानि विन्यस्य गहे स्वे स्ैस्वारिणौ ॥ ४२॥ 
तदनन्तर यदुकुटको आनन्दित करनेवाले वे दोर्नौँ वन्धु 
वसुदेवकरे भवने प्रव्र्ट दृ । उसै समय उनके मुखपर्‌ दर्पो 


विष्णुपर्व ] 


चतुखिश्षो ऽध्यायः 


२२५ 


----------------------------न----- व=~ 


स्छास छारहाथाओौरये भेर पर्वतपर जनिवटे चन्द्रमा 


ओर सूर्ये समान प्रतीत हते ये । वे मदान्‌ तेजसे सम्पन्न 


तथा देवैश्वरेके समान मनोहर रूपधारी श्रील्रप्ण वरराम 
-आयुर्धोको अपने घर्मे रखकर उस पुरीमे स्रेच्छानुसार विचरने 

रगे ॥४१-४२॥ 

मुमुदातिे यदुवरौ चसु्रेवखताद्ुभौ । 

उद्यानेषु विचित्रेषु फटपुष्पावनामिपु ॥ ४२॥ 

वसुदेवकरे वे दोनों पुत्र यदुङ्कुरुतिख्क भ्रीङृप्ण-वरङ्याम 

फल ओर भूख भरसे छक हुए इर्भोवाले विचित्र उवार 

सानन्द विचरते थे ॥ ४३ ॥ 

चेरतुः सखुमहात्मान्तै यादवैः परिवारितौ । 


रेवतस्य समीपेषु सरित्छु बिमखासु च ॥ ४४॥ , 


पद्मपचविचद्धाछु कारण्डवयुताषु च। 
यादबसि पिरे हृ वे दोनों महात्मा रैवतक पर्वतके 
समीपवर्ती प्रदेशे्मि तथा वरदे हुए पद्म-पत्रोसे युक्त एवं 
कारण्डव पिके करेसि मुखरित निर्मल सरिताकि 
तर्योपर भ्रमण करते ये 1[ ४४१॥ 
एवं तवेक्षनिमाणौ मथुरायां शभाननौ । 
उग्रसेनानुगौ भूत्वा कंचित्‌ कारं सुमोदतुः ॥ ४५॥ 
चे दोर्नो भाई एक तस्वके चने हुए थे ( एं दी सचिदा- 
नन्दधन परमातमा इन दोनोके रूपोमे प्रकट हुए ये ) | उन 
दोनेकरि मुख व्डे ही सुन्दर एवं मङ्गल्कारीये | वे कुछ 
कारुतक अग्रसेनका अनुसरण कसते हुए मथुरामे वड़े सुखसे 
रदे ॥ ४५॥ 


इति श्रीमहाभारते खिकभागे हरिवो विष्णुपर्वणि रामङृष्णप्रत्यागसने त्रयखिखोऽध्यायः ॥ ३३ ॥ 


दस प्रकार श्रीमहाभारते खिग्भाग दरिवशके अन्तरत विष्णुरे श्रीवरूराम ओर कर्णक 
मथुरे प्रत्यागमनवरिषयक ततीयः अध्याय पुरा हुमा ॥ २३ ॥ 


चतुधिरोऽ्यायः 


वैग्म्पायन उत्ाच 

सख छष्णस्तज्न सहितो रौहिणेयेन संगतः। 
मथुरौ याद्वाकीणं। पुरीं तां खुखमवसत्‌ ॥ १ ॥ 
भातप्रीवनदरेहस्तु युक्तो राजधिया विभुः 
चचार मधुरं प्रीतः स वनाकरभूषणाम्‌ ॥ २ ॥ 

वैरास्पायनजी फते है--जनमेजय ¦ ग्रररामसदित 
रीकृष्ण यादवोसे भरी हु मथुरापुर सुखपूर्वक रहने खगे । 
उनक्रे श्रीअज्ञोको युवावस्या प्रात रई थी । वे भगवान्‌ 
राजोनित शोभसे खुदोभित हो बन-ग्ान्तौसे विभूपरित मथुरा- 
पुरीमे प्रस्नतापूर्वक विचरते ये ॥ १-२ ॥ 
कस्यचिच्वथ कारस्य राजा राजग्रहेर्वरः। 
शुश्राव निहतं कंसं दुहितभ्यां महीपतिः ॥ २ ॥ 

कुख कालके अनन्तर राजगृहे स्वामी प्थ्वीपति राजा 
जरासंधने अपनी दोनो पुधियेति सुना कि (कंस मारा गयाः ॥ 
ततो नातिचिसात्‌ कालाज्यसंधः प्रतापवान्‌ 1 
आजगाम षडङ्गेन वेन महता वृतः ॥ ४॥ 
जिर्धाखुदिं यदृन कुद्धः कंसस्पापचिति स्मरन्‌ । 

बह दुःखद समाचार सुनकर प्रतापी जरासंध थोडे दी 


दिनोमे छः अङ्गो युक्त अपनी विया सेनि चिरा हु 
माष 


१* रथः हाथी घोडे, पेद, पण्य धान्य ( विकार अन्न ) 
तथा आपणिक ( विकतेना व्यापारी )--ये सेनक्रे छः अङ्ग ई 1 


जरासंधका अपनी विक्तारु सेनाके दारा आकर मथुरापुरीपर घेरा डारना 


मथुरापुरीपर चद्‌ आया । वह कसते उत्रण दौनेकी बातका 
ध्यान रखक्रर कुपित हो समस्त यादवौका विना कर डालना 
चाहता था | ४९ ॥ 
अस्तिः प्रािश्च नाञ्च ते मागधस्य सुते देप ॥ ५ ॥ 
जरास्तंधस्य कदयाण्यौ ,पीनमरोणिपयोधेे ! 
उभे कंसस्य ते भये प्रादाद्‌ वारदद्रथो चपः ॥ ६ ॥ 
नरेश्वर ! मगधराज जरासंधके दो कस्याणमयी कन्यार्दे 
यी, जिनङ़े नाम ये अस्ति ओर प्राति । इन दोनके कटि- 
मदेाके पिठे भाग स्थूर तथा उरोज पीन ये । वृहद्रथपुत् 
जरासंधने अपनी वे दोनो कन्य कसको देदीगथीं।वे 
दोनों कंसकी पियो थी ॥ ५-६ ॥ 
स ताभ्यां समुद रजा वद्ष्वा पितग्माटुकम्‌ । 
समाधित्य जरासंघमनादरत्य च यादवान्‌ । 
दरसेनेभ्वसे राजा यथा ते बहुशः श्रुतः ॥ ७ ॥ 
श्ररसेनदेदका स्वामी कंस जरासंधका आश्रथ ठे यादर्वो- 
का अनादर करके अपने पिता उग्रसेनक्रो कैद कर स्वयं ही 
राजा वन व्रैठा था ओर अपनी उन दोना पलिवेक्रि साथ 
आनन्द भोगने ख्गा या; जेमा करि ठुमने बहुत तरार 
सुना होगा ॥ ७ ॥ 
कषातिकायोर्थसिद्धर्थमुग्रसेनदिते स्तः: 
वसुदेवो ऽभवन्नित्यं कंस न मस्ये चतम्‌ ॥ ८ ॥ 
भादै-जन्धुभकि कार्य ओर प्रयोजनकी सिद्धिके च्ि 


देरेदै 


भरीमहटाभारते खिकभागे 


[ हरिवंशे 


वसुदेवजी सदा उग्रमेनकरे हितम तत्पर रहते थे; वितु कंस 
उनके इस वतविको सहन नही कर पता था ॥ ८ ॥ 
रामरूष्णौ समाधित्य हते कंसे दुरात्मनि । 
उग्रसेनोऽभवद्‌ राजा भोजचृष्ण्यन्धकचरैतः ॥ ९ ॥ 
वकम ओर श्रीक्ृप्णते मिदकर जव दुरात्मा कंस मारा 
गयाः तवर मोजः इष्ि ओौर अन्धकवंशी यादर्वोि पिरे दए 
उग्रसेन स्वयं रजा हुए ॥ ९॥ 
दुदिदभ्यां जससंधः प्रियाभ्यां चखवान्‌ चषः। 
नोदितो वीरपलीभ्यासुपायान्मशु्य ततः ॥ १०॥ 
तदनन्तर अपनी दोर्नौ प्रिय पुत्रिरयोषः जो वीर कंसकी 
पलिर्यो यीँ? प्रेसिति होकर व्रटवान्‌ राजा जरासंधने मथुरापर 
आक्रमण किया ॥ १० ॥ 
छृत्वा स्च समुद्योगं करोधादधचिसम ज्वखन्‌ । 
प्रतापावनता ये च जसयसंघस्य पार्थिवाः ॥ ११॥ 
मिनाणि क्षातयश्चैव संयुक्ताः खददस्तथा । 
तमेवाद्धययुः सवं सैन्यैः समुदितै्धुताः ॥ १२॥ 
वह्‌ क्रोधे अग्निक समान जल रा था | उसने स्व 
प्रकारे पूरा उद्योग करके चटाई की थी | जरासंधकर प्रतापवे 
नतमस्तक दए जो-जो राज्ञा थे तथा जो उसके मित्रः माई 
बन्धु, मिलने-ुलनेवलि ओर बुद्धद्‌ ये, उन सवने अपनी 
सारी तेनाथक्रि खाथ जरासंधका ही अनुसरण क्रिया ॥११-१२॥ 
महेष्वासा मषावीर्या जरासंधप्रियेपिणः। 
कारूपो दन्तवक्ञश्च वेदिराजश्च वीर्यवान्‌ ॥ १३॥ 
कलिङ्गाधिपतिश्चैव पौण्डश्च बलिनां वरः । 
साकृतिः केदिकश्चैव भीष्मकश्च नराधिपः ॥ १४॥ 
पुत्रश्च भीमकस्यापि स्कमी मुख्यो धुभर॑ताम्‌ । 
वास्देवाञ्ुनागेयां यः स्पर्धते स महाहवे ॥ १५॥ 
वे नहाधनुर्धर तथा महापराक्रमी नरे्गण् जरसंधका 
ही परिय चादनेवाठे थे । उनके नाम इस प्रकार ईह--करूप 
देशका राजां दन्तवक्त्र; पराक्रमी चेदिराज धिगुपाठः कटिन्ग- 
देशका राजा श्रुतायुः व्रल्वारनभिं श्रेष्ठ पोण्डरक ( वासुदेव ) 


सांकरतिः किकः राजा भीप्मक तया धनुर्धािेमिं श्रेष्ठ 
भीन्मकपुत्र स्वमी? जो मदामर्स श्रीकृष्ण ओर अर्जुनक साथ 
रढनेक्रा दौला रखता था | १३-१५ ॥ 
वेणुदरारसिः श्युतवी च क्थदचेवाट्युमानपि । 
सद्धणजश्च वखवान्‌ वङ्कानामधिपस्तथा ॥ १६॥ 
कौसटयः कारिराजश्च ददार्णीधिपतिस्तथा । 
खखेश्वरश्च विकान्ते पिद्रेह्याधिपतिस्तथा ॥ १७॥ 
मद्रराजश्च वंखवांलिगतीनामथेश्वरः । 
शाल्वराजश्च विक्रान्तो द्रदश्च मह।चरः ॥ १८॥ 
यवनाधिप्तिश्चैव भगदत्तश्च वीर्यवान्‌ । 
सौवीर्णजः कशोच्यश्च पाण्ड्यश्च विनां वरः ॥ ६९ ॥ 
गान्धारराजः सुवो न्मनि महावलः 
कादमीर्तजो गोनद दस्दाधिपतिर्पः। 
दुरयोधनादयश्चैव धार्हरा्टा ` महावलः ॥ २०॥ 
पते चान्ये च राजानो चठवन्तो मद्ास्थाः । 
तमन्वयुजराखंधं विद्धिपन्तो जनार्दनम्‌ ॥ २९१॥ 
वेणरुदारिः श्रुतर्वा, क्रथ, अंग्चमान्‌; व्र्वान्‌ अङ्गराजः 
वङ्गनरेशः कोसटनरेशा, कारिराजः दयाणदेदाकरे अधिपति; 
पराक्रमी सुलेश्वर, विदेहराजः वल्वान्‌ मद्रयज ( त्रस्य ); 
तरिगर्तदेखका याश्षक सुखार्मा, पराक्रमी शाल्वराजः महाव्रटी 
दरदः यवर्नौकरा राजा पराक्रमी भगदत्तः सौवीरदेयक्रा राजाः 
दन्यः वरल्वारनमि शरे पाण्डयः, गान्धास्यज सुतर मद्वरली 
नग्नजित्‌ कादमीरराजन गोनर्द दरददेदाके अपिपत्ति, 
धृतराटफे महाश्रटी पुत्र दुर्योधन आदि-ये तथा ओर भी 
चल्वान्‌ महारथी राजा श्रीक्कप्णसे देप रखते हुए जरासंध 
साथ अये ये ॥ १६--२१॥ 
ते श्रसेनानाविदय प्रभूतयवसेन्धनान्‌ । 
ऊषुः संध्य मधुरां पुरस्कृत्य वर तदा ॥ २२॥ 
वे श्ूरसेनदेयर्मैः जदो दाना-घास् ओर ल्कड़ीकी 
बहुतायत थी, आक्र अपनी-अपनी सेना्थकिो आगे करे 
मथुरापर घेरा डाल्कर रटने टगे ॥ २२॥ 


इति श्रीमहाभारते खिरभागे हसिवंरो विष्णुपर्वणि मधरु तेपरोधे चतुर्खिद्ोऽध्यायः ॥ ३४ ॥ 
दस प्रफार श्रीमहाभातके छिरभाग हिंद अन्तरगन्त वि्णुपवम जर संथकी सनादटाय 


मुरापर चरत्रिषयक चौतीस्ः अध्याय पृरा हुभा ॥ ३४ ॥ 
~~ 


पञ्चत्रिदोऽध्यायः 
जरासंधकी सेनाका वर्णन, उसकी चारों दिशसि मधुरापुरीपर आक्रमणकी योजना, यादेक 
साथ जरासंधकी सेनक युद्ध) श्रीकृष्ण ओर वररामके पराक्रमसे उसक्री सेनाका पलायन, 
जरासंध्टारा अपने सेनिकोंको प्रोत्साहन तथा उभय-पधके वीरम घमासान युद्ध 


वैशम्पायन उवाच 
मथुयेपवने गत्वा निविष्ठंस्तान्‌ नराधिपान्‌ । 
अपदरयन्‌ वृष्णयः सँ पुरस्टछत्य जनार्दनम्‌ ॥ १ ॥ 


(4 = (नप्‌ 

वेशम्पायनजी कहते दै-- जनमेजय | वे सव्र नरेद 
मथुराक्रे ॐपवनने परटुचकर छावनी डटे हुए थे । वर्य समस्त 
दृष्णिवंसिर््नि श्रीकरप्णको आगे करके उन देखा ॥ १॥ 


विष्णुपर्व { 


ततो हए्ठमनाः रण्णो रामं वचनमघ्रवीत्‌ 1 
त्वरते खदु कीर्थं देवताता न संशयः ॥ २ ॥ 

तव श्रीकृस्णने मन-दी-मन प्रसन्न टोक्रर वलरामजीसे 
कहा--पञार्यं | देवता्ओका कार्यं एवं प्रयोजन शीघ्र दी तिद्ध 
होना चाहता है--इसमे संशय नदीं है ॥ २॥ 


यथायं संनिरृष्े हि जरासंध नराधिपः । 
लक्ष्यन्ते हि ध्वजाग्राणि रथानां वातरहसाम्‌ ॥ ३ ॥ 

(तभी तो यह राजा जयंसंध सखयंदही हमारे निकर आ 
पटच । यह वायुकरे समान वेगश्नाटी रथोक्रौ ध्वजाओकि 
अग्रभाग दिखायी दे रेदै॥३॥ 


पतानि राशिक्रद्पानि वृपाणां विजिगिपिताम्‌ । 

छन्ाण्यारयं विराजन्ते प्रोचच्तानि सितानि च ॥ ४ ॥ 
'्भेया | विजयकी इच्छसे अये हए राजा्करि ये 

चन्द्रमा-जेते दवेत एवं ऊँचे-ऊचे छतर योभा णा रहे दै ।॥५॥ 


अहो सपर्थोद्य्ा विमखार्छतपङ्क्तयः । 
अभिवतन्ति नः शुश्रा यथा चे हंसपङक्तयः ॥ ५ ॥ 
अहो { राजाथोके रथोपर ॐची-ऊॐची निर्मङ एवं जुभ्र 
छच-पेकतिरयो आकाशमे हंसकी पोतोके समान योभा पाती हर 
हमारे निकट आ रही है ॥ ५॥ 
काठे खट्ट छुपः प्राप्तो जरासंधो महयीपतिः। 
अव्रयोंद्निकषः प्रथमः समरातिथिः॥ दे ॥ 
 शृ्वीपति जरासंध ठीक समयपर आ परहूचा दै । यह 
हम दोनेफि युदधकी कतौटी तथा समराद्नणका पहला 
अतिथिदै॥६॥ , 
आयं तिष्ठावे सहितावनुप्रात्ते महीपतौ । 
युद्धारम्भः प्रयोक्तन्यो वलं तावद्धिखरुद्यताम्‌ ॥ ७ ॥ 
{आयं { उस राजक जा जानेपर दम दोनो साथदहीर 
य॒द्धका आरम्भ पे दोगा । पठे उसकी सेना कितनी है 
इसका विचार कर छेः || ७ ॥ 
पएवमुषत्वा ततः छृष्णः खस्थः संग्रामलालसः। 
जरासंधवटं प्रप्डुश्चकार वखदरयनम्‌ ॥ ८ ॥ 
रेता कदकर श्रीकृप्ण स्वश्य-चित्तसे संग्रामकरी' खलता 
रखकर जरासधकी याक्तिक। पता ठगने स्रि उसक्षी सेनाका 
निरीभण करने स्मे ॥ 
वीक्षमाणश्च तान्‌ सर्वान्‌ मृपान्‌ यदुवसे ऽव्ययः] 
आत्मनेवात्मनो वक्यमुवाच हरिं मन्नवित्‌ ॥ ९ ॥ 
अविनी वदुकुरुतिलकर मन्ववत्ता श्रीष्कुष्ण उन सवर 
राजा्ओंकर देखकर अपने-आप हौ मने इ प्रकार कहने 
लो-॥ ९॥ 
इमे ते पृथिवीपालाः पार्थित्र वर्व्मनि सिताः 
ये विनाशं गमिष्यन्ति शालरदष्डेन कर्पणा ॥ १० ॥ 


पश्चर्चिश्षो.ऽध्यायः 


२९६५७ 


ध्येये भूपाल, जो रजोचित मार्गपर खित दै ओर 
साल्ोक्त विधिने विनारको प्रात हेनेवले ई | १० ॥ 
प्रोक्चितान्‌ खस्विमान्‌ मन्ये श्ल्युना दपपुद्नवान। 
सगगामीनि चाप्येषां वपूंपि प्रचकारिरे ५११॥ 
म समक्षता हू कि मृध्युने रण-यक्ञकी आहुति बननेके 
च्िदनष्रेष्ठ नरेौकरा प्रोक्षण क्रिया दै | इने खर्गमामी 
शरीर मी प्रका दौ उठेईह॥ ११॥ 
स्थने भारपरिशान्ता वसुधेयं दिवं गता। 
पषां चरपा्णां मुख्यानां चलोैरभिपीडिता ॥ १२॥ 
भ्य प्रथ्वी इन मुख्य-मुख्य नरेशे सैन्य-समुदायसे 
पीडित दो महान्‌. भास्से थर जो देवलोकमे गयी थी, वह 
इतका जाना उचितदीथा॥ १२॥ 
मही निरन्तस चेयं वलख्यष्यमिसं बता । 
स्वस्पेन खलं केन विपिक्तं पृथिवीतलम्‌ ॥ !२॥ 


, भविप्यति नरेनद्रोधैः शतशो विनिपातितैः । 


इन राजाोकरे सेन्य-पमुदायते आहरत दोकर येकी 
भूमि ठसाठस भर गयी है । कदी थोडा सा भी अवकादा नह 
रह गया हैः परंदु थोड़े दी समयमे जवर ये सैकड़ो नरेश सैन्यहिः 
मार गिराये जाये, तत्र यड मूतर निर्जन-सा हो जायगा ॥ 
के्ग्पायने उवाच 

जयसंधस्ततः कृद्धः पयु; सवेमहीक्षिताम्‌ ॥ ₹४॥ 
नरधिपसरस्नोधेरनुयातो मदादुतिः। 

वैशस्पायनजी कते है--जनमेजय ! तदनन्तर 
समस्त राजार्ओंका स्वामी गदातेजस्वी जरासंध कुपित हो 
सदसो नेश-समुदायेोके साय अगे ब्दा ॥ १४३ ॥ , 


व्यायतेदृश्रतुरेः खयानः सुसमाहितैः ॥ १५॥ 
रथेः सग्रमिकयुक्तेरसङ्गगतिभिः कचित्‌ । 

कद मुन्द्र ठग सुभलिते सुन्दर वादन; सथ युद्धोपथोगी 
सामग्नियोसे सम्पन्न थे। उनमे विश्षाक णवं प्रचण्ड 
वेगवलि अश्व छते दए थे] उन रथोकी गति कभी 
अवरुद्ध नही होती थौ ( एेसे रथोद्याग रथी योद्धा युदधके चि 
अगि व्रहरदैये)॥ १५२ ॥ 
देमकश्षैमहाघण्डेवरणेवौरिदोपमेः 
महाम त्रोत्तमारूढैः कल्पितै रणकोधिषै 

1 बरहुसस्यक्र हाथी चछ रहे ये, जिन सोनकर जंजीर 

सक्दागवाथा। उनफ़ दोनो ओर वडवे घण्टे लटक 
रदेथे। वे दायी कलि मेवे समान प्रतीत हते ये | उनके 
ऊपर अच्छे महावतवेढे ये तथा रणङ्कुगल योद्धाथद्धारा 
उन्द सुनन करवा गवा या (उन दधिवोद्राया गजारही 
योद्धा अगे बद्‌ रदे थे) ॥ १६१ ॥ 
स्ारूढः सदिभियुक्त प्रह्मणेः प्रवस्गितेः ॥ १७॥ 


॥ १६॥ 


२३८ 


चजिभिवौयुसंकादौः प्रुबद्धिरिव पनिभिः। 
करुख ध्ुदसवार योद्धा रोपर अच्छी तरदसे सवार ये । 
उनके वे घोडे वायुकरे समान वेगद्याटी थे ओर उशल्ते- 
कूटदते हए अगि वदते समय आकादाै उदंते दए. पक्षियोके 
समान प्रतीत होते थे ॥ १७१ ॥ 
खङ्गच्भधसेदयरैः , पत्तिभिर्वदलिनां . वरे; ॥ १८॥ 
सहसख्रसंख्यासंयुकतैरुत्पतद्धिरिवोर्गैः । 
चल्वानेमि भेर पैदल सैनिक भी ढाठ ओौर तख्वार व्यि 
प्रचण्ड रूप धारण कर अमि वदते थे । वे दजार-हजारकी 
योखियोमे एक साथ चस्ते ये ओर उदङ दए. स्के समान 
दिखायी देते ये ॥ १८६ ॥ 


=. 


पवं चतुर्विधैः सैन्यैः कम्पमनेरिवाग्चुदैः ॥ १९॥ 
चपः प्रयाते वल्वाश्चससंधो धृतनतः।! 
दस प्रकारं ्मेडराते दए वादर्खोके समान चवुरङ्किणी 
सेनाः साथ केकर वीरत्रतको धारण कर्नेवाद्य वख्वान्‌ राजा 
जरासंध युद्धकरे व्यि आगे वद्‌ रह्‌। या ॥ १९३ ॥ 
स॒ स्थैर्मेधनिधेवि्गजैश्च मदसखंयुतेः ॥ २०॥ 
हेपमाणेश्च तुरगैः क्षवेडमानैश्च पत्तिभिः। 
नाद्याने दिशः सवीस्तस्याः पुय वनानि च ॥ २९॥ 
वद्‌ मेघे समान गम्मीर घर्घर धोपर करनेवाटे स्थः 
विग््ाइते हुए मतवाले दाथियोः हिनदिनाते दु धोद तया 
गजते हुएपैदल निकास उस पुरोकी सम्पूरणं दिशार्ओं तथा 
वनोँको कोलखदस्पू्णं बनाता हुमा आ र्दा था ॥२०-२९१॥ 
ख राजा सागयाक्षारः ससैन्यः प्रत्यटद्यत ) 
तद्वरं पृथिवीरानां दश्टयोधजनाङलम्‌ ॥ २२॥ 
सेनक्रे साय आता हुखा राजा जरासंध विशाल समुद्रके 
समान दिखायी देता था! भृमिपारछकी वदे सेना दृष्ट-पुषट 
योद्धा्ओैमि परिु्णं थी ॥ २२ ॥ 
क्ष्वेडितास्फोरितरवं मेधसेन्यमिवावभौ । 
रथैः पवनसम्पातेगज्ैश्च जल्दोपः। 
तरगेश्च. जवेपेतैः पत्तिभिः खगमेोपमः ॥ २३॥ 
विमिश्रं सर्वतो भाति मत्तद्धिपसमाकुलम्‌ 1 
घमोन्ते ' सागस्गतं यथाश्रपरलं तथा ॥ २९॥ 
गर्जन ओर ताल केकी गम्भीर ध्वनिते वह मेर्धोकी 
गजंती हुई" घरके समान प्रतीतरदोठी थी । वायुके समान शीघ्र- 
गामी र्थौ मेधोके सद्दा दिखायी देनेवाटे दाधथि, वेगनाटी 
घो तथा आकाद्याचारी पक्षि्योकरे समानं जान पड़नेवलि 
वैदल सैनिकति मिश्रित दुद उस सेनाकी स्व ओरसे बड़ी 
द्ोभा दो रही थी । मतव दायियोसे व्याप् हई बह विदा 
वादिनी वर्पा-छरतुमे समुरकरे मोतर ल्षित दोनेवाये मेवोकरे 
समूहकी सोभा -धारण करती थौ ॥ २३-२४॥ 


भरीमष्टाभारते लिकभागे | 


॥ हरिवंशे 


सवलखास्ते महीपा असासंघपुसेगमाः । 

पर्वायं पुरर सवं निवेशायोपयक्रिरे ॥ २५॥ 
व जरासंध यादि समस्त भूपार अपनी सेनाके राथ 

मधुरापुरीको चा ओस्खे पेसकर छावनी डाठनेकी तैयारी 

क्ले स्मो ॥ २५॥ 

वभौ तस्य निविष्टस्य वखश्चीः दिविरस्य वै । 

शधपरयन्तपू्णस्य यथा रूपं मदोदधः ॥ पद ॥ 


वरौ उरा उछि हुए जरा्तधके से्निक-िविरोकी 


सोभा वैसीद्ी प्रतीत रोती श्री, जैसा कि शरुक्ट्यक्षकी 

पूर्णिमाकरो अपनी उत्ताल तरद परिपूर्ण ॒हुए मदा 

सागरका रूप देखनेम आता दै ॥ २६ ॥ 

वीतरात्रे ततः काटे समुत्तस्थुर्मदीक्षितः। 

असेदहणाथं॑पुरयीस्ते खमीयुयदलाटसाः ॥ २७ ॥ 
तदनन्तर रात व्रीतनेषर प्रातःकाल सवर राजा उठे ओर 


, युद्धकी लालसे मथुरापुरीपर चटाई करनेके व्यि एकत्र 


देने ल्मे ॥ २७ ॥ 
समवायीकृताः सर्व यसुनामद्ु ते खपाः 
निविष्टा मन्नयाम्ुयंद्कारङ्कतृष्टलाः ॥ २८॥ 
यमुनाक्रे किनारे एकत्र दोकर वे समी नर्या वैडे 
ओर युद्धके युम अवरे चयि उत्ुक दये आपसे मन्त्रणा 
करने खे ॥ २८ ॥ 
तेषां खुतुमुरः शब्दः शुश्वुवे पृथिवीक्िताम्‌ । 
युगान्ते भिद्यमानानां सागराणामिव खनः ॥ २९॥ 
सेनासदित उन नरर्गोकौ तुमुल ध्वनि प्रल्यकास्मे 
मर्यादाको तोड़कर बहनेवले समूदरोकी भयंकर गर्जनाके 
समान सुनायी देती यी ॥ २९॥ 
तेषां सकञ्चुकोप्णीपराः स्थविरा वेत्रपाणयः । 
चेरुमौ शब्द इत्येवं वदन्ते राजलासनात्‌ ॥ २०॥ 
उन राजा्थेक खडीदार्‌ वृदे सिथादी चोगा ओर पगड़ी 
धारण कयि तथा दाथमे व्रत ल्यि राजाज्ञसे वह्‌ कदते हुए 
विचरे खगे क्रि श्तव्र खोग मौन र्ट ¡ कोई एक 
शब्द मीन वरोद" | ३० ॥ 
चस्य रूपं वलटस्यासीचनिःश्ब्दस्तिमितस्य चे । 
दीनमीनव्रदस्येव निभव्दस्य यथोदधेः ॥ ३९ ॥ 
उस समय नीरव ओर निश्वल हुए. उस सैन्यसमूहका 
रूय जिसक्रे मतस्य ओर राद विलीन हो ये द्य उस शब्द- 
हीन सान्त महासागरफे समान प्रतीत होता था॥ ३१॥ 
निःराब्डस्तिमिते तस्मिन्‌ योगादिव महाणैवे । 
जरासंधो वृ्द्‌ वाक्यं वृदस्पतिरिवादषरे ॥ ३२ ॥ 
उस सैन्य-समुद्रके मानो योगव्रल्ते सदसा नीरव तथा 


विष्णुपर्व ] 


पञ्चधिश्नोऽध्यायः 


व= 


निश्चल हौ जनिषर वृहस्पति ममान नीतिमान्‌ जरामंधने 
यह मदच्पर्ण बात कदी--]] ३२॥ 
शीघ्रं समभिवर्ठन्तां चखनि प्रृथिवीक्षिताम्‌ । 
सर्वतो नगसी चेधं जनौत्रः परिवार्यताम्‌ ॥ ३२ ॥ 
धराजार्थोकी सेन शीघ्र आक्रमण करं अर इस 
मधुरानगरीको सव्र ओरे सेनिक-समूरदौद्रारा प्रर ट ॥३३॥ 
अद्मयन्ाणि युज्यन्तां क्षेपणीयाख सुद्रसः। 
काया भूमिः समा सवौ जरोधेश्च परिष्ठुता । ` 
उर्यं चापा निवादह्यन्तां प्रासा वै तोमसास्तथा ॥ ३४ ॥ 
प्रत्थरोके गोले बरखानेवले यन्त्र ठ्गा दिय ज्ये ) 
क्षेपणीय ८ गोफना या देल्वोसि ) तथा मुद्रर सेभाल ल्ि 
जा्ये । सारी भूमि समतल कर दी जाय ओर उसे जल 
रारिर्येति आप्टावित शिया जाय | धनुर्पको ऊपर उठा 
लेना चादि, प्रासो ओर तोमर्येको भी दायै ठे ल्य 
जायं ॥ ३४ ॥ 
दर्यां चैव रङ्ा्चैः खनित्ैशच पुरी द्रुतम्‌ । 
सपश्च युद्धमायंश्ना चिन्यस्यन्तामदूरतः ॥ २५) 
ष्टके आदिक द्वारा तथा खनित्रसि इस पुरीको ठरंत 
ही विदीर्ण कर दिया जाय । युद्धकी प्रणाटीक जाननेवाठे 
नरेशोको उसके समीप दी यथास्थानं खड़ा किया जाय ॥३५॥ 
अदयप्रशरति सैन्यम पुरीरोधः भ्रवर्त्यताम्‌ । 
यावदेतौ रणे गोपौ षसुदेवसुतादुभौ ॥ ३६॥ 
संकर्षणं च ङष्णं च घातयामि रिततैः शरेः । 
आकाशमपि वाणौधैर्निःसम्पातं यथा भवेत्‌ ॥ २७ ॥ 
'आजते मेरे सैनिरकोद्ारा मधुरापुरीपर परेरा डल दिया 
जाय ओर उसे तवरतक चाट रखा जाय, जव्रतक कि मँ थुदधमे 
इन दोनों ग्वा वसुदेवपुतर संकर्षण ओर ङप्णकरो अपने 
तीसरे वार्णोद्यारा मार न ड्द | उस समयतक आकाराको 
मी वाणसमूोसि इस तरह सध दिया जाय; जिससे पक्षी भी 
उड़कर बाहर न जा सवैः || ३६-३७ ॥ 
मयायुि्ल्तिष्टन्तु पुसीभूमिषु भूमिषाः। 
तेषु तेष्ववकाशेषु शौघ्रमारुद्यतां पुरी ॥ ३८ ॥ 
“मेरा अनुशासन मानकर समस्त भूपाल मधथुरापुरीके 
निकटवर्ती भूभागे खड़े रदं ओर जव जदो अवकाश मिक 
जाय ततव तर्हो शीप्र दी पुरीपर चटाई कर दं ॥ २८ ॥ 
मद्रः कलिद्ञाधिपतिश्येकिंतानः सवाहकः । 
कादमीरराजो गोनर्दैः करूप्ाधिपतिस्तथा ॥ ३९ ॥ 
टमः किम्पुशष््ैव पर्वतीयो हयनामयः। 
नगयौः पञ्चिभं द्वारं शीघ्रमासेधयन्त्विति ॥ ४०॥ 
(मद्रराज ( शल्य ), कलिद्धराज श्रुतायुः चेकितानः 
याष्धिकः कादमीररज गोनर्दःकरूपराज दन्तवक्च तथा पर्वतीय 


पदे सेगरदित करि्ररन द्रुम-ये शीघ्र टी मथुरापुरीके 
पचिम द्वास्फो रोक ट ॥ ३९-४० ॥ 

परयो बेणुदारिष् वैदर्भः सोमक्रस्तथा । 

रक्मी च भोजाधिप्तिः सृथीक्षश्धेैव मालवः ॥ ४१९॥ 
विन्दायुविन्दाचावन्त्यौ दन्तवक्चश्च वीयवरा्‌ । 
छागलिः पुरमि्रश्च धिराटश्च मदीपतिः ॥ ४२ ॥ 


- करौरव्यो माख्वश्चैव शतधन्वा विदूरथः! 


भूरिश्रवासिगर्तश्च वाणः पञ्चनद्स्तथा ॥ ४६॥ 
उत्तरं नगस्द्वारमेते दुगंसहा चपाः। 
आसद्य चाभिमर्दन्तां वज्रघ्रतिमगौरवाः ॥ ४८ ॥ 
'ृर्वंशी वेणुद्यारि विदभदेशीय सोमकः भोजि 
अधिपति खुद्मी, माल्वाफरे राजा सूयक्षि, अवन्तीके राजकमरि 
विन्द ओर अनुविन्द) पराक्रमी दन्तवक्त्र, छागलिः परमित, 
राजा विराटः कुरवंशी मालवः शतधन्वा विदूरथः भूर्थिचाः 
तरिगर्व बाण ओर पञ्चनद--ये दुर्गका आक्रमण सह सकने 
वाठे नरेद मथुरा नगरफे उत्तर द्वारपर चदाद करफे दारुको 
कुचल उं । इनका गौरव वल्के वल्य है ॥ ४९-४४ ॥ 
उदकः कैतधश्चैव वीरथ्यांश्युमतः सखुतः। 
एकटन्यो वृदसक्षजः क्षत्रधमी जयद्रथः ॥ ९५॥ 
उत्तमौजाश्च शल्यश्च कौरवाः कैकयास्तथा । 
वैदिशो चमदेवश्च सांङृतिश्च सिनीपतिः ॥ ४६॥ 
पूर्व॑ नगरनिव्युंहमेतेष्वायत्तमस्तु नः। 
दास्यन्तो विघधावन्तु वाता व वखाहकान्‌ ॥ ४७ ॥ 
(्तकुनिपुत्र उच्छः अं्यमनिफ़े पुत्र वीर॒ एकठ्व्यः 
वृहःसषत्ः क्षत्रधर्मा, जयद्र थः, उत्तमौजाः याल्यः कुरुवंदी, 
केकयराजक्रुमार, विदिद्याक्रे राजा वामदेव तथा सिनीपति 
सांकृति--इन सतव्रके अधीन मथुरापुरीका पूर्व दार कर दिया 
जाय ।येखोग जेते वायु बादल छि्न-मिन्न कर देती दैः 
उसी प्रकार शतरुओंको विदीर्ण करमेके चयि उनपर धावा 
वोट दं ॥ ४५४७ ॥ 
अहं च दस्दश्चैव चेद्विराजश्च चीर्यवान्‌। 
दक्षिणं नगरद्वारं पालयामः सखुदृशिताः 1 ४८ ॥ 
भमः दरद तथा पराक्रमी चेदिराज दिशुपार कवच 
धारण करे नगरे दिग दारका मोर्चा सँभाठेगे ॥ ५८ ॥ 
पवमेषा पुरी क्षिप्रे खमन्ताद्‌ वेष्टिता वङैः। 
वञज्रावपातचिषमं प्राप्नोतु तुमुटं भयम्‌ ॥ ४९} 
“इस प्रकार हमारी सेनाओंदारा चारो ओरसे धिरी हुई 
यह नगरी मानो इसपर वज्रपात हो गया दोः इस प्रकार विग्रम 
एवं घोर भय प्राप्त करे ॥ ४९ ॥ 
गदिनो ये गद्ाभिस्ते परिधैः परिधायुघाः । 
अपरे विविधः शखदौरयन्तु पुरीमिमाम्‌ ॥ ५० ॥ 
(गदाधारी वीर गदाअंसि, परिष चल्मनेवछे परिधि 


[1 


३४० 


~~~ 


~~ 


तया अन्य वीर्‌ नना प्रकारे दूसरे द्वि इस पुरीको 

विदीर्ण कर र्दे ॥ ५० ॥ 

अदैव नगरी दयेग विपमोचय्रसंकरा] 

कार्या भूमि्तमा सवौ भवद्धर्वखुधायिवैः ॥ ५९१ ॥ 
प्याज दी आय सव्र भृपाट मिलकर ऊंचे-नीचे महर्टकरे 

समृदनि भरी हुई इस साय नगरी सदमे मिलकर समतल 

भूमिके समान कर दे ॥ ५१ ॥ 


चतुरड्रवदव्यद्य जगसंधो व्यवस्थितः । 
[8 [५ (१ 
अधाभ्ययाद्‌ यदून्‌ करद्धेः सह खवनंसाधिपेः ॥ ५२॥ 


ट्ख प्रकार अदेय दे चतुरङ्घिणी मेनाथोकरा व्यूह्‌ ना- 
कर जरासंध युद्धम क्रि उट सथा ओर क्रोधे भरे हुए 
समस्त नेोके जथर यादरवोपर चद्‌ आया ॥ ५२॥ 
प्रतिजगमुरदशाीसनं व्यृढानीकाः प्रहारिणः । 
तद्‌ युद्धमभवद्‌ घोरं तेपां देवाुेपमम्‌ 1 
अरपानां वहुभिः साध चयतिपक्तरधट्धिपम्‌ ॥ ५३ ॥ 
उस समव अपनी भेनाक्रा व्यूह्‌ वनाकर प्रहासकः 
यादर्वौनि जयामेधका सामना क्रिया | उनका वह युद्ध देवार. 
संग्रामकते समान भयंकर्‌ ग्रनीत दयता था। यह थोडेसे योद्धाओ- 
का वहुमंख्यक च्रं माथ युद्ध हुमा ज्िघमे उभय पस्नके 
रथ जौर हाथी एक वृ्रेमे मटकर जज रटे थे ॥ ५३ ॥ 
नगरान्निस्खतौ दष्टा चसुरैवसुताघरुभौ । 
छुभितं चचसनीकं घ्रस्तसम्मूढवाहनम्‌ ॥ ५४ ॥ 
इसी समय वसुरेव दोनो पुत्र श्रीकृष्ण ओर्वलराम नगरमे 
वार निकले । उद देखते दी उन श्रेष्ठ राजार्योकी विगाछ 
वादिनी न्ध दो उठी । उसे वाहन मगभीत ओर मोदच्छनन- 
खेदो गये॥ ५४॥ । 
रथस्थो दंशितौ चैव चेरतुस्तच याद्चौ। 
मकराचिव संरव्यौ समुद्रक्षोभणावुभौ ॥ ५५॥ 
कवच धारण करके रथपर बैठे दए तरे दने यादव-वीर 
वर्धो विचरने ल्गे, मानों क्रोधम्‌ भरे हए दो मगर समुद्रम 
टच मचा रहे ट ॥ ५५ ॥ 
तयोः प्रयुध्यतोः सस्ये मतिरासीःमात्मनोः । 
सायुधानां पुरणानामाष््नरुतखक्षणा ॥ ५६ ॥ 
उत्त संग्रामम जुङ्चते दए उन दोना मदत्मा वीरोके 
मनम य संकल उदा, यदि मारे पुरातन अख आ जति 
तो टम उन्दी टेकर युद्ध करते ॥ ५६ ॥ 
ततः खा्निपतन्ति स्म दिव्यान्यादवलमप्रच। 
टेखि्ा(नानि दीप्तानि महान्ति सुखानि च ॥ “७ ॥ 
उनके इतना सोचते द्री उम युद्धम आक्राटमे वे दिव्य 
आयुष नीचे अने तो । व सवके-मव्र तुद, महान्‌ ओर 


श्रीमदहामासते सिलमागे 


""--~----~--~~------~---------~----------- 


देदीप्यमान थे त्तथा शत्रु्भको चाट जनिके स्यि उद्यतदिखायी 

देते थे ] ५७॥ 

करव्यादिर दुयातानि मूर्तिमन्ति वृदम्ि च। 

दपितान्याहवे भोक्तु चरपमांसानि व शम्‌ ॥ ५८ 
उनके पठे मासनस्ी मूतयेत आदि मी आरदेये। 

चे दिव्य अस्त्र मूर्निमान्‌ एवं विशार ये तथा युद्धम अये हप 

राजायोके र्त-मासक्रा उपभोग करने च्ि मानो अत्यन्त 

भूखे प्यसे थे ॥ ५८ ॥ 

दिव्यख्रग्दामधःसीणि चःसयन्ति च खेचरान्‌ । 

प्रभया भासमान्नानि पतमानानि चाम्बसयात्‌ ॥ ५९ ॥ 
उन्न दिष्प पूरके हार धारण किये थे । अपनी प्रभासे 

प्रकटित हो आकलमे गिरते हुए ये दिव्पराल्र आकायचारी 

प्राणिगरोके मनमे भय उत्पन्न करते थे ॥ ५९ ॥ 

हलं संवर्तक नाम सोनन्दं मुसटं वथा। 

धुरा प्रवरं चाड गदा कौमोदकी तथा ॥ ६०॥ ; 

चत्वायंतानि तेजांसि विष्णुप्रहरणानि च। । 

ताभ्यां समरवतीणीनि याद्वा्यां मदाय ॥ ६१॥ ¦ 
संवर्तक नामक्र दलः सौनन्द्‌ नामक मूतलः धनुरपोमि श्रेष्ठ 

शाङ्ध तथां करौमोदकी गदा--मगवान्‌ विप्णुके ये चार तेजस्वी । 

आयुध उन दोनो भादयोके ल्ि यादवोकरे उस्र मदासमरमे ` 

उतर अयि ॥ ६०-६१ ॥ 

जग्राह प्रथमं रामो खलामप्रतिमं हरम्‌। 

सर्पन्तमिव् सर्प॑न्दरं दिन्यमाटाङ्कलं सधे ॥ ६२॥ 
व्रल्गमजीने उस युद्धसल्मे पे सप॑राजके समान 

सर्पणमील ( गतिमान्‌ ) तथा दिव्य मालभते अटक्रत 

सुन्दर आक्रृतित्रले दख्को ( दाहिने दाथमे ) महण क्रिया ॥ 

सौनन्द्‌ं च ततः श्रीमान्‌ निरानन्दकरं हिषाम्‌ । 

सव्येन सात्वतां श्रेष्ठो जग्र(ह मुसलोत्तमम्‌ ॥ ६२ ॥ 
तदनन्तर यादवोम श्रेठ श्रीमान्‌ सव्र्परणने दनरुभकि 

आनन्दक्रौ हर छेनेवलि सौनन्द नामक शरे मूसल्को वाये 

ह्यथसे ग्रहण क्रिया ॥ ६२॥ 

दर्शनीयं च लोकेषु धचुज्ञ॑खदनिःसखनम्‌ । 

नाख्ना शाङ्धमिति ख्यातं कृष्णो जग्राह वीर्यवान्‌ ॥ ६४ ॥ 
इसके वाद पराक्रमी श्रीकरृप्णने मेके समान मम्भीर 

घोप करनेवाटे गाद्ध नामक्र धनुधकरो प्रदण क्रिया) जो समस्त 

खोकर दर्गनीव दै ।॥ ६४॥ 

देषर्निगदितार्थस्य गगा तस्यापरे करे। 

निशिता दुमुद्रक्षस्य नाम्ना कौमादकति सा ॥ ६५॥ 
देवतानि चिन्हे अपना प्रयोजन वताया था ओौर जिनके 

नेच लिह हुए कुमुदे समान मोना पाते दै, उन भगवान्‌ 


विष्णुपर्व | 


पश्चर्धि्नो ऽध्यायः 


२८४१ 


(नन यव~ = 


रक्षणक दूसरे दामे वद्‌ सुप्रपिद्ध कौमोदकी गदा खतः 
भा गयी || ६५ ॥ 
तो सव्रदरणौ कीरो सष्टद्‌ विप्णुतनूपमौ । 
समरे रामगोविन्दौ रिपुंस्तान, पत्ययुद्धच ताम्‌ ॥ दद ॥ 
उन आयुते युक्तं दो साक्नात्‌ विप्णु-विग्रहके समान 
दररीरवाले ढोर्नौ वीर बरट्सम ओर श्रीकृष्ण सपराद्चणमे उन 
शुक्रे ताथ युद्ध क्सने ले ॥ ६६ ॥ 
सगयुधपप्रदौ वीरौ तावन्योन्याश्रयादुभौ । 
पूर्वजावुजसंक्षै तौ गमभोवरिन्दलक्षणौ ॥ ६७ ॥ 
हिषस्ु ध्रतिकुश्रीणो परक्रान्तौ यथेश्चसे । 
धिवेसतु॑धा देवौ वसुद्रेवयतावभो ॥ ६८ ॥ 
उन दिव्य थायुरधोकरो प्रण करे एक दूस सहार 
देनेवाछे बे अग्रज सौर अनुत्रस्य दोनो वीर बन्धु श्रीव्रटसयम 
ओर श्रीटृप्ण चतुर्थेका सामना कसते हुए ईश्वरकोरिके महा- 
पुरुपोके समान पराक्रम द्विखानि खगे 1 वञुदेवके वे दोनो पुत्र 
रणभूमिमे देवता्थेक्रे समान विनस्ते थ ॥ ६७-६८ ॥ 
हटमुयम्य रामस्तु सर्पन्द्रमिव कोपितः 
चच्चार समरे वीते एिद्धिपास्त्तकतो यथा ॥ ६९॥ 
वीर्‌ बलराम क्रौषमे मरकर सधराजकरे समान दल उचये 
यतु ट्यि कालसर्प होकर समरमूमिमे विचर रदे ये ॥ 
विकर्वर्‌ र्थन्रन्दानि क्षत्रियाणां महात्मनाम्‌ 1 
चकार येषं सफटं नागेषु च । हयेषु च ॥ ७० ॥ 
वे मदहायनस्वी क्षत्चियोके रथसमृहौको पीछे ठकरेख्ते हुए 
हाथियों आर बरोडोपर सवना सोप सफठ करने खो ॥ ७० ॥ 
कुअयषछो्टक्षिप्रान्‌ मुसला्रेपनाडित्तान्‌ । 
रामो विराजन्‌ स्मरे निर्ममन्थ यथाचलान्‌ ॥ ७१ ॥ 
वरखरामजी गजस ओको दृट्ते खींचकर उन्दे मूनठ्की 
मारसे घायर कते हुए समराद्नणमे अद्भुत मोमा णा रहे ये। 
उरि पवनो समान दाधियोको मथ डाल ॥ ७१ ॥ 
ते वध्यमाना रामेण रणे श्सत्रियपुङ्गवाः) 
जगसंघान्तिकं भीताः समसात्‌ प्रतिजग्मिरे ॥ ७२) 
रणभूमिमे व्रटरामीके दारां मारे जाते हए वे श्चत्रिय- 
शिसोमणि भयभीत हौ समसे पि हय्कर जरासंधकरे पाम 
भाग गये ॥ ७२॥ 
तादुवाच जरासंधः श्रचधर्तं व्यवस्थितः। 
धिगेतां क्षत्रघ्ृत्ति वः समरे कातरात्मनाम्‌ ॥ ७३ ॥ 
उत समव धत्रिव-धर्ममे दिर रदनेवाले जरामंधने उन 
त्रियते कला--“अरे ममराद्गणमे व्तर-दृदय होकर पीछे 
भागनेवद् तुम सत्र लोमेकी इम क्षधिव-वृत्तिको धिक्छ।र है! । 
परादत्तस्य समरे विरथस्य परायतः। 
श्रणदत्यामिवासद्यां प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ५५ ॥ 


भजो क्षत्रिय संग्रामभृयिम रथदीन होनेर पीठ दिखाकर 
भागने लगता दै, उसकी इत भीरुनाकरो मनीपी पुरुप ब्रृण्र- 
हत्याके समान असह्य वताते ह ॥ ७५४॥ 
भीताः कस्माच्निचर्तध्वं धिगेतां छजदुत्िताम्‌ । 
क्लिभरं सवे निवर्तध्वं मम चाक्येन चोदिताः ॥ ७५॥ 
धयोदधाओ { ठम भयभीत दोकर्‌ युद्धसे पीर कथो हते 
दो १ ठम्दारी एेसी क्षन्निवव्रत्तिको पिक्छार है} मेरी वाणीस 
मरेरिति दो त॒म सव्र लेग शीघ्र दी चुद्धभूमिको खोर जाओ ॥ 
अथवा तित स्थैः भेष्चक्राः समवस्थिताः! 
याचदरैतौ रणे गोपौ प्रेषयामि यमक्षयम्‌ ॥ ७६॥ 
“अथवा रथोके दारा दयैक बनकर तवतक्र खडे ररौ, 
जतव्रतक करि मेँ रणभूमिमे इन ग्वालोको मारकर यमलोक नहीं 
भेज देता हूः ॥ ७६ ॥ 
ततस्ते क्षच्रियाः स्वे जरासंधेन नोदिताः। 
सृजन्तः ररजास्नि हठा योद्धुं व्यवस्थिताः 1७७ ॥ 
तव्र जरामंधसे तरेरित दौ वे समस ध्रियं साण-पमूर्हौकी 
दृष्टि करते हुए वड़े हर्पके साथ युद्धकरे चयि उट गये ॥७७। 
ते दयैः काञ्चनापीडे र्थेश्चाम्बुदनादिभिः। 
नगोश्वाम्बुदसकाले्मदामाव्रप्रचोदितैः ॥७८॥ 
चे सोनेके आभूप्रगसे विभूषित हुए घोड़ो, येषकी 
गर्जनाके समान प्रप्र ध्वनि फरैढानेपल़ रथों ओर महावतो- 
दारा दकि गये मेषोके समान काठके गजराजाय अगि 
चदृकर युद्ध करे च्मे॥ ७८ ॥ 
सतनुवाः सनिखिशाः सपताकायुधध्वजाः । 
स्वारोपितधयुप्मन्तः सतूणीराः सतोमराः ॥ ७९॥ 
उन सत्रफे खरीरमे कवन वधे येः सवने तल्वारे ठे 
रखी थीः समी ध्वजपताका ओर आयुते सम्पन्न ये, 
समीके धनुप चद हुए भरे तथा सने तरस ओर्‌ तोमर ठे 
रखे थे ॥ ७९॥ 
सच्छन्राः सादिनश्चैव चारुचामरवीनजिताः। 
रणे तेऽधिगता रेजुः स्यन्दनस्था मदीक्षितः ॥ ८०॥ 
र्थपर बरठे हृष्‌ उन राजाथेक्रि ऊपर छत्र तने हुए थे, 
मनादरः चवर इये जति थे} उनके साथ षुड़सवार भी ये| 
भूमिमे सित हुए वे सभी नरेद वड़ी गोभा पा रहे थे ॥ 
ते युद्धसमा रथिनो व्यगाहन्त युधां वसाः । 
गदाभिश्चेव श्वभिः क्षेपणीय सुदधरेः 1 ८१॥ 
योडाजमि श्रेष्ठ उन रथी वीररौक्र युद्धमे अनुराग था, 
इवि वे भारी गदा, भेपणीयो ८ गोपने ) तथा मुदरसे- 
मे विपभिर्योकरो धायठ कस्ते हए उनकी सेनाओमि घुस गये । 


एकाकारा 1 ागकोकवकवनव 


# ॥ 


२४२ 


पतस्मि्नन्तरे तत्र॒ देवानां नन्दिविधेनः 
सुपणध्वजमास्थाय रष्णस्तु रथमुत्तमम्‌ ॥ ८२॥ 
समभ्ययाज्रासंधं दारर्विव्याध चाण्भिः 1; 
सारथि चास्य विव्याध प्ठभिनिंितैः शरैः ॥{८२॥ 

इसी बीच देवतार्ओंक्रा आनन्द व्रद़ानिवाठे भगवान्‌ 
श्रीकृष्ण उतम गड्भ्वज र्थपर आरूढ दौ जरार्धपर चद्‌ 
अय । उन्दने आट वरार्णेति उसको घायल कर दिया ओर 
पचि वैने वार्णोद्ारा उसके सारयिकरो भी वीध डाला ॥ 
जघान तुरगांश्वाजौ यतमानस्य यीर्ययान्‌ । 
तं छऊच्क्रगतमाक्षाय चिबरसेनो महारथः ॥ ८३ ॥ 
सेनानीः कैशिकश्चेव छृष्णं धििधतुः शरेः 

जरासंध वचमेका प्रयत्न करता ही रह गयाःर्वित॒ परा- 
क्रमी श्रीकृप्णने रणभूमिमे उसके घोडोको भी मार दाला । 
उसे संक्रमे पडा जान महारथी चित्रसेन तथा सेनापति 
कैरिक्र दोना था पर्हुचे ओर श्रीकृष्णको अपने वार्णोदयारा 
ध्रायठ करने ल्मे | ८४४ ॥ 
भरिभिर्विध्याध संलक्तं वदेवं च कैडिकः ॥ ८५॥ 
वरूदेवो धनुश्चास्य भट्टेनाजौ द्विधाकरोत्‌ । 
जवेनाभ्यर्दयव्वापि तानरीर्छस्वृष्टिभिः ॥ ८६॥ 

कैरिकने लगातारतीन बाणेति बखरामजीको रबी दिया । 
तव ब्रल्यमने भी एक भव्छ मारकर युद्धम उके धनुपकरे 
दो इकडे कर डके | साथ दी वेगपूर्वक वार्णोकी वर्था करके 
उन तीनों शन्रुओंको पीडित कर दिया ॥ ८५-८६ ॥ 
बहुभिर्बहुधा वीरान्‌ समन्तात्‌ सख्णैभुपणेः 
तं चिच्नसेनः खंरच्यो विन्याध नवभिः शरेः ॥ ८७ ॥ 
केरिकः पञ्चभिश्वापि जरासंधश्च सक्तभिः। 

उन्दोनि बहुतसे खणभूप्रित बाणोदारा उन वीर्सोको सव 
ओरते ब्रारंवार धाय किया । तवर क्रोध भरे हए चिन्रसेनने 
नी, कैमिकने पोच तथा जरासंधने सात गराणेसि उनको क्षत- 
विक्षत कर दिया ॥ ८७१ ॥ 
भिभिल्िभिश्च नासचेस्तान्‌ विभेद जनार्दनः ॥ ८८ ॥ 
पञ्चभिः पञ्चभिश्चैव वर्देवः दितेः हारः । 

यदह देख भश्रीक्रप्णने तीन-तीन नाराचसि उन तीर्नोको वेध 
डाल । फिर वख्देवने भी पचिर्पोच पैने बार्णेसि उन सवक 
घायर कर दिया ॥ ८८२ ॥ 
स्थं चैवास्य चिच्छेद्‌ चिचसेनस्य वीर्यवान्‌ ॥ ८९.॥ 
चङ्देवो धचुश्चास्य भव्डटेनाजो द्विधाकरोत्‌ । 

इसके वाद पराक्रमी बलरामने चित्रसेनके रथकरे टुकडे- 


टकडे कर दिये तथा एक भल्छ मारकर युद्धस्थल्मै उसके 
धनुषे मी दो खण्ड कर डले |८९१॥ 


श्रीमहाभास्ते सिरभागे 


[ हरिवः 


स च्छि्नधन्वा धिरथो गदामादाय यीयेवान्‌ ॥ ९० ॥ 
अभ्यधावत्‌ छुस्ररव्धो जिघांस सखायुधम्‌ । 
धनुर ओर स्थकरे नष्ट द्यो जनेपर येपर्मे भस हुमा 
पराक्रमी चित्रसेन मुसखूधारी ब्टरामको मार डाटनेकी इच्छा- 
से हाथमे गदा लेकर उनकी ओर्‌ दीडा ॥ ९०१ ॥ 
सिखक्चतस्तु  नाराचांश्ि्रसेनवधैपिणः। 
धटुश्िच्छेद्‌ रामस्य जरासंधो मदहावखः ॥ ९१॥ 
, यद्‌ देख व्रल्याम चि्रसेनके वधकी दन्छासेि उसप्र 
नारार्चोकी बृष्टि करमे स्तरो । इतनेदीम मदावली जरासंधने 
चलरामजीके धनुपकरो क्राट दिया ॥ ९१ ॥ ` 
गद्या च जघानाश्वान्‌ क्रोधात्‌ स मगधेश्वरः । 
रामं चाभ्यद्रवद्‌ वीये जसासंधो मदावः ॥ ९२ ॥ 
साय दी क्रोधपूर्वक गदाका प्रदयार करके मदाव्रटी वीर 
मगधराज जयसंधने उनके घोर्डोको कार्करे गामे मेज द्वियाः 
फिर वरलरामपर भी धावा करिया | ९२ ॥ 


आद्राय मुखं रामो जरासंधमुपाद्रयत्‌ । 
तयोस्तद्‌ युद्धमभवत्‌ परस्परवधैषिणोः ॥ ९३॥ 
व्रलरामजी भी मूल लेकर जगमंधपर ट पड़े । एक 
दूसरे वधकरी इच्छावले उन दोनो वीररि धोर युद्ध 
हने द्या ॥ ९३ ॥ 
चित्रसेनस्तु संसक्तं षट रामेण मागधम्‌ । 
रथमन्यं समारुह जरारसंधमवास्यत्‌ ॥ ९४ ॥ 
उधर चित्रसेन मगधराजको वटरामजीकरे साथ उलन 
हुमा देख दूसरे रथपर चट्कर था गवा ओर जरसंधकरो 
लडनेसे रोकने ख्गा | ९४॥ 
ततो येन महता गजानीकेन चाप्यथ । 
उभयोरन्तरे ताभ्यां संकुखं समपयत ॥ ९५॥ 
तदनन्तर वद्‌ वि्नाक गजतेनाके साथ जरासंध ओर 
वररामके ब्रीच आ गया ओर उन दोनो भादयेकि साय 
धोर युद्ध करने लगा ॥ ९५ ॥ 
ततः सैन्येन महता जराखंघो.ऽभिसंश्नतः। 
रामङूप्णाध्रगान्‌ भोजानाससाद्‌ महावर; ॥ ९६॥ 
तव्र विशाट सेनासे धिरा हुआ मदावरी जरासंध बल- 
राम ओर श्रीङृण्णके अग्रगामी मोर्जोपर जा चदा ॥ ९६ ॥ 
तत्र॒ श्रक्षुभितस्येच सागरस्य मदाखनः। 
परादुर्वभूव तुमुखः सेनयोरुभयोरपि ॥ रजो 
फिर तो वरहो उमय प्रकरी सेना्थमि विष्ठुन्ध महासागसके 
समान व्ड़ी भयंकर एवं भारी गर्जना सुनायी देने र्गी ॥ ९७॥ 


वेणुभेरीरदड्ानां शाद्भुनां च॒ सहखशः 
उभयोः सेनयो राजन्‌ प्रादुरासीन्मह्यखनः ॥ ९८ ॥ 


विष्णपवं ] 


पट्‌त्रिशोऽष्यायंः 


~~ 


राजन्‌ ! दोनो सेनाओंमे वेणु, भेरी, मृदङ्ग ओर शद्ध 
आदि सदो वायोका महान्‌ घोष होने ठ्गा ॥ ९८ ॥ 
. क्वेडितास्फोरितोक्छष्टेस्तमुखः स्वेतोऽभवत्‌। 
उत्पपात रजश्चापि खुरनेमिसमुद्धतम्‌ ॥ ९९॥ 
योद्धाओंके गर्जनेः तार ठो्ने ओर उच खरसे पुकारने 
आदिके कारण वर्ह सव्र ओर वुल ध्वनि छ गयी । घोड़ो 
की यपो ओर रथक्े पदियोके प्ान्तमागसे उटी हुई धूल 
सव्र ओर उड़ने लगी ॥ ९९ ॥ 
समुयतमहाशसखाः प्रगरहीतश्चरासनाः । ` 
 अन्योन्यमभिगर्जन्तः शुरास्तजावतस्थिरे ॥१९००॥ 
` +उमयपक्षके शूरवीर सैनिक बड़े-बड़े श उटये, धनुष 
ल्ि एक दूसरके सम्मुख गजना करते दए युद्धसयल्मे उटे 
हुए थे ॥ १००॥ 
रथिनः सादिनश्चैव पत्तयश्च सहसरद्णः। 
गजाश्चातिबलास्तत्र समुत्येतुः समन्ततः ॥१०९॥ 
उस युद्धम खव ओर रथीः शुडखवार सखो पैदर तथा 
अत्पृन्त चर्छाटी गजराज एक दूसरेषर टे पढ़ते थे ।१०१। 
स ` संनिपातस्तुमुटस्त्यक्त्वा भराणनवर्तत । 
वृष्णिभिः सह योधानां जसयसंधस्य दारूणः ॥१०२॥ 
वृष्णिर्योके साथ जरासंधके योद्धार्जका वह घमासान युद्ध 
प्रा्णोका मोह छोड़कर हो रहा था ओर भयानक रूप धारण 
करताजारहाथा|॥ १०२॥ 
ततः शिनिरनाधृष्टिविश्चर्विपृथराहुकः 
बङदरेचं पुरस्कृत्य सेन्यस्याद्धन ं्चिताः ॥१०२॥ 
दक्षिणं पक्षमासेदुः शच्ुसेन्यस्य भारत । 
मरतनन्दन | तदनन्तर शिनिः अनापृष्टिः वभ्र॒ (अक्रूर); 
विपु ओर आहुक ( उग्रसेन }--इन सवने वख्देवजीको 
आगे "रखकर अपनी आधी सेनासे पिरे रहकर रातुर्ओकी सेना 
के दिण भागपर आक्रमण क्रिया | १०३१ ॥ 
पालितं चेदिराजेन जरासंधेन चा विभो ॥१०४॥ 
उदीच्यैश्च मदावी्यँः शस्यद्ास्वादिभिरपैः 
खजन्तः शरवपौणि समभित्यक्तजीवितः ॥९०५॥ 
प्रभो [ उस भागक्री रधा चेदिराज चिद्पालः जरासंध 


तथा उत्तर दिदशाकरे महापराक्रमी योद्धा शस्य ओर शास्वं 
आदि नरेश कर रदे थे । याद्वन जीवनका मोहं ,छोड्कर 
शन्ुओपर बाणव्षां आरम्म कर दी ॥ १०४-१०५ ॥ 
अवगाहः पृथुः कङ्कः शतद्युम्नो विदुस्थः। 
हृषीकेशं पुररछत्य सेन्यस्याद्धेन दंरिताः ॥१०द॥ 

गोष सेनाके आये भागते धिरे हुए अवगाहः पृथु कङ्कः 
शतदयुम्न ओर विदूरथ आदि वीरोने भगवान्‌, श्रीङम्णको अगि 
रखकर रातुसेनाके वामभागपर आक्रमण क्रिया ॥ १०६ ॥ 
भीप्मकेणाभिगुत्तश्च रुक्मिणा च मदात्मना । 
देवकेनापि राजेन्द्र॒ तथा मद्धेभ्वरेण च ॥१०७॥ 
ाच्यैश्च दाक्षिणव्येश्च गुश्चचीयंवलान्वितेः 
तेषां च युद्धमभवत्‌ समभित्यक्तजीवितम्‌ ॥ १०८॥ 
दक्त्युिपासवाणोघान्‌ खजतामश्तनिसनान्‌ । 

राजेन्द्र | वह माग भीष्मकः सदटामना रुक्मीः दवकः 
मद्रयज शल्य तथा गुप्त वल-पराक्रमसे सम्पन्न पूर्वं ओर दक्षिण 
दिशाके वीरि सुरभित या । इन्दं सत्र सोगोमे जीवनका 
मोह छोड़कर युद्ध होने ख्गा । ये रोग व्रिजलीके समान गड्- 
गड़ाहट पैदा करनेवाले शक्तिः ऋष्टि, प्रास तथा बाणसमूहो- 
की वर्षा करते थे ॥ १०७-१०८१ ॥ 
सात्यकिंश्चि्रकः इयामो युयुधानश्च बीर्यवान्‌ । 
राजाधिरैवो दुरः दवफरकश्च महारथः ॥१०९॥ 
सजाजिच प्रसेनश्च बलेन महता वृताः 
व्यूहस्य पुच्छं ते सवं भ्तीयुदविपतां सधे ॥११०॥ 
व्यूहस्याद्ध  समासदुखेदुरेणाभिरक्षिताः 
राजभिश्चापि वहुभिर्वेणुदारिसुखैः सद ॥१११॥ 

सात्यकिः चिचक, इयामः पराक्रमी युयुधान, राजाधि- 
देक गदर महारथी श्वफस्कः सत्राजित्‌ ओर प्रसेन--दन 
सवने विद्या सेनासे धिरकर युद्धसखल्मे रातु स्पूह्के 
पुच्छभागपर आक्रमण क्रिया । मृदुरतसे सुरक्षित रहकर 
इन्दौने भ्यूहफे आधे नागपर धावा वो दिया था; उस 
समय इनका वेणुधारि आदि वहुत-से राजाओकरे साथ युद्ध 
हुआ ॥ १०९१९११ ॥ 


इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिविं्े विष्णुपर्वणि मथुरोपरोधे युद्धवर्णने पच्चव्रिशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥ - 
र्य प्रकार श्रीमहाभारते किकमान हरिवंशे अन्तर्म विष्णुप्वमे जससंधक्रा मथुरापर चस ओर दोनो 
पष्ठ योदधाभकि युद्धका वणेनविषयक पतीस मध्याय पूरा हु ॥ २५ ॥ 
नत~ 


षट्विशोऽध्याय 
बृष्णवया तथा जरासंधके सानकक्रि युद्ध, वरराम अरर जरासधक्ा गद्‌ युद्ध 
तथा जरासधका पयञजत हकर पटायनं करना 


वेजम्पायन उवाच 
ततो युद्धानि वृष्णीनां बभूवुः सुमहान्त्यथ । 
मागघेस्य महामतरेरैवेश्चेवादुयायिभिः॥ १ ॥ 


(~ १ 

वेदास्पायनजी कहते ह--जनमेजय ! तदनन्तर 
जरासंध मदावर्तौ ओर अकृगामी नरेशेकि साय दृष्णिवंरिर्यौ- 
के कदं बड़े-वडे युद्ध हए ॥ १ ॥ 


॥। 


९७४ ; 


सक्मिणा वासुद्रेवस्य भीप्मक्रेणाहुकस्य च । 
क्रयेन वसुदेवस्य कैशिकस्य तु चश्रणा॥ २॥ 
गदेन चेदिराजष्य॒दन्तवक्तरस्य शङ्कुना । 
तथान्येर्चष्णिवीसणां सृपाणां च महात्मनाम्‌ ॥ २ ॥ 
युद्धमासीद्धि सैन्यानां सैनिकरभ॑रतषभ । 
अदानि पञ्च चेकं च षट्‌ सघत च दारुणम्‌ ॥ ७ ॥ 
भरतश्रेष्ठ ! सक्मीकरे साथ वासुदेव श्रीक्ष्णका, भीप्मक- 
के साय अहक (उग्रसेन ) काः क्रथकरे साथ चसुदेवकराः 
चभ्रु (अक्रूर ) के साथ कैशिकका; गदके साथ चेदिराज 
शिदयपाठ्काः शंकु साय दन्तवक्तवकरा तथा अन्य सैनिरकोकि 
साथ ब्ष्णिङ्ुरके महामना वीर नसे्तोकाः सार्य यह कि 
उभय पक्षके सैनिकोका प्रतिद्न्द्री सैनिकौके साथ दारुण 
दन्द युद्ध होने खगा, जो सत्तू दिर्नौततके चरता 
रहा ॥ २-४ ॥ 
गैगजा हयैरभ्वाः पदाताश्च पदातिभिः। 
रथे रथा विमिश्राश्च योधा युयुधिरे चप॥ ५॥ 
नरेश्वर । हाधि्येषि हाथी; धोडि घोडे पैदरोसे पैदक 
ओर रथोते रथ मिश्रित हो गये ओर इख प्रकार धोरू-मेऊ 
कर समी योद्धा विपक्षियेकि साथ युद्ध कसे स्मे ॥ ५॥ 
जरासंघस्य नृपते रामेणासीत्‌ समागमः । 
महेन्द्रस्येव ध्रत्रेण दारुणो सोमदहषेणः॥ ६ ॥ 
राजा जरासंधका वरूरामजीके साथ उसी प्रकार दारुण 
एवं रोमाञ्चकारी संघप॑ं हुआ, जैसा दृ्रासुरफे साथ देवराज 
इन्द्रका हुमा था ॥ ६ ॥ 
अवे्य खकिमर्णी ष्णो सकिमिण'न म्यपोथयत्‌ । 
ज्वलनाकादयुसंकादानाखीविपविषोपमान्‌  ॥ ७॥ 
चार्यामास ष्णो वै शरांस्तस्य तु रिक्षया । 
सविमणीके साथ भविष्यमे होनेवाटे सम्बन्धको टष्टिमि 
रखकर श्रीकृष्णने सवमीको नहीं मारा, उसकी ओरसे 
आनेवठे अग्नि ओर सूर्यकी क्रिरणोके मान तेजखी तथा 
विघधर सुपेकि समान विषैले ब्रार्णोका उन्हनि अपनी रिष्चके 
बख्ते निवारण कर दिया ॥ ५१ ॥ 
दस्येषां खुमदहानाखीद्‌. वरोघानां परिक्षयः ॥ < ॥ 
उभयोः सेनयो राजन्‌ मांसरोणितक्वमः। 
राजन्‌ | इस प्रकार दोनों सेनाओके सैनिक्रसमूहोका 
महान्‌ विना हुआ । वरहो रक्त ओर मासिकी कौच 
जम गयी | ८<‡ ॥ 
कवन्धानि समुत्तस्थुः खुबहनि समन्ततः ॥ ९ ॥ 
तस्मिन्‌ विमर्द योधानां संख्याघ्रचिकराणि च । 
योद्धाकरि उस महान्‌ सदार चारो ओस्े व्हुत-से 
कव्रन्ध उठने स्मे जिनकी गणना नहींकी जा स्क्ती 
थी| ९३ ॥ 


श्रीमहाभारते खिरभागे 


| [ हरिवंशे 


रथी रामो जरासंधं रारेरदैविपोपमेः ॥ १०॥ 
आब्रण्वन्नभ्ययाद्‌ वीरस्तं च राजा स मागधः 1 
अभ्यवर्तत वेगेन स्यन्दनेनाद्युगामिना ॥ ११॥ 
रथारूढ वीर वटरामने विषधर सर्पेके समान भयंकर 
वार्णोदारा जरास्तंधको जच्छादित कसते दए उसपर आक्रमण 
करिया तथा मगधराज भी अपने शीघ्रगामी स्थाय बडे वेगसे 
उनका सामना करनेके ल्ि आ पर्हुचा ॥ १०-११ ॥ 
अन्योन्यं वि्िधेरखर्विद्ष्वा विद्ध्वा विनद्‌तुः ¦ 
तौ क्चीणशखोौ चिरथौ हताग्वे हतसारथी ॥१२॥ 
गदे गृदीत्या विक्रान्तावन्योन्यमभिघावताम्‌। 
पे दोनो नाना प्रका यचोदास एक दूसरेको धाय, 
करके जोर-नोरसे गरजते थ । दोन अलल भीषण हलो 
गये, दोनों ही स्थहीन हे यये तथा दोनेक्रे दी घोडे अर 
सारथि मरे गये ] उस दामे वे दोर्नौ परक्रमी योद्धा गदा 
हाथमे लेकर एक-दूसरेपर ट पडे ॥ १२३ ॥ 


कम्पयन्तौ सुवं वीरो ताड्यतगदाुभौ ॥ ६२३॥ 
ददृशाते मदात्मानौ गिरी सशिखराविव । 
हाथमे गदा उठये वे दोर्नो महामनस्वी वीर पृरथ्वीको 
कम्पित करते हुए वहो एक-एक शिखरे दो पर्वेतौकरे समान 
दिखायी देते भ ॥ १३१ ॥ 
व्युपारमन्त युद्धानि परयता तौ मदहासुजो । 
संरन्धावभिधावन्तौ गदायुद्धेपु विश्रुतौ ॥ १६॥ 
उन दोनों महाबाहू वीरयँक्रो युद्धे च्वि उद्यत देख 
दूसरे योद्धाओैके युद्ध वंद हो गये । उन दोर्नोकी गदायुद्धमे 
ख्याति थी । वे दोनो वड़े रोपमे भरकर एक-दूसरेपर धावा 
करते थे ॥ १४ ॥ 


उभौ तो परमाचार्यौ रोके ख्यातो महावलौ । 
मत्ताविव गजौ युद्धे तावन्योन्यमयुध्यताम्‌ ॥ ९५ ॥ 
वे दोनो महावटी वीर संसारम गदायुद्फे उत्तम 
आचार्यक रूपमे विख्यात ये तथा जैत्े दो मतवाले हाथी 
र्डते दैः उसी प्रकार रणमूमिने वे एक-दूसरे चाथ जज्ञ 
रदे थे ॥ १५॥ 
ततो देवाः -सगन्धवीः सिद्धाश्च समदषयः। 
समन्ततश्चाप्सरसः समाजग्मुः सहस्रशाः ॥ १६ ॥ 
उस समय गन्धर्वो्हित देवताः सिद्धः महपि तथा 
सदसो अप्रा सव्र ओरसे उस युद्धको देखमेके व्यि आ 
परटुचीं ॥ ६६ ॥ 


. तद्‌ देवयक्षगन्धर्वमहर्पिभिरटंदृतम्‌ । 


ध्द्यभेऽभ्यधिक्रं राजन्‌ दिवं ज्योतिर्गभैरिव ॥ १७॥ 
अभिदुद्राव रामं तु जससंधो महावलः 
सन्यं मण्डरूमाध्ित्य वख्देवस्तु दक्षिणम्‌ ॥ १८॥ 


। 


५ 


विष्णुपर्व ] 


राजन्‌ ! देवतार्ओ, यक्षो; गन्धर्वो ओर मदर्ियोषि 
अकत हया. ्ाकाशका वह भाग नक्चत्रसमूहौँषे विभूषित 
हुम-खा अधिक शोमा पाने ख्गा | महावली जयसंघ वारे 
वैतरा देकर बलरामीकी ओर दौड़ा ओर वरगमजीने 
दाहिनेसे उखुपर अक्रमण किया ॥ १७-१८ ॥ 
्रहरन्तौ ततोऽन्योन्यं गदायुद्धविकारदौ । ' 
हृन्ताभ्यामिव मातङ्गो नादयन्तौ दिन्नो दश्च ॥ १९॥ 
गदानिपातो रामस्य श्ुशवुवेऽदानिनिःस्वनः। 
जरासंघस्य च रणे पर्वतस्येव दीर्यतः ॥ २०॥ 
गदायुद्धे कुल वे दोनों वीर दसं दिशार्जको निनादित 
करते हुए एक दूसरेपर उसी प्रकार प्रहार करने रगे, जैसे 
दो मतवाले हाथी परस्पर दतिंसि आघात करते हँ । बरुयमजी 
जव गदाका आपात करते, तव वञ्रपातकरे समान भयानक शब्द 
खनायी पडता था तथा रणभूमिमे जरासंधके गदाघातसे एेसी 
आवाज होती थीः मानो कोई पव॑त फट पड़ा हो ॥१९-२०॥ 
न स्म कम्पयते रामं जरासंधकरच्युता । 
गदा गदशरतां श्रेष्ठं विन्ध्यं गिरिमिवानिकः ॥ २९॥ 
रामस्य तु गदावेगं वीयौत्‌ स मगधेश्वरः । 
सेदे धेयेण महता शिक्षया च व्यपोदयत्‌ ॥ २२ ॥ 
जेते प्रचण्ड वायु विन्ध्यपर्वतको नहीं हिला सकती, उसी 
प्रकार जरासंधके हाते चटी हई गदा गदाधारिर्यमि शेष 
वर्रामजीको कम्पित नहीं कर पाती थी । चल्रामजीकी गदाके 
वेगको मगधराज जरासंध अपने वर्की अधिकतक्रे कारण 
महान्‌ धैर्यके साथ सह केता था तथा अपनी शिक्षाके 
द्वार उनके म्रहारको व्यर्थं कर देता था ॥ २१-२२॥ 
पवं तौ तत्र संद्रामे विचरन्तौ मावली । 
मण्डलानि विचिघ्राणि विचेरतुररिदमो ॥ २३॥ 
इस भ्रकार रात्रुओंका दमन करनेवारे वे दोन महाबली 
योद्धा उस संग्राममे विचित्र पतर दिखाते हुए विचर रदे थे॥ 
व्यायच्छन्त चिर कारं परिश्रान्तौ च तस्थतुः । 
समाश्वस्य सुहतं॑तु पुनेरन्योन्यमाहताम्‌ ॥ २४ ॥ 
देर्तक परिश्रम करके थक जामेपर दोनो खडे हो जाते 
थे; फिर दो घड़ीतक्र सुस्ताकर एक-वुसरेपर प्रहार करने 
लगते ये ॥ २४॥ । 
पवं तो योधसुख्यौ तु समं युयुधतुधिरम । 
न च तौ युद्धवेसुख्यसुभावेव प्रजग्मतुः ॥ २५॥ 
इख प्रकार वे दोनों प्रमुख योद्धा समानमावसे देरतक 
ल्डते रदे } वे दोनो ही युद्धे विशु नदीं हुए ॥ २५ ॥ 
 अथापद्यद्‌ गदायुद्धे विरेषं तस्य वीर्यवान्‌ । 
रामः छद्धो गदां त्यक्त्वा जघ्राह सुसरोत्तमम्‌ ॥२६॥ 
तदनन्तर पराक्रमी वलरामजीने जव गदायुद्धमे जरासंधकी 


न 


षट्त्रिशोऽध्यायः 


न्नव 
नन्व 


* विशेषता देखी, तत्र उन्दनि कुपित हो गदा प्यागकर उत्तम 


२४५ 


मूसक हाथमे लिया ॥ २६ ॥ * ˆ ` 
तमुद्यन्तं तदा मुसलं धोरदश्चेनम्‌ । 
अमोघं वरवन धेन त॒ महारणे ॥ २७॥ 
ततोऽन्तरिक्षे बागासीत्‌ खुखया लोकसाक्षिणी। 
उवाच बरुदेवं तं समुद्यत ङायुधम्‌ ॥ २८ ॥ 
उख महासमर कुपित हूए वल्देवजीके द्वारा उस भर्यानक 
तथा अमोष मूसल्को उठाया जाता देख आकाशमे सव रोगे 
सामने खष्ट शब्दों देववाणी सुनायी दी । उसने हठ.मूषछ 
उटाये हुए बल्देवजीसे कदा--॥ २७-२८ ॥ 
न त्वया राम वध्योऽयमलं सेदेन मानद्‌ । 
विदिवोऽस्य मया शत्युस्तस्मात्‌ साधु व्युषारम। 
अचिरेणेव काडेन भ्राणांस्त्यस््यति मागधः ॥ २९ ॥ 
'दूसरोको मान देनेवाले बररामजी ! जरासंधका वध 
आपके हायते होनेवाला नहीं दै; अतः खेद, करनेकी 
आवश्यकता नहीं है । इसकी मूत्युका दे सन्ने विदित हो 


' गया है; अतः आप इसे मारेको चेष्टसे निघ्रृत्त दौ जादये । 


मगधराज जरासंध थोड़े दी समयम अपने प्रार्णोका पस्याग 
करेगाः ॥ २९ ॥ 
जरासंधस्तु तच्छुत्वा विमनाः समपद्यत । 
न प्रजहे ततस्तस्मे पुनरेव दरायुधः ॥ २०॥ 
यह सुनकर जराघंधका मन उदाद हो गया ओर 
चलरामजीने फिर उसपर प्रहार नदीं किया ॥ ३० ॥ 
तौ व्युपारमतां युद्धे चृष्णयस्ते च पाथिवाः। 
असक्तमभवद्‌ युद्धं॑तेषामेवं खदारूणम्‌ ॥ ३१ ॥ 
दीर्घकालं महाराज निघ्नतामितरेतरम्‌ । 
अव वे दोनो युद्धसे विरत हयो गये; फिर तो वृष्णिवंशी 
योद्धा तथा दुसरे राजानि भी युद्ध वंद कर दिया । महाराज | 
इस प्रकार दीर्धकारतक एक-दूसरेपर प्रहार करते हुए उन 
योद्धाओंका जो अत्यन्त भयंकर युद्ध अविराम गतिसे चरता ` 
आ रहा थाः वह्‌ शन्त दो गया ॥ २३११ ॥ 
पराजिते त्वपक्रान्ते जरासंधे महीपतौ ॥ ३२॥ 
अस्तं याते दिनकरे नायुसस् स्तदा निशि । 
राजा जरासंध जव परास्त होकर युद्धसे हट गया ओर 
सूदे अस्त हो गये» तव रातके खमय यादवेनि फिर उसकां 
पीछा नदीं किया ॥ ३२६ ॥ 
समानीय स्वकं सैन्यं छन्धलक्ष्या महाबलाः ॥ २२ ॥ 
पुछ प्रविविशुः केदावेनाभिपाछिसाः। 
मगवान्‌ श्रीकृष्णदास सुरक्षित महावली यादव अपने 
क्षयम खफल हो चुके ये, अतः वे अपनी सेनाः साथ ठेकर 
बड़ी प्रसन्नतके साय मथुरापुरीम लोट आये ॥ ३६३१ ॥ 


चेध्द , 
खाच्च्युतान्यायुघान्येवं तान्येवान्तर्श्ुत्तदा ॥ ३४॥ 
जयसंधोऽपि चपतिर्धिमनाः खपुर ययो 
राजानश्चालुगा येऽस्य खर्राण्येव ते ययुः ॥ ३५ ॥ 
इखी तरह आक्रादय,या दिव्य लोकसे जो आयुध आये 
ये, वे भी तत्का अन्तर्धान दो गये । इधर राजा जरासंध 
मी उदास दोकर अपनी पुरीकरो टोट गया । उसके साथजो 
राजा रोग अयि ये, वे भी अपने-अपने राको दी टोट गवे॥ 
जरासंधं तु ते जित्वा मेनिरे नेव निर्जितम्‌ । 
चृष्णयः कुरुदादुंख राजा दयतिवलः स चे ॥ ३६॥ 
कुश्श्रे् ! इृणिर्वंशी वीर जरासंधको जीतकर भी उसे 
हारा दुआ नहीं मानते ये; क्योकि उस राजाक्रे पास व्रहुत 
वदी सेना थी तथा वह खयं भी अत्यन्त वृल्याटी था | 
दश्च चाण्ौ च संध्रामाञ्जराखन्धस्य यादवाः । 
दुन चैनं समरे हन्तुं शेकु्॑हावखाः ॥ ३७॥ 
महावखी यादर्वोनि जरसंधको अठारह वार युद्धका अवक्षर 


श्रीमहाभरते लिमा 


[ ्रिविंदो | 


प्रदान करिया; क्रतु वे किसी भी सममे उसेमारनस्फे॥। 


अक्षौदिण्यश्च तस्यासन्‌ विररातिश्च मदीम्ते। | 
जससन्धस्य भ्रृपतेस्तदथ याः समागताः ॥ ३८ ॥ 

मदामते | राज! जरासंधफरे पाठ वीस अप्नौदिणीसेनार्णर्थीः ' 
जो उसके व्यि ठ्डनेको आग्री थीं ॥ ३८ ॥ 


यट्पत्वादभिभूतास्तु चृण्णयो , भर्तपभ । 
वार्दद्रधेन राजेन्द्ध राजभिः खदहितेन पे ॥ २९॥ 
मरतशरे्ठ ! राजेन्द्र ! दृष्णिवंशी वीर संख्यार्मे बेद्रत 
कम ये; इसय्यि वे राजाओंतदित जरासंधसे अभिभूत दो 
जते ये ॥ ३९ ॥ 
जित्वा तु मागधं संख्ये जरासन्धं मदीपत्तिम्‌ । 
वि्टरन्ति स सुखिनो वृष्णिसिहा महारथाः ॥ ४०॥ 
मगधक्रे राजा प्रथ्वीपति जयरासंधको इस रकार युद्धम 
जीतकर बृप्णिवंदके सिंह-जैसे पराक्रमी महारथी सुखपूर्वक 
वरदा विहार कणे खे ॥ ४० ॥ 


इति श्रीमहाभारते खिरभागे हिंद विष्णुपर्वणि जरासंघापयानं नाम पट्रिशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥ 


दस प्रकार श्रौमहाभःसतके दिमाग हरिवंशके अन्त्र विष्णुपर्व जरसधका 
पसयनव्रिषयक छन्ती; अध्याय पुरा हुता । ६ ॥ 


+ 


सपतत्रिरोऽध्यायः । 
जरासंधके पुनः आक्रमणसे शङ्कित यादर्वोकी सभाम पिकटुका भाषण--राजा . : 
` दहयश्चका चि तथा उनसे यदु एवं यादर्बाकी उत्पत्तिक्रा वणन 


वै्यम्पायन उवाच 
स कृष्णस्तत्र वरवान्‌ रौहिणेयेन संगतः 
मथुरां यादवाकीर्णां पुरी तां खखमावसत्‌ ॥ १ ॥ 
वेरम्पायनजी कते है--जनमेनय } मदावदी 
भगवान्‌ श्रीकष्ण रोदिणीकरुमार वख्देवजीके साथ मिलकर 
यादवेसि भरी दुई उस मथुरापुरीमं सुखपूर्वक रहने ख्ये ॥ १॥ 
प्रात्तयौवनदेदस्तु युको रजध्िया विसुः। 
चचार मथुरां प्रीतः सवनाकरभूपणाम्‌ ॥ २ ॥ 
उनके श्रीयद्धौमि योवनावस्ाका प्रवेश हा था | वे 
भगवान्‌ राजोचित रोभासे सम्पन्न हो वन-प्रान्तसे विभूषित 
मुरा प्रसन्नतापूर्वक विचरते थे ॥ २॥ 
कस्यचित्‌ त्वथ कालस्य राजा राजगेश्वरः । 
सस्मार निहतं कसं जरासंधः प्रतापवान्‌ ॥ ३ ॥ 
कुख कालकरे यनन्तर राजग्रफे स्वामी प्रतापी राजा 
जयासंधने कंसंफे मारे जानेकी ध्रटनाको फिरसे स्मरण किया ॥ 


युद्धाय योजिवो भूयो इुदिदभ्यां मदीपतिः। 


दलन सप्त च सं्रामाञ्चससंधस्य यादवाः ; 
ददुरन .चेनं समरे दन्तं रोकुर्महारथाः ॥ ४ ॥. 
उसकी दोन कन्यार्थनि पुनः उसे युद्धफे व्यि उत्साहित 
किया | यादर्वोने जरासंधको क्रमद्रः सत्रह वार युद्धका अवसर * 
दिया; परंतु वे महास्थी यादव समरभूमिमे उसे मारन स्के ॥ 


ततो मागधराटर्‌ श्रीरमाश्चतुरह्ववदयान्वितः । 
भूयोऽप्य्ठादशं कर्तं संग्रामं स समारभत्‌ ॥ ५ ॥ 
तदनन्तर श्रीमान्‌ मगधराजने चठुरद्चिणी सेनको साय 
लेकर फिर अटारहवीं बार यादवोके साथ युद्ध -करनेका 
आयोजन करिया ॥ ५॥ 
वेलक्ष्यात्‌ पुनरेवासौ राजा राजेश्वरः । 
जरासंधो वरी श्रीमान्‌ पाकशासनयिक्रमः ॥ £ ॥ 
राजगृहका स्वामी वलवान्‌ राजा श्रीमान्‌ जरासंध इन्द्रके 
समान पराक्रमी था । उसने पहटेकी पराजयसे क्ला- 
का अनुभव करके कारण पुनः युकी तैयारी की ॥ ६ ॥ 
स साधनेन महता बृददथसुतो वली । 
कृष्णस्य वधमन्विच्छन्‌ भूयो वैं संन्यवतंत ॥ ७ ॥ 


१ 1 


विष्णुपवं 1 


सप्ततरि्लोऽध्यायः 


2३७७ 


वृद्रथका वह वलवान्‌ पु महान्‌ साधनते सम्पन्न हो 
श्रीकृष्णा वध चाहता हुआ फिर मथुरापुरीकी योर लेय ॥ 
तं श्रुत्वा सहिताः सवं निदत्त मगघेश्वरम्‌। 
यादु्रा मन्नरयामाखुजससंधभयादिताः ॥ ८ ॥ 

मग्रधराजको पुनः लीय हुभा सुनकर जरासंध भयसे 
पीडित हुए सवर यादव एक साथ वेढकर मन्त्रणा करने रगे ॥ 


ततः प्राद महातेज  विकट्ुनेयकोषि 

कृष्णं कमरपन्राक्चमुघ्रसेनस्य श्धण्वतः ॥ ९ ॥ 
उस समय नीतिकरुशर महातेजसी विकरद्ुने उग्रसेनके 

सुनते हुए कमलनयन श्रीङृष्णते कदा--] ९ ॥ 

श्रुयतां तात गोविन्द कुलस्यास्य समुद्धवः। 

श्रुयतामभिधास्यामि प्राप्तकालमहं ततः । 

युकं चेन्मन्यसे साधो करिष्यसि वयो मम ॥ १०॥ 
प्तात ¡ गोविन्द 1 इस ऊुखकी उत्पत्निकरा प्रसंग सुनो 

इसके च्य उपयुक्त अवसर आया है, इल्यि वता रहा दः 

ध्यान देकर श्रवण करो । साधो | इसे सुनकर यदि उचित 

समञ्चो तो मेरे कथनानुखर कायं करना | १० ॥ 


यादवस्यास्य वंशस्य समुद्धवमरेषतः । 
यथा मे कथितः पूं ग्यासेन षिदितात्मना ॥ ११॥ 
,“यादववंशकी इस उत्यत्तिका सारा प्रसंग आत्मान 
नि पूव॑काल्मे मुञ्चे जैसा वरताया था; वैसा ही सुना 
॥ ११॥ 


आसीद्‌ राजा मनोर्वशे श्चीमानिक्ष्वाङसम्भवः 

हयश्च इति विख्यातो महेन्द्रसमविक्रमः ॥ १२॥ 
'वेवस्वत मनुके वंशम इश््वकरुके पुत्र हर्यश्व नामसे 

विख्यात एक श्रीसम्पन्न राजा हो गवे दै, जो मदेन््रके वल्य 

पराक्रमी ये ॥ १२॥ | 


तस्यासीद्‌ दयिता भायौ मधोदेत्यस्य वै खता 1 

देवी मधुमती नाम यथेन्द्रस्य र्यी दथा ॥१३ ॥ 
भ्मधु नामक देत्यकी पुनी मधुमती देवी उनकी प्राण- 

प्यारी भायां थी । जेते इन्द्रको इची प्रिय दैः उसी प्रकरार 

हयश्वको मधुमती प्रिय थी | १३॥ 


सा यौवनगुणोपेता रूपेणाप्रतिमा भुधि। 
मनोरथकरी राक्ञः प्राणेभ्योऽपि गरीयसी ॥ १४॥ 

यौवने गुते समयन्न थी । इस परश्वीपर उसके 
रूप सोन्दर्यकी कीं ठ॒टना नदीं थी । वह राजा हर्यश्व 
मनोर्थको सिद्ध करनेवाखी दानेके कारण उन्हे प्राणोसे भी 
अधिक माननीया थी ॥ १४॥ 


दानवेन्द्रङ्के जाता सुश्रणी कामरूपिणी । 
पकपलीव्रतधरा सेचय रोहिणी यथा ॥ १५॥ 


'दानवराज मधुकरे कुलम उतपन्न हुई वह सन्दर कटि- 
प्रदेदावाटी कामरूपिणी देवी रोदिणीे समान एकपलीततका 
पाटन करनेवाी तथा आकारे विचरनेवाली थी ॥ १५. ॥ 


सा तमिश्वाङुशादुंं कामयामास कामिनी । 
स कदाचिन्नरधरेष्ठो स्याज्रा च्येष्ठेन माधव ॥ १६॥ 
राज्यान्निरस्तो विश्वस्तः सोऽयोधष्यां सम्परित्यजत्‌। 
स॒ तद्‌।द्पपरीवारः प्रियया सहितो चमे ॥ १७॥ 
वह्‌ कामिनी होकर इष्वाकवंशके श्रेष्ठ वीर हर््॑को 
सम्पूर्णं हदये चाहती थी । माधव ! एक दिन वदे भाईने 
उनके विश्वासपर्‌ रहनेवछे नरभरष्ठ हरय॑श्वको राज्यसे निकाल 
दिया, तव उन्होने अयोध्या छोड़ दी ओर थोड़े-ते परिवारे 
साथ अपनी प्रिया मधुमतीसदहित वे वनमे रहने ल्गे॥ 


रेमे समेत्य कालक्ञः प्रियया कमटेक्षणः। 

ाच्ा विनिष्छृतं राज्यात्‌ भरोवाच कमलेक्षणा ॥ १८ ॥ 
काल्की महिमाको जाननेघाङे कमलनयन हर्य॑भ अपनी 

प्यारी पनीक्े साथ मिलकर वरहो बे आनन्दसे समय ब्रितानै 

लगे | एक दिन कमल्नयनी मधुमतीने भर्ईदवारा राज्यसे 

निकाले गये पतिसे कदा--} १८ ॥ 


पल्यागच्छ नरश्रेष्ठ त्यज राज्यकृतं स्पृहाम्‌ । 
गच्छावः सहितौ वीर मधोर्मम पितुरगंदम्‌ ॥ १९ ॥ 
(नरश्रेष्ठ वीर ! अयोध्याके राज्यकी अभिलाषा छोड़ दो 
ओर आजो मेरे साथ चले । हम दोनों मेरे पिता मधुके 
घरपर चठ ॥ १९ ॥ 
रम्यं मधुवनं नाम कामपुष्पफदटुमम्‌ । 
सहितो तच रस्यायो यथा दिवि गत्तौ तथा ॥ २०॥ 
धसुरम्य मधुवन नामक वन ही मेरे पिताका निवाससान 
दे । वके ब्र इच्छानुसार" फू ओर फल देनेवछे है । 
वर्ह हम दोनों साथ रहकर खर्गवासियोके समान मौज करगे॥ 
पितम दयितस्त्वं हि मावुम॑म च पार्थिव 
मचस्ियाथं भियतसे सातु ख्वणस्य वै ॥ २१॥ 
शृध्वीनाथ ! मेरे पिता ओर माता दोरनौको ही युम बूत 
परिय हो तथा मेरा प्रिय करनेके व्यि मेरा भाई लवणासुर भी 
ठुम्हे अत्यन्त प्रिय मनेगा ॥ २९१ ॥ 
रस्यावस्तत्र सदितौ राज्यस्थाबिव कामगौ । 
तच्च गत्वा नरश्रेठ॒ द्यमराविव नन्दने । 
भद्रं ते विहररिप्यावो यथा देवपुरे तथः ॥ २२९॥ 
(नरश्रेष्ठ ! वहा जाक्रर हम दोनो साथ-साथ रहकर 
राज्यपरं बढ हए दम्पतियोकरी भोति इच्छानुरूप व्वुओका 
उपभोग करते हुए मण करगे । जे देवपुरी नन्दनवनमे 
देवाज्गना ओर देवता विहार कसते दै, उसी प्रकार वह हम 
दोनो विहार करेगे । आपका भल द ॥ २२॥ 


२४८ 


श्रीमदाभास्ते खिकभागे 


[ हरिवंशे 


तं त्यजाव महायज श्ातरं तेऽभिमानिनम्‌ । 
आवयोर्देपिणं नित्यं मत्तं राज्यमदेन दै ॥ २२३॥ 
(महाराज | आपका भाई राज्यके मदे सदा उन्मत्त 
रहकर अभिमान्मे मरा रदता दै ओर दम दोनेखि देष रखता 
ह; अतः दम दोनों उपे त्याग द | २३॥ 
धिगिमं गर्हितं वासं भृत्यवच परयश्रयम्‌ | 
गच्छावः सहितौ वीर पितुर्मे भवनान्तिकम्‌ ॥ २४॥ 
घ्दाघकी भोति दूसरेके आधित होकर रहना अच्छा नदीं 
दै; अतः इस निन्दित निवासको धिकार दै । वीर | चोः 
हम दोनो मेरे पिताक्रे घे पास चट" ॥ २४॥ 


तस्य॒ सम्यक्प्रुत्तस्य पूर्वजं श्रातरं प्रति । 
कामातस्य नरेन्द्रस्य पल्यास्तद्‌ रुख्चे चचः ॥ २५॥ 
श्रीकृष्ण | यन्यपि द्य॑श्वका अपने वृदे माके प्रति 
अच्छा वर्ताव था ( वद उनते कोद प्रतिरोध नहीं ठेना 
चादता था);तो मी कामते पीडित होनेके कारण उस नरेदाको 
पत्नीकी ब्रात पसंद आ गयी ॥ २५॥ 
ततो मधुपुर राजा दर्यदवः स जगाम च । 
भायेया सह कामिन्था कामी पुरुपयुद्भवः ॥ २६॥ 
(तवर कामी पुरषप्रवर राजा र्यश्च अपनी कामवती पलनी- 
के साथ मधुपुरको चला गया ॥ २६ ॥ 
मधुना दानवेन्दरेण स साम्ना समुदाहतः। 
स्वागतं यत्स दर्य॑दव भ्रीतोऽसि तव दृश्च॑नात्‌ ॥ २७॥ 
धवो दानवराज मधुमे उस्वे सान्त्वनापूर्वक कदा-- 
शरेटा द्यश्च | तुम्हारा खागत दै । मँ वु्दरि दर्यनते ८ अथवा 
तमसे मिलकर) वहत प्रसन्न हू ॥ २७ ॥ 
यदेतन्मम राज्यं वै सर्य मधुवनं विना। 
ददामि तव राजेन्द्र चासश्च पतिगरृद्यताम्‌ ॥ २८ ॥ 
'्जेन्द्र ! यह जो मेरा सारा राज्य दै, उसे भं केव 
मघुवनक्रो छोडकर वदे सप रदा द| ठम यदो निवास 
करो ॥ २८ ॥ 
वनेऽसि्धंवणश्चायं सदायस्ते भविप्यति । 
अमिघ्रनिच्रहे चैव कर्णधारत्यमेण्यति ॥ २९॥ 
ध्रस वनम यह मेरा पुत्र छ्वण मी ठम्दारा सदायक्र 
होगा तथा ारर्जोका निग्रह करने यह तुम्दारे व्यि कर्ण- 
धारका काम देगा ॥ २९॥ 
पाल्येनं शछयमं रटे समुद्रानृपभूपितम्‌ 1 
गोसखखद्धं धिया जुणमाभीरपराथमाचुपम्‌ ॥ ३० ॥ 
तुम समुद्रके जय्प्राय प्रदेढसे विभूषित इस य॒म राष्रू- 
का पालन करो । यह गौर्ओैपि समृद्ध ओर ट्धमीसे सेवित दै 
तथा इसमे अधिकतर आभीर जातिके छोगोका निवास है ॥ 


अन्न ते चखतस्तात दुरम भिरिपुरं महद्‌ । 
भविता पार्थिवावाखः खुसषए्विपयो महान्‌ ॥ २९॥ 
अनूपविषयश्चैव  सयुद्रान्ते निरामयः । 
४तात | यहो रहनेपर मदान्‌ एवं दुर्गम गिरिपुर (गिरि 
नार या रेवत्तक पर्व॑ते मिद्य हया नगर ) ठम्दारी राजधानी- 
के रूपम प्रतिष्ठित दोगा । यदह मदान्‌ सुराष्ट्र राज्य समुद्रके 
निकट ओर जलप्राय प्रदेशसे युक्त दै । यरद किसी प्रकारका 
रोग नीं होत्रा ॥ ३११ ॥ 
आनतं नाम ते राषटरं भविष्यत्यायतं मदत्‌ ॥ ३२॥ 
तद्‌ भविष्यमहं मन्ये काख्योगेन पार्थिव । 
अध्यास्यतां यथाकाटं पार्थिवं दृत्तसुतच्तमम्‌ ॥ ३२॥ 
"तुम्हारा विदार एवं विस्तृत राज्य आनर्तं नामे 
विख्यात दोगा । प्र्वीनाथ ! मेरा विंदवाख दै कि काख्योगे 
वह अवदयम्भावी है । ठम समयानुतार उत्तम राजोचित 
चर्तावका आश्रय छेकर यरद रदो ॥ ३२-३३ ॥, 
यायातमपि वंशस्ते समेप्यति च याद्‌वम्‌ । 
अलु वंद च वंशस्ते सोमस्य भविता किङ ॥ २४॥ 
शुम्दाया यद वंग ययाति एवं यदुके वर्मे मिर जायमा। 
चन्द्रव॑शके भीतर म्दाय वंदा चलेगा ( सूर्यवंशचसे उसका 
कोद सम्बन्ध नदीं रद ' जायगा ) | ३४॥ 
पष मे विभवस्तात तवेमं विषयोत्तमम्‌ । 
द्त्वा यास्यामि तपसे सागरं रवणाख्यम्‌ ॥ ३५॥ 
(तात | यदी मेरा विभव है | म तुमह यद उत्तम राज्य 
देकर तपस्याके लि क्वणसमुद्रको चला जागा ॥ २५ ॥ 
रवणेन समायुकस्त्वमिमं विपयोत्तमम्‌। 
पार्यखाखिदटं त(त खस्य वंशस्य दृद्धये ॥ ३६॥ 
ध्तात | ठम ठवणकरे साथ रदकर अपने वंदकी बृद्धिके 
य्ि इस समस्त उत्तम राज्यका पाटन करो, ॥ ३६ ॥ 
वाढमित्येव हर्यद्वः प्रतिजग्राह तत्‌ पुरम्‌ । 
सख च दैत्यस्तपोवासं जगाम वरूणार्यम्‌ ॥ ३७॥ 
४तव ध्वहूुत अच्छा ककर दर्वश्वने उस ॒पुरको प्रहण 
किया; फिर वह दैत्य तपक्याके ल्यि खमुद्रको चला गया ॥ 
हर्यश्वश्च महातेजा दिव्ये गिरिवसेत्तमे । 
निवेशयामास पुरं वासार्थममरोपमः ॥ ३८॥ 
'अमसोके समान महातेजखी दर्यश्वने दिव्य एवं भेष्ठ 
गिरिवर ( रैवतक ) क समीप अपने रहनेके चयि एक नगर 
वसायां ॥ ३८ ॥ 
आनर्त नाम तद्‌ रषं खरां गोधनायुतम्‌ । 
अचिरेणैव कटेन सग्धद्धं परत्यपद्यत ॥ ३९ ॥ 
आनतं नामे प्रसिद्ध वद॒ गोधनसम्पन्न रष सुरा 


† 


विष्णुपर्व ] 


सप्तत्रिदोऽन्यायः 


२४९ 


कदल्या ओर थोडे दी समयमे समृद्धिशाटी दो गया ॥३९॥ 


अनूपविषये चैव॒ वेलावनविभूषितम्‌ । 
विचिक्ं क्चेघरसस्याढन्यं पाकारयामसंङ्कटम्‌ ॥ ४० ॥ 
शशास खपतिः स्फीतं तद्‌ राष्ट राए्वर्धंनः। 
राजधर्मेण यशा प्रजानां नन्दिवर्धनः ॥ ४९॥ 
ध्जलगप्राय देदामे समुद्रतटवर्तीं वनौँसे विभूप्रितः विचिच्नः 
खेती ओर हयै-भरी खेतीसे सुशोभित, परकोर्यौ जर गवति 
युक्त तथा धनधान्ये सम्पन्न उस रष्रपर राटी बद्धि करनेवठे 
राजा हर्थश्च शासन करने लगे ओौर राजधर्म एवं यासे म्रजाका 
आनन्द वदान ल्त ॥ ४०-४१ ॥ , 
तस्य सम्यक्‌ प्रचारेण हर्थदवस्य महात्मनः । 
व्यवर्धत तदस्मभ्यं राष्ट राषटगुणेर्युतम्‌ ॥ ४२॥ 
(महामना हर्यश्वके उत्तम आचार-ग्यवहारफे कारण वहं 
अक्षोभ्य राष्ट उत्तम राष्रके गु्णोसि सम्पन्न हो निरन्तर उन्नति 
करने ख्या ॥ ४२॥ 
स हि राजा स्थितो राज्ये राजघृत्तेन शोभितः। 
प्राप्तः कुखोचितां लक्ष्मी बृत्तेन च नयेन च ॥ ४३ ॥ 
'्राज्यपर सित दहौकर राजोचित बर्तावसे सुरोभित 
होनेवाठे उन॒राजा हयैश्वने सदाचार ओर उत्तम नीतिसे 
अपने कल्क व्यि उचित लक्ष्मी प्राप्त कर खी ॥ ४३ ॥ 


तस्यैव च ख॒वरत्तस्य पुत्रकामस्य धीमतः। 
मधुमत्या खतो जके यदुनौम मदायराः ॥ ४४ ॥ 

‹पुचकी इच्छा रखनेवले उन्दी सदाचारी एवं बुद्धिमान्‌ 
हर्य॑श्वके मधुमतीके गर्भसे महायसस्वी यदुका ' जन्म 
हुज+# } ४४॥ 


स्रोऽवधेत महातेजा यदुदन्दुभिनिःखनः 1 
राजलक्षणसम्पन्नः सपन्तैरठुरतिक्रमः.॥ ४५॥ 
भ्महातेजखी यदुका स्वर दुन्दुभिनिनादके समान गम्भीर 
था । वे राजोचित लक्चणोसे सम्पन्ने दोकर दिर्नोदिन वदने 
लगे । शतु्ओकि लि वे सर्वथा दुर्जय थे ॥ ४५ ॥ 
यदुनौमाभवत्‌ पुभ्रो राजलक्षणपूजितः। 
यथास्य पूर्वजो राजा पुरः स खुमदायश्षाः ॥ ४६ ॥ 
टयंश्वका वह्‌ पुत्र यदु नामसे दी विख्यात हुआ । यदु 
राजोचित लक्षणोसे सम्मानित थे, ठीक उसी तरह जसे उनके 
पूवज राजा महायशस्वी पूर खम्गनित होते थे ॥ ४६ ॥ 


# कते हैः जैसे अक्षाजीके मानसपुत्र वसिष्ठ किसी कारणव 
मित्रावरुणके अंशसे नूतन शरीर धारण करके मकर हुए; फिर भी 
चतिष्ठ हौ बने रे, उसी प्रकार ययातिपुत्र महाराज यदु टौ योग- 
चलते हयेश्के पुपररूपमं कट हए ये बौर उक पूर्व नामस ख्यात 
हप 1 


स एक एव तस्यासीत्‌ पुत्रः परमशोभनः । 
ऊर्जितः पृथिवीभती हयंश्वस्य महात्मनः ॥ ४७ ॥ 
(महामना ` हर्यश्वफे एक षी पुर यदु हुए । वे परम 
सुन्दरः, भरुवान्‌ ओर प्रथ्वीका भरण-पोषण करने समथं 
ये ॥ ४७ ॥ । 
दस वर्षसहस्राणि स शृत्वा राज्यमन्ययम्‌ 1 
जगाम जिदिवं राजा धघंणाप्रतिमो भुवि ॥ ४८॥ 
भ्राजा ह्॑श्च दस हजार वर्पौतक अक्षय रभ्यका उपभोग 
करके खर्म॑लोकमे चङे रये । वे भूमण्डल्के अनुपम धर्मात्मा 
ये ॥ ४८ ॥ .- ~ ॥ 
ततो यदुरदीनात्मा प्रजाभिस्त्वभ्यपिच्यत । 
पितयुंपरते भीमान्‌ क्रमेणाक इवोदितः ॥ ४९॥ 
ध्पिताके मर जानेषर प्रजाभने उदास्चेता श्रीमान्‌. यदु- 
को उनके राज्यपर अभिषिक्त करदिया। वे क्रमशः पक 
सूरयके वाद दूसरे सूर्ये समान उदित हो कारित होने 
रगे ॥ ४९ ॥ 


शशास चेमां वसुधां पश्षान्तभयतस्कराम्‌ ! 
यदुरिन्द्रथतीकारो रपो .येनासखर यादवाः ॥ ५० ॥ 
ध्वे इन्द्रतुस्य तेजस्वी यदु; जिनके कारण हमलोग 
यादव कहत्ते है, जव इस प्रथ्वीका शासन करने ल्मे, तव 
यदोका सारा भय शान्त हौ गया । चोर-छटेरे आदि छप हो 
गये ॥ ५० ॥ | 
सं कदाचिन्तरप्चक्रे जलक्रीडां मदोदधघौ । 
दारैः सह शुणोदारैः सतार इव चन्द्रमाः ॥ ५१॥ 
^एक समयुक्री वात है" राजा यदु अपनी उदार गुणवादी 
पलिरयोके साथ ताराओसहित चन्द्रमाके समान महासागरमे 
जलक्रीडा कर रहे ये ॥ ५९१ ॥ 


स तत्र सहसरा क्षिप्तस्तितीर्षुः सागराम्भसि । 
धूम्रवर्णन शपतिः सर्पराजेन वीर्यवान्‌. ॥ ५२ ॥ 
सो.ऽयारृष्यत वेगेन' जके सर्पपुरं महत्‌ । 

ध पराक्रमी राजा यदु जलृको पार करके निकलना दही 
व्वाहते ये किं सदसा किसीनि उन्ह समुदरके गहरे ज्ये डाल 
दिया । बात यह हुई कि सपक राजा धूमरवर्णने वदे वेगतसे 
उनको खीचा ओर जलके भीतर बते हुए स्पोके एक महान्‌ 
नगरमे पर्हृचा दिया ॥ ५२३ ॥ 


मणिस्तस्भदद्धारं सु्तादामविभूषितम्‌ ॥ ५२ ॥ 
कीणं शद्धकलेः शश्रे रत्नरारिविभूषितम्‌। 
भवाखाङ्करपताद्यैः = पादपैरुपशोभितम्‌ \॥ ५९ ॥ 
"हके खम्भेः षर ओर द्वार समी मणिोके रने हृ 
ये । उन सको मोतीकी रुढिरयो एवं श्ालरौसि सजाया गया 
था । वहां देर-क-देर श्वेत शङ्कि समूह्‌ पड़ हुए थे । रलन- 


२५० 


रारियेसि उस नगरे घरद्रारको विभूप्रित किया गया था। 
नूतन प्लव, अंकुर ओर पत्तेसि युक्त वृक्ष उस नगरकी 
रोमा ब्रदृति थे | ५३-५४ ॥ 
कीणं पन्नगना्ोधैः समूद्रोदर्वसिभिः। 
ख्णवणेन भाखन्तं खस्तिकेनेन्दुवर्च॑सा ॥ ५५ ॥ 
धवो समुद्रके उदर निवास करनेवाखी नागटलनार्दै 
मरी दुई थीं । वह ग्राम कदं सुवर्णमय ओर कदी चन्द्रमाकर 
समान उ्वेत कान्तिमान्‌ स्स्िकसे प्रकारित होता था ॥५५॥ 


स तं द्दश्चं राजेन्द्रो विमले सागराम्भसि । 
पन्नगेन्द्रपुरं तोये जगत्यामिव निर्मितम्‌ ॥ ५६॥ 
(राजाधिराज यदुने देखः--समुद्रके निर्मल जर्स्म बरना 
हआ यह नागराजका नगर भूतल्पर ही निमित हुभा-खा जान 
पड़ता है ॥ ५६ ॥ 
खच्छं चैव पुरं तच प्रविवेदा च्पो यदुः 
अगाधं तोयद्ाकारं पूरणं सर्पैवधूगणेः ॥ ५७ ॥ 
"राजा यदुने पर्पवधु्ओसि मरे हए उस अगाध जल्दाकार 
सच्छ नगरम प्रवेश किया ॥ ५७ ॥ 
तस्य दत्तं मणिमयं जलजं परमासनम्‌ । 
स्वास्तीर्णं पश्मपत्रैश्च पञ्चसू्रोत्तरुच्छदम्‌ ५ ५८ ॥ 
ध्वहो उन्दे मणिमय कमलकरा आसन दिया गया, जिसपर 
पद्मके दल व्रछे हुए ये ओर पद्मधूर्रोकी ही बनी हुई चादर 
डाटी गयी थी ॥ ५८ ॥ 
तमासीनं चरपं तत्र॒ परमे पन्नगासने। 
दविजिद्धपतिरव्यप्रो धूम्रवणो ऽभ्यभाषत ॥ ५५ ॥ 
श्वपकि दिये हूए उस उत्तम आसनपर जव राजा यदु 
वरहो विराजमान दए तव सपरज धूम्रवर्णने उनसे शान्तमाव- 
से कहा-॥ ५९ ॥ 
पिता ते स्वगंति प्राप्तः छृत्वा वंशमिमं महत्‌ । 
भवन्तं तेजसा युक्तमुत्पाद्य वरुधाधिपम्‌ ॥ ६० ॥ 
'राजन्‌ ! तम्दरि पिता इस विशार वंशकी नीव डालकर 
.. ओर उम-जेते तेजसी भूपालो जन्म देकर ख्रोकको 
चले गये ॥ ६० ॥ 
याद्वानामयं वंशस्त्वन्नाश्ना यदुपुङ्गव । 
पित्रा ते मङ्गला्थाय स्थापितः पार्थिवाकरः ॥ ६१ ॥ 
ध्यदुपुङ्गव ¦ वम्दारे नामके ही यह वंदा यादववंश 
कदलायेगा । पुम्दारे पिताने वम्दारे मङ्गले च््यि दी इस कल्की 
स्थापना की है, जो राजा्ओंकी खान है ॥ ६१ ॥ 
वंशो चासस्तव विभो देवानां तनयाव्ययाः । 
च्रपीणामुरगाणां च उत्पत्स्यन्ते योनिजाः ॥ ६२ ॥ 
श्रमो { ठुग्हरि इस वंशम देवताओं ओरं ऋषि्यौ तथा 
नार्मोकी अक्षय संताने मनुप्य-योनिर्मे उत्पन्न होगी ॥ ६२ ॥ 


श्रीमहाभारते खिकभागे 


[' हरिवंशे 


५ न ० ० 


तन्ममेमाः खुताः पञ्च कुमायों चत्त सम्मताः! 
उत्पत्ना यौवनाश्वस्य भगिन्यां चथसत्तम ॥ ६३ ॥ 
प्ट [ मेरी जे ये पोच कुमारी कन्या ई, वे उत्तम 
आचारव्यवहारते सम्मानित द | इनका जन्म यौवनास्वकी 
वहिनके गर्भे हुमा है ॥ ६२ ॥ 
प्रतीच्छेमाः खधरैेण प्राजापत्येन क्मणा। ,, 
वरं च ते प्रदास्यामि चरार्दस्त्वं मतो मम ॥ ६४॥ 
तुम अपने धर्मके अनुखार वैवादिक विधिखे इन 
कन्यार्ओको ग्रहण करे मेरी धारणाके अनुसार त॒म वर पानेके 
योग्य दो, अतः ओँ दुमद मनोवाज्छित वर मी दुगा ॥ ६४॥ 
मैमाश्च कुकुरादचेव भोजाश्चान्धकयाद्वाः। 
दादाही चृष्णयदचेति ख्याति यास्यन्ति सप्तते॥ ६५॥ 
तुमसे सात कुल विख्यात दग, जो मैमः कुक्कुर, भोजः 
अन्धकः यादवः दायां तथा श्रप्णिके नामते प्रसिद्ध हेगिः ॥ 


स तस्मै धूष्रवणों वै कन्याः कन्या्ते स्थिताः । 

जलपूर्णैन योगेन ददाबिन्द्रसमाय वै ॥ ६६॥ 
"एसा कहकर धूप्रवेने इनद्रतुल्य तेजखी यडुको कन्या- 

व्रतम यित हुई वे कन्यार्णँ हाथमे जल लेकर संकत्पूर्वक 

देदीं॥ ६६॥ 

चरं चास्मै ददौ प्रीतः स वै पन्नगपुङ्गवः। 

श्राचयन्‌ कन्यकाः सवौ यथाक्रममदीनवव्‌ ॥ ६७ ॥ 
“फिर उन नागरिरोमणि धूप्नवर्णने प्रसन्न होकर समस्त 

कन्यार्ओको सुनाते हुए एक उदार पुरुपकी मति राजाको 

क्रमशः; वर प्रदान कयि | ६७ ॥ 

पनास ते खुताः पञ्च खता मम मानद्‌। 

उत्पत्स्यन्ते पितुस्तेजो मातुश्चैव समाधितः ॥ ६८ ॥ 
ध्मानद [ मेरी इन पोच कन्याओसि तुम्हारे पचि पुत्र 

उ्नन हगिः जो पिताओर माता दोर्नोफे तेजसे सम्पन्न 

होगे ॥ ६८ ॥ 

असरत्समयवद्धश्च सलिलाभ्यन्तरेचराः। 

तव वंदे भधिष्यन्ति पार्थिवाः कामरूपिणः ॥ ६९ ॥ 
ष्ट्मारे वरदानमे अनुग्रहीत होकर व॒म्दारे वंके वे समी 

राजा जल्के भीतर विचरनेवाठे तथा इच्छानुसार रूप धारण 

करलेमे समर्थं हेगि ॥ ६९ ॥ 

स वरं कन्यकाश्येव ङव्ध्वा यदुवरस्तद्ा 1 

उदतिष्ठत वेगेन सटिलाच्न्द्रमा इव ॥ ७०॥ 
ध्वे श्रेष्ठ यदु उस समय वर ओौर उन कन्याओंको पाकर 

चन्द्रमाफे समान वेगपूर्वक जले ऊपर उठे ॥ ७० ॥ 

स पञ्चकन्यामध्यस्थो ददरो तच पार्थिवः । 

पञ्चतारेण संयुक्तो नक्षमेणेव चन्द्रमाः ॥ ५१॥ 
पोच कन्याओके बीचमे सित हुए राजा यदु वरहो पोच 


विष्णुपर्व ] 


अण्र्चिश्छो ऽध्यायः 


२५९ 


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--------------------------------------न र~ 


तारार्ओवाले नश्षत्रते संयुक्त चन्द्रमाफरैे समान दिखायी 

देते थे ॥ ७१॥ 

स ॒तदन्त्पुरं सर्वं ददशं पसत्तमः। 

वैवाहिकेन वेषेण दिव्यस्रगलुरेपनः ॥ ७२॥ 
भ्वैवादिक वेदसे युक्त तथा दिन्य हार एवं चन्दन 

धारण करमेवलि दपशर् यदुने जले बाहर आकर अपने 


समस्त अन्तःपुरको वरहो उपसित देखा ॥ ५२॥ 

समाश्वास्य च ताः सर्वास पल्लीः पावकोपमाः। 

जगाम स्वपुरं राजा प्रीत्या परमया युतः ॥ ७३ ॥ 
(तदनन्तर अग्निके समानतेजन्विनी उन सारी पलियौको 

आश्वासन देकर राजा ग्रु अस्यन्त प्रसन्नतापूर्वक उन स्के 

साथ अपने नगरकरो चले गये? ॥ ७३ ॥ 


इति श्रीमदाभारते खिरुभागे इरिविदो विष्णुपर्वणि विकद्ुवाक्यं नाम स्तचिज्ञोऽध्यायः ॥ ३७ ॥ 
दस प्रफार श्रामहयभस्तते स्िरमाग इिंशके अन्तर्मत विष्य स्मे विणद्रुका वास्यत्िषयक संतीस। अध्याय पूरा हुमा ॥ २७ ॥ 


अष्टात्रिशोऽध्याय 
वरिकदवुद्रारा यदुकी संततिका वणन तथा मधुरापुरीको जरापरंधका आक्रमण सहनेके अयोग्य वताना 


दश्चग्पायन उवाच 
स तासु नागकन्या काडेन महता चृपः। 
जनयामास विक्रान्तान्‌ पञ्च पुत्रान्‌ कखोददान्‌॥ १ ॥ 
वैशाम्पायनजी कदते है-- जनमेजय ! यदुने दीर्घकाल- 
के पश्चात्‌ उन पचो नागक्न्याओके ग्भ॑से पोच पराक्रमी एवं 
छुख्का भार वहन करनेमे समर्थं पुत्र उत्पन्न वयि ॥ १॥ 
मुचुकुन्दं महाबाहु पञ्चवर्ण॑तथेव च । 
माधवं सारसं चेव हरितं चेच पार्थिवम्‌ ॥ २ ॥ 
उनके नाम दस प्रकार ईै--महावाहू मुचुकुन्द, पद्यवर्ण; 
माधवः सारस तथा राजा हरित ॥ २॥ 
पतान्‌ पश्च सुतान्‌ राजा पञ्चभूदोपमान्‌ भुवि । 
दक्षमाणो चपः प्रीतिं जगामातुखविक्रमः ॥ ३ ॥ 
ये रपो पुत्र भूतलपर पोच भूर्तोके समान थे | अचु 
पराक्रमी राजा यदु इन्दे देखकर बहुत प्रसन्न होते थे ॥ ३ ॥ 
ते प्राप्तवयसः सर्वे स्थिताः पञ्च यथाद्रयः। 
तेजिता बलदपौभ्यामूच्खुः पितरम्रतः ॥ ४ ॥ 
जव वे सवर वयस्क दए, तवर पोच परवंतोके समान प्रतीत 
होने खो । एक दिन अपने बक ओर दर्पसे प्रोत्साहित होकर 
वे अपने पिताक्रे सामने खड़े दो इस प्रकार बेोरे--॥ ४ ॥ 
तात युक्ताः स्म॑ वयसा वदे महति संस्थिताः । 
क्षिप्रमाष्षप्तुमिच्छमः कि कुर्मस्तव शासनात्‌ ॥ ५ ॥ 
प्तात } अव हम वड़ी अवाक दो गये, महान्‌ वल्मे 
हमारी स्थिति दै ८ दम महान्‌ बलवान्‌ ई ); अतः गीघ् 
आपकी आश्च चाहते है, वादये, आपके आदेशसे हम कौन- 
सा कार्यं करें ॥५॥ 
स तान्‌ शरपतिशादूंलः शादखखानिव वेगितान । 
प्रीत्या परमया प्राह सुतान्‌ वीयकुतूष्टलात्‌ ॥ ६ ॥ 
नरेशोमे सिंदके समान पराक्रमी यदुने सिंहौके ही सदय 


वेगसाटी अपने इन पु्रोसे उनके व्रल-पराक्रमको जाननेकी 
उत्सुकतासे अत्यन्त प्रसन्नतापूचक कदा] ६ ॥ 


विन्ध्यक्ष॑वन्तावभितो दधे पुर्यो प्व॑ताधये । 

निवेरायतु यत्नेन मुचुकुन्दः खतो मम ॥ ७ ॥ 
पेया पुत्र मुचुकुन्द विन्ध्य ओर करक्षवान्‌ पर्वतोके 

निकट पएव॑तीय भूमिका दी आश्रये यल्नपूर्वक दो पुर्यो 

वरसाये ॥ ७ ॥ 

सद्यष्य चोपरिष्ठत्त दक्षिणां दिशमाधितः 

पद्मवर्णाऽपि मे पुत्रो निवेशयतु मा चिरम्‌ ॥ ८ ॥ 
भेरा वेरा पद्मवण भी दक्िण दिराका आश्रय ठे सद्यपरवत- 

के दिखरपर शीघ्र एक नगर वसये ॥ ८ ॥ 

तत्रैव परतः कान्ते देशे चभ्पक्भूषिते। 

सारसो मे पुरं रम्यं निवेशयतु पुत्रकः ॥ ९ ॥ 
धवं प्रश्चिम दिलाकी ओर चम्पके ब्रकषेसि सुशोभित 

मनोरम प्रदेदमे बेर्य सारस एक रमणीय राजधानीकी खापना 

करे ॥ ९॥ 

दरितोऽयं महाबाहुः सागरे हरितोदरफे । 

दीपं पन्नगसजस्य खतो मे पाठयिष्यति ॥ १०] 
भेरा पुच्र यह महाग्राह हरित हेरे जल्से भरे दए समुद्रम 

नागराज धूम्रवर्ण दीपक्रा पालन करेगा ॥ १० | 

माधवो मे महवाहुव्यंष्ठपुजश्च घ्म॑वित्‌ 

यौवराज्येन संयुक्तः खपुरं पारयिप्यति ॥ ११॥ 
भेरा पचर्वो पुत्र महाबाहु माधव व्येषठ तथा धर्मद, 

यह्‌ युवराज होकर अपने इसी नगरकरा ( जों रेवतक्रके समीप 

हे) पालन करेगाः ॥ ११॥ 

सवं छपश्ियं प्राप्ता अभिपिक्ताः सचामसः। 

पि्राचुशिषटश्चत्वासे खोकपालोपमा दषाः ॥ १२१ 


2५२. 


धीमष्छभारते खिकभागे 


[ शिवे 


स्वं स्वं निवेदनं स्वँ भेजिरे खेपसत्तमाः। 
पुरस्थानानि रम्याणि सगयन्तो यथाक्रमम्‌ ॥ १३॥ 
उन सवकरो रा्यरक्षमी प्राप्त दुई । सवक्रा विभिन्न सार्यो- 
पर अभिपेक हुआ तथा समी छत्र-चमर आदि राजोचित 
चिहंसि अल्ङृत हुए. 1 तलश्वात्‌ पिताक आज्ञा पाकर ोक- 
पारक समान वे चारों पश्र राजकुमार अपने-यपने धर्म 
गये । फिर उन्दनि क्रमशः सुरम्य राजधानी वनानेके चयि 
स्थानकी खोज प्रारम्भ की ॥ १२-१३ ॥ 
मुचङन्दश्च राजपिर्विन्प्यम्यमरोचयत्‌। 
स्वस्थानं नर्मदातीरे दारुणोपलसंकटे ॥ १४॥ 
राजं सुचु्ुन्धने विन्भ्यपवंतके मध्यवर्ती स्थानको पद 
करिया उन्दने विषम प्रसरदण्डसि भरे हुए दुर्गम नर्मदा- 
तटपर अपना खान बनाया ॥ १४ ॥ 
स चतं शोधयामास विविक्तं च चकार €। 
सेतं चैव समं चक्रे परिखाश्चामितोदकाः ॥ १५॥ 
उन्दने उख सखानका योधन क्रिया ओर उसे एकान्त 
एवं पवित्र वनाय! ] सम सेका निर्माण किया जीर अथाद 
जकल्से भरी हई खादयो खुदवार्यीं ॥ १५ ॥ 
स्थापयामास भागेषु देवतायतनान्यपि । 
रथ्या बीथीर्रेणां मागौश्चत्वराणि वनानि च ॥ १६॥ 
नगरके विभिन्न भार्गेमिं बरहुत-से देवमन्दिर भी श्यापित 
कयि । सद्ँ, गिरयो, जनखाधारणके मार्ग तथा चीरे 
चनवाये ओर वन भी ख्गवयि ॥ १६ ॥ 
स॒तां पुरीं धनवतीं पुरुहतपुरीप्रभाम्‌। 
नातिदीर्घेण काटेन चकार चुपसत्तमः॥ १७॥ 
उन द्रपश्रेष्ठ मुचुङुन्दने उस पुरीको थोड़े ही दिनम 
धन-धान्यसे सम्पन्न करके इन्द्रपुरीके समान प्रकारित एवं 
सुदोमित कर दिया ॥ १७॥ 
नाम चास्याः श्युभं चक्रे निर्मितं स्वेन तेजसा । 
तस्याः पुयौ छखपधेष्ठो देवश्रेष्ठपरक्रमः ॥ १८॥ 
देवता्भेकि समान श्रेष्ठ पराक्रमी गरपवर मुुञ्न्दने 
उख पुरीका अपने दी तेजते निर्मित श्युम सुन्दर नाम 
र्वा--॥ १८ ॥ 
महादमसंघातवती यथेयं विन्ध्यसाुगा । 
मािष्मती नाम पुरी प्रकाश्लसुपयास्यति ॥ १९॥ 
¶विन्ध्य-गिरकि शिखरपर वसी हुई यह नगरी महान्‌ 
अद्मषंघात ( प्रसरसमूह ) से युक्त दैः इसल्यि संसारम 
ध्माहिष्मतीपुरीः के नामसे विख्यात होगी ॥ १९ ॥ 
उभयोर्विन्ध्ययोः पदे नगयोस्तां महापुरीम्‌ 1 
मध्ये निवेशयामास धिया परमया वताम्‌ ॥ २०॥ 


राजा मुचुकरुन्दने उत्तम शोमा-सम्पतिसे सम्पन्न उस 
महापुरीको दोर्नौ विन्ध्यपर्वतेकरि बीच बसाया था | २० ॥ 
पुरिकां नाम॒ धमौत्मा पुर देवपुरीप्रभाम्‌ । 
उद्यानदतसम्बाघां सम्रद्धापणचत्वसाम्‌ ॥ २१॥ 
तश्वात्‌ उन धर्मात्मा नरने एक '्पुरिकाः नामवाटी 
पुरी वसायी; जो देवपुरीके समान प्रकाशित होती यी | उक्षे 
भीतर सैको उद्यान वने ये तथा वेभवपूर्णं हाट-बाजार जीर 
चौराहे भी उसकी शोमा वदते ये ॥ २१॥ 
ऋक्षवन्तं समभितस्तीरे तत्र॒ निरामये + 
निर्मिता सा पुसी राक्षा पुरिका नाम नामतः ॥ २२॥ 
रृक्षवान्‌ पर्वतके समीप, रोग-दोकये रदित नर्मदातट- 
पर राजाने पुरिका नामक पुरीका निर्माण कथया था ॥२२॥ 
सते दे विपुङे पुर्यो देवभोग्योपमे द्भ । 
प्राख्यामाल धमौत्मा राजः घमं व्यवसितः: २६ ॥ 
धर्मम दित हए वे धर्मात्मा नरे देवतामकरि पभोगम 
अआनेवाटी खर्गीव पुसियिक्रि ' समान उन दो सुन्दर नगर्योका 
मिर्माण करके उनका पाल्न करने स | २३ ॥ 
पद्मघर्णोऽपि राजर्षिः सद्यपृष्ठे पुरोत्तमम्‌ । 
खकार नद्या वेणायास्तीरे तर्लताक्रटे ॥ २४॥ 
राजिं पद्मव्णने भी सद्यपर्वतके पृषठमागर्म बो ओर 
ठलताओपि व्याप्त वेणा नदीकरे तटपर एक उत्तम नगरका 
निर्माण कराया ॥ २४॥ 
विपयस्याटपतां श्षात्वा सम्पूर्णं रषषट्मेव च । 
निवेशयामास गरपः स वमप्रप्रायसुत्तमम्‌ ॥ २५॥ 
अपनी राज्यभूमिक्रा विस्तार दुसर्योकी अपेक्षा छोटा जान- 
कर उर्न्दौनि अपने सम्पूर्णं रष्ट्को दी एक नगरके स्पर्मे 
रसाया ओर उसे सव ओरपे एक विशार चदारदिवारीके 
द्वारा घेर दिया ! उस उत्तम र्ट परकोयेकी ही प्रधानता 
थी ॥ २५॥ 
पद्मावतं जनपदं करवीरं च तत्पुरम्‌ । 
निर्मितं पश्चच्ण॑न प्राजापत्येन कमणा ॥ २६॥ 
उनक्रा राज्य पद्मावत जनपदके नामसे प्रसिद्ध हआ । 
उनकी राजधानीका नाम करवीरपुर हुआ । पद्मवर्णने रिव्य- 
शाल्लके नियमो अनुसार उस नगरका निर्माण कराया था ॥ 
सारसेनापि विषितं रम्यं क्रौशपुरं मदत्‌। 
चम्पकारोकवहुटं विपुखं ता्न्धच्तिकम्‌ ॥ २७ ॥ 


राजा सारसने भी क्रौश्चपुर' नामक महान्‌ एवं रमणीय 


नगरका निर्माण कराया; जिसमे चम्पा ओर अशोक वबरक्षोकी 


१, आचार्यं नीककण्ठने (कौन्चपुरः नगरकी सिति वेणके 
दक्षिण तदप वतायी 


विप्णुपवं | 
बहुरता थी । उसका विस्तार बड़ा था ओर वरह तेविका कारोबार 
होता थाः जिससे लोगो जीविका चरती थी ॥ २७ ॥ 
वनवासीति विख्यातः स्फीतो जनपदो महान्‌ 1 
पुरस्य तस्य तु श्रीमान्‌ दरुमः साव॑तैकैवतः ॥ २८ ॥ 
उस नगरका महान्‌ समृद्धिशाटी एवं शोभायमान जनपदं 
‹वनवासीः नामते, विख्यात दुआ । वरो समी अद्मि 
पूलने-फल्नेवलि दक्ष सव ओर हरेभरे दिखायी देते थे ॥२८॥ 
हरितोऽपि खमुद्रस्य द्वीपं समभिपालयत्‌ । 
रलसंचयसम्पू्णं नारीजनमनोहर्म्‌ ॥ २९ ॥ 
हरिति भी र्नराशिते पूणं उस ॒समुद्र-सम्बन्धी दीपका 
पालन करने रो, जो नारीजनोके ल्थि मनोहर था ( अथवा 
नारियेकि कारण मनोहर प्रतीत होता था ) ॥ २९ ॥ 
तस्य दाश जले मसरा मह्य नापर विश्चुताः। 
ये हरन्ति सदा शङ्कान्‌ ससुद्धोदस्चारिणः ॥ ३० ॥ 
राजा हरितक दारा नियुक्त हुए धीवरः, जो वहा (महर, 


, नामते प्रसिद्ध थे, जलमे द्भवकर समुद्रके भीतर विचरनेवले 


शङ्खको पकड़ खते थ ॥ ३० ॥ 


` तस्यापरे दाश्लजनाः प्रवाखाञ्चखसम्भवान्‌ । 


संचिन्वन्ति सद्‌ा युक्ता जातरूपं च मौक्तिकम्‌॥ ३१ ॥ 
उनके दृूसरवूसरे मल्लाह सदा सावधान रहकर जल्के 


भीतर होनेवले मूगो तथा चमकीठे मोतियोका संग्रह करते 
ये॥ २९॥ 


जलजानि च रलानि निषादास्तस्य मानवाः । 


भरचिन्वन्तोऽणेवे युक्ता नौभिः संयानगामिनः ॥ ३२ ॥ 

हरितक ही कायंकर्ता निषाद वड़ी-वड़ी नौकाओंको साथ 
व्यि छोटी नौकायद्वायं समुद्रमे जाति ओर जरम उत्पन्न 
होनेवले ररनोकी खोज करते थे ( छोटी नावति दुर-दूरतक 
जाकर वे रनोका संचय करते ओर एक जगह खडी हुई 
बडी नौकामे कर रखते थे ) | ३२॥ 


मत्स्यमांसेन ते सवे वर्तन्ते स सदा नयः। 


 गहवन्तः सर्वरलानि रलद्धीपनिवासिनः ॥ ३२॥ 


उस रनद्ीपमे निवास करनेवाछे वे मल्लाह जातिके 
लोग सवर प्रकारके र्नौका प्रह करते ओर मच्ठीके मांससे 
जीवन-निर्वाह करते ये ॥ ३३ ॥ 


तेः ` संयानगतैर्भ्यैवेणिजो दूरगामिनः। 


` रितं तपंयन्त्येकं यथैव ॒ घनदं तथा ॥ २४॥ 


नौकाओमि समुद्रम निकाले गये जे द्रव्य संचित हते, 
उनके द्वारा दूर देशोकी यात्रा करनेवाठे व्यवसायी वैश्य 
व्यापार करते ओर प्रात हुए धनसे एकमात्र राजा इरितको 
दी पृस करते थे, जे यश्च केवर कुवररको दी अपने उपार्थित 
धनसे संतुष्ट किया करते दँ ॥ ३४ ॥ 


भरु षह० १ रेष 


अण्ट्िशछोषध्यायः 
व्व 


२५२ 


पवमिक्ष्वाक्कवश्ात्‌ तु यदुवर विनिःखतः। 
चतुधी यदुषुत्रस्त॒ चरिते पुनः ॥ २५॥ 
इस प्रकार यद यदुवंश इष्वाज्वंशसे निकला है । फिर 
यदुके चार छोये पुरद्वार यद चार अन्य शाखाओमे विभक्त 
हुआ दे ॥ ३५ ॥ 
स यदुमौघवे राज्यं विखज्य यदुपुङ्गव । 
निवि्टपं गतो राजा देहं त्यक्त्वा मदीतरे ॥ ३६॥ 
वे राजा यदु अपने वदे पुत्र यदुकुल-पुञ्घव माधवको 
अपना राज्य दे इस भूतलपर शरीरा परित्याग करके खगं- 
को चले गये ॥ ३६ ॥ 
बभुव माघवश्ुतः सर्वतो नाम वीयंवान्‌ 1 
सववृत्तिगुणोपेतो साजा राजगुणे स्थितः ॥ २७ ॥ 
माधवका पराक्रमी पुत्र खस्यत नामते विख्यात हु । 
वे गुणवान्‌ राजा स्वत राजोचित गुणोमे प्रतिष्टित ये ओर 
सदा साक्षिक इत्तिते रदते ये ॥ ३७ ॥ 


सच्वतस्य खुतो साजा भीमो नाम महानभूत्‌ । 

येन भैमाः सुसंबृनत! सचतात्‌ साच्वताःस्मुताः॥२८॥ 
सत्वतके पु भम॑हान्‌ राजा भीम हुए जिनसे भावी पीदी- 

के छोग “भमः कहखये । सखतसे उत्पन्न होनेके कारण उन 

सवक “सात्वतः भी माना गया दै॥ ३८ ॥ 


राज्ये सखिते चरपे तसिन्‌ सामे राज्यं प्रशासति । 

शबुघ्रो लवणं हत्वा चिच्छेद स मधोर्वनम्‌ ॥ ३९॥ 
जव राजा भीम आनतं देशके राज्यपर प्रतिष्ठित येः उन्हीं 

दिनो अयोष्यामे भगवान्‌ श्रीराम भूमण्डल राज्यका शासन 

करते थे | उनके . राज्यकारूमे शत्ुव्नने मधुपुत्र ख्वणको 

मारकर मधुवनका उच्छेद कर डाल ॥' ३९ ॥ 


तस्मिन्‌ मधुचने स्थाने पुरीं च मथुरामिमाम्‌। 
निवेशयामास वियु; सखुमित्रानन्दवर्धनः ॥ ५० ॥ 
उसी मधुवनफे खानमे खुमित्राका आनन्द बदानेवाछे 
प्रभावशाटी रातरुव्नने इस मथुरापुरीको वसया था ॥ ४० ॥ 
पर्यये चैव रामस्य भरतस्य तथेव च। 
खमित्राखुतयोरचैव स्थानं प्राप्तं च वैष्णवम्‌ ॥ ४१ ॥ 
भीमेनेयं पुरी तेन राज्यसम्बनधकारणात्‌ । 
खव स्थापिता पूं खयमध्यासिता तथा ॥ ४२॥ 
जवर श्रीरामकरे अवतारका उपसंहार हुआ ओर श्रीराम; 
भरतः छक््षण तथा दातरुष्न सभी परमधामको पधारे, तव 
भीमने इस वैष्णव खान ( मधुरा ) को प्राप्त करिया; क्योकि 
( ख्वणकरे ) मारे जानेपर अवर उस रज्यसे उन्दीका लगाव 
रह गया था । (वे दी उत्तराधिकारी दोनेयोग्य ये| )% 
# ह्ये पुत्र यदु मघुकी पुत्री मघुमरतीके गर्भसे उत्पन्न हु 
ये; अतः वे मधुक दौदित्र ये । नानके कोई पुत्रन द्यो तो उसकी 


२५४ 


श्रीमहाभारते सिरभागे 


[ हस्वे ` 


भीमने इत पृरीको अपने वदाम किया ओरये खयं भी यदीं 
आकर रहने लतो ॥ ४१-४२ ॥ 
ततः कुरे स्थिते राज्ये छ्वे तु युवराजनि । 
अन्धको नाम भीमस्य खतो रास्यमकारयत्‌ ॥ ४३ ॥ 
तदनन्तर जवर अयोध्याक्रे राज्यप्रर कुदा प्रतिष्ठित हुए 
ओर क्व युवराज वरन गये, तव मथुरामे मीमके पुत्र अन्धक 
राव्य करने खो ॥ ४३ ॥ 
अन्धकस्य सुतो अक्षे रेवती नाम पार्थिवः। 
क्योऽपि रेवताजक्षे रम्ये पर्वतमूर्धनि ॥ ४४॥ 
ततो रेवत उत्पन्नः पर्व॑तः सागरान्तिके । 
नाम्ना रेवतको नाम भूमौ भूमिधरः स्तः ॥ ४५॥ 
अन्धकके पुत्रे राजा रेवत हए 1 रेवतसे पर्वतक्रे रमणीय 
शिखरपर छष्चका जन्म हुआ । इख मकार उनसे रेवत 
( छश्च ) की उत्ति हर्द । उस समय समुद्रके तरकी भूमि- 
पर ज विदा भूधर या, वह्‌ उसी रैवतके नामपर रैवतक 
पर्वतके नामहे प्रसिद्ध हुआ ॥ ८४४५ ॥ 
शरेवतस्यात्मजो राजा विग्वगभों महायशाः! 
यभूव परथिबीपालः पथिन्यां प्रथितः परभुः ॥ ४६॥ 
रेवत (शक्न ) के पुत्र महायशस्वी राजा विश्वगर्मं हुए; 
जो इस पृथ्वीपर प्रसिद्ध एवं भ्रभाकाटी भूमिपाल ये ॥४६॥ 
तस्य तिखपु भायौसखु दिव्यरूपा केव । 
चत्वारो ज्िरे पुरा रोकपारोपमाः श्युभाः ॥ ४७॥ 
केशव ¡ उनके तीन भायर्पिं थी । तीनो दी दिव्य रूप 
सीन्दर्यसे सुशोभित होती थी] उनक्रे गर्मते राजाक्रे चार 
सुन्दर पुत्र हुए, जो छोकपार्छोके समान पराक्रमी ये ॥५७॥ 
वखरव शुः खपेणश्च समाक्षश्चैव व्रीयंवान्‌ । 
यदुप्रवीसाः प्रख्याता रोकपालखा इवापरे ॥ ४८॥ 
उनके नाम इस प्रकार ईदै-वसु, वभ्रुः सुषेण जर 
वलवान्‌ समाक्ष । ये यदुकुल्के भ्रस्यात धरे वीर दूसरे 
ठोकरपारकि समान रक्तिसाली ये ॥ ५८ ॥ 
तैरयं यादवो वंशः पार्थिवेर्वहुलीरूतः। 
यैः साकङृष्ण छोकेऽसिन्‌ प्रजावन्तः प्रजेश्वराः॥४९॥ 
वसोस्तु इन्तिविपये वखदेवः खतो विभुः । 
ततः स जनयामास सुप्रभे द च दारिके ॥ ५०॥ 
छन्ती च पाण्डो्मदिपीं देवतामिव भूचरीम्‌ । 
भार्या च दमघोषस्य चेदिराजस्य सुप्रभाम्‌ ॥ ५९॥ 
श्रीकृप्ण ! उन राजानि इस यादव-वंरको वदाकर 
बड़ी भारी संख्यासे सम्पन्न कर दिया । जिनके साथ इस 


सम्पत्ति दीदिव्रको ट प्राप्त दौनी चाद्िये--यह गाल्लका नियम दै; 


अतः कवणासुरके मारे जानपर यदु-पीत्र मीभ दी उन्न भ्रमय उस 
राज्यके अधिकारी हृष 1 


संसा बरहुत-से संतानवान्‌ नरे ई । व्ठुसे ( जिनका दूषय 
नाम दूर था ) वसुदेव उन्न दृष । ये वुपुत्र वसुदेव ब्रह 
प्रमाव्ाटी द । वसुदेवकी उसपत्तिक्रे अनन्तर वसुने दो 
कान्तिमती कन्यार्थको जन्म दिया(जो प्रया ( कुन्ती ) 
ओर श्रुतश्रवा नामसे विख्यात हुई ) | इनमेते प्रथा कुन्ति 
देम ८ राजा ऊुन्तिमोजकरी दत्तक पुजीके रूपमे ) रदती 
थी | कुन्ती जो प्रथ्वीपर विचरनेवाखी देवाद्रनाके समान 
थीः महाराज पाण्डुकी मदारानी हुई तथा सुन्दर वान्तिसे 
प्रकाशित दोनेवाटी श्रुतश्चवा चेदिराज दमप्ोपक्री पत्नी हुई ॥ 
पप ते स्वस्य वंशस्य प्रभवः सम्प्रकीर्तितः! 
श्रुतो मया पुसा कष्ण छृष्णद्धेपायनान्तिकात्‌ ॥ ५२॥ 
श्रीकृष्ण ¡ यद मैने तुमसे अपने यादवरवं्राकी उ्वत्ति 
वरतायी दै । इसे मेनि पहले श्रीद्ष्णद्रैपायन व्याखजीसे 
सुना था ॥ ५२॥ 
त्वं त्विदानीं प्रणष्टेऽस्यिन्‌ वंशे वंशश्चतां वर । 
सख्वयम्भूरिव सम्प्राप्तो भवायास्जयाय च ॥ ५३॥ 
वंशधारियि श्रे गोविन्द्‌ ¡ ठस समय यह्‌ वंशा नषटसा 
दो चला था} परंतु तुम खयम्भू व्रह्माजीके समान इस वंशके 
उद्धव तथा हमारी विजयके व्यि इसमे अवतीर्णं हुए द्ये ॥ 
न तु त्वां पौरमात्रेण शक्ता मृहयितुं वथम्‌ । 
देवगु्येष्वपि भरन्‌ सर्वषः. सरवेमावनः ॥ ५४॥ 
इमलोग वुम्दं साधारण पुरवासी वताकर दिपानेर्मे 
असमर्थं द; क्योकि वम देवता्करि गु रदस्येवि मी परिचितः 
सर्वत तथा सवक उच्यन्न करनेवले दो ॥ ५४ ॥ 
शक्तश्यापि जरासंधं दपं योधयितुं विभो। 
त्वददुद्धिवसगाः सवं वयं योधव्रते स्थिताः ॥ ५५ ॥ 
प्रमो ! ठम राजा जरासंधसे युद्ध करनेमे समर्थं दो | हम खव 
लेग योधा्थेकरि वतम स्थिर रहकर सदा वम्र बुदिके 
वगीभूत रगे ॥ ५५ ॥ 
जरासंधस्तु चलखवान्‌ पाणां मूध तिष्ठति । 
अप्रमेयवख्श्चैव वयं च छश्साधनाः ॥ ५६१ 
परंतु राजा जरासंध व्रडा वलवान्‌ है । वह राजाभकि 
सिरपर खड़ा ह । उसके पास असंख्य सेना दै जर इधर हम 
त्रेगोकि पास युद्धकी साधन-सामग्र बहुत थोड़ी है ॥ ५६ ॥ 
न ॒चेयमेकादमपि पुरी रोधं सदिष्यति 1 
ङदाभकतेन्धनक्चामा दुगंरपरिवेष्टिता ॥ ५७ ॥ 
यह मथुरापुरी शुर्थोद्धारा क्रिये गये एक दिनके उपरोध । 
(मेरे) को भी नहीं स्‌ सकेगी; क्योकि यर्दो खाने-पीनेकी ¦ 
सामग्री बहुत कमह | ककदिर्योका सचय मी खलव्यदही है तथाः 
यद पुरी विभिन्न प्रका दोसे धिरी हुई नदीं है ॥ ५७ ॥ 


विष्णुपर्व ] 


पकोनचत्वारिखो.ऽघ्यायः 


२५५५ 


---------------------------------------((न न~~ 


असंस्छृताम्बुपस्लिा दारयन्त्रविवर्जिता । 
वप्रप्राकारनिचया , कर्तव्या वहुविस्तरा ॥ ५८ ॥ 
इतके चारौ ओरं जो जल भरनेके ल्यि खार्यो वनी 
हुई दै, उनकी बहुत दिने मरम्मत ओर सफाई नदीं हुई 
है तथा नगरे द्वारपर रक्षाके च्वि यन्त्र ( तोप भादि) मी 
न्दी खे हए ईै.। पुरीकी राक्र चि चारे ओस्ते मिदटीकी 
मोटी दीवार तथा करई पक्के परकोटे चनवानेकी आवश्यकता 
दै जिनका विस्तार्‌ ब्रहुत वद्ध हो ॥ ५८ ॥ 
संस्कर्तव्यायुधागारा योक्तन्या चेष्टिकाचयैः। 
कंसस्य वलभोग्यत्वान्नातिगुत्ता पुरा जनैः ॥ ५९. ॥ 
नगरे जितने आयुधागार ई उन सवका संस्कार 
( मरम्मत ओर सफाई ) होना चादि । जगह-जगह ई्योके 
ठेर जया ठेनेकी आवद्यकता है { कंसकी सेनाके उपयोग्मे 
अनेके कारण इस नगरकी रक्षाके व्यि लोगेनि पहलेसे कोई 
व्यवसा नहीं कर रखी है ॥ ५९ ॥ 
सद्यो निपतिते कंसे राज्येऽस्माकं नवोदये । 
पुरी प्त्य्ररोधेव न रोधं विसदहिष्यति ॥ ६० ॥ 
अभी दाम ही कंस मारा गया है, अतः हमरे राज्यका 
अभी नवोदय ' ( प्रभात ) काल है । जैसे राजक सिपाही 
कर वसूल करके चयि गोविको घेर ठेते दैः उसी तरह यदि 
इस पुरीका भी अवरोध हुआ तो यह उसे सहन न कर सकेगी ॥ 
घरं सम्म्द॑भरनं च रूष्यमाणं परेण द 1 
असंशयमिदं राष्ट जनैः सह विनयति ॥ ६१॥ 
हमारी सेना अनेको युदधोका खमना करके कारण 
हतार दो गयी है ! शतु इसे वार-वार पीडा देकर क्षीण कर 
रहा रै, अतः यह राष्ट यदहेकि निवासि्योके साथ ही नष्टो 
जायगा । इसमे संदेह नदी है ॥ ६१ ॥ । 
यादवानां विरोधेन ये भिता राज्यकाुकैः । 
ते सरवे दधमिच्छन्ति'यत्‌ क्षमं तद्‌ विधीयताम्‌ ॥ ६२ ॥ 


हमलोगनि साज्यपरा्िकरी इच्छा रखकर यादर्वीका विरोध 
करके कारण जिन-जिन ठोगोको पराजित किया है, वे सव्र 
लोग दमम एूट डाटना चाहते ६ । रखी परिस्थितिमे जो 
उचितद्ये सोकरो॥ ६२॥ 
वञ्चनीया भविष्यामो सपाणां चपकारणात्‌ । 
जरासंघभयातीरनां दवतां राज्यसम्ध्रमे ॥ ६२॥ 
राजा जरासंध कारण दृसरदूषरे राजा भी ह्म धोखा 
दो; क्योकि वे जरासंधके भयते पीडित दै ओर अपने 
राज्यम कोद विष्ठव न मच जाय, इसके उरसे सव-के-षव 
उसके पीछे दौढते दै ॥ ६३ ॥ 
आती वक्ष्यन्ति नः सवे रुष्यमानाः पुरे जनाः । 
यादवानां विसेघेन विन्ठाः स्मेति केशव ॥ ६४ ॥ 
केराव | यदि इस नगरे सव्र रोग श्रुजकि घेरा 
डालनेसे अवर्द्ध हो जर्येगे तो ये पीडित रौकर हमारे 
लि यदी कटैगे किं हम यादर्वोकर विरोधे नष्ट दो गये ॥६४। 
एतन्मम मतं ष्ण विखम्भाव्‌ समुदाहृतम्‌ । 
त्वं तु विक्षापितः पूर्व न पुनः सम्प्रयोधितः ॥ ६५॥ 
श्रीकृष्ण | यद मेरा मत है, जिते तुमपर विश्वास होनेके 
कारण मैने प्रकट किया दै । तुम इस व्रातकी पहले-पहल 
सूचना दी गयी दै} ठम्दे समन्चनेका प्रयल नदीं किया 
गया ३ ॥ ६५॥ 
यदघ्न चः क्षमं ष्ण तश्च वै संविधीयताम्‌ । 
त्वमस्य नेता सैन्यस्य वयं त्वच्छासने स्थिताः। 
त्वन्मूखश्च िसेधो ऽयं रक्लास्ानात्मना सह ॥ ६६ ॥ 
श्रीकृष्ण † इस परिस्थितिम जो उचित होः वह करो । 
तुम इस यादव-तेनाके नेता दो भर हम ठंम्दरे शास्म 
स्थित दै । इस विरोधके मूर कारण वुम्दीं दो, इसल्मि त॒म 
अपने साथ ही दमलो्गोकी रघा करो ॥ ६६ ॥ 


इति श्रीमहाभारते खिरुभगे हरिर विष्णुपर्वैण चिक्टुवाक्यं नामाषटव्रिशोऽध्यायः ॥ ३८ ॥ 
इस प्रकार श्रीमहाभारते सिराम्‌ इरिवंशेके अन्तत विष्णुपर्व दिका वाक्यतरिषयरु अदृतीसवः अध्याय पूरा हुमा ॥ ६८ ॥ 


एकोनचत्वारिशोऽ्यायः 


वरराम ओर श्रीकृष्णका परी ओर पुखापिर्योकी राके सिय मधुरासे दिण भारतकी ओर प्रान, 
परशयुरामजीसे उनकी भेर तथा उन दोनोको गोमन्तपर्वतपर चरनेके लिये उनकी चला 


ठेद्म्पायन उवाच 
विकद्रोस्तु वचः श्रुत्वा वसुदो महायडाः । 
परितुष्टेन मनसा वचनं चेदमनयीत्‌ ॥ १९ ॥ 
वैशम्पायनजी कहते है--जनमेजव ! विकदरुकी वात 
खनकर महायशस्वी वसुदेव संतुष्टचित्तसे इस प्रकार 
बोरे--॥ ९ ॥ 


राजा पाडगुण्यवक्ता वै राजा मन्त्राथैतच्ववित्‌। ~ 
सतत्वं च हितं चैव ङष्णोक्तं किर धीमता ॥ २ ॥ 

“श्रीकृष्ण ! जो राजनीतिके छः गुर्णेसि युक्त ब्रात बरोञे 
अथवा उन छो गुर्णोके रपयोगका अवसर बताये; वद राजा 
दै। जो ,मन््राय॑तत्व (युत मन्नणाका प्रयोजन एवं मत्व ) 


द५द 


रीमष्टाभारते खिलभागे 


[ हरिवो 


समञ्चता हो, वह रजा दे । बुद्धिमान्‌ विकद्रने तच्च ओर दित- 
की बात वतायीदै॥ २॥ 
भाषिता राजधमौश्च सत्याश्च जगतो हिताः। 
विक्रदुणा यदुश्रेष्ठ यद्धितं तद्‌ विधीयताम्‌ ॥ ३ ॥ 
व्यदुशरेष्ठ ! विकद्रने उन राजधर्मोकि प्रतिपादन किया 
हैः जो सत्य होनेके साथ ही जगते ल्यि हितकर द! अव 
म्ह जो दितकर जान पडे, वह कसेः ॥ 
पतच्छुत्वा पितुवौक्यं विक्रदरोश्च महात्मनः । 
वाक्यसुत्तममेकाय्रो वभापे पुरुषोत्तमः ॥ ४ ॥ 
अपने पिता वमुदेव तथा मदात्मा विक्रद्रुका यद कथन 
सुनकर पुरषोत्तम श्रीकृष्णे एकाप्रचित्त होकर यह ॒ उत्तम 
वात कदी-] ४ ॥ 
तुवतां वः श्रुतं वायं हेतुतः करमतस्तथा । 
न्यायतः श्चाखतश्चैव देवं चैवाञुपदयताम्‌ ॥ ५ ॥ 
ध्यापलोगेनि वैरफे मूलकारण, गद्रुके पराक्रमः 
न्यायोचित वर्तावः शाघ्रकी आज्ञा तथा दैवक्छ मविष्यमे 
होनेवाले कार्यपर दृष्टि रखते हुए जो कुछ कदा ई 
वह सव्र्यँने सुन ल्य ॥ ५॥ 
श्रयतामुत्तरं वाप्त्यं श्वुतवा च परिगृह्यताम्‌ । 
नयेन ग्यवषतंव्यं पार्थिवेन यथाक्रमम्‌ ॥ £ ॥ 
संधि च विग्रहं चैव यानमासनमेव च। 
दैघीभावं संभवं च पाड्गुण्यं चिन्तयेत्‌ सदा ॥ ७ ॥ 
अव उसका उत्तर सुनिये ओर सुनकर यदि ठीक 
जचे तो उसे ग्रहण कीजिये । दस्मे संदेह न्दी किं राजाको 
राजनीतिके अनुसार व्यवहार करना चाहिये । उसक्रे ल्यि यद 
उचित है करि संधिः विप्रः यानः आसनः दैधीभाव ओर 
समाश्रय-दइन छः रर्णोका क्रमशः सदा चिन्तन करता 
रदे ॥ ६-७ ॥ 
यलिनः संनिरृ्टे तु न स्थेयं पण्डितेन वै । 
अपक्रमेद्धि काठक्षः समथा युद्धमुदददेव्‌ ॥ ८ ॥ 
धविद्वान्‌ पुरुषको चाहिये कि वह वलवान्‌ शुके समीप 
न ठरे ! समयका ज्ञान रखनेवाला पुरप्र वलवान्‌ शतुसे अपनी 
रक्चा करनेक्रे स्मरि खान छोड़कर हट जाय । यदि वह रात्र 
सेनाका सामना केके व्यिसमर्थं दो तो युद्धका बोद्च 
उठवि ॥ ८ ॥ 


संपि, विह आदि छः गृरणोका संक्षिप्त परिचय शस प्रकार 
दै--श्वुते मेल रखना संपि, उस्तसे कड छेडना विग्रहः माक्रमण 
कना यान, अवस्तरकी प्रतीक्षामे 2 रदना आसनः दुरम नीति 
चेतना द्रैषीमाव भीर्‌ अपनेसे वर्वान्‌ राजाकी दारण ठेना समाश्रय 
कदकाता ह 1 


अहं तावत्‌ सार्यण सुहतं ऽस्मिन्‌. प्रकादिते । 
जीवितां गमिष्यामि शक्तिमानप्यराक्तवत्‌ ॥ ९ ॥ 
भमै यक्ति्ाटी होकर भी असमर्थकी मेति इस वर्तमान 
महूर्तम मेया बल्रामजीकरे साथ जीवनकी रधकरे चयि यदेति 
पलायन करूंगा ॥ ९ ॥ ,. 
ततः सद्याचलयुतं सहा्यंणादमक्षयम्‌ । 
आत्मद्धितीयः श्रीमन्तं पवेक्षये दक्षिणपथम्‌ ॥ १०॥ 
ध्यति प्रान करनेके वाद्‌ मँ आर्यं -व्रस्यामके साय 
अपने आपको दी उनका दूसरा साथी वनाकर उस्र अक्षय 
शोभासम्पन्न दक्षिणापथमे प्रवेश करूंगा, जो सह्य पर्वते 
मिल्-ज॒ल दै ॥ १० ॥ 
करवीरपुरं चैव॒ र्म्यं क्रौश्पुरं तथा। 
दरकष्यावस्तज्न सहितौ गोमन्तं च नगोत्तमम्‌ ॥ ११॥ 
ध्वा हम दोनों माई एक साथ रहकर करवीरपुर, 
रमणीय क्रौच्चपुर तथा पर्वतश्रेष्ठ गोमन्तका ददन करगे ॥ 
आवयोर्गमनं श्युत्वा जितकाशी स ` पार्थिवः। 
अप्रविद्य पुरी दर्पीदयुसारं ` करिष्यति ॥ १२॥ 
ध्टमलोर्गोका दक्षिण-गमन सुनकर विजयसे सुशोभित 
होनेवाख राजा जरासध वल्के घमण्डमे अकर मथुरापुर 
प्रवेरा न करके हमारा पीछा दी करेगा ॥ १२॥ 
ततः सद्यवनेष्वेव राजा याति स सायुगः। 
आवचयोग्रदणे चेव ॒ दपतिः प्रयतिष्यति ॥ १३॥ 
“ प्तत्यश्चात्‌ हमारा अनुखरण करता हुआ वह राजा सेवको 
सहित स्याचर्के वनम दी जा पर्हूचिणा ओर दम दो्नोको 
पकड़ लेनेके लि पूरा प्रयत्न करेगा ॥ १३ ॥ 
पषा नः ्रेयसी यात्रा भविष्यति इरुस्य वै । 
पौराणामथ पुयौश्च देशस्य च सुखावहा ॥ १४॥ 
ष्टमासी यह यात्रा इस यादवछुलके लि कल्याणकारिणी 
होगी तथा पुरवासिवेकि, मधुरापुरीके एवं इस श्यूरसेन देशके 
च्ि मी उखदायिनी होगी ॥ १४॥ 
न च शोः परिश्रष्ठा राजानो विजिमीपवः। 
परराष्ेयु खष्यन्ति सधे होः क्षयं धिना ॥ १५॥ 
'विजयकी इच्छा रखनेवाठे राजालोग जव शत्रु हाथमे 
आक्र निकर जाता हैः तत्र वे उस शकते राज्यों पर्हुचकर 
युद्धम उसका वध क्रिये विना शान्त नदीं होते ई" ॥ १५ ॥ 
पवमुक्त्वा तु तौ वीरौ छष्णसंकर्पणावुभो । 
प्रपेदतुरसम्ध्रान्तौ दक्षिणौ दक्षिणापथम्‌ ॥ ६६॥ 
रेसा कहकर वे दोनों नीतिनिपुण वीर श्रीकृष्ण ओर 
संकर्षण चिना किसी घव्ररादयफे दक्षिणापथकी ओर चछ 
दिये ॥ १६॥ 


तौ तु राषटराणि शतदाश्चरन्तौ कामरूपिणौ । 
दक्षिणां दिक्मास्थाय चेरतुमी्गगौ सुखम्‌ ॥ १७॥ 
हृच्छानुसार रूप धारण करनेवलि वे दोनो कीर सेक 
रासतोपर विचरते हुए दक्षिण दिशम परहुचकर उत्तम मार्गका 
आश्रय टे सुखपूवक अगे व्रदने लगे ॥ १७ ॥ 
स्पृष्टे रम्येषु मोदमानाबुभौ तथा। 
दक्षिणापथगौः बीरावध्वानं सम्ध्रपेदतुः ॥ १८ ॥ 
सद्यपर्वतके रमणीय शिखर्योपर सानन्द विचरते टुए वे 
दोनो दक्षिणापथके वीर यात्री अपने मार्म॑पर बृदते ही चले 
गये ॥ १८ ॥ 
तौ च स्वल्पेन काटेन सद्याचरविभूपितम्‌ । 
करवीरयुरं शरासतौ स्ववंदोन विभूषितम्‌ ॥ १९॥ 
थोदे दी समयमे वे दोनो भाद्‌ सद्यफ़ी पर्वत-माखओंि 
अलंकृत करवीरपुरम जा पर्हुचेः जो उन्दींके वंश्के लोगे 
विभूपित था ॥ १९ ॥ 
ती तन्न गत्व( वेणा नयास्तीरान्तमाधितम्‌ । 
आसेदतुः भ्ररोहाद्यं न्यग्रोधं तसुपुद्धवम्‌ ॥ २०॥ 
वरहा पर्हुचकर वे दनो वीर वेणा नदीकरे तटपर ही बरद 
हए, बरोदसि युक्तं एक श्रेष्ठ बभ वरगदके समीप गये ॥ 
अधस्तात्‌ तस्य ब्रक्षस्य मुनि दीप्ततपोधनम्‌ 1 
अंसावसक्तपर्युं जरावदकखधारिणम्‌ ॥ २१९॥ 
गौरमग्निरिखाकारं तेजसा भास्कसोपमम्‌ । 
्षत्रान्तकरमक्षोभ्यं . वयुप्मन्तमिवार्णवम्‌ ॥ २२॥ 
न्यस्तसंकचिताघानं काठ हुतहुताशनम्‌ । 
दिन्नं न्रिपवणाभ्भोभिराद्यं देवयुं यथा ॥ २३॥ 
सघत्सां धेदकां देतां दोमधुक्‌ कामदोदनाम्‌। 
क्षीसर्खण कर्प॑माणं महेन्द्रगिरिगोचरम्‌ ॥ २७॥ 
द्दशुस्तौ सदितावपरिश्रान्तमग्ययम्‌ । 
भागंवं राममासीनं मन्द्रस्थं यथा रविम्‌ ॥ २५॥ 
उस वृक्षक नीचे उद्ीप्त तपस्वी भगुनन्दन परञ्यरामजी 
विराजमान थेः जिनके एक॒ कंथेपर फरसा सय हआ था 
ओर जो जय ओर वत्करर धारण क्रि हुए ये | उनके 
दारीरका वर्णं गौर तथा अग्निरिखाके समान प्रकादामान था। 
वे सूर्यके समान तेजसी दिखायी देते ये । क्षत्रियका 
अन्त करनेवाठे परज्युराम किससे क्षुग्ध दोनेवरे नही ये । 
वे मूर्तिमान्‌ समुद्रके समान गम्भीर प्रतीत होते थे । उनका 
अम्न्याधान-सम्बन्धी कायं समाप्त एवं संकुचित दहो चुका 
याः पिरि भी वे समय-खमयपर प्रज्वलित अग्निम आहूति 
दिया करते ये । तीर्न समय स्नान करनेके कारण उनका 
शारीर एवं वस्र जल्मे भीगे हुए थे | वे देवतार्थके आदि. 
गुर बृहस्पतिके समान जान पड़ते ये । उनके पास जो 


धकोनचत्वारिदशोऽध्यायः 


2५७ 


दवेत रंगकी सवत्सा ( वख्देवाटी ) येनु थी, वह केवल 
होमके लियि दुदी जाती यी, दसव्थि टोमघेनु कदलाती थी । 
इसके सिवा वट्‌ मुनिकी इच्छाके अनुसार समस्त वस्तुको 
देने समर्थ थी, इसलिये कामदोदना या कामधेनु कखाती 
यी । दूघरूपी अग्निक प्रकट करनेके च्य अरणीके समान 
ज्लोभित केनेवाटी उस ॒होमपेतुको परश्चरामजी कीं खच. 
करकजा रहेये | वे कमी परिधरमत्ते थक्ते नदी 
ओर अविनाशी दै | श्रीदष्ण ओर बर्यमने महेन्द्र गिखिर 
विचरनैवारे परश्चरामजीको , वरहो मन्दराचल्के शिखरपर 
प्रक्ित होनेवले सूरये समान देखा ॥ २१-२५॥ 
न्यायतस्तौ त॒ तं षट पादमूटे रतावरी । 
वसुदेवसुत वीरौ सधिष्ण्याविव पाचको ॥ २६॥ 
उनका दर्शन करके वसुदेवके उन दोनों वीर पु्रनि 
न्यायातुसार उनके चरणेमिं हाथ जोड़कर प्रणाम किया । वे 
उस समय वेदीपर प्रज्वलित अग्नियेक्रि समान जान पडते 
थे ॥ २६॥ 
कृष्णस्तस्टषिशादृंलसुवाच वदतां वरः। 
दलक्ष्णं मधुरया वाचा रोकचत्तान्तकोविद्‌ः ॥ २७॥ 
इसके बाद वक्ता्ओमं श्रे एवं लोकवृत्तान्तके शाने 
कुश श्रीकृष्णने मुनिश्रेष्ठ परग्रामजीसे स्नेदयुक्त मधुर- 
वाणीम कदा-)) २७ ॥ , 
भगवन्‌ जामदग्न्यं त्वामवगच्छामि भागंवम्‌। 
रामं सुनीनार्षभं क्षन्नियाणां कुलान्तकम्‌ ॥ २८ ॥ 
ध्मगवन्‌ | मँ समक्ता ह कि आप भृगुकुलभूषण क्षत्रिय- 
ुरविनाशक मुनिश्रेह जमदग्निनन्दन परश्चरामजी ६ ॥ २८॥ 
त्वया सायक्वेगेन क्षिपो भागव सागरः । 
दयुपातेन नगरं छतं श्रुपौरकं त्वया ॥ २९ ॥ 
“शरगुनन्दन ! आपने अपने वाणके वेगसे समुद्रको 
पीछे टकेल दिया स्थीर जितनी दरीमे ब्राण गिरा समदरसे 
उतनी दी भूमि लेकर वरो शरर्पारक नगरका निर्माण 
किया | २९॥ 
धलुःपञ्चशत्ायाममिपुपञ्चरातोच्छयम्‌ 1 
सह्यस्य च निकुञ्जेषु रफीतो जनपदो मदान्‌॥ ३०॥ 
'्उस नगरकी खाई पोच सौ धनुष ओर चीडाई र्पौच 
सौ वाण दे । स्यपवंतके निङुोमि वह समद्धिशाली मदान्‌ 
जनपद्‌ त्रसा हुमा दै ॥ ३० ॥ 
अतिक्रम्योदघेव॑लामपरान्ते निवेशितः । 
त्वया तत्‌ कार्तवीर्यस्य सहस्नमुजकाननम्‌ ॥ ३१॥ 
छिन्नं परदयुनेकेन स्मरता निधनं पितुः । 
# धनुष चार शायख्वा जौरबाणदो राय रवा माना 
गया दै । 


२५८ 


शीमष्टाभारते खिकभागे 


{ दसि 


"आपने समुष्वेलक्रा उल्छद्वन करके अपयान्तदे मे 
८ जो पिम खमुद्रके तटपर दै ) उख महान्‌ जनपदको वसवा 
है! आपने टी अपने पिताकरी मू्युको याद कखे एक दी 
फरसेसे कार्तवीर्वकौ सद अुजार्थोका वद जंग काट 
डालाथा | ३१३ ॥ 
श्यमदयापि रुधिरैः क्षतियाणां हतद्विषम्‌ ॥ ३२॥ 
स्निग्धेस्त्वत्परदत्खष्टै रकपङ्का वस्ुंधस । 
रेणुकेयं विजाने त्वां श्चिठी क्षितिपसेयणम्‌ 1 ३२ ॥ 

(आपके द्वारा मरि रये जो दाचरुभूत श्त्निय येः आपके 
फरसेते प्रवादित हुए उनके सिग्ध॒च्थिरते आज मी यद 
वसुन्धरा भीगकर स््तद्री कीचसे युक्त द्लिावी देती दै | मै 
जानता हू क्रि आप भूमण्डले श्वतिर्योपर रोपर प्रकट करने- 
बाठे रेणुकानन्दन पुरदछछराम ई ॥ ३२-३३ ॥ 


परदयुप्रप्रहे युक्तं यथैवेह रणे तथा 
ठदिच्छावस्त्यया विधं कंचिदर्थसुपश्चुतम्‌ ॥ ३९ ॥ 
उरं च श्रुतार्थेन भत्युक्तमविह्ङ्कया 1 
वकर्योकि आप रणभूमिकी ही भति यहा मी फरा चि 
हए. ई, यतः विप्रवर { दम दोर्नौ चापे एक वात पूना 
चाहवे ईद तया आप हमार वात सुनकर निर्भक्रिदोदम जो 
उत्तर दे, उवे सुननेकी मी हमारी इच्छा हे ॥ ३४१ ॥ 
आवयोमैयुर यम यमुनातीरद्णोभिनी ॥ ३५ ॥ 
यादवौ स्वो सुनिधेष्ठ यदि ते श्चुतिमागतो 1 
घलुदेवो यदुश्रेष्ठः पिता नौ हि धृतव्रतः ॥ ३६॥ 
भुनिश्रे्ठ पर्रम { हमारी निवासभूमि मथुरापुरी दै, 
जो यमुनातरपर खोमा पाती है । हम दोनो यादव ईद। यदि 
हमरे नाम भी कमी आपके कानेमिं पडेर्दौ तो आप हरम 
जानते मी हग । यदुङ्कच्के श्रे पुदष तथा उत्तम तत. 
धारण करनेवछठे वसुदेवजी हम दोनेक्रि पिता ॥२५-३६॥ 
जन्मम्रभूति चैवावां अजेष्वेव नियोजित । 


चौ स्वः कंसखभयात्‌ तश्र शङ्धितौ परिवद्धितौ ॥ ३७ ॥ - 


ष्टम दोर्नौ माई जन्मसे दी कंखकर- मयते त्रजमे ही सक्ते 
गये ओर वदं उससे शा्कित रहकर वडे हुए द ॥ ३७ ॥ 
वयश्च प्रथमं प्रप्त मथुरायां भवेदितौ । 
तावावां व्युत्थितं दत्व! समाजे कंसमोजसा ॥ ३८ ॥ 
पितरं तस्य तथैव स्थापयित्वा! जनेश्वरम्‌। 
स्वमेव कम॑ चारव्धौ ग्वा व्यापारकारकौ ॥ ३९॥ 

प्रथम क्रिदयोरावस्याको ग्रात होनेपर हम दोनों मार्या 
करा मयुर प्रवेद हआ । वरहो दमने धर्म-मर्वादाते विचलित 
दए कंको रंगव्रालर्मे वल्पूर्वक मार डाल्म ओर उसके रा्य- 
पर उ्तीके पिताको राजा बनाकर व्रिठा दिवा तवशात्‌ 
सदासे गोपाटन-सखम्बन्धी कर्यं करमनेवले हम दोना माइयेनि 


= =-= =^ 


ककड 
फिर वही अपना काम-घंधा आरम्भ कर दिया ॥ ३८-२३९॥ 
अथावयोः पुरं रोद्धुं जरासंधो व्यवस्थितः । 
संग्रामान्‌ खुवहन्‌ त्वा ख्धलस्षावपि स्वयम्‌।। ४०५ 
ततः स्वपुररक्ताधं ध्जानां च धतत्रत। 
यङूताथौवयुद्योमो कर्तन्यवरुखाधनो ॥ ४९१॥ 
(तदनन्तर राजा जरासंधने इम दो्नेकरि नगरपर धेर 
डालनेके च्वि निश्चित विचार कर लिया | यश्चपि दम दोना उसके 
साथ वहन युद्ध कर चुके ई ओर उन्म अपना कश्च चिद 
करें सफर मी हुए दै तथापि अपने नगर ओर प्रनाज्नौ- 
करी रक्तक ल्मि इमने जरासंधते छ्डुनेके च्वि कोई उन्रोग 
नदी करिया व्रतधारी सुने { अमी मलोक शक्ति ओर साधनक्र 
संचयकररना है, अतः यक्तार्थ होकर दी मलोग वदखि चट 
पड़े ॥ ४०--४१ ॥ । 
अरथौ पत्तिनौ युद्धे निस्तल॒जौ निरायुघौ । 
जरासंधोदमभयात्‌ पुराद्‌ द्वावेव निः ॥ ४२॥ 
मारे पास युद्धे च्ि रय नदी है । इम वैदल दी ई । 
हमारे शरीरणर कवच ओर हार्थो अल्र-राल्र भी नदीं ई । 
इम जरासंधके आक्रमणके मयते नगस्को छोडकर केवल दो ` 
हयी जने वदेसि निकल अवि ई ॥ ४२ ॥ 
पएवमावामनुप्रा्तौ समुनिशे्ठ॒ तवान्तिकम्‌ 1 
आवयोर्मन्घ्रमात्रेण करतमर्दसि सच्ियाम्‌ ॥ ४३॥ 
भमुनिश्रष्ठ ! इख प्रकार हम दोनो आपके निकट अयि 
ह! आय हम सल्महमात्र देकर हमारा सत्तार करे" | ४३ ॥ 
श्ुत्वैतद्‌ भार्गवो रामस्तयोकौक्यमनिन्दिवम्‌ 1 
रेणुकेयः प्रतिवचो ध्म॑संहितमत्रवीत्‌ ॥ ४४ ॥ 
उन दोर्नोक यह निर्दोष वचन सुनकर रेणुकानन्दन 
भगुवंदी परद्यरामने उन्हे यह्‌ धर्मयुक्त उत्तर दिया--11४४।) 
अपरान्वाद्ं छ्ृष्ण॒सम्प्रतीदागतः प्रभो । 
एक प्व विना हिष्यैथुंवयोरम॑न्ध्रकारणात्‌ ॥ ४५॥ 
'प्रमावक्षाटी श्रीकृष्ण ! मै ठम दोर्नोको सल देनेके ° - 
चयि ही इस समय यहो अपरान्तते अक्रैल्य ही चला आया हूं । , 
चिर्प्योकरो मीरमैनेसाथनदींचि है 1 ४५॥ 
विदितो मे वजे वासस्तव पद्मनिभेक्षण । 
दानवानां वधश्चापि कसम्यापि दुरात्मनः ॥ ४६॥ 
धकमल्नवन ! वुम्दाया जो वरजम निवास हज है तया 
वम्हारे दयाथसे जो दानर्वो ओर दुत्मा कंसक्रा वध हुञा दै, 
वह्‌ सत्र मुञ्चे विदित दे ।॥ ४६॥ 
विच्रहं च जरासंध विदित्वा पुरुषोत्तम । 
तव सखश्राठृकस्येह सम्प्ास्तोऽस्ि वरानन ॥ ४७ ॥ 
धसुन्द्र मुखवाटे पुर्योत्तम ! जरासंधके साथ होनेवाठे 


~ ५१ ष 


विष्णुपवं | 


विगरहको जानकर ही मँ मा्ईसदित वमे मिल्नेक व्ि य 
आ गया दू ॥ ४७] 
जाने त्वां कृष्ण गोततारं जगतः प्रथ्ुमन्ययम्‌ 1 
दैवकायोर्थसिद्धःधर्थमवाटं -वाखतां गतम्‌ ॥ ४८ ॥ 
श्रीकृष्ण | मै तुम्हे अच्छी तरह जानता ह| तुम जगत्के 
रक्षक अविनाशी 'भगवान्‌ हो ओर देवतार्ओका कायं सिद्ध 
करनेके ल्ि वाल्क न होनेपर भी वाल्क बनकर प्रकट 
हृएदो ॥ ४८॥ `. _. 
न त्वयाविदितं, किचित्‌ धिषु ठोकेषु वियते । 
तथापि भक्तिमात्रेण श्णु वक्ष्यामि ते वचः ॥ ४९॥ 
तीनों लोकमि जो ऊुछ भी है, वह तुमसे अविदित नहीं हे 
(अतः वरम सलाह देनेकी कोई आवद्यकता नहीं है ); तथापि 
म अपनी भक्तिमात्नसे प्रेरित हो ठमसे जो वात कदता हूः 
उसे खनो ॥ ४९॥ । 
ूर्वनैस्तव गोविन्द्‌ पूरं पुरमिदं छतम्‌ । 
करवीरपुरं नाम रां चेव निवेरितम्‌ ॥ ५०॥ 
“गोविन्द्‌ | पहले तुम्हारे पूर्व॑जेनि य्ह इस करवीरपुर 
नामक नगरका निर्माण. किया ओौर इत रष्टूको वसाया है ॥ 
पुरेऽस्मिन्‌ पतिः रष्ण वासुदेवो महायशाः । 
म्गाल इति विख्यातो नित्यं परमकोपनः ॥ ५१॥ 
“रीकृष्ण | इस करवीरपुरमै इस समय महायशसखी 
वासुदेव रहता दैः जो श्रगार नासे विख्यात है । वह सदा 
ही अत्यन्त करोधमे भरा रहता है ॥ ५१ ॥ 
पेण तेन गोविन्द्‌ . तव वंशभवा पाः । 
दायादा निहताः सवं वीर दवेषाजुशायिना ॥ ५२॥ 
ध्वीर गोविन्द ! सदा द्वेषका दी अनुसरण करनेवाले 
उस राजा श्गालने ठार करुल्मे उद्यन्न हुए समस्त 
उत्तराधिकारी क्षत्रिय नरेशको मार डास है ॥ ५२ ॥ 


अहंकारपरो नित्यमजितात्मातिमत्ससी | 
राज्येश्वयमदाविषठः पुत्रेष्वपि च दारुणः ॥ ५९ ॥ 
“वह्‌ नित्य धमंडमे भरा रहता है । उसक्रा मन वामे 
नही ह । बह दूसरे अत्यन्त डाह रखता है । राज्य ओर 
फेशर्यके मदसे उन्मत्त हकर अपने युते मरति मौ निरदयता- 
पं वर्तव करता ३ ॥ ५३ ॥ 
तन्नेद भवतः स्थानं रोचते मे नरोच्तम 1. 
करवीरपुरे थेरे नित्यं॑पार्थिवदूपिते ॥ ५४ ॥ 
(नरश ! इसील्थि यहो सर्वदा इस राजद्वारा कलङ्कित 
धोर करवीरपुरमं तम्दारा ठहरना यञ्च ठीक नी चता दै॥ 
श्रयतां कथयिष्यामि यन्नो शत्रवाधनो । 
जरासंधं वलोदध्रं भवन्तौ योधयिप्यतः ॥ ५५॥ 


पकोनचत्वारिश्चो ऽभ्यायः 


२५९ 


[क 
--~-----------------~------ः 


“नह रहकर ठम दोनों बन्धु शतरुको वाधा पर्हूचाते हु 
चरमे बदे-चदे जरासंधके सथ युद्ध करगे; उस खानका 
परिविय देता हूः सुनो ॥ ५५ ॥ । 
तीत्वौ वेणामिमां पुण्यां नदीमयैव वाुभिः। 
विषयान्ते निवासाय गिरि गच्छाम दुर्गमम्‌ ॥ ५६॥ 

ष्टमखोग आज दी इस पुण्य नदी वेणाको भुजाअसि 
ही पार्‌ करके इस देशकी सीमापर खित एक दुर्गम पर्वतपर 
चले चट, वहीं निवास करेगे ॥ ५६ ॥ 


रम्यं यज्ञगिरिं नाम सद्यस्य प्ररुहं गिरिम्‌ । 
निवासं मांसभक्षाणां चौराणां घोरकर्मणाम्‌ ॥ ५७ ॥ 
“उस पव॑तका नाम है यज्ञगिरि, जो. सहापर्वतकी ही 
उपशाखा है । वह बड़ा ही रमणीय स्थान दै । वरहो इन दिनों 
भयानक कर्म करनेवके मांसादारी चोरडककुओंने अङ्का जमा 
सला हे ॥ ५७ ॥ । 
नानाद्ुमरतायुक्तं चिं पुष्पितपादपम्‌। . 
म्रोष्ये त निशामेकां खटवा नाम निम्नगाम्‌॥ ५८ ॥ 
भद्रं॑ते संतरिप्यामो निकपोपलभूषणाम्‌ । 
गह्ापपातप्रतिमां श्रां च महतो गिरेः ॥ ५९ ॥ 
“उस पर्वतपर मति-मोतिके क्ष ओर कतार ठहल्दा 
रदी द । वक्षेमि पल लगे हुए द । इते उस प्व॑तकी 
विचित्र शोभा होती है । वरहो दमरोग एक रात निवास 
करगे | तदनन्तर खट्वाङ्गा नामवारी नदीको पार करेगे, जो 
कसोरीके पत्थरोते विभूषित है । व॒ग्हारा मख हो | वह नदी 


उस महान्‌ पर्वतसे गिरी हुई ३, जो गङ्खक़े प्रपात-सी 
दिखायी देती हे ॥ ५८-५९ | 


तस्याः भ्रपातं द्रक्ष्यामस्तापसारण्यभूयणम्‌ । 
उपथुज्यत्विमान कामान्‌ गत्वा तान्‌ घरणीघयन्‌॥ द०॥ 
द्रक्ष्यामस्तच तान्‌ विप्राज्छम्यतो वै सपोधनान्‌। 
रम्यं कौश्चपुरं नाम गमिष्यामः पुरोत्तमम्‌ ॥ ६१ ॥ 


'खट्वाङ्खाका प्रपात ( श्रना ) तापसारण्यसे विभूष्रित 
हैः हमलेग उसे देखेगे ओर वहीं छु खा-पीकर 
इन कमनीय एवं परसिद्ध परवतपर विचरते हुए बह उन 
तपसौ ब्राहर्णोका दर्दान करेगे, जो तपम संन होकर कष्ट 
उठा रहे है । तयस्चात्‌ हम रमणीय एवं शरेष्ठ नगर करौ 
पुरम चलेगे ॥ ६०६१ ॥ 
वंशाजस्तत्र ते राजा कृष्ण धर्मरतः सदा । 
महाकपिरिति ख्यातो नचास्यजनाधिपः ॥ ६२ ॥ 

श्रीकृष्ण [ वरो वम्दरि ही कुक उन्न एक राजा 
राव्य करते्ैः जो सदा धर्मम तत्र रहनेवाले ह, उनका 
नाम है महाकपि । वे चनवासौ जनयद्‌ तथा वर्होकी निवासी , 
प्रजाजेक्रे अपिपति ह ।{ ६२ ॥ । 


३६० 


---~----------~~------- 


तमृष्व राजानं निवासाय गतेऽहनि । 
तीर्थमानडददं नाम॒ तत्नस्थाः स्याम संगताः ॥ ६२ ॥ 
(उस राजामे मिल विना ही हमलोग निवासफे व्ि 
संध्या होते-दोते आनडह नामक तीर्थे जा पर्रचेगे ओर वहं 
एक साथ मिदर रदैगे ॥ ६३ ॥ 
ततश्च्युता गमिष्यामः सद्यस्य चिवरे गिरिम्‌। 
गोमन्तमिति विख्यातं नेकम्शद्गविभूष्रितम्‌ ॥ ६४ ॥ 
ध्वहेसि उतरकर हमलोग सद्यपर्वतक्री गुफारम होते हुए 
उस गोमन्त नामसे विख्यात गैरपर जा प्र्चगे, जो अनेकानेक 
शिखरि विभूप्रित दे ॥ ६४ ॥ 
स्वग॑तैकमदाश्रद्धं दुरसरोदं खभैरपि। 
विश्रमभूतं देवानां च्योति्भिरभिसंचतम्‌ ॥ ६५॥ 
“इसका एक विशाल दिखर इतना ऊँचा दै किं वह्‌ 
खग॑लोकतक पर्टुवा हुआ जान पड़ता है । आक्राराचारी 
पकिर्योके ल्ि भी उपर चदृना कठिन दै । वह देवतार्ओका 
विश्राम-र ह ओर व्योतिर्येसि विरा हुआ दै ॥ ६५ ॥ 
सोपानभूतं खर्ग॑स्य॒गगनाद्रिभिवोचिद्तम्‌ । 
तें विमानावतर्णं भिरि मेरुमिवापरम्‌ ॥ ६६॥ 
'८उसे खर्गका सोपान समन्ना जाता दै । वह उचतम 
पर्त ८ भूतल्का नदीं ) आक्रादक्ा-सा पर्वत जान पडता द । 
उसप्र देवता्ओक विमान उतरत द॑ तथा वह दूसरे मेख- 
गिरिके समान प्रतीत होता दै ॥ ६६ ॥ 
तस्योत्तमे मदाग्धङ्गे भास्वन्ती देवरूपिणौ 1 
उदयास्तमये सयं सोमं च ज्योतिधां पतिम्‌ ॥ ६७॥ 
ऊर्मिमन्तं समुद्रं च अपारद्धीपभूपणम्‌ । 
मर्वमाणौ सुखं तत्न नगात्रे विचरिप्यथः ॥ ६८ ॥ 
तुम दोनो भाई देवता समान दिव्य रूपधारी तथा 
तेजस्वी दो । उस गोमन्ते गिरिके महान्‌ शिखरपर आरूढ 
दोकर उदय ओर अस्तक समय सूर्यं प्रवं नक्ष्क स्वामी 
चन्द्रमाका तथा अपार द्ीपोसे विभूषित यर दरन्नमाखाओषे 
अलंकृत समुद्रका दन कसते हुए छम दोना बन्धु वर्ह 
पर्वतीय शिखे अग्रभागे खुखपूर्क विचरोगे ॥६७-६८॥ 
द्गस्यौ तस्य शैलस्य गोमन्तस्य वनेचरौ । 
दुर्गयुद्धेन धावन्तौ जरासंधं विजेप्यथः ॥ ६९॥ 
(उस गोमन्त नामक दौरे िखरपर रहकर वदेकि 


- वनमेःविचसते हए ठम दोना वीर दुग-युद्द्वारा धावा करके 


जरासंधको जीत रोगे ॥ ६९ ॥ 

तत्र शरगतौ दद्रा भवन्त यद्धदर्मदौ। 

आखक्तः शेखयुद्धे वै जरासंधो भविप्यति ॥ ७० ॥ 
श्वम दोनो रणदुर्मद वीरको उस पवंतपर आद हया 

देख जरासंध पर्व॑त-युदधम दी आसक्त हो जावगा ॥ ७० ॥ 


श्रीमहमभार्ते सिलकभागे 


॥ हरिवंशे 


भवतोरपि युद्धे ठ॒ प्रवृत्ते तच दारुणे। 
आयुधैः सह संयोगं पदयामि नचि सयद्रिव ॥ ७१॥ 
ध्वा भयंकर युद्ध आरम्भ द्यो जनिपर ठम दोनेकरि 
हाथमे मी गीवदही दिव्य अधुरपौका संयोग दु देर्वूगा ॥ 
संग्रामश्च महान्‌ कृष्ण निर्दिरस्तत्र दैवतेः। 
यदूनां पर्थिवानां च मांसशोणितकर्दमः ॥ ७२॥ 
श्रीकृष्ण ! वरहे देवतार्थेनि यादर्वो तथा अन्य राजाय 
मदान्‌ चुद्धका निर्दया किया हैः जिसमे स्त ओर मासिकी 
कीच जम जनेवाीं टै | ५२ ॥ 
तन चक्रं दं चैव गदां कौमोदकी तथा। 
सौनन्दं मुखटं चैव मैप्णवान्यायुघानि च ॥ ७२३ ॥ 
द्चयिप्यन्ति संग्रामे पास्पन्ति च महीक्षिताम्‌ । 
रुधिरं कालयुक्तानां वपुर्थिः काठसंनिभैः ॥ ५४॥ 
ध्वा सुदर्णन चक्रः संवर्तक दः कौमोदकी गदा तथा 
सोनन्द नामक मुसल-ये विष्णुसम्बन्धी "आयुध संग्राममे वु 
दर्गन देंगे ओर अपने कालके समान खस्येति कराच्के अधीन 
हए राजार्थोका रक्त पीयेगे ॥ ७३-७४ ॥ 
स चक्रमुसखो नाम संग्रामः रृप्ण विधुतः। 
दैवतैरिद निर्दिष्ः कालस्यादेदासं्षितः ॥ ७५॥ 
ध्रीक्प्ण | वद्‌ संग्राम चक्र-मुसल्करे नामसे विख्यात 
होगा । देवतानि इषी स्थानपर उसके दोनेका संकेत क्रिया 
दै । वह युद्ध सानात्‌ काट्का अशनाय दै ॥ ७५॥ 
तत्र ते कृष्ण स्रामे खुव्यक्तं वैष्णवं वपुः 
दरक्ष्यन्ति स्पिवः स्वँ सुराश्च सुरभावन ॥ ७६॥ 
ष्देवतार्योकी उत्ति यौर श्वृदधि करनेवलि श्रीकृष्ण | 
उस संग्रामम समस्त शयु अगर देवता मी वम्दारे भटीभेति 
व्यक्त हुए वंध्णव ल्पक्रा दशन करगे | ७६ ॥ 
तांभजस्र गदां कष्ण चक्रं च चिरषिरश्रतम्‌ 1 
भजसख स्वेन रूपेण सुराणां चिजयाय वै ॥ ७७॥ 
पभीकष्ण ! त॒म अपने उसी वैष्णव रूपते खित हो 
देवतार्जकी विजयक्रे स्थि चिरकरालते मूले हुए अपने उस 
चक्र ओर गदाको ग्रहण करना ॥ ७७ ॥ 
वलश्चायं दं धोरं मुसलं चारिमेदनम्‌ । 
वधाय सुरशध्रूणां भजताह्टोकभावनः ॥ ७८॥ 
तथा ये छोकभावन बलसम भी देवद्रोदिर्योका वध करने- 
के चयि अपने रघरुविदारण घोर हर ओर मुसल्को हाथमे 
ठे ७८॥ 
पपर ते प्रथमः कृष्ण संग्रामो भुवि पार्थिवः 
पृथिव्यथं समाख्यातो भारावतरणे खुरैः ॥ ७९. ॥ 


विष्णुपवं 1 


चत्वारिदोऽन्ययः 


२६१ 


„(व्व 


शश्रीङ्प्ण ! पृथ्वीका भार उतारमेकरे लि भूमण्डल्करे 
राजाओक्रि साथ तुम्हारा यद्‌ पहल संग्राम देवतार्जोद्वारा बताया 
गया दै ॥ ७९॥ 

[= [> 

आयुधावधिरत्रैव वपुषो वैष्णवस्य च। 
लक्म्याश्च तेजश्चैव ध्यृहानां च विदारणम्‌ ॥ ८० ॥ 

ही तुम्दं अपने दिव्य आयुधोकीः वैष्णव खरूपकीः 
लक्षमीकी तथा गन्नुवयूरहौका विदारण करनेवाले तेजक्ी प्राप्ति 
होगी | ८० ॥ 
अतःप्रभृति संग्रामो धरण्यां श्सख्रमूच्छितः। 
भविष्यति महान्‌ कृष्ण भारतं नाम वैशसम्‌ ॥ ८१॥ 

धश्रीङ्कप्ण [ इसके वाद पृरथ्वीपर अलर्षि व्याप्त एक 


महान्‌ संमराम ह्योगा; जो ठोगेमिं महाभार्तके नामते प्रसिद्ध 

दोगा ॥ ८१ ॥ 

तद्‌ गच्छ रूष्ण शैलेन्द्रं गोमन्तं च नगोत्तमम्‌ । 

जरासंघमरघे चापि विजयस्त्वासुपस्थितः ॥ <२॥ 
“अतः श्रीङण्ण ! तुम पर्वतम श्रे गिरिराज गोमन्त 

पर चलो ! जरासंधके युद्धम भी विजयश्री वम्दारा दी वरण 

करनेके लि प्रस्तुत रै ॥ ८२ ॥ 

षदं चेवासतप्रख्यं दहोमधेनोः पयोऽसतम्‌। 

पीत्वा गच्छत भद्रं वो मयाऽऽदिष्टेन वत्मना ॥ ८३ ॥ 
धुम्ारा कल्याण दो! मेरी इस होमधेनुका यह अमृतो- 

पम सुमधुर दुग्ध पीकर मेरे बताये हुए माग॑से चरोः ॥ ८३॥ 


इति श्रीमहाभारते लिरभगे हरिवंशे विच्णुपवंणि . रामवाक्ये एकोनचस्वारिलोऽध्यायः ॥ ३९ ॥ 


इस प्रफार श्राम्‌ भासत लिकभाग ररिविशके अन्तमेत परनुरामास्यव्िषयकर उन्तारीसर्े अध्याय पृरा हुमा ॥ ३९ ॥ 
---°्<्)--- 


चत्वारिरोऽध्यायः 
भ्रीङृष्ण, बलराम ओर परशुरामजीका गोमन्तपर्वतपरं आरोहण गोमन्तकी शोभाका वर्णन 
| तथा परश्ुरामजीका श्रीकृष्णको युद्धके सिये प्रोत्साहन देकर वहसि प्रान 


वैश्नम्पायन उवाच 
तन्तु घेन्वाः पयः पीटवा वलद्‌प समन्वितौ 1 
ततस्तौ रामसदितौ भसित यदुपुद्धवौ ॥ \ ॥ 
वेशम्पायनजी कहते है-- जनमेजय ! उक्त दोमधेनु- 
करा दूधरपाकर वल ओर दर्थे भरे हए वे दोनो यदुपुङ्गव 
वीर परयुरामजीक स्नाथ वदास प्रखित हुए ॥ १॥ 
गोमन्तं पर्वतं द्रष्टं मत्तनगेन्द्रगामिनी। 
जामट्ग्स्यपदिष्रन मर्गेण वदतां चसै॥ २॥ 
मतवल़ गजराजकी मोति मस्तीफे साथ चल्मेवालं वे 
वक्ताओंम प्रेष्ठ श्रीकृष्ण ओर व्रलयाम परद्यरामजीके वतय हुए 
मागे मोमन्तधवतका ददान कनके ल्यि चटे ॥ २॥ 
ज(मदयच्ततीयस्त चस्य इवाञ्चयः। 
शोभयन्ति स पन्थानं चिदिवं बिदशा इव ॥ ३ ॥ 
उन दोनोकरे साथ तीसरे परमरुरामजी ये । वे तीनों तीन 
अग्नियोक$ समान उसी तरह उस मार्गकी योभा ब्रद़ातेयेः जेते 
देवता खर्गकी ॥ ३ ॥ 
ते चाध्वत्रिधिना स्वं ततो वै दिवसक्रमात्‌ । 
गोमन्तमचल ` प्राता मन्द्रं चिदा इव ॥ & ॥ 
मनुप्य निक तरट्‌ किस मार्गपर चलते ई, उसी विधिसे 
वेषव्ररोग यात्राकरते हुए क्रमशः कई दिनके वाद 
गोमन्त गिरिपर जा परहचेः मानो देवता मन्द्राचल्के 
शिखरपर गये हो ॥ ४॥ 


रुताचारूविचि्रं च नानाद्रुमविभूषितम्‌ । 
नानायुरुपिनद्धाद्गं चिं चि्ैर्मनोहरेः ॥ ५॥ 
नाना प्रकरास्की लताओोके विस्तारसे उस पर्वती सुन्दर 
एवं विचित्र रोभा दो रदी थी । मेति-मेतिके ब्क्ष उसके 
ल्ि मूप्रणक्रा काम दे रहे ये । उत्त पर्वतक्रा सारा अङ्ग अनेक 
भरक्रारके अगुरु आदि सुगन्धित धूपोसे व्याप्त था । मनोदर 
मूर उखे ओर मी विचित्र गोमति सम्पन्न क्य 
देतेथे॥५॥ 
दविरेफगणसंकीणं शिखसंकटपाद्पम्‌ । 
मत्तवर्हिणनिधेपरिनीदितं मेधनादिभिः ॥ ६ ॥ 
भ्रमरोमे व्यात ओर शिखा तथा इते भया हुआ वद 
पर्वत॒मेवोके समान गम्भीर सरोम ब्रोलनेवाले मतवाठे 
मभूरौकी मधुर ध्वनिसे निनादित दो रद्य था॥ ६ ॥ 
गगनाल्मशिखरं जछद्‌।सक्तपादपम्‌ 1 
मच्द्विपविषणघ्रेः परिचरषेपखाङ्कितम्‌ ॥ ७ ॥ 
उसके शिखर आकाशके ऊर्ध्वभागसे ल्म हुए ये । 
चादर उसके वरक्षौका आलिङ्गन करते ये तथा उसके प्रस्तर 
खण्ड मतवाठे हायि्योके दोतोके अग्रभागकी रगड़्से विसे 
हए दिखायी देते ये । उन प्रसतरोसि अङ्कित हुआ वह पर्वत 
वदी शोमा पाता था॥ ७॥ 
चरुजद्धिश्चाण्डजगणेः समन्तात्‌ प्रतिनादितम्‌ । 
द्रीभरपातास्बुरवेदछन्नं ` शादुष्तलननः ॥ ८ ॥ 
वहं चारो ओर पक्षी केर करते येः जिनकी प्रतिभ्वनि 


६६२ 


भौमदाभासते सिकभागे 


[ शिविरे 


रिक 


सव्र ओर छाय रदती थी । गुपा्िं प्षरनेका जर गिरेस 
जो यब्द होता था तथा व्डे-बदे व्याघकरे ददाड्नेसे जो ध्वनिं 
होती थी, उसमे भी वह पर्वत व्यपत्तदोरद्यया॥८॥ 
नीटादमचयसंधातेवंहवर्ण यथा घनम्‌ | 
धाठुविलरावदिग्धाङ्गं सायुप्रसखवभूपितम्‌ ॥ ९ ॥ 
वर्दी नीटे पथर्क देर-के-देर पदे ४, जिनमे वदं अनेक 
वर्णक मेवक्री मोति सुरोभित दोता या | पानीके साथ गेरू 
आदिः धातुयीकरे ब्रहनिसे उसक्रा अद्ध चन्दने चर्चित-घा 
जान पड़ता था | धिखरोसे जो क्षरने गिर रदे थे, वे आभूष्ण- 
करे समान उसकी श्चोमा व्रदत्तिये॥ ९॥ 
कीर्ण सुरगणः कान्तेरतैनाकमिव कामगम्‌ । 
उचितं उविश्चालाग्रं समृलम्बुपरिखवम्‌ ॥ १० ॥ 
कान्तिमान्‌ देवता वर्ह सव्र ओर फैले हुए थे । वद्‌ 
इच्छानुखार विचरनेवठे मैनाक-सा प्रतीत दता या। 
असन्त विशाल दिखरते सुशोमित वह उतम पर्वत अपने 
मूरभागसे निर्छरकि जल्की धारा ब्रहम रहा था ॥ १० || 


सकननदरीप्रस्थं दवेताश्रगणभूपितम्‌ । 
पनसाग्रातकाग्रौधवेचस्यन्दनचन्दनैः ॥ ११॥ 
तमलैलावनयुतं मसचश्चुपसंकुखम्‌ । 


वनः गुन ओर शिखरसि सम्पन्न वह दौटरान द्चैत 
चादि विभूपित था । वदो क्लः आभ्रातक ( अमा ); 
आकि समृ? वेतः स्यन्दन ( तिनि ); चन्दनः तमाः 
इलाथचीकरे वन तथा मिर्चकी द्चादिर्यो शोभा पाती थीं । १११ 
पिप्पलीवद्धिकलिलं चिध्मिङ्कुदिपादपैः ॥ १२॥ 
मेः स्जरसानां च सवतः परिशोभितम्‌ । 
प्रायुशार वनेत वहुचिघ्रवनेयुंतम्‌ ॥ १३५ 
वदो सव ओर पिप्यटीकी वेले फैली यीं । इड्ुदीके दृक्ष 
विचित्र मोभादे रदे थे तथा सनेरस (रल) के वृक सव्र 
ओरे उस पर्वतक्रो सुयोभित क्रिये हुए ये । ऊंचे-ऊचे गाल 
वर्धक वन तथा अन्य व्रहूत-से विचित्र वन उस पर्वतक्री 
सोभा वदा रट थे ॥ ६२-६३॥ 
सजजनिम्बाञ्चुनवनं पाटरीकुटसंङ्लम्‌ । 
हिन्ताेश्च तमारेश्च पुन्नगेश्चोपद्योभितम्‌ ॥ १४ ॥ 
राख, नीम थर अर्जुन वर्षका वन योभादेरदा था। 
पाद्र व्र्करि समूद वदो मव ओर छा रदे ये! हतार, तमाल 
ओर पुन्नाग ८ जायफट ) उस गौखादिखरकी दोमा बदति 
ये ॥ ६४॥ 
जलेषु जटजैदछन्नं स्थटेपु स्थलजैरपि । 
पङ्कनैद्ध॑मखण्डैश्च सर्वतः प्रतिभूपितम्‌ ॥ १५॥ 
वरहो जर्छोमिं जठ कमलः स्थल खल्ज कमल तथा 
अन्यान्य वृ्षसमूहं सवर रसे उस पर्वतकरे आभूप्रण व्रने 
हुपएये॥ १५ ॥ 


जम्बूजम्बटन्रक्षाव्य कटरुकन्दखभूप्रितम्‌ । 
चम्पकारोकवकुटं बिल्वतिन्दुक्चोभितम्‌ ॥ १६॥ 

जामुन, केवदे कद्रु; केटे, चम्पा; अदोकः वेक्रुल 
विल्व ओर तिन्टुक आदि वंस वद्‌ री सु्ोमित था ॥ 
कुन्जनै्य नागपुष्वेश्च समन्तादुपल्तोभितम्‌ । 
नागयूधसमकीर्णे स्गसंघातनशोभितम्‌ ॥ १७॥ 

ब्रहूत-ते ऊुञ् ओर नागकेसर परख सवर योरे उष 
शोमा बदति थे । छंट-के-खंड दाथी वदो सव्र ओर कंठे हुए 
थे | मूगेकरि मरुदायसे वह्‌ योभायमान था ॥ १७॥ 


सिद्धचारणसरक्रोभिः सेवितप्रस्तरन्तसम्‌ । 
गन्धर्वश्च समायुक्तं गुद्यकेः पक्तिभिस्तथ। ॥ १८॥ 
उसके प्रस्तरखरण्डोके मध्यमागमिसिंद्धः चारण तथा 
साश्चस्रेढे हुए थे । गन्धव, गुद्यक तया परकषी भी उ पर्वत- 
का सेवन करते थ ॥ १८ ॥ 
विद्याधरगणे्नित्यमनुकीणदिटतटम्‌ 1 
सिददयादुंकुखंनदैः सततं धतिनादितम्‌ । 
सेवितं वारिघाराभिश्वन्द्रपादैद्य रोभितम्‌ ॥ १९॥ 
उसकी दिखे सदा दी वियाधरगणेमे सेवित दोती 
थीं । सिंहो ओर व्याघ्र ददादुनेकी ध्वनिसे वद्‌ पर्वत निरन्तर 
गूजता रता था । जट्की धारा भौर चन्धमाकरी किरण 
उसक्रा सेवन एवं गोमा-संवर्धन करती थीं ॥ १९॥ 
स्तुतं निदश्षगन्धवरप्ससेभिरटं कृतम्‌ । 
वनस्पतीनां दिव्यानां पुष्पैरुष्चाचचैः धितम्‌ ॥ २०॥ 
देवता ओर गन्धर्वं उसकी प्रदांसा करते थे | वह पर्वत 
अष्रा्ओति अलंकृत या । दिग्य वनद्पतिर्योके नाना प्रका 
प्ल वदो सव्र ओर व्रिखरर पदे २ ॥ २० ॥ 
श्ाप्रवजप्रहाराणामनभिननं कदाचन । 
दावाग्निभयनिर्मुं्तं महावातभयोच्द्रितम्‌ ॥ २१॥ 
उस पर्वतको कमी नी इन्दरफे वज्ज्रहारकी व्यथाका 
अतुमव नहीं हुमा था । वदो न तो दावानल्काभय या ओर 
न प्रचण्ड रओधाका ॥ २१॥ 
प्रपातश्रभवाभिदच  सरिद्धिटपदशोभितम्‌। 
काननेराननाकारेविशेपद्धिरिव धियम्‌ ॥२२॥ 
निरोप प्रकट हुई सरिता उस पर्वतकौ सुदयोमित 
करती र्थी। वद अपनी योभा व्रढति हए-ते सुखाकरि 
काननेसि उपलक्षित होता था॥ २२॥ | 
जकद्ौवलण्धद्ाव्रेरुन्मिषन्तमिव श्रिया! ! 
स्यटीभिसरगज्ञुणाभिः कान्ताभिरूपद्मोभितम्‌ ॥ २३॥ 
जक ओर हिवाससे युक्त गिखरोकरे अग्रभागद्वारा मानों 
वह रक्ष्मीसे अखि मिटा रहा था । पञ्ु्भोसि सेवित कमनीयं 
वनस्थया उसकी शोभा वदती थी ॥ २३ ॥ 


४ 


विष्णुपर्व ] 


पाद्ये ख्पलकल्मवमवैस्वि निभूवितम्‌ 1 
पादपच्छन्नभूमीभिः सपुप्पाभिः समन्ततः ॥ २९ ॥ 
. मण्डितं वनसाजीभिः प्रमदाभिः पतिर्यथा । 
पादर्वभागमे दित चितकवरे प्रलरखण्डंपि वह एेसी 
श्नोमापारदा थाः मानो वहुरमे बादरि विभूषित हो रदा 
ह्यो ! अपने वृक्षसमूदपि भूमिको ठक देनेवारी पुप्यद्नोभित 
वनरेणिर्मो उम पर्वतको सष अर्ति वेरकर उसी प्रकार 
योमा-सग्न्न श्रिए. हुए यीं, जेते पुष्पवती ( रजल्त्म होनेके 
पश्चात्‌ स्नान एवं पुष्पहयासे अरं ङृत ) युवती च्चिर्ो पतिकरो 
बेसर खद द 1 २५४ ॥ 
खुन्दयमिर्दरभिद्व कन्दराभिस्तथेव च ॥ २५॥ 
तेपु तेप्ववकारोपु सदारमिव शोभितम्‌ । 
जगह-जगह सुन्दर गुफाभ ओर मनोदर कन्दराथेति 
अलंकृत हुआ गोमन्तमिरि वरिमिन्न खानम्‌ सपत्नीक पुरुपः 
की भोतियोभा पाता था॥ २५१ ॥ 
जओपधीदीक्तरिखरं ` वानप्रस्यनिपेवितम्‌ । 
जातस्पैर्वनेोदेश्ः छृतिमैसिव भूषितम्‌ ॥ २६॥ 
विभिन्न प्रक्रारकी यपधिर््ो उसके शिखरकोौ उन्धासित 
किय दए थीं | वानप्रस्थ सुनि उसक्रा सेवन करते थे तथा 
उसके सदज सुन्दर वनोदेग वरत्रिम उयर्नेक्री भोति उसे 
तरिमूपरित क्रिये हए प्रे ॥ २६ ॥ 
मूटेन विराटेन शिरसाप्युचिन्रतेन च । 
पृथिवीमन्तरिश्चं च ग्राहयन्तमिव स्थितम्‌ ॥ २७ ॥ 
वद पर्व॑त अपने अत्यन्त विशाल मृल्माग ओर उचतम 
दिखरमे प्रय्वी ओर आकाशम प्रविष्ट टोकर उनकी थाह 
लगाता हुञा-सा खड्ाथा ॥ २७ ॥ 
ते समासाद्य गोमन्तं रम्यं भूमिधरोत्तमम्‌ । 
रुचिरं सस्चुः सवं वासायामरसंनिभाः ॥ २८॥ 
पर्वतेमिं शर सुन्टर एवं मनोदर गोमन्तपर्व॑तपर्‌ परहूच- 
कर उन समी देवोपम पुर्परौने वरो निवास करनेकी 
इच्छाकी।॥ २८॥ 
रुरुटुस्ते गिरिवरं खमूर्वमिव पक्षिणः । 
असमाना वेगेन वैनतेयपरक्रमाः ॥ २२ ॥ 
गरडके समान पराक्रमी वे तीनों महापुदष उस प्रे 
पर्वतपर उसी तरह वेगमे चदूने लगे, ञे पक्नी ऊपर आकरा. 
मे उदते ह । उम समय उनमेने किंसीकी भी गति अवसुद 
नदीं हेती थी ॥ २९॥ 
ते त॒ तस्योत्तरं ग्यङ्मारूटासिददा इव । 
अगारं सदसा चक्रुमैनसा निर्मिते(पमम्‌ ॥ ३०॥ 
वे देवताभकी मति उत्क सर्वोच दिखरपर आरूद 
षो गये । वहो उन्दनि स्सा अपने रदनेके व्यि घर श्रना 


दिशि £ 
चत्वारिदोऽ्ध्यायः ॥ 


द 


~ ~-----------------------------------------------~ 


~ 


लिया, मानो मानसिक संकन्यमे दी उका निर्माण कर 
लियाष्ो॥ ३०] 
निविष्टौ यादवौ दष्टा जामदग्न्यो महामतिः 
रामोऽभिमतमद्िष्टमप्रषुपचक्रमे ॥ २६ ॥ 
उन दोनों यदुकरुमारोको वरदो विराजमान दुभा देख 
परम बुद्धिमान्‌ पर॒रामजीने प्र्रनतापू्वक अपने अभी 
सानपर जनके व्यि उनतते पटना आरम्भ क्रिया--॥३१॥ 
कृष्ण यास्याम्यहं तात पुरं शरुपीर्कं विभो । 
युवयोनस्ति वैमुख्यं संध्रामे दैवतैरपि ॥ ३२॥ 
पतात ] प्रभावशाली श्रीकृष्ण [अर मेँ यरा नगसको 
ज्जँगा | अपि दोनो तो युद्धम देवना भी नदी दय सकते 
(फिर मनुप्यक्री तो वातदहीक्यादे१)॥ ३२॥ 
प्राप्तवानस्मि यां प्रीति मागौञुगमनादपि। 
सा मे छष्णाचुगरक्णाति दारीरमिदमग्ययम्‌ ॥३३ ॥ 
“श्रीकृष्ण | तुम दोनेकि साथ माका अनुसरण करनेसे 
मुने जो प्रसन्नता प्राप्त हई दै, वद मेरे इस अव्रिनाशरी शरीर. 
को अनुगृहीत कर रदी ६ ॥ २३ ॥ 
इदं तत्‌ स्थानसुदिष्ं य्रायुधसमागमः। 
युबयोर्विहितो देवैः समयः सास्परायिकः ॥ २४॥ 
मैने जिते बताया था ओर जयं वुम्दरं अपने रिव्य आयुध 
पराप्त होनेवले है, चह स्थान यदी दै । देवतानि तुम्दारे लि 
उनकी प्रातिका यही समग्र निर्धारित क्रिया है, जो परटोकरके 
स्यि हितकर दै ॥ ३४ ॥ 
देवानां मुख्य वैकुण्ठ किणो देवैरभिष्टुत । 
रृप्ण सर्व॑स्य लोकस्य णु मे नैष्ठिकं वचः ॥ ३५ ॥ 
वदेवनाभमि श्रेष्ठ वैकुण्ठ ! त॒म सर्व्यापी विष्णु टो | 
देवतार्भेनि षदा ठम्दारी स्तुति कौ द| श्रीकृष्ण | तुम 
मेरी यह ताच्विक्र वात सुनो; जो सम्पुर्गं जगते चयि 
दितकर है ॥ ३५ ॥ 
यदिदं प्रस्तुतं कर्म त्वया गोविन्द लोकिक्रम्‌ | 
माचुपाणां दहिताथौय लोके मायुरेहिना ॥ २६॥ 
तस्यायं प्रथमः कल्पः कालेन तु नियोजितः] 
ध्गोचिन्द ! तुमने मनुप्योकरे हिनके लि संसारे मानव- 
गरीर धारण कररफे जो यद्‌ ठोक्रिक कर्म प्रारम्भ क्ियादैः 
उमक्रा वद्‌ पद्य प्रव्रोग दीद्ये जास्टयदहै] काटने 
उसका आयोजन यहीं श्रिया दै | ३६१ ॥ 
जरासंधेन वे साधं संग्रामे समुपस्थिते ॥ २७॥ 
तजायुधवलं चैव रूपं च रणक्कशम्‌ । 
खयमेवात्मना रृप्ण त्वमात्मानं विधत्स्व ह ॥ ३८ ॥ 
“श्रीकृष्ण ! जरासंधकफे साथ संग्राम उपस्थित होनेप्र 
ठम स्वयं हौ अपने-भपक्े दारा अपनेको आयुध-ल्ते सम्पन्न 
कर लेना ओर अपना रण-कर्कय रूप बना तेना ॥२७-३८॥ 


२६४ 


श्रीमहाभारते सिकभागे' 


[ हरिवंशे 


चक्रोद्यतकरं दष्टा त्वां गदापाणिमाहे। 
चतुर्दिगुणपीनांसं विभ्येद्पि रदातक्रतुः ॥ ३९ ॥ 
भजित समय तम आट मांसल कं्धोमि युक्त दो हा्थोमिं 
चक्र ओर गदा उटाये युद्धे स्थि उपयित हदोगे, उस 
समग्र तुम देखकर देवराज इन्द्र भी भयभीत दो उटैगे ॥ 
अद्यप्रभृति ते यात्रा खर्गोक्ता समुपस्थिता । 
पृथिव्यां पाथिवेन्द्राणां तासे त्वयि मानद्‌ ॥ ८० ॥ 
ध्मानद्‌ ! जव तुम दधे हथियार टेकर युद्धके व्यि उप्त 
हो ग्येदो, तव आनमेदी भूमण्डले राजार्ओकी खर्गीय 
यात्रा आरम्भ हो जायगी | ४० ॥ | 
वैनतेयस्य चाद्धानं वादनं ध्वजकर्मणि । 
छर दीघं महावादयो गोविन्द्‌ वदतां चर ॥ ४१॥ 
ध्वक्ता्थमिं श्रे महावराह गोविन्द | तुम अपने 
ध्वजारोपणरूप कार्यकी सिद्धिके च्ि शीघ्र दी बादनस्प 
विनतानन्दन गरुड़का आवाहन करो ॥ ४१ ॥ 
य॒द्धकाम त्रपतयखिदिवाभिमुखोद्यताः। 
धात॑रष्रष्य वश्चषगास्तिष्ठन्ति रणचृत्तयः ॥ ४२॥ 
धयुद्धकी इच्छा करनेवाले मरेागण स्वर्गके व्यि अभिमुख 
एवं उशत दोकर युद्धवरत्तिका आश्रयं ठे पृतराष्टपुत्र दुर्योधन- 
के अधीन होकर खदे ई ॥ ५२॥ 
राक्षां निधनदष्रर्था वैघब्येनाधिवासिता । 
पएकचेणीचरया चेयं वसधा त्वां प्रतीक्षते ॥ ४२॥ 
धराजार्थौका निधन दोनेवाला टै, यद्‌ बात प्रत्य देखकर 
वेधभ्यसूचक वेष-भू्रा धारण क्रिये एक वेपीधारिगी ( केर- 
संस्कारे रदित ) यह वसुन्धश वग्ारी राद देखती है ॥४३॥ 
सच्रहं कष्ण नक्षत्रं सक्षिप्यारिविमर्दन। 
त्वपि माुष्यमापन्ने युद्धे च समुपस्थिते ॥ ४४ ॥ 


शतुमर्दन श्रीकृष्ण ! आप मानवरूप धारण करे इस 
धरातद्पर आ गये ह ओर युद्धका अवमर भी उपद्ित दैः 
इसल्मिि ्षत्रिययमाज मरल्युपे संकरुचिन न दक्र रणभूमिमे 
अनेके लि उतावला दो उत्रादै। किसी समयत्रिदोपकी 
प्रतीक्षा नदी कर्‌ रहाट, क्योकि उसक्रा जन्मनक्षत्र क्रूरदम 
आक्रान्त दो गया दै | ४४ ॥ 
त्वरस्व कृष्ण युद्धाय दानवानां वधाय च । 
खगौय च नरेन्द्राणां द्रेवतानां सुखाय च ॥ ४५॥ 
श्रीकृष्ण ! तुम द्वानर्वोका वथ करने, नरेयेकि स्वरग- 
लोकम भेजने ओर देवतार्थे सुख परहुचानेके उदेध्यने 
युद्धकरे यि जल्दी करो ॥ ४५ ॥ 
सत्कृतोऽहं त्वया कृष्ण स्योकैश्च सचराचरे: । 
त्वया स्त्छृ्रूपेण येन॒ सत्छृतव्रानहम्‌ ॥ ५६॥ 
'सचिदानन्दध्रन श्रीकृष्ण ! तुम स्वरूपतः सवके द्वार 
सत्कृत दो । तुम सर्यात्मनि जो मेरा सत्कार क्रिया है, उसे 
म चराचरं प्राणिरयोसदित सम्पूणं छोकेद्रारा सकत हौ गया 
ओर मदा लि सत्कारवान्‌ वरन गया ॥ ४६ ॥ 
साधयामि महावाहो भवतः काय॑सिद्धये । 
स्म्तव्यश्चासि युद्धेषु कान्तरेषु मद्यश्चिताम्‌ ॥ ४७ ॥ 
'महाव्राहो ! म वम्दारे कार्यकी सिद्धिके य्ि्यं मी 
साधना कङ्गा । सभी भूमिपार्खोको चादि कि वे दुर्गम सकट 
ओर युद्धे अवमरसोपर मेरा सरण करः 1 ४७॥ 
इत्युक्न्वा जामदग्न्यस्तु छप्णमह्धिषटकारिणम्‌ । 
जयारिपा वद्ध॑यित्वा जगामाभीष्ितां दिदाम्‌॥ ४८ ॥ 
सा ककर परजुरामजी अनायाम ही महान्‌ क्म करने- 
वठे श्नीकृष्णक्रो विजयमूचक आश्ीवदिमे बद्रावा देकर स्वयं 
अभीष्ट द्विगाक्रो चटे गये ॥ ५८ ॥ 


दति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिविगे विष्णुपर्वणि गोमन्तारौहणं नाम चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४० ॥ 


दस प्रकार श्रीमहाभारते खिरभाग हसिंरके अन्तर्ैत तरिप्णुपपमे श्रद्धष्णका गेोमन्तपर्बतपर 
आरोहण्रिषयफ चासीसरवः अध्याय परा हुजा ॥ ४० ॥ 


एकचतवारिरोऽध्यायः 


"वलरामके पास वारुणी, क्रान्ति एवं श्री ( ज्ञोभा )--इन देवाङ्खना्भाका आगमन, गरुडके 
श्रीकृष्णको [७ जरासंधकी 
दारा को वेष्णव युङ्टकी प्रापि, श्रीकृष्णक्रा बररामसे बार्ताछाप तथा जरासंधः 
सेनाकरा निरीक्षण करके अपने आपसे ही मानसिक उदार प्रकट करना 


वैश्रण्पायनं उवाच 
जामषग््ये गते रमरि तौ याद्चकुखोद्धदौ । 
गोमन्तदिखरे रभ्ये चेरतुः कामरूपिणौ ॥ १ ॥ 


वेदाम्पायनजी कते ह--जनमेजगर ! परज्ुरामजी- 
करे चले जानेपर व्रादव्ुख्करा मार वहन करनेवले वे श्री- 
कृष्ण ओर वल्यम इच्छानुसार रूप धारण करके मोमन्त- 


विष्णुपवं 1 


पकचत्वारिशो ऽध्यायः 


३६५ 


--------------------------------न न च---~-----~-----------~-- 


पर्व॑तके रमणीय शिखरपर विचरन रगे 1 १ ॥ 
वनमालाङलोरस्कौ नीकपीताम्बरादुभो ! 
नीलद्वेतवपुष्मन्तौ गगनस्थाविवाभ्बुदौ ॥ २ ॥ 
उन दोनो, वक्षःस्थले वनमाला शोभा पा रही थी। 
दोना क्रमसः नीले-पीठे वलन धारण करके अपने गौर-श्याम 
शरीरसे आकागमे स्थित हुए. दो मेघोके समान शोभा पा 
र्देथे॥२॥ 
तौ शेकधातुदिग्धाङ्गौ युवानौ शिखरे स्थितौ । 
तरेरतुस्तजन कान्तेषु वनेषु रतिलारुसौ ॥ ३ ॥ 
पर्वतीय धातभसि अपने अद्धोका शृङ्गार करके उस 
पर्वते शिखरपर ख्डे हए. दोनो नवयुवक वीर क्रीड़ाकी 
लालसा व्यि कमनीय वनोमे विचरण करने ल्गे ॥ ३ ॥ 
उदयन्तं निसीश्चन्तौ शशिनं ज्योतिषां चरम्‌ । 
उदयास्तमने चैव श्रहाणां धरणणिधरे ॥ ४ ॥ 
वे उस पर्वतपर ज्योतिमय नक्षत्रोमे श्रेष्ठ चन्द्रमाके 
उदयकी सोभा देखते ओर ग्रहके उदय-अस्त देखा 
करतेथे॥४॥ ` 
अथ संकर्षणः श्रीमान्‌ विना छष्णेन वीय॑वान्‌ । 
अचार तस्य रिखरे नगस्य नगसनिभः॥ ५ ॥ 
एक दिन परम पराक्रमी श्रीमान्‌ संकषंण भ्रीक्ृष्णके 
तरिना ही उस पव॑तकरे शिखरपर विचर रहे थे । वे स्वथं भी पवत- 
के समान्‌ ही प्रतीत होते थे ॥ ५॥ 
प्रफुल्टस्य कदम्बस्य सुच्छाये निषसाद ह्‌ । 
वायुना मन्दगन्धेन वीज्यमानः सखेन वै ॥ ६ ॥ 
घूमते-घूमते एक खिले हुए कदम्बकी मनोहर छायामे 
ब्ेठ गये । उस समय कदम्बकी मधुर मन्द्‌ गन्धे वासित 
वायु उन्हे सुखपूर्वक व्यजन इलने लगी ॥ ६ ॥ 
तस्य तेनानिरघेन सेव्यमानस्य तत्र बै । 
मयसंस्पस्षजो गन्धः संस्पुराच्‌ घ्राणमागतः ॥ ७ ॥ 
वह मन्द-मन्द वायु बहकर जवर ब्रलरामजीकी सेवा कर 
रही शरीः उस समव उनकी घ्रणेन्रियमे मधुका स्प्रं करके 
अये हुए सुगन्धित समीरने प्रवेश म,५। ।। ७ ॥ 
तप्णा चैनं विवेश्ल्यु वारुणीभ्रभवा तद्‌ । 
खुशोप च मुखं तस्य मत्तस्येवापरे ऽहनि ॥ ८ ॥ 
उस समय उनके भीतर वारुणी ( मधु या अमत) की 
वृप्णाका अवे हुघा । फिर तो दूसरे दिन मतवाले पुरुषकी 
भोति उनका मह्‌ सूखने ट्गा ॥ ८ ॥ 
स्मारितः स पुरावृत्तमख्तप्रारानं विसुः। 
कषितो मदिरन्वेषी ततस्तं ॒तरुगैक्षत ॥ ९ ॥ 
उन्दे पूरवकारमे किये गये अमृतपानका स्मरण हो आया। 
ये वषित होकर उस अम्‌ृतकी खोज करने लो । त्र उन्होने 
उस बृक्षकी ओर रेखा ॥ ९ ॥ 


तस्य प्रावृषि पफुल्यस्य यदम्भो जलजोञ््ितम्‌ । 
तत्कोटरस्थं मदिरा संजायत मनोहरा ॥ १०॥ 

वर्ाकालमे उस खिठे हुए कदम्बपर जो मेषौका बरसाया 
हआ जल गिरा थाः बह उसके कोटरमे मनोहर सुधाके रूपमे 
प्रकट हो गया ॥ १०॥ 


तां तु ठष्णाभिभूतात्मा पिवन्नातं इवासरृस्‌ । 
मोहाञ्च चचिताकारः समजायत स प्रभुः ॥ १९॥ 

चलरामजीका हृदय प्यासते घबरा उठा था । वे पिपासा- 
पीडित पुरुषकी भोति उस अगृतको बार-बार पीने ल्गे | 
उसको अधिकं पी लेनेके कारण उनपर मोह ८ नशा-) साख 
गया, जिससे उन प्रभावशाटीका शरीर कुछ लडखडङ़ाने-खा 
ख्मा| ११॥ 


तस्य मत्तस्य वदनं फिचिश्चकितरोचनम्‌ । 
घूर्णिताकारमभवच्छरत्कलेन्दुसप्रभम्‌ ॥ १२ ॥ 
मधुसे मत्त हुए बरयामका मुख कुछ श्मता-सा प्रतीत 
हुआ नेच चित्‌ चञ्चल हो उठे । उस सुखकी प्रभा श्त्‌- 
कारके चन्द्रमाकी मोति सुगोभित दने ठगी ॥ १२॥ 


कदम्बकोटरे जाता नाम्नां कादम्बरीति सा। 
रूपिणी वारुणी तजन दैवानामस्रतारणी ॥ १३॥ 

वह मधुमयी सुधा कदम्बक कोटरमे उत्पन्न हर्‌ थीः 
इसव्यि कादम्बरी नामसे विख्याते दई । वहो मूतिंमती 
वारुणी प्रकर हुई थी, ज देवताओंके स्मि अगत पैदा करने- 
वारी है ॥ १३॥ 


काद्म्बरीमदकलं विदित्वा कष्णपू्वंजम्‌ । 
तिस्रसिदशनायेस्तसुपतस्थुः पियंवदएः ॥ १४॥ 
श्रीकृष्णके बडे मारईको कादम्बरी ( मघु या अमृत ) 
के नकषेसे स्पष्ट चात बरोलनेमे असमर्थं जान तीन प्रियवादिनी 
देवाङ्गनार्णे उनकी सेवामे उपस्थित हुई ॥ १४ ॥ 


मदिरा रूपिणी भूत्वा कान्तिश्च शारिनः प्रिया 1 
श्रीश्च देवी वरिष्ठा खरी स्वयमेवाम्बुजध्वजा ॥ ९५॥ 
साञ्लिप्रघहा देवी रोरहिणयमुपस्थिता 
वारुण्या सहितं वाक्यमुव।च सदविङ्कवम्‌ ॥ १६॥ 
एक तो मादक मथु वा अमनी अभिष्टात्री देवी (जिन्हे 
वारुणी कते द ) मूतिमती होकर प्रकट हुई । दूसरी चन्द्रमा- 
की प्रिय कान्ति ( की अधिष्ठात्री देवी) थी ओर तीसरी श्री 
देवी थोः जो सर्वशरे्ठ स्री सानी जाती है, उनके ध्वजमे 
कमलका चिह दैः वे देवी खयं ही हाथ जोड़े हुए रोहिणो- 
नन्दन यलरामकरी सेवामे उपर्थित हर्‌ थीं । वासणके साथ 
उन्होने मदविहृल वल्याभजीसे इस प्रकार कहा-।९५-१६॥ 


वलं जयस्व दैत्यानां वल्देव दिवीश्वर। 
अहं ते दयिता कान्ता वारुणी समुपस्थिता ॥ १७॥ 


# 
1 
1 


~~ मदेनागलितय्मेणी 


॥ 
| 


ददद 


(पहले वारुणी बरोली ष्देवलेकरेश्वर ब्रल्देव | आप दैर्योकी 


सेनापर विजय प्राप्त कर । मे आपक्री प्राणवल्छ्मा वारुणी 
सेवामे उपस्थित हुई हं ॥ १७ ॥ 
त्वामेवान्तर्हितं श्रुत्वा श्ाद्तं चडवास्ुखे । 
क्षीणपुण्येव चसुधां पयंमि विमानन ॥ १८॥ 
धनिर्मल मुखवले देवे ! मै आपको बड़वानल्के समीप 
पातारमे शेषरूपते नित्य विराजमान जानती थीः किंतु इस 
समय भूतल्मे अवतार ठेनेकरे कारण वहसे अच्श्य हौ गये 
है, एेसा सुनकर मेँ पुण्यहीना नारी-सी आपकी खोजमे सारी 
परथ्वीपर भटक रही थी ॥ १८ ॥ 
पुष्पचक्रानुटिषकेणु केखरेपूपितं मया । 
अतिसुक्तपु चाक्षोभ्य पुष्पस्तवकवत्ु च ॥ १९॥ 
(अजेय वीर ! मने पुण्पसमूहँसे अनुलिप्त दए केसररोमि 
निवास क्रिया ह, पूरके गुच्छे सुसोभित वासन्ती कताम 
वास किया है ॥ १९॥ 
अहं कदम्बमालीना मेधकारे सुखप्रिया । 
कपितं मार्गमाणा त्वां स्वेन रूपेण छादिता ॥ २०॥ 
भमरे लि प्यासे हुए आपकी खोज करती हुई मेँ अपने 
रूपको छिपाकर वर्षंकाख्मे कदम्ब व्क्षकरे भीतर छक-चिपकर 
रहती आयी हूँ । मन्न आपके मुखका निवास दही विष 
प्रियहे॥ २०॥ 
सास्मि पूणंन योगेन यथेवामतमन्धने । 
समीपं प्रेषिता पित्रा वरुणेन तवानघ ॥ २१॥ 
सा यथेवार्णवगता तथेव वडवामुखे 
त्वयोपभोक्तुमिच्छामि सम्मतस्चं हि मे शुः ॥ २२॥ 
निष्पाप व्रलराम | जते पूरवंक्राख्मे अमतमन्थनके समय 
पु्णयोगसे युक्त होनेपर मेरे पिता वरुणने मुञ्चे आपके समीप 
भेजा थाः जैसे समुद्रमे ओौर पातालम मे आपके पास रही हः 


उसी प्रकार इस समय भी आपकी सेवम उपस्ित ट्ृई हू 


ओर चाहती हूः कि आपके दाय मेरा उपभोग हो; क्योकि मेरे 
दृदयने आपहीकौ अपना खामी मना है 1 २१-२२॥ 
न त्वानन्तं परित्यक्ष्ये भत्तितापि त्वयानघ । 
नाहं त्वया घिना रोकायुत्सहे देव सेवितुम्‌ ॥ २३॥ 
आदिपद्यं च पद्यद्गं दिव्यं श्रवणभूषणम्‌ । 
कौरयानि च नीलानि समुद्राणि विश्रती ॥ २४॥ 
“अनघ } आप मुन्ने डटि वतायेः तो भी मे अप अनन्त- 
का परित्याग नीं करगी । देव | मै समुद्रे रहनेवाटीके योग्य 
नीले रगकी रेशमी साडी पहनकर आदिपद्म तथा पद्मचिहित 
दिव्य कर्णभूषण धारण कर आपकी सेवामे आयी हूँ । आपकर 
बिना मेँ दृ किन्दीं लोका सेवन करना नहीं चाहतो२३-२४ 
मदिरानन्तरं कान्तिः संकर्पणमुपस्थिता । 
किचिदाघूणितेश्षणा ॥ २५॥ 


श्रीमहाभारते खिख्भागे 


[ दस्विंरो 


प्रोवाच प्रणयात्‌ कान्तिर्वद्धाञ्षछिपुखा सती । 
जयपूर्वेण योगेन ससितं वाक्यमर्थवत्‌ ॥ २६॥ 
वारणीके बाद कान्तिदरेवी संकर्पणकी सेवामे उप्रथित 
हई । उसक्रा कचरे मदमे करु कमित दो र्दा था 
अख भी ऊ धूमरही थीं । उस्ने टोनो दाथ जोडकर 
कहा--'जय दो वरूरामजीकी ।' फिर प्ेममे मुसकराती दरद 
वह प्रयोजनयुक्त वचन वोटी--॥ २५-२६ ॥ 
अदं चन्द्रादपि शुरं सहस्रिरसं पुम्‌ । 
स्वैगुणेरचुरक्ता त्वां यथेव मदिस तथा ॥ २७॥ 
धप्रभो ¡ यापकरे सदर्लो मस्तक द । आप जगत्‌के सामी 
ह| मेरी द्टिम आपक्रा गौर चन््मामि मी अथिकदै।र्भ 
भी वारुणीक्री माति पके निजी युणंपमि अक्र दो आफ 
अनुरक्त हो गयी हू ( दमीच्यि आपकी सेवाम्‌ -उपसित 
ह । आप सञ्च अङ्खीकार करे | )' ॥ २७ ॥ 
श्री पद्माटखया देवी निधया वैप्णवोरसि ।. 
रौहिणेयोरसि श्भा मालिवामटतां गता ॥ २८॥ 
सा मालाममलां गृह्य वलम्योरसि दंदिता। 
पद्मास्या पद्मरस्ता वै संकपणमथाय्वीत्‌ ॥ २९॥ 
जो भगवान्‌ विप्णुक्रे वकःस्वलमे नित्य निवासत करने 
योग्य हैः वे कमट्वनभे वास करनेवाटी देवी री 
(गओोभा) रो्िणीनन्दन वल्यामके वश्नःस्टमे सुन्दर 
मादकी भति प्रतिष्ठित दो निर्मल भाव्को प्रान ह| 
उनका मुख कमलके समान सुमोभित था, उनके हाथमे भी 
कमलपुष्पं योभा दे रदा था; वल्लामूपर्णोति सुखित हुई 
वे मूतिमती शोभा देवी बख्यामकरे वक्नमे स्थित हो एक निर्मल 
माला हाथमे ठेकर संक्रमे वरोर्टी---॥ २८-२९ ॥ 
राम रामाभिरामस्त्वं वारण्या समरंरतः। 
कान्त्या मया च देवेश संगतश्चन्द्रमा यथा ॥ ३०॥ 
देवेश्वर राप { वल्याम { आप वड़े ही अभिराम 
( न्द्र ) दै । बाखुणी ८ सुधा ) से, चन््रमाकी-सी कान्तिसे 
तथा मुञ्चसे ( कमलट्याकी-सी सोभासे ) सम्पन्न होकर 
चन्द्रमाके समान प्रकादित दोरहेदं। ३०॥ 
इयं च सा मया मौलिः प्रोद्धना चरुणालयात्‌ । 
मूर्ध्निं रीर्पसदखस्य या ते भादुगिवाव्रभो ॥ ३१॥ 
'्याप सहस्र िरवाल अनन्तदेवक मस्तकपर जो सूर्यके 
समान उद्धासित होता थाः वह्‌ मुक्कुट समुद्रस निकालकर मे 
यदो ठे आयी ह । ग्रही है वह सुद्ुट ॥ ३१॥ 


* यहाँ श्रीका अर्थं शोमाकी अथिष्ठत्री देवी ै। साक्षात्‌ 


भगवती लनी तो भगवान्‌ विष्णुकी मनन्यामुरागिणी पतित्नता पत्नी 
है । यहा मधु»काम्ति ओर दोभा --श्न तीन रोकसामान्य वस्तुओ- 
की मधिषठात्री देविर्योका ही उरुरेल किया गया ै--पेसा समह्ना, 
वाये । 


विप्णुपवं ] 


पकचत्वारिश्ो्ध्यायः 


3, 


ज ---- 


जातरूपमयं चैकं कुण्डलं वजरभूपितम्‌ । 
आदिपदं च पद्माक्षं दिव्यश्चवणभूप्णम्‌ ॥ ३२॥ 
{इसके सिवा वच्रमणि ( हीरे ) से विभूषित एक खुत्रण- 
मय कुण्डल भी ठेती आर हूः जो आपके एक करानका दिव्य 
भूषण है । यह आदिपद्न ओर्‌ पराभ कदल्या है ॥ ३२ ॥ 
कौरोयानि च नीरानि समुद्रहीणि भावतः । 
हारं च पीनतरटं सनुद्राभ्यन्तसेषितम्‌ ॥ २३ ॥ 
धजो समुद्र्मे.ही मिल "शकते हैः से कितने द्यी नीले 
रंगके रेमी व्र ८ अथवा आपकी इच्छके अनुरूप नील 
कौशेय वस्र ) तथा यह पीन तरल हारः जो समुदमे ही 
विद्यमान थाः यँ अपकरे व्यि लायी ह| आप इसे सादर 
म्रहण करे ॥ २३ ॥ . 
देवेमां प्रतिगृह्णीष्व पौराणीं भूषणक्रियाम्‌ । 
समयस्ते महावाहो भूपणानामटंक्रिया ॥ ३४ ॥ 
ष्देव | यह सब्र आपकी पुरातन मूपरण-सामग्री है । इसे 
ग्रहण कीजियि । महात्म ] यह्‌ आपके मूपण ग्रहण करनेका समय 
है। आपे ही इन भूपरणोकी शोमा हैः इनसे आपकी नही" 
संगद्य तमख्कारं तश्च तिखः सुरश्ियः। 
शयुयुभे वख्देवो हि शारदेन्दुसमपरभः ॥ ३५॥ 
वह अलङ्कार तथा उन तीन देवाङ्गनार्थको ग्रहण करके 
चस्देवजी शरत्काले चन्द्रमाकर भति ओोभा पने खो ॥ 
स॒ समागम्य कृष्णेन जलजाम्भोदव्च॑सा 1 
सुदं परमिकां लेभे श्रहयुक्तः शी यथा ॥ ३६ ॥ 
तदनन्तर वे नील्कमन ओर मेधके समान श्याम कान्ति- 
वले श्रीकृप्णके साथ मिलकर प्रहयुक्त चन्द्रमके समान 
सुशोमित दोने ल्गे । उस समय उनको वरड़ी प्रसन्नता 
प्राप्त हुई ॥ ३६ ॥ 
ता्यासुभाभ्यां संरूपे वर्त॑मनि गृहे यथा| 
वैनतेयस्ततो ऽध्वानमपिचक्राम वेगतः ॥ ३७ ॥ 
वे दोर्ना भाई जेते प्रसि व्रेठे दो, उस प्रकार बातचीत 
करने लगे । इसी समय विनतानन्दन गरड ब्र वेगसे विशाल 
सर्ग ते के वो यि ॥ ३७ ॥ 
संत्रामसुक्तस्तेजली दैत्यप्रदरणाद्कितः। 
देवतानां जयन्छाघी दिव्यस्रमनुरेपनः ॥ ३८॥ 
तेजसी गरुड़ उस समय एक संग्रामे चुटकर अयि 
थे । दत्योके प्रहारोके चिह॒ उस समय भी उनके अमि 
अङ्कित ये । वे देवतार्ओकरी विजय चाहनेवाले तथा दिव्य 
प््पोकी माला ओर दिव्य चन्दन धारण करनेवाले ये ॥३८॥ 
खपतस्य शयने दिव्ये क्षौद्रे वरूणाय ) 
विष्णोः क्रिरीरं दैत्येन हतं वेरेचनेन बै ॥ ३९ ॥ 
वरुणकरे निवातभूत्‌ क्षीरसमुद्रमे जव भगवान्‌ बिष्णु 


दिग्य शय्यापर सो र्दे थे, उस समय विरोचनके पुत्र एक 
देत्यने उनका किरीर चुरा चिया ॥ ३९ ॥ 
तदरथस्तेन संग्रामः कतो गर्वर्थमोजसा । 
किरीखाथं समुद्रस्य मध्ये देत्यगणेः सह ॥ ४०॥ 
अपने युसुरूप भगवान्‌ स्यि उस कररीटको वापस 
लनिके उदये गरुढ्ने ब्रीच समुद्रे दैत्योके साथ बवलपूवंक 
संग्राम किया ॥ ४० | 
मोक्षयित्वा किरीटं ठु, वैप्णवं पततां वरः । 
ज्यत्यक्रमत वेगेन गगनं देवताख्यम्‌ ॥ ४१ ॥ 
भगवान्‌ विष्णुके उस किरय्को दैव्योकि दाते दुडाकर 
पक्षियोमे श्रेष्ठ गरुड़ वदे वेगसे देवता्ओके निवासभूत 
आकारमे उड़ चले ॥ ४१॥ 
स ददर गुरु ददे पिष्णुं कायौन्नरागतम्‌ । 
तेन क्रीडावलम्बेन किरीटेन विराजता ॥ ४२॥ 
उन्होने देखा, मेरे खामी विप्णु दूसरे कार्यसे इस परवत- 
पर पर है । वे उस समय उस प्रकाशमान किरीरको कीडा- 
पूर्वक अपनी चोमे ल्टकये चरू रदे थे ॥ ४२॥ 
स दृष्ट माषं विष्णुं शैलराजशिरोगतम्‌ 1 
प्रकादाचेष्टनिमुं्तं विमोखिमिव मानुषम्‌ ॥ ४३ ॥ 
अभिन्नस्तस्य भावानां गरुत्मान्‌ पततां वरः । 
चिक्षेप खं गतो मरि विष्णोः किरसि दष्वत्‌ ॥ ४४॥ 
गिरिराज गोमन्तके शिखरपर विराजमान मानवरूपधारी 
विष्णुको प्रकाश ओर चेष्टाओते रदित तथा सुकरहीन देख 
उनके मानसिक भावोँको समद्ननेवठे पक्षियोमे श्रेष्ठ गण्ड़ने 
आकरारामे सित होकर व्रडे दर्षे साथ उन श्रीविष्णुक्र 
सिरपर वह मुकुट डाक दिया ॥ ४२-४४ ॥ 
उपेन्द्रमूर्चिं सा मोदिरपिनद्ध। इवापतव्‌ । 
शिरसः स्थाननिगं्ता छष्णं चेवान्वदयेभयत्‌ । 
यथेव मेरुशिखरे भायुर्मध्यंदिने यथा ॥ ४५ ॥ 
वह मुकुट श्रीकृप्णक्रे मस्तकपर गिरा ओर्‌ इस प्रकार 
वरेठ गया मानो किसने पहना दिया हो । मस्तकके खानपर 
निदिचत रूपसे आव्रद्ध होकर उस मुक्ुटने भगवान्‌ श्रीकृप्ण- 
की सोभा वदा दी | जते दोपदरफे समय मेरुके शिखरपर 
सूर्यदेव प्रकारित दति दै, उसी प्रकार वह्‌ सुकरुट भी देदीप्य- 
मानहोरहाथा॥ ४५॥ 
वैनतेयप्रयोगेण विदित्वा मौखिमागताम्‌ । 
ङष्णः प्रहृष्टवदनो रामं चचनमत्रवीत्‌ ॥ ४६ ॥ 
गख्ड़के ग्रयोगसे युङुटको मसकपर आया हुआ जान 
शरीकृष्णक्रा मुल प्रसन्नतासे खिल उठा ओर वे वलरामजीसे 
इस प्रकार वोठे--। ४६ ॥ 
स्वस्ते खलु कायौ देवतानां न संशयः। 
यथेयमावयोः शले संप्रामरचना छता ॥ ४७॥ 


२६८ 


श्रीमहाभारते लिकभागे 


॥ हरिवंशे 


~~~. 


ध्मैया | इस पर्वतपर हम दोनेक्रि स्थि जिस प्रकार 
युद्धोपयोगी वेप्र-मृप्राकी स्वना कर दी गयी दहै, इससे यी 
अनुमान होता द क्रि देवताओंक्रा कार्यं एवं प्रयोजन श्ीघ ही 
सिद्ध दोना चाहता दै, इसम्‌ संय नदीं है ॥ ४७ ॥ 
वैयोचनेन सुप्तस्य मम मौलिर्म॑दोदधो । 
हाक्रस्य सदशं रूपं दिन्यमास्थाय सागरात्‌ ॥ ४८ ॥ 
प्राहरूपेण यो नीत अआनीतोऽसौ गरुत्मता । 
ममािश्षयनान्मौलिर्हत्वा क्षिप्तो गरुत्मता ॥ ४९॥ 
ध्जव्र मै महावागसमे सो रदा थाः उस समय विरोचनका 
पुत्र इन्द्रका-स्ा रूप ध।रण करे वदो चला गया यौर जवर मँ 
दोष-शय्याते उठकर यर्दो आ गयाः तवर वह प्रादरूप धारण 
करके व्हेसि मेरा मुकुट उठा खाया । वही मुद्ुट गण्ड उससे 
छीन खये है ओर उन्दनि इते मरे मस्तकपर रख दिया दै ॥ 
सखुन्यक्तं संनिकृष्टः स जरासंधो नराधिपः। 
छक््यन्ते हि ध्वजाग्राणि रथानां चातरहसाम्‌ ॥ ५० ॥ 
"निश्चय ही राजा जरासंध अव बहुत निकट आ गया 
ड; क्योकि वायुके समान वेगवाले र्थोकी ष्वजा्कि जग्रभाग 
दिखायी दे रदे दे ॥ ५० ॥ ॥ 
पतानि विजिगीषूणां शश्लिकल्पानि भूभरताम्‌ । 
छन्राण्यार्यं विराजन्ते दंदितानि मितानि च ॥ ५१ ॥ 
ध्यं | विजयकरी अभिका रखनेवाले राजा्भकि ये 
चन्द्रमा-जैसे स्वेत कान्तिवाले सुसलित छत्र प्रकारित हो रहे 
है; इनकी संख्या परिमित दी दै ॥ ५१ ॥ 
अहो दछपरथोद्श्रा विमलाद्छन्नपडन्कयः। 
अभिवर्तन्त नः शुभ्रा यथा खे दंसपङ्क्तयः । ५२ ॥ 
"अहौ ! यजार्ओकि रर्थोपर विराजमान जो ये वेत 
वर्णवाटी ऊँची छत्रपदकषर्यो हमलोगोकरी ओर ब्दी आ रदी 
दै, ये आकारा उच्ज्वल दंसपदक्ति्योके समान सुशोभित 
होती द ।॥ ५२॥ 
अहो चयौर्धिमल।भानां शखयाणां विमलानना । 
ध्रभा भास्करभामिश्रा चरन्तीव दिको दश्च ॥ ५३॥ 
'अहो | इन निर्म प्रभाववाटे भर्लोकी चमक्रसे 
आक्राराका मुख भी उच्स्वल एवं प्रकादित दौ उठादहै। 
श्रखौकी ये दीति सूर्थदेवकी किरणो मिलकर दरस दिद्ाथमिं 
विचरती-षी प्रतीत होती ई ॥ ५२ ॥ 
पतानि मूलं समरे पार्धिवेरयुधानि च । 
क्षिप्तानि विनदिप्यन्ति मयि सवीणि संयुगे ॥ ५४ ॥ 
निश्चय ही; समराद्वणमे भूमिपालद्रारा मुक्षपर चत्ये 
गये ये चमस्त अल्र-दल् नष्ट दो जर्येगे ॥ ५४॥ 


काटे खलु चपः प्राप्तो जससंधो महीपतिः । 
आवयोयुंद्निकपः प्रथमः समरातिथिः ॥ ५५॥ 
धराजा जरासंध टीक समयपर आया है । यह हमलोगंकि 
युद्ध-कौरल्की कसीटी है तथा समराद्धणक्ा पहल अतियि है ॥ 
आर्यं तिष्ठाव सहितौ न खल्वानागते पे । 
युद्धारम्भःश्रयोक्तव्यो वटं तावद्‌ विश्रद्यताम्‌॥ ५६॥ 
'आर्य हम दोर्नौ साथ रहं । राजा जगासंधके आनेसे 
पठे अभी हर्म युद्ध आरम्भ नहीं करना चादधिये । जवतक 
वह नर्द आता दै तवतक्र हम उसके वलकरा विचार कर "| 
एवमुक्त्वा ततः कृष्णः खस्थः सग्रामलकाछ्सः। 
जससंधवधं ब्रष्युश्चकार वलदर्लनम्‌ ॥ ५७ ॥ 
ेसा कहकर श्रीङकष्ण सखस्यमावस संग्रामकी इच्छा रख- 
कर जरासंधक्रा वध चाहते हुए उसके सेनिकर-वल्का निरीक्नण 
करने खगे ॥ ५७ ॥ 
वीक्वमाणश्च तान्‌ सरन्‌ नृपान्‌ यदुवसेऽव्ययः। 
आत्मानमात्मनोवाच यत्पूवं दिति मन्त्रितम्‌ ॥ ५८ ॥ 
हमे ते पृथिवीपाखाः पार्थिवे वत्म॑नि स्थिताः। 
ये धिनाक्शं गमिष्यन्ति शाखदष्टेन कर्मणा ॥ ५९॥ 
उन सव राजार्भका निरीक्षण करते हुए अविनाशी 
यदुकुरुतिलक भगवान्‌ श्रीङ्कप्ण स्वयं हो अपने-जापसे कटने 
ल्गे--५अहो ! दिव्यलयेकर्मे देवताओकरि साथ वैठफर जो युत्त 
मन्त्रणा की गयी थी, उसके अनुसार ये भूमिपाल राजोचित 
मार्गपर सितै! ये शाष्छोक्त विधिमे संग्राममे विनाशक 
प्रास दगि ॥ ५८-५९ ॥ 
भरोक्षितान्‌ लल्विमान्‌ मन्ये स॒ल्युना चृपसत्तमान्‌ । 
स्वगंगामीनि चण्येषां वपुषि प्रचका्िरे ॥ ६० ॥ 
मतो समन्ता ह फि मूत्युने रणयक्ञमे आहूति 
देनेके स्थि इन श्रेष्ठ राजार्ओका प्रोक्षण कर चियरा दहै] इनके 
स्वर्गगामी शरीर अभीसे प्रकरायित दोर्टेह॥ ६०॥ 
स्थने भार्पररिश्रान्ता वसुधेयं दिवं गत।। 
पां गरपतिसिहानां वदलेरभिपीडित। ॥ ६१॥ 
ध्य्‌ पृथ्वी इन राजित सैन्यसमृहते पीडित हो इनके 
भारते थककर ज देवटोक्रभे गयी थी; वद इसरा जाना 
उचित ही था॥६१॥ 
अद्येन ख्यं कालेन विविक्तं परथिधीतटम्‌ | 
भविष्यति नरेन्द्रौधेराकीर्णं च नभस्तलम्‌ ॥ ६२॥ 
धर थोडे दी समयम यह भूमण्डल इन राजसमूर्ते 
खाली हौ जायगा ओर आका मर्‌ जायगा" | ६२ ॥ 


दति श्रौमहाभारते खिरूभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि जरासंधाभिगमनं नामैकचत्वारिरोऽध्यायः ॥ ४१ ॥ 
दस प्रकार श्रामदमासततेः छिरमाग हिद अन्तर्मत विष्णुम जरासथका अभियानविषयक इकतारीसर्े{ अध्याय पुरा हुमा ॥८६॥ 


नरो ०99० 


| विष्णुपर्व ] 


दिचत्वारि्ी ऽध्यायः 


२६९. 


| दविचल्वारिशोऽध्यायः 
जरासंधकी सेनाका चरणन, उसका सेनाको पव॑तपर आक्रमण करनेकी आज्ञा देन रिञ्ुपालकी 
सम्पतिसे गोमन्तपरवतमे आग रगाया जाना, पर्वतका जङना तथा वराम 
ओर श्रदृष्णका पर्वतसे कूदकर रजार्भोषी सेनामे आ पर्हैचना-- 


वैशम्पायन उवाच 
जरासंधस्ततः प्रो गरृपः सर्वमहीक्षिताम्‌ । 
नराधिौ्ययुयेरुयातो महाद्युतिः ॥ ९ ॥ 
वैशम्पायनजी फष्ठते है--जनमेजय | तदनन्तर 
समस्त राजाओका राजा महातेजस्वी जयासेध व्हा आ पर्हुचा । 
उसके फे अपनी-अपनी सेना साथ दूसरे भी बहुत-से 
नरेश थे ॥ १॥ 
व्यायतोदय्रतुरगोधिस्प्टा्थंसमाितैः । 
रथैः सङुग्रमि्ुकैरसङ्गगतिभिः कचित्‌ ॥ २ ॥ 
करी अल्ल-शाछफरे ज्ञाता पुरणेद्यारा भरीर्मोति तिखाये 
गये विरा एवं प्रचण्ड वल्शाली अश्वोसे युक्त रथ युद्धोप- 
योगी साम्यति सम्पन्नं होकर अगि बद्‌रदे थे। उन 
रथोवयी गति कटी भी अवरुद्ध नहीं होती थी ॥ २॥ 
देमक्ेरमहापण्टैवररणेवारिदोपतैः । 
महामाशरोत्तमारूढैः कर्पते रणगवितैः ॥ ३ ॥ 
~ कीं ब्हुसंस्यक हाथी चर रदे ये, जिन्ह सोनेकी जंजीरोसे 
कसा गया था} उनके दोनो पार््वभे यदे-बडे घटे लटक रहे 
ये | वे समी हाथी मेषोकी घटाकर समान जान पडते थे! उनकर 
ऊपर अच्छे महावत वैडे थे तथा रणगर्वित कुशल योद्धार्भौ- 
द्वारा उन्ह सुसजित किया गया था ॥ ३ ॥ 
खारूटैः सादिभिर प्रेह्ुमाणेः भवदिगतेः । 
वाजिभिवौयुसंकादोः बद्धिरिव पत्निभिः ॥ ४ ॥ 
कहीं घुड़सवार योद्धा धोड्धौपर अच्छी तरसे सवारये । 
उनके बे घौडे वयु समान वेगश्चाटी ये ओर उचल्ते-कूदते 
हए जगे वदते समय आकाशम उद्तते हुए पक्ष्योके समान 
प्रतीत होते थे ॥४॥ 
सङ्गचभैवरोदभैः पत्तिभिर्वलिनां वरः 
सदस्रसंस्यर्नुरत्यतद्धि(रवोरभैः ॥ ५६५ 
ख्वारनोमि शरेष्ठ पेदल सैनिक भी ठा भौर तल्वार 
लवि अ्रचण्डश्प धारण करे आगे वदते थे । वे दजार-हजार- 
कौ टोषिोमि एक साय चरते जौर केचुखते चे हुए सर्पके 
समान उछल्ते थे ॥ ५] 
पवं चतबिधेः सैन्यैः प्रचलद्धिरिषाम्बुदैः । 
रपोऽभियातो यरवा्जरासंघो धृतवतः ॥ ६ ॥ 
पस प्रकार मेडरत हुए भादल समान चतुरङ्खिणी 


सेनर्पँ साथ लेकर वीरचतको धारण करनेवाला ब्रल्वान्‌ राजा 
जरासंध युद्धके ल्ि आगे वद्‌ रहाथा॥६॥ 
स रथनेमिषोपश्च गरजैदचव मदसेयुतैः । 
हेपद्धिश्वापि तुरः क्वेडितोत्रेश्च पत्तिभिः ॥ ७ ॥ 
संनादयन्‌ दिशः सवः सर्वाश्चापि गुदादयायान्‌ 1 
सख राजञा खागराक्ारः ससैन्यः भरत्यददयत ॥ < ॥ 
वह्‌ राजा पदिक धर्भ॑र घोषते युक्त र्थो, ( चिग्धाइते 
हुए ) मतवारे हाथियों, हिनहिनाते हए घोड़ो तथा गर्जते 
हुए पैदल सैनिकोदयारा सम्पूर्णं दिशाओं एवं समस्त पर्वताय 
कन्दरारओंको प्रतिध्वनित करता हुआ. सेनाक्रे साय ॒समुद्रके 
समान दिखायी देता धा ॥ ५-८ ॥ 
तदं परथिवीच्यानां द्योधननाङ्खम्‌ । 
कवेडितास्फोटितरवं मेधसेन्यभिवावभो ॥ ९ ॥ 
भूमिपालकी वह सेना दृषटपुष्ट योद्धासि परसिपृणं थी । 
गनि ओर ताल ठोकनेकी गम्भीर ध्वनिते वह्‌ गर्जती हृरद 
मे्घोकी घटके समान प्रतीत होती थी ॥ ९ ॥ 
रथैः पचनसंपातैर्गजेश्च जर्दोपतेः । 
तुरगैश्च सिता्नामैः पत्तिभिश्चापि दंरितैः ॥ ९०॥ 
व्यामिश्रं तद्वछं भति मत्तद्विपसखमाङ्खम्‌ । 
धमौन्ते सागस्गतं यथ(श्रपरटं तथा ॥ ११॥ 
वायुकरे समान तीव्र गतिप्े चस्नेवाठे र्थो, काठे मे्वोके 
समान प्रतीत रोनेवाले हाधिर्यौ, ख्वेत वादलोकरं समान घों 
तथा कवच आदिे सुसजित पेदल योद्धाओसे मिभ्नित हुई वह 
सेना सव्र ओसरपे सुशोभित दयो रही थी । मतवा दाथियोति व्याप्त 
हुई वह विशाल वादिनी वर्पशरदुमे समुद्रके भीतर चश्ित 
होनेवाले मे्घोकि समूदकी सोभा धारण करती थी ॥१०-११॥ 
सबरास्ते मदीपाङा जरासंधपुरोगमाः। 
परिवायं गिरं सवे निवेशायोपचकमुः ॥ १२ ॥ 
जरासंध आदि समस्त भूपाल अपनी सेनक साथ उस 
पर्वतको चार ओस्से घेरकर छावनी डल्नेकी तैयारी करने 
स्रो ॥ १२॥ 
वभौ तस्य निविष्टस्य वरुथीः शिषिरस्य वै । 
शङ्के पर्वणि पूर्णस्य यथा सूपं मदोदघेः ॥ १३॥ 
व्हा डरा ढाठे टुए जसरसंधके सैनिकरिविरकी सोभा 
वेखी ही प्रतीत दती थी, जैसा कि शक्लपक्षकी पूर्णिमाको 


२७० 


अपनी उत्ता तरंगोपि परियरणं हुए महाखागरका रूप देखनेमे 
आतारै॥६६॥ 
चीतराश्रे ततः काले नृपास्ते रृतकौतुक्राः 
आरोहणार्थं शेखस्य समेता युद्धखाटसाः ॥ १४॥ 
तदनन्तर रात वीतनेपर्‌ सतर रजा उठे ओर्‌ मंगलाचार- 
म समयन्न दह्ये युद्धकी लढा गोम. तपर्वतपर चद्नेके च्वि 
एकतर रोने चमे ॥ १४॥ 
सखमवावीकृत सर्वं गिखिव्रस्थेपु ते चृपाः। 
निविष्ठा मन्यामाखयंद्कारकुतूदलाः ॥ ६५॥ 
पर्वतक़े मिखसेपर एकत्र दो वे सभी राजा वैटे ओर 
युद्धकरे शुभ अवक्षरफे च्वि उस्घुक दौ आपस मन्त्रणा करने 
त्रो ॥ १५॥ 
पां तु तुमुलः शाब्दः श्ुश्ुवे पृथिवीक्षिताम्‌ । 
युगान्ते भिद्यमानानां सागसणां यथा खनः ॥ १६॥ 
सेनातदित दन नेरेोकी वमुक ध्वनि प्रल्यक्रालमे मर्वादा- 
करो तोद्कर व्हनेवाटे समुर््रकी भयंकर गर्जनाके समान 
सुनायी देती थी ॥ १६ ॥ 
तेषां सकञ्चुकरोष्णीषाः स्थविरा वेन्नरपाणयः | 
चेरी प्राघ्द्‌ इत्येवं ब्रुवन्तो राजशासनात्‌ ॥ १७ ॥ 
(उन राजा्थेकि छडीदार वृषे तिपादी चोगा ओर पगद़ी 
धारण क्रिये तथा हाथमे त्रत लिये राजाज्ञसे यह कहते हुए 
विचरे लगे क्रिंस्व्ररछोग मनर । कोद एक शब्द मी 
न ब्रोठे ॥ १७ ॥ 
तस्य रूपं वलस्यासीन्निःदाब्दस्तिमितस्य वै 1 
लीनमीनथुजद्गस्य निनदव्दभ्य पयोदधेः ॥ १८॥ 
उश्च समय नीरव जीर निश्वर हृष उस्र सैन्यसमूहका 
रूप उस यनब्ददीन प्रगान्त महासरगरके समान प्रतीत होता 
था, निस्के म्य ओर भुजन्न जलकरे भीतर विटीन दौ 
ग्ये्दो ॥ ६८॥ 
तस्मिन्‌ स्तिमितनिद्रब्दे योगाद्विव महदा्णैवे । 
जरालन्यो वृद्वत्क्यं ब्रृदस्पतिरिवाद्रदे ॥ १९॥ 
वह सैन्यरसागर मानो यौगव्रख्ते जन सदसा नीरव तथा 
निश्चल दो गयाः तवर बृदलतिके समान नीतिश्च जरासंधने 
यह मदत्त्रपूणं वात कदी-1 १९ ॥ 
शीघ्रं समभिवर्त॑न्तां वलानीह मदीक्षिताम्‌। 
सर्वतः पर्वतश्चायं वलोपः धसिवार्यताम्‌ ॥ २० ॥ 
श्यजार्ओकरी सेनार्दे बीधदी आक्रमण कर जर स्व 
ओरते मैनिकसमृह इस पर्वतक्री व्रेर टे ॥ २० ॥ 
अदमयन्त्राणि युज्यन्तां क्षेपणीयाश्च मुद्सः। 


ऊर्वं चापिप्रबादयन्तां श्राला वै तोमराणि च ॥ ९१॥ , 


रीमषहाभारते लिटभामे 


[ हरिवो 


(पत्थर गे बरसनेवटे यन््र त्रा दिये जर्थ। 
क्षेपणीय ( गोफना या देल्वोसि ) तथा मुद्भर संमा च्ि 
जर्ये । प्राद्य भौर तोमर भी ऊपर कर व्यि जाथे ॥ २१॥ 
ऊर्ध्वं प्रक्षेपणाथौय दृढानि च छघरूनि च । 
शख्रपातधिघातानि क्रियन्तामाद्यु दिद्पिभिः ॥ २२॥ 

'रात्ुधकरि शस्रपदारको नष्ट करे समर्थ सुद्ट्‌ ओर 
हल्के गोलोक ऊपर फैकनेके यि हमारे शिप दीघ तैयार 
करं ॥ २२॥ 
शराणां युद्ध.मानानां प्रमत्तानां परस्परम्‌ । 
यथा नस्पतिः प्राह तथा दीप्रं विधीयताम्‌. ॥ २२॥ 

ष्परस्पर्‌ प्रमत्त दोक्रर युद्ध कस्नेवाले द्रूरवीरकरि स्यि 
जैसा राजा शिशुपाल कटे, शीघ्र वैसा दी प्रबन्ध क्रिया जाय ॥ 


दरय॑तामेष द्रोः खनितरैश्च नगोत्तमः। 
चरपाश्च युद्धमायंक्षा तिम्पस्यन्तामदुर्तः ॥ २४॥ 
(उम उत्तम पर्वतो टंकसमृदं ओर खनिर््मि 
खोदकर विदीर्णे कर डाल य | युदकी प्रणायक जानकार 
नसेयेकरि इसके समीप ही वथाखान खड़ा क्रिया जाय ॥२५॥ 
अयग्रथृति सेन्यैमं गिरिरोधः प्रवर्त्यताम्‌। 
यावदरेती पातयामो वसद्रेवघुतावुभौ ॥ २५ ॥ 
'आजमे मेरे मैनिकर दरस पर्वतपर्‌ प्रेण डान दै जीर इसे 
तव्रतक्र चा. रखे, जग्रतक करि हम इन दोनो वसुदरेवपुर्बोको 
मार नडं ॥ २५॥ 
अचलोऽयं शिलायोनिः क्रियतां निखखाण्डजः। 
अकाश्मपि वाणोचैनिःसम्पातं विधीयताम्‌ ॥ २६ ॥ 
'दिल्भसे दी उत्पन्न हभ ( अयवा श्चिव्यर्योका 
उत्पादक ) ग्रह पर्व॑त स्ववं तो अचल दै दी, इसपर रहनेवाटे 
पक्षिर्वोको भी सायकोद्रारा यचट ( दिटने-इुट्ने या उदु 
असमर्थं ) कर द्विया जाय । आकादाको भी वाणभमृहोते दस 
तरद सध द्विया जाय क्रि उसमे पक्षी भी उडन स्क |॥२६॥ 
मयाुि'पएरस्तिष्टन्ठ॒ भिरिभूमिघु भूमिपाः। | 
तेषु तेप्ववकरादोघु दीच्रमारुद्यनां गिरिः ॥ २७॥ 
पेरी आशा मानकर समस्त भूपाल पर्वतीय सानि खडे 
रहे ओर जर्हो-जर्दो अवकाय मिल जाय वर्शे-व्हेसि शीध दी 
पर्वतपर चद जाये | २७॥ 
मद्रः कलिद्नाधिपनिश्ेक्रितानश्च वाहिकः । 
कद्मीरराजो गोतर्द॑ः करूष।धिपतिस्तथा ॥ २८॥ 
द्रमः किंपुरुषश्चैव पर्वतीयाश्च मानवाः। 
पर्च॑तस्यापर पादं क्षिप्रमासेदयन्त्वमी ॥ २९ ॥ 
मद्रराज शास्यः कटिज्ञराज श्रुतायु चेकितानः वाहिकः 
कादमीरराज गोनर्द, करूपरा दन्तवक्त्रःकरि्रराज दम तथा 


विष्यं ]. 


द्विचत्वारिशेऽघ्यायः 


#॥ 


. २७१ 


पर्वतीय परेश योदधा--ये सवर लोग इस पर्वते पश्चिम 
„, मागपर ची ही चदाई कर दें ॥ २८२९ ॥, 
परयो वेणुदास्ि वैदर्भः सोमकस्तथा । 
रुक्मी च भोजाधिपतिः सू्याक्ष्यैव मालवः ॥ ३० ॥ 
पाञ्चालाधिपतिश्चैव _ द्रुपद नराधिपः 
विन्दाचुविन्द्‌्ावन्त्यौ द्न्तचक्चश्च वीर्यवान्‌ ॥ ३१॥ 
छागलिः पुरमितघ्रश्च विरारश्च महीपतिः | 
कौशाम्भ्यो मारवश्चैव शतधन्वा विदूरथः ॥ ३२॥ 
भूरिश्रवालखिगतंश्च वाणः पञ्चनद्स्वथा । 
-उत्तरं पर्वतोदेशमेते दुर्मसहा च्रपाः। 
आसेहन्तु विरदन्तो वच्रघरतिममौरवाः ॥ ३३ ॥ 
पूरवंसीय वेणुदारिः विदमदिशीय सोमक्रः भोजोके 
अधिपति रुक्मी मालवके राजा सूर्याः पाश्चाख्देशके 
अधिपति राजा द्रुपदः अवन्तके दोनो राजकुमार विन्द ओर 
अनुविन्द) पराक्रमी दन्तवक्च, छागलिः पुरमिनच्र, राजा 
विराटः कौ शा्वीनेरेश मालवः शतधन्वा, विदूरथ, भूरििवाः 
त्रिगर्त, वाण र पञ्चनदे दुर्गयुद्धकरा येग सह सकनेबाले 
नरेश शातुरमोको ऊुचल्ते हुए इ परवतके उत्तरभागपर चदाई 
करे इनका गौरव वज्र परस्य है ॥ २०-३३ ॥ 
उत्ट्कः कैतवेयश्च वीरव्ांशुमतः सुतः । 
पकलन्यो दडढाश्वश्च क्षचरधमं ` जयद्रथः ॥ २४॥ 
उत्तमोजास्तथा दालः कैरदेयश्च कैदिकः। 
वैदिशो वामदेव्य खुकेतुश्चापि वीर्यवान्‌ ॥ ३५॥ 
पू्पर्वतनिव्यूंमेतेष्वायतमस्लु नः। 
विदारयन्तो धावन्ते बाता इव बलाहकान्‌ ॥ ३६॥ 
'शङ्खनिपुत्र उच्छ, अंञयमान्फ्े पुत्र वीर, एकलध्यः 
दृदादवः धत्रधर्मा, जयुद्रथः उन्तमोजा, शाल्वः कैरलराज 
केशिकः विदिव्ाके राजा वामदेव ओर पराक्रमी सुकेवु-इन 
सरे अधीन इस पर्वतका पूर्वभाग सप दिया जाथ | ये लोग 
जेते वायु बादलोको छिन्न-मिन्न कर देती दहे, उसी प्रकार 
रातुभोको विदीणं करते हए उनपर धावा बोल दै ॥२५-३६॥ 
अहं च दग्दश्चैत्र वेदिराजश्च वीर्यवान्‌ । 
दक्षिणं शेनिचयं दूारयिष्याम दल्चिताः ॥ ३७॥ 
नमे दरद तथा पराक्रमी चेदिराज शि्ययाख कवच आदि. 
से सुषलित होकर इक्त पर्वतक्रे दक्षिणभागक्तो विदीर्ण कर 
ङ्गे ॥ ३७ ॥ 
पवमेप गिरिः क्षिप्रं समन्ताद्‌ वेष्टितो वद्ैः । 
वज्जप्रपातप्रतिमं प्राप्नोतु तसुं भयम्‌ ॥ ३८॥ 
“दस प्रकार हमारी सेनार्ओष्ठार चारौ ओसरसे धिर हुआ 
य पर्वत मीघ्र दी" मानो इसपर वश्नका आधात हो रहा होः 
इस तरह घोर भय प्राप्त करे ॥ ३८ ॥ 


गदिनो धै गदाभिश्च परिधैः परिघायुधाः । 

अपरे विविधैः राचख्दीरयन्तु नगोत्तमम्‌ ॥ ३९ ॥ 
'्गदाधारी वीर गदाओंत्ि; परिप्र चलानेवाले परिस 

तथा अन्य वीर नाना प्रकारे दूसरे अन््र-रासरोनि इम श्रे पर्वतके 

इक्डेःटकडे कर डले ॥ ३९ ॥ 

एप भूमिधरोऽथेव बिपमोचरशिखान्वितः। 

कार्या भूमिसमः स्व भवद्धिर्वखुधाधिपेैः ॥ ४०॥ 
ध्विषम एवं ऊँची चिलाभंसि युक्त इस भूधरो याप 

समी भूपाल मिलकर आज ही भूमिके समाने समत कर 

डाः ॥ ४० ॥ 

जरासंधवचः श्रुत्वा पार्थिवा राजशासनात्‌ ! 

गोमन्तं वैष्टयामाखुः सागराः परथिदीमिव ॥ ४१॥ 
भरासंधकौ ब्रात सुनकर समस्त राजाओनि मगधराजकी 

आज्ञासे गोमन्तपर्व॑तकौ चारौ ओसते ब्रेर च्याः ठीक उसी 

तरह जेते समुर परथ्वीको रेरे हुए हे ॥ ४९॥ 

उत्राच, राजा चेदीनां देवानां मघवानिव । 

कि ते युद्धेन दुगे ऽसिन. गोमन्ते च नगोत्तमे ॥ ४२॥ 
-उस समय देवताओं राजा इन्दरके समान चेदिवासिरयौ- 

के-अधिपति राजा दमयोषने जरामंधसे कहा-राजन्‌ } यहं 

पवतम श्रेष्ठ गोमन्त दुर्गम पर्वत है 1 इसपर युद्ध करने 

जापको क्या लभ होमा | ४२॥ 


दुरारोहश्च शिखरे प्रां्युपादपकण्डके। 

काषठस्दणेश्च वहुभिः परिवायं समन्ततः ॥ ४२ ॥ 

अदयेष दीप्यतां क्िप्रमलमन्येन कर्मण । 
“इसके रिलरपर ऊँचे-ऊचि दृध ओर किरे हैः अतः 


, इसपर चद्ना बहुत कठिन काम है । मेरी तो राय दै बरहुत-से 


काठ ओर घासफूष जुयाकर दस पर्बतको चारो अस्ते घेर 
दिया जाय ओर अमी इसमे आग खगा दी जाय । इसी 
कार्यम शीता करन चादि । दूसरे किसी भ्रयानसे कु 
हने-जानेवाला नहीं दै ॥ ५३१ ॥ 


्षननियाः सुकमारा हि रणे सायक्रयोधिनः ॥ ४४॥ 
नियुक्ताः पर्वते दुगे नियोषतुं पादयोधिनः। 
ननाम प्रतिबन्धेन न चावस्कल्द्कर्मणा ॥ ४५॥ 
शक्य एप गिरिस्तात देेरप्यवभर्दितुम्‌। 

'क्योकरं क्षचिय लोग सुकुमार होते &। ये रणभू 
बाणेद्धारा दी युद्ध कर सकते  ।( पर्वतपर चदना इनक 
लिय अलयन्त कठिने । ) इस समय इनं दुर्म परव॑तप्र 
चद्कर बहक पैदल योद्धाओंके साथ युद्ध करनेके कामप्रं 
नियुक्त किया गया है ( जो इनके चि दुष्कर ह )। तात | 
केवल घेरा डालनेसे या ऊपर चद्‌ जनिसे देवता भी इस 
पर्वतका सद॑न नहीं कर सक्ते ॥ ४४.४५१ ॥ 


३५७२ 


दुग्धे क्रमः शरेयान रोधयुद्धेन पार्थिवाः ॥ ४६॥ 
भक्तोदकेन्धकैः क्षीणाः पात्यन्ते गिरिसंधिताः। 
वयं वदब इत्येवं नाप्येप निपुणो नयः ॥ ४७ ॥ 
राजा ! दुर्गय॒दधम सेधयुद्ध ( प्रेय डालने ) के द्वारा 
जो ठ्डर्दृका क्रम चाद किया जाता दहै; वह श्रेयस्कर होता 
ह ( कर्यो दुर्गकी खायसामग्री समा दोनेपर वेकि निवा- 
चिका पतन अव्द्यम्भावी दै; परंतु वरौ परव॑तनिवासियेकरि 
च्ि खानि-पीनेकी सामग्री सदा सुल्म दहै ) ¡ अन्न, जल ओर 
लक्रडीकी कमी दौ जाय तमी पर्वतवासी योद्धार्जकरी धरा- 
शायी किया जा सक्ता | हमारी संख्या व्रहुत है जर 
विप्िर्योकी कम--एेसा मोचना भी निपुण नीतिकरा परिचायक 
नदी दै ॥ ४६-४७ ॥ 
याद्रवौ नावमन्तन्यौ द्वावप्येतौ रणे स्थितौ । 
अविक्ञातव्रकावेतौ श्रूयेते देवसभ्मितौ ॥ ४८॥ 
धे दोनो यदुवंगी भी युद्धके चयि दैयार खे ई 
अतः इनक्री अवदैखना नदीं करनी चादिये। इनके पूरेपूरे 
वरल्करा ज्ञान क्रिमीको नदींटै। वे दोनों देवताओफ़ि समान 
तेजम्बी सुने जति द ॥ ४८ ॥ 
कर्मभिस्त्वमसै चिश्नो वाखावतिवलान्वितौ । 
दुष्कसणीद कमणि छतवन्तौ यदुत्तमौ ॥ ४९॥ 
(अपने करमोति तो ये अमर जान पडते दै; क्योकि वाल्या- 
वस्या दी ये अव्यन्त वल्शाटी द| यदुकुख्के इन श्रेष्ठ 
पुनि इस जगन्म वदे-यदे दुष्कर कर्म क्रिये द ॥ ४९॥ 
दयुष्ककष्ठैस्तणेरवेध्य सर्वत; पर्वतोत्तमम्‌ 1 
अग्निना धीपयिप्यामो दद्येतां गतन्ेतनो ॥ ५० ॥ 
अतः सूखे काटो ओौर तिनकेपि अयविष्टित करके इस 
उत्तम पर्वतम म सव्र ओरसे आग टगा दैगे | इससे 
अचेत रौकरर वे दोनो भस्म हो जर्येगे ॥ ५०॥ 
यदि चेन्निष्करमिष्येते दद्यमानावितो ऽन्तिके । 
समेत्य पातयिष्यामस्त्यक्ष्यतो जीवितं ततः ॥ ५१ ॥ 
ध्यदि आगसे जल्ते दए वे दोनो हमारे पासते निकटेगे 
तो हम सव्र छोग भिखकर उन मार गिर्येगे । इस तरद 
उन दोर्नौको अपने जीवने हाथ धोना पडेगा, | ५१॥ 
वाक्यमेतत्तु रखख्चे सवलानां मदीक्षिताम्‌ । 
यदुक्तं ब्रेदिसयजेन ग्रपाणां दहितद्ंसिना ॥ ५२॥ 
राजा्ेकरि द्वितकी वात वतानेवाठे चेदिराजने जो ब्रात 
यौ कही; वद्‌ सेनापदहित समस्त ॒राजा्भको यच्छी 
त्गी | ५२॥ ॥ 
ततः काण्डैस्तृणे्वरौः श्यु्कलासखैश्च पादपैः 
उपाकीप्यत दन्दः स्थंपादैरिवाम्बुदः ॥ ५३॥ 
तदनन्तर उन्मि काठ.कवादु, घाग-फूस ओर सृष्वी 


शीमद्ाभारते विरुभरे . 


.[ हस्वे 


डाख्वाले व्र्न यकर उनके द्वारा उस गिस्गिज गोमन्तम 
आगल्गादी| उस्र समग्र आगक्री उवाका्जति भरिया भा 
वह्‌ पर्वत सूर्यकी किरणेनि आत्त मेधकरे ममान प्रतीत होता 
शा ॥ ५३॥ ~ - 


ददुस्ते सर्व॑तस्तूण पावकं ॒तच्र पार्थिवाः) 
यथोद्देशं यथावातं श्चैलस्य खघुविक्रमाः ॥ ५४॥ 
इसके वराद शीघतापूर्वक पैर ब्रदति हए रजा्थेनि जं 
जैसा वाका ख्ख था, उसके थनुसार तुरंत दी पर्वते चां 
ओर वह्‌ आग फैला दी | ५४ ॥ 
ख वागुदीपितो बद्िरुत्पपात समन्ततः। 
सधूमज्वारमाखाभिभौभिः खमिव शोभयन्‌ ॥ ५५॥ 
वायुने प्रज्वलित हद आग वदो सत्र ओस्ते ऊपरको 
उठने लगी यी धूमयुक्त ज्वाटमालर्ओकी प्रभासे आकारकी 
दोभा-ती वदानि लगी ॥ ५५ ॥ 


सोऽन; पवनायस्तः काटसंचयमूलवान्‌ । 
ददाद दौर श्रीमन्तं गोमन्तं कान्वपद्पम्‌ ॥ ५६॥ 

सूखे काठोकेटेर ही जिसकी जड थे, वह आग वायुकर 
सहारेसे वद्कर कमनीय व्रक्षोबाटे मोमा-सम्पन्न गोमन्तपर्वत- 
को चासौ ओरतते दग्ध करने गी | ५६ ॥ 


स दश्मानः शैलेन्द्रो मुमोच विपुलाः शिलाः । 
शतशः दातधा भूत्वा मदोल्काकारदशंनाः ॥ ५७ ॥ 
उस आगसे दग्ध होता हुआ गिरिराज गोमन्त घडी 
ब्रदधी दिर छोडने खगा ( अग्निक तापसे चयककर प्रस्तर- 
खण्ड द्ूटदूटकर गिरने चो ), वे सैकड़ों गिल्‌ सौ-सी छ 
होकर गिरते समग्र व्रही-वडी उच्का्ओकि समान दिखायी 
देती थीं ॥ ५७ ॥ 
सख चित्रभावुः शैटेन्द्रं भाभिभीचुरिवाम्बुदम्‌ 1 
आदिम्पतीव विधिवत्‌ समन्तादर्चिरुद्धतः ॥ ५८ ॥ 
लपटोसे ऊपरको उठती ई वह॒ आग उस पर्वतराजको 
सव्र ओरसे प्रमा्द्यारा विधिपूर्वकं खीपती-सी प्रतीत होती 
शरीः ठीक उसी तरट्‌ जे सूर्यदेव अपनी श्रिरणोद्रा मेर्घोको 
अनुत्त कर देते ई ॥ ५८ ॥ 
धातुभिः पच्यमानेश्च ज्वलद्धि्धैव पादपैः । 
उद्भान्तश्वापदो रोति तु्यमान श्ाद्रिराट्‌ ॥ ५९॥ 
पकती हुई धातुर्थो, जल्ते हुए व्रृ्नो तथा धवड़ये हुए 
दिंसक्र जन्तु अति युक्त वद्‌ पर्वतराज एसा जान पडता था, 
मानो व्यथति पीडित होकर यो रदा दो ॥ ५९॥ 


प्रतप्तो दद्यमानस्तु स दोलः कृष्णवर्त्मना 1 
रीतीर्निर्व्तयामासलं काञ्चनाञ्जनराजतीः ॥ ६० ॥ 
आगमे दग्ध होकर तपा हुमा वह पर्वत सोने, वोदी 


विष्णुपर्व ] 


हिचत्वास्दिषिऽष्ययः 


२३७२ 


[क यनिक्यकयनेकिण्य 
----------------------न--नन ~~~ 4 
नन ----------------- "~~~ 


तथा कले संगकी धातुक पिधले हुए स्मोकी धार बदाने 
क्क्गा |) ६० |} 
चद्धिना चापि दीप्ता गिरिनौततिविसाजते । 
धूमान्धक्रारोर््वतलुर्मजमान इवाम्बुदः ॥ ६९ ॥ 
यपि अग्निसे उसक्रा सारा अद्ध उद्धासित हो उखा या, 
तो मी उसके उपरी भागमे धुर्येका अन्धकारदखा रा याः 
इसल्यि उस पर्वतकी अधिक्र योभानर्दीष्टोरही थी। वद 
समुद्रम द्रवते हुए मेघके समान जान पडता था ॥ ६१ ॥ 
वि्छिष्रोपटसंघातः फकशाङ्ञारवषणः 
गिस्भिीत्यनरोद्रारैरुट्कावृष्टिसिवाम्बुदः ॥ ६२ ॥ 
उक्ते प्रस्रसमूह अलग हो-होकर गिर रदे थे । 
उससे कदे अक्रर्योकी वर्पाहो रही थी} उस समय ओग 
उगलनेकरे कारणं वह पर्व॑त उत्कार्थोकी वर्षां करनेवाले मधकर 
समान प्रतीत होता था ॥ ६२॥ 
प्रपातप्रख गेन्कषिघो, धूमसेवर्दितोद्रः। 
स गिरि्भंसतां, यातो युगान्तच्चिहतोपमः ॥ ६३ ॥ 
उसे ञ्लरनेके सोत सूत गये, मध्यभागे धुर्भां केक 
गया! उस अवस्धार्भे वह्‌ पर्वेत प्रलयाग्निसे दग्ध होकर भस्म 
दुभा-सा जान पडता था | ६३ ॥ 
विद्टलास्तस्य पाह<भ्यः सपौ दग्धाधैदेहिनः। 
भ्वसन्तः पुथुमू ने निद्चेसररिवेश्चषणाः ॥ ६४ ॥ 
उसके पा््वभागेि, घव्रराये हए सर्पं निकलने लगे । 
उनके आधे शरीर जल गये थे | उनकी अखि क्रूरता टपक 
रही थी तथा वे अपने फेठे ए मस्तकं ( फनो ) से फुष्ार 
माररहेथे] ६४ ॥ 
उत्पत्योत्पत्य गगनात्‌ पुनः पुनरवाङ्‌ सुखाः ! 
रेखुश्योदेजिताः सिः शादुंलाखानलाविलाः ॥ ६५॥ 
अगते र्ते हुए पिह ओर व्याघ्र भयते उद्विग्न दहो 
वारवार उर्ख्करर आकाश्से नीचे यद कयि गिरते जर 
आर्तनाद कसते थे ॥ ६५ ॥ 
सुमुखः पादपाद्यैय दाहनियीसजं जलम्‌ ॥ ६६॥ 
वके र्न दग्ध होनेके कारण अपने भीतरके रसक्रो 
पानीके रूपम वहानि ट्य | ६६ ॥ 
वहत्यू्वैगतिवीततो  भस्माङ्गारातिपिद्गलः) 
धूमच्छया च गगने दर्पिनाम्भोददरसना ॥ 2७ ॥ 
ऊपरक्तो उव्नेगटी वायु भस्म ओर अङ्धातेसे अत्यन्त 
पिंगलवर्णको होकर ब्रहने लगी ओौर आकाशम धूमकी छया 
घुमद्कर रिरो दुई मेर्घोकी घटाके समान दिखागी देने लगी 
व्यज्पमानो मह्ासायुर्विहगैः श्वपैरपि । 
गिस्विंकल्यमायाति श्रागरभ्यारट्प्णवर्मनः ॥ ६८ ॥ 


पी ओर हिक जन्तु भी उमे दोडकर भाग रे ये। 
वह्‌ महान्‌ निखरवालय पर्वत अधिक आग ब्रद्‌ जानिके कारण 
ग्याक्ुल्खा ष्टो उठा भा ॥ ६८॥ 
स मुमोच शिखाः दौलश्चरोदग्रशिरोष्ययः । 
चज्रेण पुखटतस्य यथा स्याद्‌ दरितस्तथा ॥ ६९ ॥ 
ब्द़ी.-वड़ी चश्चर श्िल््ओक रसे युक्त वह पर्वत आगते 
तपकेर अपनी गिस्रौके इस प्रकार छोड़ र्दा था, मानो 


[° 


दन्ध्रके वञ्चते विदीर्ण होकर विखरा जा र्हा दो ॥ ६९ ॥ 
आदीप्य तं तु दलि क्षिया व्यूहधंरिताः 1 
अर्धक्रोशमपक्रान्ताः पावक्रेनाभितापिताः ॥ ७० ॥ 
उस पर्वतराजमे आग ल्गापएर व्यूहके आकास्मे सुसजित 
होकर खडे दए क्षत्रिय उस प्रचण्ड पावकसे सन्तप्त हो 
आधा कोस पीठे हट गये ॥ ७०] 
दद्यमाने नगघ्रष्टे सीदमनिमदाद्रुमेः! 
धूमभारैरनालक््ये मू शिथिलतां गने ॥ ७१॥ 
सेषं हि तदा रामो चननं केनिसुदनम्‌। 
चमाषे पद्मपत्राक्षं स॒ साक्षान्मधुसूदनम्‌ ॥ ७२॥ 
वह पर्वतोमि श्रेष्ठ गोमन्त नष हेते हुए महान्‌ इ्षोकि 
साय जवर इस प्रकार दग्ध दोने ल्गाः धूममारसे उसकी 
ओर देखना अमम्भव दौ गया ओर उसका मृलमाग शिथिल 
होने छगा, तव बलरामजीने केनी सौर मधुनामक्‌ द्त्यौका 
संहार करनेवाले साक्षात्‌ विष्णुम्वरूप कमलनयन श्रीकृप्णसे 
रोधपुवक कदा--11 ७१.७२ ॥ 
दह्यतेऽयं गिरिस्तात ससायुशिखरदुमः। 
आवयोः छृष्ण वैरेण विभिर्वसुघाधिपे. ॥ ७३॥ 
ध्तात | श्रीकृष्ण } हमलोगोसि वैर दो जानिके कारण 
इन ब्रक्वान्‌ भूपतिर्योद्ार छोटे-वडे शिखरो ओर इ्षोसहित 
यह पर्वत जलया जा रहा है ॥ ७३ ॥ 
पद्य रप्णानलोप्णानां सधूमानां समन्ततः । 
वनानां धिरसन्तव नगाभ्याते ह्धिषोत्तमाः ॥ ७४ ॥ 
श्रीकृष्ण | देखो, चारे ओर आगमे तपे ओर धुते मरेन 
जंगलकि वरघ्नौके निकर ये उत्तम हाथी करुण-कन्दन-सा कर 
रदे द ॥ ७४॥ 
अयं यदयाचयोरथं गोमन्तस्तात द्यते । 
अयदास्यमिदं लोक्रे कौटीतं च भरिष्यति ॥ ७५॥ 
(्तात्त } यदि दम दोनोकरे ल्ि गोमन्त जला दिया 
जायगा; तो यहं संनाप्मै हमारे च्ि महान्‌ अपय ओर 
कलङ्की चात होगी ॥ ७५॥ 
तदम्यासुण्यहेतोर्हिं नगस्य नगसंनिभ । 
्षश्रियाननिहनिष्यामो दोभ्यौमिव युधां घर ॥ ७६॥ 
“अतः योदार्जमिं शरेष्ठ तथा युद्धम पर्वुतके समान 


२७४ 


श्रीमहाभारते सिखभागे 


हरिवरो 


अविचर रहनेवले श्रीक्ण्ण ¡ इस गोमन्त पर्वतते उच्रण 
होनेके च्ि हमलोग अपनी भुजा्ओंसि दी इन क्ष्रिर्योक्रो मार 
डरे 1 ७६ ॥ 
पते ते क्षत्रियाः सर्वे गिसिमादीण्य रेशिताः 
रथिनस्तात रदद्यन्ते यथदेशं युयुत्सवः ॥ ७७ ॥ 
(तात | ये सरे धत्रिय इसत पर्व॑तको जलाकर कवच 
आदिसे सुखित हो स्थपर बैठकर यथास्यान युद्ध करनैके 
लि उत्सुक दिखायी देते ह ॥ ७५७ ॥ 
पवभ्रुक्त्वा गिरेः द्नान्मेरुश्द्ादियोडरर्‌ । 
निपपात वदः श्रीमान्‌ वनमाराधसे युवा ॥ ७८॥ 
खा कहकर गे ष्पर्वतकरे शिखरते नीचे उतरनेवाले 
चन्द्रमाक्रे समान कान्तिमान्‌ वनमाद्धारी नवयुवक वटराम 
गोमन्त पर्वतकी चोटीसे कूद पडे | ७८ ॥ 


काद्स्बरीमदश्चीवो नीरवासाः सिताननः। 
स॒ शारदेन्दुसंकाद्यो वनमाखाश्चितोदरः ॥ ७९ ॥ 
उस समय वे कादम्बरी (ठुधा यामध) के मदसे कुछ 
मत्त-से हो रदे थे | उनके श्षरीरपर नीट वचर योमा पाता था। 
उनकामुल गौरवर्णका था] वे शषरत्‌-कालकरे चन्दरमाकी भोति 
उञ्ग्यक प्रमाते उद्धाषितत हो रदे थे | उनका उदरभाग वन- 
मालसे अछत था ॥ ७९ ॥ 
कान्तेककुण्डकधरश्चासमौलिस्बाङ् सुखः । 
निपपात नरेन्द्राणां मध्ये केदावपूर्वजः ॥ ८०॥ 
उन्दनि एक कानमे कमनीय कुण्डल धारण कर रखा 
था तथा उनके मस्तकपर मनोहर मुकुट शोभा दे रदा धा। 
श्रीकृप्णके वरदे भाई वठ्राम नीचे मँह क्रिये राजार्थो ब्रीच 
ही कृद्‌ पदे ॥ ८० ॥ 
अवष्तयुते ततो रामे कृष्णः छप्णाम्बुदोपमः। 
गोमन्तशिखराच्छ्ीमानाप्टयुनोऽमितविक्रमः ॥ ८१ ॥ 
ल्ामजीके कूदनेकरे पश्चात्‌ काठे मेघक्रे समान दयाम 
कान्तिमान्‌ ओर अमित पराक्रमी श्रीमान्‌ ङृष्ण मी गोमन्त- 
दिखरसे कूद पडे ॥ ८१ ॥ 


ततस्तं पीडयामास पद्धश्वां गिरिवरं हरिः । 
ख पीडितो भिरिस्तेन निर्मम समन्ततः ॥ ८२॥ 
जखाङ्करोपलस्तत्र प्रचरतो दिस्यो यथा। 
स तेन वारिणा वदहिस्ततक्षणात्‌ प्रशमं ययौ ॥ ८३॥ 
कटपान्ते वारिधाराभिमेधजादैरिर्वाद्युमान्‌ 1 


कूदते समय श्रीहसमि उस श्रेष्ठ पर्व॑तको अपने दोनों 
वैरि दव्राया ! उनके दाय दवाय पदटनेपर वह पव॑त चा 
ओरते जलममग्न-ता दयो गया | उका एक-एक पस्थर जल्से 
नदा उठा यर मदक वदे रपकनेवाले हाथीके समान जल- 
करा सोत बहनि स्गा ! उख जख्पे वर्की सारी आग तत्का 
बुद्च गयी । मानो प्रख्यक्रास्मे मेघ्रसमृहद्वार वरसायी हई 
वारिधारा अं्चमाटी सूर्यं शान्त दो गवे हँ ॥८२-८३१॥ 


सिहारसितनिर्घोपः पीतवासा धनारृतिः ॥ ८४॥ 
किरीटमूद्धी सौम्यास्यः पुण्डरीक्रनिभेश्षणः । 
श्रीवत्सवक्षाः खुमुखः सरहस्याश्चसमघुतिः ॥ ८५ ॥ 
रामादनन्तरं कृष्णः ष्ठुतो वै वीर्यवा स्ततः । 

उस समव पीताम्वरधारी धनदयाम-विग्रह कमलनयन 
श्रीकृष्ण विहरे सपान दह्याड रदे थे | उनके मस्तकपर दिव्य 
किरीट गोभापा रदा था ओर मु वड़ा ही सीम्य दिखायी 
देता था । उनके वक्नःख्यल्पर श्रीवत्सका चिह वुशोमित था 
मुख बहुत दही खुन्दर धा ओर अंगोर कान्ति देवराज इन्द्रके 
समान प्रकारिन हो रदी शी | व्रलयमजीके बाद पराक्रमी 
श्रीकृष्ण भी वदी ( राजाओकरे ब्रीच दी ) कूद पदेये॥ 
ताभ्यामेचप्टयुताभ्यां च चरणः पीडितो गिरिः ॥ ८६॥ 
मुमोच सखलिदोत्पीडांस्तीव्पावकरान्तये । 
सलिरोत्पीडनं दष्टा पार्थिवा भयमाविशान्‌ ॥ ८७ ॥ 

उन दोनौ मादर्योकरे कूदनेसे उनके चरर्णोका द्राव 
पाकर वह पर्व॑त ज्र खोत वहाने क्गा था, जो उस भयानक 
अग्निको बु्चानेमे सहायक हुभा । पर्व॑तसे जल्क्रे सोत 
निक्र्ते देखकर राजा मन्म भय समा गया ॥८६-८७॥ 


इति श्रीमहाभारते लिभागे हरिवो विप्णुपव॑णि मोमन्तदाहे दिचस्वाररिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥ 


दस प्रवर श्रीमहाभारतप हिगमागः दरक अन्तरगत विय्णुप्वमे मेमन्त-प्वतकरा दाह्रिषयक्र 
यया्तीस्रे( अव्याय पर! हु्ा॥ -८२ ॥ 


तरयश्रत्वारिरोऽध्यायः - 
श्रीष्ण ओर वलरामका जरासंध ओर उसकी सेना्ेकि घाथ युद्ध, राजा दरदकी सत्यु, जरासंधका 
पराजित होकर पक्ायन बथा चेदिराज दमधोषके साथ श्रीकृष्ण ओर वरररामका करबीरपुरम जाना 


वैश्चम्पयन उवाच 
तौ नगादाप्लुतौ चष्ट वचस्देवदुताबुभौ । 


न्धं नरषरानीकं सवं खम्मृढवाहनम्‌ ॥ १ ॥ 
वैशस्पायनजी कहते है--जनमेनय | वसुदेव 


1 


विप्णुपवं 1 


उन दोनों पुरक पर्वतसे कूदकर आया देख उन नरेशोकी 
सारी सेनाम , हल्चल मच गयी । उसमे वाहरनोपर मोह 
छागया॥ १॥ 
बाहुप्रदग्णो तौ तु चेर्तुस्तच याद्वौ। 
मकराविव संरच्धौ वी समुद्रक्षोभणावुभौ ॥ २ ॥ 
रोप भरे. हए वे दोनों यदुवंशी व्रीर अपनी शुजाअंसि 
दी आयुधक्रा काम ठेते हुए उस विशाल सेनाम विचरे 
त्रः जसे दो महान्‌ मगर समुद्रको विश्षुन्ध करते हुए उसके 
भीतर धूमरदेदों॥२॥ 
ताभ्यां धे प्रविषएटाभ्यां यादवाभ्यां मतिस्त्वभूत्‌ । 
आगयुधनिां पुराणनामादानरकतलक्षणा ॥ २ ॥ 
समराङ्गणम प्रविष्ट होनेपर उन दोनो यादर्वोके मनम 
अपने पुराने आयुरधेकरो ग्रहण करनेका विचार भा ॥ ३ ॥ 
ततोऽम्बरतखाद्‌ भूयः पतन्ति स महात्मनोः । 
मध्ये राजसदसखरस्य समरं प्रतिकाष्िणोः ॥ ४ ॥ 
यानि वै माथुरे युद्धे प्राप्तान्याहवशोभिनोः। 
फिर तो सदहखो राजाओके वीचमे युद्धकी आकरक्षा रखने 
तथा समर शोमा पानेवठे उन दोनो सदप्मा्भेकरे हाथमे 
आकारसेवे ही अल्र-शल्र आ गये, जो मथुरके युद्धम 
उन दोर्नोको प्राप्त दए ये ॥ ४ 
तान्यस्वरात्‌ पतन्ति स्म दिन्यान्यादबसम्प्वे ॥ ५ ॥ 
छेलिष्टानानि - दीप्तानि दीप्ताश्चिलदशानि वै । 
निक्षिप्य यानि त्रैव तानि परतो स यादवौ ॥ ६ ॥ 
उस युद्धसम्बन्धी विष्ठवके समय वे द्यी प्रज्वलित अग्निके 
ठ॒ल्य तेजस्वी, दीप्तिमान्‌ तश्रा शन्ुखोको चाट जानेवाठे 
दिव्याछ्न आकाशसे आ प्डे | जिन्हेवे यादव-वीर मथुरामे 
ही ( आकायमे ) फककर चटे गये थे, उन यदुवंशी वीर्योको 


. पुनः उन दिव्याश्ोकरी प्रति हो गगरी ॥ ५६ ॥ 


कव्यादैरचु्ातानि मूर्तिमन्ति बृहन्ति च। 
तपितान्याहये भोक्तुं चपमांसानि सर्वशः ॥ ७ ॥ 
उन अश्लकरि पीके मसिम्षी भृत-य्रत आदिभी रदे 
ये । वे वि्ाक अचर मूर्तिमान्‌ दोक्रर उस युद्धमे समस्त 
राजार्मकरे स्त-मास्का उपभोग करके व्यि मानो भूखे 
प्रासे थे ॥ ७ ॥ 
दिष्यस्लम्दामधारीणि जसयन्ति च खेचरान्‌ । 
प्रभया भासमानानि दशितानि दियो दश्च ॥ ८ ॥ 
उन सग्रने दिव्य पुप्पोक्ी मार्ह धारण की्थीं।वे 
अपनी प्रमति प्रकादित होकर दसो दिगार्भको सुसखोभित 
करते थे ओर आकालचारी प्रणियेकरो भी भयभीत कर 
देतेथे॥८॥ 


त्रयश्छत्वारि्ोऽध्यायः 


२७५ 


व कन्ानण्डन्कानयानकाानण्याकान्दन्याया्डना्कन्यनकन्कान्का्यन्कानडानय्न्ननानयानकोणडणकानयाननकानण्नय्कानयनकनन 


हं सांवर्तक नाम सौनन्दं ससरं तथा । 
चक्रं सुदरछनं नाम गदां कौमोदकी तथा ॥ ९ ॥ 
चत्वार्येतानि तेजांसि विष्णुप्रहरणानि वे । 
ताभ्यां समवतीणनि यादवाभ्यां मदासधे ॥ १० ॥ 
सोवर्तक दलः सनन्द मूसल, सुदर्शन चक्र ओर 
कौमोदकी गदा--भगवान्‌ विष्णुके ये चार तेजस्वी अल्-रल 
उस महासमर उन टोरनो यादव-वीरयोके टये उतरे थे ॥९-१०॥ 
जग्राह प्रथमं रामो टखामगप्रतिमं रणे । 
सर्पन्तमिव सर्पन्द्रं दिव्यमारकुटं दरम्‌ ॥ ११ ॥ 
पहले वलरामजीने रणभूमिमे सुन्दर आङ़ृतिवाके सप॑राजके 
समान सर्पण तथा दिव्यमाखा्ौते अठंकृत दल्को अपने 
दाय हाथमे प्रहणक्िया।॥ १९१॥ + 
सव्येन सात्वतां शेषो जग्राह मुसटोत्तमम्‌ । 
सौनन्दं नाम चटवान्‌ निरानन्दकरं ष्िषाम्‌ ॥ ९२॥ 
फिर उन यदुकुलतिख्क वल्वान्‌ वीरने वाये हाथसे 
सोनन्द नामक उत्तम मूसलकरो अहण क्रियाः जो दातुर्ओको 
आनन्दञ्यूल्य कर देनेवाला था ॥ १२॥ 
दर्शनीयं च छोकेषु चक्रमादित्यवच॑सम्‌ । 
नारा सुदर्शनं नाम प्रीतो जग्राह केशवः ॥ १३॥ 
तत्पश्चात्‌ भगवान्‌ श्रीकृप्णने सम्पण लोकमि दर्नीय 
तथा सूरये समान तेजसी सुदर्खन नामक चक्रको बड़ी 
प्रसन्नताके साथ ग्रहण क्रिया ॥ १३॥ 
दशनीय च रोकेषु धयु्जखुदनिःखनम्‌ । 
नासा शा््गमिति ख्यातं प्रीतो जग्राह वीर्यवान्‌ ॥ १४॥ 
फिर समस्त लोकोमे दर्यनीय तथा मेधोकी गर्जनाकरे समान 
टंकारध्यनि करनेवाछे शाङ्ं नामे विख्यात धनुपकरो मी उन 
चरूवान्‌ शरीकप्णने ग्रन्नतापूरवक अपने हाथमे ठे छया ॥ 
देवै्निगदितार्थस्य गदा तस्यापरे करे । 
निपक्ता कुमुदाक्चस्य नास्ना कौमोदकीति सा ॥ १५॥ 
तदनन्तर देवताओने जिनसे अपना प्रयोजन नितरेदन 
क्रिया था तथा जिनके नेत्र विकसित कुमुद-कुसुमके समान 
योमाधरमान दैः उन भगवान्‌ श्री्प्णकरे दूरे दाथमे 
कौमोदकी नासक्र गदा आ गयी ॥ १५ ॥ 
तो सप्रहरणो वीरौ साक्लादृविष्णुतनूपमो । 
समरे रामगोविन्दौ रिषुस्तान्‌ प्रन्ययुद्ध.चताम्‌॥ १६॥ 
सक्षात्‌ वि्णुकर-से विग्रहवाठे वे दोनों वीर वट्राम ओर 
श्रीकृष्ण जवर अस््न-दरालमेसि सम्पन्न दो गये; तव समरभूमिमे 
उन शनुओकि साथ युद्ध करने स्रो ॥ ६६ ॥ 
आयुधधग्रहौ वीरौ तावन्योन्यमयादुभौ । 
पूर्वनादुजसंक्षौ त॒ पमगोविन्दलण्चणो ॥ १७॥ 


॥ 


६७६ 


| 


शीमदाभारते खिकभागे 


[ शस्थिंशे 


अघ ग्रहृण करे समराज्गणमे खडे हए वे दोनों अग्रज 
ओर अठेज वीर बलराम तथा श्रीकृष्ण अन्योन्यमय ( एक- 
दूमरेपर आश्रित अथवा एक दृषषरके खस्य ) ये ॥ १७॥ 


समरे.ऽप्रतिरूपौ तो विष्णुरेको दविधा कतः। 
दविषर्छु परतिङ्ककबीणौ पराक्रान्तौ यथेश्वसे ॥ १८॥ 
रणभूमिमे उनक्री तुलना करनेवाला दूसरा कोई नदी 
था। वेदोर्नोणकदही विष्णुरे दो खरू्पये तथाश्षवुर्भोका 
प्रतीकार करते हुए सवंखमर्थं ईश्वरी ्मोति पराक्रम प्रकट 
कर ररैये॥ १८॥ 
दरपुयम्य र मस्तु सर्पनद्रमिव कोपनम्‌ । 
चचार समरे वीरो द्विषतामन्तकोपमः ॥ १९॥ 
वीर बलराम क्रोधमे भरे हुए सर्पराजे तस्य सांवर्तक 
हलो हाथमे उठाकर समसमं शतरि लि कालरूप होकर 
विचरने लगे ॥ १९॥ 
विकरषन्‌ रथवरन्दानि क्ष्रियाणां महात्मनाम्‌ । 
चक्रार योषं सफलं नगेपु च टये च ॥ २०॥ 
कुजरलिद्गरोस्पिप्ताच्‌ मुसलाक्षेपताडितान्‌ । 
रामोऽभिरमः समरे निमेमन्थ यथाचखान्‌ ॥ २१॥ 
वे महामनस क्षत्रियो रथसमूर्हौको पीछे ठकेरते हुए 
हाथिर्यो ओर धोडोपर अपना रोब सफठ करने स्मो । समरस 
परम सुन्दर प्रतीत होमेवाठे बलराम हरते हायिर्योको ऊपर 
उचाल देते ओर मूस रफेककर उन्दं मार दार्ते ये । इस 
प्रकार उन पर्वतोपम हायिर्योको उन्न मार डाटा ॥२०-२१॥ 
ते वध्यमाना रामेण समरे क्षधियपंभाः। 
,जरासंधान्तिकं भीता विरथाः प्रतिजग्मिरे ॥ २२॥ 
समराङ्गणमे ब्रल्यामजीके द्वारा मारे जाते हए वे क्षतरिय- 
शिरोमणि योद्धा रथदहीन दो भयके मारे जरांधकरे पास 
भाग गये॥ २२॥ 
ताञुवाच जरासंधः कषच्रधमं व्यवस्थितः 1 
धिगेतां क्षत्रदृचि वः समरे कातरान्मनाम्‌ ॥ २३॥ 
तवर धतरियधर्ममे स्थित रहनेवाले जगसंधने उनसे कहा- 
ध्ममरभूमिमे आकर मनमे कायरता छनेवाले तुमलोर्गोकी इस 
कषत्नियड्त्तिको पिष्छार र ॥ २३ ॥ 
पराक्रान्तस्य समरे विरथस्य पडायतः। 
श्रूणदत्यामिवासघां प्रवद्‌न्ति मनीपिणः ॥ २४ ॥ 
"मनीषी पुरुष समरे पराक्रम प्रकट करफे रथहीन 
होकर मागनेवाठे योद्धाकी इस कायरताको भ्रणदत्याके समान 
अवद्य वताते है ॥ २४॥ 
पत्िनो भुवि चैकस्य गोपस्याट्पत्ररीयसः। 
भीताः कि विनिवतेध्वं धिगेतां क्षतदृत्तिताम्‌ ॥ २५॥ 
¶्यहं ग्वाला अत्यन्त बलीन हैः पैदल है ओर पर्वीपर 


अके खड़ा रै । भला; इससे भयभीन होकर वैमठोग क्यो 
भाग रे ह्यो १ तम्दारी इस क्षत्नियदृक्तिको पिक्छार है ॥२५॥ 
क्षिप्रं समभिवर्तन्तां मम वाक्येन नोदिवाः। 
यावदरेतौ रणे गोपौ प्रेषयामि यमक्षयम्‌ ॥ २६॥ 
धरी आज्ञासे प्रेरित दोकरर त॒म सव रोग श्रीघ्रष्टी 
दघ्रुर्भौपर आक्रमण करो । तव्रतक य रणभूमिर्म इन दोनो 
ग्वार्छको मारकर यमलोक भेज देता टर" ॥ २६ ॥ 
ततस्ते क्षत्रियाः सर्वै जरासंधेन नोदिताः । 
क्षिपन्तः शरजालानि दष्ा योद्ुसुपस्थिनाः ॥ २७॥ 
ते हथैः काञ्चनापीदै रथशचन्टुसमग्रमैः। 
नागैश्चास्भोदसंकारौर्महामात्रप्रणोदितैः ॥२८॥ 
तवर जरासंधसे प्रेरित होकर वे समस्त क्षत्रिय व्राणममूर्टो- 
की वर्प करते हुए वदे यरे साथ युद्धे व्यि उट गये । 
वे सोनेके आमूष्णोते विभूप्रित अर्वा; चन्द्रमाक्रे समान 
कान्तिमान्‌ र्थो ओर महावर्तोदास फ़ गये एवं मेक 
समान काठ रंगवाले हाधिर्यो द्याया रणभूमिमे आगे बदने खो ॥ 
सतञु्ाणनिखि शः सायुघाभरणाम्यराः । 
खारोपितधनुप्मन्तः सतृणीसः ससायकाः ॥ २९॥ 
उनके शरीरम कवच ओर हामि खज्घ ये । वे अयुषः 
आमूष्ण तथा वलसि ससित ये । उन्दने धनु्पेको मली- 
भोति चदा रखा था । बे बाणो ओर तरकसेति सम्पन्न ये॥२९॥ 
सच्छोत्सेधिनः सवै चाख्चामरवीभित।ः । 
रणावनिगता रेजुः स्यन्दनस्था दीक्षितः ॥ ३० ॥ 
जो राजा रणभूमिं रर्योपर वटे हए थे, उनके सिरपर 
ऊचे खत्र तने थे तथा मनोहर चामररोदयारा उनके ल्ि हवा 
कीजारदी थी। इस तरह वे सभी बड़ी रोमा पति ये ॥ ३० ॥ 
तौ युद्धरङ्गापतितौ विधावन्तौ मदाञुजौ । 
वसधेव्ठतौ वीरौ युयुन्ख्‌. प्त्यटद्यताम्‌ ॥ ३१ ॥ 
युद्धकी रगभूमिमे उतर कर सत्र ओर धावा करनेवाले 
वे महावराह बीर वसुदेवपुच युद्धके लि उच्घुक दिखायी 
देतेथे॥ ३१ ॥ 
तद्‌ युद्धमभवत्‌ तज तयोस्ते्पा त॒ संयुगे । 
सायकोत्सगंवहुखं गदानिर्धातदारुणम्‌ ॥ ३२ ॥ 
वहं रणमूमिमे उन दोनो भादयो तथा उन रानामि 
भारी युद्ध होने लगा । उसमे बहूतसे वार्णोकी वर्षाकी जा 
रही थी । गदाओकि आघातसे उस युद्धकी भयङ्करा ओर 
यद्‌ गयी थी | ३२॥ 
ततः श्रससाणि अतीच्छन्तौ रणेपिणौ । 
तस्थतुर्योधमरुख्यो तावभिवृ्टौ यथाचलो ॥ ३२ ॥ 


। विष्णुपवं 1 


धि ॥ ट 
निचत्वार्दो.ऽध्यार्यः 


९७७ 


[नावा 


, तदनन्तर सदो वाणकी बरौद्ार ग्रहण करते हुए वे 
१दोनो युद्धाभिलाषी महायोद्धा वर्घराकरा आधात सहन करनेवाटे 
* दो पर्वतोकि समान वरदो अविचलमावसे खद रहे ॥ ३३ ॥ 
` गदाधिद्वेव गुर्ीभिः क्षेपणीयैश्च सुदररेः। 
¡ अर्यमानौ महेष्वासौ यादवौ न चकम्पतुः ॥ २९ ॥ 
शतरुओंकी भारी गदाओंः गोर्न या देल्वास तथा 
सद्ररोकी मारसे पीडित होति हुए भी वे दोनो महाधनुर्धर 
यादव वीर कम्पित नहीं हूए ॥ ३४॥ 
ततः एृष्णोऽभ्वुदाकारः राङ्धचक्रग्धरः । 
व्यवधंत महातेजा बातयुक्त॒प्रवानखः ॥ ३५ ॥ 
तत्यश्वाप््‌ शङ्क, चक्र ओर गदा धारण केवले धन- 
* -उयामविग्रह महातेजस्वी श्रीकृष्ण वायुसे प्रेरित होकर प्रज्वलित 
दृ अग्निक समान व्रद्ने रगे ॥ ३५ ॥ 
स॒ चक्रोणार्कनुल्येन दीप्यमानेन तेजसा । 
चिच्छेद्‌ समरे वीये चगजाश्वमदारथान्‌ ॥ ३६॥ 
समराङ्गणमे उन. वीर मधुसूदनने तेजपे उदीप होनेवाठे 
सर्यतुल्य तेजली चक्रके दाय मनुर्वो, दधिर्यो, षो तथा 
वङके-बदे र्थो भी इकडे-टुकडे कर उले ॥ ३६ ॥ 
गदानिपातविहता लाड्खेन च कर्पिताः। 
न दोकुस्ते रणे स्थातुं पार्थिवा नष्टचेतसः ॥ ३७ ॥ 
गदाके आधातसे मारे गये तथा इदछते खीचकर नष्ट कि 
गये राजा रोग अपनी चेतना खोकर रणभूमिमे खड़े न रह 
सफ़े ॥ ३७ ॥ 


खक्श्युरनिरत्तानि विचित्राणि मदीक्षिताम्‌ । 
रथयुथानि भन्नानि न शेङश्वलितुं रणे ॥ २८॥ 
चक्रके दचुरोसे इकडे-टकडे वयि गये राजाअकरि विचित्र 
रथसमूह भग्न होकर युद्धभूमिमे अगे न बद्‌ स्के ॥ ३८ ॥ 
मुसखाक्ेपभस्नश्च कुञ्चराः पषि्ठायनाः। 
घना इव घनपये भग्नदन्ता विचुक्रृद्युः ॥ २९ ॥ 
, भुतर्लोकी मारसे घायल हुए साठ वर्पौकी अवस्धावके 
हाथी दोति ट जानेकरे कारण शरद्‌-ऋतुकरे जलदीन वादलेकि 
समान असमर्थं हो आत॑भावसे चीत्कार कर रदे ये ॥ ३९ ॥ 
चक्रानलृञ्वाकहताः सादिनः सपदातयः। 
पेतः परासवस्तच यथा वज्रहतास्तथा ॥ ४० ॥ 
‡ सुदर्दीन चक्रमे प्रकट हुई आगकी उवालसे श्ुलसकर 
कितने ही घुडसयार ओर पैदल योद्धा धरतीपर पड़ ये । 
उत्करे प्राण-पखेरू उड़ गये ये तथा वे वञ्रके आधातसे मरे 
हुए वस्य प्रतीत होते थे ॥ ४०॥ 
चक्रखाङ्गलनिर्द॑ग्धं तत्सेन्यं विदलीरूतम्‌ । 
युगान्तोपहवम्रस्यं सर्य पतितमाबभो ॥ ४१॥ 


चक्र जीर हते दग्र होकर विदी्ण कौ गयी बह सारी 
सेना इस तरह धरतीपर पड़ी थी मानो प्रख्यका्ल्मे सवका 
एक साथ संहार हो गया हो ॥४१॥ 
आक्रीडभूमिं दिव्यानामायुघानां षपुप्मताम्‌ । 
वैष्णवानां चृपस्ते तु द्रष्डुमप्यवलीयसः ॥ ४२॥ 
वरहो मूतिंमान्‌ होकर प्रकट हए उन वैष्णव दिव्यार्ञ्ोकी 
क्रीडा-मूमिरूप युद्धसखस्की ओर देखनेमे भी वे राजालोग 
असमर्थं हो गये ये ॥ ४२॥ 
केचिद्‌ रथाः सम्घुदिताः केचिश्निहटतपाथिवाः । 
भगनैकचक्रास्त्वपरे विक्ीण घरणीतके ॥ ४३ ॥ 
कितने ही रथ रौद उलि शये] कित्नौकि राजा मार 
उलि गये ओर कितने दी एक-एक पहिया नष्ट हो जनेके 
कारण भूतल्पर विखरे पड़ थे | ४२ ॥ 
तस्मिन विदासने घोरे चक्रखङ्रकसम्पुचे । 
दारुणानि प्रवृत्तानि र्ास्यौत्पातिकानि च ॥ ४४॥ 
चक्र ओर दल्द्वारा जहा विष्टवे मच गया "था; उस 
घोर संग्राममे राधरसोदयासा उपस्थित की गयी भयंकर उत्पात- 
सूचक घटना घटित होने ठगी ॥ ४४॥ 
आतौनां कूजमानानां पाडितानां च वेणुवत्‌ । 
अन्तो न शाक्यतेऽन्वेष्टं रनागस्थवाजिनाम्‌ ॥ ४५ ॥ 
जो आर्तमाक्से चीख रहे थे तथा जो बोसिकी तरह चीर 
डे गये ये, एसे मनुरयो, दायियो, रथारोहियों ओर षोड 
की अन्तिम संख्या कितनी दै, इसका पता ठ्गाना' असम्भव 
हो गया था॥ ४५॥ 
सा पातितनरेन्द्राणां रुधिराऽद्रौ रणक्षितिः । 
योपेव चन्दनाद्रोङ्धी मरवा प्रतिभाति चै ॥ ४६॥ 
धरतीपर पड़े हुए राजाभकेि सुधिरसे भीगी हई बह 
रणभूमि सर चन्दने आद्रं अज्गवाटी नारके खमान भयंकर 
प्रतीत होती थी ॥ ४६ ॥ 
नरकेशास्थिमजान्बेः रातितानां च दन्तिनाम्‌ । 
रुधिरोधष्ुवस्तत्र च्छादयामास मेदिनीम्‌ ॥ ४७॥ 
मनुष्यौके केशो, द्वियो मजा्भ तथा अति 
मिखा हज कटे हाधियोके रक्तका प्रवाद वर्होकी भुमिको 
अच्छादित करता जा रदा था ॥ ४७॥ 
तस्मिन्‌ महाभीषणके नरवादनसंक्षये । 
शिवानामरिबैः शब्दैनीदिते धोरदर्छनि ॥ ४८॥ 
वह रणभूमि वङ्ी भयानक भ्रतीत होती थी) बर्ह 
मनुष्यों ओर उनके वाहर्नोका संहार हो र्दा था  गीददिरयो- 
के अमङ्गलघरचक्र शब्द वरदो सदा भूजते रदते ये । बद देखमे- 
मे भी वड़ी भयंकर थी ॥ ४८ ॥ 


९५७८ 


धीमहाभारते लिकभागे 


, ` [ हरिशे 


आर्व॑स्तनितसंनादरे सधियम्बुह्दाकुठे। 

अन्तकाक्रीडसदयो नागदरेदैः समावते ॥ ४९ ॥ 
अतं प्राणिर्योकी चीख--पुकारका शब्द सव ओर फलय 

हआ था । रक्तक कितने ष्टी कुण्ड वन गयेथे) दाधिर्योकी 

साशेसि ठकी दर्द वद युद्धस्थली काल्की क्रीडाभूमिके समान 

प्रतीत हेती थी ॥ ४९ ॥ 

अपास्तैवौहुभि्यापैस्तुरगेश्च विद्‌।रितैः। 

कटटेव्य यदगृधैश्च नादितैः प्रतिनादिते ॥ ५०॥ 
करटी योद्धार्ओकी वेदिं कटकर गिरी थी । करीं वहुतठे 

योद्धा दी मरे पदे ये ओर कीं विदीर्ण हूए षोर्होक्री खलँ 

वी हुई थीं। बदेनवडे बगुरलो, कर्मो ओर गीरधौकी 

नोचित वह्‌ समराद्धण ूज रहा था ॥ ५० ॥ 

निपाते पृथिवीश्षानां सृत्युखाधारणे रणे । 

कृष्णः शराघ्रचधं कर्तु चचारान्तकदश्तंनः ॥ ५९ ॥ 
जरं ब्डे-वडे भूमिपाल धराशायी दहो रदे ये ओर मृत्यु 

एक साधारण-सी बात हो गवी थी, उस रणभूमिर्म काठके 

समान दिखायी देनेवाले श्रीकृष्ण शतरर्भोका वध करनेके व्यि 

विचर रदे थे ॥ ५१॥ 

युगान्तारक॑परमं चकं काटी चैवायसीं गदम्‌ । 

गृह्या सेन्यावनिगतो वभाषे केशवो पान्‌ ॥ ५२ ॥ 
प्र्यकालके सूर्यकी भोति प्रकाशित होनेवाले चक्र ओर 

खोदेकी बनी हु काटी गदाको हाथमे टेकर भगवान्‌ श्रीकृष्ण 

सेनाके मध्यकी भूमिम खड़े हो राजाओखि इस प्रकार वोले-॥ 

किन्न युद्धश्त वै शूरा दस्त्यभ्वरथसंयुताः । 

फिमिदं गम्यते शुराः तासा टडनिश्चयाः। 

अष्टं सपूर्वजः संख्ये पदातिः प्रभरुखे स्थितः ॥ ५३ ॥ 
ष्टायी, घोदे ओर `थसि युक्त श्चरवीरो | अव युद्ध 

क्यों नहीं करते हो १ अखेक्रि विद्धान्‌ तथा युद्धका दद्‌ निधय 

रखनेवाले वीरे ! स्यो इस प्रकार पलायने करते हो रमतो 

युद्धम अपने वद्धे मार्दके साथ तुम्हारे सामने पैदल दही 

खड़ा हु ॥ ५३ ॥ 

अष्टष््ोपेण रणे भवन्तो येन पालिताः । 

ख ददानीं जरासंधः किमर्थं नाभिवतैते ॥ ५४॥ 
शयुद्धम जिसने दोष नहीं देखा है तथा जिसके द्वारा ठुम 

लोग पालित हुए ह, वह जरासंध अव हमरि सामने क्यो 

नदी आ रदा है १ ॥ ५४॥ 

एवमुक्ते तु खपतिर्दरदो नाम॒ वीर्यवान्‌ । 

शमं हलाग्रोध्रभुजं धरत्ययात्‌ सैन्यमध्यगम्‌ ॥ ५५॥ 
श्रीकृप्णके एेसा कहनेपर पराक्रमी राजा दरद सेनक 

मध्यमे खड हुए तथा दले अग्रभागसे उग्र भुजावाठे वल- 

रमके सामने आया ॥ ५५ ॥ 


वभापे स तु ताघ्राक्षुक्षाणमिष सेवनी। 
पहि राम युष्यख मया साद्धमरिंदम ॥ ५६॥ 
जसे किसान यैठते बात करता है, उशी ' प्रकार उसने 
लल नेत्रौवले वर्रामजीसे इ प्रकार कदा--शातरुदमन 
राम ! आः आभो | मेरे चाथ युद्ध करो» ॥ ५६ ॥ 
तद्‌ युद्धमभवत्‌ ताभ्यां रामस्य दर्दस्य च । 
मृधे लोकवरिष्ठाभ्यां कुञ्जयभ्यामिवौजसा ॥ ५७॥ 
चराम ओर दरद-दोर्नौ जगत्फे शरे कीर ये । युद्ध- 
स्थम उन दोर्नोका बव्ूर्वक संग्राम दने खगा; मानो दो 
हाथी आपरमे ठ्ड रहे ष्ट ॥ ५७॥ 
योजयित्वा ततः स्कन्धे रामो दस्दमाचे 1 
हयेन बलिनां श्रेष्टो समुसटेनावपोथयत्‌ ॥ ५८॥ 
तग्र वच्वारनमिं शरेष्ठ चरख्रामने युद्धस दरदके कंथेसे 
हृ फँसाकर उसे मुसट्से मार डाटा ॥ ५८ ॥ 
खकायगतमूधौ वै सुसटेनावपोध्वितः। 
पपात दर्द भूमौ दारिवादं इवाचलः ॥ ५९ ॥ 
मुखे मारे गये दरदका मस्तक उसके शरीरस टी धस 
गया यर वह्‌ विदीर्णं हुए पर्व॑तकी मेति ््वीपर गिर 
पदा ॥ ५९ ॥ । 
रामेण निहते तस्मिन्‌ द्रदे राजसत्तमे । 
जरासंधस्य राक्षस्तु रमेणासीद्‌ समागमः ॥ ६० ॥ 
मदेन्द्रस्येव वृश्रेण दारुणे रोमदर्यणः। 
राजार्भमिं श्रेष्ठ दरदफे वररामहमारा मरि जनेपर रजा 
जयरासेधका उनके साय अत्यन्त भयंकर एवं रोमाश्चकारी युद्ध 
होने लगा ! मानो देवराज इन्द्रका दृत्रामुसके साथ संप्रम 
होरदादो॥६०१॥ 
गदे गीत्वा विक्रान्तावन्योन्यमभिधाचतः॥ ६१॥ 
कम्पयन्त भुवं वीरौ तादुद्यतमष्ागदौ । 
ददृशाते महात्मानौ गस सक्िखसाविव ॥ ६२ ॥ 
वे दोनो पराक्रमी वीर गदा्थ ` दाये लेकर पृथ्वीको 
कम्पित करते हुए. एक वृसरकी ओर दीदे । दो विखाल 
गदर्् उखये हृएवे दोनों महयामनस्री योद्धा रिखरेति युक्त 
दो पर्वतकि समान दिखायी देते थे ॥ ६९-६२ ॥ 
व्युपारमन्त युद्धानि प्रक्ष्य तौ पुरूपर्पभौ । 
संरन्धाविव धावन्तौ गदायुद्धेषु विश्तौ ॥ ६२॥ 
उन दोनों पुरषप्रवर वीरको युद्ध कसते देख दूरके 
युद्ध बंद हो गये । गदायुद्धोमिं विख्यात जरासंध ओरं वराम 
रोषावेशमे भरे हुए-से एक दूखरेपर धावा करते थे ॥ ६२ ॥ 
ताबुभौ परमाचार्यं लाके ख्यातौ मदायलै । 
मत्ताविव महानागावन्योन्यं खमधावताम्‌ ॥ ६४ ॥ 


विष्ुपवं ] 


वै दोनों महावली वीर संसारम गदायुद्धके उत्तम आचाय 
के जति ये.। वे दो मदमत्त विदालकाय हाथिर्योके समान 
परस्पर आक्रमण करते थे | ६४ ॥ 
ततो देवाः सगन्ध्वौः सिद्धाश्च परमरपयः । 
यक्षाश्चाप्सरसदयैव समाजग्मुः सदसः ॥ ६५ ॥ 
उख समय, देवता; गन्धर्व, सिद्धः महर्षिः यक्ष तथा 
सदसो अप्सरा वद युद्ध देखनेक्रे च्थि आ गर्यीं ॥ ६५ ॥ 
तदेवयक्षगन्धर्वमहपिभिरटंङूतम्‌  । 
शश्चमेऽभ्यधिकं राजन्‌ नभो ज्योतिगंणेरिव ॥ ६६ ॥ 
राजन्‌ | देवतार्भो, यर्षो; गन्धर्वो ओर मदपयसि 


अ्ङृत हुञा वर्होका आकादा नक्षत्रेसि आवृत हुभा-सा 
अधिक शोमा पाने ठ्गा ॥ ६६ ॥ 


अभिदुद्राव रामं तु जरासंध नराधिपः। 
सव्यं मण्डलमाध्रित्य वल्देवस्त दक्षिणम्‌ ॥ ६७ ॥ 

राजा जरासंध वार्यं ओरसे पैतरा देकर बलरामजीपर 
दट पड़ा ओर बस्दैवजीमे दाहिनी ओरसे उसपर धा 
किया ॥ ६७॥ 


तावन्योन्यं प्रजहाते गदायुद्धविशारदौ । 
दृन्ताभ्यामित्र मातङ्गो नादयन्तौ दिसो दन्न ॥ ६८ ॥ 


गदायुद्धभ निपुण वे दोनों चीर एक दूसरेषर प्रहार करने 
लो । जैसे दो मतवले हाथी अपने दोतिति परस्पर चोट करते 
हौ, उसी प्रकार गदाेसि आधात करते हुए वे दसो दिशार्जँ 
को निनादित करने स्मे ॥ ६८ ॥ 


गदानिपातो रामस्य शुश्चुवे ऽशनिनिःसनः। 
जरासंधस्य च रणे . पवैतस्येव दीयंतः॥ ६९ ॥ 

रणभूमिमे वलरामजीकी गदक्रे आधातक्रा शब्द वञ्रपात- 
के समान सुनायी पड़ता था तथा जयासंधक्रे गदाघातकी ध्वनि 
फते हए पदाडकरे समान प्रतीत होती थी ॥ ६९ ॥ 


न स्म कम्पयते रामं जरासंधक्ररच्युता। 

गदा गदाृतां श्रेष्टं विन्ध्यं गिरिमिवानिखः ॥ ७०॥ 
जरासंधके हाथसे चटी दई गदा गदाधारियोमे श्रेष्ठ 

चल्यामजीको उसी प्रकारः कग्पित नहीं करपाती थी, जैवे वायु 

विन्ध्यगिरिको नदीं हिल सकती हे 1 ७० ॥ 

रामस्य तु गदावेगं राजा स- मगघेश्वरः। 

सेहे धैर्येण महता शिक्षया च व्यपोथयत्‌ ॥ ७१॥ 
चर्रामजीकी गदाका वेग मगधराज जराध ब्रह पैर्यसे 

सष्टन करता ओर शिक्षा-कौशल्से उसको विफल भी कर 

देता था॥ ७१९॥ 


वतो ऽन्तरिक्षे वागासीष्‌ खुसखरा रोकसास्षिणी । 
°“न त्वया राम वध्योऽयमलरं खेदेन मानद्‌ ॥७२॥ 


त्रिचत्वारिशोऽध्यायः - 


~ _--------~--~----------------~----------------------- र र न ~ ~ = ~ ~= = 


विष्ठितोऽस्य मया ख॒न्युस्तस्माव्‌ सधु व्युपारम । 
अचिरेणैव काटेन्‌ श्राणांस्त्यकष्यति मागधः ॥७३॥* 
उख समय आकाशम सतर ठोगेरि समक्न सुस्पष्ट खरस 
दैवी वाणी सुनायी दी--पदूसररोको मान देनेवाले बल्यम | 
जराधका वध तुम्हरे दासि दोमवाल्म नदीं दैः. अततः खेद 
न कयो । इसकी मल्युका विधान मेरे द्वारा वना दिया गया 
है, अतः तुम इस युद्धे विरत हो जाओ । योडे ही समयमे 
मराधराजक्रो अपने प्राणेति दाथ धोना पड़ेगाः ॥५२-७३ ॥ 


जससंघस्तु तच््ुत्वा विमनाः समपद्यत । 
न॒ भ्राहस्त्‌ ततस्तस्मे पुनरेव दखायुधः 
तौ व्युपारमतां युद्धाद्‌ दृप्णयस्ते च पार्थिवाः ॥ ७४७॥ 
दीर्घ॑काटं महाराज निजष्लुरितरेतरम्‌। 
पराजिते त्वपक्रान्ते जरासंधे महीपतौ ¦ 
विविकमभवत्‌ सैन्यं परावृत्तमहारथम्‌ ॥ ७५॥ 
वह आकारावाणी सुनकर अराघंधकां मन उदास दो 
गया । तदनन्तर वररामने उस्पर पुनः प्रर नहीं करिया | 
वे दोनों वीर युद्धसे विरत हो गये । महाराज ! इस पटे ये 
दृणिवंशी योद्धा ओर वे राजा लोग दीर्घकालतक एक दूसरे 
पर प्रहार करते रदे । जव राजा जरासंध पराजित . हौकर 
पलायन करने र्गाः तत्र उसकी खारी सेना खाली हो गयी । 
उख्के विशा रथ पीेकी ओर लौट गये |७४.७५ | 
ते पाश्योदितैनौगेः स्यन्दनैस्तुरगैस्तथा । 
दुदुवुर्भतिमनसो व्याघ्राघ्ाता सगा इव ॥ ७६॥ 
वे राजा व्याघ्करे चे हुए यकि समान मनही-मन 
बहुत डरे हुए थे, अतःअपने हाथी, घोडे ओर रर्थोको हौकते 
हुए रणभूमिसे भाग चङे ॥ ७६ ॥ 
तन्नरेनदधैः परित्यक्तं भयद्प्महारथैः । 
घोरं क्रव्यादवहुकं सैद्रमायोधनं बभौ ॥ ७७॥ 
जिनका घमंड चृ-चूर हो गया था, उन महारथी 
नरे्ोद्यारा परित्यक्त हुए उस घोर युद्धसल्मे अधिकतर मास- 
भक्षी जीव-जन्तु ही रह गये थे | इससे वह वड़ा भयंकर 
प्रतीत होता था} ७७ | 
द्रवन्खु रथमुख्येषु चेदिराजो महादयुतिः। 
स्मृत्वा यादवसम्बन्धं रष्णमेवान्ववर्तत ॥ ७८ ॥ 
जवर सुख्य-मुख्य र्यी माग चले; तव महतिजस्वी चेदि- 
राज दमधोषने यादर्वोकरे साथ अपने सम्बन्धको सरण करके 
श्रीकृप्णक्रा ही अनुसरण्र किया ॥ ७८ ॥ 
चूतः कारूषसेन्येन चेदिसैन्येन चानघ । 
सम्बन्धकामो गोविन्दमिदमाद स चेदिरार्‌ ॥ ५९ ॥ 
निष्पाप जनमेजय ¡ करूष ओर चेदिदेशकी सेनासे धिरे 
हु चेदिराज श्रीङृष्णके साय सम्बन्ध ब्रद॒नेकी इच्छसे उनसे 
दरस प्रफार वोले-- ।॥ ७९ ॥ 


2८० 


भरीसष्टाभारते सिलभागे 


 { दरिवंशे 


अहं पितृष्वखुर्भती ` रव यादंवनन्शन । 
सवलस्त्वामुपाचृत्तस्त्वं हि मे दयितः धमो ॥ ८० ॥ 
ध्यादवबनन्दन ¦ यै तुम्हारी वृूभआका पति हू ओर सेना- 
सहित ठम्ारे पास भाया दर| प्रभो | तम मेरे परम प्रिय 
हो ॥ ८० ॥ 
उक्तर्चेष मया राजा जरासंघो ऽल्पचेतनः । 
कृष्णाद्‌ त्रिरम दददे विप्रहयाद्‌ रणकर्म॑णि ॥ ८१ ॥ 
पने इस मन्दबुद्धिः राजा जग्संधसे कहा था किं अरे 
दुर्बुद्धे ! त्‌ इस विग्रहे श्रीकृप्णङे साथ युद्ध करनेसे विरत 
हो जाः कितु इसने नहीं माना ॥ ८१ ॥ 
तेषो.ऽध मया त्यक्तो मम वाकयस्यु दूषकः | 
भग्नो युद्धे जरासंधस्त्वया न्रंवति सानुगः ॥ ८२॥ 
(सने मेरे दस कथनक्री निन्दा की थी, अतः अव यैन 
हसे त्याग दिया है । युद्धम तम्दारे द्वारा पराजित दोकर यह 
जरातंष अपने साथिर्योसदित मागा जा रदा दै ॥ ८२ ॥ 
निर्वैसे नैष संयाति सपुरं पृथिवीपतिः 1 
त्वय्येव भूयोऽप्यपरं द्षंयिष्यति किदिविपम्‌ ॥ ८३ ॥ 
(परंतु यद राजा वेर-भाव छोड़कर अपने नगरको नदी 
छट रदा है; अतः यड फिर वम्दारे परति दी दूसरे पापपर्ण 
कृत्यका प्रदर्शन करेगा ॥ ८३ ॥ 
तदिमां संत्यजाद्यु त्वं मरही दतनराङुरखाम्‌ 1 
क्रन्यादगणसंकीर्णा सेवितन्याममायुषैः ॥ ८४ ॥ 
(दइसच्यि अव तुम शीघ्र ही इस भूमिको व्याग दो । यह्‌ 
मदे मनुप्यंति भयी हई है ओर यदो सव ओर दिखक प्राणी 
छा गयेरहै। अव यृह॒ स्थान मानवेतर ८ राक्षस आदि) 
प्राणियोके दी सेवन करने योग्य है ॥ ८४ ॥ 


करवीरपुर प्ण गच्छामः सवलानुगाः 
श््गाटं वासुरेवं वे द्रक््यामस्तत्र पार्थिवम्‌ 1 <५॥ 
धश्रीकृष्ण | अच हमलोग सेनिकों ओर सेवकोंसहित 
करवीरपुस्म चलं । वौ शगार नामे विख्यात राजा वासुदेव 
रते है । उनमे हम मिरँगे ॥ ८५ ॥ 
इमौ रथवसेदग्रौ युवयोः कारितो मया । 
योजितौ शी्रतुरगैः खङ्गचक्राक्क्रूथरौ ॥ ८६ ॥ 
धये दोष्रेष्ठस्थ मनि दुम दोनों मादर्यौके स्यि तैयार 
करये दै । दनम शीभ्रगामी घोडे लते हुए ई । इनके सभी 
अद्ध; पिये, धुरे ओर कूबर आदि सुष्ट्‌ ई ॥ ८६ ॥ 
श्ीघ्रमारुह भद्रं ते बलदेवसहायवान्‌ 1 
त्वयमः करवीरस्थं दष्टं तं वदुध.चिपम्‌ ॥ ८७॥ 
श्ुम्दारा भव्य हो | तुम बरैवकरे साथ शीध रथपर 
आर्ट हो जाओ । हमे करवीरपुरमें निवास करनेवाठे राजा 
शरगाठसे मिलनेके व्यि जब्दी लगी हुई हैः ॥ ८७ ॥ 


वैश्चग्पायन उच 
पिदप्वखपतेवौक्यं श्रुत्वा चेदिपतेस्तदा | 
वाक्यं दृटमनाः रृमप्णा जगाद्‌ जगतो गुरुः ॥ ८८॥ 
वेराम्पायनजी कष्टते र--जनमेजगर । उस समय 
अपने एफ चेदिराज दमधोधका यद वचेन, सुनकर जग्रुर 
श्रीकृप्णके मनमे व्री प्रसन्नता दई । वे बेदे--1॥ ८८ ॥ 


अहो युद्धाभिखंतप्तौ देशकालोचितं स्वया । 
चान्धवप्रतिरूपेण संसिक्तौ वचनाम्बुना ॥ ८९ ॥ 
अहो | दमखोग युद्धसे संतप्त दहो गये ये| आपने एक 
आत्मीय बन्धकी मति आकर ` अपने देदाकालोचित वचन- 
रूपी जके दम नदद्य द्विया ६ ॥ ८९ ॥ 
देशकराखचिहिषएटस्य दिस्य मघुरस्य च । 
वाक्यस्य दुरभा लोके चक्तारद्चेदिसत्तम ॥ ९० ॥ 
धचेदिराज | इस जगत देदकालूके अनुरूप हितकर 
ओर मधुर क्न बोलनेवलि लोग दुरम ई ॥ ९० ॥ 
चेदिनाथ सनाथो स्वः संवृत्तौ तव दर्शनात्‌ । 
नावयोः फिचिदुभाण्यं ययोस्त्वं चन्धुरीदश्चः ॥ ९९ ॥ 
ध्चेदिनाथ | आपके ददानते दम दोनो समायो ग्ये। 
जव दमारे अप-जैपे बन्धु वहो मौजूद ई त्र वरह हमरि लियि 
कुछ भी अप्राप्य नहीं टे ॥ ९१॥ 
जरासंघस्य निधनं ये चान्ये तत्समा सपाः । 
पयौप्तौ त्वत्सनाथौ स्वः कर्तु वेदिकुटोददं ॥ ९२॥ 
'्चेदिक्रुखमृष्रण हम दोनो आपसे सनाय होकर जरठ 
तया उक समान जो दूसरे राजा दैः उन सवको मौतङे वाट 
उतार देने मर्थं ट ॥ ९२ ॥ 
यदुनां प्रथमो वन्धुस्त्वं हि सर्वमदीक्षिताम्‌ । 
अतः प्रभृति संत्रामान्‌ द्रक्ष्यसे चेदिसत्तम ॥ ९३॥ 
ध्चेदिप्रवर्‌ } समस्त राजाओमे अप दी यडुवेदि्योकि 
प्रथम चरन ई | अवमे आपको बरहुत-से संत्राम देखनेकौ 
मिलेगे ॥ ९३ ॥ 
चाक्र मोसलमिव्येवं स्रामं रणचरत्तयः। 
कथयिष्यन्ति खोक ऽसिन्‌ये धरिष्यन्ति पार्थिवाः) ९४॥ 
शयुद्धसे जीवन-निर्वाह करनेवाले जो राजा इस टकम 
जीवित रदैगे, वे आजकरे इस चाक्र, मौसल युद्धकी सदा चर्च 
करगे ॥ ९४ ॥ 
राक्षां पराजयं युद्धे गोमन्नेऽचलसत्तमे । 
रवणाद्‌ धारणाद्‌ वापि स्वर्ग॑रोकं बजन्ति हि ॥९५॥ 
(पवतम श्रेष्ठ गोमन्तकरे सर्मप युद्धम हमारे द्वारा जो यद 
राजार्ओंकी पराजग्र हुई दै, इसके सुनने अथवा स्मर्ण करने. 
से भी मनुष्य खर्गलोकर्मे जर्येगे ॥ ९५ ॥ 
तदह्रछम महाराज करवीरं पुरोत्तमम्‌ । 


विष्णुपवं ] 


चतुश्चत्वारिदोऽध्यायः 


३८१ 


ववज 


स्वयोदिष्टेन मागण चेद्विराज शिवाय वै ॥९६॥ 
{अतः महाराज चेदिराज } अव हमलोग आपके व्रतय 

हुए मागि अपने कल्याणक लिये उत्तम नगर करवीर पुरको 

चर्त? ॥ ९६ ॥ ` । 

ते स्यभ्दनगताः स्यं पवनोत्पातिभि्हयेः । 

भेजिरे दीर्घमध्वानं मूर्तिमन्त इवाग्नयः ॥ ९७ ॥ 
तदनन्तर वे सवर-के-सव तीन मूर्तिमान्‌ अग्निर्योके 


समान रथपर आखूद्‌ हो हवाकी भोति उड़नेवारे बोरडोदधार 

विशार मार्गपर चल दिये ॥ ९७ ॥ 

ते त्रिरा्रोषिताः प्रात्ताः करवीरं पुरोत्तमम्‌ । 

रिवाय ख रिव देशे निविष्रखिदश्चोपभाः ॥ ९८ ॥ 
वे देवोपम कीर मार्गमे तीन रात निवाख करे उत्तम 

करवीरपुरम जा परहुचि । वरहो उन्दनि अपने भले व्यि एक 

सुखद खाने डरा डाला ॥ ९८ ॥ | 


इति श्रीमहाभारते खिरुभागे हरिवंरे विष्णुपर्वणि करवीरयुराभिगमने चिचत्वार्तेऽध्यायः ४ ४३ ॥ 


इस प्रकार प्रोमहम्भरतेके िरूभाग इयि अन्तत विष्णुम श्रीडष्ण अदिकी करवीरपुरमं 
गमनविषयकं ॒तैतारीसर्वैः अध्याय पुरा हुमा ॥ ४३॥ 


चतुश्रतारिशोऽध्यायः 
भीकृष्णदवारा शृगाखका ध तथा उसके पुत्रका करवीरपुरके राज्यपर अभिषेक 


वेशमरयन उश्च 
तानागतान्‌ विदित्वाथ श्गालो युद्ध दुमैदः। 
पुरस्य धषेणं मत्वा नि्जंगमेन्दधविक्मः ॥ १ ॥ 
वेशम्पायनजी कहते ह--जनमेजय | उन सेके 
अनिका समाचार पाकर इन्द्रके समान पराक्रमी रणदुर्मद 
राजा श्टगाल अपनी पुरीपर आक्रमण हुआ समक्षकर नगरे 
बाहर निकल ॥ १}. 


रथेनादित्यवर्णेन भाता रणगामिना । 
आगुधप्रतिपणैन  नेमिनिधोंषदहासिना ॥ २ ॥ 
दराचलकल्पेन चिक्नाभरणभूषिणा । 
अक्षय्यसायक्षस्तूणेः पूणेनार्णबरघोषिणा ॥ ३ ॥ 
हयैदवेनाद्युगतिनासक्तेन शिखरेष्वपि । 
हेमक्बर्गभंण डटश्षेणातिद्ोभिना ॥ ४ ॥ 
सखुबन्धुरेण दीप्तेन पतत्निवरगामिना । 


खगतेनेव शक्रस्य हर॑श्ेन रस्थाद्रिणा ॥ ५ ॥ 
सावित्रे नियमे पूणं यं ददौ सविता खयम्‌ । 
आदित्यरद्विमभिस्वि रदिमभियों निग्रहे ॥ ६ ॥ 
तेन स्यन्दनुख्येन ` दविषःस्यन्दनघातिना । 
स श्रगाखोऽभ्ययाल्छृष्णं शलभः पावकं यथा ॥ ७ ॥ 
वह एक श्रेष्ठ रथपर चदकर चला । उसका वह्‌ रथ 
सू॑के समान तेजःपुञ्गसे प्रादित हो रहा था ! वह्‌ रणमूमिमे 
(अग्रतिहतगति ) से जानेवाला था । उसमे सभी तरहके अखर- 
दाख भरे हुए थे] उत्क पदि्योकी जो धरषराहट होती थीः 
वही मानो उतसक्रा अद्रहाम था ( अथवा वह्‌ षरिर्योकी 
घश्रर ध्वनिसे मेधरकी-गम्भीर गर्जनाकरा उपहास कर रहा था)। 
उसका आकार मन्दराचच्के समान था । उस रथको विचित्र 
आमरणोतसि बिभूपरित किया गया था । कह अभ्य सायकंसि 


भरर हुए तूणयते परिपू था तथा समुदरकी गम्भीर गजनाके 
समान घरपरराहर पैदा करता था। उनम हरे रङ्गके शीघ्र 
गामी धोड़े जुते हुए थे । वह ॒पर्वतक्रे गिखरोपर भी करी 
अटकता नहीं था । उमके कुबरे # भीतरी भागम सोना 
जड़ा हुआ था, उसका घुरा भी सुद्‌ था, उस रथकी बडी 
रोभा हो रही थी । वह सुन्दर रस्सियोते मीर्मोति वेधा दुभा 
था, उसक्री दीप्ति सव ओर छिटक रही थी; वह पक्षिराज 
गरुड्के समान तीव्र गतिसे चल्नेवाल्य था ओर इन्द्रके 
हरित अश्वे जते हुए आकाशगामी पर्व॑ताकार रथकी 
समानता करता था । श्गाटने नियमपूरवक गायत्री जपः करक 
सूर्यदेवकी आराधना की थी | उसकरा वह नियम पूर्णं होनेपर 
साक्षात्‌ भगवान्‌ सूर्यने उसे वह रथ दिया था, जो सूर्यकी 
किरणोकि समान सुनदरी बागडोरोसे उस रथके बोर्डोको 
कावूमे खाया जाता था | ात्रुओकि. र्थोको नष्ट॒कर 
देनेवाले उस शरेष्ठ रथके द्वारा राजा शगार उसी तरह श्री- 
क्ृप्णपर चट्‌ आया जते पर्तिगा आगपर टूट पडता ३।२-७॥ 
चापपाणिः सुतीकष्णेपुः कवची देममालिकः। 
सितप्रावरणोष्णीपः पावकाकारखोचनः ॥ ८ ॥ 
उसके हाथमे धनुष ओर तीखे वाण शोभा पति ये | 
वह कवच धारण करके सोनेकी माखासे विभूषित था। उसकी 
चादर ओर पगड़ी शवेतवर्णकी थी ओर ने अग्निके समान 
जलतेे प्रतीतं होते ये ॥ ८ ॥ 
सुडमुहज्यचपलं विक्षिपन्‌ दुःसहं घुः । ' 
निर्व॑मन्‌ रोषजं वायुं स्ानलञ्वारुमण्डकलम्‌ ॥ ९ ॥ 


# कूवर रथका वष्ट माग है, जिसपर जा वोधा नाता 
है, 


२८२ 


श्रीमष्ाभर्ति खिलभागे 


[ शरिवंशे 


वह वारंवार अपने दुःसह धनुषकरो दिव्यता हुआ उसकी 
भ्रवयस्चा खीचता था ओर आगकी ज्वाला्सि युक्त रोषजनित 
उच्छवास छोढ़ रदा था ॥ ९ ॥ 


भाभिभूपणपचछीनां दीपो मेरस्विाचलः। 
रथस्थ इव शेः श्टगालः प्रत्यदद्यत ॥ १० ॥ 
अपने आश्रूषण-समृहौकी प्रभाओंसि प्रकाशित होकर 
वह राजा शगार मेस्पर्वतके समान शोमा पाताथा ओर 
रथपर्‌ वेढे हए गिरिराज-सा दृष्टिगोचर हता था ॥ १० ॥ 


तस्यारसितशन्दरेन रथनेमिस्वनेन च । 
गुरुत्वेन च नाम्यन्दी चचारो्वी भयातुरा ॥ ११ ॥ 
उसके गर्जनेकी ध्वनि, रथके पदिर्योकी धर्षराहर जीर 
मारीपनते दवी जाती हुई प्रवी मयसे आवुर हो डगमगने 
लगी ॥ ११॥ 
तमापतन्तं श्रीमन्तं मूर्तिंमन्तमिवाचलम्‌ 1 
श्छगालं खोकणालामं दष्ट ष्णो न विव्यथे ॥ १२॥ 
छोकपाोके समान तेजस्यी ओर मूर्तिमान्‌ पर्वतके समान 
विशालकाय श्रीमान्‌ रजा श्गाल्को आक्रमण करते देख 
श्रीकृप्णके मन्म तनिक भी व्यथा नहीं हुई ॥ १२॥ 
ग्गाङ्श्वापि संरन्यः स्यन्द्नेनाद्युगामिना । 
सर्पे वाश्ुदेवस्य थुयुत्छुः प्रत्यदद्यत ॥ १३॥ 
इधर श्गाल भी रोषरमे भरकर उस शीघ्रगामी रथके 
द्वारा श्रीकरष्णकरे प्रास आकर युद्धके च्वि उत्युक दिखायी 
देने ख्गा॥ १२३॥ 
वासुदेवं स्थितं दष्टा श्टगारो युद्धलारसः। 
अभिदुद्राव वेगेन मेधराश्चिरिवाचरम्‌ ॥ १४॥ 
श्रीकृप्णको अपने सामने खड़ा देख श्गाल्की युद्ध- 
लालसा जाग उटठी यर जिस प्रकार मेधोका समूह वर्षाद्यारा 
` ` पर्व॑तपर आक्रमण करता दै, उसी प्रकार उसने वेगपूर्वक उन- 
पर धावा किया | १४॥ 
वासुरेवः स्मितं कृत्वा प्रतियुद्धाय तस्थिवान्‌ । 
तद्‌ युद्धमभवत्‌ ताभ्यां समरे घोरदर्शनम्‌ । 
उभाभ्याभिव मत्ताभ्यां कुञ्जराभ्यां यथा वने ॥ १५॥ 
तवर भगवान्‌ श्रीङृष्ण मुसकराकर उसक्रा सामना इलेके 
स्मि खदेदहो गये; फिर तो समरभूमिरमे उन दो्नोका वड़ा 
मयंकर युद्ध होने खगा, जेते वनम दो मदमत्त हाथ॑। आपसमे 
क्ड़ र्दे ॥ १५॥ 
शगालस्त्वत्रवीत्‌ ष्णं समरे समुपस्थितम्‌ । 
युद्धसागेण तेजखी मेोषटाश्चलितगोरवः ॥ १६॥ 
उख समय मोहवस जो अपने गौरवसे गिर गया था, 
उस तेजखी श्गाठ्ने समेराङ्गणमे उपस्थित हए धी्ृष्णसे 
युद्धविषयक आसक्तिसे प्रेरिते दयोफर फष् ॥ १६ ॥ 


गोमन्ते युद्धमा्गेण यत्‌ त्वया कृष्ण चेश्ितम्‌ । ; 
अनायकानां सूखीणां खपाणां दुर्वे . चले ॥ ९७॥ 
स मे सुविदितः छृष्ण क्षनिया्णा, पराजयः । 
रपणानामसच्वानामयुद्धानां ` रणोत्सवे ॥ १८॥ 
्कृप्ण | तुमने गोमन्ते समीप नायकररदिद् मूख नर्यो 
की दुव सेनाके मीत युद्धे मा्गसे जो-जो चेष्ट की ई 
उनके विषयमे मुञ्चे सव कुछ मलीर्मोति विदित हो गया दै । 
क्िरयोके उस पराजयते ओँ अच्छी तरह ` परिचित दू; परंतु 
वे क्षननिय कायरः धैर्यं ओर शक्तिसे रदित तथा समरोत्सवमे 
कमी युद्ध न कर सकनेवठे ये | १७-१८ ॥ 
तष्ठेदानीं यथाकामं स्थितोऽहं पांथिवे पदे । ` 
क्र यास्यसि मया रुद्धो रणेष्वपरिनिष्ठितः ॥ १९॥ 
"परंतु इस समय त॒म इच्छानुसार युद्ध करसनेके स्वि 
खडे हो जाओ मै यँ सजे पदपर प्रतिष्ठित हू । यदि र्म 
ठम स्र ओष वेरा डाल्कर रकरः तोठम कहो 
जाओगे; क्योकि तुम तो रणकर्ममै परिनिष्ठित ( निपुण ) 
दो नदीं ॥ १९॥ , 
न चाहमेकं सखवलो युक्स्त्वां -योद्धुमाहवे । 
अहमेकस्त्वमप्यको द्धौ युध्याव रणे स्थितौ ॥ २०॥ 
तुम अके हो ओर मै सेनक साथ हूं । अतः रणभूमिः 
भ तम्दारे साथ युद्ध करना मेरे च्ि उचित न होगा । इधरसे 
मै अकेला रहं ओर उधस्वे ठम, फिर दम दोनो समरमूमिे . 
टकर युद्ध करे ॥ २० ॥ । 
कि जनेन निरस्तेन त्वं बाहं च रणे स्थितः। 
धर्मयुद्धेन निधनं व्जव्वेकतरो रणे ॥ २१॥ 
ध्साधारण लेोगौको मारेसे क्या खभ { रणभूमिमे खदे 
हए ठम या मै--दोनेर्मिते एक योद्धा धर्मयुद्धके दवारा ृत्युको 
प्रात हो ॥ २१॥ 
रोकेऽसिन्‌ चाखदेगेऽहं भविष्यामि हते त्वयि । 
हते मयि त्वमप्येको वासुदेवो भविष्यसि ॥ २२॥ 
धुम्दारे मारे जानेपर इस संसारम म अकेला ही वासुदेव 
रहुगा ओर मेरे मारे जानेपर त॒म भी अकरेटे वासुदेव वने 
रदोगेः॥ २२॥ 
म्गारुस्य वचः श्रुत्वा वासुदेवः श्षम।परः । 
ईष्यन्तं प्रहरस्वेति तमुक्त्वा चक्रमाददे ॥ २६॥ 
श्गाठकरी यह वात सुनक्रर क्षमाशील भगवान्‌ वासुदेव- 
ने उस ईर्मा नरेशसे कदा; पठे त॒म प्रहार करो" एसा 
कहकर उन्दनि हाथमे चक्र ठे लिया | २३॥ 
ततः सायकजाखानि शगालः क्रोधमूिंतः । 
चिक्षेप रृष्णे घोराणि युदय लघुविक्रमः ॥ २४॥ 
तव युद्धे लि शीध्रतापू्व॑क पराक्रम प्रकट कररमेवाठे 


विष्णुपवं 1 


चतुश्चत्वारिद्योऽष्यायः 


२३८१ 


=== 


शगालने क्रोधने उन्मत्त होकर श्रीकृप्णपर. घोर वाण-स्मृहो 
की वर्षां आरम्भ कर दी | २४ ॥ 
शद्माणि यानि चान्यानि मुसखलद्यानि संयुगे । 
पातयामास गोधिन्दे सख श्टमाखः प्रतापवान्‌ ॥ २५ ॥ 
प्रतापी श्रगाखने उस युद्धम गोविन्दपर मूल आदि 
अन्य गलका मी प्रहर किया ॥ २५ ॥ 
ग्रमालप्रहितेरसखैः पावकनज्वाटमालिभिः। 
बिर्वंयाभिदतः रृष्णः स्थितो गिरिरिवाचखः ॥ २६॥ 
सोऽसखर्रहाराभिदतः परिचिद्‌ रोपसमन्वितः। 
चक्रमुद्यम्य गोविन्दः श॒गारुस्य परिक्षिपत्‌ ॥ २७॥ 
श्टगाक्के चल्यये हुए अखोदारा, जिनसे आगकी ल्पे 
उट रदी र्थी, . निर्दयतापूर्वंक आहत हनेपर भी श्रीकृष्ण 
पर्व॑तके समान अविचल-भावसे खड़े रदे । उखके अरजके 
प्रहारसे धायर दोकर किञ्चित्‌ रोपसे युक्तं हुए भगवान्‌ 
गोविन्दने चक्र उठाकर शरगाट्पर प्रहार किया ॥२६-२७॥ 
तं रथस्थं भरमाणस्थं श्गाटं युद्धदुर्मदम्‌ । 
जधान समरे चक्रं जातदरपं महावलम्‌ ॥ २८ ॥ 
रणदुर्मद महाबरखी शगार धमण्डममे भरकर रथपर ही 
रे सहाः अपनी जगहसे दया नहीं । इसी समय (भगवान्‌- 
के चये हुए ) चक्रने समरभूमिमे उसपर गहरी चोट 
की॥ २८ ॥ 


ततः सुदर्शनं चक्रं पुनणयाद्‌ सासेः करे । 
चक्रेणोरसि निर्भिन्नः स गतासुर्गतोत्सवः। 
पपात सक्षतजस्रावी श्गाखो.ऽद्विरिवादतः ॥ २९ ॥ 
इसके बाद सुदर्शन चक्र पुनः जगद्गु भगवान्‌ 
श्रीकृप्णकरे दाथर्मे आ गया | उत्त चक्रसे आहत हौकर श्रगाल- 
की छाती फट गयी ओर वह वज्रके मारे हुए पर्वतकौ भति 
खूलक्री धारा व्राता हु प्राणद्यूल्य होकर प्वीपर गिर 
पदा । उसके जीवनका सारा आनन्दयोत्सव॒ समाप्त दो 
गया | २९॥ 


निरम्य तं निपतितं वञ्जपातादिवाचर्म्‌ । 

तस्य ॒सैन्यान्यपययुविं मनांसि इते ग्रपे ॥ २०॥ 
वञ्रपातसे धराशायी ्ुए पर्वतकी भोति राजा श्गाटको 

परष्दीपर पड़ा देख, उसके मारे जानेपर उसके सरे सैनिक 

चिन्नचित्त होकर भाग गये ॥ ३०] 

केचित्‌ प्रविदय नगरं कट्मलाभिहता भृशम्‌ । 

रुरुटुदःखसंतप्त भर्दशोकाभिपीडिताः ॥ २९॥ 
ङ्ख सैनिकं नगरमे प्रवे करे अत्यन्त मोदयस्ल, 

दुःखखे चन्तप्त तथा खामीके सोकसे पीडित हे पूट-पफूटकर 

रोने लो ॥ ३१॥ 


केचित्‌ तत्रैव श्रोचन्तः सरन्तः सुरूतानि च । 

पतितं भूपतिं भूमौ न त्यजन्ति स्म दुःखिताः ॥ २२॥ 
ङु सैनिक वीं सोक कएने खे ! वे स्वामीके उपकार्येः 

का स्मरण कसे दुखी हो भूमिपर पड हुए भूपालको छोढं 


नरी ररे ये॥ ३२॥ 
ततो मेधनिनदेन स्वरेणारिविमदनः | 
छृप्णः कमलपत्राक्षो जनानामभयं ददौ ॥ २३ ॥ 


तदनन्तर शतुमर्दन कमलनयन श्रीकृष्णे मेष-गजनाके 
समान गम्भीर सरसे उन खवर ठोर्गोको अभयदान दिया ॥३३॥ 


चक्रोचितेन हस्तेन राजतागुङ्ठिपरवेणा । 
न मेतथ्यं न भेतन्यम्रिति तानभ्यभापत ॥ ३४ ॥ 
नास्य पापस्य देचिण निरावाधकरं जनम्‌। 
घातयिष्यामि समरे मेद्‌ श्रतं मतम्‌ ॥ ३५॥ 
उन्होने अङ्गुलिप्वते सुशोभित तथा चक्र धारण करने- 
के योग्य उठे हृष दाने हाथके द्वारा संकेत करके उन खवः 
से कटा, सैनिको | ठुम डरो मत | डरो मत | दख पापीके 
अपराधसे मँ खमरभूमिमे निरपसध मनुर्योका वध नी 
करगा; कर्योकि-यह वीरोँका बरत नहीं हैः ॥ २४.३५ ॥ 
अश्ुपुणसुखा द्यीनाः क्रन्दमाना भं तद्‌ 1 
ते स्म पदयन्ति पतितं धरण्यां घरणीपतिम्‌ ॥ २६॥ 
चक्रनिर्दारितोरस्कं भिन्नम्धड्मिवाचटम्‌ ॥ २७ ॥ 
वे सैनिक अत्यन्त दीनमावसे क्रन्दन करते हए उख 
समय प्रथ्वीपर पड़े हुए प्र्वीपति श्गाल्की ओर देख रे 
थे । उनका सारा युखमण्डरु ओसि भीमा हुमा था | 
राजाका वक्षःखल चक्रसे विदीणं हो गया था । वह दरटे हुए 
शिखरवाले पर्वतके समान भूमिपर पड़ा था ॥ ३६-२७ ॥ 
विरुपन्ति स्म ते सवं सचिवाः सप्रजा भृशम्‌ । 
खाश्रुपतेक्षणा दीनाः शोकस्य वशमागताः ॥ ३८॥ 
वे समस्त सचिव तथा प्रजावर्गकरे टोग॒शोकरके वशीभूत 
हो नेव्रेलि अश्रुपात करते हुए अत्यन्त दीनभावे विलाप 
करते थे ॥ ३८ ॥ 
तेषां रुदितशब्देन पौराणां विखरैः खरैः । 
मदिप्यस्तस्य निष्पेतुः सपुत्रा सदिताननाः ॥ ३९ ॥ 
उन पुस्वासियके रोनिके शब्द तथा फटे हुए खरोसि 
अनिष्टकी आशद्धा करके राजा श्गाल्की रानिर्यो भी पु््रोको 
सथ व्यि रोती दुई वह निकल आयीं ॥ ३९ ॥ 
तास्तं निपतितं दष्ट छाष्यं भूमिपति पतिम्‌ । 
स्तनानासज्य करजैशशातीः पर्य देवयन्‌ ॥ ४० ॥ 
अपने स्पृदणीय पति भूमिपाल श्गाल्को वौ धरतीपर 
पडा देख वे रानियों अत्यन्त आर्ते टौ अपनी अद्ुलिरयखि 
सनको नोचती हुई करुण विलाप कसे त्वी ॥ ४० ॥ 


२८४ 


उरस्य॒रसिजश्चिव शिरोजान्याङलान्यपि । 
निदं वाडयन्त्यस्ता विखरं खखटुः लियः ॥ ४१॥ 
वे छिरो अपनी छती, सन ओर वर्हौ फैले हए सिरके 
वार्छोको भी निर्दयतापू्वंक पीटत्री हुई पका फाड-फाड़कर 
रोने गी, ॥ ४९॥ 
तस्योरसि खुदुःखाता श्रदिताः द्धिन्नलोचनाः । 
पेतरू्वभुनाः सवौदिछन्नसूा ठत दव ॥ ४२॥ 
वे खवर रानिर्यो अत्यन्त दुःखे आदर ओर मर्दित हो 
नेत्रे सि वहाती हूं दोनों बेहि ऊपर उठाक्रर जडुते 
कटी हूर ठतार्योकी मति रजकी छातीपर गिर पदीं ॥४२॥ 
तासां बाप्पाम्बुपू्णीनि नेत्राणि दपयोपिताम्‌ 1 
वारिविप्रदतानीव प्ह्जानि चकाशिरे ॥ ४३॥ 
उन राजरानिर्योकरे ओवभरे नेत्र जल (या ओले) से 
आहत दए कमर्टोकरे समान प्रकारित ेते ये ॥ ४२ ॥ 
ताः पति पतितं भूमौ दन्त्यो हदि ताडिताः । 
खारप्यमनाः करुणं योषितः पर्यदेवयन्‌ ॥ ४४॥ 
` धरतीपर पदे हए पतिक्री ओर देखकर रोती ओर छती 
पीटती हुई ये राजयननिर्यो करण विलप करती हुईं शोकोद्रार 
प्रकट करने लगीं ॥ ४४] 
पुत्रं चास्य पुरस्छत्य वालं प्रज्ुतलोचनम्‌ । 
हाक्रदेवं पितः पाद्व विणं रुरुदुः सियः ॥ ४५॥ 
उस राजाके वाल्क पुत्र शक्रदेवक्रो अपने अगे पिताक्र 
पास खढ़ा करफ़ वे रानिर्यो ओर दूने वेगसे रोने तथा विल्मप 
करने ठगी ¡ उस वाल्कके नेत्रेषि भी अदि बह रहाथा॥ 
अयं ते वीर विक्रान्तो वालः पुत्रो न पण्डिवः। 
त्वद्धिदीनः कथमयं पदे स्थास्य'त पैठ्के ॥ ४६॥ 
वे वोर्छी--"कीर महाराज ! यह आपका पराक्रमी पुत्र 
अभी वाल्क दैः विद्धान्‌ नही हो सका ३ । अव आपके व्रिना 
यह अपने पैतृक राज्यपर कपे प्रतिष्ठित हो सकेगा १ ॥४६॥ 
कथमेकपदे त्यक्त्वा गततोऽस्यन्तःपुरं परम्‌ । 
अतृप्तास्तव सौख्यानां कि कुर्पो विधवा वयम्‌ ॥ ४७॥ 
भप्राणनाश }) आप अपने अन्तःपुस्की रानिर्योको सहा 
त्यागकर क्यो परलोकको चठे गये १ हम आपके दिये हुए 
सुखेसि अमी वप्त नहीं हई थीं । हाय ! हम विधवा हो गर्यीः 
अच क्याकरें १ ॥ ८७ ॥ 
तस्य पद्मावती नाम महिप्री प्रमदोत्तमा । 
रुदती पुत्रमादाय बायु्रेषमुपरस्थिता ॥ ५८ ॥ 
राजा श्गाख्करी पटरानीका नामं पद्मावती था । वह्‌ 
चिर्योमे श्रेष्ठ यी } पदूमावती रोती हुई अपने पुत्रको साथे 
भगवान्‌. वासुदेषके पास गयी ॥ ४८ ॥ 


~ 


श्रीमष्टाभारते खिकभागे 


![ श्रिवंशे . 


यस्त्वया पातितो चीर रणप्रोक्तेन कमणा । 
तस्य प्रेतगतस्यायं पुत्रस्त्वं शरणं गतः ॥ ४९ ॥ 

ओर बोटी--ीर ¡ आपने युद्ध-कर्मके द्वारा जिन ` 
मार गिराया दै, उन्दी परोकवासी नरेयका यह पुथ आपकी 
दारणे आया टै ॥ ४९ ॥ 


यदि त्वां श्रणमेतासौ छुयौद्‌ वा शासनं तव । 

नायमेकप्रदारेण जनस्तप्येत दारुणम्‌ ॥ ५०॥ 
ध्यदि ये महाराज आपको प्रणाम करते--अआपके सम्मुख 

विनीत भावक्रा परिचय देते अथवा आपकी आश्छका पालन 

करते तो आपके एक दी प्रदारसे इन्दे संत्तापका भागी नहीं 

होना पड़ता ॥ ५० ॥ 

यदि कुयोदयं मूटस्वयि यान्धवकं चिधिम्‌ । 

नैवं परीतः कृपणः सेवेत धरणीतलम्‌ ॥ ५१५ 
ध्यदि ये मूढ ( वित्रकर्ून्य ›) मरे आपके प्रति ग्रनु- 

जनोचित बरताव करते तो इन मांसभक्षी जन्तुअओसि धिरकर 

पृथ्वीका सेवन नर्द करना पड़ता ! ५१ ॥ 


अयमस्य विपन्नस्य बान्यवस्य तवानघ । 
सन्तती रक्ष्यतां वीर पुः पुत्र श्वत्मजः ॥ ५२॥ 
(अनघ | वीर | यद्‌ अपिके इस मरे दए वान्धवक्री ष्टी 
सन्तति दै; आप अपने पुत्रकी टी भति इसकी रष्वा करे ॥ 
तस्यास्तद्‌ वचनं श्रुत्वा महिष्या यदुनन्दनः । 
गदुद्चमिदं वाक्यमुवाच घदतां वरः ॥ ५३॥ 
रान+का यह वचन सुनकर वक्ता श्रेष्ठ यदुनन्दन 
शीङ्ृष्णने मधुर वाणम कदा--) ५३ ॥ 
राजपत्नि गतो रोषः सहानेन दुरात्मना । 
प्रतिस्था वयं जाता देति सेषोऽसि वान्धवः ॥ ५४॥ 
'राजरानी ! मेरारोप तो इस दुराप्माके मारे जनिके 
साथी दूर्‌ हो गवा | देख ! अत्र हम स्वाभाविक खिति 
ह| मै आपका वही भारई-बन्धु ह ॥ ५४ ॥ 
रोपो मे विगतः साध्वि तव वाक्यैरकत्मयैः 1 
योऽयं पुश्रः श्टगालस्य ममप्येप न संशयः ॥ ५५॥ 
प्ताभ्वी रानी ! ठम्दारे इन निर्दोष वचर्नोति मेरा सारा 
क्रोध दूर्‌ हो गया । राजा गाला जो यह पुन्न दैः यह 
मेरे च्िभी पु्रके ह समान हैः दसम संशय नदीं है ॥५५॥ 
अभयं चाभिषेकं च ददाम्यस्मै सुखाय घे 
आहयन्तां भ्रषवयः पुरोधा मन्व्रिणस्वथा ॥ ५६ ॥ 
पित्पैतामहे राज्ये तत्र पुश्रोऽभिपिच्यताम्‌ । 
भँ इसके सुखके ल्यि इसे अभय देनेके साथ दही इसका 
राज्याभिषेक भी कर दूंगा । आप समस्त प्रकृतिर्यो तथा 
मन्नी ओर पुरोदिर्तोको भी बुलवादये,जिससे आपके इख युत्र- 


6 
4 
५ 


विष्यपथं | 


` ` पञचत्वारि शी ऽश्यप्यः 


[नषि नो 
५. (1 
# ५ 


क८५ 


न यवय 
[कक कक कक क 


को इसके बाप-दादोके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया जायः ॥ 
ततः प्रङुतयः सवी पुरोधा मन्ध्रिणस्तथा ॥ ५७ ॥ 
अभिवेकार्थमाजगमूर्यतो बै . रामकेदावौ । 
तदनन्तर, सारी प्रकृतिर्या ( प्रजा आदि )! पुरोत ओर 
मन्त्री भी रजकरमारका अभिषेक करनेके ल्मि उस सथानपर 
अये जर श्रीबल्यम ओर श्रीकृष्ण विराजमान ये ॥ ५७१॥ 
ततः सिहयासनस्थं तुं राजपुरं जनार्दनः ॥ ५८॥ 
अभिषेकेण दिष्येन योजयामास बीयंवान्‌ । 
इसके वाद पराक्रमी भगवान्‌ जनार्दनने राजकुमारको 
राज्य सिहासनपर बिटाकर दिव्य अभिषेककी विभिसे उसका 
राज्याभिषेक कर्म सम्पन्न किया ॥ ५८३ ॥ 
अभिषिच्य शटगाङस्य करवीरपुरे सखुतम्‌ 1 
छष्णस्तदहरेवाश्चु परस्थानमभ्ययोचयत्‌ ॥ ५९ ॥ 
श्रगालके पुत्रको करवीर पुरके राज्यपर अभिषिक्त करके 
श्रीकृष्णने उसी दिन वहसि शीघ्रतापूर्वक प्रान कर देना 
उचित समन्ना ॥ ५९ ॥ 
रथेन हरियुक्तेन तेन युद्धार्जितेन वै। 
केदावः प्रस्थितोऽष्वानं बृध्रदा अिदिवं यथां ॥ ६० ॥ 
जते इन्दर सर्गलोकको जति दै, उसी प्रकार भगवान्‌ 
श्रीकृष्ण भी युद्धम प्राप्त हए उत्त अश्वयुक्त रथकरे द्वारा 
मथुराके पथपर चछ दिये ॥ ६० ॥ 


हक्रदेबोऽपि धमौ्मा सह मात्रा परंतपः । 


सवाटबृदधुवतीमुख्थाः- “ प्ररङृतयस्तथा ॥ ६१ ॥ 
शिषिकायामथायोप्य श्गाटं युखदुमेदम्‌ । 
संहता दृरमागंण पश्चिमाभिसुखा ययुः ॥ ६ ॥ 
शबुओंको संताप देनेवाल धर्मात्मा राजा शक्रदेव भी 
माताके साथ बालकः बद्ध ओर युवती आदि सारी प्रकृतियो- 
को साथ ले रणदुर्मद श्गाख्के शव्को पाठकीमे सुलाकर 
सव्र रोग संगठित दो नगरसे दूरके रास्तेपर पश्चिमकी 
ओर चले ॥ ६१-६२ ॥ 
नैधनस्य विधानेन चक्रुस्ते तस्य सत्कियाम्‌ । 
सत्कारं कारयामासुः पिवृणां पारलौकिकम्‌ ॥ ६२ ॥ 
क्मशान-भूमिे छे जाकर अन््ेष्टिकी विधिसे उन स्ने 
रक्रदेवद्वारा राजाका दाह-संस्कार करवाया ओर पितरे 
ल्थि पाररोक्रिक इत्यका सम्पादन कराया ॥ ६२ ॥ 


उदिद्योदिश्य राजानं धाद्धं कत्वा सदसः । 
ततस्ते खलिलं द्वा -नामगोत्रादिकीर्तनेः ॥ ६४ ॥ 
पितयुंपरते धोरे शोकसंविग्नमानसः । 
कृत्योदकं तदा राजा प्रविवेश पुरोत्तमम्‌ ॥ ६५॥ 
राजाके उद्यसे सहसो प्रकारकी वस्र्य श्राद्ध देकर 
उन सवने श्गारके चयि नामगो अके उचारणपूरवक 
जख्दान किया । इस प्रकार पिताकी घोर गत्यु हो जानेपर 
शोके न्याकुर्चित्त दए राजा शक्रदेवने उन्हे जलाज्ञलि देकर “ 
अपने उत्तम नगरम प्रवेश किया | ६४६५ ॥ 


इति श्रीमहमिारते खिकुभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि श्गारख्वघो नाम चतुश्चत्वारिशोऽध्यायः # ४४ 
इस प्रकार श्रीमहाभारते लिरभाग हिक अन्तर्गत विष्णुपवमे शरगासका वघनामक चौवारसर्वो अध्याय पृरा हुमा ॥ ८४ ॥ 


पञचचत्वारिोऽध्यायः 
रराम ओर श्रीकृष्णका मथुरामे प्रत्यागमन ओर खागत 


वेशम्पायन उवाच 

तौ तु स्वल्पेन केन दमघेोषेण संगतौ । 
अथाध्नविधिना तौ तु पञ्चरात्नोपितो पथि ॥ १ ॥ 
द्मघोषेण संगम्य पएकरागरोपिताविव । 
जग्मतुः सितो वीरौ मुदा परमया युतौ । 
गग मथुरां प्राप्तो बवसुदेवखुतावुभी ॥ २ ॥ 

वैशम्पायनजी कहते है--जनमेजय { तदनन्तर, वे 
दोनो भाद चेदिराज दमधोषके साथ मिलकर यात्रा करने स्मो । 
मार्गके नियमानुसार चरते हए उर्दि वीची पोच 
रात निवास किया; किं द्मधोषके साथ रदनेषे उन्दं रेसा 
प्रतीत द्मा किं इम एक ही रात मार्गमे रे है । इस प्रकार 


न° इ १६ 


परमानन्दे सम्पन्न हो वे दोनों वीर वसुदेवकुमार साथ-साथ 

थोद़े ही समयमे मथुरा नगरीमे जा पर्हुचे ॥ १-२ ॥ 

ततः भत्युद्गताः सवे यादवा यदुनन्द्नौ । 

सबला हृष्टमनस उभ्रसेनपुरोगमाः ॥ ३ ॥ 
उस समय उग्रसेन आदि सभी याद्वन सेनासहित आगे 

आकर प्रसन्नचित्तसे उन दोनों यदुनन्दन वीरोका खागत 

किया ॥३॥ 

भेण्यः प्रङृतयद्चैव मन्धिणश्च यथोचिताः । 

सवालब्द्धा सा चैव पुरी समभिवतंत ॥ ४ ॥ 


अनेक प्रकारके शिर्व्योद्वारा जीवन-निर्वाह करनेवाले 
नाना जातिके रिस्पीः अरजावर्ग, मन्वी तथा वाल्क ओर 


४८दै 


बृद्धोसहित सारी मथुरापुरी यथोचित रीतिते उनके स्वागतमे 
लुटी थी ॥ #॥ 
नन्दितूयौण्यवायन्त स्तूयेतां पुरूप्पभौ 1 
रथ्यां पताकामाछिन्यो भासन्ति स समन्ततः ॥ ५ ॥ 
आनन्दवर्ध॑क मङ्गक-वाद्य चजने लगे । उन दोनो पुरष- 
प्रवर कीरतौकी स्ठति होने लगी । स्वर ञ्नोरकी गलियों अर 
सडक पताकाओंसे अल्छ्रुत हो उत्तम श्योभा पाने ठगी ॥ 
हृष्टा प्रमुदिता सवो पुरी परमद्रोभिता । 
श्राघ्रोस्तयोरगमने यथैवेन्दरमदे तथा ॥ ६ ॥ 
उन दोन भादर्योकि आनेसे इन्दरोत्छवके समान सारी 
पुरी परम शोभासे सम्पन्न हो दर्षसे चिर उट । सर्वच आनन्द 
छा गया॥६॥ 
मुदितास्त्न गायन्ति राजमार्गेषु गायकाः। 
स्तवारीर्वंदुखा गाथा यादवानां प्रियंकरः ॥ ७ ॥ 
सदुरककोपर आनन्दमग्न हुए. गायक्र यादर्वोको प्रिय ख्गने- 
वाली आशीवादयुक्त गार गा रदे ये॥७॥ 
गोविन्द्रामो सम्प्राप्तो श्रातसै छोकविश्चुती । 
स्वे पुरे निभयाः सव क्रीडध्वं यादवाः सुखम्‌ ॥ ८ ॥ 
ओर सर्वत्र यह धोधणा करते ये किं ध्वादयो ! 
विश्वविख्यात वीर दोनों माई श्रीकृष्ण ओौर वल्राम अवर 
अपने नगसमै आ गये दैः अतः सवरोग निर्भय होकर 
खलपूर्वक क्रीडा करोः ॥ ८ ॥ 
न तघ्र किद्‌ दीनो वा मिनो वा विचेतनः । 
मथुरायामभूत्‌ किद्‌ रामङूष्णसमारमे ॥ ९ ॥ 
वरयाम ओर श्रीकृष्णके आ जानेपर उस मथुरापुरीम 
कोई मी दीनः मिन अथवा उदासचित्त नटीं दिखायी 
देता था॥ ९] 
वर्यासि साधुवाक्यानि ग्रह गोदयददिपाः 1 
नरनारीगणाद्चैव भेजिरे मानसं सुखम्‌ ॥ १० ॥ 
प्ची खमधुर योटी बोक्ते थे; गौ; घोडे ओर हाथी 
भी बहुत प्रसन्न ये तथा लियो ओर पुरक मनको मी वड़ा 
ही सुख मिला ॥ १० ॥ 
शिवाश्च भ्रववुर्वाता विरजस्का दिश्षो दद । 
दैवतान्यपि सवौणि हष्यन्त्यायतनेष्वथ ॥ ११॥ 
शीतल एवं सुखदायिनी हवा चलने ठगी, दसं 
दिशार्ओंकी धूल उद्‌ गवी ओर मन्दिरमि खित स्र्ण देवता 
मी वडे प्रसन्न हूए ॥ १९॥ 
यानि लिङ्गानि खोकस्य चृत्तानीह छते थुगे । 


भौमहाभारते चिकमागे 


[ दिवे 


तानि सवौण्यददयन्त॒ तयोरागमने तदा ॥ १२॥ 
घत्ययुग आनिपर इख जगतूमे जो-जो लक्षण एवं वृष्तान्त 
घटित होते ईः वे सव-केःखव श्रीकृष्ण एवं बर्यामके आगमन- 
पर प्रत्यक्ष दिखायी देने स्मो ॥ १२॥ 
ततः काले दिवे पुण्ये स्यन्दनेनारिमर्दनी । 
हस्युक्तेन तो वीरौ प्रविष्टौ मधरा पुरीम्‌ ॥ १३॥ 
तदनन्तर मद्धल्मय पुण्यमुहूर्तम वे दोनो शरतरुमर्दन वीर 
उस अश्वयुक्त रथकरे द्वारा मयुरापुरीमम प्रविष्ट दए ॥ १३॥ 
विशन्तं पुरर रम्यां गोविन्दं सममेव च । 
अयुजग्मुर्यदुगणाः शाक्रं देवगणा दव ॥ १४॥ 
उस रमणीय पुरीम प्रवेश करते ठमय श्रीकृष्ण ओर 
वरलरामके पीछे समस्त यादव उसी प्रकार चके, ञे देवता 
इन्द्रे पीग्रे चते द ॥ ९४॥ 
चसुदेवस्य भवनं पितुस्ती यटुनन्दनौ 1 
प्रविष्टौ दण्वदनौ चन्द्रादित्याविवाचलम्‌ ॥ १५॥ 
जैसे चन्द्रमा जीर सूर्य सुमेख्पर्वतकी गुफा्म प्रवेश कसते 
हो; उसी प्रकार वे दोन यदुनन्दन बीर पिता वसुदेकके 
घर्म प्रविष्ट हुए । उस समय उन दोनेकि मुखपर प्रषन्नता 
छारी थी) १५॥ 
तत्रायुघानि संन्यस्य गृहे स्वे स्मैरचारिणो । 
सुमुदाते यदुवरौ वखदेवखुताद्भौ ॥ १६॥ 
वरहो अपने धरस्य आयुर्धोको रखकर वे दोना यदुकुल- 
तिलक वसुदेवपुत् स्वेच्छानुखार विचरते इु्ट आनन्दमम्न 
रहने स्रो ॥ १६॥ 
ततस्तु वसुदेवस्य पादौ समभिपीढ्य च । 
तजोभ्रसेनं राजानमन्यूखि.. यदुपुद्गनान्‌ ॥ १७॥ 
यथान्यायं पूजयित्वा तो सर्वेश्चाभिनन्दितौ 1 
जग्मतु॑मनसौ मातुरेव निवेशनम्‌ ॥ १८॥ 
तदनन्तर, वसुदेवजीफे दोनो चर्णोको दवाकर राजा 
उग्रसेन तथा अन्य प्रधान यदुंरि्योका यथोचित सत्कार 
करनेके पश्चात्‌ उन सवके द्वारा खयं भी अभिनन्दित हो, वे 
दोनों भाई प्रसन्न मनसे माताके ही महल्मे चले गये १७-१८ 
पवं तवेकनिर्माणो मथुरायां श्चुभाननेौ । 
उश्रसेनाञुगो भूत्वा कंचित्कारं समोदतुः ॥ १९॥ 
इस प्रकार एक ही तत्त्वके वने ओर एकं ष्टौ उदेश्यकी 
सिद्धिके च्ि कट हुए वे दोनो श्रीकृष्ण ओर वल्राम 
राजा उग्रसेनके अनुगामी होकर कुछ कार्तक वहा सुलसे 
रदे ॥ १९॥ 


इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंरो विष्णुपर्वणि रामकूष्णयोर्मधुरा प्रत्यागमने पञ्चचस्वारिशोऽध्यायः ॥ ४५ ॥ 
इस प्रकार श्रीमदाभसतते लिरमाग दरिं अन्तरत विष्णुम चरम भौर श्रीडस्णकः 
, मथुरामे प्रत्यागमनव्रिपयक पेतारीसते अध्याय पुरा म ॥ ४५ ॥ 
--+--9अ-+--- 


विष्णाप्वं 1 


पद्चत्वारियोऽभ्यायः 


2८७ 


परचत्वारिंशोऽध्याय 
बलरामजीकी अजयात्रा वथा उनके द्वारा यञ्नाजीका आकषण 


वैशम्पायन उवाच 
कस्यचित्‌ त्वथ काटस्य स्त्वा गोपेयु सौदवम्‌। 
जगावैको चजं रामः कष्णस्याञुमते स्थितः ॥ १ ॥ 
वेश्चम्पायनजी कहते है--जनमेजय ! कुछ कालके 
अनन्तर गोपे सौदार्दका सरण करके श्रीकृप्णकी अनुमति 
ठे वलरामजी अकेले ही वरजम गये ॥ १॥ 


स मतस्तन्न रम्याणि दद्द विपुलानि वै। 

भुक्तपूर्वाण्यरण्यानि ` सरांसि सुरभीणि च ॥ २ ॥ 
वरहो जाकर उर्न्दोने वहुत-से वदे-वदे सुगन्धित वन 

तथा सरोवर दैखेः, जो पषटले उनके उपभोगे आ 

चुकेथे॥२॥ ` 

स प्रविष्टस्तु वेगेन तं जजं छष्णपूर्वजः। 

वन्येन रमणीयेन वेषेणांक्तः प्रभुः ॥ २ ॥ 
्रीकृम्णके पूर्वन बलरामजी वड वेगसे उस तजे प्रविष्ट 

हुए । उस समय वे प्रभावशाली संकषण वनवासिर्योके योग्य 

रमणीय वेष-मूप्रासे अलंकृत ये ॥ ३॥ 

, स ॒तानभाषत प्रीत्या यथापूर्वमरिंदमः 
गोपास्तेनैव विधिना यथान्यायं यथावयः ॥ ४ ॥ 


शानुदमन चराम पहलेकी ही भोति उसी तौर-तरीकेसे 
अवस्थाकी छोयाद्बड़ाईैके अनुसार यथायोग्य सव गोपोके 
साथ मिले जौर प्रेमपूर्वक उनसे बातचीत के ख्ये ॥ ४] 
तथेव प्राह॒तान्‌ सर्वास्तथैव परिहर्षयस्‌ । 
तथैव सह गोपीभिर्योजयन्‌ मधुराः कथाः ॥ ५ ॥ 
उन्दने पूर्ववत्‌ सवका इर बदति हुए सतवसे उसी तरद 
वतं कीं तथा योपियोके साथ भी पदले-जसी हयी मधुर चर्चापि 
छ्डदीं॥५॥ 
तमूचुः स्थविरा गोपाः भियं मधुरभाषिणः। 
रामं रमयवां श्रेष्टं भरवासात्‌ पुनरागतम्‌ ॥ & ॥ 
रमानेवाटे ( मनको आनन्दित करनेवारे ) पुरर 
रष वलरामजी परदेशमे रहकर फिर टे थे ओर गोपोके 
हुत ही प्रिय ये | अतः मधुरभाषी ब्डे-बृदध गोर्पौनि उने 
कटा--| ६ ॥ 
स्वागतं ते महावाहो ' यदूनां कुलनन्दन ।. 
अद्य स निङेतास्तात यत्‌ त्वां पद्यामहे वयम्‌॥ ७ ॥ 
भयदुकुल्को आनन्दित करनेवाठे महावाहो ! तुम्हारा 
स्वागत है | तात ! आज हम वहत खुद दैः क्योकि हमे 
विं वाद ॒वुम्े देखनेका सौमाग्य प्रात हुआ 
॥ ७ ॥ 


भरीताद्चैव वयं वीर यत्‌ त्वं पुनरागतः 1 
विख्यातखिषु छोकरेषु रामः शुभकरः ॥ ८ ॥ 

वीर | तुम जो पुनः लौटकर यहो आयि होः इषसे ' 
हम वहत संव है । यतुरओको भय देनेवाठे वीर वेख्यमकौ 
तीनो ठोकौमि प्रहिद्धि दै ॥ ८॥ 


धर्नीया वयं वीर त्वया यादवनन्द्न । 
अथवा शराणिनस्तात रमन्ते -जन्मभुमिषु ॥ ९ ॥ 
वीर यादवनन्दन ! यँ आकर तुमने हमारा गोर 
दाया है, यह तुम्हारे ल्ि उचित ही दै । अथवा तात । 
अपनी जन्मभूमिमे समी प्राणियोको सुख मिर्ता दै ॥ ९ ॥ 


विदां वयं मान्या धुवमद्यामटानन । 
ये स्म दृष्टस्त्वया तात काष्वमाणास्तवागमम्‌ ॥१०॥ 
'अमलानन ! वमने जो हम छोगोंपर कृपादृष्टि की दै, 
इससे निश्चय हयी अव हम देवताओके व्यि भी माननीय दो गये। 
तात { दमखोग म्रतिदिन म्हारा श्भागमन चादते ये॥१०॥ 
दिष्टथा ते निहता महवा; कंसश्च विनिपातितः । 
उग्रसेनोऽभिषिक्श्च मादास्म्येन जनेन वै ॥ ११॥ 
ववे सौमाग्यकी वात है किं त॒म दोनों भादयेक्रे द्वारा 
वे मल्ल मारे गयेः कंस भी मार गिराया गया तथा उग्रसेनका 
राज्यपर अभिषेक हो गया। उनके महात्मापन(साधुसखभाव) के 
कारण दही स्व॒ ठोगोनि उनको राज्यपर अभिषिक्त 
कियाहै ॥ ११॥ 
समुद्रे च श्रुतोऽस्माभिसितमिना खद विग्रहः । 
वधः पञ्चजनस्यैव जरासंधेन विग्रहः । 
गोमन्ते च श्चुतो ऽस्माभिः क्षत्रियः सह विरहः ॥ १२॥ 
्टमने यह मी सुनादहै कि समुद्रम तिमि ( पञ्चजन 
नामक्र मगरमच्छ ) के साथ तुमरोगौका युद्ध हआ था। 
उसमे पञ्चजन मारा गया । तसश्वात्‌ मथुरामे जरासंधके 
साथ वड़ा मारी युद्ध हुआ | इतना ही न्दी? हमारे स॒नेम 
यह भी अया है कि गोमन्तपर्वतके निकर क्षत्रियोके साथ 
ठम लेर्गोक्रा घोर युद्ध हुभा था ॥ १२॥ 
द्रदस्य वधदचैव जयसंघपराजयः। 
तत्रायुधावतरणे श्रुतं नः परमाहवे ॥ १३॥ 
'उस संग्राममे राजा दरदका वप हुमा ओर जरासंधकरी 
पराजय हुई । सुना था किं उस महायुद्धमे ठम लोगेके स्यि 
अकिाराते दिन्य अयुध उतर अये थे॥ १३॥ 
वधदचैव श्टगाखस्य करवीर पुरोत्तमे । 
तत्सुतस्याभिषेकश्च नागराणां च सान्त्वनम्‌ ॥ १४ ॥ 


२३८८ 


“सके सिवा; उत्तम करवीरपुस्मे राजा श्रगालका बभ 
करके उसके पुत्रका वँ अमिपेक किया गया ओर वर्क 
नागरिकको वम्हारी ओरसे सान्त्वना दी गयी ॥ १४॥ 
मथुरायां प्रवेक्श्च कीर्तनीयः सुरोत्तमैः । 
प्रतिष्ठिता च वसुधा पार्थिवाश्च वीताः ॥ १५॥ 

“फिर तमरोर्गोका मथुरामे प्रवेग हुआ; जो देवता्के 
ल्ि कीर्तन करने योग्य दे । पृथ्वीका भार उतारकर दउमने 
इते भटीरमोति प्रतिष्ठित कर दिया ओर भूमण्डले समी नेरौ 
को वर्मे कर लिया ॥ १५ ॥ 
तत्र चागमनं दष्ट सभाग्याः स यथा पुख। 
तेन सख परितुष्ठा वै हिताश्च सबान्धवाः ॥ १६॥ 

धुम्हासा ्चुमागमन देखकर दम पूर्ववत्‌ सौभाग्यशाली 
दो गये द । ह्मे सत्र तरदसे संतोष प्रा हुआ द ओर म 
अपने बन्धुजान्धर्नोसहित दर्षसि उक्छुस्ल हो उदे दै ॥ १६॥ 
प्रत्युवाच ततो रामः सर्वस्तानभितः स्थितान्‌ । 
याद्वेष्वपि सरवे भवन्तो मम चान्धवाः ॥ १७॥ 
इदावयोर्ग तं चाल्यमिह॒चैवावयो रतम्‌ । 
भवद्धिवद्धितादवैव यास्यामो विक्रियां कथम्‌ ॥ १८ ॥ 

तम बलरामजीने अपने सत्र ओर खदे हए उन समस 
गोर्पेसि कदा--“समस्त याद्वेकि होते ए. भी भपलोग द्वी 
हमारे सगे वान्धव ह । यही हम सर्गोका वचपनं वीता, यदीं 
हम खेले-कूदे ओर आप रोगन ही हमै गल-पोषकर बढ़ा 
किया; फिर दम आप लेोर्गोको भुला कैसे सकते ह ॥१७-१८॥ 
गदेषु भवतां शुक्तं गावश्च परिरक्षिताः । 
अस्माकं वान्धवाः सच भवन्तो वद्धसौहदाः ॥ १९॥ 
श्टमने आपके घरमे खाया पीया ओर गौर चरायीं। 
आप सम लोग हममे अनुराग रखनेवाखे हमारे बन्धु-वान्धव 
दैः ॥ १९॥ 
चरवत्येवं यथात्वं गोपमध्ये हखायुचे। 
- संहृ्टवदना भूयो वभूहर्बनयोपितः ॥ २०॥ 
हट धारण करनेवाले वलरामजी जत्र इस प्रकार यथार्थ 
वात कद रहे थे, उस समय उनकी वाति सुनकर व्रजघुन्दरि- 
यके मुखपर पुनः प्रसन्नता छ गयी }! २० ॥ 
ततो बघनान्तरगतो रेमे रामो महावलः, 
एतस्मिन्नन्तरे घ्राप्ते रामाय विदितात्मने ॥ २९॥ 
गोपालैर्देशकारक्षैरुपानीयत वारुणी । 
सरोऽपिचत्‌ पाण्डुराभ्राभस्तत्काटं श्षातिमिश्च॑तः॥२२॥ 
तदनन्तर, महाव्टी वराम वनके भीतर जाकर सुख- 
पूर्वक विचरे गे । इसी समय उनके मनोमावको जानकर 
देश-कालके ज्ञाता गोपाख्गण उनके खयि वास्णी ( सुधा या 


शीमष्टाभार्ते सखिरनाभे 


[ स्विस 


शहद ) ठे अये । फिर उन वन्धुजनेति भिरे हुए गौर-कान्ति 
चलरामने उस समय उसका पान किवा ॥ २१-२२॥ ` 
वनान्तरगतो रमः पानं मरदसमीरणम्‌। 
उपनिन्युस्ततस्तस्मै वन्यानि विविधानि च ॥ २३॥ 
भव्यत्ररमणीयानि पुष्पाणि च फलनि च । 
मेध्याश्च विविधान्‌ गन्धान्‌ भक्ष्यां हदयंगमान्‌। 
खद्यो हतानि पद्मानि विक्रचान्युत्पखानि च ॥ २४॥ 
वनम गये हुए वलरामजीने जो सधु पीया था, वह करु 
नेया नेवाद्य था; उसके पीनेके बाद ग्वाल-वाल उनके 
स्यि वनक्रे नाना प्रकारे पुष्प ओर फल ठे अयिः नो अमी 
नये ( तने ) दोनेके कारण वडे रमणीय गते ये । इस 
सिवा मोर्पौनि उनके च्य भोति-भोतिकी पवित्र गन्ध तथा 
मनोरम भक्ष्य पदार्थं प्रस्ठुत किये । व॒रंतके कये हुए विकसित 
कमल ओर उत्पल मी भेट विये ॥२३-२४॥ 
शिर्खा चारुकेदोन किचिदादतमौलिना । 
श्रवणैकावखम्ेन कुण्डटेन विराजता ॥ २५॥ 
चन्दनाद्रंण पीतेन वनमाखाचरुम्बिना । . 
विचभावबुरसा रामः कैटासेनेव मन्द्रः ॥ २६॥ 
यठ्यामजीके सिरके वाठ यद्धे मनोर ये 1 उतपर रखा 
हुआ सकट ङ टदा था } उनके पक कानमे सुन्दर इुण्डठ 
टक रदा था । वक्षःसखल चन्दनके अनुटेपते आद्र एवं 
पीत था, उस्पर वनमाला कटक रदी थी । रेसे वक्षस बल- 
रामजीकी वैसी ही शोभा दती थीः ञे कैल्मस पर्वते 
मन्दराचर सुशोभित होता ६ ॥ २५-२६ ॥ 
नीके वसानो वसने प्रत्थग्रजलद्पमे । 
रराज वपुषा शयुश्रस्तिमिरोधे यथा शी ॥ २७॥ 
उन्हनि नूतन जलधरे समान कान्तिवाले दो नीले वज्ञ 
धारण कर स्खे थे ओर शरीरते वे गोरे थे; अतः अन्धकार 
राशिमे चन्द्रमाके समान सुल्ञोमित रोते थे ॥ २७ ॥ 
लाद्भखेनावसिकतेन भुजगाभोगव्तिंना ! 
तथा अुजाधस्छिष्टेन सुखलेन च भाखता ॥ २८ ॥ 
उनके एक हाथमे सर्प-शरीरके समान दल शोमा पाता 
था ओर दूसरे प्रकाशमान मुसल ॥ २८ ॥ 
स मत्तो विनां धेषठो र्रजाघूणिंताननः । 
शेशिरीपु यामास यथा स्वेदालसः शी ॥ २९॥ 
वल्वानमे शरेष्ठ वल्यामजी सधुसे मत्त-से दो रदे थे! उनका 
मुख द्म रहा था। वे एसे ख्यते येः मानो शर्की रारतमि 
स्वेद-विन्दुओसि युक्त अल्छये हूए चन्द्रमा शोभा पति 
दौ ॥ २९॥ 
रामस्तु यसुमामाष्ट॒स्नातुमिच्छे मष्टानदि । 
पि मामभिगच्छ त्वं रूपिणी सागरगमे ॥ २० ॥ 


विष्णुपवं ] 


ठस समय वलरामजीनै यमनासे कहा--“महानदि ! मे 
स्नान करना चाहता दूँ । सागरगामिनि ! मूषिमती होकर 
आ, चलो मेरे साथः ॥ ३० ॥ ' 
सकपणस्य मोक्ता भारतीं परिभूय सा। 
नाभ्यवर्तत तं' देशं खीस्वभावेन मोहिता ॥ ३१॥ 
संकर्पृणकी चातको मतवलिकी तरहक समद्चक्रर नारी. 
खमावते मोत दुई उस नदीन उसकी अवहेर्ना कर दी । 
वह उनकरे अभीष्ट यानको नदीं गयी ॥ ३१ ॥ 
ततद्चुक्रोध वलवान्‌ रामो मद्रखमीरितः। 
चकार स हलं हस्ते कर्षणाधोमुखं बी ॥ ३२॥ 
तत्र व्रल्वाम्‌ बलराम मदते प्रेरित हो कुषित हो उटे। 
उन्दनि यम्रुनाकां कषण करनेके स्यि इट्का मुख नीचेको 
कर छया | ३२ ॥ 
तस्यामुपरि मेदिन्यां पेतुस्तामरसस्रजः । 
सुसुखः पुष्पकोदोश्च वासरेण्वरुणं जलम्‌ ॥ २२॥ 
यमुनाको खींचते समय उनके गलते जो कमलपुष्यकी 
मार्गणे दूख्कर प्रथ्वीपर गिरी, वे पुष्प-कोर्शोद्ारा सुगन्धित 
परागसे अरण रंगका जट छोढमे लगीं | ३३ ॥ 
ख शठेनानताग्रेण कूरे शुद्य महानदीम्‌ । 
चकर्ष यमुनां रामो श्युत्थिवां चनितामित्र ॥ ३४ ॥ 
जिषका अग्रमाग कुछ का हुभा थाः उस हल्को 
यमुनाके तय्से ख्णाक्रर स्वेच्छाचारिणी वनिताके समान उस 
महानदीको अभीष्ट दिाकी ओर खीचां ॥ ३४ ॥ 
सा विद्लजलस्नोता हदृश्सितसंचया । 
व्याचतंत नदी भीता दटमागौनुखारिणी ॥ २३५॥ 
उसक्रा जल-सोत क्षुज्ध हो उठा ! कुण्ड्िं जो अगाध 
जलरारिका संचय था, वह्‌ वहति निकलने र्गा ओर वष 
नदी भयमीत-सी दोकर हल्के बनाये हुए मासे चलने ख्गी॥ 
कालादिष्वत्मौ सा चवेगगा वक्रगामिनी । 
संकर्षणभयत्रस्ता योषेवाक्ङतां गता ॥ ३६॥ 
दक्की रेखा दी उसे गन्तव्य मार्गका अदेश दे रही 
थी । सीधे मा्गपर वेगसे व्हनेवाटी वह नदी टेदे सस्तेपर 
मन्थर गतिते चलने लगी । वह संकर्पृणके मयसे चस्त दई 
किसी युवतीकी माति व्याकर हो उदी थी ॥ ३६ ॥ 
पुङिनोणिविम्बौष्ठी सदितैस्तोयताडितैः। 
फेनमेखलसुतैश्ध च्छिन्नेरण्बुदगामिनी ॥ २७ ॥ 
दोनो किनारे दी उसके नितम्ब थे, सक्तकमलोका समूह 
दी उसके अरुण अधर्योका प्रतीक था । फेन ही उसके मेखला- 
सूत्र धरः जो जल्पे ताडित यर मर्दित होकर छिन्न-मिन्न हो 
गये थे; वह नदीरूपिणी युवती सथरुद्रर्पी प्रियतमके साथ 
समागम करनेवाखी थी ॥ ३७ ॥ 


५ 


पटुचत्रारिशोऽघ्यायः 


२८९ 


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तरङ्विषमापीडा यक्रचाकोःसुखस्तनी । 
वेसगस्भीर वक्रापि अस्तमीनविभूषणा ॥ २८ ॥ 
उसके तरङ्गरूपी ' शिरोमूषण ॐँचेननीचे हो रदे थे, 
चक्रवाकशूपी स्तन ऊँचे उठे टुए थे, उत्करे गम्भीर अंग 
वेगके कारण वक्र हो रहै धे, बह बसत मीनरूमी आभूषणेसे 
विभूषित थी ॥ ३८ ॥ । 
सितदंसेक्षणपाङ्गी काशक्षौमोचिद्रूताम्बरा । 
तीर्जोद्धतक्रेश्ान्ता  जलस्खलितगामिनी ॥ २९ ॥ 
दवेत हंस उरक नेत्र ओर अपङ्ग ये, काशपुष्प उसके 
फदराते हुए रेशमी वस्र थैः तय्वर्तीं पौदे या दृक्ष उसके केश 
ये तथा जलक्रा प्रवाह दी उसकी स्खलित गतिका प्रतीक था॥ 
खाङूगलोर्किखितापाज्गी क्षुभिता सागरगमा । 
मत्तेव छुरिखा नासै रजमागेण गच्छती ॥ ४०॥ 
उसके नेत्र-परान्त मानो हल्की नोकसे चिर गये ये, वह्‌ 
सागरगामिनी क्युन्य दौ उसी थी; बह करि एवं मतवाखी 
ख्ीके समान खुटी सडकपर चर रही थी ॥ ४० ॥ 
ष्यते सातिवेगेन सखोतःरखलितगामिनी । 
उन्मागीनीतमागौ सा येन धृन्दावनं वनम्‌ ॥ ४१ ॥ 
ऊचे-नीचे प्रवाह ही उसङ़ी स्सटित गतिक सूचक ये। 
वष्ट उस विपरीत मार्गपर सखयी गयी थी, जिस ओर इन्दावनं 
सुशोभित होता था \ ४९ ॥ 
बृन्दावनस्य मध्येन सा नीता यमुना नी । 
रोरूयमाणेव खगैरन्विता तोयवासिभिः ॥ ४२॥ 
यमुना नदी इृन्दावनके बीचसे खायी गयी थी | जत्र 
निवास करनेवाले पक्षी उसके साथ-साथ बोलते हूए आ रहै 
थे । उन पक्षि्यौके शब्दम मानो वह नदी दी जोरजोरसे 
रोर्हीथी॥४२॥ 
सा यद्‌ समतिक्राम्ता नदी चन्शावनं चनम्‌ । 
तदा खीरूपिणी भूत्वा यसुना राममव्रवीत्‌ ॥ ४३ ॥ 
वष नदी ज्र इन्दावनको लोधं गयी; तव लीरूपमे 
प्रकट हो ब्रर्यमजीसे वोटी--) ४३ ॥ 
भ्रसीद्‌ नाथ भीतास्मि प्रतिटोमेन कर्मणा । 
विपरीतमिद्‌ रूपं तोयं च मम जायते ॥ ४४॥ 
प्नाय | प्रमन्न होये म आपके इस विपरीत कर्मत 
बहुत डर गणी दू । मेरा यह रूप ओौर जल विपरीतो 
गया है ॥ ५४ ॥ 


असत्यं नदीमध्यै सौष्िणेय त्वया छता । 


~------------------------------------------------- 


कषणेन महावाहो सखमार्गव्यभिचारिणी ॥ ४५ ॥ 


षषभ 


१, ने्रपे भन्तमाग । 


२९० 


श्रीमहाभारते सिङभागे 


[ दरिवंशे 


'रोदिणीनन्दन | महात्रादो ! आपने इष तरह पुन्न 
वीचकर नदियेक्रि वीच (असती चना दिया । मुने मेरे 
मार्गते भ्रष्ट कर दिया ॥ ४५ ॥ 
धरातां मां सागरे पूर्य सपल्यो वेगगर्विंताः। 
फेनहासैर्दसिष्यन्ति तोयव्यादृसगामिनीम्‌ ॥ ४६॥ 

धज म समुद्रके निकट जाऊँगीः उस समय मेरी सौते 
वेगसे गर्वित होकर अपने फेनर्पी हार्सोदधास मेरीर्दषी 
उदर्येगीः सुत्ने जल द्वासा विपरीतगामिनी वतार्येगी ॥६॥ 
प्रसादं कुरु मे वीर याचे त्वाँ रष्णपूर्वज । 
खुप्रसन्नमना नित्यं भव त्वं सुरसत्तम ॥ ४७॥ 

शश्रीकृप्णके वरदे मैया वीर सुरम्रेषठ | आप मु्चपर कृषा 
कर । म आपे याचना करती ह, आप भु्नपर सदा प्रसनन- 
चित्त रदे ॥ ४७ ॥ 
कपंणायुधरृष्टासि रोपोऽयं चिनिवत्य॑ताम्‌ । 
मृ गच्छामि चरणौ तवैषा लाङ्गलायुध । 
मार्गमादिष्रमिच्छामिं क गच्छामि महाज ॥ ४८॥ 

'दटायुध | मेँ आपके कर्षणायुध (हल ) से यर्होतक खाच 
सयी गयी ह| आप अपने दस रोपको रीय दं | म आपके 
चरणे मस्तक रखती दर । महावाहो ¡ सन्ने राह चतादयेः 
म करदो जाऊँ  ॥ ४८॥ 

, वैश्नम्पायन्‌ उवाच 
रणयावनतां दष्ट यनां लाहखायुघः 1 
प्रत्युवाचार्णववघूं मदङ्कान्त शं घचः ॥ ४९ ॥ 
वैराम्पायनजी कहते है--जनमेजय | समुद्रपत्नी 
यमुनाको प्रमते नतमस्तक दुद देख मधुके मदसे क्लान्त हुए 
यर्रामजीने यह ब्रात कदी ॥ ४९ ॥ 
लाङ्लादिष्रमागी त्वमिमं मे प्रियदरषने। 
देश्षमम्बुप्रदानेन श्वयखाखिखं श्म ॥ ५० ॥ 
शुभे ! प्रियदरनि { मैने हल्के द्वारा ठम्दारे जनके 
सि मार्ग व्रता दिया दै, त॒म इस सारे प्रदेशको अपना जल 
देकर आश्मवित कर दो ॥ ५० ॥ 
पय ते खुश्च सदेदाः कथितः सागरंगमे । 
श्यान्ति चज मष्टाभागे गम्यतां च यथासुखम्‌ ॥ ५१॥ 
यावत्‌ स्थास्यति छोक्रोऽयं ताचत्‌ तिष्ठतु मे यशा 

शुरु | सागरगामिनी महामगि ! यद ठम्दारि च्ि 
सन्दे कदा गया है ¡ गान्ति धारण करो ओर जहो दुम्री 
मौज दहो ची जाभो । जवतक यद संसार रहेगा; तव्रतक्र मेरा 
यद सुया मी वना रदेगाः ॥ ५१३ ॥ 
यमुनाकषंणं दष्ट स्वँ ते वजवाक्िनः ॥ ५२ ॥ 


[का नयननकानननता्यनत्यााननननानककककका नककककक 


साधु क्ताभ्विति रामाय ध्रणामं चक्रिरे तदा । 
यमुनाजीका आकर्षण हुभा देख समस्त व्रजवासिर्येनि उस 
कहकर वरलरामजीको 


समय साधु | साधु | ( वादःवाद ) 
प्रणाम क्रियः ॥ ५२१ ॥ 
ताविखुज्य महाभागां वांश्च सवीन्‌ बजौकसः॥ ५३॥ 
ततः संचिन्त्य मनसा रामः प्रहस्तं चरः। 
पुनः प्रतिजगामाद्यु मथ॒रां रोहिणीसुतः ॥ ५४॥ 
महाभागा यमुना तथा उन समस्त व्रजवासिर्येक्रो विदा 
करके प्रहार करनेवामि श्रे रेदिणीयुत्र बटसमर्जीने मन- 
ही-मन कुख सोचकर पुनः यीघ दही मथुराको ग्रख्यान किया। 


ख गत्वा मुरं रामो भवने मधुसुद्रनम्‌। 
परिवत॑मानं दददो पृथिव्याः सारमन्ययम्‌ ॥ ५५॥ 
मथुरा पर्हुचकर वरलसमने प्रथ्वीके. सारभूत अविनाशी 
मधुपूद्रनक्रौ भवनक्रे भीतर शाय्यापर करवट बदलते देखा ॥ 
तयैवाच्यन्यवेयेण सोपदिख्टो जनार्दनम्‌ । 
प्रत्यश्रवनमाटेन वक्चसाभिपिराजता ॥ ५६॥ 
तत्र उसी राहगीरफे वेपर्म वेलरामने यतन वनमायते 
विभूपरित सुन्दर वक्नःखल्द्ारा भगवान्‌ जनार्दनका आचिद्गन 
किया ॥ ५६ ॥ 
स दृष्ट तूर्णमायान्तं समं खाङ्गधारिणम्‌। 
खदसोत्थाय गोचिन्दो ददावासनमुचखमम्‌ ॥ ५७॥ 
ल्घल्धारी ब्ररयामको यीघतपूर्यक अति देख गोविन्दे 
सदसा उठकर उनके चयि उत्तम आसन दिया ॥ ५७ ॥ 
उपविष्टं तदा रामं प्रच्छ कुशं बजे। 
वान्धवेपु च सवपु मोघु चैव जनार्दनः ॥ ५८॥ 
जव वलरामजी बैठ गये, तव श्रीकृष्णे उनसे रजकी 
ऊुशक पृष । समस्त बरान्धर्वो तथा गौ्यैकरि विप्य्मे मी 
जिज्ञासा की ॥ ५८ ॥ 
परत्युवाच ततो रामो भ्रातरं खाघुभाषिणम्‌ । 
सेर कुशं ष्ण येषां ऊुदारमिच्छसि ॥ ५९॥ 
तत्र बटरामने उत्तम नपण करनेवाले भाई श्रीङृष्णको 
हस प्रकार उत्तर दियाः श््रज्प्ण { तुम जिनकी कुशल 
चाहते हो, उनकी सर्वत्र कुखट ३” ॥ ५९ ॥ 
ततस्तयो्धिःचिच्राशीः पौराण्यश्चाभवन्‌ कथाः । 
वशुदेवाग्रतः पुण्या रमङरेशवयोस्तदा ॥ ६०॥ 
तदनन्तर वसुदरेवजीके अगे वराम ओौर श्रीकष्णकी 
विचित्र अर्थसे युक्तं पवित्र एवं पुरातन कथा होने गी ॥ 


इति श्रीमहाभारते चिख्भागे हिद विष्णुपर्वणि यसुनाकपमे पट्चत्वारिं्रोऽध्यायः ॥ ४६ ॥ 


षस प्रकारे श्रीमहाभारते खिरभाग खिवदके जन्तग॑त विष्णुपर्व वररमर्जके द्वारा यमुनाजीकरा 
आकषैणव्रिययक छियारीसवे भष्याय पुरा हुमा ॥ ४६ ॥ 


~~नो 


विष्णुपर्व ] 


, सत्तचत्वारिशयोऽध्यायः 


३९१ 


सप्चत्रारिशोशऽध्यायः ' 


भ्रीकुष्णका यादे साथ रुकिणी-खयंवरके अवसरपर ङण्डिनपुरमे जाना 
तेथा राजा केशिकद्वारा उनका सत्कार 


, वैशम्पायन उदाच 

पतस्मिन्नन्तरे प्राप्ता ोकपराचत्तिका नराः । 
चक्ायुधग्हं सवै टोकपाखगरृष्ठोपमम्‌ ॥ १ ॥ 

वैराम्पायनजी कहते है--जनमेजय ! इसी बीचमे 
जगतूर्मे होनेवाटी मरदृत्तियों अथवा षटनार्योकी धन्वना देने- 
वाके सव्र लोग मथुरमि अयि ओर टोकपाछोके भवनकी भोति 
शोभां पानेवटे चक्रधारी श्रीङृप्णके शमे एक द्ुए ॥ १॥ 
तेष्वात्ययिकदांखीपु टोकमराद्रत्तिकेष्विह । 
रुतसंक्षा यदुश्रेष्ठाः . समेताः कष्णसंसदि ॥ २ ॥ 

वे लोग विनाशकारी युद्धका समाचार बताना चाहते थे। 
उनके आ जानेपर आपखका संकेत प्राकर समस्त श्रेष्ठ यादव 
शीक्रष्णकी सखभामे जुट गये ॥ २॥ 
समागतेषु सवपु यदुमुख्येषु संसदि । 
प्रावृत्तिका नराः प्राहुः पार्थिवात्ययिकं वचः ॥ ३ ॥ 

समस्त प्रधान यादर्वके उस सभामि आ जानेपर वे 
समाचार या सन्देश नेवल मनुष्य राजार्ओकि विनाराका 
केगरणभूत वचन इस प्रकार बरोले-) ३ ॥ 


जनार्दन नरेन्द्राणां पार्थिवानां समागमः । 
भविष्यति क्षितीनां समूढानामनेकराः ॥ ७ ॥ 
प्जनादन ! अनेक देरोकि विवाहाथीं प्रथ्वीपतियो, शासको 
एवं नरेशेका समागम होनेवाल्य ३ ॥ ४ ॥ 
त्वरितास्तज्न गच्छन्ति नानाजनपदेश्वराः । 
कुण्डिने पुण्डरीकश्च भोजपु्स्य शासनात्‌॥ ५ ॥ 
भकमलनेयन | भोजपत्र सक्मीका निमन्वण पाकर अनेक 
अनपरदोके राजा बड़ी उत्तावलीके साथ वरह कुण्डिनपुस्मे जा 
रदेद॥५॥ 
रकां स कथास्तत्र श्रुयन्ते मुजेरिताः। 
रूक्रिमिणी किङ नामास्ति रुपिमिणः प्रथमा खसा॥ ६॥ 
भावी खयंवरस्तघ्र तस्याः किर जनादन 
दत्य्थमेते सबला गच्छन्ति मयुजाधिपाः ॥ ७ ॥ 
, (जनार्दन ! वर्ह ठोगोके सहसे यह वात स्यष्टरूपसे 
खुनी जाती है कि स्क्मीकी जो पहली बहन है, जिसका नाम 
सक्मिणी है, उसका वरहो सखयंवर हेनेवाल है । इसीष्यि ये 
नरेशागण सेनाओखदित वो पधार रहे दै ॥ ६-७ ॥ 
तस्याखेरोक्यसुन्दयीस्ततीये ऽहनि यादव । 
ङपमभूषणभूषिण्या भविष्यति सखयंवरः ॥ ८ ॥ 


यदुनन्दन { आजसे तीसरे: दिन सुव्ण॑मय आभूष्ेति 
विभूषित रहमेवाखी उस चिरोकसुन्दरी ' खक्मिणीका सर्वर 
होमा ॥ ८ ॥ 
राक्षां तज समेतानां हस्त्यश्वरथमामिनाम्‌ । 
द्रश््यामः रातरशस्तत्र शिबिराणि महात्मनाम्‌ ॥ ९ ॥ 
थी, घोडे भौर रथसे यात्रा करके वर्ह एकत्र दु 
महामनखी नरेशोके सेकड़ों शिविर हमे वद देखनेको मिदेगे॥ 


सिहशादुंखदप्तानां  मत्तद्धिरद्गामिनाम्‌ । 
सदा युद्धभ्रियाणां हि परस्परममषिणाम्‌ ॥ ९० ॥ 
जयाय शं सिता वलोध्रेन समन्विताः । 
निरुद्धाः पृथिवीपााः किमेकान्तच्चय वयम्‌ । 
निरुत्साहा भविष्यामो गच्छामो यदुनन्दन ॥ ११ ॥ 
धजो सिंह ओर वाधक समान अपने बख्के घमण्डमे भरे 
रहते दै, मतवले हाथिरयोके समान चलते दै, सदा युद्धते ही 
मेम रखते दै भौर आपस्मे एक दूसरेके प्रति अमर्ष॑ते भरे 


रहते है, देते नरेोपर शीघ्र विजय पानके ल्य बहुत-से 


भूपार अपने सैन्यसमूहके साथ संगठित होकर वर्ह रुकिमिणी- 
को पानेकी इच्छासे रुके हुए द । यदुनन्दन ¡ क्या हमलोग 
एकान्तमे रहनेवाछे कोल-भील है, ज .ेसे अवसरपर उत्साह- 
हीन दो वैठे रगे, हम भी अवश्य उत्साहपूर्वक वर्ह चलेगेः ॥ 
श्रुत्वेतत्‌ केशवो वाक्यं हदि शाल्थमिवापितम्‌ । 
निर्जगाम ` यदुश्रेष्ठो यदूनां संहितो वैः ॥ १२॥ 
यह समाचार सुनकर श्रीकृष्णको एेषा ल्गा, जैसे उनके 
ह्दयमे ्रिसीने कयि-सा चुभो दिया दो | वे यदुश्रेष्ठ गोविन्द 
यदु वंरियोकी सेनाके साथ नगरते बाहर निकटे ॥ १२ ॥ 
यादघास्ते वलोदय्राः सवे सं्रामलाखसाः। 
निर्ययुः स्यन्दनवरैर्गविंताखिददरा दव ॥ १३॥ 
वे समस्त यादव, जो वर्मे वदे-चदे ये ओर संमरामकी 
सरसा रखते ये, श्रेष्ट रथोदारा यााके ल्यि. निकले । उस 
समय वे गर्वलि देवताभोके सभान जान पड़ते थे ॥ १३॥ 
वाग्रेण नियुक्तेन इरिरीशानखम्मतः। ` 
चक्रोदयतकरः छृष्णो गदापाणिन्यंसेचत ॥ १४॥ 
अपनी आक्चाकरे अनुसार चल्नेवाली श्रेष्ठ सेनक्रे साथ 
यान्राके च्यि उद्यत दुष्ट भगवान्‌ श्रीङष्णः जो दिवजीके 


परम प्रिय है, एक हाथमे चक्र ओर दुसरेमे सदा च्वि बड़ी 
शोभापारदेये॥ १५४॥ 


२९९ ` भीम्ाभारते क्िलभागे [ हरि्षदी 
यदबाध्ापरे तत्र वासुदेवाञ्ुयायिनः। 'दूसर्यको मान देनेवाछे तात ! मते दी हमलोग सनाथ 
रथैरादित्यसंकादः किद्धिणीप्रतिनादितैः ॥ १५॥ दै। दम्दारे वाहुब्का आशय लेकर दम नर्क तो वात 


दूसरे यादव भी सूर्ये समान तेजसी तथा ओेरी-छोटी 
ण्टयिकि नादे निनादित स्थौद्रारा भगवान्‌ वाडुदेवके 
पीपी बहो जानेको उत हुए ॥ १५॥ 
उग्रसेनं त गोविन्दः श्राह निश्ितदुर्शनः। 
तिष्ठ त्वं चपल राजा मे सहितोऽनघ ॥ १६॥ 
उस समय निश्चित दृष्टि रखनेबले भगत्रान्‌ गोविन्दने 
राजा उग्रतेनसे कदा-- "अनष | वृरपश्ेष्ठ | आप मेरे वदे 
भाई वर्रयामजीके साथ यदीं रहिये ॥ १६ ॥ 
क्षत्त्रिया विङ्तिप्रशषाः शाख्रनिच्ितददोनाः । 
पुय शुन्यामिमां वीर जघन्येऽभिपतन्ति द ॥ १७ ॥ 
ध्वीर | प्रायः क्षत्रिय छल-कपटमे चतुर होते दै, उनकी 
दृष्टि राजनीतितक दी सीमित रहती दै ¦ कदी ेष नष्टो 
कि वे मेरे जनेके पश्चात्‌ इस पुरीको सूनी समश्चकर ईसपर 
आक्रमण करदं ॥ १७ ॥ 
अस्मार्क शङ्किताः सर्वे जणसंभवशादुगाः । 
मोदन्ते शखुखिनस्तश्र देवटोके यथामराः ॥ १८ ॥ 
शहमते शङ्कित दो वे सव-के सत्र जराषंधके वशवर्ती हो 
गये है भीर देवरोकमे निवास कसनेवले देवता्थकी भति 
वे जरासंधके र्दा वरदे युख ओर आनन्दे रहते 
दै ॥ १८ ॥ 
सैश्चम्पायन उवाच 
तस्य तद्‌ वचनं श्युत्वा भोजराजो महायश्ताः। 
कृप्णस्नेदेन विषृतं वभापे वचनात्‌ ॥ १९॥ 
वेशाम्पायनजी कंते है--जनमेजय ! श्रीङृप्णकी 
वह्‌ बात सुनकर महायशषस्वी भोजराज उग्रसेन उनके स्नेष्से 
गदगद हुई अमृतमय वार्ण बोले ॥ १९ ॥ 
कृष्ण ङइष्ण महावाहो यदूनां नन्विवद्ध॑न । 
श्रुयतां यदहं त्वद्य वक्ष्यामि रियुखूदन ॥ २०॥ 
कृष्णं [ ङृप्ण {{ महावाहो [[] ठम यादवोका अनन्द 
वदानेवाले हो । शत्ुमूदन { इस समय म ठमसे जो कुद कहता 
हः उसको चुनो ॥ २० ॥ 
त्वया विहीनाः सर सन शक्ताः खुखमासिवुम्‌ । 
पुरेऽस्मिन्‌ विषयान्ते वा पतिष्टीना ष लियः ॥ २१॥ 
वुम्हयारे व्रिना हम सय छोग इस नगर या राज्यमे 
इससे नष्टौ र्ट सकते, ठीक उखी तरह जैसे पतिहीन सियो 
कटं भी सुखसे नहीं रह पाती है ॥ २१॥ 
त्वत्सनाथा चर्यं तात त्वद्ाष्टुवटमाध्िताः । 
विभीमो न नरेन्द्राणां सेद्द्राणामपि मानद्‌ ॥ २२॥ 


ही कथा है ? देषेन्द्रसदित देवताओं भी नहीं उसते ई ॥२२॥ 

विजयाय यदुश्रेष्ठ यश्च॒ यत्न गमिष्यसि । 

तन्न त्वं सदहितोऽखाभिर्गच्डेथा यादृवर्पभ ॥ २३॥ 
पयदुशरष्ठ | यादवप्रवर | तुम विजयक्रे लि अह-ज्दो 

मी जाओ, वर्ह हम लोगेकि साथ दी चलो, ॥ २२॥ 


तस्य राक्षो घचः श्रुत्वा ससितं देवकीसुतः । 
यथेष्टं भवतामद्य तथा कतौरूम्यसंदायम्‌ ॥ २४ ॥ 
राजा उय्रसेनका यह वचन सुनकर देवकीनन्दन श्रीङप्ण 
मुस्करति दृण वोक्तेः (दासन | आप लेोर्गोकी जैवी षच्डा 
होगी, वैसा ष्टी म करल दस्मे संशय नही ३ ॥ २४॥ 
कैद्नम्णयन ठव।च 
पवसुफत्वा तु बे कृष्णो जगामाद्यु रथेन वे । 
भीष्मकस्य गरदं प्रासो खोदितायति भास्करे ॥ २५॥ 
वेश्म्पायनजी कते है--जनमेजय ! एेसा कदकर 
शरीकप्ण शीर ष्टी रथे चल दिये जीर मूर्यका रग खाल हेते 
राजा मीष्मकके घरपर जा पर्हुचे \ २५॥ 
प्राते राजसमाजे ठ हिविराकी्णभूतले । 
रङ़ सुविपुलं रष्ट्र राजसी तनुमाविश्यव्‌ ॥ २६॥ 
राजाओंका समाज आ चुका था। उनके रिविरोसे 
कुण्डिनपुरे आस-पासका भूभाग अच्छदित हो गया था। 
स्वयंवरका रद्धखल मी वहत विस्तृत था] उसे देखकर 
भगवान्‌ श्रीकरष्णने राजस प्रकृतिक्रा आश्रय चवा ॥ २६ ॥ 


वि्नासनाथ भूपानां प्रकाद्ाथं पुरातनम्‌। 
मनसा चिन्तयामास वैनतेयं महावरम्‌ ॥ २७॥ 
उन्दनि सजा्ओकरो उरा ओर अपने प्रभावको प्रकारित 
करनेके व्यि पुरातन वाहन महावखी विनतानन्दन गरडका 
मन-ही-मन चिन्तन करिया | २७ ॥ 
ततश्चिन्तितमा्नस्तु विदित्वा विनतात्मजः । 
सुखलक््यं चपुः कृत्वा निलिल्ये केदावान्तिके ॥ २८ ॥ 
उनके चिन्तन करनेमाचसे ही उनके मनोमाबको जान- 
कर विनताकुमार गण्ड सुखपूर्धक देखने योग्य सौम्य शरीर 
धारण करके भ्रीकृप्णके पास चे हुए अये ॥ २८ ॥ 
तस्य॒ पक्षनिपातेन पवनोद्धान्तकारिणा । 
कम्पिता मनुजाः सर्वं न्युञ्जाश्च पतिता भुवि ॥ २९॥ 
उनका पंलसंचालनं वायुको भी उद्भ्रान्त कर देनेवाल 
था | इतकी एवा ठगनेसे वकि सारे मतुम्य कोप उठे ओर 
ओधि केकर प्रथ्वीपर भिर पडे ॥ २९ ॥ 
गरुडाभिहताः सवं पचेष्न्तो यथोरगाः । 
तान संनिपेतितान्‌ ष्ट रष्णो गिरिरिवाचरः॥ २० ॥ 


| विष्णुपर्व 1] | सक्ष्च त्वारिदोऽध्यायः ३९३ 


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स॒ तदा पक्षवातेन मेने पतगसत्तमम्‌ । - श्रीकृष्ण उवाच 

गरुडे वेगसे आहत होकर प्रध्वीपर गिरे हु वे सारे खागत खेचरश्रेष्ठ खलम । ९७ । 
मनुप्य सपौकि समान छटपयने रमो । उन सवरको भिरा हुमा विनताटदयानन्द्‌ स्वागत कि वपि !९०॥ 
देख पर्वतके समान अविचर मावसे खड़े हुए श्रीकृप्णने उस श्रीङ्ष्ण वोठे--आकाशचारियं भष ग्ड 
समय पद्की हवासे ही यह अनुमान कर ल्या किं पक्षियौमे दउम्दाया स्वागत है] देव्वेनके शरघ्रुओका मदेन करनेवा 
शरेष्ठ गख्ड़ आ गये (फिर उन्दनि मन-ही-मन उनका आद्र केशवगप्रिय विनतानन्दन | तम्हास स्वागत दै॥ ३७॥ 


=-= 


किया) ॥ ३०९ ॥ रज पचनस्थश्रेष्ठ कैशिकस्य निवेशनम्‌। 
दद्धं गरूडं धातं ॑दिव्यखरगवुेपनम्‌ ॥ ३९ ॥ वयं तत्रैव गत्वाय परतीक्षाम खयं षरम्‌ ॥ ३८ ॥ 
पक्षवातेन पृथिवी चालयन्तं सुदुः । पंस ही जिनका रथ है, उन पक्षियों ससे श्रेष्ठ गख्ड्‌ | 


थोड़ी देरमे ह उन्दोने देखा, गर्‌ आ पहुचे बै ठम राजा कैशिक भवनमे चलो ¡ हम आन वहीं चलकर 
दिव्य पुप्पोके हार ओर दिव्य चन्दनसे अलंकृत ये । वे स्व्यवरकी भ्रतीक्षा करं | ३८ ॥ 
अपने पंखेकि संचाखनसे उखी हुई वायुके द्वारा प्रथ्वीको मी रा तत्न समेतानां हस्त्यश्वरथगामिनाम्‌ । 


वारंवार हिला देते ये ॥ ३१६ ॥ दरक््यामः शतद्यास्तज्र समेतानां महात्मनाम्‌ ॥ ३९ ॥ 

९. थौं सेकडों टु 

पृष्ठासक्तः परहरणेदटिद्यन्वमिवोरमैः ॥ ३२ ॥ वरहो हाथी, घोड़े ओर रथोदारा यात्रा करनेवाले सेक 

वैष्णवं ्स्तसदेषं भन्यमानमवाड््रलम्‌ । महामनस्वी नरे एकच हुए हैः जिनका हमे दन प्रा 
= होगा ॥ ३९ ॥ 


पृष्ठभागे कुह दिव्य अधयुधस्टे हुए ये, जिनसे अ ५ 
रसा उनके षठमाग कि दि प उन = दे ] वे एवमुक्त्वा मदावाहुवैनतेयं महावटम्‌ । 
५ नान प्ता णा 0 कटं स ^ जगामाथ पुरं ष्णः कैशिकस्य महान्मनः ॥ ४० ॥ 
मुह नीचे कि मन-दी-मन अतुभव कररहे- थे किं सुने वेनतेयसखः श्रीमान्‌ यादवै यैः ] 
४ +, वें : श्रीमान्‌ यादवेश्च महारथः 
भगवान्‌ विष्णु वरद हस्तक स्पशं प्राप्त हो रहा दै।२२३॥ महावरी विनतानन्दन.गरुडसे एेसा कहकर महावा 
चर्यः भकः हेमपतेरुपवितं न्तं पाण्डुरं भोगिनां चरम्‌ ॥ ३३॥ श्रीमान्‌ कृष्ण गर्द तथा महारथी “दवे साथ महामना 
देमपन्रैरुपचितं घातुमन्तमिवाचखम्‌ । कैरिककी राजधानी कुण्डिनपुरमे गये ॥ ५०३ ॥ 
ङ्य ल दोनो नेषि एक तथ समको सचि लि विदर्भनगरीं प्राप्ते कष्णे देवकिनन्दने ॥ ४१॥ 
आरहेयेः जिस्कारंग शेत था। वे सुवर्णमयं पंखों हृ „ = , 
॥ र्यत छाः प्रसुदिताः सवे निवासरयोपचक्रमुः। 
सम्पन्न होनेके कारण विविध धाठतुअसि युक्त पर्वतके समान ट सुदि ल 


सव शखरायुधधरा राजानो वलशालिनः ॥ ४२ ॥ 
प्रतीत होते थे ॥ ३३१ ॥ नन्दन विदर्मनगरमे प 
इतीर द्विजिहेन देवकीनन्दन शरीकृष्णके विदर्भनगसमै पर्हुच जनेपर 
असरतारम्भ नद्रविनारानम्‌ ॥ ३४ ॥ 


उनक्रे साथक्रे सत्र रोग बडे प्रसन्न हुए } स्के मनमे वड़ा - 


स ५ | [| 
जासन दैत्यसंघानां वाहनं ध्वजलक्षणम्‌ 1 हषं हुआ । वे समस्त बलशाली तथा अच्न-श्जधारी राजपूत 


येवे ही गरुड़ थे, जिन्देनि एक वार अमृतका अपहरण बहौ ठहसनेकी तैयासौ करने स्ये ॥ ४१-४२ ॥ 
कर ल्याथा। वे वङचे सर्प॑रा्जीका विनाश करनेमे वैसनस्पायन उवाच 
समर्थ दैतयसमूर्होको भयभीत करनेवारे तथा भगवान्‌ विष्णु. पतस्मिन्नेव काके तु राजा नयविशारदः । 
के ध्वजचिह एवं वादन ये ॥ ३५४९ ॥ कैरिकस्तत उत्थाय श्रहष्टेनान्तरात्मना ॥ ४३ ॥ 
च १ 1 (1 [<| $ नं द्त्वा छः ।4 
तं दष्टा स ध्वजे परां सचिवं साम्परायिकम्‌ ॥ ३५ ॥ अध्यमाचमन दत्वा स राजा केशिकः खयम्‌ । 
धृतिमन्तं गरुत्मन्तं जगाद मधुसूदनः ! स्त्य विभिचत्‌ इष्ण पुर सम्म्रवेशयच्‌ ॥ ४७॥ 
दष्टा प्ररमसष्ठः स्थितं देवमिवापरम्‌ । वेशम्पायनजी कते है--जनमेजय ! इसी समय 
तुल्यखामथ्यैया वाचा गरुत्मन्तमवस्थितम्‌ ॥ ३६ ॥ नीतिविदारद राजा कैशिक मसन्नविततध उठकर ख्यं दी 
सककालक र्वान्‌ श्ीङकष्णके पास गये ओर उन अर्यः आचमन आदि देकर 
अपने ध्वजः सचिव तथा संः साथी धैयंवान्‌ ¢ गस ठ 
विधिपूवक सत्करार करके अपने नगरमे ले अयि ॥ ४३-४४५॥ 
गर्ड्को आया देख मगवान्‌ मधुसूदनको वडा हर्षं हुमा । कारितं 
वे दूसरे देवताकी भति सामने खड़े थे । इस प्रकार सम्मुख पू्ैमेव ल्‌ कृष्णाय कारितं दिव्यमन्द्रम्‌।___ ठ छष्णाय दिव्यमन्द्रिम्‌ । 


---------~- 
उपस्ित हुए गरुडुसे अपने समान शक्तिशालिनी बाणीदारा १. ये राजा कैडिक विदर्भराज भीष्मकके पिता तथा रुवमीके 
मधुसूदनने इस धकार कदा ॥ ३५-३६ ॥ पितामह ये 1 


३९४ 


ध्रीमहाभा त्ते सिकमगि 


[ दरिं 


विवेदा सब्रः श्रीमान्‌ कैखासं श्षंकये यथा ॥ ४५॥ 

उरन्दोनिं श्रीहष्णके ल्थि पहल्से दी एक दिव्य भवनकरा 
निर्माण करा रखा था | जे भगवान्‌ शंकर कैलासधाममे 
जाते ईः उसी प्रकार श्रीमान्‌ कृष्ने अपनी सेनाकरे साथ 
कैयिकके उस भवनम प्रवेदा क्रिया ॥ ४५ ॥ 


खाद्यपान।दिरललोैरचितो बासवानुजः। 


= -------------~------------------------ ˆ~ 


खखेन उपितः कृष्णस्तस्य राक्ष निवेदने । 
पूजित वहुमानेन स्मेदपूर्णन. चेतसा ५ ४६॥ 


इन्दरके छोटे भाई शीदरष्ण उस राजमदहल्मे खान-पान आदि- 
से एवं रल-रपिर्योदयास भलीरभोति पूनित दो शखपूरवक 
रहने रगे । राजा केशिकने बडे ही तम्मानके साथ स्नेदपूण 
छदयते उनका धूजन क्रिया था ॥ ४६ ॥ ` 


इति श्रीमहाभारते खिलमागे हतं विष्णुपर्वणि सकिंमणीसयंवरे सक्तचत्वारिदोऽध्यायः ॥ ४७ ॥ 


इ प्रकार श्रीमहाभाप्तके िरुभाग दरक भन्तम॑त विप्णुपममे सकिमणी स्वयवरविषयक सता ईस; अध्याय पुर हज ॥ ८७ ॥ 


-- "नभ 


ल ~~ 


अष्ट्वतारिरोऽध्यायः 
भरीकृप्णके आगमनसे चिन्तित हुए राजाओंकी सभाम जरासंध ओर सुनीथका भाषण 


वैशम्पायन उवाच 
ते छृष्णमागतं दृष्टा वैनतेयसदहादगरुतम्‌ । 
वभूुश्चिन्तयावि्ठः सवं खेपतिसत्तमाः ॥ १ ॥ 
वेशम्पायनजी क्ते है--जनमेजय ¡ अपनी महिमा- 
से कभी च्युत न होनेवठे श्रीकृप्णको गरुडे साथ आया 
देख समी शरेष्ठ नरपति चिन्तामगन दो गये ॥ १ ॥ 


ते समेत्य खभां रजन्‌ राजानो भीमविक्रमाः । 
मन्वाय मन्जङुराखा नीतिराखार्थवित्तमाः ॥ २ ॥ 
राजन्‌ ! वे भयानके पराक्रमी राना नीति-शाख्फे भी 
अच्छे ज्ञाता तथा मन्त्रणा करने कुशल ये ¡ उन्दनि परस्पर 
मन्नणा कसनेके स्यि एक सभामे एकच होनेका विचार 
किया | २॥ 
भीष्मकस्य सभां गत्वा रम्यां हेमपरिष्कताम्‌ । 
सिद्यसनेषु चिभेषु विचिजास्तरणेषु च। 
निपेदुस्ते चप देवा देवसभामिव ॥ २ ॥ 
फिर जेषे देवता देवस्मामे विराजमान दोते ह, उखी 
प्रकार वे श्रेष्ठ नरेशगण राजा भीप्मककी सुवर्णभूपित रमणीय 
समामे जकक्रर विचि.विद्छौनोे युक्त मोति-भोतिके सिंहासन 
पर्‌ वेढे ॥ ३॥ 
तेपां मध्ये महावाद्ु्ज॑ससंधे महावलः । 
वभाषे स महातेजा देवान्‌ देवेश्यरो यथ( ॥ £ ॥ 
उनके वीचमे मदावरटीः महातेजखी ओर महाबाहु 
जयसंधमे उसी तरह भाषण देना आरम्भ क्रिया; जैसे देवराज 
इन्द्र देवता्योके समध प्रवचन करते द ॥ ४ ॥ 
जरासंध उवाच 
श्रूयतां भो सपशर भीप्मक्श्च मदामतिः। 


कथ्यमानं मया बुद्धा वचनं वदतां वराः ॥ ५ ॥ 


जसासंध वोल(--इस समामे उपसित हुए. वक्ता्मि 


रष नेयो ! में यर्दो अपनी बुद्धिके अनुसार जो ऊख कदं 
रा दहर उसे आपटोग तथा परम बुद्धिमान्‌ राजा भीष्पक्र 
भी घुने ।॥ ५॥ 
योऽसौ छरप्ण इति ख्यातो वसुदेवसुतो वी । 
वैनतेयसदायन सम्प्राप्तः दण्डिनं त्विह ॥ ६ ॥ 
कन्यहेतोर्मदातेजा : याद्वैरभिसंबृतः 
अवद्यं रुते यत्नं कन्यावाप्तियंधा भवेत्‌ ॥ ७ ॥ 
वे जो श्रीकृप्ण नामस विख्यात वख्वान्‌ वमुदेवपुत्र इस 
कुण्डिन पुरम गण्डके साय पधरि ददै, वड तेजखी ई 1 यर्होकी 
राजकन्याको प्रात करनेके चि ही वे यादवेसि धिरे हुए यदो 
तक अवि ह । जिक्त तरद भी कन्याकी प्राति हो स्के कैसा 
ग्रयल वे अवद्य करेगे ॥ ६-७ ॥ 
यद्‌ कारणं कायं सुनयोपेतयद्धितम्‌ । 
इरुष्वं गपशादुखा विनिश्चित्य वलावलम्‌ ॥ ८ ॥ 
श्रेष्ठ नरपतियो ! यरो जो सुनीतिसे युक्त तथा समृद्धिका 
हेठभूत कारण ८ उपाय ) कामम खने योग है, उसे अपने 
बलवख्का विचार करके आपठोग करं ॥ ८ ॥ 
पद्‌तिनौ मदावीयो वसुदेवसुतावुभौ । 
वैनतेयं विना तस्मिन्‌ गोमन्ते पर्वतोत्तमे । 
कृतवन्तौ महाघोरं भवद्धिर्विदितं हि तत्‌ ॥ २ ॥ 
वसुदेवके ये दोनों पुत्र महान्‌ पराक्रमी दै।ये रोग 
पर्वतेमिं शरेष्ठ गोमन्तपर गर्डको साथ ल्थि विना पैदल दी 
अयिथेःतो मी इन्देनि जो घोर महायुद्ध किया थाः वह 
आपलेर्गोको विदित ही रै ॥ ९॥ 
वृप्णिभियीद्वैदचेव भोजान्धकमदहास्थैः । 
समेत्य युद्धयम।नस्य कीटशो विम्रहो भवेत्‌ ॥ १० ॥ 
इस समय जत्र ये यदुर्व्ीः दृणिरवंशीः भोजवंशी तथा 
अन्धकवंखी महारथि्योके साथ मिलकर युद्ध करेगे, तव इनका 


। | विष्णुपर्व ] 


अ्टचत्वारिदोे ऽध्यायः 


३९५ 


° [र 


न्न्य वयव वव 


संग्राम कैसा होगा--८ यह आपलोग स्वयं अनुमान कर 

सकते है )॥१०॥ ` 

कन्यार्थे यततानेन गर्डस्थेन विष्णुना । 

कः स्थास्यति रणे तस्मिन्नपि शकरः सुरे; सह ॥ १९॥ 
राजकरन्याके च्वि यत्न करते हए इन ॒गख्डवाहन 

भगवान्‌ विष्णुरे सोथ युद्धे देवताओसदित इन्द्र दी क्यो न 

हो, कोन उहर सकेगा ॥ ११ ॥ 

यदा चास्मै नापि सुता कदाचित्‌ सम्प्रदीयते 1 

ततो ह्ययं बलरदेनां नेतुं शक्तः खुरः सह ॥ १२॥ 
यदि कदाचित्‌ इन्दे कन्या न मी दी जायतोये 


देवता्ओके साथ उपसि हो वलपूर्वंक दे ठे जनेमे समर्थं 


पुरा पकाणेवे धोरे श्रूयते मेदिनी त्वियम्‌ । 
पातालतरुसम्म्ा विष्णुना प्रभविष्णुना ॥ १३॥ 
वाराहं रूपमास्थाय उद्धता जगदादिना । 
हिरण्याक्षश्च दैत्येन्द्रो वराहेण निपातितः ॥ १४॥ 

सुना जातादैकि प्राचीन काछ्मे यह परथ्वी भयंकर 
एकार्णवमे निमग्न हो रतातल्मे जा पर्हुची थी । उस समय्र जगते 
आदि कारण इन्दीं प्रभावी विष्णुने वारादरू्प धारण 
करके इसका उद्धार किया था ! उस समय दैत्यराज दहिरण्या्न- 
को मी वारादरूपसे ह मार गिराया था ॥ १३-१४॥ 


हिरण्यकशिपुश्चैव म्ावरूपरक्रमः। 
अवध्यो ऽमरहैत्यानासृषिगन्धर्वंकिन्नरेः ॥ १५ ॥ 
यक्राक्षसनागानां नाकाशे नावनिस्थसे 1 
न चाभ्यन्तरराञ्यहोनं दुष्केणार्द्रकेण च ॥ १६ ॥ 
महान्‌ वल ओर पराक्रमसे सम्परनन दैत्यराज दिरण्यकरिपु 
देवताओं ओर दै्योके व्यि भी अवध्य था । करूषि; गन्धर्व 
ओर किन्नर भी उसे मार नदीं सकते थे | यक्नः राक्षस 
ओर नागे स्यि मी वह अजेय था । वह नतो आकाश 
मर सकता थाः न प्रथ्वीपर । न रातमे न दिनम ओरन 
सूखे अल्रसे न गीठे अश्रसे ही ॥ १५-१६ ॥ 
अवध्यसिघु रोके दैत्येन्दरस्त्वपराजितः। 
नरस््िन रूपेण निहतो विष्णुना पुरा ॥ १७॥ 
तीनो ठोकोमे अवध्य वह्‌ दैत्यराज किंसीसे पराजित 
होनेवात्म नदीं था, तो भी पूरवक्राख्मे भगवान्‌ विष्णुने 
नरसिंदरूमर धारण करे उमे सार उद्यम ॥ १७ ॥ 
वामनेन तु रूपेण कदयपस्यात्मजो वी । 
अदित्या गभंसम्भूतो वखि्चंद्धोऽखरोत्तमः ॥ १८ ॥ 
सत्यरज्ज्ुमयेः पादैः कतः पातालसंश्रयः । 


फिर किसी समय वलवान्‌ विष्णु महर्पि कदयपके पुत्र. , 


रूपमे देवी अदितिके गर्भसे प्रकट हुए । उस समय उरन्होनि 
वामनरूप धारण करके असुरसज व्रलिको सत्यकी रस्सीसे 


वनय गये पूडोद्याय बोध ल्या ओर उसे पाताटलोकका 
निवासी वना दिया ॥ १८ ॥ 


कार्तवीयो महावीयैः सहसखभुजविग्रह; ॥ १९ ॥ 

दत्ताप्ेयप्रसादेन मत्तो राज्यमदेन च । 
कृतवीरयका पु महापराक्रमी-अर्जुनका सरीर दत्तात्ेयजी- 

की कृपासे सदख भरुजाओंसि सुशोभित होता था । बह राच्यः 

मदसे उन्मत्त हो गयाथा॥ १९१ ॥ 

जामद्रत्यो महातेजा रेणुकागभंसंभषः ॥ २० ॥ 

अेताद्वापरयोः संधौ रामः शखभरेतां वरः । 

( उसके दमने लियि भगवान्‌ विष्णु ) वेता ओर 
ह्वापर्की सन्धिकरे समय रेणुकाके गभे प्रकट हुए । वे गलन 
धारियोमि श्रेष्ठ महतेजस्वी जमदग्निक्ुमार परश्चरामके नामसे 
प्रहिद्ध हुए ॥ २०३ ॥ 
पुना ` बच्रकरर्पेन सप्तद्वीपेश्वयो चपः 
विष्णुना निहतो भूयः छद्यरूपेण हैहयः ॥ २१ ॥ 

इष तरह पुनः चदूमरूपधारी भगवान्‌ विष्णुने देहय- 
वंशमे उन्न राजा कार्तवीर्यकोः जो सातो द्वीपोका स्वामी थाः 
अपने वच्तल्य फरसेसे मार डाला ॥ २१॥ 
दक््वाङ्कुरुसम्भूतो रामो दाशरथिः पुरा । 
त्रिखोकविजयं वीरं रावणं संन्यपातयत्‌ ॥ २२॥ 

तत्पश्चात्‌ वे इस्वाकु-ढुखमे दशरथनन्दन शओीरामके 
रूपमे प्रकट हुए । उन्होने पूर्वंकालमे तिलोकविजयी वीर 
रावणक्रो मार गिराया था ॥ २२॥ 
पुरा कृतयुगे विष्णुः संप्रामे तारकामये । 
वोडश्द्धभुजो भूत्वा गरुडस्थो हि वीर्यवान्‌ ॥ २३॥ 
निजघानाखुरान्‌ युद्धे वरदानेन गर्विंतान्‌ । 
कालनेमिश्च दैतेयो देवानां च भयप्रदः ॥ २४ ॥ 

भाचीन काठक बात है--सत्ययुगमे जब तारकामय संग्राम 
हुआ थाः उस समय पराक्रमी विष्णु आर भुजाओंसे युक्त 
हो गख्डपर बैठकर वर्ह पधरि । वर्हौ उन्दने वरदानसे 
गवित हए असुरौको युद्धमे मार डाला तथा देवतार्ओको भय 
देनेवले कालनेमि नामक दैत्यका मी वध कर दिया॥२२-२५॥ 
खदश्नक्रिरणाभेन चक्रेण निहतो युधि । 
महायोगवलेनाजौ बिश्वरूपेण विष्णुना ॥ २५॥ 

सम्पूण विश्व जिनका रूप है, उन मगवान्‌ विष्णुने 

युद्धम महान्‌ योगवरल्ते सूर्य-तुल्य तेजसी चक्रदवारा उस दैत्य 
का संहार क्रिया था | २५॥ 
अनेन प्राप्तकराखास्ते निहता वोऽसुराः 


चने वनचरा दैत्या महावरूपराक्रमाः ॥ २६ ॥ 
निहता वालभावेन भरलस्बारिष्टधेलुकाः । 


२९.६ 


दन धीकृष्णने एमे ब्हुत-ये अघ्ुर्यको मार दाग १, 
जिनका काठ आ पचा था | वनम विचगनेषारे गषटान्‌ व्रल 
ओर पराक्रमसे सम्प प्रलभ्य ओर पेनुक नाम दैत्पौको 
षन्दोनि बाद्यावद्धं षी मनक भीर्‌ मार्‌ गिराया | २६९॥ 


शनी केदिनं चैव यमलार्युनकाघवि ॥ ७ ॥ 
नागं फूवलयापीडं वचाणृरं सुष्िकं तथा। 
फंखं च वलिनां धेष्ठं सगणं देवकीसुतः ॥ २८॥ 
न्यहनद्‌ गोपवेपेण फएीटमानो हि केद्ायः। 

पूतनाः केगी, यमलरुनः कुवल्यापीदट्‌ धथ, चाणृर 
मुष्टिक तथा नेचयार्नोमि धेट कसक भी उर्फ गर्णोषिति एन 
देवकीपुत्र केशयने न्ट कर दिया है | उस समयये गोपयैदर्भ 
फी फरते थे ॥ २७.२८१ ॥ 
प्वमादीनि दिव्यानि छष्ररूपाणि चक्रिणा ॥ २५ ॥ 
रतानि दिव्यरूपाणि विष्णुना प्रभगिष्णरुना । 

हन प्रभावशाटी चकारौ पिष्णुने ये तथा प्रीरभी दमी 
तरे शुत से दिव्य द्रर्प समय-ममयपर धार परिये ६॥ 
तेनाष्टं घः प्रवक्ष्यामि भवतां दितफास्यया ॥ २०॥ 
तं मन्ये केशवं विष्णुं सुरायमस्ुसन्तकम्‌ । 

सलि भ जप्टोगेफि दितिकी शच्छपे यद कष र पु 
कि धीफृष्ण देवताभक्रि आदि कारण एवं अमुरविनाफः 
विष्णु ६। र्ग उन्ररेणाष्द स्मसतारहू॥ ३०६॥ 


नारायणं जगद्योनिं पुराणं पुरपं धुवम्‌ ॥ ३१॥ 
स्रं सर्वभुतार्नां व्यक्ताव्यक्तं सनातनम्‌ । 
अध्य सर्वखोक्रानां सर्वलोकनमस्छतम्‌ ॥ ३२॥ 
अनादिमध्यनिधनं स्षरमक्षरमव्ययम्‌ । 
स्वयम्थुचमजं स्थाणुमजेयं सचराचरः ॥ १३॥ 
तनिविक्रमं धिलोकेद्षं भिददेन्द्रारसिनाद्यनम्‌ ! 

वे जगत्की उत्ति सानयूत पुराणपु अभिनादी 
मगवानू नारायण ६ । वैदी समस मूर्ती उषटि कृरनेवटे 
तथा व्यक्ताव्यत्तन्वरूप सनातन परमात्मा { । समरणं टोक़ 
मिलकर भी उन परजित नष्टौ कर सकत | सरा संम्नार्‌ 
उनके चरेम मकर धुकाता ट । बरे आदि, मध्य ओर 
अन्तसे रष्ित, षर ( सर्वभूतमय ); अक्षर ( नृय ) ओर 
अविकारी द| वे द स्वयंभू, भन्मा, सदा सिर रटने 
तथा चराचर प्राणियेकरे लिय अभे ६ | उर्न्हको म देचेन्धरके 
शलुर्भो्ा विनाणफ़ः त्रिलोकनाथः च्िविक्मरूपधारौ विष्णु 
मानता हं ॥ २३१-२३९ ॥ 
इति मे निश्चिता वुद्धिजौतो ऽयं मथुरामधि ॥ २४॥ 
कखे महति वै सां विपु चक्रवर्तिनाम्‌ । 
कथमन्यस्य मर्त्य॑स्य गरुडो वाहनं भवेत्‌ ॥ ३५ ॥ 

यदी मेशे बुद्धिका निश्वय दै ।येचिष्णु टौ मधुर 


भीमदाभास्ते सिटभागे 


[ दपि 


वर्ती गजान गष्मन्‌, पयं निधान कुरी प्रण द्रुपद । 
अन्यया दषे पिमा मनुष्या वान गयु कने ष्टो कते ६॥ 
विदोयेण तु पन्यां विक्छमस्थ जनादून। 
छः स्याम्यति पुमानद् गरटम्यध्रता वनद ॥३६॥ 
व्िसेवतः यथ भगवान्‌, सनारदून मजदन्याफी प्रानितरे 
द्यि पराम प्रकट परमप सुर यार्यैमेः सय पीन पसा 
पयान्‌ पयय जो श्नात्‌ गस्य सम्म शद प फ्रेगा। 
स्ययंवग्छनेनासी विष्णुः स्ययपिष्टानतः। 
पिष्णोसगमनं द॑व भान्‌ दोषः प्रकीर्तितः ॥ ३७ ॥ 
भवद्धिरयचिन्त्य् प्रियतां यश््नन्तरम्‌। 

म स्व्यवसे सि गात्‌ पिष्णु मर्ह पप ६। 
ध्यु आगमन दिपर्‌ मरे श्पि जो मष्न्‌, टप (राध) 
उपन्वित 2 उमे दनि दनाया] व पिम्येम मी दृण्र 
विर करैः आमिणोकुृ्ट सरना, पह फ । ३५३ ॥ 

शम्यायन उवाच 
प्यं पिद्रवमाणे तु मगधानां उनैम्थ्दे ॥३८१ 
स्ुनीयोदथ मद्दप्राणे पचनं चेदरमद्रवीत्‌ । 

येश्तम्पायनजी फटने {(--सनमेरय | मगपय 

राजा जव दम श्रम भोपमदे युतः तय मददुद्धिमान्‌ 
सुनीथने शख प्रर एटा ॥ ३८३ ॥ 

तुरीय उषाप 
सम्यगाह मदावाहुर्मगध्राधिधतिर्नेपः ॥ २९ ॥ 
समश्य नस्देयरानां यधानुचं यमदादवे। 
गोमन्ने समद्रष्णाम्यां छतं करम गुदुष्कस्म्‌ ॥ ४० ४ 

समध योट-प्तराष्‌ मगधयत टोट क्ये ६। 
मोमन्त पवतर समीर मप्तत्रमरमं उती पटना पटिति हद 
धी तथा दलराम शीर शीषप्णने मो अनयन्त नुष्कर्‌ स्म फर 
दिवाया धा, बु एन सान्र नैमनि अवनी अनि देवम 
या] ३९.५० ॥ 
गजाभ्वरथसम्याधा पिध्यलसमाफुःसा। 
निर्दुग्धा महती सेना चकलाद्भरवदिना ॥ ४६॥ 

ह्मथी, पोरे ओर्‌ रपेसि भरी तथा परस सीर घतः 
व्याप्त हर्‌ सयार्जोी वट धिगाल गेना नभर टम्पी 
निभे जक्कर भसष्े गयी] ४६॥ 
तेनायं मागधः श्रीमाननागतमचिन्तयत्‌ । 
रैवते सजसेनायामतुस्यत्य सुदारुणम्‌ ४ ४६॥ 
पदाल्योयुध्यतोस्तघ्र  वरकेशव्योयुभि । 
दुर्निबार्य॑तसे धोखे शभवद्‌ वादिनीक्षयः ॥ ४३ ॥ 

षए्सीलियि इन भीमान्‌ यगधेनीदाने लान भावौ परिणाम- 
फा विचार किया ् | राजार्जोकी सेनि जो अत्यन्त दारण 
धय्ना घटित षर थौ, उत्का सरण करफे ये इ समय 


~ 


| 
'विष्णुपवं ] 


पकोनपश्चाद्तचमो ऽध्यायः 


३९५७ ` 


ननन जजच्ज्-ज ज=-च===---------- 


उपर्युक्त बात कहं गये. । वरहो युद्धम वकयम जीर श्रीकृष्ण ` 
वैदल ही ल्डरदे-येः तो भी हमारी विशाल वादिनीका ेसा - 


प्रोर संहार हआ जिसे रोकना अव्यन्त कठिन हो गया 
था॥ ४२८५८द॥ ,; 

विदितं वः खुपणेस्य खागतस्य. सपोत्तमाः। 
पक्षवेगानिलेद्धता वश्चमुर्गगनेच राः ॥ ४४ ॥ 


श्रेष्ठ नरपतियो ¡ गख्ड़के अति समय यहा जो प्रभाव 
पड़ा था, उते आपटोग अच्छी तरह जानते द । उनके पंख. 
के वेगे जो वायु उडी थी, उरक्रा चोका खाकर आकार- 
वारी प्राणी चक्छर काटने लगे ये ॥ ४४ ॥ 
समुद्राः क्षुभिताः सवे चचालद्धिमेही सुदुः । 
वयं सवरं ससं्रस्ताः किमुत्पातेति विङ्कवाः,॥ ४५ ॥ 
तारे समुद्र क्षुन्ध हो उठे थे | पर्व॑त कोपने स्मो ओर 
धरती भी व्रार-वरार डोट्ने ठगी थी } हम स्तव स्ेग यह्‌ से- 
कर मयभीत एवं ग्याङ्कुक हौ गये ये किं यह कैसा उत्पात 
खड़ा हो गया | ४५॥ 
यद्‌ा संनह्य युध्येत आरूढः केशवः खगम्‌ । 
कथमसमद्विघः शक्तः प्रतिश्यतुं रणाजिरे ॥ ४६॥ 
अवे केराव कवच बोधकर गरुडकी पीठपर आरूढं दहो 
युद्ध करेगे, उस समय इमारेजैखा पुरुष समराङ्गणमे कैसे 
ठदर घकता है | ४६ ॥ 
रा्ञां स्वयंवये नाम सुमहान्‌ हषवर्धनः। 
कृतो नरवरैययैयैशोधर्मस्य वै विधिः ॥ ४७॥ 


ख्य॑वर राजाओंक च्थि महान्‌ आनन्दवर्धक उत्सव है। 
पर्वकाले शर नरन दस सुयश 'जीर धर्मश्री षिद्धिके य्य 
प्रचलित किया था | ४७ ॥ 
वं ठु ङण्डिनगरमासादयय मयजेक्मराः। 
पुनरेवेप्यते क्षिपं महापुरूषविग्र्म्‌ ॥ ४८ ॥," 
परंतु मनुजेश्वरो ] इस कुण्डिनपुरम आकर हमारे 
सामने पुनः शीघ्र ही महापुरुषके खथ महान्‌ युद्धका अवसर 
आनः चाहता है ॥ ४८ ॥ 
यदि सा चस्येदन्यं राक्षां मध्ये चृपात्मजा । 
छृष्णस्य भुजयोर्वीयं कः पुमान्‌ प्रसदिप्यति ॥ ४९ ॥ 
यदि राजकुमारी रुकिमणी राजाओंकरे वीचमे किसी दूसरे 
नेका व्रण कर ठे, तव कौन णेस पुरुष है-जो श्रीङृष्ण- 
की. भुजूओंका पराक्रम सह सकेगा | ४९ ॥ 
विक्ञापितमिदं दोषं स्वयंवरमरोत्सवे । 
तदर्थमागतः कृष्णो वयं चैव नराधिपाः ॥ ५०॥ 
इस स्वयं वर-महोत्सवमे यह्‌ युद्धकी सम्भावना ही महान्‌ 
दतोष है जिसे सूचित कर दिया गया | श्रीकृष्ण तथा हम 
सत्र नरेश भी खयंवरफे च्वि ही यहा पधारे ई ॥ ५० ॥ 
करष्णम्यागमनं चैव॒ मृपाणामतिगर्दितम्‌ 1 
कन्याहेतोनेरेन्द्राणां यथा बदति मागधः ॥ ५९ ॥ 
राजकन्याके उदेदयसे श्रीकरष्णका आगमन इम सव 
नरेशेकि स्थि अत्यन्त गर्हित सिद्ध शो रदा है--मैषा कि 
मगधराजका कथन है | ५१ ॥ 


इति श्रीमहाभारते विरुमगे हे चिष्णुपर्रणि सभ्मिगी ष्वयं बरे मागवसुनोथवाक्ये जष्टवस्वारिशोऽध्यायः ॥ ४८ ॥ 


इस प्रकार श्रीमहाभग्तके सिरभाग हथिंशके अन्तर्मत विष्णुप्व॑मे स्मिमणीस्वयंवसके प्रसंममे जरःसंध्‌ 
ओर शुनीथकरा भाषणविषयक अडतां सर्व अध्याय पूरा हुभा ॥ ४८ ॥ 


पकोनपञ्रत्तमोऽध्यायः 
दन्तवक्त्र ओर शास्यका भाषण सुनकर भीष्मकका श्रीकष्णके प्रभावका 
वर्णन करते हुए उम्हे प्रसन्न करनेका ही निश्चय करना 


वेद्यम्पायन उवाच 
इत्येवमुक्ते वचने सुनीथेन मदात्मना } 
करूषाधिपतिर्वीरो दन्तवक्नोऽभ्यभापत ॥ १॥ 

वेदाम्पायनजी कहते है--जनमेजय !} महामना 

सुनीथके एता कहनेपर करूपदेशके वीर राजा दन्तवक्तरने 
भाषण देना आरम्भ क्रिया ॥ १ ॥ 

द्न्तक्केतर उवाय 
यदुक्तं मागधेना् सखुनीथेन नराधिपाः। 
युक्तपूषमष्टं मन्ये यद्साकं वयो हितम्‌ ॥ २ ॥ 


दन्तवक्च वोला--राज्ञाओ { यहो मगधराजने ओर 
राजा सुनीथने जो कुछ कहा द, उसे यै युक्तिसंगत मानता हूः 
करयोकिं इनका प्रवचन दमलोगेकि च्थि हितकर दै ॥ २ ॥ 
न च - विद्धेषणेनाहं न॒ चाहंकारवादिना। 
न चान्मविजिगीयुत्वाद्‌ दूषयामि वचोऽस्रनम्‌॥ ३ ॥ 
मै न तो विद्धेषकरे कारणः न अहंकारवादी होनेके कारण 
जओर न अपनी बिजयकी अभिखषा रखनेके ष्टौ कारण आप 
दोनोके अमृतमय वचनो सदोष वता रषा हू ॥ २ ॥ 


४९८ 


धाक्याणवं महागाधं नीतिशासयार्थकृहितम्‌। 

क एप निविलं वकु" दातो वै राजसंसदि ॥ ४ ॥ 
षस राजतभार्भे दीन एेमा पुर्षे नो म प्रकार गगुटर- 

कफे समान अत्यन्त अगाध एवं नीतिशाछफे अनुकुट सर्वगुण- 

सम्पन्न वात कट्‌ सके | ४॥ 

कि स्वचुस्मरणार्यऽदं यद्‌ व्रवीमि णुष्व मे । 

आगतो वासुदेवेति किमाश्चयं नराधिपाः ॥ ५॥ 
परंतु आपरो्गोकि एक कततव्यकी याद्‌ दिखनेफे चि 

भ॑ज छु कष्टता दर मेरी यद गात सुन टीभ्ि । नरेश्वरो ! 

यदि वसुदेवनन्दन मगवान्‌ श्रीरूष्ण म्ह पधि ¢ तो दसम 


[२ 


आश्वर्यकी स्या बात द ॥ ५॥ 
यथाऽऽगता घयं सवे छणोऽपीद तथाऽऽगतः । 
किम दोपो गौण्यो चा कन्यदितोः समागताः ॥ ६ ॥ 
सैसे हम सव्र ठोग यट अयि ६, उसी तरद्‌ श्रीद्ष्ण मी 
चले अयि । द्म क्यादोवरे ओर क्यागुण। हम सव 
लोगोकि आगमन प्क षी उदूदेदय दै-राजकन्यापी मराति॥ 
यदस्माभिः समेत्यैश्यात्‌ छतं गोमन्तसोधनम्‌ । 
तत्र युद्धरुतं दोषं फथं व वकुम्ंय ॥ ७ ॥ 
हमल्येमेनि एक साय मिटफर अपम पक्ता स्यापि 
करफे जो गोमन्त पर्वतपर् पेया एटरण्या था) उत द्रम 
यदि वरदौ युद हुआ तो उसे अपदयेग दोप फैमे वत्ता र ६॥ 
वनवासे स्थितौ वीरौ कफंसव्यामोदरेतुना । 
देवर्पिवचनाद्‌ राजन्‌ ब्रनदूवनवै स्थिनौ ॥ < ॥ 
तावाषय वधार्थैन उर्भी रामजनार्दनौ । 
नागेनोरहीपितौ वीरौ इत्या नागं पिवेदतुः ॥ ९ ॥ 
ततः खवीयंमाध्ित्य निदतो स्द्रसागरे। 
गताघुरिवं चासीनो मघुरेद्यः सदानुगः ॥ १० ॥ 
किमच्र व्रिदिते दोषो येनासाभिवं मेऽधिङैः। 
उपरोधपसया राजन्‌ चयं सर्वे समागताः ॥ १९॥ 
राजन्‌ ! वीर व्द्याम ओर श्री्ष्ण फंयको मोम 
डालनेकरे वि दही चनवास कर रै ये| ब्रन्द्रावनके किनि 
रषटते थे; परतु देवपिं नाद कटमेते उन दोनो भार मेटराम 
ओर श्रीकृप्णको कंममे उनका वध करमैके द्यि बुख्याया 
ओर कुवटधरापीट टाक द्वारां आक्रमण कराकर उन दोनों 
वीरयौके फोधको उदीपित फरिया ! उस द्यार्मे यै दोन उष 
हाथीको मारकर समुद्रके समान व्रा रंगदाटा्म प्रविष्ट 
हुए; फिर उन्दोनि अपने वाहूवटका आश्रय लेकर मूर्देके समान 
वैरे ए. मथुरानरेशको यदि उसके सायिरयोऽदित मार शाला तो 
सरमे उनके द्वारा क्या दोप चन गया । राजन्‌. † इसी तरष् 
कंसका वध करे यदि श्रीङृप्ण ओर वलरामने टम वयोषृद 
मरेशकि साय वियेध किया ओर उव दमि यदिष्म सम 


आीमद्ाभारते लिखभाग 


[ शसि 


कितिति प 


लोगेनि वर पचिषर मधुसपुरीपर मेया दाष पिया ते उम 


भीफ्यादोषथा॥ ८-{१॥ 
सेनातिवटमाखोफय विच्रस्तौ समक्रदरा्वं। । 
पुरं घं समुत्छज्य गोमन्न च गताघुभौ ॥ १२॥ 

मारी दना महान्‌ वन्द दसकर वगम धीर दय 
दरगे यर जपने नगर तथा भनार दोदर प्रन माई 
गोगन्तर्वतयर चने गमे ॥ १२॥ 
तप्रापि गतमसाभिर्हन्तं समग्योधिभिः। 

$. क [3 लि 

यप्रा्तयायनाभ्यां च पद्रातिभ्यां रणानि ॥ ६२॥ 
रथाम्वलर्नागन नास्माभिविप्रषः रुतः। 
छत्योपतेधं टस्य क्थधर्मेण द्रीविनः ॥ १॥ 


क, 


र्म 
जयानि नरठष्टुए्‌ ये तीर रमृमिम ददन षी ष्तः 
एपरिये दमने नयीरपेषििरय प्रीर पदटनिप्र चुरी 
अनुसार सामन्तपर्वेत्पर चग रद्य उमम भधायटनाद्‌ी फी) 
दवाचिमुख्रमविद्य दुर्निनीततपस्विनो 1 
विनीत ति मन्यामः सर्धं प्षचियपुद्गयाः। 
प्रतियुरे र्ते व्वेवं द्याम सनार्दुनम्‌ ॥ ६५ 
एम सनी क्षथिमनपुद्रय कष समते भे फि पे दोर्न 
उद्रण्ट तपन्वी वाद दाचन मुगयर्मे पदर सन जयम 
(भे कलिका फटता जवने ) 1 दमी दयाम उन दोनो 
मायेति यदि प्रतिभोधःकद युदप्िया से म उनाश्नमे 
दष तर दोव सोद ( सन्नि य कृ पिपा, ठगी 
प्य) } १५॥ 
यघ्न यथ्रप्रपरास्यामो चयं त्र भयेत्‌ कटिः । 
प्रीत्य प्रयतिष्यामः छष्णेन सष भूमिपाः ॥ १६॥ 
(ीहष्ये मर स्पनेवर) मनेय जरजप्नं रने, वर 
मष्ट क्च मक्ता सनः सजायो | आकि म 
शरीक सायस्रेम दुनि प्रथम ज्म १६॥ 
षदं कुण्डिनपुरं ष्णो नागतः फन्दितुना । 
कन्यानिमित्तागमने कस्य युद्धं प्रयच्छति ॥ १७ ॥ 
दत कुष्टिनिदुमम "टप युद च्वि नही जयि १। 
यदि राजकन्या निमित्त टी उनम नागमन हुये तरवे 
किरके साय युद्ध करेगे ॥ ६७ ॥ 
मत्ये ऽसिन्‌ पुख्पेद्रौऽसौ न कश्चित्‌ प्राहृतो नरः । 
देवरोकफेषु देवेषु धवः पुरूोत्तमः 1 १८॥ 
ये कोई पार्त मनुष्य नही । दष मध्यंलोकमे शरे 
पुरुप १ । देयलोक्वानी देवता्थमि भी स्वे पुरषोत्तम ईै॥ 


` विषयपर् ] 


"~~~ ~~~ ~= = -=--~----- ------ ~~~ 


देवानामपि कती 'ोकानां च विक्ेषतः । 
न चैव बालिशा बुद्धिनं चेप्यी नापि मत्सरः ॥ १९॥ 
वे देवत्ताओंके भी कर्ता ह ओर विशेषतः सम्प्णं लोकेकि 
कष्ाभीवे दीह उनक्री वदि गेवारौ-जैषी नदीं है । उनके 
मनम न ईर्ष्या हैः न मात्स्यं ॥ १९ ॥ 
न स्तब्धो न कशो नातः प्रणतार्तिंहरः सदा । 
एप विष्णुः प्रथुदेवो देवानामपि दैवतम्‌ ॥ २० ॥ 
येनतोक्ठोरदहैः'न द्र £ ओर न रोग-शोक्रते 
पीदितदीदै।ये तो सदा शरणागतका दुःख दूर करते रदते 
ह । ये श्रीकृणा साक्षात्‌ भगवान्‌ विष्णु तथा देवता्ओके मी 
देवता है ॥ २०॥ 
आगतो गरुडनेदर्छदधाकादयहेतुना । 
नानाख्रसहितो यात्ति कृष्णः शाघयुविनाश्ने ॥ २१॥ 
द्मां याजं विजानीध्वं प्रीत्यर्थं ह्यागतो हरि; । 
सहितो यादवेन्द्रेश्च भोजवृष्ण्यन्धकैरिह ॥ २२ ॥ 
हस समव ये अपने छद्मरूपको प्रकारित करनेके लि 
गसड़के दाया यरा पधारे दै । श्रीद्धप्ण शतरुर्ओंक्रा विना 
करनेके ल्ि नाना प्रकारके अस्र-शस््ोके साथ यात्रा करते है । 
पस्तु उनकी इष याचको वैता न समन्नो । इस समय तो 
ये श्रीहरि भोजः व्रष्णि, अन्धक आदि यादवेन्द्र साथ यर्दा 
प्रीति बरदृनिके ल्यि दी आये] २९२२) 
अर्ध्य॑माचमनं दरवा आतिथ्यं च नराधिपाः । 
करिष्यामो चयं सवं केरावाय महात्मने ॥ २३ ॥ 
अतः नरेश्वरो { हम सव्र ठोग य्य महात्मा केखवको 
अर्घ्यं ओर आचमन आदि देकर उनका आतिथ्य-सत्कार 
करेगे ॥ २३॥ 
पवं संधानतः कृत्वा कप्णेन सहिता चयम्‌ । 
वसामो विगतोदधेगा निर्भया विगतज्वराः ॥ २४॥ 
इस प्रकरार सन्धि करफे हमखोग श्रीकृष्णके साथ उदेगः 
भग्र ओर चिन्ता रहित द्योकरर निवासत करेगे ॥ २४॥ 
तस्य तद्‌ वचनं श्रुत्वा द॒न्तवक्नस्य धीमतः । 
वासवः प्रवदतां शरे्टस्ताचुवाच नराधिपान्‌ ॥ ९५ ॥ 
बुद्धिमान्‌ दन्तवक्चकरा यदह वचन सुनकर वक्ताभीमे 
श्रेष्ठ शास्वने उन नरेरोसि कदा-) २५॥ 
ज्राल्व उवाच 
कि भयेनास्य नः सव तन्यस्तरास्रा भवामहे । 
संधानकरणाद्धेतोः कृष्णस्य भयकम्पिताः ॥ २६॥ 
शादय बोला--यजाओ ¡ यदि एसी व्रत दहै तो 
क्या हम सच छोग श्रीकरुप्णकरे भयस अव्र अपने अल्ल-शस्र नीचे 
डालकर नित्ये हो ज्ये । सन्धि करमेके टदे तो यदी पता 
लछमाता है कि सव नरेद श्रीकृप्णकै भये कोप रदे ह ॥२६॥ 


पकोनपन्छाशा्तमो ऽध्यायः 


` ३९९ 


नेप धर्मो नरेन्द्राणां क्षात्रे धमे च तिष्ठताम्‌ ॥ २७॥ 
अपने बलकरी निन्दा कफ दुमरेकी स्ति करेसे क्या 

प्रयोजन । धत्रिय-धर्ममे खित रहनेवाले नरेदौँका यह धं 

नदीं है ॥ २७॥ 

महत्छु राजवंशेषु सम्भूताः कुखवरद्धनाः । 

तेषां कापुरपा बुद्धिः कथं भवितुमर्हति ॥ २८॥ 
जो महान्‌ राजवरोमै उत्पतन होकर भने कुकी कीति 

बदानेवाटे ई, उन ाजार्ओोकी वुद्धिमे एेसे कायरतापर्ण विचार 

का उदय कैसे हो सकता है ॥ २८॥ 


अहं जानामि वै छष्णमादिदेवं सनातनम्‌ । 
भुं सवौमरेन्द्राणां नारायणपरायणम्‌ ॥ २९ ॥ 

मे जानता हू शीक्ृम्ण समसत अमरेद्वरोके खामी आदि- 
देव सनातन पुरुष द । नारायण दी इने मान्‌ आश्रय 
( खरूय › द ॥ २९॥ 
वैङुण्ठमजयं रोके चराचरगुरुं टरिम्‌ । 
सम्भूतं देवकीगभं विष्णं छोकनमस्छतम्‌ ॥ ३० ॥ 
कंस्रराजवधाथीय भारावतरणाय च। 
अस्माकं च विनाशाय लोकसंरक्षणाय च ॥ ३१॥ 
अंशावतरणे छर्स्नं जाने विष्णोर्विचेष्ठितम्‌ । 

लोकम अजेय; वेकरुण्ठ-धामके अधिपतिः चराचरगुखः 
पापहारी विद्ववन्दित भगवान्‌ विष्णु दी प्रथ्वीका भार उतारने, 
कंसराजकरो मारने तथा हमारा विनाश ओर सम्पूर्णं ठो्कौकी 
रक्षा करनेके चि देवकीके गर्भसे प्रकट हुए ह । अपने अंश- 
सदित भगवान्‌ विप्णुके इस पूर्णं अवततारमे जो-जो कार्यं होने 
वाला है, वह सव्र मै अच्छी तरह जानत हँ ॥ ३०-३१३ ॥ 
स्राममतुखं रत्वा विष्णुना सह भूमिपाः ॥३२॥ 
चक्राचरुविनिद॑ग्घा यास्यामो यमसादनम्‌ । 

अतः भूमिपाल ! हमलेग इन भगवान्‌ विष्णुके साथ 
अनुपम संग्राम करफे इनकी चक्राग्निसे दग्ध हो यमलोके 
जा पर्हुचेगे ॥ ३२६ ॥ 
तच्वं जानामि राजेन्द्रः काडेनायु्षयो भवेत्‌ ॥ २३६ ॥ 
नाकाटे प्रियते कश्चित्‌ प्राते काटे न जीवति । 

रजेन्द्रगण | मै इस तत््वफो जानता हूं कि कच्छे दी 
आयु क्षीण होती है ! जवरतक़ कार न आया हो कोई नही 
मरता है ओर काल आ जानेपर कोद जीवित नहँ रहता ॥ 
पवं विनिश्चयं कुत्वा न कयौत्‌ कस्यचिद्‌ भयम्‌ ॥२४॥ 
ख प्व भगवान्‌ विष्णुयरोक्य तेपसः क्षयम्‌ । 
निहन्ता दिततिजेन्द्राणां यथाकाडेन योगवित्‌ ॥ २५ ॥ 

अपने मनम सा टद्‌ निश्चय रखकर कमी किसी भय 
नदी रखना चाद्ये 1 वे हौ योगवेत्ता भगवान्‌ विष्णु दैत्य- 


मै 


29 


राजक तपस्या क्वण. हुई देख यथासमय उनका संहार 
करते ई ॥ ३४-३५ ॥ 
घरि वैरोचनिं चैवं वदुष्वावध्यं महाबलम्‌ । 
रतवान्‌ देवदेवेशः पातारतरवासिनम्‌ ॥ ३६॥ 
उन्दी देवदेवेदवरने महावटी विरोचनङ्ुमार मरलिको, जौ 
किखीके हाथसे मरि जानेवाठे नदीं ६ बोधकर उन्दं पाताल- 
लोकका निवासी वरना दिया दै ॥ ३६ ॥ 
पवमदीनि वै विष्णोदचेष्टानि च नराधिपाः । 
तस्मादयुक्तं भवतां विग्रहाय विचारणम्‌ ॥ ३७॥ 
नरवरो | भगवान्‌ विप्णुकी रेसी ष्टी चेर्प्‌ हमा 
करती दै । अतः आप खोर्गोका युद्धके ल्मि विचार करना 
अनुचित दै ॥ २७॥ 
न च संप्रामरेतोर्हिं रष्णस्यागमनं स्विष्ट । 
यस्य चा कस्य वा कन्या वरयिष्यति तस्य सा । 
किमन्न विग्रहो राक्षां भरीतर्भवतु यै धुवम्‌ ॥ ३८ ॥ 
शीकृष्णक्रा यहो आना युद्धे व्यि नदीं हा ै। 
राजक्रन्या जिस किसीका मी वरण करेगी, उसीकी पली 
होगी । इसमे स्रगदेकी कोन सी वात | राजामि सदा 
अछ प्रीति चनी रहनी चादिये ॥ ३८ ॥ 
य्चम्पायन उवाच 
पवं कथयमानानां खषाणां दुद्धिश्ािनाम्‌ । 
न किचिद्‌नवीद्‌ राजा भीष्मकः पुश्रकारणात्‌ ॥ ३९॥ 
वैशाम्पायनजी कष्ते है--जनमेजय | उन वुद्धिखली 
मरके इ8 प्रकार कहनेपर मी राजा मीप्मक्र अपने पुत्रके 
कारण कु बोल न फे ॥ ३९॥ 
महावीर्यमदोत्सिकतं भार्गवास्राभिरक्षितम्‌ । 
रणप्रचण्डातिरथं विचिन्त्य मनसा सुतम्‌ ॥ ४०४ 
वह अपने मदान्‌ वल्के घमंड भरा रहता था । 
भार्यवाल्नते सुरक्षित था ओर रणभूमिमे प्रचण्ड पराक्रम प्रकट 
करनेवाला अतिरथी वीर था । भीप्मकने मनी मन अपने 
उख पुन्नका चिन्तन करके हस प्रकार कदा- ४० ॥ 


भीष्मक उवाचं 
कृष्णं न सहते नित्यं पुरो मे य्दु्पितः। 
नित्याभिमानी च रणे न विभेति च कस्यचित्‌ ॥ ४१॥ 


भीष्मकं वोके-मेरा पुत्र सदा वल्के धमंड भरा 
रहनेवाख ओर अभिमानी है | बह श्रीकृष्ण ओर उनके 


, म्रमावको सदन नदीं कर पाता दै तथा युद्धे किसौसे रता 


नदीं है ॥ ४१॥ 


कृष्णस्य भुजवीर्येण हियते नाज संडायः। 
भविष्यति ततो युद्धं महापुरुपविप्रहम्‌ ॥ ४२॥ 


| १ 


श्रीमहाभार्ते सिलभागे 


[ हस्वे 


सरमे सन्देह नदी कि श्रीद्रपणेकी भजायेकि चलते कन्या. 
का अपदरण होगा | उत अवसरपर मदापुरपके साथ महान्‌ 
विग्रह एवं युद होकर दी रदेगा ॥ ४२॥ 
देषी चैयाभिमानी च क्तो जीवति मे खतः । 
जीवितं नार पदयामि मम पुत्रस्य केदावात्‌ ॥ ४३॥ 
उस अवस्था्मे श्रीकृष्णे दे रखनेवाद मेरा अभिमानी 
पुत्र कैते जीवित रद्‌ सकता  । अतः मुने श्रीकृष्णके टाथये 
य्ह अपने पुत्रके जीवनकी श्रा दोती न्दी दिखायी देती ॥ 
कन्यदेतोः खतं ज्येष्टं पितृणां नन्दिवर्धनम्‌ । 
कारयिष्ये कथं युद्धं पुप्रेण सष केश्रचम्‌ ॥ ४४॥ 
कन्यके चि पितर्योका आनन्द चदनिवले अपने ग्येष्ठ 
पुत्रको केशवके साथ जौर केशवको अपने पुत्रके साय युद्ध 
करनेकरा अवसर कैव दगा ॥ ४४॥ 
न च नारायणं देवं घरमिच्छति रुक्मवान्‌ । 
मूदढभावो मदोन्मत्तः संभ्रामेष्वनिवर्तक्रः । 
नियतं भस्मसाद्‌ याति तूखराक्षियथानखात्‌ ॥ ४५॥ 
सक्मीका मनोभाव मृदृतासे भरा हुआ दै। अतः वह 
भगवान्‌ नारायणक्रो सकिमणीका वर वनाना न्दी चाहता । 
वह यलकरे मदते उन्मत्त रहता भीर युदधसे कमी भह नदी 
मोढ़ता दै | अतः जैसे आग लगनेसे सर्दका ठैर जट जता 
दै, उसी प्रकरार वह श्रीकृष्णषठे मिद्कर निश्वय ही मस्र हौ 
जायगा | ४५ ॥ 
करयीरेदयरः दरः शगाङुध्चित्रयोधिना । 
क्षणेन भस्मसान्नीतः केटयेन बलीयसा ॥ ४६॥ 
विचित्र प्रकारे युद्ध करनेवाठे अत्यन्त भेटवान्‌ केद्यवने 
करवीरपुरके श्रूरवीर राजा शगालको क्षणमरमे ध्म मिल 
दिया ॥ ४६ ॥ 
बृन्दावनेऽवसच्त्रीमान्‌ केदावो चलिनां चरः । 
उद्‌धृन्यैकेन हस्तेन सप्ताहं धृतवान्‌ गिरिम्‌ ॥ ४७॥ 
दुष्करं कम॑ संरख्त्य मनः सीदति मे भरशाम्‌ ॥ ४८॥ 
जव्र ध्रटवार्नेमिं श्रेष्ठ श्रीमान्‌ कैव ब्रन्दावनमे रहते येः 
उस समय उन्न गोवर्धन पर्वतकरो उठाकर सात दिर्नेतिक्र 
उपेष्क दी हाथतते धारण कररखा था ] उने उस दुष्कर 
कर्मको याद करके मेरा हदय अत्यन्त दिथिल, दो 
जाता दै ॥ ४७-४८ ॥ | 
नगेन्द्र खहसाऽऽगम्य दैवतैः सह वृ्रहा। `: 
अभिपिच्याव्रवीव्‌ रृष्णसुपेन्दरेति शचीपतिः ॥ ४९ ॥ 
उस समय देवताथकि साथ इच्ादुरविनाशक शचीपति 
इन्द्रने सदा गिरिज गोवध॑नपर आकर श्रीकृप्णका मौभेकि 
इनद्रके पदपर अभिपेक किया ओर उन उपेन्द्र कहकर पुकारा॥ 


ॐ विष्णुपवं 1 


पकोनपन्चाश््मो ऽध्यायः 


४०१ 


यथा वै मितो नागः कालिये यमुनाहदे । 
` विषाच्निज्वलिवो रः काडन्तकसमपरभः ॥ ५०] 
-यमुनाके कुण्डम निवास करनेवाले घोर कालिय नाग 
अपनी विषाग्निपे प्रज्वलति दो काठ ओर अन्तकके खमान 
प्रतीत होता था, किंतु इन श्रीङृष्णने उसका भी जिस प्रकार 
दमन क्रिया ( बह सवक्रो विदित है ) ॥ ५० ॥ 
केरी चापि महावीयं दानवो दयविप्रहः। 
निष्टतो वासदेवेन देवेरपि दुरासदः ॥ ५९१ ॥ 
सहापराक्रमी केशी नामक दानव धोदेका शरीर धारण 
करके रहता था । उको जीतना देवतार्ओकर ल्ि मी अयन्त 
कठिन था; परु इन भगवान्‌ वासुदेवने उसक्रो भी मार 
डल | ५१ ॥ 
सान्दीपनिसुतदचैव चिरनष्टो षि ~ सागरे । 
दैत्यं पञ्चजनं हत्वा ' आनीतो यममब्दिरात्‌ ॥ ५२॥ 
इन्दनि समुद्रम चिरकाख्पे नष्ट हए सान्दीपनिके पुत्- 
को पञ्चजन देव्यका वध करके यमटोकसे या दिया था} 
गोमन्ते खुमहद्‌ युद्धं वहभिवेंध्रितादुभौ । 
शृत्वा वित्राक्जननं नागाश्वर्थसंक्षयम्‌ ॥ ५३ ॥ 
गजेन गजचृन्दानि रथेन र्थयोधिनः। 
सादिनश्चाश्वयोधेन नरेण च पदाततिनः। 
जघ्नतुस्तौ महावीय वसुदेवसुतावुभौ ॥ ५४ ॥ 
गोमन्त पर्वतपर जो महान्‌ युद्ध हुभा थाः उसमे वहुत-से 
राजा्ओंद्वारा यह दोन भाई धिर गये थे परंतु वसुदेवके 
उन दोन महापराक्रमी पुर्रोनि हाथी; षोडे तथा रर्थोका 
संहाररूप अत्यन्त भयदायक पराक्रम कर दिखाया । हाथीसे 
हाथिर्योके समू्दौको, रथसे रथारूढ गेद्धाओंकोः शुडसवारसे 


ही धुडसवारको ओौर पैदल योद्धापे ही पैदर्छौको मारकर यम- 


खोक परहा दिया ॥ ५३.५४ ॥ 
न॒देवा्रगन्धव्रौ न यक्षोरगराक्षसाः । 
न नागान च दैत्येन्द्रा न पिराचा न गुह्यकाः ॥ ५५ ॥ 
कृतवन्तस्तथा घोरं गजाश्वरथसंक्षयम्‌ । 
वमवेस्खत्य संग्रामं अशं सीदति मे मनः ॥ ५६॥ 
हि देवताओं अपुरो, गन्धर्वः, यक्नः सर्पौ, राक्षसोः नार्गौः 
देत्यरार्जौः पिशाचो ओर गुद्यकनि मी कमी हाथी, घोडे ओर 
र्थोकां एसा घोर संहार नहीं मचाया था | उस संग्रामको 
वार्वार यादे करके मेरा मनदिथिरु होत्ता जा रहा 
हे ॥ ५५-५६ ॥ 
न मया श्रुतपूवों चा ट्ूर्वः कुतोऽपि बा । 
तादरो भुवि म्यो ऽन्यो वासुदेवात्‌ खरोत्तमात्‌॥५७॥ 
मेने पदले कमी भूतल्पर सुरभेष्ड भगवान्‌ वासुदेवो 
छोडकर दूसरे किसी वैसे मतुप्यका होना न तो देखा है भौर 
ननाद रै॥ ५७॥ 


सम्यगाह महाबाहदन्तवक्यो मष्टीपतिः । ` - 
सान्त्वयित्वा महावीयं संबिधास्याम यरक्षमम्‌ ॥ ५८ ॥ 
मदाब्राहू राजा दन्तवक्त्र ठीक कहते द । हम पहले 
महापराक्रमी श्रीकृप्णको सान्त्वनाद्वारा शान्त करके फिर 
जैसा उचित हो वैसा करे ॥ ५८ ॥ 
वश्स्पायन उवाच ' 
इति संचिन्त्य मनसा बलावरविनिश्चयम्‌ । 
गमनाय मति चक्र भरसादयितुमच्युतम्‌ ॥ ५९ ॥ 
वैशम्पायनजी कदते है--जनमेजय ! इस प्रकार 
मन-दी-मन अपने वलावल्का निश्चय करके राजा भीष्यकने 
भगवाम्‌ श्रीकृष्णकरो प्रसन्नं करनेके व्यि उनके पास जनैका 
विचारक्रिया॥५९॥ । 
चिन्तयानो नरेन्द्रस्तु वहुभिनयशारिभिः। 
सूतमागधवन्दिभ्यो वोधितः स्तुतिमङ्गलैः ॥ ६० ॥ 
चहुत-से नीतिशारी विद्वान्‌ मन्त्रियोकि साथ विचार 
करते हुए. राजा भीष्मक जव रातमे सो गये, त्र सवेरा होने- 
के समय चूतः मागधं ओर बन्दिर्योके शखसे स्तुति श्वं 
मङ्खल-पाठ चुनकर जगे ॥ ६० ॥ ' 
प्रभातायां रजन्यां तु रतपूरवाहिकक्रियाः । 
उपविष्टा शरपाः सवं स्वेषु विश्नामवेदमसु ॥ ६१ ॥ 
जवर रात बीतनेपर परभातकाक आया; तव॒ सव नरेश 
पूर्वाहनकार्के नित्यकं पूर्णं करके अपने-अपने विश्राम-भवनो- 
मे वैठे॥६१॥ 
ये बिखष्टास्तु राजानो विदभौयां नराधिपैः । 
तेरागम्य खभूपेषु रहो गन्वा निवेदितम्‌ ॥ ६२ ॥ 
राजा्मेनि अपनी ओरसे जिन-जिन राजक्रुमासौको 
विदर्भ॑पुरीम भेजा था, उन्होने छौटकर अपने-अपने राजा्ओकि 
पास एकान्तम जाकर वर्होक्रा समाचार निवेदन किया 1६२॥ 
शत्वा कृ ष्णाभिषेकं तु केचिद्‌ धृष्य नराधिपाः । 
केचिद्‌ दीनता भीता उदासीनास्तथा परे ॥ ६२ ॥ 
श्रीकृप्णके अभिपेकका समाचार सुनकर कुछ नस्ल तो 
बहते ही प्रषन्न हुए) कुछ लोग अव्यन्त दीन; भयभीत हो 
गये ओर दूसरे राजा उदासीन ( तटस्य ) वने रदे ॥ ६२ ॥ 
त्रिधा प्रभिन्ना सा सेना नरनागाण्वमालिनी । 
महार्णव इव श्चुन्धा अभिषेकेण चाछ्िता ॥ ६४ ॥ 
इस प्रकार शीकृष्णकरे अभिषक्रसे चाल्ति हई मनुष्यो; 
दाथियो ओर षोढ़सि भरी हुई वह सेना तीन मा्ममिं वैर 
गयी ओर महासागरके समान विक्ुन्ध हो उठी ॥ ६४ ॥ 
खपाणां भेदमाखोक्य भीष्मको राजलत्तमः । 
स्यतिक्रममच्चिन्त्यं च छृतं सुपतिना स्वयम्‌ ॥ ६५५ 


४०२ 


भ्रमष्ठाभारते सिखभागे 


हि. | 


विचिन्त्य मनसा राजा दद्यमानेन चेतसा । 
जगाम नरदेवानां समाजे प्रतिवोचितुम्‌ ॥ ६६॥ 

राजाओमे श्रेष्ठ भीष्मक उन नरेेमिं मेद हआ देखकर 
ओर सयं अपने ही किये दए अचिन्त्य अपराधका विचार 
करे मन-दी-मन चिन्तासे दग्ध होति दए उन नरदेर्वोके 
समाजे उन्दं समन्चनेके ल्य गये ॥ ६५-६६ ॥ 


एतस्ि्न्तरे दुताः सम्प्राप्ताः कथक (दाकौ । 
ठेखमुद्धुत्य शिरसा विविद्युस्ते दपाणवम्‌ ॥ ६७ ॥ 

इसी वीचमे इन्द्रके दूत रजा क्रथ ओर कैरिकके 
पात जा पहुचे ओौर भनिर शछका एक प्र निकालकर 
उन्दं दिया; फिरवे राना समुद्रजैसे समानम शुष 
गये 1 ६७ ॥ 


दति श्रीमहाभारते धिर्भागे' हरिवंरो विष्णुपवणि रुकिमिणीस्वरपवरे एकोनपद्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ४९ ॥ 


दस प्रकार श्रोमहभास्तकरे खि मान दयिंदफे अन्तत विष्णुर्मे स्ङिमणीसयंवरतरिषयक 


उनचासवे( अध्याय पूरा दुभा ॥ ८९ ॥ 
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प्चारात्तमोऽप्यायः 


क्रथ ओर कैदिकदारा भगवान्‌ श्रीकृष्णको अपने राज्यका समर्पण, देवराज इन्द्रके आदेशसे सव 
नरेश्ोदारा भगवान्‌का रजेन्द्रफे पदपर अभिषेक तथा भगवानूका सवक्रो आश्वासन देना 


जनमेजय उवाच 
हृत्वा कंसं महावीयं देवैरपि दुरासदम्‌ । 
नाभिपिक्तः सवयं राज्ये नोपविषटो चपासने ॥ १ ॥ 
जनमेजयने पृ्धा--मुने ! जो देवताकि च्यि भी 
दुर्जय था, उख महापराक्रमी कंका वध करके भगवान्‌ श्री- 
करप्ण खयं न तो राज्यपर अभिषिक्त दण ओर न राजाकरे 
-आसनपर दी रै, इसका क्या कारणदै १ ॥ १॥ 
कन्यां चागतः कृष्णस्तचापि न ₹तोऽतियिः । 
~" अमानमतुटं प्राप्य क्षान्तवान्‌ केन देतुना ॥ २ ॥ 
भगवान भरीङ्ृष्ण कुण्डिने कन्यके य्यि अये ये 
परंतु वरदो भी वै निमन्वित अतिथि नदीं चनयि गये ये 
~ अपने आप विना बय आये ये ओर अपने प्रभावे 
कारण पूनित हुए थे ) । रेते अनुपम अपमानको पाकर भी 
श्रीङप्णने कितच्यि क्षमा कर दी ॥ २॥ 
विनतायाः सुनश्चैम मदावख्पराक्रमः। 
सख चयि क्षमया युक्तः क्रारणं क्रिमपेक्िनः। 
पतद्राख्यादि भगवम्‌ परं कौनूदलं हि मे ॥ ३॥ 
विननाफ़ पुत्र गण्ड भी तो मश्‌ चर ओर परक्रमते 
सम्पन्न १ । उन्होने मी करि कारण अपिक्षासि क्षमामाव 
धारण कर पिया १ भगवन ! गद मुने वनाद, इसक्नो पुनने- 
के ल्थि मेरे मनने वदा कोवर द रदा दे ॥ ३॥ 
वैसम्पाधत उका 
पिदर्भनगर पे वैनतेये सहान्युने। 
मनला चिन्तयामास वासुदेवाय कैरिकः ॥ ४ ॥ 
व्ैशस्पायनजी कते ह~ जनमेजय ! ( कथ ओर 
कैशिक मगवान्‌के भक्तये । उनपर कपा करनेफेच्िही 
भगवान्‌ बद स्वयं पघ।रे थे । )जव्र भगवान्‌ श्रीङ्कप्णफ़े साथ 


विनतानन्दन गव्ढ्‌ भी विदर्भपुरीमे गये, उस समय कैरिक- 
नै उन वसुदेवके स्मि मनही-मन उत्त प्रकरार चिन्तन 
किया ॥ ४॥ 
दृषटऽ ऽश्वं हि नः सवौन्‌ राजन्यान्‌ प्रवदम्यहम्‌। 
वसुद्रेवसते टे धुवं पापक्षयो भवेत्‌ ॥ ५ ॥ 
विद्युद्धभावः रष्णस्य आवयोरटतस्वतः। 
अतः पात्रतरः कोऽन्यसिघु खोकेयु त्रियते ॥ ६ ॥ 
कृष्णात्‌ कमरुपन्राक्षाद्‌ देवदेवाज्ननादनात्‌ 1 

( यदि दम दोनों भाई श्रीकृण्णकरा अमिपेक करे ते) 
भगवान्‌ श्रीकृप्णफे आश्चर्यमय अमिपरकको देखकर हमरे 
पापका नादो जायगा तथा सप्रके मने विशुद्ध भाव- 
का उद्य होगाः अतः मै राज्ञेति करहुगा---ष्वसुदेव- 
पुत्र भगवन्‌ श्रीङ्गष्णका दर्गन, कर टेनैपर निश्चय ष्टी 
सवके पर्पोका क्षय हो जाता दै | हम दोनेनि श्रोङ्कप्णङे तत्व- 
कां साक्षात्कार किया है ¡ तीनों लोम उन कमटनयनदेवापि- 
देव जनाईन श्रोकृणणपन ब्रटुकर सुगत दरा कौन ह ५-६१ 
तस्यावां किं प्रदास्याव्र आतिथ्यक्ररणे द्रप ॥ ७ ॥ 
पात्रमासाद्य वै राजन्‌ यथा धर्मों न दुष्यते । 

धनरेश्वर { दम दोनो उनके आनिथ्य-सत्कारफे समय उन्दे 
कौन सी एसी वस्तु भट कर, जिससे उत्तम पाचको पाकर 
उसश्न समुचित आद्र न करनेकरे कारण हमरे धर्मक रोप 
न होने पयवे" ॥७६३ ॥ 
पथमन्यौन्यं संचिन्त्य ्रातसै क्रथकैशिकौ ॥ ८ ॥ 
स्वं राज्यं दालुक्रामौतु जग्मतुः केशबान्तिकम्‌ | 

दष प्रकार दोनो माई क्रथ अर कैरिक आपस 
विचार करे अपना राज्य समर्पित करनेश्गी इच्छते भगवान्‌, 
केशवक्रे निकट गये ॥ ८३ ॥ 


विष्णुपवे 1 


दवेवमासाद्य तौ कीरो चिदर्भनगराधिपो ॥ ९ ॥ 
ऊचतुस्तौ महाभागौ प्रणम्य शिरसा हरिम्‌ । 
भगवानफरे पास. पर्हुचक्र व्िदर्भनगरके स्वामी वे 
दोना महाभाग वीर उन श्रीहरिको हिर द्यकाकर प्रणाम 
करके पश्चात्‌ उने इस प्रकार बोये-। ९१ ॥ 
अद्यावां सफटं जन्म अद्यावां सफर यशः । 
अद्यावां पितरस्तृक्ता देवे चावां गरदागते ॥ १०॥ 
भगवन्‌ | आज आप हमारे घर पधारेः इससे हम 
दोनोका जीवन सफर हो गया, हमारा यश्च भी सफल हौ 
गया ओर हमि सम्पूर्णं पितर भी तप्त दौ गये ॥ १० ॥ 
चामरे व्यजनं छनं ध्वजं सिंहासनं बलम्‌ 1 
स्फीतकोशा पुरी चेयमावाभ्यां सहिता तच ॥ १९॥ 
प्यह चामर) व्यजन; छत्रः ध्वज; विंहासनः सेना तथा 
समृद्धिशाली कोषस परिपूर्णं यद पुरी हम दोनो भादरयोकिं 
सायं आपकी सेचाम समर्पित दै--दम सच आपके द ॥११॥ 
उपे्द्रस्त्वं महावाहो देवेन्द्रेणाभिषिक्तवन्‌ 1 
आवामिह हि राज्ये त्वामभिषिकतं ददामि ते ॥ १२॥ 
"महाबाहो ! आप उपेन्द्र ह । साक्षात्‌ देवेन्द्रे आपका 
अभिषेक करिया है 1 हम भी इस राज्यपर आपका अभिषेक 
करते ईद सारा राग्य आपको दे रे द ॥ १२॥ 
आवयोर्यत्छतं कार्यं वहुभिः पार्थिवैरपि ) 
न शक्यते ऽन्यथा कतुं जरासंधेन वा स्यम्‌ ॥ १३॥ 
ध्म दोनेनि जो आपका अभिषेकरूप कायं कर दिया 
हैः उसे ब्हुत-चे भूपाल अथवा खयं राजा जरासंध भी 
अन्यथा नहीं कर सकता ॥ १३ ॥ 
शुस्ते मागधो राजा जरासंधो महाष्युतिः। 
कथां ते चरूवते नित्यं खृपाणामभयय्रदः ॥ १४ ॥ 
'मगधदेदाका अधिपति मदातेजसवी राजा जरासंध 
आपका र है । उसने आपके विशद होकर राजार्ओंको 
अभय प्रदान किया है | वह प्रतिदिन आपके सम्बन्धम्‌ इस 
तरदकी ब्रात करिया करता है ॥ १४ ॥ 
सिहासनमनध्यास्यं पुरः चास्य न विद्यते । 
कथं राजसमाजेऽस्मिन्नास्यते देवकीसुतः ॥ १५ ॥ 
'८कोरं भी सिंहयसन श्रीकृष्णके वरैठने योग्य नहीं है 
( क्योकि इसपर मूर्धामिपिक्त नेरेभ ही वरैठ सकते है), 
इनका कोद नगर या राजधानी मी नहीं है, अतः देवकी- 
नन्दन श्रीकृष्ण राजाअकि इस समाजे सिंहासनपर कैसे 
दैडेगे ॥ १५॥ | 
रृष्णोऽपि खमदावीयों दयभिमानी मदादयुतिः। 
न चागमिष्यते घासिन्‌ फल्या च खयंवरे ॥ १६॥ 


पाक्षन्तमो ऽघ्यायः 


ननि नच्च ~= ~~~ ~ ~ ~न ~ 


 वरैवेगे०॥ १७1. 


४०२ 


्रद्प्ण भी महापराक्रमी; अभिमानी ओर मदतिजस्नी 
ह| रे कन्याकरे स्थि इपर खयंवरमे कदापि नहीं पारगे ॥१६॥ 
पार्थिवेषूपविण्ेपु स्वेषु सिदासनेषु पे! 
कथमास्यति नीचेषु आसनेषु महाद्युतिः ॥ ९७ ॥ 
प्जव राजाखेग अपने प्िदासर्नोपर तरैठे दगिः उस 
समय वरहो महातेजस्वी श्रीङ्प्ण नीच आसनौपर करसे 
इति संचोयभानस्वु श्रुत्वासौ भीष्मको चपः । 
आवयोः सह सम्मन्ध्य विच्रहोपश्माय च ॥ ६८ ॥ 
त्र चिध्रामदेतोदिं कारस्तिष्टं गररोत्तमम्‌ । 
इस प्रकार पूजे जनिपर राजा मीष्मकरने उसकी ब्रात 
सुनकर हम दोनेकरि साथ सलाह की ओर कलटकी शान्तिके 
स्यि उर्दि आपके विभ्रामके चयि इस उत्तम भवनका 
निर्माण कराया है ॥ १८१ ॥ 


देवानामादिेवोऽस्ि ` सर्वलोकनमस्कृतः ॥ १९॥ 
मादुष्ये मर्त्वरोकेऽस्मिन्‌ रजेन्द्रत्वं समाचर । 
समाजे मचुजेन्द्रणां मा भृदासनसंकरम्‌ ॥ २० ५ 
श्रमो ! आप देवता्कि भी आदिदेव द । ' समस्त 
संसार आपके चरणेमि मस्तकं श्चकाता है । आप मत्यंलोके 
इस मानव-जगत्‌म राजा दी नदी, राजेन्द्र॒ बनकर रद्ियेः 
जिससे मरेनदरोकि समुदायमे आसनका संकट ( सिंहासनपर 
वरैठनेके प्रनको केकर विवाद) उपस्ित न हो | १९-२०॥ 
विदर्भनगरे शेषां राजेन्द्रत्वंविचे्य। 
आस्यतामासने द्यभ्रे श्वः प्रभाते महाद्युते ॥ २९॥ 
‰ भमहातिजसवी गोविन्द ! विदर्भनगसमे इन राजार्ओकी 
रजेन्द्रताको आप विचलति कर दीजिये ओर कल प्रातः- 
कार रंग-भूमिमे एक ` उज्ज्य सिंहासनपर वियाजमान 
दौद्ये ॥ २१॥ 
अधिवास्याद्य चात्मानं विधिद्ेन कर्मणा 1 
यथा गमिष्यन्ति पाः करिष्पर देवशासनात्‌ ॥ २२॥ 
'आज आप शासनीय विधिके अनुसार अपने आपको 
अधिवासित ( राज्यामिषरेकके पूर्वाह्न संस्कारसे सम्पन्न ) 
कीजियै । फिर कल भँ ठेसा प्रयत करगा, जिससे देवराज 


इन्द्रके अदेसे सव्र राजा आपके अभिपेकके च्वि यहो 
पधारेगेः ॥ २२॥ 


पवसुक्त्वा खुरश्रेष्ठं॑प्रणिपत्य कृताच । 
्े्रयामासतुवीरो रगमध्ये खपेदते ॥ २३॥ 
रेता कहकर वीर क्रथ ओर कैडिकने दोन दाथ जोड- 


कर सुरश्रेष्ठ श्रीकृप्णको प्रणाम क्रिया जीर रजासि भरे 
हृ स्क्गस्यरमं (देवराज इनद्रका वद आदेदापज ) भेजा ॥२३॥ 


॥ १ हरिवंशे 

४०४ अमषमभास्वे सिटभाग { स्वंशे 
दयदूनन्य यनं वधानं ददपािना) वायताः द्ुण्डिनगरे कन्यद्तितोनसधिपाः। 

दिनिन्दा समदायः वैधः श्रद्‌ शासनम्‌ ॥२४॥ नागमिष्यति यः कश्चित्‌ सोऽस्य वथ्योभविव्यति। ३१) 

स्म्य सर्म देवदूत वनम, स श्म दुष्डिनेपुरम सजक्न्यदी प्राति स्यि नो 

अधन १न्द ठन्न द्र शक्यय च भ्रं द मर्श दधार ९. नम्य म कर्‌ भी एनक्ने आभिेकमं 1 


विश्न यो नृपाः सवे वेनत्यन्वहाच्युतः। 
स्यगना4तिधिरुपण विदर्मनग्य हरिः ॥२५॥ 
द्यि याद--रनाल्मे ! आपि नयं सो्मण्यु यद्‌ 
विति 2 दि अन सदमन कमी च्युते न होनिवयि 
मकम्‌ शे मदद्रे ग्यय अनिथिन्पमे दिदरमपुर्मे 
4५१1 २५ 
प्रानमान्टोत्य पाथोऽयमिनि संचिन्त्य भूपतिः। 
परददौ यायाय स्यं राज्यं घ्मदेतुना ॥ २६ ॥ 
$दमासगमास्यति श्राधा म चोदिते तवः 
धारना व्यद्ासरेण केनापि व्योमयाग्णि ॥२७॥ 
उन्द ायादन प्यष उतम पार ह देना मोचकर 
गरा शने भगवान्‌ वटुेवमो भमै अना सारा 
सम्मरर्मन द्र दिवि 1 तिर्‌ मेरे भाट प्रथने भगवान 
पदा प्प्रम ४ 1 ग गि्यनं ५1, सेवा योम गर्भित | (4: 
धर्‌ पदमे 1 उनके नना सते ष्टौ फी अकाययारी 
ष्य प्रानः किन शरीर दिन्ययी मदेता धा, यद्‌ 
पाठ कष |} २६.२७1 
देवदूत उवाय 
शतु त्वपासीनं 


{= 


[१ 


न युकमामनं नराधिप । 


शृदमम्यासनं द्वियं सर्वगन्नपिमृपितम्‌ ॥ २८॥ 
जाम्बूनदमयं दुश्चं र्चिनं विदव्रूमणा) 
प्रेतं भयमेव सिंद्ुखद्णन्टन्नितम्‌ „ २०,॥ 
वप्रापयिषटं द्वच चगाचर्नमस्टनम्‌। 


क [ 2९ 
सरभिपिष्छन्तु गन्द सषुभिः पाथिवेः सद्‌ ॥३०॥ 
भगु दत धोः न्वर्‌ ! द्विसयर्‌ दुम 
धन सुरे ६. छम (तन्न दुमो शरीद्रष्नत च्छि देना उपमिन 


क [कण 
नह | एन वि भ म्य सनोर विभूषित द्विष 


५ 
न्श्र॑मे 


त 


दे श्रन्यु4 है" भे = (दु मा व ग्म? 
स्मत कम उस? ग्मन्‌ धिष्यर्मनि दमा हिम 
सिपि! चर (लर विषम दिते ९, दययत दन्न 
क 111 


(ॐ ४ >; > ~ ^ श्य $गनम्‌ 
मदे सन्य म्यत परम्‌ द, चे दचय्यग भगवान्‌ 
>, [नि क 

(न) ५ वु दुर यद ४ भ्यं ~प मदनः 
[+ श की भ = ८ कक 7 क 
गर अ > श ३ चर्‌ दनव 


अर [- €-~-5= } 


शद्ग 


म्प; दद दनङा नस्य हो 18 १ ॥ 
द्मे चवाक्लश्षा निघीनामश्षसम्भवाः। 
अक्षया राजयजस्य धनेशस्य महात्मनः ॥ ३२ ॥ 
दिव्या काश्चनस्त्नाटया दिव्याभरणयोनयः। 
राजेन्दरस्याभियेक्तर्थमागच्छम्ति सपैदंताः ॥२३॥ 
ये आढ अध्य कटर ट, ञे निपिर्योके अयसे उन्न हुए 
ट! वे राजाधिराज मदात्मा धने ( दुवेर ) के कटश 
दिव्य कटश जो सुवर्णं ओर स्नेसि सम्पन्न द । इनम 
आमृप्ण ओर आमन मी दिव्य दै) चे कटय शरीकुष्णक्न 
राजनरपदपर अभिषेक कलेके व्यि राञा्थोकि साथ रषे 
६ ।॥ २२-२६ ॥ 


पण शाप्तस्य संदरद्ाः कथितो वो नसयधिपाः 
लेखेनाहय तान्‌. खर्वानभिपिन्चन्तु केदावम्‌ ॥ ३४॥ 
मरेथ्वसे ! यद्‌ मने आपटोग षि इन्द्का संरेदा सुना 
६! अतः आपिखोग इ टिखित आजपन्नके द्वासा सथ 
राजार्ओमि बुटक्रर भगवान्‌ श्रीष्रष्णका अभिषेक करे ॥२३८॥ 
कथिक उवाच 
इति संचोद्य चस्योऽस्तौ एरैचदूतो गतो दिवम्‌ । 
दत्वाऽ.ऽसनं चं ्रप्णाय वाखाक॑सददाप्रभम्‌ ॥ २५॥ 
कैदिकने कदटा--रेसी प्ररणा देकर तथा श्रीएूप्णफे 
च्वि प्राततःकराटीन सूर्घकफै समानि कान्तिमान्‌, तिदाघ्न समर्पित 
कर्यै वषट आक्रम म्वित हथ देवदून खर्गटोकको चन्र 
ग्र 1 ३५॥ 
नेनादं नेोदपिष्यामि भवद्धियं समागताः। 
दुनिवार्यनरं थोर शक्रस्य स्ययमीस्निम्‌ ॥ ६६॥ 
द्ग्यि अ आपदटोर्गीकि अट्प्यक्रा अभिधेकर करने 
न्धि प्रगिति कर स्द्राह | जपिमतेजो लेग यक्षे परि 
उन सवे व्यि माभान्‌ दनक द्वारा स्म गयी दन आश 
फा फरना अन्यन्न कटिन ण्व पयक्र१॥ ३६॥ 
गुप्माभिर्दनं युक्तमद्रुनं शुधि दुटभम्‌। 
कत्गदीरभिपिच्यन्नं स्ययमय नभस्तन्यन्‌ ॥ ३७॥ 
श्षटमऽशछ्यय टि नः स्थान. धुं पापक्षयो भवेत्‌ । 
्टमोद्राग श्रीष्रष्ण्न सयं षी 
श्य पृथ्वीधर सरमया दर्यं 
सनाय त्यय सन्ध्य दन्ना 
य दुनयर्‌ दम सय लोगो 
गा |} ३८३ ॥ 


४ १4१ 


(18 1114 


त्याद्र ्ट 
| यापनयर्मीमि भव्य द 
चयि | एम -पक्चपृरनद 


म प्राण वनेष हैदर द 


[2 


विष्णुपवं ] 


स्नापनं च ङष्णाय देवदेवाय धिष्णवे ॥ ३८ ॥ 
आगच्छध्वं सृपघरेषठा ' न भयं क्ुमदहथ । 

रेष्ठ नरपतियो { आपलोग देवाधिदेव विप्णुखरूप 
श्रीकृप्णको नहटनेके स्यि आदये । उनसे भय न कीमिये॥२३८३॥ 
आवयोः तसखन्धानो युष्मदर्थं जनार्दनः ॥ ३९॥ 
सर्वेषां मजेन्दराणामभयं ऊरूते दरिः । 
विद्युदधभावः कृष्णस्तु आवयोरष्टतच्वतः ॥ ४०॥ 

हमने आपरेरगोकि ल्ि जनार्दनसे संधि कर खी द । 
भगवान्‌ श्रीदरि समस नरेशोको अमयदान कर रदे द। 
हमने श्रीछष्णकरे खरूएको यच्छी तरह देख ओर समक्न 
ख्य है | आपलोगोके प्रति इनका भाव सर्वथा 
शद्ध है ॥ ३९-४० ॥ 
मागधस्य विदेेण न वैरं हदि दयते । 
यदत्र कारणं कायं तद्‌ भवद्धिविंचिन्त्यताम्‌ ॥ ४१ ॥ 

त्रिरेषतः मगधराज जरासंधके स्थि उनके दयम तनिक 
भी वैर नदीं दिखायी देता दै! इसच्यि यहो जो कार्यः 
कारण उपसित दैः उसपर आपलोग अच्छी तरद विचार 
कर टं ॥ ४१॥ 

वै्नम्पायन उवाच 

पवं संचिन्तयामायुचंपाः शापभयार्दिताः 1 
भूयः शश्च रजेन्द्राः केशवाय महान्मने ॥ ४२॥ 

वैशम्पायनजी कहते है--जनमेनय ! रेस वात 
सुनकर वे राजा शापकरे भयते पीडित हो नाना प्रकारकी 
चिन्तार्य करने चो । इतनेमे ही उन रजेन््रोने महात्मा केगव- 
के निमित्त पुनः आकाशवाणी सुनी ॥ ४२ ॥ 
मेघगम्भीरनादेन स्वरेणापृस्यन्‌ नभः। 
वागुवाचाशरीरेण देवराजस्य शासनात्‌ ॥ ४२ ॥ 

देवराजे दासनसे किंसी अदस्य व्यक्तिने मेघके समान 
गम्भीर ध्वनिसे आकारको पूर्णं करते हुए इस प्रकार 
कटा--। ४३ ॥ 

चित्राङ्गद उवाच 

बैरोक्याधिपतिः राक्रः प्रजापालनदेतुना । 
सआक्षापयति युष्माकं चपाणां हितकाम्यया ॥ ४४ ॥ 

चिज्ाद्धद्‌ वोलखा--जरिलोकीनाथ इन्द्र प्रजा-पाठनके 
च्यि तुम सव राजा्ओका दित चाहते हुए ठम्द इस प्रकार 
अश्ञादे रदे ह ॥ ४४॥ 
न युक्तं वसतान्योन्यं कृष्णेन सह वैरिणा । 
वसध्वं प्रीतिसुत्पायय स्वराषटेयु यपोत्तमाः ॥ ४५॥ 

श्रेष्ठ नरेशगणः तुमलोग श्रीकृप्णकरे साथ वैरभाव रखवर 

„अथवा श्रीकृप्णको वैरी बनाकर जो उनके साय रहते टो; 

देस बुम्दारे स्थि उचित नहीं दै । वुर्दे एक दूरके साथ 


पञ्चाह्यत्तमो ऽध्यायः 


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(१ "+ ~ 


- ४०५ 


वैरभाव नदीं रखना चादिये । दुमलोग॒परस्षर प्रेम-भाव 
उन्न करके अपने-अपने र्मे निवास करो ॥ ४५ ॥ 
प्रणतार्तिहर छृष्णः प्रतिसेनान्तकोऽनलः । 
अनेन सद सम्प्रीत्या मोदध्वं विगतस्वसः ॥ ४६॥ 
श्रीप्ण रारणागर्तोका दुःख दूर करनेवाले ई; पर 
यातुर्ओंकी सेनाके लि कार ओर यग्मिकरे समान भयंकर दै । 
चमलोग इनके साथ प्रेमभाव रखकर निधिन्त एवं प्रसन्न 
रदो ॥ ४६ ॥ 
मलुपाणां छपा देवा बरपा्णां देवताः इरः । 
सुराणां देवता शाक्रः शक्रस्यापि जनार्दनः ॥ ४७ ॥ 
साधारण मनुप्वोके ययि राजा ही देवता ईद । राजाअकि 
ल्ि देवता ही आराध्यदेव द । देवता्ओंकि देवता इन्द्र 
ओर इन्द्रके भी देवता भगवान्‌ श्रीकृप्ण दै ॥ ४७ ॥ 
पष विष्णुः प्रयुदेवो देवानामपि देवतम्‌ । 
जातोऽयं मायुषे लोके नररूपेण केश्वः ॥ ४८॥ 
ये मगवान्‌ विष्णुदेव देवताओंके भी देवता द ! ये केशव 
ही मलुप्यलोकमे मानवरूपमे अवतीर्णं हुए दै ॥ ४८ ॥ 
अजेयः सर्वलोकेषु देवदानवमानवैः । 
कार्तिकेयसद्टायस्य अपि शूभ्रतः स्वयम्‌ ॥ ४९॥ 
समस्त रोर्कोमि देवता, दानव ओर मनुष्य इन्दं कमी 
जीत नदीं सकते । कार्तिकेयके साथ साक्षात्‌ भगवान्‌ निच्नूल- 
धारी शंकरे ल्थि भी ये अजेय ६॥ ४९ ॥ 
तस्मै देवाधिदेवाय केशवाय महात्मने । 
अभिषेक्तुं खरे; सार्धं किमिच्छेयमतः परम्‌ ॥ ५० ॥ 
उन्दीं देवाधिदेव महात्मा केावकरे च्वि देवतार्भसदित 
मेरी यह इच्छा है किं इनका रजेन्द्रपदपर अभ्पिक हो | 
इससे वद्कर मुञ्चे ओर कौन-सी इच्छा हो सकती दे ॥ ५०॥ 
न चाधिकाये देवानां राजेन्द्रस्याभिपेचने । 
तेनाहं नाभिपिञ्चामि सर्वसोकनमस्छतम्‌ ॥ ५९॥ 
परंत॒ रजेन्द्रपदपर किसीका अमिपेक करनेके स्थि 
देवताओका अधिक्रार नदीं है; इसील्यि भ सर्वलोक्रवन्दिति 
श्रीक्ष्णका स्वयं मी अभिप्रेक नहीं कर रहा हू ॥ ५१ ॥ 
सपाणामधिक्रासोभ्यं गजेन्द्रस्य निवेदने । 
गत्वा युयं चिदभौयां क्रथकेरिकयोः सह ॥ ५२ ॥ 
संचिन्त्य विधिदृष्टेन कुरुध्वं नृपसत्तमाः 
रेष्ठ नरेगण { रजेन्द्रपदपर क्रिसीको प्रतिष्ठित कृरने- 
का अधिकार केवर राजाओंको दी प्राप्त हे । अतः तुम लोग 
क्रथ यर केगिकके साय विदर्मपुरीभ जाकर भली्भोति सोच- 


विचार करके ास्रीय विधिके अनुसार श्रकृप्णका अभिषेक 
करो | ५२१ ॥ 


०६ 


भीमष्टाभारते लिरमगि 


[ शरिवंशे 


प्रीतिसन्धानकरालो ऽयप्रिति संचिन्त्य वासवः ॥ ५३ ॥ 
योधना्थं विखष्टोऽहं युष्माकं मयुजेश्वयः । 

नरेशसे ! यह त॒म सगे दयि परस्पर परमपूर्वक संधि 
करर ठेनेका समय दै । दसव्यि वुम्दं समन्चानेके च्ि 
देवता्ओकी ओस्से दूत बनाकर भेजा गया र ॥ ५३३ ॥ 


विदर्मनगरे कृष्णः श्रावितो ऽस्याधिवासनम्‌ ॥ ५४ ॥ 
राजेन्द्रत्वाभिवेकार्थं राजानौ कथकैरिकौ 
ताभ्यां सह छपध्रेठाः कत्वा सुमह दुत्सवम्‌ ॥ ५५ ॥ 
अभिचेकेण सत्छृत्य प्रतिगृह्यास्य दृक्षिणम्‌। 
आगमिष्यथ संहृ; पुनरेव स्वयंवरम्‌ ॥ ५६॥ 
रेष्ठ राजाज ¡ भगवान्‌ श्रीकृष्ण विदर्भं नर्स विराज- 
मान द जौर उर उनका अधिवास ( अभिवेकका पूर्वाङ्ग 
संस्कार ) सुना दिया गया दै अर्थात्‌ वे पूर्वाङ्ग संस्कास्ते 
सम्पन्न हो गये द | राजा क्रथ यर कैरिक उनका रजेन्द्र- 
पदपर अभिषेक करनेकरे ल्यि सारी तैयारी कर चुके दै । ठम 
सव्र ठोग उन दो्नैकि साय मदान्‌ उत्व करके राज्यामिपेक- 
के द्वारा भगवानका सक्तार यौर उनकी परकरिमा करनैके 
पश्चात्‌ पुनः प्रसन्नतापूर्वकर खयंवरसम टीट आथ ॥५४.५६॥ 


जरासंधः सुनीथश्च स्क्मी चैव महारथः। 
श्ाद्वः सौभपतिग्चैव चत्वारो राजसत्तमाः ॥ ५७॥ 
रङ्गस्याश्रन्येतोर्हिं तिष्ठन्तु इष्ट॒ पार्थिवाः । 

यह रङ्गभूमि सूनी न दो जाय--इसके ल्य यहो चार 
र्ठ राजा बैठे र्द--जरासंधः सुनीथः महारथी दक्मी ओर 
सौमविमानक्रे अधिपति राजा यास्व ॥ ५७१ ॥ 

वैद्यम्पायन उवा 

पवमाकशां खरेदास्य शरुत्वा चित्राङ्रदेरिताम्‌ ॥ ५८ ॥ 
गमनाय मति चकुः सर्वं एव दृपोचमाः 
अचुक्षाता नरेन््रण जरासंधेन धीमता ॥ ५९॥ 


कैदाम्पायनजी कहते है--इस प्रकार चिवराङ्गदके 
द्वारा कटी गयी देवेश्वर श्नद्रकी आशा सुनकर उन समी 
श्रेष्ठ नरेशेनि श्रीकृष्णके अमिषेकर्मे जानेका विचार कर छया । 
बुद्धिमान्‌ नरेश जरासंधने मी उं जानैकी अनुमति 
दे दी ॥ ५८-५९ ॥ 
भीष्मकं पुरतः इत्वा प्रयाताः स्ववलेचछैताः 
भीष्मक मषहावद्ुः स्ववटेन समन्वितः ॥ ६० # 
जगाम ` पाथवेः सद्धं देद्यमानेन चेतसा । 
यज कृष्णो महावाहुः कैशिकस्य निवेश्यने ॥ ६१॥ 

फिर तो वे राजा मीप्मकको अगि करफे अपनी सेना्ओ- 
के साय वर्ह गये | मदाव्राहू भीष्मक मी अपनी तेनकि साथ 
दूसरे जारको साय ल्मि कैरिकके मवनर्मे, जँ महावराह 
श्रीकृष्ण विराजमान थे; गये । उस समय अपने पुत्रके दोषे 
उनका चित्त चिन्ताकी आगरम जर रहा था ॥ ६०-६१ ॥ 


दुरादेव पधरक्र्न्ती पताकाध्वजमालिनी। 
द्युभा देवसभा सम्या स्नानहेतोरिदागता ॥ दे२॥ 
भगवान्‌ स्नानक्रे यि खुन्दर , सुर्य देवसभा दस 
भूतल्पर उतर आयी थी; जो दूते दी प्रकारित हो री 
थी । वह ध्वजा, पताक्रा्जमि अकृत यी ॥ ६२॥ 
द्िन्यरल्लप्रभाकीणी दिव्यध्वजसमाकुखा । 
दिन्याभ्बरपताकाढ्या दिव्याभरणभूषिता ॥ दैरे॥ 


उसमे दिव्य स्नौकी प्रमा सव र व्यात दयो रदी थी। 
दिव्य ध्वजाय फदराती थी । दिव्य वर्की पताक उसकी 
शोमा वदती थीं यर दिव्य आभूरणों ( सजावय्की 
सामग्रियों ) ते वद समा विभूषित थी ॥ ६२ ॥ 
दिन्यसख्ग्दामकलिखा दिन्यगन्धाधिवासिता । 
विमानयानैः श्रीमद्धिः समन्तात्‌ परिवारिता ॥ ६४ ॥ 
उसमे जगह-जगह दिव्य पू्प्योकी माठरः ल्टक री 
थी । दिव्य गन्धि वह खमा शुवाषित थी । विमानपर 
चल्नेवाटे कान्तिमान्‌. देवतानि उसे सव ओरसे प्रर. 
रखा था ॥ ६४॥ 
दिव्याप्ससेगणाद्वैव विद्याधरगणास्तथा । 
गन्धवौ मुनयर्चेव किन्नराश्च समन्ततः ॥ ६५॥ 
उपगायन्ति देवेक्षामम्बरान्तरमाध्िताः । 
स्तुवन्ति मुनयश्चैव सिद्धाश्च परमर्पयः ॥ ६६ ॥ 
दिव्य अप्वराओकि समुदायः विधाधरोतरे समूह, गन्धर्वः 
मुनि ओर किन्नर स्व ओर आकारमे लित हौ देवेश्वर 
श्रीकृष्णका यरा गाते ये तथा मुनिः सिदध एवं मदर्षिं उनकी 
स्ति करते ये ॥ ६५-६६ ] 
देवटुन्दुभयद्चरेैव स्वयमेवानद्‌न्‌ दिषि। 
पञचयोनिसमुत्थानि गन्धचु्णन्यनेकशः ॥ ६७ ॥ 
समन्तात्‌ पात्यमानानि चाकाश्चस्थेर्िंवौकसैः । 
देवतार्ओकी दुन्दुमिर्यो आकाशम खयं ही बज उसी । 
आकाशम खद हुए देवता सव॒ ओरसे वारंवार पं्वयोनि- 
जनित सुगन्धनूणं गिरा रदे ये ॥ ६७१ ॥ 
स्वयमागत्य देवेन्द्रो देवैः सह शचीपतिः ॥ ६८॥ ` 
विमानवरमारुह्य सप्रकाश्चः स्थितो ऽम्बरे । 
देवताति साय श्चीवस्टम देवेन्द्र खयं आकर एक ,.. 
रेष्ठ विमानपर आरूढ द आकराश्मे सित ये ओर सव्र लोग 
उर प्रत्यक्ष देख र्दे ये ॥ ६८१॥ 


१ विभिन्न वृक्षुकि मूलः त्वचा, पत्र, पुष्प भीर फल- ये 


पोच योनि अर्थात्‌ क्रारण हं । नसे नो गन्धचूर्णं तैयार श्रिये गये 
६ छन्द पश्चयोनिजनित कहते दै । अथवा मन्दार, पारिजात, पंतान, 
कद्पवृक्न ओर ्रिचन्दन नाभक जो पाँच देववृक्ष है, उनसे प्रकर 
हप ॒दिम्य गन्धचू्णंको भी वर्धो पञ्रयोनिजनित कष्ठ गया 


. र। 


विष्णुपवैं ] 


पश्चाशचतमो ऽध्यायः 


४०७ 


अष्ठौये छोकपाखास्ते स्वासु दिश्चु समास्थिताः ॥ ६९ ॥ 
उपगायन्ति रत्यन्ति स्तुवन्ति च समन्ततः । . 

जो आठ खोकाल ये, वे अपनी दिशाओमि सित, दो 
सव॒ ओर भगवान्‌. यशका गान, नृत्य णवं स्वति 
करते थे ॥ ६९३ ॥ 
श्रुत्वा सुतुमुं नादं सर्वं एव नराधिपाः ॥ ७० ॥ 
विस्मयोत्फुलनयना विविश्चुस्ते सभां श्युभाम्‌ । 

उनके दृत्य-गान्‌ आदिके सम्मिङिति शब्दको सुनकर 
सभी नरेसेकर नेत्र आश्वयंते खिल उठे ओर उर्न्होनि उस 
मङ्घल्मयी दिव्य सभाम प्रवेश क्रिया | ५०१ ॥ 


कैरिकञश महावाहुरुपगम्य नराधिपान्‌ ॥ ७१॥ 
प्रवेशयामास वदी प्रतिपूज्य यथविधि। 

उस समय वच्छान्‌ महावराह कैशिक समस्त नरेश 
पास जाकर उनका , विधिपूर्वक पूजन करके उन सवरको भीतर 
ठे अयि ॥ ७१९ ॥ 


निवेदिते सुरभेष्टे पार्थिवानां समागमे ॥ ७२ ॥ 
निर्जगाम दरिः श्रीमान्‌ स्वंमङ्गलपूजितः। 

जव सुरभेष्ठ भगवानूको समस्त राजा्ओके ञ्युभागमनकी 
सूचना दी गयी; तवर सम्पूरणं मद्गल्मयी सामभ्यो पूजित 
हुए वे श्रीमान्‌ इरि भवनसे वाहर निकले ॥ ७२१ ॥ 


ततो ऽभ्बरस्थास्ते दिन्याः कलश्ादवैरकण्डठिनः ॥७३॥ 
सहकारसमायुक्ता “ ववयचुंजंलदा इव । 

तद्रनन्तरः आकाशम सित हुए वे दिव्य कलः जिनके 
कण्ठमे वस्र स्ेटे गये ये तथा जो आभ्रपस्टर्वोसे सुखोभित 
येः भगवानफ्रे ऊपर शदलेक्रि समान जठ्की वर्षा करने 
लगे ॥ ७३१ ॥ 
दिव्यक्राञ्चनरलवेर्दिव्यपुप्पसमन्वितैः ॥ ७४॥ 
गन्धचूणेव्िमिधैश्च राजेन्द्रस्याभिषेचने । 
यथोक्तविधिपू्ेण अभिषिच्य जनार्दनम्‌ ॥ ७५॥ 
दशैयित्वा नरेन्द्राणां दिव्यैरावरणेः शुभैः । 

उन दिव्य कलरघनि भगवान्‌का राजेन्द्रपदपर अभिषेक 
करते समय दिव्य सुत्र्णं एवं रत्नेके समुदायसे युक्तः दिव्य 
पुष्पे सुवासित तथा सुगन्धनर्णसे मिश्रित जके द्वारा 
शाखोक्त विधिकर अनुमार श्रीङ्प्णके अभिषेका कार्यं सम्पन्न 
करके उन्द सुन्दर दिव्य वच्राभूष्रणेदारया अलंकृत एवं नरेश 
के चयि दर्शनीय कर दिया ॥ ७५७५१ ॥ 


दिव्यास्बरतिचिनैश्च दिव्यमाल्य।युलेपनैः ॥ ७६ ॥ 

सत्डस्य विधिदद्ाश्च उपविष्टो जनार्दनः । 

शुभे देवसभे रम्ये स्नानदेतोरिहायते ॥ ७७ ॥ 
नश्चात्‌ दिव्य वलः विचित्र दिव्य माला ओर दिव्य 

अनुलेपने घक्ञ अयि हुए राजार्भोक्रा विधिपूर्वकं सत्कार 


१ 


करके उनकी अनुमति ठे, भगवान्‌ शीक्ृप्ण अपने स्नानक्रे 
खि इस भूतलपर उतरी, हुई सुन्दर एवं रमणीय देवसभाके 
भीतर ८ एक उज्ज्वल दिष्य सिंहयासनपर ) विराजमान हुए ॥ 


उफास्यमानो यदुभिर्विदर्मैश्च ` नराधिपेः। 
वैनतेयश्च बवटखवान्‌ कामरूपी नरारतिः ॥ ७८॥ 
दक्षिणं पाद्वमाधित्य आश्नसथो महावलः । , 
क्रथश्चःकैरिको वीरो वामपादं तथासने ॥ ७९ ॥ 
उपविष्टौ महात्मानौ देवस्या्चुमते रपो । 
तथेव वामपादं तु वृष्ण्यन्धकमहारथाः ॥ ८०॥ 
सात्यकिग्रसुखा चीरा उपविष्टा मष्टावलाः। 

उस समय यादव तथा बिदर्भदेशीय नरेश उनकी सेवामे पास 
ही खड़े थे । इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले वर्वान्‌ एवं 
महापराक्रमी गरुड मनुप्यक्रा रूप धारण करे भगवान्‌ दाहिने 
त्रगल्म जाकर एक आसनपर बैठे | वीर क्रथ ओर कैरिक- 
ये दोनो महात्मा नरेश भगवान्की आज्ञा पाक्रर उनके बाम 
पारर्वमे एक आसनपर व्रैठे । उसी प्रकार वाम भागम हयी 
वृष्णि ओर अन्धक वंशके महारथी सात्यकिं आदि मदाब्रटी 
वीर भी विराजमान हए ॥ ७८-८०१ ॥ 


भास्करभ्रतिमे दिव्ये दिग्यास्तरणविस्वते ॥ ८१॥ 
खुखोपविष्टं श्रीमन्तं देवैरिव शचीपतिम्‌ । 

सूरये समान तेजस्वी तथा दिव्य वि्ीनोसे सुसजित 
दिव्य िंदाखनपर सुखपूर्वक वेढे हुए श्रीमान्‌ मगवान्‌ 
श्रीकृष्ण देवताओंकरे साथ विराजमान जचीपति इन्द्रके समान 
रोभापारदेये॥ ८१२ ॥ 


सचिवैः श्राविताः सवे प्रविष्यस्ते नराधिपाः ॥-८२ ॥ 
यथार्हंण च सम्पूज्य राजानः सर्वं पव ते । 
खुखोपविष्ास्ते स्वेषु आसनेषु नराधिपाः ॥ ८३॥ 
तदनन्तर मन्तिर्योमे गजाज्ञा पाफर सभी नरेद उस 
भवनम प्रविष्ट हुए 1 उन समस्त मरेशोने यथायोग्य 
भगवानूकरा पूनन करिया; फिर वे अपने मासर्नौपर सुखपृवेक 
बैठ गये ॥ ८२.८२ ॥ 
केशिकस्तु महापाज्ञः स्वंशास्रा्थवित्तमः | 
पूजयित्वा यथान्यायमुवाच व्रतं वरः ॥ ८४ ॥ 
इसके बाद वक्ताओमि श्रे महाज्ञानी कैशिक, जो समस्त 
राखरके मम्च थे, यथोचितरूपते मगवानूकरा पूजन करे 
इस प्रकार ब्रोठे--॥ ८४ ॥ 


केथिक उवाच 
अविक्ञाता नृपाः सवं मादुप्रोऽयमिति प्रभो । 
भवन्तसुपरूद्धानां देव त्वं क्लन्तुमर्हलि ॥ ८५॥ 
कैशिकने कदहा-प्रभो ! देव ! अ्रतक सवर राजा 
अशःनवश आपके विषधर यदी जानते धे क्रिये मी ममुप्यही है; 


ष 
ष 


अमष्टाभास्ते लिकभागे 


५५५ 


, इसीव््यिये लोग आपके प्रति अपराध कर वैठे द । आप 
इन अपराधि्योको क्षमा कर दँ ॥ ८५ ॥ 
श्रीकृष्ण उवाच 
न मे वैरं प्रवसति एकाहमपि कैशिक । 
विशेषेण नरेन्द्राणां क्षघ्रधमें ऽवतिष्टतम्‌ ॥ ८६ ॥ 
योद्धव्यमिति धर्वेण अध्ने ' तु पराङ्मुखे । 
तेषां किदेतुना कोपः कर्तन्यस्त्ववनीश्चराः ॥ ८७ ॥ 
यदटतं तदतिक्रान्तं ये मृतास्ते दिवं गताः। 
पष धर्मा चरोके ऽस्मिञ्नायन्ते च भ्रियन्ति च ॥ ८८ ॥ 
श्रीकृष्ण योखे -केयिक ! मेरे मन्म एक दिनि मी 
वैर नद्य टिकता दै । विङेष्रतः क्षनिय-धर्ममे स्थिर रहनेवले 
नेरयौपरः जो युद्धको धर्म समन्नकर उसमे प्रदत्त होते यौर 
अधर्मति मह मोदे रहते है, कंसस्य क्रोध किया जाय | 
भूमिपालो | जो कत गया, वह गया; जो लोग मर गये, वे 
खर्म चठे गये । इस मनुष्य-खोकका यह स्वाभाविक धर्म॑ 
( नियम ) दै करि यदो प्राणी जन्म ठेते ओर मस्ते रदते ई ॥ 


तस्मादद्योच्यं भवतां सतां च नराधिपाः 
क्षन्तव्यं रोचतेऽस्माकं वीतवेस भवन्तु ते ॥ ८९ ॥ 

अतः नरेदवरो ! जो खोग मर गये या मारे गये, उनके 
स्यि आपरेोर्गोको ओक नदीं करना चाहिये । हमे तो क्षमा 
ही अच्छी लगती है | अतः वे सव राजा आजते वैरभावका 
त्याग करके निर्वेर हो जर्ये ॥ ८९ ॥ 

वैद्यम्पायन उवाच - 

पवसुक्त्वा नरेन्द्रा स्तानादवास्य मधुखूदनः । 
कैरिकस्य मुखं वीक्ष्य विराम मदादयुतिः ॥ ५०॥ 

वैश्स्पायनजी कते है--जनमेजय ¡ उन नेरेषि 
णखा कहकर उन्दै आइवाखन दे महातिजसी भगवान्‌ मधुसूदन 
कैदिकके भुदकी ओर देखकर चुर <¦ गये ॥ ९० ॥ 
पतस्मिन्मेव काटे तु भीष्मको नयकोविंदः। 
पूजयित्वा यथान्यायमुवाच वदतां वरः ॥ ९१॥ 

इसी समय वक्तार्थमिं श्रेष्ठ नीतिकुशाल राजा भीष्मक 
भगवानूक्रा यथोचित पूजन के वोले-॥ ९१ ॥ 


इति श्रीमहाभारते खिरूभागे दरविगे विष्णुपर्वणि रकिमिणीख्यंवरे पजादात्तमोऽध्यायः ॥ ५० ॥ 


इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिरमाग दसिवंदोके अन्तर्भत्‌ विष्णुपर्व 


स्विमिणीका 


स्वयंरविषयक पचासर्व अध्याय परा हुमा ॥ ५० ॥ 


एकयन्चारात्तमोऽध्यायः 
श्रीकृष्ण ओर भीप्मकका संवाद, भीप्मकदवारा श्ीकृष्णकी स्तुति तथा श्रीकृष्णका मथुरागमन 


भीष्मक उवाच 
पुश्रो मे वाटभावेन भगिनी दातुमिच्छति । 
खयं वरे नरेन्द्राणां न चाहं दावुमुत्सदे ॥ १ ॥ 
भीष्मकने कष्ा--भगवन्‌ ! मेरा पुत्र सक्मी अपने 
बाख्चापस्य या अविवेकरके कारण अपनी वरहिनिको नसेनद्रोकि 
समक्ष सखयंवरम देना चाहता है; परं मेय इच्छा उसे 
खयवरम देनेकी नदीं दे ॥ १॥ 
अतीव वारभावत्वाद्‌ दातुमिच्छेन्मतिमैम । 
पका येकं समालोक्य वरयिष्यति मे मतिः ॥ २॥ 
अत्यन्त व्रचपन या मूरखताके करारण दी वह अपनी 
हिनको सवयंवरम देना चाहता दै, वा मेरा विश्वास दे | 
मेरी राय तो यदी दै कि वह अकी एकमा मनोनीत पतिः 
कावरण करे ॥ २॥ 
अतः प्रसादयिष्ये त्वां परजटुनयदेतुना । 
श्रसादं कुर दवेश्च क्षन्तुमरर॑सि मे प्रभो॥ २॥ 
अतः प्रभो | मै अयने पु्रकरी दु्नीतिके कारण ( अपने 
को उप्रराधी मानकर ) अणो प्रसन्न करना चाहता हू | 
दैवेश्वर ¡ आप मुभपर ङपा बने रे ओर मेरे अपराधक्रो 
क्षमाकरं) ३॥ 


श्रीशष्ण उवा 


वालभावेन पुत्रेण चालितं दरपमण्डलम्‌ । 
यदा भवति वे भ्रोढः कीदशो ऽविनयो भवेत्‌ ॥ ४ ॥ 


श्रीङप्ण वोले-राजन्‌ ! आपके युते वाल्वावस्म 
दी खमस्त नरेश-मण्डलमे हलचल मचा दी दै; किर जब्र वह 
परोद दोगा, तवरन जानि उसकी उद्रण्डता कैसी हयो 
जायेगी १॥ ४ ॥ 
खर्यन्दु लदर्शोरखोकां स्तपसोपार्जितमियः । 
लोकेऽस्मिन्‌ नस्देवानां महाङुटसमुद्ध वान्‌ ॥ ५ ॥ 
पकस्यापि सपस्ाप्रे मोहाद्‌ यो वितथं वदेत्‌ । 
न स तिष्टति रोकेऽस्मिन्‌ निष हेद्‌ दण्डवह्धिना॥ ६ ॥ 


जो एक राजाके सामने भी मोहवश च वोख्ता है, वह 
राजार्ओकरो मिलनेवाले सूर्यं ओर चन्द्रमाके समान प्रकाशमान 
तथा तपस्यसि श्रीसम्पन्न ए छोर्कौकोः जो उसे महान्‌ कुरे 
उत्पन्न होनेके कारण सुगमतापूर्वक कयि गये वदे-वड़े यश- 
द्वारा प्रा हु ईः यम-यातनाकी आगसे दग्ध कर दैतादै 
ओर उन लोकेमिसे ही एक जो यह लोक दैः इसमे भी बह 
रह नदीं पाता हे ॥ ५-६ ॥ 


दिष्णुप्वं 1 


पर्कपञ्चादाशषमोऽध्यायः 


४०, 


यव 


पप धर्मं नरेन्द्राणामिति ते विदितं भरभो। 
सोकधतरं पुरस्रत्य पुस गीतं स्वयम्भुवा ॥ ७ ॥ 
परमो | यह ( सत्यमापण ) नेरेशोौका धमं दै । ‰स वत्त. 
फो आप भी जनते ष्च कगे । खयम्भू. ब्र्याजीने पूर्वकाले 
लोकधर्मको सामने रखते हु सत्यके ही मदस्वका मान 
करियादै॥७॥ ` 
कथं तव सुतस्तेषाम्रते मयुजेश्वर ! 
वषतुमर्हंति राजेन्द्र॒वितथं साजसंसदि ॥ ८ ॥ 
मनुजैश्वर ! राजेन्द्र ! एेसी दामे आपका पुत्र. राज- 
समामे उन राजाओकि भागे श्चूढ कैसे गोठ सकता दै! 
` ( जिम आपकी सम्मति नहीं होगी, उखकी घोषणा वह्‌ कैसे 
करर सकता टै) ॥ ८ ॥ 
तां रड्मतुरं कारयंस्तनयस्तव । 
फथं त्वया हाविज्ञात इति मे संशयो मदान्‌ ॥ ९ ॥ 
आपका युव जवर वेखा अगुपम रंगल वनवा रहा थाः 
तवर आप उसकी उस चेष्टसे किस तरह अनजान रह गये १ 
यह्‌ मेरे मनम मदान्‌ संश्य ६ ॥ ९ ॥ 
आगतानां नरेन्द्राणामनराकँन्दुवर्चसाम्‌ 1 
यथाण तु सम्पूज्य आतिथ्यं ईतवानसि ॥ १०} 
अग्निः सूर्यं जीर चन्द्रमाके समान कान्तिमान्‌ नरेश 
यो पधारे द ओर आपने उन सवक्रा यथायोग्य पूजन करके 
आतिच्यसत्कार किया है । ( पिर आप इन सवर वार्ति अपने- 
को अपरिचित कैते वता रदे ई) ॥ ९० ॥ 
रथाश्वनरनागानां षिमरद॑ंमतुरं तथा । 
कथं न क्ातवान्‌ राजंस्तव पुश्रस्य चेष्टितम्‌ ॥ ११॥ 
राजन्‌ ¡ रथ षोडः हाथी ओर पेद सैनिको भरी 
हुई चतुरद्धिणौ सेनाका जो अनुपम संहार हु रै, वह सप्र 
आपके पुत्रकौ कुचेष्टका ही फल है, इस वातकी जानकारी 
आपको केते नदीं हुई !॥ ११॥ 
विषादो न भवेदन्न चतुरुद्वरागमे। 
कथं न क्षायते राजक्चिति मे चुद्धिसंदयः ॥ १२॥ 
राजन्‌ ! जव यहो चतुरङ्खिणी सेनाकरा जमाव होगा, तव 
क्या को सेदजनक घटनानदीं घटित होगी--यह्‌ बात आप- 
की समक्षम केसे नदीं आ रह है ! यद मेरी बुद्धिम संशय 
उलन्न हो गयादे॥ १२॥ 
ममागमनमेवेह प्रयेण न हितं तव। 
अतो न ऊृतमातिथ्यमपाघ्नाय नरेश्वर ॥ १३५ 
नरेश्वर ! मेय यहो आगमन हयी प्रायः आपके विये हित- 
र नहीं ै-रेसा समकर ही आपने मुस अपा्का 
अआतिष्य-दक्तार नद किया ॥ १३ ॥ 


५ ~ ० ~~~ ~~ ----- ~ 


पत्रेभ्यो दीयतां कन्या मामपास्य नरेश्वर । 
ममागमनदरोपेण कथं कन्यां न दास्यसे ॥ २४३ 
राजन्‌ ! सुते छोडकर आप इन सुयात्र राजार्ओंको अपनी 
कन्या दीजिवे ! मेरे आ जनेके दी दोपते अप अपनी कुन्या- 
का दान कैवे नदीं करेगे ॥ १४॥ 
कन्याविघ्नं च क्वणो नरके परिपच्यते । 
इति धमविदैर्गति  मन्वादिभि्रोत्तमेः ॥ १५ ॥ 
कन्याके विवाह्य विव्न डाल्नेवाश मनुष्य नरकक्ी 
आगर्भ पकाया जाता दै--रेखा मतु आदि धर्मश नरेेनि 
का दे १५॥ 
अतोऽर्धं न प्रविष्टोऽदं रङ्गमध्ये विक्षास्पते। 
विदित्वा नरृतातिथ्यं नरदेव तवार्यम्‌ ॥ १६१ 
प्रजानाथ [ इसील्यि मै रङ्गभूमिमे नद्यं आया ह 
नरदेव ¡ मुक्ने पदले दी श्त होगया था कि आपका धर 
आतिथ्यदीन दै ॥ १६ ॥ 
हियाभिभूतो रजेन्द्रपाथिबोऽदं नराधिप । 
विदर्भनगरे राजन्‌ बरवि्रमहेतुना ॥ १७ ॥ 
राजन्‌ | नरेश्वर { मेने विदभं नगरमे विश्नामके ष्थि 
जो अपनी सेनाको ठहरा दिया--इख्के कारण रामे््रोका 
राजा होकर भी भै लजासेगड़ गया हूँ (्योकि यदि मनि यँ 
विश्राम न करिया हता, तो मसे भपके द्वारा सत्त न होने- 
का अपमान नहीं सहना पडता )॥ १७ ॥ 


आवाभ्यां रतमातिथ्यं कैरिकस्तु प्रियातिथिः । 
उपितौ च यथा खगे पुरा गरुडकेदादौ ॥ १८॥ 

इतनेपर भी मैने ओर गर्डने पूरा-पूरा आतिथ्य-सत्कार 
प्रात किया है; क्योकि सजा कैरिकको अतिथि प्रिय है । हम 
दोनो यहो उसी तरद सुखे रदे है, जे पहरे पैकुण्ठधाममे 
रदा करते थे ॥ १८ ॥ 

| वैदचमायन उवाच 
पनमेव चवाणं तु कृष्णं चाग्बज्नचोदितम्‌ । 
चछक्ष्णवाचाम्बुनाऽऽसिच्य दामितोऽश्निखिवि ज्वलन्‌ १९ 

वेदास्पायनजी कहते ह-- जनमेजय ! एेसी ही वाति 
कहकर जिन्दँने वाग्बग्रका रहार किया था, उन्दी मगवान्‌ 
भीकृष्णको, जो अग्निके समान प्रज्वलति दो रदे ये, राजा 
मीष्मकने अपनी मधुर-काणीरूप जल्पे सीचक्रर शान्त 
करिया | १९॥ 

भीष्मक उवाच 

प्रसीद्‌ देवरोकेश पाहि मां छोकषश्षासन । 
अक्षानतमसाविष्टं क्षननक्षुः्दो भव ॥ ६० ॥ 

भीष्मक योटे- 'देवलयकेदवर ! आप सुश्षपर प्रसन्न 
हीः ल्ेकदासक परमेश्वर } मेरी रा कीलियि। मँ अशानरूपी 


४१० 


महाभारते चिलभागे 


[ श्सिविंशे 


अन्धकारते धिरा हुभा हः, आप सुने जञनरूपी ने प्रदान 

कर | २०॥ 

मद्धष्ये मांसचश्चुष्रदसम्यग्विदिता वयम्‌ । 

न प्रसिद्धश्वन्ति कमणि क्रियतामपरिचारणात्‌ ॥ २१९ ॥ 
मनुष्ययोनि जन्म केकर मांसपिण्डपर ही दृष्टि रखनेके 

कारण अथवा केवल स्थूल्दर्शी दोनेके कारण दम सम्यग्‌ शान- 

से वञ्चित दह ८ हमारी बुद्धि उल्टी हो गयी द ) | अतः अवि- 

न्वासूर्वक कर्म॑करनेके कारण हमारे काय॑ षिद्ध नदीं दो 

पते ॥ २१॥ 

भवन्तं श्रारणं प्राप्य देवानामपि देवतम्‌ । 

सम्यग्‌ भवतु मे टिः सम्पद्यन्त च मे क्रियाः॥ २२॥ 
आप देवताओंकि भी देवता द । आपकी शरणमे आकर 

मेरी ट्ट उत्तम दो जाय ओर मेरे सरे कर्म ठीक ठंगसे 

सम्पन्नो ॥ २२॥ 

अनिष्पन्नामपि क्रियां नयोपेतां विचक्षणाः । 

फटदां हि प्रक्र्वन्ति मदासेनापतियंथा ॥ २३ ॥ 
जैसे प्रधान-खेनायति अयोग्य सेनाका भी नीतिपू्क 

सश्चाठनकर उसे सफल चना देता दै, उसी तरद विदान्‌ 

पुष असम्पन्न कर्मको भी यदि वह न्याययुक्त दैः तो फल- 

दायक वना देते ६ ॥ २३॥ 

भवन्तं शरणं प्राप्य नाति वाधति से भयम्‌ । 

यन्मया चिन्तितं कायं तद्‌ भवाज्छरोत॒मर्दति ॥ २४॥ 
आपकी शरणम आ जानिके कारण अव सन्ने किषी 

प्रकारका भय न्दी सता रहा है । मने जो कार्यं सोचा है, उसे 

आप सुननेकी कपा.करे ॥ २४॥ 

न दातुमिच्छे कन्यां वै पाथिवेभ्येः खयंवरे । 

प्रसादं कुरू देवेदा न कोपं कर्तुमर्हसि ॥ २५॥ 
देवेश्वर | मँ खय॑वसमं अयि हुए राजा्थको अपनी कन्या 

देना नहीं चाहता 1 आप भन्नपर कृपा करः क्रोधन कर ॥ 

श्रीकष्ण उवाच 

घचनेन किमुक्तेन त्यया राजन्‌ महामते । 

खकन्यां दास्यसे नेति कोऽ नेता तवानघ ॥ २६॥ 
श्रीङ्कष्ण वोखे--मदामते नरेश्वर ! आप केवल वार्ति 

यनाते ई! इससे क्यादोगा१ अनघ ! आप अपनी 

कन्या किसीको देगे या नर्ही--दइस विषरयम आपको रोकनेवाला 

फौन दै १॥ २६॥ 

मा देदीति न चाख्येयं ददस्वेति न मे वचः । 

रुपिमण्या दिव्यमूर्तित्वं सम्बन्धे कार्णं मम ॥ २७॥ 
आप दूसरेको कन्या न दीजिये, सदे दी दीजिये यद 

दोनों प्रकारकी बति सुघने नदीं कहनी चादिये। रुक्मिणी दिव्य- 


रूपधारिणी देवी है, उसकी यह दिव्यता-दी . उसके साथ मेरे 
मावी सम्बरन्धमे कारण दै ॥ २७॥ ~ 

मेख्करुटे पुरा देवैः छसमंशावतारणम्‌ 1 

तदा निखृएछ श्रीः पूतं गच्छ त्वं पतिना सह ॥ २८॥ 
मायुष्ये ऊुण्डिनगरे भीष्मस्याङनोदरे । 
जायस्व विपुलश्रोणि प्रत्यवेक्ष्य च वासवम्‌ ॥ २९॥ 


पूर्वकाले मेस्पर्वतके दिखरपर एकच, दए देवतानि 
अपने-अपने अंशको भूतलपर उतारा था, ।-उस समय ब्रह्माजी- 
ने लक्षमीसे कदा--'देवि | ठम मी अपने पतिके साध जाओ | 
ओर मनुष्यलोके कुण्डिनपुरके भीतर साजा भीप्मककरी रानी- 
के गर्भे जन्म छो । विपुलभोणि ! इन्द्रपर कृपा करके तुर 
एेसा करना चाहिये ॥ २८-२९ ॥ ` 
तेनाहं वः परवक्ष्यामि राजच्ररृतकं वचः । 
श्ुत्वा स्वयं विनिधित्य यद्‌ युक्तं तत्‌ करिष्यति ॥ ३०॥ 
रुक्मिणी नाम ते कन्या न सा प्राङृतमायुषी । 
श्रीरेषा बह्मवाक्येन जाता केनापि हेतुना ॥ ३१॥ 
राजन्‌ ¡ इसीलियि मेँ आपसे खामाविक् वात कद रहा 
हरः इसमे कीं छृनिमता या वनावट नहीं है । इस बातको 
सुनकर आपकी कन्या रुक्मिणी स्यं द्यी अपने कर्तन्यकां 
निश्चय करके जो उचित समन्चेगीः वह .करेगी; र्योकि वद 
साधारण सत्री नदीं है, यद साक्षात्‌ लक्ष्मी है ओर किसी कारण- 
वश ब्रक्लाजीके कदनेसे यदौ प्रकट हई दै ॥ २०-३१ ॥ 
म चसा मसुजेन्द्राणां खयंवरविधिक्षमा। 
पका त्वेकाय दातव्या इति धर्मों व्यवस्थितः ॥ ३२॥ 
वह नरेनद्रौकरे सामने स्वयंवरविधिका पाल्न करने 
योग्य नदीं है । एक कन्याको एक ही वरे हाथमे देना 
चादि--यही सिद्धान्तभूत सुखिर धर्म है ॥ ३२ ॥ 
न च तां राक्यसे राजल्टछष्मी दातुं खयं चरे । 
सदशं , वरमालोक्य दातुमद॑सि धर्मतः ॥ २६ ॥ 
राजन्‌ ! आप उस लक्षमीको सयंवरमे नदीं दे सकते । 
किसी योग्य वरको देखकर धमपर्वक उसके हाथमे उसका 
दान कर देना ही आपके लिये उचित है ॥ ३३ ॥ 
अतोऽर्थं वैनतेयोऽयं विश्चकारणहेतुना । 
आगतः करण्डिनगरे देवराजेन चोदितः ॥ ३४ ॥ 
इखीष्िये देवराज इन्द्रस प्रेरित होकर यह विनतानन्दन 
गण्ड इस खयंवरभ विघ्न डालनेके देठु कुण्डिनपुरभ पधारे 
द॥३४॥ 
अहं चैवागतो याक्ञां द्रष्टुकामो महोत्सवम्‌ । 
तां च कन्यां वरारोहां पश्चेन रहितां धियम्‌ ॥ ३५॥ 
मै. रजाओकि इस मदार्‌ उत्सवको तथा व्रिना कमल्की 
रक्मीरूपा इस परम सुन्दरी राजकरन्याकरो देखनेकी इच्छते यहो 
आयाथा॥ ३५॥ 


विष्णुपवं ]  विष्णपवे) __ __ __ कव्पाय 


पकपञ्चाद्प्तमो ऽध्यायः 


४११ 


~~~ 


क्षन्तव्यमिति यत्‌ श्रोतः त्वया राजन्‌ ममाग्रतः। 
युकतिपूर्वमहं मन्ये कट्युपाय न॒ पार्थिव ॥ ३६॥ 
राजन्‌ ! पृथ्वीनाय | आपने जो मेरे सामने ग्रह बात 
कदी करि मेरा अपराध क्षमा करना चादिये, सो टीकदै। 
द्मे युक्तिसंगत मानता हू । इमे दुर्मावका कोद कारण नदी 
द॥ ३६॥ । 
पूर्वमेव मयाऽऽख्यातं येनासि विषये तव । 
आगतः सौम्यरूपेण तेनेव क्षान्तवान्‌ धिभो ॥ २७॥ 
चिमो | इस विपये तो मैँ पटले दी कट्‌ चुका कि 
आपके राज्यम सौम्यरूपते आया हूँ ( विरोधीरूपते नदीं ) । 
इसीसे आपको समञ्च लेना चाहिये किर्मनेक्षमा कर 
दीदे॥२७॥ , 
छ्चन्तेषु शुणवाहुस्यं दोपाप्रणं क्षमा । 
कथमस्मदिधे सजन्‌ कलुषो वसते हदि ॥ २८॥ 
राजन्‌ | क्षमाशील पुस्पं ब्हुत-से गुण प्रकर होते है । 
क्षमा खव दोपोकि हर लेनेवाटी है । मुद्ध-जैसे पुरुषके हृदयम 
दर्मा कैसे रह सकता ३ ॥ ३८ ॥ 
कुटजे सत्यसरम्पन्ने धर्मके सत्यवादिनि । 
भवादे कथं राजन्‌ क्टुपो भुवि वर्त॑ते ॥ ३९ ॥ 
नररेदवर ! आप भी ऊुटीनः सच्वयुण-सम्पन्न, धर्म॑श्च भौर 
सत्यवादी ई । इस भूतलपर आप-जेते पुरषके ृदम्े कटुष- 
माव कैसे टिक सकता है | ३९ ॥ 
क्तान्तोऽयमिति मन्तव्यं मम सेनासदागतम्‌ । 
न चाहं सेनया साद्धं यास्थामि स्पुवादिनीम्‌ ॥ ४०॥ 
मै सेनके साथ यर्हो आया ह इसय्यि आपको यदी 


मानना चाष किये क्षमाशीक ई; क्योकि मँ शतुर्ओौकी 


सेनाम अपनी सेना साय लेकर नदीं जाता दू | ४० ॥ 
अक्षान्तश्चास्तिनायां यास्यामि दिजवादने । 
सितः सोमाक॑संकाखान्यायुधानि करर्वहन्‌ ॥ ४१॥ 
जव में असदिप्णु होकर शतरु-सेनापर आक्रमण करता हू 
तवर गरुढ्पर ्ैठता हँ ओर अपने हार्थो चन्द्रमा तया सूर्य. 
के समान चमकीठे अखर-राख धारण करता हू ॥ ४१ ॥ 
मान्योऽस्माकं त्वया राजन्‌ वयसा च पिनां समः। 
पालयस्व पुरी सम्यकक्षत्रेणु पिदवद्‌ चस ॥ ४२॥ 
राजन्‌ ! मेरे व्यि पिता स्त्रसे अधिक आदरणीय ै, 
जो अवस्था आपके ही तुल्य दै ( अतः आप मी मेरे चि 
पिताके ही तुल्य ई ) । आप अपनी पुरीका भलीमेति पाटन 


कीन्पि ओर क्षत्रियोमिं पिताक समान आदरणीय यनकर रहिवे॥ . 


कलुषो नाम रजेन्द्र वसेत्‌ कापुरूपेषु वै । 

द्रेषु छदधभवेषु कटुपो वसते कथम्‌ ॥ ४३॥ 
राजेन्द्र ! दुर्माव तो कायरम रहा करता ३, विद्युद 

भावले धरूरवीरयोम कटुपित भाव कैखे रद सकता र ॥४२॥ 


जानीष्वमेषा मे वृत्तिः पुरेयु पिठेवद्‌ वयम्‌ 1 
दमावपि च राजानौ विदर्भनगरायिपी ॥ ४४॥ 
मेरी यद वर्ति सर्वधा कटप भावचे रष्टित दै, ईस वात 
को आपलोग अच्छी तरद जान टै । हम पुर्रोपर पिताके दुल्य 
ही सेद रखते ई ।ये दोनो विदर्मनगरफे अधिपति राजा 
क्रथ ओर कैरिक भी रेखे दी स्वमाककरे द | ४४॥ 
आतिथ्यकरणेऽस्माकं स्वराज्यं ददतावुभौ 1 
तेन दानफलेनास्य दरपूचौ दिवं गताः ॥ ४५॥ 
इन दोनेनि दमलेोर्गोका आतिथ्य-सत्कार करते समय 
मुञ्चे अपना सांरा राज्य ही समर्पित कर दिया | उस दानके 
फलते इनक दस पीट पदटेके पूर्वन खर्गलोकर्म चले गये ॥ 
भविष्याश्चैव राजानः पुज्रपौत्रा दशावरा । 
तेऽपि "त्रैव यास्यन्ति देवरोकं नराधिपाः ॥ ४६॥ . 
भविष्ये भी दस पीदीतक जो पु्रमी् आदि राजा 
हेगिः वे सभी नरेद उक्त दानफे फलते उसी देवरोक्मे जार्येगे॥ 
अनयोः खचिरं कालं भुक्त्वा राज्यमकण्टकम्‌ । 
यदाभिरपो मोक्षस्य यास्येते निदृंति सुखम्‌ ॥ ४७ ॥ 
इन दोनेकि चिरकारतक अकण्टकं राज्य भोग लेनेकरे 
पश्चात्‌ जव मोक्षकी अभमिलखषा होगी; तत्र ये सुखस्वरूप 
परमानन्द-पदको प्राप्त कर ठँगे ॥ ४७॥ 
नरेन्द्राश्च मह्यभाया येऽभिपेचितुमागताः । 
काठेन तेऽपि यास्यन्ति देवलोकं न्निविष्टपम्‌ ॥ ४८॥ 
जो महाभाग नरेद मेरा अभिषेक करनेके स्यि अयि ये; 
वे भी समयानुसार देवता्ओकि निवासभूत खर्गलोक्त्मे चले 
जायेगे ॥ ४८ ॥ 
स्वस्ति वोऽस्तु गमिष्यामि वैनतेयसषहायवान । 
नगरी मधुरां स्म्यां भोजराजेन पालिताम्‌ ॥ ४९॥ 
आपलोर्गोका कल्याण हो, अव मै गसुड्के साथ भोज- 
राज उग्रसेनदारा पालित रमणीय मधुरापुरीको जागा ॥ 
वे्म्पायन उवाच 
पवमु्त्वा तु राजानं भीष्मकं यदुनन्दनः । 
राश्वेवसुपामन््य वेदभीभ्यां बिदोपतः ॥ ५० ॥ 
समान्िष्कम्य देवेशे जगाम रथमन्तिकम्‌ । 
वेशम्पायनजी कहते है-- जनमेजय ! राजा भीप्मकर- 
से एेसा कहकर विदोयतः वरहो व्रैठे हुए राजायेति विदा छे 
यदुकुलनन्दन देवेटवर्‌ श्रीकृष्ण विदर्भरान क्रथ ओर कैचिक- 
के साय समभाभवनते निकलकर रये निकट गये | ५० २॥ 
ततः प्रहरे राजपि्भीप्मकः किल केशवम्‌ ॥ ५९१ ॥ 
ते सवं च मष्ठीपाला विषण्णवद्नाभवन्‌ । 
, तदनन्तर) भगवान्‌ श्रीङण्णको नते देख राजर्धिं भीष्मक 
वहे भरसन हु जौर उन समस भूपालो मुखपर विषाद 
छा गया ॥ ५१९ ॥ 


४९१२ 


आीमषहाभास्ते विरभागे 


[ श्िवंरे 


आद्यं स्वायम्युवं रूपं खुराखरनमर्छृतम्‌ ॥ ५२ ॥ 


स्टस्रपात्‌ सहस्नाक्षं  सरसखधुजधिप्रदम्‌ । 
सष्टस्रिरसं देवं सष्टस्रयुफुटोज्व्वलम्‌ ॥ ५२॥ 
दिव्यमाल्याभ्बरधरं दिव्यमघानुटेपनम्‌ । 


दिव्याभरणसंयुक्तं दिव्यानेकोघतायुधम्‌ ॥ ५० ॥ 
फुष्णं र्कारविन्दाश्चं चन्द्रसर्याश्निरोचनम्‌ 1 
षा स राजा राजेन्द्रं प्रणिपत्य छएताञ्रलिः ॥ ५५ ॥ 
वाड््रनःकायसंयुक्तं स्तोतुमारन्धवां स्तदा । 

जो सवके आदिकारणः, खयम्भूर्वसूप, देवतार्थं यीर 
असुर्याय वन्दित, सदा चरणेपि युक्तः सदो नेत्रति 
विभूषित, रख भुजा्षि सुद्रोभित श्रीसवाठेः सदसो मलक 
से सम्पत्न तया सष मुकुटेपे प्रकारामान £, जो दिव्य 
माला तथा दिव्य च धारण करनेवाले; दिव्य गन्ध 
ओर दिव्य अनुटेपनसे अल्त जिनके श्रीऽर्गोपर दिव्य 
आमूधण दमा देते £, जो अनेक दिव्य आयुधि सम्पन्न ६ 
तथा चन्द्रमाः सूर्यं ओर अग्नि जिनके नेत्र ६ उन धस्ण 
कमलनयन राजेन्द्र श्रीङष्णको देखफर राजा मीप्मक हाय 
जोड़ उनके चरणेमिं गिर पदे । एस प्रकार मनः वाणी ओर 
दारीरद्वाय प्रणाम कफे उन्दनि उश्च समयं उनकी सुति 
आरम्भ की ॥ ५२-५५९ ॥ 


भीष्मके उवाच 
वेवदेव नमस्तुभ्यमनाविनिधनाय यै ॥ ५६॥ 
द्वाभ्वतायादिदेवाय नारायण परायण । 


भीष्मक वोे-देवदेव ! पको नमस्कार १ । भाप 
आदि ओर अन्तसे रहित €» आपक्रो नमस्कार १ ¦ नारायण | 
धाप सवके परम आभय्‌ ई । आप सनातन आद्विदेवको 
नमस्कार द ॥ ५६१ ॥ 


स्वयम्भुवे च विश्वाय स्थाणवे येधसाय च ॥ ५७॥ 
पद्मनाभाय अजरिने दण्डिने पिषलाय च। 
हेखप्रभाय हंसाय चक्ररूपाय यै नमः ॥ ५८ ॥ 

आप टी खयम्भू ( बरह्मा ); विदवरूपः सखाणु (मादेव 
अथवा स्थावर्‌ प्राणी ); वेधस्‌ ( विधाता ); पद्मनाम, जरा- 
धारी, दण्डधारीः पिद्लवर्ण, षएंसकान्तिः षल्य तथा चक्र. 
स्वरूप ६ | आपको नमस्कार १॥ ५७.५८ ॥ 


वैकरुण्डाय नमस्तस्मै अजाय परमत्मने । 
सदसद्भावयुक्ताय पुराणपुसख्पाय च ॥ ५९॥ 


अप वैकुष्ठ-धामकरे अधिपति, अजन्मा एवं परमातमा, 


ई। आपको नमस्कार ६ । आप ष्टी सद्धाव ओर असद्धावते 
युक्त ६ आप टी पुराणपुरुष ६। आपको नमस्कार १ ॥५९॥ 
पुरुषोत्तमाय युक्ताय निर्शुणाय नमोऽस्तु ते । 

वरदो भव मे नित्यं त्वद्धक्ताथ सुरोत्तम ॥ ६०॥ 


<----------------------------- न ----~----~-~~~~~ 


खोकनाभो ऽसि नाथ न्वं पिष्णुस्त्यं चिदितान्मनाम्‌। 
अप योगयुक्त पुसपोत्तम पयं निर्युण परमातमा {। 
आपको नमस्कार दै | सुरमेट | # आपा मनर वा 
मेर्‌ चि सदा वरदायकरच | नाथ | श्रपिष्ी सगयणं येक 
नाय--संर्क { । आत्मशानिरयोके पिप्यु ८ पर्वव्यापी 
परमात्मा ) मी आपरष्टी ६॥ ६०९ ॥ 
वेद्म्फायन उवाच 
पयं स्तुत्या मददेयं श्रपाणामप्रतो नेपः ॥ ६१॥ 
मदार्दमणिमुकाभिर्वजवैदर्यद्ासिनम्‌, 1 
द्ावकुम्भस्य निचयं द्ःष्णाय परदृदी चपः ॥ ६२॥ 
पुनश्चक्रे नमस्कारं वैनतये मष्टावटे 1 
धैशम्पायनजी फत्‌ ह--जनमेगय ¡ याना भीष्मक. 
ने समसन नरेण सामने बहटुमृ्य मणिर्यो तथा मुक्ता्थौद्रारा 
वत्र ओर वैदुर्यमणिका भी उपदया कसनेवकरे महान्‌ दैवा 
धीकण्णकरी एस प्रकार स्तुति करके उदं सुवर्ण यथि मैट 
फी | पिर मद्टादटी यिनतानन्दन गर्टको भी नमस्कार किया ॥ 
^ भीष्मक उवाच यतसे 
नमस्तस्मे गगेन्धाय नमो से ॥ ६३ ॥ 
कामरूपाय द्विव्याय कादयपाय च यै नमः। 
भीप्मफः बरोदटे- जिना वेग वायुर गमान ओ 
च्छातुनार सूप धारण करने, दिव्यस्वस्प ध्यं कषयर 
मुनिर पुत्र उन पक्षिराज गस्टको नमक्कारदै, नमक्कारदै॥ 
पधम्पायने उका 
ति संस्ेपतः स्तुत्या सत्छत्य धरभूध्रौः ॥ ६४ ॥ 
ततो विसर्जयामास एष्णं कमटटोचनम्‌ 1 
अटुजग्मु्रपाश्यैव प्रस्थितं वासवानुजम्‌, ॥ ६५॥ 
यैशास्पायनजी फष्टते है--जनमेजय ¡ एष प्रकार 
संभेपे वी गख्टकी स्तुति करके उत्तम आभू्णोद्याया सक्तार 
फरनेफे पश्ात्‌ राजान फमटटोचन श्रीटरप्णको विदा जरिया 1 
इन्द्रे छोटे भाद उयेन्द्रके परान करैपर बहुत-पे राजा 
उनके पीदि-पीटे गये । ६४.६५ ॥ 
प्रतिय॒ष्य च सत्कार शपानामन्ज्य वीयवान्‌ । 
जगाम मयुसं फएप्णो द्योतयानेो दिद्रो दश्च ॥ ६६४ 
धैनतेयं पुरस्छत्य सौम्यरूपं खगोत्तमम्‌ । 
पराक्रमी शीकरृष्ण उन रानार्भोजा सत्कार प्रण करके 
उनते बिदा ले द दिगार्थके भ्रकरानित कसते हुए सौम्य- 
रूपधारी पर्षिप्रवर विनतानन्दन गरसुटको आगे करे मधुरा. 
पुरीको गये ॥ ६६१ ॥ 
महता रथच्ृन्द्रेन परिवार्य समन्ततः} ६७ ॥ 
भेसीपरदनादेन शहुटुन्दभिनिःस्वनैः । 
धृहितेन च नागानां हयानां देपितेन च.॥६८ ॥ 
सिहनदेन श्ुरणां स्थनेमिस्वनेन च। 
तुमुलः सखुमनासखीन्महामेधस्योपमः ॥ ६९. ॥ 


वे अपनेको चँ ओरसे विराट रथसपूहद्वारा, व्रैरकर 
भेयी, पय्दः यङ्क भौर दुन्दुभियोकी ध्वनिके साथ प्रसित 


हुए. । हाथियोके- चिग्धाडने, घोडे हिनदिनने, अूरवीरोकर ' 


सिंहनाद कसे तथा स्थे, पदियोकरी घर्ष॑साहरसे मिक्करर उन 
वार्योका रेखा महान्‌ वुमुर नाद हुः जो महामेर्बोकी गम्भीर 
गर्जनकरे समान प्रतीत होता था ॥ ६७-६९ ॥ 

गते छष्णे म्ा्ची्ये, आदाय वरमास्नम्‌ । 
सभामादाय ` देवाश्च प्रययुखिदशाख्यम्‌ ॥ ७०॥ 


दिषश्थाशन्तमो ऽध्यायः 


` ४१२ 


महापराक्रमी श्रीकृप्णके चले जानेपर देवतालोग उस 
र सिंहासन तथा सभारमंवनको साथ ठे स्वर्गलेकको चङे गये 
महता चतुरङ्गेण बलेन ; परिवारिताः । 
कोशमाघमुपवज्य अनुक्षाते ; अनार्दने ॥*७१॥ 
प्रययुस्ते पाः सवं पुनरेव : खयंवरम्‌ ॥ ७२॥ 

विशाल चतुरद्धिणी सेनासे धिरे. इए राजा लोम एक 
कोसतक पीछे-पीे जाकर भगवान्‌ जनार्दनकी आज्ञा मिल्नेपर 
लोटे ओर सव्र-के-सवर पुनः स्वयेवरम चले गये ॥ ७१-७२ ॥ 


दति श्रीमहाभारते खिल्भागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि .शरीरृष्णाभिषेको नामैकपच्वाशत्तमोऽध्यरायः ॥ ५१ ॥ 
इस प्रकार श्रीमहाभारते खिर्भाग हरिवंशे अन्तमेत विस्णुपवे शरीरष्णका अभ्पिकनामक इस्यातनवे अध्याय पूरा हुमा 1 ५९ ॥ 


1. 


दिपारात्तमोऽध्यायः 
शाल्वके कथनालुसोर जरासंध आदि नरेशोका शाल्वको ही कालयवनके पास दूत वनाकर भेजना 


वैशम्पायन उवाच 
भ्रयाते वसुदेवपुषे 
` नराधिपा भुषणभूपिताङ्गाः। 
सभां समाजग्मुः सरेन्द्रकद्णाः 
॑ प्रबोधनार्थं गमनोत्सवास्ते ॥ १ ॥ 
वैशम्पायनजी कष्ठते है--जनमेजय ! वसुदेवपुत् 
श्रीकृप्णके वहसि चले जानेपर सत्र राजा अपने अङ्गौको 
आमूषरणेसि विभूषित करे देवेन्द्रके समान स्ज-धजकर राजा 
भीष्मककी समम उद समन्चानेके ल्ि गये | श्रीकुप्णक्रे 
चले जानेसे उन्दं बड़ी प्रसन्नता हुई थी ॥ १ ॥ 
सभागतान्‌ सोमरविपरकाश्चान्‌ 
खखोपविष्टान रुचिरासनेषु । 
समीक्ष्य राजा खुनयार्थवादी 
जमाद्‌ वाक्यं नरराजसिष्टः ॥ २ ॥ 
सभाम आकर सुन्दर सिंहासर्नौपर सुखपूर्वक वेढे हुए 
सोम॒ ओर से समान प्रकारित होनेवाठे गजार्ओको 
देखकर उत्तम नीतिके अनुकूल युक्तियुक्त वात कटनेवाठे 
नरेशे सिंहके समान पराक्रमी राजा भीष्मक इस प्रकार 
योढे ॥ २ ॥ 
स्वयंवरछृतं दोषं विदित्या वो नराधिपाः । 
क्षन्तव्यो मम चद्धस्य दुर्दग्धस्य फरोदयम्‌ ॥ ३ ॥ 
(नरेश्वरो ! स्वयंवरे द्वारा जो शीकृप्णविरोधरूपी 
दोष सम्पादित हो रदा था, उसे जानकर ८ मैने इसे यगित 
कर दिया । ) आपलेग सुच बद्धके अपराधको क्षमा करे । 
जिसे' दैवरूपी दावानल्ने अच्छी तरह जला दिया दो, उस 
बृक्षसे फलकी प्राति कैसे हो सकती है ( जिस स्वयंवरे 
भगवद्विरोधकी सम्भावना दो; वद स्फर नदीं दो 
सकता ) 1 ३॥ 
वैश्नम्पायनं उवाच 
पवमाभाष्य तान्‌. सर्वान्‌ सत्छृत्य च यथाविधि । 


ततः 


- ततो विसर्जयामास चपा स्तान्‌ मध्यदेश्जान्‌ ॥ ४ ॥ 


पूवेपशिमजश्चैव उत्तरापथिकानपि । 

वैशम्पायनजी कषते ह-- जनमेजय | एसा कहकर 
मीप्मकने उन सव राजार्ओकरा विधिपुर्वक सत्कार करके उर 
विदा कर दिया | उनमेसे कोई मभ्य देदाके येः कोई पूर्व 
पश्चिम ओर उत्तर भारतके । उन सवक्रो उन्दनि सादर 
विदा किय ॥ ४४ ॥ 
येऽपि सवं महेष्वासाः प्रदृष्टमनसो नराः ॥ ५ ॥ 
यथादैण च सम्पूज्य जग्मुस्ते नरपुद्घवाः। 

वे सव्र महाधनुर्ध॑र नरेश भी प्रसन्नचित्त होकर राजाका 
यथायोग्य सम्मान करके अपने-अपने स्थानको चठे गये ॥५१॥ 
जरासंधः सुनीथश्च दन्तवक्श्रश्च वीर्यवान्‌ ॥ £ ॥ 
शर्वः सौभपतिश्वैव महाकूरमश्च पार्थिवः । 
क्रथकैशिकसुख्याश्च चपा; भवरवंशाजाः ॥ ७ ॥ 
बेणुदारिश्च राजर्षिः कादमीराधिपतिस्तथा । 
पते चान्ये च बहवो दक्षिणापयिका सपाः ॥ ८ ॥ 
धोतुकामा रहो वाक्यं सथिता वै भीष्मकान्तिके। 

जरासंधः सुनीथः पराक्रमी दन्तवक्त्र; सौभपति शाल्व; 
राजा महावूर्म, क्रथ ओर कैिक आदि शरेष्ठ कुल्के नरेशः 
राञभ्रं वेणुदारि तथा कादमीरनरेश--ये एवं दूसरे बहुत.से 
दाक्षिणात्य नरपाल राजा भीष्मककी एकान्त वार्ता सुननेकी 
इच्छसे उनके पाष ही ठहर गये ॥ ६--८१ ॥ 
तान्‌ वे समीक्ष्य राजेन्द्रःस राजा भीष्मको बली ॥९॥ 
स्नेदपूर्णेन मनसा स्थितांस्तानवनीश्वरान्‌ । 
निचगसहितं श्लक्ष्णं षड़गुणालरृतं श्भम्‌ ॥ १०॥ 
उवाच नयसम्पन्नं स्निग्धगम्भीरया गिरा। 

उन सरको देखकर वख्वान्‌ राजाधिराज राजा भीष्मकने 
स्ेदपू्णं छदयसे वरहो खड़े इए उन भूपाोके प्रति स्निग्ध 
प्यं गम्भीर वाणीम धर्म, अर्थं जौर कामसे युक्तः मधुर, 


४१४ 


, भीमष्टाभारते खिकभागे 


[ हरि्वंरो 


सन्धिविग्रह यादि छः गुणेति अलंकृतः श्म एवं नीतिसम्पनन 
चात कहौ ॥ ९--१०५ ॥ 
भीष्मके उवाच 
भवतामवनीशानां समालोक्य नयन्वितम्‌. ॥ ११॥ 
वचनं व्याहतं श्रुत्वा कृतवान्‌ कार्यमीदरम्‌ । 
सद्धिरभवद्धिः क्षन्तव्यं वयं नित्यापराधिनः ॥ १२॥ 
भीष्मक वोखे--राजायो ¡ आप सव प्थ्वीपतिर्योकी 
ओर देखकर ओर आपकर द्वारा के गये नीतियुक्त वचनकौ 
सुनकर मने एेसा कायं किया है | आप सव लोग सत्पुरुष 
है; अतः मेरे इस वर्तावको भमापूर्वक सद ठगे | टम 
अपनेको सदा अपराधी मानते ६ ॥ ११-१२॥ 
वै्यम्पायन उवाच 
पवसुषत्वा तु रजा स भीष्मको नयकोविद्‌ः। 
उवाच खतमुदिद्य वचनं यजसंसदि ॥ १३ ॥ 
वेहाम्पायनजी कष्ते ह--जनमेजय ! एेसा कदकर 
नीति-निपुण विद्वान्‌ राजा भीष्मक उस रानसमा्मे अपने 
पुत्रको ल्य करफे बोठे ॥१३ ॥ 
भीष्मक उवाच 
पुत्रस्य चे्ामारोक्य घासाङुितरोचनः। 
मन्ये वारानिर्मोरिलोकान्‌ स एप पुरुयः परः ॥ १४॥ 
भीष्मकमे कष्टा-राजाम ! अपने युतरकी चेष्टाको 
देखकर मेरे नेत्र भयसे व्याकुल दो उठे ई | मै इन लो्गोको 
( खक्मी आदिको ) बालक ( विवेक्यूल्य ) मानता ह| 
मेरी दमि ये भगवान्‌ श्रीकृष्ण परम पुख्प ई ॥ १४ ॥ 
कीर्तिः कीर्तिमतां श्रेष्टो यज्ञश्च विपुरं तथा । 
स्थापितं भुवि मत्यं ऽसिन्‌ स्वयाहुवलमूर्जिंतम्‌ ॥१५॥ 
ये कीर्तिमानेमिं श्रेठ ई । इन्दनि इख मर्त्यलोक 
भूतलपर अपनी उत्तम कीर्तिं यौर घुयदाकी स्थापना की 
तया अपने ओजस्वी वाहूवखका भी परिविव दिया १ ॥ ९५॥ 
धन्या खल महाभागा देवकी योपितां चरा 1 
पुषं धरि्ुवनधेष्ठं कृत्वा ग्ण केदावम्‌ ॥ १६॥ 
कृष्णं कमलपन्नाधं श्रीपु्जममस्चितम्‌ । 
नाभ्यां स्नेदपूरणीभ्यां वीक्षते मुखपद्जम्‌ ॥ १७ ॥ 
धन्य ई नास्मि श्रेष्ठ महाभागा देवकी, जो तीर्न 
केम स्स श्रेष्ठः शोभाके पुञ्ञ; देवपूनितः कमलदल्लोचन 
कैदाव कृप्णको युचरूपते गर्भे रखक्रर जन्म देनेके श्वात्‌ 
सदा स्नेहपु्णं नेनेति उनके मुखारविन्दको निदारा करती 
द ॥ १६-१७॥ 
वै्रम्पायन उवाच 
एवं ठालप्यमानं तु राजानं राजसंसदि । 
उवाच छक्ष्णया वाचा शास्वराजो मदयुतिः॥ १८ ॥ 
वैदास्पायनजी कष्ठते ह--जनमेजय | राजसम 


राजा मीप्मकको इस प्रकार व्रारवार रोचते दे मदातिजखरी 
दास्वराजने सान्त्वनपूर्णं मधुर वार्णीमे कदा ॥ १८ ॥ 
शाल्व उवाच 
अलं खेदेन राजेन्द्र सुताय रिपुमर्धिने। 
क्षत्रियस्य रणे राजन्‌ शुचं जयपसयजयौं ॥ १९॥ 
शरास वोखा--रनेन््र | (थाप सेद र्यौ प्रकट 
करते द॑) आपका पुच्र ानुर्थोका मान मर्दन कसनेवाद ६ै। 
दसफरे व्यि वेद्‌ करना व्यर्य है ८ इपर तो आपको मर्थ 
ह्यना चाये )। रजन्‌ ! रणमभूमिरमे क्षत्रियो जय यथवा 
पराजय अवद्य प्राप्त दती ३॥ १९ ॥ 
नियता गति मर्त्यानामेष धर्मः सनातनः। 
वलकेशवयोरन्यस्वतीयः कः पुमानिह ॥ २०॥ 
रणे योधयितुं शक्तस्तव पुत्रं महावटम्‌ । 
यद मनुर्प्योकी नियत गतिं द । यद सनातन धरम दै। 
वल्राम ओर श्रीकृ्णके सिवा इख भूतल्पर तीस कौन 
पेखा पुख्ष दै, जो समराङ्गणममे आपके मदावली पुत्रका 
सामना कर स्के | २०३ ॥ 
र्थातिरथचृन्दानामेक पव रणाजिरे ॥ २१॥ 
रिपून्‌ वाधयितुं शकतो धनुगंद्य मदा्ुजः । 
यद महाबाहू वीर हाथमे धनुष लेकर ॐकरेख दी युद्ध- 
तमे रथिर्यो ओर अतिरयिर्योके समूदका सामना करने 
ओर ातुर्मोको बाधा पर्ुचनिमे समर्थं दे ॥ २१४ ॥ 
भार्गवाखं महारौद्रं देवैरपि दुयासदम्‌ ॥ २२॥ 
खजतो बाहुवीर्येण कः पुमान्‌ प्रसहिष्यति । | 
जिस समय यद अपने ब्राहुवल्से देवता्कि व्यि मी 
दुर्जय महाभयंकर भार्गवालका प्रयोग करेगा, उस समय दस 
वीरका आक्रमण कौन पुखप सद्‌ सकेगा ॥ २२४ ॥ 
अयं तु पुरुपः छृष्णो ्यनादिनिधनोऽव्ययः ॥ २३॥ 
तं विज्ञेता यखोके ऽस्‌. नापि श्यूखधरः स्वयम्‌ । 
ये श्रीकृष्ण तो अनादि, अनन्त ओर अविनादी पुरुप 
ह। इस नर्क साक्नात्‌ चिद्यूख्धारी भगवान्‌ यङ्कर मी 
उन्दं जीत नदीं सकते ॥ २३१ ॥ 
तच पुरो महाराज सर्वश्ाख्ार्थतत््रवित्‌ ॥ २४॥ 
विदित्वा देवमीशानं न योधयति केदावम्‌। 
मदाराज | आप्करा पुत्र सम्पूर्णं आार्खोका तच्ववेत्ता 
ह । यह श्रीकृप्णकरो देवता ओर ईदवर समन्चकर दी उनसे 
युद्ध नहीं करता हे ॥ २४ ॥ 
सद्य तस्य रणे जेता यवनाधिपतिर्यंप ॥ २५॥ 
स॒ काठयवनो नाम अवध्यः केङवस्य ह। 
नरेष्वर | यआजकङ युद्धर्मे श्रकरम्णपर विजय पानेवाखा 
` ` १.प्यतिः क स्ानमे “तिः समक्चना चाम । नीरकण््मे 
` यदौ विभक्तिका छेष भां माना ६ 1 


विष्णुपर्व ] 


दिपश्वाक्षच्तमो.ऽध्यायः 


४१५ 


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केवल कालयवन ३, जो यवर्नौका अधिपति है । वह श्रीकष्णके 
ल्य अवध्य दे ॥ २५६ ॥ 
तप्त्वा सुदारुणं धोरं तपः परमदुश्चरम्‌ ॥ २६॥ 
रुद्रमायाधयामास इाद्रा्दानयो.ऽशनः। 
पुजकामेन सुनिना तोष्य शद्रात्छुतो वृतः ॥ २७॥ 
माथुराणामवध्यो ऽयं भवेदिति च शाङ़रात्‌ 1 
पवमस्त्विति रुद्रोऽपि भरद्दौ सनये खतम्‌ ॥ २८ ॥ 
गाग्यमुनिने अच्यन्त दुष्करः भयंकर एवं दारुण तपस्या 
करके बारह वषौतक ' पुचकी कामनासे स्द्रदेवकरी आराधना 
की थी} वे उन दिनों केवर खोदका चूणं खाकर रदते थे । 
इ प्रकार उद्रदेवको संद॒९ करके उन्होने उनसे एक पुव 
मोगा तथा भगवान्‌ शङ्करे यह भी प्रार्थना कीकिंमेरा 
वह पुत्र माथुर ( मधुरम उत्यन्न हए रोगो ) के ल्ि 
अवध्य हो ] तव सुद्रदेवने “एवमस्तु? कहकर मुनिको वैसा 
पुर प्रदान कर दिया ॥ २६--२८ ॥ 
पएवं गाग्य॑स्य तंवयः श्रीमान्‌ सुद्र वसे्धवः । 
माधुरणामवध्योऽयं मथुरायां विदोषः ॥ २९ ॥ 
इस तरह गार्ग्यका वह तेजस्वी पुच्र रद्रदेवके वरसे 
उत्पन्न हआ है ओर विगेषतः माथुर ( मथुरामे पैदा हु 
वीरो ) के स्यि अवध्य है २९॥ 
कृष्णोऽपि बर्वानेष माथुसे जातवानयम्‌ । 
ख जेष्यति रणे कृष्णं मथुरायां समागतः ॥ २०॥ 
ये श्रीङृप्ण वल्वान्‌ होनेपर भी मथुरामे जन्म ठेनेके 
कारण माथुर ही द । अतः मथुरामे आया हुआ काख्यवनः 
रणमूमिमे शरीङृष्णको अवद्य जीत ठेगा ॥ ३० ॥ 
मन्यध्वं यदि वा युक्तां चपा वाचं मयेरिदाम्‌ । 
त्र दूतं विखजध्वं यवनेन्द्रपुरं प्रति ॥ ३९॥ 
, नरतियो ! यदि - आपलोग मेरी कदी हुई इस ब्ातको 
उचित समन्नं तो यवनराजकरे नगरको दूत मेज दें ॥ ३९ ॥ 
वैद्यम्पायन उवाच 
श्रुत्वा सौभपतेवीक्यं सर्वे ते यृपसत्तमाः। 
कर्म॑ इत्यव्रवन्‌ द्रा जरासंधं महावलम्‌ ॥ ३२॥ 
वेश्चम्पायनजी कहते है--जनमेजय ! सोम विमानके 
अधिपति राजा गास्वकी वात सुनकर वे समी श्रेष्ठ नरे 
हमे भरकर मदाव्रटी जरासंधसे वोले--"हमलोग यव्य 
साही करं ॥३२॥ 
ख तेषां वचनं श्रुत्वा जरासंधो महीपतिः 
वभूव षिमना राजन्‌ बह्यणो कचनं सरन्‌ ॥ ३२ ॥ 
राजन्‌ ! उन राजायकी वात सुनकर आकारावाणीकी चात 
याद करके प्रथ्वीपति जरासंधका मन उदास दो गया ॥ ३१॥ 
जरासंध उवाच 
सा समाधित्य पूवस्मिन्‌ चपा नर पभयार्दिताः । 
प्राप्नुवन्ति हतं राज्यं सभूत्यवरुवाहनम्‌ ॥ ३४॥ 


# 


जरासंध वोला--आजसे पठे सव राजा दुसरे 
राजाओकरि भयते पीडित होनेपर ` मेरी शरणमे आते थे ओर 
भूत्य, सेना तथा वाहनोंसदित अपने खोये हए राज्यको मेरे 
सहयोगसे पुनः प्राप्त कर लेते थे ॥ ३४॥ 
इह संचोदयते भूपैः परसं्यहेतुना । 
कन्येव स्वपतिद्धेषादन्यं ` रतिपरायणा ॥ ३५॥ 
इस समय वहो ' सव॒ `राजा मुद्चे दूसरेका आश्रय 
ठेनेके च्वि प्रेरित कर रदे द । जेप रतिरोद्धप नारी 
अपने पतिकरे प्रति देष होने उसे छोड़कर दूसरे पुखषका 
आश्रय लेती हैः( उसी प्रकार मै ` अपने वल्का 
आश्रय न लेकर दुसरेका सदारा ठेनेको उचत हुआ दू ) ॥२५॥ 
अदयो सुवख्वद्‌ दैवमश्क्यं विनिवर्तितुम्‌ । 
यदहं कृष्णभीतो ऽन्यं संश्रयामि वलाधिकम्‌ ॥ ३६ ॥ 
अहो | दैव वड़ा प्रवर है। उसे ल्येयाया नदींजा 
सकता; क्योकि आज मै श्रीक्ृष्णसे डरकर दूसरे अधिक 
वलशाटी राजका आश्रय अहण कर रहा द्रं ॥ ३६ ॥ 
नूनं योगविद्दीनोऽहं कारयिष्ये पराश्रयम्‌ । 
श्रेयो हि मरणं मद्यं न चान्यं संश्रये च्रपाः ॥ ३७ ॥ 
निश्चय ही मँ निरपाय दो गया हूः अतः सुनने दुसरेका 
आश्रय लेना पद्ेगा; परं एसे जीवनसे तो मेरा मर 
जाना ही अच्छा है । नरपतियो | मँ दुसरेकी शरण 
नदीं गा ॥ ३२७ ॥ 
ष्णो वा वल्देवो बायो वासौ बा नराधिपः 
हन्तारं प्रतियोत्स्यामि यथा ब्राद्यप्रचोदितः ॥ ३८ ॥ 
शीकृप्ण हौः बरुदेव हौं अथवा जो कोई भी राजा 
क्योनरहो, जो सुनने मरिगाः उसका मै टकर सामना 
कछेगा । जेता करि आकाशवार्णीने कहा है कि सुते कोई 
दूसरा मारनेवाल दै ॥ ३८ ॥ 
पषा मे निशिता बुद्धिरेतत्सत्‌ पुरूषत्रतम्‌ । 
अतोऽन्यथा न शाक्तो ऽहं कतुं परसमाश्रयम्‌ ॥ ३९ ॥ 
यही मेरी बुद्धिका निश्चय है, यदी सप्पुरुष॑का बरत है । 
इसके विपरीत मेँ दूसरेका आश्रय टेनेमे असमर्थ हू ॥ २९॥ 
भवतां साधुवृत्तानामावाधं न करोति सः 
तेन दुतं प्रदास्यामि पाणां रक्षणाय वै ॥ ४०॥ 
आप सदाचारी नरेदोको श्रीकृष्ण वाधा न पर्हुचावेँ, 
इस उददेश्यसे राजार्ओकी रक्षाके च्ि मँ दूत दंगा अर्थात्‌ 
चूते मेजना स्वीकार कङ्गा ॥ ४० ॥ 
व्योममागेंण यातन्यं यथा ष्णो न वाधते। 
गच्छन्तमयुचिन्त्येवं प्रेषयध्वं त्रपोत्तमाः ॥ ७१॥ 
रेष्ठ राजा ¡ इस दूतको आक्राशमार्मसे जाना चाद्ये; 
जिससे यदेति जति समय उसे श्रीकृष्ण बाधा न दे सक | 
इसन पति विचार करे द्वी तसन्मोग क्न येनो ।1+०१) 


४१६ 


अयं सौभपतिः शीमाननलार्केन्दुविक्मः 
रथेनादित्यवर्णेन भ्रयाति स्वपुरं वटी ॥ ४२॥ 
ये श्रीमान्‌ सौभपति वट्वान्‌ राजा शाल्व अभिः सूयं 
ओर चन्द्रमके समान पराक्रमी ६। ये सूर्यतुव्य वेनखी 
रथ ( विमान ) दारा अपने नगरको जते ई ॥ ५२ ॥ 
यवनेन्द्रौ यथाभ्येति नरेन्द्राणां समागमम्‌ । 
वचनं च तथास्माभिदृत्ये नः रष्णविग्रदे ॥ ४३॥ 
ये दूतकर्म करते समय हमलेर्गोकी ओरसे मेषी वात 
कनी चाये केसी ही कर्टैः जिसे श्रीट्ष्णके साथ हम 
लोर्गोका युद्ध उपसित दोनेपर वह यवनराज काठ्यवन 
हम नरेर्शोकी मण्डटीषे आकर मिक जाय ॥ ४३॥ 
वैशम्पायन उवाच 
पुनरेवाघ्रवीद्‌ राजा सौभस्य पतिमूर्जितम्‌ । 
गच्छ स्वनरेन्द्राणां साष्टाय्यं कुर मानद्‌ ॥ ४४॥ 
यैदाम्पायनजी कहते है--जनमेजय! फिर राजा जरासंधने 
सौमविमानके स्वामी बलवान्‌ राना गास्वसे कदा-- "मानदः | 
जाओ, सम्पूणं नरेदोकी सहायता करो ॥ ४४ ॥ 
यवनेन्द्धौ यथा याति यथा ष्णं विजेष्यति । 
यथा षयं च तुण्यामस्तथा नीतिर्विधीयताम्‌ ॥ ४५ ॥ 
ठम रेसी नीतिका प्रयोग करौ, जिषसे यवनराज चद 
करे श्रीकृष्णको जीते ओर हमलो्गोको संतोप दो" ॥ ५५॥ 
एवं संदिददय सर्वास्तान्‌ भीष्मकं पूर्य घर्म॑तः । 
प्रययौ खपुरं राजा स्वेन सैन्येन संवृतः ॥ ४६॥ 
इस प्रकार सवको संदेश देकर ओ र धर्मानुसार मीप्मकका 
भी.सम्मानं करके राजा जरासंध अपनी सेनके साथ अपने 
नगरको चला गया ॥ ४६ | 


श्रीमहाभारते छिरभागे 


[ हरिवंशे 


्राल्वोऽपि दंपतिग्रषठस्तांश्च सम्पूज्य धर्मतः 
जगामाकाद्रामार्गेण रथेनानिलरं्सा ॥ ४७॥ 
राजामि शरेष्ठ शास्य भी उन सवका धर्मपूर्वक आदर 
करके वायुके समान वेगा विमानद्वारा आक्राशमार्मसे 
चत्र गया ॥ ४८५७ ॥ 
तेऽपि सवं महीपाला दक्षिणापथवासिनः । 
अचुब्ज्य जरासंधं गताः खनगरं प्रति ॥ ४८॥ 
दक्षिण मास्ते रदनेवठे जो समस्त भूमिपाल वरह 
उपसित येः वे मी कुछ दूरतक जयसंधके पीछे जाकर पिर 
अपने नगरको"चटे गये ॥ ४८ ॥ 
भीष्मकः स पुत्रेण ताबुभौ चिन्त्य दुर्नयम्‌ । 
स्वे गरे न्यवसद्‌ दीनः ऊृष्णमेवाञुचिन्तयन्‌॥ ४९. ॥ 
राजा भीष्मक अपने पुत्र स्क्मीफे साव दी उन रौन 
शाल्व ओर्‌ लरसंधक्रा तथा उन सप्रकी दु्नीतिका विचार 
करके श्रीटृष्णका ही चिन्तन कसते हए दीनभावे अपने 
घर्म रने ल्मे ॥ ४९ ॥ 
विदित्रा रुकिमिणी साध्वी खयंवरनिवतंनम्‌ । 
कष्णस्यागमनाद्धेतेर्युपाणां दोपदरनम्‌ ॥ ५५ 
गत्वा तु सा सखीमध्ये उवाच नीडितानना 1 
न चान्येषां नरेन्द्राणां पली भवितुमुत्सहे ! 
कृष्णात्‌ कमटपत्राक्षात्‌ सत्यमेतद्‌ वचो मम ॥ ५१॥ 
सती साध्वी हकिमर्णीको जत्र यह पता च्गणगयाकिि 
श्रीकृप्णका आगमन दोनेसे सखयंवर स्थगित हो गया तथा 
राजार्ओीकी जो दोषदृष्टि थी उसक्राभी शनो गया, तववे 
अपनी सखिरयोकि वीच्मे जाकर लजसे सिर कयि हए 
ब्रोखी--"सलियो { प कमलनयन श्रीृप्णके छोडकर दूसरे 
नरगोकी पकी नदीं हो सकती--यह मेरी सची चात है (५०-५१] 


इति श्रीमहाभारते लिरूभागे इरिवंदो विष्णुपरव॑भि रकिमिणीस्वयंवरे द्विपञ्ादात्तमोऽध्यायः ॥ ५२ ॥ 
इस प्रकार श्रमहाभास्तके सिरमाग इिवंदके भन्तभेत विषणुपतम सिमणोर स्वयंबरतरिपयक वाननर्म[ मध्याय पृरा हुम ॥ ५२ ॥ 


2 ° + ~ , 


्रिपव्ारत्तमोऽध्यायः . . 
कारयवनकी विेषता, राजा शाखका उसके यदौँ दूत बनकर 


अना 
वैश्रम्पायन उवाच 

यवनानां वलखोदग्रः स काटयवनो चपः 
यभूव राजा धमेण रक्षिता पुरवासिनाम्‌ ॥ १ ॥ 

वैदाभ्पायनजी कहते ह--जनमेजय | सम्रसे अधिक 
व्रखशाटी कराख्यवन यवर्नोका राजा था, जो धर्मके अतुसार 
पुरवासिर्योकी रक्षा करता था ॥ १ ॥ 
निव्गविदितः पराकः पडगुणादुपजीवकः । 
सत्तन्यसनसम्मूटढधो गुणेष्वभिरतः सदा ॥ २ ॥ 


ओर उसे जरासंधका संदेश सुनाना 


वह त्रिवर्गं ( पदः खान एवं बृद्धि अथवा धर्मः. अर्य 
ओर काम ) का श्ाताबुद्धिमान्‌ राजनीतिके छः गुणो (खंपि 
विग्रह आदि ) का आश्रय लेनेवाखा, खातं प्रकारके व्यसन 
ते अनभिक्ल जर सदा शुणोमि तत्पर रहनेवाटा था ॥ २॥ 
श्ुतिमान्‌ धर्म॑श्ीखश्य सत्यवादी जितेन्द्रियः] 
साग्रामिकविधिक्षश्च 

१ स्तात व्यत्नन श्स प्रकार ई्--गृगवा, जुम; द्विनर्मे सेनाः 
प्रायी निन्दा, खीविषयकं सक्तिः मचपान भौर व्यर्थं माषण 1 


दुर्गलाभादसारणः ॥ ३ ॥ ` 


॥ 


विष्णुप्वं 1 


विन्यावान्‌ः धर्मशील, सत्यवादी जितेन्द्रिय, युद्धविधि- 
का ज्ञाता तथा दुलभ लमका अनु्तरण करनेवाखा था ॥३॥ 


शरोऽश्रतिवलदचैव मन्चिप्रवरसेवकः । 
खुखासीनः सभां रम्यां सचिवैः परिवारितः ॥ ४ ॥ 
उपास्यमानो यवनैरत्मविद्भिर्विपध्ितैः। 
विविधाश्च कथा दिव्याः कथ्यमानाः परस्परम्‌ ॥ ५ ॥ 
पतस्िन्मेव काटे तु दिन्यगन्धवदयो ऽनिङः । 
प्रववौ मव्नावोधं चकार सुखर्शातखः ॥ ६ ॥ 
उक खमान वल्वान्‌ दूसरा कोई नदीं या । वह चर- 
वीर ओर शरेष्ठ मनितिर्योका सेवन करनेवाखा था । एकर दिन जव 
वह मन्वि्वोखे धिरा हआ अपनी रमणीय सभाम सुखमूव॑क 
व्रेडा थाः आत्मन्ञ एवं व्रिद्रान्‌ यवन्‌ उस्तकरी सेवम उपसित 
. ये ओर उनम परस्पर नानां प्रकारकी दिव्व कथर्द ह्ये रदी 
थीं] इसी स्मय दिव्य सुगन्ध टेकर मन्द-मन्द वायु वहने 
रगी । वह सुखद एवं शीतर वायु उन सव्रके कामभावको 
जात्रत्‌ करने र्गी ॥ ४--६ ॥ 
किस्विदिव्येकमनस्ः सभायां ये समागताः । 
उत्फुःल्लनयनाः सवै राजा चेवावटोक्य सः ॥ ७ ॥ 
उस समय समामे जो छोग अये थेः वे सभी एकचित्त 
होकर यह जिज्ञाखा करने ख्गे कि भ्वह क्या है? सवके 
ने आश्चर्यसे खिर उठे थे ! राजा कालयवन भी यह्‌ अद्भुत 
चात देखकर प्रभावित हुए विना न रह स्का ॥ ७ ॥ 
अपद्यन्त रथं दिन्यमायान्तं भास्करोपमम्‌ । 
श्तद्घम्भमयैः शुभ्रं रथाद्गैरुपल्योभितम्‌ ॥ ८ ॥ 


दिग्यरत्नपरभाकीर्ण दिन्यध्वजपताक्रिनम्‌। 
वाहितं दिव्यतुरगै ४५ = 
वादितं देन्यतुरगेम॑नोमारुतरहसेः ॥ ९ ॥ 


उन सव्रने अआकासे एक सूर्थकरे समान तेजस्वी दिव्य 
विमानको उतसते देखा; जो सुवर्णमय चमर्कीरे पदियेसि शोभा 
पाता थाः; वह रथया विमान दिव्य र्त्नोँश्ी प्रभासे व्यात्त 
था । उस दिव्य ध्वजा-पताकषे फहरा रहीं शीं तथां मन 
एवं वायुके समान वेगन्राटी दिव्य अश्च उस रथकरो खींच 
रहे थे ॥ ८-९ ॥ 
चन्द्रभास्करविम्बानि कृत्वा जाम्बूनदेन ठम्‌ । 
रचितं वे विश्वरृता वैया्रवरभूषितम्‌ ॥ १०॥ 

विश्वकमनि चन्द्रमा ओर सूर्यकरे विम्ब बनाकर जाम्बू- 
नद नामक सुवर्ण॑से उस स्थका निर्माण क्रिया था । वह चारों 
ओर उत्तम व्याघचर्मद्यारा मद्‌ हु! था ॥ १० ॥ 
स्पू्णां त्रासजननं मित्राणां दर्पवद्धंनम्‌ । 
दक्षिणादिगुपायान्तं स्थं परग्थारुजम्‌ ॥ ९१ ॥ 

वह रथ शत्रु ्करि मनम चा उन्न करनेवाल ओर 
मिका हं बद्निवाल था-। वद दष्विण दिशव्छी ओर 
आ रदा या ओर शत्ुभकरि रथको तोड़ डाल्नेमे समर्थं था ११ 


मत [4 | ९ 0 


िपञ्चादन्तमो ऽध्यायः 


जज जज 


४१७ 


~~~ 


तजोपविष्ठं श्रीमन्तं सौभस्य ` पतिमूजितम्‌ । 
दृष्ट्रा पस्मसंहश्र्चाच्यं पायेति चासकृत्‌ ॥ ६२ ॥ 
उवाच यवनेन््स्य मन्ञी मन्त्रविश्रां वरः। 

उसमे बैड हुए सौभपतिं तेजस्वी राजा श्रीमान्‌ ाल्वको 
देखकर मन्नवेत्तार्भम श्रेष्ठ यवनराजका मन्त बहुत प्रसन्न 
हुआ ओर वासार कहने लगा--“अरे ! अघ्यं लामो, पाय 
लाओः ॥ १२१ ॥ 
तत्रोत्थाय महावाहुः खयमेव गपासनात्‌ ॥ १३ ॥ 
परसय द्म्यार्व्यमादाय रथावतरणे स्थितः । 

उस समय महावा राजा काट्यवन खयं ही राजसिंहासन- 
से उठा ओर अर्घ्यं ल्यि अगे वदृकर विमाने उतरनेकी 
सीटकरे पास खड़ा हो गया ॥ १३३ ॥ 
दाट्वोऽपि च महातेजा दष्ट रजानमागतम्‌ ॥ १४ ॥ 
मुदा परमया युक्तं राक्रप्रतिमतेजसम्‌ । 
अवतीय खविश्रन्ध एक एव रथोत्तमात्‌ ॥ १५ ॥ 
विषेश परमं प्रीते मित्नरदशेनलरसः। 

महातेजसवी राजा शाद्व भी इन्द्रके समान तेजखी यजा 
काख्यवनकरो बड़ी प्रषन्नताके साथ आया देख निर्भय दो 
अप्रेल ही उस उत्तम स्थते उतर पड़ा आओौर मिक दर्धन- 
की खालसा मनम रखकर अप्यन्त संवुष्ट हयो उसके भवनम 
प्रविष्ट हुआ ॥ १४१५३ ॥ 
दषटाधैमुयतं राजा शल्यो साजषिसत्तमः ॥ १६ ॥ 
उवाच दलक्ष्णया वाचा नाधो ऽसि महाद्युते । 

अपने च्थि अव्यं उपसित देख राज्रियेमि श्रेष्ट राजा 
शास्व मधुर वाणीम बोला--"महाचुते ! मै अर्य ग्रहण करने- 
के योग्य नही हूं ॥ १६२ ॥ 
दूतोऽहं मजुजेन्द्राणां सकाशाद्‌ भवतो ऽम्तिकम्‌॥ १७॥ 
मेषितो वहुभिः साद्ध जरासंयेन धीमता । 
तेन मन्ये महाराज नाघौदहो ऽसीति राजघु ॥ १८॥ 

मे नरेशोका दूत बनकर उनकी ओरमे आपके पास 
आया दू । बुद्धिमान्‌ जरासध तथा बहुतसे नरेशोँने एक 
साथ मिलकर सुन्वे आयकरे पास मेजा दै । महारज ! इसीष्यि 
मे समन्नतवा हू किं इस समय मै राजाभोका अर्व्यं छने योग्य 
नदीं हूः ॥ १७-१८ ॥ 

काटयवन उवाच 


जानाम्यहं महावादो दौत्येन त्वामिहागतम्‌ । 
साहित्ये नरद्रवानां परेषितो मागधेन वे ॥१९॥ 

कालयवन वोखा--मदहावाहये ! मँ जानता द कि तुम 
दूत बनकर यहो जये हो ओर नरपतियोके साथ मगधराज 
जरासंधने तुम्दे यदा मेना ३ ॥ ६९ ॥ 


४१८ 


शीमष्टाभारते खिरभागे 


[ दरिं 


तेन॒त्वामर्चये राजन्‌ विरेपेण महामते । 
अष्यपाद्यादिसत्कारेरसनेन यथाविधि ॥ २०॥ 
भवत्यभ्यचिंते राक्षां सवंपामचिंतं भवेत्‌ । 
आस्यतामासमे शुभ्रे मया साद्धं जनेश्वर ॥ २१॥ 

राजन्‌ ¡ महामते ¦ इसीव्यि मँ ठम्दारी विदोषरूपसे 
पूजा करना चादता हर । अव्य, प्य आदि सत्कारोते तथा 
विधिपूर्वक आसन देनेसे यदि आपकी पूजाहो जायगी तो 
इक्के दवारा समस्त राजाओंका पूजन सम्पन्न दौ जायगा | 
अतः जनेश्वर | अव्र मेरे साथ उज्ज्वल षिंहासनपर विराजमान 

दोदये ॥ २०-२१॥ 
वंग्रम्पायन उवाच 

ख हस्तालिद्ननं छृत्वा पृष्ट च राखामयम्‌ । 
खुखोपविष्ठौ सदितौ श्युभे सिहासने स्थिती ॥ २२॥ 

वेशम्पायनजी कहते है--जनमेजय | काल्यवनने 
शाल्व दाथ मिल्मकर उसका कुगलमंगर पूषा । फिर दोनों 
एक सुन्दर सिंहासनपर साथ-साथ सुखपूर्वक वरैठे ॥ २२॥ 

कटयवन उवाच 

यद्वाहुवलमाधित्य वयं सवं नराधिपाः। 
वसामो विगतोष्धि्या देवा इव शचीपतिम्‌ ॥ २२॥ 
किमसाप्यं भवेदस्य येना परेपितो मयि । 

उस समय काटयवनने क्टा--राजन्‌ | जिनके 
बाहुवलका सदारा ठेकर हम सव्र नरेश उसी प्रकार निमय 
रदते £, जेते देवता राचीपति इन्द्रका सदारा लेकर भयसे 
मुक्त हो जाते है; उन्दी महाराज जरासंधके ल्ि करौन-सा 
कार्यं अखाध्य हो गया दै, जिसते उरन्दोनि मेरे पास आपको 
भेजा है १॥ २३१ ॥ 
बद्‌ सत्यं वचस्तस्य किमाक्नापयति प्रयुः। 
करिष्ये वचनं तस्य अपि कर्मं सुदुष्करम्‌ ॥ २४ ॥ 

उन्न क्या कदा है, यह तच-खच वताक्टये । वे प्रभु 
मेरे व्यि क्या आज्ञा देते? मे उनकी आज्ञाका पालन 
करूंगा । उनके कदनेसे अत्यन्त दुष्कर कर्म भी करर सकता 
ह ॥ २४॥ 


श्राल्व उवाच 
यथा बदति राजेन्द्र मगधाधिपतिस्तव । 
तथाहं सम्प्रवक्ष्यामि श्रुयतां यचनाधिप ॥ २५॥ 

शाल्व वोखा-- रजेन्द्र॒ { यवनेश्वर | मगधराज 

जगासंधने आपते जेसी वात कहनेको कदा दै, वैती दही बता 
रा हू, खनिये ॥ २५ ॥ 

जराप उवाच 
जातोऽयं जगतां वाधी कृष्णः परमदुर्जयः । 
विदित्वा तस्य दुङ्खेत्तमदहं हन्तुं समुयतः ॥ २६॥ 


जरासंधका कथन दै कि-ये जो परम दुर्जय भी. 
ङ्ष्ण प्रकट हु ई, सम्पूर्ण जगत्‌को वडा कष्ट दे रदे टै। 
उनके दुराचार्को जानकर म उर मार डालनेके स्थि उदयत 
हुआ था ॥ २६ ॥ 
पारथिवर्वहुभिः सार्ध सम्रवरबाह्मैः । 
उपरुध्य महासैन्येगोमन्तमचलोत्तमम्‌ ॥ २७॥ 
चेदिराजस्य वचनं महार्थं॒श्रुतवानदम्‌ । 
तदा तयोर्विनाश्षाय दुताश्नमयोजयम्‌ ॥ २८॥ 

बहूत-से राजा अपनी समूची सेना ओर भवार्िर्यो ठेकर 
मेरे सायद्यो गये ये| उन सव्रकी विदाटसेनार्थोदवारा मेनि 
गोमन्त नामक उत्तम पर्वतपर्‌ घ्रेय डाल (क्योकरि उघ समय 
श्रीकृष्ण ओर वरयाम गोमन्तपर ददी वि्मान ये ) । पेय 
डाटनेफ वाद मैने चेदिराज दमधोघका वचन सुना, जो महान्‌ 
अर्थते भरा था | तवर मैन उन दोन विनाश्के स्थि उस 
पर्व॑तपर आग ठ्गा दी ॥ २७-२८ ॥ 


ज्वाटाश्तसदस्नाटवं युगान्तािसमप्रभम्‌ । 
षट समो भिरेः कूखदप्युतो हेमताटश्रक्‌ ॥ २९॥ 
विनिष्पत्य महासेनां मध्ये सागरसंनिभाम्‌ । 
आजघान दुराधष नराद्वरथदन्तिनाम्‌ ॥ ३०॥ 
वद आग सैकड़ों ओर दजाो ल्पर्टोखे प्रज्लिति हो 
उठी, जो प्रख्यकाटकी संवर्तक अग्निके समान ग्रकारित दी 
रदी थी | उस आगको देखकर सुवर्णमय तारध्वज धारण 
करनेवाले वङराम पर्वतके शिखरसे कूद पदे ओर समुद-जेषी 
प्रतीत होनेवाखी उस विशार सेनाके मध्वभागर्मे पर्हुचकर 
दायी, घोढेः रय ओर वैदर्छोका संहार करने खगो | उस 
समय उन पराजित करना अव्यन्त कठिन हो गया था२९-३० 
सर्पन्तमिव सपेन्द्धं विरूष्यारूप्य ल द्रम्‌ । 
नरनायाभ्वद्न्दानि सुसटेन व्यपोश्वयत्‌ ॥ ३१॥ 
उन्न सर्पराजकरे समान सरक्ते हुए दलका आकर्षण 
जीर विकर्परण कफे अर्थात्‌ उख ॒दलद्वारा रानुसैनिरकोको, 
टकेरते ओर खींचते हुए ब्रहुत-त मत्य, घोरो जर हायियो- 
को मुसलसे मर डाला ॥ ३१॥ 
गजेन गजमारफाटय रथेन रथयोधिनम्‌ 1 
हयेन च हयायोहं पदातेन पदातिनम्‌ ॥ ३२॥ 
वे हा्थीसे दाथीक्रोः स्थते रथी योद्धाकोः, घोडेसे शुड- 
सवारको तथा वैदल्से वैदल दिपादीको मौतके घाट उतार 
देतेथे ॥३२॥ 
समरे स॒ महतिजा दपाकशतसंकुङे । 
विचरन्‌ विविधान्‌ मागौन्‌ निदाघे भास्कसे यथा॥३२॥ 
जेते ग्रीष्म ऋतुं सुदेव प्रचण्ड तेजसे सम्पन्न हो जते 
उसी प्रकार सैकड़ों राजारूपी सूर्वसे व्याप्त समराङ्गणमे वे 


विष्णुपवं ] 


नन ववववववववववव्वववव- 


मदातेजस्वी बलराम भेति-्भोतिकरे पैतरे दिखाते हुए विचरन 


न्ये ॥ ३३ ॥ 
रामादनम्तरं ष्णः भृह्याकंसमप्रभम्‌ । 
चक्रं चक्रथरतां श्रेष्ठः सिहः शुद्रस्गं यथा ॥ २४ ॥ 
बरल्गमसे छोये ह शरी्गप्णः जो चक्रधारि्ेमिं श्रे दै । 
वे सूर्ये समान तेजखी चक्र हाथमे लेकर उसी तरह रदु 
सेनिरकोपर द्र पढ़े, जैसे सिंह क्षुद्र शूरगोपर आक्रमण करता 
दे॥ ३४॥ ` 
प्रविचाल्य महावीर्यः पाद्वेगेन तं गिरिम्‌ । 
शब्ुसैम्ये पपातोच्यैर्यदुधीरः प्रतापवान्‌ ॥ ३५॥ 
्रत्यन्निव रोलेन्द्रस्तोयधासयभिषेचितः। 
धूणैमानो विवेश विनिवौप्य नाशनम्‌ ॥ ३६॥ 
महापराक्रमी प्रतापी यदुवीर श्रीकृष्ण अपने पैरोके वेगसे 
उस पर्वतको दिक जब्र ऊचि शिखरसे शनुर्ओकी सेनाम 
कूदे थे, उस समय वह रौरराज नाचता-सा प्रतीत होता था। 
वह अपने ही अवयवो निकली हुई जल्धारसे नहा उ 
ओर सारी आगको दुञ्चाकर चक्र काटता-सा कु दूरतक 
पृथ्वीम घुस गया ॥ २५-२६ ॥ 
आदीप्यमानदिखराद्‌वप्टुत्य जनार्दनः । 
जघान वाहिनीं राजंशचक्रव्यग्रेण पाणिना ॥ ३७॥ 
राजन्‌ ! परवेतके जज्ते हए शिखरसे नीचे कूदकर 
शीकृष्णने चक्रयुक्तं हासे राजाओंकी सेनका संहार आरम्भ 
किया ॥ ३४॥ 


विक्षिप्य विपुखं चक्र गदापातादनन्तरम्‌ । 
नरनागाश्वबन्दानि सुसटेन व्यचू्णेयत्‌ ॥-२८॥ 
विदार चक्र फंककर फिर गदाद्वारा आघात करते ये । 
तदनन्तर बलराम मुसङ्ते हाथी, घोडे ओर मनुष्येकरि समूदो- 
का कचचूमर निकार देते थे ॥ ३८॥ 
कोधानिलसमुद्धतचक्रलाङ्लवल्लिना । 
निर्दग्धा महती ` सेन! नरेन्द्राकभिपाछिता ॥ ३९ ॥ 
क्रोधरूपी वायुस ग्रज्वखित चक्र ओर हटरूपी आगसे 
नरे्तरूपी सुयद्रारा पाटिति वह विशाल सेना जलकर भस हो 
गयी ॥ ३९ ॥ 
नरनागाश्वकरिखं पत्तिष्वजसमाकरुरुम्‌ । 
रथानीकं पदाताभ्यां क्षणेन विदटीरृतम्‌ ॥ ४० ॥ 
इन दो ही पैदल वीरोनि हाथी; घोड़ँ ओर मनुष्यो 
परिुणं एवं पेदख जर ष्वजे व्याप्त रथसमूहका क्षणमसम 
ही संदार कर डाला ॥ ४० ॥ 
सेनां प्रभन्नामाङोक्य चक्रानलभयादिताम्‌ । 
महता रथच्न्देन परिवायं समन्ततः ॥ ४१॥ 


५ । 
वरिप्ार्तमोऽन्यायः 
.__ __ -----~-------~------------------------~-------- रः 


४१९ 


तत्राहं युद्धश्चमानस्तु स्ातास्य वलवान्‌ ली । 
सितो ममात्र श्रो गदापाणिर्दलायुधः ॥ ४२॥ 
चक्राग्निके मप्रसे पीडित हुई अपनी सेनाको पलायन 
करती देख मै विदल रथसमूहके द्वा उन दोनोको सख 
ओरसे घेरकर युद्ध करने लगा । उस समय शरोङृप्णके भल्वान्‌ 
भ्राता शूरवीर बलराम हाथमे गदा ओर इल च्वि मेरे सामने 
खड़े दो गये ॥ ४९-४२ ॥ 
दादक्लाक्षौदिणीर्दत्वा प्रभिन्न इव केसरी । 
हटं सौनन्दसुत्खज्य गद्या मासताडयत्‌ ॥ ४३ ॥ 
उन्होने चोट खाये हूए सिंदके समान कुपित दो मेरी 
चारह अभौहिभी सेनाओंका संहार करे दख ओर मसखल्को 
तो छोड़ दिया ओर गदासे ही मुद्षपर आघात क्रिया ॥ ४२॥ 
वञ्जपातनिभं वेगं पातयित्वा ममोपरि । 
भूयः प्रहतीकामेः मां वैदाखेनास्थितो महीम्‌ ॥ ४४ ॥ 
उसका वेग वञ्रपातके समान था । मेरे ऊपर उस गदा- 
का रहार करफे वै पुनः मुद्षपर चोट करनेकी इच्छते वैशाखी 
८ शक्ति ) ठेकर प्रथ्वीपर खड हो गये | ४४॥ 
वेराखं स्थानमास्थाय गुहः करौश्चं यथा पुरा । 
तथा मां दोर्धतेजाभ्यामीक्चते निददम्निव ॥ ४५ ॥ 
जेते पू्वंकारूमे कातिकेयने क्रोच्च पर्व॑तको विदीर्ण किया 
था; उसी प्रकार वे मेरे म्म॑ख।नको रक््य करके शक्ति खोडने- 
की इच्छासे अपने वड़े-बडे नेर््रोद्रारा मेरी ओर इस तरदं 
देखने ख्गे, मानो मुघ्ने जखकर भस कर ड्ग ॥ ४५ ॥ 
तारगरूपं समालोक्य वर्देवं रणाजिरे । 
जीवितार्थी दलोकेऽस्िन्‌ कः पुमान्‌ स्थातुमरति॥४६॥ 
रणभूमिमे बल्देवके वैसे खरूपको देखकर अपने जीवन- 
की इच्छा रखनेवाखा इस मनुष्यटोकका कौन पुरर उनके 
सामने ठदर सकता है ॥ ५६ ॥ 
गीत्वा ख गदां भीमां कारूद्ण्डमिवोद्यताम्‌ । 
कालाङ्कशेन निधूंतां स्थित एवा्रतो मम ॥ ४७॥ 
फिर काठ्दण्डके समान उटी हुई भयानक गदाको हाथ- 
मे ठेकर वे मेरे सामने खड़े हो गये । बह गदा काल्की प्रेरणा- 
से घुमायी जा रदी थी ॥ ४७ ॥ 
ततो जखदगम्भीरसख्वरेणापूरयन्‌ नभः । 
वागुवाचाहरीरेण सख्यं रोकपितामहः ॥ ४८ ॥ 
प्रहतंव्यो न॒ राजायमवध्यो ऽयं तवानघ । 
कटिपितो.ऽस्य चधोऽन्यस्माद्‌ विरमसख दलायुध॥ ४९ ॥ 
इसी वीचमे साक्षात्‌ लोकपितामह ब्रह्माजी मेषके समान 
गम्भीर स्वरसे आकाशको पूर्णं कसते हुए अद्द्यरूपते बोले 
“अनप [ इस राजापर प्रहार न करना । यह वुम्दारे छथि 


&२० 
अवध्य दै । इसका वध दूरके हायते निधित करिया गया दैः 
अतः हक्धारी वराम ! तुम प्रहारसे विरत दहो जा ˆ४८-४९ 
श्रुत्वाहं तेन वाक्येन चिन्ताविष्रो निवर्तितः! 
सवैप्रणहरं घोरं ब्रह्मणा सखयप्रीरितम्‌ ॥ ५० ॥ 
यह्‌ सुनकर उस आकारावाणीके कारण मै चिन्तामे 
निमग्न हो गया ओर युदढसे लोट पड़ा; व्ौकि साक्षात्‌ 
ब्रह्याजीने वह रमा घोर क्चन सुनाया था; जो मेरी सम्पूर्णं 
प्राणरक्तिकरो हर टेनेवाला था ॥ ५० ॥ 
तेनाहं वः पव्रक््यामि सरपाणां हित्तक्राम्यया । 
श्रुत्वा त्वमेच राजेन्द्र कुर्ह तद्‌ वचः ॥ ५१९॥ 
राजेन्द्र } इसलिये मै तमसे समस्त नेक दितकी 
कामनसि कुछ कना चाहना हू उमे सुनकर म्द उसे पृण 
कर सक्ते हो ॥ ५१ ॥ 
तपसोग्रेण मता पुराथ तोप्य शङ्करम्‌ । 
प्राप्तवान्‌ देवदेवं त्वामवध्यं माधुरेजनैः ॥ ५२॥ 
महासुनिश्चायसचूणेमदन- 
न्युपस्थितो द्वादश्षवार्पिकं चतम्‌ । 
सुरासुर: संस्तुतपादपद्कजः 
स॒ खव्धवानीप्सितक्रमसम्पदम्‌ ॥ ५२३ ॥ 
महामुनि गार्ग्य, जिनके चरणारविन्दोकी स्वति देवता 
ओर अघुर भी करते ई; बारह वर्पोतक ब्रह्मचर्यत्तका पालन 
करनेके पश्चात्‌ सोदचणं खाकर तपस्या करने कगे । मरने 
पुत्रकी कामना रखकर उस उग्र एवं महान्‌ तपके द्वारा 
भगवान्‌ शड्रको संतुष्ट करे उनते उन्दनि अपनी अभीष्ट 
कामसम्पत्तिके सूप्मे देवयज-तु्य तुमको प्राप्त किया | तम 
मथुरामण्डल्मे उन्न दोनेवाठे लोर्गकि य््ि अवध्य 
हो ॥ ५२.५३ ॥ 
तपोव्रलाद्‌ गार््यसुनेर्म॑हात्मनो 
वरग्रभावाच्छकरलेन्दुमौलिनः । 
भवन्तमासाद्य जनार्दनो हिमं 
विखीयते भास्कररदिमना यथा ॥ ५४॥ 


श्रीमष्टाभारते खिकभागे 


[ दिवं 


महामुनि गार्ग्य तपोव्रल ओर चन्दरर्धशेखर भगवान्‌, 
निवफ वरदानसे तम्दाय प्राकस्य दुधा द । तुपमे यकर ठेनै. 
पर श्रीकण्ण उसी प्रकारनध्दो जर्थगेः तमे वफ सूर्यकी 
क्रिर्णेसि गल जाता टै ॥ ५४ ॥ 
यतस सान्नं चचनधरचोदिवो 
व्रजस्व या्ां विजयाय केद्यवम्‌ । 
प्रविदय रषं मधुसं च सेनया 
निहत्य ष्ण प्रथयन्‌ खक यदः ॥ ५५॥ 
राजन्‌ ¡ तुम राजा वचनेति प्रेरित द्ये श्रदृष्णनो 
जतनेकरा प्ररत करो | उनपर्‌ विजय पनिकर लि मधुरापर 
चटाई कर दौ | अपनी सेनादसा मथुराके राव्य ओर नगरः 
मे प्रवेश कफे श्रीकरप्णको मारकर अपने यद्क्रा विस्तार 
करो ॥ ५५ ॥ 
माध्ुरो वायुप्रनोऽयं वख्देवः सवान्धवः। 
तौ विजेष्यसि संग्रामे गत्वा तां मधुरं पुरीम्‌ ॥ ५६॥ 
वसुदेवपुत्र श्रीकृष्ण ओर चलदेव अपने बन्धु -बान्धरवो 
सहित माथुर दी ई; ठम मधुरापुरीपर चदाई करके उन दोन 
मादर्योको युद्धम जीत ल्येगे ॥ ५६ ॥ 


श्रत्व उवाच 


इत्येवं नरपतिभास्कर प्रगीतं 
वाक्यं ते कथितमिदं हितं पाणम्‌ । 
तत्सर्वे सद सचिधेर्धिसदय बुद्धा 
ययुकतं कुर मच॒जेन्दरं चात्मनिष्टम्‌ ॥ ५७ ॥ 
श्राल्य कहता है-- नचेनद्र ! राजामि सुर्के समान 
प्रकायित होनेवठे जशसंधने दश्च प्रकार जो सम्पू नरेगेकि 
ल्ि दितकारक वात कदी दै, वह्‌ ने वम कद सुनायी। 
दम अपने मन्ति साथ वैठकर उन खारी व्रातोपर बुद्धि- 
पूर्वक विचार करे जो अपने न्धि लभदायरक ओर उचित 
जान पडे, वह करो 1 ५७ ॥ 


हति श्रीमहाभारते विरुभागे हरि विष्णुपर्वणि क्ाल्ववाक्ये प्रिप्वादात्तमोऽध्यायः ॥ ५३ ॥ 


इत प्रकार श्रीमहाभारते खिकभाग रिक अन्तत त्रिगवं श्षालका वाक्यत्रिपयरु तिरपनरे अध्याय पुरा हुमा ॥ ५२ ॥ 


~----~र-2----- 


चतुष्प्ारात्तमोऽध्यायः 


काटयवनका राजा्भका अनुरोध खीकार करे श्रीकृष्णपर 
विजय पानके सिये मथुराको प्रान 


वै्यम्पायन उवाच 
पवं कथयमानं तं श्ाटवराजं यपाक्षया। 
उवाच परमप्रीतो यवनाधिपति्ुपः॥ १॥ 


वैश्म्पायनजी कते है--जनमेजय ! नरेर्थोकी 
आ्ञाफे अनुसार खास्वराजने जब्र उपयुक्त बात कीः तवं 
यवकं अधिपति राजा कालयवनने अत्यन्त प्रसन्नं होकर का ॥ 


पञ्चपश्चाश्चन्तमो ऽध्यायः 


४२१ 


_____ ~~~ 


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काटयवन उवाच 
धन्यो ऽस्म्यनुगृदीत्तोऽरिम सकष्टं जीवितं मम । 
छृप्णनिग्रहदेतोर्य॑न्नियुक्तो वहुभिर्खपेः ॥ २ ॥ 
काटयवन बोखा-बरहुत-ते राजानि मिलकर जो 
मुने भीद्चप्णकरे निग्रहे चि नियुक्त किया दैः इस्त म धन्य 
हयो गया । यदह उन सवका मुञ्चपर महान्‌ अनुग्रह है । आज 
मेरा जीवन सकल दो गया ॥ २॥ 
दर्जयसिषु रटोक्रेु खुरुरगणैरपि । 
तस्य निग्रहंहेतोमीमवधा्य जयारिपम्‌ ॥ २३ ॥ 
परदे राजरिैस्तैरवधायो जयो मम। 
तेषां वाचाम्बुधरचेण विजयो मे भविष्यति ॥ ४॥ 
जो तीना लेर्कमि देवतार्ओ ओर असुरे व्यि भी दुर्ज 
है, उन्दी निग्रदके व्यि मुघ्ने मेजनेका निश्चय करिया गया 
ओर मुञ्ञे विजग्रसूचक आशीर्वाद भी प्राप्त हुआ | ह्मे मरे 
दए उन राजमिहनि यदि मेरी विजयका निश्चय क्रियाहैतो 
उनके वचनामूत्तकरी व्रि मेरी जीत अवद्य होगी | ३-४॥ 
करिष्ये बचन तेषां चपसत्तमचोदितम्‌। 
पराजयोऽपि राजेन्द्र जयेन सद्डो मम ॥ ५ ॥ 
रजेन््र | मँ नृपश्रेष्ठ जरासंधके कथनानुसार उन 
राजायकि वचनक्रा पालन अवश्य करछँगा । इस युद्धम 
यदि मेरौ पराजय मी हुरईतो वद मेरे ल्मिव्रिजयके ही 
समाने दोगी ॥ ५ ॥ 
अद्येव तिथिनक्षत्ं सुहत करणं श्युभम्‌ 1 
यास्यामि मथुयं राजन्‌ तिजेतुं केशवं रणे ॥ ६ ॥ 


राजन्‌ ! यै आनकरी तिथिः नश्चत्र, पूतं यर करणको 
शुम मानकर श्रकृप्णकर युद्धम जीतनेकरे व्यि आज दी 
मधुरको प्रस्ान करगा ॥ ६ ॥ 

कैदम्पायन उवाच 

पवमाभाप्य यजानं सौभस्य पतिमूर्जितम्‌ । 
सत्कृत्य च यथान्यायं महार्हमणिभूपणेः ॥ ७ ॥ 
ब्राह्मणेभ्यो ददौ वित्तं सिद्धादेश्षणय वें चरपः। 
पुरोदिताय राजेन्द्र॒ भददौ वहुशो धनम्‌ ॥ ८ ॥ 

वैराम्पायनजी कहते ईै--जनमेजय | सौमभविमाने 
अधिपति वरल्वान्‌ राजा शाल्वसे एेसा कहकर काठयवनने 
चहुमूल्य मणिमग्र आभूषर्णेद्वारा उसका यथोचित सत्कार 
क्रिया । रज्र  त्पश्वात्‌ उस राजनि सिद्धिसूचक आसीद 
प्रप्त करमेके लि बादार्णोकि धन दान दिया ओर पुरेदितको 
वहूत-सा धन अर्वित क्रिया ॥ ७-८ ॥ 
हत्वाग्नि बिधिवद्‌ यजा ईतकौतुकमङ्गलः। 
भ्रस्थानं रतवान्‌ सम्यग्‌ जेतुकामो जनादंनम्‌ ॥ ९ ॥ 

तदनन्तर, विधिपू॑क अग्निम आहुति करके या्ाकालिकि 
मङ्गलचार सम्पन्न करनेकरे पश्चात्‌ राजा काख्यवनने जनार्दन 
श्रीकृप्णपर भीर्भोति विजय ॒पनिके च्यि वदेसि प्रस्थान 
किया॥ ९॥ 
श्ाव्वोऽपि भरतश्रेष्ठ छताथाँ हृष्टमानसः । 
यचनेन्द्रं परिष्वज्य जगाम स्वपुरं खपः॥१०॥ 

भरतश्रेष्ठ ! इधर राजा शाल्व भी कृतार्थं एवं प्रसन्नचित्त 
हो यवनराजको ददयते कगाक्रर अपने नगरको चलम गया ॥ 


इति श्रीमहाभारते खिरुभगे हरिविदे विष्णुपर्वणि कारु्यवनवाक्ये चतुप्प्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५४ 1 
इस प्रकार श्रामहाभारतफे खिलमाग दसिवंशके अन्तम॑त वरिप्णुपवमे कासयवनक। 
वाक्यविषयक चौवनवे अध्याय पूरा हुमा ॥ ५४ ॥ 


नदस्य 


। पचप्चाशत्तमोऽष्यायः 
गरुड्का श्रीकृष्णके निचासयोग्य भूमि देखनेके लिय जाना, मथुरामे राजेन्द्र 
भीकृष्णक्रा खगत, श्रीकृष्णद्वारा राजा उग्रसेन तथा मधुरावासिरयोका 
सत्कार एवं गरुडका ोरकर इुशयखलीके विषयमे वताना | 


जनमेजय उचाच 
विदर्भनगसाद्‌ याते शक्रतुटयपसक्रमे । 
किमर्थं गरुडो नीतः किं च कम चकार सः ॥ १॥ 
जनमेजयने पूा--इनदरके दल्य पराक्रमी भगवान्‌ 
शरीङ्प्ण जव विदं नगरे मधुरको गये, उस समव अपने 
साय गरद्को क्यो छे ग्ये ओर गर्डने व्हा जाकर कौन- 
“सा कार्यं सम्पन्न क्रिया १॥ १॥ 


न चारुरोह भगवान्‌ वैनतेयं मदावलम्‌ ! 
पतम्मे संशयं ब्रह्मन्‌ नदि तं मासुने ॥ २ ॥ 


महामुने ! व्रह्मन्‌ { भगवान्‌ श्रीकृष्ण महावली गरुड्पर 
आरूढ कर्यो नदीं हुए १ यह मेरा संय है । आप इसका 
टीक्र-टीक समाधान करे | २॥ 

वै्चम्पायन उवाच 

श्णु राजन्‌ सुपर्णेन र्त कमौतिमाुपम्‌ । 
विदर्भनगरीं गत्वा वैनतेयो मदायुतिः॥ ३ ॥ 

वैशम्पायनजी कहते है-- रजन्‌ ! मदातेजसी विनता- 
नन्दन गर्ड़ने विदेभनगरम जाकर रेस कार्थं ॒क्रिया था, 
जो मानवीय दाक्तिसे पकी वस्तु टै ॥ ३॥ 


४२२ 


श्रीमहाभारते लिलभागे 


४ ॥। 


[ श्यिषशे 


असम्प्रात्ते च नगरी मथयं मधुसूदने । 
मनसा चिन्तयामास वैनतेयो मदादुतिः॥ ४ ॥ 
यदुक्तं देवदेवेन दपाणामप्रतः परभो। 
यास्यामि मथुरां रम्यां भोजयजेन पाठिताम्‌ ॥ ५ ॥ 
ति तद्धचनस्यान्ते गमिष्यति धिचिन्तयन्‌ । 
छताअजलिपुटः धीमान्‌ प्रणिपत्यात्रवीदिदम्‌ ॥ ६ ॥ 

प्रमो | मधुसूदन श्रीकृप्ण विदर्मनगरसे चख्कर अमी 
मार्गम ही येः मथुरापुरी नदीं पहुचे ये । तमी मदातेजलखी 
गरुड्ने मन्‌-ही-मन विचार किया कि देवाधिदेव श्रीदस्नि सव 
राजाओकि सामने जोक्दाथा कि भे भोजराज उग्रतेनके 
द्वारा पालित रमणीय नगरी मथुराको जागाः उनके उस 
कथनके अन्तर्मे "चग? यह्‌ कहकर मैने भी चलना स्वीकार 
कर ल्या था ] यदी सोचते हए. गरड़को एक कार्यं॑सूज्च 
गया ओौर उन तेजस्वी पक्षिराजमे दोनो दाथ जोड़ भगवान्को 
प्रणाम करके दस प्रकार कदा--॥ ५-६ ॥ 


ग्ड उकाच 


- दैव यास्यामि नगयी शेवतस्य कुशस्थलीम्‌ । 


रेवतं च गिरिं रम्यं नन्दनग्रतिमं वनम्‌ ॥ ७ ॥ 
गरुड़ वोे-देव ! मै राजा रेवतकी कुशखटी 
नगरीको जाऊँगा । वहो रमणीय रैवत गिरि है, जहो नन्दनके 
समान मनोहर बन ह ॥ ७॥ 
रूफिमिणोद्धासितां रम्यां शेरोदधितटाभ्चयाम्‌। 
चृष्वशरमलताकी्णां पुष्परेण्ुविभूषिताम्‌ ॥ ८ ॥ 
सक्मीने पर्वत ओर समुद्रतटका आश्रय केकर वसी हुई 
' उस रमणीय मगरीको उजाड़ दिया है । वहो दहरे-भरे इषः 
गुल्म ओर वतारे फैली हुई ६ । केके पराग उसकी लोमा 
दृते ई ॥ ८ ॥ 
गजेन्द्रुजमाकीणीसक्षवानरसेविताम्‌ । 
वराष्टमष्टिपाक्रान्ता सगयुधैरनेकश्यः ॥ ९ ॥ 
वरहो हाथी ओर सपं भरे हए द । रीछ तथा वानर 
उसका सेवन. कसते दँ । वारादः भसे तथा मृगेकरि अनेकानिक 
ड वरदौ वाख करते ई ॥ ९॥ 
तां समन्तात्‌ समारोक्ष्य वासार्थं ते क्षमां क्षमा । 
यदि स्याद्‌ भवतो रम्या प्रशस्ता नगरीति च ॥१०॥ 
कण्टकोद्धरणं कृत्वा आगमिष्ये तवान्तिकम्‌ । 
उस भूमिका सव ओससे निरीक्षण करे मेँ यह दर्यूगा 
किं वह अपके निवासके ल्यि उपयुक्त दै या नदीं । थेदि वह्‌ 
आपके योग्यं रमणीयं या उत्तम नगरी हो स्करेगी तो वहि 
-कंण्टर्कोको ( आपके मार्गका अवरोध करनेवाले सत्रु्ओको ) 
उखा रकग ओर आपके पास लोट अङ्गा ॥ १०३ ॥ 


द्रम्पायन उवाच 


पवं विज्ञाप्य देवेक्षं प्रणिपस्य जनार्दनम्‌ ॥ ११॥ 
जगाम पतगेन्द्रोऽपि पश्चिमाभिमुखो वदी । 

वैराश्पायनजी कते है- जनमेजय | इस प्रकार 
अपना अभिप्राय निव्रेदन करे देवेश्वर जना्दनको प्रणाम 
करनेके अनन्तर वलवान्‌ पक्षिराज गस्ड़ पश्चिम दियाकी ओर 
चरु दिये ॥ १९१४ ॥ 


कृष्णोऽपि यदुभिः सादं विवे मथुरा पुरीम्‌ ॥ १२॥ 
स्वैरिण्य उग्रसेनश्च नागराश्रैव सर्वशः| 
परत्युद्धम्याच॑यन्‌ छृष्णं ब्रहृष्टजनसंकुटम्‌ ॥ १३॥ 
इधर श्रीकृप्ण मी यदुवंरिरयेकरे साय मयुरापुरीमे जा 
पहुचे ¡ उस समय राजा उग्रसेनः नर्तकरियों तथा मथुराके 
नागरिक सथ्रने आगे वकर दृ्टपुष्ट मनुष्येकि पाय अयि 
दए शरीकृष्णका सखागत सत्कार करिया ॥ १२-१३॥ 
जनमेजय उवाच 
श्ुत्वाभिपिक्तं राजेन्द्रं वहुभिर्वसघाधिषैः । 
क्रि चकार महदावादुरुग्रसेनो महीपतिः ॥ १४॥ 
जनमेजगने पृछा-वहत-छे राजार्ओोनि मिलकर श्री- 
कृप्णका रानेन्द्रपदपर अभिषेक किया दै--यद समाचार सुन- 
कर महाबाहु राजा उग्रसेनने क्या किया ?॥ १४] 
वै्चम्पायन उदराच 
शुत्वाभिषिक्तं रजेन्द्रं बटुभिः पार्थिवोत्तमैः। 
शन्द्रेण छतसंधानं दुतं चिचाद्गदं रतम्‌ ॥ १५॥ 
एकैकं दपतेभौगं शतसादखरसम्मितम्‌ । 
राजेन्द्रे त्वर्वुदं दत्तं मानचेपु च वे ददा ॥ १६॥ 
ये त समयुप्राप्ता न रिकास्ते ग्रहं गताः । 


शदो याद्वरूपेण प्रददौ हरिचिन्तितम्‌ ॥ १७॥ 
पवं निधिपतिः श्रीमान्‌ दैवतैरयुमोदितः। 


वैशम्पायनजीते कहा--बहुत-से श्रेष्ठ ॒नरेशोनि 
मिलकर श्रीकृष्णका राजेनदरके पदपर अमिपेक क्रिया दै। 
इन्ध्रका अभिप्राय निवेदन करनेके ल्य वितराङ्गद दूत व्रनकर 
अये थे] एक-एक राजाको एक-एक लख मुद्रः पुरस्कार 
दी गयीं | जो रजेन्द्र था, उसे एक अर्बुद ( दस करोड ) 
दिया गया तथा साधारण मनुरपयोको भी दस दस हजार रपये 
दिये गये । जो वर्हो पर्हूच गये धेः वे खाली हाथ धर नदी 
लौटे । श्रीमान्‌ निधिपति शद्ध ही यादवरूपते उपसित दो 
भगवान्‌ श्रीकृप्णकी इच्छाके अनुसार धन देता थां ओर 


सम्पूणं देवता इसका अनुमोदन करते थे ॥ ६५१७३ ॥ 


इति श्रुत्वात्मिकजनारलोकग्रृत्तिकान्नरात्‌ ॥ १८ ॥ 


षिष्णुपवं ] 


चकार मर्तं पूजां देवतायतनेष्वपि । 
यदह समाचार आत्मीय जरनपि सुनकर तथा लोकटत्तान्त- 
की जानकारी करानेवाछे गुप्तचर भखसे जानकर उग्रेनने 
देवमन्दिरोमिं वरिदेष रूमते पूजाकी व्यवस्था करायी ॥ १८९॥ 
वसुदेवस्य भवने तोरणोभयपादू्वतः ॥ १९॥ 
नटानां चत्यगेयानि वाद्यानि च समन्ततः। 
वसुदेवकरे मवनके दोर्नो बग्प तोरण रूगे ओर सत्र 
ओर नर्योके नाच-गान होने ओर व्रजे बजने ट्गे ॥ १९१॥ 
पताकध्वजमाराद्यां कारयामास वै चपः ॥ २०॥ 
कखराजस्य च सभां विचित्राम्बरस्ुपभाम्‌ । 
राजा उग्रतेननै कसराजकी सभाको विचित्र वस्रसि 
सुसलित तथा । प्वजा-पताका एवं माखा्ओसि अलंकृत 
कराया ॥ २०९ ॥ 
पताका विविधाकारा दापयामास भोजराय्‌ ॥ २९ ॥ 
तोरणं गोपुरं चैव सखुधापद्काचरेपनम्‌ । 
कारयामास राजेन्द्रो राजेन्द्रस्यासनाक्यम्‌ ॥ २२॥ 
भोजराजने सव्र ओर भोति-्भोतिकी पताकार्णैँ र्गवायीं 
ओर प्रलयेक फाटक एवं गोपुरको चूनेसे ट्पिवाया ] इस 
प्रकार रजेन्द्र उग्रसेनने राजेन्द्र श्रीकृष्णके ल्यि षिंदासन 
ओर भवन तैयार करवाया ॥ २१-२२ ॥ 
नखानां सत्यगेयानि वायानि च समन्ततः । 
पताका वनमारादयाः पुणङुम्भाः समन्ततः ॥ २३ ॥ 
राजमागेपु राजेनद्र चन्दनोद्कसेचितम्‌ । 
रजिन्द्र | नगरमे चास ओर नाच-गान दने ओर बाजे 
यजने लगे । राजमार्गोपिर चन्दनयुक्त जलका दिढ्काव 
करिया गया थार वर्हो चारो ओर जल्ते भरे टुए कलदा 
रखे गये ये | उन कलटर्शोकतो पताका ओर वनमालओसि 
अलंकृत किया गया था ॥ २३१ ॥ 
चस्राभरणकं राजा दापयामास भूतले ॥ २४॥ 
धूपं पण्वोभये चेव ॒चन्दनागुरुगुग्युलेः 1 
गुडं सर्जरसं चेव ॒ दद्यमानं ततस्ततः ॥ २५॥ 
राजा उग्रसेनने भूतल्पर ्पोवड़ेके रूपमे वस वरिखवा 
दिये थे ओर वरहो पूर्लकी माल र्खवा दी थींतथा 
सद््कोकि दोनो व्रगल चन्दन, अगुरु ओर गुग्ुलकी धूप 
जल्वायी । जर्हे-तर्शो रा ओर गुड जलये जा रदे 
ये ॥ २५२५ ॥ । 
दृद्धखीजनसंपेश्च गायद्धिः स्त॒तिमहकम्‌ । 
अर्घ छृत्वा प्रती्चन्ते स्वेषु स्थानेषु योपितः ॥ २६॥ 
वृटी लियो समुदाय सान-खानपर स्तुति ओर मङ्गल 


पश्चपञ्ादात्तमोऽध्यायः 


४२२ 


गाते थे | उनके खाय दी युवतिर्यौ मपने-अपने घरपर अव्यं 
सजाकर शरीकृष्णके श्यभागमनकी बार जोह रदी थीं ॥ २६ ॥ 
पवं कृत्वा पुरानन्दसु्रसेनो नराधिपः । 
वखुदेवगृ्ं गत्वा प्रियाख्यानं निवेद्य च ॥ २७॥ 
रामेण सष्ट सम्मन्न्य निगतो रथमन्तिकम्‌ । 
इख प्रफार राजा उग्रसेन नगरम आनन्दोत्सवकी 
व्यवस्था करके वसुदेवके घरपर गये ओर श्रीकृप्णके अभिषेक 
तथा आगमनका परिय समाचार निवेदन करफे बलरामके 
साय सलाहकर श्रीटप्णके रथकरे निकट चरे ॥ २७६ ॥ 
तसिननेवान्तरे राजञ्शाङ्कुष्वनिरभून्महान्‌ ॥ २८ ॥ 
पाञ्चजन्यस्य निनदं श्रुत्वा मधुरचासिनः। 
दियो बुद्धाश्च वाखाश्च सूता मागधवन्दिनिः ॥ २९॥ 
विनिर्ययुर्महासेना रामं छृत्वाग्रतो चप। 
अर्घ्यं पाद्यं पुरस्त्य उग्रसेनेन धीमता ॥ ३०॥ 
राजन्‌ { नरेश्वर ! इसी वीचमे बड़े जोरसे राद्ु-ध्वनि 
सुनायी दी । पाञ्चजन्यक्रा गम्भीर नाद सुनकर मधुपुरवासी 
स्री, वार्कः इद्धः सूत, मागध ओर वन्दी बल्यमजीको 
अगे करफे विश्नाठ सेनफेि साथ अर्व्य-पाद्य आदि च्वि 
नगरसे वादर निकले | न स्वकरे साथ बुद्धिमान्‌ राजा 
उग्रसेन भी ये ॥ २८--३* ॥ 
दृ्िपन्थानमासाय उग्रसेनो महीपतिः! 
अवतीय रथाच्छुश्रात्‌ पादमागेंण चाग्रतः ॥ २१ ॥ 
शरीकृप्णके दृष्टिपथमे आकर राजा उग्रसेन अपने उज्ज्वल 
स्थते उतर पदे ओर पैदरु दी आगे बद ॥ ३१ ॥ 
दषटऽऽसीनं स्थे रज्ये दिव्यरत्नविभूषितम्‌ । 
अद्ेष्वाभरणं चैव॒ दिव्यरःनप्रभायुतम्‌ ॥ ३२ ॥ 
वनमालोरसं दिव्यं तपन्तमिव भास्करम्‌ । 
चामरं व्यजनं छं खगेन्द्रध्वजमुच््ितम्‌ ॥ ३३ ॥ 
राजलक्षणसम्पूर्णमासन्ना्कमिवोज्ज्वटम्‌ । 
ध्रियाभिभूतं देवेशं दुर्निंयक््यतरं हरिम्‌ ॥ ३४॥ 
उन्दोनि देखा, भगवान्‌ श्रीकृष्ण एक रमणीय रथपर 
विराजमान ह | दिभ्य रत्नमय आमूषणेि विभूषित ई । 
उनके अङ्खोके आभूप्रण दिव्य रलोकी प्रभासे प्रकाशित हो 
रे दं । उनके वक्षःखल्पर वनमाला विराज रदी ३ |वे 
दिव्य स्पधारी श्रीहरि तपते हृ. चु्वके समान जान पडते 
द । उनके दोनों पा्र्वमे चर्वैर अर व्यजनं कये जति ह | 
सिरपर छत्र तना हुमा है । रथपर ऊँचा गरखुडृष्वज फदरा 
रहा दै । वे समस्त राजोचित छक्रणोसे सम्पन्न ह ओर 
निकट आये हुए सूयक खमान दिग्य ज्योतिसे जान्वत्यमान 


[ स्वरो 


उवाच वदतां श्रेष्ट उग्रसेनं नराधिपम्‌ ॥ ४२॥ 


४२४ श्रीमहाभारते खिखभगे 

हो रे £| उदु मोग व्यान दिखायी देते ह! उन अधोयतमुजं द्षटर॒सखापयित्वा स्थोचमम्‌ । 
देवेश्वर अदस ओर देखना भौ अत्यन्त कठिनिदोरदा 

६॥ ३२--३४५॥ 


दध्र ख सजा रजेन दर्पगद्धदया गिरा। 
भाषे पुण्डरीका सामं चखनिपृद्नम्‌ 1 ३५॥ 

रचिन्द्र ! भगवान्‌. श्रीङ्प्णको इख स्ूपर्मे देखकर राजा 
उग्रमेन य््न्दन्ता केमटनयन व्रटरामनौमि ह्यगद्रद 
वारी योदे--) ३५ ॥ 
स्थेन न मया गन्तुं यु्तपूर्ेति चिन्त्य वै। 
अवतीणो मदाभाग गच्छ त्वं स्यन्दनेन च ॥ ३६॥ 

भमरहामाग } मनि प्रददे दी यद्‌ सोच च्याहैकि युन 
रथपर वरैटकर मगवानङे खामने नदी जाना चादिये ! अतः 
वर स्यसे यत्रा क्रो} एेखा ककर वे रथसे उतर 
गये | ३६ ॥ 
विष्णुना छद्मरूपेण गव्वेमां मयुसं पुरीम्‌ । 
अनुप्रकादितान्मानं देवेन्द्रत्वं खपार्णवे ॥ ३७॥ 
तमं स्तोतुमिच्छामि सर्वभावेन केशवम्‌ । 

उतस्कर वे फिर वोटे--भगवान्‌ विष्णु छद्ुरप धारण 
करके ख मथुरापुरीमे अयि ये ह्दोनि राजा्करि समुद्रम 
लाकर अपने देवेन्र-रूपको प्रकाशित किया टै; अतः 
केशवकी सवतोभावसे.स्वुति करना चाहता हर ॥ २७१ ॥ 
परत्युवाच मद्दातेजा राजानं छृप्णपूर्वजः ॥ २८॥ 
न युक्तं चरपते स्तोतुं बजन्तं देवसत्तमम्‌ । 
यिना स्तोप्रेण संतुष्टस्तव॒राजक्चनार्दनः ॥ २९ ॥ 
वु्टस्य स्तुतिना किं ते दशनेन तव स्तुतिः । 

तय धीकृष्णकर वदे माई मदातेजम्बी वलरामनं राजा 
उग्रषेनफो दख प्रकार उत्तर दिया--नसेश्वर ! यदो अति हूए 
देवप्मवर श्रीषण्णक्री स्तुति करना आपके च्वि उचित नहीं 
1 सन्‌. | आपपर तो भीष्ण व्रिना स्वतिकि दी संतु 
६1 जववेखंतु्ट रीं तो उनकी स्तुतिषे आपको क्या 
देना ४ 1 आपतते दर्गनमात्रसे दी उनकी त्ति दयो 
गयी । ३८-३९६ ॥ 
राजेन्द्रत्वमयुप्ाप्य आगतस्तव पेदमनि ॥ ४०॥ 
न त्ववा स्तुतवान्‌ राजन्‌ दिव्यैः स्तोतरैरमायुभैः। 

राजन्‌ | श्रीटप्ण रजिन्दरका पद पकर आपके घरञआ 
रट £ दमन्ि आर अमातुधिफ दिव्य स्दुति्योद्यारा उनकी 
स्तुति करद आपके व्यि उचित नदद ६॥ ८०३॥ 


पयमाघ्रुवमाणेो तौ सम्प्राप्तौ केदावान्तिकम्‌ ॥ ४१ ॥ 


इस तरद बातचीत करते हुए वे दोनो श्रीकृप्णके निकट 
जा प्च । राजा उग्रसेनको दाथर्मे अव्य व्यि खड़ा देख 
वक्तारओमिं श्रेष्ठ श्रीर्कप्ण अपने उत्तम रथक्रो उदृयाकरर उनते 
इस प्रकार बोले ४१-४२ ॥ 
यन्मया चाभिपिक्रस्त्यं मथुरे भवत्विति । 
न युकमन्यथा कर्तं मधुराधिपते खयम्‌ 1 ४३॥ 
ध्मथुरपते ¡ मने जो आपका इसय््यि अभिपेक किया 
थाक्रि अप मधुराराच्यके स्वामी दौ, उसे आपस्वयंदही 
मयियामेट कर दै--यह आपके लि उचित नदी दै ॥४३॥ 
सर््यमाचमनीयं च पाद्यं चास्मै तरिवेदितम्‌। 
न दातुमर्दसे राजन्नेष मे मनसः प्रियः ॥ ४४॥ 
ध्राजन्‌ ! मैने आपको. अर्घ्यः पाथ ओर आचमनीय 
निवेदन कवा दै। अतः आप मुच्नेये स्त्र वस्तुन देँ- 
यही मेरे मनको प्रिय है ॥ ४४॥ 
तवाभिप्रायं विक्ाय तअ्रचीमि नरपते वचः। 
त्वमेव माथ॒खे सजा नान्यधा कर्तमर्दंसि ॥ ४५॥ 
ध्नरेध्वर्‌ ! मँ आपके मनोभावको जानकर कहता टू । 
अप ही मधुरे राजा ई ओर रटेगे । इसे अन्यथा करना 
आपे लि उचित नही है ॥ ५५ ॥ 
स्थानभागं च चपते दास्यामि तव दक्षिणम्‌ । 
यथा नृपाणां सरवेथां तथा ते स्थापितोऽद्यत्रः ॥ ४६॥ 
'मरहाराज ! म आपको पुरत्कार्के रूपमे नियत धनका 
माग अर्पित कर्ैगा | जेते अन्व सत्र राजाओको दिया गया 
दै, वैसे आपके च्ि मी सामने सा हुभा ह ॥ ४६ ॥ 
श्तस्राहचिक्ो भागो बवल्ाभरणवर्जितः। 
आरु रथं शुरं चामीकरविभूषितम्‌ ॥ ४७॥ 
ध्वल्न ओर जमूप्ण छोडकर केवल एक लख सखर्णं 
८ दीनार ) आपके दिस्सेम अर्पित ई । अव आप इस स्वर्ण 
भूषित य॒भ्र स्थपर आरूढ होष्टये ॥ ४७ ॥ 
चामरं व्यजनं छत्रं ध्वजं च मदुजेश्वर। 
दिव्याभरणसंयुक्तं मुकुटं भास्करप्रभम्‌ ॥ ४८॥ 
धारयस्र महाभाग पाटयस्र पुरीमिमाम्‌ । 
भ्मदामाग ! मनुजेश्वर ! चरः व्यजन, छत्र, ध्वज थर 
दिव्य आमूप्र्णोषद्ित सूयक समान प्रकायमान मुकुट धारण 
कीलिये । साय दी इख पूरका पाटन करते रदे ॥४८९॥ 


[न 


ष्यं ~ 


पश्चपञ्चाराश्तमोऽण्यायः 


४५५ 


चज -~--=-=-=----- 


पुतरपौभरैः भरसुदितो मथुरां परिपारय ॥ ४९॥ 
जित्वारिगणसंर्धाश्च भोजवंशं विवर्दंय । 

आप पुत्रों ओर पौत्रौके साथ आनन्दित रहकर मथुरा- 
पुरीका पालन कीभिये । शन्नुगर्णोको पराजित करके भोजवंश- 
को बाध्ये ॥ ४९९ ॥ 
देवेवाच्यनन्ताय शौरिणे वञ्नपराणिना ॥ ५०॥ 
व्रेषितं देवराजेन दिव्याभरणमम्बरम्‌। 

'वश्नधारी इन्द्रने श्रूरसेनके कुर्म उत्पन्न हुए देवताओं 
के मी देवता, सवके आदि कारण रोषस्रूप वलरामजीके 
चयि दिव्य वख ओौर आमूषण मेजा है ॥ ५०१ ॥ 
मायुखणां च स्ववां भागा दीनारका दृश्या ॥ ५९॥ 
सूतमागधयन्दीनामेकैकस्य सषटस्चकम्‌। 
घृद्धस्नीजनसंधानां गणिकानां हात शतम्‌ ॥ ५२॥ 
पेण सह तिष्टन्ति विकंटुपमुखाश्च ये । 
दश्षसाष्सिको भागस्तेषां ध्रा प्रकदिपतः ॥ ५३ ॥ 

ध्मथुराके समी नागरिकंकि स्थि पृथक्‌ पृथक्‌ दस-दस 
दीनीर सुवर्णके भाग नियत कि गये द । सूत, मागध ओर 
वन्दीजरनोमिते एक-एकको एक-एक हजार दीनार प्राप्त हंग । 
भङ्गरु गानेवाटी बूढी लियो तथा नर्तकिर्योको सौ-ठौ दीनार 
दिये जागे । विकट आदि जो प्रमुख यादव राजा उग्रसेनके 
साथ रहते ई, उनरभेते प्रयेक्रका भाग इन्द्रने दस दस हजार 
दीनार नियत किया रै, ॥ ५१-५३ ॥ 

` वैशम्पायन उवाश्व 

धवं सम्पूज्य राजानं माथुराणां चमूमुखे । 
शृत्वा सखुमहदानन्दां मथुरां मघुखदनः ॥ ५४ ॥ 

वैशषम्पायनजी कष्टते है - जनमेजय { इस प्रकार 
मधुरावासिर्योकी सेनाके मुहनिपर राजा उग्रसेनका सम्मान 
करके भगवान्‌ मधुसूदनने सारी मथुराको महान. आनन्दसे 
परिपूणं करते हुए उसमे प्रवेश किया ॥ ५४॥ 
दिष्याभरणमाल्येश्च दिव्याम्यरविरेपनैः। 
दीप्यमानाः समन्ताश्च देवा द्व भिविष्पे ॥ ५५॥ 

जैसे खर्गम देवता शोमा पति टै उसी प्रकार मथुरामे 
भगवान्‌ श्रीकृष्ण ओर वेके नागरिक दिव्य आभूषर्णो, 
दिष्य पुष्पौकी मालाओं तथा दिव्य वल्ल ओर चन्दने 
अलक्त हो सब्र ओर प्रकारित हो रहे ये ॥ ५५ ॥ 


१. पक हजार स्वर्णमुद्रा्ोका एकं दीनार होता ै । श्सके 


अनुसार मपुराके प्रप्येक न।गरिकको दस-दस हजार श्वणंसुदरा्े 
मपित कौ गयी । 


भेरीपटहनदेन = शङ्खदुम्दुभिनिःखनेः। 
रटितेन ख नागानां शयानां हेषितेन च ॥ ५६॥ 
सिष्टनादेन शूराणां र्थनेमिखनेन शच । 
तुसुलः समहानासीन्मेधनाद्‌ दईवाम्बरे ॥ ५७ ॥ 
मेरी, पटह, शङ्खं जौर दुन्दुभि आदि वायोकी ्वनिके 
साथ दाथियेकि चिग्धाद्ने, घोड़ौके हसने श्चरवीरोकि सिंहनाद 
करने तथा रथके पषियोकी घरषराहट शेनेसे जो सम्मिलित 
महान्‌ शन्द होता था, वह आकाशम मेर्घोकी गर्जनाके 
समान प्रतीत होता था ॥ ५६-५७ ॥ 
बन्दिभिः स्तूयमानं च नमश्चक्तुरपि पजाः। 
द्या दानमनन्तं च न ययौ विस्मयं हरिः ॥ ५८॥ 
बन्दीजन भगवान्‌की स्तुति करते ये ओर प्रजावगेके 
रोग उनके चरणो मस्तक श्चकाते ये । उस समय धनका 
अनन्त दान करके भी श्रीहरिको कोई विस्मय या गव॑नहीं 
हुआ ॥ ५८ ॥ 
स्पभावोन्नतभावत्वाद्‌ दष्पूबौत्‌ नतोऽधिकम्‌ । 
अनहंकारभावाश्च पिस्मयं न जगाम ह॥५९॥ 
एक तो खभावसे ही उनका ऊँचा भाव था। वे उससे 
पहले उसक्री अपेक्षा भी अधिक धनका दान देख चुके ये 
ओर खभाविक दी उन्दं अकार दु नदीं गया था; इसि 
उनको विस्मय या गर्वं नदीं हुआ ॥ ५९ ॥ 
दीप्यमानं स्ववपुषा आयान्तं भास्करप्रभम्‌ । 
दृष्टा मयुरवाखिन्यो नमश्चक्षुः पदे पदे ॥ ६०॥ 
अपने इस शरीरसे प्रकारित होते हुए सूर्यतुस्य तेजसी 
भगवान्‌ श्रीकृप्णको अति देख मथुरावासी लियो पग-पगपर 
उन्हे नमस्कार करती थीं ॥ ६० ॥ 
पष नारायणः श्रीमान्‌ क्षीरार्णवनिकेतनः। 
नागपय॑ङकयुत्छन्य भ्रापतोऽयं मथुरां पुरीम्‌ ॥ ६१॥ 
( उस समय मथुरावास आपसे इख प्रकार कते ये ) 
ध्ये कषीरसमुद्रम निवास करनेवाके श्रीमान्‌ मगवान्‌ 
नारायण ईद, जो इस समय श्ेषशय्याका परसियाग करके मथुरा 
पुरीम आ गये ह ॥ ६१॥ 
बद्ध्वा वरि महावीर्यै दुर्जयं निद्शेरपि । 
शक्राय परद्दौ राज्यं भरैरोक्यं वञ्जपाण्ये ॥ ६२॥ 
“न्न देवताओंकि लि भी दुर्जय महापराक्रमी राजा 
बरखक वोधकर्‌ वञ्जधारी इन्द्रको धिलोकीका राज्य दे दिया 
था॥ ६२ ॥ 


हत्वा देत्यगणान्‌ स्ववोन्‌ कंसं च षलिनां शरम्‌ । 


४२६ 


भोजराजाय मथुरां दत्वा केरिनिपूदनः ॥ ६३॥ 
नाभिषिक्तः स्वयं राज्ये न चासीनो सृपासने। 
राजन्द्रत्वं च सम्प्राप्य मथुरामाविशव्‌ ततः ॥ ६४॥ 
श्न केरिनिषूदन केशावने समस्त दैत्यसमूरदोका वध 
करके चल्वारनेमिं शरेष्ठ कंसको मारकर मथुराका राज्य भोजराज 
उग्ेदेनको -दे-दिया; जरं न तो खयं ये राज्यपर अभिषिक्त 
हट ओर न राजाके सिंहासनपर ही बैठे । एष समय रजेन 
पद्‌ प्रात करके ये मथुरामे प्रविष्ट हुए ई, ॥ ६२.६४ ॥ 
पवमन्योन्यसंजटपं श्चुत्वा पुरनिवासिनाम्‌ । 
वन्द्मागधसूतानामिदमूखुगंणाधिपाः ॥ ६.१॥ 
षस प्रकार आपसमै कटी गयी पुरवातिर्योकी वाते सुन- 
कर सूतः मागध ओर वन्दीजनेकि प्रधान टोग इस प्रकार 
कहने सो- ६५ ॥ 
कि वा शक्यामदे वक्‌ ` गुणानां ते युणोदघे। 
माुषेणेकजिष्धेन = परभावोत्सा्सम्भवान्‌ ॥ ६६॥ 
श्गुणसागर | हम मनुष्यको मिली एक जिहके 
दवारा आपके गु्णोका प्रभाव, उत्साह ओर प्राकस्य कैसे वता 
सकते द १॥ ६६ ॥ 
सं तत्र भोगी नागेन्द्रः कदाचिद्‌ देच वुद्धिमान्‌ । 
दिसादसखेण जिदेन वासुकिः कथयिष्यति ॥ ६७॥ 
'्वेव | कदाचित्‌ पाताललोकमे रनेवाठे सपशरीरधारी 
नागराज बुद्धिमान्‌ वासुकि (शेष) अपनी दो दजार निडार्ओं- 
द्वारा आपके गुण प्रभावका वर्णन कर सकेगे ॥ ६७ ॥ 
र त्वद्धूतमिषं रोके मानवेन्द्रेषु भूतले । 
न भूतं न भविष्यं च शक्रादासनमागतम्‌ ॥ ६८ ॥ 
{इस भूतरूपर या जगतूमे मरेरशोके ल्यि कभी इन्द्रलोक- 
ते सिंहासन आया दोः यह अदूभुतवात न कमी हुई थी ओर 
न मविष्यमे कभी दोनेवारी दे । ( किंतु आपने इस असम्भघ- 
को भी सम्भव कर दिखाया ) ॥ ६८ ॥ 
खभावतरणं चेव कलदौरागतं स्वयम्‌ । 
न श्चुतं न च दष्टं वा तेन मन्याभदेऽद्भुतम्‌ ॥ ६९ ॥ 
प्छर्गसे सभामवनका उतरना ओर आकारामे दिव्य 
कटर्योका प्रकट होकर स्यं दी अभिषेक करना न तो किसीने देखा 
या गौर न कमी सुननेमे दी आया था । इसल्ि म इस घटना- 
को अदूुत मानते द ॥ ६९ ॥ 
धन्या देवी महाभागा देवकी योषितां चण्‌ ! 
भवन्तं शरिदशशेष्टं धत्वा गरंण केदावम्‌ ॥ ७०॥ 
ष्णं पद्मपलादाक्चं॑श्रीपुञ्ममराचितम्‌ । 
जेचाभ्यां र्नेष्टपूणणीभ्यां वीक्षते सुखपद्कजम्‌ ॥ ७२ ॥ 


आम्टाभार्ते िखभागे 


[ हरिवंशे 


शयुवतियमि प्रेष्ठ महामागा देवकीदेवी धन्य है, जिन्हनि 
आप देवप्रवर केवको गर्भम धारण करनेका मदान्‌ सीमाम्प 
परक किया ओर अत्र वे अपने सनेदपुणं ने्रोसि आपके श्याम- 
खुन्दर कमलनयन शभाधाम देवधूमित मुखारविन्दको निष्टार 
करती है" | ७०-७१ ॥ 
दति संजल्पमानानां शण्वन्तौ पथगीरितम्‌ । 
उग्रसेनं पुरस्छन्य धातर रामकेदावौ ॥ ७२ ॥ 
भ्राकारद्वारि सम्प्राप्ावर्चयामास वै तदा। 
अर्ण्यमाचमनं स्तरा पाद्यं पायेति चाच्र्वीत्‌ ॥ ७३ ॥ 
उग्रतेनस्ततो धीमान्‌ केद्रादस्य रथाप्रतः। 

फेसी बाते कदनेवारे चुतः मागध ओर वन्दियेकि ध्रथक्‌- 
पृथक वचर्नोको सुनते हुए दोन भाईवल्राम ओर श्रीङृष्ण 
उग्रसेनको आगे करके नरगरकी चदारदिवारीके दरवाजेपर आ 
पहुचे । उस समय बुद्धिमान्‌ राजा उग्रसेनने भगवान्‌ शरी- 
कृष्णकरे रथके अगे खड़ा होकर कदा- पय खयो, पाच 
लाज ।» फिर स्वयं टी पाद्य; अर्यं ओर आचमन देकर 
उनका पूजन किया ॥ ७२-७२१ ॥ 
श्रणम्य दिरसा ष्णं गजमारुह्य वीय॑वान्‌ ॥ ७४॥ 
घनवत्‌ तोयधारेण ववर्ष कनकाम्बुभिः। 

तत्पश्चात्‌ श्रीकृष्णकौ सिरत प्रणाम करके वे पराक्रमी 
राजा उग्रसेन दाथीपर चद गये ओौर जते मेष पानीकी धारा 
गिराता ३, उसी प्रकार वे सुर्णमय जल्की वर्षा करने 
लगे ॥ ७४३ ॥ 
घनौधेर्वपमाणस्तु सम्प्राप्तः पिदवेद्मनि ॥ ७५॥ 
मयुराधिपतिः शभ्ीमाञ्ुवाच मधुखष्नम्‌। 

उत्त वषकरि साथ दी भीकष्ण अपने पिताके घर जा 
पहुचे ! वदं श्रीमान्‌ मथुरानरेश उग्रसेनने मधुसूदन शरीकृप्ण- 
से कहा--। ७५४ ॥ 
राजेन्द्रत्वमनुप्राप्य युक्तं मे दपवेदमनि ॥ ७६॥ 
स्थापितुं देवराजेन दत्तं सिष्टासनं प्रभो । 

(प्रभो ! आपने रजेन्द्रका पद प्राप्त करिया दै; अतः 
आपके स्यि यही उचित है किं आप देवराज इन्द्रे दिये 
हुए सिंदासनको इस राजमहलमे स्थापित करे ॥ ७६४ ॥ 
नेष्यामि सथुरेशस्य सभां अुजवलाजिताम्‌ ॥ ७७ ॥ 
प्रसादयिष्ये भगवन्‌ न कोपं कर्तंमर्दसि । 

भगवन्‌ ! अप ही मधुराके सवामी दै | आपने य्होकी 
राजखभाको अपनी युजाभोके वले प्राप्त किया है । मे आपको 
उस सभाम ठे चदूगा ! एवं अपने व्यवहारोसे आपको प्रसन्न 
रखनेकी चेष्टा करैगा । आप गरु्षपर क्रोध न करं ।॥७७१ ॥ 


1 


विष्णुपर्व ] 


पश्चपश्चादाच्तमोऽघ्यायः 


४२७ 


-----------------नन नल 4 


देवक्षी बसुेवश्च रोहिणी च विशाम्पते ॥ ७८ ॥ 
न किचित्करणे शक्ता दर्ष्कमविमोष्िता । 

ध्रजानाथ ! देवकी, वसुदेव ओर रोिणी-ये हर्षके 
उद्रेकसे मोहित टो गये ये; अतः उस समय ङ्क मीन कर 
सके ॥ ७८६ ॥ 
कंसमाता ततो यजन्र्चयामास केदावम्‌ ॥ ७९॥ 
नानादिग्देश्जानीतं कंसेनोपार्जितं धनम्‌ 1 
देशकालं समालोक्य पादयुग्मे न्यवेदयत्‌ ॥ ८०॥ 
उग्रसेनं समाहूय उवाच ग्छष्ट्णया गिस। 

राजन्‌ ¡ तव कंसकी माता पद्मावतीने भगवान्‌ केशावका 
पूजन किया ओर ` कंस अनेक देदोसि जिस धनको जीतकर 
लवा याः. उसे देशकालकां विचार करके श्रीकृष्णके युगल 
चर्ण निखछावर कर दिया । इस समय श्रीकृप्णने राजा 
उग्रसेनको बुलाकर मधुर वाणी इस प्रकार कदा ||७९-८०१। 

श्रीकृष्ण उवाच 


न चाहं मघुराकाङ्क्षी न मया वित्तकाङ््षया॥ ८१॥ 
धातितस्तव पुत्रोऽयं कठेन निधनं गतः। 

श्रीरूष्ण दोले--महाराज ¦ गै मधुराका राञ्य नदी 
चाहता । ने धनकी अभिलषसि आपके पुत्रका वध नही 
किया है । यह काल्से ही मृल्युको प्रास्त हआ हे ॥ ८२१ ॥ 
यजस्व विविघान्‌ यक्षान्‌ ददस्व विपुलं घनम्‌ ॥ ८२ ॥ 
जयस्व रिपुसैन्यानि मम॒ बाहुवलाश्रयात्‌ । 

राजम्‌ [ आप नाना प्रकारके यज्ञ कीजिये, प्रचुर धनका 
दान दीजिये ओर मेरे वाहुग्खका आश्रय सेकर शतरर्मोकी 
सेनार्ओपर विजय पाद्ये ॥ ८२१ ॥ 
त्यजस्व मनसस्तपं कंसनादोद्धत्रं भयम्‌ ॥ ८२३ ॥ 
नयस्व वित्तनिचयं मया दत्तं पुनस्तव । 

आप मानपिक संतापको त्याग दीज्यि | कंस-वधजनित 
भयको मनसे निकाल दीजिये तथा मेरी दी हुई इत धन- 
राशिको पुनः अपने ही भवनमे ठे जाये ॥ ८३१ ॥ 
इति प्राभ्वास्य राजानं रष्णस्तु हदिनां सष ॥ ८४ ॥ 
प्रविवेश ततः श्रीमान्‌ मातापिब्ोरथान्तिकम्‌ । 

इस तरद राजा उग्रसेनको आश्वासन दे श्रीमान्‌ श्रीकृष्ण 
हरुधरके साथ माता-पिवाके पास गये | ८४३ ॥ 
आनन्दपरिपूणौभ्यां हृदयाभ्यां महावर ॥ ८५॥ 
पिविमान्रोस्तु पादान्‌ वै नमश्चक्रतुरानतौ । 

वहो उन दोनो मावली षीरनि आमन्दपू्म हृदवसे 
विनीत होर माता-पिताके चर्णोमि नमस्कार फिया |८५१॥ 


तस्मिन्‌ सुष्तँ नगरी मथुरा तु वभूव सा ॥ <६॥ 
स्वर्गटोकं परित्यज्यावतीणेवामरावती । 
उख मुहूर्तम मधुरा मगरी फेसी जान पडती थीः मानो 
अमरावतीपुरी स्वगंटोककां परित्याग करके भूतरूपर उतर 
आयी हो ॥ ८६३ ॥ 
वसुद्रेवस्य भवनं समीक्ष्य पुरवासिनः ॥ ८७ ॥ 
मनसा चिन्तयामासुद्रैवरोङ्गं न भूतम्‌ । 
बदुदेवके घरकी ओर देखकर पुरवासी अपने मने 
सोचने रमो किं यह भूलोक नदीं देवरोक दै ॥ ८७१ ॥ 
विखन्य मथुरेशं ठ॒मदिषीसषितं तदा ॥ ८८ ॥ 
भवनं वसुदेवस्य प्रविश्य बरकेदावौ । 
न्यस्तशस्रादुभौ वीरौ स्वगे स्वैरारिणौ ॥ ८९ ॥ 
उस समय रानीसदित मधुरानरेशको विदा करके 
दौर्न वीर वख्याम ओर श्रीकृष्ण वसुदेवके धरम प्रविष्ट 
हुए ओर अल-रा्च रखकर अपने धरम इच्छानुसार 
विचरन तमो ॥ ८८-८९ ॥ 
ततः ताषठिकौ भून्वा खुखासीनो कथान्तरे । 
पतस्मिन्नेव काले तु मदोत्पातो वथु ह ॥ ९० ॥ 
तदनन्तर, नित्य कर्म करके सुखपू्वक बैठकर जब वे 
दोनो बातचीत करने के, इसी समय वर्ह महान्‌ उत्पात 
मकट हुआ ॥ ९०॥ 
वश्चसुश्च धनाकारो चेलुश्च भुवि पर्वताः। 
समुद्राः क्षुभिताः सवं विश्रान्तो भोगिनां षरः ॥९१॥ 
क.म्पता यादवाः सवे न्युञ्जाश्च पतिता सुषि । 
आकारमे वादक चक्कर काटने स्तो । प्रथ्वीपर पर्वत 
हिल्ने लगे ! सरे समुद्र क्षुब्ध हो उठे ओर स्मि अष 
शेषनाग भमी चकरा गये । समस्त थादब कम्पित हो ओधि 
ह पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ९११ ॥ 
तौ तान्‌ निपतितान्‌ दष्ट रामरृष्णौ तु निश्वलो॥ ९२ ॥ 
महता पक्ष्ातेन विक्लातौ पतगोत्तमम्‌। . . 
उन सत्रको गिरा जा देखकर भी वख्याम ओर 
भीष्ण विचलित नदीं हए । पोखसे उठी हुई प्रचण्ड 
युके दारा उन्ै यह्‌ पता ल्ग गया कि पक्षिभि श्रेष्ठ 
गरुड़ आ रदे है ॥ ९२१ ] 
व्दशे समनु दिव्यस्नगचुखेपनम्‌ ॥ ९२ ॥ 
णस्य हिरा साभ्यां सोम्परूपी ऊृतासनः । 
इतनेमे ट श्रीकृष्णे देखा, गरुडजी आ गये । वे दिष्य 
थोके हार ओर विष्य चन्दने अलंकृत थे । उन्होने शिर 


८ 


छकाकर उन दोनो भादर्योकों प्रणाम क्या । फिरवे 
सौम्यरूपर धारण करके एक आखनपर त्रेठ गये ॥ ९३ ॥ 
तं षट समबुप्रापतं सचिवं साम्परायिकम्‌ ॥ २४ ॥ 
धृतिमन्तं गसत्मन्तसुबाच वदटिखूद्रनः। 

अपने समरसचिव वैर्यवान्‌ गरुढको आया देख बलिक 
वोधनेवाले भगवान्‌ श्रीकृष्ण इत प्रक्रार बोठे-॥ ९४१ ॥ 
सख्रागतं सेचरश्रष्ठ सुरसेनारिमर्दन ॥ ९५॥ 
विनताहदयानन्द सखागतं केदावप्रिय ¦ 

“पक्ष्म श्रेष्ठ ग्ड | तुम्डारा स्वागत दहै | देवसेनाकरे 
शतुर्भोक्रो कुचल देनवाले पक्षिराज ! वम्दारा स्वागत दै । 
विनताके यको आनन्द देनेवाले केदवप्रिय गस्ड़ ! वग्दारा 
स्वागत दै ॥ ९५२ ॥ 
तमुवाच ततः छृर्णः स्थिनं देदमिवापरम्‌ ॥ ९६॥ 
तुर्यखरमथ्यंया चाचा आसीनं विनतात्मजम्‌ 1 

तदनन्तर, भीकृष्ण अपने दुमरे शरीरके समान वरैठे 
इट ,विनतानन्दन गर्ढ़से अपनी शक्तिके अनुरूप वाणी- 
दवारा शस प्रकार योले-॥ ९६२ ॥ 

श्रीकृष्ण उवाच 


यास्यामः पतगधेष्ठ॒भोजस्यान्तःपुरं महत्‌ ॥ ९७॥ 
तत्र गत्वा सुखासीना मन्ययामो मनोगतम्‌ । 
शीरष्णने कदा- प्षि्रवर † हमलोग मोजराजके 
विशाल अन्तःपुर्मे चरलेगे ओर वहीं युखपूर्वक बैठकर 
मनोगत विप्रयपर गुप्तरूपते विचार करगे ॥ ९७१ ॥ 


वै्यम्पायन उवाच 


प्रविष्रौ तौ महावीर्यो वलदेवजनार्दनौ ॥ ९८ ॥ 
वेनतेयठतीयौ च गद्यं मन्त्मथावरुवन्‌ 1 
अवध्योऽसौ कतोऽस्माकं स महश्च रिपोर्वटम्‌॥ ९९ ॥ 
घतः सेन्येन महता मषद्धिश्च नराधिपः । 
बष्टलानि च सैन्यानि हन्तं वर्पदातैरपि ॥१००॥ 
न शक्ष्यामः क्षयं कतुं जससंघस्य वाहिनीम्‌ । 
अतो ऽर्थ वैनतेय त्वां च्वीमि मशुसं पुरीम्‌ ॥१०१॥ 
वसतोरावयोः श्रेयो न भवेदिति मे मतिः। 
वैशम्पायनजी कते हैँ--जनमेजय † इसके बाद 
महापराक्रमी वख्याम ओर श्रीकृष्ण तीसरे गरुड्को साथ लेकर 
उक्त भवनम प्रविष्ट हुए यौर गु विपरयपर मन्त्रणा करने 
लगे । उस समय श्रीकृष्ण ब्रोठे--प्विनतानन्दन † जरात॑धको 
इमलेर्गोक्रे व्यि अवध्य वनौ दिया गया है ८ यही द्मा 
काख्यवनकी मी है ) | परु हमरे उस शन्का सैनिक पयं 


श्रीमष्टाभारते खिरुभागे 


{ दरिवंशे 


शारीरिक वल बहत वड़ा दै। यह बहुत वरड़ी सेना तथा | 
मदान्‌ नरे्ंसि धिग रहता दै ] उसकी सेनार्पे इतनी अभिक , 
किं दमलोग जरासंधकी उस विशाल्वादिनीका सौ वपि, 
भी संदार नदीं कर स्वैगि । अतः मँ वुमसे कदतारहूं कि 
अव मथुरापुर रदनेषे दम दोर्नोका भला नदी होगा । 
मेरा तो रेखा ही विद्वा है” ॥ ९८--१०११ ॥ 

गरड उवाव 


देषदेवं नमस्त्य गतोऽहं भवतोऽन्तिकात्‌ ॥१०२॥ 
वासार्थमीक्षितं भूमि तव देव कुदास्थटीम्‌ । 

गरुड वोले--देव ! आप देवताओकि मी देवता 
है । आपको नमस्कार करके मै आपके निकटसे आपहीके 
रनेगोग्य निवासभूमिक्रा निरीक्षण करनेके च्वि कुदाखटीकी 
ओर चला गया ण | १०२३ ॥ 
गत्वाहं से समास्थाय समन्तादवरोक्य ताम्‌॥१०३॥ 
दष्टादं विबुधथेषठ॒ पुरी लक्षणपूनिताम्‌। 

सुरश्रेष्ठ { वहाँ जाकर आकाशका आश्रय ठे सव ओरसे 
निरीक्षण करे मै इस निश्वयपर पर्हुचा दँ कि वर्हौ समी चम 
लक्षणेसि सम्पन्न एवं सम्मानित पुरीका निर्माण हो सकता 
है ॥ १०३९ ॥ 
सागरानृपविपुलां प्रागुद॒क्श्वशीतलाम्‌ ॥१०४॥ 
सर्वतोदधिमन्यस्थामभेदां िददौरपि । 

ऊुशस्यखीके बहूत-ते प्रदेदा सागरके समीप दोनेते जलप्राय 
है । वर्होकी भूमि पूवं ओर उत्तरी ओरते कुछ ठाद. ओर 
शीतल ३ । वह सव आओरसे समुद्रके वीचमे है, इत कारण वर्ह 
वसी हुई पुरीका भेदन करना देवताभकि च्यि मी असम्मव 
दोगा ॥ १०४१ ॥ 
सर्वरत्नकरवर्ती सर्वकामशद्ुमाम्‌ ॥१०५॥ 
सर्वर्तुकुखुमाकीर्णी सर्वतः खमनोहराम्‌ 1 

वरदा जो पुरी वेगी, वह सव प्रकारके रत्नोकी खान 
होगी । वेके इक्ष सम्पूर्णं मनोवाचञ्छित कामनार्जीको फल्के 
रूपमे प्रदान करनेवले होगे । समी ऋतुर्भमिं खिलनेवाठे 
पूल उत्त पुरीकी गोमा वदृर्यँगे । वह सव ओस्ते अव्यन्त 
मनोहर होगी ॥ १०५१ ॥ । ह 
सवौश्चमायिवासां च सर्वकामगुणेर्युताम्‌ ॥ १०६॥ 
नरनारीसमाकी्णां नित्यामोदविवर्धिनीम्‌ । 

वदो समी आध्र्मोकरि लोग निवास करेगे । वह पुरी 
समस्त कमनीय गुर्णेसि अुङ्ृत होगी । अमख्य नरनारि्योवि 
मरी रहकर सदा ही आमोद-प्रमोदकौो व्रदनेवाटी 
होगी ॥ १०६१ ॥ 


विष्णुपवं ] 


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प्राकारपरिखोपेतां मोपुराद्धलमालिनीम्‌ ॥१९०७॥ 
विचित्रचत्वरपथां विपुलद्धारतोरणाम्‌ । 
यन्त्रार्गटविचि्राद्यां देमप्राकारदोभिताम्‌ ॥ १०८४ 


वह्‌ नगरी परकोर्टो, खादर्यो, गोपुरे ओर अद्राखिकार्ओ- 
की पटक्तिविसि बुदोमित दोगी । इसी सदे ओर चौरादे 
अद्‌भुत शोभते सम्ग्न्न हेगे । उस पुरीके दवार एवं फाटक 
बहुत व्रडे-बडे गे । विचित्र-विचित्र यनो ओर अर्गलाअसि 
वह सम्पन्न होगी } सोनेक्री चहारदीवारी उसकी शोमा व्रदयेगी॥ 
नरनागाद्वकलिखां रथसैन्यसमाकुकाम्‌ । 
नानादिष्देशजाक्रीर्णा दिन्यपुष्पफलट्रुमाम्‌ ॥१०९॥ 

हायी, घोडे, मनुष्य ओर रर्थोकी सेनासे बहे पुरी व्याप्त 
रदेगी । विभिन्न दिशाओं ओर देशेकि लेर्गो तया वरा 
उचचन्न हुए पदा्योसे वह भरी होगी । दिव्य पुष्प ओर फल 
देनेवाठे देवद्क्ष उसङी शोभा ब्रदायेगे ॥ १०९ ॥ 
पताकराध्वजमालाद्यां मदहाभवनशालिनीम्‌ । 
भीषणी रिपुखंघानां मित्राणां हर्पवद्धनीम्‌ ५१९०॥ 

वह्‌ नगरी ध्वजा-पताका्ओंकी पट्‌क्ति्योसि अलंङ्त तया 
वदे-कडे भवनेषि सुदोमित दौगी । शतु-खमूर्दोका मय ओर 
मिर््रोका दर्थं बदाती रदेगी ॥ १९० ॥ 
मनुजेन्द्राधिवासेभ्यो विरिष्टं नगरोत्तमम्‌ । 
स्वतं च मिरिथेधं कुर देव सखुयटखयम्‌ ॥१११॥ 
नेन्द्नप्रतिमं दिव्यं पुरद्धारस्य भूषणम्‌ । 
कारयस्वाधिवासरं च तत्र मन्वा सुरोत्तम ॥१९२॥ 

देव [ अव्रतक नरेनद्रके जितने अधिवास दै, उन सवते वह 
पुरी विरिष्ट होगी । देवतार्जौका निवासस्थान जो गिसिपरषठ 
रेवतकदै, उखको ओर व्क नन्दनवन-सददा दिव्य नको अपने 
नगरद्रासका भूषण वनाइये | सुरभरष्ठ { वहीं चलकर आप 
निवास कीजिये ॥ १९१-११२॥ 
क्रुमासेणां प्रचारश्च सुरमण्यो भविष्यति 1 
नाजा दारवती भैया षु लोकेषु विश्चुता ॥११३॥ 
भविप्यति पुरी रम्या रशाक्रस्येवामरावतती । 

वौ कुमार्सर्योक्रा अत्यन्त मदोदर दंगसे धूमना-फिरना 

हो सक्रेमा । उख पुरीक्रा नाम होगा द्वारवती या द्वारका जो 
तीनो लोकम प्रसिद्ध होगी । वह पुरी इन्द्रकी अमरावतीके 
-समान परम रमणीय होगी ॥ ११३१ ॥ 
यदि स्यात्‌ संदरृतां भूमिं प्रदास्यति महोदधिः॥१९४॥ 
यथेष्टं विविधं कर्म॑ विश्वकर्मां करिष्यति | 

यदि महासागर जक्ठे ठकी हुई भूमि (का कुछ भाय ) 


पञ्चपञ्वाहत्तमो ऽध्यायः 


२९. 


दे देगा, तो वर्हो उपर्युक्त गुणे सम्पन्न पुरीका निर्माण हौ 
सकेगा । सात्‌ विश्वकर्मां पधारकर वरहो आपक्षी इच्छाके 
अनुसार नाना प्रकारके शिवयय-कर्मं करेगे ॥ ११४६ ॥ 


मणिसुक्तापरवालाभिष्डवैदु्यसघभेः ११५ 
दित्यैरभिप्राययुनैरदिव्यरल्नेखिलोकजैः । 
दिव्यस्तम्भश्चताक्रीणीन्‌ खगे देवसभोपमान्‌ ॥ ११६॥ 
जाम्बुनद्मयान्दु शान्‌ स्ैरलविभूषितान्‌ । 
दिव्यध्यज्पताकराठ्यान्‌ देवगन्धवपालितान्‌ ॥११७॥ 
चन्द्र सूर्यप्रतीकाश्यान्‌, प्रासादान्‌ कारय पभो । 

परमो ! आप मणि, मोती, मूँगाः हीर; वैदूर्यं तथा 
दिव्य भावस युक्त न्रिरीकीके अन्यान्य दिव्य रर्नद्राया रेते 
महल बनवादइये, जो सखर्गलोककी देव-समा्ओंके समान शोमा 
पार्हेर्दी। उने सैकड़ों दिव्य खम्भे त्रो हँ) वे महर 
सेनक ईटोसे बने हो ओर उन्हे सवर प्रकारके र्ति विभूषित 
क्रिया गया हो | वे शुभ्र प्रासाद दिव्य ष्वजा ओर पताकार्ओ- 
से अच्कृत दो । चन्द्रमा ओर सूर्यके समान प्रतीत होते ष्टौ 
ओर देव-गन्धर्वं उनकी रक्षाम तत्पर रदँ ॥ ११५११७१ ॥ 


वैशम्पायनं उवाच 


पवं रत्वा तु संकटपं वैनतेयोऽथ केदाषम्‌ ॥११८॥ 
श्रणम्य हिरसा ताभ्यां निषसाद इतासनः 1 

वैश्षम्पायनजी कते है-जनमेजय ! शत प्रकार 
श्रीकष्णके प्रति अपना मनोभाव प्रकट करके विनतांनन्दम 
गरुडने सिर श्ुकाकर उन दोनो माहर्योको प्रणाम किया । 
फिर वे अपने आमनपर बैठ गये ॥ १४८१ ॥ 
छष्णोऽपि रामसष्टितो विचिन्त्य हितमीरितम्‌॥ ११९॥ 
प्रकाशकर्ुंकामो तौ विखृज्य विनन्पत्मजम्‌ । 
सन्छृन्य विधिवद्‌ राजन्‌ महार्हवरभूषणेः ॥१२०॥ 
मोदेते उखिनौ तश्र खरलोके यथामसै । 

राजन्‌ } फिर वलरामतदित श्रीकष्णने भी गरडकी कही 
हद दितकर बातपर विचार करॐ़े उसे प्रकादित करनेकी 
इच्छा की ओर ब्रहुमूल्य सुन्दर आभूप्रणोदारा विनतानन्दन 
गरुड़का विधिवत्‌ सत्कार करफे उन्दे विदा कर दिया । तत्पश्चात्‌ 
देवसमरेकर् विहार करनेवले दो अमरोकी मेति वे दोर्नौ भाई 
मथुरामे खुल ओर आनन्दके साथ रहने ल्गे ॥११९-१२०१॥ 
तस्य तद्‌ वचनं श्रुत्वा भोजराजे महायशाः ॥१२१॥ 
कृष्णं स्तेदेन विखव्धं वभाषे वचनाखतम्‌ । 

गरुड्का वह वचन सुनकर महायशम्बी भोजराज उग्रसेन 


्रीकृपणसे स्नेह ओर्‌ विश्वारपू्वक यह अमृतके समान मुर 
वचन बरोठे--॥ १२९९ ॥ 


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कृष्ण छरष्ण महावाहो यदुनां नन्दिवर्धन ॥१२२॥ 


श्रूयतां वचनं त्वाद्य वक्ष्यामि रियुखहन । 
“श्रीकृष्ण | यद्ुकुलका आनन्द बदटनिवलि महाबाहू 
श्रीकृष्ण | शात्ुसूदन ! आन म चमसे जो नात कष्टता 
उसे सुनो ॥ १ २२१ ॥ 
त्थया विष्ठीनाः खवँ सम न शराः सुखमासितुम्‌॥१२३॥ 
पुरेऽस्मिन्‌. विषयान्ते वा पतिहीना दव सियः। 
भजते पतिहीन लियो कदी युखसे नदीं रद सकतीं, उसी 
प्रकार तुमसे वि्ुडकर म समस्त यादव इस नगर या साज्य- 
म सुखसे नदीं रह सकते ट ॥ १२२१ ॥ 


त्त्सनाथा वयं तात त्वद्वाहुवखमाध्रिताः ॥१२४॥ 
विभीमो न नरेन्द्राणां सेन्धाणामपि मानद । 


भीमहाभारंते शिलभगि 


छम्दारे बाहुवल्का आश्रय ठे ने्रौकी ती वात ही क्याहै, 
इन्द्रसदहित सम्पूर्णं देवताति भी न्ह सते ई ॥ १२४१ ॥ 
विजयाय यदुश्चेष्ठ यश्र॒ यन्न गमिष्यसि 1 १२५॥ 
तत्र त्वं सहितोऽस्माभिगंर्छेथा यादवर्षभ । 
ध्यदुश्ेष्ठ } यादवप्रवर ¡ ठम ॒विजयक्रे च्यि जर्हो-नष् 
जायो, वर्ह हम सवको साय स्यि चरोः ॥ १२५१ ॥ 
तस्य राक्षो वचः श्युत्वा सस्मितं देवकीरुतः ॥१२६॥ 
यथेष्ठं भवतामद्य तथा कतोस्म्यसंशयम्‌ ॥१२७॥ 
राजा उग्रसेनकी यह्‌ वात सुनकर देवकीनन्दन भगवान्‌ 
श्रीकृष्ण मुसकराकर वौले--"राजन्‌ | अत्र आपकी जैसी इच्छा 
होगी, वैसा ही करगा, इसमे संशय नदीं है ॥१२६-१२७॥ 


इति श्रीमद्टाभारते लिरुभागे हिवंरो विच्णुपर्वणि श्रीङृष्णस्य सथुरागमनमदयस्सवो 
हारवतीप्रयाणसंके्तौ नाम पद्वपश्चादत्तमोऽध्यायः ॥ ५५ ॥ 


इस प्रकार श्रीमहाभारते लिरुभाग दयिदके अन्तत वरिष्णुपवमे श्रीङृष्णका मथुरा-गमनमषटोत्सव 
तया उनके द्वारका जनिका स्फेतनामक पचपनर्वा अध्याय पुर हुमा ॥ ५५ ॥ 


पटपशारात्तमोऽध्यायः 
श्रटृष्णकी आह्ञासे याद्वोका दारकापुरीको प्रस्थान 


वैशम्पायन उवाच 
कस्यचिद्‌ त्वथ काटस्य सर्भ्यास्तान यदुसंसदि । 
कभये पुण्डरीकाक्षो हेतमद्टायसुत्तमम्‌ ॥ १ ॥ 
वैदाम्पायनजी कहते है--जनमेजय ! तदनन्तर, 
किसी सम्य कमलनयन भगवान्‌ श्रीछरष्णने यादर्वोकी समामे 
ठे हट समस्त समामदेसि यह देठयुक्त उत्तम वचन 
कहा १ ॥ 
यादवानामियं भूपिर्रथुरा रषट्मालिनी । 
वयं चैवे सम्भूता घजे च परिवदधिताः ॥ २ ॥ 
भ्यह राष्ट्की माछसे अलंकृत ८ समूचे रषट्को माल्यकी 
मति धारण करनेवारी राजधानी ) मधुरापुर यादर्वोकी 
भूमि दै! हम मी यदीं पैदा हए ह ओर दसीके वर पल्कर 
वदे दुष ई ॥ २॥ 
तदिदानीं गतं दुःखं दरा्रवश्च पराजिताः । 
शपेधु जनितं वैरं जरासंधेन विग्रहः ॥ २॥ 
स समय हमारा सार हुःख दूर शि गया है । मारि 


दरु मी हमले हार मान चुके ह । हमने राजि केर मोल 
छे ल्या ओर जरासंधसे लडाई छेड़ दी है ॥ ३ ॥ 
वाहनानि च नः सन्ति पादातं चाप्यनन्तकम्‌ । 
रलानि च विचिघ्राणि भिध्राणि च वहनि च ॥ ४ ॥ 
मारे पास पर्याक्न वाहन दहै | वैदर्लोकी संख्या मी अनन्त 
ह | हमारे खजानेर्म विचित्र रत्न दँ तथा हमारे मिर्घोकी संख्या 
मी बहुत रै ॥ ४॥ 
इयं च माथुरी भूमिरद्पा गम्या परस्य तु। 
वृदधिश्रैव परास्माकं वरतो मित्रतस्तथा ॥ ५ ॥ 
परंतु यह मथुराकी मूमि ब्रहुत छोरी है ओर शत्रुका 
सुगमतपूर्वक इसमे प्रवेश दौ जाता दै। इधर हमारे 
सैनिकों ओर मिर््रोकी बहुत अधिक इदि हुई है ॥ ५॥ 
कुमारकोस्यो याश्येमाः पदातीनां गणश्चये। 
पफधामपीष्ट वसतां सम्मर्दमुपरुश्चये ॥ ६ ॥ 
(हषर पास जो ये प्क करो कुमार ( अकिथादि ) 


'दूसर्रोको मान देनेवाठे तत्‌ | हम वमले सनाथ होकर 


[ दिवश 


विष्णुपषे | 


सेनिकईैतथायेजो पैदल बहुत-से दलर्दैः इनके भी 

यछ रेरे यहा बड़ी मीड़-भाड दिखायी देती है ॥ ६ ॥ 

अचर नो रोचते मह्यं निवासो यदुङ्ग बाः । 

पुरी निवेहायिष्यामि मम तच्‌ क्षन्तुम्द॑थ ॥ ७ ॥ 
"अतः यदुपुङ्गवो ! अव यहो निवास करना सज्ञे 

उच्छा नदीं ख्यता है; इस्ल्यि मै दुसरी पुरी 

घसार्ँगा । मेरी इस धृष्टताको अपरोग क्षमा 

करेगे ॥ ७॥ 

पतद्‌ यदृयुरूपं वो ममाभिप्रायजं वचः । 

भवाय भवतां काङे यदुक्तं यदुखंसदि ॥ ८ ॥ 


५इस यादवसभामे मेरे हार्दिक अभिप्रायके अनुमार जो 
बात कही गयी दै, वह समयानुखार आपलोगोकि उद्धवके 
स्मिदीहै। यदि आपलो्गौको अनुकूक जँचतीहो तो 
कदि ॥ ८ ॥ 
तमुचुयौदवाः स्वे हृषेन मनसा तदा । 
- साध्यतां यदभिप्रेतं जनस्यास्य भवाय वे ॥ ९ ॥ 
त्र समस्त यादव प्रसन्न मनते बोल उठे--्रमो ! 
इस यादव समाजके उद्धवके च्वि आपको जो अभीष्ट दहो 
वह कार्यं कीज्विः ॥ ९ ॥ 


ठतः सम्मन्बयामासुवरैष्णयो मन्घसुत्तमम्‌ । 
अवध्यो ऽसौ कतोऽस्माकं सुमहच रिपो्लम्‌॥ १०॥ 
तम समस्त इम्णिवंशी मिलकर उत्तम मन्त्रणा करने 
क्ो--“यद जरासंध (या काख्यवन ) हमलोगोके च्ि 
अवध्य कर दिया गया दै ! हमारे उस शतरुका सैनिक वल 
वहत वड़ा हे ॥ १० ॥ 
कृतः सेन्यश्चयश्चापि महानिह नराधिपैः । 
बहुलानि च सेन्यानि हन्तुं वर्पंशतेरपि । 
न शशष्त्यामो शयतस्तेषामपयाने ऽभवन्मतिः ॥ १९ ॥ 
मारे पश्चके नरेशोने शात्रुकी उस सेनाका वडा मारी 
विनाश किया दै तो भी उसके पास अभी वहुत-सी सनाप हैः 
जिन्हे हमखोग सौ वमि भी नदीं मार सक्ते । अतः हमारा 
विचार उनते हट जनेके ल्यि दो गया हैः | ११ ॥ 
तरस्मिश्यैवान्तरे राजा सकालयवनस्तद्‌ा । 
सैन्येन तदूविधेनेव मथुखमथ्युपागमत्‌ ॥ १२ ॥ 
इसी वीच काल्यवनपदित राजा जरासंध फिर वैसी दी 
सेना साथ लेकर मथुरापर चद आया ॥ २२॥ 
ततो जसलंयवलं दुर्निवायंममूत्‌ तद्‌ । 
ते काठथवनं चैव श्रुत्वेदं प्रतिपेदिरे ॥ १२॥ 
उस समय मथुराके सैनिकोके व्यि जरासंधकी सेनाको 
सी सेकना अत्यन्त केडिनि भार्यं था । फिर जव यादवोने काल- 


धर्पञादा्तमो.ऽध्यावः 


1. 


"^~ 


यवनका मी आगमन सुना; तव तो उन्दने मश्चरासे हट जानी 

ही अपने ल्य श्रेयस्कर समन्चा ॥ १३ ॥ 

केरावः पुनरेवाह यादवान्‌ सत्यसंगरः । 

अद्यैव द्विसः पुण्यो नियोमः खबखायुगाः ॥ १४ ॥ 
सत्यप्रतिज्ञ श्रीकृष्णने वरहो यादर्वेसि फिर कर्दा--“अाज 

ही वह पुण्य दिवस है, जब कि अपनी सेनाके साथ दमे ह- 

से निकल चल्ना है" ॥ १४ ॥ 

ततो निश्चक्रमुः सवं यादवाः कृष्णह्वासनात्‌ । 

ओघा इव समुद्रस्य वलोधग्रतिनादिताः ॥ १५ ॥ 
यह सुनकर समस्त यादव श्रीकृष्णकी आक्ासे उस 

पुरीको छोडकर निकर गये | उस समय सैन्यसमूरहौके कोलः 

हल्ते भरे हुए. यादबवोके दर समुद्रके जल्प्रवाहकी भोति जान 

पडते थे ॥ १५॥ 

संगृह्य ते कटनाणि वसुदरेवपुसोगमाः । 

खुस्नदेगंजैमते रथेरद्यैश्च दंरितैः ॥ १६॥ 

आहत्य दुन्दुभीन्‌ खें खजनक्षातिषान्धवाः । 

निर्ययुयौदवाः सवे मथुरामपदाय वै ॥ १७॥ 
वसुदेव आदि सभी यादव अपनी सि्योको साथ छे 

कते-काये मतवाले हाथियों, रथो ओर सुखित अशोके 

द्वारा मथुरा छोड़कर चर दिये । उन सवने डके पीकर 

खजनों तथा जति-भादयोके साथ वदेसि प्रधान किया 

था | १६-१७ ॥ 

स्यन्दनैः काञ्चनापीडमंतै वरवारणैः । 

सते प्ठुतैश्च तुरगैः कशापाष्णिप्रणोदितैः ॥ १८४ 

ख्वानि खानि वङामप्राणि शोभयन्तः प्रकर्षिणः । 

धत्यङ््‌सुखा ययुदष्टा चष्णयो भरतषभ ॥ १९॥ 
भरतश्रेष्ठ ! सुवर्णभूषित रथो, मतवले गजराजो ओर 

सारथीकौ आक्ञामाजेसे उछखकर चल्नेवाठे तथा हाथमे चाबुक 

ल्यि सवार द्वारा हके जनेवाले धोदोसे अपनी-अपनी श्रेष्ठ 

सेना्ओंकी शोभा वदति तथा उन्हे खीचकर अपने.साथ ल्यि 

जति हुएः ब्रष्णिवंशी बडे द्षंके साथ पश्चिम दिगाकी अर 

प्रसित हुए ॥ १८-१९ ॥ 

ततो मुख्यतमाः सें यादवा रणकोविदाः । 

अनीकाभ्राणि कषन्तो वासुदेवपुरोगमाः ॥ २०॥ 
तदनन्तर युद्धकुशर श्रीकृष्ण आदि समी मुख्य-मुख्य 

यादव अपनी सेनार्ओोको साथ छेकर्‌ चङे | २० ॥ 

ते स्म नानाकताचिनं नारिकेलवनायुतम्‌ । 

कीणं नागवलेः कान्तं केतकीखण्डमण्डितम्‌ ॥ २१ ॥ 


तचिपुन्लागवङुलद्राक्षावनघनं कचिव्‌ । 
अनुं चखिन्धुखजस्य प्रपेतुयदुपुङ्गबाः ॥ २२ ॥ 


४२२ 


भीमह्ाभारते सिटभागे 


वे यदुपुङ्घय वीर सिंघुराजके जलप्राय देशम जा प्हुचेः 
जो नाना प्रकारकी र्ताेसि विचित्र शोमा पारहाया। 
नारियरूके वहूत-से वन वरहा सुशोभित होते थे । नागकेसरोके 
छठ इधर-उधर सव ओर फैले थे; जिनते वहोकी कमनीयता 
ओर भी बद्‌ गयी थी । केवर्होकी भादवियेति वह्‌ प्रदेदा 
अलंकृत हो रहा था । कदी-कीं ताद्‌ पुन्नाग, वङकुर अौर 
अंगूरके वन उस भूभागको ओर घना वना रहे ये ॥२१-२२॥ 
ते तश्र रमणीयेषु विष्येषु खखभरियाः। 
सुसुद्ुयीदषाः सवं देवाः स्वर्गंगता श्य ॥ २३॥ 
जिन्हे सुख ही प्रिय दहि, वे सव यादव वर्हफि रमणीय 
स्थानेमि सर्गम र्नेवारे देवता्भेकि समान आनन्दका अनुभव 
करने लो ॥ २३॥ * 
पुरवास्तु विचिम्वन्‌ स कृष्णस्तु परवीरहा । 
ददं विपुलं देशं सागरेणोपशोभितम्‌ ॥ २४ ॥ 
शत्रुवीरोका संहार करनेवाले श्रीकरप्णने नगरे वाश्यु- 
स्थानकी खोज करते दए समुद्रसे सरोभित शोनेवले प्क 
विशाल पदेदाको देखा ॥ २४॥ 
घाहनानां हितं चैव सिक्रतातागघ्रमृसिकम्‌ । 
पुरलक्षणसस्पन्नं छतास्पद्मिव धिया ॥ २५॥ 
वह स्थान वादे साथी तेकिक्रे रङ्खवाली मिद्रीसे 
सुखोभित था । बाहनेकि स्यि हितकर तथा मगरोपयोमी 
शुभ छक्ष्णोसे सम्पन्न था । वहु रेस मनोहर प्रतीत होता 
था, मानो खक्ष्मीने उसे अपना वास्खयान यना लिया हो ॥२५॥ 
सागरानिटसंवीतं सागराम्युनिवेषितम्‌ । 
विषयं सिन्धुराजस्य शोभितं पुरलक्षणैः ॥ २६॥ 
िधुराजका वह्‌ प्रदेश समुद्रकी वायुस विजित, सागरे 
जख्छे सेवित तथा नगरोपयोगी लक्षर्णेसि सुखोभित था ॥२६॥ 
त्र रैवतको नाम पर्वतो नातिदुरतः। 
मन्दरोदारशिखरः सवतोऽभिदिगाजते ॥ २७॥ 
वहो पास ही रेवतक नामे प्रसिद्ध पर्वत था; जिसके 
शिखर मन्दराचर्के समान ऊँचे ओर रमणीय ये | वद पर्वत 
तव ओरखे बड़ी शोभापारहदाथा॥ २७॥ 
तत्नैकरुव्यसंचासो द्वोणेनाध्युपितश्चिरम्‌ । 
प्रभूतपुरुपोपेतः सर्वरत्नसमाक्कुलः ॥ २८॥ 
बहो एकलव्य रहता था । आचार्य द्रोण भी वरटा दीरष- 


कालतक निवास कर चुके थे। बहुत-ते मनुष्य वरौ माति-जति | 


ये तथा वह पर्व॑त सवर प्रकारके रत्नेपि व्याप्त था ॥ २८॥ 
विहारभूमिस्तत्रैव तस्य गाक्ः सखनिर्मिवा। 
नान्ला दारवती नाम खायताचछ्पदोपमा ॥ २९ ॥ 
उसके पा दी उस राजा रेवतकी विहारभूमि थी, जिसका 
वदे सुन्दर दंगे निर्माण किया गया था। उस भूमिका नामया 
द्वारवती, जो विशाल ोनेके साथ यौ शतरज या चौरी 
विरछोतके समान चौकोर थी ॥ २९ ॥ 
केशवेन मतिस्तत्र पुयर्थे विनिवेिता। 
निवेशं व्र सेन्यानां रोचयन्ति स्म यादवाः ॥ ३०॥ 
भगवान्‌ श्रीङ्कष्णने वहां नगर यसानेका विचार किया | 
यादर्वोको मी वर्हो सेनाका पड़ाव डालना जँच.गया ॥ ३०॥ 
ते रक्तसूयदिषसे तन्न॒ याद्वयुङ्गवाः। 
सेनापारश्च सं चक्कुः स्कन्धावारनिवेश्नम्‌ ॥ ३१॥ 
दिनम जत्र कि पूर्यपर खी ख रदी थी, व्ये श्रेष्ठ 
यादर्वोनि सेनाके रक्षक नियुक्त किये ओर वैनिकेक्रि ठद्रनेके 
स्यि छावनिर्यो तैयार करायी ॥ ३१ ॥ 
धुवाय तश्र न्यवसत्‌ केदावः सह याद्रैः। 
ददो पुरनिवेशाय स॒ यदुग्रवसो विसुः॥ ३२॥ 
यदुप्रवर भगवान्‌ श्रीकष्णने यादवोके साथ उस प्रदेग- 
भ एके सुस्यिर मगर व्रसानेके ययि निवा किया ॥ ३२॥ 
सस्यास्तु बिधिवन्नाम वास्तूनि च गदाप्रजः। 
निर्ममे पुरुषश्रेष्ठो मनसा याद्वोच्चमः ॥ ३३॥ 
गदके वडे भाई यादवश्रेष्ठ पुरुषोत्तमने मानिक संकस्प- 
के द्वारा उस पुरीका नाम निश्चित किया ओर मनसेही 
विधिपूर्वक उसमे शोका विभाग किया ॥ ३३ ॥ 
एवं दवारवतीं चैव पुरी प्राप्य सयान्धवाः। 
सुखिनो न्यघसन्‌ राजन्‌ स्वर्गे देवगणा इव ॥ ३४॥ 
राजन्‌ | इस प्रकार यन्धु-ब्ान्धर्वोसदित यदुवंशी द्वारका- 
पुरीम पर्हुचकर वर्दो उसी तरह खसे रने रगो, जैसे देवता 
स्वगे रहते द ॥ २४॥ 
कृष्णो.ऽपि कालयवनं कात्वा केहिनिषूदनः । 
जरासंघभयाच्चैव पुर दवारवतीं ययो ॥ ३५ ॥ 
केरिदन्ता श्रीकृष्ण मी काख्यवनका आनां जानकर 
उसके ओर जरासंधके भयते द्वारकापुरीको चे गये ॥ ३५॥ 


इति श्रीमहाभारते खिक्भागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि द्वार बतीप्रयाणे षट्पन्रादालमोऽध्यायः ॥ ५६९ ॥ 


शस प्रफार श्रीमहयभारतके ` खरुभाग हरिवंशके अन्तर्म॑त विष्णुप्मे श्रीकृष्णसदित यादर्योका 
द्वाखापुरीको श्रयाणबिषयकं छृष्यनर्गेः अध्याय पूरा हमा ॥ ५६ ॥ 


[कि | "गयो 


[ हरिव, 


1 


1 
॥ 


विष्णुपवं ] 


` सक्तयञ्चाश्त्तमोऽध्यायः 


४२ 


सक्तपत्ारात्तमोऽध्यायः 
कठयवनका वध 


जनमेजय उत्राच 
भगवन्द्लोतुमिच्छमि विस्तरेण महात्मनः । 
चरितं वासुदेवस्य यदुश्रेष्ठस्य धीमतः ॥ १ ॥ 
जनमेजयने पूा--भगवन्‌ ! मै बुद्धिमान्‌. यदुर 
महात्मा वसुदेवनन्दन भगवान्‌ श्रीृप्णका चरित्र विस्तारपूर्वक 
नना चाहता हू ॥ १९॥ 
किमर्थ च परित्यज्य मथुरां मधुसूदनः । 
मध्यदेहास्य ककुदं धाम ठक्ष्म्याश्च केवलम्‌ ॥ २ ॥ 
श्टङ्कं पृथिन्याः स्राटक्ष्यं प्रभूतधनधान्यवत्‌ । 
आयौट्यजलभूविष्ठमधिष्ठानवयोच्तमम्‌ ॥ ३ ॥ 
अयुद्धेनैव दाशार्दस्त्यक्तवान्‌ द्विजसत्तम । 
स काट्यवनश्चापि ङष्णे कि प्रत्यपद्यत ॥ ४ ॥ 
भगवान्‌ -मधुसूदन क्रिसव्ि मथुरा छोडकर चे गये ? 
वह तो मध्यदेशका ककुद ८ सर्वोत्तम खान ); ठक्मीका 
अद्वितीय धामः पृथ्वीका शज्ध, सुन्दरः दर्यनीय, प्रचुर धन- 
धान्ये सम्पन्न, आर्यका न्विासस्थानः लकी अधिकतासे 
सुशोभित तथा समी अधिष्ठानम खवसे उत्तम है । द्विज्रेष्ठ ! 
ददार्हकुटनन्दन श्रीकृष्णे त्रिना युद्धे दी उ२े क्यो छो 
दिया १ तथा काट्यवनने मी श्रीकृष्णके साथ क्या वरर्ताव 
करिया १॥ २-४॥ 
द्यारकां च समासाद्य वारिदुर्गां जनार्द॑नः। 
कि चकार महाबाुर्महायोगी महातपाः ॥ ५ ॥ 
महाव्राहु, महायोगी ओर महातपसखी भगवान्‌ जना्दनने 
जलरूपी दुरगसे धिर हुई दारका जाकर क्या किया १ ॥९५॥ 


किवी्यः कारयवनः केन जातश्च वीर्यवान्‌ ! 
यमसद्यं समालक्ष्य व्यपयातो जनार्दनः ॥ ६ ॥ 

काख्यवनका पराक्रम केसा था ? किंसने उस ब्रलशाली 
वीरको जन्म दिया थाः जिते असद्य समक्चकर भगवान्‌ 
श्रीकृष्ण द्वारकासे हर गये ये १ ६ ॥ 

कै्यग्पायन उवाच 

चष्णीनामन्धक्रानां च गुरुगौग्यां महामनाः । 
ब्रह्मचारी पुख भूत्वान स्म दारान्‌ स िन्दति॥ ७ ॥ 

वैशम्पायनजीने कहा--राजन्‌ ! दृणि ओर अन्धक 
वंशी यादर्वोके गुर ( पुरोहित ) महामना गार्म्यमुनि पहले 
नियमपूर्वक ब्रह्मचारी रहकर क्रंसी साधनामे लगे हुए ये । 
वे उन दिनों ख्ी-संसगपे दुर रहते थे ॥ ७ ॥ 
क्था हि वर्तमानं तमूर्ध्वरेतसमभ्ययम्‌। 
दयालो ऽभिशस्तवान्‌ गाग्यंमपुमानिति राजनि ॥ ८ ॥ 


विकाररहित ऊर्ध्वरेता ब्रह्मचारी रूपमे रहते हुए उन गार्ग्थ- 
मुनिपर उर्दि सलेने राजसभा नपुंसक दोनेका कठ्डू र्गाया॥ 


सो ऽभिद्यास्तस्तदा राजन्‌ नगरे त्वजितं जये । 
अकिष्संस्तु लियं चैव तपस्तेपे खदारुणम्‌ ॥ ९ ॥ 
राजन्‌ } जिन्न अजित प्ररमात्माको भी जीत लिया थाः 
उश नगरमे इस प्रकार कल्ङ्कित होनेपर उरन्दोनि खीरी इच्छा 
तो नदीं कीः परंतु क्रोधपूरव॑क अत्यन्त कटर तपस्या आरम्भ 
करदी॥९॥ 
ततो दादशवषौणि सोऽयद्चूणंमभक्षयत्‌ । 
आराधयन्‌ महदेवमचिन्त्यं शुरुपाणिनम्‌ ॥ १०॥ 
वे गार्म्पमुनि अचिन्त्यसखरूप च्यूल्ाणि महादेवजीकी 
आराधना करते हुए बारह वरपोतक केवल रेका चूर्ण 
खाकर रहे ॥ १० ॥ 
सद्रस्तस्मै वरं प्रादात्‌ समर्थं युधि निग्रहे। 
चृष्णीनामन्धकानां च स्वेतेजोमयं सुतम्‌ ॥ ११॥ 
तच भगवान्‌ रुद्रने उन्हे वरके रूपमे पूर्णं तेजखी पुज 
प्रदान क्रियाः जो युद्धम इष्णि ओर अन्धक-वंरक्ते ीर्ोका 
मी निग्रह करनेमे समर्थ था ॥ ११॥ 
ततः शयु्राच तं राज्ञा यवनाधिपतिर्वरम्‌ । 
पुतरप्रसवजं दैवादपुत्रः पुज्रकामिता ॥ १२ ॥ 
इसी समय यवरनोकि अधिपति एक राजाने उस पुत्र- 
प्रदान करनेवाटे वरका इृत्तान्त सुना । वह दैवभोगसे पुत्रहीन 
था ओर पुर पानेकी इच्छा रखता था } १२॥ 


स चृपस्तमुपानाय्य सान्त्वयित्वा द्विजोत्तमम्‌ । 

तं घोषमध्ये यवनो गोपद्रीपु समासजत्‌ ॥ १३ ॥ 
उत्त यवन-नरेदान द्विजभेष्ठ गार्ग्थकी सान्त्नापूर्वक घर 

लाकर ठहराया ओर किी गोष्ठके भीतर उन्दे मोपनारियेकिं 

संसर्गमे रखा ॥ १३॥ 

गोपाली त्वण्सरास्तत्र मोपस्मीविषधारिणी । 

धारयामास गाग्यस्य ग्म दुर्धरमच्युतम्‌ ॥ १७ ॥ 
उशी गोष्मे गोपाखी नामाली अप्सरा थी, जो गोप- 

नारीका वेष धारण करके वरहो रहती थी । उसीने गा्यमुनिके 

उस धर एवं अच्युत गर्भको धारण क्रिया ॥ १४ ॥ 

मायष्यां गाग्वंभा्ीयां नियोगच्छ्रलपाणिनः। 

स कारयवनो नाम ज्ञे शुरो महावलः ॥ १५॥ 
भगवान्‌ सङ्करफे वरे प्रभावसे गार्म्यमुनिकरी उस मानवी- 

रूपधारिणी अप्सरार्मा मायकरि गर्म॑से महात्रली ग्ररवीर 

कार्यवनका जन्म हआ ॥ १५ ॥ 


न 


४३४ 


अपुत्रस्याथ राक्षस्तु ववृघेऽन्तःपुरे रिषः । 
तसिमिन्नुपस्ते राजन्‌ स कालयवनो चपः ॥ १६॥ 
राजन्‌ | उस शिञ्युका उस पुत्रहीन राजके अन्तःपुरे 
लारन-पाटन एवं संवर्धन होने च्गा | उस राजाकी मृल्यु 
होनेके पश्चात्‌ कालयवन ही उसके राज्यका अधिपति हुमा ॥ 


युद्धाभिकामो चरपततिः पर्यपृच्छद्‌ द्विजोत्तमान्‌ । 
वृष्ण्यन्धककुलं तष्य नारदेन निवेदितम्‌ ॥ १७ ॥ 
राजा काख्यत्रन युद्धकी अभिलापा रखकर श्रे द्विजसि 
पूछने खगा कि सपरत बडे वीर कौन द ओर करटो रहते ६ ¢ 
तव देवर नारदने उसे व्रष्णि ओर अन्धकवंशका पर्विय 
दिया ॥ १७॥ 
क्लात्वा ठ वरदानं तन्नारद्रन्मधुखश्रनः। 
उपक्षत तेजस्वी वर्धन्तं यवनेु तम्‌ ॥ १८॥ 
नारदर्जीसि उत्को मिले दु वरदानका समाचार जानकर 
भी तेजी मधुसूदनने गवर्नर यर्टे पठते हुए. उस काल- 
यवनकी उपेक्षा कर दी 1 १८ ॥ 
स्द्धो हि यदा यजा यवनानां महावलः । 
तत पवं चपा म्टेच्छाः संधित्यादुययुस्तदा ॥ १९॥ 
जव्र यवनोका याजा मदावटी काख्यवन समरद्धिल्नाटी 
हुआ, तव दूसरे म्डेच्छ नरे उसकी शरण लेकर उसीका 
अनुसरण करने चमे ॥ १९॥ 
श्ाकास्तुपाय दरदाः पारदाः शङ्गलाः खसाः । 
पहवाः श्ातश्चश्चान्ये म्लेच्छा दैमवतास्तथा ॥ २०॥ 
दरक वप्राः दरद, पारद, शृङ्खल, खस, पव तथा 
दूसरेदूसरे सेकरड दिमालय-निवासी म्लेच्छ उसके साथ दो 
गये ॥ २०॥ 
स तैः परितो यजा दस्युभिः राख्मैरिव । 
नानावेषायुधेर्भानिरमधुरामभ्यवर्दत ॥२१॥ 
शलमोके समान उन अगणित रोते, जो नाना प्रकारके 
वेरा ओर आयुध धारण करनेके कारण वड़े भयंकर प्रतीत 
होते ये, धिर हुआ राजा कालयवन मशुरापर चद्‌ आया ॥ 
गजवाजिखयोष्ाण(मयुतैरवुदैरपि 
पृथिवीं कम्पयामास सैन्येन महता चरतः ॥ २२॥ 
रेणुना सूय॑मागं तु समवच्छाद्य पार्थिंवः। 
मूत्रेण शक्ना चैव सैन्येन सखजे नदीम्‌ ॥ २३॥ 


उसके साथ दाथीः घोडे, गदे ओर ऊंट दजारो, लख 
तथा करोड संख्यमिं वियमान थे । वद उस विदा सेना- 
से धिरकर इस प्रथ्यीको कम्पित कर रहा था] उर राजाने 
सेनाद्वारा उठी हुई धूल्से सूर्ये मार्गको आच्छादित कर 
दिया ओर सैनिकौके मल-मूतरसे नूतन नदीकी खष्टि कर दी ॥ 


धीमष्टाभारत लिलभागे 


अद्वोष्टशारृतां रशेनिंसुखतेति जनाधिप । 
ततोऽद्वशशृदित्येवं नाम नखा वभूच ह ॥ २९ ॥ 
जनेश्वर ! घोड़ों ओर ऊँर्यैकी दीर्ये टेरे वह्‌ नदी प्रकर 
हुई थी, इसल्यि उसका नाम (अश्वदाक्रत्‌, दो गवा ॥ २४॥; 
तत्सैन्यं मददायाद्‌ वै श्रुत्वा चष्ण्यन्धक्रात्रणीः । 
वसुदेवः समानाय्य क्षातीनिदसुवाच ह ॥ २५॥ 
उसकौ विद्याल सेनाकरे आगमनक्रा समाचार सुनकर 
वरूण ओर अन्धके अगु वसुद्रैवजी सव जाति 
भादर्योको एकच कररफे उनमे इस प्रकार बोटे--।| २५ ॥ ' 
दं समुत्थितं घोरं वृप्ण्यन्धकभयं महत्‌ । 
अवध्यश्चापि नः शाघ्ुवैरदानात्‌ पिनाकिनः ॥ २६ ॥ 
न्रन्धुभो [ यद्‌ वृष्णि ओर अन्धक-कुल्के लि मदान्‌ 
एवं घोर संकट उठ खड़ा हुमा है । परिनाकपाणि भगवान्‌ 
हंकरफ़े वरदाने हमारा यत्रु अवध्य दै ॥ २६ ॥ 
सामाद्योऽभ्युपायाश्च विहितास्तस्य सर्वराः। 
मत्तो मदवखाभ्यां तु युद्धमेव चिकी्पंति ॥ २७॥ 

(उसे शान्त करनेक्रे चि हमने खम आदि उपार्योक्र 
भी सर्वथा प्रयोग कफिवा दैः परंतु वद मद ओर बरलके उन्मत्त 
होमके कारण केवल युद्ध कगनेकी दी इच्छा प्रकट करता ३ ॥ 
पतावानिह वासश्च कथितो नारदेन मे। 
पतावति च वक्तव्यं समैव परमं मतम्‌ ॥ २८॥ 

'्नारदजीने इतने ही समयतक्र हमलेर्गोकरा यहा निवात 
बतलाया था । ने याक्ति-साधन सम्पन्न गनरुके प्रति सन्त्रना- 
पूरणं वचन कटना दी परम उत्तम माना गया दै ॥ २८॥ 
जसयसंधश्च नो राजा निन्यमेव न मूष्यते। 
तथान्ये पृथि्रीपाखा बरृस्णिचक्रप्रतापिताः ॥ २९॥ 
केचित्‌ कंसवघाच्चापि विरक्तास्तद्ता छषाः। 
समाश्चित्य जरासंधमस्मानिच्छन्ति वाचितुम्‌ ॥ ३० ॥ 

ध्ाजा जरासंध हमलोगेकि कमी क्रमा नदीं करता दै-- 
हमारे प्रति सदा अम्परे दी भरा रहता हे तथा दूसरे मूपा 
जो वृष्णिमण्डटसे सताये गये द एवं कुछ नरेद, जो कंम- 
वधक्रे कारण दमरोगोसे विरक्त दो गये हैः वे सव्रके-खव 
जरासंधते मिरु रवे ह ओर उक्तीका आश्रय लेकर हमलोगो- 
करो वाधा पर्हुचाना चाहते दै ॥ २९-३२० ॥ 
वहवो क्षातयश्चैव यदुनां निहता -चपैः। 
वद्धितुं नैव शाक्त्याम पुरेऽस्मिन्निति कावः ॥ ३९॥ 
अपयाने मति छृत्वा दृतं तस्मै ससर्ज ह 1. 

'उन राजानि वदुकुटके ब्रहुत-मे भारईयन्धुर्भोको मार 
डाल है । दूमलेग यहो रहकर पल-पल न्दी सकरेगे, यदी 
सोचकर श्रीकृष्णने यहि हट जानेक्रा विचार करके उसे 
पास एक दूत मेजा था ॥ ३१३ ॥ 


1 
५ 


८ 


[ रिवंदो 


विष्णुपर्व ] 


ततः कुम्भे महासर्पं भिन्नाञ्चनचयोपमम्‌ ॥ ३२॥ 
धोरमाश्चीविपं कर्णं कृष्णः प्राक्ेपयत्‌ तदा । 
ततस्तं मुद्रयित्वा तु स्वेन दतेन ्ास्यत्‌ ॥ २३ ॥ 
“श्रीकृष्णे उस समय खानसे काटकर निकाठे गये क्रोयले- 
क ठेरफे समान कठि, भयंकरः विपधर महासरपैको एक घडमे 
रखवाया ओर उका मंद वंद करके उस घ्रडेको अपने दूतके 
दवारा उसके पास पर्हुचवा दिया ॥ ३२-३३ ॥ 
निदनं मोविन्दो भीषयामास तं यपम्‌ । 
स दुतः कालथवने दशयामास तं घटम्‌ ॥ ३४ ॥ 
कालस्रपपमः कृष्ण इत्युक्त्वा भर्तपेभ । 
'गोविन्दने दृ्ान्तके द्यि वह्‌ सर्पं भेजकर उस राजाको 
उरनेक्ी चेष्टा की थी । भरतश्रेष्ठ ! उस [दूतने काक्यवनसे 
यह कहकर किं श्रीकृष्ण काले सर्पके समान भयंकर है उसे 
धड़ा दिखलया ॥ ३४९ ॥ 
तत्काखयवनो घुद्धूवा चासनं यादवैः कतम्‌ ॥ २५ ॥ 
पिपीलिकानां चण्डानां पूरयामास तं घटम्‌ । 
¢काठगप्रवनने यह समक्षकर कि .यादर्बोने मुञ्चे डरानेका 
प्रयल किया है उस षदेमै ब्हुत-ते रोपभरे चीरयेक्ो 
मर दिया ॥ ३५२ ॥ 
स सपं वहुभिस्तीक्ष्णैः सर्वतस्तैः पिपीलिकैः। 
भष्यमाणःकिखद्धेषु भस्सीभूतोऽभवत्‌ तदा ॥ ३६ ॥ 
८उन वहुसंख्यक तीखे चीयोने सव्र ओरसे उस स्पंके 
शरीरको काटना शयु करिया, जिससे वह्‌ कास सर्पं तत्ता कालके 
गाट्मे चला गण ॥ ३६ ॥ 
तं सुद्रयित्वा तु घटं तथैव यवनाधिपः। 
रेपयामास ` कृष्णाय वाडुद्यसुपवर्भयन्‌ ॥ २७ ॥ 
“फिर उस घडेको उसी तरह वंद करके यवनराजने अपनी 
सैनिक-शक्तिकी ब्रहुल्ताका वर्णन करते हुए श्रीकृप्णके पास 
मेज दिया ॥ ३७॥ 
वासुदेवस्तु तं दष्ट योगं वि्टतमात्मनः। 
उत्खज्य मथुरमाद्यु द्वारकामभिजग्मिवान्‌ ॥ ३८ ॥ 
'्मगवान्‌ श्रीकृष्णे अपने उस प्रयोगको विफल हुभा 
देख तुरंत ही मधुरा छोडकर द्वारकाको प्रस्थान कर दियाः ॥ 
वैरस्यान्तं विधित्संस्तु बाखुदेवो महायशाः 1 
निवेद्य द्वारकां राजन्‌ वुष्णीनाश्वास्य चैव ह ॥ ३९ ॥ 
राजन्‌ ! मदायरस्वी वासुदेवे उस वैरका अन्त कर 
डालनेकी इच्छसे द्वारकापुरी व्रसाकर इप्णिवंरि्योको 
आश्वासन दे ८ पुनः वति मधुरको प्रस्थान किया ›) ॥३९॥ 
पदातिः पुरुषव्याघ्रो बाटुप्रहरणस्तदा । 
आजगाम म्षवीयां मधुरं मधुखदनः ॥ ४०॥ 


सक्षपश्चाशत्तमो ऽध्यायः 


माना कि 


= 
१ ५ ५ 


७२३५ 


महापराक्रमी पुरपरसिंह मधुसूदन केवल भुजार्भोको ही 
आयुधरूपमे साय ठे पैदल दी मथुरामे अयि ॥ ४० ॥ 

षट निर्ययौ हृष्टः स कालयवनो रुषा 1 
मेक्षापूवं च रष्णोऽपि निश्चकपरं महावलः ॥ ४१ ॥ 

न्द देखकर हर्षं ओर रोधवे भरा हु! काट्यवन 
निकला । इधर महात्रटी श्रीकृष्ण भी अपने-अपकरो दिखाकर 
भागते द्ुएट उसे भी अपने पीछे खींच ठे चटे ॥ ४१॥ ` ` 


अथान्वगच्छद्‌ गोविन्दं जिधृष्चुयंवनेश्व्रः। 

न चेनमराकद्‌ राजा ब्रहीतुं योगधर्मिणम्‌ ॥ ४२ ॥ 
यवनेश्वर राजा कार्यवन गोविन्दको पकड़ लेनेकी इच्छा- 

ते उनकरे पीछे-पीटे चला; परंठु इन योगधर्मं श्रीक्ृणणको 

वद्‌ पकड़ न सका | ४२॥ 

मान्धातुस्तु खतो राजा मुचुङखन्दो महायशाः । 

पुरा देवा्ुरे युद्धे छतकमौ मदावलः ॥ ४३ \ 
प्राचीन कामै जव देवासुर-संग्राम हुभा थाः उस समय 

मान्धाताके पुत्र महायशखी, महाव्रलटी राजा मुचुकुन्दने 

देवताओंकी ओरसे युद्ध करके उसमे सफलता प्रप्त की थी ॥ 

चरेण चछन्दितो देवैरनिद्रामेव गृहीतवान्‌ । 

श्रान्तस्य तस्य वगेचं तद? प्रादुरभूत्‌ किङ ॥ ४७ ॥ 
देवताओंनि उनसे वर मोगनेका अनुरोध कियाः तब 

उन्दनि निद्राको ही वरके रूपमे ग्रहण किया | युद्धते यके 

होनेके कारण उस समय उनके मँदसे निम्नङ्कित वाणी 

प्रकट हर्द ॥ ४४॥ 

प्रखक्तं बोधयेद्‌ यो मां तं ददेयमहं सुराः । 

चश्चुषा क्रोघदीसेन प्वमाद पुनः पुनः ॥ ४५॥ 
ष्देवताओ | जो मुने सोतेते जगा देः उसे मेँ क्रोधे 

मज्वलित हुई दषे दवारा जल्यक्र भस कर दँ, ठेस उन्दनि 

बरारवार कहा ॥ ४५ ॥ 

पवमस्त्विति तं शक्र उवाच चिददोः सह । 

स॒ खुरोरभ्ययुक्षातो श्द्िराजसुपागमत्‌ ॥ ४६ ॥ 
तव देवतार्ोसदहित इनदरने उनसे कहा "एवमस्तु, ( रेखा 

ही हो ) । इम प्रकार देवताओसि आश्चा लेकर वे गिरिराजके 

पास अये ॥ ४६ ॥ 

स पवंतगुहां काचित्‌ प्रविर्य श्वरमकरदितः। 

खष्वाप कालमेतं वे याघक्छृष्णस्य दर्शनम्‌ ॥ ४७ ॥ 
भमसे थके हुए राजाने पर्वतकी किरी रुफामे प्रवेश 


करके उस समयतक शयन किया, जवतक कि उन्हे श्रीकृप्णका 
ददन नदी हज था ॥ ४७॥ 


तत्सवं वासुदेवाय नारदेन निवेदितम्‌ । 
वरदानं च देवेभ्यस्तेजस्तस्य च भूपतेः ॥ ४८॥ 


५३६ 


राजा मुचुकुन्दक तेज तथा देवताति उन्ट मिठे दपः 
वरदानक्री सारी वातं देवर्धं नाग्द्रने वसुदेवनन्दन भगवान्‌ 
श्रीकृष्णको व्रत्तायी थी ॥ ४८ ॥ 
छष्णोऽखगम्यमानश्च तेन म्टेच्छेन श्ाघरुणा । 
तां गुदं मुचुऊुम्दस्य प्रविचेश्रा चिनीतचत्‌ ॥ ४९. ॥ 
उ म्टेच्छनातीष रघ्नुके दवाय पीटा क्ये जति हुए 
श्रीकृष्णे मुचुकुन्द फी उस युफामे एक विनीत. पुरुपकी मेति 
प्ररेदा करिया | ४९॥ 
शिरःस्थाने त॒ राजपेुचु्कन्स्य फेश्चवः। 
संदर्शनपथं त्यक्त्वा तस्थौ बुद्धिमतां चलः ॥ ५०॥ 
वुदधिमानेमि शरेष्ठ धीफुप्ण राजर्गिं मुचुुन्दफ पिरदानेकी 
ओर उनके टष्टिपथको व्यासकर ( अर्थात्‌ जदसि उन्टर दिखायी 
नदे स्के--रेसे खानपर ) खड दो गये॥ ५०॥ 
अचुप्रविद्य यवनो ददश्तं पृथिवीपतिम्‌ । 
स तं सुप्तं छृतान्ताभमाससाद खदुर्मतिः ॥ ५१ ॥ 
उनके पौे-पीटे उस कालयवनने भी गुफामे प्रवेश करके 
सोये दए राजा मुदुकरुन्दको देखा । वद दुर्बुद्धि अपने च्वि 
काठके समान उन नरेशे पाह खयं टौ जा पर्हुचा ॥ ५१॥ 
वाखदेवं तु तं मत्वा घल््यामास पािवम्‌ ! 
पदेनात्मविनाश्षाय शलभः पावकं यथा ॥ ५२॥ 
जसे पत्िगा अपने दी विनाशक लि आगम कूद पड़ता 
है, उखी प्रकार कालयवनने मुचुकुन्दको श्रीछष्ण॒सम्नकर्‌ 
उन्दं अपने विनादशके वि टी कत्तसे मारा ॥ ५२ ॥ 
मुखकुन्दस्तु राजर्षिः पादस्पर्लश्वोधितः। 
निद्राच्छेदरेन चुक्रोध पादस्पर्येन तेन च ॥५३॥ 
राजर्पि मुचुकुन्द उसके परोकी ॐोकर लगनेसे जाग 
उठे । एक तो उनकी निद्रा भङ्गं हद थी गीर दुसरे उस 
यवनने उन्दै परे छू दिया थाः इसमे वे ऊुपित 
दो उठे॥ ५३ ॥ 
संस्मत्य स वरं शक्राद्वेश्षत तम्रतः। 
स टद्टमात्रः क्रोधेन सम्प्रजज्याल सर्वशः ॥ ५४ ॥ 
फिर इन्द्रस मिले हुए वर्का स्मरण करे उन्दनि सामने 
खदे दुष्ट काट्यवनकी भोर देखा | उनके फ़्ोधपूर्वक 
देखते ही वह्‌ सव्र ओरसे आगमे जस्ने ठगा ॥ ५४ ॥ 
ददाद पावकस्तं तु द्युष्कं वृक्षमिवाशनिः। 
क्षणेन कारुयवनं नेतेजोविनिगंतः ॥ ५५ ॥ 
जेते वन्न सूदे बृक्षको जल देता 2, उसी प्रकार भचु- 
कन्दक नेक तेजते प्रकट हूर उस अग्निने काठ्यवनको 
क्षणम ही जखकर भस कर दिया ॥ ५५ ॥ 
तं वासुदेवः श्रीमन्तं चिग्सुप्तं नराधिपम्‌ । 
ङतकार्यो ऽ्वीद्‌ धीमानिदः वचनमुष्ठमम्‌ ॥ ५६ ॥ 


श्रीमदहाभास्ते सिलभागे 


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बुद्धिमान्‌ मगवान्‌ श्रीक्रप्णक् अमी कायं मिदद्े 
गया | वे चिसकाटमे सये हए उन तेज) राजा 'इचुकुन्दपे ` 
गृ उत्तम केचन बोर - | ५६ ॥ 
गध्चिरध्रखुक्तिप्सि कथितो नासद्रेन म। 
छनंम सुमदत्फाय खस्ि तेऽस्तु चजाम्य्म्‌ ॥ "७ ॥ 
"राजन्‌ | यप दीर्य य्ह मोर्टरये। मूत्रे नारद. 
जीन आपके विधयो ताया भा] यपरे मेरा मान्‌ कायं 
सिद्ध कर दिवा । आपका कव्याणष्टो | ध्रमं जना ॥ 
चायुद्रवमुपाटक्ष्य गजा हस्वं प्रमाणतः। 
परिष्छतं युगं मेन कष्टेन मता तद्रा ॥ ५८॥ 
राजा मुचुकुन्द वसुदेवनन्दन श्रीक्रुप्णको कदम छोरा 
देखकर यद समद्यलिधरा पि दीर््पल व्यतीत दोनेसे युग 
दल गया ॥ ५८ ॥ 
उवाच सज! गोधिन्दं को भवान्‌ किमिहागतः । 
कश्च काटः ्रसुमस्य यदि जानासि कथ्यताम्‌ ॥ ५९॥ 
राजाने गोधिन्दमे ृष्ा-प्ाप कौन ६ ! ओर किष 
यध आय द? भरे मोतेतोते शितिना समव व्यतीत दो गया! 
यदि जानते द्र तो वतादयः ॥५५॥ 
श्रीह्ष्ण उव।च 


सोमवंशोद्भवो राजा ययातिनाम नाहुषः । 
तस्य पुघ्रो यदुञ्यंटश्चत्यासोऽन्ये यवीयसः ॥ ६० ॥ 
भ्ीकष्णने कदा--एञन्‌ ! चन््रचदर्मे नहुषे पुत्र 
राजा ययाति द्यो गथेट्‌। उनके गे पुत्र यदु ये| यदुके 
चार ठरे भाद्‌ ओरये॥ ६०॥ 
यदुवंशात्‌. समुध्पन्ने यसुरवातमजं विभो । 
वापुदरेवं विजानीहि यपत मामिदहागतम्‌ 1 ६१॥ 
विभो ] नेर } आपको विदित किरम यदुवंशे 
उच्न्न हुआ ह| वहुदेवका पुरू, अतण्व लोग मुस 
वासुदेव कदत ६ । मेँ वातुदेव द्यं यहो आग्रहं । ६१॥ 
परेतायुगे पुप्तोऽक्ति विदितो मेऽस्ति नार्दव्‌। 
ददं फलियुगं चिद्धि किमन्यत्‌. फरवाणि ते ॥ ६२ ॥ 
आप तरेतायुगे सेये ये । सुद्धे आपके विषयमे नारदजीसे 
सवय वाते शात ह ट} इस समय दपर ओर कलियुगकी 
मेधिक काल समश्िये } इसके सिवा आपकी स्या सेवा करै ॥ 
मम दाघरुस्त्वया दग्धो देवदत्तव्ये चप) 
अवध्यो यो मया संख्ये भवेद्‌ वपशवैरपि ॥ ६३॥ 
नरेश्वर ! तुमने मेरे उस शनरुक्तो जलाकर भस्म किया दै, 
जिते देवतासि वरदान प्राप्त था जौर जो युर मेरे द्वार 
सौ वमे भी नर्द मारा जा सकता था | ६३॥ 


विष्णुपवं 1 


अष्रपश्चाशतमोऽच्यायः 


४२७ 


(मिमाना 


वैश्चम्पायन उवाच 
इत्युक्तः स तु छृष्णेन निर्जगाम गुहामुखात्‌ । 
अन्वीयमानः कृष्णेन ऊतका्यंण धीमता ॥ ६४ ॥ 
वैशस्पायनजी कहते है--जनमेजय | श्रीकृ्णके एेसा 
कहनेपर राजा मुचुकुन्द युफाकरे द्ारसे बाहर निकले । उनके 
पीछे कृतक्रस्य हुए बुद्धिमान्‌ श्रीद्ष्ण भी थे ॥ ६४ ॥ 
ततो दद््षं॒पृथिवीमावृतां हखनरः । 
खल्पोत्सादैरटपवटैरट्पवीर्यपराक्रमेः 
परेणाधिष्ठितं चैव राज्यं केवलमात्मनः ॥ ६५ ॥ 
उन्दोनि देखा प्र्वीपर होय-छोटे मनुष्य भरे हए दै । 
उन सत्क उस्साहः बल, वीर्य ओर पराक्रम ब्रूत योद 
द । अव्र अपना केवल राज्य वरच गया दै, जिसपर दृसरेका 
प्रयुत्व स्थापित हो चुका है ॥ ६५ ॥ 
प्रीत्या विष्ञ्य गोविन्दं प्रविवे् महद्‌ वनम्‌ । 
दिमवन्तमगाद्‌ रज्ञा तपसे धृतमानसः ॥ ६६॥ 
तव राजाने बडे प्रेमसे भगवान्‌ श्रीकृष्णको विदा किया 
ओर खयं अपने मनमे तपद्याका निश्चय करके हिमाख्यपर्वत- 
पर वकि विशाट वने चे गये ॥ ६६ ॥ 
ततः सर तप आस्थाय विनिंच्य कटेवरम्‌ । 
आररोह दिवं राजा कर्म॑भिः स्वैर्जिताश्चुमैः ॥ ६७ ॥ 


वरहो तपस्या करफे शरीरको त्यागकर राजा मुचुङुन्द्‌ 
अपने अश्ुमनिवारक पुण्यकमेकि द्वारा खगंरोक्मे जा 
पर्हुचे ॥ ६७ ॥ 
वासुदेवोऽपि धमौत्मा उपायेन मदामनाः। 
घातयित्वा ऽऽत्मनः श्रं तत्सैन्यं त्यपयत ॥ ६८ ॥ 
इधर मदामनस्वी धर्मात्मा मगवान्‌ वासुदेवने भी अपने 
शत्रुको पर्व क्त रूपसे मरवाकर उसकी सारी सेनापर अधिकार 
क्र छया | ६८ ॥ 
प्रभूतरथहस्त्यश्चवर्म॑शसखयायुचध्वजम्‌ । 
आदायोपययौ धीमान्‌ स सैन्यं निहतेश्वरम्‌ ॥ ६९ ॥ 
बुद्धिमान्‌ श्रीकृष्ण बहुसंख्यक रथ; हाथी? घोदेः कवचः 
अल, शखर ओर ध्वजाओते युक्त सेनाको, जिसका राजा मारा ` 
गया थाः, अपने साथ ले गये ॥ ६९॥ 
निवेदयामास ततो नराधिपे 
तदु्रसेने प्रतिपूर्णमानसः। 
जनार्दनो द्वारवतीं च तां पुरी- 
मरोभयत्‌ तेन धनेन भूरिणा ॥ ७० ॥ 
उनका मनोरथ पूर्णं हयो चुका था । जनार्दने वद सारी 
सेनां राजा उग्रसेनक्रो समपिंत कर दी ओर उस प्रचुर ॒धनः 
रारिसे उन्दनि दारकापुरीकी सोभा बायी | ७० ॥ 


इति श्रीमहाभारते खिर्भागे हरिवो विष्णुपर्वणि कारुयवनवये सप्तपन्चाशत्तमोऽध्यायः ।॥ ५७ ॥ 


इस प्रफाग श्रीमहाभारते लिकभाग हरिवंके अन्तम॑त विष्णु पवमे फारुयवनका वधविषयफ सत्ताबन्वे अध्याय पूरा हुमा ॥ ५७ ॥ 


अष्टपच्ाशत्तमोऽध्यायः 


दारका परीका विशवकसदारा निर्माण, निधिपति शह ओर सुधमौसभाका आनयन, श्रीकृष्णद्रारा 
रुव्यवखयापूंक वहो याद्वोको बसाना तथा यरूरामजीका रेवतीके साथ रवाह 


वैश्चम्पायन उवाच 
ततः प्रभाते विमले भास्करे उदिते तदा । 
छृतजाप्यो दपीकेरो वनान्ते निषसाद ह ॥ १ ॥ 
वैशस्पायनजी कहते है --जनमेजव { तदनन्तरः निर्मल 

प्रमातकाल्म सूर्योदय होनेपर मगवान्‌ श्रीकृष्ण नैचिक जप 
एवं साध्याय आदि पूं करके वनके भीतर व्रैठे ॥ १॥ 
परिचक्राम तं द्वेदं दुर्मस्णानदिदश्षया । 
उपतस्थुः कुटप्राग्या यादवा यदुनन्दनम्‌ ॥.२॥ 

` तत्श्वात्‌ दुर्गे व्यि उपयुक्त यान देखनेकी शच्छासे 
चे उस प्रददे घूमने ठगे । उस समय कुले ब्रदे-वृहे 
यदुवगी मी यदुनन्दन श्रीकृप्णके पास आ ग्येथे ॥ २॥ 
रोदिण्यामहनि श्रेष्टे स्वस्ति वाच्य दिजोन्तमान्‌। 
पुण्याहोपेर्विपुैदुरगस्यारव्धवाच्‌ क्रियाम्‌ ॥ ३ ॥ 


श्रीकृष्णने रोदिणी नक्षत्रे श्रेष्ठ शनिवारको उत्तम 
ब्रा््णेि स्वस्तिवाचन कराकर , विपुर पुण्यादषोषके साथ 
दुगंनिर्माणकरा कार्यं आरम्भ कर दिया ॥ ३॥ 
ततः पड्जपत्राक्षो यावान्‌ केरिसृद्धनः। 
मरोनाच वदतां श्रेष्ठो देवान्‌ ब्ृ्रिपुर्थथा ॥ ४ ॥ 
तत्पश्चात्‌ वक्ता शरेष्ठ केशिहन्ता कमलनयन श्रीकृष्ण- 
ने जेसे त्रासे वैरी इन्दर देवताओि कोई बात कते है, 
उसी प्रकार यादर्वसि कहा ४॥ 
कलिपतेयं मया भूमिः पदयध्वं देवसद्मवत्‌ । 
नाम चास्याः कृतं पुयोः ख्याति यदुपयास्यति ॥ ५ ॥ 
ध्यादवो ! मेने देषसदनके समान इस भूमिका निर्माण 
करखियादै। आप सवर रोग देख । मैने इसका नाम भी 
निशित कर लिया दै, जिससे इसकी ख्याति होगी ॥ ५ ॥ 


४२८ 


दयं दास्वती नाम प्रथिग्यां निर्मिता मया। 
भविष्यति पुरी स्म्या शक्रस्येवामसावती ॥ £ ॥ 
भरे दारा दस भूतलपर निर्मित हुई यद पुरी द्वारवतीके 
नामते प्रसिद्ध दोगी तथा इन्द्रकी यमरावतीके समान रमग्रीय 
दिखायी देगी ॥ ६ ॥ 
तान्येवास्याः कारयिप्ये चिद्वान्यायतनानि च । 
चत्वरान्‌. यजमा्गाश्च सम्यगन्तःपुराणि च ॥ ७ ॥ 
प्रं इस पुरीफे वेदी चिः वेदी मन्दिरे दी 
चौरा, उगी तरदकी स्ट ओर वैष टौ उत्तम अन्तःपुर 
चनवा्जगा? जते किं अमसवततीम १ ॥ ७॥ 
देवा वाच मोदन्तु भवन्तो सिगतन्वराः। 
चाधमाना रिपू ध्राचुग्रसेनपुरोगमाः ॥ ८ ॥ 
शते देवतां अमरावतीं आनन्द भोगते र, उसी प्रकार 
उग्रसेन आदि आपटोग भी निश्चिन्त दो अपने यतुर्भौको 
पीड़ा देते ए इस पुरीम सानन्द निवास कर ॥८॥ 
गर्ठन्तां वेद्रमवास्तृनि कटस्यन्तां चिकचत्वराः। 
मीयन्तां सजमागश्च प्रासादस्य च या गतिः ॥ ९ ॥ 
“धरतोके शिलान्यासक्री सामग्रिर्यो संग्रह करके छायी नर्य | 
तिरा्हौ ओर चीरादोकी कत्मना की जाय । सड़क लिथि 
भूमिका पाप क्रिया जाय तया राजमद्म जाने जो मार्ग 
द, उसके लि भी भूमि नापी जाय ॥ ९ ॥ 
्े्यन्तां शिदधपसुख्या वे नियुक्ता वेदमकर्मसु 1 
नियुल्यन्तां च देशेषु प्रेप्यक्मंकरा जनाः ॥ १० ॥ 
धृदनिर्माणकरे कार्यम लगे रहनेवटठे जो सुयोग्य एवं 
श्रेष्ठ निखी हँ, उर यहो मेजा जाय जीर जगद्-जगद 
मजवृरीका काम करनेवटि मजदुर्योकरो ( कारीगरयोफे साथ ) 
काम करने ल्िख्गा दिया जायः ॥ १० ॥ 
पवमुक्ते तु यव॒चो गृहसं्दतः्पयः। 
यथानिवेदां संहण्चक्रुवौस्तुपरिग्रघम्‌ ॥ ११॥ 
भगवान्‌ श्रीङ्रष्णके णेस कटनेपर सव यादव दर्पे 
उल्लसित हो गृहनिर्माणकरे लियि उपयोगी सामगरीका संग्रह 
करनेर्मे ल्ग गये | उन्दनि सभी घर व्यि उनकी सितिके 
अनुसार गिलान्यासकरे निमित्त आवश्यक वस्तुर्ओोका संग्रह 
क्रिया ॥ १९१९॥ 
सूत्रदस्तास्ततो मानं चक्रुयौदवसत्तमाः। 
पुण्येऽदनि महाराज दविजातीनभिपूज्य च ॥ १२॥ 
महाराज ! तदनन्तरं श्रेष्ठ यादवेनि एक पविन्र दिनको 
ब्राहार्णोका पूजन करके दार्थोमिं सूत्र केकर भूमिक्रो नापना 
आरम्भ क्रिया | १२॥ 
चास्तुदैवतकमरीणि विधिना कारयन्ति च । 
स्थ पतीनथ गोविन्दस्तत्रोषाच महामतिः ॥ १३॥ 


श्रीमष्टाभारते स्िकभागे 


[ शसन 


५ ७ ००० 


वै वास्तु देवताके पूजन यादि कर्मं भी विधिपूर्व 
सम्पन्न क्रराने खे 1 तदश्वात्‌ परम वुद्धिमान्‌ भगवान 
श्रीकप्णने वदो थवदयेमि कदा) १३ ॥ 
अस्मद्‌ सुविहितं करियताम मन्दिरम्‌ । 
विविक्तचत्वरपथं सनिविष्टेष्ैवतम्‌, ॥ १४॥ 

धकारीगसये ¡ तुमलोग यद दम यादर्वोके चयि भुन्द्र 
टंगते ए मन्दिरकरा मिर्माण करो, जिम दृ्टदेवताकी उत्तम 
विधिते खापना की जाय । यर्घैका मार्गं थर चौगदा प्रथ 
रहना चादियेः ॥ १८ ॥ 
ते तथेति मष्टावादटुमुक्त्या स्थपतयस्तदा | 
दुर्गकमीणि संस्कासयुपकटप्य यथाविधि ॥ १५॥ 
यथान्यायं निमिमिरे दुगण्यायतनानि च । 
स्थानानि निदधुश्चाच्न ब्रह्मादीनां वधाक्रमम्‌ ॥ ६६॥ 

तवर उन थवदर्येनि मावर धीकरप्णमे चद्रुत अच्छा 
ककर विपिपूर्वफ़ दुर्ग-कमं ( दुर्गनिर्माण-सम्बन्धी धरम्मि 
कार्य--नीव खोदना आदि ) शीर संस्कार ( भृमिश्ोधन-- 
कण्टकनिवारण आदि ) कर यभोचित रौनिमे वरिमिन्न 
दग ओर मन्दिर्योक्ा निर्माण क्रिया तथा उनम ऋय 
वरदया आदि टेवताभेफि चि स्वान वनाय ॥ १५-१६ ॥ 
सपाम॒ग्तेः सुरेशस्य दपदोटखलस्य च 1 
चातुर्दवानि चत्वारि द्वाराणि निदधुश्च ते ॥ ६७ ॥ 

उन्न जटः अग्निः इन्द्र तथा पिल-योखदटी--दन 
वचार देवता्कि द्यि चार द्वार वनवि (यवा य॒द्धात्न 
आदि चार दैवतामेकि स्यि द्र्य द्न निर्माण क्रिया ) ॥६५॥ 
युद्धाक्षमेन्द्रं भरलारं पुष्पदन्तं तथेव च । 
तेषु वेदमष्र युक्तेषु यद्रवेपु मदात्मयु ॥ १८ ॥ 
पुयौः क्िप्रं निवेदयां चिन्तयामास मायवः । 

उन कागीगरीनि य॒द्धाश्नः छर; मद्लट ओर्‌ पुणदन्त- 
की भी मूर्पिर्यो यनाय ओर्‌ उनके न्यि उपयुक्त खानका 
निर्माण करिया | जवर मदयामनखी यादव उन भवदे निर्माण 
कार्यम जुट गये, तव माधव श्रीकरप्ण दस चिन्ता पडे कि 
कंच तरद द पुरीक्रा यीघ निर्माण दो जय ॥ १८६ ॥ 
तस्य दैवोत्यिता वुद्धिर्विमला क्िप्रकारिणी ॥ ६९. ॥ 
पुथीः भ्रियकस सा वै यदूनामभिवदधिनी। 

दैववद्य उनके भीतर पुरीका शीघ्र निर्माण करनिवाटी 
निर्मल बुदधिका उदग्र हुभा, जो यादवो ज्रिव एवं अम्यु- 
दय करनेवाटी थी ॥ १९६३ ॥ 
शिसिपिमुख्यस्तु देवानां प्रजापतिखतः प्रभुः ॥ २०॥ 
विश्वकमौ ख्वमन्या वै पुरस संस्थापविप्यति । 

उन्दोनि सोचा; ष्देवताओकि प्रधान चिस्पी प्रजापतिपुत्र 
विष्वफर्मा इस कार्यम समर्थं ६ । वे अप्रनी घुद्धिके अनुसार 
दसत पुरीकी स्थापना करगेः॥ २०२ ॥ 


दिष्णपवं ] 


अष्टपञ्चादाक्तमो ऽध्यायः 


४२९ 


मनसा समदुष्याय तस्यारगमनकारणात्‌ । 
निदश्षाभिसुलः कृष्णो विविक्ते समपयत ॥ २९१ ॥ 
मन-दीमन यह्‌ बात सोचकर मगवान्‌ श्रीकृष्ण एकान्त 
स्थानम विद्वकर्माकि आगमनक्ैः स्थि देवताओंकी ओर 
उन्मुख हुए. ॥ २१ ॥ 
तस्मिन्नेव वतः कारे शिस्पायाखं महामतिः । 
विश्वकमी सुरश्रेष्ठः कृष्णस्य भ्रस्रुखे स्थितः ॥ २२॥ 
इसी समय परम बुद्धिमान्‌ शिलयातचार्यं सुरमरेष्ट विश्वकमां 
श्रीद्ष्णके सामने आकर खडे हो गये | २२॥ 
वि्कर्मोवाच 
शक्रेण येषितः क्षिप्रं तव विष्णो धृतव्रत । 
किङ्करः समयुपाप्तः राधिर्मा किक्रसेमिते ॥ २३॥ 
विश्वकमौ वोखे-- उत्तम वतको धारण करेवाठे 
विप्णुदेव ! मु इन्द्रने आपके पास सीर भेजा है ] मँ सेवक 
आपकी ेवामे उपसित हँ ! अक्ता दीन्यिः मै आपकी क्या 
सेवा "करू १} २३॥ 
यथासौ देवदेवो मे राङ्कसश्च यथान्ययः। 
तथा त्वं देव मान्यो मे त्िद्धेपो नास्ति वःप्रभो ॥ २९ ॥ 
देव ! प्रभो } मेरे ययि जते देवाधिदेव ब्रह्माजी तथा 
अविनाशी भगवान्‌ शङ्कर माननीय है, उसी प्रकार आप भी 
मेरे व्यि सम्माननीय दै } मेरी धारणाके अनुसार अप तीनो- 
म कोई अन्तर नदीं है ॥ २४ ॥ 
चैत्मरेक्यक्षापिकां बाचसुत्छजख महाभुज । 
पणोऽस्मि परिः कि करोमि प्रदाधि माम्‌॥ २५॥ 
महाबाहो ¡ आपकी बाणी तीनो जकोका ज्ञान कराने- 
वारी ३ ( अथवा तीनों खेकोँको आज्ञा देनेमे समर्थ है ) । 
आप मेरे प्रति उसीका प्रयोग ीन्यि । मै शित्पाख्रका 
पारदर्शी आपके सामने खदा हूं । आक्ञा दीनि, कौनसा 
कायं करः |} २५ 
श्रुत्वां विनीतं वचनं केकवो विश्वकर्मणः । 
प्रत्युवाच यदुश्ेष्ठः कंसारिरतुदटं वचः ॥ २६॥ 
विश्वकमाक्रा यहं विनययुक्तं क्चन सुनकर कंसविष्वंसी 
यदुम्रष्ठ भगवान्‌ श्रीकृष्णं उनसे यह अनुपम वचन वोले--), 
श्रुतार्थ देवशरयस्य भवान्‌ यत्र वयं स्थिताः] 
अवशयं चिद कर्तव्यं सदनं मे सुरोत्तम ॥ २७) 
"सुरश्रेष्ठ ! पूर्वकाल्मे देवतार्योकरी जो रुक सभा वैटी 
यी> जद हमछोग उपखित येः बह तुम भीयेः अतः 
देबतार्ओोकरा जो गृढ्‌ प्रयोजन हैः उसे तुमने भी सुना दी है। 
अतः यों मेरे रहनेके चयि अवद्य ही सुन्दर सदनक्ा निर्माण 
करना दोगा ॥ २७ } । 
तदियं पूः प्रकाशां निवेश्या मपि खबत । 
मत्पभावाचुरूपैश्च गृषैश्चेयं समन्ततः ॥ २८ ॥ 


य 


८उत्तमनतधारी देव } मेरे निमित्त अपने शिस्पकौशरका 
प्रदर्यन करके ल्थि ठुम्हे इस नगरीको साना ओर इसके 
भवर्नोका निर्माण करनां है । यह पुरी सव्र ओस्े मेरे प्रभाव- 
के अनुरूप ग्र्होद्राय उुयोभित दौ } २८ ॥ 


उत्तमा च पृथिव्यां वै यथा खगे.ऽमरावती । 

तथेयं हि त्वया कायौ शक्तो दसि महामते ॥ २९ ॥ 
"महामते { जैषे खर्गमे अमरावतीपुरी सवेसे श्रेष्ठ दैः 

उसी तरद्‌ इस प्रथ्वीपर यह पुरी जैसे भी सर्वोत्तम हो स्कः 

वैषा ही प्रयत्न करके ठम्दे इसका निर्माण करना है । तुम 

इस कार्यम समर्थं दो | २९॥ 


मम स्थानमिदं कार्यं यथा वै भिदिवे तथा । 

मत्याः पद्यन्तु मे कक्षम पुय यदुकुरस्य च ॥ ३० ॥ 
भेरा यह खान दम्दे वैता ही वनाना हैः जैताकि 

वैकुण्ठधामय है । जिसे यहेकि खतर मनुप्य मेरा, इस पुरी.- 

का तथा यदुङ्कख्का वैभव देख सके" | ३० ॥ 


पवसुक्तस्ततः प्राह विश्वकमी मीश्वरः । 

छष्णमद्धिष्टकमौणे ` देवामित्रविनाशनम्‌ ॥ २३१ ॥ 
उनके ेसा कनैपर बुद्धिफे स्वामी प्रजापति विहवकर्मा- 

ने अनायास ही महान्‌. कम करनेवाले देवशत्रुविनाशक श्री. 

कृप्णते कहा--॥ २१ ॥ 

स्वेमेतत्‌ करिष्यामि यत्‌ र्वयाभिहितं पभो । 

पुरी त्वियं जनस्यास्य न पर्याप्ता भविष्यति ॥ ३२॥ 
“प्रमो ¡ आपने जो कुछ कडा है, वह सथ मँ 'करसगा; 

परत पुरीके लि जो भूमि दैः यद इस विशाल जनसमुदायके 

व्ि पर्याप्त "दी हौगी ॥ २२॥ 

भविष्यति च विस्तीणौ चद्धिरस्यारतु शोभना । 

चत्वारः सागरा हास्या विचरिष्यन्ति रूपिणः ॥ २२ ॥ 

यदीच्छेत्‌ सागरः किविदुर्खष्टुमपि तोयराट्‌ 1 

ततः खायतटक्षण्या पुरी स्यात्‌ पुरूषोत्तम ॥ २४ ॥ 
“पुप्रोत्तम ! आप चाहे तो यह विस्तृत द्ये स्क्तगी | 

मेरी इच्छा है इसका सुन्दर विस्तार दो । इसमे चारौ समुद्र 

मतिमान्‌ होकर विचरे । यदि जके खामी समुद्र कु सूमि 

छोड़ सकें तो यह पुरी भलीमोति विस्तृत एवं उत्तम लक्षणो 

से सम्पन्न हो सकरेगी' ॥ ३३-३४ ॥ 

पफचपुक्तस्ततः छृष्णः प्रागेव कृतनिश्चयः! 

सागरं सरितां नाथमुवाचच वदतां वरः ॥ ३५॥ 
विशवकमकरि एसा कहनेपर वक्ताओमे श्रेष्ठ श्रीकृष्ण, जो 

पहेते ही समुद्रसे भूमि चेनेका निश्वय कर खुके थेः सरि 

ताओकरे स्वामी सागरसे बोरे) ३५] 

ससुद्र दशा च दे च योजनानि जलादग्ये । 

परतिसंहियतामात्मा यद्यस्ति मयि मान्यता ॥ २६ ॥ 


1}. 


धीमदाभारते खिखभागे 


[ हरिवते 


श्समुद्र { यदि मेरे प्रति पम्दारी आदखवुद्धि दै तो दम 
मेरे कमेत बारह योजनतक्र जटाश्चयर्मेते अपने खरूप (जट) 
कोसमेटले॥ ३६॥ 
अवकाश्च त्वया दत्ते पुरीयं मामकं चलम्‌ । 
पयाप्तविषया रम्या समग्रं विक्तहिष्यति ॥ ३७॥ 
श्ुम्हरि जगह दे देनेपर य्ह बनमेवाटी इस परीका 
म्रदेर पर्याप्त विस्तारको प्राप्त दो जायगा तयथा यद स्मणीय 
पुयी मेरे खमस्त सैन्यसमूहका मार सहन कर स्करेगीः ॥२७। 
तदः छृष्णश्य वचनं श्रुत्वा नदनदीपतिः । 
स मारुतेन योगेन उरससजं जलाश्चयम्‌ ॥ ३८ ॥ 
उत खमय श्रीटृष्णका यह वचन सुनकर नदो ओर 
मदिर्योकि अधिपति समुद्रने मारतयोग ( वायुके संकोच ) 
दवारा अपने जलाश्षयके जलका उपसंहार करके उतनी भूमि 
छोड दी ॥ ३८ ॥ 
विभ्वकमा ततः प्रीतः पुयीः संलक्ष्य घास्तु तत्‌ । 
योविन्दे चैव सम्मानं कतचान्‌ सागरस्तदा ॥ ३९॥ 
पुरीका वह विशार वास्तु देखकर विदवकर्माको बड़ी 
प्रसन्नता हुई । समद्रने उस समय भगवान्‌ श्रीकृष्णका 
सम्मान किया | ३९ ॥ 
विश्वकमी ततः रष्णसुवाच यदुनन्दनम्‌ । 
अद्यप्रथृति गोविन्द सर्वे समधिसेदत ॥ ४०॥ 
तत्यश्वात्‌ विदवकमनि यदुनन्दन शरीङृप्णसे कदा-- 
धगोविन्द | आप सवर छोग आज्ते टी दस पुरीम निवास 
करनेके चयि तैयार हो जादये ॥ ४० ॥ 
भनसा निर्मिता चेयं मया पुः भ्रवरा विभो । 
अचिरेणैव काठेन शृदसम्बाधमालिनी ॥ ४९१॥ 
भविष्यति पुय रम्या खुदाय प्राश्यतोरणा । 
चयाट्राटककेयुरा परथिष्यां ककुदोपमा ॥ ४२ ॥ 
प्रमो ! मैने मनते इस श्रेष्ट युरीका निर्माण कर ल्या 
हि। अव्र येद दी समयमे य ॒ग्दकी पदृत्तियेसि अलंकृत 
रमणीय पुरीके सूम प्रकट दो जायगी । इसके द्रवे रहत 
ही सुन्दर हेगि । इसमे व ओर सुन्दर बवन्दनवारे स्गी 
र्गी । दीटे, परकोटे ओर अद्धालिकार् इस पुरीको केयूर 
८ मुजवन्द ) क समान सुग्रोभित करेगे । यदह पुरी भूतल्पर 
पृथ्वीकी चोटीके समान मानी जायगीः ॥ ४१-४२ ॥ 
सन्तःुरं च कृष्णस्य परिचर्याश्चयं महत्‌ 1 
चकार तस्यां पुर्या वै देशे अिददपूनिते ॥ ४२ ॥ 
विश्वकर्मनि इख पुरीके देवपृजित प्रदेदा्मे श्रीकरष्णके 
च्यि विदा अन्तःपुरका निर्माण करियाः निसमै परिचर्या 
८ स्नान आदि ) के व्यि अरग-अख्ग घर वने हृ ये ॥ 


वतः खा निर्मिता कान्ता पुसी दारावती तदा 1 


भानसेन प्रयत्तेन वैष्णवी विश्वकर्मणा ॥ ४४॥ 

हव प्रकार उस समय विद्वकरमनि मानिक प्रयल 
( संकस्प ) के द्वारा उष कमनीय वेष्णर्वपुरी दवारावततीका 
निर्माणकार्यं सम्यन्न किया ॥ ५४ ॥ 


विधानविदहितद्यार प्राकारवरद्योभिता। 
परिखाचयसंगुष्ता साट्धप्राकारतोरणा ॥ ४५ ॥ 


उसके द्वार चिव्यलाख्रकी विधिकर अनुसार बनाये गये 
ये । श्रेष्ठ परकोटे उसक्री गोमा वदति ये । खाद्य जर 
टीठेसि वह पुरी सुरक्षित थी तथा उसमे अद्ाटिका, चदार- 
दीवारी ओर तोरण यथरास्ान वने हए ये ॥ ४५॥ 
कान्तनारीनरगणा वणिग्िरुपशोभिता । 
नानापभ्यगणाकरीणपै खेचरीव च गां गता ॥ ४६॥ 

सुन्दर नरनारियोकि समुदाय वरदो वसे हुए थे । व्यापारी 
वर्गके लोग उसकी योभा वदृत्ति ये! नाना प्रकारे क्रय- 
विक्रयकी वस्ठर्ओी ओर दृकानेषि वह॒ भरी हुई थी । रेखा 
जान पदता थाः मानो अकाश्मे विचरनेवाटी पुरी पथ्वीपर 
उत्तर आयी दो ॥ ५६ ॥ 


श्रपावापीप्रसन्नोदा उद्यानैरुपन्षोभिता । 
समन्ततः सखंव्रृताङ्ी बनितेवायतेक्षणा ॥ ४७ ॥ 


चस पुरीकै ्पौषिठे र बावदिर्यमि खच्छ जल भय 
हमा था तथा नाना प्रकारे उग्रान उसे सत्र ओरसे खुो- 
भित कर रहे थे । इस अवसाम वह दँकी हूरई अर्खोवाली 
विशार्रोचना वनितके समान्‌ जान पडती थी ॥ ४७ ॥ 


सग्रद्धचत्वरवती वेदमोन्तमधनाचिता 
रथ्याकोटिसहस्ाख्या शुश्रराजपथोत्तरा ॥ ४८॥ 


उसके चौराहे त्रदे सश्रद्धिदाली ये ¡ उसके ऊचि-ऊवे 
महर वादल्षि व्याप्त होरहैथे। उस्र पुरी कोटि सदल्ल 
गर्यो थीं ओर उज्ज्वल राजमार्गे उसकी उक्कृष्ट सोभा हो 
रही थी ॥ ४८ ॥ 
भूषयन्ती समुद्रं सा स्ग॑मिन्द्रपुरी यथा । 
पृथिव्यां सर्वरत्नानामेका निचयश्षाछिनी ॥ ४९॥ 

जेते इन्द्रपुरी खग॑की सोमा बदाती है, उसी प्रकार वह 
समुद्रकी गोभा वदती थी | वह भूतलपरर सम्पूर्णं॑र्नकि 
सञ्चयपे सुखोभित हनेवाली एकमात्र नगरी थी ॥ ४९॥ 
सुराणामपि सु्षेत्रा सामन्तक्षोभकारिणी । 
अप्रकाशं तदाकाशं भासादरैरपल्र्वती ॥ ५० ॥ 

द्रारकापुरी तेवताथेकि चयि मी पुण्य्ेत्र शी ] सीमावतीं 
नरेशेकि मनमे क्षोभ उद्यन्न केवाली थी तथा बह अपने 
ऊचे-ऊँचे मदक द्वारा आक्रादक्रो भी आच्छादित क्रिये 
देती थी ॥ ५० ॥ 


दिण्णुपषं ] 


अ्टपञ्चादालमो ऽध्यायः 


| , 4 


[म 


[निव 


पृथिध्यां प्रयुराष्रायां जनौघप्रतिनादिता । 
आओधैश्च वारिराजस्य दिरिसरृतमास्वा ॥ ५९ ॥ 
बहुत-ते राष्ैवाली इस प्रष्वीपर सी दुई द्वारकापुर 
जनस्रमुदापके कोटाद््त गूजती रहती यी ओर जले सामी 
सभरुद्रके प्रवाद एवं उत्ताट तरङ्ग कारण वर्की वायु सदा 
शीतल बनी र्ती यी ॥ ५१ ॥ 


अनृपोपवमैः कान्तैः कान्त्या जनमनोहस । 
सतारका चौरिय सा दारका प्रत्यराजव ॥ ५२॥ 

समुद्रे जल्प्राय तटपर खष्टराते हुए कमनीय उपवरनेकि 
दारा यदी हुई अपनी अनुपम कान्तिसे वह द्वारकापुर 
मतु्योफे मनको मोहे ठेती थी ओर नक्ष्ेषि युक्त आकादा- 
की भति श्लोभा पाती थी॥ ५२॥ 


धराकरेणा्षवर्णेन शातकौम्भेन सदृता । 
हिरण्यप्रतिवर्नश्च गृरैर्मम्भीरनिःखनेः ॥ ५२॥ 
श्शचमेषप्रतीकादौदधीरः सौधेश्च शोभिता । 
र्यके समान वर्णवाले सुवणंमय परकोयेे धिरी हुई वह 
नगरी गम्भीर घोपवाले खर्णनिर्मित भवनो तथा श्वेत बादर्ल- 
के सष्टा उज्ज्वल दारौ ओर अष्टालिका्भति सुशोभित ्ोती 
थी] ५२३२॥ 
क्रचित्‌ क्वचिदुदप्रापेरुपावृतमह्ापथा ॥ ५४ ॥ 
तामावसत्‌ पुर छष्णः स्वँ यादवनन्दनाः । 
अभिप्रेतजनाकीर्णा सोमः खमिव भासयन्‌ ॥ ५५॥ 
कहीं-कहीं वहत ॐचे मदलोकी छयति उसकी विशाल 
सके आच्छादित दो रदी थी । रेसी दारकापुरीयै श्रीकृष्ण 
तथा समस्त यादवनन्दन निवास करने स्तम | वह पुरी अभीष्ट 
जनमि शौ मरी-पूरी थी । जैसे चन्द्रमा आकाशको प्रकारित 
करते £ उसी प्रकार भगवान्‌ श्रीकरुप्ण उख पुरीकी शोभा 
दृति थे ॥ ५४.५५ ॥ 
विभ्वकमौ च तां रत्वा पुरीं दाक्रपुरीमिव । 
जगाम त्रिदिवं देवो गोविन्देनाभिपूजितः ॥ ५६॥ 
इन्द्रपुरीके समान पररक्पुरीरा निमाण गरे देव 
बिदवकर्मा भयवान्‌ ्ररप्णद्ार। सम्मानिन दहो न्वगटोये 
चठे गये ॥ ५६ ॥ 
भूयश्च वुदिरभवत्‌ कष्णस्य चिदिनान्यनः। 
जनानिमान्‌ धनैीचेष्य तर्पययमरं यदि ॥ ५७ ॥ 
ततश्चत्‌ आस्मञानी नगवान्‌ श्रीषण्णक मनम यट 
विनार उखा फ व्यक लेोरगेष्त यदि प धनमे वृत्त कर 
सकता तो बहुत अन्डा पेता" ॥ ५५ ॥ 
स वैधवणसंस्प्टं निधीनामुत्तरः निधिम्‌ 1 
दाङ्कमाहयतोपेन्ध्रो निरि स्य भवन प्रभुः ॥५८॥ 
तम उन भगवान्‌ उयेन्द्रन कुतेस्के सम्यमे रषे 


निधिम उत्तम निधि शङ्खका राधि रमय घने मवने 
आवाहन फिया ॥ ५८ ॥ 
ख शङ्कुः केदावाह्वानं शत्या हि निधियट्‌ खयम्‌ । 
आजगाम समीपं धै वस्य दारषतीपतेः ॥ ५९ ॥ 
ध्मगवान्‌ श्रीङृष्णने मेरा आङ्कान फिया ४" यष जानकर 
निधिर्योका राजा शङ्क खयं टी द्वारकानायक समीप भा 
गया | ५९ ॥ 
स शङ्कः भ्रा्जलिर्भूत्या विनयादबनि गतः । 
छृष्णं विह्णापयामास यथा वैधवणं तथा ॥ ६० ॥ 
उस शङ्के विनयपूर्वक शाय जोद धरतीपर माया 
टेककर्‌ कुवरेरके टौ समान मगवान्‌ धीकृप्णको प्रणाम किय) 
ओर्‌ एस प्रकार कदा--॥ ६० ॥ 
भगवन्‌ कि मया कायं सुराणां वित्तरक्षिणा ! 
नियोजय महाबा यत्‌ कायं यदुनन्दन ॥ ६१ ॥ 
, भ्मगवन्‌ | म देवतार्भोका विच्तरक्षक हं । मषाबाहू 
यदुनन्दन | मुले स्या करना ्ोगा १ जो काय॑, उसक 
च्वि मुपे आश दीज्यिः ॥ ६२१॥ 
तमुवाच पीकेद्ाः शङ्खं शहयकमु्तमम्‌ । 
जनाः द्राधना येऽसस्तान्‌ घनेनाभिपूरय ॥ ६२ ॥ 
तत्र श्रीकृण्णने उस शङ्खं नामक उत्तम गुह्यके कहा-- 
'इस नग. जो निर्धन या अस्प धनवके मनुभ्य ई, उनको 
घने पसि्णं कर दो ॥ ६२॥ 
नेच्छाम्यनक्ितं ष्टं शं मटिनमेव च । 
देष्यीति चैव याचन्तं नगर्या निर्धनं नरम्‌ ॥ ६३ ॥ 
पमे हस नगरमे किसी भी पेते निर्धन मनुप्यको नरी 
देखना चादृताः, निमे भोजन न मिख्नेके कारण उपवास 
करना पदता, जो दुर्बल ओर मलिन हो तथा ष्दीजियेः 
कहकर किसीके सामने हाय रैलाता या भीख मौगता 
टो" ॥ ६३ ॥ 
वैग्रग्पायन उवाच 
गहीत्वा शासनं मृष्नौ निधिराट्‌ केदावस्य ह 1 
नियीनाप्ापयामस द्वास्यत्यां गृहे गृहे \॥ ६४५॥ 
धनोंधैरभिवर्पध्वं चकः सर्व तथा चते 
दैशस्पायनजी कदत है---लनमेनय } भगयान्‌ श्री 
कृष्णक आभा धिरोधायं करक निषियेद्ि याना यङ्कने समस्त 
निधिर्योको अद्रेः दिया-- -श्वुमसेग द्रारफामे घरपर जाकर 
धनयादिरौ व्पाकरो 1 उन सय निधिरयेनि ममा किया६४३ 
नाधनो पिद्यन तच्च क्षीणभाग्योऽपि घा नरः ॥ ‰५ ॥ 
घो चा मलिन वपि दास्वन्यं कमयन) 
द्ास्वभ्यां पुरि पुरा केषशधम्य मशान्मनः ॥ ६६ ॥ 


४७४२ 


इख तरह्‌ पूर्वकर्म महात्मा केवकी पुरी द्वारकामे 
कोई मनुम्य किठी तरह भी निर्धन अथवा माग्यहीन नहीं 
रद गया | दुर्बल या मलिन भी नदीं रदा ॥ ६५-६६ ॥ 


चकार वायराह्वानं भूयश्च पुरुपोत्तमः । 
तत्रस्य एव भगवान्‌ यादवानां परियंकरः ॥ ६७ ॥ 

तत्यश्वत््‌्‌ यादर्वोक्रा प्रिय करनेवाले पुरषोत्तम 
भगवान्‌ श्रीकृप्णने द्वारका्मे सित दोकर दी वायुदेवका 
अविहन किया ॥ ६७ ॥ 


भराणयोनिस्तु भूतानासुपतस्थे गदाधरम्‌ । 
पक्म्रासीनमेकान्ते देवगुद्यधर पञ्चम्‌ ॥ ६८॥ 
समस्त भूर्तोके परर्णोकी योनिरूप वायुदेव एकान्तम अके 
बैठे हुए भगवान्‌ भीक्ृप्णकी, जो देवताओङि गु प्रयोजनको 
अपने हृदयम धारण क्वि हुए ये, सेवा उपखित हप ॥ 
क्‌ मया देव कर्तव्यं सर्वगेनाञ्युगामिना । 
यथेव दनो देवानां तथैवास्ि तवानघ ॥ ६९ ॥ 
ओर वोठे-देव ! मै शी्गामी तथा सर्वग ( सरवन 
पटुचनेमे समर्थ ) हू । सुनने आपकी कौन-पी ठेवा करनी है 
अनष ! मँ जैसे देवतार्थोका दूत ईः उषी तरह आपकामी हूः ॥ 
तमुत्राचच ततः कृष्णो रहस्यं पुरपरो दरिः। 
मारतं जगतः पाणं रूपिणं समुपस्थितम्‌ ॥ ७०॥ 
जगतके प्राण-खरूपम वायुदेव मूतिमान्‌ होकर वेवाभे 
उपचित ई, यह देख अन्तर्यामी, पापहारी भगवान्‌ शरी्ष्ण 
उनसे रदस्यभरी वात बोले--॥ ७० | 
गच्छ मारुत देवेशमदमान्य सहामरैः । 
सभां खधमौमाद्प्य देवेभ्यस्त्वमिदानय ॥ ७१॥ 
(मारत { जाओ, देवतार्ओषदित देवराज इन्द्रका आदर 
करके उनकी अनुमति ॐ देवताओंके यदेसि सुधर्मानामक 
सभाको यहो उडा ठे आजी ॥ ७१ ॥ 


यादवा धार्मिका शेते विकान्ताश्च सहखश्वः । 

तस्यां विषयुरेते वे न तु या छिमा भवेच्‌ ॥ ७२ ॥ 
ध्ये सदो धर्मात्मा तथा पराक्रमी यादव उसी प्षमार्भे 

वै, जो कृत्रिम ( क्षणमंगुर ) न दो ॥ ७२ ॥ 

या ह्यक्षया सभा रम्या कामगा कामरूपिणी । 

सा यदुन्‌ धारयेत्‌ सरवौन्‌ यथेव विदशांस्तथा ॥ ७३ ॥ 
°जो सभा अक्षयः रमणीयः इच्छानुखार सर्वत्र चल 

सकनेवाखी तथा सभासदोकी इच्छाके अनुरूप सरूप धारण 

करेवाखी दैः वद सुधर्मा समा अपने भीतर इन खमस 

यदुवंरिर्योके धारण करे, ठीक उसी तरह जैमे बट्‌ देवतार्थ- 

करो धारण करती हैः | ७२ ॥ 

संगृह्य वचनं तस्य ङष्णस्याङ्किष्टकमंणः। 


श्रीमष्टाभारते सिलभागे 


[ शसि्वंशे 


वायुरात्मोपमगति्जगाम  अिदिवालयम्‌ ॥ ७४॥ 
अनायास ही महान्‌ कमं करनेवाटे श्रीकृष्णका संदेश 
लेकर अपने ही समान गतियाछे वायुदेव स्वर्मलोकमे गये ॥ 
सोऽञचुमान्य खुरान्‌ सवौन्‌ छृष्णवाकयं निवेध च । 
सभां सखुघमौमाद्ाय पुनरायान्मदीतखम्‌ ॥ ७५॥ 
उन्दने समस्त देवतार्ओको आदरपर्वक भरकृप्णका वचन 
सनाया ओर उनकी अनुमतिते शुधर्मां सभाको ठेकर वे पुनः 
भूतल्पर अये ॥ ७५ ॥ 
खुघ्माीय सुधमा तां छष्णायाङ्धि्कारिणे । 
देवो देवसभां द्वा वायुरन्तरधीयत ॥ ७६॥ 
अनायास दी महान्‌ कर्म करनेवाछे सुधर्मात्मा श्रीकृप्णको 
वह सुधर्मा नामक देवसभा देकर वायुदेव अन्तर्धान दो गये॥ 
द्वारवत्यास्तु सा मध्ये केरावेन निवेशिता । 
खधमौ यदुमुख्यानां देवानां जिदिवे यथा ॥ ७७॥ 
भरीकृष्णने द्वारकापुरीके मध्यभागरमे उख सुधर्मा समाको 
स्थापित करिया । जते खर्गभे देवतार्ओकी समभा है, उसी प्रकार 
भूतल्पर वह पमुख यादर्वोकी समा हुई ॥ ७७॥ 
पं दिव्यैश्च भोगश्च जलकञैश्वान्ययो हरिः। 
दरव्येरलंकयेति सर पुर्या खां प्रमदामिव ॥ ७८॥ 
इस प्रकार अविनाशी श्रीहरि दिव्य भोगों तथा समुद्रके 
जल्पे प्रकट हुए द्रन्यो ८ रत्नौ >) से अपनी पुरीको युवती 
छीकी भति अलंकृत करते ये ॥ ७८ ॥ 
मयौदाद्चेव संचक्रे श्रेणीश्च शरकृतीस्तथा । , 
चङाघ्यक्षांश्च युक्तश्च प्ररूतीदांस्तथेव च ॥ ७२९॥ 
उरन्दोनि सवके लि धर्मकी मर्यादा्पर्वोध दी व्यापारियोः 
प्रजाज्नोः सेनापतियों तथा प्रजाव्गके शाखकेकि च्वि भी 
समुचित मर्यादा स्थापित कर दीं ॥ ७९ ॥ 
उग्रसेनं नरपति कादयं चापि पुरोहितम्‌ । 
सेनापतिमनाधरष्ि विकट मन्विपुङ्गवम्‌ ॥ ८० ॥ 
उग्रसेनकरो द्वास्काक्रा राजा त्रनायाः कारीके विद्वान्‌ 
सान्दीपनि मुरनिकरो पुरोदितक्र पदपर प्रतिष्ठित क्रिया। 
अनाधृष्टिको सेनापति तथा विक्रुको प्रधान मन्त्र वनाया ॥ 
यादवानां कुककरान्‌ स्थविरान्‌ दश तत्र वै। 
मतिमान्‌, स्थापयामास सर्ध॑कारयेष्वनन्तरान्‌ ॥ ८१॥ 
बुद्धिमान्‌ श्रीकृष्णे याद्वौकि वंशधर दस वडे-वृटे 
पुरर्षोकोश् सभी का्येमि सल््रह देनेके य्यि अवान्तर मन्त्रीके 


पदपर स्थापित किया था॥ ८५ ॥ 


# दस बेद-वृटे पुरुपकि नाम ये ई-- 
उद्व; वसुदेव; कद्‌) विपएृथु. श्वफल्क, चित्रक; गद, सत्यक, 
चरमद्र ओर पृधु । 


विष्णुपयं ] 


पकोनपष्टितमो ऽध्यायः 


14 


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न ¬ ~~ ---~ ~ ~-----~-- -------- ~~~ 


रथेष्वतिरथो यन्ता दारुकः केडवस्य वे । 

-योधसुख्यश्च योधानां प्रवरः सात्यक्रिः ऊतः ॥ ८२ ॥ 
रथम अतिरथी दारक भगवान्‌ श्रीक्रप्णका सारथि था। 

योध्यं श्रेष्ठ सात्यकि दी समस्त योद्धा्क्रि प्रधान वनाय 

ग्येये॥८२॥ 

विघानमेवं छत्वाथ कृष्णः पुर्यामनिन्दितः 

मुमुदे यदुभिः सद्धं खोक्स्नएठा महीतले ॥ ८३ ॥ 


समस्त ठोकंकि कष्टा अनिन्द्र कीर्तिवाठे भगवान्‌ श्रीङृष्ण 
दस प्रकार वैधानिकं व्यवस्था कफे द्वारकापुर यादर्वोके 
साथ आनन्दपूर्वक रहने कगे ॥ ८३ ॥ 
रेवतेस्याथ कन्यां च रेवर्ती शीरुसम्मताम्‌ । 
प्राप्तवान्‌ वल्ेवस्तु छृष्णस्याुमते रदा ॥ ८४ ॥ 
उस समय श्रीकरप्णकी अनुमतिम बल्देव्जीने राजा रेवत- 
की सुशील कन्या रेवतीको पत्नीरूपमे महण किया | ८४ ॥ 


इति श्रीमहाभास्ते खिलभागे दिं चिष्णुपवैणि द्वारावतीनिमौणेऽषटपञ्चादात्तमोऽध्यायः ॥ ५८ ¶ 
इस प्रकार श्रीमहामास्तके लिरमाग दसिंहके अन्तम॑त व्रि्णुपरवमे टारदतीकफा निर्माणतरिपयक् अद्रावनवे अध्याय पुरा हुमा ॥ ५८ ॥ 


एकोनषष्टितमोऽध्यायः 
भगवान्‌ श्रीकष्णके दारा स्क्मिणीका हरण तथा यादकवीराका 
जरासंध एवं लिद्यपाल आदिके साथ घोर युद्ध 


वैश्नम्पायन उवाच 
पतसिन्नेव काटे तु जरयसंधः प्रतापवान्‌ । 
श्रपायुद्योजयामास  चेदिराजप्रियेप्सया ॥ १ ॥ 
वैशम्पायनजी कहते ह-- जनमेजय ! इसी समय 
प्रतापी जयासंध चेदिराजकः प्रिय करनेरी इच्छसे राजाओंको 
एकन करनेका उद्योग किया ॥ १ ॥ 
खताया भीप्मकस्याथ सक्रिमिण्या रुकमभूषणः 
दिहापालस्य चपतेर्विवादो भविता किल ॥ २॥ 
उसने सर्वत्र यह समाचार भेज दिया फि “भीष्यक्रकी 
पुत्री सकरिमणी तथा राजा शिगयुपारका विवाह दोनेवाल दै । 
इसमे केवल सुवर्णे वआाभूष्रणोका उपयोग होगा ॥ २ ॥ 
दून्तवक््नस्य तनयं स्ुचक्चममितौजसम्‌ । 
सहस्राक्षसमं युद्धे मायाद्रतविदास्दम्‌ ॥ ३ ॥ 
दन्तवक्त्र पुत्र अमिततेजस्वा सुनक्चको, जो सैकड़ों 
मावार्थोकरि जान एवं प्रयोगभे क्रा तथा युद्धे सहख ने्न- 
धारी इन्द्रफे ठल्य पराक्रमी था ( जरासंधने नोर देकर 
चुल्वाया ) ॥ 
पौण्डूस्य वासुदेवस्य तथा पुत्रं मदावरम्‌ । 
खदेवं वीयंसम्पन्नं प्रश्गक्ौहिणीपतिम्‌ ॥ ४ ॥ 
परौण्ड्क वासुटेवकरे मदाबन्छ यर पराक्रमसतम्पन्न पुत्र 
तुदेव्को भी जो प्रथक्‌ एक अक्षौहिणी नेनाका अधिपति था 
( जयामंधने दत्राव डाल्कर ही बुख्वाय्रा धा ) ॥ ४ ॥ 
प्कलव्यस्य पुनं च वीर्यवन्तं महावटम्‌ 1 
पुत्र च पाण्ड्वरजस्य कलिङ्गाधिपति तथा ॥ ५॥ 
छताप्रियं च छृष्णेन वेणुदारिं नराधिपम्‌ । 
अंशुमन्तं तथा क्राथं श्ुतधमीणमेव च॥ € ॥ 


निवृत्तराघ्रुं कालिद्धं गान्धाराधिपति तथा । 
परसह्य च महावीर्य कौश्चास्ग्यधिपमेव च ॥ ७ ॥ 

एकलन्यके महव्रखी एवं पराक्रमी पुचरकोः पाण्ड्यराजके 
पुत्रको; कलिङ्गदेदाके अधिपतिकोः श्रीकृष्णे जिसका अग्रिय 
किया थाः उस राजा वेणुदारिको, क्रथपुत्र अंञ्चमान्‌ णवं 
श्रुतधर्माकोः श्रुरोको पराजित करनेवले कलिङ्गराजकोः 
गान्धारनरेदको तथा महापराक्रमी कौशास्वीपतिको भी 
जरासंधने वल्मूर्वक बुखनेकी चेष्टा की थी ॥ ५-४॥ 
भगदत्तो मदासेनः रालः शाल्वो महावलः । 
भूरिथ्रवा मद्रासेनः ऊुन्तिवीरयश्च वीर्यवान्‌ । 
खयं वराथं -सम्पात्ता भोजराजनिवेश्षमे ॥ ८ ॥ 

विशाल सेनासे युक्त राजा भगदत्तः दाल, मदाघटी 
शस्व, बहुत वड सेनावाठे भूरिथिवा तथा पराक्रमी कुन्ति- 
वी्य-ये सव्र लोग खयं ही वर नियुपारुकी वारात करनेके 
चि भोजराज भीष्मके भवनम पधारे ये ॥ ८ ॥ 

जनमेजय उवाच 

कस्मिन्‌ देदो शपो जक्षे रुक्मी वेदविदां वरः । 
कस्यान्ववाये युनिमान्‌ सम्भूतो द्विजसत्तम ॥ ९ ॥ 

जनमेजयने पूछा--द्िजश्रे्ठ ! वेदवेत्ता्ओमिं उत्तम 
कान्तिमान्‌ राजा सक्मी क्रिस देय ओर किंस कुलम उत्यन्न 
दुा था।॥९॥ 

वंश््पायन उवाच 

राजपे्याद्वस्यासीद्‌ विदभं नाम वै खुतः। 
विन्ध्यस्य दक्षिणे पाद्व विद्भौयां न्यवेदयत्‌ ॥ १० ॥ 

वेशम्पायनजीने क्ा--राजन्‌ ! राजपिं यादवके 


111 


श्रीमर्ाभारते विलममि ` 


| [ हरिवंशे 


विदर्मनामक एक पुत्र था, जो विन्ध्येगिरि ददिण पार्ये 
विदर्भानगरीमे निवास करता था | १०॥ 
क्रथकैरिकसुख्यास्तु पु्ास्तस्य मदावखाः। 
वभूवुर्वीर्यसम्पन्लाः पृथग्वं्यकरा चृपाः ॥ ११ ॥ 
विदर्मके क्रथः कैदिक आदि बहुत-से मदावी पुत्र हए 
जो पराक्रमखम्यन्न तथा पृथक्‌-ए्थक्‌ वंशो प्रवर्तक नेग ये॥ 
तस्यान्ववाये भीमस्य जक्षिरे दृप्णयो दपा; । 
क्रथस्य त्वंयुमान्‌ वये भीष्मकः कैशिकस्य तु ॥ १२॥ 
राजिं यादवके दी वंदा भीमसे बृष्णिवं्षी राजार्योकी 
उत्पत्ति हर्द थी । क्रथके व॑दाम अंश्टमान्‌ ओौर कैरिकके वंशज 
भीष्मक द्ट ॥ १२॥ 
दिरण्यत्तेमेत्याहुर्य दाक्षिणत्ये्वरं सपाः 1 
अगस्त्यगुत्तामाशां यः कुण्डिनस्थोऽन्वसान्यरेपः॥ १३॥ 
मीप्मकको दी राजा लोग हिरण्यरोमा तथा दाक्षिणात्येश्वर 
कदते £, जिन्दनि कुण्डिनपुरमे रहकर अगस्त्यं भुनिके द्वारा 
सुरक्षित दिद्या दक्षिणका रासन किया था। १३॥ 
स्क्मी नस्याभवत्‌ पुरो रुषिमिणी च विहाम्पते । 
सक्मीषचास्राणि दिन्यानि द्रुमात्‌ प्राप मावः ॥१४॥ 
जामदग्न्याच्‌ तथा रामाद्‌ व्राह्यमस्मवाप्तवान्‌। 
भ्ास्पर्दत स षष्णेन नित्यमद्भतकर्मणा ॥ १५॥ 
प्रजानाथ | उन्दी रजा भीप्मकका पुत्र सस्मी थातया 
रुक्मिणी भी उन्दीकी कन्या यी महावटी स्क्मीने 
( किम्पुखषराज ) द्रुमे दिव्या प्राप्त कि ये।सायद्ी 
जमदग्निनन्दन परश्रामसे उखको व््याल्लकी प्रापि दृद 
यी । स्क्मी अदुमुत कर्म करनेवाले श्रीक्ृष्णके साथ सदा दी 
स्पर्धा रखता था ॥ १४१५ ॥ 
सकिमिणी त्वभवद्‌ राजन्‌ रूपेणासदटशी भुषि । 
खकमे वासुदेवस्तां श्रवादेव मदाप्तिः ॥ १६ ॥ 
राजन्‌ । सविमिणीकरे रूपकी समानता करनेवादी दस 
पृथ्वीपर दूसरी कोई खरी नदीं थी । महतिजस्वी वसुदेवनन्दन 
श्रीकृष्ण उसका परिचय सुनकर दी उसे चाने रगे 
भरे ॥ १६॥ 
स तया चभिरपितः श्रवादेव जनार्दनः। 
तेजोवीर्यवरेपेतः स मे भतौ भवेदिति ॥ १७1 
इसी प्रकार सुकिमिणी भी श्रीकृप्णकी प्रशंसा सुनकर दही 
उर्ह चादने ख्गी थी । उसकी इच्छा थी किं तेजः वीर्य 
, ओर वले सम्पन्न श्रीकृष्ण ही मेरे पति हो ॥ १७॥ 
तां ददौ न च ष्णाय द्वेषाद्‌ सक्मी महावरः । 
कंसस्य चधसंतापात्‌ रष्णायामिततेजसे ॥ १८ ॥ 
याचमानाय कंसस्य देणष्यो ऽयमिति चिन्तयन्‌ । 


महावदी .ख्वमी श्रीकृष्णते देष स्ता थाः दृद्ि 
उसने श्रीकृष्णको अपनी विन न्दी दी । कंका वध सुनकर 
उपे ब्रा षंताप हा था | वद्‌ सदा यदी सोचता याकि 
कृप्ण कंसद्रोदी टै दखय्यि उनके याचना करनेपर मी सक्मी- 
ने अमित तेजी श्रीकरप्णको सकरिमिणी नदी दी ॥ १८३ ॥ 
चैयस्याथं खनीथस्य जरासंधस्तु भूमिपः । 
वरयामास तां राजा भीष्मकं भीमविक्रमम्‌ ॥ १९) 
परष्वीपत्ि राजा जरासंधमे चेदिरान सुनीयके पुत्र 
रिद्पार्के परि भयानक पराक्रमी भीष्मके उनकी कन्या 
सकमिणीको मोगा था| १९॥ 
चेदिराजस्य तु वसोरासीव्‌ पुरो वृष्टदथः 
मगघेयु पुरा येन निर्मितोऽ्चौ गिरियजः ॥ २० ॥ 
चेदिराज उपरिचर वघुके एक पुत्रका नाम बृहद्रथ था, 
जिखने पूर्वका्छ्म मगधदेशके भीतर गिरिज नामक नगरका 
निर्माण कराया था ॥ २०॥ 
तस्यान्ववाये जक्नेऽसौ जरासंधो महावलः 
वसोरेव तदा यशे दमघोषोऽपि चेदिरार्‌ ॥ २१॥ 
उखीके वंगमे मदावली जरासंध पैदा हुजा । उपरिचिर 
वयुके ष्ठ वंगर्मे उन दिनो दमघोष पैदा हए ये, जो चेदि 
देशके राजा ये ॥ २१ ॥ 
दमघोषस्य पुत्रास्तु पञ्च भीमपराक्रमाः! 
भगिन्यां वसुदेवस्य श्रुतश्रवसि जष्ठिरे ॥ २९॥ 
दमधोधके पोच भयानक पराक्रमी पुत्र हए, जो वयुदेव- 
की वदिन श्रुतश्रवके गर्भे उत्पन्न दए थे ॥ २२॥ ` 
दि्यपालो दृशम्रीवो रेभ्योऽथोपदिश्षो वरी । 
सवोखङ्कशला चीरा वीर्यवन्तो म्टावखाः ॥ २३॥ 
उनके नाम इस प्रकार ६--रिडपालः द्म्रीव, रैभ्यः 
उपदि ओर बली । ये सव-के-सव सम्पूरणं अरखोके शनम 
निपुणः वीरः पराक्रमी ओर मदावरी ये } २३ ॥ 


श्तेः समानवंश्षस्य खुनीथः प्रददौ सुतम्‌ । 
जरासंघस्त॒ खतवद्‌ ददश्नं जुगोप च ॥ २४॥ 
जरासंधं कुटुम्बी था तथा सुमान वर्मे उत्पन्ने हग 
याः इसल्यि सुनीथ ८ दमघोप्र ) ने अपना पुत्र शिशुपाल 
उसे सप दिया था ( रिश्चुपाल्को जरासंधका सहयोगी बना 
दिया था) | जरासंध मी रिद्युपालको अपने पुत्रके स्मान 
समक्षता ओर उसकी रघा करता था ॥ २४॥ 
जरासंधं धुरस्रृत्य वृष्णिहाध्रुं महावटम्‌ । 
क्रतान्यागांसि चैयेन दृष्णीनां चाप्रियैषिणा ॥ २५॥ 
इृष्णिवंरके शत्रु मदावली जरासंधको आगे करके चेदिः 
सजने ब्ृष्णिर्यौका अप्रिय नतादते हुए उनके अनेक अपराध 
क्यिये॥ २५॥ 


विष्णुप्चं | 


पक्षोनषष्ठितमोऽभ्यायः 


~~ ~ ~~~ ~ 


~~~ च 
----~-----~-~---~--~-~--~ त = 
~----~~-~~--~----~---~------~---------~--~--~-----~ 


; जामाता. त्वभवत्‌ तस्य कंसस्तसिन्‌ हते युधि । 

-ङष्ार्थं ॒वेस्मभवजयसंधस्य वृष्णिभिः ॥ २६॥ 
कंस जरातंधका जामाता था । जत्र वह युद्धम श्रीकरप्णके 

हायसे माय गया; तव श्रीङकप्णके ही स्यि समस्त दृष्णि- 

वंरि्योकि साय जरासंधका वैर हे गया ॥ २६ ॥ 

भीष्मकं चरयामास नीथा च रुक्मिणीम्‌ । 

तां ददौ भीष्मकथापि शिद्युपाटाय वीर्यवान्‌ ॥ २७॥ 
जरासंधने सुनीथपुध्र दिद्पार्रे स्वि ही भीष्मके 

रुक्मिणीको मोगा था ओौर पराक्रमी भीष्मकने उसका रिश्य 

पाल्के स्यि वाग्दान कर दिया } २७॥ 


ततरचैयमुपादाय जरासंधो नराधिपः। 
ययौ विदर्भान्‌ सरहिचो दन्तवक््ेण यायिना ॥ २८ ॥ 
तव राजा"जयार्मधं अपने सहायक दन्तवक्चके साथ 
रिद्युपाख्को सकर षिदभं देशको गया ॥ २८ ॥ 
अुक्षातश्च पोण्डेण वाञ्जदेवेन धीमता । 
अद्गवङहकलिद्धानामीश्वरः स महावः ॥ २९ ॥ 
बुद्धिमान्‌ पौण्डूक वासुदेवे भी इस कार्यम जरासंधका 
अनुमोदन किया था 1 महाव्टी जराप अङ्ग-व्ग ओर 
कलिङ्ग देशका भी सम्राट्‌ था ॥ २९ ॥ 


मानयिष्येश्च तान्‌ रुक्मी प्रव्युद्धस्य नराधिपान्‌ । 
पर्या पृजयोपे्तास्ताच निनाय पुरी परति ॥ ३० ॥ 
सक्मीने उन नरेर्गोका सम्पान करनेके स्थि उनकी 
अगवानी की ओर अच्छे दंगे उनका श्वागत-सत्कार करे 
वह उन्द्‌ अपनी पुरीम ठे गया ॥ ३० ॥ 
पिदष्वसुः परियार्थं च रामकृष्णाबुभावपि ) 
प्रथयुदष्णयश्चान्ये रथेस्तच वखान्विताः ॥ ३९ ॥ 
वटराम ओर श्रीकृष्ण ये दोनो माई भी अपनी दुआकी 
प्रवन्नतके ्यि वर्ह गये । साय ही दूसरे वल्शाटी दृष्णि- 
वंशी वीर भी र्योद्धारा वहो पधार ॥ ३९ ॥ 
ऋथकैशिकभत तान्‌ भ्रतिगरद्य यथाविधि । 
पूजयामास पूजाहौन्‌ वदिश्चैव न्यवेदयत्‌ ॥ ३२॥ 
क्थकैशिक देदाके स्वामी भीप्मकने उन पूजनीय पुरष- 
करा विधिपूर्वकं पूजन किया ओर उन्दै बादर ही ठदराया ॥ 
श्वोभाविनि विवाहे च सकिमिणी निर्ययौ वहिः । 
चुर्युजा स्थेनैनद्रे देवतायतने द्युमे ॥ ३६ ॥ 
इन्द्राणीमर्ययिष्यन्ती कुतकौतुकमद्गला । 
दीप्यमानेन .चयुषा चेन महता दृता ॥ ३४ ॥ 
जवं विवाह कल होनेवाला था अर्थात्‌ जव उसके होने- 
मणक दी दिन रेष रह गयां थाः उस्र समय राजकुमारी 
सत्मिणी तत्कालोचित मङ्घलाचास्से सम्पन्न दौ अपने दीति- 


मान्‌ शरीस्ते युोभित होती हई सुन्दर देवाख्यम इन्द्राणी. 
की पूजा करनेके च्यि चार घोड़ंखि जते हपट र्थपर वैठकर 
येष्ठा नक्ष्रमे राजमहस्ते वाहर निकी } उस सप्रय वद 
विशार सेनष्वे धिरी इई थी 1 २२३-२४ ॥ । 
तां दद्चं तदा कृष्णो लक्ष्मीं साक्लादिव स्थिताम्‌ ` 
स्पेणाय्र्ेण सम्पन्नां देवतायतनान्तिके ॥ ३५॥ 
उस याचके समय देवमन्दिरं निकट परम युन्दर रूप 
से सम्पन्न साक्षात्‌ लकषमी-सी खड़ी हुई स्निमणीको भगवान्‌ 
भीकृष्णने देखा } ३५} ` 
बहेरिव दिखां दीं मायां भूमिगतामिव 
पृथिवीमिव गम्भीरामुत्थि्ता पृथिवीतखात्‌ ॥ ३६ ॥ 


वह प्रज्वलित हुई अग्निकी शिखाः पृरथ्वीपर उतरी हुई 
देवमाया तथा मूते उढी हुई गम्भीर खभाववाटी मूर्ति 
मती भूदेवीके समान जान पड़ती थी ॥ ३६ ॥ 
मरीचिमिव सोमस्य सौम्यां खरीविग्रहां सुवि । 
श्रीमिवाघ्यां विना पद्मं भविष्यां भ्रीसहायिनीम्‌। 
कृष्णेन मनसा दष्टं दुर्निरीक्ष्यां खुरेरपि ॥ ३७ ॥ . 
उसे देखकर ेसा प्रतीत होता थाः मानो वचन्द्रमाकी 
सौम्य किरण सुन्दरी नारीका स्प धारण करके पृथ्वीपर उतरी 
हौः विना कमल्की श्रेष्ठ लक्ष्मी हो अथवा भविष्य होनेवाटी 
ठष्ष्मीकी सदायिका दो ! देवताओंके चि भी जिषका दर्शन 
हीना अत्यन्त कठिन था, उस स्विंमणीको श्रीकृष्णने जी मर 
कर देखा ! २७ ॥ 
छयामावदाता सा दासीत्‌ पथुचावीयतेश्षणा । 
ताग्रौश्ठनयनापाङ्खी पीनोरुजघनस्तनी ॥ २८ ॥ 
उरुकी सोरे वर्षकी अवस्था थी 1 अङ्खौकी कान्ति 
गौरव्णंकी थी । उसके नेत्र बहुत ही मनोहर एवं विशाक 
ये ! ओठ तथा नयनोके प्रन्तमाग तविके समान खट ये | 
जोषः नितम्ब ओर स्तन मोटे एवं मांसल ॐ ॥ ३८ ॥ 
ददती चारुसवौङ्ी तन्वी शशिसितानना ) 
ताघ्रतुद्ननखी खश्चनीलकुञ्चितमूर्धेजा ॥ ३९ ॥ 
वहं पतले ओर खे कदकी खी थी । उसके सारे अङ्घ 
चदे ही मनोहर थे } उसका भख चन्द्रमकि समान मौर 
कान्तिते सुशोभित था । नख रार ओर ञिथे । महि 
सुन्दर तथा सिरके बार काठ ओर घराठे ये ॥ ३९ ॥ 
अत्यर्थं रूपतः कान्ता पीनश्रोणिपयोधसा ! 
तीकणशुक्कैः समोदन्तैः पभासद्धिररुछृता ॥ ४० ॥ 
वह रूपकी दष्टिते अत्यन्त कमनीया थी । उसके नितम्ब 
ओर उरोज पौन ( उमरे हृष ) थे । वह तीक, दवेत, 


वेगवर जमे हए ओर उमक्ीरे दोसे सुदोभित होती 
थी ॥ ४० ॥ 


11 


श्रीमष्टाभारते खिरुभागे 


[ शरिवंशे 


५ 


अनन्या प्रमदा छोक्रे रूपेण यदास ्चिंया । 
रुफिमणी रूपिणी देवी पाण्डुरष्तौमवासिनी ॥ ४१॥ 
रूपः यश॒ ओर शोभाकी दष्िसे संसारे दूसरी कोई 
युक्ती उसके समान नदद थी । उज्ज्वल रेशमी साडी पने 
हए राजकुमारी रुक्मिणी रूपवती देवी-सी जान पड़ती 
श्री ॥ ४१ ॥ ॥ 
तां दष्ट वद्धे कामः रष्णस्य प्रियशछौनाम्‌ । 
हविषेवानलस्यार्चिमैनस्तस्यां समादधत्‌ ॥ ४२ ॥ 
जसे घीकी आहुति डलनेसे अग्निकी ज्वाला प्रज्वलित 
हो उरती है उसी प्रकार उस प्रियदर्शना राजकन्याको देख- 
कर श्रीकृष्णकी उसे पानके व्यि कामना व्रहुत वद मयी | 
उन्दने अपना दय उसीपर निकछाबर कर दिया ॥ ५४२ ॥ 


रमेण सद्‌ निश्चित्य केशवस्तु महावलः । 
तत्प्रमाथेऽकसोद्‌ बुद्धि बरष्णिभिः प्रणिधाय च ॥ ४२॥ 
तदनन्तर महाबली श्रीकृप्णने दृप्णिवंरिर्येके साथ सलाह 
ओर व्रलरामजीके साथ कर्तव्यका निश्चय करके सिमिणीको 
ह्र लेनेका विचार किया.॥ ४३ ॥ 
छते तु देचताकाये निष्क्रामन्ती सुराख्यात्‌ । 
उन्मथ्य सदसा ङष्णः स्वं निनाय रथोत्तमम्‌ ॥ ४९ ॥ 
इतनेम दी देवपूजाका कार्यं सम्पन्न करके सुकिमणी देवा- 
ख्यसे निकलने लगी । उसी समय शरीक्ष्णने सहसा पहुंचकर 
उसे गोदमे उठा लिया ओर अपने उत्तम रथपर पर्चा 
दिया ॥ ४४ ॥ 
चक्षमुत्पास्य रामोऽपि जघानापततः परान्‌ 1 
समनद्यन्त दाशदौस्तदाष्षतताश्च सर्वश्चः ॥ ४५॥ 
इधर बर्रामने भी एक पेड उखाडकर आक्रमण करने- 
वाले शत्रुओंका उसीप्े संहार कर डाला | उस समय बल- 
रामको आज्ञा पाकर समस्त यदुवंशी वीर गुद्धके व्ये 
कमर ककर तैयार दो गये ॥ ४५ ॥ 
ते स्थैर्विविधाकारैः समुचरतमदाध्वमैः । 
चाजिभिवारणेश्चैव पस्विन्रकायुधम्‌ ॥ ७६॥ 
वे ऊँचे एवं विगार ष्यति युक्त भेति-भेतिफे थोः 
घोड़ों ओर हाथियोद्वारा बलरामजीको चास अओरसे बरेरकर 
खड हो गये | ४६ ॥ 
आदाय सक्रिमर्णी ष्णो जगामाशु पुरीं प्रति ! 
समे भारं तमासस्य युशुधाने च चीयंवान ॥ ९3 ॥ 
वककान्‌ श्रीकृष्ण युद्धका सारं भर्‌ व्रख्राम तथा 
सात्यकिपर छोड़कर सकिपर्णको साथ ठे जी ही द्वारकापुर. 
को चर दिये | ४७ ॥ 
अक्रूरे विपथो चैव गदे च ऊतवर्मणि। 
चक्रदेवे, खदेवे च सारणे च महावले ॥ ४८॥ 


णि 


निदृत्तदाचौ विक्रान्ते भङ्गकारे विदुस्थे। 
उग्रसेनात्मजे कट्टर शतधुख्े च केदावः ॥ ४९॥ 
रजाधिद्रेवे शृदुरे भरसेने चि्के तथा। ,. 
अतिदान्ते धृदद्‌ दुगे श्वफट्के सत्यकरे पथो ॥ ५०॥ 
चृष्ण्यन्धक्रेषु चान्येषु प्ुख्येघु मधुसद्रनः। 
गुरुमासन्य तं भारं चयो द्वारवती प्रति ॥ ५९॥ 
मधुसूदन श्रीकृप्णने युका वह गुरुतर भार ( बलसम 
ओर मात्यकिकैः सिवा ) अग्रूरः विष्रधु, गदः कृतवर्मा, चकत 
देव; सुदेव; महावली सारणः निवृत्तयानरु, पराक्रमी मङ्गकार 
विदूरथः उग्रतेनकुमार कष्ट, शतदयुम्नः राजाधिदेकः ग्रदुरः 
प्रसेन, चित्रकः अतिदान्तः बृहद्दर्भः श्वफल्कः सत्यकः प्रु 
तथा अन्यान्य बृण्णि ओर अन्धक्वंदयके प्रमुख वीर्योपर रख- 
कर दारकापुरीकी ओर प्रस्थान किया ॥ ४८-५१ ॥ 
दन्तवक्रो जरासंधः शिद्युपारश्च चीर्य॑वान्‌ । 
संनद्धा निर्ययुः कद्धा जिधांखन्तो जनार्दनम्‌ ॥ ५२॥ 
उधर दन्तवक्त्र, जरासंध ओर पराक्रमी शिशुपाल कवच 
धकर श्रीकृप्णक मार डाटनेकी इच्छते क्रोधर्मे मरे हुए 
निके ॥ ५२ ॥ 
अद्गवद्धकलिद्ैशच सार्ध पौण्डश्च वीर्यवान्‌ । 
निर्ययौ चेदिराजस्तु भ्राठभिः स मदास्थैः ॥ ५२॥ 
परक्रमी चेदिराज रि्युपार अङ्गः वङ्ग, कलिङ्ग ॒तथा 
पुण्ड्देक्रीय वयोद्धा्ओ ओर अपने महारथी भादयोकि साथ 
युद्धके व्यि निकल ॥ ५३ ॥ 
तान्‌ प्रत्यगर्णन्‌ संरन्धा घुप्णिवीया महार्थाः । 
संक्णं पुरस्कृत्य वासवं मरुतो यथा ॥ ५४॥ 
उस समय रोपर भरे हुए वृष्णिवंगकरे महारथी वीरोने 
जसे देवता इन्द्रको आगे रखते दैः उसी प्रकार वल्यमजीको 
अगे करके उन ममस्त दघनु्ओको आगे बद्नेसे रोक 
दिया ॥ ५४ ॥ 
आपतन्तं हि वेगेन जरासंधं महाबलम्‌ । 
पडपिर्विव्याध नाराचैभुयुधानो महपघे ॥ ५५ ॥ 
उस महासमरमं वेगसे आमे बटते हुए महातव्रटी जरासंधः 
च माय्यक्रिने छः नारानचेने मारकर शरावल कर दिया ॥५५॥ 
अक्रसे दन्तवकचं तु विव्याध नवभिः शरैः । 
तं प्रत्यविद्धत्‌ कारूयो वाणेर्दसभिराश्ुरः ॥ ५६॥ 
अक्रमे दन्तवक्तरको नो वाग्रे वेध दिया तवर करूप 
राज दन्तवक्न्ने दस दीघगामी वागेद्राय अक्रूरो मी रवीध- 
कर ब्रदला चुकाया ॥ ५६ ॥ 
विपृथुः चिद्युपालं तं ररैचिन्याध स्तमिः। 
अष्टभिः परत्यविद्धचत्‌ तं शिद्युपालः प्रतापधान्‌॥ ५७ ॥ 


विष्णुपर्व ] 


पकौनधष्टितमो ऽध्यायः 


८७ 


=== 


विप्रधुमे सात ्रार्णसि गिष्धुपाको घायल कर दिया तव 
प्रतापी रिश्युपालने आठ बरा्णेसि विप्रथुको क्षत-विश्चत कर 
दिया ॥ ५७ ॥ 
गवेषणस्तु चेयं तु प्रडभिर्विव्याध मार्गणः 
अतिदएन्तस्तथाण्भिवदद्‌दुरगश्च पञ्चभिः ॥ ५८ ॥ 
तत्र गवेषणने छः, अतिदान्तने आठ यर ृदूदुरगने पोच 
वार्ण चेदिराज शिड्पाकको गहरी चोट पर्हुचायी ॥ ५८ ॥ 
प्रतिविव्याध ताश्चे्ः पञ्चभिः पञ्चभिः रारे; । 
जघाना्वाश्च चतुर्धतुभिर्विप्रथोः शरेः ॥ ५९ ॥ 
शिद्युपाल्ने भी उन स्वको पोच्पोच वाण मारकर 
बदला चुकाया ओर चार वार्णोसि वि्रथुके चारों घोदौको मार 
डाला ॥ ५९ ॥ 
दृदद्दुग॑स्य भरलेन शिरश्िच्छेद चारिहा । 
गवेषणस्य सूतं तु प्राहिणोद्‌ यमसादनम्‌ ॥ ६० ॥ 
हताद्वं तु रथं त्यक्त्वा बिपृथुस्तु महावखः। 
आरुरोह स्थं शीघ्रं बृहद्‌ दुगेस्य वीयंवान्‌ ॥ ६१ ॥ 
इतना ही नही, शत्रुसूदन रिष्धुपाल्ने एक भस्लसे 
बृहददुर्गका सिर काट लिया ओर गवेषणके सारयिको यमलोक 
पर्चा दिया । तव महावली एवं पराक्रमी विप्थु अपने अश्व- 
हीन स्थको त्यागकर शौ ही बृहदूटुगंके रथपरजा 
चदे ॥ ६०-६१ ॥ 
विपृथोः सारथिश्चापि गवेषणरथं टद्ृतम्‌ । 
आरा जनानन्वान्‌ नियन्तुमुपचक्रमे ॥ ६२ ॥ 
विष्रथुका सारयि भी तरत हयै गवेषणके रथपर जा वैटा 
ओर उसके वेगशाली घोडोको कावूमे रलनेकी चेष्टा कसे 
ख्या ॥६२॥ 
ते कृद्धाः रशारव्पेण सुनीथं समवाकिरन्‌ । 
तरत्यन्तं रथमागेधु चापदस्ताः कलापिनः ॥ ६३ ॥ 
फिरतोवेक्रुपित दहो धनुष सौर वाण हाथमे लेकर रथ- 
मागोपर द्य-सा करते हुए सुनीथयुच्न रिद्पाख्पर वार्णोकी 
बोखार करने स्मो \ ६३ ॥ 
चक्रदेबो दन्तवक्धं विभेदोरसि पिष । 
पड्रथं पञ्चभिश्चैव विव्याध युधि मामः ॥ ६४ ॥ 
चक्रदेवने पंखवटे बाणसे मारकर दन्तवयत्रकी छाती 
छेद डरी । फिर पोच वाणेदयारा उन्दने युद्धपे पडस्थको 
भो घायल कर दिया ॥ ६४ ॥ 
ताभ्यां स विद्धो दशभिर्वणैतमापिगैः शिरः । 
ततो बरी चक्रदेवं विभेद दशभिः शरेः ॥ ६५ ॥ 
तच उन दोनेनि भी पैनी धारवाके दस मर्मभेद त्राणे दारा 
चक्रदेवको गहरी चोट पर्टुचाया । फिर जिशचुषात्परे भार 
अलीने भी चक्रदेवक्रो दस बाण मारे ॥ ६५ ॥ 


पञ्चभिश्चापि विव्याध सोऽपि दुराद्‌ विदूरथम्‌ । 


-विदूरयोऽपि तं पड्भिर्विन्याधाजौ दितः दरः ॥ दद ॥ 


तसश्वात्‌ उने दूर्वे छ पोच वाण मारकर विदूरथको 
भी घायल कर दिया । विदूरथने भी छः पैने बाण मारकर 
युद्धे चरीको आदित कर दिया ॥ ६६ ॥ 


धिता प्रत्यविध्यत्‌ तं वली वाणेमेष्टावलम्‌ । 
कृतवमौ विभेदाजौ राजपुत्रं निभिः उरः ॥ ६७॥ 
न्यहनत्‌ सारथि चास्य ध्वजं चिच्छेद सोच्दूतम्‌ । 

तव बीन महावरी विदूरथको बदलें तीस वाण मरे । 
दूसरी ओर कतवमाने युद्धम पौण्डुक बासुदेवके पुत्रको तीन 
वारणे घायठं कर दिया । साथ दी उसके सारथिको भी मार 
डाल ओौर ऊँचे ध्वजको कार भिराया | ६७१ ॥ 


भ्रनिविन्याध तं कृद्धः पण्डः पड्भिः दिरीसुखेः ॥६८॥ 
धुशिच्छेद्‌ चण्यस्य भस्टेन ऊतवमेणः 

तव क्रोधमे भरे दए पौण्डूने छः याण मारकर यदला 
चुकाया ओर एक भले ृतवर्माका धनु भी काट दिया ॥ 
निवत्तशन्ुः कालिङ्गं विभेद निशितैः शरेः । 
तोमरेणांखदेशे तं निर्विभेद कलिङ्गरा्‌ ॥ ६९॥ 

निष्त्तश्ुने वहुत-से पैने वाण मारकर कलिङ्गराजको 
वीध डाल | तव कलिङ्गशजने एक तोमरका प्रहार करके 
उसके कधेपए्र घाव कर दिया ॥ ६९ ॥ 


गजेनासाय कङ्कस्तु गजमद्भस्य वीर्यवान्‌ । 
तोमरेण विभेदाङ्ं वियेदाङ्गग्च तं रारैः ॥ ७०॥ 
पराक्रमी कद्भने हाथीके द्वारा आक्रमण करके अङ्गराजकरे 
हाथी ओर अङ्गराजकौ भौ तोमरसे धायरू कर दिया | तव 
अङ्गराजने भी अनेक वाणेद्वास कङ्ककी चोर पर्हुचायी ॥७०॥ 
चिज्रकश्च श्वफतकश्च सत्यक्श्च महारथः 
कलिद्गस्य तथानीकं ना्चैर्विभिदुः शतैः ॥ ७९॥ 
उधर चित्रकः श्वफल्क ओर मदारथी सत्यकने कलि 
राजी सेनाको सौ नायचेसि मारकर विदीर्ण कर डांस } 
तं निख्द्रमेणजौ वद्धराजस्य कुञ्चरम्‌ । 
जघान रामः संक्घदधो वद्गराजं च सयुगे ॥ ७२ ॥ 
तदनन्तर क्रोधमे भरे हुए वरुरामने एकं पहीन दृष्चके 
दरार युद्धखस्मे वङ्गराजके हाथी ओर वदङ्गराजको भी काट्के 
गार्मे मेज दिया ॥ ७२॥ 
तं दत्वा स्थमाच्द्य धञुरादाय चीयंवान्‌ । 
संकपणो जधानोधेनौरचेः कैशिकान्‌ वहून्‌ ॥ ५३ ॥ 
वक्घराजक्रा वध करफे पराक्रमी संकर्पणने धनुप हाने 


ठे स्थपर आरूट्‌ हो भयक्र नाराचंदवारा बहुत-ते कैरिको- 
के] सदार कर डाल | ७३ ॥ 


४४८ - ` 


श्रीम्टाभारते खिखभागे 


[ हरिवंशे 


षड्भिर्निहत्य कारूषान्‌ महेष्वासान्‌ स वीर्यवान्‌ । 
शातं जघान संक्ृद्धो मागधानां मावरे ॥ ७४॥ 
अत्यन्त कुपित हु्ट॒पराक्रमी वकरामने छः वार्णेति 
करूष देशके उनेक महाधनुर्धयोका वध करके मागर्पोकी 
विशाल सेनारमेसे सौ चुने हुए. वीर्यौको यमलोक पर्हुचा दिया॥ 
निहत्य तान्‌ मष्टावाहु्जरासंधं ततो ऽभ्ययात्‌ 1 
तमापतन्तं विव्याध नाराचैमौगधसिभिः ॥ ७५॥ 
उन सवका संहार करफे महाबाहु बल्यामने जरासंधपर 
धावा क्रिया । अपनी ओर अति हुए वलरामको मगधराजने 
तीन नारा्चेसि घायल कर दिया ॥ ७५ ॥ 
तं विभेदाटभिः ह्द्धो नारचेुंसलायुधः। 
चिच्छेद चास्य भल्लेन ध्वजं हेमपरिष्छतम्‌ ॥ ७६ ॥ 
तव मूसखूधारी वल्देवने कुपित ह्यो आठ नाराच 
जरासंधको क्षत-विष्षत कर दिया ओर उसके सुवर्ण 
भूषित ध्वजको एक भदे काट गिराया ।[ ७६ ॥ 
तदू युद्धमभवद्‌ घोरं तेषां देषाखुरोपमम्‌ । 
सृजतां शरवर्षाणि निघ्रतामितरेतरम्‌ ॥ ७७ ॥ 
वार्णोकौ वृष्टि करते ओर . एक-दूखरेको मारते हुए उन 
वीरोमिं देवायुससंग्रामके समान घोर युद्ध दोने ल्गा ॥ ७७॥ 


गजैर्गजा हि संक्रदधाः -संनिपेतः सदख्दाः 

रथे रथाश्च संरब्धाः सादिनश्चापि सादिभिः ॥ ७८॥ 
क्रोध मरे हुए सदसो हाथी दायियेतिः रथ र्थेसि जर ' 

रोषविद्यसे युक्त घुढसवार घुडसवारोति मिड़ गये ॥ ७८ ॥ 

पदातयः पदार्वीश्च शक्तिचमौसिपाणयः। 

छिन्दन्त्चोत्तमाङ्गानि विचेख्यंधि ते पथक्‌ ॥ ७९ ॥ 
हा्थमि शक्तिः ढा भौर तल्वार च्ि हुए पैदल वीर 

वेदरषि जुह्ञते ओर उनके मस्तक काटते हए युद्धम एयक्‌- 

एक्‌ विचेरने रगे ॥ ७९ ॥ 

असीनां पात्यमानानां कवचेदु महास्वनः । 

हाराणां पततां शाष्द्‌ः पक्षिणामिव शुश्वुवे ॥ ८०॥ 
कवर्चोपर गिरायी जाती हुई त्वार्यो ओर गिरते दए 

वार्णोका महान्‌ शन्द पक्षिर्योके चहचहानेके समान सुनायी 

पडता था | ८०॥ 

भेरीदाङ्घ्डदङ्ानां वेणूनां च गधे ध्यनिम्‌। 

जुगूह घोषः शास्नाणां ज्याघोषश्च मष्टात्मनाम्‌ ॥ ८१॥ 
युद्धख्मे महामनसी वीर्यीकी परत्यक खीचने ओौर 

शकि यकरानेका शब्द भेरी, ङ्ख, मृदङ्ग ओर वेणु्भकी 

ध्वनिको आच्छादित करदेता था | ८१ ॥ 


इति श्रीमहाभारते िरभागे हरिवंशे विष्णुपवंणि स्किमणीषटरणे एकोनपष्टितमोऽध्यायः ॥ ५९ ॥ 
इस प्रकार श्रामहाभारतते दिमाग दरिवंशके अनतत विम्णुपवमे समिमणीहरणनिषयक उनसर अध्याय पूर हुमा ॥ ५. ॥ 


षष्टितमोऽध्यायः 


भ्रीङृष्णद्वारा रुकपीकी पराजय तथा रुक्मिणी आदिके साथ श्रीटृष्णका 
विवाह एवं उनसे उत्पन्न हद संतानोंका संधिप्ठ परिचय 


वैशम्पायन उवाच 
कृष्णेन हियमार्णां. तां रुक्मी श्रुत्वा तु रुकिमिणीम्‌ । 
प्रतिक्षामकरोत. कुद्धः समक्षं भीष्मकस्य ह ॥१॥ 
वैशम्पायनजी कहते ह --जनमे जय ! खकमीने जव सुना 
कि श्रीकृष्ण सकिमणरीको हरकर च्ि जा रहे है, उसने कुपिते 
होकर भीष्मक्के सामने ही यह प्रतिज्ञ की ॥ १॥ 
सक्म्युवाच 
अहत्वा युधि गोचिन्दमनःनीय च रुक्मिणीम्‌ । 
कुण्डिनं न भ्वेक्ष्यामि सत्यमेतद्‌ ब्रवीम्यहम्‌ ॥ २ ॥ 
रुक्मी वोटा-म युद्धे श्रीङृप्णका वध क्रिय व्रिना 
त्था सविंमणीको वापस खये विना कुण्डिनपुरमे प्रवेश नहीं 
करंगाः वट्‌ मै सत्य कता हू ॥ २॥ 
आस्थाय स रथं वीरः समुदध्र्ुघध्वजम्‌ | 
जयेन प्रययौ क्रुद्धो वेन मता यवः ॥ २ ॥ 


सी प्रतिज्ञा करके क्रोधर्मे भरा हृभा वीर सक्मी 
प्रचण्ड आयुध ओर ऊँचे ध्वजते सुसोमित रथपर आरूद्‌ 
हो विशाल सेनके साथ वड़े वेगसे अगे बदा ॥ ३॥ 
तमन्वयुगेपादचेव दक्षिणापथवतिनः । 
क्राथौ ऽद्माश्द्ुतवौ च वेणुदारिशच वीर्यवान्‌ ॥ ४ ॥ 
भीष्मकस्य सखतश्ान्ये रथेन रथिनां वराः 
ऋ फ दिक्ुख्य्च सवं पव महारथाः ॥ ५ ॥ 

उसके पीछे दक्षिण भारतके वहते नरेशः क्रथपुत्र 
अद्यमान्‌, श्चुतर्वां तथा पराक्रमी वेणुद्‌रि भो चले । मीप्मकके 
अन्य पुत्र भीः जो रथ्यम शरेष्ठ येः रथके द्वारा रक्मीकं 
साथ गये | क्रथकैदिकदेशके सभी यख्य महारथिरयेनिं भी 
सक्मीका साथ दिया ॥ ४-५ ॥ 
ने गत्वा ' दुरमध्वानं सरितं नमंदामयुं । 
गेषिन्द्‌ द्ददः कृद्धाः खटेच प्रियया स्थितम्‌ ॥ 


बिष्पवं | 


षष्टितमो ऽभ्यायः 


४४९. 


उन सबने दुरतक रास्ता ते करके नर्मदा नदीके किनि 
अपनी प्रियतमा िमिणीफे साथ रथपर वैठे हुए श्रीङ्भ्णको 
क्रोधपूरवक देखा ॥ ६ ॥ 
अषस्थाप्य च तत्सैन्यं सक्रमी मद्वरन्वितः । 
चिकीुदवैरथं  युद्धमभ्ययान्मधुखूदनम्‌ ॥ ७ ॥ 
सक्मीको अपने बख्का बड घमंड था | उसने अपने 
साथ आयी ह सारी सेनाको एक जगह खडी करके दरथ 
युद्ध करनेकी इच्छसि स्वयं ही भगवान्‌ मधुसूदनपर आक्रमण 
किया ॥ ७॥ 
स विन्याध चतुःपष्टधा गोविन्दं निदितैः शरेः । 
तं प्रत्यविध्यत्‌ स्त्या वाणैयुधि जनार्दनः ॥ < ॥ 
उसने चौसठ पैने बाणोंसे धीकृष्णको वीध डात्म । तब 
जनादंनने भी समरम सत्तर बाण मारकर खक्मीसे बदल्म चुका 
व्यि ॥ ८ ॥ 
यतमानस्य चिच्छेव्‌ भ्वजं चास्य महावलः । 
जहार च रिरः कायात्‌ सारथेस्तस्य वीर्यवान्‌ ॥ ९ ॥ 
मषाब्रली ओर पराक्रमी श्रीकृष्णने विजयके लि प्रयत्न- 
शीर रक्मीके ध्वजको काट डाखा तथा उसके सारथिके सिरको 
धडुसे काट च्या | ९॥ 


तं छृच्छरूगतमाक्षय परिवनरजेनादेनम्‌ । 
दाक्षिणात्या नि्धांसन्तो राजानः सवे एवि ॥ १०॥ 
उसे संकटे पड़ा जान दक्षिण दिद्ाके समस्त राजानि 
भीङृष्णको मार डालनेकी इच्छा रखते हुए उदे चारौ ओर 
सेषेरल्िया॥ १०॥ 
तमम॑श्यमान्‌ महावाहुर्विन्याघ दाभिः शरेः । 
श्ुतवौ पञ्चभिः छदधो वेणुदारि् सत्तभिः ॥ ११॥ 
महावराह अंञ्यमाचूमे दसः श्रुत्वानि पोच ओर क्रोधमे 
भर हए वेणुदासिने सात बाणोसे उन्हे धायल कर दिया ॥ 
ततोऽश्युमन्तं गोविन्दो विभेदोरसि वीर्यवान्‌ । 
निषसाद्‌ रथोपस्थे व्यथितः स नराधिपः ॥ १२॥ 
तव पराक्रमी गोविन्दने एक वाणे अंद्यमानकी छाती 
छेद टी । इसे व्यथित होकर राजा अंशुमान्‌ रथके पिले 
मागमे जा वैठा ॥ १२॥ 
छत्वंणो जघधानादवाश्चतुभिश्चतुरः शरेः । 
पेणदारेष्व॑जं छित्वा मुजं चिन्याध दक्षिणम्‌ ॥ १३॥ 
तत्पश्चात्‌ भ्रीकृष्णने चार वाणे श्रुतवकि चारो धोोंको 
मार दाल ओर वेणुदारिकी ध्वजा काटकर उसकी दादिनी 
वोहमे गहरी चोट प्टुचायी ॥ १३ ॥ 
तथैव च श्रुतवौणं शरै्विव्थाथ पञ्चभिः । . 
रिभनिये सध्वजं शान्तो न्यषीदच्च व्यथान्वितः ॥ १४ ॥ 


म्ण ९५- 


[कथका नानानना = = 


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इसी प्रकार श्ुतर्वाको मी पोच वारणेसि घायल कर दिया। 
शरुत्वा व्यथासे पीडित हो ध्वजका सहारा ठे शान्त शे- 
कर वेड गया ॥ १४॥ 
मुञ्चन्तः शरवर्षाणि वासुदेवं ततोऽभ्ययुः । 
क्रथकैदिकमुख्याश्च स्व॑ पव महारथाः ॥ १५॥ 
तत्पश्चात्‌ क्रथकैरिक देदकरे सभी मुख्य महारथी वाणो 
की वषा करते हूए भगवान्‌ श्री्प्णपर चद्‌ अये ॥ १५ ॥ 


बाणेबीणांश्च. चिच्छेद तेषां युधि जनादंनः । 
जघान चैषां संरब्धः पतमानांश्च ताञ्छरान्‌ ॥ १६॥ 
श्रीकृष्णने युद्धखल्मे अपने बाणोद्रारा उन सवके बाण 
काट डे तथा रोषवेशमे भरकर उन्दोनि शुक उन गिरते 
हृष बार्णको नष्ट कर दिया ॥ १६ ॥ 
पुनरन्यांश्चतुःषष्टधा जघान निरितेः शरेः । 
करद्धानापततो वीरानद्रिवत्‌ सं महावलः ॥ १७ ॥ 
पर्वेतके समान अविचल भावसे खड़े हए उन महाबली 
श्रीक्रष्णने पुनः चौंखठ वैने वार्णोद्रारा क्रोधमे भरकर अपने- 
पर आक्रमण करनेवाले शतरुपक्षके अन्य वीर्यौको मार 
गिराया ॥ १७ ॥ 
विद्रुतं खव दष्ट सक्मी क्रोघकशंगतः । 
पञ्चमिरनिंहितैबीणेरविव्याधोरसि केशवम्‌ ॥ १८॥ 
अपनी वेनाको मागती देख सक्मी करोधके वशीभूत हो 
गया 1 उसने पोच तीखे बार्णेसि शीङृष्णकी छार्तीमि गहरी 
वोट पर्हुचायी ॥ १८ ॥ 
सारथि चास्य विव्याध सायकैर्निशितेकिभिः। 
आजघान शरेणास्य ध्वजं च नतपर्वणा ॥ १९ ॥ 
साथ ही तीन पने सायकेसे उनके सारथिको भी धाय 
कर दिया ओर छक हुई गोठबाले एक प्राणसे उनके धवज- 
पर भी आधात क्रिया ॥ १९ ॥ 
केशवस्त्वरितं दष्टा करद्धो विन्य्ध मगणः । 
धनुश्चिच्छेद चाप्यस्य यतमानस्य रक्िमिणः ॥ २०॥ 
सुक्मीको रीघ्रतापूर्वक वाण मारते देख श्रीकृष्ण कुपित 
हो उठे 1 उन्हौनि अपने वाणोते स्कमीको धायल कर दिया 
ओर विजयके चि प्रयत्नशील हुए सक्मीके धनुषको भी 
काट डाला ॥ २० ॥ 
अथान्यद्‌ धनुरादाय सकषम कष्णजिघांसखया । 
प्रादुश्चकार चान्यानि दिन्यान्यस्ाणि वीर्यवान्‌ ॥ २१॥ 
फिर तो पराक्रमी सक्मी दूसरा धनुष हाथमे ठेकर श्री. 
कृष्णको मार डाख्नेकी इच्छाते दूरेदुसरे दिव्याल्न प्रकट 
करने ल्गा ॥ २१ ॥ 
असरैरख्राणि संवायं तम्य क्ष्णो महावलः ! 
पुनश्चिच्छेव तच्चापं रथेषां च चिभिः शारः ॥ २२॥ 


| #, 


भीमहाभारते सिलभागे 


[ हरिवंशे 


महावटी भीङृष्णने अपने अर्खेदरारा उसके अर्स्रोका 


निवारण करके पुनः तीन वाणौद्रारा उसके धनुष ओर रथके 

हरसेको काट डाला ॥ २२॥ 

ख च्छिन्नधन्वा वचिर्थः खडगमादाय चर्म च 

उत्पपात रथाद्‌ वीरे गर्त्मानिव वीर्यवान्‌ ॥ २३ ॥ 
धनुष कट जानेपर रथदहीन हआ पराक्रमी वीर स्क्मी 

हाथमे ढाल ओर तलवार केकर उस ट्टे स्थसे गरुडकी भोति 

कूद पड़ा ॥ २३॥ 

तस्याभिपतनः खड्गं चिच्छेद युधि केशवः 

नाराचैश्च जिभिः क्द्धो विभेदैनमयोरति ॥ २४॥ 
युद्धम अपने सामने अति दए सक्मीकी तल्वारको श्री- 

कृष्णने काट डाल ओर कुपित होकर तीन नाराचेसि उसकी 

छाती छेद डाली ॥ २४ ॥ 

सख पपात महावादुर्वछ्धामयुनादयन्‌ । 

विखंक्ञो मूर्तो राजा वज्रेणेव मश्चस्ुरः ॥ २५॥ 
तवर संशाय्यूत्य हआ मदावाह राजा सक्मी प्रथ्वीक्रो परति- 

ष्वनित करता हज मूच्छित दोकर गिर पड्धा; मानो कोर 

महाच्‌ असुर व्ञसे मारा गया हो ॥ २५ ॥ 

तांश्च रक्षः दारैः सवौन्‌ पुनर्विव्याध माघवः । 

रुक्मिणं पतितं दष्टा व्यद्रवन्त नराधिपाः ॥ २६॥ 


तदनन्तर माधवने पुनः अपने बार्णोदवारा उन सव नरे 


को घायल करना आरम्भ किया । सक्मीको धराशायी हआ 
देख सव नरेश भाग खडे दए ॥ २६ ॥ 


बिचेष्टमानं तं भुमौ भ्रातरं वीक्ष्य सकरिमणी । 
पादयोन्यंपतद्‌ विष्णोश्रौतुर्जावितक्राङ्क्षिणी ॥ २७॥ 

अपने भार्ईको भूमिपर छटपराति देख उसके जीवनकी 
इच्छा रखनेवाडी रुक्मिणी मगवान्‌ श्रीकृष्णके वैरोपर गिर 
पड्धी ॥ २७॥ 


तामुत्थाप्य परिष्वज्य सान्त्वयामास केडावः। 

अभयं सकिमिणे दसा प्रययौ खपुर ततः +, २८॥ 
तवर भगवान्‌ श्रीकृष्णे उसे उठाकर ददयस ख्गा 

च्या ओर भटीमोति सान्त्वना दी । फिर स्वमीको अभव 

देकर वे अपनी पुरीको चले गये ॥ २८ ॥ 

बृष्णयोऽपि जरासंधं भङकत्वा तांश्चैव पार्थिवान्‌ । 

प्रययुद्धीरकां ठः पुरस्कृत्य हखायुधम्‌ ॥ २९॥ 
बृष्णिव्ी मी जरासंध तथा उन राजाओंको परे हय 

कर ्षसे उस्लसित हो व्रकरामजीकरो अगे करे द्वारकापुरी- 

की ओर चल दिये ॥ २९॥ 

प्रयाते पुण्डरीकाक्चे श्वुतवौभ्येत्य संगरे । 

सक्मिणः स्थमासेण्य भरययो भवां पुरी प्रति ॥ ३०॥ 


कमरनयन श्रीकृप्णकरे चले जानेपर श्रुत्वा रणमभूर्िभे 
आया ओर सदमीको रथपर ग्रिटाकर अपनी पुरीकी ओर ॐ 
चला} ३० ॥ 


अनानीय सखसारं तु ख्कमी मानमदान्वितः। 

हीनप्रतिक्षो नैच्छत्‌ स प्रवेष्टुं कुण्डिनं पुरम्‌ ॥ ३१॥ 
अभिमान यर मदसे उन्मत्त रहनेवाला सक्मी अपनी 

ब्रदिनको लीयकर न स्म मकाः इसय्यि उसकी प्रतिक्ञा मङ्ग 

दो गयी । इरीसे उसने कुण्ठिनपुरमं प्रवेद केकी इच्छा 

न्दी की ॥३१॥ 

विदर्मँषु नित्रासा्ं निमेमेऽन्यत्‌ पुरं मत्‌ । 

तद्‌ भोजकटमित्येव वभूव शुवि विश्वुतम्‌ ॥ ३२॥ 
उसने विदं देशम अपने रहनेके च्य दुसरे विद्याल 

नगरका निर्माण किया; जो दस भूतल्पर भोजकटके नामे 

विख्यात हुआ ॥ ३२ ॥ 


तघ्रौनसा मष्टातेजा दक्षिणां दिश्यमन्वगाच्‌ । 
भीष्मक्रः कुण्डिने चैव राजोवास मद्दाभुजः ॥ ३३॥ 

उस महातेजस्वी वीरने वर्ह वल्पूर्वक रहकर दक्षिण 
दिशाका शासन किया ओर महाबाहू राजा मीप्मक कुण्डिन- 
पुरम रहने रगे ॥ ३३ ॥ 


द्वारकां चापि सम्प्राप्ते रामे दृष्णिवलान्विते । 
रुक्षिमिण्याः केश्वः पाणि जग्राह विधिवत्‌ प्रयुः॥ ३४ ॥ 
वृप्णिवंशिर्योकी सेनाके साथ जव ॒व्रख्रामजी द्वारकामे 
पहुचे, तश्र मगवान्‌ श्रीृष्णने विधिपूर्वंक सक्मिणीका 
पाणिग्रहण किया ॥ ३४ ॥ 
ततः स्ट तया रेमे प्रिया प्रीयमाणया । 
सीतयेव पुरा रामः पौलोम्येव पुरंदरः ॥ ३५॥ 
रवका् जेते भरीरामचन्द्रजी सीता ओर देवराज इन्दर 
पुलोमकरुमारी शाचीकरे,साथ सानन्द रमण क्रते धेः उसी 
प्रकरार भगवान्‌ श्रीक्प्ण प्रसन्न हुई प्रिय पत्नी रक्मिणीके साथ 
रमण करने लो ॥ ३५ ॥ 


सा हि 'तस्याभवनञ्ज्येषठा पत्नी छष्णस्य भामिनी । 
पतिव्रता गुणोपेता रूपदीखयुणान्विता ॥ ३६॥ 
वह श्रीङृष्णकीं ज्येष्ठ पत्नी थी । भामिनी सकरिमिणी पतिः 
व्रताः खदूगुणवतीः रूपवती, सुशीला तथा अन्यान्य उत्तम 
गु्णोसे खम्पन्न थी ॥ ३६ ॥ 
तस्यामुत्पादयामास पुत्राम्‌ दख मदारथान्‌ ! ` 
चारुदेष्णं सुदेष्णं च धयुश्चं च म्टावलम्‌ ॥ ३७॥ 
सुपेणं चारुगु्तं च चारुवाहरुं च वीर्यवान्‌ । 
चारुचिन्दं सुचारं च भद्रचारं तथेव चं ॥ २८॥ 
चारं च वकिनां श्रेष्टं सुतां चारुमतीं तथा । 
धमौ्थकुशलास्ने तु छृतास्रा युद्ध दुर्मद: ॥ ३९ ॥ 


विष्णुपवं ] 


बल ओर परक्रमते युक्त श्रीङप्णने रकमिणीके गर्भसे 
दस पराक्रमी पुत्र उत्पन्न किये; जिनके नाम इत प्रकार 
है-वाददेष्णः सुदरेष्णः मदव्रली पुन्न सुपण चास्गुषचार्वाहुः 
चाषविन्दः सुचारः भद्भ्वास तथा वल्वार्न्मे श्रेष्ठ चार । 
इनके धिवा एक कन्याको ` भी उन्न जन्म दि्याः जिसका 
नाम चाख्मती था । चे समी पुन्न धर्म ओर अर्थम 
कुशल, अख-राकि श्ञाता तथा युद्धरमे उन्मत्त हौकर 
रुङ़नेवाे वीर थे ॥ ३७-३९ ॥ 


महिषीरष्ट॒कदयाणीस्ततोऽन्या मधुसूदनः । 
उपयेमे महाबाहुगणोपेताः करोद्धवाः ॥ ४०॥ 
कालिन्दी मिश्रविन्दां च सत्यां नाभ्नजिक्रीमपि । 
सुतां जाम्बत्रतश्चापि रोहिणीं कामरूपिणीम्‌ ॥ ४१९ ॥ 
मद्वरजखतां चापि सुदहीखां श्चभखोचनाम्‌ । 
साधाजितीं सत्यभामां लक्ष्मणां चारुहासिनीम्‌ ॥४२॥ 
शषेभ्यस्य च सुतां तन्वीं स्पेणाप्सरसोपमाम्‌ । 
खीसष्टस्ाणि चान्यानि षोडश्ातुरुषिक्रमः ॥ ४२॥ 
उपयेमे षीकेदाः सवौ भेजे स ताः समम्‌ । 
तदनन्तर महाबाहु मधुसूदनने कल्याणक्वरूपा सदरुण- 
वती तथा उत्तम छले उत्यन्न हई अन्य आठ पररानिर्यौ- 
के साथ विवाह किया, जिनके नाम इस प्रकार दै--९, 
( सूर्य-पुत्री ) कालिन्दी. २. ( भ्रीङृष्णकी बुआ राजा- 
धिदेवीके गर्म॑से अवन्ती देशम सन्न हुई ) मि्नविन्दाः 


पकषष्ितमो ऽध्यायः 


४५१ 


„----------------------------------------------------------------------------------- ~~~ 


२३. ( अयोष्यानेरेश ) नग्नजितूकी पुत्री सत्या; ४' जाम्ब 
चानकी पुत्री जाम्बवती, ५. इच्छानुसार सूय धारण कसे- 
वाली रोहिणी ( जिसका दूसरा नाम मद्रा था ! कैकयनरेश- 
की पुत्री हनेते यही कैकेयी कदलती थी । सह श्रीकृप्णकी 
बुआ श्रुतकीर्तिकी कन्या थी । ), ६, मद्रराजकी खुशीखा एवं 
श्भलोचना पुत्री मनोहर युसकानवाटी च्ड्मणाः ७, सत्राजित्‌- 
की पुत्री सत्यभामा, ८. राजा रशैन्यकी तन्वङ्गी पुत्री 
८ गान्धारी )४ जो रूपमे अप्ठरके समान थी । इनके षिवा 
सोह दजार ओर लिर्यो थी ! उन सवके साथ अवल परा- 
कमी श्रीक्रप्णने एक ष्टी समय उतने ही रूप धारण करके 
विवाह किया था | ४०-४२९ ॥ 
परा्ष्यवदख्ाभरणाः कायैः सर्वैः सुखोचितः 
जक्षिरे तासु पुत्राश्च तस्य वीराः सहस्रशः ॥ ४४ ॥ 
उने सत्रके चल्न ओर आभूषण बहुमूल्य ये । वे समके 
सवं सम्पूणं मनोवाञ्छित भोगे सम्पन्न तथा सुख भोगनेके 
योग्य थीं ¡ उन सवके गभ्सि श्रीङृष्णके सद वीर पुभ्र 
उत्पन्न द्ृए थे ॥ ४४ ॥ 
चशालरार्थङुहाखाः सवं वल्वन्तो महारथाः । 
यज्वानः पुण्यकर्माणो महाभागा महाबलाः ॥ ४५॥ 
वे समी पुव शालरर्थक्ुखलः बलवान्‌, महारथी? यककर्ता; 
पुण्यकर्मा, महान्‌ भाग्यज्लाटी तथा महाबली ये | ४५] 


इति श्रीमहाभारते खिरुभागे हरिवो विष्णुपर्वणि स्विभणीहरणं नाम षष्ितमीऽध्यायः ॥ ६० ( 
इस प्रकर श्रोमहाभर्तके सिरभाग हरिवंशे अन्तरत विष्ण पमे सविमिणीटरणविषयक सार; अध्याय्‌ पूरा हुमा ॥ ६०॥ 


एकषष्टितमोऽध्याय 


स्क्मीफी पुत्री शयभाङ्गीहारा खयंवरमं प्रदुम्नका वरण, ग्र्युम्नपुत्र अनिरुद्रका सक्मीकी 
पोत्री रुक्मतीके साथ तरिवाह तथा बरामदारा सकमीका वध 


वरैश्स्पायन उच 
नतः काले न्यतीने तु रूक्मी महति श्रीर्यत्रान्‌ । 
दुष्टिः कारयामास  खयंवरमरिदमः ॥ ९ ॥ 
चेशम्पायनजी कहते रहै--जनमेजय { तदनन्तर 
दीर्धा व्यतीत हो जनेके पश्चात्‌ शघु्ओका दमन करनेवाठे 
पराक्रमी वीर स्क्मीने अपनी पुच्रीका स्वयंवर सचाया ॥ १ ॥ 
तत्राहता हि राजानो राजपुत्राश्च रुकिमिणा 1 
समाजग्मुमेहाथीयौ नानादिग्भ्यः न्ियान्विताः ॥२॥ 
उसमे सक्मीका बुलावा पाकर विभिन्न दिशाअेसि बह्ुतेरे 
महापराक्रमी श्रीसम्पन्न राजा ओर राजकुमार अये ॥ २॥ 
तञआजगाम प्रधः कुमारैरपरेश्॑तः। 
साहितं चकमे कल्या स च ताँ ल्युभरोचनाम्‌ ॥ २ ॥ 


वहां बरहुत-से अन्य यदुकरुमारोके साय प्रयुम्न मी अयि 
ये । सकंमीकौ कन्या उन्हें चाहती थी ओर प्रयुम्न भी उस 
श्मलोचना राजक्रुमारीको पानेकी इच्छा रखते ये ॥ ३ ॥ 
सभाङ्गी नाम वेदर्भी कान्तिद्युतिसखमन्विता । 
पृथिव्यामभवत्‌ ख्याता रुक्मिणस्तनया तदा ॥ ४ ॥ 

उस विद्भ-राज्करुमारीका नाम था श्चमाङ्गी । बह कान्ति 
ओर शओोमसे सम्पन्न थी । सक्मीकी बह कन्या उन दिनं 
अपने सूप-सन्दर्यके ल्य समसत भूमण्डल्ये निर्यात 
थी॥ ४॥ 
उपविष्टेषु सरदैयु पाथिवेषु महामद 1 
वेदर्भी वस्यामास प्रघयुस्नमरिखृदनम्‌ ॥ ५ ॥ 

जव समी महामनस्वी भूपारु स्वयंवरसमामि तैढ गये, 


४५२ 


तव उस विद्भराजकरमारीने आकर ग्ुसदन प्रुम्नक्रा वरण 
कर च्या ॥ ५॥ 
स हि सर्वास्रकुदाटः सि्टसंहननो युवा । 
स्पेणाध्रतिमो लोके केदावस्यात्मजो ऽभवत्‌ ॥ ६ ॥ 
प्रुम्न सम्पूर्ण अखकि ज्ञान एवं प्रयोग्मे परुशल ये । 
उनका शरीर के समान ुदृद्‌ था | वे नवयुवक ये । 
रूपमे श्रीकप्णकरे उस पुत्रकी समानता करनेवाला संसारम 
दुरा कोद नदीं था ॥ ६ ॥ 


वयोरूपगुणोपेता राजपु्नी च साभवत्‌ । 
नारायणीवेन्द्रसेना जातकामा च तं प्रति॥ ७ ॥ 
वद्‌ राजकुमारी भी नवी अवस्या; सुन्दर रूम ओर 
उत्तम गुणे सम्पन्न थी | जैमे नारायणी इन्द्रसेना पने पति 
मिं मुदलकर प्रति प्रेम करती थी, उसी प्रकार श्ुमाद्धी भी 
परययुम्नक़े प्रति अतेरक्त थी ॥ ७ ॥ 
दृत्ते स्यंवरे जग्मू. जानः खपुराणि ते । 
उपादाय च वैदर्भीं प्रयुस्नो द्वारकां ययौ ॥ ८ ॥ 
स्वयंवर समास दो जानेपर सवर राजा अपने-अपने नगर- 
को चले गये यीर्‌ प्रुम्न उस विदर्मराजकुमारीको साथ केकर 
द्वारका चले अये ॥ ८ ॥ 
रेमे सष्ट तया वीते दमयन्त्या नखो यथा । 
स तस्यां जनयामास देवगर्भोपमं सतम्‌ ॥ ९ ॥ 
वीर प्रनुम्न उसके साय उसी प्रकार रमण करने स्रोः 
ठेस राजा नर दमयन्तीके साथ करत ये । उन्दौनि वैदर्माकि 
गर्म॑से देवकुमारफे समान तेजखी पुत्रको जन्म दिया ॥ ९ ॥ 


अनिरुदधमिति ख्यातं कर्मणाप्रतिमं युवि। 
धचुर्वंदे च वेदे च नीतिदश्याखे च पारगम्‌ ॥ १०॥ 

उसका नाम था अनिष्दध । वह यपे पराक्रमपूर्णं क्थ 
दवारा भूमण्डर्ल्मे अनुपम वीर माना जाता था | बह धनुर्वेदः 
वेद तथा नीतिगाल्लका पारंगत विद्धान्‌ था ॥ १० ॥ 


अभवत्‌ स यदा राजन्ननिरुद्धो चयोऽन्वितः। 
तद्रास्य रुक्मिणः पौरी रुकिमणी सक्मलंनिभाम्‌ । 
पत्यं वरयामास नाञ्चा स्क्मव्रतीति सा ॥ ११॥ 
राजन्‌ | जव्र अनिरुद्ध युव्रावस्धाते सम्यन्न हए; तव 
सक्मिणीने उनकी पत्नी वननिके लवि सक्मीकी पौत्रोको, जो 
सुवर्णे समान गौर वर्णवाली थी; उनसे मेगा । उसका नाम 
था स्केमवती ॥ ११ ॥ 
अनिरुद्धगुणेदोतं कृतवुदधिर्जपस्ततः। 
भ्रीन्या दि सौकिमणेयस्य सकिमण्याश्चाप्युपन्रहात्‌॥१२॥ 
विस्पद्ध॑न्नपि छष्णेन वैरं त्यज्य महायशाः 1 
ददामीत्यन्नवीद्‌ राजा प्रीतिमाञ्जनमेजय ॥ १३॥ 
जनमेजय † राजा सक्मी अनिष्दधके गुणोसे दी आश्र 


श्रीमद्दाभाग्ते सिखभागे 


[ वरिवो 


~~~ ~~ ^~ ~~~ -------~---- ~~ 


होकर अपनी पौवरीका विवाह उनके सराय करना चाहता था, 
अतः स्क्रिमणीके आग्रदसे उसेराजी रखनेके च्वि तथा 
्रयुम्नकी प्रसन्नताके निमित्त उस मदायश्चस्वी रजाने र. 
करस्णके साथ स्पर्धा रलते हए मी वैरस्यागकर्‌ प्ररन्नतापूर्वक 
कटा कि प्म अपनी पौत्री अनिरद्धकेच्िदे रदा दः १२-१३ 
केशवः स्ट रुक्मिण्या पुरैः संकपंणेन च । 
अन्यैश्च वृष्णिभिः सार्धं विदर्भान्‌ सयो ययौ॥ १४॥ 
तव भगवान. श्रीह्ष्ण अपनी पत्नी रसकमिणी, प्रयु 
आदि पुत्रगणः, मैया बलराम तया अन्य वृष्णिवंशी योदार्गौ- 
के साथ सेनासदित विदर्मदेदमे गमे | १४॥ 
संयुक्ता धातयश्चैच क्क्मिणः सखटदश्च ये । 
आहता श्किमिणा तेऽपि तथाजग्मूर्मराधिपाः ॥ १५॥ 
उस विवादोत्छरवमे सक्मीके मार्दन्धु ओर सुदद्‌ नरे 
भी उख्का निमन्त्रण पाकर वर्टो अयि ये| १५ ॥ 
द्युमे तिथौ मदाराज नक्ते चाभिपूजिते। 
विवादः सोऽनिरुद्धस्य चभूव्र परमोत्सवः ॥ १६॥ 
महाराज | श्म तिथि तथा उत्तम नच्चत्रमे अनिषद्धका 
वद्‌ प्रम उत्सवमयं व्रिवाह-कार्यं सम्पन्न हुजा ॥ १६ ॥ 
पाणौ गृहीते वैदभ्यीस्त्वनिरदधेन तश्र वै। 
वैदर्भयादवानां च वभूव परमोत्सवः ॥ १७॥ 
जव अनिष्दने विदर्भयजकरुमारी सदमवतीका पाणिग्रहण 
किया, उस समय विदर्भनिवासिर्यो तथा यादवेकि मन्म मढा 
दं हुआ ॥ १७॥ 
रेमिरे धृप्णयस्त्र पूज्यमाना यथामरः । 
अथाद्मकानामधिपो वचेणुदारिरुदारधीः ॥ १८॥ 
अक्षः श्रुतवौ चाणुरः ्ाथद्चैवांशुमानपि । 
जयत्सेनः कलिङ्कानामधिपश्च महावलः" ॥ १९ ॥ 
पाण्ठयश्च नरपतिः श्रीमादुपीकाधिपतिस्तथां । 
पते सम्मन्त्य राजानो दाक्षिणात्या महद्ध॑यः.॥ २० ॥ 
अभिगम्याव्रयन्‌. सवे करिणं रहसि प्रभुम्‌ । 
वैदरभोद्रारा पूजित हुए यदुवंशी वौ देवता्थेकि समान 
आनन्दपू्क रम रदे थे । इसी सप्रय अग्मक देदाकां अधिः 
पति उदारुद्धि वेणुदारि, अक्र; श्रुतर्वा; चाणूर, क्रथपुव् 
अंखमान्‌ः कलिज्गदेदाका अधिपति जयत्सेनः राजा पाण्ड्य 
तथा श्रीमान्‌ श्रृषीकनरेश-ये सव अच्यन्त समृद्धिशाटी 
दाक्षिणास्य नेया एकान्तमे सामर्थ्यक्राली सक्मीके पास जाकर 
बोठे--1 १८-२०२ ॥ 
भवानक्षेयु ऊुदाखो वयं चापि रिरंसवः॥ २१॥ 
भ्रियद्यतग्च रामोऽसावक्षेप्वनिपुणोऽपि च । 
'आप अक्षविद्या ( युत ) मे कुल ह ओर हमलोग 
मी चूतक्रीडाकी इच्छा रते द । उधर बलराम यूतकीडामे 
निपुण न होनेपर भी उसे प्रेम रखते ह ॥ २११४ ॥ 


विष्णुपर्व ] ` 


~~ -- 


ते भवन्तं .पुरस्छत्य जेत॒मिच्छाम तं वयम्‌ । 
इत्युक्तो रोचयामास स्क्मी दयुतं महार्थ; ॥ २२॥ 
'अतः हम चाहते द किं आपको आगे करके वररःमको 
दयूतकरीदद्ारां जीत दे ।' उनके रेता कहनेपर महारथी 
सक्मीको जु चेलमेकी वात पसंद आं गयी ॥ २२ ॥ 
ते श्राभां काश्चनस्तम्भां कखुमैभपिताजिराम्‌ । 
सभामाविविध्र्णाः सिक्तां चन्दनवारिणा ॥ २३ ॥ 
तदनन्तर वे समस्त भूपाल व्दे दर्पके साथ सुन्दर चुत 
समाम प्रविष्ट हुए" जिसमे सोनेके खम्भे लगे ये ओर जिसके 
अओगनक्रो एसि सजायां गया था ¡ उस समामे चन्दनके 
जल्पे छिडकाव किया गया था | २३ ॥ 
तां प्रविहय ततः स्वँ शुश्रस्मगुटेपनाः 1 
सौवणेष्वासनेष्वासां चक्रिरे विजिगीपवः ॥ २४ ॥ 
सुन्दर माल्य ओर चन्दनते अलंकृत दौ उस सारम 
परवेदा करके वे समी राजा सोनेके सिंदासर्नोपर वैठ गये 1 उन 
सवरकी यही षच्छा थी कि हम वरलमद्रको जीत ठ ॥ २४॥ 
आहतो वङ्देवस्तु कितवैरक्षकोविदैः । 
वादमित्यत्रवीदधटः सह दीष्याम पण्यताम्‌ ॥ २५ ॥ 
तदनन्तर चतक्ऱमि निपुण जुआरिो दारा वर्देवजीको 
आमन्नित करिया गया । वे श्वहुत अच्छा कहकर प्रसन्नता- 
"पूर्वक वोले--+अच्छा, हमलोग साथ-साथ खेत । आपलोग 
दवि स्गादयेः | २५॥ 
निकृत्या विजिगीषन्तो दाक्षिणात्या नराधिपाः । 
मणिभुक्ताः सुवणं च तच्रानिन्युः सहखश्चः ॥ २६ ॥ 
छले जीतनेकी इच्छा रखनेवाले दाक्षिणात्य भरे वरहो 
सहच मणिः मोती एवं सुवर्णं ठे अये ॥ २६ ॥ 
ततः प्रावर्तत धूतं तेषां रतिषिनाशनम्‌ । 
कलहस्यास्पदं घोरं दुर्मतीनां क्षयावहम्‌ ॥ २७ ॥ 
फिर तो उनमें द्यूत आरम्भ हभ; जो पारस्परिक प्रेमका 
नाग करनेवाला एवं कठका घोर खान है तथा दुर्बुद्धि 
पुरर्पोका संहार करनेवाला है | २७ ॥ 
निष्काणां च सहस्राणि सुवर्णस्य दश्चादिनः । 
रुक्मिणा सह सम्पाते वरेवो ग्लहं ददौ ० २८॥ 
ब्र्देवजीने स्क्मीके साथ जुआ खेलते समय पटे दसु 
हजार सोनेकी मोहरे दोवपर रखी ॥ २८ ॥ 
तं जिगाय. ततो रुक्मी यतमानं महावलम्‌ । 
ताघदेवापरं भूयो बलदेवं जिगाय सः॥ २९॥ 
महाव्रली ब्दैव जीतनेका प्रयत्न करते दी रह गये; 
परंतु स्क्मीने उस दोवक्रो जीत चखा | तत्पदचात्‌ उसने 
पुनः बर्देषका उतना ही सुवर्णं जीता ॥ २९ ॥ 


परकचटटिवमो ऽध्यायः 


१५६ 


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अखकजीग्रमानस्तु सक्रमिणा केदावाश्रजः। 
सुवर्णक्ोरी्ज्॑राह र्लं तस्य महात्मनः ॥ ३० ॥ 
सक्मीके द्वारा बारंबार जीते जानिपर श्रीकप्णके ब्द 
माई वरलयामने उस महामनस्वी सकमीक दपर एक करोड़ 
सुवर्णेमद्रापैः ठेकर रक्खीं ॥ ३० ॥ 
जितमित्येव देऽथ नमाहुतिरभापत 1 
शछछाच्यमानश्च चिक्षेप प्रहसन्‌ सुसलायुघम्‌ ॥ ३९ ॥ 
रुवमी अत्यन्त कुटिल -था | वह हर्षम भरर बोल उठ।-- 
यने ही जीता ।› सव राजा उसकी प्रदा करने ल्मे । उसने 
सते दए वरहो मुसर्धारी बलरामजीपर अक्षिप किया--11३१॥ 
अविद्यो दुव॑ः श्रीमान्‌ हिरण्यममितं मया । 
अजेयो वल्देवोऽयमक्षदयते पराजितः ॥ ३२॥ 


ये श्रीमान्‌ बल्देव विन्रादीन एवं दुर्वर द । ये अजेय 
यनते थे परंवु आज इस अधयत मु्षसे पराजित दो गये। 
मने इनसे असंख्य सुवणं जीता है" ॥ २३२ ॥ 
कलिङ्गराजस्तच्ष्ुत्वा -परजहयस शशं तदा । 
दन्तान्‌ संदश्तंयन्‌ हस्तधाक्रुद्धश्द्धलायुधः ॥ ३२ ॥ 

सक्मीकी वह्‌ वात सुनकर कलिङ्गराज हर्षसे उल्लसित 
हो उठा । वह अपने यौत दिखा-दिखाकर जोर-जोरसे हंसने 
लगा  तव्र वर्ह यल्यामजी कुपित हो उठे ॥ ३३ ॥ 
शुप्मिणस्तद्‌ वचः श्चुत्वा पराजयनिमित्तजम्‌ । 
निग्माणस्तीकष्णाभिवग्भिभीष्पकस्ना ॥ ३४ ॥ 
रोषमाष्टारयामास जितसोपोऽपि धमेवित्‌। 
संक्रुद्धो धर्षणां प्राप्य रौहिणेयो महावलः ॥ २५ ॥ 


सक्मीके उस वचनको; जो बल्देवजीकी पराजयको 
निमित्त बनाकर कदा गया था, जव उन्दनि सुना ओर जवर 
मीष्मकपुघ्र स्क्मी अपने तीखे वच्नेखि उन्दँ निगहीत करने 
लगा, तव महाबली रोहिणीककमार वलरामजी उस तिरस्कार- 
को पाकर अत्यन्त कुपित हो उठे । यद्यपि वे धर्म॑त्त येः 
उन्न रोपर विजय भी पायी थी, तो मी उस समय उनके 
मनम वड़ा भारी रोष भा ॥ ३५३५ ॥ 
धैयौनमनः संनिधाय तनो वचनमव्रवीत्‌ । 
दशकोटिसहस्राणि ग्छह पको ममापरः ॥ ३६॥ 
पनं सम्परिगरहीष्व पातयाक्षान्‌ नगधिप। 
छृष्णा्षर्लोष्िता्षांश्च देशचेऽसिस्त्वधिपांसुटे॥ ३७॥ 
हत्येवमाह्यामास रुक्मिणं रोहिणीसुतः । 

इतनेपर भी उन्होने धैरयपूरवक मनको कावूमे किया ओर 
इस प्रकार कहा-धविदर्भनरेधर ! दस सदस कोटि सरणं 
मुदरा्भोका यह मेरा एक दूस दोष है । से ग्रहण कयो ओर 
इम अधिकं रजोगुणी देशकाल तुम कराले ओर लाल पासे 


४ ५४ 


श्रीमहाभारते खिलभागे 


[ दरिवंदो 


फको ।' े्ा कहकर रोहिणीङकमार वलरामने पुनः जुआ सेके 
के व्यि ठ्टकारा ॥ २३६-२७१ ॥ 
अनुक्त्वा वचनं किचिद्‌ वाढमित्यव्रवीत्‌ पुनः॥ २८ ॥ 
अध्वान्‌ रुक्मी ततो हृष्टः पातयामास पार्थिवः 

इसके उत्तरम राजा सक्मीने कोद दुसरी यात न ककर 
फिर इतना ही कदा कि वहत यच्छा }2 इसके व्राद उसने 
हर्षपूर्वक पते फेके ॥ २८१ ॥ 
चातुरक्षे तु निरते निरजितस्य नराधिपः ॥ ३९ ॥ 
वल्देवेन धमेण नेत्युवाच ततो वलम्‌! 

उस समय चार अंक्वाला पासा गिरा । उसके अनुसार 
ब्देषजीने धर्मतः उसे हय दिया था, तो भी उख नरेश्वरे 
बख्देवजीसे यही कहा कि (आपकी विजय नदीं हुई है, १९१ 
पैयान्मनः समाधाय स न किविदुवाच द ॥ ४०॥ 
बलदेवं ततो स्क्मी मया जितमिति स्मयन्‌ । 

वलरामजीने पुनः अपने मनको वैरपूर्वक कायु करके 
कोई वात नहीं कही } तव स्क्मीने भुसकराते हुए बल्रामजी- 
से कदा--्यह्‌ दोष भी मैने ही जीता रै, ॥ ४०३१॥ 
बर्वेषस्तु तच्छुत्वा जिह्यं वाक्यं नराधिप ॥ ४१॥ 
भूयः क्रोधसमाविष्टो नोषखरं व्याजहार ह 1 

नरेश्वर | उखकी यह कुटिरतापू ब्रात सुनकर वल्देष- 
जीको पुनः वड़ा क्रोध हुआ, तथापि उन्होने उसे कोई उत्तर 
नहीं दिया ॥ ४११ ॥ 
ततो गम्भीरनिधोंप्रा वागुवाचाश्चरीरिणी ॥ ४२ ॥ 
बलदेवस्य तं क्रोधं वर्धयन्ती महात्मनः । 

तव गम्भीर धरोषकरे साथ वरहो आकाद्यवाणी हुई; जो 
महात्मा बल्देवके क्रोधको वद॒नेवाटी यी ॥ ४२३ ॥ 
सत्यमाह वलः श्रीमान्‌ घर्मणेष पराजितः ॥ ४३ ॥ 
अनुक्त्वा चनं क्रचित्‌ प्राप्तो भवति कर्मणा । 
मनसा समयुक्षातं तत्‌ स्यादित्यवगम्यताम्‌ ॥ ४४॥ 

शश्रीमान्‌ वरैवजी सत्य कहते ह । यह खक्मी धर्मतः 
पराजित हो चुका दै. यपि इसने दोष र्गाते समय कोरर 
बात नर्हीकदीयीतो मीडइसने जो पाषा फैकने आदिका 
कमं किया, उससे उख दवम इसका सहयोग खतः सिद्ध हो 
जाता है । इकने मनते उस ॒रदोवको स्वीकार कर छ्य थाः 
टेक् समन्ना चादयः ।॥ ४२-५४॥ 
इति श्रुन्वा बचस्तथ्यमन्तरिक्चाव्‌ सखुभाषितम्‌ । 
संकर्प॑णस्तथोत्थाय सौवर्णेनोखुणा असी ॥ ४५॥ 
रुक्मिण्या आतर ज्येष्ठं निजघान महीरखले । 

आकाराते युन्दर ठंगसे कहा गया यष्ट यथाथ वचन 
सुनकर श्रख्वान्‌ संकर्षण उठकर खड़े टौ गये ओर उन्हनि 


सोनेके ने हु विशाल अष्टपंदके द्वारा सक्रिमिणीके वदे 
माई सक्मीको प्रथ्यीपर मार भिराया ॥ ५५१ ॥ 
विवादे कुपितो रामः क्षे्तारं किर खकिमिणम्‌ । 
जघानाष्ठापदेमैव प्रमथ्य यदुनन्दनः ॥ ४६॥ 
विवादरमे कुपिन हए यदुनन्दन बक्समने अपने ऊपर 
आओश्षेप करनेवाले सक्प्रीको पटककर अष्टापदे द्वी मार गल | 
ततोऽपसखत्य संक्रुद्धः कलिङ्कायिपतेरपि । 
दन्तान्‌ वभञ्ज संरम्भादुख्रनाद्‌ च सिष्टवद्‌ ॥ ५७॥ 
वहसि टकर अत्यन्त क्रोधने भरे हुए सकर्पणने कृशिङ्ग- 
राज जगत्तेनके सरे दोति तोड़ उलि तथा रोपते वे चिहके 
समान दहाडे स्रो ॥ ४७ ॥ 


खङ्गमुद्यम्य तानसर्बाल्रासयामास पार्थिवाय्‌ । 
स्तम्भं सभायाः सौवर्णमुत्पार्प बलिनां वरः ॥ ४८॥ 

इसके वाद उर्होनि त्वार उठाकर समस्त राजार्भकरो 
भयभीत कर दिया । किर चयूतसभाक़े सुवर्णमय खम्भको 
उखाइ़कर बलवार श्रेष्ठ वररामजी अगे ब्रदे ॥ ४८ ॥ 
गजेन्द्र इव तं स्तम्भं कर्मन्‌ संकर्षणस्ततः। 
निजैगाम सभादारावघ्रासयामास कैरिकान्‌॥ ४९॥ 

गजराजक्रे समान उस खंभेको खचकर व्यि जते हुए 
संकर्षण जव समाद्वारते व्राहर निकले, तव उन्दने समस्त 
कैरिर्कोको भयमीत कर दिया ॥ ४९ ॥ 


खष्मिणं निरतिप्र्ञं स हत्वा यादवर्षभः । 
विधास्य विद्विषः सवौन्‌ सिंहः ्रुद्रस्धगानिव ॥ ५० ॥ 
इस प्रकार छल-कपटमे चुर ₹उक््मीको मारकर यादव- 
प्रवर बरलरामने समस्त शत्ु्ओंको उसी तरह भयम डाल 
दिया, जेते सिंह छोटे पञचर्भोको मयमीत कर देता दै ॥५०॥ 
जगाम दिषिरं रामः खयमेव जनादृतः! 
न्यवेदयत्‌ स कृष्णाय तत्र सर्वं यथाभवत्‌ ॥ ५२ ॥ 
तदनन्तर खजनसे धिरे हुए बर्यम अपने दिवि 
गये ओर्‌ ययूतसमामे जो कुछ हुआ था, वह स्व स्वयं ही 
उन्न श्रीकृष्णको घता दिया ॥ ५१ ॥ 
नोवाच स तदा ष्णः क्रिचिद्‌ रामं महाद्युतिः । - 
निगृह्य च तदाऽऽत्मानं रच्द्रादश्चुण्यवर्तयत्‌ ॥ ५२॥ 
उस समय मदातेजसखवी श्रीङकृष्णने वरुरमजीसे ङु नही 
कदा; वे अपने आपको किसी तरह रसमालकर बडे कष्टसे 
अपि वहाने ठ्गे ॥ ५२॥ 
न शतो वाख्देवेन यः पूवं परवीरा । 


ज्येष्ठो भराताथ खक्मिण्या स्कमिणीस्नेहकारणात्‌ ५३ 


१, अमरकोषे अनुसार शारिफक ( शतरंज या चरकी 
निर्घत मथवा वितास ) को अष्टापद करते र 1 


विष्णाप्वं ] 


दिषितमो ऽभ्यायः 


४९५९५ 


स ॒रामकरसुक्तेन निहतो चूतमण्डले । 

- अष्टापदेन बलवान्‌ राजा वञ्जघरोपमः ॥ ५७॥ 
` ` भगवान्‌ वासुदेवने परे खुक्मिणीके प्रति स्ने्टके कारण 
उसके जिस बडे भाईको नदीं मारा था, षष्टी षञ्जधारी इन्द्रके 
समान बङ्वान्‌ एवं श्रुवीरोका संर करनेवाला राजा खक्मी 
बरररामजीके -हाथसे चुट हुए अष्टापदके द्वारा मार डाल गया ॥ 


तसिन्‌ हते महावीय पतौ भीष्मकात्मजे । 

हुमभार्गवतुल्ये वै दुमभागंवश्षिक्षिते ॥ ५५॥ 
कृतौ च युद्धकूशकते नित्ययाजिनि पातिते । 

कृष्णयश्चान्धकराश्चैव सवे विमनसो ऽभवन्‌ ॥ ५६ ॥ 
` भीष्मकपुत्र राजा सक्मी महान्‌ बल-पराक्रमसे सम्पन्न 
था । वह द्भुम ओर परन्चरामजीसे अखर-रिक्षा पाकर उन्दी 
दोनेक्रि समान पराक्रमी दौ गया था । रुक्मी विद्वान्‌? युद्ध 
कुराल ओर नित्य यज्ञ करनेवाला था । उसके मारे जानेपर 
बृष्णि ओर अन्धक्वंशके समी वीर उदास हो गये ॥५५-५६॥ 


वेश्म्यायन उवाच 

सकिमरणी च महाभागा विरुपत्त्यातंया गिरा 1 
विलपन्तीं तथा दृष्ट सान्त्वयामास केदावः ॥ ५७ ॥ 

वैशस्पायनजी कहते ह-- जनमेजय ¡ ८. भाईके 
मरे जानेसे ) महाभागा सक्रिमिणी आत॑वाणीम विलाप करने 
र्गी । उन्हे रोती-बिख्खती देख भगवान्‌ कृष्णने सान्त्वना दी॥ 
पतत्‌ ते सर्वमाख्यातं सुकिमिणो निधनं यथा । 
वैरस्य च समुत्थानं बृष्णिभिर्भरतर्षभ ॥ ५८ ॥ 

भरतश्रेष्ठ | यह भने तुम्दे खक्मीके वधका यथावत्‌ 
बरत्तान्त बताया है । साथ ही यह भी स्पष्ट कर दियाहेकिं 
उसका इष्णिवंरिरयोकि साथ किंस प्रकार वैर इजा था १ ॥ 
इष्णयो.ऽपि महाराज धनान्यादाय सर्वश्च । 
रामङृष्णौ समाधित्य ययुद्धीरवतीं भरति ॥ ५९॥ 

महाराज ! इृष्णिवंशी मी वदेसि सत्र प्रकारके धन्‌ लेकर 
बलराम ओर श्रीकृष्णका आश्रय ठे द्वारकापुरीको चले गये ॥ 


इति श्रीमहाभारते खिल्भागे हरिवंशे विष्णुपवेणि रुकिमिवधो नामैकषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६१ ॥ 
इस प्रकार श्रीमहाभारते लि माग हरिवंशे अन्तत विष्णुपवेे सक्मीका नधव्रिपयक इकसररवेः अध्याय पूरा हुमा ॥ ६९ ॥ 


द्विषष्टितमोऽध्यायः 


. बलदेवजीका माहात्म्य, उनके दारा हस्तिनापुरको गङ्गाम गिरानेका अद्भुत प्रयत्न 


राजोवाच 
भूय पष तु विप्रपं वरुदेवस्य धीमतः। 
माहात्म्यं भोतुमिच्छामि शेषस्य धरणीच्धतः ॥ १ ॥ 
राजाने कटा-्रह्यधं ! धरतीको धारण करनेवाले 
शेषके अवतार बुद्धिमान्‌ बररामकरे माहात्म्यको भँ पुनः 
सुनना चाहना हू ॥ १ ॥ 
अतीव , वर्दरेवं तं . तेजोरादिमनिजितम्‌ । 
कथयन्ति महात्मानं ये पुराणविदो जनाः ॥ २॥ 
जो पुराणवेत्ता पुरुष है वे महात्मा वल्देवको अत्यन्त 
तेजकी रादि ओर अपराजित वताते ह ॥ २॥ 
तस्य कमोण्यहं विप्र श्रोतुमिच्छामि तच्वतः। 
अनन्तं ॒यं ` विदुनौगमादिदेवं महौजसम्‌ ॥ २ ॥ 
, विप्रवर ! मै उनके कर्मोको पुनः यथार्थरूपसे श्रवण 
करनी चाहता हरः जिन्हे विद्वान्‌ पुरुष महान्‌ बल-परक्रमसे 
सम्पन्नं आदिदेव अनन्त नागके रूपमे जानते ह ॥ ३ ॥ 
वे्नम्पायन उवान 
पुराणे नागराजऽसौ पठ्यते धरणीधरः । 
दोपस्तेजोनिधिः श्रीमानकस्प्यः पुरुषोत्तमः ॥ ४ ॥ 
योगाचायों महावीयो देवमन्धसुखो वी । 
जससंधं गदायुद्धे जितवान्‌ यो न चाषधीत्‌ ॥ ५ ॥ 


्दाम्पायनजी कष्टते है--जनमेजय | पुराणमे 
व्रल्मद्रजीको साक्षात्‌ नागराज धरणीधर दोष्र वताया जाता 
दै । वे तेजकी निधिः दिव्य ओोभासे सम्पन्नः कभी कम्पित 
न षनेवाले ओर पुरुषोत्तम दै । वे योगके आचार्यः महा- 
पराक्रमीः बलवान्‌ तथा देवताओंकी गुप्त मन्नणाको सुनने 
ओर उसपर विचार केवलम प्रधान ह । उन्दने गदा- 
युद्धमे जरासंधको जीत लिया, परंतु उसका वध नहीं करिया ॥ 
वष्टवद्चेव राजानः पथिताः पुथिवीतले । 
अन्वयुमौगधं सव ते चापि विजिता,रणे ॥ ६ ॥ 

भूतले ब्रहुत-ते विख्यान राजा, जो सवके मव मगध- 
राज जरासंधका भनुसरण करते थे, युद्धमे बख्देवजीके दवारा 
परास्त कर दयि गये ॥ ६ ॥ 
नागायुतवश्राणो भीमो भीमपरक्रमः। 
असकृद्‌ ब्रखदेवेन वादुयुद्धे पराजितः ॥ ७ ॥ 

जिनमै दस हजार दाथियोका वरर था, वे भयानक 
पराक्रमी भीमसेन बाहुयुद्धं .बरुदेवजीके द्वारा अनेक बरार 
पराजितष्टो चुके ये ॥ ७॥ 
दुयोधनस्य कन्यां त हरम्राणो न्यगृ्यत 
साम्बो जाम्बवतीयुश्रो नगरे नागसाढये ॥ ८ ॥ 
राजभिः सर्वतो सुद्धे हरमाणो बलात्‌ किङ । 


४५६ 


श्रीमहाभारते किलभाणे 


[ हरिवंशे 


एक समय इयोधनकी पुनी लक्षमणाका अपहरण करते 
हए. जाम्बवतीक्कमार साम्बो कौर्ोने इसिनापुस्मे कैद 
कर जिया । वष नगर सव ओरसे राजाओंद्यारा धिरा हुमा 
ा | कहते दैः साम्ब ब्र्पूर्धक उस कन्याको ले जारे येः 
इसलिये उन्दे वंदी वनाया गया ॥ ८३ ॥ 
तदुपश्युत्य संरुद्धमाजगाम महावः ॥ ९ ॥ 
रामस्तस्य तु मोक्ताथंमागतो नारमच्च तम्‌ । 
साम्बको कैद कर छया गया है, यह्‌ सुनकर महावली 
वटराम उन्हे दुङनेके ल्थि अये; परु वे शन्तिपूर्वक 
मोगनेपर साम्बकोनपास्करे॥ ९९ ॥ 
ततद्चुक्रोध बरवानद्धतं करोन्महत्‌ ॥ १०॥ 
अनिवा्यमभेद्यं च दिन्यमप्रतिमं वले। 
खाङ्खखं समुदयस्य व्रह्ममन्त्राभिमन्धितम्‌ ॥ ११॥ 
प्राकारवत्रे विन्यस्य पुरस्य च महाद्युतिः । 
प्कषप्तुमेच्छद्‌ गङ्भयां नगरं कौरधस्य तत्‌ ॥ १२॥ 
तव बलवान्‌. बलराम कुपित्त हो उडे ओर उन्होने वर्ह 
एक महान्‌ अदूयुत कायं कर दिखाया । महातेजस्वी वत्ज्यम- 
जीने, जो किंीके द्वारा भी निवारण या भेदन करनैयोग्य 
नीं है, उस अप्रतिम शक्तिशाखी दिव्य हल नामक अख्रको 
उठाकर उसे ब्रह्ममन्त्रसे अभिमन्नित किया ओर कौरवनगर 
हसिनापुरके परकोटेक्री नींवमे धसाकर समच नगरको गज्ञा- 
जीमे उकूट देनेकी इच्छा की ॥ ६०-६२॥ 
तद्‌ विघूणिततमारक्ष्य पुरं दुर्योधनो वृपः। 
साम्बं निपीतयामासर सभार्य तस्य धीमतः ॥ १३ ॥ 
अपने नेगरको चष्छेर काटता देख राजा दुर्योधनने 
तुरंत आकर बुद्धिमान्‌ बल्देवजीकी सेवामे पत्नीसहित साम्ब- 
को लोटा दिया ॥ १३॥ 
ददौ शिष्यं तदाऽ ऽत्मनं रामस्य खुमहात्मनः। 
गदैयुदधे रूपति शिष्यं जग्राह वतं च खः ॥ १४॥ 
ॐ समयं उसने अपने-जपको महात्मा वररामजीके 
हाथमे शि्य-मावसे सप दिया । तवर उन्होने कुरुराज दुर्योधन- 
को गदायुद्धकी रिष्ठा देनेके व्यि अपना शिष्यं वना लिया ॥ 
ततः प्रश्ति राजेन्द्र॒ पुरमेतद्‌ बिघुणिंतम्‌ । 


आवर्ितमिवभिति गक्मभिपुखं दप ॥ १५॥ 
रजेन 1 तमीसे यह नगर कुछ धुमा ओर गङ्खाकी ओर 
छकाया हुभा-खा प्रतीत होता है ॥ १५ ॥ 
श्दमत्यद्भुतं कर्म॑ रामस्य कथितं शुषि । 
भाण्डीरे कथितं राजन्‌ यच्‌ रतं शौरिणा पुरा ॥ १६॥ 
राजन्‌ ¡ यह भूतरूपर वरामजीका अत्यन्त अदूसुत कर्म॑ 
कडा गया है । पहले भाण्डीरवरके निकट उरन्देनि जो ङु 
किया थाः उखका वर्णन तो कर ठी दिया गया है ॥ १६॥ 
प्रलम्यं सुध्िनिंकेन यज्जघान हलायुधः । 
चेक तु महावीयं चिक्षेप नगमूद्धंनि । 
स गतायुः पपाते दैत्यो गर्द॑भरूपधूक्‌ ॥ १७ ॥ 
उस समय हरधंरने प्रलम्बको एक दी मुक्केसे मारकर 
कालके गामे दाक दिया था ओर महापराक्रमी घेनुकासुरको 
ताइकी चोटीपर फक दिया था। वह गर्दभरूपधारी दैत्य 
वहते गतायु होकर प्रथ्वीपर गिरा था ॥ १७ ॥ 
ङवणजखगमा महानदी 
दरुतजकवेगतर ङ्गमालिनी । 
नगरमभिमुखं यदा हता 
हरुविध्रता यमुना यमखसा ॥ १८॥ 
खारे पानीके समुद्रम मिलनेवारी यमकी बहिन महानदी 
यमुनाकोः जो बहते हुए जल्के वेग॒ ओर तरंगेसि अलंकृत 
थीः उन्दौनि हल्के द्वारा नगरकी ओर खीच लियिथा॥ 
वलदेवस्य मादास्म्यमेतत्‌ ते कथितं मया । 
अनन्तस्याप्रमेयस्य शेषस्य धरणीभरतः ॥ १९ ॥ 
जो अनन्त) अप्रमेय, धरणीधर शेषके अवतार है, उन 
वर्देवजीका माहात्म्य मने वुम्हे वता दिया ] १९॥ 
श्ति पुरुषवरस्य खद्गछे- 
वहुषिधमुत्तममन्यदेव च| 
यद्कथितमिहाद्य कमं ते 
तदुपरभख पुराणविस्तरात्‌ ॥ २०॥ 
इस प्रकार पुरुपोत्तम हल्धरफे दृसरे-दूसं भी उत्तम 
चरित्र दै, उनके जि कर्मकी यहां च्चा नह्य कौ गयी हैः 
उसे तुम विस्तृत पुराति जन लो ॥ २० ॥ 


इति श्रीमहगभारते लिरभगे इरिदंदै विष्णुपर्वणि बर्देवमाहम्ये द्विषषटितमोऽध्यायः ॥ ६२ ॥ 
इस प्रकार श्रीमहाभारतेके लिमा हरिवेदाके अन्तरगत िष्ुपरमे वर्देवका मा्ास्यविषयक वासख्वे{ अध्याय पु हुमा ॥ ६२ ॥ 


त्रिषष्टितमोऽध्यायः । 

नर्कासुरका परिचय, दवारकाम इन्दरका आगमन ओर श्रीकृष्णसे नरषधके शिि अनुरोध, 
सत्यभामासहित श्रीङप्णका प्रण्ज्योतिपपुरमे गमन तथा उनके द्वार॒ शह, निषुन्द, हयग्रीव, 
विरुपाक्ष, पञ्चनाद, अन्यान्य अमुर तथा नरकापुरका वध । 


जमेमेजय उवाच 
धत्येत्य द्रवं विष्णु ते सविमणि यीर्यच्छन्‌ 


अकरोद्‌ यन्बहावाद्स्तन्मे चद्‌ महामुने ॥ १ ॥ 


जनमेजयने पूछ--मदामुने { सक्मीके मारे अनेपर , 


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विष्णुपवं ] 


तरिषण्ितमो ऽध्यायः 


४५७७ 


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ज परम पराक्रमी महाबाहु शीङृप्ण द्वासकाको कोट अयिः 
तद्र उन्हे क्या किया, यह सुश्चे वतादये ॥ १ ॥ 
वेद्स्पायन उवाच 
स तैः परिवृतः श्रीमान्‌ पुरी यादवनन्दनः । 
द्वारकां भगवान्‌ विष्णः ्रत्यवेश्चत वीर्यवान्‌ ॥ २ ॥ 
वेशस्पायनजी कहते ह--जनमेजय | श्रीमान्‌ याद्व- 
नन्दन पराक्रमी भगवान्‌ श्रीछष्ण उन यादवो धिरे हुए जव 
द्वारकाको अयि; तव उन्होने उस पुरीका भलीभेति निरीक्षण 
किया ॥ २॥ 
प्रत्यपद्यत रलानि विविधानि वसनि च। 
यथा पुण्डरीकाक्षो नैतान्‌ प्रत्यवारयत्‌ ॥ २ ॥ 
कमलनयन श्रीकृप्णने जो नाना प्रकारके धन ओर र्न 
प्राप्त कथि थे, उनक्रा वे द्वारकर्मे यथोचितरूपसे संरक्षण 
करते थे ओर उन्द हडपनेकी च्छवे राकर्तौको उन्दोनि 
मार भगाया था॥2॥ 
तत्र धिघ्नं चरस्ति स्स दैतेयाः सह दानवैः । 
ताञ्जघान महावाहर्वरटप्तान् मष्टासुरान्‌ ॥ ४ ॥ 
वहो उनके मार्गमे दैत्य ओर दानव विघ्न डाला करते 
ये । महावा श्रीकृष्णने बर पाकर उन्मत्त दए उन बदे-वदे 
असुरोको मार डाला ॥ ४॥ 
विध्नं चास्याफरोत्‌ तन्न नरको नाम दानवः! 
ध्रासनः सदैदेवानां देवराजरिपुर्महान्‌ ॥ ५ ॥ 
त्यश्चात्‌ नरक नामक दानवने भगवान्क्े कार्यम विन्न 
डालना आरम्भ किंया } वह समस्त देवतार्भको भयभीत 
करनेवाला तथा देवराज इन्द्रका महान्‌ रज्र था ॥ ५॥ 
स भूमो मूर्तिलिङ्धस्थः सर्व॑देवाधिवाधिता । 
देवतानासृषीणां च भतीपमकरोत्‌ तदा ॥ ६ ॥ 
समस्त देवता्जओंको ब्राधा देनेवाल नरकाुर भूमिके 
भीतर मूतिलिङ्धमे खित होकर देवताओं र ऋषि्ोके प्रति- 
कूल आचरण किया कसताथा॥६॥ 
व्वष्टुदुहितरं भौमः करशोखमगमत्‌ तदा । 
गजस्येण जग्राह रुचिराङ्गां चतुर्दशीम्‌ ॥ ७ ॥ 
भूमिका पुत्र दोनसे नरकको मौमासुर भी कते ई । 
उसने हाथीका सूप धारण करके प्रजापति व्वष्यकी पुत्री 
कगेस्फेः जो चौदह वर्धकी अवसथावाली तथा सुन्दर अङ्गंसि 
खंशोमित थी, समीप जाकर उसे पकड़ छया ॥ ७ ॥ 


(१. सूति या दिवरिङ्गयेः भाकारका कोई दुभ गृह, जो पएथ्वी- 
के भीतर शुफाम बनाया गया हो । शत्ुभेसि भा्मरादी दृष्टिसे 
नरकचठरने पसे निवासस्यानका निरमीण करा रखा भा । 


प्रमथ्य तां वरारोहां नरको घाष्यमन्रवीत्‌ । 
नष्टशोकभयो मदात्‌ श्राण्ज्योतिषपतिस्तदा ॥ ८ ॥ 
नरकासुरं भ्ाग््योतिषपुरकां राजा था 1 उखे शोक ओर 
भय नष्ट हो गये थे । वह्‌ मोहवद्य सुन्दरी कशेरको अपनी 
दोनों थुजाओमिं दवाकर हर छे गथा ओर उससे इस प्रकार 
चोख--) ८ ॥ 
यानि देवमलुष्येणु रलानि विविधानि च। 
विभति च मही छृत्स्ना सागरेषु च यद्‌ वसु ॥ ९ ॥ 
अद्यप्रभृति तानीह सहिताः सवनेश्छंताः 
तवेदोपाहरिष्यन्ति दैत्याश्च स्ट दानवेः॥ १०॥ 
ष्देवि | देवता ओर मनुष्योके पास जो नाना प्रकारके 
रनः सारी प्ध्वी जिन रनक धारण करती दहै तथा 
समुद्रम जो रन संचित दै उन सव्रकरो आजसे समी रा्चसः 
दैत्य ओर दानष भी वम्दे ही कर दिया करेगे ॥९-१०॥ 
मुत्तमरलानि षल्माणि विविधानि च] 
ख जहार तद भौमस्तश्च नाधिचकार सः ॥ ११९॥ 
दस प्रकार भौमासुरे नाना प्रकारके उन्तम सनौ ओर 
मोति-्मौतिके वका उस समय अपहरण किया था ] अप- 
हरण करके भी उसने उनपर अधिकार नहीं किया ( उन्ह 
अपने उपभोग नदी लया ) ॥ ११९॥ 
गन्धकीर्णां च याः कन्या जहार नरको बी । 
यादच देवमुष्याणां सत्त चाप्सरसां गणः ॥ १२॥ 
गन्धर्वाकी जो कन्या यी, उन्द मी बल्वान्‌ `नरकासुर 
दर खया था । देवताओं ओर मनुरष्योकी कन्याओं तथा 
अप्छराओके खात समुदायौका भी उसने अपहरण कर 
च्या॥ १२॥ 
चतुरा सदस्रणि पक्िश्ञर्छतानि च । 
पक्वेणीधराः सवौ; सतीमार्गमनुचताः ॥ १३॥ 
इस प्रकार सोलह हजार एक सौ सुन्दरी चिरयो उसके 
घरमे एकतर हौ गयीं । वे सव-की-सव्र सतियोके मार्गका अनु- 
सरण करके बत ओर नियमौँके पानम तत्र हो एक वेणी 
धारण करती थी ॥ १३ ॥ 
वैद्स्पायन उदाष 
तासां पुरबरं भौमोऽकारयन्मणिपर्वतम्‌ । 
अलकायामदीनात्मा सुखः खविषयं प्रति ॥ १४॥ 
वैदास्पायनजी कदते ईदै--जनमेजय ] उदार इदय- 
वाके भोमाबुे उनके रहने स्थि मणिपर्व॑तपर एक श्रेष्ठ 
पुरका निर्माण कराया था । जित खानपर बह पुर बना था; 


वह अलका नामसे प्रसिद्ध था ! वह खान मुर नामक दैत्यके 
अधिशृत प्रदेदम था ॥ १४॥ 


४५८ 


शीमहाभारते ल्लिखभागे 


[ शरिषंशे 


ताश्च प्रार्ज्योतिपपति सुरोश्चैव दहात्मजाः। 
नेक्छैताश्च यथा मुख्याः पारयस्त उपासते । 
ख पष तपसः पारे वर्षो मदाखुरः ॥ १५॥ 
मर या मुर नामक दैत्यके दस पुत्र तथा प्रधान-प्रधान 
राक्षस उन कुमासियों तथा प्राग्न्योतिषरपति भौमकी रक्षा करते 
हए उसकी उपासना करते थे 1 यह महान्‌ अमुर नरक 
तपस्याके अन्तम वर पाकर उन्मत्त हौ गया था] १५॥ 
न चाखुरगणैः सदेः सितैः क्म तत्‌ पुरा । 
छृतपूर्य॑ तदा घोरं यव्कार्बीन्महासुरः ॥ १६॥ 
ूर्वकालमे समसत महादैत्येनि एक साथ मिलकर भी वैसा 
अत्यन्त घोर पापकर्म नहीं किया था, जो उस महान्‌ असुरने 
अकेठे दी कर उल था ॥ १६॥ 
अदिति धर्षयामास कुण्डन्गथं महासरः । 
यं मदी सुपुवे देधी यस्य प्रारञ्योतिषं पुरम्‌ ॥ १७ ॥ 
द्वारपालाश्च चत्वारस्तस्यासन्‌ युदधदुमंदाः 
उस मदादैत्यने कुण्डके व्यि देवमाता अदितितकका 
तिरस्कार कर दिया था । पृध्वी देवने जिसि जन्म दियाथा 
ओर प्राग््योतिषपुरपर जिसका अधिकार था, उस नरकायुर- 
के चार युद्धोन्मत्त दैत्य द्वारपार ये ॥ १७९ ॥ 


हयग्रीवो निखन्दश्च वीरः पञ्चनदस्तथा ॥ १८ ॥ 
सुखः पुधसषशनैश्च वरदप्तोऽश्ुरो महान्‌ । 
उनके नाम इ प्रकार दै--दयप्रीवः, निसुन्द; वीर 
पञ्चनद तथा सहस पुरनोखहित महान्‌. असुर्‌ मुरः जो किं वर- 
दान प्राक कर चुका था॥ ९८२ ॥ 
अदेवयानमाद्रत्य पन्थानं समुपस्थितः । 
वित्राखनः सखुरूतिनां विरूपै राक्चसेः सद ॥ १९॥ 
वह नरकाम्ुर समूचे देवयान मार्गको घेरकर वहां 
उपसित दो जाता ओर भयंकर स्यवाले रक्चसोकि साथ रह्‌- 
कर उधरसे जनेवाठे पुण्यात्मा्ओको उराया करता था ॥ 


तद्वधाथं मदावाहुः श्ाह्भचक्रगदसिभत्‌ । 

जातो दृष्णिषु देवक्यां वसखुदेवाज्ञनादंनः ॥ २० ॥ 
उसके वधके लि शद्ध, चक्रः गदा ओर खद्ध धारण 

करनेवठे महावाह्न शीकृप्ण दृष्णिङ्ुट्म देवकीके गर्भ॑ ओर 

वमुदेवके संयोगते प्रकट हुए ॥ २० ॥ 

तस्याथ पुख्षेन्द्रस्य ङोकप्रथिततेजसः 

निवासो दारका देवैरुपायादुपपादिता ॥ २१॥ 
उनका तेज सम्पूर्ण विश्वम विख्यात है । उन पुरुपग्रवर 

भीङृप्णका निवासस्थान द्वारका द, ज्ठि देवताओंनि उपयुक्त 

उपायसे उपरुन्ध कराया था ॥ २१९ ॥ 

अतीव हि पुरी रम्या दारका वासवक्षयात्‌ । 

महणवपरिश्चिता पश्चपर्वतदोभिता ॥ २२॥ 


दारकापुरी इन्द्रके निवासस्थान अमरावतीपुरीपे भी 
अच्यन्त रमणीय दै ¡ बह महासागरसे धिरी हद तथा पच 
परवति सुकोमित है ॥ २२ ॥ 
तस्यां देवपुसभार्यां सभा काञ्चनतोरणा । 
खा दाद्र्हि बिख्यात(योजनायामविस्छता ॥ २२३॥ 
देवपुरीके समान सुशोभित दोनैवारी दारकर्म एक 
सभा दैः जिम सोनेकी वन्दनवारे लगी द | उसकी ठंवाई- 
चौडाई एक-एक योजनकी है तया वह दादाींचभाके नामपे 
विख्यात दै ॥ २३॥ 
तत्र दृष्ण्यस्धक्षाः सव समरूष्णपुरोगमाः। 
लोकयाघ्रामिमां त्स्नं परिर्तन्त आसते ॥ २४॥ 
उसमे वरयम ओर श्रीकृष्ण आदि दृप्ि ओर अन्धक- 
वंके छभी लोग व्रैठते ये जौर सम्पूणं छोकजीवनकी रधम 
दत्तचित्त रहते थे ॥ २४ ॥ 
तत्राखीनेषु सर्वे कदाचिद्‌ भरतर्पभ । 
दिन्यगन्धो ववौ वायुः पुष्पवपं पपात ह ॥ २५.॥ 
भरतश्रेष्ठ | एक दिनकर वात है समी यदुवंशी उस 
समामे विराजमान थे } इतनेमे ही दिव्य सुगन्धे भरी हई 
वायु चल्ने ठक्गी ओर दिव्य कुुमोकी वर्षा दने लगी ॥ 
ततः किंककरिखाशब्दः प्रभाजाखभिसंव्रृतः। 
सहर्तमन्तरिश्षे ऽभूत ततो भूमौ प्रतिष्ठितः ॥ २६॥ 
तदनन्तर दो दी घद़ीके अंदर आकाशम किलकिंलाहर- 
का शब्द हु ओ तेजोरारिसे धिरी हर्द दिव्य आकृति 
प्रकट हर्द, जो धीरे-धीरे एथ्वीपर आकर खद हो गयी ।२६। 
मध्ये तु तेजखस्तस्य पाण्डुरं गजमांस्थितः। 
चरतो देवगणेः सर्वेवासवः समदद्रयत ॥ २७॥ 
उस तेजपुञ्खकरे भीतर दवेत हाथीपर वैडे हए इन्द्र सम्पूर्णं 
देवता्करे साय दिखायी द्यि ॥ २७ ॥ 
रामकृष्णौ च राजा स बृष्ण्यन्धकगणैः सह । 
परत्युययु्महात्मानं पूजयन्तः सुरेश्वरम्‌ ॥ २८॥ 
उख खमय महात्मा देवराज इन्द्रका खागतं कसनेके ल्थि 
चलामः श्रीकृष्ण तथा राजा उग्रसेन इष्णि ओर अन्धकवंश- 
के अन्य ठोगेकि साथ उठकर उनकी अगवानी गये ॥२८॥ 
सोऽवतीर्य गजाव्‌ तूर्णं परिष्वञ्य जनार्दनम्‌ 1 
ससखजे वरदेवं च तं च राजानमाहुकम्‌ ॥ २९ ॥ 
इन्द्रने दाथीसे उतरकर शीघ्र ही भगवान्‌ श्रीकृष्णको 
हदयस स्माया; फिर वरूदेव तथा राजा उग्रसेनवे भी वे 
उसी प्रकार मिरे ॥ २९॥ 
दष्णीनन्याम्‌ सस्वजे च यथाकालं यथावयः । - 
पूजितो रामष्टष्णाभ्यामाषिषेश स तां सभाम्‌ ॥ ६०॥ 


विष्णुपवं ] 


चिषष्ितमो ऽध्यायः 


८५९ 


न 
व 


तत्पश्रात्‌ उरन्देनि यथासमय अवस्थके अनुषार समी 


ततः सदैव शक्रेण श्षङ्खचक्रगदासिशत्‌ । 


बृप्णिवंशी वीरको दयते छ्गाया । इसके वाद वलराम ओर प्रतस्थे गरुडेनाधथ सत्यभामासहायवान्‌ ॥ २५ ॥ 


श्रीकृष्णे पूजित दो वे उस दादरी सभाम गये ॥ ३० ॥ 


तत्रासीनो ऽभ्यरंहृत्वा सभां ताममरेभ्वरः । 
अध्यौदिखमुदाचारं भ्रव्ययल्लाद्‌ यथाविधि ॥ ३१९॥ 
वरो बैठकर उस सभाकी शोमा वदति हुए. देवेश्वर इन्द्र 
मे विधिपूर्वक अर्ध्यं आदि उपचार ग्रहण करिया ॥ ३१ ॥ 
वैद्यग्पायन उवाच 
अथोवाच महातेजा वासवो वासवाद्ुजम्‌। 
सान्त्वपूर्वं करेणास्य संस्पृद्य वदनं श्युभम्‌ ॥ २२॥ 
वेदास्पायनजी कष्टते है--जनमेजय ¡ तदनन्तर महा- 
तेजी इन्द्रने अपने अनुज श्रीकृष्णको सान्त्वना देकर उनके 
सुन्दर गुखारविन्दपर हाथ फेरते हए कहा} ३२ ॥ 
देधकीनन्दन वचः णु मे मधुखदन । 
येन त्वाभिगतोऽस्म्यद्य कार्येणामिघ्कर्न ॥ २२ ॥ 
ष्रवकीनन्दन | मधुसूदन ! सत्रुनाशन } आज भँ जि 
कार्यस तम्दारे पास आया ह उत्करे विषयमे मेरी बात 
सुनो ॥ ३३ ॥ 
नेच्छैतो , नरको नाम॒ बजह्यणो बरद्पिंतः। 
अदित्याः छुण्डले सोहाजदार दितिनन्दनः ॥ ३७ ॥ 
(नरक नामवाला एक राक्षस है जो ब्रह्माजीका वरदान 
पाकर धमंडसे भर गया हे ! उस दैत्यने मोहवश देवमाता 
अदितिके दोनों कुण्डल हर व्यि द ॥ ३५॥ 
देवानां विप्रिये नित्यसषीणां च स वतैते । 
तं च देवान्तरं प्रक्ष्य जहि त्वं पापपरूपम्‌ ॥ ३५॥ 
ष्देव ! वह प्रतिदिन देवताओं तथा ऋषियेकि विरोधमे 
ही लगा रहता है अतः तुम अवसर देखकर उस पापात्मा 
पुरुषको मार उठो ॥ ३५ ॥ 
अयं त्वां गरुडस्तत्र प्रापयिष्यति कामभः। 
फामवीयो.ऽतितेजली वैनतेयोऽन्तरिक्षगः ॥ २६ ॥ 
धये इच्छानुसार सर्वत्र जा सक्नेवाके गरुड़ तुम्हे वहो 
पर्चा देगे; क्योकि इनमे यथेष्ट बल है ¡ ये अन्तरिक्षचरी 
विनतनन्दन गरड अव्यन्त तेजस्वी दै ॥ ३६ ॥ 
अवध्यः सर्वभूतानां भौमः स नरको.ऽखुरः 
निधृद्रधित्वा तं पापं क्षिप्रमागन्तुम्दसि ॥ २७॥ 
भूमिपुत्र नरकासुर समसत प्राणि्वोके ल्यि अवध्य है,अतः 
ठम उस पापीका शीघ्र ह्‌ संहार कफे टीट आयोः ॥३७॥ 
इत्युक्तः पुण्डरीकाक्षो देवराजेन केशवः 
प्रतिजक्षे महावाहुर्नरकस्य निवर्दणे ॥ ३८ ॥ 
देवरा के एेसा कदनेपर महाबाहु कमलनयन श्रीकृप्णने 
उनके . सामने नरकायुके संदारफी परतिक्ता की ॥ १८ ॥ 


तदनन्तर शाद चक्र; गदा ओर खङ्ग धारण करनेवाले 
भगवान्‌ श्रीकृष्ण सत्यभामासदहित गरुड़पर वरैठकर इन्द्रके 
साथी चलदिये। ३९॥ 
क्रमेण सत्तस्कन्धानू स॒ मरुतां सदवासवः। 
पदयतां यदुसिहानामू्यमाचक्रमे घटी ॥ ४०॥ 
यदुङुलके सिंह-सटश पराक्रमी वीरे देखते-देखते इन्द्र 
सहित मल्वान्‌ शीङृप्ण क्रमशः वायु सातो स्कन्धोको खष- 
कर ऊपर चले गये | ४० ॥ 
चारणेन्द्रगतः शक्रो गरडस्थो जनार्दनः । 
विदुरत्वात्‌ प्रकाशेते सूयाचन्द्रमसाविव ॥ ४१॥ 
गजराज एेरावतपर चदे दृ. इन्द्र॒ ओर गसड़पर वेढे 
हुए भगवान्‌ जनार्दन अधिक्र दूर चले जानेके कारण सूं 
ओर चन्द्रमाके समान प्रकारितहो रदे थे) ४१॥ 
अन्तरिक्षे च गत्धर्वैरण्ससोभिश्च केशवः । 
स्तूयमानोऽथ शक्रश्च क्रमेणान्तरघीयत ॥ ४२॥ 
अन्तरिक्षम गन्धर्वं ओर अप्ठरा्ओदारा स्वति किये जति 
हुए श्रीृप्ण ओर इन्द्र वारी-वारीते अदश्य हो गये ॥ ४२ ॥ 
समाधायेतिकतव्यं वासवो षिबुधाधिपः। 
खमेव भवनं प्रायात्‌ रष्णः प्राग्ज्योतिषं परति ॥ ४३ ॥ 
अपने कार्यकी सिद्धिके ल्यि उपयुक्त भ्यवस्था करके 
देवराज इन्द्र अपने भवनको चले गये ओर श्रीकृप्णने 
प्ाग्ज्योतिषपुरकी राह टी 1} ४२1) 
पक्षानिहतो वायुः परतिखोमं ववौ तदा 1 
ततो भीमरवा मेघा वश्चमु्गगनेचसाः ॥ ४४॥ 
गर्डके पंखेसि आहत होकर वायु उर्टी दिशाको वहने 
लगी † फिर तो आकारमे विचरनेवठे बादल भयानक आवाज- 
के साथ वर्दी चकर काटने सो ॥ ४४॥ 
क्षणेन समनुप्राप्तो द्विजेनाकादागेन वै। 
दुरादेव च तान्‌ दष्ट प्रययौ यत्र ते स्थिताः ॥ ४५॥ 
आक्राशचारी पक्षी गरुढके द्वार भगवाम्‌ श्रीक्ृप्ण क्षण- 
भरं प्रग्ज्योतिषपुस्मे जा पहुचे । उन्दने दूरसे ही उन 
राक्षसोको देखकर जहो वे खढ़े थे, उधर ही यात्रा की ४५] 
अपद्यद्‌ दारि तथस्थां हस्त्यश्वस्थवादिनीम्‌ 1 
वसन्तान्‌ मौरवाग्पादान्‌ पटसदलान्‌ ददर ६।५६। 
भरङप्णने देखा, प्राग्योततिपपुरे द्ाखसर हाथी, घोढे 
ओर्‌ सर्पोकी विद्या वादिनी खद है । उन्दनि भुर दैत्यके 
यनाय हए छः हजार पाश देवे, जिनके क्रिनारेके मागेमिं दुरे 
ल्गे हुए थे ॥ ५६॥ 


४६० श्रीमद्ाभारते सिरुभागे [ हरिषंशे 
वैशम्पायन उवाष इनदरादानिरिनेन्द्रेण चिद इव - निःखनः । 

गख्डस्योपरि धीमाज्छष्ुचक्रगद्ए्धरः 1 आकर्णं चिश्चेप अचन्द्र खुोत्तमः ॥ ५४॥ 

विध्र्ीलाम्बुवाकारं पीतवास्ाश्चतुर्युजः ॥ ७७ ॥ मध्यदेदे ल॒ चिच्छेद गदां तां रुकमभूषिताम्‌ । 


वेदाम्पायनजी कष्ते है--जनमेजय | शद्ध, चक्र 
ओर गदा धारण करनेवाले श्रीमान्‌ भगवान्‌ श्रीकृप्ण श्याम 
मेधके खमान सुन्दर विग्रह धारण कयि गर्ड़पर बैठे थे । 
उनके अङ्खपर पीताम्बर शोभा षा रहा था) वे चार थुजार्थौँ 
से विभूषित थे ॥ ५७ ॥ 


घनमाखाङकखोरस्कः श्रीवत्साङ्कितभूषणः 
फिरीरः दी सूयोभः सविदयदिव चन्द्रमाः ॥ ४८॥ 


उनका वक्षःखल वनमालसे व्याप्त था | वे श्रीवत्स- 
चिहसे अटत थे । उनके मस्तकपर किरीट शोभा पाता थाः 
जिसे वे सूर्थके समान प्रकाशमान ओर विचयुतूसदित चन्द्रमा- 
के सदृश शोभायमान दिखायी देते ये ॥ ४८॥ 


ज्यां विक्ुजन्महाराब्दः श्रूयतेऽङइानिनिःखनः 1 
क्षात्वा च दानवः स्वं खयं विष्णुरिहागतः ॥ ४९ ॥ 
उन्दनि धनुप्रकी प्रत्यञ्चा खींचकर जव उसकी टंकार- 
ध्वनि कैथी, उस समय वञ्रपातकरे समान महाभयंकर शाब्द 
सुनायी दिया । तव दानव मुरने वह सत्र जानकर यह समञ्च 
लिया कि साक्षात्‌ भगवान्‌ विष्णु ही यहो पधार ह ॥ ४९ ॥ 
क्रोधाद्‌ द्विगुणरक्तासमो सुरः कालान्तकोपमः । 
अभ्यधावत वेगेन शकि गद्य महासुरः ॥ ५० ॥ 
इसते सुखकर वडा क्रोध हु । उसकी अखि रोषते 
दुगुनी चल दौ गयीं । काल जओौर अन्तक्रकै समान भयंकर 
वह महान्‌ असुर हाथमे शक्ति केकर वदे वेगसे उनकी 
ओर दौड़ा ॥ ५० ॥ 
चिक्षेप खुमहाराकि वञ्रकाञ्चनश्ूषिताम्‌ । 
तामापतन्तीं शकि तु महोर्कां ज्वकितार्मिव ॥ ५१॥ 
समाधत्त शरं चैकं सकमपुङ्‌खं जनार्दन; । 
द्विघाच्छिनत्‌ श्चुरप्रेण वाखुदेवः स वीर्यवान्‌! ५२ ॥ 
उसने हीरे ओर सुवर्णे भूप्रित वद महागक्ति भगवान्‌ 
श्ीकृप्णपर चरायी । जठ्ती हुई बडी" भारी उल्काके समान 
उस दक्तिको अपनी ओर आती देख पराक्रमी वखुदेवपु्र 
श्रीकृष्णे एक सोनकर पंखवाटे ब्णकरोः धनुषपर रक्ा । 
उसष्षुरप्रके द्वारा उन्दने मुरकी शक्तिके दो टुकडे कर उले॥ 
शकि चिच्छेद ततासौ विदयु्पु्च इव ज्वलन्‌ । 
पुन करोधरकाक्षो सरुगरंद्य महागदाम्‌ ॥ ५३ ॥ 
जव्र उन्दने शक्ति काट डाली; तव वरहो खड़ा हुआ 
मुख, जो विदयुत्‌-पुद्धके समान प्रस्वल्ति दो रदा थाः पुनः 
क्रोधे सल अखं करके एक विशार गदा हाथर्मेठेटी॥ 


पुनधिच्छेद्‌ भट्टेन दानवस्य शिसये रणे ॥ ५५॥ 

इतनेहीरमे सुरश्रेष्ठ श्रीकृप्णने अधचन्द्रनामक वाण हाथ 
च्या, मानो इन्द्रने वन्न उठा ख्या द्ये] उस समय धतु 
को वीचनेते व्र गिरनेके समान शी छब्द हुआ । भगवानने 
उस अर्धचन्द्रको कानतक खींचकर चाया | उसने उस 
सुव्णभूप्रित गदाको धीचसे ही काट गिराया } फिर शरीकृष्णने 
एक भचछछद्वारा रणभूमिमै उस दानकवक्रा सिर उड़ा दिया ॥ 


संछिद्य पाडान्‌ सर्वास्तान्‌ सुरु हत्वा सवान्धवम्‌ । 
सोऽग्रयान्‌ रक्मोगणान्‌ हत्वा नरकस्य महावदखान्‌ ॥५६॥ 
शिरासंधानतिक्रस्य भगवान्‌ देधकीषुतः। 
अपद्यद्‌ दानवं सैन्यं निसुन्द च मदावलम्‌ ॥ ५७॥ 
हय्रीवं च दितिजं तथा्याधिधरयोधिनः। 

मुखके समस्त पार्शोका छेदन करे उसे भारई-न्धुर्ओः 
सित मारकर नरकासुरके मदा्रली अग्रगामी र्षरसोका संहार 
करनेके अनन्तर रिलासमूह्को रेधिकरर भगवान्‌ देवकी- 
नन्दन श्रीकृप्णने दानवोँकी विशार उेनाको ओर महावली 
नियुन्द दैत्यः हयग्रीव तथा विचित्र युद्ध करनेवाऊे अन्यान्य 
द्योको भी देखा ॥ ५६-५७१ ॥ 


रोचथामास तन्मार्गं सख्सेन्येन महावलः ॥ ५८ ॥ 
निसुन्द विनां श्रेष्ठो रथमारुह्य सत्वरम्‌ । 
जग्राह कामुकं दिव्यं हेमपृष्ठं दुरासदम्‌ ॥ ५९ ॥ 
व्रलवारनमिं श्रेष्ठ महावटी निसुन्दने अपनी सेनक दारा 
श्ीङकष्णका मार्गं रोक दिया ओर तुरंत सथपर आसद्‌ हो 
सोनेकी पीठवाडे दिव्य दुर्जय धनुषको द्याथमे ठे ल्या॥ 
विव्याध दृरभिवीणनिंखन्दो मधुखदनम्‌ । ` 
केशवश्चापि सप्तत्या विव्याध निहिततैः कूरः ॥ ६०॥ 
इसके वाद ॒निसुन्दने दघ बाणोसे मधुसूदनको वेध 
दिया । तव श्रीकृप्णने मी उ्षपर सत्तर वैने चार्णोकरा प्रहार 
क्रिया | ६० ॥ ` 
अप्राप्तांश्चान्तरिद्ये ताञ्छरांध्चिच्छेद माधवः। 
ते स्वं सेनिकाः छृष्णं समन्तात्‌ पर्यवारयन्‌ ॥ ६१ ॥ 
शारजलिन महता खयमानः खयोत्तमः 
दष्ट तान्‌ दानवान्‌ सर्वान्‌ सक्रोधो मधुसूदनः ॥ ६२ ॥ 
, उम दानवके. बाणोकरो अपने पास पर्हुचनेसे पहले आक्राश 
दी श्रीकृप्णने काट डास्म । तत्र उसके सेनिकोने उन्ह 
चसे ओर घेर लिया ओौर वाणे वचाल जाते ठकना 
आरम्भ किया । तत्र उन समस्त दानवोको देखकर भगवान्‌ 
मधुसूदन कुपित हो उठे ॥ ६१-६२ ॥ 1 


६ 


विष्णुपर्व 1} 


भिषष्टितमो ऽस्याः 


७६ 


ननन 


ततो' दिव्येन चाखरेण पारजन्येष अनादेमः । 

प्ररता शश्रवप्रण धास्यामास तष्टकम्‌ ॥ ६२॥ 
जनार्दने पार्जन्यनामक दिव्य अछसे व्रार्णोकी बड़ी 

भारी वर्प कफे उसकी सेनाको अगि वदुनते रोक दिया ॥ 


पञ्चपञ्चररेसतेणु पकैकेन च तान्‌ वह्रन्‌ । . 
पा्जन्यस्य “प्रभावेण सवौन्‌. मर्मखताडयत्‌ ॥ ६७ ॥ 
उन्दने पार्जन्य असफ प्रभावते एक-पक करके उन 
सवर वहुसंल्यक दानर्वोके मर्मखामं पेचर्पोच ` वाणोका 
प्रहार किया ॥ ६४॥ 
ददुुभयखंस्ता भ्नास्ते दानवा रणे । 
स्वसैन्यं विद्रुतं द्र निश्चक्राम 'पुनररधे.॥ ६५ ॥ 
वे सभी दानव भयसे संच्रस्त होकर रणभूमिसे भाग 
खड़े हुए । अपनी सेनाको भागती देख निसुन्द पुनः युद्धके 
स्यि निकला ॥ ६५.॥ 
विखजन्छरवप्रीणि छष््यामासर केशवम्‌ । 
न विभाति रणे सथो नापि व्योम दिसो दश्च ) ६६ ॥ 
वह वाणोकी वर्षा करता हुमा श्रकृ्णकरो आच्छादित 
करने लगा | उस समय युद्धम न तो सूरय॑का पता चङ्ता था 
ओर न आकाम तथा दसो दिशओंका ही ॥ ६६ ॥ 
शरः संछादथामास निुन्दो गरुडध्वजम्‌ । 
साधिं नाम दिव्यां जग्राह पुरुपोत्तमः ॥ ६७॥ 
निन्दने अपने बाणेसि गरुड्-ध्यजको ढक दिया । तवर 
पुरोत्तम श्रीकृष्णने सावि नामक दिव्याछ्रको रहण किया। 
तेन वाणेन ताम्‌. वा्णाध्िच्छेद समरे हरि; । 
चणेवर्णाश्च संच्छय तस्य कप्णो महावखः ॥ ६८॥ 
छत्रमेकेन वणेन स्थेपां च तरिभिः शै। 
पुनश्चिच्छेद तानश्वश्चतुर्भिश्चतुरः श्रेः ॥ ६९॥ 
सारथि पञ्चभिवोणैष्वेनमेकेन चिच्छिदे । 
उस अस्सदास दे हुए वाणे रुमराङ्गणम भरीहरिने 
निसुन्दके उन समी वाणोको काट डा । महव्रटी श्रीृध्णने 
अपने व्रा्णोद्रारा उसके सायकोके इुकडे-टुकडे करके एक 
वाणे उसका छत्र सौर तीन वर्णते उसे रथका हरसा 
काट डाला; फिर चार्‌ वासे उसके चर घरोडोको ओर पोच 
याणेषि सारथिको माकर एक काणते उसकी ध्वजा काट डाली 
शरेकेन चपुः कृप्णः सुतीक्ष्णेन शितेन वै ॥ ७० ॥ 
दिर्विच्छेद भस्टेन निखुम्दस्य सखुयेत्तमः। 
किरि सुरभे शरीह्ष्णने एक अच्यन्त तीष बाणते उर 
शरीरो ओर एक, भटके दयाया नियुन्दके सस्तकको भी 
काट गिराया ॥ ७०३ ॥ 
यः सहस्रसमासत्येकः सवौन्‌ देवानयोधयत्‌ ॥ ७९१ ॥ 


निदनं पतितं ष्ट्रा श्यद्रीवः प्रतापवान्‌ । 
शिलां प्रगृह्य महती तोखयामास दानवः ॥ ७२॥ 
जिसने अवले ही लगातार एक सदश्च प्परोतक सम्पूण 
.देवतामोके खाय युद्ध किया था, उसी निन्दको धराशायी 
हुमा देख प्रतापी दानव ्यग्ीवने एक यहत यड़ी च्यन 
ठेकर उसे ्ार्थोपर तोला ॥ ७९.७२ ॥ 
माविष्य सदसामुश्चच्किलां दौरसमां प्रभुः । 
गृष्टीत्वा दिव्यपार्जन्यमख्मस्रविदां ' पुरः ॥ ७३ ॥ 
दिव्याख्रेण रिखां विप्णुः सप्तधाटत तेजसा । 
तद्‌ विदायं मष्टयाहम पातयामास भूतरे ॥ ७४॥ 
फिर ससा धुमाकरं बह पदटाङ-जैसी शिला उसने 
श्रीकृष्णपर दै मारी, परंतु अश्वेत्ता्जमिं र्ठ भगवान्‌ विष्णु- 
मै दिव्य पार्जन्याछ्च केकर असक द्वारा अपने तेजसे उत 
क्षिके सात दुंकदे कर डि ! उस वहुत बड़ी चदानको 
विदीणं करे उन्हने पएृथ्वीपर गिरा दिया ॥ ७३-७४ | 
ततस्तैः शा्खनिर्युंकैनौनावणेर्मदादरैः । 
यथा देवाश्चरं युद्धमभवद्‌ भरतषभ । 
नानाप्रहरणाकीर्ण तथा धोरमवर्त॑त ॥ ७५ ॥ 
भरतश्रेष्ठ ! तदनन्तर शाङ्गधनुषसे छोढे गये नाना 
प्रकारके महान्‌ बाणास देवासुरसंग्रामके समान घोर युद्ध 
आरम्भ दे गया । उसमे भोति-भमंतिके अख्-शख छोड 
जाने गे, जिनसे सारा युद्धस्र व्यत्त दो गया ॥ ७५ ॥ 
ततः शाङम्गंधिनिरमेनौनावणेरमहा शरः । 
गरुडस्थो मदावाहूर्निजघान मदहयाुरान्‌ ॥ ७६॥ 
तलश्वात्‌ यरुड्पर वैठे दए महाबाहु शरीकृप्णने शाङ्ग 
धनुप्रसे छोडे गये 'रमोति-ेतिके रंगवाञे विशार वा्णोद्रार 
वदे-वडे असुका खंडार करना आरम्भ किया ॥ ७६ ॥ 
सहालाद्गलनिर्भिन्नाः शङ्लदाकिनिपातिताः । 
विनेद्युदौनवाः सरवै समासाद्य जनादेनम्‌ #॥ ७७ ॥ 
वे समस्त दानव भगवान्‌ श्रीकृष्यसे टकर ठेकर उनके 
दारा चल्ये गये महान्‌ च्वे विदीर्णे तथा उनके शद्खुकी 
शक्तिसे धराशायी दयेकर नष्ट हौ गये } ७७ ॥ 
फेचिच्यक्राधिनिदग्या दानवाः पेतुरम्वशात्‌ । 
संनिकपंगताः केचिद्‌ गतासुषिङ्तानना; ॥ ७८॥ 
कितने दी दानव उनकरे निकट आकर चक्रागनिसे दग्ध 
दो आकारे ध्ष्वीपर गिर पड़े । प्राणशचन्य होनेपर्‌ उनके 
सुख विकराक दौ गयेये। ७८ ॥ 
असजञ्छरवपपणि , दृष्िमन्त दवाम्बुदाः । 
विङूताद्भासुसः सवे छृष्णवाणभ्रपीडिताः 1 ७९ ॥ 


` दोणिताक्ताः स्म यन्त पुप्पिता इव क्रिद्युकाःे 


भ्यदववन्त विधर्ता भभास्नाश्चियोधिनः ॥ ८०॥ 


४६२ 


भरीमदहाभारते सिख्भगि 


[ हरिचंशे 


वे असुर वर्प्र केवले बादलौकी भाति श्रीकृप्णपर 
वार्णोकी दृष्टि करने खगे; परत श्रीकृष्णक्रे सायकरति अत्यन्त 
पीडित होकर उन सवकरे अंग-भंग हो गये ओर वे सूलस 
रग जनके कारण पठे हुए पलरके समान दिखायी देते थे। 
विचित्र युद्ध करनेवाठे वे दानव अपने अघ्ल-शघ्लौके भंग 
हो जानेसे अत्यन्त मव्रभीत दो माग खद हुए ॥ ७९-८० ॥ 


पुनश्च क्रोधरकक्षो वायुवेगेन दानवः। 
दश्षव्यामोचि्रतं वक्षं समारुह्य वनस्पतिम्‌ ॥ ८१ ॥ 
बृ्षमुत्पास्य वेगेन प्रतिगरह्याभ्यधावत । 

तत्र पुनः कोधे खर अखि करके दानव हयग्रीव वायु- 
के समान वेगसे चद्‌ आगरा । उसने द न्यामं ऊचे एक 
वनस्पततिक्रो उखाड़ा ओर उखादकर उस वबृक्षको दार्थ 
लि हए वह बडे वेगते श्रीृष्णकी ओर दौड़ा ॥ ८१९ ॥ 
चिक्षेप स माच्च दिक्षया सुघनारूतिः ॥ ८२॥ 
चृक्षवेगानिखोद्ूतः श्वश्ववे खमहाखनः। 

काठे बादक्के समान आक्रारवले हयग्रीवने उस विशार 
दृभको शिक्षाक अनुसार कुशरवापुर्वक शरीक्ृप्णपर दे माया । 
उस इृक्षक वेगसे उटी हुई वायुकरे द्वारा वड़े जोरका शब्द्‌ 
सुनायी पड़ा ॥ ८२३ ॥ 
ततः श्षरसश्खरेण यतमानो जनार्दनः ॥ ८३॥ 
नैकधा तं प्रचिच्छेद चित्रभाुनिभारूतिम्‌ } 

तत्र विजयके द्वि प्रयत्न करते दए. भगवान्‌ श्रीङ्प्णने 
एकर सहख व्राण मारकर उख वक्ष व्रहुतेरे इकडे कर उलि । 
उस समय उसकी आकृति चित्रल्खित सूरयकरे मान जान 
पड़ती थी ॥ ८३१ ॥ 
पुनश्चैकेन वाणेन हयग्रीवस्य चोरसि ॥ ८४॥ 


विव्याध स्तनयोर्मध्ये सायको ज्वरुनप्रभः। 
विवेश सोऽपि वेगेन हदं भिचा विनिर्गतः ॥ ८५॥ 


फिर उन्न एक वाणे हयग्रीवकी छती छेद डाली । 
अग्निके समान प्रकारित होनेवाटा वह वाण उसके दोर्नो 
स्तनोके बीचमे गहरा आधात करता हा वेगपूर्वंक भीतर 
घुस गवा ओर हदव विदीर्ण करे ब्रादर निकर गया ॥ 


तं जघान महाघोरं हयग्रीवं मदावलम्‌ । 
अपारतेजा दुर्धपः स वै यादवनन्दनः ॥ ८६ ॥ 
मध्ये लोरहितगद्धस्य भगवान्‌ देवकीसुतः 
ओंद्क्रायां विरूपाक्षं पाप्मानं पुरोचमः ॥ ८७ ॥ 


इस प्रकार अपार तेनघ्वी दुरध्॑पं वीर यादवनन्दन 


१. दोनों ञ्ुनाओकेो दोनो ओर फैलानेपर एक दाथकी अयुलिरयो- 
के शिरसे दृक्तरे दायकी ्थएखियेक्रि सिरेतक जितनी दूरौ होती है 
ठ्से व्याप कते दै । 


भगवान्‌ देवकी पुत्र पुख्पोत्तम श्रीकृप्णने खोदितगङ्ध# नामक्र 
्रदेरके मध्यमाग्म ओका ( या अल्का ) के समीप छरुल्प 
नर्बोवाटे महाभयंकर ओर मदाव्रली पापी हयग्रीवकौ कालके 
गातम डाठ दिया | ८६-८७ ॥ 
भरषठौ शतसहस्राणि दानवानां परंतपः। 
निदत्य पुरुषव्याघ्रः भ्राण्व्योत्िपमुपाद्रवत्‌ ॥ ८८॥ 
तव्यश्वात्‌ आठ खख दानर्वोका संहार कफे शनरुर्ओूको 
संताप देनेवलि पुरप्र्धिह श्रीकृष्णने प्राग््योतिपरपुरपर धावा 
करिया ॥ ८८ ॥ 
हत्वा पञ्चनग्र नाम नरकस्य महासुरम्‌ । 
ततः प्राग्ज्योतिं नाम दीप्यमानमिव धिया ॥ ८९ ॥ 
पुरमासाश्चयामास युद्धं तचाभवन्महत्‌ । 
नरकाञ्रफे प्रमुख योद्धा मदान्‌. असुर पंचनद (या 
पञ्चजन) को मारकर वे प्राग््यौतिपरपुरम जा पर्हुचे, जो अपनी 
द्ोमासे देदीप्यमान-खा दो रहा था। वरदो असुरेकि साथ 
उनका महान्‌ युद हुआ ॥ ८९४ ॥ 
ततः प्राध्मापयच्छङवं पाञ्चजन्यं महावलः ॥ ९०॥ 
स्रवे सुमदारव्दः संवर्तनिनदो यथा । 
श्रूयते चजिषु रोकेयु भीमगम्भीरनिःखनः । 
तं श्रुत्वा नरकश्चासीत्‌ क्रोधसंरक्कखोचमः ॥ ९१॥ 
तत्पश्चात्‌ महावटी श्रीकृप्णने अपना पाश्चजन्यनामक 
शद्ध बजाया । उखका महान्‌ शब्द उखी प्रकार सुनायी-दियाः 
सते प्र्यकाटीन संवर्तक मेधकी भयानक गम्भीर गर्जना 
तीनों लोकम सुनायी पडती दै । उस शद्ध-ष्वनिको सुनकर 
नसकाुरकी अविं करोधवे चल छे ग्य ॥ ९०-९१ ॥ 
खोदचक्राष्श्चयुकतं जनिनक्वपरतिमं स्थम्‌ । 
रलकाश्चनचित्राद्वं वेदिकाभोगविस्तरम्‌ ॥ ९२॥ 
वञ्रध्वजेन महता काञ्चनेन विराजितम्‌ । 
हेमदण्डपताकादयं चैदुर्यमणिक्रुचरम्‌ ॥ ९३.॥ 
युकमदर्वसदस्रेण स्थं पररथाख्जम्‌। -- , 
लोदजखैश्च संछन्नं चि्रभक्तिविराजितम्‌ ॥ ९४॥ 
वह एक एेसे रथपरर आरूढ हथः जिम लेोदैके आर 


# 


# यह्‌ सिन्युका दी प्रदेकदिषेप था] 


२. वहो जल्की अपिक्ता थीया जल्पे भरी हदर्‌ खाई थीः 
सल्यि उस पुर या सानका नाम (जीदका' रखा गया था । 
मदामारत सभापवं पृष्ठ ८०५ मेँ भी प्सका वणन माया दहे। 
हरिवंशके रपी अध्याये १४ वँ छोकमे श्सका नान अलका 
भाया दै। ~ 


विष्णुपवं ] 


चिषष्ितमो ऽध्यायः 


ज~ ~~~ ज~ 


पद्ये लगे थे । उसकी ंवाई तीन नर्क वरावर थी ! वद 
रल ओर सुवर्णे जटित होनेकरे कारण विचि सोभासे 
सम्पन्न था | उसकी व्रैठक ब्रहुत विस्तृत थी] वह रथ सुवर्ण 
निर्मित तथा हीरकजटित विशाख ध्वजते सुरभित था । 
उसकी पताका सोनेका डंडा लमा हुजा था । उस रथका 
कूवर वैदूर्यं मणिका वना हुमा था । उसमे एक हजार घोडे 
जते हए ये ओर वह शत्नुपक्चके रर्थोक तोड़ डाल्नेमे समर्थं 
था । उसे उपरते ठोदेकी जालीदार ठक दिया गया था 
ओर वह रथ विचित्र बेरे सुरोभित था ॥९२-९४॥ 
रथमध्यगतो चीरः खसंभ्य ईव भास्करः । 
नानाप्रदरणाकीर्ण र्थं हेमपरिष्कृतम्‌ ॥ ९५॥ 
उस स्थके मध्यमाग्मे वैठा हुआ नरकायुर संध्या- 
काठ्से युक्त सूरयके समान जान पड़ता था | उसका वद्‌ 
सवर्णभूषित रथ नाना प्रकारे अखर-शक्लेति मरा हमा था॥ 


च्रं तथोरुछदमिन्दुवणं 
व्यानद्धसुकानखवुल्यतेजाः । 
किरीदमूद्धौकंडतारनाभः 


कणौ तथा कुण्डलयोर्ज्वङन्तौ ॥ ९६ ॥ 

हीरेका बना हुआ वक्षःसखलको ढकनेवाला उसका कवच 
चन्द्रमाके समान धेत कान्ति प्रकादित हो र्दा था। 
मुक्तकी माटा धारण करके वह अग्निक तुल्य तेजस्वी प्रतीत 
होता था । मसतकप्र उदीप किरीट धारणं करफे वह सूर्यं 
एवं अग्निकी-सी प्रभासे प्रकारित होता था तथा उसके दोनों 
कान सुन्दर कुण्डलोँसे जगमगा रदे थे |! ९६ ॥ 
धूष्रवणौ महाकाया रक्ताक्षा विरूताननाः। 
नानाकवचिनः सवै दैत्यदानवराक्चसाः ॥ ९७ ॥ 

उसके साथ धुर्ठैके समान रंगवाटे विशाल्क्राय लाल 
नेर ओर विकयाल मुखवाके जो दैत्यः दनव ओर राक्चष 
अये येः वे सवर-के-सव नाना भकारे कवच धारण कयि 
हए थे ॥ ९७ ॥ 
खड्गचमंघराः केचित्‌ केचित्‌ तूणधयुर॑तः । 
शकतिहस्तास्तथा केचिच्छ्रलदस्तास्तथापंरे ॥ ९८ ॥ 

कोद ढक ओर तक्वार व्यि हुए थे तो कोद धनुष, 
बाण ओर तरकस । किन्दीके हाथमे शक्ति थी ती किन्दीके 
हाथमे श्रू ॥ ९८ ॥ 
गजवाजिरथोेश्च चाख्यन्तश्च मेविनीम्‌ । 
निययुनगरात्‌ सतँ खसंनद्ः प्रहारिणः ॥ ९९॥ 


१. प्राचीन कारकौ मान्यताक्षे मुस्र भूमिकी एक प्रकारको 
नापया परिमाण; जो किसके मत्से सौ दाथका ओर किसीके 
सहे चार सौ हाथका होता था 


वे पवर भठीमोति कवच जआदिसे सुसजितत एवं प्रहार 
करनेके व्यि उदयत हो हाथी; धोड़े, तथा रथसमूर्होद्ारा 
प्रश्वीको कम्पित करते हुए नृगस्ते बादर निके ॥ ९९ ॥ 
वृतो दैत्यगणैः सार्ध नरकः कारसंनिभः । 
भेरीशद्भश्ठदङ्गानां पणवानां सदसः ॥१००॥ 
शुश्राव वाद्यमानानां जीमूतनिनदोपमम्‌ । 

दैत्य-समूहोसे ध्रिरे हुए कार्ष नरकरारने व्रजते हण 
गङ्ख, भेरीः दद्ध तथा पणव आदि सदलं वार्ोका मेघकी 
गजनाके समान गम्भीर शब्द्‌ सुना ॥ १००३ ] 


यतः छृष्णस्ततो गत्वा सवं ते विङूताननाः ॥१०१॥ 
परिचाय्यं गसत्मन्वं सर्वेऽयुध्यन्त संगताः । 
वे समी विकरारु मुखवके निशाचर जर्हो कृष्ण ये 
उधर दी जाकर गख्ड़को घेरकर खडे दौ गये ओर सव्र-के- 
सव्र संगठित होकर्‌ युद्ध करने लये ॥ १०१३ ॥ 
महता छदयामाखुः रारवपेण सैनिकाः ॥१०२॥ 
शक्तिदूलगदाप्रासांस्तोमसन्‌ सायकान्‌ वहून्‌ । 
आकाशं उदयामासुर्विंमुश्चन्तः सदसः ॥१०३॥ 
उन समस्त सैनिर्कौनि वार्णोकी चड़ी मायी वर्षा करे 
भगवान्‌को ठक दिया) उन्दोनि कर्द सहस्र रक्तिः शूट 
गदाः प्रा, तोमर ओर सायकोका प्रहार करके अकाशको 
आच्छादित कर दिया ॥ १०२-१०३ ॥ 
कृष्णः रष्णाम्बुदाकारः दाग द्य धयुस्ततः । 
विस्फायं सखमहच्वापं धसुर्ज॑छदनिःखनम्‌ ॥१०४॥ 
व्यख्जच्छरवषणि दानवानां जनार्दनः। 
दारवपेण तत्सैन्यं भ्यद्रवत्‌ तु महादवात्‌ ॥ १०५॥ 
काले मेधके समान दयामसुन्दर अरीरवाके जनार्दन 
शरीकरृणणने मेघकी ग्जनाकरे समान गम्भीर ध्वनि. करनेवाठे 
शाद्धनामक सुविखार धनुपरकरो दाथ लेकर उसे खचरा 
ओर दानवोपर ब्राणोकी व॒र्षा आरम्भ कर द्‌ी | उस ब्राण- 
वपसि भयभीत हो असुरोकी वह सेना उस महासमरसे मास 
खड़ी हुई ॥ १०४-१०५ ॥ 
तद्‌ युद्धमभवद्‌ घोरं घोररूपेण रक्षसा । 
भग्ननयुह्ाश्च ते सवं ईष्णवाणप्रपीडिताः ॥१०६॥ 
उस भयंकर स्यधारी राक्षसके साथ श्रीकृष्णका घोर 
युद्ध हुमा । वे सभी दानव श्रीकृष्णके वाणे अत्यन्त पीडित 
हयो अपनी सेनाका व्यूह्‌ भंग करके भाग गये ॥ १०६ ॥ 
केचिच्छिन्नसुजाश्वेव च्छिन्नभ्रीवाशिराननाः । 
केचिश्चक्रद्धिधाच्छिन्नाः केचिद्‌ चाणार्दितोरसः॥ १०७॥ 
किर्दीकी सुजा कट गयी थीं, किरन्दीके कण्ठ, मस्तक 
जर मख चछिन्न.मिन्न दो गये थे । किनन्दकि चक्रदवारादो 


इकडे हो गये थे ओर चिन्दीके वक्षःखल वाणोके आघाते 
पीडित हो रहै ये ॥ १०७॥ 


४६८ 


केचिद्‌ द्विधारृताः श्वक्त्या गजाश्वर्थवा्नाः । 
केचित्‌ कौमो्कीभिष्नाः केचिश्क्रविदारिताः ॥ १०८॥ 
को हाथी, घोदे यौर रथोपर उवार दोकर युद्ध करने- 
नि योद्धा शक्तिके प्रहारे दो टक हो गये थे! को 
फौमोदक्री गदाके आधातसे पिस गये थे तथा क्रितने ही 
चक्रद्वारा विदीर्ण कर दिये ग्येये॥ १०८ ॥ 
धवं विमिता सवी नराद्वरथवाष्टिनी । 
तत्रासीन्नरकेणास्य युद्धं परमदारुणम्‌ ॥१०९॥ 
हस प्रकार मनुष्यः धोड़ेः रथ ओर हाथि्योसि युक्त षह 
सारी सेना मथ डाली गयी थी | वर्य नरकासुरके साथ 
भगवान्‌ श्रीकृप्णक्रा अत्यन्त दादण युद्ध हुमा था ॥ 
यत्‌ समासेन वक्ष्यामि तन्मे निगदतः शण । 
त्रासनः सुरसंघानां नरकः पुरुषोत्तमम्‌ ॥११०॥ 
योघयामास तेजखी मघुचन्मधुखूदनम्‌। 
करोधस्कान्तनयनो नरको धनसंनिभः ॥१११॥ 
यर मै षंकषेपसे जो कुछ बता रहा ह, वह मेरे मुखते 
सुनो । देवसमूहको चास देनेवाल तेजस्वी नरकासुर मधुकी 
भोति मधुसूदन भगवान्‌ पुरुषोत्तमके साथ युद्ध कसे र्गा । 
उसके नेत्रपरान्त फरोधते खल हयो रहे थे ओर उसकी आङ्ति 
मेधके समान काटी थी ॥ ११०-१११॥ 
जग्राह कामुकं चीरः राक्रचापमिवोद्षम्‌ । 
तथाकंक्निरणप्रव्यं याणं जग्राह केदावः॥११२॥ 
वीर भ्रीकृर्णने इन्द्रधनुर समान ऊँचा शरासन उठाया 
ओर सूर्यकिरणेकि समान चमचमाता हभ बाण हाथ च्वा॥ 


दिव्येनास्ेण समरे पूरयामास तं रथम्‌ । 
उत्तमाखं मष्टापातं सुमोच नरको यदी ॥११३॥ 
उन्दनि समराङ्गगमे अपने दिव्याल्द्यारा नरकापुरके 
उस रथको भर दियाः तव व्रल्वान्‌ नरकासुरने भी बडे वेगसे 
आधात करनेवाटे उत्तम अका प्रहार किया 1 ११३} 


वज्रविस्ए्जिताक्रारम।यान्तं बीक््य फेशवः। 

चिच्छेदाखं महाभागच्यक्रेण मधुषृद्रनः ॥११४॥ 
व्रकरे समान गङ़गड्ाहट पैदा करते हुए उस अखकरो 

अति देख मष्टामाग मधुसूदन केशवने चक्रके द्वारा उसका 

उच्छेद कर डाला ॥ ११४॥ 

व्यदनत्‌ सारथि चास्य रेकेण जनार्दनः 

स रथं सध्वजं सादं जघान दशभिः शरेः ॥११५॥ 
भगवान्‌ श्रीङृप्णने एक वाणसे उसके सारथिको मार 

डाला ओर दस बार्णोषे ध्वज ओर धोड़ँसहित उस रथका 

संहार कर डास ॥ ११५ ॥ 

तनुधं चेव चिच्छेद शरेण मधुखदनः। 

चतो विमुरुकवचः सर्पस्येव तदयथा ॥११६॥ 


शीमहाभारते लखिलभागे 


[ रिव 


इसके बाद मधुसूदनने एकं ब्राणसे उसके कवचको काट 
गिराया । कवच कट जानेपर उसका शरीर कंदुकसे निकठे 
दुष्ट षक समान प्रतीत होने खगा ॥ ११६ ॥ 
हतश्वोऽपि रणे वीये वितघुचश्च दानवः। 
जग्राह विमरज्वालं खोदभयार्पितं च्टम्‌ ॥ ११७ 
आविध्य सहसा मुक्तं ्यूलमिन्द्राशनिप्रमम्‌ । 

घोटके मारे जाने तथा कवचके कट जनिपर भी 
रणभूमिमे खड़े हुए उस दाव कीरने एक निर्मल उ्वालसे 
युक्तः हमारे सम्पन्न ओर सुद्‌ श्रू हाथमे लिया, जो 
इन्द्रके वच्रकी भति प्रकारित दो रहा था] उसने उस 
श्रूखको सष्टसा घुमाकर छोड दिया ॥ ११५७३ ॥ 
तदापतत्‌ स सम्परय शूलं हेमपरिष्कृतम्‌ ५९१८॥ 
द्विधा छिन्नं क्षुपेण रुष्णेनाद्भुतकमेणा । 

उस सुवर्ण॑भूषरित श्ूल्करो अपनी ओर आता देख 
अद्धुतक्मां श्रीकृप्णने एक श्चुखके दवारा उसके दो टड्कदे 
कर डाठे ॥ ११८९ ॥ 
तद्‌ युद्धमभवद्‌ घोरं घोररूपेण रक्सा ॥११९॥ 
हाखरपातमक्षघातं नरफेण मदात्मना । 


उस समय उनका उस भयानक रूपधारी विशालकाय 
यभस नरकके साथ श्ख्रेकि सम्पात एवं महाघातप्ते युक्त 
घोर युद्ध हुभा ॥ ११९१ ॥ . 


सुष्ट्तं॑ योधयामास नरकं मधुसूदनः ॥१२०॥ 
अथोग्रचक्रश्चकरेण प्रदीपेनाकरोद्‌ द्विधा । 

उग्र चक्रधारी मधुमूदनने दो घदीतक नरक्रासुरफे साथ 
युद्ध किया । तत्पश्चात्‌ प्रज्वलित चक्रद्वारा उसके शरीरके 
दो इकडे कर डले ॥ १२०१ ॥ 
चक्रद्विधाङृतं तस्य॒ दारीरमपतद्‌ भुवि ॥१२९॥ 
विभक्तं कुकिशेनैव गिरेः शङ्कं द्विधाङूतम्‌ । 

चक्रसे दो टक हुआ नरकाुरका शरीर प्रथ्वीपर गिर 
पडा, मानो किंसी पर्वतक्रा दिखर वञ्रकरे आघाते दो भागोमे 
विभक्त होकर धरादायी हो गवा दो ॥ १२१९३॥ 


रूष्णमासाय देवेश्चं जगामास्तमिरववाद्चुमान्‌ ॥१२२॥ 
चक्रोत्छन्तितगानोऽसौ दानवः पतितो रणे । 
वजप्रहारनिर्भिन्नं यथा मैरिकपर्वतम्‌ ॥१२२॥ 
देवेश्वर श्रीकृप्णते रक्कर लेकर वह सू्व॑की भोति 
अस्ताचल्करो चला गया । चक्रसे शरीरके द्क-टूक हो जानेपर 
वह दानव रणभृमिम भिर पड़ा । उस्र समय वह वञ्चक 
प्रदाससे विदीर्ण हुए गेरूके पदाड-नैसाजान पड़ता था१२२-१२३ 
भूमिस्तु पतितं पुत्रं निरीक्त्यादाय कुण्डले । 
उपातिष्ठत गोविन्दं वचनं चेदमव्रवीत्‌ ॥१२४॥ 
अपने पुत्रको गिरा हज देख मूर्तिमती भूमिदेवी 


विष्णुपयं ] 


अदित्तकि दोन कुण्डल ऊ गोविन्दकी सेवमि उपर्थित हुई 
ओर इख प्रकार वोटी--॥ १२४ ॥ 

दृ्तस्त्वयैष गोषिन्द स्वयैव विनिपातितः। 
यथेच्छसि तथा ऋरीड वाटः क्रीडनकैरिव ॥१२५॥ 
मे ते कुण्डठे दैव भ्रजास्तस्यायुपाखय ॥ १२६॥ 


चतुःषष्टितमो.ऽध्यायः 


५६५ 


ध्गोविन्द ] आपने सन्ने यद पुत्र ` प्रदान किया था 
ओर आपहीने इसे मार गिराया । प्रभो ] आपकी जैखी इच्छा 
हो वैषी क्रीडा कीजिये, अकर वैते ही, जते बा्क सिलीरनैषि 
खेत करता है । देव [ये दी वे दोनें ुण्डल दै, इन्दं टीनिये 
ओर उस नरकासुरकी संतानक्रा पाटन कीभ्िः | १२५-१२६॥ 


इति श्रीमष्यभारते खिखभगे हरिवंशे विष्णुपर्वणि नेरकवघे न्निष्टितमोऽध्यायः ॥ ६३ ॥ 
इस प्रकार श्रोमहाभारतके खिरभाग दरिवशके अन्त्मत वरिष्णुप्वमे नस्कासुरका बधविषयफ तिरसर्ठ्वौः अघ्याप्र पूरा हुभा ॥ ६९ ॥ 


चतुःषष्टितमोऽध्यायः 
श्रीकृष्णा नरकासुरफे भवनम परवश करके वाक धन-वेभव तथा सोरह हार कमारि्योको 
दारका भेजना ओर खयं देवलोके जा अदितिको इण्डरु दे बहस पारिजात रेकर छोटना 


वै्स्फायन उवा | 
नित्य नरकं भौमं वासवोपमविक्रमम्‌। 
वासवावरजो विष्णुरददर्श 


पराक्रमी भूमिपुत्र नरकायुरका वध करके इन्द्रे छोटे माई 
शरीकृप्णने उसके भवनका निरीक्षण किया ॥ १॥ 
अथार्थगरदमासाद नरकस्य जनाद॑नः। 
ददृशे धनमक्षय्यं रत्नानि विविधानि च ॥ २॥ 
तदनन्तर नरकरासुरके धनागार ( खजाने ) मै जाकर 
भगवान्‌ जनार्दनने अक्चय धन ओर भोति-ोतिके 
रत्र देखे ॥ २॥ 
मणिसुक्ताभ्रवाखानि वैदुर्स्य च संचयान्‌ । 
मासारगल्वङ्कुटानि तथा वज्रस्य संचयान्‌ ॥ ३ ॥ 
जाम्बूनदेमयान्यस्य शातकुम्भमयानि च । 
प्रदी्तज्वलनाभानि हप्तिरद्पिनिभानि च ॥ ४॥ 
मभि; मोती भूगि, वैदर्यमणिक्े ठेर चन्द्रकान्त मणिकी 
पर्वतोपम राधि तथा हीरोके संग्रह देखे । जाम्बूनद तथा 
शातक्ुम्भ नामक सुव्णौकी वनी हई बहुत-सी एेसी व्र 
वहो दृष्टिगोचर हुई जो प्रज्वलति अथि ओौर शीतरदिम 
चन्द्रमाके समान प्रकाित हो रही थी ॥ ३-४॥ 
` शयनानि महारणि तथा सिदहाक्तनानि च । 
हिरण्यदण्डरुचिरं शीतरदिमिसमप्रभम्‌ ॥ ५ ॥ 
ददृश तम्महच्छन्रं वषमाणमिवाम्बुदम्‌ । 
जातरूपस्य शुभ्रस्य धाराः छतसदस्रराः ॥ ६ ॥ 
वहुमूस्य शय्या तथा सिंहासन भी देखनेरमे आये ! व्ही 
उन्हने वह विशाल छन्न भी देखा; जो वषा करनेवाठे 
मेषके समान उज्ज्वल सुवर्ण॑की लख धारार्णु बह्म रदा थाः 
उसका सुन्दर दण्ड सुवर्णका वना हआ था तथा उसकी 
कान्ति चन्द्रमाके समान श्वेत वर्णकी थी ॥ ५-६॥ 


नरकाल्यम्‌ ॥ ९ ॥, 
वशम्पायनजी कहते है--जनमेजय ! इन्द्रके समान 


वरुणादाहतं पूरय नरकेणेति नः श्रुतम्‌ 1 
यावद्रलनं गृहे दृष्टं नरकस्य धनं बहु ॥ ७ ॥ 
नेव राक्ष; छुवेरस्य न शक्रस्य यमस्य च । 
र्संनिचयस्तादग्‌ ृष्पूर्वो न, च श्चुतः ॥ ८ ॥ 

हमने खना दै कि वह छत्र नरकाभुर पद्ले वरुणके 
यदहषि छीन खाया था । नरकाुरफे धरम जितना रत ओर 
असंख्य धन देखा गया, उतना राजा कुबेरः इन्द्र ओर 
यमके पास भी नदीं था । रर्तोका मैस संग्रह कुमेर आदिके 
यहो भी न तौ कमी देला गया ओर न सुना हौ गया ॥ ७-८॥ 
हवे भौमे निखुन्दे च दयग्रीवे च दानवे । 
उपानिन्युस्ततस्तानि रजञान्यन्तभ्पुराणि च } ९ ॥ 
दानवा शतरि ये कोहासंचयरक्चिणः1 
केशवाय मक्षाहौणि यान्युत जनार्दनः ॥ १० ॥ 

भौमाय निञुन्द्‌ ओर दानव हयम्रीक्के मारे जानेपर 
मरनेसे वचे हए जो दानव ओर खजानेके रक्षक थे, वे उन 
बहुमूल्य रो ओर अन्तःपुरकी वस्वुओंको भगवान्‌ शरीकर्णके 
पास ठे आये, जिन्दं पाने ओर रखनेकी योग्यता एकमाप्न 
भीङ्ृष्णमे दी थी ॥ ९-१० ॥ 

दैत्या जः 

इमानि मणिरलानि विविधानि यहनि च । 
भीमरूपाश्च मातङ्गाः प्रवारुबिरूताः म भवार, हाः ॥ १९१॥ 
हेमखत्रा ६1 
खचिराभिः पताकाभिः शवखा रुचिरां क्ाः॥ १२॥ 
ते च विङतिसाहस्रा द्विस्तावत्यः करेणवः । 
अष्टौ शत सहस्राणि देशजाश्योत्तमा हयाः ॥ १३॥ 
गोषु चापि रते यावार्‌ कामस्तव जनार्दन । 
तावतीः प्रापयिष्यामो चृष्ण्यन्धकनिवेशनम्‌ ॥ १४ ॥ 

दैत्योनि कष्ा--जनादन | ये जो नाना प्रकारके 
बहुसं्यक मणिरत द तया जो मयंकर सूपवाके गजराज है, 


४६६ 


श्रीमहाभारते खिलभागे 


[ शस्व 


जिनके ऊपर विद्छायी जनेवाखी काटी भूमेति विभूषित ईः 
जो सोनेके तारे वने हुए रस्सेसि कसे जति ६ जिनकी 
जंजीर बहुत बड़ी £ जी धनुष ओर तोमर आदि अल. 
शक्तोसि सुशोभित दोते दै जिनके अद्रा यदे सन्दर 
तथा जो नाना प्रकारौ सुन्दर पताकार्ओदवारा चितकमरे 
दिखायी देते दै उन गजराजकी संख्या रीस हजार टै । 
इनसे दूनी हथिनिर्यो ६ । आठ लाख उत्तम देशी धोदे 
ह । इनके सिवा बहुत.सी गौर द । इनमेसे जिनके ल्यि 
आपको जितनी आवश्यकता हो, उतनी संख्याम म इन 
सघको दृप्णि ओर अन्धकर्वंशी यादर्वोकि निवाससखान 
दवारकाम पर्चा देगे ॥ १९-१४॥ 


आचिकानि च सक्ष्माणि श्ायनान्यासनानि च । 
फामन्यादारिणक्यैव पक्षिणः प्रियदर्छनाः ॥ १५॥ 
चन्दनागुरुकाछठानि तथा कारीयकाल्यपि । 
घु यत्‌ जिपु ठोकेषु धर्मेणाधिगतं तव । 
प्रापयिप्याम तत्‌. सर्य घृष्ण्यन्धकनिवेश्नम्‌ ॥ १६॥ 
देवगन्ववैरलानिं पन्नगानां च यद्‌ षु! ` 
तानि स्वणि सन्तीह नरकस्य निवेशने ॥ १७॥ 
ग्रभो [ महीन ऊनी वस्र अनेक प्रकारकी शय्यार्य 
वहुत-से आसनः च्छानुसार बोखी बोख्नेवाठे गौर देखनेमे 
सुन्दर पश्चीः चन्दन ओर अगुखुकाष्ठः कालगुसं तया तीनो 
लोकमि जो धन ओर रत्र यहो सञ्चित ६ उन सखवपर 
आपका धर्मतः अधिकार ष्टौ गया दै। हम उन स्वको 
बृष्ण्यन्धकपुरी दवारकाम पर्वा देगे । देवताओं ओर 
गन्धरवेक यहो जो रत ६ तथा नागेकि यट जो पैमव है, 
वे सव य्ह नरकाञ्ुे भवने विद्यमान ६ ॥ १५-१७ ॥ 
- वैश्नम्पायन उवाच 
तच्च स्य॒पीकेश्ः परिगर्य पसीष््य च । 
सव॑मादारयामास दानधैढौरकां पुरीम्‌ ॥ १८॥ 
वैदाम्पायनजी कते है--जनमेजय ! भगवान्‌ 
श्रीकृष्णने वद सारा वैभव ठेकर उसकी परराश्वा करके 
सव्र-का-खव्र दानवोदरारा द्यारकापुरीको पहुंचा दिया ॥ १८॥ 


ततस्तद्‌ वारुणं छं स्रयसुत्क्िप्य माधवः। 
दिरण्यवपं वर्पन्तमारुयेह विदद्कमम्‌ ॥ १९॥ 
गरुडं पतगश्रष्ठं सूरतिमन्तमिवाग्बुदम्‌ । 
तवोऽभ्ययाद्‌ गिरिथिषठमभितो मणिपर्वतम्‌ ॥ २०॥ 
तदनन्तर माधवने सुवर्णंकी वर्प करते हूए वणकरे उस 
छत्रको खयं दी उठाकर गण्डपर रख दिया भीर मूर्तिमान्‌ 
मेधके समान आकागगामी पक्षिप्रवर गर्ड्पर वे खयं मी 
व्रैठ गये । तत्यश्वात्‌ वे गिरिश्रेष्ठ मणिपर्वतके समीप गये ।१९-२०। 


तत्र पण्या वद्ुवीता छाभवंधामखाः परभाः। 
मणीनां देमषणौनामभिमूय विषाकरम्‌ ॥ २१॥ 


वर्ह बरी पवित्र टवा च्छ ष्टी थी | रोनेके समान 
रंगव्टी मणिरयोकी निर्म प्रमा सूर्यको तिरस्कृत-सा करके 
प्रकारितष्ये रदी थी॥२१॥ 
तत्र॒. वैदर्यवणौनि ददद्तंमघुखूदनः। 
सखतोरणपताकानि द्वाराणि शरणानि च ॥ २२॥ 
. वर्ह मधुदधदनने ब्रहते वैदूरयमणिके समान रंगव्े 
प्रकाशमान दवार जीर धर देखे, जदो बन्दनवारं र्वी थी 
जर पताकार्णेः फरा रदी थ ॥ २२॥ 
विचयुद्रथितमेघाभः भ्रवभौ मणिपर्व॑तः। 
हैमचिघ्नवितानैश्च प्रासादैरपशोभितः ॥ २२॥ 
वह्‌ मणिपर्वत ( जो कन्यार्ओका अन्तःपुर या) 
वरिज्टीति रयि द्टुए मेधके समान प्रकादरित होता था । जिनमे 
सोनेके विचित्र चदोवे तने हए ये, पेते मदर उलकरी 
गोभा वदति ये ॥ २२३॥ 
त्न ता चर्देमाभा ददश्षं मधुखह्नः। 
गन्धर्वखुरमुख्यानां प्रिया दुहितरस्तथा ॥ २४॥ 
ददर्ल॑प्रथुरुध्रोणीः संखद्धा भिस्किन्द्रे 
नरकेण समानीता रक्ष्यमाणाः समन्ततः 1 २५.॥ .' 
वहो मधुसूदनमे श्रेष्ठ शुवर्णके समान कान्तिवाटी प्रधानः 
प्रधान गन्धर्वौ ओर दैवतार्ओकी उन प्यारी पुद्रिर्योको देखा; 
जो उख पर्वतफी कन्दरा कैद की गयी थी] उन खयके 
नितम्बमाग स्थूल ओर मांह थे । नरकाञुरने खय 
ओरसे लाकर उन्दरं रख दोडा था ॥ २४-२५ ॥ 
चिविष्पसमे देशे तिष्ठन्तीस्परजिताः। 
निर्वियन्त्यो थथा देव्यः खुलिन्यः कामवर्जिताः ॥ २६॥ 
वह्‌ प्रदेदा खर्भके समान सुखद था । वर्ह र्ती ईं 
वे कुमारस्य नरकाडस्ते पराजित नरी इई थी! उन्हनि 
कामभोगका परित्याग कर रक्खा था ओर वे देविर्योकर 
समान वरहो घुखपूर्वक रहती थीं ॥ २६॥ -. 
परिववर्महावाहुमेकवेणीधस सियः 
ख्वीः कापायचासिन्यः सर्वाश्च नियतेन्द्रियाः ॥ २७॥ 
एक वेणी धारण करनेवाली तथा काषाय वलते अपने 
अरङखोको आच्छादित करनेवाखी उन समस्त कुमारियेनि 
महावाहू शीकृप्णको चारय ओस्खे घेर लिया । उन्न अपनी 
इन्िर्योको पूर्णतः संयमे रक्ला था ॥ २७ ॥ 
नतोपवासतन्वङःम्यः काङक्षन्त्यः रष्णदश्लंनम्‌। 
समेत्य यदुसिंहस्य सवाश्चक्तुः सियो ऽअटीन्‌॥ २८॥ 
त्रत भौर उपवास करनेके कारण उनके सरे अञ्ज 
दुबठेष्टोगयेथे। वे सदा दौ शरीङृप्णके दर्नकी अमिलषा 


-रखती थीं । यदुकुर्के िह श्रीकृष्णके पास जाकर उन सव 


कुभासि्नि हाय ओं स्मि ॥ २८ ॥ 


विष्णुपर्व ] 


चतुःषष्ितमोऽभ्यायः 


४६. 


--------------------------------------------- = 


नरकं निहतं क्षात्वा सुरं चैव मद्यारम्‌ 1 
हयश्रीचं निन्द च ताः ष्णं पयंवास्यन्‌ ॥ २९ ॥ 
नरकासुरः महान्‌ असुर मुरः हयग्रीव तथा निदुन्दको 
माया गया जौनक्रर वे सव्र चर्यो श्रीङृप्णकौ घेरकर 
खडी हुई थीं | २९॥ 
ये चासां रक्षिणो चृद्धा दानवा यदुनन्दनम्‌ । 
छताश्चङिषुराः स्व भ्रणिपेतुर्चयोऽधिकाः ॥ ३० ॥ 
जो वदे-चूदे दानव उन कुमारियंकि रक्षक थे, उनकी 
अवद्या बहुत अधिक थी। उन सत्न हाथ जोड़कर 
यदुनन्दनकरो प्रणाम क्रिया ॥ ३० ॥ 
तासां परमनारीणासषभाष्षं निरीक्ष्य तम्‌ । 
सर्वासामेव स्ंकटपः पतित्वेनाभवत्‌ ततः ॥ ३१॥ 
ठृषभके समान विाल नेव्रवाठे श्रीकृप्णका दर्य॑न करके 
उन समस युन्दरियोके मनम उन्दँ पति वननिका संकस्प 


उदित हुआ ॥ ३१ ॥ 
` तस्य चन्द्रोपमं वकं निरीश्य मुदितेन्द्रियाः। 
सम्प महावाहुमिदे चचनमनरुवन्‌ ॥ ३२॥ 


श्रीकृष्णका चन्द्रमाके सचमान मनोहर यख देखकर 
उनी सारी इन्दिर्यं आनन्दसिन्धुमे निम्र हो गयी थीं | 
वे अयन्त दर्पमे भरकर उन मदावाहूसे इस प्रकार बोटी-।र२) 


सत्यं च यत्‌ पुरा वायुरिहास्मान्‌ वाप्यमन्रवीत्‌ । 
सर्वभूतमतिक्षश्च देवर्पिरपि नारदः ॥ ३३॥ 
'भगवन्‌ | पू्वकाख्मे बायुदेवने तथा सम्पूणं भूतेकि 
मनोभाचको जाननेवले देवर्षिं नारदने भी जो वात्तकटी थीः 
वह आज सत्य हो गयी ॥ ३३॥ 
विष्णुनौरायणो देवः शङ्खचक्रगदासिभरत्‌ । 
स भौमं नरकं हत्वा भती च भविता स चः ॥ ३४ ॥ 
'उन्हेनि कहा था कि शष्कु चकर गदा ओर खन्ध 
धारण करनेवाले जो सर्वव्यापी नारायणदेव ६, वे भूमिपुत्र 
नरकक्रा वध करफे तुम सव्र जोगंकि पति दहभे ॥ ३४ ॥ 
सुधियं वत पद्याम्चिरश्रुतमर्सिदमम्‌। 
दशनेन हताथ हि वयमद्य महात्मनः ॥ ३५॥ 
म्‌ चिरकालसे जिन शघ्नुदमन दयामघुन्दरफे विषयमे 
ब्रहुत कुछ सुनती चली आ रही है आज उन्हीं प्रम 
प्रियतम प्र्ुको प्रतयश्च देखनेका हमै सौभाग्य प्राप्त हुमा । 
आज आप परमात्माके दर्खनसे हम सव्र कृतार्थ हो गर्यीः | ३५। 
ततस्ताः सान्त्वयामास परमदा वासवाञ्रुजः। 
सयोः कमरपत्राीर्षटरा चोवाच माघवः ॥ ३६॥ 
तवर इन्द्रके छोटे भाई माधवने उन समस्त कमल्नयनी 
युव्रतिरयोकरो सान्तना दी, उनकी ओर देखा ओर उनसे 
वार्तालाप फिया | ३६ ॥ 


यथार्हतः पूजयित्वा समाभाष्य च केराषः। 
यनः किद्करखंयुक्तंखवाह  भमधुखदनः ॥ ३५ ॥ 
इसके वाद मधुषूदन केशवने उनका यथोचित सम्मान 
तथा उनसे सम्भाधण करके उन्दं किद्कर नामक दानवे 
युक्त शिविका्भोपर सवार कराया | ३५४ ॥ 
किद्कसणां सदस्नाणि रक्षसां वातरंहसाम्‌ । 
रिविकां बष्तां तत्न निर्घोषः सखुमद्नभूत्‌ ॥ ३८ ॥ 
वायुके समान वेगशाडी किङ्कर नामक सदर राक्षस 
उनकी रिविकर्ण ढोने स्ये} उर समय उनका महान्‌ 
घोष सर्वत्र छ गया | ३८ ॥ 
तस्य पर्वतराजस्य , शद्ध थत्‌ परमार्चितम्‌ । 
विमखर्कैन्दसंकाहं मणिकाश्चनतोरणम्‌ ॥ ३९ ॥ 
उस पवंतराज मणिपरव॑तका ओ सर्वोत्तम एवं प्रसित 
शिखर थाः वह निर्मख सूर्यं एवं चन््रमाके समान प्रकारित 
होता था! उसमे मणि एवं सुवर्णके फाटक बने हुए ये ॥२९॥ 
सपक्षिगणमातङकः समरगव्यापाद्पम्‌ । 
शाखाख्रुगगणाकौणं सुप्रस्तरदरिलातलम्‌ ॥ ४० ॥ 
न्यंङ्कभिश्च वरादैव्य रुरुभिख निषेवितम्‌ । 
सप्रपातं महासा विचित्रशिखरद्ुमम्‌ ॥ ४१ ॥ 
अत्यद्धुतमचिन्त्यं च शखगनरन्द्विखोडितम्‌ । 
जीवश्रीवकसंघेश्च वर्हिभिश्च निनादितम्‌ ॥ ४२॥ 
वरदो पक्षि्योके समदाय, हाथी, मृगः सपं जर वक्ष 
शोभा पाते थे । वंदरोके समदाय स्वर ओर भरे हुए ये । 
बहक पसतर ओर शिल्प वहत युन्दर थीं । न्यङक 
( बारहषिंहाविदेष ) वराह ओर रसमृग उसका सेवन 
करते थे । वरहो अनेकानेक स्षरमे गिरते थे} उसके कई 
चदे-बडे आन्तर शिखर ये । उरक शङ्ख ओर इक्ष विचि 
शोभा सम्पन्न थे | मणिपर्वतकरा वह शिखर भत्यन्त अद्भूत 
ओर अचिनय था । गकि श्वंड वँ दौड़ ख्गाते रहते थे । 
चकोरोके छंड ओर मोर अपने कलसे उसे परतिष्वनित 
कयि रहते ये | ४०-४२ ॥ 
तद्प्यतिवर विष्णु्दोभ्यामुत्पास्य भारम्‌ । 
आरोपयामास यली गरुडे पक्षिणां वरे ॥ ४३॥ 
अत्यन्त वल्दारी भगवान्‌ श्रीकृप्णने अपनी दोनों 
जायि उस तेजसी पर्वत-रिखरको उखाड़कर पश्चिपरवर 
गरुडी पीठपर रख दिया ॥ ४३ ॥ 
मणिपव॑तङ्गं च सभार्य च जनार्दनम्‌ । 
उवाह खीटया पक्षी गर्डः पततां वरः ॥ ४४॥ 


पक्ष्यो शेष्ट-गरुड मणिपर्वतफरे उस रिखरको तथा 
पलीरुदित श्रीहृप्णको भी ञेकर ठीलपूर्वक चरने लो (५४ 


४६८ 


श्रीमदहाभारते.खिरभागे 


[ दरिवशे 


स पश्चथखवि्चपै्दिमाद्रिशिलसेपमः। 

दिश्चु सवखु संहादं जनयामास प्षिराट्‌ ॥ ४५॥ 
उनका शरीर हिमाख्यक्रे रिखरफे समान विशाक था ] 

वे पक्षिराज अपनी पोरखको वर्क दिल-हिलाकर सम्पूर्ण 


दिशार्थ्मि महान्‌. कोखादठ मचाते जा रदे थे | ४५॥ 


आाख्जन्‌ पर्वताग्राणि पादपाश्च समुत्छिपन्‌ । 

संजहार महाभ्राणि विजहार च कानिचित्‌ ॥ ४६॥ 
वे वडे-वदे पर्वतरिखर्रोको तोड़ उस्तेः इृ्षोको 

उखाढ़ रफैकतिः वडे-बड़े वादर्लौको छिन्न-मिन्न कर देते खीर 

करुख्को अपने साथ उडाये व्यि जति थे ॥ ४६ ॥ 

विषयं समतिक्रम्य देवयोखन्द्रसू्ययोः। 

ययो वातजः पश्ची जनादनवशे. सितः 1 ४७॥ 
चन्द्रदेव ओर सूर्यदेवके प्रदेशको खोकर वे वायुके 

समान वेगाटी पक्षी गरुड़ भगवाम्‌ श्रीङकष्णके वारम होकर 

चल्ते थे ॥ ४७ ॥ 


ख॒ मेरुगिस्मिसादयय देवगन्धर्चसेवितम्‌ । 

देवसद्मानि सवौणि ददद मधुखूदनः ॥ ४८ ॥ 
देवताओं ओर गन्धरवोखे सेवित मेरुगिरिपर पहुंचकर 

उन भगवान्‌ मधुसूदनने घमस देवग्र्हका दर्शन किया ॥४८॥ 


विद्वेषां मरुतां चैव साध्यानां च नराधिप । 
श्राजमानान्यतिक्रामन्नभ्विनोच्य परंतप ॥ ४९॥ 
प्राप्य पुण्यतर्माछछोकान्‌ देवटोकमरिदमः। 
श्रक्रसद्म समासाद्य प्रविवेश जनार्दनः ॥ ५० ॥ 
शनुरओको संताप देनेवलि रे्रर ! उन्हौनि विदरः 
मरदवर्णोः सार््यौ जर अश्चिनीक्मार्यौके प्रकाद्मान खानोँको 
खोधते हृएट पुण्यतम लेोकर्मिं परहचक्रर देवलोकर्म पदार्पण 
किया । तत्पश्चात्‌ रशत्रुदमन जनार्द॑नने दन्द्रमवनके निकर 
जाकर उसके भीतर प्रवेश किया 1 ४९-५० ॥ | 
अवतीर्य स ताक्ष्यौत्‌ तु ददर्शं विवुधायिपम्‌ | 
प्ीतश्चेवाभ्यनन्दत्‌ तं देवराजः श्वतकत्ुः ॥ ५१ ॥ 
वर्ह गचड़खे उतरकर वे देवेश्वर इन्द्रे मिले । देवराज 
इनद्रने मी प्रसन्नतापूर्वक उनका अभिनन्दन क्रिया 1 ५१ ॥ 
भ्रादाय कुण्डले दिभ्ये ववन्दे तं तद्‌ाच्युतः। 
सभाय विदुघघ्रेष्टं नरश्रेष्ठो जनादंनः ॥ ५२॥ 
उख समयं अपनी महिमा कमी च्युत न दहौनेवाके 
पकीषदित नरश्रेष्ट जनार्दनने वे दौर्नौ दिव्य कुण्डल उन 
देकर दैवप्रवर इन्द्रको प्रणाम किया ॥ ५२ ॥ 
अर्चितो देवपजेन रत्नैश्च प्रतिपूज्ञितः 
सत्यभामा च पौलोम्या यथलदभिनन्दिति। ॥ ५३॥ 
देवराज इन्द्रने नाना प्रकारके रर्तद्रासय श्ीङ्कष्णका 


--~ 


धादर-सत्कार किया । सी प्रकार पुल्ममकन्यां राचीने मी 
सत्यभामाका यथोचित स्पे अभिनन्दन किया | ५६ ॥ . 


घाखवयो वासुदेवश्च जग्मतुः सहितौ तदा \ 
अदित्या भवनं. दिव्यं देवमावुरमदद्धिमत्‌ ॥ ५७॥ 
तदनन्तर इन्द्र ओर भगवान्‌ श्रीकृष्ण दोनोनि एक साथ 
होकर देवमाता अदितिके अव्यन्त समृद्धिशाली दिन्य 
भवने प्रवेश्च किया ॥ ५४ ॥ 
तच्रादितिसुपास्यन्तीमष्सरोभिः समन्ततः । 
ददद्याते महात्मानौ महाभागां तपो ऽन्विताम्‌ ॥.५५॥ 
वरहो उने दोनौ महत्मार्ओनि महाभागां तपिनी 
अदितिका दर्यन किया; जिनकी स्व ओरते अप्सरा 
उपासना ( सेवा > करती शी ॥ ५५. ॥ 
ततस्ते कुण्डके दिव्ये प्राद्ाददितिनन्दनः 
ववन्दे तां राचीभतौ भातरं स्वां पुरंदरः 1 ५६॥ 
वहा अदितिनन्दन शन्वीवद्लम पुरन्दर इन्द्रने वे दोनों 
कुण्डल अपनी माताको दे दिवे ओर उनके चरेम प्रणाम 
क्रिया ॥ ५६ ॥ 
जनार्दनं पुरस्कृत्य कर्म चेव शशांख तत्‌ । 
अदितिस्तौ खत प्रत्या परिप्वज्याभिनन्य च 1 ५७ ॥ 
आश्ीर्भिरलुकरकाभिखभावप्यवदत्‌ तदा । 
इ्द्रने जनार्दनको आगे करके उनके पराक्रमकी भूरि 
भूरि प्रशंसा की ¡ अदितिने अपने उन दोनो पुकि प्रखन्नता- 
पूर्वक दयसे ख्गाक्रर उनका अभिनन्दन किया ओर दोनेकि ` 
ल्ि अरकूरु आशीर्वाद प्रदान करिया ॥ ५७१ | 


पौरोमी सत्यभामा च प्रीत्या परमया युते ॥ ५८॥ 
अगृहीतां वराया देव्यास्ते चरणौ दुभौ । 
ते चाप्यभ्यवदत्‌ प्रेम्णा देवमाता यखिनी ॥ ५९॥ 
शचौ ओर सत्यभामानि मी वदी प्रसत्नताके खाय परम 
पूजनीया देवी अदितिके सुन्दर चरणोका सरश क्रिया । तव 
यशखिनी देवमाताने उन दोनेखि मी प्रमर्दक वार्तालाप करिया | 
यथावद्घचीच्चैव जनार्दनमिदं वचः। 
अधृष्यः सर्व॑भूतानासवष्यश्च भविष्यसि ॥ ६०॥ 
यथैव देवराजो.ऽयमनितो खोकपूनितः। 
इसके वाद्‌ अदितिने भगवान्‌ जनार्दनसे यह यथार्थं वात 
कदी--ष्वत्स ! तुम सम्पूर्णं मू्तोके ल्ि अजेय ओर अवध्य 
होओगे । जैते ये दैवसान इन्दर हैः उसी प्रकार ठम भी 
अपराजित ओर्‌ ोकपूनित होगे ॥ ६०२ ॥ 
भवत्वियं वरासेदा नित्यं च प्रियदशंना ॥ ६१ ॥ 
सर्वरोकेथु विख्याता दिव्यगन्धा मनोरमा । ` 
सत्यभामोत्तमा द्ी्णां सुभगा स्थिस्योवना ॥ ६२ ॥ 
जसं. न यास्यति वधूयोवच्वं रष्ण माषः । 


विष्णापरषं | 


पश्चवद्ितमो ऽध्यायः 


४६९ 


न 
= 


ध्यट्‌ सुन्दरी सत्यभामा सदा प्रियदर्नाः सम्पूर्णं लेशं 
विख्यातः दिव्य गन्प्रवाली, मनोरमाः सुखिस्यौवनाः सौभाग्य- 
वती तरथा लिर्योमि उत्तम ष्टो । श्रीकृष्ण [ जवतकर तुम मानव 
अनकर मनुष्यलोक्म रोगे, तव्रतक वहू सत्यभामा बृदी 
नदी होगी ॥ ६१ ६२३ ॥ 
पचमभ्यचितः छृष्णो देवमा महावलः ॥ ६२ ॥ 
देवसजाभ्ययुक्षातो रत्नैश्च परतिपूमितः। 
वैनतेयं समारुह्य सहितः सत्यभामया ॥ ६७॥ 
देवाष्रीडं परिकामन्‌ पूज्यमानं छररपिभिः। 
देवमाता अदितिफे द्वारा इस प्रकार सत्कार पाकर 
देवराजकी आश्ञा ठे उनसे र्नोंदयारा पूजित हौ महात्रेटी 
भीष्ण सत्यमामातहित गस्ड़पर आरूढ हुए ओर देवर्पिरयोद्यारा 
प्रशंसित देवता्ओके क्रीडा-कानन नेन्दनवनमे स्व ओर 
घूमने तमो ॥ ६३-६४३ ॥ 
स ददृक्ष मदावाहुराक्रीडे वासवस्य ह ॥ ६५॥ 
विव्यमभ्यर्चितं देवैः पारिजातं महाद्रुमम्‌ । 
नित्यपुष्पधरं दिव्यं पुण्यगन्धमयुत्तमम्‌ ॥ ६६ ॥ 
इन्द्रे उस कीडावनमे महावाहूु श्रीकृप्णने पारिजात 
नामक दिव्य विशाठ शृ्षको देखा, जो देवताओंद्यारा पूजित 
था | वह्‌ दिव्य चक्ष सदां ही एूल धारण करनेवाखाः पवित्र 
गन्धसे सुवासित तथा परम उत्तम था |} ६५.६६ ॥ 
यमासा जनः सौ जाति स्मरति पौर्विकीम्‌ । 
संरक्ष्यमार्ण देवैसतं प्रसद्यामितविक्रमः ॥ ६७ ॥ 
उत्पाव्यारोपयामासर विष्णुस्तं गरुडोपरि 1 
उसके पास जानेपर सव लोगोको अपने पर्व॑जन्मकी वार्त. 
का स्मरणदहो आता था देवता उख बृक्षकी रक्षा करते थे 


परंतु अमितपराक्रमी श्रीकृप्णने उसे ब्पूर्वक उखाड़कर गरुडकी 


पीठपर रख लिया ॥ ६७६ ॥ 


सोऽपदयत्‌ सत्यभामा च दिव्यमष्खरसां गणम्‌ ॥६८॥ 
पृष्ठतः सत्यभामा च दिव्या योपा च वीक्षिता । 
धरायास्‌ तो द्वास्वतीं वायुजुष्टेन वै पथा ॥ ६९॥ 
वहो श्रीकृष्ण तया सत्यमामाने दिन्य भम्ठराओंके 
समुदायो देखा । उन्न भी पीछे दिव्य युवती घत्यमामा- 
का दर्शन किया | तदनन्तर बायुतेवित मार्गे भीकृप्ण 
ए्ारकापुरीकी ओर चल दिये ॥ ६८-६९ ॥ 
श्रुत्वा तं देवयजस्तु कम रष्णस्य तत्‌ तदा । 
अचुमेने महाबाहुः तक्ति चात्रवीत्‌ ॥ ७० ॥ 
महाबाहु देवराज इन्द्रे जत्र उस समय श्रीकृष्णके 
पारिजात-हरणसूपी उस करम॑को सुना? तव यह्‌ कष्टकरं उसका 
अनुमोदन किया कि श्रीकृष्णने ` मेर बहुत वड़ा कायं सिद्ध 
किया है ॥ ७० ॥ 
स॒ धृज्यमानसिदरः सक्षपिगणसंस्तुतः 1 
प्रतस्थे द्वारकां छृप्णो देवरोकाद्रिंदमः )॥ ७१॥ 
देवताति पूजित जर खतपिोचे प्रशेसित दो शदुदमन 
भ्ीकृष्णने देवलोके दारकाको प्रसखान-किया ]॥ ७१ ॥ 
सोऽभिपत्य मदावादुरदीधंमध्वानमरपवत्‌ । 
पूजितो देवराजेन दददे यादवीं पुरीम्‌ ॥ ७२॥ 
देवराजवे सम्मानित हुए महाबाहु भरीकृष्णने उस विग्नाङ 
मार्गको ल्घु मा्गकी भोति थोढ़ी ही देरमै ते करके यादव- 
पुरीको देखा ॥ ७२ ॥ 
तथा कर्म मदत्‌ रत्वा भगवान्‌ वासवादुजः) 
उपायाद्‌ द्वारकां रप्णः श्रीमाच्‌ गरुडवाहनः ॥ ७३ ॥ 
इन्द्रके छोटे भाई गरंड़वाहन श्रीमान्‌ भगवान्‌ श्रीकूप्ण 
वेता मदान्‌ कर्म करके दवारकाम चके गये ॥ ७३ ॥ 


इति श्रीमहाभारते खिकभागै हिं दिष्णुपव॑णि पार्जितहरणे द्वारकाप्रवेश चतुःप्टितिमोऽध्यायः ॥-६४ ॥ 


दख प्रकार श्रीमहाभारते खिरुभाग हसिश्षके अन्तमैत विग्णुपर्वमे 


पारिजात-हरण ओर दारफमिं 


प्रवेशाविषयफ दौसव्यौ अध्याय पूरा हुजा ॥ ६४ ॥ 


पञ्चषष्टितमोऽध्यायः 
रेवतक पवैतपर रुक्मिणी व्रतोघयापनका उत्सव, उसमे पारिजात-पुष्प देकर श्रीकृष्णदरारा 
रुकिमणीका सम्मान, नारदजीढारा रुकिमिणीके सवौधिक सौभाग्यकी प्रशसा 
तथा सत्यभामाका फोपभवनम प्रवेश्च 


जनमेजय उवाच 
प्रादुभोवे स॒निशरेठ मश्युरे चरितं श्भम्‌ । 
श्ण्वन्नेवाधिगच्छमि दृत्ति कमप्णस्य धीमतः ॥ १ ॥ 


जनमेजयते कहा--युनिशरे ¡ मथुराम अवतार लेकर 


~~ 


बुद्धिमान्‌ श्रीकृप्णने जो मङ्गलमयी लीटर की £, उर 
सनते-ख॒नते सुने वृप्ि नदीं होती है ॥ १॥ 

द्वारकायां निवसतः रृतदारस्य षड्गुणम्‌ । 
चरितं बृहि रृप्णस्य सर्वे हि विदितं तव ॥ २ ॥ 


४७० 


श्रीमहाभारते श्िलभागे 


[ हरिर 


दवारकाम निवास करफे सपत्नीक यो जानेपर धीकृष्णने 
जो ड गुणंऽम्यत्न चरि क्वि ई, उन वत्य क्योकि 
शीकृप्णक्री खारी टीलार्द आपको विदित ६ ॥ २॥ 

व्नमायन उवाच 

जनमेजय ष्णस्य छृतदारस्य भारत 1 
निबोच चरितं चिरं तस्यैव सदश्तं प्रभो॥३॥ 

वेशम्पायनजी कषटते है--भरतनन्दन जनमेजय ! 
पतनी परियरह करनेके पश्चात्‌ श्रीकृप्णके जो चिचित्र चरित्र 
ई, उर सुनो । प्रमो } वे चरिघर उर्फ भनुसूप ६॥ ३॥ 


प्राप्दासो मदातेजा वाघ्ुदेवः प्रतापवान्‌ । 
सरुपिसण्या सहितो देव्या ययौ शेवतकं चप ॥ ४॥ 
नरेधर { सपत्नीक नेक पश्चात्‌ एक समय मषातेजली 
एवं प्रतापी वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण महारानी खक्मिणीके खथ 
रेवतक पर्वतपर गये ॥ ४ ॥ 
उपवास वसनं हि स्पिमण्याः प्रतिपूजयन्‌ । 
त्पयिप्यन्‌ स्वयं विप्राञ्जगाम मघुखदनः ॥ ५ ॥ 
उस सत्रिमणौ देवीके उपवाष-बतका उद्यापन या 
उका समादर कसते हुए मगवान्‌ मधुसूदन सयं ही बासर्णो- 
को भोजन आदिमे वृत्त कसक च्वि वरदौ गये | ५॥ 
माराः प्रययुस्तच्र पुन्नश्रातर प्व च। 
प्रेषिता वाखुदरेवेन नास्दस्याभ्ययुल्लया ॥ £ ॥ 
देवं नारदकी अनुमतिसे मगवान्‌ वासुदेवे भेजनेपर 
यदुकुले कुमारः पुत्र ओर माई मी वरहो गये ॥ ६ ॥ 
षोडश सीसष्टस्चाणि जगसुरेव च धीमतः। 
ऋद्धा परमया राजन्‌ विष्णोरेवायुरूपया ॥ ७ ॥ 
राजन्‌ | परम बुद्धिमान्‌ विप्णुस्वरूप श्रीकृप्णके अनुरूम 
उत्तम समृद्धिते सम्पन्न सोलह हजार चर्यो मी उस उत्सवमे 
सम्मिचित नके स्थि गर्यी | ७॥ 
ततस्तत्र दिजातीनां कामान्‌ प्रादादयोष्जः। 
अर्थिनां धर्मनित्यानां वन्दिनामिए्टवादिनाम्‌ ॥ ८ ॥ 
कल्याणनामगो्राणां महतां पुण्यकर्मणाम्‌ । 
योनेः धौतश्च मासश्च श्युद्धानां कुरुनन्दन ॥ ९ ॥ 
कुख्नन्दन } तदनन्तर वर्ह भगवान्‌ श्रीकृष्णे प्रार्थी, 
नित्य धर्मपरायणः, वन्दी, प्रियवादी, माङ्गलिक नाम-गोत्रसे 
युक्तः महान्‌ पुण्यकर्मा तथा योनि, विद्रा जौर यके सम्बन्ध- 
से शुद्ध बाह्य्णोको मनोवाञ्छिति पदार्थं दिये ॥ ८-९ ॥ 


२. समद देश्य, समय श्वानः समर यश्च; सन्धी, समय 
वैतग्य अौरसमश्र पर्म-ये छः भग( रेच्य) दयी छः यण द! मथवा 
सर्वता, चृष्ति, नादि योधः, खतन्तरता, भटप्तशचक्तिला ओर भनन्व 
शक्तिका दोना--ये परमेश्यरके खरूपभूक्त गुण ददौ यर्दा छः रुणेकि 
नाने सरणि गये ई 1 


तर्पयित्वा द्विजान्‌ कामैरिष्टैसिष्टः सतां गविः। 

श्रातीन्‌ संतर्पयामास यथाहं भक्तषत्सटटः ॥ १० ॥ 
ब्ा्यर्णोको अभीष्ट वस्र्य तृप करके सत्पुरपेकि प्रिय 

आध्यं भक्तवछट भगवान्‌ श्रीकृष्णने अपने मार्दचन्धुर्योको 

मी यथायोग्य संतु किया ॥ १०॥ 

उपवासावसानेऽय भगवान्‌ स॒ विश्चेषतः। 

यहु मेने प्रियां भार्या रुपिमिणी भीप्मकात्मजाम्‌ ।११ 
उपवासक अन्तर्मे भगवान्‌ शीकृप्णने वपन} प्यारी 

पत्नी भोप्मकराजङ्कमारी रकपिणीका विरोषरूपसे बहुत 

आदर क्रिया | ११ ॥ 


वसतस्तस्य श्ष्णस्य सद्रारस्यामितीजसः। 
सष्टासीनस्य सपिमण्या नारयो ऽभ्याययौ सुनिः॥ १२॥ 
अमिततेजख्वी श्रीकृष्ण परलिर्योदित वरो रहकर जवर 
सविमणीदेवीके खाय बैठे हुए ये, उसी समय नारदमुनि 
उनफे निकट अयि ॥ १२॥ 
आगतं चाप्रमेयात्मा सुनिमिन्द्रायुजस्तष्टा 
श्ास्रदष्टेन विधिना अच॑यामास केदावः ॥ १३॥ 
अप्रमेयघ्सूप इन्द्रके छोटे माई भगवान्‌ श्रीकृष्णने 
उस्र समय वर्ह जये हए नार्दमुनिका शाघलोक्त विधे 
पूजन किया ॥ १३॥ 
खोऽर्वितो घासुदेवेन सुनिर्व्यतमः सताम्‌ । 
पारिजाततसेः पुष्पं ददौ कृष्णाय भारत ॥ १४॥ 
मरतनन्दन | भगवान्‌. वासुदेवस पूनित हो सत्पुर्पोे 
परम पूजनीय निने वरो श्रीकृष्णङ़े हाथ पारिजात 
इ्यका एक एल दिया ॥ १४॥ 
तद्‌ बृक्षणजकुुमं सकिमिण्याः भ्रद्दौ हरिः। 
पादर्वस्था सा हि एष्णस्यभोष्या नरवराभवत्‌ ॥ ९५) 
नरजरषठ | श्ृष्षराज पारिजातफरे उस एूटको श्रीहसिने 
सकिमिणीदेवीफे ायरमे दे दिया; क्योकि वै भोजक्रुख्नन्दिनी 
सविमणी श्रीकृष्णके पास उनके चर्म ही वैठी हुई यी ॥ 
ध्रतिगृहा तु तत्‌ पुष्पं कामारणिरनिन्दिता। 
िर्स्पमलपञाक्षी ददौ रष्णेद्धितादुमा ॥ १६॥ 
उस पुष्पको हायरमे लेकर प्रयुम्नजननी सती-साध्वी 
कमटनयनी स्तरिमिणीने, जो श्रीकृष्णे संकेतका अनुसरणं 
करनेवाली यी, अपने चिफे वार्लमि ख्गा ख्या ॥ १६ 
भ्ेटोक्यरूपसर्वस्वं नारायणमनोहसा । 
द्यश्मे देवपुष्पेण द्विगुणं नैप्मकी तदा ॥ १७॥ 
त्रिभुवनकी खारी रूपसम्पत्ति जिनमे निदित थीः वे इन 
नारायणकरी मनोदारिणी रश्ष्मीस्वसूपरा रुक्मिणी उस देवपुष्यक्रो 
धारण करनेते गुनी शोभा पने ची ॥ १७॥ 


विष्णुपवं } 


पञ्चषष्टितमोऽन्यायः 


४.७१ 


तां नार्दस्तथोवाच सुनि्््यसुतस्तद्‌ । 
ठवैवौपयिकं पुष्पमेकं देवि पतिवते ॥ १८॥ 
उस समय ब्रह्मकुमार नारद सुनि उनसे वोले---"्ेवि ! 
पतिव्रते ! यद एकमात्र पुष्य ठम्हारे दी योग्य था ॥ १८ ॥ 
अलंकृतं पु्पमेतत्‌ संसगौत्‌ तव ॒सर्वथा। 
सत्यौ च मतः मे त्वमेतत्पुष्पाद्‌ धत्ते ॥ १९ ॥ 
“ध्रतको -धारण करनेवाखी देवि | ठम्दारे संसग॑से यद 
पू सर्वथा अकृत हो गया ¡ इस पुष्पको धारण करनेसे 
तम मेरी द्म अत्यन्त पूजनीय हो गयी हो ॥ १९॥ 
कल्याणगुणसम्पन्ने सततं भकतवत्सले । 
अम्खानमेतत्‌ सततं पुष्पं भवति कामिनि ॥ २०॥ 
संवत्सरपरं कटं क्ारक्षे गुणसम्मते । 
दप्सितानपि गन्धांश्च ददाति वदवां वरे ॥ २१॥ 
कल्याणमय रुर्गेसि सम्पन्न पतिवत्ले कामिनि ¡ यद्‌ 
पूल.एक वर्षतक सदा ताजा वना रहता है कमी ऊुम्दलता 
नही ह } समयका श्ञान रखनेवाली, अपने गुर्णेषे आदर 
पानेवाटी, वक्ताओ्मिं भेष्ठ सक्रिमिणी ! यह्‌ एूर एक सालनक 
मनोवाञ्छित गन्ध प्रदान करता रहता दै ॥ २०.२१ ॥ 
शीतोष्णे चेच्छिते देवि वुष्पमेतत्‌ प्रयच्छति । 
स्रवत्यपि रसान्‌ देवि मनसा काङ्क्ितान्‌ वरान्‌ ॥२२॥ 
ष्दैवि ! जितनी दी या गमी अभीष्ट दो, यह एर उसे 
देता रहता है तथा मनम जिन ष्ट र्तोको प्रात करनेकी 
अमिलषा हो, उन्दँ भी यह पुष्य स्वयं दी क्षरता रहता ३ ॥ 
सेव्यमानं च सौभाग्यं ददाति वरवर्णिनि । 
सवत्यपि तथा गन्धानीप्सितान्‌ पीतिवरद्धनान्‌ ॥ २३ ॥ 
'्वरवर्णिनि ¡ इस पुष्पका सेवन क्रिया जायतो यह्‌ 
समाग प्रदान करता है तथा मनकी परसन्नताकरो बदानेवाटी 
अभीष्ट सुगन्ध सरता रदता है ॥ २३॥ 
यानि यानि च पुष्पाणि त्वं देन्यभिरषिष्यसि । 
कुसुमं बृक्वरजस्य तानि तानि प्रदास्यति ॥ २४॥ 
ष्देवि { ठम जिन-जिन पूर्लोकी अभिखघा करोगीः 
चृक्षराज पारिजातका यह एर उन उको प्रस्तुत कर देगा ॥ 
पतदेव भगाधानं धर्मिष्ठे पुत्रदं तथा। 
मति च नाद्युभे धत्ते घायंमाणं सद्‌ा श्युभे ॥ २५॥ 
धर्मम निष्ठा रखनेवाली ञ्यभे ! देवि ! यह पुष्य रेश्र्यकरी 
प्राति करानेवाल तथा पुत्रदायक है । इसे सदा धारण क्रिया 
जाय तो यह बुद्धिको अद्यभ चिन्तनमे नहीं ख्गमे देता ॥ 
यद्‌ यदिच्छसि वणं च तत्‌ सब धारयिष्यति । 
खल्पं वा यदि वा स्थूलं छन्दतस्ते भविष्यति ॥ २६१ 
धुम इस पको जिस-जिच स्प-रंग्मे देखना चादोगी 


वह सव यद धारण फर ठेगा । ठम्दारी इच्छक अनुसार यद 
छोया-बड, हस्का-मारी अथवा स्थूल-ष्म हो जायगा ॥२६॥ 
अनिष्टगन्धद्रणमेतत्‌  सदगन्धवद्धंनम्‌ । 
प्रवीपकर्म॑रात्नौ च करोति कमलेक्षणे ॥ २७ ॥ 
वकमल्लोचने | यद पुष्प अग्रिय गन्धका निवारण तथा 
उत्तम गन्धकी ब्द्धि करनेवाला है } रातकरे समय यह दीपकका 
भी काम करता है ॥ २७ ॥ 
संतानकखजे मारां पुष्पवस्रादि बाच्युतम्‌ 1 ` 
पुष्पमण्डपमुख्यानि चिन्तितेन प्रदास्यति .॥ २८ ॥ 
ध्यह्‌ चिन्तन करनेमात्रसे संतान नामक ` दिव्य बृ्षके 
फूर्छका हारः मास, एूकः कभी नष्ट न होनेवाले व्र आदि ` 
तथा अच्छे-अच्छे एूर्टोके मण्डप प्रदान करेगा ॥ २८ ॥ 


युभुक्षा वा पिपासा चा ग्छानिर्वप्यथवा जरा। 
देवबद्धास्यन्त्यास्ते खच्छन्देन भविष्यति ॥ २९ ॥ 
ष्देवताओंके समान इसको धारण करते समय तुमह भूख- 
प्यास; ग्लानि अथवा शरद्धावस्था नहीं प्राप्त होगी । ये सारी 
वस्तर्णं म्हारी इच्छके अधीन हो ज्यगी ॥ २९॥ 


अजुगीतानि गतानि दास्यत्यपि च चिन्तिते । 
खुवादि्रान्‌ खुमधुरास्तथेव तव सम्मतान्‌ ॥ ३०॥ 
^दतना ही न्दी, यह चिन्तन करनेपर व॒म्हं परिय खाने- 
वाले सुन्दर वायो तथा संगीत-शाछ्रके अनुकर गीतौका भी 
आनन्द भ्रदान करेगा ॥ ३० ॥ 
पूणं संवत्सरे देवि पुष्पमेतत्‌ तवान्तिकात्‌ । 
निकेत्स्यंते तरुवर समयेन प्रयास्यति ॥ ३१॥ 
ष्टवि ! वषं पूर्णं होनेपर यह परू तम्दारे पासते 
समयानुसारं चला जायगा ओर बृष्ठप्रबर पास्नितसे 
सड जायगा ॥ ३१ ॥ , 
छृतिरेपा हि भद्रं ते पारिजातस्य सखप्रभे । 
निसगंतः सगंृता सत्कारार्थंऽसुरद्विाम्‌ ॥ ३२ ॥ 
धुप्रमे ! व्दारा कल्याण दो । सृष्टिकर्ता बद्याजीनि 
असुरो देवता सत्कारके स्थि स्वभावतः ` पारिजातकरी 
एेसी सामथ्यं रच दीह ॥ ३२॥ ` 
उमा ` देववरस्य हिमालयसुता सती । 
धार्यन्तीश्वरी नित्यं पुष्पाण्येतानि सुप्रभे ॥ ३३ ॥ 
(उत्तम प्रमाति प्रकारित हौनेवाटी देवि [ देवेश्वर रिवक्ी 
प्रियतमा हिमाल्यपत्री सती-साध्वी सुरेरी उमा नित्य इन 
पूरक धारण करती है ॥ ३३ ॥ 
मदितिश्च सपोरोमी मेन्द्सुरतारणी । 
साविश्री देवमाता च श्रीश्च सर्वेगुणोचिता ॥ ३४॥ 


वपल्यस्त [= 
देवपल््यस्तथेवान्या देवाश्च वञदेवताः। 


संबत्सरपरः कालः सर्वेषां न सु संशयः ॥ ३५॥ 


४७२ 


श्रीमष्टाभारते सिखभागे 


[ शिवो 


ष्देवराज इन्द्रकी माता अदितिः देवेन्द्रपत्नी शची 
देवमाता सावित्री; सर्वगुणसम्पनना लक्ष्मी तथा अन्य देवपक्िर्योः 
देवगण थर वसु देवता--ये सव्र दख पुष्पको धारण कसते 
है | उन सत्रके व्यि भी इस पुप्पफे धारणक्रा अधिक 
अर्धिक समय एकर वर्परतक दी दै । दमे संशय नर्द दै ॥ 
चोडशास्रीसहसखाणां मध्ये त्वं खदु वतसे । 
अये सुदेवस्य वेडि त्वां भोजनन्दिनि ॥ ३६॥ 

'भोजनन्दिनि ] आज मन्न मादूमष्टोगयाकि एन 
सोलद जार लिथेक्रि बीच भगवान्‌ वासुदेवको ददी सत्रसे 
अधिकमप्रियष्ो ॥ ३६ ॥ 
सपल्न्यस्ते गुणोपेते सवीः ` सर्वेश्वरप्रिये । 
अवमानावसेकेन त्वया सिक्ताय भामिनि ॥ २७ ॥ 

शस्वैश्वरप्रिये ! सद्गुणवती भामिनि { आज इमने 
अपनी सारी सीर्तोको अपमानके जस्त सच दिया ॥ ३५ ॥ 


प्रकारमय सौभाग्यमनिवार्यं यक ते। 
मन्दार्कुखुमं धच यत्‌ ते मधघुनिधातिना ॥ ३८ ॥ 
"आज तुम्हारा अनिवार्य रीमाग्य ओर यडा प्रकाङर्मे 
आ गयाः क्योकि भगवान्‌ मधुसूदनने यह मन्दारपुष्प केवर 
वम्हरि थमे दिया है ॥ ३८ ॥ 
अद्य सात्राजिती देवी क्षास्यसे धरलर्णिनी । 
सौभाग्याय सद्‌( वेत्ति य(ऽ ऽ त्मानं सुभगं सती ५३९॥ 
(आज सत्राजिवकी पुत्री परम सुन्दरी सती सत्यभामा 
देवी, जो अपने-भापको सद्‌ा खव्रते अधिक सीभाग्यशालिनी एवं 
खुभगा समद्ती री दै जान ठगी फि किंखका सीमाग्य 
अधिकदै | ३९॥ 


साम्बमाता च गान्धारी भायीश्चान्या महात्मनः) 
सीभाग्याथोद्यताकादह्ुमय मोक्ष्यन्ति निःस्पृहाः ॥४०॥ 
प्वाम्बमाता जाम्बवती तथा गान्धारी आदि, जो महात्मा 
श्रीकरप्णकी अन्य पलिर्यो है, वे आज निःस्पृह दोकर रीभाग्य- 
के व्यि उसी हृद आकाद्वाकरा प्रसि्याग कर्‌ देगी ॥ ४० ॥ 
सोभग्यैकरथो जैश्रस्तव देव्यय निःखतः। 
मनोस्थरथानां यः सहस्रैरपि दुजंयः ॥ ४१॥ 
्धेवि ! अन तम्दारे सौभाग्यका पकमानन विजयशीक 
रथ बाहर निकला दै, जो सहर मनोरथरूपी रथेकि लि 
टुर्जय है ॥ ४९॥ 
अयाहमवगच्छमि सर्बथा सर्व॑शोभने । 
अत्मा दवितीयः कृष्णस्य भोजे त्वमिति भामिनि ॥ ४२॥ 
(सर्वाङ्गयुन्दरी भामिनि ¡ मोजराजकन्ये } अन मँ 
सर्वथा दस वातकरो समक्न गय ज्र श्रीङ्ृष्णकी दृक्तरी आत्मा 
दर्द े॥ ४२॥ 


रैलोक्यरल्सर्वंस्वमददाद्‌ थत्‌. तवाच्युतः । 
जीवितातिश्षायस्तेन त्वया प्राप्तो ्रिप्रिये ॥ ४२ ॥ 
(हरिप्रिये ! तीन सोकंकि र्मौका सर्वश्वरूप यह 
पारिजात पुष्प भगवान्‌ श्रीङृण्णने जो दर्म टी दिया टै, 
हस्ये दमने आज प्राणेसि मी अधिक उत्छृट वत्तु प्राप्त 
कर टी टै ( अथवा तमहं आज समसत रौमाग्यवती छिर्योकी 
यपक्षा उक्र जीवन प्रास दुमा ह । >, ॥ ५३ ॥ 
नारदेनेवसुक्तं॑तु तथ्यं वाक्यं नराधिप। 
तत्रस्थाः धुश्चुवुः प्रेष्याः प्रेषिताः सत्यभामया ॥ ४४॥ 
-दिश्वर | सत्यमामाकी भेजी हुई दाघिर्यो वरदो खदरी 
थी | उन्दने नारदजीके दवारा इत प्रकार कहे गये 
यथार्थं वचर्नोको सुना ॥ ४४॥ 
देषीनां च तथान्यासां पत्नीनां च विश्वाम्पते । 
षटु तः सविशेषं च नारदेनाभ्युदाद्यतम्‌ ॥ ४५॥ 
प्रजानाथ ! अन्य देषिर्यौ तथा पलिर्योफी दारधिर्यो 
भी र्हं खी थी । उन सव्रफो देखकर नारदजीने 
उपर्युक्त वातै ओर भी मदा-चदाकर कष्ट थी ॥ ५५ ॥ 


तश्च श्रुत्वा सनिखिङं प्रेण्याभिः खीस्वभावतः। 
प्रकाशीरतमेवासीद्‌ विष्णोरन्तःपुरे तदा ॥ ४६॥ 
उस्र खमयवे खारी वातं सुनकर उन दतियेनि्री- 
सरभावके कारण भगवान्‌ श्रीकृप्णके अन्तःपुरम उर भरकट 
कर ष्टी दिया ॥ ४६॥ 
करणाकरणं ततो दरेन्यः कोटीनमिव संघशः । 
मन्त्रयाञ्चकरिरे श॒ रकिमिण्यतिगुणोद्यम्‌ ॥ ४७॥ 
कार्नोकान वह्‌ सव जानकर श्रीकृप्णकी अन्य पलिर्यो 
प्रद-की-षंड एकन ष्टो दरपमे मरकर स्किमिणीके 
अत्यन्त रुणयुक्त सौभाग्योदयकी चर्चा करने लगी, मानो 
कल्के किषी गृढु रहस्यपर रुप मन्त्रणा कर रदी ट ॥*४७॥ 


अर्हेति पुत्रमातेति ज्येष्ठेति च समागताः 
प्रायेण प्रवव्रन्ति स ष्टा दामोद्रसखियः ॥ ४८॥ 
ह्वे उक्छुस्छ हुई मगवान्‌ दामोदरशी वे @छिर्यो 
एकत्र दयोकर प्रायः इस प्रकार कने ठगी किं वे (रुक्मिणी) 
हम स्व॒ सेर्गोकी पूजनीया ह ज्येष्ठ पुत्रकी माता ई 
ओर खयं मी य्येष्ठा ई ॥ *८॥ 
मम्रपे न सपल्यास्तु तत्‌ सौभाग्यगुणोद्यम्‌ । 
सत्यभामा प्रिया नित्यं विष्णोरतुरुतेजसः ॥ ४९.॥ 
परंतु अतुल तेजस्वी श्रीकृण्णकरी नित्य प्रिया सत्यभामा 
अपनी सौतके उस सौमाग्य-गुणका उदय नदीं सदन 
केर स्का | ५९॥ 
रूपयौवनसम्पन्ना खसौभाग्येन गर्धित 1 
अभिमानवती देवी श्चत्पैवे््यावश्ं गता ॥ ५०॥ 


विष्णुपवं ] 


वे रूप ओर यीवनते सम्पन्न थी | उद अपने सौमाग्य- 
पर गर्वं था; अतः अभिमानिनी देवी सत्यभामा सौत्के 
अभ्युदयका समाचार सुनते ही ईष्यकि वशीभूत दौ गर्यी+॥५०॥ 
समुत्खजन्ती वसनं सकुकमं 
श्युचिस्िता शुङ्खतमेकमं द्यकम्‌ । 
जग्रा रोषाङुलितेन वेतसा 
वद्वेस्तद्‌ा श्रीरिव वर्धितेन्धना ॥ ५१॥ 
पवित्र मुकानवाटी सत्यमामने कुंकुम रगी हई 
खाड़ी उतारकर रोष्राक्रुरु चित्तते एकमात्र वेत वल 
धारण कर छलिया ] वे उ समय अभिक इधन डाल देनेसे 
चदी हई अग्निकौ दीपतिमती श्िखाके समान प्रतीत 
होती थी ॥ ५१ ॥ 


दन्द्ामाना ज्वलनेन बद्धता 
ईष्यौसमुत्थेन  गतग्रभेख । 
क्रोघान्विता क्रोधग्दं विविक्तं 
विवेश्च तरेव धनं स्तोयम्‌ ॥ ५२॥ 
उनके मनम राजिनित आग वदती जा रदी थीः 
जिससे अव्यन्त दग्ध दोनेके कारण वे श्रीदीन-सखी दहो गयी 
थी | सते तासा सजल जल्धरकी ओम चली जाय 
उसी प्रकार रोषमरी सत्यभामाने वरदा एकान्त कोपभवनर्मे 
प्रवेश किया ॥ ५२ ॥ 


यदष्वा ठरे हिमचन्दरशच्ख 
दुक्रखयद्ं प्रियरोपचिह्नम्‌। 


वदुवष्टिवमोऽध्यायः 


४७ 


पर्यन्तदेश्चं सग्सेन देवी 
वििप्य सा टोषितचन्वनेन ४ ५३ ॥ 
देवी सत्यमामनि लछा्य्म प्रियतमके प्रति रोषुत्वके 
चिहके तौरपर दिम ओर चन्द्रमा समान श्वेत दुकूलपद 
योध ल्वा ओर उस छल्मटके किनारे किनरि रख (गी) 
ल्मल चन्दन पोत लिया ॥ ५३ ॥ 
संस्मृत्य संस्मरत्य शिरः सरोषं 
भ्रकस्पमाना समुपोपविष्टा । 
दीघोपघाने शायनेऽपनीय 
विभूषणान्येव नियद्धवेणी ॥ ५७ ॥ 
उन पातकी याद करकरके बहा बड़े तक्यिवाठे 
पलंगपर व्री दईं वद देवी रोषपूर्वंक षिर दिला री 
थी ओर खरे आभूषर्णोको उतारकर उसने अपने केयीको 
एक वेणीके स्परे वष लिया था ॥ ५४ ॥ 
अकारणार्थन विरृष्यमाणा 
प्ेष्याजनस्याभिजनान्विततापि 1 
विचूणेयामास कुशेशयं सा 
निःश्वस्य निश्वस्य नसैनैतस्‌ः ॥ ५५ ॥ 
'आपको अकारण ही क्रोध हुआदरैः एेखा ककर 
जव दति्योने उन्दं कोप-भवनते बाहर चलनेके व्यि खीचा; 
उस समय उन्तम कुमे उत्पन्न ( अथवा परिजने युक्त ) 
दोनेपर भी छकी भौदौवाटी सत्यभामाने सेषवश्च वारंवार 
षी सोसि खचकर दस्तगत कीदाकमल्को नले नोच- 
नौँचकरं वूर्ण-सा कर दिया | ५५ ॥ 


इति श्रीमहाभारते सिरुभागे हरिवंदो चिप्णुपरवेणि पारिजातहरणे पञ्चपष्टितमोऽध्यायः ॥ ६५ ॥ 
दस प्रकार धरीमहाभारतेके क्िकभाग इरिवंदाके भन्तमत विष्णुपर्वमे पारिजातहरणपिषयक सर्य अध्याय पूरा इमा ॥ ६५ ॥ 


॥ 


पटुषष्टितमोऽध्यायः 
श्रीकृष्णका सत्यभामाको मनाना ओर सत्यभामाका मानसिकं सेद प्रकट 
करके उनसे तपसाफे श्यि अञुमति मोँगना 


 वैश्नमपायन उवाच 
उपविष्टं सुनि शास्वा सकिमिण्या सह फेशवः । 
निश्चक्रामाप्रमेयात्मा व्यपदेशेन सर्वंचित्‌ ॥ १९ ॥ 
वैशम्पायनजी फहते दै--जनमेजय ! खव कुछ जानने- 
वाठे अप्रमेयस्स्प भगवन्‌ श्रीकृष्ण नारदजीको दक्िणीके 
खाय वैडाजान किसी दूसरे का्यके बहाने वेपि निकल 
गये ॥ १॥ 
जगाम त्वरितश्चैव सत्यभामागदं मव्‌ । 
रम्ये रेवतक्रोददेश्े निर्मितं विध्वकमेणा 1 २॥ 
वहेति निकल्कर वे बी उतावलीके साय सत्यभामाके 


विद्या भवनम गये, जिसे रवतकर पर्वतके रमणीय धिखरपर 
साक्षात्‌ विदवकमानि बनाया था | २॥ 
अभिमानवतीमिष्टं ध्रणैरपि गरीयसीम्‌ । 
जानन्‌ साघ्राजितीं विप्णुर्विवेदा शनकैरिव ॥ २ ॥ 


सनाजित्करी यु्री सत्यभामा उन्द प्राणेसि भी अधिक 
प्रिय एवं आद्रणीय थी, परं वे सखमावसे मानिनी था 
इस वातको जानकर शीङृप्ण धीरे-धीरे उनके भवने 
घुखे ॥ ३ ॥ 


खपितामिव तां देवौ स्नेष्टात्‌ संकट्पयन्निव । 
भीतभीतः स शनकैर्विवेश मधुसूदनः ॥ ४ ॥ 


2७८ 


श्रीमष्टाभारते सिकभागे 


[दरिविगे 


मधुभूदन सेवक देवी सत्यभामके रूखी होनेका विचार 
करते हए भयमीतसे होकर धीरि-धीरे उनके मदर्ल्मे 
गये ॥ ४॥ 
सेवकं दारदेदो तु तिष्ठेत्युक्त्वा विवेश हं । 
नारदस्योपचाराथं भरचुक्लं विनियुज्य सः ॥ ५॥ 
अपने साथ आये हुए सेवकको दरवाजेपर खदे रहनेका 
अदे दे ओर नारदजीके सक्तारफ चि प्रयुम्नकरो नियुक्त 
करके वे उस्र मदल्के भीतर प्रविष्ट हुए ॥ ५॥ 
स दक्षे प्रियां दुरात्‌ क्रोघागारगतां तदा । 
रे्यामिव खििरतां.कोपान्निःभ्वसन्तीं मुदु: ॥ ६ ॥ 
उन्दने दूरसे दी पनी प्रिया सत्यमामाको कोपभवनके 
भीतर गयी हूर देखा । वे करोधवदा बारंत्रार छवी ससि 
खच रही थीं ओर दासीकी भंति वदो पद्म थी॥६॥ 
करजाग्रावटीढं तु पङ्कजं मुखपद्वजे। 
संदलेप्यित्वा निःश्वस्य विहसन्तीं पुनः पुनः ॥ ७ ॥ 
अपने मुखारविन्दपर नखोंसे कुचला हआ शक कमल 
सटाये वे व्रारवार उच्छवास लेती ओर कमी-कमी रहस 
पड़ती थीं ॥ ७॥ 
किंचिदाुलितात्रेण चरणेन वसुन्यसम्‌ । 
छृत्वा पष्टेऽथ वदनं विहरन्ती पुनः पुनः ॥ ८ ॥ 
उनक्रे चरणका अग्रमाग कुछ आकल एवं चञ्चला 
ह्यो रहय था । उस चरणके द्वारा वे प्रथ्वीपर रेला-छी खीचती 
ओर परेकी ओर मह मोडकर बार-बार घूमती थीं ॥ ८ ॥ 
करपदूमे पुनः सन्ये समुखपदूमं निवेद्य च । 
वनितां चारुसवोौद्भां ध्यायन्ती कमटेक्षणाम्‌ ॥ ९ ॥ 
पिर वरार्थे करकमल्पर अपने मुलारविन्दको रखकर वे 
किसी चिन्तारमे द्रव जाती थी । उनके सारि" अङ्ग अत्यन्त 
मनोदर थै । नेच कमर्छोकी मोभाको छनेकेते ये। वे 
एक सुन्दरी वनितार्थी॥९॥ 
सरसं चन्दनं गृह्य प्रेण्याहस्तादनिन्दिताम्‌ । 
प्रहादयित्वा हदयं क्षिपन्तीं निदैयं पुनः ॥ १०॥ 
दासीके हाथसे सरस चन्दन लेकर वे सती साध्वी सत्य- 
भामा पठे तो उस चन्दनकी प्रशंसा करके उस दासीक 
द्दयको आदह्वादित कर देर्ती; परत पुन; निर्दयतापूर्वक 
उसको ्चिदकने ओर फटकारनै लगती थीं | १०॥ 
पुनरुत्थाय शयनात्‌ पतन्तीं च पुनः पुनः । 
तास्ताश्येष्ठाः परियायाश्च तथान्या दृदश्चे हरिः॥ ११॥ 
दाय्प्रासे बार वार उठकर फिर बीं भिर पडती थी। 
श्रीदसिनि अपनी प्रियतमाकी वे तथा ओर मी वहतत-घी 
चेष्ट देखीं ॥ ११॥ 


अवगुण््य यदा वक्चसुपधाने न्यवेशयत्‌ । 
ददमन्तरमित्येवं तदा गत्वा जनादंनः ॥ १२॥ 
जव्र उन्दने अपने रंहको वघ्ठसे टककर तक्रियेपर स्वाः 
तवर ग्रही उपयुक्त अवसर दै-णेा सोचकर श्रीकृष्ण उनकर 
पास शवले गये ॥ १२॥ 
प्रप्याजनं स संक्षय अनाख्येयोऽस्मि संक्षया । 
स शद्धितप्रचास्श्च चारितोऽन्वगमत्‌ ख ताम्‌ ॥ १३॥ 
वरहो पर्हुचकरर उरो संफेतसे दातिर्थोको समन्ञा द्विया 
कि मेरे आनिकी बात दर्द व्रताना मत। दासिर्योकरा क्ंकरित 
होकर इधर-उधर जाना मी रोक दिया | उस द्गार्मे उन्दनि 
सत्यमामाक्रा अनुसरण करिया ( अर्थात्‌ वे उनके प जाकर 
खदेष्टो गये) १२३॥ 
ग्रहाय व्यजनं चेव स्थित्वा स परिपाद्वतः। 
शनेरिवाखनद्‌ यातं जद्यासर शनकैरिव ॥ १९ ॥ 
वरगर्छ्म खे हो ह्यथर्मे व्यजन केकर धीरि-पीरे हवा 
कररनै ओर मुखकराने स्रो ॥ १४ ॥ 
स॒ पारिजातपुष्पस्य संसगौचुवासितः 
चभार भगवान्‌ गन्धं दिग्यं मायुषदुखंभम्‌ ॥ १५॥ 
उस समय पारिजात-पुष्पके संसर्गते युवासित हुए 
भगवान्‌ श्रीकृष्ण एक एेखी दिव्य सुगन्ध धारण करते थे मो 
मनुप्यमे दुर्लभ दै ॥ १५, 
अत्यद्भुतं सुगन्धं च जिधित्वा विस्मयान्विता । 
अपावरणोन्मुखं सत्या किमेतदिति चाव्रवीत्‌ ॥ १६॥ 
उस अघ्यन्त अदत सुगन्धको सघकर सत्यभामाको बड़ा 
विसय हुआ । उन्दने महपरसे कपड़ा दटाया ओर पूषा; 
व्यद क्या दै ?॥ ६६॥ 
सोत्थिता पृष्ठतो देवमपद्यन्ती युचिसिता । 
पर्यपुच्छदथो येष्या गन्धस्य प्रभवे तदा ॥ १७॥ 
पविन्र मुसकानवाली सत्यमामा उखकर्‌ व्रैठ गयीं ओर 
अपने पीडे खदे हुए भगवान्‌ श्री्कप्णको न देखकर दासि्योखे 
पूछने ठगी, श्यद्‌ सुगन्ध करेसि प्रकट हुई दे १ ॥ ९७॥ 
ताः पर्पस्तवप्रभाषन्त्यो जाजुभ्यां धरणी गताः। 
अधोस्ुख्यस्ततस्तस्थुः छताञ्जटिपुटास्तदा ॥ १८॥ 
स्वामिनीके इस प्रकार पूछनेपर वे कुछ न गों | 
धरतीपर घुटने टेककर पिर नीनि वयि हाथ जोड़कर 
वैठी रदी ॥ १८ ॥ । 
तद्पूरवमटष्रैव गन्धं सुञ्चति मेदिनी। 
कथमेकतरस्तस्या गन्धोऽयमिति तत्‌ खलु ॥ १९॥ 
गन्धक्रे आश्रयभूत भगवानको न देखकर वे अनुमान 
करने लगीं करि प्रथ्वी ही उस गन्धको प्रकट कर री है; 


विष्पवं ] 


पट्‌ पष्टितमोऽभ्यायः 


७७५ 


(~~ ~ 


परंतु उसकी एेसी उक्छृष्ट गन्ध कैसे हो गयी; यह वात 
समक्षम नरह भती ॥ १९॥ 
कि न्विदं स्यादिति च सा विवेक्चन्ती समन्ततः। 
द्रो केशवं देवी सहस्रा खोकभावनम्‌ ॥ २०॥ 
तो फिर यह क्या दै १ सा कहकर जव देवी सत्यनामाने 
नारो ओर' टृषिपात किया; तव ` उन्दँ स्सा विश्वभावन 
भगवान्‌ श्रीकृष्ण दिखायी दि ॥ २० ॥ 
युज्यतीति ततोवाच सदसाश्नाविलेक्षणा । 
अवतिक्तेव `रोपेण वभूव प्रणयान्विता ॥ २१॥ 
तव सदसा उनके न्म अद्र भर अये थर वे गद्रद 
कण्ठसे उतना ष्टी कह स्कीं किं आपके शरीरसे एेसी 
सुगन्धकां प्रकट होना उचित ष्ट है। भगवानके प्रति 
परेमभावसे युक्तं होनेपर मी वे उस समय रोप्रसे कुछ तिक्त- 
सीदहोउसी थीं॥२१॥ 
सा प्र्फुरितचावोंष्ठी निः्वस्याघोसुखी तद्‌! । 
मुह्त॑मसितापाङ्गी तस्थावन्यमुली श्भा ॥ २२॥ 
उनके मनोहर ओं फड़कने लगे । उन्दने छवी ससि 
खींचकर भह नीचे कर लिया; फिर कजररे नेर््रौँबाखी वे 
श्चभल््षणा देवी दो घड़ीतक दूरी ओर र्मुद करफे 
्रैठी र्दी ॥ २२॥ 
निवध्य शरकुटि वामां सम्यग्‌ विक्षिप्य लोचने 1 
निवेदय वदनं हस्ते रोभखीत्यव्रवीद्धसिम्‌ ॥ २३॥ 
फिर अपने मुखको हाथपर रखकर वायं भह चदाये 
भटीर्ोति दषटिपात करके वे श्रीदसिसि बोरी, ध्वड़ी सोमा पा 
रहे दहै आप | ॥ २३॥ 
तस्याः सुखाय नेचाभ्यां वारि प्रणयकोपजम्‌ । 
कुरोरायपलादाभ्यामवद्यायजरं यथा ॥ २६ ॥ 
तना कफर उनफरे नेत्रौसे प्रणयकरोपजनित जल्की 
धारा बहमै लगी; मानो कमलके दलसे दुपष्रारका जख 
भिरर्दादहो॥ २४॥ . 
समुत्पत्य जद्धं तत्न पतितं वदनाम्बुजात्‌ । 
भ्तिजग्राह पद्याक्षः करभ्य्रामतिसत्वरः॥ २५॥ 
तत्र कमटनयन्‌ श्रीकृष्ण अव्यन्त उतावटे दो उद्लकरर 
परंगथर आ गये ओर प्रिवतमक्रे मुखारषिन्दसे गिरते हुए 
अश्रनस्को उन्दने दोनो हाथमे ठे लिया ॥ २५ ॥ 
अधोरसि पतत्तोयं श्रीवर्साद्धो ऽभ्बुजेक्चणः। 
प्रियानयनजं देवः परि्रज्येदमव्रवीत्‌ ॥ २६॥ 
श्रीवत्चिहुसे सुशोभित कमलनयन भगवान्‌ गोविन्दने 
प्रियकर नेत्रे गिरते हुए उस जल्को ठेकर अपनी छातीमे 
खगा लिया जीर इस प्रकार कदा--) २६ ॥ 


"------------- ~~~ ~~~ ------------------------------ ~ 


खवत्यसितप्क्षि किमर्थं तत्र॒ भामिनि। 
तोयं खन्दरि नेत्राभ्यां पुष्कराभ्यामिवोदकम्‌ ॥ २७ ॥ 
ध्नीट कमल्दल्के समान ने्नोवाटी भामिनि ! खन्दरि ! 
ते कमले जल टपक रहा हो, उसी तरद ठम्दारे युगल 
न्ने यह अश्न कैसे गिर रदा दै १॥ २७ ॥ 
प्रभाते पूर्णचन्द्रस्य मध्या पङ्कजस्य च। 
विभर्ति तव किं वकं वपुस्तव मनोदरे ॥ २८॥ 
'ममनोदारिणी प्रिये ! ठम्दारा मुख प्रभातकालके शोभादीन 
पूणं चन्द्रमा तथा मध्याहकालके मुरसनायि हुए कमल्का खस्प 
क्यो धारण कस्ता है १1 २८॥ 
किमर्थं कौम घासे महाराजतमेव च । 
नादुगह्णासि सख॒श्नोणि श्रुक्टं षासोऽगरषटते ॥ २९॥ 
श्रोणि { कुंकुम ओर कुम्भ रंगकी साड़ी क्यों नहीं 
धारण करती टौ १ श्वेत वल्ञपर ह्वी आज इतना अनुग्रह 
क्यो है १॥ २९॥ 
वासस्येते ` तवाभीष्टे म्ारजतकौकुमे । 
देवाभिगमनादूष्वं शुक्लं नेष्टं हि तत्छियाः ॥ २०॥ 
धे कुसुम्भ ओर ककमके रंगमे रगे हए युग वस्र है, 
जो वुग्द बहुत प्रिय द देवपूजा करफे देवतार्ओीका विसर्जन 
कर देनेके वाद स्रीके चयि श्वेत वघछ्र धारण करना 
अभीष्ट नहीं हे } ३०॥ 
किश्चानाभरणं गाधं गानि तव कथ्यताम्‌ } 
चिन्नकस्थानमाक्रान्तं `कस्मादवस्वणिनि ॥ ३९॥ 
सुन्दर अर्खोवाटी देवि ! बताओ, आजं ठम्दारा शारीर 
आभेपणोसे भूषित क्यो नदीं दै १ धूसर कान्तिवाली सवे | 
जो चि्रक--पत्रभङ्ग-स्वनाका खान दै, वह वम्दारा मुख- 
मण्डल आज ओसि चिन म्यो दो रहा है १॥ ३१ ॥ 
दवेतेन तव पष्न वाससा भियदैते । 
टरं सेव्यते क्यन्दनेन सुगन्धिना ॥ ३२ ॥ 
सरसेनायतापङ्धि कान्तेन हद्यप्रिये। 

' “प्रियदनि ! विशाल मयनप्रान्तवाली हदयवमे ! 
आज तुम्दारा ललाट इवेत पर््वल्र ओर सरस सुगन्धित एवं 
कमनीय चन्दनद्वारा करते सेवित हो रदा दै १॥ ३२१ ॥ 
भरभोपमद्र केनापि कारणेनाननस्य च! 
करोपि मम वात्य मनो ग्टापथसि पिये ॥ २२॥ 

प्रिये ! क्रिस कारणसे दम अयने सुखकरी प्रभाका 
उपमदन ( नोभा निवारण ) कर रही दो अथवा यह्‌ सप्र 
करके क्यो मेरे मनको अत्यन्त ग्लानि पर्चा रदी ह १।२३॥ 
प्रखतश्चन्दनरसः कपोदधणयी तच । 
पत्रटेखासपत्नत्वं॑प्रातते नातिविरजते ॥ ३४॥ 


७७ 


ध्य फस हुमा चन्दन-रख वुम्दारे फपोरलका प्रेमी 
वनकर पत्र-रचनाका श्रु बन वेढा ६ ८ अर्थात्‌ जर्दौ पत्र- 
स्चना होनी चाहिये, वर्ह यद चन्दनका वेदढंगा रस पैर 
रदा है), अतः अधिक शोमा नर्दूपार्दाद॥ २४॥ 
रलैश्चाभरणेशुंक्ता तव प्रीवा न श्षोभते। 
प्रहनक्षघ्रदिता चौस्वाव्यकशास्वी ॥ २५ ॥ 
(कमय आभूपर्मोसि सनी दुद्‌ दम्दारी" यद प्रीवा, अर्ध 
शरद्‌ श्रृकी शोमा प्रकट नदीं दू दै, उस अ्र्-नक्रोफे 
दर्खनसे रहित वर्पाकाल्के आकादाकी भत्ति योमानर्ी पा 
री ट ॥ ३५॥ 
पूर्णचन्द्रसपरमेन स्मेरेणावटुभापिणा । 
फु ना भाषसे माद्य मुखेनोत्पटगन्धिना ॥ २६ ॥ 
धु्हारा सुसकराता हुआ मख पूर्णं चनद्रमाका प्रतिदरन्द्ी 
यना रदता टे । यह बहुत कम बोक्ता ओर फमलटकी-सी 
सुगन्ध व्रिखेरता रहता द । रेखे मनोर मुखफे द्वारा आज 
ठम समुद्नसे बात क्यो नहीं करती टो १ ॥ ३६ ॥ 
सद्धीकष्णापि हि तावन्मां फिम्धं न निरीक्षसे । 
स्वस्येव सखनिभ्वासं तोयमश्चनटुर्दिनम्‌ ॥ २७ ॥ 
"पूरी नदीं तो आधी अखि भी मेरी ओर क्वा नदीं 
देखती दो ? वी सख खींचकर अनते मलिन दुमा 
अश्रुनल वदती ही जा रदी दो ॥ ३७॥ 
अटमिन्दीवरश्यामे ख्दितेन मनखिनि। 
जलमञ्जनकस्मापं मा मोक्षीखननद्धिषम्‌ ॥ २८॥ 
ध्नी कमलके समान श्याम कान्तिवाली मनखिनि 1 
यह्‌ रोना-धोना व्यर्थ । एसे वंद करो ! यद्‌ जञ्जनमिधित 
अश्रुनल दरम्दारे मुखकी सोमाका वैरी द । षये मन 
बहाओ ॥ ३८ ॥ 
त्वदीयो.ऽदं यद्‌ देषि ख्यातो जगति किरः । 
नाक्षापयसि किं मां त्वं पुरेव घरवर्णिनि ॥ ३९ ॥ 
ष्देवि ¡ जव खरि संसारम यह प्रसिद्ध किरम तम्दासय 
किद्‌ ह+ तव वरवर्णिनि | तुम गुने पदलेकी टी भति अभीष्ट 
सेवके व्यि आशा र््यो न्दी देतीष्टे१॥३९॥ 
किमकार्षमरं देवि विप्रियं तव भामिनि) 
येनातिमाचमात्मानमायसयसि खन्द्रि ॥ ४०॥ 
ष्देवि | भामिनि | सुन्दरि | नि व्दारा कौनसारेवा 
अग्रिय कायं ( अपराध ) क्रिया है, जिते तुम अपने-आपको 
अत्यन्त कष्ट दे र्दीदो |] ४० ॥ 
मनसा कर्मणा वाचा न त्वामतिचराम्यदम्‌। 
स्वैथा सर्वचार्वहवि सत्यमेतद्‌ व्रवीम्यदम्‌ ॥ ४१॥ 
'सर्वाद्धघुन्दरी | मँ ठमसे यद सर्व॑या सत्य कहता ह कि 


श्रीमद्दाभास्ते सिठभागे 


[ हरिं 


म मन, वाणी शीर करियाद्राय भी कमी ठम्दारी शशका 
उदन नष्टीफस्ता ट| ८९॥ 
घहुमानोपमान्याछ सखीषु सर्वासु श्षोभने । 
स्नेदध्य यटुमानश्च त्वासरतेऽन्याद्रु नास्ति मे ॥ ४२॥ 
श्योभने [र्यो तो मेरी समी चछिर्यो मेरे द्वारा बष्टत 
सम्मान भौर मादर पानिकी अधिकारिणी द, तथापिं मेय 
विशेष आदर ओर लैष्ट तम्र सिवा धन्य स्य 
सिरि नदी ६॥ ४२॥ 
मैच त्वां मदनो जद्यान्मृतेऽपि मयि भामकः। 
षति मे निधितं चिद्धि चेतः खस्प्रतोपमे ॥ ४३॥ 
ष्देयकन्यार्भकि समान सुन्दरी ्त्यमप्रे | मेय जो 
तुम्हरे प्रति फाममाव अथवा प्रगट प्रेम वटर मरे मर 
जानेपर भी तटं न्ट छोद्‌ खकता-यद्‌ मेय निद्िवित 
धारणा है । दख यरातको यच्छी तरद्‌ समन्न ठो ॥ ५३ ॥ 
सषमाद्य्च मेदिन्यां शब्दराद्याश्चाम्यरे गुणाः। 
धुवं पद्जगभौमे त्वयि स्नेहस्तथा मम 1 ४४॥ 
व्करमल्फे मीतरी मागकी सी जामावाटी प्राणव्रछमे | 
रेपे पूर्वी क्षमा आदि भीर धाका्रभे शब्द आदि रुण 
नित्य ४, उसी प्रकार ठम्दारे प्रति मेरा स्ने भी भय टै ।४४। 
रचिरग्नी यथा दिव्या प्रभा चैव दिवाकरे । 
कान्तिष्य शाभ्यती चन्द्र स्नेस्त्ययि तथा मम। ४५॥ 
धपे अग्ने दी, दिवाकर दर्ये दिव्व प्रमा ओर 


"न्द्रमा कान्ति सदा व्रनी रदती %, उसी प्रकार दग्रे प्रति 


मेरा स्नेद सदा अविच १ ॥ ४५ ॥ 

पवंवादिनमात्मेषटं सत्यभामा जनार्दनम्‌ । 

श्ामैरवाच नेश्राभ्यां प्न्य सुभगा जलम्‌ ॥ ४६॥ 
जव श्रीफप्ण हस प्रकार अपनेको प्रिय खगनेवांरी बात 

कह रे ये, उस समय रीमाग्श्चादिनी सत्यभामाने अपने 

नेषि यह्ते हुए ओंँदुर्जौको ्पोकर उनसे धीरेसे इष 

प्रकार कष्य--।) ४६ ॥ 

मदीयस्त्वमिति ह्यासीन्मम नित्यं मनः प्रभो। 

अद्य साधारणं स्नेषं त्वयि तावद्‌ गनास्म्यहम्‌॥ ४७॥ 
प्रमो [ मेरे मनम सदा यष्टी विश्वास वना हुआयाकिं 

वुम मेरो; पतु आज यद यात मेरी सम्य आ गयी 

करि तम्दरि भीतर मेरे व्यि मी साधारण टी सेद दै 

( व्छषिप नर्द) ॥ ४५॥ 

नाधासिपमदहं पूव॑मनित्यं कारपयंयम्‌ । 

सद्य ठोकग्ति रृत्स्नामवगच्छामि न घुवाम्‌ ॥ ४८॥ 

प्र पटले वह नदीं जानती थी कि यर्दोका सव कु 
अनित्य दै ओर समय सभी वार्ति उलटफेर कर देता टै; 


विष्णुपषं ] 


सप्तपष्ितमो ऽश्याचः 


५,१9 


त ~ 


परत अव सम्पूर्णं लोकगतिको ठी भ यसिर ( क्षणमङ्घुर ) 
समक्षे खगी हूँ ॥ ४८ ॥ 
असुताया वितीयोऽपि जन्मौहि मम सर्वथा । 
"किमत्र वहुनोकेन हद्यं वेग्रि तेऽच्युत ॥ ४९॥ 
'अच्युत [ मँ जव्रतक जीवित हँ, तव्रतक वर्दी मेरे 
चि द्ितीय' (आत्मा, -जीवन-सङ्गी, सहायक एवं प्रियतम 
' पति ) दो । शटी प्रकार वरम्दरे ल्यि गँ दी द्वितीया ( आत्मा 
जीवनसङ्िनी, सहायिका एवं प्राणवछठमा पदी) द्र । एेसा 
मानकर मैने अपने जन्म ओर जीवनको सर्वया सफल समला 
. थाः परंतु अव्र यहो बहुत कदनेते क्या खम १ दम्दरारा हृदय 
- कैखा दै, यह मै अच्छी तरह जान गयी 1 ४९ ॥ . 
चाद्यात्नमेव पद्यामि माधुयं सम्प्रयुज्यते 1 
' मयि स्मेश्यं छृतकस्तवन्यत्र न छचिमः ॥ ५०॥ 
द्देखती हँ कि तुम मेरे पास ( केवल मीरी-मीरी वात 
ही वनाया-करते हो ) वाणीमाच्कते ही माघुर्यका प्रयोग करते 
हो । रे प्रति ठम्दारा स्नेष्ट छत्रिम ( यनावटी ) ह; परं 
दूसरी जगह कृत्रिम नहीं खामाविक ई ॥ ५० ॥ 
चऋजुखभावां भक्तां च सर्वथा पुरुषोत्तम । 
अवजानासि जानन्‌ मां कैतवीं वृत्तिमास्थितः ॥ ५१ ॥ 
धपुदपोत्तम | मेरा खभाव सर है ओर स्व॑था वुम्दारे 
प्रति भक्तिभाव रखती दहू--इस वातको जानते हुए ठेम 
खल-कपयका आशय लेकर मेरी अवदेखना करते हो ॥ ५१ ॥ 


पताचत्‌ खदु परयौतं शणं श्रषटव्यमघ्ययम्‌ । 
रुतं चाप्यथ यच्छ्रव्यं दष्टः स्ने्टफरोदयः ॥ ५२ ॥ 
८अस्तु तना युत है । जो कुछ अपरिवर्तनीय दशय 
देखना था, वह भने देव छा । जो सुनने योग्य बात यी, 
वह्‌ भनि सुन री । तम्हरि सनेहके फलका उदय फ किस 
प्रकार होता है, यष्ट मी प्रत्यक्ष ष्टो गयां ॥ ५२ ॥ 
यदि स्व््मलुग्राह्या मामनुशातम्सि । 
तपस्येऽहं परं इत्या निश्चयं पुरुपो्म ॥ ५३ ॥ 
'पुसपोत्तम ¡ यदि ओ वुम्दारे अनुग्रहका पात्र दज तो 
मुभे आशा दे दो. ! भै उत्तम निश्चय चठेकर्‌ 
तपस्या करूगी ॥ ५३ ॥ 
भर्तुछन्देन नासणां तपो वा वतकानि वा। 
निष्फलं खदु यद्‌ भुरच्छन्देन क्रियेत हि ॥ ५४ ॥ 
(क्योकि पतिकी ` इच्छति द्यी क्रिये गये नारियेकि ततप 
अथवा बतत सफल होते द । सखामीकी इच्छक विना जो कुछ 
मी किया जाय, वह निश्चय ही निष्फल हो जाता है ॥५४॥ 
दतीदमुष्त्वा पुनरेव दणेभना 
` सुमेष्व तोयं नयनोद्धवं सती 
प्रहाय पीतं हरिवाससः श्युभा 
पटान्तमाधाय मुखे श्युचिसिता ॥५५॥ 
ेसा ककर पवित्र मुसकानवाटी सुन्दरी शभखक्षणा 
सती सत्यमामा भगवान्‌ श्रीङ्प्णके पीत-वलख्रका अश्च ठे 
उसीसे अपने शुहको ठककर पुनः ने्रेषि ओप सदाने खगीं ।५५। 


इति श्रीमहाभारते िरुमगे हरिदिंशै विष्णुपवेणि पारिजातषहरणे षटषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६६ ॥ 


शस प्रकार श्रीमहाभारते खिरूमा हिरि अन्र्तं दिष्णुपम पारिजातद्रणव्रिषयक 
। छठ भच्याय पूर हुमा \ ६६ ॥ ` 


सप्तषष्टितमोऽध्यायः 
श्रकृष्णफे पूनेपर सत्यभामाका उन्दं अपने रोष एवं खेदका कारण वताना, श्रीटृष्णका उनके खये 
पारिजात धृष नेका विश्वाप्त दिलाकर उन्दं संत करना, सत्यभामा ओर श्रीङृष्णदारा 
मारदजीका सत्कार तथा नारदजीके हारा पारिजातकी उत्पत्ति ओर मदिमाका वर्णन 


वैश्नसयायन उवाच 
नारायणः सत्यभामां पुनरेवैष भारत 1 
प्रोवाच प्रणयात्‌ छद्धामभिमानवतीं सतीम्‌ ॥ १ ॥ 
वैशम्पायनजी कहते है--भारत ¡ मारायणस्वरूप 
शरीकृप्णने परेमवश कुपित हुई अपनी अभिमानिनी पत्री सत्ती 
सत्यभामासे पुनः इष प्रकार कदा ॥ १ ॥ 
श्रीमगवादकाच 
दहतीव ममाक्षानि शोकः कमललोचने 1 


किमु तत्‌ कारणं येने त्वमेवमतिविङ्कवा ॥ २ ॥ 
भीभगवाम्‌ ब्रोे--कमल्लोचने | बुग्दारा दुल 
देखकर मञ्चे जो शोक दभा है वह मेरे खरे अर्घाको 
दग्ध-सा कर रदा है ! वद कौन-सा रेखा कारण दै, निखसे 
देम इस तरद्‌ अत्यन्त व्याङुख्दो उटीष्ो॥२॥ 
शापितासि मम प्राणैराचक्ष्वानत्ययो यदि । 
श्रोतन्ये यदि भक्तेन भ्रौ सवाद्भश्षोभने ॥ ३ 1 
सर्वाद्नशोभने ! मै अपने प्रारणोकी क्षपय दिखाकर 


४८० 


श्रीमष्टाभारते सिरभागे 


{ शरिवंशे 


मन्युरेध प्रखृषटो हि भवेद्‌ बहुगुणं मम । 
सीमन्तिनीनां स्वासामधिका स्याभधेोक्षज ॥ २४ ॥ 
मगवान्‌ श्रीकरष्णके एेसा कदनेपर हरिवल्कभा 
सत्यभामा बोटी-*अच्युत | यदि इस प्रकार उव व्रक्षको यदा 
लया स्के तो ने यह्‌ रोपर त्याग दिया ओर मेरा ुख 
करई गुना वद सकता है ¡ अधोक्षज | उस दशमे यै समस्त 
माग्यवती लिरयोमि खे अधिक भौरवशालिनी हो 
जार्जेगीः | ३३-३४॥ 
तथास्तु प्रथमः कल्य इति तां मधुखषद्रनः । 
भ्रोवा्चाप्रतिमो देवो जगतः प्रभवाप्ययः ॥ ३५॥ 
तत्र जगत्‌की उत्ति ओर प्रख्यकरे कारणभूत अनुपम 
देवता भगवान्‌ मधुषूदनने उने कटा अच्छा तो ठम्दारा 
रोष शान्त करनेके स्थि यदी सवत्तम उपाय हो | ३५ ॥ 
वथेत्युकेति छष्णेन तुतोष समितिजय । 
सत्यभामा सतामरिठा कंसन।शछनधरटभा.॥ ३६॥ 
युद्धर्मे विजय पानैवाले जनमेजय | जवर श्रीकृष्णने 
'तयास्तु, कष्ट्कर उनकी प्रार्थना स्वीकार कर खी, त 
सद्पुरर्षोकी दष्टदेवी ओर कंचनान श्रीकरष्णकी वस्लमा 
सत्यमामा यदहूत सवष्ट हुई ॥ ३६ ॥ 
ततः खातो जगन्नाथः स्वैशः स्व॑भावनः। 
चकारावदयकं सर्व॑सर्वकामप्रदः सताम्‌ ॥ ३७ ॥ 
तदनन्तर सथ्रकी उत्पत्ति करनेवले घर्वेश्वर जगन्नाथ 
भीकृष्णनेः जो सत्पुरर्षोकी सम्पूर्णं कामनाओं दाता ई 
स्नान जीर अन्य सव आवदयक कार्यं किया ॥ ३७ ॥ 
दध्यौ च नारदं देवः स्नातो देवमुनिनरँप 1 
अभ्याजगाम स्नानान्ते मुनिधेष्ठो महोदधौ ॥ ३८॥ 
नरेश्वर ! तदश्वात्‌ भगवानूमे देवर्षिं नारदका चिन्तन 
किया । नारदजी उछ समय महााग्समै स्नान कर रदे थे। 
स्नानके प्रश्वात्‌ वे भुनिश्रे भगवान्‌ कृष्णकरे पास 
अये ॥ ३८ ॥ 
तमागतं नरपते स्तां गतिरधोक्षजः। 
सत्यया सद धमौरा यथाविधि अपूजयत्‌ ॥ ३९ ॥ 
राजन्‌ | उर माया देख सत्पुरषोके आश्रयदाता धर्मात्मा 
अधोक्षज श्रीकृने सत्याकरे खथ उनका विधिपूर्वक पूजन 
किया॥ ३९ ॥ 
पादौ प्रक्षाल्याश्चके मुनेः सात्रानिती स्वयम्‌ । 
जटं देवः स्वयं छृष्णो भूद्धरेण ददौ तद्रा ॥ ४० ॥ 
उस समय सत्राजित्‌की पुत्रीने खयं दी नारदजीके.दोर्नी 
पैर धेये ओर भगवान्‌ श्रीकृप्णने खयं दी स्ारीपे जल 
गिराया.॥ ४० ॥ 
अथोपकल्ययामास खुलासीनाय केदावः। 


परमान्नं स मुनये प्रयतात्मा जयद्‌गुखः ॥ ४७१ ॥ 
जव वे सुखपर्वक वैठ गये, तव अपने मनकी वर्म 
र्खनेवाले जगद्गु भगवान्‌ श्रीकृण्णने मुनिके ल्य उत्तम 
अन्न परोसखा ॥ ४१॥ 
तल्लोककञनी सत्कृत्य द्वं मुनिरुदारधीः । 
वुभुजे वकतां शेष्ठः श्वद्धया परया युतः ॥ ४२॥ 
लोकखष्टा भगवान्‌ शरीरके सक्तरासपर्वक दिये हुए उस 
अन्नको वक्तारं श्रेष्ठ उदाखुद्धि नारद मरनिने वद्धी धद्धके 
साथ भोजन किया ॥ ४२ ॥ 
उपस्पृदय ततस्वृप्तः प्रददौ चादिपः प्रभो । 
ताश्च प्रीतेन मनसा अरतिजघ्राह केदावः ॥ ४२॥ 
प्रमो ¡ तदनन्तर शाद धो माचमन करके वृप्त हुए 
मुनिने भगवान वहुत-ठे आशीर्वाद दियि ओर भगवान्‌ 
केरावने, प्रसन्न चित्तवे उन आशीर्वार्दोको मर्ण किया ॥५३॥ 
हतः साश्राजितीं देवी प्रणतां नारदो.ऽध्रवीत्‌ 1 
प्रसार्य दक्षिणं शस्तं सजलं जलजेक्षणाम्‌॥ ४४॥ 
तदश्वात्‌ नारदजी अपने चरर्ण्मि प्रणाम केवाली 
कप्मलनयनी सत्राजित्‌-पुत्री सत्यमामा देवरे मीगे हए दाहिने 
हायको फौलाकर बोटे--॥ ५४ ॥ 
यथेदानीं तथैव स्यं भव देवि पतिवता। 
सविशेषं च शुभगा भव मत्तपसो बलात्‌ ॥ ४५॥ 
ष्देवि | तुम दस समय मखी दो, वैषी ही पतिप्रता सदा 
वनी रदो तया मेरे तपके बल्ते ठम बिगेप सीमाग्यश्ाटिनी 
होगोः ॥ ४५ ॥ 
इत्युक्ता सुनिमुख्येन सत्यभामा हरिप्रिया । 
उत्तस्थौ, महता युक्ता पण तु नराधिप ॥ ४६॥ 
नरेधर ! शुनिप्रवर नारदजीके एषा कदनेपर हरिप्रिया 
सत्यभामा महान्‌ दर्षते उरफुष्छ होकर उदी ॥ ४६ ॥ 
स छष्णोऽप्यभ्यनुश्षां तु रग्ध्वा मुनिवरात्‌ तद्‌ा। 
धुयुजे विघसं धीमानप्रमेयपराक्रमः ॥ ४७७ ॥ 
उख समय मुनिवर नारदजीसे आच्चा ठेकर अप्रमेय पराक्रमी 
बुद्धिमान्‌ श्रीकृष्णने मी यज्षशि्ट अनका मोजन किया ॥ 
ततस्त्वावह्यक्रं रत्वा सत्यभामापि भारत 1 
अलुक्षया त्तदा भर्तुविवेशान्तगहं मुदा ॥ ४८॥ 
भरतनन्दन ¡ तदनन्तर आवरहयक कृत्य करके सत्यभामा- 
ने मी पतिकी अग्धासि अपने धरे मीतर प्रवनतापूरवेक 
प्रवेश क्रिया ॥ ४८ ॥ 
ततो विमिर्गता देवी प्णस्येवाभ्ययुश्षया । 
खिता पाव च रष्णस्य नमस्छृत्वा महात्मने ॥ ४९ ॥ 
इसके बाद पुनः श्रीङृष्णक्री ही आसाते सत्यादेवी भीतर- 


विष्णुपर्व 1 


से निकली ओर महात्मा नारदजीको नमस्कार करफे श्रीकरप्णके 
पादर्वभागमे वैठ म्यी ॥ ४९॥ 


ततो मुहतमासित्वा ' नारदः ऊष्णमनत्रवीवत्‌ । 
आपृच्छे त्वां गमिष्यामि शक्रलोकमधोष्चज ॥ ५० ॥ 
दो घडीतक बैठने पश्चात्‌ नार्दजीने श्री कृष्णसे कहा- 
“अधोक्षज { अर म इन्द्रखोकको जाऊंगा; अतः जानेकी 
अनुमति चाहता हू ॥ ५० ॥ 
तत्रायं देवमीशानं नमरस्छत्य महेश्वरम्‌ । 
गास्यन्ति देवगन्य्वौस्तथेवप्सर्सां मणाः ॥ ५१ ॥ 
ववो देवगन्धर्व ओर अप्सरा आदिदेव ईशान 
भगवान्‌ महेश्वरको नमस्कार करके उनकी प्रसन्नताके च्य 
गत्य एवं गान करेंगी ॥ ५१ ॥ 
मासि मास्युचितं हयेतन्महेन्द्रसदने पभो 1 
पूजां देवदेवस्य गान्धर्वे सत्यमेव च ॥ ५२॥ 
प्रमो { देवाधिदेव महदेवजीकी पूजाके व्यि मदेन 
भवने प्रतिमा इस दत्य ओर गानका समुचित आयोजन 
-होता ३ ॥ ५२ ॥ 
अन्तर्हितो देवदेवः सोमः सग्रवरो विभुः । 
पद्यत्यमरसुख्येन कतं भक्त्याद्धिघातिना ॥ ५३ ॥ 
'परवेतौका विघात करनेवाले देवश्रेष्ठ इन्द्रदारा भक्ति- 
भावे करिये गये उस अआयोजनको अपने श्रेष्ठ पार्षदौ तथा 
भगवती उमासहित देवाधिदेव भगवान्‌ महदिव अद्श्य 
रहकर देखते द ॥ ५३ ॥ 
निमन्तितोऽहं पूरवः पुष्पं दर्वा महादे । 
पारिजातस्य भद्रं ते तरुराक्षो मष्टात्मनः ॥ ५४॥ 
"महाद्युते ! आपका भला दो । इन्द्रे विशालकाय इक्ष- 
राज पारिजातका पएूल देकर पहले ही दिन समुच्चे वरदो आनेके 
ल्ि निमन्त्रित करिया था ॥ ५४॥ 
यदेतदाहृतं स्वगौत्‌ त्वद तु मया विभो । 
देवोपभोग्यमेतद्धि तरुराजसमुद्धवम्‌ ॥ ५५ ॥ 
प्रभो } त्रान पारिजातका यह पूः जिसे ये खर्ग॑से 
अपकेय्यि दी न्यया थाः देवताओकरे उपभोगकी वस्तु है ॥ 
दः स बृ्चः सततं शच्याः पुष्कररोतच्चन । 
सौभार्यमावहव्येव पूज्यमानो.ऽपि नित्यदाः ॥ ५६ ॥ 
कमलनयन ! बह इक्ष इन्द्रपत्नी राचीको सदा ही परिय 
, हि प्रतिदिन पूजित होनेपर वह अवश्य ही सौभाग्यकी 
प्राप्ति कराता है ॥ ५६ ॥ 
पुण्यं कतु तदा खष्टः पारिजातो महाद्रुमः । 
अदित्या धर्मनित्येन करयपेन महात्मना ॥ ५७ ॥ 
'धर्मपरायण महात्मा कदयपने अदिति देवीके पुण्यकर्म- 


म० इण षै | द 


सप्तषष्टितमो ऽध्यायः 


४८१ 


-----------------------------------------(- === 

क व्यि उस समय पारिजातनामक महावरभकी खष्टि की यथी॥ 

पुयदिन्या मह तिजास्तोषितः किं क्यपः । 

चरेण च्छन्दयामास मारीचस्तपसो निधिः ॥ ५८ ॥ 
(कहते है, पूर्वकाल्मे अदितिदेवीने महातेजस्वी कश्यप 

मुनिको अपनी सेवासे संवुष्ट क्रिया । तव तपोनिधि मरीचि- 

नन्दन कदयधने उन्हे इच्छानुसार वर मोगनेके व्ि कहा ॥ 


खोवाच सुभगः येन॒ भषेयं सुनिखत्तम । 
खलता कामतश्च सर्वैरेव ` विभूषणैः ॥ ५९ ॥ 
शप्छितं गीवन्ुत्यं च भवेन्मम तपोधन । 
कुमारी नित्यदा चैव भवेयं तपसो निधे ॥ ६०॥ 
विरजा श्ोकरदिता भवेयमिति नित्यद्‌ा 1 
पतिभक्तिमती चैव धर्मशीला तथैवं च ॥ ६६ ॥ 
(उस समय उरन्दौनि उनसे कदा--पमुनिशरे्ठ ! सुनने कोई 
देखी वस्तु दीजिये, जिते मै सदा सोभाग्यदालिनी बनी रह ; 
इच्छा होते ही समस्त आमूषर्णोसि विभूषित दो जा । 
तपोधन |! सन्ने मनोवाञ्छित गौत ओर बरप्य प्राप्त होता रहे । 
तपोनिघे ! मै सदा कुमारो-सी हौ तरनी, रहूँ ओर निर्मलः 
सोकरहित, पतिभक्तिमती एवं धर्मशीला दोऊः ॥५९--६१॥ 
पारिजातं ततोऽसखा्चीददित्थाः प्रियकाम्यया । 
सर्वकामदैः पुष्पैरावृतं नित्यगन्धैः ॥ ६२ ॥ 
प्तत्र मुनिवर केश्यपने अदितिका पिय करमेकी इच्छसे 
पारिजातकी ष्टि की; जो सम्पूणं मनोवाञ्छित वस्तुओंको 
देनेमे समर्थं ओर निस्य सुगन्धप्रद पूलोसे मरा रहता ३ ॥ 


तरिश्षाखं स्वेदा दद्यं सर्वभूतमनोहरम्‌ । 
सर्वपुष्पाणि द्यन्ते तस्मिन्नेव महाद्रुम ॥ ६३ ॥ 
'्वह्‌ सद। तीन गालामपे ही युक्त दिखायी देता है 
ओर अपनी शोभासे सम्पूर्णं प्राणियोका मन हर केता ३ । 
उवी महान्‌ वृक्षम सभी तरदके पूर दिखायी देते ई ॥६३॥ 


देटान्यपि पुष्पाणि बिभर््यैकापि रूपिणी । 
चह्ुरूपाणि चाप्यन्या पद्मानि च ततोऽपरा ॥ ६४ ॥ 
ष्ेवताओकी कों रूपतरती खरी तो एेते एल भी धारण 
करती है ( जसे मे यहो लाया था )› दूसरी उसके अनेक रूप- 
वारे ूर्लको ग्रहण करती दै तथा तीसरी उस शरक्षतसे केवल 
कमल-जैसे पएूटोंको ही चुनती है ॥ ६४ ॥ 
मन्दारादपि बरक्लाचच सारमुद्धत्य कञ्यपः। 
तस्मादेष तरुधरेष्ठः सवेषां “श्रेष्ठतां गतः ॥ ६५ ॥ 
'कदयपजीने मन्दार-इक्षसे भी सरार निकालकर इस 
बक्षका निर्माण करिया था; इसव्ि यह ॒तरुश्रेष्ठ पारिजात 
समस्त देवच्रक्ोमे उक्छृष्ट माना गया हे ॥ ६५ ॥ 
ततस्तज्न निवध्याथ कदयपं परददौ दुभा । 
अदिति्मम पुण्यां सौभाग्या तथेव च ॥ ६६॥ 


४८२ 


श्रीमहाभाप्ते लिकभागे 


[ हस्विंशे 


(तदनन्तर श्चभलक्षणा देवी अदितिने पुण्य ओर सौमाग्य- 
की बृद्धिके लियि उस बृ पास कर्यपजीको बोधकर सुद्चै 
दान केर दिया था ॥ ६६ ॥ 
अदित्या क्यपो दत्तः पुण्याथं च तथा मम । 
पुष्पद्ास्ना वेष्टयित्वा कण्ठे पुण्यार्थमात्मवान्‌ ॥ ६७॥ 

'अदितिने पुण्यके स्यि कश्यपजीके ग्म पूर्लोक्मी माला 
ल्पेटकर उन मनस्वी मुनिको मेरे हाथमे दानके रूपमे दे दिया 
था | उस दानका एकमात्र उद्देश्य था पुण्यकी प्राप्ति 
एवं वृद्धि ॥ ६७ ॥ 
निष्क्रयेण मया मुक्तः कदयपस्तु तपोधनः । 
इन्द्रो वत्तस्तथेन्द्राण्या सौभाग्यार्थं ततो मम ॥ ६८॥ 

'८उस् समय भने निष्क्रय (मूल्य ) ठेकर तपोधन कर्यप- 
को मुक्त कर दिया था । इसी प्रकार इन्द्राणीने भी सोभाग्यकी 
बृद्धिके च्ि मुषे इन्द्रका दान कर दिया था ॥ ६८ ॥ 


सखोमश्चाप्यथ रोहिण्या श्छृद्धश्ा च धनदस्तथा । 
वं सौभाग्यद चक्चः पारिजातो न संरायः ॥ ६९ ॥ 
'्सोिणीने सोमका तथा च्रृद्धिने धनाध्यक्ष कुवेरका 


[ककव 


दान मी इसी उद्देदयसे करिया था । इस प्रकार वह्‌ पारिजात 
बरक्ष सोभाग्य प्रदान करनेवाला दैः हस्म संशय नदीं है ॥ 
परि जतो विष्णुपदयाः पारिजातेतिशब्दितः । 
मन्दारपुष्येरययुो मन्दारस्तेन कथ्यते ॥ ७०॥ 
ध्यह वर्ष विष्णुपदी गङ्गाके ऊपर प्रकट हुजा था 


, इसल्यि इसका नाम पारिजात हुया । मन्दारे पूषि मी 


संयुक्त होनेके कारण यह मन्दार कहखाता दै ॥ ७० ॥ 
कोऽप्ययं दारुरित्याहुरजानन्तो यतो ,जनाः। 
कोविदार इति ख्यातरततः स॒ खुमदातरूः ॥ ७१ ॥ 
प्जो लोग इसे नहीं जानते थे, वे इसे देखकर कहने 
च्मो--“कोऽप्ययं दासः ८ यह कोई दास है ); इसव्यि वह ` 
महान्‌ चक्ष कोविदार नामसे विख्यात दौ गया | ७१ ॥ 
मन्दारः कोविदार पारिजतश्च नामभिः। 
ख वृक्षो क्षायते दिव्यो यस्यैतत्‌ ङखमोत्तमम्‌ ॥ ७२॥ 
(इस प्रकार वह दिव्य चक्ष मन्दारः कोविदार ओर 
पारिजात--इन तीन नामि जाना जाता है, जिसका यह 
उत्तम पुष्प मे खया थाः ॥ ७२ ॥ 


दति श्रीमहाभारते खिरूभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजातदहरणे सक्तष्टितमोऽध्यायः ॥ ६७ ॥ 
इरः प्रफार श्रीमहानारतके लिरुभाग हखिवंशके अन्तमैत विष्णुपर्व परिजातदहरणनिषयक सरसटरवेः अध्याय पुरा हुभा ॥ ६७ ॥ 


4-35-0 -- 


अष्टषष्टितमोऽध्यायः 
श्ीरृष्णका पारिजात वृ मोगनेके रिय नारदजीके दवारा इन्द्रके पास संदेश 


भेजना ओर न देनेपर उन्हे 


वै्गायन उवाच 
ततो जिगमिषुं त्न नारदं मुनिसत्तमम्‌ । 
प्रोवाच भगवान्‌ विष्णुरथमेयपराक्रमः॥ १ ॥ 
वैशम्पायनजी कते हैँ-- जनमेजय ! तदनन्तर 
अनन्त पराक्रमी मगवान्‌ श्रीकृष्णने इन्द्रलोक्रको जानेकी 
इच्छावाले मुनिश्रेष्ठ नारदसे वदो इस प्रकार कदा--॥ १॥ 


महष धर्म॑तच्वक्ष स्वर्भं गत्वा त्वयानघ । 
ष्ट्रा सदस्यान्‌ देवस्य त्रिपुर श्रस्य घीमतः ॥ २ ॥ 
अनाक्षया मद्धचनाद्‌ विक्षाप्यः पाकशासनः । 
सम्भावयित्वा श्रातत्वं पौराणं वेत्सि यन्मुने ॥ ३ ॥ 
(्धर्मके तत्वको जाननेवाठे निष्पाप महँ | आप खर्म 
जाकर ८( वर्ह उत्व देखनेके व्यि पधारे हुए ) बुद्धिमान्‌ 
त्रिपुरविनाशक देव सद्रके सदस्यो (पाद ग्ण ) का दर्न करके 
मेरे शर्व्दोमिं पाकद्ासन इन्द्रस मेरी एक प्रार्थना सुनादयेगा । 
मुने ! मुद्चम ओर इन्द्रम जो पुराना (वामनावतार समयका ) 
श्रातरृभाव हैः उसे तो आप जानते दी दहै । उश्ीको सादर 


गदा मारनेकी धमकी देना 


सामने रखते हुए उनसे इद्त तरद वात कीनज्यिगा, जिते 
मेरी ओससे आज्ञा देनेका भाव प्रकटन दो ॥ २:३॥ 


यमस््राक्षीन्सुनिश्रेष्ठो भगवान्‌ कदयपस्तसम्‌ । 
पारिजातं पुरादित्याः खुखाथं धर्मसत्तमः ॥ ४ ॥ 
स पुण्यमतिसौभाग्यं ददाति तरुखचमः। 

( नारदजीसे एेखा कहकर श्रीङ्कप्णने अपना संदेश इस 
प्रकार उपधि करि ग-- ) प्देवराज {पूर्वकारमे धमत्मिओंँ 
मे उत्तम मुनिश्रेष्ट मगवान्‌ कद्यपने देवमाता अदितिको 
सुख पर्हुचानेवेः व्यि जित पारिजात वृ्षक्री खष्टि की थीः वद 
सव वृक्षि श्रे है ओर दानमे दिये जानेपर अव्यन्त सौमाग्य 
तथा पुण्य प्रदान करता है ॥ ४२ ॥ 
तव दत्तं पुरा दानं नतेन तरमुत्तमम्‌ ॥. ५ ॥ 
देवीभिर्धर्मनित्याभि्धंमार्थममसरोत्तम । 
दत्तं श्रुत्वाभिकाङ्कन्ति दातुं पल्यो. मम प्रभो ॥ ६ ॥ 
पुण्यां दनधमर्धं मम परीत्यर्थमेव च। 

'अमरश्रे { सुननेम आया दै कि परे सदा धमर 


विष्णुपवं 1 


अष्पणितमो ऽन्यायः 


४८२ 


---------------------------------------------------- = 


तत्पर, रहनेवाखी अदिति. आदि देविर्योनि धर्मकरे च्थिदही 
आपके उस उत्तम बक्षको ब्रतपालनपूर्वंक ( पतिषदित ) दान 
कर दिया था ( जौर उसे नारदजीने पुनः आपक्रौ छौयया 
था ) । प्रमो इस वातको सुनकर मेरी पलिर्यो भी पुण्यः 
दानधर्मं तथा मेरी प्रसन्नताकी प्रा्िके ल्ि उसका दान 
करना चादती ई ॥ ५.६१ ॥ 
आनाययद्‌ द्वारवतीं पारिजात महाद्रुमम्‌ ॥ ७ ॥ 
दत्ते दाने पुनः स्वर्भं॑तरं त्वं नेतुमर्हसि । 
‹इसीलियि आपके इस भार्ईूने उस पारिजातनामक महान्‌ 
बरक्षको द्वारकापुरीम मेगवाया है । यहो दानका कार्यं सम्पच्च 
हो जानेपर आप पुनः उस वृक्षको खर्गलोकम ठे जा सकते दै। 


स वाच्य पवं भगवान्‌ वलभिद्‌ भगवंस्त्वया ॥ ८ ॥ 
तथा तथा प्रयत्नश्च कायो ऽस्मिन्‌ सुनिखन्तम । 
यथा ` तरुवर दयात्‌ पारिजातं खुरेररः ॥ ९. ॥ 
(अव वे नारदजीको सम्बोधित करके वोट) (भगवन्‌ ! 
भनिशरेष्ठ | ब्ररासुरका मेदन करमेवले रेश्र्यशाटी इन्द्रको 
आप तेरा संदेदा इसी रूपमे सुनादयेगा । इस विषयमे आपको 
वैसा-ही वेसा प्रयत्न करना चाहिये, जिसते देवेश्वर इन्द्र वह 
तरशर पारिजात मु्चे दे दं ॥ ८९ ॥ 


तत्र दूतगुणं तावत्‌ पदयामस्ते तपोधन । 
सम्भाव्या सर्वकृत्यानां सम्पदि त्वयिमे मता ॥ १०॥ 
ध्तपोधन { दूतमे जितने गुण दोने चादिये, वे सत्र मुने 
आपके भीतर दिखायी देते दै । मेरे मनम आपको सौँपे गये 
समी का्योकी सम्यकूल्पसे सिद्धिके स्यि निशित सम्भावना 
वनी हई दैः | १० ॥ 
धवं नारायणेनोक्तो नारदो भगवाङषिः। 
प्रहस्योवाच केशिष्नमिदं वाक्यं तपोधनः ॥ १९१ ॥ 
नारायणक्वरूप श्रीकृप्णके एेसा कनेपर तपोधन भगवान्‌ 
नारद मुनिने सकर केरिनाश्चन भगवान्‌ श्रीकृष्णसे इस 
प्रकार कहा---| १२१ ॥ 
बाद्रमेवं शरवक्ष्यामि यदुसुख्य सरेद्दरम्‌ । 
न तु दास्यति दैवेन्द्रः पारिजातं कथंचन ॥ १२॥ 
ध्यदुशरेष्ठ } मै खीकार करता दरू । मै देवराज इन्द्रे ठेसी 
ही ब्रात कर्हगा; परंतु मुन्ने मालूम है करि देवराज इन्द्र॒ उसं 
पारिजात ब्रक्षको किसी तरह मी नदीं देगे ॥ १२॥ 
मन्दरं पर्वतश्रेष्ठं दानवैखिद्रोस्तथा । 
निक्षिप्य तोयधोौ पृ पारिजातः समाहतः ॥ १३॥ 
मन्दरात्‌ पवतश्े्ठान्नयितुं प्रेषितः पुरा । 
, पारिजातं हरेणापि लोककज्ी जनादन ॥ १४॥ 
, '्जनार्दन ¡ पहठेकी वात है, दानवं ओर देवतानि 
पर्वतश्रेष्ठ मन्दरको क्षीरसागरे डाख्कर उसका मन्थन करके 


पारिजात ब्रक्षको वदेसि निकाला था । तत्श्वात्‌ पूर्वकाये 
गिरिश्रेष्ठ मन्दराचख्से रोककर्ता भगवान्‌ शङ्करे उसी 
पारिजातको लेनेके व्ि मुने इन्दरके पास भेजा था ॥ १२९४॥ 
रयं विक्षापितो गत्वा चतः शाक्रोण शाङ्करः । 
आक्रीडद्भुम उद्याने शच्याः स्यादिति याचितः ॥१५॥ 
८उस समय इन्द्रे स्वयं दी जाकर मगवान्‌ दाङ्करसे प्रार्थना 
की अओौर नम्नतपूर्वक यह नितरेदन किया कि वह दृक्ष शा्चीके 
उन्यानसे कीडादृक्षके रूपमे रदे ॥ १५॥ 
तथास्त्विति वये द॑त्तो मदाद्रेवेन चानघ । 
न च नीतः पारिजातो मन्दरं चिश्चकन्दरम्‌ ॥ १६॥ 
“अनघ ! तव महादेवजीने (तथास्तु? कहकर इन्द्रको 
उसे रखनेके स्थि वरदान दे दिया । फिर वे विचित्र कन्दराओंँ- 
से सुशोभित मन्दराचरूपर उस पारिजात बक्षको न्दी टे.गये॥ 
क्रीडावृक्षः स शच्येति उपदेशेन मोक्षितः । 
महेन्द्रेण मदावाहयो पारिजातस्ततः पुरा ॥ ९७॥ 
'महावाहो [ इस तरह प्राचीनकारूम मदेन्द्रने "वद. 
शचीका कऋीड़ा-इक्ष दैः एेखा बहाना बनाकर पारिजातको 
रङ्करजीके अधिकारखे चुडा ल्या ॥ १७ ॥ 
प्रियार्थमुमया साक्षात्‌ पारिजातवनं हरः । 
गध्यूतिदातविस्ती्ण मन्द्रस्यैव कन्दरम्‌ ॥ १८॥ 
प्तव उमादेवीका प्रिय करनेके ल्यि साक्षात्‌ भगवान्‌ 
शिवने मन्दराचल्की दो सौ कोस विस्तृत कन्दरको ही 
पारिजातके वनते परिपूर्णं कर दिया ॥ १८ ॥ 
न तध सूर्यभाः ष्ण प्रविशन्ति नगोत्तमे । 
न च चन्द्रप्रभा शीता नैव छष्ण सदागतिः ॥ १९॥ 
“श्रीकृष्ण | उस शरेष्ठ पर्वतपर वरहो न तो सूर्यकी प्रभा 
पर्हुच पाती दै, न चन्दरमाकी शीतल क्रिरणोका प्रवेश होता 
है ओरन बायुकी ही पर्हुच हो पाती हे] १९॥ 
शीतोष्णे छन्द्तस्तच्र दोलपुच्या भवन्ति.हि 1 
स्वयश्रभं वनं तद्धि महषद्ेवस्य तेजसा ॥ २०॥ 
"वहो गिरिरजनन्दिनी उमाकी इच्छाके अनुसार सर्दी 
गीं होती है । महादेवजीके तेजसे वह वन खयं दी 
प्रकारित होता रहता है ॥ २० ॥ ' 
वर्जयित्वा महादेवो सगणौ यदुनन्दन । 
मां चान्यस्तद्धनं दिव्यं न प्रयाति कथंचन ॥ २९ ॥ 
ध्यदुनन्दन ! महादेवी पावती, महादेव शिवः, उन दोर्नो- 
के गण तथा मुद्चको छोडकर दूसरा कोई उस दिव्य वनम 
किसी तरह नहीं जान॑ पाता है ॥ २९ ॥ 
सरवन्ति तच्च वार््णेय पारिजाताः समन्ततः । 


' सरत्नानि सख्यानि मनसा काङ्क्लितानि बै ॥ २९॥ 


४८४ 


श्रीम्टाभारते लिलभागे 


[ दिवश 


शरृभ्निनन्दन [ वदफ पारिजात स्त्र ओरसे सम्पूर्णं मनो 
वाच्छित श्रे र्न ठपक्रति रदते ६ ॥ २२॥ 
गणास्तान्युपरुलन्ति धरवरणां मह्ल्मनाम्‌ । 
आशया देकैवस्य . खोकनाथस्य केदाच ॥ २३॥ 

पकरेशव | वद्य देवामिदेव चिव्वनाथक्री अनसि मदारमा 
प्रमधेकि समूह्‌ उन र्नौका उपभोग करते ई ॥ २३ ॥ 


पारिजाताद्‌ बहुगुणं फं तेषां तथा वनम्‌ । 
अभिमानं प्रभाश्ेव गुणा भूस्थिणास्तथा ॥२४॥ 
मूर्तिमन्तश्च ते वृष्ताः सोमं देवं दपध्वजम्‌। 
उपतिष्ठन्ति सततं पवर; सह केद्ाव ॥ २५॥ 
धछ्वर्मीप्र पारिजातक्री अपेक्षा उन मन्दराचल्वर्ती परि 
जा्तौका पल ओर वन करई युना अच्छा | उनम अभिमानः 
प्रभा ओर गुण समी खर्गीय पारिजाततसे बकर ६ । केशव | 
वदेकि प्रचुर शुणक्चाटी एृश्च मूर्तिमान्‌. शेकरर उमासदित 
भगवान्‌ याद्धसकी प्रमथगणोके साय सदा उपासना करते ६ ॥ 
सेद्ेण तेजसा जुष दुःसै्दीनिः खखान्विताः 1 
दरयो मन्द्रे ते हि दपिताः दोलकन्यया ॥ २६॥ 
'मन्द्राचलपर जो ये पारिजाते पृक्ष ६ वे भगवान्‌ 
सद्रफे तेजते युक्त दुःखरदित ओर सुखे सम्पन्न ६; अतः 
गिरिराजकुमारी उमाको वे विरेष प्रिय है ॥ २६ ॥ 
भ्रविवेशणान्धक्ो नाम धोरस्तत्र महावलः । 
कैतेये वरदानेन दर्पितः पापनिश्चयः \॥ २७1 
(एक समयक बात दै अन्धक नामसे प्रसिद्ध धीर 
महाप्रली यीर पापपूरणं निश्चय रखनेवाला दैत्यः जो वरदाने 
मदमत्त रदता था, उस पारिजात-बनम घुस गया ¡ २४ ॥ 
सख हती देषदेषेन हरेणामित्रघातिना। 
अवध्यः सवभूतानां वृश्राद्‌ ददाशणं चटी ॥ २८ ॥ 
'वह्‌ वरृबाुरे दस गुना बलवान्‌. ओर समस्त प्राणियोफे 
चयि अवध्थ था तो भी वर श्रुषाती देवाधिदेव महादेवे उसे 
मार डस ॥ २८ ॥ 
पवं दुभ्खं न ते देव पारिजातं प्रदास्यति । 
पुष्कराक्ष सदस्नाक्षः सत्यमेतद्‌ व्रवीमि ते ॥ २९॥ 
ष्देव | कमलनयन | इत प्रकार दुःखके साय कट्ना 
पदता दै कि सदसत नेत्रधारी इन्द्र आपको पारिजात नदं 
देगे । यह्‌ र्म आपे सच्ची बात कदत ह ॥ २९॥ 
सततं सहितो देव्या शच्या ख हि वरद्ुमः । 
सर्वकामप्रदः रृप्ण तथेन्द्राय महीजसे ॥ २० ॥ 
शश्रीकृप्ण | यद्‌ श्रेष्ठ वृक्ष हित -साधनकी शक्तिसे युक्त 
्ै । वह ` शचीदेवी तथा महापराक्रमी इन्द्रफो सम्पूणं 
मनोवाञ्छित पदाथं देता रहता है ॥ ३० ॥ 


श्रीभगवानुवाच ` 
मुने तद्‌ युज्यते साघु मष्टदरवन धीमता । 
यच्छचीकारणं शत्या न नीतः सं तरः पुस ॥३१॥ 
श्रीभगवान्‌ वाटे--मुने ! पूर्वकर्म बुद्धिमान्‌ 
महादेवजी राचीकरे कारण उत वर्षको जो मन्द्राचे्पर नष 
टे शये, वद उनका कायं ठीक र्वैचता१॥ ३५॥ 
स ज्येष्ठः सर्वभूतानां टोकरत्‌ ध्रभवोऽन्ययः । 
पावर्यस्य सश्छयं छतवानिति मे मतिः॥ ३२॥ 
ये समस्त मूर्ते यिय यमेषठः टोकसष्ठाः जगत्की 
उसक्तिकफे कारण ओर अविनाभी परमात्मा | उन्देनि बद 
शटेकी जो सोकमर्यादा £ उसके अनुह्य ष्टी कायं क्रिया। 
णखा मेरा विश्वास द ॥ ३२॥ 
अष्टं यचीश्ान्‌ प्रैचस्य सर्वथा वलघ्रातिनः । 
खालनीयश्च भगवशञ्चयन्त दव सत्तम ॥२२३॥ 
पसु भगवन्‌ | मुनिश्रेष्ठ } मे सो बराघ्युसविनादान 
देवेन्का छोटा भाई दर; अतः जयन्तक्री भति उनके दार 
सर्वथा छड-म्यार पान योग्य हू | ३३ ॥ 
स्वेधा भगरवास्तावदुपायंयंहुविस्तरः 
करोतु यत्नं प्रीत्यथं श्रच्ते दासि तपोधन ॥ २४॥ 
तपोधन ! आप बहुतर उपाय फरके एसा वलन करं, 
जिससे एमलोगमि परेम चना रहे; क्योकि याप रेखा कले 
समर्थ ६॥ २४॥ 
भया सुने प्रतिक्ातं पुण्याथ सट्यभामया। 
स्यगीदिष्षानविप्यामि पारिजातमिति श्रमो ॥ ३५ ॥ 
मने } प्रभो } म॑ने स्यभामके पुण्वणयक्रा सम्पादन 
करनेफे द्यि यद प्रतिश्ठा कीषटैकि म पादिमित वृको 
सवर्गते यर्टो ठे आगा ॥ ३५ ॥ 
मया वद्रृतं कर्तुं कथं हाक्यं तपोधन! 
नादृतं हि पचो विप्र प्रोक्तं पूर्वं मयानघ 1 ३६॥ 
निष्पाप तपोषन ¡ मँ अपने उप वचनको मिष्या कषे 
कर सकता हू | विप्रवर | गनि पठे मी को मिथ्या बात 
नष्ट कटी ह ॥ ३६ ॥ 
मयि भग्नपरतिक्षे वै खोकानां पिप्लयो भवेत्‌ । 
यन्मया हि सुनिघ्रेष्ट खोकघमौ गुणान्विताः) 
परिघधायीः स्थिती सव स कथं छतं वदेत्‌ ॥ २३५७॥ 
मुनिश्रेष्ठ ! मेरी प्रतिश्चा भङ्क ह्ये जनेपर समस्त लोकमि 
विष्व मच जायगा ( सव लोग श्रू गोल्ने सरग) | युपे 
तो जगतत्‌की सितिके लियि उत्तम गुणते युक्त समसत छक 
धर्मो को धारण करना चाद्ये; जिक्षपर ेखा उत्तरदायित्व 
ष्टो, वह श्च कते नोठ सफ़ता रे १॥ ३७॥ 


विष्णुपवं ] 


प्कोनसप्ततितमो ध्यायः 


४८९५ 


वव ----------------------------------- 


न देवगन्धर्वगणा न राक्षसा 
(4 
. न चासुरा नेव च यष्चपन्रगाः। 


मम प्रतिक्षमपहन्तुमुद्यता 


मने समथः खद्धु भद्रमस्तु ते ॥ ३८॥ 

मुने ! आपक्रा कल्याण दये ] यदि समस्त देव्ता, गन्धर्वः 
रासः अघुरः यक्ष ओर नाग मीं उयत दोकर आ ज्ये तो 
वे मेरी प्रतिक्ाको नष्ट करनेमे समर्थ नही ह्यो सक्ते, नहीं 


दो सकते ॥ ३८ ॥ 
स पारिजातं यदि न परदास्यति 
प्रयाच्यमानो भवतामरेश्वरः। 
शचीन्याखदिताञटेपने 
गदां विमोक्ष्यामि पुरदयोरसि ॥ ३९ ॥ 


ततः 


` यदि आपके याचना करनेपर अमरेश्वर इन्द्र पारिजात नही 
देगे तो म उनके उम वक्चःसखलपरः जर्होका अनुलेपन शचीके 
आलिङ्घनसे मिट गया है अपनी गदाका प्रहार कङ्गा ॥ 
दूति प्रवाच्यो यदि सामपू्वंक 
याच्यमानो न तरं प्रयच्छति । 
खुनिष्ययं मद्गमनाय सवंथा 
त्वयापि कायैः खदु तञ्च निश्चयः ॥ ४० ॥ 
यदि वे शान्तिपूर्वक मोगनेखे पारिजात वृक्ष नीं देते है 
तो मेरा इन्द्रलोकपर आक्रमण करनेका उत्तम निश्चय सर्वथा 
अय ह, यद उन्दै वता दीजियेगा तथा उस दशाम आपको 
भी वरहो अवश्य वही निश्चय करना चाहिये ॥ ४० ॥ 


इति श्रीमहाभारते खिरूभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजातहरणे नारदकृष्णमाषणे अष्टषष्टितमोऽध्यायः।॥ ६८ ॥ 


शस प्रकार श्रीमहाभारतके दिरुभाग हरिके अन्तर्गत दिष्गुपरवमे परिजातदरणके प्रञ्गमे नाख ओर 
्रदधप्णका वर्तासापविषयकं अड़स््वो अध्याय पुरा हुभा 1 ६८ 1 


एकोनसप्तितमोऽध्यायः 
खर्गमे महादेवजीकी पस्विर्याके लिये चृत्य-गीत आदि उत्सव, नारदजीका इन्द्रको शीकृष्णका ˆ 
, पारिजातक सिये प्ार्थनापिषयक संदे सुनाना ओर इन्द्रका अनेकं कारण वताकर ` 
पारिजातको न देनेका विचारं प्रकट करना 


वै्यम्पायन उवाच 

नारदोऽथ सुनिर्गत्वा मदेन्द्रखदनं भ्रति । 
तां रा्रिमवसव्‌ तत्र दद्शे च मदोत्सवम्‌ ॥ १ ॥ 

वेशम्पायनजी ` कहते ह--जनमेजय ! तदनन्तर 
नारद मुनिन महेन्ढरमवनमे जाकर उ रते वर्दी निवास 
करिया ओर पूर्वोक्त मदोत्सवको भी देखा ॥ १ ॥ 
त्रादित्या महात्मानो बसवश्च सुरोचमाः। 
राजर्षयश्च विद्धांखः खर्गताः कर्मभिः श्मः ॥ २ ॥ 
नागा य्चष्य सिद्धाश्च चारणाश्च तपोधनाः । 
ब्रह्मर्षयश्च हहातश्षो देवर्षिमनवस्तथा॥ ३ ॥ 
खुपणीश्च महात्मानो मरुतश्च महावलाः। 
दिवौकसां निकायाश्च हातदो.ऽन्ये समागताः ॥ ७ ॥ 

वरहो महात्मा आदित्यगणः सुरघेष्ठ वषुगणः अपने शुभ 
क्ति सवर्गम गवे हए विद्वान्‌ राजर्षिगणः नग यः सिद्धः 
चारण, तपोधन बरहर, सैकड़ों देवर्षिं ओर मनु, महामना 
गख्ड़ पक्षी, सहावली मदद्रण तथा देवता्भकि जो अन्य 
सैकदो समुदाय द, बे सव्र उस उत्छवमे पधरे थे ॥ २-४॥ 
उपर्युपरि सर्वैषां सोमो देवो महेश्वरः । 
वस्थावमितविक्रान्वः स्वैर्गणेः परिवारितः ॥ “^ ॥ 


देवपिभिसुनिधरेष्ठेः संत्रेतः सर्वभावनः। 
करपान्तरसखदखेषु श्चयो येषां न विद्यते ॥ ६ ॥ 

सवके ऊपर उमासदित अयित पराक्रमी भगवान्‌ महेश्वर 
अपने म्रमथगोते पिरे हुए खडे ये | वे स्व॑भावन भगवान्‌ 
शिव उन मुनिश्रेष्ठ देवर्षि्योसे धिरे दए. थे जिनका सखो 
कस्यान्तरोमे भी विनाश नदीं रोता है ॥ ५-६ ॥ 


यानच॑यन्ति सततं देवा देवेश्वरोपमाः । 
आत्मरक्षा नावछेपास्धा ये च धर्मपथि स्थिताः ॥ ७ ॥ 
जो अभिमाने अन्धे नदीं हुए है तथा जो धर्मक 
मार्गपर स्थित रहनेवछे है, वे देवेश्वरौके समान प्रमावली 
आत्मज्ञानी देवता भी उन देवर्धिर्योकी सततत आराधना 
करते द ॥ ७॥ 
रुद्राश्च कादयपा देवमध्युपासखन्त भारत । 
स्कन्दश्च भगवानचिर्गज्ञा च सरितां वरा॥ ८॥ 
अ्चिष्मांस्तुम्बुरुष्धैव भारिश्च वदतां वरः । 
भरतनन्द्न ! सुद्रगणः कर्यपजीके पुत्र ( देवगण ); 
भगवान्‌ स्कन्दः अग्निदेव; सरिताओमिं श्रेष्ठ गद्धा तथो 
अर्चिष्मान्‌? तुम्बुर ओर वक्ता्ओमिं शरेष्ठ मारि (ये तीनां 
गन्धर्वं ) वरहो महदिवजीकी सेवा उनके पाख ही खे थे ॥ 


नेवासे देवद्रैवानामेते दि तपसान्विताः ॥ ९ ॥ 


४८६ श्रीमहाभारते सिटभागे [ हस्विंरे 
पतानुविधीयन्ते सर्वदेवगणा चप) उस व्र्ताव एवं व्यवहारसे संदष्ट हो वे भगवान्‌ दिव पुनः 


धर्मनित्यास्तपोनित्याः सतां मार्गमुपाधथिताः ॥ १० ॥ 
ये सव्र-के-सवर तपोव्रटसे सम्पन्न होनेके कारण देवाधि- 
देवि भी नेता द ८ उनका नेतृत्व करनेमे समर्थं द) 
नरेश्वर ! जो नित्य-निरन्तर धर्म ओर तपम संलग्न रहकर 
सत्पुर्षकरे मार्गका आश्रय ठे चुके दैः वे समस्त देवगण इन 
सद्र आदिका अनुसरण क्रसते है ॥ ९-१० ॥ 
ये त्विमे माुपा देवान्च॑यन्ति श्युभार्थिनः। 
तानच॑यन्ति शछप्रसस्तथा साजज्छुभा्थिनः ॥ १९॥ 
राजन्‌ | जो ये मनुष्य मङ्गल्करी कामना रखकर उन 
देवतार्ओकी पूजा करते ई वे देवता मी उन. माथी 
मनुर््योको अभीष्ट फल देकर उनका सत्कार करते ह ॥ ११॥ 
पितृृत्येयु देवानां संन्यासं ये त्वनुष्टिताः। 
स्वाध्यायवन्तः कौर्व्य सदा नियमचारिणः ॥ १२॥ 
कुखनन्दन | जो देवतार्थे ओर पितरोके कृत्यो सरो 
रहते है जिन्दनि संन्यासधर्मका अनुष्ठान कियाद, जो सदा 
स्वाघ्यायश्ीक तथा निय्मोकि पालनर्मे तत्र रहते द ( उन 
मनुर्ण्योको मी अभीष्ट फल देकर ये देवता उनक्रा सत्कार 
करते ई) ॥ १२॥ 
गन्धवौयिपतिः श्ीमांस्तत्र चित्ररथो चुप। 
सपुत्रो वादयामास देववाद्यानि प्रवत्‌ ॥ १२३॥ 
नरैर ¡ उस उत्सवके समय वर्ह श्रीमान्‌ गन्धव॑राज 
चित्ररथ पुत्रसहित प्रसन्नतापुर्वक देवसम्बन्धी वाद्य वजा 
रदेये॥ १३५ 
ऊणीयुश्चिघरसेनश्च दादा हृदस्तथेव च । 
इम्बरस्वुम्बुरुश्चैव जगुरन्ये च पड्गुणान्‌ ॥ १४॥ 
ऊर्णायु; चित्रसेनः दादा दहृ, इ्बर, तुम्तुख तथा अन्य 
गन्धर्वं छः गुणेचि युक्त गीत गा रदे थे ॥ १४॥ 
उर्वश्षी विप्रचिचिश्च हेमा रम्भा च भारत । 
हेमदन्वा धृताची च सजन्या तथेव च ॥ १५॥ 
भारत ! उर्वशी, विप्रचित्ति, हेमा, रम्भा, देमदन्ताः 
धृताची ओर सदजन्या--ये अप्तरार्धँ भी अपने नृत्य ओर 
गीत-कलाका प्रदर्गन रती थी ॥ १५ ॥ 
ज॒जोप भगवान्‌, देवस्तदुपस्थानमात्मव्रान्‌ । 
वृत्तेन वटः शाकस्य जगाम जगतो गतिः ॥ १६॥ 
आस्मसंयम्रील जगदाधार भगवान्‌ महादेव अपनी 
आराधनासे सम्बन्धं रखनेवाटे उस वत्य-गीत आदिको 


प्रसन्न तापूर्वक ग्रहण करते--उस्करा आनन्द ठेते ये | इन्द्रके 


१. वक्रिमः स्निग्ध, मधुर, जख; विमक्त तथा मववद्ध--ये 
गोते छः गुण द । ( नील्कण्ठीते ) 


अपने खानकौ चके गये ॥ १६} 

गते भूतपतौ सवै॑शपा जग्मुयैथागतम्‌ 

महेन्द्रेणार्यिता देवाः स्वानेव निखयान्‌. गताः ॥ १७॥ 
भगवाम्‌ भूतनाथके चले जानेपर समसत राजर्षिं (जो 

अपने पुण्यफल्षे खर्गरमे अयि येः ) वदेसि अपने-भप 

स्थानक्रौ लीट गये तथा देवता भी देवराज इन्द्रस सम्मानित 

हो अपने भवर्नौको दी चले गये ॥ १७ ॥ 

ततः सवपु यातेघु खुखासीनं पुरंदरम्‌ । 

सदस्यैः स्वैः सदासीनं नारदोऽभिययौ मुनिः ॥ १८॥ 
जव सव रोग विदा दो गये ओर देवराज इन्र ुखपूरवक 

विंहास्नपर बैठ गये, उस समय अपने सदस्यकि षाथ कै 

दए इन्द्रके पास नारद मनि गये ॥ १८ ॥ 

तमिन्द्रः पूजयामास समुत्थाय तपोधनम्‌ । 

दिदेश कुरागमं च पीठमात्मासमोपमम्‌ ॥ १९॥ 
इन्द्रने उठकर उन तपोधनका पूजन किया ओर अपने 

आखनके समान दी एक पीठ उन्दँ व्रैठनेके ल्विदिवा 

जिस्तके मीतर कुड व्रिदखछा हुथा था ॥ १९ ॥ 

नारदोऽथ महातेजा महेन्मिदमव्रवीत्‌ । 

दतो ऽहममरश्रेष्ठ॒ विष्णोरतुलतेजसः ॥ २०॥ 
कितु महातेजस्वी नारदे ८ खदे-खडे ही ) मदनरस 

कहा--+अमरग्ेष्ठ | मँ इस ` समय अनुपम तेजस्वी भगवान्‌ 

विष्णुका दूत द्र ॥ २० ॥ 

किञ्चित्कार्यं पुरस्कृत्य प्रेपितोऽस्सि महात्मना ! 

आनतीदार्तिहरणं तस्यैवानघतेजसः ॥ २१॥ 
(उन महात्मा श्रीकृष्णने कु कार्यं सामने रखकर सुत्ने 

आनर्तदेश ८ द्वारकापुरी ) से यहा भेजा दै । उन निर्मल 

तेजसी श्रीङृष्णका ही कष्ट दूर करना आजकर मुख्य कर्व टै 

( जिसके व्यि मँ यहो आया हू)» ॥ २९॥ 

भ्रीतिवाक्यानि हद्यानि प्रयुज्य मुनये तदा । 

ततः ब्रहृष्टो भगवानव्रवीत्‌ पाकद्मासनः ॥ २२॥ 
तत्र हर्षम भरे दुष्ट भगवान्‌ इन््रने देव्धिं नारदे 

प्रति मनको प्रिय लगनेवले परमपूर्णं वचर्नोका प्रयोग करके 

इस प्रकरार पृा-॥ २२॥ 

किमाह पुस्पश्चेष्ठः इीन्रमाचक्ष्व मे सुने । 

चिरस् खलु कृष्णेन संस्रतो.ऽस्मि महात्मना ॥ .२३॥ 
“मुने ! पुरपरोत्तम श्रीक्रष्णका कौन-सा संदेदा है, यह 

मुञ्चे शीघ्र यतादये ¡ निश्चय दी महातमा श्रीकृप्णने चिरकात्करे 

पश्चात्‌ मेरा सरण करिया है ॥ २३ ॥ 

नारद उवाच 
महेन्देन्द्राचजं द्रष्टुं गतोऽषटं श्रातरं तव। 
कथञ्चिद्‌ द्ारकां ततन काद्यपानां यशस्करम्‌ ॥ २४॥ 


विष्णुपवषे ] 


एकोनसप्ततितमो ऽध्यायः 


४८७ 


~व वव 


"= == = 


नारदजीने कहा--म्देन््र ! भै तुम्हरे छोर भाद 
्रीङृष्णका दर्शन करनेके व्यि किसी तरद दारका जा पर्चा 
थाः जो वर्हो रहकर कदयपी संतानो ( देवताओं ) के 
यशका विस्तार कसते ह ॥ २४॥ 
तं तु रेवतकरेऽद्राक्षं तदासीनमरिदमम्‌। 
खक्िमिण्या सहितं वीरमुमयेव वृषध्वजम्‌ ॥ २५ ॥ 
वे दान्नुदमन वीर उस समय ( द्यारकापुरीके निकटवर्ती )} 
रैवतक पर्वतपर सक्मिणी देवीके साथ उसी तरह विराजमान 
ये, जैमे भगवान्‌ चङ्क उमा देवीके साय ( कैलक्च या 
मन्दराचङ्पर ) विराज रहे हौ ॥ २५॥ 
फारिजाततसयेः पुष्पं तस्य दत्तं मयानध। 
विस्मापना्थं देवेश्च पत्नीनासुरुतेजखः ॥ २६ ॥ 
निष्याप देवेश्वर | वरयो मैने उन मदातेजखी शीङृष्णके 
हाथमे उनक्री पलिर्योको विस्मयम डालनैके व्यि पारिजात 
वृका एक पूर दिया ॥ २६ ॥ 
तद्‌ दृष्टा तस्य पत्न्यस्तु विस्मयं परमं ययुः । 
दहुकामप्रदं पुष्पं वृक्षराजससुद्धवम्‌ ॥ २७॥ 
ब्रक्षरान पारिजातके उस पुष्पकोः जो वहूत-सी 
कामनाओंको पूर्णं करनेवाला दै, देखकर उनकी पलिरयोको 
बढ़ा आश्चयं हुमा ॥ २७ ॥ 
गुणास्तासां मया ख्यातास्तस्य पुष्पस्य मानद। 
खश्च पारिजातस्य कद्यपेन महात्मना ॥ २८ ॥ 
मानद ! वर्ह मेने उनकी पलियोको उस एूख्के गुण 
भी बताये ओर यह मी कदा किं मदार्मा कदयपने पारिजातकी 
सष्टिकीटै॥ २८॥ 
अदित्या कदयपो दत्तः पुण्याधं च यथा मम। 
पुष्यदास्ना वेष्टयित्वा कष्ठे पुण्याथंमान्मवान्‌ ॥ २९ ॥ 
त्वं च दत्तो यथा चाख्या देवश्चिान्ये सुरेश्वर 1 
निष्कयश्च यथ।( दत्तः कद्यपथेर्महर्पिभि. ॥ २०॥ 
सुरेश्वर ! फिर अदितिने पुण्यक्री प्राप्ति च््यि 
आत्सप्तयमी मद्धि कश्यपक्रे गलेमे पूलोकी माला ल्पेर्कर 
जि तरह मेरे हाथमे उनका दान कर दिया या तथा चीने 
जिस प्रकार तुम्हारा दान क्रिया था ओर अन्य देवताभी 
जिष प्रकार अपनी पलिर्योद्याय दानमे दिय गये ये एवं कश्यप 
आदि महर्पियोनि जिस प्रकार मुने अपना निष्क्रय ( मूल्य) 
दिया थाः ( बह सारा प्रसङ्ध मेने वहा सुनाया ) ॥ २९-३०॥ 
तच्छुत्वा तस्य पल्स्येक्रा सत्यभामेति विश्चुत। । 
पुण्यकायं मनश्चक्रे दयिता ते यवीयसः ॥३१९॥ 
यह्‌ सुनकर उनकी एक पत्नीने, जिसक्रा नाम सत्यमामा 
है तथा जो ठ्दारे छोरे मार्ईकी वहत ही प्रिय रै अपने 
मनम चह दानरूप पुण्यकार्यं करनेका विचार करिया ॥ २३१ ॥ 


तया चाभ्यर्थिंते भती देव देव्या गणेश्वरः । 
प्रतिजक्षे स धमौ्धं यवीयांस्तव मानद ॥ ३२ ॥ 
दूसरौको मान देनेवले देव ! जैसे देवी पार्वती 
प्रमथगर्णोके स्वामी भगवान्‌ शिवसे कोई वात कहती हः 
उसी प्रकार सत्यभामाने अपने पतिसे पारिजात बृक्चके लि 
प्रार्थना की ओर म्द छोटे भाईने उसके धर्मका्यकी 
सिद्धिके स्यि उस वर्षको खा देनेकी प्रति्चा कर दी ॥३२॥ 


ततो मासुक्तवान्‌ वीरो विष्णुवटचतां चरः । 
यथावत्‌ खुरसुख्येश चरबतः श््ण्णु भावतः ॥ ३३ ॥ 
देवप्रमुख ! देवेश्वर ! तदनन्तर बरल्वार्नमिं शरेष्ठ वीर 
श्ीक्ृष्णने तुमसे कनेके ल्ि युस्ते जो बात कही थीः 
उसे ज्यो-की सयो सुना रहा हू; ठम ध्यरान देकर सुनो ॥३३॥ 
छालनीयो यवीयांस्तु प्रणिपत्याच्युतेऽवीत्‌। 
आनयेयं सखुरथेष्ठ॒पारिजातं वरद्भुमम्‌ ॥ ३४॥ 
ठम्दारे छोटे भाई अच्युते, जो तुमसे खाड-प्यार पनिके 
योग्य दैः तुम्हे प्रणाम करफे इस प्रकार कदा है-पसुर- 
श्रेष्ठ { मे उत्तम बर पारिजातको यहां खना चादता हूं ॥२४॥ 


मनोरथो ऽस्तु सपफखो वष्वास्तेऽसुरसूदन । 
धर्मरत्ये विषेण वचधभ्वास्ते सुरसत्तम ॥ ३५ ॥ 
“असुरसूदन ! सुरश्रेष्ठ ! आपकी वहू घत्यभामाका यद 
मनोरथः जो विदेषतः धर्मकार्यसे सम्बन्ध रखता दै, सफल 
होना चाहिये ॥ ३५ ॥ । 
अयं दशिंतकस्याणो लोको खोक्रगणेश्वर । 
पदयन्त्यमरकल्याण मत्प्रभावाश्च मानवाः ॥ ३६॥ 
ध्लोकगणेशवर | ग्रह मनुष्यलोक भी उस कल्याणमय 
बक्षकरा दरसन कर सके ८ एेसी कृपा कीजियि ) } मेरे प्रभावसे 
मनुभ्य भी देवताओके च्ि कस्याणक्रारी वर्न पारिजातका 
दन कर छं ( एेसा अवतर दीभ्यि )' ॥ ३६ ॥ 
वैशम्पायन उवाच 
चास्रेववचः शरुत्वा महेन्द्रः कुरुनन्दन 
नारदं वदतां धेष्ठमिद्‌ं वाक्यमथात्रवीत्‌ ॥ ३७ ॥ 
वैशम्पायनजी कते है- कुरुनन्दन } भगवान्‌ 
वासुदेवका वह संदेश सुनकर देवराज इन्द्रने वक्तार्थमि 
रेष्ठ नारदजीते इस प्रकार कहा--) ३७}! 


भजासनं द्विजधेषठ॒ युक्तमुक्तं त्वया दविज । 

संदेशं प्रतिदास्यामि विप्णोरतुखतेजसः ॥ ३८ ॥ 
"द्विजश्रेष्ठ | प्ले आसन तेो ग्रहण कीज्यि । बद्मन्‌ ! 

आपने उचित वात कदी है । मै अनुपम तेजस्वी विष्णुके 

व्यि संदेश्यका उत्तर दूंगा } ३८ ॥ 

आसीने नारदे शक्रो खच्धानुशषे ऽथ नारदात्‌ 

खभरासखनं ततो भेजे तस्यैव सदशं प्रभो ॥ ३९॥ 


८८ 


प्रमो ¡ जत्र नारदजीं कैठ गये, तव उर्दि आश 
लेकर इन्द्र अपने विंदासनपर बैठे, जो उन्दीके अनुरूप 
या{॥३९॥ 
उपविष्टः सुरपतिरथोचाच तपोधनम्‌ 1 
निरीक्ष्य ख्वटं वीयं हदं दृध्रनारानः ॥ ४०॥ 
िंदावनपर बैठकर वृव्राञ्ुरका विनाशा करनेवाले 
देवराज इन्द्रने अपने दर्षदायक धरर ओर पराक्रमकी ओर 
दृष्टिपात करके तपोधन नारदजीसे कहा | ४० ॥ 
चत्र उवाच 
मषटपं कद्र पृष्टा वक्तन्यस्ते जनार्दनः । 
वचनान्मम धर्मक सर्व॑भूतखावहः ॥ ४१॥ 
दन्द्र वोठे--धर्मल् महर्षे ! आप मेरी ओरसे कुदाल 
पूकर समस्त प्राणिर्योको सुख देनेवाले जनार्दने मेरे ही 
शब्दम दस प्रकार कदियेगा--॥ ४१ ॥ 
मदनन्तरमीशस्त्वं जगतो नत्र संडायः। 
त्वदीयः पारिजातश्च रलान्यन्यानि चाच्युत ॥ ४२॥ 
"अच्युत ! मेरे वराद दुम्दीं इस जगतुके ईश्वर हो 
इसमे संशय न्दी दै । इस दृष्टते पारिजात पतेथा दूसरे 
रन भी ठम्दारे टी ई ॥ ४२॥ 
त्वं तु भ्यवतरणं कर्तु देव महीं गतः। 
माचु्यं सर्ववरचानां स्थितः कायस्य सिद्धये ॥ ४३॥ 
ध्परंतु देव | इम प्थ्वीका भार उतासेके च्वि 
भूतल्पर गये हो ओर अमीष्ट कार्यक्री सिद्धिके व्यि समी 
वर्तव ओर व्यवहारमि मानवीय मर्यादाका ही आश्रय लेते 
दयो ॥ ५३ ॥ 
त्वयि तीर्णप्रतिक्षे हि पुनः पराप्ते पिरिषटपम्‌ । 
पूरयिष्यामि वध्वास्ते श्एन्‌ क(मनघोष्छजञ ॥ ४४॥ 
"अधोक्षज } जव ठम भूमारदरणक्ी प्रतिक परी 
करके पुनः स्वर्गखोकरम आओगे, उस समय मेँ घुम्दारी पत्मी 
सत्यभामाके समी अभीष्ट मनोर्थो पूणं करगा | ४४ ॥ 
खर्गीयानि च रल्लानि न नेतन्यानि केराव । 
खल्पाथं भायुषं खोकमिति पूर्वता स्थितिः ॥ ४५॥ 
ष्वेव { किसी छोटे-मोटे कार्यके व्यि स्वर्गीय र्नेकि 
मनुप्यलकम नदी ले जाना चाद्ये । यह पूर्वकाल्की ही 
योधी गयी मर्यादा दै ॥ ४५ ॥ 
उत्क्रम्य हि स्थिति दर्वी प्रवर्तामि म्टाषट। 
यद्यं कि भव्न्ति परजापत्तिगणाः प्रभो ॥ ४६॥ 
(महान्‌ बल्या प्रभो ! यदि म देवलोककरीं मर्यादाका 
उस्टद्धन करके कोई नया व्तावि कर तो प्रापतिगण भ्न 
क्या करट्गे ॥ ४६॥ 


श्रीमद्ाभारते लिख्भागे 


[ दरिषशे 


नदथ 


ब्रह्मणा सह पुत्रेण सखपौत्रेण महात्मना 1 
नियमाः सर्वरृत्यानां स्थापिता जगतो धुचाः ॥ ४७॥ 
ध्यु ओर ौर्वोसहित महात्मा ब्रह्माजीने जगते 
समस्त कार्ये स्यि कुक अर्ल नियम निश्चित कर दिये 
दै॥ ४७॥ 
प्रजापतिकृतं मागंमपास्य चजतो मम । 
श्रुत्वा प्रजापतिर्धीमाञ्च्छापमप्युत्खजेत्‌ प्रभुः ॥ ४८॥ 
ध्यदि मेँ प्रजापति ब्रह्माद्वाय नियत क्रिये गये माग॑को 
छोडकर चरू तो इसे चुनकर बुद्धिमान्‌ भगवाय्‌ प्रजापति 
सुस शाप मी दे सकते दँ ॥ ४८ ॥ 
अस्माभिर्भिद्यमानं हि मयौदासेतुबन्धनम्‌ । 
भेत्सयन्त्यदाद्गिता दैत्या दैत्यपक्षास्तथापरे ॥ ४९॥ 
ध्यदि दमलोग द्यी प्राचीन मर्यादारूयी सेठका बन्धन 
तोड़ दै त तो दैत्य तया देत्यपक्षके दूसरे रोग निभशङ्क 
होकर उन म्यदिार्ओका भेदन कसे क्गि ॥ ४९ ॥ 
खीनिमित्तमितो नीते पार्जिते दुमेभ्वरे। 
खर्भौकसो भविष्यन्ति विमनस्काश्च मानदं + ५० ॥ 
मानद | यदि केवर एक स्रीको संवु्ट करमेके च्ि 
स्वग॑से दृक्षराज पारिजातको भूतल्पर पर्चा दिया जाय तो 
सर्गलोकके निवासिर्योका मन उदास हो जायगा ॥ ५० ॥ 
उयभोगा मद्ध्याणां विता ये स्वर्य॑ुवा । 
तैस्तु तष्यतु मे भ्राता सम्पद्यम्‌कालपर्ययम्‌॥ ५९ ॥ 
धस्वयम्भू ब्रह्याने मनुष्योके चयि जो उपभोगकी वस्तु 
वनायी हैः समयके प्रिवतनको देखते हुए मेरे भारो उर्दि 
संतोष करना चाहिये ॥ ५१ ॥ 
दृक्षापि तात दिवे मम यः स्यात्‌ परिद्रहः। 
भिदिवस्योऽपि तं कृष्णः सवं भोकमिहार्दति ॥ ५२॥ 
(तात ! इत सखगंटोक्मे मेरे पास जो भोग-सामभ्निर्योका 
संग्रह है, बह सत्र श्रीकृष्ण यह रहकर भी तो मोग सकते ई॥ 
द्ये ह्यामिपभोज्यानामभिमानाजना्व॑नः। 
ततो धमे सथ्युत्खभ्य पापमेवाघुवर्तते ॥ ५२॥ 
'मत्य॑लोककी भोग्य वस्तुओसि दषट-पु्ट होनेके कारण 
जनार्दन श्रीकृष्णको कुर अभिमान दो गया है । उस अभिमानकरे 
कारण ही वे धर्मा परित्याग करके पापका दी अनुसरण कर 
रे द॥ ५३1 
सीवद्यता ख्यप्यमाना ष्णस्य महात्मनः । 
जगत्ययदासा योगं जनयेदिति मे मतिः ॥ ५७ ॥ 
महात्मा श्रीकृष्ण समीके वद्ीभूत रदते दै इस वातकी 
प्रसिद्धि तो उनके च््यि संखारमे अयद या क्ट्ककी ही प्रधि 
करयेगी; रेख मेरा विश्वास दै ॥ ५४ ॥ 


विष्णुपवं ] 


पकोनसक्ततितमो ऽध्यायः 


७८९ 


माचुष्यं मानुषे प्रतो यदेतन्मधुखदनः 1 

कुयौ्चिर्वन्धनीयं यद्‌ श्रा ज्येष्ठेन नारद्‌ ॥ ५५॥ 
नारद्‌ ¡ मनुप्बलोकर्मे मानवशरीरको प्राप्त हुए मधुसूदन 

यदि मुद्ध वड़े भाईके साथ दुराग्रह वर्तव करं तो यह 

उनके ल्ि उचित नदीं र ॥ ५५ ॥ 

स्वग्य॑रलविलोपेन धर्षणा स्यान्ममानघ । 

कषतितो धर्षणा चैव विशेषेणेव गर्दिता ॥ ५६॥ 
निष्पाप देवर्ष ! खर्गीय रलनकरे विलोप होने--उस्फे 

च्टे जनेसे मेर तिरस्कार होगा ओर अपने भाई-बन्धुसे 

तिरस्कार पाना तो ब्रहुत ददी निन्दित दै ॥ ५६ ॥ 

धर्ममर्थं च कामं च क्रमेण मधुसूदनः! 

सेवत्वेष सतां धमौन्‌ स्थापितान्‌ पद्मयोनिना ॥ ५७ ॥ 
ये मधुसूदन क्रमशः धर्म, अर्थ ओर कामकरा सेवन करे 1 

व्रह्माजीके द्वारा स्थापित कयि हुए स्पुरषोके धर्मोका 

आश्रय ठँ | ५७. 

सद्यीतदं पारिजातमप॑यिष्यास्यदहं यदि । 

पौलोमीमादितः त्वा को चु मां वहु मंस्यते ॥ ५८॥ 
यदि मँ पारिजातक भूतलपर भेज दगा तो शचीपते केकर 

कौन एता खर्गवासी होगाः जो सुन्वे अपिक्र आदरकी दि 

, से देखेमा ॥ ५८ ॥ 
पारिजातं महीपृष्ठे दृष्टा स्पृष्ट च माषाः । 
“स्वगं नोयमिष्यन्ति दष्टा स्वर्ग॑फरं क्षितौ ॥ ५९॥ 

भूतल्पर परिजातक्रा दर्शन ओर स्प करके मनुष्य 

प्रथ्वीपर ही खर्गका फल उपरच्य हुआ देख खर्गकी प्रा्ति- 

के व्यि उद्यम हो नदीं करेगे ॥ ५९ ॥ 

पारिजतगुणान्‌. मत्यौ जुषन्ति यदि नारद्‌ । 

देवतानां मचुष्या्णां न विशेषो भविप्यति ॥ ६० ॥ 
नारद ! यदि मनुष्य पारिजातक गुणो (जौर उससे मिल्ने- 

वले समो )क्रा सेवन कसे रूरगि तो देवताओं ओर मनुष्यं 

कोई अन्तर्‌ ही नदीं रह जायया ॥ ६०॥ 

तत्र यत्‌ कियते क्म इह तद्‌ सुज्यते नरैः । 

स्वगौथं न यतिष्यन्ति पारिजातगुणान्विताः ॥ ६१ ॥ 
म््यखोक्मै जो शुभकर्म किया जाता हैः उसका फल 

मनुध्य यह स्वर्ममे आकर भोगते द । जव्र उन्द मूतख्पर दी 

पारिजातके गुण ( लाभ ) प्राप्त होने लगेगेः तेत्र वे खर्गके 

ल्यि यत्न नहीं करगे ॥ ६१ ॥ 

सवैरत्नवरः स्वगे पारिजातस्तमोधन । 

तल्यं देवसमेेत्ैः सर्वदेव जगद्‌ भवेत्‌ ॥ ६२॥ 


तपोधन [पारिजात स्वगि सव रत्नोमे श्रेष्ठ है । यदि यह भूतल- 


पर चला गया तो मनुप्य देवताओोके समान दो जार्येगे ओौर (उनसे 
भरो हुआ) सारा जगत्‌ खदा दी ( स्वर्गे) दस्य दो जायगा ॥ 


यकन्मत्यी ने यक्ष्यन्ति छन्धस्वर्गफला भुवि । 

न पूर्तीनि प्रदास्यन्ति तुर्यत्वममरेगंताः ॥ ६३ ॥ 
पृथ्वीपर स्वर्गक्रा फल पाकर देवतार्ओकी समानताको 

प्रा हुए मनुष्य न तो यरञोद्यसा देवतार्भका यजन करगे 

ओर न पूर्तकरमोिं ही धन स्मायेगे ॥ ६३ ॥ 


यत्नेर्जप्याहिकैदचैव निव्यमाप्याययन्ति नः। 
मायुषाः स्वर्गमिच्छन्तः दधानास्तेपोधन ॥ ६४ ॥ 
तपोधन ! श्रद्धा मनुष्य स्वगंकी अभिलाषा रलकर 
यज्ञ; जप तथा नित्य कर्मेकिं द्वारा चदा हमलोर्गोको तप्त एवं 
पुष्ट कसे ई ॥ ६४ ॥ 
तच्‌ सर्य न करिष्यन्ति पारिजातगुणान्विताः। 
निस्तेजसो भविष्याम ते गतास्तद्िदीनताम्‌ ॥ ६५ ॥ 
परंतु पारिजातक्रा खम मि जानेपर मनुष्य वह सव कुछ 
नहीं करगे; फिर तो उन यक्ष आदिसे वित होकर हम सवर 
देवता निस्तेज हो ज्येये ॥ ६९५ ॥ 


शतः सुवृष्ट सस्यैस्ते जीषम्ति पुरप्रा युचि। 
आप्याययन्तस्तेऽप्यस्मान्‌ दनैय्ञेस्तथेव च ॥ ६६॥ 
खर्गकी ओरसे जत्र अच्छी वर्षा की जाती है, तत्र उससे 
पैदा होनेवाठे सस्यं ( अनाजों ) द्वारा भूतले मनुष्य जीवन- 
निर्वाह करते है ओर वे भी दान एवं य्ञोद्रासां हम देवतार्ओं- 
का पोषण करते दै ॥ .६६॥ 
न वुशुश्चा पिपासा वा बाघते यदि मायुषान्‌ । 
रोगो जण घा श्त्युवी धर्मक्षारतिरेव च ॥ ६७ ॥ 
दौर्गन्ध्यं व! सुघोरा वा ईतयः क॑सम्भवाः। 
किमुद्योगं करिष्यन्ति पारिजातगुणान्विताः ॥ ६८ ॥ 
धर्मज्ञ नारद | परिजातक्रा लम मिल जनेषर यदि 
मनुर्ष्योको मृख-प्यास नहीं सतयेगी, रोगः दुदापाः अरति 
( अषंतोष या दुःख-शसोक ) अथवा मृत्युकी परासि नदीं होगी, 
उनमे दुगैन्ध नदीं रदेगा ओर कर्मजनिव भयंकर ईतिर्योग 
उन्दे वाधा नदीं र्देगी तो वे खग॑के.व्यि क्यों उन्रोग करेगे ॥ 
सर्वथा नयनं तत्न पारिजातस्य न क्षमम्‌ । 
इति वाच्यस्त्वया विप्र विष्णुरङ्धिएटकर्मृत्‌ ॥ ६९ ॥ 
विप्रवर { पारिजातका मर्त्यलोके छे जाया जाना सर्वथा 
अनुचित दै । यह वात आप अनायास दी महान्‌ कर्म करने- 
वाले भगवान्‌ विष्णु ( श्रीकृण्ण ) से कह दीनियेगा ॥ ६९ ॥ 


यथा यथा चमे भ्राता तुष्यत्येतद्‌ विचारयन्‌ । 
तथा तथा स्वया कायं कायं मल्परीतिमिच्छता ॥ ७०॥ 
-- --------- ५ च्द्ता ^ ७०॥ 


१. खेतीको हानि पू्हुचानेवे उपद्रव ईति कहलाते ई 
ये छः प्रकारके हे--१ भतिदृष्टि, २ अनावृष्टि" ३ दिद्धो पना, 
४ चह खुगना, ५ पक्रयोकौ मधिकतरा शौर ६ दूरे रानाकी 

` चदाई। 


४९० 


श्रीमहाभारते शिरभागे 


[दसषिशि 


सुने ¡ मेरी प्रसन्नताकी इच्छा रखकर आपको वरदौ वैखा 
ही कार्यं या प्रयत करना चा्टिये, लिखते मेरे इस कथनपर 
विचार के मेरे भाई श्रीकृष्ण संतु दो जार्यै ॥ ७० ॥ 
हाराश्च मणयदचयैव चन्द्नान्यगुरूणि च । 
चस्नाणि च विचित्राणि वष्वास्त्वं दारकां नय ॥ ७१ ॥ 

देवपे ! अप वहू सदयमामाके स्थि यदसि हार, मणि; 
चन्दन, अगुरु ओौर विचित्र वन्न द्वारकाको ठे नाद्ये ॥ 
योग्यानि यानि मत्यौनां यावदिच्छति केदावः। 
न स्वर्गपरिमोपं तु कर्तमर्दति साम्प्रतम्‌ ॥ ७२॥ 

जो-जो पस्तु मनुष्यो योग्य ई, उन श्रीकृष्ण जितना 


नचा ठे सकते ६; परंतु उन्द इष समय स्वर्गटोककौ दूटकर 
इसे कंगार वना देना उचित नदीं है ॥ ७२ ॥ 
ददामि रत्नानि यथेष्सितान्यहं 
वहनि चित्राणि बिभरषणानि च । 
न ॒पारिजात्तं च कथचन द्रुमं 
सुने परदास्यामि दिवौकसां पियम्‌॥ ७३॥ 
मुने ! म शरीकृप्णकी इच्छक अनुखार ब्रहुतसे रन ओर 
विचित्र आभूषघण दे रहय हू परं पारिनात दृश्चको मँ किसी 
प्रकार नहीं दुगा वर्योकि यद खर्गविर्योको बहुत प्रिय दै 
( इसे वे अन्यत्र जने देना नदी चादते ) ॥ ७३ ॥ 


इति श्रीमहाभारते सिटमगे हरिवंवो दिष्णुपव॑णि पारिजात्हरणे दन््रवाक्ये एकोनस्ततितमोऽध्यायः # ६९ ॥ 


इख प्रकर शरीमहाभा्तके दिरुभाग दरि्वरके अन्तरत विष्णुपर्मे पारिजातदरणक भ्रसंगमे 
इन््रका या््यतिषयक उनदत्तर्वौ अध्याय पूरा हुमा ॥ ६०. 


सप्ततितमोऽध्यायः 


भ्रीकृष्यङे द्वारा गदप्रहारकी धमकी सुनकर कुपित इए इन्द्रका नारदजीसे उनके पर्ताबकी कटु 
आकोचना करना ओर युद्ध ्ियि षिना पारिजात वृधो न देनेका ही निचय कना 


वैश्नग्धायन उवाच 
देवराजवचः श्रुत्वा नारदः कुसनन्दन । 
भ्रोषाच षाषत्यं वायसो धमौत्मा धर्मवित्तमः ॥ १.॥ 
वैराम्पायनजी कषत ई--ऊुसनन्दन ! देवराज 
दनद्रकी वात सुनकर धरमरमिं भरे तथा बातचीत करनेकी कल 
जाननैवारे धर्मालमा नारदजीने यद वात कटी-! १ ॥ 


अवद्यमेव वक्तव्यं हितं वरनिपुदन 1 

मया तच मदायाद्यो वहुमामोऽस्ति मे त्वयि ॥ २ ॥ 
"महावराह बलसूदन ¡ मेरे मनम दुम्दारे प्रति वहत 

आदर दैः दस्य मुञ्चे उम्डारे दितकी वात अवश्य वतानी 

व्वादिये ॥ २॥ 

उक्तो मया वाखुद्रेबो जानता भवतो मतम्‌ । 

न दत्तः पारिजातोऽयं हरस्यापि त्वया पुर॥ ३॥ 
शन वुम्दरि इस विचारको जानता था; र्योकि वमने 

पहले मदयादेवजीक्रे मौगनेपर भी यह पारिजात वृक्ष ऊर 

मरही दिया था; इयि मने दम्दार ओरखे शरीकृप्णको सव 

कुठ बताया था ॥ ३1 

हेतवश्च मया तस्य दितास्ते समासतः । 

न॒ चावगरवान. देवः सत्यमेतद्‌ बवीभिते ॥ ४ ॥ 
तुमने पारिजात न देनेके विषयत जो कारण चतय ईहः 

उन्हं मी यने संक्षेपे उनक्रो दर्खाया या; परु भगवान्‌ 

भीङृप्णने उन सीकर नहीं किया, यह्‌ मै तुमसे सची वात 

बतारदाद्रु॥४८॥ 


उपेन्द्रो ऽहं महेन्द्रेण खालनीयः सदेति भाम्‌ । 

उवाच पुण्डसीकाक्षो दत्तसुच्तरमेव च॥ ५॥ 
भेरी घातका उत्तर देते दए कमलनयन श्रीङ्ष्ण कष्टनै 

ल्मे, भ्म उपेन्द्र ८ इन्द्रका छोय माई ) हँ; अतः महदेन्रको 

खदा ही मेरा खाह-प्यार करना चाहिये" ॥ ५॥ 

पुनः पुनमेया चास्य हेतवो देच दृ्रिताः। 

ततो न वुद्धिष्यीवृ्ता बृ्नादान तस्य वै ॥ ६ ॥ 
शत्रासुरविनाशन देव ! मैने वारर उन्दै कारण 

दिखयि; परंतु उनका विचार नही वदाः ५६॥ 

अपि चाप्युक्तवान देवो वाक्यान्ते मधुखद्टनः। 

भरत्या पुरुषश्रेष्ठः सरोषमिव वासव ॥ ७ ॥ 
“इन्द्र॒ | मेरी बातकै अन्तर्मे युदपश्रेष्ठ॒ भगवान्‌ 

मधुसूदनने फु रुष्ट-से दोकर उन्तर देते हुए कदा-॥ ७ ॥ 
न देवगन्धर्वगणा न राक्षसा 

न चासुर नैव च यक्षपन्नगाः। 
पतिक्लामपषहन्वुमुद्यता 

सुमे समथौः खलु भद्रमस्तु ते # ८ ॥ 
भुन ! आपका कस्याण दौ ¡ यदि समसत देवता; गन्धर्वः 

राक्षसः अयुर्‌, यष्च ओर नाग भी उत होकर आ ज्य 

तो वे मेरी प्रतिद्चको नष्ट कर्मे चमर्थं नदं हे सकते; न्दी 

हो ष्कते ॥ ८ ॥ 
स पारिजातं यदि न प्रदास्यति 

प्रयाच्यमानो भषतामरे्वरः । 


मस 


` षिण्णुप्ष } 


सप्ततिमो ऽध्यायः 


४९१ 


~ __ न 


नक 


द्रचीव्यास्रदितादुखेपने 

गदां विमोक्ष्यामि पूरेदमेरलि ॥ ९ ॥ 
ध्यदि आपके याचना करमेपर अमरेदवर दन्द्र पारिजात 

नदीं देगे ती म उनके उस वक्षःस्यरपर, जर्होका अनुटेपन 

शचीके आलिङ्गनसे मिट गया है अपनी गदाका 

प्रहराम करेगा ॥ ९ ॥ 

उपेन्द्रस्य मदेन्द्रायं भ्रातुस्ते निश्चयः परः । 

यदत्र मन्यसे न्याय्यं सम्प्रधार्यं छरुरुष्व तत्‌ ॥ १० ॥ 
"महेन्द्र | तम्दरि भाई उपेन्द्रका यदी अन्तिम निश्चय 

है। अव यद्यं छम जो न्यायोचित कार्यं समघनो, उसका बिचार 

करफे षदी कयो ॥ १० ॥ 

तत्तवं हितं च देवेश्च श्रूयतां वदतौ मम । 

नयतं पारिजातस्य द्वारकां मम सेचते ॥ १९॥ 
वेदवर | मे तुम्हं तत्व ओर हितकी ब्रात वताता हु 

-सनोः मुने पारिजातका दवारकाम ठे जाया जाना दी ठीक 

चता है" ॥ ११ ॥ 

मास्देनैवमु्तस्त॒ सुव्यक्तं वल्दे्भित्‌ 1 

रोषाविष्ः सहस्रो ऽन्रवीदेतन्नराधिप ॥ १२॥ 
नरेश्वर } जव नारदजीने स प्रकार सुस्पष्ट चात कह 

दीः तव बलामुरका विनास्र करनेवाले सदस नेत्रधारी न्द्र 

रोपके अविश्म आकर बोरे) १२॥ 

अनागसि मयि ज्येष्ठे सोद्रे यदि फेशवः। 

एवं प्रदः किं शक्यं क्म्य तपोधन ॥ १३॥ 
(तपोधन | यदि श्रीकृप्ण अपने निरपराध एवं ज्येष्ठ 

सहोदर भाईके प्रति णेखा अतुचित वर्तव करनेके व्यि उयत 

हतो अवस्याफियाजा सकता? ॥ १३॥ 


हनि प्रतिरोमानि पुरा स रतवान्‌ मयि । 

कृष्णो नारद्‌ सोढानि श्रातेति स्म मया सद्‌ ॥ १४॥ 
धनारद्‌ | श्रीङ्प्णने पहले भी मेरे प्रतिकूर बहत-ते कायं 

कपि दै; परंतु यद मेरा छोय भाई द, एेखा समद्चकर भने 

सदय उन बातींको खदन करिया है ॥ १४॥ 


खाण्डवे चाजनरथं पुरा वाहयता सता \ 

मदीया वारिता मेधाः इमयन्तोऽधिमुद्धतम्‌ ॥ १५ ॥ 
'पहलेकी चात दै, ये खाण्डव वनम अर्जुनक रथ होक 

रदे थे, उस समय उस वनमे लगी हई प्रचण्ड आगको 

बुस्निके व्यि मने जो मेव नियुक्त क्रिये, मेरे उन समी 

मरघोका इन्होने निवारण कर दिया था ॥ १५॥ 

गोवध॑नं धार्यता विपियं च छृतं मम। 

तथा बुश्रवघे प्राते सादाय्यार्थं चतो मया ॥ १६॥ 

समोऽदमिति सर्वेषां भूतानामिति चोकवान्‌ । 

खबाहुवलमाधित्य वृत्रश्च नि्तो सया # १७॥ 


न 


खी तरह मोवर्धन पर्वतको धारण के दनि मेर 
सप्रिय फिया था) ञव पृ्रासुरके वधका अवसर प्राप्त हज; 
उस समय ममे एनसे सदायताके च्थि प्रार्थना की थी; परत 
हन्दनि यद कहकर मुक्ते कोरा जवार दे दिया किमतो 
समस्त प्ाणियेकरि लिथि सम हं (मेरा किसके राग या द्वेष नही 
ट) 1 तवरन अपने ही बराुधल्का आश्रय देकर वृजयुरका 
वध क्रिया था ॥ १६-१७ ॥ 
देवासुरेषु प्रातेषु संप्रामेषु च नारद्‌ । 
युभ्यत्यात्मेच्छया ष्णो सुने सुविदितं तव ॥ १८ ॥ 
धुन ¡ नारद | जव्र-जव देवाघरसंग्रामकरे अवसर अति 
ह, तवर-तव विष्णु अपनी इच्छे ही युद्ध करते ६ (जी आया 
तो करते दै ओर नदी तो चर देते ह) । यद व्रात भयको 
अच्छी तरह शात दहै ॥ १८ ॥ 
यहुना् किसुकेन तस्माद्‌ दिया प्रवतंताम्‌ । 
क्षातिभेदो न नः कार्यः साक्षी त्वं मम नारद्‌ ॥ १९ ॥ 
८ विपयमे बहुत कदनेसे क्या लाम ( वात वदृनिसे 
छख दोने-जनेवाटा नदी है ); अतः यदि प्रारब्ध युद्ध 
ही दोनादैतो हो; पतु नारदजी { आप मेरी ओरे इस 
यातकरे साक्षी ई कि हमलोर्गोको अपने मर्दते कठ करना 
अभीष्ट नही ६ ॥ १९ ॥ 
ममोरसि गदां मोकतमुद्यतो यदि केदावः 
अबुशब्द्याथ पीरोर्मी गुणः क दृह टद्यते ॥ २०॥ 
ध्यदि केशव मेरी छातीमे गदा मारनेको दी उदयत ई 
तो पुखोमङ्कुमारी शचीका नामोव्छेख करके रेखी वात करनेर्भे 
यदौ कौन-सा खम दिखायी देता दै १ ॥ २०॥ 
उद्घासगतो घीमान्‌ पिता नः क्यपः परभुः । 
अदित्या सह मे माना तयोर्वाद्यमिदं भवेत्‌ ॥ २१ ॥ 
भेर बुद्धिमान्‌ पिता भगवान्‌ क्यप मेरी माता 
अदितिके साय क्षीरसागर जलवा करके च्वि गये रै। 
वे दोर मेरे प्रति एेखी वात कष सकते ये ( क्योकि माता- 
पिताको यह अधिकार है किं वह्‌ पुत्रको रादपर लनेके वि उसे 
ताडना दे ) ॥ २१॥ 
अजितात्मा मम श्रावा रजसा तमसा चतः 
कामेन च खियो चाक्यादेवं मासुक्तवान ुरुम्‌॥ २२॥ 
ध्पर्तु मेरे भाई श्रीरप्ण अजितात्मा ह, अपने मनपर 
कादृ नदींपाखकेर्ः साय दी रजोगुण ओर तमोशुणे शरिरे 
हुए €; अतः कामवश एक चके कनेमाव्रसे मुद्ध अपने 
गुमजनकरे प्रति उन्देनि एेी बात कष द्यी रै ॥ २२॥ 
धिक्छियः स्वा विप्र धिग्‌ राजसमित्ि तथा 
यत्राधिक्षित्तवान्‌ विष्णुरेवं मां स्रीजितो दविज ॥ २३ ॥ 
विप्रवर ! लिर्योको सर्वया भिक्षार £ तथा उस राज 


४९ 


समाको मी धिकार दैः जरौ सीकर वरीभूत हए श्रीक्ृष्णने 
मुद्चपर इस प्रकार आक्षेप किया है ॥ २३ ॥ 


न दष्ट कद्यपकके व्यपदेदयं महामुने । 

नेव दक्षक्के दण्टं मातुर्मे यत्न सम्भवः ॥ २४॥ 
महामुने { महर्षिं कदयपकरे कुट अवतक्र कोर 

निन्दनीय बातत नदीं देखी गयी है तथा जर्हो मेरी माताक्रा 

जन्म हया दै, उस दक्षकरुतमे भी एसी कोई व्रात देखनेमे 

न्दी आयी है ॥ २४॥ 

न ज्येष्ठता न राजत्वं देवानां प्रतिमानितम्‌ । 

कामरागाभिभूतेन रष्णेन खलु नारद्‌ ॥ २५॥ 


ध्नारद ! काम ओर रागते आक्रान्त हुए श्रीकृष्णने न 
तो मेरे बद्ष्यनकरा आदर क्रिया है ओर न मेरे देवराज 
पदका ही सम्मान क्रिया है ॥ २५ ॥ 


पुचदारसदसखैर्दिं आतानघ विदिप्यते। 
सद्वृत्त क्षानसम्पन्न इति बह्मा पुरात्रवीत्‌ ॥ दे ॥ 


निष्पाप देवप ! परव॑कारखमे ब्रद्याजीने एेसा कडा था किं 
सदाचारी ओर शानसखम्पन्न भाई दजारो चर्यो ओर पुत्रंसि 
दृकर ह ॥ २६ ॥ 


नास्ति ्राठरसमो वन्धुरादा्यं तरो जनः। 
षति मामव्रवीन्माता पिता चेव प्रजापतिः ॥ २७॥ 


भेरी माता तथा मेरे परिता प्रजापति कदयपजीने मुद्चसे 
कदा था कि भाईके समान दूरा कोई बन्धु नीं है क्योकि 
वद खाभाविक बन्धुहै ओर दुरे छोग भोजन आदि देकर 
वनय हए द ॥ २७ ॥ 


सोदरे तु विशेषं तु पिता मे कदयपो ऽ्रवीत्‌ | 

खप्ता मया विरुद्धश्न्ते दानवाः पापनिश्चयाः ॥ २८ ॥ 
भेरे पिता कदयपने सहोदर भार्द्मे विशेष बन्धुत्व 

चताया है } यद्यपि दानव भी दमरिभाईही दै तथापिवे 

घमंदी ओर पापपू्ं विचार रखनेवङे हो गे दै; इषल्ि मँ 

उनक्रा विरोध करता हू 1 २८ ॥ 


काममेतन्न चवक्व्यं खयमात्मस्तवान्वितम्‌ । 
परा्तस्त्ववसलये विप्र यदिह।योच्यते मया ॥ २९॥ 
ध्विप्रवर ! जो व्रात अपनी प्रहंसासे युक्त दो, उसे खयं 
ही नदीं कहना चाहिये, इसमें संगय न्दी है तथापि इस समय 
यदौ मेरे द्वार जो वात कदी जाती है, उसफै कहनेका अवसर 
आगयादटै॥ २९॥ 
धनुञ्यौर्या सुनिशेद छिन्नायां हि पुरानघ । 
घन्वीभिरमरणां च वरदानान्महामते ॥ २५॥ 
उत्छत्तशिरसो विष्णोः पुरा देहो धतो मया | 
सन्धितं च शये यत्नाच्छिन्नं रौद्रेण तेजसा॥ ३१॥ 


श्रीमहाभारते सिलभागे 


[ हरिवंशे 


= = ~~~ ~~~ 


ध्ुनिश्रेष्ठ ! महामते ! पूर्वकाय ( दक्षयज्ञ-विध्वंसके 
समय ) जवर भगवान्‌ क्षंकरफे धनुर्धर पर्पदोनि वरदानकरे 
प्रभावसे देवा धनुरपोकी प्रत्यश्चा काट डाली ओर 
यशरूपी विम्णुका सिर काट छिया गया थाः उस समय नि 
ही उनके धड्को धारण क्रिया था तथा खद्रके तेजवे कटे 
हुए उनके सिस्को यत्नपूव॑क धद्स्े जोडा था ॥ ३०-२१॥ 


अहं विशिष्टो देवानामित्युक्त्वा पुनरच्युतः । 
धसुरासेण्य दर्पेण स्थितो नारद्‌ केदावः ॥ ३२॥ 
नारदजी { जवर उनका मस्तक जुड़ गथा, तव वे अच्युत 
सरूप केडाव पुनः धनुपर चद्ाकर वरद घमंडके साथ यह्‌ 
कते हुए खड़े द्ये गये क्रि मँ इन देवतार्थं सवरस 
यद्करदटर॥३२॥ 
कि मांपितावामाताचा चक््यतीति मया मुने । 
स्नेटेन च स्थितं विष्णोः शरीरं मुनिसत्तम ॥ ३२॥ 


सुने ¡ ऋ्रषिशरेष्ठ } मैने उस समय वह सोचकर करि यदि 
म नहीं वचाता हं तो मेरे पिता-माता सुच क्या कर्दैगेः वदे 
स्नेदफरे साथ विप्णुके दारीरको थाम लिया था॥ ३३॥ 


णेन्द्र वेष्णवमस्थैव मुने भागमदं ददौ। 
यवीयांसमहं परेम्णा ष्णं पदयामि नार्‌ ॥ २४॥ 
ध्नारद मुने ! ( वर्षा ऋ जो सर्म या पूजन 
किया जाता है उसपर ( मुच ) इन्द्रका दी आधिपत्य &ै; 
क्योकि उस समय श्रीविष्णु शयन करते ई ) उस छेन्रभागको 
ही वैष्णव माग बनाकर मने इन्दे अर्पित क्रिया ६ । इख 
प्रकार म अपने छोटे भाई छृष्णको सदा प्रेमपूर्णं द्वे दी 
देखता हू |} २४ ॥ 
संथ्रामेघु प्रहर्तव्यं तेन पूर्वं तपोधन । 
राजा किलां समरे प्रहराम्यग्रतो धुवम्‌ ॥ ३५॥ 
तपोधन ! संग्रामकरे अवसरयोपर ( वदि प्ण मेरे विरोध- 
म स्डेदोतो) पटले उनको भ्ुञ्ञपर प्रद्र क्ररला चाद्ये] 
अन्यतर युद्धम मै अवद्यं ही पदे प्रहार करता हूः केकि मँ 
राजाह ।॥ ३५ ॥ 
प्रादुभीवेषु सवघु खशरीरमिवानघ । 
यलाद्‌ रश्चामि धर्मज्ञ केशवं भक्तिमधितम्‌ ॥ २६॥ 
प्पापरदित धर्मन नारदी | समी अवताररोके समय मुम 
भक्ति रखनेवाले केदयवकी मं अपने शारीरके समान यकनपर्वक 
रक्षा करता आया | ३६॥ 
इदं भङक्त्या मदीयं च भुवनं विष्णुना छतम्‌ । 
उपयुपरि छखोकाामधिक्र शुवनं सुने ॥२७॥ 


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# दरिवंश्धर्वदेः पचपन अध्यायक्रे शेक रद्सैमी शस 
बातका समर्थन दयोत्ता है देचिये पृष्ठ १८९। 


विष्णुपर्व ] 


सप्ततिवमो ऽध्यायः 


४९१ 


धने ! विष्णुने मेरे इस्‌ सुवन ( खर्गखोक >) की मर्यादा 
मंग करके सत्र छोकोसे ऊपर-ऊपर अपने भुवन ( वक्ण्ठ- 
धाम ) को प्रतिष्ठित , किया ओर उसे अन्य लोकि बद्कर 
महत्व दिया ॥ ३७ ॥ 
अवमानः स च मया पृष्ठतः क्रियते मुने । 
छाखनीयो भया वाल इत्येवं ्राठगीरवात्‌ ॥ २८॥ 
मुने ! वह अपमान मने पीछे कर दिया (खुल दिया) 
चडे भार््का जो गौरव है उपर ध्वान देकर मैने सदा यही 
सोचाहै क्रि यह्‌ वाल्क है। अतः मेरे द्वारा लड्-प्यार 
पिके योग्य है ॥ ३८ ॥ 
वारोऽयं मम पुत्रेति यवीयानिति नारद्‌ । 
पिज्रा मारा च गोविन्दो मानी च परिभाषितः ॥ ३९ ॥ 
ध्नारद ! श्रीकृप्णकं विषयमे मेरा सदा यदी भाव रदा है 
किं यह वालक हैः मेरा छोय माई है; अतः मेरे द्वारा पुत्रके 
समान लड़ ल्डनिके योग्य दैः किंतु उनके विषयमे मेरे 
मातापिताने भौ अपना यही विचार व्यक्त किया है कि गोविन्द 
मानी हे ॥ ३९ ॥ 
ह एरस्तज्र जनानां च केश्यः सुविरोषतः। 
वयं द्वेष्या न संदेदस्तत्न स्नेहो ऽतिरिच्यते ॥ ४० ॥ 


ध्वहो ( मनुप्यखोक ) के छो्गोको श्रीकृष्ण विरोघ प्रिय 
ह जौर हमलोग उनके देषके पात्र हो गये ई इस कोई 
संदेह नहीं दै । इसका कारण यही दै कि श्रीक्ृष्णका उन 
मनुय प्रति स्नेह वदता जा रहा है ॥ ४० ॥ 


स्क्षो वख्वाज्छरः पानं मानयिता तथा । 
केदावेव्येव च ध्यानं यत्तद्धितथतां गतम्‌ ॥ ४१॥ 
'अतव्रतक जो मेरा यह खधाल था किं केशव सर्वज्ञः 


वलवान्‌, शूरवीर सुपात्र तथा दूसयोको मान देनेवले ह 
ड सवर निष्फल हो गया ॥ ४१ ॥ 


गच्छ नास्द वक्तव्यः केदायो वचनान्मम । 
आहूतो न निवर्तेयं समरं प्रति राघुभिः ॥ ४२॥ 
'नारदजी ! जाइये ओर मेरे शब्दोमे भरीकृष्णसे कह 
दीन्िकरि पमे बन्नुओंके आहान करने या लङकासनेपर युद्ध- 
से पि नहीं टट सकता ॥ ४२ ॥ 
यदीच्छसि तदागच्छ सद्यं ते यस्वमिच्छसि । 
प्रहरस्व च पूर्य त्वं भाजित यथेच्छसि ॥ ४२॥ 
'पत्नी$ यक्षम रहनेवाठे शरीक्रुष्ण ! यदि तुम सुद्षपर 
क्रा प्रहर करना चाहते दो तो आ जाओ तुम जो 
चाहते हो, तम्दारे उस प्रदारो सदन किया जायगा । जसे 
तम्दारी इच्छा दै, उसफे अनुखार पके वम्दीं प्रहार करो ॥ 


रथद्धेनाथ श्रा्रंण गद्या नन्दकेन च। 
प्रहराख्द्य गरुडं डो भूत्वा जनादन ॥ ७४८ ॥ 
प्रहते प्रहरिष्यामि यथाराक्त्या च केदाव। 
अहो धिग्‌ यदि मां स्नेहो विद्धं न करिष्यति ॥ ४५॥ 
(जनार्दन तुम गरुड्पर चद्कर सुद्‌ होकर मेरे ऊपर 
सुदरसन चक्र, शाञ्जं धनुप्र, कौमोदकी गदा ओर्‌ नन्द्कनामक 
खन्चके द्वारा प्रहार करो । केशव [ यदि श्रातृस्नेह सने 
व्याक्ुक नहीं कर देगा तो ठम्डारे प्रहार करनेपर मेँ मी 
यथाशक्ति तुमपर प्रहार करगा । अदयो, एेसी परिखितिको 
धिकार दै ! ॥ ४४-४५ ॥ 


यावन्न सं्(मगतो जितोऽहं चक्रपाणिना । 
पारिजातं न दास्यामि तावद्‌ भो मुनिसत्तम ॥ ४६ ॥ 


भुनिश्ेष्ठ ! जवतक मे संग्रामभूमिमे उपस्थित होकर 
चक्रपाणि भीकृष्णके दारा पराजित नीं हो जाऊंगा; तव्रतकं 
उन्द पारिजात नदीं दूंगा ॥ ४६ ॥ 


मां समाह्ययते ज्येष्ठं यवीयान्‌ स तपोधन 
अहो तं भषयिष्यामि किमथ स्रीजितं ्रिम्‌ ॥ ४७॥ 


४८अहो तपोधन ! जब्र श्रीङृष्ण छोटे होकर समुन्न बडे 
भारईको युद्धके व्यि खलकार रहै है, ततर प्नीके गुलाम चने 
हुए उन केशवे इस वर्तावको म किंस चल्थि सदन कर | 


अद्येव गच्छ भगवन्‌ द्वारकां रृष्णपाछिताम्‌ । 
विवादे संस्थितः सोऽ इति वाच्यरत्वयाच्युतः॥४८॥ 


भगवन्‌ { आप आज दी भीकृष्णद्वास सुरक्षित दारका- 
पुरीको चले जाये ओर विवादे च्थि तैयार खड़े हुए. उस 
अज्ञानी अच्युतसे इस प्रकार मेरा उत्तर सुना दीन्यि ॥४८॥ 


पलाहपन्राद्ध॑मपि त्वयाजितो 
न पारिजातस्य तव प्रदास्यति । 
दति प्रवाच्यो मधुखूदनस्त्वया 
वचो मदीयं सरता तपोघन ॥ ४९ ॥ 


'्जव्रतकर तुम पराजित नहीं कर दोगे, तवरतक्र पारिजात 
चक्की तो बात ही क्या है, उसकी आधी पत्ती भी इन्द्र वु 
नदीं देगा । तपोधन | मेरी इत वातकरो याद रखते हु 
आपको मधुसूदन शरीद्ष्णठे इन्दी सार्व्दोमि यद व्रात कनी 
चादि ॥ ४९ ॥ । 

पुनः प्रवाच्यो भगवंस्त्वयाच्युततो 
मम प्रियाय खदु निर्विशङ्धितम्‌ । 
न मायया हतुमिहार्दसि दमं 


खुयुद्धमेवास्तु धिगस्तु जिह्यताम्‌ ॥ ५०॥ 
(भगवन्‌ ! आपको मेरा प्रिय करसनेफे च्वि अय्युततसे 


४९७ 


पुनः निःशङ्क होकर यह भ्रात कह देनी चाय किं माया 
( छट-कपट ) के द्वारा पारिजात श्रक्षका अपहरण करना 


धीमह(भारते न्िलभागे 


[ रिषे 


वम्दारे च्वि उचित नरह ६ । विद्युद युद्ध ष्टी होना चादिये। 
कुरिख्तापुणं वर्तावको धिकार दै ॥ ५० ॥ 


इति श्रीमहाभारते खिरुभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजातदरणे दन्दरवाय्ये सप्ततितमोऽध्यायः ॥ -७० ॥- 


दस प्रकार भ्रीमहाभासके ह्िरभाग दिदे भन्तम्त विष्णुपर्व परिजत-हरण्मे प्रसगे इन्द्रका 
वाक्यविषयक सत्तरे{ अध्याय पुरा हुमा ॥ ७० ॥ 


एकसपतितमोऽध्यायः 
नारदजीफे दार श्रीकृष्णकी महत्ताका प्रतिपादन सुनफर भी इन्द्रका 
उन्दं पारिजात देनेफो उद्यत न होना 


वैशम्पायन उव्राच 
मदेन्द्रवचनं श्रुत्वा नारदो वदतां वरः । 
विषिक्ते देवराजानमिदं वचनमन्रवीत्‌ ॥ १॥ 
वैशम्पायनजी फते है-- जनमेजय ! देवराज इन्द्र 
का यह्‌ वचन सुनकर वक्ताओिं श्रेष्ठ नारदजीने एकान्तम 
उनसे स प्रकार कदा--| १॥ 
कामं प्रियाणि राजानो वक्तव्या नात्र संशयः । 
प्राप्तकालं तु वक्तव्यं हितमग्रियमप्युत ॥ २ ॥ 
देवेश्वर ! अवश्य ही राजापि वे टी व्रात कटनी चाये, 
जो उन प्रिय गे; समै संशाय नही है तथापि जिका 
अवसर प्राप्त हुआ होः रेखा हितकारक वचन तो अप्रिय 
दोनेपर भी उनसे कद देना टी उचित दै ॥ २॥ 
अनियुक्तपुरोभागो न स्यादिति वदन्ति हि। 
सखुरोकगतितत्वक्षो नयविक्षानकोविदः ॥ ३ ॥ 
“जो उत्तम छोकगतिके तत्वका श्चाता है ओर नीतिके 
विश्वान भी कुशल है, एेखा पुरम त्रिना कदे-सुने कीं 
अगुमा न वरन, यद बुद्धिमान्‌ पुद्पमोका कथन है ॥ ३ ॥ 
कायौकायं समुत्पन्ने परिपृच्छति मां भवान्‌ । 
यतस्ततः प्रवक्ष्यामि गृ्यतां यदि रोचते ॥ ४ ॥ 
“कर्तन्याकर्तन्यकी समस्या खद्धी होनेपर प्रायः तम मुद्यसे 
पूठते ओर सला लते हो; इसस्मि इस समय भी मै तुमसे 
कुछ कर्हुगा । यदि अच्छाल्गे तो इसे कामम लना ॥४५॥ 
अनुक्तेनापि खुदा वक्तहयं जानतां हितम्‌ । 
न्याय्यं च प्राप्तकारं च पराभवमनिच्छता ॥ ५ ॥ 
धजो राजाकी पराजय नदीं चादता ओर किंस बात 
उसका दित दैः यदह अच्छी तरद जानता है,--रेसे सुद्दव्तो 
विना के भी न्यायसंगत जर समयोचित हितकर वचन 
अवद्य कना चाद्ये ॥ ५ ॥ 
वक्तव्यं सर्वथा सद्धिरभिय चापि यद्धितम्‌ । 
आचरण्यमरेतत्‌ . सनेदस्य सद्धिरेवातं पुरा ॥ ६ ॥ 


४द्पुकष्थेकरो उचित है कि वे सर्वथा ्ितक्री ष्टी बात 
चता, भले टी वह्‌ सुनने अप्रिय श्ये ] यष्टी स्नैदसे उच्रण 
होनेका उपाय दै, जिखका श्रेष्ठ पुर्पनि दी प्राचीन काल्प 
आद्र किया दै ॥ ६ ॥ 
अनृते घर्म॑भम्मे च न शुध्यति चापिये। 
न प्रियं च हितं वाच्यं सद्भिरेवेति निन्दिताः ॥ ७ ॥ 
घ्नो असत्यवादी, धर्म-मर्यादाको भंग करनेवाटे, किसी- 
का उपदेश सुननेकी इच्छा न र्खनेवाठे ओर सवके भप्रिय 
( देपपात्न >) & एेठे सोसि म तो प्रिय वात कटनी चाये 
ओरन दितकी दी । रेखा ककर सत्पुद्ौनि इन खकी 
निन्दा की ३॥ ७॥ 
सर्वथा देव॒ वक्तव्यं श्रयतां श्टण्वतां वर । 
श्रुत्वा च कुस सर्वच मम धेयस्करं वचः ॥ ८ ॥ 
“श्रोतार्यि शरे सर्वच देव | मपरे मको सर्वथा हितकी 
वात वतानी दहै, सुनो ओर सुनकर मेरे कल्याणकारी यचनका 
पालन करो ॥ ८ ॥ 
अन्योन्यभेदो रावृणां खुष्टदां घा घखान्तक । 
भवत्यानन्द्रूद्‌ देव दविषतां नाप्र संदायः ॥ ९ ॥ 
ध्रृखासुरका विनाश करनेवाठे देव ! मादर्यो ' अथवा 
सुद्देमिं यदि परस्पर भेद ( वैरभाव) टो जाय तो बह 
शतरुर्भोको आनन्द देनेवाला होता है, दसम संशय नदीं ।९॥ 
दहिताञुवन्धसदहितं काय॑ केयं सुरेश्वर । 
विपरीतं च तद्‌ बुदृष्वा नित्यं बुद्धिमतां वर ॥ १० ॥ 
यत्‌ स्यात्‌ तापकररं पश्चादारब्धं कायमीदशम्‌। 
आरभेन्नेव तद्‌ धि्टानेष बुद्धिमतां नयः ॥ १९॥ 
धवुद्धिमानेमिं शरेष्ठ सुरेश्वर ¡ अपने करव्याणते सम्बन्ध 
रखनेवलि कार्यको जानना वचाष्टिये तथा जौ सके 
विपरीत दयोः उसको भी सदा समञ्च ठेना चाष्टिये | सममन 
छेनेफे चाद जो कायं आरम्भ करमेपर पटे संताप देनेवाख 
हयः एेसे कार्यको विदान्‌ पुरुष कदापि आरम्भ न करे 


,यही इदधिमानकी नीति दै॥ १०-११॥ 


विष्णुपर्व 1 


, पकसत्ततितमोऽध्यायः \ 


७९५ 


~~~ =-= 


विपाकमस्य कार्यस्य नायुपदयामि शोभनम्‌ । 

यदध्र "कारणं देव निषोघ विघुधाधिष ॥ १२॥ 
देव { विबुधेश्वर ! मै इस कार्यकर परिणाम अच्छ 

नदी देलता र । दस्मे जो कारण है, उसे ध्यान देकर सुनो ॥१२॥ 


य पको विभ्वमभ्यास्ते प्रधानं जगतो हरिः । 
परङृत्या यं परं स्वँ क्षेबक्षं वै विदुदुंधाः ॥ १३॥ 
जो अप्रेल ही कार्यभूत जगत्‌ ओर उसके कारणभूत 
प्रषानके मी अथिष्ठाता ( संचालक ) दैः वे श्रीहरि ही 
भीष्ण रै । निन्द समसत विद्वान्‌ प्रङृतिते परे विराजमान 
्षे्रशके रूपमे जानते ई ॥ १३॥ 
तस्याग्यक्तस्य यो ष्यक्तो भागः सर्वभवोद्भवः । 
तस्यात्मा परमो देषो विष्णुः सर्व॑स्य धीमतः ॥ १४॥ 
(उस अव्यक्त प्रकृतिके जो व्यक्तभाग ( महत्त्वे या 
समष्षुदधिके अभिमानी चेतन ) ब्रह्मा दै, वे ही समस 
संषारकी उदयत्तिके कारण दै । उनके तथा सम्पूर्णं चेतन 
जीवमात्रके आत्मा वे परमदेच श्रीविष्णु ही द ॥ १४॥ 


पररुत्याः प्रथमो भाग उमा देवी यदाखिनी । 
व्यक्तः सर्वमयो विश्वः स्रीसंक्षो लोकभावनः ॥ १५॥ 
यद्यखिनी उमादेवी प्रकृतिका मुख्य भाग ( व्यक्त 
जगत्‌खरूप ) द । अतः सर्वमय व्यक्त विश्च खरीसंरक 
( खमूर्णं भोग्य वस्तुरूप ) 2, जो चेतनमात्रको वृत्त 
करनेवाला टै ॥ १५॥ 
सुकमिण्याद्याः खियस्तस्या व्यक्तत्वं प्रथमो गुणः। 
अल्थया भ्रङूतिर्दैवी शुणी देवो महेश्वरः ॥ १६॥ 
(सक्मिणी आदि लिर्यो भी प्रकृतिका शर्य गुण (भाग) 
अर्थात्‌ व्यक्तरूप ई । अविनारिनी प्रकृति उमादेवी है, जो 
शुणरूपा है ओर उनसे युक्त गुणी पुसष भगवान्‌ मदेश्वरदै।१६। 
न विक्नेषोऽस्य र्द्रस्य षिष्णोश्चामरसन्तम । 
गुणिनश्चान्यथः शास्ता सदा च प्रथमो ऽशुणः ॥ १७ ॥ 
नारायणो महातेजाः स्व॑कृस्टोकभावनः । 
देवशरेष्ठ ! ( इसी पकार रक्षमी या इक्िणी गुणमयी 
अविनादिनी प्रकृति र ओर विष्णु या श्रीकृष्ण रुणी पुख्ष 
है ) इन गुणवान्‌ मायावी रद्र ओर विष्णुर्मे कोई अन्तर 
नदीं हे । निरुणात्मक जगतरके जो प्रथम अविनाशी शासक 
निरं परमात्मा दै, वे द्यी मदातेजस्वी नारायण ह| वे 
सवके खष्टा ओर समस्त जगते उत्पादक ह ॥ १७१ ॥ 
भोक्ता महेश्वरो देवः कती विष्णुरधोक्षजः ॥ १८ ॥ 
बह्मा देवगणाश्चान्ये पश्चात्‌ सृष्टा मदात्मना । 
महदिवेन देवेदा प्रजापतिगणास्तथा ॥ १९ ॥ 
देवेश्वर | इन परमात्मा परमदेव नारायणके द्वारा ही 
भोक्ता मदेशरदेव, कतां अधोक्षज विष्णु, बरसा, अन्य देष- 


समुदाय तथा प्रजापतिगण--ईइन सवकी पटे श्ट 
हुई ३ ॥ १८-१९॥ 
पवं पुराणयुक्षो विष्णुदेवेश्चु॒पटश्ते । 
अचिन्त्यश्चप्रमेयश्च गुणेभ्यश्च परस्तथा ॥ २० # 
रस प्रकार पुराणपुरुष भगवान्‌ विष्णु देवता्भोमं 
अचिन्त्यः अग्रमेय ओर गुणातीत कदे जति है| २० ॥ 
अदित्या तपसा विष्णुमेक्षत्माऽऽराधितः पुरा। 
चरेण च्छन्दिता तेन परितुष्टेन चादितिः ॥ २९१९॥ 
"पूर्वकम देवमाता अदितिने तपस्याद्वारा परमात्मा 
विष्णुकी आराधना की । उससे संतुष्ट हो भगवान्‌ विष्णुने भी 
अदितिको इच्छानुसार वर मोगनेके ल्यि आज्ञा दी ॥ २१॥ 
तयो्तस्त्वत्समं पुजरमिच्छामीति खसोत्तम । 
प्रणिपत्य च विक्ञाय नारायणमधोक्षजम्‌ ॥ २२॥ 
“सुरश्रेष्ठ { उस समय अदितिने अधोक्षज ( इन्दियातीत ) 
भगवान्‌ नारायणको पदचानकर उन्दै प्रणाम क्रिया ओर इस 
पकार कदा--“प्रभो } मै आपके समान पुत्र चाहती ह ।२२। 


तेनोक्त भुवने नास्ति मत्समः पुरुषोऽपरः । 

अशचेन --तु भविष्यामि पुरः खख्वष्टमेव ते ॥ २३॥ 
'तबर उरन्दोनि कदा--'देवि | समस्त भुवर्नमिं मेरे समान 

दूरा कों पुरुष नदीं है । अतः मै ही अपने अंशे वुश्ारा 

पुत्र होऊंगा ॥ २३ ॥ 

स जातः सर्वरृद्‌ देषो भ्राता तथ सुरेभ्बर । 

नारायणो महातेजा यमुपेन्द्रं प्रचक्षते ॥ २४ ॥ 
“सुरेधर ! ( इस निश्रयके अनुसार ) वे सरी खुष्ट 

करनेवञि महतेजस्वी मगवान्‌ नारायण तुम्हरे भार्ईके रूपमे 

अवतीणं हुए मिन्द उपेन्द्र कहते ३ ॥ २४॥ 

इच्छन्नेव हरिदैव कादयपत्वमुपागतः । 

[अ ्ैविङुरुते 

तेस्तेभपरे भूतमञ्यभवाप्ययः ॥ २५ ॥ 
वदेव ! भूत ओर भविप्वकी उचत्ति एवं संहारक ` 

अधिष्ठानभूत श्रीहरि स्वैच्छसे दी कर्यपजीके पुत्ररूपमे 

प्रकट हए थे तथा अपनी इच्छके अनुसार ही वे विभिन्न 

रूपमे अवतीर्णं होते रहते ई ॥ २५॥ 

प्रादुभौवं गतो देवो जगतो हितक्षास्यया ! 

मारः जगतो नाथः कतौ हती च केद्रायः ॥ २६॥ 
(जगत्‌ संरभकः खष्टा ओौर्‌ संहारक मगवान्‌ केशव 

जगतके हितकी कामनसे ही मधुरामे अवतीर्णं हुए. है ॥२६॥ 

यथा पलरपिण्डः स्याद्‌ स्यात्त स्तेटेन मानद्‌ । 

तथा जगदिदं व्याप्तं विष्णुना पभविष्णुना ॥ २७ ॥ 
'दूसरो को मान देनेवल देवेन्द्र | जैसे मांसपिण्ड स्नेह 

( चर्वी या चिकेनाई ) से भ्या होता है, उसी प्रकार यद 

सास जगत्‌ प्रभावशाली भगवान्‌ विष्णु व्याप्त ह ॥ २७ ॥ 


र्दे 


श्रीमहाभारते खिखभागे 


[ दरिवंशे 


ब्रह्मण्यदेवः सक्रीत्मा तैसरतेभोवेविंकर्वति । 
जगत्यतिगुणो देवो वैङुण्डः स्वंभावनः ॥ २८ ॥ 
वे भगवान्‌ ्राह्यणेकि हितैषी ई, सबके आत्मा दै ओर 
जगत्‌ जैखा शरीर धारण करते ईँ, उसके अनुसार दी 
विभिन्न मार्वो ८ सुखदुःखादि धर्मो ) द्वारा विकारो प्राप्त 
होते-से प्रतीत दोते ई ! वासवम तो सवकी उत्पत्ति करनेवाले 
वे भगवान्‌ वैकुण्ठ गुणातीत दै | २८ ॥ 
अत; समस्तदेवानां पूज्य पव च केरावः। 
पद्मनाभश्च भगवान्‌ परजास्ंकसो विभुः ॥ २९ ॥ 
"अतः प्रजक्री खष्टि करनेवाले सर्व॑भ्यापी मगवान्‌ पद्मनाम- 
सरूप श्रदरप्ण समस्त देवताओंके च्यि मी पूस्य ही दै ॥२९॥ 
अनन्तो धारणार्थं च विभर्ति च महयश्चः। 
यक्ष दत्यपि सद्धिश्च कथ्यते वेष्टवादिभिः ॥ ३०॥ 
ध्वे दयी पृथ्ठीको अपने मस्तकपर धारण करनेके ल्यि 
अनन्त ( शेषनाग ) > रूपम प्रकट हए ह । वे मदान्‌ यड 
धारण करते है । वेदवादी साधु पुदष उन्दीका ध्यज्ञ'नामते भी 
प्रतिपादन कसे ह ॥ ३० ॥ 
वेतः छृतयुगे देवो रकस्रेतायुगे तथा । 
द्परे च तथा पीतः रृष्णः कलियुगे विभुः ॥२१॥ 
ध्वे सर्वव्यापी भगवान्‌ सत्ययुगे श्वेतः तरेतामें रक्तः 
द्वापर पीत तथा कचियुगर्मे ङष्ण वर्णका सरूप धारण 
करते है *॥३९१९॥ 


# शरुतिमे कहा दै-- 
कलिः रायानो भवति संजिदानस्तु द्वापरः । 
उत्तषठंल्ेता भवति कृतं सम्पधते चरन्‌ ॥ 

धत शरुत्िके साथ उप्त दखोककी सद्गति गाति हए माचायं 
नीषकण्ठ कते है कि जो अविधारूपौ निद्राम सो रहा दै अर्थात्‌ 
जो अत्यन्त मूढ पुरुष दैः वदी कलि दै । उ्तपर्‌ अनुग करनेके 
चयि इत जगत्‌ भगवान्‌ श्रीहरि कृष्ण द्योते दै ( अर्थात्‌ श्रीरष्णकरा 
अवततार ्रहणक्यवे है) । जो कुछ-कुछ कस्याणकी वर्तको 
देखता शौर समञ्यता है, जो उत्त अश्ान-निद्रासे आधा जग गया टै, 
उप्त पुरुपको द्वापर क्रते दै! उक्षके किये मगवान्‌ पीतवणं होते 
ह अर्थात्‌ सुव्णैके समान मनोर कान्ति धारण करते हं 1 वद 
मतुष्य उमरे उस्र दिव्यरूपपर आक्कष्ट होकर कुछ भक्तिकी मोर 
उन्मुख दोता ६ । जो कव्याणकीौ प्राकर व्यि सदा सजग रक 
भ्रयल कर्तां ६, वह साधकं त्रेत्ता कदराता दै 1 उस्तपर्‌ अनुग्रह 
करमेके लिये मगान्‌ रक्तं माताको मंति-भनुरक्त ( वात्छस्यमावसे 
युक्त ) होते दै । जो युधिष्ठिर आदविकी ति भगवानूका मघ्यन्त 
मक्त £, सदा क्तिके पथपर ही चरता दैः वह छृनछ्त्य दोनेके 
कोरण करृतयुग अथवा सत्ययुग कदा गया दै; उ्के मरति भगवान्‌ 
शुशवर्णं हेते द अथवा उसके समक्ष वे सदा मपने शुद्ध रूपका 
टी प्रकाद्धित कस्ते ६1 


अवधीत्‌ सर हिरण्याक्षं दिव्यरूपघसये हरि; । 
दधासप्छु निमञ्जन्तीमेष देवो वकुन्धराम्‌ ॥ ३२॥ 
वायां षपुराधित्य जगतो हितक्राम्यया । 

(उन श्रीदरिने अपने दिव्यरूप धारण करके दिरण्याक्ष 
नामक दैत्यका वध किया या। उन्होनि जगतूके दितकी 
कामनातसे वाराहरूप धारण करके जल द्ववती हई पृथ्वीका 
उद्धार एवं जल्के ऊपर इसका संस्थापन किया था ॥ २२१॥ 


जघ्ने दिरण्यकरिपुं नारसिंहवपुदरिः ॥ ३३॥ 
जिगाय जगतीं चेव विष्णुवौमनरूपधुक्‌ । 
ववन्ध च वदि देवः श्रीमान्‌ पन्नगवन्धनेः ॥ २४॥ 

“उन्दी श्रीह रिने नरसिंह रूप धारण करके दिरण्यकरिपुका 
संहार करिया ण ओर उन्दी वामनरूपधारी श्रीमान्‌ भगवान्‌ 
विम्णुने इस प्रथ्वीको जीता ओौर विकि नागपाराम 
बोध छलिया ॥ ३३-३५॥ 
देवदानवसम्भूतानक्रामयष्पि धियम्‌ । 
त्वय्यनन्तः पुरा विष्णुरुदाये ऽमितविक्रमः ॥ ३५॥ 

ध्यद्यपि देवताओं ओर दानवोकि सम्मिलित प्रयसे प्रकट 
हई राजलक्ष्मी दोनौके च्ि साधारण थी तो भी पूर्वकार्लमै 
अमितपराक्रमीः उदार दय, अनन्तद्वरूप भगवान्‌ विष्णुने 
व॒म्दारे च्ि उसपर आक्रमण किया अर्थात्‌ विराटरूपते 
तीर्न शओोर्कोको आक्रान्त करके बरिलोकरक्ष्मी ठम्द 
समपिंत कर दी ॥ ३५॥ 


सावशेषं तपो यस्य तक्निहन्ति जनार्दनः 1 
अीकेष्वपि वर्तन्तं चतमेतन्महयात्मनः ॥ ३६॥ 
धजिषक्री तपद्या शेष है, वह भी यदि अलीक--मायामय 
अर्थान्‌ छल-कपट एवं अन्यायपूर्णं बरताव करता दै तो 
भगवान्‌ श्रीक्कण्ण उसे मार डाख्ते ईः क्योकि दुराचार्सिवीका 
यहं विनाश इन महात्मा शरीक्प्णका त्रत है ॥ ३६ ॥ 
जघ्ने च दानवान्‌ मुख्यान्‌ देवानां ये च शत्रवः। 
तव भिया गोविन्दो धर्मनित्यः स्तां गतिः ॥ ३७ ॥ 
प्तदा धमकी रक्षर्मे तद्र रहनेवले सत्पुरुषोके आश्रय- 
भूत भगवान्‌ गोविन्दने वम्दारा प्रिय करनेके लिय मुख्य- 
मुख्य दानर्वोका तथा जो लोग देवताओकरि शतरुहुएर्दै 
उनका मी वध कर डाल है ॥ ३७ ॥ 
रामत्वमपि चावाप्यं जघ्ने रावणमत्मचान्‌ । 
भूत्वा कामगुणश्चेव जघान द्विस्दं हरिः ॥ ३८॥ 
{इन मनखी प्रमुने हौ भीरामचन्द्रका रूप धारण करे 
रावणकरो मारा था तथा दुसरे दूसरे अवतार धारण करके इन 
श्रीदसिने इच्छानुसार शौर्यं आदि गुर्णौते युक्त अपुर्योका 
उसी तरद संदार कर उ्या था जैसे सिंह हाथीको नष्ट 
कर देता दै ॥ ३८॥ 


विश्युपवं ] 


पकसप्तितमो ऽध्यायः 


४९७ 


नच्च 


हिताय जगतोऽद्यापि रोके वसति मायुषे । 
उपेन्द्रो जगतां नाथः सर्व॑भूतोत्तमोत्तमः ॥ ३९ ॥ 
"समस्त मूर्तौमि ओ उत्तम दैः उनसे भी उत्तम बे 
जगदीश्वर उपेन्द्र इस समय भी जगत्‌के हितकरे स्थि मनुष्यके 
रूपमे निवाख करते दै ॥ ३९ ॥ 
जी शृस्णाजिनी दण्डी दष्टपुवां मया हरि; । 
दैतेयेयु चरन्‌ देवस्तणेप्बग्निरिवोद्धतः ॥ ४०॥ 
ते तिनि प्रज्वलित हुई आग परल रदी होः उसी 
प्रकार ने पू्वकाल्य दत्य-समूहोके बीच श्रीदरिको जटाः 
काट मूगचर्म एवं पलश-दण्ड धारण किये वामन बद्यचारी- 
कै रूपमे विचरते देखा है ॥ ५० ॥ 
अद्राक्चमपि गोविन्दं दानवेका्णैवं जगत्‌ । 
कुवीणं दानवेरहीनं जगतो हितकाम्यया ॥ ४१ ॥ 
ध्जवर सारा संसार दानवरूपी एका्णवमे मग्न थाः उस 
समय भी जगत्‌के हितकर कामनाते इस विश्वको दानवहीन 
करते हुए शीगोविन्दका मने दर्यन किया है ॥ ४१ ॥ 
अवद्यं पारिजातं ते नयिष्यति जनार्दनः । 
द्वारकाममस्शरे्ठ नाश्चतं च ब्रवीम्यहम्‌ ॥ ४२ ॥ 
'अमरशरे्ठ ! मँ श्ट नही बोखता द जनादन श्रीकृष्ण 
तुम्हारे इस पारिजातको अवद्य द्वारकपुरीमे ठे जर्विगे | 
श्रादस्नेहाभिभूतस्त्वं न छृष्णे प्रहरिष्यसि । 
नापि रष्णस्त्वयि च्येषठे प्रहरिष्यति वासव ॥ ४३ ॥ 
ध्वासव ! तुम श्रातर-स्नेहसे अभिभूत होकर श्रीकृष्णपर 
प्रहार नरह करोगे ओर श्रीकृष्ण भी तुमपर वड़े भाईके नति 
प्रहार नदीं करेगे ॥ ५३ ॥ 
नैव चेच्छरोष्यति प्रोक्तं मया देव कथञ्चन । 
पृच्छ त्वं नयधमेक्षान्‌ ये हितास्तव मन्निणः ॥ ७४६ ॥ 
ष्देव | यदि मेरी की हई बात त॒म किसी तरह नही 
सुनोगे तो नीति-धर्मके जाननेवाठे जो तम्दारे हितैषी मन्न 
हौ, उनसे जाकर पृष्ठो" ॥ ५४॥ 


वैद्यम्पायन उवाच 
नारदेनैवमुक्तस्तु - मदेन्दरो जनमेजय । 
ष्दसुत्तरमीशोऽथ प्रत्युवाच जगद्गुरम्‌ ॥ ४५॥ 
वैशम्पायनजी कते है--जनमेजय, ! नार्दजीके 
सा कदनेपर देवेद्वर इन्द्रे उन जगद्गुरु समुनिको इस 
प्रकार उत्तर दिया--- ४५ ॥ 
पवंविधप्रभावं त्वं छृष्णं वदसि यद्‌ द्विज 1 
पवमेतत्‌ सुबहुशः श्रुतं खलु मया सुने ॥ ४६ ॥ 
भ्रद्यन्‌ | अप श्रीङृष्णकरो जो पेते प्रभावशाङी बता रहे 


हः वह ठीक हे] मुने ! उनक्रे एेसे प्रमावकी चर्चा मैने 
बहुत वार सुनी दै ॥ ४६ ॥ 
यतश्चेवंविधः क्ृष्णस्ततोऽहं तस्य वै तसम्‌। 
न प्रदास्यामि दातव्यं सतां धर्ममलुसरन ॥ ४७ ॥ 
धज श्रीकृष्ण रसे महान्‌ दै तव मेँ सस्पुरु्षके ध्मका 
सरण करते हुए निश्चय दही उन्दै देने योग्य होनेपर भी 
पारिजत दृक्ष नदीं दगा ॥ ५७ ॥ 
सह्ात्रभावो नाल्पा रुष्येदिति विचिन्तयन्‌ । 
व्यवस्थितोऽदं भद्रं ते मुने सवैगुणादिति ॥ ७८ ॥ 
धमुने ¡ आपका कच्याण हो] जो महान्‌ प्रभावशाली 
पुरुष दैः वे इस छोरी-सी व्क स्थि मुद्लपर रट नहीं देगिः 
ला सोचकर उन सर्वरुणसम्पन्न श्रीङ्प्णसे निरभ॑य होकर 
खित दहं ॥४८॥ 
महाप्रभावाः संततं भवन्ति हि सदिष्णवः। 
श्रोतारश्चैव सततं बुद्धानां क्षानचश्चुषाम्‌ ॥ ४९॥ 
'्महान्‌ प्रमावशाली महापुरुष सदा सहिष्णु होते है ओर 
शनटष्टि रखनेवाठे वडे-ूरदोकी वर्ते सुनते द ॥ ५९ ॥ 
महात्मा कारणे नाल्पे कृष्णो घर्म॑श्चतां वरः । 
श्ात्रा ज्येष्ठेन सर्वक्षो विरोधं गन्तुमर्दति ॥ ५०॥ 
'्धर्मात्माओमि श्रेष्ठ सर्वज्ञ महात्मा शीकृष्ण इस छोरे-से 
कारणपर अपने बडे मारके चाथ विरोध नदीं करणे ॥ ५० ॥ 
यथेवं मम मातुः स वरं प्रादादधोष्चजः। 
तथैव तस्याः पुत्राणां ज्येष्ठानां सोदुमर्हति ॥ ५१ ॥ 
“जैसे अधोक्षज भगवान्‌ विष्णुनेमेरी माताको इस प्रकार 
वदान दिया है, वैसे ही उन्द उसके ज्येष्ठ पुतरोके अपराधको 
भी सहन करना चाहिये ॥ ५१ ॥ 
यथेवेपिन्द्रतां यातः स्वयमिच्छञ्चनार्दनः। 
तथैव ातुरिनद्रस्य सम्मानं कर्ठीमरहैति ॥ ५२॥ 
“नेते खयं अपनी ही इच्छसे भगवान्‌ विष्णु उपेन्द्र 
भावक प्रा हुए ( मेरे छोटे माके रूपमे अवतीर्णं हुए ), 
उसी प्रकार उन्दे अपने वड़े भारं मश्च इन्द्रका सम्मान भी 
करना चादिये ॥ ५२ ॥ 
ज्यष्ठथमेतेन देवेन नारन्धं किं पुरातने । 
अथेदानीमपीच्छेत्‌ स व्यषठोऽस्तु मधुसूदनः ॥ ५२ ॥ 
“या पूरवकारम ( वामन-अवतारफे समय ) इन विग्णु- 
देवने मेरी ब्यषठता नदीं स्वीकार कर थी, उसी तरह इस समयं 
भी यदि मधुसूदन चाहं तो खयं दी ज्ये हो जाथ | ५३ ॥ 
खुनिश्चितं बङसपुमीक्ष्य नारदो 
हि विसजितस्िदश्यवरेण धर्मश्‌ । 
यथौ पुरीं यदुचृपभाभिरक्षितां 
करस्थरीं धृतिमतिमांस्तपोधनः ॥ ५४ ॥ 


४९,८ 


धृतिं ओर वुद्धिसे युक्त धर्मात्मा तपोधन नारद चठ 
विनाशन इन्द्रको अपने निश्चयपर अल देख उन देवेदवरसे 


श्रीमहाभारते सिखभागे 


[ हरिवंशे 


विदा ठे यदुपति भरीकृष्णसे सुरध्ित कुाखरी ( द्वारका ) 
पुरीको चे गये ॥ ५४॥ 


इति श्रीमहाभारते खिकभागे रिवो विष्णुपर्वणि पारिजातहरणे नारदस्य सर्गास्पुनरागमने एकसक्ततितमोऽध्यायः ।॥ ७१ ॥ 


दस प्रफार श्रीमहाभारते विरभाग/ हरिवंदके अन्तर्गत विग्णुपवमे पारिजातदरणकै प्रसंगे नारदनीका 
स्वर्मलोकसे पुनरागमनविषयक कदने अघ्याय पुरा हुमा ॥ ७\॥ 
~---"-<- + 


दविसप्रतितमोऽध्यायः 
श्रीकृष्णका नारदजीको अमरावतीपर आक्रमण करनेका निश्चय वताकर इन्द्रफे पास संदेश मेजना, 
हन्द्र ओर वृहस्यतिकी वादचीत, वृहस्पतिका कश्यपजीको यह समाचार बताना ओर 
करयपजीका युद्धकी शान्तिके सिये भगवान्‌ शंकरकी स्त॒ति करना 


वेश्रम्पायन उवाच 
अथैत्य द्वारकां रम्यां नारदो मुनिसत्तमः। 
ददश पुर्यश्रेव्दं नारायणमरिंदमम्‌ ॥ १ ॥ 
वैदास्पायनजी कषटते ह--जनमेजय ! तदनन्तर 
रमणीय द्वारका पुरीम जाकर मुनिवर नारदने रातरुर्ओका दमन 
करनेवाले पुरुषप्रवर नारायण ८ भगवान्‌ श्रीकृष्ण ) का 
द्र॑न किया ॥ १॥ 
स्ववेदमनि खखाक्षीनं सितं सत्यभामया । 
विराजमानं वपुपा सर्वतेजोऽतिगामिना ॥ २ ॥ 
वे अयने भवनम दत्यमामाके साथ खखमूर्वक व्रैठे ये 
ओर सम्पूर्ण तेर्जोका अतिक्रमण करनेवाले अपने दिव्य विग्रह- 
से विराजमान दोर्देये॥२॥ 
ततवाथं महात्मानं चिन्तयन्तं श्टवतम्‌। 
केवलं योजयन्तं च वाक्यमाभ्रेण भाविनीम्‌ ॥ ३ ॥ 
दृदृतापूर्वकं अपने व्रतका पालन करनेवाले महात्मा 
श्रीकृष्ण उसी ( पारिजात ) के विपरयमे सोच रदे ये ओर 
भामिनी सत्यमामाको केवर वाणीमात्रते घन्त्वना दे रहे थे ॥ 
धैव नारद्‌ं देवः प्रत्युत्थाय अधोक्षजः । 
पूजयामास च तथा बिधिरष्टेन कर्मणा ॥ ४॥ 
नारदजीको देखते ही भगवान्‌ अधोक्षज उठकर खदे 
हो गये तथा उन्दने शास्नो्त विधिसे उनका पलनं क्रिया ॥ 
सुखोपविष्टं धिश्वान्तं प्रहस्य मधुखदनः। 
वृत्तान्तं परिपप्रच्छ पारिजाततरं प्रति॥ ५॥ 
जव वे सुपूर्वेक आसनपर बैठ गये ओर विश्राम कर 
चुकेः तव मधुन श्रीकृण्णने रखकर उनसे पारिजात-वरक्षके 
विप्रय्मे समाचार पूछा ॥ ५॥ 
अथाचष् मुनिः सर्वं विस्तरेण तपोघनः। 
शन्ध्रायुनायेन्ववाष््यं निसिलं जनमेजय ॥ ६ ॥ 


जनमेजय | तत्र तपोधन मुनि नारदजीने खारा समाचार 
विस्तारपूर्वक बतलाया ओर इन्द्रे छोटे भाई शरीकृष्णके चि 
षन्द्रकी कदी हुई साय वर्ते कट सुनार्यी ॥ ६ ॥ 
श्रुत्वा एष्णस्तु तत्‌ सवं नारदं वाक्यमरवी्‌ । 
अमरखवर्तीं पुय यास्ये दवोऽदहं धर्मतां वर ॥ ७ ॥ 

वद॒ सव्र सुनकर श्रीङृष्णने नारदजीषे का-- 
ध्धर्मात्मार्मिं श्र मुनीदवर { यै कल अमरावतीपुरीकी 
यात्रा कङ्गा' ॥ ७ ॥ 
दतयुक्त्वा नारदेनैव सितः सागरं ययौ । 
संदिदेश ततस्तघ्न विविक्ते नारदं हरिः ॥ ८ ॥ 

णेसा कहकर श्रीहरि नारदजीके साथ ष्टी समद्र-तटपर 
गये ओर वरदौ पएकान्तमे उन्दने उन देवर्पिफो यद 
संदेश दिया--॥ ८ ॥ 

महेन्द्रभवनं गत्वा अद्य बृहि तपोधन । 
अभिवाद्य महात्मानं मदा्त्यसमसेच्तमम्‌ ॥ ९ ॥ 
न युद्धे प्रमुखे श्वक्र स्थातुमर्हसि मे प्रभो । 
पारिजातस्य नयने निशितं त्वमवेि माम्‌ ॥ १०॥ 

'तपोधन ! आप आज ही इन्द्र-भवनर्मे जाकर मेरी 
ओरसे अमरश्रष्ठ मदात्मा इन्द्रको प्रणाम करके उनसे मेरी 
यह्‌ चात वता दीनि किं इन्द्र! प्रमो | आप युद्धम मेरे 
सामने नदीं ठर सकेगे । आपको यह ज्ञात हो जाना चाये 
किं मै पारिजातको वहसे ठे अनेका ्द्‌ निश्चय कर चुका द" | 
पवमुक्तस्तु छष्णेन नारद्सिदिवं गतः । 
आचचक्षेऽथ रृष्णोक्तं देवेन्द्रस्यामितोजसः ॥ ११॥ 

श्रीकृष्णके रेखा कदनेपर नारदजी खर्गलोककौो चके 
शये ! वहा उन्न अमिततेजस्वी देवराज इन्द्रको श्रीकृष्णकी 
कटी हई सारी वात वता दी 1 ११ ॥ 
ततो वृहस्पतेः शक्रः शाद्वांस बरनाद्नः। 
शरुत्वा ब्ृ्टस्पतिदंषसुवाच कुरुनन्दन ॥ १२॥ 


विष्णुपर्व ] 


हिसंप्तसितमोऽध्यायः 


४९०९. 


कुरुनन्दन ! तव ब्र्युरका विनाश कोवि इन््रने 
बृदस्पतिते यह्‌ सत्र प्रसंग कट सुनाया.। उसे सुनकर बृहस्पतिने 
देबेन्दरसे कदा -\ १२ ॥ 
सहो धिग्‌ बह्मसष्नं मयि याते हातक्रतो । 
दुर्नीतमिद्मारन्यमत्न भेदो हि दारुणः ॥ १३ ॥ 
। भअहो, भिक्षार है ! रातक्रतो ! मै वहेति व्रह्मलोकको चखा 
गया था | इती वीच ठुमने यह दुनीति आरम्भ कर दी ; क्योकि 
तुम्दारे इस वर्तावके कारण यहो भयंकर भेद { कलह ) का 
अवर उपसित हो गया है ॥ १३ ॥ 
अनाख्यत्वा कथं नाय भवता श्ुवतेश्वर । 
मेतत्‌ इत्यमारण्धं देवे केनापि देना ॥ १४ ॥ 
ध्सुबनेन्धर ! देव ! क्या कारण था क्रि ठुमने मुदधसे 
बताये विना ही यद दुष्कृत्य आरम्भ कर दिया ॥ १४] 


अथवा भवितव्येन कर्म॑ञेन प्रयुज्यते । 

जगद्‌ धृषध्च न विधिः शक्त्यः समतिवरतितुम्‌ ॥ १५ ॥ 
'अथवा वृत्रासुर-विनारन इन्र ! यद सम्पूण जगत्‌ 

मावी कर्मफले प्रेरित होता रहता है । विधिके विधानका 

उद्छद्न करना असम्भव हे || १५ ॥ 

सदटसेव तु कायौणामारम्भो न प्रदास्यते 1 

तदेतत्‌ सहसाऽऽर "धं कायं दाश्यति लाघवम्‌ ॥ १६॥ 
(हसा किया हुआ कार्यौका आरम्भ अच्छा नहीं माना 

गया ३ ! तुमने जो खहसा यद कार्यं आरम्भ कर दियारै, 

यह अवद्य तुमह लधुता ( पराजय ) प्रदान करेगा? ॥ १६॥। 

वृहस्पति महात्मानं मदेग्दरस्त्वत्रवीद्‌ दयः 

पवं गतेऽद्य यत्‌ कायं तद्‌ भवान वक्तमहति ॥ १७॥ 
तव महेन्द्रने महात्मा वृहस्पतिते कदा--गुरुदेव ! रेसी 

परिस्थितिर्मे आज जो मेरा कर्तन्य होः उसे आप बतनिक्री 

कृपा करर" ॥ १७ ॥ 

तसुबाखाथ धमौत्मा गतानागततस्ववित्‌ 1 

अघोमुखश्चिन्तयित्वा बृ्टस्पतिरदार धीः ॥ १८॥ 
यह सुनकर भूत ओर भविष्यके तस्वको जाननेवाठे 

उदारबुद्धि धर्मात्मा वृहस्पतिने नीचे र्मह करके कु देर्तक 

सोच-विचारकर उनसे कहा--) ९८ ॥ 

यतस सह पुध्ेण योघयस्र जनार्दनम्‌ । 

तथा शक्र करिष्यामि यथा न्याय्यं मदिष्यति ॥ १९. ॥ 
देवेन्द्र ! अव तुम अपने पुत्र जयन्तके साथ युद्धमूमिमे 

उपसित हो श्रीकृप्णकरे साय युद्ध ओर उस्म विजय पानेका 

प्रयत्न करो । तव्रतक मेँ एसा प्रयत्न करसाः जिससे न्यायसंगत 

परिणाम प्रक होगा | १९ ॥ 

यृषटस्पतिस्त्वेवमुक्त्या क्षीरोदं सागरं गतः। 

आचष्ट सुनये सवं कद्यपएय हारने ॥ २० ॥ 


रेखा कहकर दस्यतिजी क्षीरसागरके तटपर गये । वरहो 
उन्हनि महात्मा कर्यप मूनिसे सवर बाते कंद सुनारीं ॥२०॥ 


तच्छुत्वा कड्यपः क्ृदधो अस्पतिमभाषत 
अवश्यं भाव्यमेतद्‌ भोः सवेथा नात्र संशयः ॥ २१ ॥ 
वह सुनकर कदयपजीमे कुपित दो वृदस्पतिजीते कदा-- 
(अजी, यह्‌ युद्ध अवश्य दोगा । सर्वया होकर रहेगा--दसरम 
संशाय नहीं है ॥ २९ ॥ 
हच्छतः सदशी भार्या महपदैवशार्मणः 1 
अपध्यानरूके दोषः पतत्येष शतक्रतोः ॥ २२ ॥ 
भमिं देवदार्माकी पलनी खचि सर्वथा उनन्दीकि समान 
द्ध आयार-विचारवाखी थी; परव इन्द्रे उये प्रास्त करनेकी 
इच्छा की । इससे सुनिने इन्द्रका अनिष्टचिन्तन किया । 
वदी थह दोष इस समय इनदरषर पद रहा ३५ ॥ २२॥ 
तस्य दोषस्य श्ाल्त्य्थमारन्यश्च सुने मया 1 
उद्वासः ख दोषश्च प्राक्त प्व सदारुणः ॥ २३ ॥ 
“मुने { उख दोषकी शान्तिके च्वि ष्ठी भने यह जल्वास- 
रूप तप आरम्भ किया था तथापि वह अव्यन्त दारुण दोष 
प्राप्त दो दी गया ॥ २३॥ 
तद्‌ गमिष्यामि मध्येऽश्य सषादित्या तपोधन । 
उभौ तौ वारयिष्यामि दैषं संवदते यदि ॥ २४॥ 
नतपोधन † अतः अब म अदितिके साथ इस युद्धके 
अवसरपर मध्यस्थं होकर जागा ओर यदि दैव अनुकूल रहा 
तो दोनोको युद्से रो्करगा ॥ २४ ॥ 
चृदस्पतिस्तु धमौत्मा मारीचमिदमन्वीत्‌ । 
प्रा्तकारं त्वया तश्र भवितव्यं तपोधन ॥ २५ ॥ - 
तव धर्मात्मा बृहस्यतिने मरीचिनन्दन कदयपसे इस 
प्रकार कहा--तपोधन ! अव्र युद्धका अवसरं प्राप हो गया ! 
अतः आपको वरहो अवद्य उपखित होना चादयः ॥ २५ ॥ 
तथेति कर्यपश्चोक्त्वा सम्पस्थाप्य बृहस्पतिम्‌ 1 
जगामाचयितुं देवं रद्र भूतगणेभ्वरम्‌ ॥ २६॥ 
करयपजीने श्रुत अच्छा" कहकर बृहस्पतिको वरहौसे भेज 
दिया ओर स्वयं वे भूतगोके स्वामी इखद्रदेवकी आराधना 
करनेके ल्ि च्छे गये } २६} । 
त्र स्वौम्यं मदात्मानमान्च॒ब्रषभष्वज्ञम्‌ । 
चसार्थी कपो धीमानदित्या सहितः पुः ॥ २७॥ 
वहां अदितिके साभ बुद्धिमान्‌ भगवान्‌ कद्यपने वर- 
प्राधतिकी इच्छा रखकर सौम्यरूपधारी परमात्मा इषमध्वज 
शिवकरी पूजा की ॥ २७ ॥ ` 


# यद प्रसङ्ग मदामारत भतुशासनपर्वके चालीक्तवे अध्याय 


देख सेना चादि ॥ 


८०० 


व्व च तमी्लानं मारीचः कद्यपस्तदा । 
वेदोक्तैः स्वरुतैश्वैच स्तवैः स्तुत्यं जगद्‌गुखम्‌ ॥ २८ ॥ 

उस समय मरीचिनन्दन कदयपने स्तुति करनैकरे योग्य 
जगदूगुर भगवान्‌ शकरा वेदोक्त मन्न तथा स्वरचित 
स्तोर्घोद्यारा सवन करिया ॥ २८ ॥ 

कश्यप उवाच 

विभ्वकमीणमीरां 
जगत्स्रष्ठरं धर्मशस्यं षरेदाम्‌ । 
खं सवं त्वां धृतिमद्धाम दिव्यं 

विदवेश्वरं भगवन्तं नमस्ये ॥ २९॥ 


कद्यपजी वोे- जो विष्णुरूपसे वामन-अवतारके 
समय महान्‌ पग बद्र तरिलोक्रीको नाप लेने समर्थं हए 
हैः यह सम्पूरणं विद्व भिनका कर्म हेः जो सवके ईदवर 
जगत्‌की खट करनेवाले है धर्मफे द्वारा जिनका साक्षात्कार 
दोता द, जो अमी मनोरथोके खामी तथा उनकी पूति 
करनेवाले दै, जो स्व॑ंखरूपः साचतिकरी धृतिवारे योमियोके जो 
ये चिन्मय धामखरूप दै, उन दिव्यस्रलूप आप भगवान्‌ 
विद्वेश्वरको म नमस्कार करता हूं ॥ २९ ॥ 


यो देवानामधिपः पापरती 
ततं विरवं येन जगन्मयत्वात्‌ । 
अपो गर्न यस्य दुभा धरित्यो 
वि्ेश्वरं तं शरणं प्पे ॥ २०॥ 


जो देवता्करि अधिपति ओर पापदा है जो जगत्‌- 
स्वरूप होनेके कारण समरणं विदवर्मे व्याप्त दै छम जल 
( जलात्मक वीयसे प्रकट होनेवाले शरीर ) जिनके गर्भं 
( अंशभूत चैतन्य ) को धारण करते ह उन भगवान्‌ 
विच्वेश्वरकी मेँ शरण रेता हू ॥ ३० ॥ 


हालाद्कान्‌ यो यतिरूपो निजघ्ने 
दत्तानिन्द्रेण पणुदो हितानाम्‌ । 
विरूपाक्षं ख॒दर्श॑नं पुण्ययोनि 
वि्चेश्वरं शरणं यामि मूध ॥ ३१॥ 
जिन्हँने यतिरूप होकर-जितेन्द्रिय बनकर इन्द्रके भेजे 
हुए इन्दरियरूपी मेदिर्योको, जो रामन्दम आदि दितेषी मर्वे 
करो द्वा देनेवलि दैः नष्ट कर दिया, जिनके नेत्र विरूपै 
जो देखनेमे बदे सुन्दर तथा पुण्यकी योनि दै, उन भगवान्‌ 
विव्वेदवरकी मँ रण लेता हू ओर उन्दे मस्तक छकाकर 
प्रणाम करता हूं ॥ २१ ॥ 
भुङ्क्ते य पको विभु्जगतो विभ्वमग्रं 
~ धानां धाम सुकृतित्वान् धष्यः। 
पुष्यात्‌ स मां महसा शाश्वतेन 
सोमपानां मरीचिपानां वरिष्ठः ॥ २२॥ 


उसक्रमं 


श्रीमहाभारते सिङभागे 


, [ हरिषे 


जो एकमात्र इस जगत्के स्वामी है तथा शेष विदवका 
पालन करते ( अथवा इसे अपने उपमोगमे त्मते ) £, जो 
धाम (नेत्र एवं सूरं आदि ) के भी धाम ( आश्य अथवा 
रकाद ) ६ तथा सुकृति ८ पुण्यरूपम अथवा सुकृत॑नामधारी 
ब्रह्मरूप ) होनेके कारण सवके स्यि अनेय .हं, सोमपान 
करनेवाठे कर्मो ओर चन्द्ररविमर्योका पान करनेवाले महा- 
मुनिर जिनका ससे ऊँचा ओर गौरवपूर्णं स्यान दै, वे 
भगवान्‌ विच्वेश्वर अपने सनातन तेजते मेरा पोषण करे ॥ 
अथवौणं खदिरसं भूतयोनिं 
तिनं वीरं दानवानां च वाधम्‌ । 
यक्षे हुति यक्षियं संस्छतं घे 
विच्वेष्वरं शरणं यामि देवम्‌ ॥ ३२॥ 


जिनका अथर्ववेद्के दवाय प्रतिपादन क्रिया गया ‡, 
जिनके पञ्चकोदारूप पोच सुन्दर मस्तक ई जो सम्पूण 
भूर्तोकी योनि अर्थात्‌ खमस्त जगत्‌ कारण ई जो विद्वान्‌ 
वीर तथा दानवेक्रि वाधक ईः यजन जिनके स्थि आहुति 
दी जाती दै यरम्बन्धी संस्कारयुक्त  इविप्य जिनका खस्प 
दे, उन विद्वेश्वरदेवकी मँ शरण लेता ह ॥ ३३ ॥ 
जगज्जाटं विततं यत्न विद्व 
विश्वात्मानं प्रीतिदेवं गतानाम्‌! 

य॒ उर्ध्वगं रथमास्थाय याति 

विदवेश्वरः स सुमना मेऽस्तु नित्यम्‌ ॥ ३४॥ 


जिनके ऊपर यह सारा जगत्‌रूपी इन्द्रनाट पल्य हुआ 
दे ज सम्पूर्णं विश्वके आत्मा दैः शारणागर्तोके दिये प्रीति 
एवं सुखको प्रकारित करनेवे दँ तथा जो ऊ्वंगामी 
( आकाशचारी ) रथपर आरूढ हो यात्रा कसे ईवे 
भगवान्‌ विद्वेश्वर मुक्पर सदा प्रघन्नचित्त रद ॥ ३४॥ 


अन्तश्चरं रोचनं चारक्लाखं 
मदावलं धर्म॑तेतारमीञ्यम्‌ । 
सहसखनेत्रं  रातवत्मौनसुप्रं 
महादेवं विण्वसखजं नमस्ये ॥ ३५॥ 
जो अन्तर्यामी अआत्मारूयसे सवके भीतर विचरते दै, 
प्रकाशमान ( चिन्मय ) है, वेदमयी मनोदर शाखा जिनसे 
प्रकट हुई दै ओ महान्‌ वर्छालीः धर्मक प्रवर्तक तथा 
सवन करने योग्य ई] जिनके सद नेत्र द ओर जिन्दै 
पानके च्यि सैको मार्गं ई (अथवा जो शतपथविदित 
कर्मपले दाता द) उन उग्रस्वरूम विश्वलष्टा महादेवजीको 
मँ नमस्कार करता हू | ३५ ॥ 


१. (तस्मात्तत्‌ सु़ृतमुच्यते ।' शम शरुतिके अतुषार भ्रह्मका 
नाम प्यक दै । 


विष्णुपर्व ] 


शुचि योयं शंखनं श्वान्तपापं 
शावं शम्यं शंकरं भूतनाथम्‌ । 
धुरंधरं गोपति चन्द्रचिषं 
हषीकाणामयनं यामि मूषो ॥ ३६॥ 
जो शुचि ( पवित्र एवं असङ्घ )› योगसे प्रात हेनेवके 
विभिन्न योगेकरि प्रतिपादकः पापन्नूल्य, संदारकः . सुखके 
उलत्तिख्यानः कल्याणकारी ओर सम्पूणं भूक अधिपति 
जो अकेले ही सम्पूणं विश्वका भार वहन कते दै, दन्दियेकि 
नियन्ता है तथा चन्द्रमाको चिहके रूपम अपने मसतकपर 
धारण करते है, चनेन्दरियोके आश्चरयरूप उन भगवान्‌ 
शिवको मे स्तक छकाकर प्रणाम करता ओर उनकी 
शरणमे जाता हू ॥ २६ ॥ 
आशुःकषिदानं चृषभं रोरूवाणं 
छृतं धम वितथं चाद्युद्तेषम्‌ 1 
वदुंधरं सभ्रजीकं समं त्वां 
धरतव्रतं श्यूधरं प्रपद्ये ॥ २७॥ 
; जो सीध फठ देनेवाला; राग अदि. दोर्षोको शान्त 
करनेवाला; अभीष्ट मनोरर्थोका वर्षक ( पूरक ); प्रातः सवन 
आदिके क्रमसे शब्दायमान ओर अनु्ठानमे लया हया जो 
य्चादिरूपं धर्मं है, वह यदि सखकामभावसे किया जाय तो 
नेश्वर फर देनेके कारण व्यर्थं हो जाता है ओर फलठ्भोगके 
द्वारा उसकी शीध दी समाति दो जाती है; किंतु वही धर्म 
य॒दि निष्काम भावत किया जाय तो वह्‌ आप्मिष्द्धि-सम्पादनके 
साथ ही पुण्यर्यी धनको सुखिर रखनेवाला होता है--यह 
दोनों प्रकारका धर्म आपका दी खर्म है! आपसी 
अवस्था्भमि सम द । उत्तम त्रतको धारण करनेवाले आप 
त्रिचयूलधारी सद्रदेवकी मँ शरण केता हू ॥ ३७ ॥ 
अनन्तवीर्यं ध॒तक्मीणमायं , 
यक्षादेषं यजतां चाभियानज्यम्‌ । 
हविर्मुजं अुबनानां सदैव 
ज्येष्ठं द्विजं धर्मभूतां भ्रपयें ॥ ३८॥ 
आपके ब्रल-पराक्रमका कीं अन्त नही है, प्रदी 
समस्त कर्मोको धारण करनेवाठे आधार है अर्थात्‌ आप दही 
समस्त कमो ओर उनक्रे फटे साक्षी है । अन्य देवताओकी 
मोति आप यरकरे अङ्ग नहीं दै) आप ही सतकरे आदि 
कारण दै । यजमान अपने यज्ञोद्वारा जिन यशपुरपकी 
आराधना करते ह, उनके वे आराध्यदेव आप दी ह | आप 
दी सदा समस्त जगत्‌करे दविप्यभोक्ता अग्रिरूप ई ओर 
अप दही धर्मातमार्थमिं व्ये द्विज ( ब्राह्मण ) हैः मै आपकी 
दरण लेता ॥ ३८ ॥ 
परं गुणेभ्यः पृश्चिगर्भ॑खरूपं 
यशः शग भ्युहनं कान्तरूपम्‌ । 


दिसप्ततितमो ऽध्यायः 


५०१ 
[भयाय भ अका 


~ ---------------------------------------- = ~ 


शुद्धात्मानं पुरूपं .सत्यधाम | 

„ सम्मोहनं दुष्ृतिनां नमस्ये ॥ २९॥ 

आप गुणेसि परे तथा विष्णुखरूप हँ । आप यश्चके समान 
व्यापक ह | सरे प्रपञ्चको व्याप्त करके भी सीगके समान 
उखसे ऊपर उठे हुए ह । आप ही समस प्राणियेकि"अङ्ग- 
प्रत्य्धको सुगठित करनेबले ह । आपका रूप अत्यन्त 
कमनीय ८ मनोहर ) है । आप वियद आत्मखरूप अन्तर्यामी 
तथा स्वधाम ८ अग्ाधित चैतन्यखरूप अथवा वकेकुण्ठादि 
निव्यधामसलरूप ) दै । ` आप दुराचारियोको मोह ८ महान्‌ 
दुः्ल ) मे डाल्नेवारेै । मै आपको नमस्कार करता दह ।३९। 


युकतोङ्ारं खिरसं चारुकर्म 
हढनतं  डढधन्वानमाजम्‌ । 

शुरं वेत्तारं धलुषोऽखरातिरेकं 
पति पदूलां शमलं नमस्ये ॥ ४०१ 
अप योगियौके व्यि प्रणवरूप द । अपने खरूपभूत 
ओंकारे सिर अर्थात्‌ उसकी अर्धमाचा आप दीरईै। 
आपका करम दिंसादयल्य दोनिके कारण - बड़ा ही मनोहर है ! 
आप ददतापू्वक ब्रतक्रा पाखन केवले है । आपका, धनुष 
अव्यन्त चुद्‌ है । आप वार्णोको दूरतकर फैकनेवाे, शूरवीर, 
धनुरवेदके शाता ओर अस्र-विरानमे सवसे वदे-चदे दै । 
समस पशं ( जीवों ) के पतिं ८ पालक ) तथा जगतूका 
संहार करनेवाले आप भगवान्‌ करको मै नमस्कार 

कर्ता हूं || ४० ॥ 
पको रातिद्चेव भूतं भविष्यं 
सर्वातिथयो हि जुषत्यरिघ्नः। 

अररितुद ऽचुत्तमः संविभागी 
विभाजको मां भगवान्‌ पातु देवः+ ४१॥ 
जो सवके एकमात्र मित्र ई, भूत ओर भविष्य जिनका 
ही खरूप हैः जो सवके अतिथि ( अग्नि ) रूपसे हविष्यकरा 
सेवन करते हैः काम आदि शत्रुभका नाश करनेवलि है तथा 
दातरुभाव रखनेवाले राक्षसौको पीड़ा देते ई, जिने उत्तम 
दूस कोई नहीं हेः जो यकम भाग पाते ओर खयं भी 
मार्गोका विभाजन करते दैः वे भगवान्‌ महदेव मेरी 

रक्वा करे ॥ ४१ ॥ 


य एको याति जगतां विश्वमीदो 
य पको.ऽदान्मतां प्राणमग्यम्‌ । 

येनानरशंस्याच्छाश्वतं साम जुं 
समां जुष्यात्‌ सुरुतिध्रेयसेऽय ॥ ४२॥ 
जो जगदीश्वर एक दोकर भी सम्पूर्णं विश्वमे प्रविष्ट दै 
तथा जिन अद्वितीयं परमास्माने प्राण्य मस्द्रणोको मी 
उत्तम प्राण प्रदान कियाहै अर्थात्‌ जे प्राणके मी प्राणै, 
निन्दने दया होनेके कारण सवके साथ सनातन मैत्री जोड़ 


1 


५०२ 


रक्खी ह, वे भगवान्‌ शिव आज उत्तम कार्यं ओर कल्याणक 
ल्म मुद्चपर कृप टट करे ॥ ४२॥ । 


मर्माखजद्‌ यो भुवनोत्तमोत्तमं 
ठस विद्यान्‌ बाह्मणः पदगुणस्य । 
खषा रसं व्याहतिस्थं समप्र 
समां पायादिह बहुरूपो ऽरिहदःः॥ ४३ ॥ 
जिन्हेनि व्रह्मा दक्र समस्त भुवर्मोमि उत्तमोत्तम दिन्यलोक- 
की रचना की है, जो विद्धान्‌ ब्रह्मवेत्ता होनिकरे कारण छः गुरो 
( फेय, शानः यशः श्रीः वैराग्य जौर धमं ) से परर्णं ई 
ग्याहतिरयोमे सित रघ तथा उसकी तीन मात्रा्भपि उपरचित 
समसत प्रपञ्चकी सषि कफे जो इसके भीतर व्याः वे 
अनेक रूपधारी, कामादि शन्ुके नाशकः अपने अद्धोदयारय 
मेरी रक्षा करें ॥ ४३ ॥ 
व्यञ्जनोऽजनोऽथ विद्धान्‌ समध्रः 
स्पृरशिः हइाम्भुः प्राणदः चिवासाः। 
रसो धुवः पवमानस्य भतौ 
सपल्लीशः श्ाह्करः सारधाता ! ४४५॥ 
जो अतीन्द्रिय विषर्योका भी शान करानेवले, अजन्मा, 
विद्यान्‌ तथा सर्वछम्प दैः व्यापक होनेके कारण जो सव्रका 
स्पशं करनैवाठे, कस्याणक्रारी तथा प्राणदाता ई» जो अपने 
शरीरपर वख्के सानम गजचर्म धारण करते ई ध्रुव रख-- 
अश्चय परमानन्द भिनक्रा खस्प ह, जो वायुके भी मरण- 
पोष्रण करनेवल ई पकी ओर पति ८ यजमान ओौर उसकी 
पत्ती ) के साय रहकर अर्यात्‌ आत्मारूपसे उन प्रेरक होकर 
यज्ञादि कर्मोका सम्पादन करते ६ तथा सार तत््वको धारण 
करनेवले ६ वे भगवान्‌ शंकर मेरी रक्षा कर ॥ ५४॥ 
त्यम्बकं पुषिदं विद्रवाणं 
धम षिप्राणां वरदं यज्वनां च । 
घराद्‌ वरं रणजेतारमीशं 
देवं देवानां शरणं यामि रुद्रम्‌ ॥ ४५ ॥ 
जो त्रिनेत्रधारी तथा स्वको पुष्टि प्रदान करनेवाले ई 
बिप्रौ--विद्वानेकि भी धर्मका उपदेदा करते ई ओर यज्ञ 
करनैकलठे यजमार्नको अभीष्ट वर देते है, जो शेषठसे मी श्रे; 
संग्रामविजग्रीः ई्वर तथा देवताति भी देवता ई, उन 
भगवान्‌ खद्रकी म श्रणक्तारहू॥ ४५॥ 
आस्यं देवानामन्तकं दुष्छतीनां 
निचल्स्तोमं चृ्तदं फर्मसाश्त्यम्‌ 
भूतायनं भूतपति शुणक्षं 
शुणाकारं शरणं यामि रुद्रम्‌ ॥ ४६॥ 
जो अग्निरूपसे देवतार्जक़ि मुखः, दुराचार््योक्रा अन्त 


श्रीमहाभारते सिरुभणो 


[ श्सिवशे 
स्थान, भूतनाथः गुण भौर गुणसखरूप ¢ उन सद्रदेवकी 
म शरण लेता टर ॥ ४६॥ 
अञुद्धतं यक्षकसौस्मन्तं 
मध्यं चाद्यं यक्ष्ठां साम्यरूपम्‌। 
वेद्यतेयु वबहुघा गीतम्रीदा 
मभिधिविषएपंद्यार्णं यामि रुद्रम्‌॥ ४७॥ 
भिन्द कोर पवल्छे भी प्रवर शत्रु उखाद़ नहीं खफता, 
जो यका सम्पादन करनेवाठे तथा यजमार्नेकि आदिः मध्य 
यौर अन्त ई प्रकृतिकी साम्यावस्था जिनका खस्य दैः 
वेदोक्त वरतो ( यो) मै अनैकानिकं देवता्थेकि स्परमे 
भिनफा गान क्वा गया तथा जो भूतले छेकर स्वर्गतक 
तीनो ठोककि दवर £ उन मगवान्‌ द्द्रकी गे दारण 
लेता हूं ॥ ४७ ॥ 
मदाजिनं बतिनं मेखलां 
सुतोपणं परोधघवं धिपापम्‌ । 
भूतं क्षकं गुणिनं चा कपर्दिनं 
नतो ऽसीह्यं वन्दनं वन्द्नानाम्‌ ॥ ४८ ॥ 
जो महान्‌ गजचर्म धारण करनेवाले, उत्तम व्रतधारी, 
मेखटसे अटंकृत, अनायास ष्टौ संतुष्ट होनेगठेः कफ्रोधके 
स्वामी पाप-तापहते रदित; नित्य विद क्षेत्रज, गुणवान्‌ जया 
जृटधारी तथा वन्द्नीयकरि भी वन्टनीय द, उन मगवान्‌ 
शंकरको म नमस्कार कर्ता ह ॥ ४८ ॥ 
दैवं देवानां पावनं पादनानां 
छृति छृतीर्नां महतो महान्तम्‌ । 
शतात्मानं संस्सुतं गोपतीनां 
पति देवं हरणं यामि सद्रम्‌ ॥ ४९॥ 
जो देवता भी देवता, पावर्नोके मी पावनः कृतिर्यो- 
की भी कृति, यशेकरि मी यर्-अर्थात्‌ यजनीयेकरिमी 
यजनीय ई जो महानसे भी महान्‌ शान्त्वरूप तया 
इन्दियेकरि अभिवर देवताभकरि व्यि मी स्तवनीय ट, उन 
सवके पाटक स्द्रदेवकी म चरण उता दहर ४९ ॥ 
अन्तश्चर पुरूपं शुद्यसक्षं 
प्रभाखन्तं प्रण: विप्रदरीपम्‌। 
परं परमस्याश्षरस्य 
शयुभं देवं गुणिनं संनतोऽसि ॥ ५० ॥ 
जो सवके अन्तःकरणर्मे विचरनेवलि अन्तर्यामी पुश्षः 
निन्दे गुह्य कदा गया हैः जो दूसरे प्रकाशते रदित स्वयं 
प्रकाशरूप ह; प्रणव ( ॐकार ) जिनका नाम दहै, जो परम 


हेतुं 


करनेवलेः चिद्रूत आदि सौरि युक्त सोमयागम्वरूपः, -- अक्षर ( जीव ) के भी परम कारणर्दः उन मद्गल्कारी 
संसारक उच्छेद केवलिः कमेकि साक्षी, भूरतेकि ख्य - गुणवान्‌ देवता भगवान्‌ हिवको मँ प्रणाम कर्ता हूं ॥५०॥ 


विष्ुपवं ] 


प्रसूतिखभयोनं प्रसूतश्च सुक्ष्म 
पृथग्भूतेभ्यो न पृथक्वैकभूतः। 
खयं भूतः पातु भां सर्व॑सादः 
भरव्‌ः स्वाद्‌ः सम्मदः पातु रतम्‌ ॥ ५९ ॥ 
ज जगत्‌ ओर जीव दोननौकी योनि ई, फिर भी समसत 
कारणोसे अतीत दोनेके कारण जो उनकी योनि नहीं 
अतएव सुक्ष्म ( कठिनतासे समक्षम अनिवाठे ) ई; सम्ूं 
भूतेवि प्रथक्‌ ई ओर उन सरसे एकभूत अभिन्न दोनेक कारण 
पृथक्‌ नर्ही मी दैः जो स्वयं टौ समस्त जगतुके रूपमे प्रकट 
हुए ई ओर सत्रके ख्यस्धान मी द तथा जो उत्तम दाता; 
स्वाद ८ सचि ) हषं तथा रमणीय ररूप है, वे भगवान्‌ 
शंकर मेरी रश्म करे ॥ ५९ ॥ 


आसन्नः संनतरः साधनानां 
भद्धावतां आद्धव्ृत्तिप्रणेता । 
पति्गंणानां महतां सत्कृतीनां 
पायान्मेषः पूरणः षड्गुणानाम्‌ 1 ५२॥ 
जो अन्तर्यामी दोनेके कारण स्वकरे निकट ई तथा 
साधनशीठ पुस्पेकि लि सन्नतर--अनाडइत अर्थात्‌ अपरोक्ष 
हैः श्रद्धा मनुयेक्रो उनकी श्रद्धाके अनुरूप इत्ति ( ्ञान 
एवं भक्ति ) प्रदान करनेवले है तथा जो महान्‌ पुण्यात्मा 
प्रमथगरणेक्रि अधिपति ओर अमी मनोरथो एवं सर्वता 
आदि छः गुर्णोकी पूर्तिं करनेवले द, वे भगवान्‌ शिव मेरी 
र्वा करे ॥ ५२ ॥ 


अन्तर्बहिष्रुजिनानां निहन्ता 
स्वयं कत भूतभावी विङुर्व॑न्‌ । 
धृतायुधः सुङृतिनायुत्तमोजाः 
प्रणुदयान्मे घृभिनं देवदेवः ॥ ५३॥ 
जो बराहरभीतरङ़े पाप-तार्पौका नाश करनेवाङे तथा 
स्वयं दी जगते कर्ता ( निमित्त कारण ) दै, पञ्च भूक 
आकास्मे अपने-भपको प्रकट करना जिनक्रा स्वमाव दै 
अर्थात्‌ जो स्वयं ष्टी जगत्का उपाद।न कारण बनते ई ओर 
आयुध धारण करके क्रोधादि विकारौको प्रकट करते ई 
. जिनका ओज ( बल-परक्रम ) सत्रसे उत्तम दै तथा जो 
देवताओं मी देवता ई, वे परमेशवर शिव पुण्यात्मा पुरर्षोका 
तथा मेरा भी पाप-ताप दुर करं ॥ ५२ ॥ 
येनोद्धताखः पुरा मायिनो वै 
दग्धा घोरेण वितथान्ताः शरेण । 
भहत्छुर्व॑न्तो वृजिनं देवतानां 
ज्यायानीदाः पातु विन्वोदधाता॥ ५४ ॥ 


जो देवतार्ओका मान्‌ अपराध करिया करते येः 
उन मायावी असुर्योको जिन्दनि पूर्वकाल अपने अलनद्रारा 


द्विसप्ततितमो ऽभ्यायः 


५०द 


कोर्यीकी मति उखाद़ फेंका था, अपने भयानक वाणदे 
उनके तीनों रोको जलकर उद मी भस्म कर दिया ओर 
दस प्रकार शख्नोद्ारा न मारे जनके कारण उन अबुरयोकी 
मृत्यु व्यर्थ ठो गयी यी--यह सत्र जिनके प्रभावसे सम्मव 
हुआ तथा जो स्के कारणभूत प्रकृति या प्रधानके मी 
आश्रय दैः वे खवसे ज्येष्ठ परमेद्वर शिव भेरी रक्षा 
करं ॥ ५४ ॥ 
भागीयत्तां भागमतो ऽन्तमिर्छन्‌ 
मसो दाक्षो येन रत्तो ऽन्वघाषत्‌। 
विद्धान्‌ यक्षस्यादिर्थान्तः स देवः 
पायादीरो मां दश्यकषान्तदेतुः ॥ ५५ ॥ 
दक्षके यकम अधिक भाग र्ण करनेवाले देवता्ओके 
भागको जिने नष्ट करमेकी इच्छा की थीः जिनके द्वारा 
विच्छिन्न हुआ दष्षका यज्ञ वहीं यज्ञेश्वरकी शरणमे गया 
या, जो यके ज्ञाताः आदि ओर अन्त ई तथा दक्षयज्ञके 
विनारम देतु बने हुए ई, वे सवैश्वर मशदेवजी मेरी रष्वा 
करं ॥ ५५ ॥ 
अन्यो धन्यः संस्छतश्योत्तमश्च 
जगद्‌ खषा योऽचि स्वोतिगुहणः। 
स मां सुखप्रसुखे पातु नित्यं 
विचिन्वानःप्रथमः षड्गुणानाम्‌॥ ५६॥ 
जो ब्रह्मरूपे जगत्‌की सृष्टि करके रद्ररूपसे उसका 
संहार करते दै, जो सत्रेकी अपेक्षा ` अत्यन्त गोपनीय ई, जड 
जगते भिन्न ( विलक्षण ) ई, शम आदि संस्कारयोसे सम्पन्न 
होनेके कारण धन्यै सभरसे उत्तम £, जो इन्द्र ओर 
अग्निकी प्रधानतावाढे यज्ञम सदा यजमार्नोकी पुण्यरािका 
संचय करते द ओर एश्वर्य आदि छः गुणक मुख्य आश्रय 
हैः वे परमेदवर मेरी तथा मेरी संततिकी प्रतिदिन रक्षा कर ॥ 


शुण्रैकाल्यं यस्य देवस्य नित्यं 
सर्योद्रेको यस्य भावात्‌ प्रसूतः । 
गोषा गोप्तृणां सन्नो दुष्रतीना- 
मायो विश्वस्य बाधमानस्य करद्धः॥ ५७॥ 
जिन परमात्माके गुण भूतः, भविष्य भौर वर्तमान तीर्न 
कार्टमि सदा बने रहते ह अथवा जिनमे स्ट, पालन ओौर 
संहार कारखम्बन्धी गुण प्रवाहरूपसे नित्य वने रहते & 
जिनमे सस्वगुणकी अधिकता है अर्थात्‌ जो विण्णुरूपसे खित 
है जिनके स्वरूपसे प्रकट हुए श्रीकृष्ण, इन्त आदि रक्षकोकि 
मी रष्तकर्हैः जो काट सद्र बनकर दुराचारिर्योको विनाशका 
कष्ट प्रदान करनेवाले है ओर विश्वके आदिकारण ८ वं 
माता-पिताके समान पार्क ) होकर भी जो इत जगत्‌को पीड़ा 
देनेवाठे खोगोपर कुपित हो उनका विनाश कर डात्ते ह, 
वे परमास्मा मेरी रध्वा फर ॥ ५७ ॥ 


५०९४ 


धानो यस्य हरिरप्रोऽथ विश्यो 
घ्रह्मा पुषैः सदितश्च द्विजाश्च । 
पराभूता भवने यस्य सोमो 
जुषत्वेव भेयसे साधुगोत्ता ॥ ५८॥ 
मगवान्‌ विष्णु जिनके तेजःपुज्खके प्रमुख भाग है तथा 
विश्व ( विराट्‌ ) रूप ब्रह्मा, साथ ही उनके पुत्र सनकादि 
ओर मरीचि आदि अन्य व्रह्मपिं जिनसे प्रकट हए द तथापिं 
वे जिनक्रे भवनम परामूत होकर प्रत्र नदीं करने पति ई वे 
सप्पुषषेकि रक्षक उमास्टित महादेवजी हमारा कल्याण 
करनेके व्यि हमपर प्रसन्न हो ॥ ५८ ॥ 


यस्माद्‌ भूतानां भूतिरन्तोऽथ मध्यं 
धृतिभूतिर्यश्च गुदाशति्ध । 
गुदाभिभूतस्य पुर्षे्वरस्य 
महात्मनः सम्श्रडवेद्यस्य तस्य  ५९॥ 
जिनेते आकाश आदि पचि भूर्तोकी उप्पत्ति, सिति 
ओर अन्त होते ई ८ वे मगवान्‌ शिव हमपर प्रसन्न हाँ ) । 
जो क्रंसीके द्वारा हार्दिक तिरस्कारसे पीडित हो एकमान 
सुखदायक मगवान्‌ रिवको दी महान्‌ आश्रय जानकर उनकी 
शरण ठेता है, वह्‌ पुरषं श्रेष्ठ एवं महात्मा है, उसे उन्दी 
मगवान्‌ शङ्करे धृति ( वैय ) जर भूति ८ रेश्वयं ) आदि 
अनुग्रहकी उपबन्ध होती है तथा उसे उन्दीसे गुह्य वस्तुका 
भवण ( उपदेश › प्रात होता दै । ( अतः संकटके समयमे 
अपनी शरणमे अयि हट मन्न ठेवक्रका क्ट वे अवदय दूर 
करगे-एेखा मेरा विश्वास दै ) ॥ ५९ ॥ 
यदिङ्गाङ्गं ऽयम्बकः सर्वमीदे 
भगलिद्गङ्ंयद्ध.थुमा सर्वधारी । 
नान्यत्‌ ठतीयं जगतीष्ास्ति किचि- 
न्मदारेवात्‌ सर्वसर्वेश्वरोऽसौ ॥ ६० ॥ 
संसारम लिङ्क ( पुरुषत्वपूचक चिह्न ) से अङ्कित जो 
मी दरीर-समुदाय हैः वह सव्र तरिनेव्भारी भगवान्‌ शङ्करका 
खसूप ह जौर भग ( खीत्वदचक ) चिहते चिह्ित जो शरीर 
समूह दै, वद खव स्वजननी मगवती उमाका प्रतीक दै । इष 
जगतरमै इन दोके चिवा तीखरी कोई वस्व॒ नदीं है । महादेवजी 
( जरं उमा ) ञे भिन्न ऊ नही हैः वे ही सर्वेश्वर ई। 
(वे हमारी रक्षा करं } ॥ ६० ॥ 


श्रीमष्टाभारवे खिलभागे 


[ हरिवो 


इति संस्तूयमानस्तु भगवान्‌ शृयभध्वजः। 
दर्शयामास धमौत्मा कदयपं धर्मधरग्बरम्‌ ॥ ६१॥ 
इस प्रकार जिनकी स्वति की जा रदी थीः उन धर्मात्मा 
भगवान्‌ वृषध्वज ( हिव ) ने धर्मात्मार्यमिं श्रेढठ मदि 
कर्यपको दर्शन दिया ॥ ६१ ॥ 
उवाच चैनं देवेशः प्रसतेनान्तरात्मना । 
येन संस्तोपि कार्येण त्वं तज्जाने प्रजापते ॥ ६२ ॥ 
दर्ान देकर देवेश्वर महादेवीने उनसे प्रसन्न-चित्तसे 
कदा--“प्रजापते | तम जिस कार्यस मेरौ स्तुति करर होः 
उख म जानता हूँ ॥ ६२ ॥ 
इन्द्रोपेन्द्ौ महात्मानौ देवौ श्ररृतिमेष्यतः। 
पारिजातं तु धर्मात्मा नयिष्यति जनार्दनः ॥ ६३ ॥ 
“इन्र ओर उपेन्र दोनों महामनखवी देवता खामाविक 
सतिम आ जर्यैगे; परंतु धर्मात्मा जनार्दन पारिजात वृष्चको 
अवद्य ठे जायेगे | ६३ ॥ 
अपध्यातो महेन्द्रो हि सुनिना देवकमेणा । 
अस्थाकाङ्क्षत्‌ पुरा भायां तपोदीक्षस्य कद्यप॥ ६४॥ 
८कदयप ! पूर्व॑कार््म मुनिवर देवरमनि मदेनद्रका अनिष्ट- 
चिन्तन किया था; क्योकि तपस्यसि उददीप्त वेजवाठे उन 
महर्भिकी पलनीको इन्द्रमे प्रात करनेकी अमिलपरा की थी । 
यही उनकी वर्तमान पराजयका कारण दै ॥ ६४ ॥ 
गम्यतां तत्न धर्म॑क्च दाक्षायण्या स्ट त्वया। 
अदित्या शक्रसखदनं श्रेयस्ते पुत्रयोधुंवम्‌ ॥ ६५ ॥ 
ध्धर्मश् | तुम दक्षकन्या अदिततिके साथ वरो इन्द्रमवरनम 
जाओ । तुम्हारे दोनों पुर्बोका अवश्य कल्याण दोगाः ॥६५॥ 
दति हरवचनं निशम्य विद्धान्‌ 
कमरभवात्मजसूनुरपरमेयः ` । 
धिद्वशगणगुरं प्रणम्य रुद्र 
मुदितमनाः सखुमनोकसं जगाम ॥ ६६॥ 
दस प्रकार भगवान्‌ शङ्करा कथन सुनकर बरदयकुमार 
मरीचिकरे पुत्र अप्रतिम शक्तिशाखी विद्धान्‌ महर्षिं क्यप उन 
देवगुर भगवान्‌ ख्द्रकौ प्रणाम करके प्रवन्न्‌-चित्त हो देव~ 
छोकको चठे गये | ६६ ॥ 


इति श्रीमहाभारते विरुभागे हिवि विष्णुपर्वणि पारिजातहरणे कर्यपङृतरुदरस्तोत्र दविसप्ततितमोऽध्यायः ॥५२॥ 


हस प्रकार श्रीमहभास्तके छिरभाग इखि भन्तर्मत विग्णुपतरैमे पारिजातदहरणके प्रसद्वमे फर्यप्त 
सद्रसतोत्रवरिषयफ वहत्य; अध्याय पुरा हुमा ॥ ७२] 


"यिनि जि 


विष्णुपवं ] 


भिसप्ततितमो.ऽध्यायः 


५०५ 


वव ववववव्वव्व---~- 


त्रिसप्ततितमोऽ्यायः 


इन्द्र ओर श्रीकृष्ण, जयन्त ओर प्रद्युम्न; त्वर्‌ ओर सात्यकि तथा एेरावत ओर गरुड्का युद्ध 


वैद्यस्पायन उवाच 

अथ विष्णुर्महातेजा सुहर्ताभ्युदिते स्वौ । 
सूगयाव्यपदरेरोन ययो रेवतकं गिरिम्‌ ॥ १॥ 

वैराम्पायनजी कते ईै--जनमेजय ! तदनन्तर 
सूर्योदयके वाद दो घडी वीत जनेपर मदातेजखी श्रीङष्ण 
हिंसक जन्दुर्थोका शिकार खेल्नेके वहाने रेवतक पर्वतपर गये ॥ 
आयोष्यैकरथे देवः सात्यकिं नरपुद्वम्‌ । 
भरयुच्नमनुगच्छेति प्रोक्त्वा ङुरुङरोदह ॥ २ ॥ 
रैवतं च गिरिं देवो गत्वा दारुकमन्रवीत्‌ । 

, ुस्छुरभूषण ! भगवान्‌ श्रीकृष्णे एक रथपर नरश्रेष्ठ 
सात्यकिको चटाकर ओर प्रद्युम्नको भी अपने पीछे अनिकी 
आज्ञा देकर जत्र रवतक पर्वतपर परह, तब अपने सारथि 
दासकते वोठे--1 २९ ॥ 
मदीयं रथमेनं त्वं ग्रहायैव दारुक ॥ २ ॥ 
प्रतिपाखय मां सौस्य दिनाद्धं वारयन्‌ दयन्‌ 1 
रथेनेव प्रवेष द्वारकां सूतसन्तम ॥ ४ ॥ 

(तम्य दाख्क | तुम मेरे इस रथको छेकर यदी आधे 
दिनतक इन घोडवो कावुम रखते हए मेरी प्रतीक्षा करो । 
सूतशिरोमणे ! मे रथके द्वारा दी दवारकापुरीमे प्रवेश कर्गा]) 
दति स्तंदिद्य भगवानाश्योद जयोयतः। 

ताय॑ ससात्यको धीमानप्मेयपराक्रमः ॥ ५ ॥ 


दारकको यह संदेश देकर विजयके व्ि उत हुए 
अप्रमेय पराक्रमी बुद्धिमान्‌ मगवान्‌ श्रीकृण्ण सात्यकरिके साथ 
गरुदपर आरूढ हुए ॥ ५ ॥ 
पृथम्‌ स्थेन कौरव्य प्रययुः शचुसखूदनः 1 
आकाडगामिना रजन्‌ पृष्ठतः रष्णमन्वयात्‌ ॥ £ ॥ 

कुखनन्दन { राजन्‌ { श्युखुदन प्रद्युम्न मी एक पृथक्‌ 
आकाशचारी स्थके दवाय शीङृष्णके पीपी गये ॥ ६ ॥ 
निमेषान्तरमास्रेण नन्दनं काननं हरिः। 
देवोद्यानं ययौ धीमान्‌ पारिजातजिदीर्षया ॥ ७ ॥ 

बुद्धिमान्‌ श्रीकृष्ण पारिजातको हर लेनेकी इच्छासे परक 
मारते-मारते देवता्भकि उग्रान नन्दनवन्मे जा पहुचे ॥ ७ ॥ 


द्द तत्र भगवान्‌ देवयोघान्‌. दुरसषान्‌ । 
नानायुधघरान्‌ व॑त्यान्‌. नन्दनस्थानघोक्षजः ॥ ८ ॥ 
तेषां सम्पश्यतामेव पारिजातं मदहावङः। 
उल्पारश्चारोपयामासर पारिजातं स्तां गतिः ॥ ९ ॥ 
गरुडं पक्षिणजानमयत्नेनैव भारत । 


षहो भगवान्‌ अधोक्षजने नन्दनवनमे चित हष 


देवताथपरके दुर्जय वीर योद्धाओंको देखा, जो नाना प्रकारके 
आयुध धारण क्रिये दए थे । भरतनेन्दन | सतपुरषोके 
आश्रयदाता महावली श्ीड्ष्णने उन योद्धा्ओक देखतेदेखते 
विशेष प्रयल्के चरिना ही पारिजातको उखाढड्कर पक्षिराज 
गरुड़की पीठपर रख लिया ॥ ८-९र ॥ 
उपस्ितो विग्रहवान्‌ पारिजातः स केशवम्‌ ॥ १० ॥ 
सान्त्वितो वासुदेवेन पारिजातश्च भारत । 
उक्तश्च धृ मा भैस्त्वं केद्रवेन मक्ाःमना ॥ ११ ॥ 
पारिजात दृक्ष मूतिंमान्‌ होकर श्रीकृष्णकी सेवम 
उपखित हुआ । भारत ] उस समय वसुदेवनन्दन मदात्मा 
केशवने पारिजातकरो सान्त्वना देते हुए कहा“ | तम 
डरो मतः ॥ १०-११ ॥ 
तं प्रस्थितं तरं दृष्ट पारिजातमधोक्षजः। 
अमरावतीं पुरीं श्रेष्ठां ततश्चक्रे प्रदक्षिणाम्‌ ॥ १२॥ 
पारिजात वृक्षको अपने खछाथ प्रस्थान करते देख भगवान्‌ 
अघोक्षजने शरेष्ठ अमरावतीपुरीकी परिक्रमा की ॥ १२॥ 
ते ठु नन्दनमेोप्तारः पारिजातो द्धुमोत्तमः। 
हियतीति महेन्द्राय गत्वा दप शारशासिरे ॥ १३॥ 
नरेश्वर [ नन्दनवने उन रक्षकोनि जाकर महेन्द्रे कदा- 
'्वेवराज ! ब्षौमि उत्तम पारिजातका अपहरण हो रहा हैः ॥ 
अथेरावतमारुह्य निर्ययौ पाकरासनः। 
जयन्तेन रथस्थेन पृष्ठतोऽुगतः घञः ॥ १४॥ 
यह सुनकर प्रभावलारी पाकरासन इन्द्र ेरावतपर 
आरूढ हो निकले 1 उनके पिपी रथपर बैठा हुमा 
जयन्त मी आया ॥ १४॥ 
पूवमभ्यागतं दवारं केशवं श्चनादानम्‌ । 
दषटीवाच प्रदृत्तं भोः किमिदं मधुसूदन ॥ १५॥ 
जबर शन्ुनाश्न केशव इन्द्रपुरीके पूर्वद्रारपर आयिः तव 
उन्दं देखकर इन्द्रने कहा--दे मधुसूदन ! यह तुमने क्या 
कियाहै॥ १५॥ 
प्रणम्य गरूडस्थोऽथ केदावः शाक्रम्रवीत्‌ । 
वध्वास्ते पुण्यकायोय नीयतेऽयं बरदधुमः ॥ १६॥ 
तवर गरुडपर बरे हुए. केशव इन्द्रको प्रणाम करके बोरे 
“देवराज { आपकी बहूरानीके युण्यकार्यका सम्पादन करनेकरे 
लि यद श्रेष्ठ क्च यदसि ठे जाया जाता है ॥ १६ ॥ 
तमुवाच ततः शक्रो मा मेवं पुष्करेक्षण । 
अयोघयित्वा न तसखनैयितम्यस्त्वयाच्युत ॥ १७ ॥ 
तव न्द्रे उने कहा--“कमलनयन अच्युत | नह, 


५०द 


श्रीमहाभारते खिकभागे 


[ हरिषे 


एेखा नदीं हो सकता । विना युद्ध पिये चर इख इक्षको नदी 
ठे जाना चाद्ये ॥ १७ ॥ 
प्रहरख महावाहो प्रथमं मयि फेडाव। 
भरति्षा सफला तेऽस्तु मुक्त्वा कौमोदकीं मयि ॥ १८॥ 
ध्महुब्ाह केशव | पले मुद्चपर प्रहार करौ । मेरे ऊपर 
कौमोदकी गदा छोडकर वुम्दारी प्रति्चा सफर दोः ॥ १८ ॥ 
ततः ष्णः श्रारेस्तीक्णर्देवसजगजोत्तमम्‌ । 
विभेदाश्निखंकादौः प्रहसन्निव भारत ॥ १९ ॥ 
भरतनन्दन ! तव श्रीकृष्णने हँखते हृपटंसे अपने वज्र- 
सद्दा तीदे बार्णोद्धारा देवराजफे गजश्रेएट एेरावतको नीधना 
आरम्भ करिया ॥ १९॥ 


विव्याध गरुडं घञ्न दिव्यैः शरबरेस्तथा । 
वाणांथिच्छेद खदसा केशवस्य तरस्विनः ॥ २० ॥ 
फिर वज्रधारी इन्द्रने भी अपने दिन्य उत्तम वार्णोदयास 
गर्ड़को धाय किया ओर वेगदाखी केशवके नार्णोको सदसा 
काट डला ॥ २० ॥ 
यान्‌ यान्‌. मुमोच देवेन्द्र स्ता स्तांश्चिच्छेद माधवः, 
माधवेन प्रयुतश्च चिच्छेद बलबृघ्रदा ॥ २१॥ 
देषेनदरने जो-जो वाण छेदे, उन माधवने कार दिया 
ओर माधवके चलये हपट नार्णोको वल-डतविनाशके इन्दरने 
खण्डित कर दिया ॥ २१॥ 
मेन्दस्य च हव्देन धलुयः फुसनन्दन । 
द्ाद्ंस्य च निनादेन मुमुहुः सर्गवासिनः ॥ २२॥ 
कुखनन्दन ! इन्द्रधनु तथा साङ्गधनुषकी ङ्कारोति 
सारे सखर्गवासी मोदित-से हो गये ॥ २२॥ 
तयो्चैतंति संग्रामे गरुडस्थं मष्टायखः। 
पारिजातं जयन्तोऽथ हतौमभ्युद्यतो वली ॥ २३॥ 
जव उन दोनोका संग्राम चल रहा थाः उसी समय 
महापराक्रमी एवं बलशाली जयन्त गर्ड़की पीठपर रखे हुए 
पारिजातको दर ठे जानेके स्यि उ्यत हु ॥ २२ ॥ 
भरययुख्मथ कंसध्चो चारयेति तदाब्रवीत्‌ । 
ततस्तं वारयामास सौपरिमिणेयः प्रतापवान्‌ ॥ २४॥ 
तव कंसविनारान श्रीकृष्णने प्र्युम्नसे कदा--“रोको उसे। 
आज्ञा पाकर प्रतापी सक्मिणीकुमारने जयन्तको रोक दिया ॥ 
जयन्तो जयतां श्रेष्टो रौक्मिणेयमयेषुभिः। 
सर्वंगात्रेयु विष्ठसन्नाजघान स्थे स्थितः ॥ २५॥ 
विजयी वीमे श्रेष्ठ जयन्त उस समय रथपर व्रैठा था | 
उसने हखते हए बाण मारकर प्रद्युम्नके समस्त अङ्गिं 
चोट पर्ुचायी ॥ २५ ॥ 


रथस्थ पव रथिनं कामस्तु कमटेष्षणः। 
येन्दरिमभ्यर्दयामास वारैयश्शीवियोपतैः ॥ २६॥ 
कामावतार कमलनयन प्रद्युम्न भी स्थर दी बेटे ये। 
उन्दने विषधर सप॑के समान भमर्वंकर मर्णोदवारा रथारूद्‌ 
इन्द्रकरुमार जयन्तको पीडति कर दिया ॥ २६॥ 
स॒ संनिपतस्तुमुलो वभूव कुखनन्श्न । 
जयन्तस्य च चीरस्य रौक्मिणेयस्य चोभयोः ॥ २७॥ 
कुख्नन्दन ! जयन्त तथा कीर सक्रिमिणीकुमार उन 
दोर्नोका बह युद्ध वड़ा भयंकर हआ ॥ २७॥ 
छृतप्रतिरृतं युद्धे चक्रतुस्तौ माब । 
मेन्द्रोपेन्द्रतनयौ जगत्यख्रभतां वयै ॥ २८॥ 


एक महेन्द्रका वेया था तो दूसरा उपेन्दरका ।दोर्नौ ही षंसारके 
अख्रधारिरयम श्रेष्ठ एवं महान्‌ चलशारी ये । अतः दोनों 
एक-दुसरेके छोड हुए अख-दार्खोका निवारण कर देते ये (२८। 


देवाश्च मुनयश्चैव ददद्यर्विस्मयान्िताः। 
तं संग्रामं मक्षधोरं सिद्धाद्चैव सचारणाः ॥ २९॥ 


देवताः मुनि, सिद्ध ओर चारण सभी आभर्यचकरित 
होकर उस महामयंकर संम्रामको देखने स्मो ॥ २९ ॥ 


ततस्तु प्रव्से नाम देवदूतो महाबलः। 

पारिजातं पुन्तुमियेय कुरुनन्दन ॥ ३०॥ 
कुसनन्दन ¡ तव प्रवर नामक महाबली देवदूतने पुनः 

पारिजात बृक्षको हर ले जनेकी इच्छा की | ३० ॥ 


सखा स देवराजस्य महास्रविद्रिदमः। 
सवध्यो वरदानेन ब्रह्मणः कुरुनन्दन ॥ २३१ ॥ 
करख्कुलनन्दन { शघ्रुओंका दमन करनेवाला भवर महान्‌ 
अल्वेत्ता तथा देवराज इन्द्रका सखा था । वह्‌ बरह्माजीके 
वरदानते अवष्यदहोगयाथा॥ ३९१॥ 
ब्राह्मणस्तपसा सिद्धो जम्बृद्धीपाद्‌ दिवं गतः 
सख्दाफ्त्या च्रप संयाततः सखित्वं वरुघातिना ॥ ३२॥ 
नरेश्वर { वह तपःसिद्ध बाह्मण जम्बूद्रीपसे खरग गया 
या ओर अपनी शक्तिके प्रमावते बल्घाती इन्द्रका मित्र 
होगयाथा॥२३२॥ 
तमापतन्तं सम्परक्चय रष्णः सात्यकिंमय्रवीद्‌ 1 
अत्रस्य पव प्रवरं शरैवौरय सात्यके ॥ ३३॥ 
उसे अति देख श्रीकृष्णने सात्यकिसे कदा--'सात्यके ! 
ठम यदीं बरैढ-बेठ अपने वार्णोदारा इस प्रवरको रोको ॥३३॥ 
न त्वन्न निर्दयं बाणा मोकतव्याः सात्यकेत्वया। 
अस्य बाह्यणचापल्यं सोढव्यं खल्धुं सर्वथा ॥ ३४॥ 
{सात्यके | वु इसके ऊपर निर्दंयतापूर्वक बाण नहीं 
छोड़ने चाद्ये । इस म्राक्षणकी चपलतकरो सर्वथा सहं ठेना 
दी उचित, ॥ ३४॥ । 


विष्णवे ] 


ततः षष्ट्या ` रथेषूणां गरुडस्थं ्िजस्तदा । 
आजधाम महाकादो सात्यकिं प्रवसे भृशम्‌ ॥ २५॥ 
महाबादो | तदनन्तर प्रवर नामक ब्राह्मणने साठ 
बारणोद्रारा गख्ड़पर बैठे हु्ट॒सात्यक्रिफो गहरी चोट 
परहुचायी ॥ ३५॥ । 

, शिनेर्नप्ता धञुस्तस्य क्षिपतः सायकान्‌ सप । 
चिच्छेद पुरुषव्याघ्रो चनं चेदमन्रवीत्‌ ॥ ३६॥ 
नरेश्वर ! तव युरुषरसिंह रिनि-पौच्न सात्यकिने वाण 
चते हुए बाह्मणके धनुष ओर यार्णोको मी काट डल 
ओर दस प्रकार कटा-) ३६ ॥ 
ब्राह्यणो नाभिन्तम्यस्तिष्ठं॒तिष्ठ स्रवत्मनि । 
अवध्या यादवानां हि स्वापराघेऽपि हि दविजाः ॥ ३७॥ 

ध्रवर | ब्राक्षण भरे दारा मारे जाने योग्य नर्ही हे; अतः 
तुम अपने मार्गपर उटे रहो, उटे रहो । अपना अपराध 

करनेपर भी ब्राहर्णोको यदुवंशी बीर अवध्य ही मानते है, ।३७। 
प्रवरस्तु प्रहस्येनमुवाच छख्नन्वन । 
अलं क्षान्त्या सरणा शुर युद्धश्च सवकत्मना रणे ॥ ३८॥ 

कुरुनन्दन ! तव प्रवरने हंखकर सात्यक्रिसे कदा-- 
“मनुय श्र सात्यके ! क्षमा करनेकी आवश्यकता नहीं है । 
ठम रणभूमि्मे सारी शक्ति ख्गाकर युद्ध करो ॥ ३८ ॥ 


जामद्रन्यस्य रामस्य शिष्योऽहमपि यादव 1 
नामतः प्रवसे नाम सखा दाक्स्य धीमतः ॥ २९. ॥ 
ध्यादववीर | म भी जमदग्निनन्दन परश्चरामका शिष्य हू । 
मेरा नाम प्रवर है ओर मै बुद्धिमान्‌ इन्दरका सखा हूँ ॥२९॥ 
न दैवा योद्धुमिच्छन्ति मन्यन्तो मधुखदनम्‌ । 
आनृण्यं सौषटवुस्याहमधिगन्ताससि माधव ॥ ४०॥ 
'मधघुवंशी वीर ! देवतारोग मधुसूदनका सम्मान करते 
है; अतः उनसे युद्ध करना नदीं चाहते है; इसल्यि मे आज 
इन्द्रके सीदार्दका ऋण चुकानेके व्यि आया हू" ॥ ४० ॥ 
तवस्वयोस्तदा रौद्रः संग्रामो ववृधे दछप। 
अखैर्दिव्यर्नरव्याघ्  शेनेयद्धिजसुख्ययोः ॥ ४१ ॥ 
नरेधर ! पुखषरसिंह ! तदनन्तर ास्यकिं ओर उस श्रेष्ठ 
बराह्मणम उस समय दिव्य अच्त्रोदरारा बड़ा भयंकर संभाम 
हज जो वदता ही चल गया ॥ ४१ ॥ 
द्यौश्चचार तद्‌ राजय दुचराश्च सदसखरश्शः। 
तस्मिन्‌ वर्तति संभ्रामे तेषासतिमहात्मनाम्‌ ॥ ७२ ॥ 
राजन्‌ !, उन॒ अत्यन्त महात्मा वीरोका व॒ संग्राम 
चाट होनेपर उस समय खर्गलोक विचलति दो उठा | 
सहलो आकादचारी प्राणी कमित दो उठे ॥ ४२॥ 


नातिरिष्ये रणे काष्णिरेन्छिमल्लश्रतां वरम्‌ । 


निसप्ततितमोऽध्यायः 


९५०७ 


--------------------------------------------- च --- 
णो 


रेग्दिः कार्ण म्ात्मानं मायिनं शरसत्तमम्‌ ॥ ४३ ॥ 
रणभू श्रीङृष्णञ्गमार प्रद्र अखधाियमि भ 
जयन्तसे आगे न बद्‌ स्के । इसी प्रकार इन्द्रकुमार जयन्त 
भी श्ूरदिरोमणि मायाविशारद श्रीकृष्णक्कमार मत्मां 
प्रयुन्नसे अधिक पराक्रम न दिखा सका ॥ ४३ ॥ 
हन्त शुद्ध शरतीच्ेति ताबुभौ योघसन्तमौ । 
युयुधाते नरणेषठ परस्परजयेषिणो ॥ ४४॥ 
नरम | परस्मर एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छावाठे वे 
दोनो श्रेष्ठ योद्धा “अरे, यह खो, दो'मेरे इस प्रहारका उत्तर! 
आदि वाते कहते हए युद्ध करने ख्गे ॥ ४४॥ 
अथ शाङ्गीयुधयुतं ` शाचीपु्ः प्रतापवान्‌ । ` 
विभाष्याभ्यदनद्‌ राजन्‌ दिव्येनास्रेण सत्वरः ॥ ४५॥ 
राजन्‌ ¡ तदनन्तर प्रतापी शचीपुत्र जयन्तने शीङृष्ण- 
कुमारको सम्बरोधित करके उनपर बड़ी, उतावलीके साय 
दिग्याख्रद्वाया आघात . किया ॥ ४५ ॥ 
सोऽखं तदभिदछीप्यन्तमापतन्तं शितैः हरेः । 
तस्तम्मे वाणजाठेव तदद्भुतमिवाभवत्‌ ॥ ४६ ॥ 
अपनी ओर अति हृण् उख तेजस्वी अस्रको पैने वाणौका 
जाल-सा फैखकंर प्रयु्नमे बीचमे ही रोक दिया । वहं एक 
अद्धुत-सी वात दुर्‌ ॥ ५६ ॥ 
ततस्तद्‌ दीण्यमानं तु पपात रणमुद्धनि । 
रौक्मिणेयस्य कौरव्य धोरं दनवमदेनम्‌ ॥ ४७ ॥ 
कुरुनन्दन ! तदनन्तर युद्धके मुदानिपर रक्मिणीनन्दन 
प्रुभ्नके स्थि मी दुस्सह प्रतीत होनेवाल्य , वह ॒दीसिमान्‌ 
दानव-मर्दन दिव्याल्न उनके स्थपर गिरा ॥ ४७ ॥ 
तेनाखेण रथो दग्धः भ्रथुञ्लस्य महात्मनः । 
नाददत्‌ तत्‌ खोर तं सौधिमणेयं नराधिप ॥ ४८॥ 
नरेश्वर ! उख अस्रके दारा महात्मा प्रच्ुञ्नका रथ 
जल्कर भस हो गया तो भी वद भयंकर असन रुक्मिणी- 
कुमार प्रचयुन्नको दग्ध न कर सका, | ४८ ॥ । 
दष्त्यनि न सस्वधिखुद्धतोऽपि विशाम्पते । 
द्ग्धाद्‌ रथान्महावाष् रौक्मिणेयः भरचक्रमे ॥ ४९ ॥ 
प्रजानाथ ! अग्नि कितना ही प्रचण्डर्प स्योन धारण 
करे, वह दुसरी अग्निको नदीं जल सकती ( उसी तरह उस 
अलक अग्निसे अग्नितुस्य तेजस्वी रुकिमणीकुमार भरयुम्नके 
शरीरको कोई हानि नहीं पर्ची ) । महछवाहु सविमणीनन्दन 
प्र्ुप्न उस जले हए रथक्रो छोडकर अरग हो गये | ४९॥ 
अथ नारायणसुतो विरथो रथिनां वरः, 
स्थितो धलुष्मानाकादे जयन्तमिद्मववीत्‌ ॥ ५० ॥ 
तदनन्तर सथहीन हृष्ट रथिर्योमि शष्ठ नारायणकुमार 


५०८ 


श्रीषहाभास्ते सिखभागे 


[ हरि्ंतन 


परयुम्न आकाशम धनुप्र स्यि खदे हौ गये ओर जयन्तये इव 
प्रकार वोले-]} ५० ॥ 
महेन्द्पुत्न दिव्यं त्वं यदं मुक्तवानसि । 
नादमीदशरूपाणां दायो हन्तुं तैरपि ॥ ५१ ॥ 
"मदेनरुमार ¡ ठमने मेरे ऊपर जो दिव्याल्न डोडा दै, 
पठे सैकड़ों दिव्याल मुने मार नहीं सकते द ॥ ५१ ॥ 
प्रयतनं कुर शिक्षाणां यत्नं मेऽ दद्य । 
नास्ति मेऽतिशयं कती संग्रमे ऽमस्तन्दमं ॥ ५२॥ 
“अमरनन्दन | चम अपनी शि्चके अनुसार प्रयत्न करो 
ओर सारा यत आज सुन्ने दिला । संग्राममे सुस्से वद्कर 
पराक्रम प्रकट करनेवाखा कोई वीर नदी है ॥ ५२॥ 
आखीन्मे साध्वलं चष्ट रथस्थं त्वा ध्रतायुघम्‌। 
विभेमि तत्र नेदानीं युद्धे दण्वरोऽवखम्‌ ॥ ५३॥ 
श्वुम रथपर्‌ बैठकर हाय्मे आयुध लिये जव यो अयि ये; 
तवर ठुम्दं देखकर मुन्चे कुछ मय हा था; परु अव युद्धम 
ठम्दारा सारा वल मने देख ठ्वा है ¡ वमे बहुत योड़ा वल 
दै अतः इख समय मँ तुमसे भय नदीं मानता ॥ ५३ ॥ 
मनसा स्मयंतां सैपर पारिजादस्त्वया तखः। 
शक्यं न खलु हस्ताभ्यां स्परएव्यो यस्त्वया यसो ॥५४॥ 
(तुम दस पारिजात वक्षका केवट मनते सरण कर लो; 
क्योकि इस समय दोनो ्ायेषि दसका स्पर्य करना तुम्हार 
च्वि निश्चय ही असम्भव दै ॥ ५४ ॥ 
रथो मायामयो द्ग्घस्त्वया यो द्यखतेजसा । 
शैटद्रानां सदस्राणि खष्टं राक्तोऽस्ि मायया ॥ ५५॥ 
ध्तुमने अपन स्के तेजसे मेरे जिस मायामय रथको 
जलाया दै, रे हजासे रथ मँ मायाद्वारा चना खकता हूः ॥ 
एवमुक्तो जयन्तश्च सुमोचाखं मयवलः। 
तपसोपचितं तेन॒ स्वयमेचातितेजसा ॥ ५६॥ 
प्र्ुम्नके एेसा कटनेपर महावरटी जयन्तने खयं दी 
अ्यन्त तेजखी तपसे पुष्ट हुए मदान्‌ अचक्रो उनपर चलाया ॥ 
तत्‌. भद्युखो महावेगं शरजादैरवास्यत्‌ 1 
चत्वार्यस्राणि दिव्यानि मुमुचे चापसणि सः ॥ ५७॥ 
उस महान्‌ वेगलालटी अख्रको प्रदयुम्नने अपने वाण- 
समूहति सोक दिया; तवं जयन्तने चार दिव्यात ओर छोडे ॥ 
दश्च सवौखु शरुषुस्तान्यसयाण्यथ भारत । 
सौकिमणेयं मदामानमन्तरिष्चे च पञ्छत्रम्‌ ॥ ५८ ॥ 
भरतनन्दन { उन अच्रनि मदात्मा स्क्मिणीकरुमार 
प्र्युम्नको सम्र्णं दिरार्ओकी ओसछे प्रेर छया तथा पीछे 
नचरगे हुए एक र्पचवैँ वाने आक्रम भी उनकी गति 
रोक दी ॥ ५८ ¦ 


महोद्कासदटदान वाणनद्याण्यमरसचमः 1 
मुमोच ,यानि घोराणि प्रद्युम्नं धति सर्वतः ॥ ५९॥ 
तानि सवीणि वाणेः ऋ्प्णिरलाण्यवासयव्‌ । 
जयन्तं चापरेवीणैर्विव्याय निदितेस्तदा ॥ ६०॥ 
अमरशरेष जयन्ते वदी भारी उस्कके स्मान जो वाण 
यर्‌ मयंकर अल प्रुम्नपर सव्र योरते छोड ये, उन सव्रका 
श्रीकृप्णकरुमास्ने अपने वाणममृरद्धासा निवारण कर दिया 
तथा दुषरेदूखरे तीचे वाणेकि द्वारा जवन्तको धाय कर्‌ दिया ॥ 
ततो नादः समुत्खो हमरे पुण्यकर्मभिः) 
षट स्थं च श्यं च धयुन्नस्य महात्मनः ॥ ६१९ ॥ 
उस समय मदात्मा परद्युम्नकी सिरता ओर फर्ती देखकर 
पुण्यकर्मा देवतानि बडे जोर दर्पध्वनि की ॥ ६१ ॥ 
भ्रवरस्यापि वाणेन दितेन रिनिपुद्धवः। 
चिच्छेेष्यासनं वीये हस्तावापं च भारत ॥ ६२॥ 
भरतनन्दन | रिनिवंशविभृपरण वीर चात्यक्रिने एक पैने 
वाणे प्रवरे भी धनुष जौर दस्तानेको कराट दिया ॥ ६२॥ 
ततोऽन्यत्‌ स तु जग्राह महत्‌ तद्धुरूचमम्‌ । 
मदेन्द्रदत्तं प्रवरो मदाद्यनिसमसनम्‌ ॥ ६३ ॥ 
ततव प्रवरे महान्‌ वच्क्रे समान यद्र ध्वनि करनेवाले 
प्क दुसरे विशाल एवं उत्तम धनुधको हाथमे लिया, जिसे 
ष्न्द्रनेदेरक्वाथा ॥६३॥ 
स तेन वीये महता धुमा िप्रत्तमः। 
श्रणन्‌ मुमोच विविधानकरदिमनिभांस्तदा ॥ ६४ ॥ 
उस वीर ब्ाह्मणदिरोमणिने उख विशार धनुषे द्वारा 
उख समय देते-रसे नाना प्रकारे वाण ददे, जेः सूर्यकी 
क्रिरणेकि समान तेजी ये ॥ ६४ ॥ 
चकर्त च धनुधिनं क्षेनेयस्यामितौजसखः। 
विन्याध सर्वमादरेषु वाणेरपि च सात्यक्तिम्‌ ॥ ६५॥ 
उसने अमित तेजस्वी शखाप्यक्रिके विचित्र धनुधकरो काट 
डाला ओर उनके खरि अङ्धमिं वार्णेद्धारा गहरी चोट पर्हुचायी॥ 
धनुरादाय श्रौनेयस्ततोऽन्यद्ध ङरुनन्दन । 
ददं भारसर्ट धीमान्‌ रिथ्याच प्रवरं र्णे ॥ ६६॥ 
कुरुनन्दन { तग्र बुद्धिमान्‌ खात्यक्रिने दख भार सदन 
करने समर्थं सुदृद धनुप्र दाये लेकर रणमूमिर्म प्रवरको 
धना आरम्भ क्रिया ॥ ६६ ॥ 
उच्चकर्ततुरन्योन्यवर्मणी तौ शितैः दारैः! 
गलरेभ्यश्चैव मांसानि मर्मभिद्धिः हरोयमेः ॥ ६७॥ 
उन दोननि तीचे वार्णेद्वास प्रस्यरफे कवच काट डले 
तथा मर्ममेदी उत्तम वार्णेद्वाया प्रयल्नपूर््रक वे एक दूसरेके 
शरीरि मांस कायने खे ॥ ६७ ॥ 


विष्णुपवं 1 


अथाष्टवारवाणेन पुनरिष्वासनं द्विधा । ` 

चिच्छेद्‌ - प्रवरो वीरखिभिश्चेनमतांडयत्‌ ॥ ६८ ॥ 
इसी समय वीरं 'प्रवरने एक आठ धारवले वाणसे 

सात्यक्रिके धनुषके पुनः दो द्कडे कर उलि तथा तीन वार्ण 

द्वार उन्दै घायरू कर दिया ॥ ६८ ॥ 

अन्यदिष्वासनं तं तु ग्रहीतुमनसं द्विजः) 

गद्या ताडयामास श्षेप्यया टघु्स्तवान्‌ ॥ ६९ ॥ 
सात्यकि दूसरी धनुष लेना ही चादते थे कि फुतीलि 

हाथवाले ब्राह्मण प्रवरने फैकने योग्य गदाके दारा उनपर 

प्रदार किया ॥ ६९ ॥ 

सोऽसि चमं च जव्राह सात्यकिः प्ररसन्निव । 

न जच्राह धवुधीमान्‌ गदयाभिहतो श्रम्‌ ॥ ७०॥ 
तव्र सात्यविने हसते हुएट-से दाल ओर तल्वार हाथमे 

ले ली | 3 गदते अधिक आहत हो चुके ये; अतः उन 

बुद्धिमान्‌ वीरने धनप्र नहीं उखाया ॥ ७० ॥ 

ततः श्ारश्षतान्येव मुमोच भ्रवरस्तद्‌ा । 

विहस्तमिव विक्षाय सात्यकिं यदुनन्दनम्‌ ॥ ७१॥ 
इसके वाद यदुनन्दन सात्यकिंको निहत्था-सा जानकर 

प्रवरने उनपर सैकड बण छोडे ॥ ७२१ ॥ 

परयुस्नोऽस्य ददौ खङ्गं निर्म॑लाकाश्संनिभम्‌। 

तस्य चिच्छेद भक्छेन निद्धिक्षं पवरस्तदे! ॥ ७२॥ 
उस समय प्रद्युम्ने उन्है निर्मल आकाराके समान एक 

खज्ध दिया, परंतु प्रवरे तत्काल एक भव्ट मारकर उनके 

खड्धकौ काट डद ॥ ७२॥ 

त्सरदेरो ऽपातयच्च प्रवरः प्रहसन्निव । 

व्यधमच तथा चर्म॑ शितैचौणेरजिह्यगैः ॥ ७२ ॥ 
प्रवरमे हसते हुए-से उस ख्गको मूठ पकड्नेकी जगते 

काटकर गिरा दिया ओर सीधे जनेवाले पैन वा्णेति उनकी 

ठाल्की भी धन्यो उड़ा दीं ॥ ७३॥ 


आजघान च हशक्त्यैनं हदि विप्रो ननाद्‌ च । 
तं विद्कवमिव क्षान्वा पारिजातजिरीर्षया 1 
ताक्ष्यौभ्याशचे रथेनैव स तस्थौ प्रवरस्तदा ॥ ७४ ॥ 
फिर उस ब्राहमणने शक्तिके दारं उनकी छातीपर आघात 
किया । इसके वाद वद सिंहके समान गर्जना करने लगा । 
उन व्याकुखखा जानकर प्रवर पारिजात हड़प ऊेनेकी इच्छा- 
से रथके द्वारा दी गस्डके निकट आकर खड़ा हो गया ।७४५]॥ 
तं पक्षपुख्वेगेन चिक्षेप गरुडस्तथा । 
गन्यूतिमेकां सरथः स पपात मुमोह च ॥ ७५॥ 
उस समय गस्डने अपने पंखौके वेगसे प्रवरको दो कोष 
दूर फक दिया । प्रवर रथसदित वरहो गिरा ओर मूच्छित 
हे गया ॥ ७५ ॥ 


निसप्ततितमो ऽध्यायः 


९५०९ 


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तं जयन्तो निपत्याथ पतितं ब्राह्मणं नृप। 
समाश्वास्य रथं शीघ्रं समारोपितवास्तदा ॥ ७६॥ 
नरवर ! तव जयम्त दौड्कर वदां जा प्हुचा ओर भिरे 
हए ब्राह्मणको सान्त्वना देकर उवे शीघ्र ही रथपर चदा दिया ॥ 
होनेयमपि मुखन्तं पतन्तं च सुदुः । 
आश्वासयानः शदयुम्नः पिदन्यं परिषस्वजे ॥ ७७ ॥ 
सात्यकि भी वारंवार मूर्छित ह-दौकर गिरे रगे 
उस समय प्रद्युप्नने चाचा सात्यकिको आश्वा्ठन देते हणं उन 
द्दयसे छ्गा लिया ॥ ७७ ॥ 
तं हि पर्प हस्तेन सव्येन मधुसूदनः । 
विरुजः स्पर्शमात्रेण सान्यकरिः समपद्यत ॥ ७८॥ 
उस समय मधुसूदन श्वीकरष्णने चाये हाथसे उनका स्पर्शं 
किया । उनके स्पद्चमात्रसे साव्यकिकी सारी पीड़ा दुर हो गयी ॥ 
प्रचुरो दक्षिणे पादवं वामे तु शिनिपुङ्गवः 
तस्थतुः पारिजातस्य ॒युद्धशगैण्डतराबुभौ ॥ ७९.॥ 
तदनन्तर पारिजातके दाने मागमे प्रयुम्न ओर बायेँ । 
पाद्व सात्यकिं खडे हो गये । ये दोन दी युद्धम अत्यन्त 
कुशल थे ॥ ७९ ॥ 
जयन्तः प्रवरश्चैव रथेनैकेन भारत! 
सम्पतम्तौ महेन्द्रेण प्ररस्यो्तौ मदात्मना ॥ ८० ॥ 
भरतनन्दन ! इतने दी जयन्त ओर प्रवर भी एक टी 
रथस दौदृते हुए वक्ष आ पहुचे । उस समय महात्मा मदेन्रने 
उन दोनी हेसकर कटा--। ८० ॥ 
नाखन्नमभिगन्तव्यं गरुडस्य कथंचन । 
वरवानेष पततां राजा - च विनतासुतः ॥ ८१॥ 
(तुम दोर्मौ किंसी तरह गरुड्के निकट न जाना । यह 
पक्षर्योका राजा विनतानन्दन गण्ड वड़ा बल्वान्‌ है ॥८१॥ 
दक्षिणे चेव सव्ये च पा मम धृतायुधौ । 
उभौ स्थितौ युद्ध्यमानं मामेव हि प्रपद्यतम्‌ ॥ ८२ ॥ 
धुम दोनों मेरे दायं ओर बाय भागम धनुष धारण 
करके खड़े हो जाओ ओर युद्ध करते समय मेरी दी देख- 
भाल करोः ॥ ८२॥ 
पवमुक्तौ स्थितौ वीरौ ततः दाक्रस्य पादर्वयोः। 
दहते युद्ध्यमानौ देवरयजजनार्दन ॥ ८२ ॥ 
इन्द्रके एता केदनेपर वे दोनो वीर उनके दोनो वगरय 
खड़े हो गये ओर देवराज इन्द्र॒ तथा श्रीकृष्णका युद्ध 
देखने ल्गे ॥ ८२ ॥ 
अथेन्द्रो गरुडं वाणेर्महादानिसमसनेः। 
विव्याध सर्वगात्रेषु महाल्परवरेस्तथा ॥ ८४॥ 
तदनन्तर इन्द्र महान्‌ वच्रके समान रन्द करमेवे 


५१० 


ध्रीमहाभारते धिष्टभागे 


[ दरिवंशे 


नवय 


बाणो तथा मद-बहे अन्नोष्टारा गर्दृके सरि भर्मिं चोर 
पहुवाने गे ॥ ८५४ ॥ 
ख तान्‌ बाणानगणयन्‌ पैनतेयः प्रतापवान. । 
ससाराभिमुखे वीरः शाक्रनागमरिदिमः॥ ८५॥ 
तत्र॒ उनके उन बार्णेको ङ् भी न गिनते द्रुण 
शतुर्भोका दमन फरनेवाटे प्रतापी बीर भिनतानन्दन गर्द 
इन्द्रके ्ाथी एेरावतदी ओर मदे ॥ ८५ ॥ 
उभौ ठी सहसा राजन्‌ बिगरी गजपक्षिणौ । 
प्युखौ वी्य॑सम्पप्नी मदाप्राणी युरासौी ॥ ८६॥ 
राजन्‌ { वे यखूवान्‌ शयी ओर पक्षी सदा एक पूसरेफे 
साय जृह्लने सो । वे दोना टी बखयराक्रमसे सम्पन्न, महान्‌ 
प्राणशक्तिसे युक्त गौर दुर्जय ये ॥ ८६ ॥ 
रदतैः पश्रगरिपुं करेण शिरसा रवा । 
फेरावतो गजपतिराजघान नदंस्तथा ॥ ८७ ॥ 
उस समय गर्जते हुए गजराज एेरावतने अपनी रयूढ 
मसखरक ओर शति स्प॑शधरु गसड्पर गरा आघात किया ॥ 
तथा नखाहृशेस्तीषवर्वैनेतेयो यलोत्फटः। 
तथा पक्मनिपातैश्च शाक्रनागं जघान ह ॥ ८८॥ 
इसी प्रकार उत्कट चलशाछी विनतानन्दन ग्ड़ने तीषे 
नखल्पी अंकुश ओर पयि शद्रके शायीपर चोट फी ॥ 
सुहत खमहानासीत्‌ सम्पाते गजपक्षिणोः। 
विस्मापनीयो जगतः प्रक्षिवृणां भयावष्ः ॥ ८९॥ 
दो षदरीतक शायी ओर पश्चमे मदान्‌ युद्ध रोता रदा; 
जो जगते लि आश्चर्यजनक भौर दर्शकोके लि मयावह्‌ था ॥ 
मून्यथेरवतं वास्य॑स्ताख्यामास भारत । 
नखाह्कशकरालेन चरणेन महायखः ॥ ९० ॥ 
भारत | नदरी गरुटने नखस्पी अक्रुशेक्रि एर 
विकराल प्रतीत होनेवाङे अपने पैर्छे रेरावतके मस्तकपर 
प्रहार किया ॥ ९० ॥ 
सम्प्रहाराभिसंतप्तो निपपात भिविष्पात्‌। 
पारियात्रे गिरिग्रेष्ठे दपेऽसिञ्जनमेजय ॥ ९१॥ 
जनंमेजय | उस प्रहासे पीदित ष्टो एेरावत खर्गधे नीये 
इस जम्पूद्रीप परवतश्रे्ठ पारियात्रपर गिर पड़ा ॥ ९१ ॥ 
पतन्तमपि तं शक्रो न सुमोच मदाव्रलः। 
कारण्यादय सौदादौव्‌ पूवौभ्युपगमादपि ॥ ९२॥ 
महाप्रली एन्द्र करुणा, रौहार्दं तथा षाय न छोदनेके 
व्यि पदठे की हई प्रतिशकरे कारण मी उश गिरते दुष 
हाथीको खोद न स्के! ९२१ 
छष्णो ऽप्यन्वगमच्चेनं पृष्ठतः प्रभवो ऽव्ययः । 
पारिजातचवा धीमान्‌ गख्डेन महावलः ॥ ९२ ॥ 


सगत्‌की उयरिफे कारणभूत यचिनाखी महबन्नी 
हेदिमान्‌ श्रीफूण्ण मी पारिजतेयु्त गसडुके दवारा इन्दरके 
पीठे-पीषटे वर्योतक गये 1 ९३ ॥ 
स तस्थौ पर्वतधरष्टे पारियक्रिे तु धृष्रहा। 
पेरावते समाश्वस्ते संग्रामो घयृघे पुनः ॥ ९४ 
धरेयाशीविपप्रस्यै र्त्नयु्तैः सखुतेमितैः। 
भन्योन्यं ुखद्रादुंट शाक़्केद्राययो्हान्‌ ॥ ९५॥ 
पृप्रा्रविनागाक ष्ट्द्र पर्वतभेष्ठ पासियात्रपर पू्दचकर्‌ 
खदे हो गये | कुरश्रे् ¡ रेसीवतफे सुता ठेनेपर इनदर ओर 
भरीकृप्णका वह मदान्‌. युद्ध पुनः यद्‌ चत्र | दोर्नो रसे 
एक-दुसरेषर तेज कयि द्रुए, रत्नयुक्त एवं विषधर स्पेकि, 
यस्य भयंकर याणेकि प्रदर ने खे ॥ ९५.९५ ॥ 
ततो वज्नायुधो पञ्मश्लनि च पुनः पुनः। 
मुमोच गरुडे रजन्नैरवतप्प दप ॥९६॥ 
राजन्‌ | नरेश्वर | तदनन्तर वज्जधारी हन्द्रने ेरावतश्र 
गरषटुपर बरारंवार वञ्ज तथा अदानिका प्रक्रकरिया॥ ९६1 
प्नाशनिनिपातंस्तान्‌ सेद शाफस्य पक्षियाय्‌ । 
भव्यो षलिनां धेटो निसर्गेण तपोबखा्‌ ॥ ९७ ॥ 
अवध्य एवं बटयवारनेमिं शरेष्ठ पशिराज गण्डने इ्द्रके 
उन यन्न जीर यश्निद्रार कयि गये प्रदारोको नैघर्गिक श्चक्ति 
तथा तपद्याके चल्ठे सद्‌ च्या ॥ ९७ ॥ 
मुमोच पक्षमेकं भानयन्नष्टानिं सदरा। 
च्रं च देवयपोऽ्य चातुः कद्यपखम्भवः ॥ ९८ ॥ 
उन कश्यपकुमार गरदन अपने माई देवराज दन्द्रफे वजर ओर्‌ 
यद्निकरा मान रखते हुए प्रवेक प्रदारपर अपनी एक-एकर्पोख 
तोढकर गिरा दी ॥ ९८ ॥ 
साफ़म्यमाणस्ताषत्येण न्यमलन्दरपते गिरिः। 
पिवेद्या धरणीं राजज्च्छीर्यमाणः समन्ततः ॥ ९९॥ 
राजन्‌ ! मरुद्के आक्रमण करनेपर व॒पारियात्र 
पर्वत सब्र ओस्पे व्रिखरकर धरती धस गया ॥ ९९ ॥ 
प्ुङुज चहुमानेन छष्णस्य स तु पर्वतः। 
तं चाद्राक्षीत्‌ ततः रष्णः किचिच्छेयमयोक्षजः॥ १००॥ 
श्रीकृण्णके भारी भारसे वह पर्व॑त आर्तेनाद-सा करने 
लगा ] तवर अधोक्षज श्रीकृपष्णने उख्की ओर देखा । उष ` 
पर्वतका कख ही भाग धरतीके ऊपर शेय रह गया था] 
तं मुक्त्वा गर्डेनाश् तस्थौ देवो विहायसि । 
प्र्युम्नं च तद्रोवाच सर्वरुहोकभावनः ॥१०१॥ 
यह्‌ देख सवके सेष्टठा लोकभावन भगवान्‌ श्रीकृष्ण उस 
पर्वतको छोडकर गण्डके द्वारा आकाशम खडे दो गये ओर 
उख समय प्रयुम्नसे वोठे--॥ १०९ ॥ 


षिष्णुपवे 


खतुःसप्ततितमोऽभ्यायः 


५११ 


इतो द्वारवतीं गत्वा रथमानय मा चिरम्‌। 
सदाख्कं महाबाहो मसेजोबलमाधितः ॥ १०२] 
भ्महागाहये ! यहेवि द्वारका जाकर मेरे तेज ओर बल्का 
आशधय ठे दाखफ़खदित मेरे रथको शीघ्र यर्दा ठे आमो ॥ 
वक्तव्यो बलभद्रश्च राजा च कुटराधिपः। 
श्वो जिववेन्द्रं त्वागमिष्ये द्वारकामिति मानद्‌ ॥१०२३॥ 
ध्मानद { वयँ मैवा चल्मद्र तथा कुकुरवंशके अधिपति 
राजा उम्रेनठे क्‌ देना कि कर इन्द्रको जीतकर मै दारका- 
पुरीको आगाः | १०३ ॥ 


तथेत्युक्त्वा तु चमौत्मा प्रचुल्लः पितरं वियुः। 
गत्वा यथो्कमुक्त्वा च याद्वेन्द्रबलादुभौ ॥१०७ 
नाडिकान्तरमत्रेण पुनस्तं देदामाययौ । 
दास्केण समायुक्तं रथमास्थाय भारत ॥१०५॥ 
मारत { तव अपने पित्तासे "बहुत अच्छा कटकर प्रमाव- 
शाखी धर्मात्मा प्र्युम्न द्वारकामे गये ओर यादषराज उग्रसेन 
तथा बठ्राम दोनसि उनका यथावत्‌ संदेश कफर वे दारुक 
के द्वारा जोते गये रथपर आरूद्‌ हे षद्ीमरमे फिर उस सयान. 
पर लीट अये ॥ १०४-१०५॥ 


इति श्रीमहाभारते खिरुभागे हरिवंशे विषप्णुपव॑णि पारिजातद्रणे श्रीष्णेन्ब्रयु्ध त्रिसप्ततितमोऽध्यावः 7 ७३ ॥ 


दस प्रकार श्रीमहाभार्तके खिरभाग हखिश्के अन्तरगत भिम्णुपर्मे पारिभातररण्के प्रसंगे 
्रङृष्ण ओर इनदरका युद्धमिषयक तिरर! भष्माब पुरा दुभा ।॥ ७३ ॥ 


चतुःसप्ततितमोऽध्यायः 
रात्रिम युद्ध खगित करङे श्रृष्णफा पारियात्र पर॑तको वरदान देना, गज्जाका सरण करना, षि 
ओर गङ्गाजरपर महादेवजीका आवाहन करके उन विस्वोदकेश्वरकी पूजा ओर स्तुति करना, 
महादेवजीका उरन्ं अभीष्ट बर देकर दैत्योफो मारनेका आदेश देना तथा पारियित्र- 
पर्वतपर भगवानूका निवास एवं उनकी प्रतिमाके पूजनी महिमा 


कैश्नम्पायन उवाच 
तमारुह्य रथं ष्णः पापिया्रं गिरिं ययो । 
यत्रैरावतमास्थाय स्थितः सुरपतिः भ्रुः ॥ ९ ॥ 
बेश्षम्पायनजी कष्टते है--जनमेजय ! भगवान्‌ 
भरीङ्कष्ण उस्र रथपर आढ दो पारियात्र पर्वतकी ओर चेः 
जरह प्रभावशाली देवराज इन्द्र एेरावतपर्‌ आरूद्‌ होकर 
ख्डेये॥१॥ 
पारिया्रो गिरिभेष्ठो दृष्ट्र यान्तं जनादेनम्‌ । 
शणपादसमो भूत्वा भविवेश वखुंधरम्‌ ॥ २ ॥ 
भगवान्‌ शीक्ृप्णको आति देख पर्वतश्रेष्ठ पारियात्र उड्द- 
के ढेर या सनके बीजकी राशिके समान शिथिल दोकर धरती- 
मेस्मागया।२॥ 
पियाथं वासुदेवस्य परभावक्षो महदात्मनः। 
तस्य प्रीते हषीकेद्यः पवेतस्य जनाधिप ॥ ३ ॥ 
भगवान्‌ वायुदेवकी प्रसन्नताके स्मि दी उखने रेखा किया 
था; क्योकि वह महात्मा श्रीक्ृष्णके प्रभावको जानता था | 
नरेश्वर 1 उख पर्वतक्रे इ व्यवहारसे इन्ियोकि खामी 
ओीङप्णको बद्ध प्रसन्नता इई ॥ ३ ॥ 
ततः प्रयातं युद्धा्थंमच्युतं ऊकसुनन्दन । 
सपारिजातो गरुडः पृष्ठतोऽुययौ तदा ॥ ४ ॥ 
कुरुनन्दन ! तदनन्तर युद्धके ल्थि जाते हुए श्रीकृष्णकरे 
पीछे-पीठे पास्जितसदित गरुद मी गये | ४॥ 


भदः सात्यकिश्चापि गरडस्थो मावर । 
गतादुभौ रक्षणार्थं पारिजातमरिदमौ ॥ ५ ॥ 


गर्ड्पर बैठे इए. महाबली प्रयुम्न ओर सात्यकि ये 


दोन शतरुदमन वीर भी पारिनातकी रक्षाके ल्थि वँ गये ॥५॥ 


ततस्त्वस्तं गतः सूर्यः प्रषृ्ता रजनी दप । 
उपस्थितं रै & 
उपस्थितं पुनयुंद्धं शाक्रकेरवयोसिहि ॥ ६ ॥ 
नेर | तत्पश्चात्‌ सयंदेव अस्त दो गये ओर खव 
ओर रात फर गयी तो मी र्दा इन्द्र ओर श्रीङष्णका 
युद्ध पुनः उपसित इभा ॥ ६ ॥ 
खुषहाराहतं द्य विष्णुरेरावतं गजम्‌ । 
नातिकल्पं मक्षा तेजा देषराजानमघरवीत्‌ ॥ ७ ॥ 
महातेजसखी भगवान्‌ भीक्ृष्णने रावत शाथीको गसड़के 
भारति अत्यन्त भाहत ओर असमर्थ हुमा देख देवराज 
इन्द्रसे इख प्रकार कटा-॥ ७ ॥ 
गरुडाभिहतः पूर्वं॑नातिकल्पो गजोत्तमः। 
परावतो महावाहो राभरिश्च समुपो्यते ॥ ८ ॥ 
श्वः भभाते यथाकामं प्रव्त॑ख यथेच्छसि । 
एवमस्त्विति रष्णं तु देवराजोऽव्वीव्‌ भुः ॥ ९ ॥ 
"महावाहो ! गसदद्वारा पदल्ते दी आदत ्ोकर आपका 
यह उत्तम हाथी एेरावत इस समय कु असमर्थं हो गया 
दै। हषर रात भी आ पी हे भतः भय कर सदे 


५१२. 


श्रीमहाभारते सिकभागे 


[ हरिवो 


आपकी जैखी इच्छा दौः उख तरद्‌ युद्ध कौञ्िगा ! तव 

प्रमावशाली देवराजने श्रीङ्कष्णसे कदा; “एवमस्तु ( एेखा 

दीद), ॥ ८-९॥ 

उवास पुष्कयभ्यादये देवयजः पुरंदरः । 

घज्ञं भिरिमयं छत्वा धमौत्मा नृपसत्तम ॥ १०॥ 
नृपश्रेष्ठ [ इसके वाद्‌ धर्मासमा देवराज इन्द्र अपने 

चयि पर्व॑तमय आवरण वनाकर पुष्करे निकर ट्र 

गये | १ ॥ 


ब्रह्मा चतो जगामाथ कद्यपश्च मदाचरषिः। 
अदितिश्येव सं च देवा मुनय पव च॥ १९१॥ 
साध्या विद्ये च कौरव्य नासत्यावग्विनौ तथा । 
भादित्यश्चैव श्द्रश्च वसवश्च जनेभ्वर ॥ १२॥ 

कुरुनन्दन | जनेश्वर | तदनन्तर ब्रह्माः महर्षिं फद्यपः 
अदितिदेवी, समस्त देवता, मनि, साध्य; विद्वेदेवः नासत्य 
नामे प्रषिद्ध अश्विनीङ्कमारः आदित्यः सद्र तथा वञुगण 
उस स्यानप्रर गये ॥ १११२ ॥ 


नारायणश्च पुतेण सात्यकेन च भारत। 

सष्टोवास गिरौ रम्ये पारियात्रे प्रहृष्टवत्‌ ॥ १२३॥ 
मारत { इधर पुत्र प्रद्युम्न तथा भाई सात्यक्रिकि छाय 

भगवान्‌ श्रीकृष्ण उत राततम सुरम्य्र गिरि पारियाच्रपर बडे 

दर्षके साथ रदे ॥ १३॥ 

यद्‌ ख शाणप्रमाणोऽस्य भक्ट्या समभवन्नृप । 

चरं प्रादात्‌ ततस्तस्य पर्व॑तस्य मष्ादयुतिः ॥ १४॥ 
मेरेदवर † वह पर्वत भगवानकते प्रति भक्तिमावसे नघ्न 

होजो शाण (उडद या खनके बीजी रारि ) के बरावर 

ष्टो गया था, हमे उस पर्व॑तपर्‌ प्रन हौ मदातेनखी श्री- 

कष्णमे उछ पर्वतक्रो यह वर दिया--) १४॥ 


ह्ाणवाद्‌ इति ख्यातो भरिष्यति महारिरे । 
पुण्येना्दधेन तस्यो हि पुण्यो हिमवतः छ्युभः ॥ १५॥ 
"महागिरे ! ठम श्राणपादके नामसे विख्यात दोभगे । 
नैते द्िमाख्य पवैतके ऊपरी आधा भाग परम पवि शेता दैः 
उखीके समान त॒म मी छम एवं पवित्र चने रोगे 1 १५1 


पवमेव च भूयिष्ठो भव परवैतखचम। 

मेरुणा स्पर्धमानो दि वहुचिरुगैययुतः। 

रमे त्वां पद्दयमानोऽहं वडुचिज्ननगायुतम्‌ ॥ १६॥ 
पर्वतश | दम इमो प्रकार वरहुसंख्यकर विचित्र मृगि 

युक्त हो मेसके साथ स्पा रखते दए ब्रहुत बडे दो जाओ । 

ठम्हं अनेक विचित्र इति सम्पन्न देखकर मे आनन्दमग्न 

हो जाता हूः ॥ १६॥ 

वथा दुखा वरं तस्य पर्व॑तस्य तु केरावः। 

द्यौ गङ्गां सरिष्े्ठा नमस्कृत्वा वूषभ्वजम्‌ ॥ १७॥ 


ख प्रकार उख पर्वतो वर देकर मगवान्‌ श्रीकृष्ण 
ने मदादेवजीको नमस्कार करफे सरितार्यमिं शरे गङ्खाजीका 
चिन्तन किया ॥ १७ ॥ 
भथाययौ विच्णुपदी स्मरता रष्णेन भारत । ¦ 
सम्पूज्य तां ततः कृष्णः रत्वा लानमधोक्षजः ॥१८॥ 

भारत ! श्रीकृष्णे स्मरण करनेपर विष्णुपदी गङ्गा वर्ह 
आ गर्यीं । अधोक्षज श्रीदूण्णने उनकी पूना करके उनके 
जलसे स्नान किया ॥ १८ ॥ 
उदकं च गृहायाथ विल्वं च हरिरव्ययः 
देवमाया्टयामास सद्र सर्वण्वरेश्वरम्‌ ॥ १९ ॥ 

फिर अविनाशी श्रीदरिने गद्भाजठ ओर वेका एल 
लेकर उसीपर सर्वेश्वरेश्वर रुद्रदेवका आवाहन क्या ॥ १९॥ 
तवः प्राक्षो मदप्रैवः सोमः सप्रवये विभुः। 
तस्थादुपरि विल्वस्य वथा गङ्गोदकस्य च ॥ २०॥ 
तम्र पार्वतीषदित भगवान्‌ मदादेव प्रमथगर्णोके साय 
वर्ह आये जर गङ्गाजख तया त्रेरके ऊपर खडे दो गये ॥२०॥ 
तं पारिजात्कञुमैरचंयामास केदावः 
ताव धाग्भिरीेद्ं सर्वकतौरस्मीश्वस्म्‌ ॥ २१॥ 
तव श्रीकृण्णने उनका पारिजातक शर्लद्वारा पूजन किया 
ओर सव्र कर्ता दश्वरेश्वर भगवान्‌ शिवकर वाणीद्राय स्तवन 
किया ॥ २१॥ 
ग्रीरष्ण उवार 
श्द्रो देव त्वं सुदनाद्‌ रावणाश्च 
सेरूयमाणो द्वावणाश्चातिदेवः। 
भक्तं भक्तानां वत्सरं वत्सलानां 
कीत्यौ युङ्क्वेशषा् प्रपये शरण्यम्‌ ॥ २९ ॥ 
ीरृप्ण योके-देव ! भाप टी रोदन (येना); रवण 
८ ख्टाना )› अतिशय शयः तथा जन्म-मरणरूप संषारका 
द्रवण ( निवारण >) करनेके कारण ध्टद्रः कदे गये । 
आप्र सव्र देवताअेसि व्रदृकर दै} ईज { मै आपके भक्तौका 
मक्त तथा स्नेदिरयोका स्नेदी हू, आप मुद्धे विजय-कीतिका 
मामी व्रनाद्ये 1 यै आज आप शरणागतवत्सल प्रसुकी शरण 
कतार्रं ॥ २२॥ 
प्रास्थारण्यानां त्वं पतिस्त्वं पद्यूनां 
ख्यातो देवः पद्युपतिः सर्वकम 1 
नान्यस्त्वत्तः परमो देवदेव 
जगत्पतिः सखुरवीयरिहन्ता ॥ २२॥ 
देवदेव ! आप दी म्रामीण ओर वन्य पश्ुर्थो ( जीरको ) 
के पति ( पालक ) द; इसीलिये आप भगवान्‌ पद्युपतिके 
रूपमे विख्यात ई । यदह सारा जगत्‌ आपकर द्यी कम॑दे। 


विष्णुपर्व } 


चतुःसप्ततितमोऽध्यायः 


५६३ 


अपिते वट्कर दूसरा कोई नदीं द । आप ही जगदीश्वर 
तथा देववीरेके शवुर्ओोका हनन करनेवले द ॥ २३ ॥ 
यस्मादीसि मदहतामीण्वराणां 
भवानायः पीतिदः प्राणदश्च । 
तस्माद्धि त्वामीदवरं प्राहुरीरं 
संतो विद्धाः सर्वैश्ाखराथंतजञ्क्षाः ॥ २७ ॥ 
आप बदे-बडे ईश्वर्कोटिके पुरर्षेकि मी ईश्वर दै। 
आप ही आदिपुरुष, प्ीतिदाता तथा प्राणदाता $ 
ईसील्यि सम्पूणं शाघ्रोके अथंतत्वको जाननेवाले विद्वान्‌ 
सधुपुखष्‌ आपको ही ईश्वर तथा ईश कदते द ॥ २४॥ 
श्रुतं यस्माज्ञगदत्यन्त धीर 
त्वत्तोऽव्यक्तादश्चसदश्रेश । 
तस्मात्‌ त्वामाटुर्भव इत्येव भूतं 
स्वेदवराणां मद्तामप्युद्धारम्‌ ॥ २५॥ 
अव्युन्त ] धीरं ! अक्षरेश्वैर ! अतः आप अव्यक्त 
अविनाशी परमेश्वरसे ही जगत्‌ उत्यन्न हुजा है, अतः विद्वान्‌ 
पुरुष आपको (मव? कहते है । ासतक्मै तो आप भूतः 
( नित्यसिद्ध ) द । महान्‌ स्रशवरोकि ल्यि भी अत्यन्त उदार 
द (फिर दीन-दुखियेके स्यि तो वात दी स्याद १) २५॥ 
यस्माज्ञितैरभिषिकोऽसि सवै- 


, दैवासुरः सर्वभूतैश्च देव । 
महेश्वरं विश्वक्मीणमाहु- 


स्त्वां वै स्वँ तेन देवातिदेवम्‌ ॥ २६॥ 
देव ! अतः पराजित हुए समस देवताओं असुरो 
तथा सम्पूर्णं प्राणिरयोनि आपका “महान्‌ ईश्वरः के पदर 
अमिषैक किया है; अतः सभी विद्वान्‌ आप विश्वनिर्माता 
भगवानूक्तो "महेश्वरः तथा ष्देवातिदेवः ( देवता्थेखि अदट्कर 
महादेव ) कते दै । २६ ॥ 
पूज्यो देवैः पूज्यसे नित्यदा वै 
काण्वच्दरेयःकाद्धिभिर्वरदामेयवीयं । 
तस्माद्‌ विख्यातो भगवान देवदेवः 
सतामिषएटः सवभूतारमभदी ॥ २७ ॥ 
अमेय बरछ-पराक्रमतसे सम्पन्न वरदायक महेश्वर } अतः 
सदा कस्याणःपरा्िकी इच्छा रखनेषाले देवता आप पूजनीय 
परमेशवरकी निस्य पूजा करते दै; अतः आप भ्मगवान्‌ देवदेवः 
( देवता्ओंके मी देवता ) के रूपमे वियात है । सत्पुरषोकि 
इष्टदेव आप दी ह | आप समस्त भूतौको अपने मतर्‌ दी 
उन्पनन करनेवाटे ह ॥ २७ ॥ 


६. अन्न अथान्‌ मृष्युको खयनेवाठे । २. 
२. भक्र्र--अविनारी जीवेकि इश्वर । 


बुद्धिके भ्ररक। 


भम० इ० ९७ ~~ 


भूमित्नरयाणां देव यस्मात्‌ प्रतिष्ठा 
पुनखोकानां भावनामेयकीतिः 
ञयम्बकेति प्रथमं तेन नाम 
तवाप्रमेय शिद्शेश्चनाथ ॥ २८ ॥ 
व्रह्मा आदि देवेश्वररौके भी खामी अप्रमेयखसू्म देव | 
बारंबार लोरकोको उन्न करनेवाले लोकभावन } अतः अप 
भूलोकः सुवरछौक ओर खर्यक--इन तीनों लोर्कोकी 
भूमियोकि आश्रय ईँ, अतः आपका प्रथम (प्रमुख ) नास 
व्थग्बक ( बिोकीके आश्रय है, आपकी कीतिं अमेयदै।२८। 
श्वः राध्रूणां शासनादप्मेय- 
स्तथा भूयः दासनाच्चेश्वरेण । 
सर्वन्यापित्वाच्छद्ुरत्वाश्च सद्धिः 
शाब्दस्येश्लानः ्रीकराकग्यतेजाः ॥ २९॥ 
अपि संहारकारी दोनेके कारण शवं कलते है, खमस 
शचुर्भोका शाखन करनेके कारण अप्रमेय राक्तिसे सम्पन्न दै; 
फिर ईश्वररूपे समस जगत्‌का शासन करनेके कारण भी 
आप अप्रमेय है, सर्वव्यापी तथा सत्पुरुपकि व्यि कस्याणकारी 
होनेसे भी आपको अप्रमेय कहा गया दे, श्री ( र्ष्मी ) की 
भ्रा्ि करनेवारे परमेश्वर ! आप सम्पूणं शर्ब्दे मी ईश्वर 
हँ अर्थात्‌ समस्त शब्दोदयारा अपका दी प्रतिपादन होता है । 
आपका उत्तम तेज सूर्थसे भी वदकर दे ॥ २९ ॥ 


संसक्तानां नित्यदा यत्‌ करोषि 
शमं ्रातन्यान्‌ ययनेषीः समस्तान्‌ 1 
तस्माद्‌ देवः शाङ्रोऽस्यभरमेयः 
सद्धिद्धमकञेः कथ्यसे सर्वनाथः ॥ २० ॥ 
आप मक्तजनोंको जो सदा सुख ओर शान्ति प्रदान 
करते हैँ तथा शत्रुभाव रखनेवाठे समस असुरको जो दण्ड 
देते हैः उसके कारण माप अप्रमेय राक्तिसे सम्पन्न कल्याणकारी 


देवता शङ्कर केदे जाते रै । धर्मज्ञ संत आपको सर्वनाथ 
( सत्रके खामी या संरक्षक ) कहते है ॥ ३० ॥ 


दत्तः धरदारः छुकलिदोन पूर्य 
तवेशान सुरराशातिवी्यं 
कण्ठे नस्यं तेन ते यत्‌ प्रवृत्तं 
तस्मात्‌ ख्यातस्त्वं नीरकण्ठेति कट्पः॥३९॥ 
अघ्यन्त पराक्रमी ईशान ! पृदकाख्मै देवराज इन्द्रने 
आपके कण्ठमे जो वञ्रते प्रहार किया था ओर उससे जो वर्ह 
नीक चिह वन गया थाः उसके कारण आप नीर्कण्ठ 
नामस विख्यात हुए. । आप समर्थं हते हुए भी दयाव देखे 
अपराध सह लेते रे॥३१॥ 
यलिङ्नाङ्कं यचच लोके भाङ्ग 
स्न सोम त्वं स्याधरं जङ्धमं च । 


प्राटुरविभ्रास्त्वां युणिनं तत्वविक्षा- 
स्तथा ध्येयामम्बिकां खोकधाचीम्‌ ॥ २२॥ 
उमासदित मदेश्वर ! अनतः संसारम सव्र कुद छिदः ओर 
भगकरे चिते ही अदित दैः अतः यद मसत चराचर 
जगत्‌ आप दोर्नेकरा ही खरूप है । तस्वन बराह्मण आपक्रो 
गुणवान्‌ ओर प्येयखरूपा लोकजननी अम्निकाको 
त्रिरुणरूपा कदते ई ॥ ३२॥ 
वेदैर्गति सा हि तत्‌ त्वं भरसूता 
यज्ञो दक्षाणां योगिनां चतिरूपः। 
नात्यद्भुतं त्वत्समं देव भूतं 
भूतं भव्यं भवदेवाथ नास्ति ॥ ३२ ॥ 
वे अभ्िक्रा ही वेदिं अजाः ( माया ) नामसे वर्णित 
हैः वे दी मदत्तरवकी जननी द | आप यज्ञकी दीक्षा ठेनेवटि 
यजमानेकरि द्रव्ययक्न तथा योगि्येकि योगयश द । लीक्रिक 
रूपसे ऊपर उठे हुए दिव्य चिन्मय विग्रहधारी ई | देव | 
आपके खमान अव्यन्त अद्भुत भूत ( त्ख ) भूतः वर्तमान 
ओर मविप्य कालम भी दृूखस कोई नदीं दै ॥ ३३ ॥ 
अद बह्मा कपिलो योऽप्यनन्तः 
पुताः सव ब्रह्मणश्चातिवीरः। 
त्वत्तः स्वं देवदेव पसूता 
पवं सवशः कारणात्मा स्वमीड्यः ॥३४॥ 
देवदेव ! म, बर्मा कपिल शेषनागं ओर आन्तरि 
शनुओौपर विजय पानेके कारण अव्यन्त बीर ( सनक आदि) 
समी बहमपुच्र--ये सव्र-के-सव्र आपसे दी उन्न हुए द । 
इसं प्रकार आप सवके दशर ओर कारणरूप दोनेकरे कारण 
स्ततिके योग्य ई ॥ ३४ ॥ 
इति संस्तूयमानस्तु भगवान्‌ गोचरपध्वजः। 
प्रसार्य ॑दक्षिणं हस्तं नारायणमथात्रचीत्‌॥ २५॥ 
इस प्रकार श्रीकृप्णने जवर स्तुति कीः तव॒ भगवान्‌ 
प्रमध्वज यिवने अपना दादिना दाय फैत्यकर भगवान्‌ 
नारायणदेवसे इस प्रकार कदा--। ३५ ॥ 


मनीपितानामथीनां प्रापिस्ते सुरसत्तम । 

पारिजातं च ्तौसि भा भूव्‌ते मनसो व्यथा ॥ ३६॥ 
पसुरश्ेष्ठ ¡ ठम्टं अभीष्ट मनोर्थोकी प्राप्ति होगी । ठम 

पारिजातको अवश्य ठे जाओगे | इस्कै च्थि तुम्हरे मर्म 

व्यथा नदीं होनी चादि ॥ ३६ ॥ 

यथा वेनाकमाधिव्य तपस्त्वमकयोः प्रभो । 

तथा मम वरं कृष्ण संस्मत्य स्थेर्यमाप्युदि ॥ २७ ॥ 
प्रमो ! श्रीकृष्ण ! जैसे मैनाकका आश्य लेकर तमने 

त्प किया; उसी तरह मेरी ओरखे वमद वर भी मिल । उस्र 

वरको याद्‌ करके रम सिरता ( वरैरय॑ ) धारण करे ॥ ३७॥ 


श्रीपद्टाभारते खिखभागे 


------~~-~ 


[ हस्वे 


पाक 


यवध्यर्त्वम्रजेवश्च मत्तः शरतरस्तथा । 
भवितासीत्यवोचं थत्‌ तत्‌ तथा न तदन्यथा ! ३८॥ 
निजो ठ॒मते क्या था करि तुम अवध्यः अजेव तथा 
मुपे भी वदृकर शूरवीर दोओगे, वद व्रात उरी रूपम 
सत्य होगी | उसे कर्द अन्यथा नदीं कर खता ॥ ३८ ॥ 
यश्य स्तवेन मां भक्त्या स्तोप्यतेऽमर्सत्तम । 
त्यया तेन धर्मश्ष धवर्मभाक्‌ सम्भविष्यति । 
समरे च जगं विष्णो पराप्य पूजां तथोत्तमाम्‌ ॥ २९ ॥ 
भ्धमज्ञ | अमरश्रे्ठ ! विष्णो | जो भक्तिभावे तग्दारि 
द्वाराकी हुई दष स्तुतिके द्वारा मेया स्तवन करेगा; वदं 
समरभूमिमे विजय तथा उत्तम "सम्मान पक्र धर्मक 
भागी होगा ॥ ३९॥ 
विस्वोदकेश्वरो नाम भवितादमिदानघ। 
देवेश्वर त्वयास्थापि देव सिद्धोपयाचनः ॥ ४०॥ 
'अनघ | देवेश्वर ! देव | तमने जो मेरी य्ह स्थापना 
की दै, उसके अनुसार म व्रिस्वोदकेश्वर नामते विख्यात 
दयजगा । यदो की हुई याचना मेरे दवारा अद्य सफल दोगी।४०। 
ददस्थोपोपितो विद्धान्‌ भक्तिमान्‌ मम केदाव । 
त्रियवमीन्सित्टिकान्‌ गमिष्यति जनादन ॥ ४१॥ 
(केशव ! जनार्दन | जो विदान्‌ पु य्ह उपवास्पर्वक 
रदकर भुम भक्तिभाव रखते हुए तीन रात उपवाख करेगा; 
मनोवाञ्छित लोकमि जावगा ॥ ४१ ॥ 
अविन्ध्या नाम देशने ऽसिन्‌ गह्धा चव भविष्यति । 
गङ्गास्नानसरमं सानं मन्तो भविता तथा ॥ ४२॥ 
"दस प्रदेन्रमे अविन्ध्या नामस प्रविद्ध गञ्जा प्रवादित 
होगी । उसमे गद्धासम्बन्धी मन्तोचारणपूर्वक क्वा हुआ 
स्नान सक्षात्‌ ग्धा-स्नानके समान फख्दायक होगा ४२ 
पट्‌ पुर नाम नगरं दानवानां जनार्दन । 
अचरान्तद्धैरण्िशे पराक्रम्य महावलः ॥ ४३॥ 
“जनार्दन ! ययो धरतीके भीतर धानर्वोका श्वट्‌पुरः 
नामक नगर दैः जदो पराक्रमपूर्वक मदाव्ली दानव 
निवास करते दै ॥ ५३ ॥ 
पते दैत्या दुरात्मानो जगतो देव कण्टकाः । 
खन्ना वसन्ति गोविन्द्‌ सानावस्य महागिरेः ॥ ४४॥ 
देव ! ये दुरात्मा दैत्य जगत्करे ल्य कण्टकरूप ई । 
गोविन्द ये इख महापर्वत दिखरपर छिपे रदते दै ॥ ४४॥ 
अवध्या - देवदेवानां वरेण बह्मणोऽनघ । 
माद्धुपान्तरितस्तस्मात्‌ त्वमेताञ्जहि केच्छव ॥ ४५ ॥ 
(अनघ ! व्रह्माजीके दिवे हुए वरे प्रभावसे ये दैत्य 
देवदेर्वोके व्यि अवध्य है; अतः केशव ! तुम मानव-शरीरकी 
आद लेकर इन षव दैरत्योको मार रगग्ये' ॥ ४५॥ 


विष्णुपर्व ] 


पञ्चसप्ततितमो ऽध्यायः 


५१५ 


------------------------------ ~= 


पवसुक्त्वा महदेचस्तभेवान्तरधीयत । 

परिष्वज्य ` महात्मानं बासुदेव जनाधिप ॥ ७६॥ 
जनेश्वर ! रेसा ककर महादेवजी महात्मा वासुदेवको 

दयसे र्गाकर वहीं अन्तर्पान हौ गये ॥ ४६ ॥ 

ततो यते महरेवे प्रभातायां नराधिप । 

तस्यां निहायां गोचिन्दो भूयः पवंतमनवीच्‌ ॥ ४७॥ 
नरेधर ! महादेवजीके चके जानेपर जय रात बीती ओर 

प्रभाततकाल आया; तथ भगवान्‌ गोविन्दने पुनः उस 

पर्वतसे का--॥ ४७ ॥ 

तवाधः पर्वतश्रेष्ठ निवसन्ति महासुराः । 

अवध्या देवदेवानां वरेण ब्रह्मणः पुरा ५४८ ॥ 
“पर्वतश्रेष्ठ | ठग्दरे नीचे बड़े-बड़े असुर निवास करते 

है, ओ पूर्वकम ब्रह्माजीका वर पानके कारण देवाधिदेवेकि 

ल्यि मी अवध्य द ॥ ५८ ॥ 

निर्गमिप्यन्ति ते नेव मया रुद्धा मरावखाः। 

ह्वरे निरुद्धे तत्रैव विनङ्क्ष्यन्ति ममाक्षया ॥ ४९ ॥ 
पने उन महावर दैर्योका दष वंद करके उन्हे अवसद 

करदियादहै) अव वे नहीं निकर सकेगे | मेरी आज्ञासे, दार 

अवसद्ध हो जनिपर वहीं नष्ट हो जर्येगे ॥ ४९ ॥ 

त्वयि संनिहितश्चादं भविष्यामि महागिरे! 

अधिष्ठाय महाघोरान्‌ निवत्स्यामि च पर्वत ॥ ५० ॥ 


"महागिरे ! मै सदा तुमपर निवास करगा । परवत 
उन महामयानक्र असुरेको दबाकर मै यीं रहुगा ॥ ५० ॥ 
आस्य मूध्नि मद्रूपं दृष्ट पवेतस्तच्तम 1 
गोसहखप्रदानस्य फटं प्राप्ति हएश्वतम्‌ ॥ ५९॥ 

रवतप्रवर ¡ जो इख पर्वतके शिखरपर आरूढ दो मेरे 
अर्चाविग्रहका दर्शन करेगा, वह सदख गोदानका श्वत 
( अक्षय ) फट प्राप्त करेगा ॥ ५१ ॥ 
त्वत्तो ऽदमभिश्च प्रतिम कारयित्वा हि भक्तितः। 
युश्रूषयन्ति ये नित्यं मम यास्यन्ति ते गतिम्‌ ॥ ५२॥ 

ध्जो लेग ठुण्हर प्रसरे मेरी प्रतिमा वनवाकर्‌ प्रति- 
दिन म्तिपूर्वक उसकी सेवा करगे, वे मेरी गतिक प्रात हगे,५२ . 
इति तं पवैतं रृष्णो वसर्दोऽनुग्रदीतवान्‌। 
तदापरश्रति देवेशस्तञ्न संनिहितोऽच्युतः ॥ ५३॥ 

इस प्रकार वरदायक श्रकष्णने उस पर्वतपर अनुग्रह 
किया ओर तभीचे देवेश्वर अच्युत वरहा निवास करने से ॥ 
पाषाणैः प्रतिमां तात कारयित्वा च कौरव । 
शुश्रुषन्ति छृतात्मानो विष्णुलोकाभिकाद्धिणः ॥५७॥ 

तात कुरुनन्दन ! छद अन्तःकरणवाटे पुरुष विष्णु- 
लोककी इच्छा रखते हए पारियात्रके पस्थरोसे भगवान्की 
प्रतिमा बनवाकर सदा उसकी सेवा करते ह । ५४ ॥ 


इति श्रीमहाभारते खिरुभागे दरिवंे विष्णुपर्वणि पारिजातहरणे श्रीङृष्णक्रतशिवस्तुतिनौम "चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७४ ॥ 


इस प्रकार श्रीमहाभारते सिरूमाग हरिव शके अन्तमैत विष्णु पतरमे पारिजतदरण्के प्रस्घमे श्रीदष्णकृत 
दिवस्तुतिविषयक चौह्तसेः अध्याय पुरा हुभा ॥ ७४ ॥ „` 


पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः 
इन्द्र॒ ओर उपेनदरका पुनयुद्र, उत्पातो फा प्राकय्य, बह्माजीकी आनज्ञासे क्यप ओर अदितिका वीच 
आकर दोरनोका युद्ध वंद कराना, फिर सवका खर्गमे गमन, अदितिकी आज्ञासे शचीदारा 
उपार पाकर पारिजातप्षहित दारकागमनः, पारिजातसे ारकावासिर्योकी प्रसन्नता, 
सत्यभामाके पुण्यक तरतमे प्रतिग्रहके सिये श्रीकृष्णद्वारा नारदजीका सरण 


वैशम्पायन उवाच 

ततो रथवरं रप्णः समारुह्य महामनाः । 
विरोदकेश्वरं देवं नमस्कृत्य ययौ चप ॥ १ ॥ 

वैशस्पायनज्ञी कहते है- नरेदवर ! तदनन्तर महा- 
मनस्वी श्रीकप्ण 'व्िल्वोदकेश्वरदेवको नमस्कार करके अपने 
रेष्ठ रथपर आरूढ हो युद्धके ल्थि चठे ॥ १॥ 
मदेनदरमाहयामास स्थस्य मशुसूदनः । 
सत्छतं पुष्कराभ्यादे सवर्देवगणेः सह ॥ २ ॥ 

रथपर्‌ बेठे हुए मधुसूदने पुष्करे निकट समसत देव- 


गणेकि साय सत्कारपूर्वक खड़े हुए देवराज इन्द्रका युद्धके 

ल्यि आन किया ॥ २॥ 

ततः शक्रो जयन्तोऽथ दरिभिरयक्तसुत्तमम्‌ । 

आरुरोह रथं देवः सर्वेकामपदः सताम्‌ ॥ २ ॥ 
तवर साधुर्ओको समसन मनोवाञ्छित वस्तु प्रदान करन 

वे देवेन्द्र घोडोसे जते हए. उत्तम रथपर जयन्तसहित 

आरूढ हुए ॥ ३॥ 

ततो १ रथस्थयोुंद्धमभवत्‌ कुरुनन्दन । 

देवयोर्दैवयोगेन पारिजातङ्ृते तदा ॥ ४ ॥ 


५५१६ 


कुरुनन्दन ! तदयश्वात्‌ रथपर वे हुए उन दोनों 
देवताओंका दैववश पारिजातक स्थि युद्ध आरम्भ हो गया ॥ 
ततोऽहनद्‌ रणे विष्णु्वौणेः राघ्रुवलारदैनः। 
सेन्यानि देवराजस्य वाणजाकैरजिह्यगेः ॥ ५ ॥ 

उस रणभूमि्मे गघरुसेनाक्रो पीडित करनेवाठे श्रीक्रप्णने 
अपने सीधे जानेवाटे वाणसमूहे दारा देवराज इनदर मैनिर्कोका 
संहार आरम्भ क्रिया ॥ ५॥ 


द्रः न महेन्द्रोऽथ नेव विष्णुः सुरेश्वरम्‌ । 
ताडयाम।सतु्ींरो शसः शक्तावपि प्रभो ॥ ६ ॥ 

प्रभो! वे दोनों वीर शक्तिराखी थे तौ भी महेन्रने 
उपेनद्रपर ओर उवेन्र विप्णुने देवेश्वर इन्दरपर गा्घद्वास प्रहार 
नदी करिया] ६] 


पकैकमदवं दराभिर्महेन्द्रस्य  जनादंनः। 

विव्याध विदिखैस्तीक्षणेरखयुक्तैर्जनेश्वर ॥ ७ ॥ 
जनेव्वर } जनादनने महेन्द्रे एक-एक अद्रवको 

दिव्यास्द्वाया अभिमन्वित दस-दस तीखे बार्णोसे घायल 

कर दिया | ७ ॥ 

शेव्याद्यानपिं देवेन्द्रः शरेरमर्सन्तमः। 

छादयामास राजेन्द्र॒ धोरैरखाभिमम्धितैः ॥ ८ ॥ 
राजेन्द्र ¡ अमरधरष देवेन्द्रने भी दिव्याख्रोद्यारा अभि- 

मन्नित भयंकर बाणो श्रीकृप्णके यव्य आदि चारो धोर्दको 

आच्छादित कर दिया॥ ८॥ 

स च वाणसष्टखैश्च कृष्णो गजमवाकिर त्‌ । 

गरुडं च महातेजा वलभिद्धसिवा्नम्‌ ॥ ९ ॥ 
श्रीकृष्णने इन्द्रके एेरावत हाथीपर सदसो याण रसय 

तथा महागेजस्वी व्रर्विनाशन इन्दरने श्रीहरिके वाहन गरुड़पर 

हजारे बार्णोकी वर्षाकी।॥९॥ 

भुयिष्ठाभ्यां रथाभ्यां तौ तदहः श्रुदारणौ । 

युयुधाते महात्मानौ नारायणस्ुराधिपौ ॥ १०॥ 
दातुओंको विदीर्ण करनेत्रले महात्मा नारावरण ओर 

देवेन्द्र उस दिन वडे-वडे रथोद्रारा युद्ध करर्टे ये ॥ १० ॥ 

चकम्पे वसुधा छृत्स्ना नोर्जकस्येव भारत । 

दिश्शां दाहेन दिग्देश्षाः संघताश्च समन्ततः ॥ ११] 
भारत | उस समय जकर ठहरी हुई नौकाकी मेति सारी 

पृथ्वी कपिने खगी । दिना्ओके प्रदेय सव ओरते दिग्दाह- 

जनित आगकी च्परोसि व्याप्त दिखागरी देते थे ॥ ११॥ 

चेदुभिंरिवरश्चैव पेतुश्च छात्रो द्रुमाः 

चेवुश्च धरणीपृष्ठे मर्या घर्म॑युणान्विताः ॥ १२॥ 
वङ्-वडे पर्वन दिल गये । सैकड़ों दश्च गिर गये ओर 

धर्मासि मनुष्य मी धरा्ायी होने ल्मे ॥ १२॥ 


श्रीमदाभारते खिलभागे 


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[ हस्वे 


निधौताः शतद्यद्वेव पेतुस्तच नराधिप । 
ऊश्च सरितः सवः प्रतिस्मोतो विद्लास्पते ॥ १३॥ 
श्वर ¡ यट ककड बार वञ्नपात हुखा तथा प्रना- 
नाथ [ समस्त सरितार्ये अपने प्रवाह प्रतिकूल उल्टी दिगा्भ 
वहने लगीं ॥ १३॥ 
विष्वग्बाता बदुश्चेव पेतुरद्काश्च निष्परभाः। 
मुहसहरभुतसंघा रथनदेन मोदिताः ॥ १४॥ 
चरो ओर धी चलने टमी, प्रभाग्रूल्य उल्का गिरने 
त्रीं ओर प्राणियेकरि समुदाय र्थी धर्भराद्रसे वारंवार 
मोदित होने खे ॥ १४॥ 
भ्रजज्वाड जसे सैव वहिर्जनपदेश्वर । 
युयुधुश्च प्रदैः सद्धं श्रहा नभसि सर्वतः ॥ १५॥ 
जनपदेद्वर  पानीरम भी आग जलने टगी । थकारे 
सव्र ओर ग्रह दूसरे रदे साय युद्ध के लगे ॥ १५॥ 
ज्योर्तीपि शतशः पेतुः खर्गाच धरणीतले । 
दिद्यां गजाः भ्रङ्कपिता नागाश्च धर्णीतटे ॥ १६॥ 
सेक तरे टकर स्वगसे प्रध्वीयर गिर पदे । दिग्गज 
ओर पाताटनिवासी नाग अत्यन्त कुपित हो उठे ॥ १६ ॥ 
गर्बभारणसंस्थानेदिछन्नाथरैश्चावृतं नभः। 
विनदद्धिर्महारवैरुल्काशोणितवर्पिभिः ॥ १७॥ 
गदर्हौकी भोति धूसर ओर अरण वर्णवाठे बादुटौके 
कदे बडे जोर-जोरसे गर्यना करते हए आकाशम छा गये 
ओर उच्कापात तथा रक्तकी वर्मा कसे लगे ॥ १७॥ 
न भूर्न दोन गगनं नरेन्द्रवपभाभवन्‌ । 
खस्थानि सुरवीरो तु दष्टा युद्धगतौ तद्‌ ॥ १८॥ 
मरेन््रगिरोमणे † उस समय उन दोनों देववीेको 
युद्धम उपलित हुमा देख भूमि, अन्तरि तथा आकायाके 
प्राणी खस न रह स्फ ॥ १८ ॥ 
जेपुरसुनिगणा मन्त्ाञ्चगतो दितकाम्यया। 
ब्राह्मणाश्च महात्मानो ्यतिष्ठंस्तेयु सत्वराः ॥ १९॥ 
मुनिगण जगत्‌ दितकी कामनसि मरना जय कसे 
त्म ओर महात्मा व्राह्मण भी व्री उनावरीकरे साय उन्दी 
मन्त्रके जपे संख्न दो गये 1 १९॥ । 
ततो ब्रह्मा महातेजाः कर्यपं वाक्यमघ्वीत्‌ । 
गच्छ वध्वा सदादित्या पुरौ वारय चत ॥ २०॥ 
तवर मदतिजष्यी जद्याने कदयपसे कदा--पसुत्रत ! तुम ` 
वहू अदिति साथ जाओ ओर दोनो पूर्ोको मना करोः ॥ 
स तथेति तदा देवमुक्त्वा पद्चभवं सुनिः। 
जगाम रथमास्थाय तस्थौ नरवसान्तिके ॥ २१॥ 


. विष्णुपवे | 


पञ्चसप्ततितमो ऽध्यायः 


५१७ 


„ -------------------------------------------------------(न 


नरणरष्ठ ! तत्र अक्चाजीसे व्वहुत अच्छः कहकर मुनिवर 
क्यप रथप्र वैव्कर गये ओर दोन पुरक निकट खड़े 
हो गये॥२१९॥ 
स्थितं तु कडयपं दष्ट सद्ादित्या तदन्ता 1 
उभौ र्थाभ्यां धरणीमवती्मौ महावलौ ॥ ८२॥ 
ब्रीचमे अदितिसदहित कदयपको खड़ा हज देख बे दोनों 
मह्री वीर रथि प्रथ्वीपर उतर गये ॥ २२॥ 
न्यस्तश्ौ च तौ कचीरौ ववन्दतुररिदिमौ ।. 
पितरौ धमतच्वक् . सर्वभूतदिते रतौ ॥ २३ ॥ 
शतरुओंका दमन कसनेवलि उन दोनों वीरयँने हमियार 
नीचे डालकर समस्त भूते दितमे तलयर रमेवाले धर्मत्वे 
ज्ञाता माता-पिताको प्रणाम किया || २२३॥ 
उभौ गृहीत्वा हस्ताभ्यामदितिस्त्व्रवीद्‌ वचः । 
असोदसाविवैवं किमन्योन्यं ईन्तुमिच्छतः ॥ २७॥ 
उस समय अदितिने दोनोको हात पकड़कर कदा-- 
नजो एक माताकी कोखसे वेदान हु ह, पेते दो व्यक्तिरयोकी 
भति ठम दोनो एक-दूसरेको मारेकी इच्छा क्यो कसते हो १ 
ˆ स्वल्पमथं पुरस्कृत्य धदृत्तमतिदारुणम्‌ । 
सदशं नेति पदयामि सवेथा मम पुरयोः ॥ २५ ॥ 
षछठोरी-सी वस्तुको सामने रखकर यह अत्यन्त दारुण 
कर्म आरम्भ हो गया । मे स्र प्रकारसे विचार कर देखती 
रं तो यह काम मुञ्चे अपने पुकि योग्य नदीं दिखायी देता ॥ 
श्रोतव्यं यदि मातुश्च पितुश्चैव प्रजापतेः । ` 
न्यस्तराख्ौ स्थितौ भूत्वा कुरुतं वचनं मस ॥ २६॥ 
ध्यदि तुम दोनेकि माताकी बात सुननी है ओर अपने 
" पिता ग्रनापतिकी आ्ञाक्रा पाटन करना है तो ठम दोनें नीचे 
हथियार डाच्कर सामने खड़े हो जाओ ओर मैजोकरहः 
उसे मानोः ॥ २६ ॥ 
कथेत्युक्त्वा च ती देवौ स्नातुकामौ महाव । 
ग्धा जम्मतुरेवाथ प्रजटपन्तौ परस्परम्‌ ॥ २७ ॥ 
तव व्वहुत अच्छाः कहकर दोनो मदावखी देवता स्नान- 
. की इच्छात परस्पर व्रात करते हुए सङ्गातटपर गभे ॥ २७ ॥ 
य्क्र उवाच 
वं प्रमुलंकरूत्‌ छृरस्नराग्ये ऽहं स्थापितस्त्वया। 
स्थापयित्वा कथं नाम पुनमौमवमन्यसे ॥२८॥ 
इन्द्रने कदा-- श्रीकृष्ण ! तुम समस संसारी खट" 
करनेवले प्रयु दो ! तुमने दी सारी तरिलोकीके राज्यपर मुञ्च 
स्थापित क्रिया है । -खापित करफे फिर किंसल्यि मेरा 
अपमन करते दो १ ॥ २८ ॥ 
आरातत्वमुपगम्येव ग्येषटत्वं 
कथं कमरूपराक्ष निचीणं 


चप्यपोद्य च । 
कतुमिच्छसि ॥ २९.॥ 


कमलनयन ! तुम मेरे भाई होकर भी मेरी च्यष्ठताकरो 
दूर हटाकर उसका कु भी खयाल न करके कैसे मेरे जीवन- 
दीपको सदाकरे लि बुन्चा देना चाहते दो १ ॥ २९॥ 


स्नातौ तु जाह्वीतोये पुनरभ्यागतौ दप । 
यादितिः कदयपश्य महात्मानो दढनतौ ॥ ३० ॥ 
-नरे्वर ! गज्धाजीके जलम नदाकर दृट्तापूवंक उत्तम 
न्तका पालन कसेवाठे वे दोनो मदाग्मा श्रीकृष्ण ओर इन्द्र 
जरस क्यप ओर अदिति चियमान ये वर्ह पुनः आं पहुचे ॥ 
प्रियसंगमनं नाम तं देशं सुनयोऽवदन्‌ । 
यत्र तौ संगतौ चोभौ पितभ्यां कमलेक्षण ॥३१॥ 
भुनिलोग उस स्थानक्रा नाम प्रियशङ्घमन तलति दैः 
जहो वे दोनो कमललोचन बन्धं माता-पितसि मिठे थे ॥३१॥ 
ततः शक्रस्य कौरव्य दस्रा वाचाभयं तदा । 
यत्न देवगणाः सवं समेता धमेचारिणः ॥ ३२॥ 
कुरुनन्दन ! तदनन्तर श्रीङृष्णने इन्द्रको उस खानपर 
अपनी वाणीद्धारा अभयदान दियाः जर्शो समस्त धर्माचारी 
देवता एकत्र ये ॥ २३२॥ 
ततो ययुर्विंसानैस्तु देवाः खवँ चिविष्पम । 
ऋद्धा परमया युकास्तेषामेवाजुरूपया ॥ ३२ ॥ 
तसश्चातु सव देवता उत्तम समृद्धिसेः जो उन्दीके अनुरूप 
थीः युक्त दौ अपने-अपने विमानेदवार खर्गरोकको गये ॥ 
कर्यपश्चादितिदवैव तथा राक्रजनार्दनो 1 ` 
विमानमेकमासद्य गता राजंसछिविष्टपम्‌ ॥ ३४ ॥ 
राजन्‌ ! कदयपः अदिति, इन्द्र ओर श्रीकृष्ण--ये स 
लोग एक विमानः व्रैठ कर स्वर्गरोकको रथे २४ ॥ 
ते शाक्रखदनं प्राप्ता रम्यं सर्वगुणान्वितम्‌ । 
ऊपुरेकज्न कौरब्थ मुदिता धमचारिणः ॥ ३५ ॥ 
कुखनन्दन ! सर्वसदूगुण-सम्यन्न रमणीय इन्दरभवनमे 
परहुचकर वे समस्त धर्माचारी महात्मा बडे आनन्द्फे साथ 
एक दी जगह ठरे ॥ ३५ ॥ 
शची तु कद्यपं पलन्या सितं धर्मवत्सला । 
उपाचरन्महात्मानं सवैभूतदिते रतम्‌ ॥ ३६1 
धर्मवत्सल शनचतीने समस्त भूतोके हितम तत्पर रहनेवाले 
पत्नीसहित मदात्मा कद्यपकी परिचर्या की | ३६ ॥ 
ततस्तस्यां प्रभतायां रजन्याभ्रवीद्धसिम्‌ । ˆ 
अदितिधर्मतच्वक्षा सर्वभूतदितं वेचः ॥ ३७ ॥ 
तदनन्तर जब्र रात वीती ओर प्रातःकार हुआ, तव 
धर्मके तत्वको जानेवारी अदितिने श्रीङणस्े यद्‌ समस 
प्राणि्योकरे व्यि हितकर वचन कदा-- ॥ ३७ ॥ 


९५१८ 


उपेन््र द्वारकां गच्छ पारिजातं नयस्व च । 

वध्वा सम्प्रापयस्वेश्च पुण्यकं दये स्थितम्‌ ॥ ३८ ॥ 
'उयेन्द्र { द्वारकाको जाओ ओर पारिजात भी ल्त 

जाजो । ईडा ] वहू सत्यभामाके हृदयम जो पुण्यक नामक 

न्तका उत्छव करनेकरी इच्छा है, उसे पूर्ण कराय ॥ ३८ ॥ 

पुण्यके सत्यया प्रपते पुनरेय स्वया तसः। 

नन्दने पुख्यश्चेषठ स्थाप्यः स्थाने यथोचिते ॥ ३९॥ 
पुरुषश्रेष्ठ { सत्यभामाद्वारा पुण्यक-त्रतका अनुष्ठान 

पूण टो जनेपर फिर ठुम्दी इस ब्रक्षको नन्दनवनमे यथोचित 

स्थानपर सापिति कर देना? ॥ ३९॥ 

पवमस्त्विति छृष्णेन देवमाता यद्ाखिनी । 

उक्ता धर्मगुणेयुक्ता नारदेन महात्मना ॥ ४०॥ 
तत्र श्रीङकप्णने यदास्विनी देवमाता अदितिसे, निन्द 

महात्मा नारदजीने धार्मिक गुणेचि सम्पन्न बताया था; कहा-- 

ध्टेसा ही दोगा? ॥ ४० ॥ 

ततोऽभिवाद्य पितर मातरं च जनार्द॑नः। 

महेन्द्रं सह शच्याथ श्रतस्थे द्वास्कां प्रति ॥४१॥ 
तदनन्तर पिता-माताकरो तथा शचीसहित महेन्द्रको प्रणाम 

करके श्रीङ्प्ण द्वारकाकी ओर प्रसित हए ॥ ४१ ॥ 


ददौ रष्णाय पौरोमी नियोगान्‌ छुरखनन्दन । 
सवौसामेच छप्णस्य भायौर्णां घर्मचारिणी ॥ ४२॥ 

कुषनन्दन ! उस समश धर्मचारिणी राचीने श्रीकृष्णकी 
समी पलिर्योकरे लियि ब्रहुत-ते उपदार दि ॥ ४२॥ 


दिव्यानां सर्वैरल्लानां वाससां च मनखिनी । 
नानारागविरकानां सदैवारजसामपि ॥ ४३॥ 
भायौणां च सहस्राणि यानि पोडश् माधवे । 
प्रतिगृह्य मदातेजाः प्रययौ द्वारकां प्रति ॥ ४४ + 
मनस्विनी चीने उनकी सोटह हजार पलि्ेकि चि 
सतर प्रकारके दिव्य रत्न तथा भोति-मतिके रंग रगे हुए 
जीर कभी मछिनं न दहोनेवाे बरहुत-से वख श्र्ृप्णकरो यपत 
किये । महातेजस्वी श्रीकृष्ण वह सवं उपहार ठेकर द्वारका- 
को चले | ४२-*४ 
सम्पूर्यमानो दयुनिमान्‌ खेचर; पुण्यकर्मभिः । 
ससात्यकिः सपुजश्च प्रानो रेवतकं गिरिम्‌ ॥ ४५॥ 
पुण्यकर्मा आक्राशनरारी प्राणिशरसि पूनित होते हुए 
तेजस्वी श्रीकृष्ण सत्यिकि ओर अपने पुत्र प्रचुम्नतदित 
रेवतक पर्वतपर आ पहुचे ॥ ४५ ॥ 
स ॒न॒त्र स्थापयित्वा च पारिजातं वर्द्ुमम्‌ । 
सात्यक्रं प्रूयामास द्वारकां द्वास्शालिनीम्‌ ॥ ४६॥ 
शे द्र पारिजातको वहीं स्थापित करके श्रीक्कप्णने 
सात्यकिको द्वारयालिनी दारकापुरीको मेजा | ४६ ॥ 


भ्ीमष्टाभारते खिखुभागे 


[ रिषो 


श्रीकृष्ण उवाच 

पारिजातमिष्टानीतं महेन््रसष््नान्मया । 
निवेद्य महावाद्यो भैमानां भैमवर्दन ॥ ४७॥ 

श्रीङृष्ण वोले--मीमवंयी यादर्वेमिं भीमक्रुल्की वृद्धि 
करनैवाठे महावादो ¡ ठम दारकर्म जाकर यह सूचना दे दो 
कि मँ इन्द्रभवनते पारिजात इक्षको यर्दो खया र| ४८५७ ॥ 
अद्य द्वारवतीं चैव पारिजातमदं द्भूमम्‌ 1 
पवेश्चयिष्ये नगरे शोभा भ्रक्रियतां श्भा ॥ ४८॥ 

आज मँ द्वासवतीपुरीर्मे पारिजात दक्षका प्रवेश्च कराजगा; 
अतः नगसमे सुन्दर टंगसे सजावट की जाय ,॥ ४८ ॥ 


इत्युक्तः सात्यको गत्वा तथोक्त्वा पुनरागतः। 
कुमारैनीगरेः साद्धं साम्वप्रभूतिभिः प्रभो ॥ ४९॥ 

प्रमो ! श्रीट्ृप्णके रेस कदनेपर सात्यकि नगरमे गये 
ओर उनका संदेश सुनाकर साम्ब आदि कुमार्यो तथा 
नागस्किके साय फिर वर्ह लोट अये ॥ ४९ ॥ 


ततो.ऽव्रतः पारिजातमातेप्य गरुडे तदा । 

प्रययुम्नो द्वारकां रम्यां विवेदा रथिनां वरः ॥ ५०॥ 
तदनन्तर रथिर्यमि प्रे परचुम्नने परिजातको अपने अगि ` 

गसुड्पर रखकर ससे पहटे रमणीय द्वारकापुरीम प्रवे करिया॥ 

शेव्यादिदययुकतेन रथेनाञुययौ दरिः। 

तस्याथ स्थसुख्येन सत्यकः साम्ब एव च ॥ ५१॥ 
फिर शैव्य आदि धोड़ोते युते हए स्थकर दवारा श्रीकृष्णने 

पारिजातका अनुखरण किया । उन्दी श्रेष्ठ स्यद्वारां सत्यकिं 

ओर साम्ब मी गये ॥ ५१ ॥ 

ये त्वन्ये चुप वार्ष्णैया यतैरहुविधेस्तथा ! 

ययुः प्रहटास्तत्‌ कम पूजयन्तो मद्त्मनः ॥ ५२॥ 
मरेशवर ! जो अन्य इृष्णिवंशी ये, वे अनेक प्रकारके 

वार्नोद्वारा महात्मा श्रीकृष्णके उस कर्मकी प्रशंसा करते हुए 

बरद दर्पे साथ पुरीम प्रविष्ट ए ॥ ५२ ॥ 

सात्यकाद्‌ विस्तरं श्चुत्वा यदवा नागरास्तथा ] 

विस्मयं परमं जगम्मुरथमेयस्य कर्मणा ॥ ५३ ॥ 
सात्यकिंसे पारिजात-दरणक्रा विस्तृत समाचार सुनकर 

यादव तथा नागरिक अप्रमेवखल्प श्रीकरप्णके उस कर्मे 

वड़े विसथको प्रा हुए ॥ ५३ ॥ । 

तं दिव्यकखुमं ब्क्षं दषा ऽऽनतंनिवासिनः । 

राजन्‌ न तपुः पदयमाना महोदयम्‌ ॥ ५४ ॥ 
राजन्‌ ! उस महान्‌ अम्युद्धयकारी दिव्य पुष्पवाले वृक्ष 

को देखकर आनत॑निवासी ब्रडे प्रसन्न हुए | वे बारंबार 

देखनेपर भी वृत्त नदीं देते ये ॥ ५४ ॥ 

तमद्धतमचिन्त्यं च मद्केिकलाण्डजम्‌। 

दु्योत्तमं पदयतां वै चद्धानामगमज्जया ॥ ५५॥ 


विष्णुपदं ] 


उस चृक्षपर वहुत-से पक्षी मदमत्त होकर केलिकिलमे 
आसक्त दो रहे थे । उस अदुमुतः अचिन्त्य एवं उत्तम इृक्षका 
दन करनेवले बद्धक शद्धावस्या तक्कार दूर दो गयी ॥ 
ये त्वन्धचश्चुषः सवं तेऽभवन्‌ दिव्यचक्षुषः । 
विरेगा सोगिणश्चासन्‌ घ्रात्वा गन्धं चनस्पतेः ॥ ५६ ॥ 
उस वनस्यतिकी गन्ध सूप्रकर रोगी नीरोग हो गये 
जर जिनकी ओं प्दठे अंधी थी वे उस समय दिव्य 
ष्टिसे सम्पन्न दो गये ॥ ५६ ॥ 
कपन्तः कोकिराञ्छ्वेतान्छुत्वा.ऽऽन्तनिव सिनः! 
वभूवुैष्मनसो ववन्दुश्च  जनादंनम्‌ ॥ ५७ ॥ 
पारिजात बृक्षपर सफेद कोकिर्छोको मधुर नोी बोर्ते 
सुनकर आनतं देके निवासी मन-दी-मन बडे प्रसन्न हुए 
ओर भगवान्‌ जनार्दनकी वन्दना करे सगे ॥ ५७] 
नानाविधानि तूयौणि गेयानि मधुराणि च । 
शयुश्चदुस्तस्यः ब्रक्षश्य नातिदूरं गता नराः ॥ ५८ ॥ 
उस दृक्षके समीप गये हुए मनुष्य नाना प्रकारके वाद 
ओर मीठे-मीठे गीत सुनते ये ॥ ५८ ॥ 
योऽयं संकरपयामास गन्धं ठं नरस्तथा । 
स तदैव तमाजघ्रे पारिजातससुद्धवम्‌ ॥ ५९. ॥ 
मनुष्य अपने मनम जिस-जिस मनोरम सुगन्धके लि 
संकस्प करते थे वदी तक्काङु पारिजात वबृक्षसे उनकी 
घराणरेन्दियमे प्रकट दो जाती थी ॥ ५९ ॥ 
वतः प्रविश्य रम्यां तु द्वारकां यदुनन्दनः) 
वसुदेवं महात्मानं दद्द देवकीं तथा ॥ ६० ॥ 
तदनन्तर यदुनन्दन श्रीङृष्णने रमणीय द्वारकापुरीमे 
प्रवेश करफे महात्मा वसुदेव तथा माता देवकीका दन क्रिया 
कुङराधिपतसिं चैव वलं सखातरमेव च। 
बद्धाश्च यादवानां ये मानाहौनमयोपमान्‌ ॥ ६१ ॥ 
फिर क्रमशः कुक्ुरवंशके अधिपति उग्रसेनः मैया 
वर्सम तथा यादर्वोमं जो वडे-वृदे माननीय देवोपम पुरुष 
थे) उन ख्वसे वे मिले ॥ ६१ ॥ 
विज्य तान्‌ वै भगवाननादिनिधनोऽच्युतः। 
सम्पूज्य च यथान्यायं खमेव भवनं गतः ॥ ६२ ॥ 
तद्षश्चात्‌ उन सवका यथोचित पूजन करफे उन्द विदा 
करनेके पश्चात्‌ आदि-अन्तसे रहित भगवान्‌ अच्युत अपने 
ही भवनम चङे गये ॥ ६२॥ 


पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः. 


व ्यवववववववय च््व्ववववववव्यववव्व्य्वववववव- = 


1 


५१९ 


८--1 


न~~. --~ ` 


सख सत्यभामया वासं विवेश मधुखदनः। 
पारिजातं तसधेष्ठं , ग्रहाय गदपूर्वजः ॥ ६३ ॥ 
गदके वदे भाई उन मषटुसू्नने तस्शरष्ठ पारिजात- 
को लेकर सत्यमामाके भवनम प्रवेश किया ।॥ ६३ ॥ 
सखा देवी पूजयामास श्रहृ्ठा वासवायुजम्‌ । 
प्रतिजग्राह तं चपि पारिजातं महाद्रुमम्‌ ॥ ६8 ॥ 
देवी सत्यभामाने अव्यन्त प्रसन्न होकर इन्द्रफे छोटे 
माई श्रीृप्णका पूजन किया ओर उ विशाल चक्ष पारिजात- 
कोले जिया ॥ ६४॥ 


मनीषितेन स ॒तेसरर्पो भवति भारत । 
महांश्च वासुदेवस्य तदद्भुतमभून्महत्‌ ॥ ६५ ॥ 

भारत | वह श्रक्च षसुदेवनन्दन ` श्रीकृप्णकी श्च्छाके 
अनुसार कमी छोय हो जाता था ओर कमी वहत ब्रड़ा । 
यह उसके विषयमे वड़ी दही अदूथुत बात्त थी ॥ ६५ ॥ 
कदाचिद्‌ रकां सर्वा प्रच्छादयति भारत । ` 
कद्चिद्धस्तधार्यसतु भवत्यङ्गुष्ठसंनिभः ॥ ६६॥ 

भरतनन्दन [ कमी तो वह वृक्ष इतना अधिक बद्‌ जाता 
कि सारी द्वारकाको आच्छादित कर केता था ओर कभी 
हाथपर रखने योग्य अङ्गठेके वराबर्‌ हो जाता था ॥६६॥ 
ननन्द्‌ सत्या कोरस्य देवी प्राप्य मनोरथम्‌ 1 
पुण्यका्थं तु सम्भारान्‌. सम्भर्तुसुपचक्रमे ॥ ६७ ॥ 

कुरुनन्दन ! देवी सत्या उस मनोवाज्छित दृक्षको पाकर 
बहुत प्रसन्न हुं । उरन्दोनि पुण्य-नतके ल्थि सामान जुयाना 
आरम्भ किया ॥ ६७ ॥ 
यानि द्न्याणि कौरव्य जम्बृद्धीपे तु कानिचित्‌। 
योग्यानि तानि रृष्णेन सम्भृतानि महात्मना ॥ ६८ ॥ 

ऊुर्कुलमूष्रण ! जम्बूद्रीपमे जो कोई भी उपयुक्त द्रव्य 
येः उन सवका मदात्मा श्रीकृष्णे संग्रह कर छया ॥ ६८ ॥ 

सुनि तदा संस््रतवान्‌. ख नारदं 
जनार्दनः सर्वगुणोचितं वदी । 
प्रतिग्रहार्थं वतकस्य सत्यया 
यथोपदिष्ठस्य पुरंदराुजः ॥ ६९ ॥ 

उस समय इन्द्रके छोटे भाई जितेन्द्रिय जनारद॑नने सत्य- 

भामाको तवि ओर उनके दवारा आचरणमे ये गये पुण्यक- 


नतर्मे दिये जानेवलि दानक ग्रहण करके व्यि सर्वगुणसम्पन्न 
नारद मुनिका स्मरण किया ॥ ६९ ॥ † 


इति श्रीमहाभारते खिरुभागे, हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजातानयने पञ्चसप्ततितमोऽभ्यायः ॥॥ ७५ ॥ 


श्छ प्रकार श्रीमहाभारते लिरुमाग हरिवंशे अन्तमेत विप्ुपर्वमे पारिजाता आनयनव्िषय 
पचतेः अध्याय पूरा हुमा 1 ७५ ॥ 


५२० 


श्रीमहाभारते सिकभागे 


[ हरिवंशे 


पटूसप्तितमोऽध्यायः 
सत्यभासाद्वारा पुण्यक-व्रतमे श्रीटृष्णका नारदजीको दन, नारदजीका निष्क्रय ठेकर 
श्रीकृष्णको छोडना ओर उनसे वर पाना, भ्ीष्णका सगे-सम्बन्धि्योको 
पारिजात दिखाकर पुनः उसे खगम पटुचाना 


दैद्यग्पायन उवाच 


अथ रष्णस्य कौरव्य ध्यातमाचरस्तपोधनः। 
आजगाम सुनिष्ेष्ठो नारदो वदतां वरः ॥ १॥ 
वैदाम्पायनजी कदते ह--कुदनन्दन । श्रीङप्णके 
चिन्तन कसते दी तपस्यक्रे धनी, वक्तार्योमिं श्रेष्ठ मुनिवर 
मारदजी वदो आ पहुचे ॥ १॥ 
सम्पूजयित्वा विधिवद्‌ वासुदेवो विशाम्पते । 
प्रतिघ्रदारथं विचिवच्छीमान्‌ भक्त्या न्यमन्नयत्‌॥ २ ॥ 
प्रजानाथ ! वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने विधिपूव॑क 
देनासजीकी पूजा करके भक्तिमावते प्रतिग्रह ल्नेके लि 
नद सविधि निमन्त्रण दिवा || २ ॥ 
वतः फे च सम्पि सातं देवो मदासुनिम्‌। 
सम्पूज्य माल्ै्मन्पैश्च भोजयामास भारत ॥ ३ ॥ 
सार्वकामिकमच्रायं सर्वेभूतरृदन्ययः। 
सत्यया प्रियया सार्द्ध प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥ ४ ॥ 
मारत { तदनन्तर मोजनक्रा खमरय प्राप्त होनेपर स्नान 
करये हु महामुनि नारदकरा गन्ध ओर मास्य आदिक द्वारा 
पूजन के सर्वमूतखष्टा सर्वव्यापी भगवान्‌ श्रीकृष्णने 
अपनी प्यारी पक्वी सल्याक्रे साय अत्यन्त प्रसन्न मनसे उन 
सवकरी खचिकरे अनुकर मोजन कराया ॥ ३-४ ॥ 
पुष्पदामावसनज्याथ कण्टे ङप्णस्य भाविनी । 
बषन्य ष्णं सुभगा पारिजाते वनस्पतौ ॥ ५ ॥ 
सौमाग्ययाटिनी भामिनी सत्यमामाने श्रीङष्णके कण्ठर्मे 
फूर्की माला डाखकर उन्द परिजात ब्म ्ोध दिया 1५ 


द्धिर्दूदौ नारदाय ततोऽुन्नाप्य केशवम्‌ । 
देवी येदुखदस्नं च काञ्चनस्य च पर्व॑तम्‌ ॥ ६ ॥ 
हिरण्यरूप्यमिध्ं च मणिरत्नप्रभस्य च। 
तिखमिश्चस्य च तथा धान्यैरन्यर्युवस्य च ॥ ७ ॥ 
तदश्वात्‌ श्रीक्रष्णकी आक्ञा केकर देवी स्याने 
` नारदजीको जच्के द्वाया श्रीकृप्णका दान कर दिवा । शाय 
ही एक सुदल धेनु तथा सोनेका पर्त मी दिया। वद 
पर्वत मणि एवं रर्वोकी प्रमति युक्त था! उस्म तिल्कामी 
सम्मिश्रण किया गया था तथा अन्व प्रकारे धान्येसिभी 
वरट्‌ सम्पन्न था | उख काचन पर्वतक्रे साथ सेनि यौर र्चः 
कमी संवोग था ॥ ६-॥ 


रतिगर्य तु तच्‌ सवं नारदो सुनिरखचमः। 
स सम्प्रषटो मुच्च भूयः केडशावमव्रवीच्‌ ॥ ८ ॥ 
सुनिश्रे्ट नारद वह सारा दान ग्रहण करके बडे प्रषन्न 
हए ओर मोजन करे पुनः श्रीकृष्णठे बोले-॥ ८ ॥ 
भोः केडाव मदीयस्त्वमद्धि्दंचोऽसि सत्यया। 
स त्वं मामञुगच्छल्र कुर यद्यद्‌ बवीम्यदम्‌ ॥ ९ ॥ 
टे केदाव 1 अव्र आपे दो गये; क्योतकरि सत्यान जच्के 
साथ आपका दान कर दिया है; अतः आप मेरे पीछे-षीे 
आद्ये चीर मै जो आश दः उसका पाटन कीनियेः | ९ ॥ 
भ्रथमः पक्ष इत्येवमन्रवीन्मघुखदुनः 1 
नजन्तमनुवनाज नारदं च अनद्नः॥ १०॥ 
तव जनार्दन भगवान्‌ श्रीकण्णने कदा--ध्यदी मुख्य 
प्च है ।' रेखा कहकर वे जति हुए. नारदजीके परीढे- 
पीछे चले ॥ १०] 
परिहासं बहुविधं शृत्वा सुनिवरस्तद्‌ 1 
तिष्ठख गच्छामीत्युकत्वा परिदासविचक्षणः ॥ ११॥ 
अपनीय ततः कण्ठात्‌ पुष्पदामनमतरवीत्‌ । 
कपिलां गां सवत्सां भो निष्क्रयार्थं प्रयच्छ मे॥ १२॥ 
तत्र पण्रिदास्मे कुरा मुनिवर नारद जीने नाना ग्रकास्का 
परिहास करे कद-अच्छाः यव आप रहिये ! मे जता 
ट | एेला कटकर उनके कण्ठसे पटरी माल दृयकर 
उन्दनि श्रीज्रष्णसे कदा--भ्मु्ने निष्कयके च्य वख्दे- 
सरित कपिला गोका दान कीजिपरे ॥ ११-१२ ॥ 
रष्णाजिनं तिक्कैः पृणं धयच्छ च सकाव्चनम्‌। 
पएपोऽघ्र निष्क्रयः ष्ण विहितो वृषकेतुना 1 १२३॥ 
श्रीकृष्ण | निके साथ काद्य मुमचर्म ओर सुवर्णं भी 
दीनि । भगवान्‌ याङ्करनै यरो यदी निष्क्रय नियत 
क्रिया है ॥ १३॥ 
तथेस्युक्त्वा हीकरश्स्तथा चक्रे जनाधिप | 
स उवाच मुनिश्रेष्ठं टसित्वा मधघुखदनः ॥ १४॥ 
जनेश्वर ! तव (तथारतु* कट्कर दीका मधुसूदनने 
यैखा दी क्रिया | फिर देसकर्‌ वे स॒निश्रे नारदे बोखे-) ६४॥ 
वरं चस्य धर्मल यस्ते नाष्दे काङ्क्षितः। 
तचे दातास्मि धर्म॑क्ञ पस रश्रतिहि मे त्वयि ॥ १५॥ 


(०६५ 1 -) 112 14210946 (७० 119 ५२1४ 


न ॥ # ५ 


9 कमण 9 


+ -------- ~ 


॥ ४ = 


५ ्* ~ 
मि व ~ = क ८ 2 [द 


श्वमन्न नारद ! करं जो अमी हो, वह वर्‌ मुक्ते 
मोग । मै तमद वह वर अवश्य दूँगा; त्रयोकि हार 
ऊपर मे बहुत प्रेम हैः | १५ ॥ 
नारद उवाच 
नित्यमेवास्तु मे प्रीतो भवान्‌ विष्णो सनातन । 
त्वत्मखादात्तु सालोक्यं जेयं ते महामते ॥ १६॥ 
नारदजीने कहा--सनातन विष्णो ! महामते ! आप 
मुद्घपर सदा ही प्रसन्न रहै ओर आपकी कपास सुसे आपदी- 
का सालोक्य प्राप्त हो| १६॥ 
अयोनिजो भवेयं ते नारायण सतां गते । 
भवेयं ब्राह्मणश्चैव पुनजौत्यन्तरेष्वपि ॥ १७॥ 
सत्पुरुपोके आश्रयभूत नारायण ! मँ आपकी पासे 
अयोनिज होऊं ओर जन्मान्तरयम भी पुनः ब्राह्मण 
दी होऊ ॥ १७॥ 
प्वमरसत्विति तं देवो विष्णुः धरोवाच भारत । 
वतोष च ततो धीमान्‌ नारदो मुनिसत्तमः ॥ १८॥ 
भारत [ तव भगवान्‌ वि्णुने उनसे कदा-्एवमस्तु 
(खादी हो )|* यह वरदान पाकर बुद्धिमान्‌ मुनिरेष्ठ 
नारद बहुत संव्॒ट हुए. ॥ १८ ॥ 
षोडश स्रीसहस्नाणि विष्णोरतुरुतेजसः 
निमन्तितानि कोरन्य सत्यया हरिकान्तया ॥ १९॥ 
ऊुख्छुटनन्दन ! श्रीकृप्णप्रिया सत्याने अतुरु तेजखी 
भीदरिकी सोरुह॒ हजार चिरयोको अपने भवनम 
निमन्नित किया ॥ १९॥ 
तासां द्दौ संनियोगमेकैकं हरिवह्छभा । 
शच्या यो वाखुदेवस्य पुरा द्प्तो नराधिप ॥ २० ॥ 
नरेशर { परे शचीन भगवान्‌ वासुदेवको नो भेंट 
समग्री दी थी, ्रीकृप्णवल्लमा सव्यमामाने उसमेते एक-एक 
वस्तुको ठेकर उन स्वको दिया ॥ २० ॥ 
पारिजातो वसंस्तत्र तततः भ्रवचरृते तद्‌ । 
आक्षया वासुदेवस्य नारदेन महात्मना ॥ २१॥ 
निमन्निता गणाः स्व केदावेन महात्मना । 
विभूति पारिजातस्य द्यः छुखनन्दन ॥ २२॥ 
पारिनात चरक वहो रदक़र अपने गुरणौको प्रसिद्ध करने 
खगा । तत्सश्चात्‌ श्रीकृष्णकी आज्ञासे महात्मा नारदमे उनके 
समस युदक निमन्वित क्रया । कुरुनन्दन ! महात्मा 
केशबदवार निमन्नित हुए उन सव ॒लोगोनि अपनी ओखति 
पारिजात इका वेभव देखा ॥ २२-२२॥ 
पाण्डवाश्चानयामास सदैव पृथया हरिः । 


द्रौपदाः च मदातिजास्तयैव च सखभद्रया ॥ २३॥ 


षट्सपततितमोऽभ्यायः ५२९ 


महातेजखी श्रीहसिनि कुन्ती, द्रौपदी ओर सुमद्राके साथ 
पाण्टर्वोकि मी द्वारकामे चूलवाया ॥ २३ ॥ 
श्ुतश्चवां च सघुतां भीष्मकं सञ्ुतं तदा । 
अन्यानपि च कौरव्य मिश्रसम्बन्धिवान्धवान्‌ ॥ २४॥ 
ख्नन्दन ! श्रुतश्रवा ओौर उसके पुन शिद्यपारुकोः 
भीष्मक जर उसके पुत्र खक्मीको तथा अन्यान्य मिरी; 
सम्बन्धिर्यो एवं बन्धु-बान्धर्वोको श्रीकृष्णे वरहो बुख्वाया था २४ 
रेमे च सदह पार्थेन फाल्गुनेन अनार्दनः ( 
सान्तःपुरो महातेजाः परमदः्थावसन्दछेप ॥ २५॥ 
मरेधर { महातेजखरी जनार्दन ऊुन्तीपुज अर्जुनक साथ 
रनवासषदित वदां क्रीड़ाविनोदपू्वकं बदरे आनन्दसे रदे । 
वे उच्यकोरिकी समृद्धिसे सम्पन्न होकर द्वारका निवा 
करते थे {| २५॥ 
संवत्सरे ततो याते केदिदामरस्मः। 
पारिजातं पुनः खगंमानयत्‌ सर्वभावनः ॥ २६॥ 
एक वर्ष्‌ बीत जानेपर सबको उत्पन्ने करेवाठे अमर- 
शिरोमणि केरिदन्ता श्रीकृष्णने पारिजात इृष्छको पुनः 
खग॑टोकमे पर्चा दिया ॥ २६ ॥ 
चनादिति कश्यपं च दष्टा खजननी प्रसुः । 
शक्रेण सहितो धीमानप्रमेयपराक्रमः ॥ २७ ॥ 
अप्रमेव प्रक्रमशाखी बुद्धिमान्‌ मगवाय्‌ श्रीकृष्णने वह 
इन्द्रसहित जाकर पिता कदयप तथा अपनी मर्ता अदितिका 
दशन किया ॥ २७॥ 


तसुवाचादितिमौता प्रणतं मधुसूदनम्‌ । 
सौश्राजमस्तु बामेवं नित्यं चामरसत्तम ॥ २८ ॥ 
मनोरथं मम त्वं च पूरयसख जनादन । 

स समय अपने चरणोमि पडे हुए मधुसूदनसे माता 
अदितिने कहा--+भमरश्रेष्ठ ! तुम दोनेमिं सदा ही अच्छा 
ातृभाव बना रदे । जनादन } ठम मेरे इसी मनोरथको 
पूणं करोः ॥ २८९ ॥ 
तथेत्येवा्रवीत्‌ छृष्णस्ततो मातरमात्वाय्‌ ॥ २९ ॥ 
आमन्धयित्वा पितरौ देवराजानमन्वीच्‌ । 
वाखुदेवो महातेजाः कारप्रा्तमिदं वचः ॥ २०॥ 

तब मनस्वी श्रीङृष्णने माता अदितिते केहा--्वहुत् 
अच्छाः खा ही करलं । तत्यश्वात्‌ पिता-मातासे विदाङे 
मदतिजस्वी बासुदेवने देवराज इन्द्रे यह्‌ समयोचित 
चात कदी--]} २९-३० ॥ 
महादेवेन देवेश ॒संदिषोऽस्मि मदात्मना । 
भन्तभूमितलेऽबभ्यानञ्ुरान्‌ प्रति मानव्‌ ॥ ३१ ॥ 


५२२ 


धीमष्ट(भारते खिखभगि 


[ हरिव 


'ूसरयोको मान देनेवलि देवेन्द्र | मदात्मा मददिवजीने 
भूमिक्रे भीतर निवास करनेवाटे अवध्य असुरोका वध करनेके 
च्वि मुस अद्वेदा दिया दै ॥ ३१॥ 
तद्रितो दशरात्रेण दन्वाहमञ्चयेत्तमान्‌ । 
त्नोपवि्मन. स्थातव्यं प्रवरेण मदात्मना ॥ २२॥ 
जयन्तेन च वीरेण दानवानां जिघांसया 1 

'अतः मँ आजे ठेकर दस रातके भीतर भूमिके मीतर 
वेढे हुए उन बदे-वडे असुर्ेका वध कर डर्द्ुगा | वरहा 
दान्वेफि बधकी इच्छसि महात्मा प्रवर तथा वीर जयन्तको 
भी मेरे साथ रहना चाये ॥ ३२१ ॥ 


पकोऽश्र मायुपो देवो देवपुत्रस्तथा परः ॥ २३॥ 


अवध्याः कि ते देवैर्बहयणो वरदु्पिताः। 
अस्माभिः फिर दन्तव्यां माजुपत्वसुपागतैः ॥ ३४॥ 
'हनमेते एक ( प्रवर ) तो मतप्य देव द ओर दूखय 
( जयन्त ) देवपुत्र । व्रह्माजीके वरछे मदमत्त दए वे दैत्य 
देवता्ंकि ल्यि अवध्य ह; परंतु मनुप्य-भावको प्राप हुए 
मलोग उन्हं अवघ्य मार्‌ उदटिगे' ॥ ३३-३४॥ 
तथेति ष्णं स रिः भ्रीतरूपस्तथात्रवीत्‌ । 
सख्जति क्षतो देवाचन्योन्यं जनमेजय ॥ ३५॥ 
जनमेजय ! तवर दन्द्रने प्रसन्न शक्र श्रीशृष्णते कदा-- 
ष्टेसा दी होगा । फिर वै दोनों देवता एकदुषरेषे 
गक पिले ॥ ३५ ॥ 


हति श्रीमहाभारते खिभागे हरिवंदो विष्णुपर्वणि पारिजिात्रणे सर्गे परिजातस्थपने पदट्सप्ततितमोऽच्यायः ॥ ७६ ॥ 


धस प्रफार श्रीमहाभारते दिरूभाग दरिवशके अन्तर्गत विष्णुपत्र॑मे परिजातदरणे प्रदम परिजत्तकी 
पुनः स्वलोक स्यापनागिषयक्र छिरत्तरे{ मध्याय पृरा हुमा ॥ ७६ ॥ 
----<>+€#ॐ~~ॐ---- 


मप्तसप्ततितमोऽध्यायः 
पुण्यक-विधिके पणेनका उपक्रम 


जनमेजय उवाच 


पुण्यकानां ममोत्प्ि कथयसर दिजोचम । 
दैपायनपरसादेन सर्वे हि विदितं तव॥१॥ 
जनमेजयने पखा--द्विजशरेठ ! पुण्य्कोकी उदत्ति 
क्रिस प्रकार हूरई % यह्‌ भन्ने वतादये; क्योकि दैपायन 
व्यासकी कृपते आपको सव कुट विदिन १ ॥ १॥ 
वैशम्पायन उवाच 
उमया पुण्यकविधिर्नरेनद्रोत्पादितः पुरा। 
श्णु येन विधानेन छेके धर्मभूतां वर ॥ २ ॥ 
वैशम्पायनजी कते ह--धर्मातारमम श्रेष्ठ नरेन्र! 
पूर्वकार्म भगवती उमाने पुण्यकबतकी विधिका प्रतिपादन 
क्रिया है । उसके अनुखार लोकम जिख विधानसे ब्रत करिया 
जाता दै, उसे व्रताता हँ खनो ॥ २॥ 
सखगौन्नीते पारिजाते रष्णेनाष्धि्टकर्मणा । 
ययौ दारवीं धीमान्‌ नारदो मुतिसन्तमः ॥ २ ॥ 
जव अनायास ही मक्षन्‌ कर्मं करमेवाढे . शरीङप्ण 
स्वग॑से पारिजात वर्को द्वारकर्मे ठे गये; उस मय 
वुद्धिमान्‌ मुनिश्रेष्ठ नारदजी भी वदँ पधरे ॥ २ ॥ 
देवासुरे शपरेष्ठ॒ संग्रामे समुपस्थिते । 
पट्‌ पुरस्य वधे घोरे महरेवाक्षयानघ ॥ ४ 1 
निष्पाप व्रपशरेष्ठ | जत्र महदेवजीकी आज्ञामे देवघुर- 


संरामका अवसर उपद्ित था ओर पट्‌ पुरवाखी दानर्वोकरा 
घोर वध दोनेवाया थाः उसी समयकी बात दै ॥ ४॥ 
छृष्णेन सदितं चिप्रं नास्दं धर्मवित्तमम्‌ । 
आसीनं परिपप्रच्छ स्फिमिणी मैप्मिकी दप ॥ ५॥ 
नरेष्वर ! धर्मेम श्रेढ विप्रवर नारदजी शीकृप्णके 
साथ बैठे ये| उस समय भीप्मककुमारी सत्रिमर्णीने उनसे 
पा ॥ ५ ॥ 
तप्र जाम्बवती देवी सत्यभामा च भामिनी । 
गान्धार्यजयपु्वी च योगयुक्ता नसधिप ॥ ६॥ 
देव्यश्च शप कृष्णस्य वहो ऽन्या वै समागताः । 
कशीटगुणोपेता धर्म॑शीदखाः पतिव्रताः ॥ ७ ॥ 
नवर ¡ वहो सक्रिमिणीके खाथ जाम्बवती देवीः 
भामिनी सत्यभामा; गान्धास्यजङुमारी योगयुक्ता दीन्या 
तथा श्रीकृष्णकी अन्य वहुत-खी कुलवती, सशील; गुणवती 
धर्मशीला एवं पतित्रता पलिर्यो भी आयी हुई यी ॥ ६-७ ॥ 
.रभ्ििण्युव्राच 
मुने धर्मतां श्ेठ॒धर्मक्षानश्चतां चर। 
उत्पत्ति पुण्यकानां त्वं वक्तुमहं स्यद्तेषतः ॥ ८ ॥ 
रुकमिणीने क्टा--धर्मात्माभौ ओर शानियेमिं भे 
मुने ! आप भुस्े पुण्यकोकी उदयत्तिकरा इृक्तान्त पू्ण॑रूपते 
अतानेकी कृपा करं ॥ ८ ॥ 


विष्णुपर्व 1 


विधि च फटयोगं च दानकाटं तथैव च । 
कौतूहलं नस्तत्सिदधि वदस्व दुतां वर ॥ ९ ॥ 
चक्तार्भोमिं श्रेष्ठ देवप ! उस पुण्यकतरतकी विधिः 
फल्योग ओर्‌ दानका व्याह १ उसकी सिद्धि कषे दोती 
१ १ यह्‌ सव व्रतादय \ ह्म उसके विपये सुननेके लिय 
बड़ी उक्तण्ठा है ॥ ९॥ 
। नारद उवाच 
ष्णु वेदर्भिं धमेत्ने सपत्नीभिः सदानघे । 
पुण्यकानां बिधिः प्रोक्तो यथा देवि पुरोमया ॥ १०॥ 
नास्दजीने कहा--धर्मकौ जाननेवाटी निष्पाप 
बिदर्भनन्दिनी ! देवि ! पूर्वकराखे उमादेवीने पुण्यककी शैष 
विपि बतायी थीः उसे तम अपनी सीरत साथ सुनो ॥१९०॥ 


चचारोमा बतं देवी पुण्यकानां श्युचित्रता। 
चतावसतिऽ्थ तया सख्यो देवि निमर्त्रतताः ॥ ९९ ॥ 

देवि { पविन्न रत धारण करनेवाली उमदेवीने जव 
पुण्यकौका नेत किया था, उस समय त्रतके अन्तम उन्दनि 
अपनी सखिर्यौको निमन्वित किया ॥ १९ ॥ 


अदित्याद्याः छताः स्व दश्चस्याङ्धिकर्मणः । 
पौलोमी च शची देवी ख्याता छोके पतिव्रता ॥ १२ ॥ 
सोदिणी च भ्ाभागा सोमस्य दयिता सती । 
फारगुनी च तथा पूर्वां रेवती च विस्पते ॥ १३॥ 
तथा शतभिषा चैव मघा च कुरुनन्दन । 
पताभि्दिं महादेवी पृव॑मासधित्ा सती ॥ १४॥ 
प्रजानाथ [ कुख्नन्दन { अनायाष् दी खष्टिसम्बन्धी 
महान्‌ कमं करनेवलठे प्रजापति दक्षकी अदिति आदि समसत 
पुत्रर्यो, रोकविख्यात पतिनरता पुरोमद्ुमारी राची देवीः 
सोमक्री प्यारी पतनी सती साध्वी मदभिगा रोहिणी, पूर्वा 
फाल्गुनी, रेवती, शतमिप्रा ओौर मधा-ये सतवर-की-तव 
निमन्नित होकर वरद आयी थीं । इन सत्रे पूर्वकाले सती 
महादेवी उमाक्री आयधना की थी | १२-९४॥ 
गह सरशती चेच वेणी गोदा च निख्रगा। 
तथा वैतरणी चैव गण्डकी या च भारत ॥ १५॥ 
अन्याश्च सरितो रम्या लोपामुद्रा च भारत। 
सत्यश्चान्या जगद्‌ देव्यो घास्यन्ति दि ताः श्युभाः॥ ९६॥ 
मारत ! ग्धाः सरश्वतती, वेणी, गोदावरी वैतरणी आर 
गण्ड्की-ये तथा ओर भी ब्रहुतसी रमणीय सरिता वों 
आयी थीं । लोषामुद्रा ओर अन्य शमलक्षणा सती देविर्याः 
जो उपने धर्मे इषे जगत्‌को धारण करती रै, वँ 
उपयित थी } १५-१६॥ 
द्युभाश्च निरिनन्दिन्यो चहिकन्याश्च खुवताः । 
स्वाहा चद्धिप्रिया देवी खाविनी च यश्चखिनी ॥ १७॥ 


सत्तखक्ततितमोऽध्यायः 


५२द्‌ 


~ 


ारायकनिनि 


च्रद्धिः ङुबेरकान्ता च जलेशमर्िपी चवा ! 
भायौ पिदरपतेक््चैव वुपल्यस्तथा च याः ॥ १८ ॥ 
सुन्दरी गिरिविन्यार्पैः उत्तम वतका पाटन करनेवारी 
अगनि-कन्या, अग्निदेवकी प्यारी पनी खदा देवीः 
यशखिनी सावित्री देवी, क्रान्ता ऋद्धि, जल्के स्वामी 
वक्णकी रानी, यमराजकी भाया तथा वसुर्जौकी पत्न्यो भी 
वरहो उपदस्ित हुई थी ॥ १७-१८ ॥ 
हरीः श्रीधतिस्तथा कीर्पिंसाश्म मेधा च सुताः! 
धरीतिर्मतिश्च ख्यातिश्च सन्नीतिद्व तपोधनाः ॥ १९॥ 
ही; श्री; धृतिः कीर्ति, आशाः मेधाः प्रीतिः मतिः 
ख्याति ओर संनीति--ये सव उत्तम ब्रतका पालन करनेवाली 
तपोधना नार्य भी वर्ह एकत हु थीं ।॥ १९॥ 
देव्यः सल्यस्तथेवान्याः सरवैभूतदिते रताः। 
तासां चरतावसाने च पूजां चक्रे ऽम्विक! तदा ॥ २०॥ 
इनके सिवा ओर मी समन्त ूर्तेकरि हितम तत्पर 
रहमेवाटी सती देवि्यो उपचित थी । अभ्थिकाने तके 
अन्तमे उन सयका पूजन किया ॥ २० ॥ 
तिखरल्नमयं द्त्वा पवेतं स्बेधान्यवत्‌। 
चासोभिथूपणेशल्येनीनारागैः सुमध्यमे ॥ २९॥ 
खमध्यमे ! तिल ओर रलौदास निमित हए सम्पूण 
घान्येसि युक्त पर्च॑तका दान कखे उमानि अनेक र॑गेक्रे 
उच्छे-अच्छे वख ओर श्रेष्ठ आभपरणेसि उनकी पूजा 
की॥२१॥ 
प्रतिणृ्य तु तां पज दत्तां देव्या तपोधनाः! 
उपदिष्टाः कथादिचन्नाः कुर्वन्तयो भदैदेवताः ॥ २२॥ 
उमदिकीद्यारा री गयी उस पृजाको रहण करके वे 
तपोधना एवं पतितरता देविर्यो वयँ पेठकर आपसे बिचि 
कथावार्ता कसे स्गी ॥ २२॥ 
पुण्यकाथं कथास्ता्ामासय्‌ देवी शरांस याः। 
विधि च पुण्यकस्याथ सतीनां भर्तदेवते ॥ २३॥ 
पतिदेवते ¡ उन सव टेषियोकी चर्वाका विप्रयं थां 
पुण्यकव्रत--वे उसमे विषयमे जिज्ञासां करती थीं |! उस 
समय देवी उमाने उन सतियो पुण्यकत्रत ओर उसकी 
बिधिका उपदेश दिया था! २३॥ 
तासां मतेन साघ्वीनां सवौसां सोमनन्दिनी । 
पयंपृच्छद्ुमां देवीं पुण्यकानां विधि वरा ॥ २४॥ 
वहां जुटी दई उन समी साध्वी देविये मते शरेष्ठ 
पतितत सोमनन्दिनी अरन्धतीने उमादेषीे पुण्यकौकी विधि 
पटी ॥ २४ ॥ 
उमा तासां प्रियार्थं तु पुण्यकान्यव्रवीत्‌ वदा ! 
समक्षं मम वैदमि सर्वेभूतदिते रता ॥ २५ ॥ 


५२४ 


विदर्भराजकुमारी ! समस्त प्राणिर्योके तमै तत्पर 
रहनेवाटी उमादेवीने उन सतिर्योका प्रिय करनेके ल्थि मेरे 
सामने ही उस समय उन्दं पुण्यर्कोका उपदेदा दिया ॥२५॥ 
ममेव चोमया दत्तः स॒ तद्रा रत्नपर्वतः। 
प्रतिगृह्य मया चैव रतो ब्ाह्यणसाच्छुमे ॥ २६॥ 

शमे ¡ उमदेवीमे उस दिन मुके दी उस रत्नमय 
पर्वतका दान दिया था। व दान ठेकर मने राह्मणेकि 
अधीन कर दिया था] २६॥ 


उमा त्वरुन्धतीं साष्वीमामन्न्य यदभाषत 1 


प्रीमहाभारते खिकभागे 


[ हरिषंशे 


श्णु कर्याणि वक्ष्यामि स्वाभिः सदहिताश्चुमे ॥ २७॥ ` 
छमे ¡ कल्याणी | उमदेवीने साध्वी अर्न्धतीको 
सम्बोधित करके जौ मापण दियाथा, उयेर्ग चतारहा 
ह| ठम न सभी रानि्यकि साथ उसे सुनो ॥ २७॥ 
पुण्यकानां विधि रुतं यथाववयुपूर्रैराः । 
यथा चैव मया द्टस्तत पप विधिः द्युमे ॥ २८॥ 
भे । पुण्यर्कोकी सम्पूर्णं विधिका जला मैने वर्णन 
सुना है थर जिस स्प्म उसे देखा दै उखी रूपमे म क्रमशः 
इसका यथावत्‌ वर्णन करता हः ठम सनो ॥ २८ ॥ 


हति श्रीमहाभारते खिरुभाये हरिवो विष्णुपर्वणि पुण्यकविधिकथने सप्ततप्ततितमोऽध्यायः ॥ ८७ ॥ 


शस प्रकार श्ीमदाभार्तके लिरमाग दखिंदके भन्तर्मैत विष्णुपमे पुण्यकविधिका कथनव्रिषयक 
सतहत्त्सयौ मध्याय पृरा हुमा 1 ७७ ॥ 


अष्टसप्ततिततमोऽष्यायः 
उमाद्ारा सती षवीके महतका वर्णन करते हए पुण्यक-वरतकी विधिका उपदेश 


उमोवाच 
सर्वषां यदा भर्तुः ध्रसदेन श्ुचिसिते । 
तदृ पुर ममादिष्ठो ष्टः पुण्यविधिः द्युभः ॥ १ ॥ 
उमा वोर्टी--पविच् मुसकानवाली देवि [ मै अपने 
पतिदेवकी कृपण सर्वश ह तो मी पूर्वक्रार्यै पतिदेवने सुमे 
इसका उपदे दिया था | तमी मुघ्चे इस श्म पुण्यक- 
विधिका साक्षात्कार हुमा ॥ १॥ 
सनातनः पुण्यविधिरिति वुद्धयावगम्यताम्‌ । 
मदादेवप्रसप्रेन मया द्स्त्वरन्धति ॥ २ ॥ 
अरुन्धती | वुम्दं अपनी दुद्धिसे दख वातको निशित 
रूपे समस्च ठेना चाहिये किं पुण्यक-ध्तकी विधि सनातन 
दि । शुषे महादेवजीकी छृपासे उसका दर्यन (शन) हुआदै॥ 
पुण्यकानि च सखवौणि ची्णवत्यस्म्यनिन्दिते । 
अयुक्षया भगवतो भर्तुः शवस्य धीमतः ॥ ३ ॥ 
अनिन्दिते | मनि अपने पति बुद्धिमान्‌ भगवान्‌ शिवकी 
आङे समस्त युण्यर्कोका आचरण किया दै ॥ ३ - 
सतीत्वं घमचरणं यस्या नित्यमखण्डितम्‌ । 
पुण्यकानां विधिस्तस्याः पुरागेः परिकीर्तितः ॥ ४ ॥ 
जित नारीको सतीत्व ओर धर्माचरणका अखण्डित 
रूपते निर्वाह षदा अभीष्ट दोता दैः उषीकरे च्वि पुरातन 
महरपियेनि पुण्यरकोकी विधिका प्रतिपादन क्रिया दै ॥ ४॥ 
दानोपवासपुण्यानि , सखुङूतान्यप्यसन्धति 1 
निष्फलान्यसतीनां हि पुण्यकानि तथा द्युमे ॥ ५ ॥ 
चमे ! अरुन्धति ! असती नारियोके दवारा मलीर्मोति 


किये जनेपर भी दान जर उपवास्करे पुण्य तथा पुण्यक 
निष्फल हो जते ई ॥ ५॥ 
या वञ्चयन्ति भतरं योनिदुष्टश्च याः खियः। 
योनिदोपात्‌ पुण्यफङं नादनन्ति निर्यङ्कमाः ॥ ६ ॥ 
जो लियो अपने पतिको ठगती ६, उन्दँं धौला देती ई 
जिनकी योनि जारघद्गसे दपित हो गयी टैः वै उख योनि- 
दोपके कारणं पुण्यका फल न्ह भोगने पार्ती; नकम दी 
गिरती दै ॥ ६ ॥ 
साष्व्यो जगद्‌ धास्यन्ति खुश्षीखाः पतिदेवताः । 
अनन्या घर्मनित्याश्च सतीपन्थानमाधिवाः ॥ ७॥ 
जिनके आचार-विचार शुद्ध ईह, जो परतिको दी आराध्यदेव 
मानती ई» उनमें अनन्य भावे अनुरक्त होती दै, सदा धर्मके 
अनुष्ठाने ठगी रहती ई ओर सतिरयोके परथपर दी चल्ती ई 
वे साध्वी लियो ष्टौ शस जगत्‌को धारण करती ई ॥ ७ ॥ 
अवाग्दु्ाः शोचथुक्ता धृतिमतः श्भवताः। 
सततं साधुवादिन्यो धारयन्ति जगत्‌ खलु ॥ ८ ॥ 
जिनकी वाणी परनिन्दा ओर असत्य आदि दोपे दूषित 
नदी है, जो बाहर-भीतरसे जचद रहनेवाटी ६, ज धेर्यशालिनी 
तथा दुम ब्रतका पालन करनेवाली ई, जो सदा अच्छी दी 
बात बोला करती है वे साध्वी किर्या इस जगत्‌को धारणं 
करती ई ॥ ८॥ 
स्याधितः पतितो चापि दीनो वापि कथञ्चन । 
न त्यक्तव्यः सिया भतौ धम एष सनातनः ॥ ९ ॥ 
अपना पति रोगी हो, पतित हो अथवा दीन ट, नारीको 


विष्णुपदं 1] 


अ्सप्ततिवमो ऽध्यायः 


५२५ 


व= 


किती तरह भी उसका त्याग नरह करना चारि । यहं 
` सनातन धर्म ६॥ ९॥ 
अकार्यकारिणं घापि पतितं धापि निंणम्‌। 
स्री पति तारयत्येव तथाऽऽत्मानं श्चुभानने ॥ १० ॥ 
शुभानने ! पतिव्रता छ्जी अपना तथा न करनेयोग्य काम 
करनेवाले पतित ओर गुणदीन पनिका मी उद्धारकरदही 
देती दै ॥ १० ॥ 
योनिदु्टसियो नास्ति प्रायश्ित्तं दतैव सा । 
वाग्दुटे विदितं सद्भिः प्रायध्ित्तं पुरातने ॥ १९॥ 
जिस ल्रीकी योनि दूषित हे, उसकी खद्धिके ल्मि कोई 
प्रायश्चित्त शी नहीं है । वह तो अपने परापके द्वारा मारीदी 
गयी | जो केवल वाणीके दोषे दप्ित है, उखकी छद्िके 
व्यि सम्पुखपोनि वेदय प्रायधित्त बताया हे ॥ ११ ॥ 
भवंश्छन्देन कर्तव्यं तकं सर्वदा सिया । 
उपवासोऽपि वा सत्ये काङ्घुन्त्या खुूतां गतिम्‌॥ १२॥ 
सत्यपरायणा अरन्धती ! जो पुण्यात्मार्ओको प्राप्त 
होनेवाखी गतिकी अभिलाषा रखती दो, उस ख्ीको अपने 
पतिकी आज्ञाके अधीन होकर टी सदा व्रतका पाटन अथवा 
उपवास करना चयि ॥ १२॥ 
कल्पान्तरखदस्रेषु न खी सा भते गतिम्‌ । 
तिर्यभ्योनिसखहसरषु पच्यते योनिषिष्रुवात्‌ ॥ १३॥ 
योनि दूषित करनेते नारी पञ्-पक्षी आदिकी सदर्खो 
योनिरयेमिं जन्म ञेकर कष्ट भोगती है । वह खरी सदस कर्पर 
मी सद्रति नहीं पाती ॥ १३ ॥ 
यदि सा नाम मादुष्यं खी छभेदसती सती । 
चण्डालयोनौ दुर्मेवा जायते कुक्छुराशना ॥ १४॥ 
यदि असती होकर रहनेवाटी नारी मरनेके माद कभी 
मनुष्ययोनि जन्म ठेती है तो चाण्डारयोनिमे ही उसकी 
उत्पत्ति होती है ओर वह खोरी बुद्धिवाटी खी कुत्तोका मांस 
खानेवाटी चाण्डाटी होती है ॥ १४ ॥ 
भती देवः सदा स्रीणां सद्धिर्द्टस्तपोधने । 
यस्या हि तुष्यते भतौ सा सती धरमरचारिणी ॥ १५॥ 
तपोधने  खि्योके च्वि सदा पति दी देवता ३। 
सत्पुर्षोनि इस सत्यक्रा साक्षात्कार करिया ह । जिस स्रीपर 
उसका पति संतुष्ट रहता दैः वह सती एवं धर्मचारिणी है ॥ 
कौवृहलष्टतानां तु खरीणां रोको न श्ोभनः। 
भरतयेव मनो यासां सद्धाचेन व्यवस्थितम्‌ ॥ १६॥ 
जो कौतूदख्वदा परपुरर्पोका सङ्ग करे मारी गयी दै, 
उन छिर्योको कमी उत्तम ठोककी प्राति नदीं होती । जिनका 
मन सद्धावपू्वंके केवर पतिम ही ल्गा रहता है, उर्न्दकि 
सती समक्षना चाद्ये | १६॥ 


र्मणा मनसा वाचा पतिं नातिचरन्ति याः । 

तासां पुण्यफटं सौम्ये पुण्यकैः समुदाष्टतम्‌॥ १७ ॥ 
सौम्य खभाववाटी अरन्धती ! जो नासि मनः बाणी 

ऊौर क्रियाद्वारा पतिका उस्लद्चन न्दी करती ई उर्न्दीको 

पुण्यक्तेद्वारा पुण्यपखकी प्राति यतायी गयी दै ॥ १७ ॥ 


पुण्यकानां विधिं त्स्नं खर्ोकग्रतिोभने । 
निवोध खह सर्वाभिर्रष्टो यस्तपसा मया ॥ १८ ॥ 
खर्गलोककी शोमा बदानिवाटी देवि ! मनि तपस्याद्वार 
निखका साक्षात्कार किया दै, पुण्य्कोकी वद सम्पूणं विधि 
वतायी जाती है ! ठम इन सारी लियोके साथ उसे ध्यान 
देकर सनो ॥ १८ ॥ 
स्नात्वा खी भ्रातस्व्थाय पतिं धिक्षापयेत्‌ सती । 
उपवासार्थमथ वा वबतकार्थं धृतमते ॥ १९॥ 


नत धारण करमेवाखी देवि { साध्वी खीको चाहिये कि 
वह प्रातःकाख उठकर सान करके पश्चात्‌ पतिकरो यह सूचित 
करे किं आज मुञ्चे उपवास अथवा ब्रत करना है ॥ १९ ॥ 


श्वद्युराभ्यां च चरणौ सततं सत्तमस्य च । 
ग्रहायौदुम्चरं पां सकुशं साक्षतं तथा ॥ २०॥ 
गोण्डः दक्षिणं सिच्य प्रतिगरह्णीत तजलम्‌। 
ततो भर्तः सती दयात्‌ सतस्य प्रयतस्य च ॥ २१९॥ 
आत्मनोऽपि निषेक्तन्यं ततःरिरसि तज्ञखम्‌ । 
बेोक्यसर्वतीथंपु  सनानमेतदुदाहतम्‌ ॥ २२॥ 
वह्‌ सास-ससुर तथा साधु-महात्माके चरर्णोमि सदा प्रणाम 
करे; फिर कुश ओर अक्षतते युक्त ताम्रपात्र ठेकर गायके 
दाहिने सीगको नहलाकर उस जख्को ग्रहण कृर ठे । इसके 
वाद सती स्री स्नान करके एकाग्र चित्त हुए पतिके मस्तकपर 
उस जख्को छिडके । तदनन्तर अपने मस्तकपर भी उस जल्के 
छटि डाले । यह्‌ न्िरोकीके सम्पूणं तीर्थो सञान वताया गया है ॥ 
उपवासेषु कर्तव्यमेतद्धि चतक च। 
सख्रानमेतद्धि सामान्यं खीणां पुंसां च भामिनि॥ २२॥ 
भामिनि ! उपवास ओर बरतके अवसररपर यह स्नान 
अवद्य करना चाहिये ¦ यह लछ्ियोँ ओर पुरक स्थि सामान्य 
स्नान है ॥ २३॥ 
अरुन्धति मया दषं तपसया हरतेजसा । 
अश्चल्यविद्धं शयनमासनं च तथाविघम्‌ ॥ २४ ॥ 
अरुन्धती ! मेने महादेवजीके तेन ओर अपनी तपस्यासे 
देखा दै किं दस तरतमे नारीके स्मि ेसी शय्या होनी चाये, 
जो कण्टकविद्ध न हो] आखन मी वैसा दी होना चाये ॥ 
स्यं भरक्षाखनं चापि पादयोरलुशब्दितम्‌ । 
अश्चप्रपातो रोषश्च कश्च कृतः सति ।- - 
उपवासाद्‌ वत्ताद्‌ ब्रापि सयो भ्रंशयति खियः ॥२५॥ 


५२६ 


धरीमषहाभारते चिटभागे 


{[ ्टस्विंरो 


उसके चयि अपने पैरोको सयं दी धोनेका विधान ६ । 
साध्वी अदन्धती } यदि ओष गिरावा गया, रोप ओर कद 
क्रियां गया तो वह लिर्योकरि तत्काल ही उपवा ओर व्रतके 
पुण्ये भ्रष्ट कर देता है ॥ २५॥ 
श्युक्टमेव सदा वासः प्रहरास्तं चन्द्रसम्भवे। 
अन्त्वासो ऽपरं चैव उपचासे घते तथा ॥ २६॥ 
चन्द्रकुमारी ! उपवास तथा व्रतम सदा वेत वलन धारण 
करना दी उत्तम माना गया दै | साक भीतर प्क दूस 
वल्ल ( पेरीकोर आदि ) भी डर ठेना चाटिये ॥ २६ ॥ 
पादुकार्थं॑तणैः कार्यं सर्वदा चतके सति । 
उपवासेऽपि च विधिरेष पव प्रवर्तितः ॥ २७ ॥ 
साध्वी अरुन्धती | व्रते अवप्तरपर उपयोगर्मे लनेके 
च्ि सदा येत आदि वूर्णोकी दी पादुका वनवा लेनी चादिये 
( चमडेकी पादुका नदीं धारण करनी चाहिये ) । उपवासं 
भी) यदी विधि चलयी गयी है ॥ २७॥ 
अञ्जनं सेचनं चापि गन्धान्‌ सुमनसस्तथा | 
च्रतक्रे चोपवासे च नित्यमेव चिचर्जयेत्‌ ॥ २८॥ 
सती नारीको चाहिये किं वह त्रत तया उपवाख्क 
अवसरपर अञ्ञन, गोयेचनः भति-मकिकरे गन्ध ओर पूर्लका 
सदा दही परित्याग करे ॥ २८ ॥ 
दन्तकाष्ठं शिरःस्रानसुद्धर्तनमथापि वा। 
विवर्जितं सदा स्यं रौचार्य॑तु चिधीयते ॥ २९॥ 
इस व्रतम नारके व्यि काठकां दातौन करना, विरके 
ऊपरसे नहाना अथवा अद्धि उवटन ट्गवाना वर्जित दै । 
सव प्रकाश्की शुद्धिके चि गृक्तिकाके दी उपयोगका विधान ॥ 
व्रिल्वामरतफरैनिंत्यं श्रीफटेश्च समाचरेत्‌ । 
प्रक्षालनं वै रसः सामुन्मिधितैर्जटेः ॥ २०॥ 
वेट; दरे या ओवद्य तथा श्रीफल्ते जिसमे मिद्रीन 


मिटी हद्‌ होः संयुक्त जक्करे द्वारा सदा दी अपने पिको 
धोना चाद्ये ॥ ३० ॥ 


रिरसोऽभ्यञ्चनं सौम्ये नैव तावत्‌ धरदास्यते । 

न पादयोनं ग्रस्य स्नेदेनेति स्थितिः स्मरता ॥ २१॥ 
सौम्ये | दए व्रतम चिरका अभ्यद्न अर्थात्‌ उचयन या 

्रेखनका चूर्णं लगाकर नहाना नदीं यच्छा माना गयादे। 

वैस अथवा समूचे शरीरम भी ते न म्ले । यदी मर्यादा 

मानी गयी ट ॥ ३१॥ 


गोयानमषरयानं च खस्यानं च वर्जितम्‌ । 
नस्रस्नानं च सततं चते चाप्युपवासकरे ॥ ३२॥ 
प्रत्येक वत र उपवास वैल, ऊट जीर गदि वुते 
टर वादनका उपयोग वित दै । उसमे कमी नग्न स्नान नहीं 
करना चादिये ॥ ३२॥ 
नदीजलं प्रस्रवजं प्रशस्तं सोमनन्दिनि। 
छ्यभे तडगि चाप्यादौ विस्तीर्णे जलजायुते ॥ ३३॥ 
गत्वा स्नानं प्रास्तं तु सदैव खदु सर्वथा । 
सोमनन्दिनि ! नदी ओर चसमेका जल उत्तम माना गया 
दे ! कमलेति मण्डितः सुन्दर एवं वि्टृत पोखर या चावदधी 
आदिर्य जाकर स्नान कसना खदा दी उव प्रकारे प्रशस् ६ ॥ 
अलाभे त्ववरुद्धा स्री घरस्नानं समाचरेत्‌ ॥ ३४॥ 
नवे कस्भैः स्नातव्यं विधिरेष पुरातनः। 
स्नानं च कायं शिरसा तपःफरूमचष्घुयाद्‌ ॥ २३५ 
निके व्यि बाहर जानेपर रोक है, वद्‌ परदेके भीतर 
रहनेवाटी नववधू नारी तडाग आदिर्भ खानका खुयोगन 
मिल्नेपर षर्दोकि जलसे स्नान करे | वद नये धदुकि जल्से 
स्नान कर-यदी प्राचीन विधि द। ८ त्रत्रे षिवा अन्य 
अवसर्सोपर ) सिरफे ऊपरसे स्नान करना चाद्ये । इस्पे 
तपस्याका फल प्राप्त दता दै ॥ ३४.२५ ॥ 


इति श्रीमहाभारते विकभागे हविरो विष्णुपर्वणि पारिजातहरणे पुण्यकरविधो अष्टसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७८ ॥ 


इस प्रकार श्रीमहाभारते दिरुभाग दसिवद्के अन्तरत विष्णुपर्वमे परिमितदरणपे प्रर्मे पएुष्यन्धितिषयक 
अठहत्तरवे अध्याय पुरा हुमा ॥ ७८ ॥ 


एकोनाशीतितमोऽध्यायः 


पुण्यक-वरतसम्बस्धी नियम एवं दानका वर्णन तथा पुत्र आदिके निमित्त 


॥ 


किये जनेवाले दूसरे चत एवं दानका प्रतिपादन 


दव उमोवाच 
विधिननेतेन छृत्स्नेन सखी सद्‌ा भ्ैदेवता। 
चरेद्‌ संवत्सरं दान्ता पण्सासानः मासमेत्र च ॥१॥ 


उमा कहती है--देवि ! पतिता स्री इस सम्पूर्ण 
विधिके सायण वर्प या छः मास अथवा एक मासतक्र 
खदा इन्दरिय-संयमपूर्वकर वतका भचरण करे ॥ १॥ 


विष्णुपर्व 1 


पक्रोनाश्ीतितमोऽध्यायः 


५२७ 


सियो दयाबादयेत्‌ साध्वीरेकादश्च समाधिना । 
स्वयं चैव विधिर्द्रो चतकानां मया द्युभः॥ २॥ 
इसमे ग्यारह साध्वी च्िर्योको घुखना चाये । मैने 
स्यं ही समाधिक्रे द्रवाय त्रतेक्रि दस श्युम विधानका साक्षात्कार 
कियाहै॥२॥ 
अद्धिर्द्यात्‌ सतीः सवौ या मूलचतिनी भवेत्‌ । 
तासां तु निष्क्रयो देयः कार्देशाञुरूपतः ॥ ३ ॥ 
मूल व्रतका अतुष्ठान करनेवाखी प्रधान खी अपने यर 
आमन्नित की गयी उन समस्त ग्यारह सति्योका दान करे 
ओर देश-कालके अनुसार उनका निष््रय दे दे* ॥ ३॥ 
ततो मालान्तद्युक्छस्य तिथौ च नवमी तथा । 
आराधयित्वा कर्तव्यं वतकस्यापवर्जनम्‌ ॥ ४ ॥ 
तदनन्तर मासके अन्तम श्युक्ल-पक्षकी नवमी तिथिको 
देवाराधना करफे व्रतको समाप्त करना चाहिये ॥ ४ ॥ 
उपवासमहोराच्रं बतकं चापि निथितम्‌ । 
आदौ चान्ते च कुर्वीत चतकस्यापि सिद्धये ॥ ५ ॥ 
्रतके उदूदेष्यसे उखकी विद्धिके व्यि आदि ओर अन्तमे 
निश्चितलूपसे एक दिन ओर रात्रा उपवास करना चाद्ये ॥ 
छुरक्म॑तते भर्तुरात्मनदवैव कस्येत्‌ । 
उत्साषनं च स्नानं च तस्िन्नहनि संस्म्रतम्‌ ॥ £ ॥ 
तदनन्तर अपने पतिकी दजामत वनववि ओर अपना भी 
नखमात्र कया ठे! उसी दिन नतान्त स्नान तथा ब्रत्तके 
उन्यापन या उत्स्गका विधान है ॥ ६ ॥ 
ततो चिवाहवत्‌ स्नानं विहितं पुण्यके श्ुमे । 
मण्डनं चैव विहितं साद्यघारणमेव च ॥ ७ ॥ 
यमे ¡ पुण्यकर-नत्मे भी विवाहके समान दी विपिपर्वक 
स्नान केकी आज्ञा है । उसमे श्ङ्गार ओर माल धारण 
केका विधान है ॥ ७ ॥ 
कुम्भैस्तु स्नाप्यमानेमं साध्वी मन्तसुदीस्येत्‌ । 
भर्तुः पादौ नमस्कृत्य मनसा वाथ वागिरा॥ ८ ॥ 
 धडोके जले नहलमयी जाती हई व्रतपरायणा साध्वी 
सत्री अपने पतिके दोनो चरणौको मन अथवा वाणीद्यासय 
नमस्कार करके निम्नाङ्कित मन्नका उचारण करे--॥ ८ ॥ 


# इने पंत्तिरयोको देखकर यदह अनुमान होता ईद किं प्ले 
जिन ग्यारह सती लियोका उनके पति्योकी अनुमतिते आवाश्न 
किया जता दैः उनका व्रनचारिणी खी पुनः उनके पतिर्योको दी 
दाने कर देती ई) देड काठके अनुरूप निष्क्रय देकर पठे छन्द 
स्पनी नाती दै ओर्‌ फिर उनक्तो उनके पदियोको ही संफरपपूव॑क 
सोपकर्‌ दानजनित पुप्यकी भागिनी होती ई 1 


च~ ~--~- ~~~ 


आपो देव्य छ्रृपीणां हि विद्वधाभ्यो 
दिव्या मदरन्त्यो याः श्दुरा धर्म॑घात्यः। 
हिरण्यवर्णः पावकाः शिवतमेन 
रसेन धेयसो मां जुषन्तु ॥९॥ 
पनी अयिषठात्री देवी छषिरयोकी जननौ, समम 
विश्यकी माता; आकायसे प्रकट होनेवारीः हषं प्रदान करने- 
वारीः कल्याणक्रारिणीः धर्मके पोपणमे ततवर) सुवर्णे समान 
वर्णवाटी, निर्मल तथा सव्करो पावनं यनानेवाटी है ] वद 
अपने परम कल्याणमय रसके दाय मूदच श्रेयका भागी बनावे" | 
अपामेष स्ते मन्नः सर्वत्रान्यत्र मेश्टणु | 
मन्बाः पुराणविदिताः स्रीणां स्वाद्गखोभने ॥ १०॥ 
सर्वाङ्गशोमने देवि { यद जटसम्बन्धी सन्त सर्वत्र 
उपयोग सया जाता दै । अन्यत्र लिये स्नानके ल्यि 
पुराणविदित मन्व उपटन्ध होते ई । उन्दै भुश्चसे सुनो ॥ 
श्चभान्यया गुणिनी युक्तधमौ 
भनी साकं मम दास्या वरेण । 
मा कर्मणा मनसा चापि वाचा | 
भरभैवेयं रषती स्यां वशाङ्घा ॥ ११॥ 
म पतिके स्थि कल्याणकारिणी दो । धन आदिते 
कभी क्षीण न होऊं । सदगुणवत्ती हे । सदा पतिके साय 
ध्म खंङगन रह । मै अपने खामीके साथ दासीके समान 
रहकर उनकी छोरी-ठे-छोरी भी सेवाः््ल खयं ही कक । 
सदा पतिके अधीन रहं ओर मन, वाणी तथा क्रियाद्वासा 
भी कमी उनसे सुट न होऊ ॥ ११ ॥ 
सपल्नीनामधि नित्यं भवेयं 
सपुत्रा स्यां सुभगा चारुरूपा । 
सस्पश्नहस्ता गुणवादिनी च 
स्वौत्मना स्यां मा दरिद्रा भवेयम्‌॥ १२॥ 
सपलिनरयोमे मेरा खान सदा सव्रसे ऊपर हो । मै पुत्रवती, 
सौमाग्यवती ओर मनोहर रूपवाली हो । मेर दाथ सदा सम्पन्न 
रदे अयात्‌ मँ भक्तहल दोकर दान कर सुर । मँ सम्पूर्य 
छदयसे सदा दृसरोके रुर्णेक्रा दी चखान कर ओर कमी 
दखिन दोऊ॥ १२॥ 
पतिश्मे स्यात्‌ खसुखो मल्तीक्षो 
नित्यं मद्भक्तः स्यान्मन्मतिर्मद्रतिष्च। 
प्रीतिश्च नौ स्याच्चकवाकालुरूपा ` 
मनोविरागोन भवेत्त्‌ साुचत्‌ स्यात्‌ ॥१२॥ 
मेरे पति मी खदा प्रस्नमुख रहकर भेरी प्रतीक्षा करनै- 


-वाले हो, उनक्रा सदा मुद्ध अनुराग वना रहे । उनकी मति 


ओर गति मेरी ही ओर रदे । हम दोर चकवा ओर ्वकवी- 
फे समान भेम वना रे । हमरे मनम कमी-एक दूसरके भरति 


५२८ 


श्रीमष्ठाभारते सिटभागे 


[ हरिषे 


विरक्तिन ह्यो ओर हमारा व्यवह्यर सदा श्रेष्ट पुरर्षोकि 
समान दो ॥ १३॥ 
लोकान साध्वीनासुत्तमानां बजेयं 
याभिः सर्च धार्यते विश्वरूपम्‌ 1 
उमे फुखे याः श्चुभाः पावयन्ति 
पितुमंर्त्च पतिभषत्योर्जिताश्च ॥ १४॥ 
जो शुभलक्षणा देविर्यो पतिभक्तिके प्रमावसे गक्तिशालिनी 
होकर पिता ओर पति दोनकि कुर्लोको पावन बनाती ह तया 
जो अपने धर्मसे इस सम्पूर्ण विदवको धारण करत) £ उन्दी 
उत्तम पतिता देविर्योके खोकेमिं मै जाऊँ ॥ १४॥ 


भूमिवौयुजरमाकामभि- 
रन्तःकषे्र्षः प्रतिय महां । 
अष्कारख् मम साये नियुक्ताः 
स्मरेयुमें निश्चयं च चतं च ॥ १५॥ 
प्रध्वीः वायुः जल) आकाशः अग्नि, अन्तर्यामी क्षेनत 
प्रकृति, मदत्तस्व ओर अदद्कार--दन स्वको मैने अपना 
स्च बनाया है । ये मेरे स निश्चय जीर तको स्मरणरै ॥ 
यैररन्धो देहिनां भौतिकोऽयं 
विधिः सत््वायैभूतयुक्तैः सवीजैः। 
खन्त्वेते मे साक्चिणः सवंसंस्था 
नते चास्मिन्‌ निश्चये चापिनित्यम्‌ ॥ १६॥ 
जिन सत्व आदि गुनि भूतो ओर उनके कर्मबीजसि 
युक्त हो देदधारियोके इस भौतिक शरीरका निर्माण करिया है, 
वे जीर उनके अभिमानी देवता जो सरमे सित, मेरे इस 
त्रत ओर निश्वयमे सदा साक्षी बने रद ॥ १६॥ 
चन्द्रादित्यौ पुण्यसाक्षी यमश्च 
दिशाः सवौ दश चात्मा च मेऽयम्‌) 
सन्त्वेते वै साश्चिणः सर्वसंस्था 
घते चास्मिन्‌ निश्चये चापि नित्यम्‌ ॥ १७॥ 
चन्द्रमा, सूरय, पुण्यके साक्षी यम, सम्पूर्णे दरस दिर 
ओर मेरा यद आत्मा-ये सत्रे खित रदनेवाले देवता मेरे 
इस बरत एवं निश्चयम सदा साध्वी वने रहं ॥ १७॥ 
मन्तेरेतैः पुणणोकतैः सर्व॑द्रव्याभिमन्बणम्‌ । 
घतचयौत्‌ भ्रश्रति वै पुराणे समुदाहतम्‌ ॥ १८॥ 
तरते आरम्भते लेकर प्रतिदिन इन पुराणोक्त मन्न 
दारा समस्त द्र्व्योकको अभिमन्तित करना चाद्ये । यद 
पुराणम कदा गया है ॥ १८ ॥ 
सात्वाथ वाससी दयाद्‌ भतः कव्यं खयं श्ुमे । 
अथात्मक्र्तितं न स्याच्छुभे विभ्तेन केनचित्‌ ॥ १९॥ 
वासो ऽन्यदरेव दया च्ेतं मुख्यं नवं शुचि । 
सखकर्तितं च षं त बाखसा तेन परिधये ॥ २० ॥ 


शुभे । स्नान करके अपने पत्तिको स्वयं दी सूत कातकर्‌ 
वनाये हुए दो वस्र मेंट करे | यदि किसी विध्न विशेषके 
कारण भपने दी काते हुए सूतका वल्ल न हो तो दूय दी 
वस्र दै दे | वद वलन शद्ध, नवीनः उन्तम ओर्‌ दवेत 
वर्णका होना चाये । उख वस्करे साय अपना कात हूना 
सूत भी मिला दे ॥ १९-२०॥ 
ततो दिजं श्चचि दान्तं शनयिकानकोषिदम्‌ । 
भोजयेच्च यथादाक्त्या सह भौ सुमध्यमे ॥ २१ ॥ 
खमध्यमे ! तदनन्तर सान-विश्चानकोविदः पवित्र; 
ज्तिन्द्िय ब्राह्मणको अपने पतिके खाय विठाकर्‌ यथाशक्ति 
मीजन करये ॥ २१ ॥ 
ब्राह्मणस्यापि दातन्यं वासोयुग्मं म्ातपे 
शय्यासनं ग्ट धान्यं दासं दासीं तथैव च ॥ २२॥ 
अलंकारः क्क्तिसश्च रत्नपर्वत प्व च। 
सर्वथान्यसमुन्मिधस्तिरैश्च सविरोयतः ॥ २३॥ 
वासोभिख प्रतिच्छन्नो नानावर्भीरखन्धति 1 
हस्त्यग्वावचयदसैव देया मौरेव च धुवम्‌ ॥ २४॥ 
महन्‌ तप करनेवाखी देवि ¡ अखन्धति ! ब्राह्मणको 
भी यथासम्मव जोडा वस्र; शय्या, आसनः गहः धान्यः 
दासदावी, आभूषणः खव प्रकारके धार्यो जौर विदोषतः 
तिटेसि मिभित रत्नमयं पर्वत, ओ नामा रंगकरे वल्षि 
आच्छादित दो, यथाशक्ति दान करना चाहिये ! सम्भवो 
तो हाी-षोर्दौका समूह्‌ दिया जाय अन्यथा एक गौका दी 
दान फर दिया जाय] यथादक्ति दान देना आवद्रयक 
दै ॥ २२-२४॥ 
छखवणप्रतिमां दद्यान्रवनीतस्य चापराम्‌ । 
शडस्य मघुनदर्वेव खवर्णस्य च शोभनाम्‌ ॥ २५॥ 
नमकः माखनः गुड़, मघु ओर सुव्णकी त्नी हु 
प्रथक्‌ थक्‌ उमा-मदेश्वरकी सुन्दर प्रतिमाका भी दान 
करना चाये | २५ ॥ 
तथैव सर्वगन्धानां रसानां पृथगेव च। 
तथा खुमनसां दद्याद्‌ रौप्यस्यौदटुम्बरस्य च ॥ २६॥ 
फलानां चैव सर्वेषां वाससामपि नन्दिनि । 
चिघ्रपरतिरुतिं चैव काष्ठस्य प्रतिमां वथा ॥ २७॥ 
नन्दिनि | उखी तरह सव्र प्रकारके सुगन्धित पदार्थो, 
रसो, पूली, चौदी, सम्पूणं फलः, व्र, चित्र जओीर काष्ठकी 
प्रतिमाका भी यथासम्भव दान करना चाद्ये ॥ २६-२७॥ 
दिलां भ्रतिङूतिं चैव दधोऽथ पयसस्तथा । 
सर्पिषा दुर्वया चैव या चान्यामध्यभीष्सति ॥ २८॥ 
प्रसरः दूषः दष्टी, घी ओर दुर्वाकी प्रतिमाको तथा 
अरे तरहटकी प्रतिमाको भी, जिते तम देना चाहोःदे 
खकती हो ॥ २८ ॥ 


विष्णुपव ] 


पकोनादाीतितमेोऽध्यायः 


५२९ 


[नााककााककाककषककाकवकाकाककाककताकववकवय कनिका 
~~~ --~-------------------~---------------~---------~--~--- --------------------~----------------------- ˆ~ 


कारुदेदादुरूपं च देयं बिभवतः सति । 

अल्पं वा बहुं वापि भर्ठरखन्देन सर्वदा ॥ २९ ॥ 
पतिव्रते ! अगर घर्म वैभवदहो तो स्वामीकी आश्ञाके 

अनुसार खदा देद्राकाल्करे अनुरूप शरोदा-बरहुत दान अवद्य 

देना चाद्ये ॥ २९ ॥ 

तिरुपाघ्नं प्रदातव्यं ने देयं नञ्च श्लोभने। 

गोस्त्वयदयं प्रदातव्या कपिला कास्यमेव च ॥ २०॥ 
शोमने ¡ तिट्से भरा हया पात्र भी देना चादियेः 

परत स्वामीक्री आक्ञाके चिना कोर वस्त नदीं देनी चाद्ये । 

उनकी आक्ञा मिक जानेपर कपिखा भी तथा कोस्िपात्रका 

दान अवश्य करना च्िये ॥ ३० ॥ 


कछष्णाजिनं च सुभगे सतिलं वाससरान्वितम्‌ । 
आदश्तद्वैव श्रूर्चश्च तथानिनमनिन्दिते ॥ ३१॥ 
पतद्‌ दर्वा सर्वकामानामनोति वरवर्णिनि । 
पुरोऽधिफा पुत्रवती खभगा रूपभागिनी ॥ २२॥ 
सुष्स्ता धनास्था च सरी भवत्यमेक्षणा । 
इच्छया रभते चैव कन्या रूपगुणान्विताः ॥ ३३ ॥ 
भवन्ति सुभगश्वयौस्तयेव च पुरोऽधिकाः। 
पुत्रचत्यो धनाद्याश्च श्चीरवत्यश्च नित्यदा ॥ २७ ॥ 
खभमे ¡ अनिन्दिते ! काल मगचर्मः तिल; वलः 
दर्पणः कुखाखन ओर मृगचर्मका मी दान करना चाये | 
वरवणिनि ! इन सव ॒वस्तुओंका दान करके नारी सम्पू 
कामनार्यको प्रात कर छेती है ओर नारि्यमिं अग्रगण्यः 
पुत्रवती; सौभाग्यवती; रूपवती; छद दायवालीः 
धनाय्य तथा निर्म॑रु ने्रवाली होती हि । व 
इच्छामात्रसे एेखी कन्यार्प प्रा कर छती दैः जो 
रूप-गुणसे सम्पन्नः सुभगाः आश्चरययुक्त गुणवाली 
अग्रगण्यः पुत्रवती, धनाठव्य तथा खदा सुशीर रोती ईै॥ 
अख्न्धति कतं होतन्मयैव प्रथमं यतः । 
उमाव्रतकमिव्येव स्यातमघ्न महीतरे ॥ २५॥ 
अरन्धति | यने दी परे इस ब्रतका आचरण करिया ईैः 
एसच्िये ष्ट प्रथ्वीपर यह्‌ उमातरतके नामसे विख्यात होगा ॥ 
पतद्रेवोत्तमं स्रीणां बतं तस्मात्‌ समाचरेत्‌ 1 
सर्व॑कामानवाप्नोति दखेवैतदनिन्दिते ॥ २६॥ 
लियो चयि यदी सत्रे उत्तम बत दै अतः दसका 
आचरण अवश्य करे । अनिन्दिते † इस ततकरे ल्म विदित 
यह दान देकर नारी सम्पूर्णं कामनार्भको प्रात कर लेती दै ॥ 
पतद्रतक्से शेव देवदेवो घुपध्वजः। 
पुराभिषिक्तवान्‌ सौम्ये प्रिया मम सर्व॑रुत्‌ ॥ ३७ ॥ 
सौम्ये इसी नतक पुण्यसे मेने देवाधिदेव भगवान्‌ 
शृषर्वज वको खरीद-खा लिया है | उन सर्वकष्टा महादेव- 


ओने मेरा पिय करने$ व्यि पूर्वकाल सुसने पटमदिषीके पदः 
पर अभिधरिकत किया धा॥ २७॥ - 
घतकस्यावसानेऽथ देयं भोज्यं च नित्यदा । 
सख्रीणां कामाः प्रदेयाश्च सराः कारदेद्रायोः ॥ ३८ ॥ 
व्रतके अन्तम सदा मोज्य-पदार्थोका दान करना चाद्ये 
चिकी अभीष्ट वस्र्जोका मीः जो देश-कार्के मनुस्य ह 
दान करना उचित ६ ॥ ३८ ॥ 
पकैकस्य प्रदातव्यं तकं घरवर्णिनि। 
छन्दतो ब्राह्मणानां तु देयमन्नं सदक्षिणम्‌ ॥ ३९ ॥ 
वरवर्णिनि ! बतके ज उपकरण द्रव्य ६, उनक्रा बरावर 
विमाग करके प्रत्येक ब्राह्मणको उपे देना चादिये तथा 
ब्राहयर्मोकी इच्छे अतुखार उन्दं दक्षिणाहि अन्नक् दान 
करना चाद्ये ॥ ३९ ॥ 
पायसं तत्र दातव्यं तके नान्यदिष्यते। 
नाघ्र भाणिवधः कार्यः पुराणे नियता श्वुतिः 1 ४० ॥ 
उस ब्रत्म खौरका दान करना चादिये । वसया कोई 
अन अमी नदीं ह । दसम प्राणिर्योकी दिंसा कदापि नदी 
करनी चाहिये । यद्‌ पुराणम्‌ निश्चितसूयसे कदा गया श्चुतिका 
सिद्धान्त दै ॥ ४०.॥ 
अथ दितीयं षक््यामि बतं सोमसमुद्धवे । 
मदादेवप्रसादेन दष्टवत्यसि यनच्छुभे ॥ ४१॥ 
चन्द्रकुमारी ! मे { अव मँ दूसरे तका वणन करेगी, 
जिसका मदादेवजीकी पति मेनि प्रत्यक्ष अनुमव किया है ॥ 
सौः पुत्रफखा नार्यः सद्धिरेतदुदादतम्‌ । 
तस्मादन्विष्यती दद्यात्‌ सयुत्रकरकाञ्छुभे ॥ ४२॥ 
शमे ! सत्पुरोका कथन टै कि सारी सिर्यो पुत्रस्म 
फलवाटी होती ह अर्थात्‌ पुत्रको जन्म देनेचे हौ उनका नारीत्व 
सफर दोता दै; अतः पुत्रकी इच्छा र्खनेवाटी खी पुत्रार्थिनी 
नारिरयोदयारा देनेयोग्य करको ( कमण्डलु्ओं ) का दान करे ॥ 
ज्येष्ठाषाडौ श्चभौ मासौ पुरोत विधिमाचरेत्‌ । 
अथवा ज्यष्ठमेवैकमापादं घा समाचरेत्‌ ॥ ४३॥ 
पहले जो विपि वतलायी गयी है, उका पुप्रार्थिनी खी 
वयेष्ठ ओर आषाद्‌ एन दो श्चम मार्खोतक पाटन करे यवा 
केषर स्येष्ठ या आपाद एक टी महीनेतक उसका आचरणं 
करे ॥ ४३॥ 
ततो माखद्यये पूर्णं मासे वा वरवर्णिनि । 
सपुनकरकान्‌ दद्यात्‌ फाणितप्रतिपूरितान्‌ ॥ ४४॥ 
वरवर्णिनि ! फिर ब्रतके दो मास अथवा एक ही मास 
पणं होनेपर पुत्रार्थिनी लिर्योद्यारा देनेयोग्य करक 


( कमण्डदओं ) का दान करे } उन सरमे रि अथवा चीनी- 
के दारयत भरे एने चाहिये ॥ ४४॥ 


५२० 


श्रीमहाभारते खिटभागे 


[ हरिवंश 


सपिंपः पयसर्वेव दधोऽथ मघुनोऽनघे। 
जलस्य च तथा दद्यात्‌ पूरयित्वा शारिप्रमे ॥ ४५॥ 
चन्द्रमाके समान कान्तिवुटी निष्पाप अरुन्धती | धीः 
दूध, ददी तथा जलवे मी कमण्डटु्ओकि भरकर उनका 
दान करे ॥ ४५॥ 
पकस्मे क्षानचवद्धाय सुताय नितात्मने । 
सपुच्रकरकान्‌. दद्याद्‌ यावन्तो मनसः प्रियाः ॥ ७६ ॥ 
नारीको चादिये किं वह्‌ उत्तम तका पाटन करनेवाठे 
तथा मनको वदाम रखनेवले एक दी श्चानवृदध बाह्यणको 
पुत्रार्थिनी छिर्वेद्ारा देनेयोम्य उतने कमण्डल्कं प्रदान करे, 
जितने उसके मनको अभीष्ट हों | ४६ ॥ 


दच्छेत खी दुहितरं स्रीणां कामकरं ततः। 
किचिद्‌ व्यं खुताकामात्‌ खता प्रामोत्यसंशयः।॥ ४५७।॥ 
जो नारी पुत्री प्राप्त करना चाहती दोः वह पुत्रीकी 
कामनति ब्राह्मणी सिर्योको कोरर एेसा द्रन्य देः जो उनकी 
इच्छा पूर्णं करनेवाख हो, रेखा करनेसे उते युत्रीफी प्राति 
होती है । दस्मे संशाय नदी र ॥ ४७॥ 
गोवौथ काञ्चनं वापि दक्षिणां प्रक्मस्यते। 
विप्रस्याच्छादनं देयमवद्यं उ शुचिस्मिते ॥ ४८॥ 
दक्षिणाके स्थि गौ अथवा सुवर्णको अच्छा व्रताया जाता 
है | पवित्र मुखकानवाटी देति } इस व्रतम नाद्यणको ओदने- 
के ल्ि व्र अवद्य देना चाहिये ॥ ४८ ॥ 
यक्ञोपवीवं तचतके दयान्नायी ग्युचिमता । 
सपुच्करका्णां त॒ विधिरुक्तो विपथ्िता ॥ ४९॥ 
पवित्रतापूर्वक वतरतकरा पाटन करनेवाली नारी तमे 
यज्ञोपवीतका दान करे । विद्वान्‌ पुरुप इसमे पुत्रार्थिनी 
लियो थि नियव कर्वोके दानका विधान ताते ई ॥ 


अपत्याख्यानयोगेन ब्राह्मणेभ्यः श्युचि्रता । 
संवत्सरं खुसम्पूर्ण नतधर्माद्धपाछिनी ॥ ५० ॥ 
करकानपि दद्याच्च पूर्णं संवत्सरे द्यमभे । 
अयुक्षया सदा भर्तः सत्यवादिन्यरुन्धति ॥ ५१९॥ 
खवर्णसू्ं विप्राय कौमुद्यां दातुमर्हति । 
यक्षोपवीतं विप्रस्य नतं संस्थाप्य कामिकम्‌ ॥ ५२॥ 
यश्चोपवीतं करकं दक्षिणां च खद्कितः। 
प्रयच्छती सती स्ीभ्यःसचीन्‌ कामान्‌ समदयुते॥५२॥ 
डमे ! वत-धर्मका निरन्तर पालन करनेवाली पवित्र 
व्रतधारिणी छी अपव्याख्यान योगसे अर्थात्‌ पच्छन्न संतान 
८ पुत्र ) की कामना होनेपर ल्लिङ्गं नक्षत्र ( पुष्यः इस्त 
ओर्‌ श्रवण.) के योगम यर स्रीलिक्ग संतान ( पुत्री) की 
इच्छा होनेपर ( सेदिणी आदि ) लीलिङ्ग नक्षत्रके योगम 
पूरे खालभरतक सुदा पतिकी माश्राठे करको ( करव ) का 


दान करे । सत्यवादिनी अरन्धती ! वपं पूर्णं होनेपर कार्तिक 
की पूर्णिमाके दिन ब्राह्मणको सुवर्णमूत्र ८ यङञोपवीत ) का 
दान करना चादधिये । कामनापूर्वक क्ये जानेवाले स बरतको 
समाप्त करके बराद्यणको योपवीतः कमण्डलु अर यथााक्ति 
दक्षिणा देनी च्धिये | जो सती-साष्वी ब्राह्मणी ल्ियेकरो 
उनकी खुचिके अनुकूठ वस्ुर्जोका दान कसती दै, वद षपरण 
कामनार्जौको प्राप्त कर ठेती ६ ॥ ५०-५३ ॥ 
नवं न भक्षयेद्‌ किचिन्नायी धान्यमथो फलम्‌ । 
पुष्पाणि नोपयुञ्ीत यावदेवं समाचरेत्‌ ॥ ५४॥ 
नारी जव्रतक दस प्रकार तका आचरण करे, तवतकर 
कोद नया अन्न अथवा फट न खाय ओर नये पूर्काभी 
उपयोग न करे | ५४ ॥ 
पकभकेन धर्मे पुण्यकं करतुमर्हति । 
ब्राह्मणाय तथा देयं भवश्च तदनन्तरम्‌ ॥ ५५॥ 
धर्मञ्चे | एक समय मोजन करके पुण्यक.त्रत करना 
चाहिये तथा पहले ब्राह्मणको भोजन देना चादिये, उसके वाद्‌ 
पतिको | ५५ ॥ 
एवं संवत्सरं कृत्या सुभगा र्पद्याज्नी 1 
भवत्यविधवा चैच स्री धनस्य तयेश्वरी ॥ ५६॥ 
एक वर्प॑तक रेवा करे नारी सीमाग्यवती, रूप-खीन्दयं- ` 
शालिनी, विधवा ओर धनक्री खामिनी होती दै ॥ ५६॥ 
चातीकानि न खादेद्‌ या खर पूर्ण परिवत्सरम्‌ । 
न सा पुत्रचिनादयं हि पद्यतीत्यवगभ्यताम्‌ ॥ ५७ ॥ 
जो खी पूरे एक वर्मतक बैगन नदीं खाती दै वह अपने 
पुत्रका विनाश नदीं देखती है, यद्‌ निश्चित सूपते जान लो ॥ 
शशकं स्छगमांसं वा नित्यमेव विवर्जयेत्‌ । 
नाप्नोति मरणं नारी प्रापभोति पतिदेवताम्‌ ॥ ५८ ॥ 
ख्ीको चाद्ये कि वह खरगोशः हिरन अथवा अन्य 
प्राणिर्योका मांस सदाके स्थि त्यागदे | एेसा करनेवाली स्री 
( अकाल ) मृत्यु या अस्रायुको नदी प्रात होती ओर पातिवत्य 
धर्मक पाठनका फर पाती दै ॥ ५८ ॥ 
अलावुं वजयेन्नासै तथेवोत्पादिकामपि । 
करम्ब काश्चन नायाद्‌ या भर्तः खखमिच्छति॥ ५९ ॥ 
जो खरी पतिका सुख चाहती हैः वद रौकी ओर पोर्ईको 
त्याग दे | सागका ङंठल ओर गूलर भी न खाय ॥ ५९ ॥ 
पूणं संवत्सरे दद्यादेकैकं शाकमादता 1 
सदक्षिणं पुत्रवती `भवत्येका पुरोऽधिका ॥ ६० ॥ 
इस प्रकार एक वर्धं पर्णं दोनेपर प्रयेक शाकका दक्षिणा- 
हित आदरपर्वक दान करे । एेखा करनेवाली छ्ी एक 
( सपत्नीरषित > पुत्रवती तथा अमरगण्या शेती १ ॥ ६० ॥ 


विष्णवं ] 


अश्ीतितमो ऽध्यायः 


[नी 


५३१ 


----------------------------------(नन च्च्य 


सयं प्रक्षालयाना सखी खपादवेवमादितः । 
पतिष्ठां लभते नित्यसुद्धेगं नाधिगच्छति ॥ ६९॥ 
जो इस प्रकार बतमे खित दो आरम्भसे दी अपने वैरयँ- 
को स्वयं ही धोती है, उसे सदा प्रतिष्ठा प्रात होती है ओर 
वह कमी उद्वेगे नदीं पड़ती ॥ ६१ ॥ 
दिवा या सूयैपूतेन वर्तयेत्‌ खी परतिता । 
एकं संवत्सरं पूर्णं रा्ाचन्नं विचजैयेत्‌ ॥ ६२॥ 
सा ज्यीवपुत्रा खुभगा भवस्यमसवर्णिनि । 
अधितिष्ठति सबौश्च सपल्यो नाच संदायः ॥ ६३ ॥ 
देवोपम कान्तिवाटी देवि ! जो पतिव्रता नारी पूरे एक 
वर्पूतक दिनम सूरयसे पवित्र हुए अननक द्वारा निर्वाद करती 
है ओर रतम भोजन व्याग देती है वह चिरजीवी पुस 
युक्त ओर सौभाग्यशाखिनी होती दै तथा सारी सौतोपर 
अधिकार रखती है; इसमे संशय नहीं है ॥ ६२-६३ ॥ 
पूर्णे संवत्सरे दयात्‌ सौवण सू॑सुत्तमम्‌। 
्ाह्मणाद्ाभिरूपाय दरिद्राय यरखिने ॥ ६४ ॥ 
एक वष पूरणं होनेपर वह रूपवान्‌, दरिद्र ओर यशसी 
ज्ाह्मणकरो सू्॑की उव्ण॑मयी उत्तम प्रतिमाका दान करे ॥ 
फलानि वाथ पुष्पाणि भक्ष्याण्यपि च सवता । 
दू्यादनस्तमितके चरितिच्रतका तथा ॥ ६५ ॥ 
अथवा उस त्रतक्रा आचरण करनेवाखी वह सुव्रता नारी 
सूर्ये अस होनेसे पूर्वं ही फल-पूल ओर मक्य पदार्थौका 
दान करे | ६५ ॥ 
या तथास्तमिते सूयं भुङक्ते सी नियता सती । 
चन्द्रनक्चत्नपूतानि भोज्यानि वरवणिनि ॥ ६६ ॥ 
सखा दयात्‌ काञ्चनं चन्द्रं नक्षत्राणि यरहानपि । 
अभिरूपाय विध्राय वासश्च डवणान्वितम्‌ ॥ ६७ ॥ 
वरवणिनि [ जो सती खरी पूर्वोक्त रूपे नत छेकर 
सूर्यास्त होनेपर दी चन्द्रमा ओर नक्षतरेसि पवित्र हुए भोज्य 


पदाथोका आहार करती है, बह मर्ष धूण होनेपर सुयोग्य एवं रूप- 
वान्‌ ब्राह्छणकों डुनर्णमम चन्द्रः नक्षत्र ओर ्रहकी भरतिमाका 
दान करे; साय ही उन्तम लक्षणे युक्त वस्र भीदे॥ 
चन्द्रशीतठगाच्ी सा भवत्यमरवर्णिनी । 
सुभगा द्रनीया च पुत्रवत्यपि भाविनी ॥ ६८॥ 
वह्‌ नारी चन्द्रमाके समान शीतक गा्रवाखी, देवोपम 
कान्तिते सुशोभित सौमाग्धवती, दर्दोनीया, पुत्रवती तथा 
पतिके प्रति अनुरक्त होती है ॥ ६८ ॥ 
पौणमास्यां तु सततं भ्रात सोमोद्येऽङ्गना । 
अध्यं दद्यात्‌ सुमनसां साक्षतं सङुशं तथा ॥ ६९ ॥ 
यावकं च वकि दद्याद्‌ दृघ्ा च सह संयुतम्‌ । 
णवं या करुते नित्यं सवौन्‌ कामानवापरुयात्‌ ॥ ७० ॥ 
वह कल्याणमयी ज्ञी सदा पूर्णिमाो चन्रोदय होनेपर 
अक्षत ओर छुशके साथ देवतार्ओको अर्यं प्रदान करे तथा 
दहीके साथ यावक ( पृ ) का नैवे अर्पण क्रे! जोली 
नित्य नियमपूर्वकं एेसा करती दैः वह्‌ समस्त कामनार्ओौको 
प्राप्त कर ठेती है ॥ ६९-७० ॥ । 
अदृष्ट या तु नादनाति सूयं नारी पतित्रता । 
दुर्दिने वाथवा ग्य्रे सेष्ठान्‌ कामानवाप्ुयात्‌॥ ७१॥ 
ओ पतित्रता नारी आकराशमे मे्धोकी धय छयी होः 
अथवा वादे रहित स्वच्छ आकाश रोः सूर्यका दर्शन 
कि भिना भोजन नहीं करती दैः वह अभीष्ट कामनाओको 
पराप्त कर छती है 1 ७१ ॥ 
काञ्चनं शक्तितो दयात्‌ सा विप्राय मनखिनी । 
खभगा दशंनीया च भवत्यमरवर्णिनी ॥ ७२॥ 
वह मनस्िनी सती अपनी शक्तिके अनसार बाह्मणकौ 
सवण दान करे, एेखा करफे वह सौभाग्यवती, दर्शनीया ओर 
देवोपम कान्तिसे सुशोभित दोती हे ॥ ७२॥ 


इति श्रीमह'भरते लिकभगि हरिवंशे विष्णुपव॑णि पारिजातहरणे चतकथने एकोनाशीतितमोऽध्यायः ॥ ७९ 1 


दस प्रकार श्रीमहाभारते दिरुभाग इखिंशके अन्तमेत॒विष्ुषवैमे 


पारिजतदरण्के प्ररुद्मे 


व्रतकथनविषयक्र उन्यासौर्वे( अध्याय पुरा हुआ ¶॥ ७९॥ 


अरीतितमोऽध्यायः 
नाना प्रकारक त्रतोका पिधान 


मगव्युवाच 
निर्वेष्टव्यं शसीरं ये्व॑तकैः पुण्यकेरपि । 
अरुन्धति प्रवक्ष्यामि सदैताभिर्दरेण तु ॥ १॥ 
भगवती उमा कती ईहै--अरन्धती ! िन नतों 
ओर पुरण्योके द्वारा इस शरीरो परम सुखकरी प्राप्िके योग्य 


वनाया जा सकता दैः उन्हे इन तिथिय ओर शरेष्ठ फलके 
साथ वताती हू सुनो ॥ १ ॥ 

छष्णा्टमीं या क्षिपति स्याद्‌ वा मूरूफलारिनी । 
ब्राह्मणायकमरनं स्वं दत्वा भकतैदेवता॥ २॥ 
सयक्लवस्रा श्चुभाचार युरुदैवतपूजका | 


५३२ 


श्रिमष्टाभारते सिखभणे 


^ 


{ हरिषे 


पवं संवत्सरं रत्वा ततो दद्याद्‌ द्विजातये ॥ ३ ॥ 
गोवाकरज्जुखुरृतं चामरं च ध्वजं तथा । 
दक्षिणापूरणमिष्टान्नं शक्त्या वापि शुचिव्रते ॥ ४ ॥ 
ऊर्मिमन्वः खरालाग्राः श्रोणिद्रेशावरम्धिनः। 
तस्या भवन्ति केशास्तु भक्तिमत्याहि भतंरि ॥ ५ ॥ 


पवित्र वतक्रा पाटन करनेवाली देवि | जो पतित्रता 
नारी कृप्णपक्षकी अष्टमी तियिको अपना एकर समयका 
भोजन ब्राह्मणक्रो देकर स्वयं उपवास्पूरवफ व्यतीत करती टै 
अथवा उस दिन फल्ममूख खाकर रहती दैः दयेत वल्ल 
धारण करके चदाचारफे पाटनपुर्वैफ शुख्जरनौ तया देवतार्गो- 
की पूजा करती दै ओर इस प्रकार एक वर्पतक दषी 
नियमका पालन करके वह अन्तर्मे सुरी गायके बाल्की 
रस्सीषे अच्छी तरद बनाया हया चर्वैरः ध्वज तथा दद्चिणा- 
सदित मिष्टान्न यथाशक्ति ्राद्मणको देती &, उ पतिभक्ता 
नारीके केश करि-प्रदेराके नीचे तक्र टटककर ठहराया करते 
ह ओर उनके अग्रभाग धंषयारे दो जते ई ॥ २-५॥ 


दिये निर्वेष्टुकामा ठु गोमयेन शिरः सती । 
परक्षालयेन्मलं धान्या यिल्वेन श्रीफ्टेन च ॥ ६ ॥ 
गोमूत्रं च सदा प्रादयेच्खिरःस्नानं च मिधयेत्‌। 
छृष्णां चतुर्द्ी त्वेतत्‌ कर्कन्यं वरवर्णिनि ॥ ७ ॥ 
भवत्यविधवाः चैव सुभगा विज्वरा तथा । 
शिरोसेगीर्नेव चास्याः शरीरमभितप्यते ॥ ८ ॥ 

वरवर्णिनि ! जो घिरको सुख पर्टचाना चाहती हो, वद 
सती-वाध्वी सनी गोत्रः अविला; कवा व्रेठ ओर श्रीफठ 
८ प्रका वेल )--दन सवको सम मात्राम मिलकर उसके द्वार 
सिरको धोयै । उसक्रौ मैक दूर करे । सदा गोमूतरका पान 
करे भौर तिरे ऊपर स्नान करते मय उस जले गोमूच- 
कोभी मितम ठे | प्रक्र कृष्णा चतुर्द॑धीको स निवमका 
पाटन करना चाहिये । रेखा करनेवाटी स्री विधवा नदीं 
होती; सौभाग्यवती वनी रषटती है ] उसे ज्वर आदि रोग 
नदीं खताते तथा उसके इारीरम तिरतम्ब्न्धी सगि कष्ट 
नदी हेता ॥ ६-८ ॥ 
दरछीनीयं छखारं या काष्ति खी श्युचिसिते । 
तिथि प्रतिपदं नित्यं सा क्षिपेदेकभोजना ॥ ९ ॥ 
पयसा च तथाश्चीयाद्‌ यावत्संवत्खये गतः 
ब्राह्मणाय ततो दयात्‌ परं रूप्यमयं शुभम्‌ ॥ १०॥ 
ललाटं रूपसम्प्मापमोति सखी सुमध्यमा । 

प्रविच्र मुखक्रानवाद्ी अदन्धत्ती ! जो स्री अपने ख्टट- 
को दर्यनीय ( दोमसि सम्पन्न ) बनाये रखना चादती है, 
वह्‌ प्रसेक प्रतिपदा तिथिक्रो एक समय भोजन करके विताये 
पं दुधके साथ मात खाकर रे | जव्रतकर एक वर्यं पूरान 
टो; तयतक ेसा करत्ती रदे । तदनन्तर ब्राह्मणको सुन्दर 


सुवर्णेमय पटं दान करे। टेसा करनेवाटी सुन्दर कटि 
प्देरावाटी ची मनोर स्प-छीन्दर्यते युक्त ल्त्यट 
पाती ह ॥ ९-१०६ ॥ 
सततं स्प द्वितीयायां श्रवोरिच्छत्‌ सुरूपताम्‌॥ ११॥ 
अनन्तरोपवासेन श्याकभक्ादाना सती । 
ततः संवत्सरे पूर्णे ब्राह्मणं सखस्ति वाचयेत्‌ ॥ १२॥ 
फरैः परि्णितैः सौम्यमीर्पाणां दक्षिणान्वितैः। 
खवणेन च भद्रं ते धृतात्रेण चानघे॥ १३॥ 
निष्याप अख्न्धती | वब्दाय मद दोः जो महिका 
सन्दर चादती द्ये, वद सती-साष्वी खी सदा द्वितीया तिभि- 
कौ एक उमव उपवास करके साग-भात खाकर रटे । इष 
तरद्‌ एक वं पर्ण छेनेपर सुन्दर पके हृ फलः एक मागा 
उवर्णक्री दक्षिणा; नमक ओर धि मरा टया पात्र दैक 
व्राह्मणसे खस्तिवाचन करावे ॥ ११-१३॥ 


आत्मनः दोभनी कणीविच्छनती सी सुमध्यमा 1 
नक्श्रे ध्रवणे प्रापे धुवं भुश्षीत यावकम्‌ ॥ १४॥ 
ततः संयत्क्रे पूणं कर्णी ददयाद्िरण्ययौ । 
धुते प्रक्षिप्य विप्राय पयसा सहिते दुमे ॥ १५॥ 
जो सुन्दर करिप्रदेधवाटी सनी अपने कार्नोकरो सुन्दर 
एवं सोभाघम्यन्न वनाय रखना चाहती द्ये; वह्‌ श्रवण 
नक्षत्र पराहत दोनेपर अवदय यावक ( जौके भायेका द्वा या 
पूया ) भोजन करे । स तरह एक वधं पूरा हेनेषर दो 
स॒वर्णेमय कान वनवकरर उर हग्धमिभ्रित षीम स्वकर 
मराह्षणको दान कर दे ॥ १४.९५ ॥ 
नासामिच्छेल्टखाटान्तामग्यद्कं व्याधिवर्जिताम्‌। 
तिखगुटमं सदा सिचेद्‌ यावत्‌ पुष्प्यदि रक्षितः॥१६॥ 
अनन्तसेपवासिन सेक्तव्यः सिरः सदा । 
तस्मादवाप्य पुष्पाणि घृते प्रक्षिप्य दापयेत्‌ ॥ १७॥ 
जोसख्री यह चादती हो त्रि मेरी नासिका ट्यय्े 
संखग्न दो, उसमे क्रिसी तरहकी विकृति न आये ओर वद 
सदा रोग-व्याधिते रदित एवं सुन्दर वनी र्देतो वद सदा 
तिलके पौर्दोको सीचे ओौर तवतक सीचतीं रदे जतव्रतक किं 
उसके दारा सुरक्षित ए उन पौरदोमि फूल तथा फल न त्तर 
जार्ये । जितत दिनते सचना आरम्भ करे, उसके एक दिन 
पदटे उपवास कर ठे; फिर, निरन्तर जले सीचिती रहे । ज 
उन पौरदोमिं एल ठग ज्ये तो उनसे पल ठे धीरम डालकर 
उस घीका दान केर दे! १६-१८ ॥ 


खश्षीभवेयमिति या सखी काह्नत्यसरतोद्ववे 1 


अनन्तरं धे भुजानां पयलाथ धृतेन चा ॥ १८॥ 
न्त = ५ = _----- 


१८ पक आभूषण) जिति लिर्यो मधन प्टीकौ तष सिरस 
मोधती दै। 


1 


विष्णुपर्व ] 


ततः. संवत्सरे पूणं पद्मपघ्नाणि मण्डिता 1 
तथेवोत्परुपत्राणि न्यसेत्‌ क्षीरे श्ुचिस्िते ॥ १९॥ 
; छबमानानि विभ्राय ततो दयात्‌ सती सति । 
छष्णसारसमानाक्षी तद्‌ दत्तवा भवति स्स वै ॥ २० ॥ 
अग्रृतमय चन्द्रमसि उत्पन्न हुई अडन्धती ! जो सनी यह 
चादती दहो किं मेरे नेत्र खुन्दर शैः बह निरन्तर दूध अथवा 
घीसे ही भोजन करे । पवि मुसकानवाखी देषि ] इस तरह 
ˆ षक वश परणं होनेपर वह व्र ओर आभूप्रणेसि विभूषित हो 
कमल जीर कुमरदफे परत्तौको द्मे डले ओर जवर वे उस्म 
तैरने रगे तर वह सती उन पत्तोसदित उख दूधका ब्राह्मण- 
कोदान कर दे । पतिघ्ते ! वह दान देकर नारी छष्णखार 
मरके समान नेजवाटी दो जाती दै ॥ १८-२० ॥ 


श्च्छेदोष्ठो चारुरूपौ या खरी धर्म॑गुणान्विता । 
खा मृन्मयेन तु पिवेदुदकं वत्र सती ॥२९॥ 
अयाचितेन भुक्नीत नवम्यां धर्मभागिनी । 
ततः संबत्खरे पूणं धिद्रुमं दातुमहंति ॥ २२॥ 
जो धर्मरूपी गुणते युक्त सती-साध्वी स्री यह चाहती दो 
किंमेरे ओट बडे सुन्दर हो; वद एक वर्तक मि्ीफे 
तनसे पानी पीये ओर धर्मकी भागिनी होकर प्रत्येक नवमी 
तिथिको विना मेगि मिरे हुए अन्नका भोजन क । इस 
प्रकार एक वर्ष पूरणं हौ जानेषर उसे मूगा दान करना 
चाहिये ॥ २९-२२॥ 
तेन बिम्बफखाभोष्ठी सी भवत्येव शोभने । 
सखुभगाथ वपुःपु्धनाद्या गोमती तथा ॥ २३॥ 
शोभने ! शेखा करनेसे उस स्ीके ओरठ अवद्य ही 
ि्बरफलके समान लार हो जाति ह तथा वह सौभाग्यवती 
रूपवती, पुत्रवती; धनान्य ओर. गौभि युक्त होती ६॥२३॥ 


या चारुरूषानिच्छेत दन्तानमरवणिनि। 
श॒ङ्का्मीं न साश्नीयाद्‌ भकद्धयमनिन्दिता ॥ २४॥ 
अमरवर्णिनि ! जो चाहती हो कि मेरे दति बहुतदी 
सुन्दर ओर खच्छ हौ, वह साध्वी खरी क्ट पक्षकी अष्टमी 
तिथिको दोना समय भोजन त्याग दे ॥ २४ ॥ 
ततः संवत्छरे पूणं दद्याद्‌ सैण्यमयान्‌ सती । 
दन्तान्‌ प्रक्षिप्य धर्मक्षे पयस्यतिगुणोदिते ॥ २५॥ 
धर्मकञे ! इख तर एक वर्षं परणं होनेपर वह सती नारी 
चोदीके दत बनवाकर उन अत्यन्त उत्तम गुणवाले दुमे 
डाल दे ओर दतिँसदित उख दुग्धका ब्राह्मणको दान कर 
दे ॥ २५॥ 
तेन सा जातिपुष्पाभान्‌ दन्तान्‌ प्रापनोति सा सती। 
सौभाग्यमपि चभनोति सपुभत्वं तथानये ॥ २६॥ 
अनघे ! पेता करमैसे वह सती-नाध्वी खी चपेटीके 


यशीतितमोऽध्यायः 
~~~ ---- ~ 


` ५३द 


फूल-नैषे श्वेत दत पाती ६ ओर रोमाग्य तथा पुत्र खम 
करती टै ॥ २६॥ । 
सर्वमेच मुखं कान्तमिच्छेद्‌ या ख्चिरानने । 
खा पूर्णमास्यां स्नात्वा तु प्राप्य चन्द्रोदये द्युमे ॥२७॥ 
यावकं पयसा सिद्धं दसा विप्राय भामिनी । 
ततः संवत्सरे पूर्णं चन्द्रं रूप्यमयं शुभम्‌ ॥ २८ ॥ 
पश फुले तु विन्यस्य ब्रीह्मणान्‌ स्वस्ति दाचयेत्‌। 
पूर्णचन्दरस्ली तेन दानेन खी शुभा भवेच्‌ ॥ २९ ॥ 
रुचिरानने ! जो खी सम्पूरणं मुख-मण्डल्को ही कमनीय 
कान्तिखे युक्त देखना चाद वद भामिनी पूणिमाको स्नान 
करके शभ चन्द्रोदय होनेपर दुध तैयार किव रये यावकरका 
ब्राह्मणको दान दे । इस तरह एक व॒ पूर्णं दोनेपर सोने या 
वोदीकी चन्द्रमाकी सुन्दर प्रतिमा बनवाकर उसे कमलके 
पूलपर रवे ओर ब्ाहाणोसे खसिवाचन करये ओर उसका 
दान कर दे बह शुभलक्षणा ली उस दानके द्वस पूर्णं 
चन्द्रमाके समान मनोर मुखवाटी हो जाती है ॥२७-२९॥ 


स्तनाविच्छति या नाशै चृणरजफलोपनौ । 
अयाचितं शृहाम्यां सा नित्यमश्चीत वाग्यता ॥ ३० ॥ 
संवत्सरे ततः पूर्णं दे विरे कथ्थिने शुभे । 
खदक्षिणे ब्राह्मणाय प्रयच्छति धुतात्सते ॥ ३१॥ 
सौभाग्यं परमान्नोति चडपु्ांस्तथेव च । 
सदोत्नतौ स्तनो सा सरी विभत्य॑मरव्णिनि ॥ ३२॥ 
जो नारी यह चाहती है कि भेरे दोनो स्तन ताडके फल- 
के समान पीन रहौ, चद प्रयेकं दशमी तिथिको खदा मौन 
रहकर विना मंगि मिले ए अन्नका भोजन करे । इस प्रकार 
एक वषं पूर्णं होनेपर जो सोनेके थने हुए. दो सुन्दर येल 
जितात्मा ब्राह्मणको दक्षिण।सदित दानमे देती ३, वह्‌ परम 
सौमाग्य एवं बहुत-ते पुत्र प्राप्त करती है } देवोपम कान्ति- 
वाली देवि { वह स्रीसदा ऊँचि स्तन धारण करती है ॥३०-३२॥ 
शातोदरत्वमिच्छन्ती क्षिपेदेकान्तभोजिनी । 
पञ्चम्यां तत्र भोक्तभ्यमन्नं तोयेन नित्यदा ॥ ३३ ॥ 
जो करोदरी होना चाहती है ( अर्थात्‌ जिखकी यद 
इच्छा करि मेरा पेट उमडने या वदने न प्रयि, भीतरको 
दवा रदे )› बह एकान्तम भोजन करे ओर पञश्चमीको सदा 
केवल जलसे अन्न दण क्रे | ३३ ॥ 
ततः संवत्सरे पणं दद्याजञातिलतां श्चुमे । 
फुां सदक्षिणां धन्ये बाद्यणाय धृतात्मने ॥ ३४॥ 
शभे ! धये ! इख तरह एक वर पूणं होनेपर जितात्मा 
ब्राह्मणको चिली हुई चमेटीक्री ठताका दक्षिणासहित दान 
करे | ३४ ॥ 
हस्ताविच्छति या नारी रूपयुकतौ खमध्यमे । 
द्वादिं सा क्षिपत्वेवं शाकैः सर्वैरनिन्दिततैः ॥ ३५ ॥ 


५३४ 


शीमहाभास्ते खिभागे 


[ हरिवंशे 


संवत्सरे तसः प्राप्रे योक्मे पमे ददातु सा। 
ब्राह्मणायाभिरूपाय तथा पद्मदयं ध्युभम्‌ ॥ ३६॥ 
सुमध्यमे { जो नारी अपने दोन हार्थोशरो सन्दर रूपते 
युक्त देखना चाहती दैः बह दादशी तिथिको व प्रकारके 
अनिन्दित ( उत्तम >) शार्कोद्वारा आहार करके व्यत्तीत करे" 
, इस तरद एकर वर्प व्यतीत दहोनेपर वह्‌ सुवर्णमयं कमट्यर 
द्य खिले हप कमलके फर रखकर उन सवका सुन्दर एवं 
सुयोग्य ब्राह्मणको दान करे ॥ ३५-३६ ॥ 
श्रोणीं विद्ाकामन्विच्छेत्‌ खी क्षिपत्वेव सुवते। 
शयोद्रीमेक्रभक्तमश्चात्वेवमयाचिततम्‌  ॥ ३७॥ 
उत्तम त्तका पालन करनेवाखी देवि ] जो नारी विशाख 
नितम्ब चाहती टो, वह चयोद्ी तिथिक्रो केवर एक यार 
अयाचित अन्न भोजन करे ओर इसी तर प्रयेक चयोदी 
को व्यतीत करे ॥ ३७ ॥ 
ततः संचःसरे पुण छवणं सम्परयच्छतु । 
प्रजपतिमुखाकारं कृत्वा तञ्च वरानने ॥ ३८॥ 
वरानने ! इत तरद एक वर्षं पूरणं दोनेपर्‌ प्रजापति 
वरह्माजीके सलकी-सी भङृतिवाटी नमक्रकी राश्िका दान 
करे ॥ ३८ ॥ 
काञ्चनं चैव दातव्यं तदाकारस्य सर्वदा 1 
अञ्जनेन -च घ्क्षा शानक्रैरवचूरणेयेच. ॥ ३९ ॥ 
खी प्रकार प्रजापतिके भुखके आकारका दौ सुवणं भी 
खदा दान करना चाये । धर्मद नारी धीरे-धीरे अञ्ञनसे 
करिी बराह्मणीकरे नैनम काजल ठ्मवि ॥ ३९ ॥ 
रलानि चेच पूर्णानि वासो रकतं च द्पयेत्‌। 
तेन श्रोणमिभिमतां खी सौम्ये प्रतिपदयते ॥ ४०॥ 
सम्य | पूर्ण रल ओर ल्य रंगका वलन मी दे } इ्चे 
वष घ्री अपने मनक अनुकूढ नितम्ब पाती ६ ॥ ४० ॥ 
मधुरं बाचमिच्छन्ती वर्जयेह्वणं सती । 
संवत्सरं वा मासं वा प्रयच्छेष्टुवणं चतः ॥ ४१ ॥ 
सदक्षिणं चाह्यणाय परं माघुरयमिच्छती 1 
श्युकवाष्यार्छतगुणं भवत्यमस्वणिनि \ ४२॥ 
मधुर वाणीकी इच्छा स्वनेवाटी सती नारी एक वर्प या 
एक मासतक नमक खाना छेद दे ओर वाके अतिशय 
माघुर्यकी इच्छा र्क्रर ब्राह्मणको दक्षिणासदित नमक दान 
करे । अमरवर्धिनि † एेखा करने उख्की वाणीकी मिठास 
तोतेकी वाणीस सौ गुनी अधिक हो जाती है ॥ ४९.४२ ॥ 
मूदढगुर्फरिसै पादाविच्छन्त्या सोमनन्दिनि । 
ष्ट्वा षष्ठ्यां घरायेदे भोक्तव्यं सछिरोदनम्‌ ॥ ४२ ॥ 
सोमनन्दिनि { वपसेदे ! जे खरी यह चाहती दो कि 


मेरे पेरोके गुल्फ ८ घुरि था गदे ) भौर नद.नादिर्यो दक्ी 
रदे; द प्रव्येक पष्ठी तिथिको केवर पानीके खाय मात खवर ॥ 
अश्वी ब्राह्यणो वापि न स्प्र्व्यः पदा सदा 
यदा पदा स्पृच तं च वन्देत तपसान्विते ॥ ४४॥ 
तपस्िनि ] यद व्रत टेनेवाली लको खदा दी उचित 
कि वद्‌ अग्नि अथवा व्राह्यणका पैसे स्प नकरे। यदि 
कमी सपय दौ जाय तो उसको प्रणम क्रे | ४४८ ॥ 
देन न च वै पादं प्रक्षाख्यितुमर्दति। 
पतेनित्यवरतेयुका धर्म्॑षा पतिदेवता ॥ ४५॥ 
चर्म रूप्यमय दद्याद्‌ आह्यणाय पतिव्रते । 
तौ वराय ब्राह्मणाय स्थापयित्वा धृतेऽनये ॥ ४६॥ 
पञ्चे चाधोसुखे न्वा दाद्‌ धिग्राय नच्िनि । 
रकेद्रव्यर्मिश्रपित्वा काश्चनेनाभ्य्टंङृते ॥ ४७॥ 
उसे वैस्से पैरो नदीं धोना ( रगढना ) चादि । इन 
नित्य तेति युक्त हद धर्मच पतिता नारी सेनि या चोदके 
दो कदु बनववि | निष्पाप पतित्रते ! फिर उने दोनो 
कदटु्ओोको धीम रखकर श्रे ब्राह्मणको दान कर दे। 
नन्दिनि ¡ इसके सिवा दो कमर्लकरो उनके मुख नीचेकी 
ओर करके रखे, उन लल रंगे गन्धादि द्रग्ेति सयुक्त 
करके सुत्र्णते अल्कृत करे; तत्पश्चात्‌ उखका ब्राह्मणक्रो दान 
कर दे ॥ ४५-४७ ॥ 
सर्वमेव तु या गाघमिच्छत्यतिमनोहरम्‌। 
धरिरात्रं पुप्पकाले सा केतु पतिदेवता ॥ ४८॥ 
जो पतिदेवता नारी अपने सम्प्णं शरीरो दी अयन्त 
मनोहर बनाना चाहती होः वह रजोदर्शनके अवस्ररपर तीन 
रात उपवास करे ॥ ४८ ॥ 
कोसुद्यामथवापाद.यं माघ्यां चाश्वयुजे तथा। 
मातरं पितरं चैव मन्यतेऽतिधिर्दवतम्‌ ॥ ४९॥ 
वह्‌ कार्तिकः आपद्‌, माघ तथा आदिविनक्रौ पूर्थिमाको 
माता, पिता; अतिथि ओर देवताका आद्र-सत्कार एवं 
पूजन करे ॥ ४९ ॥ 
चुतं च नित्यं विप्रभ्यो ददातु खवणं चथा । 
सम्मार्जनं गृहे चेव कयेतु पर्निदेवता ॥ ५० ॥ 
वह पतिव्रता ब्राह्यणेकरो प्रतिदिन नमक ओर घी दान 
करे ¡ नित्यं घर सादृ लगाये 1 ५० 1 


उपलेपनं च धर्मकते चछिकर्म॑च मानिनि । 

वाण्दु्ठा चैव मा शश्रे भकत्वात्माथपण्डिता ॥ ५१॥ 
धर्मक्ञे | मानिनि ! श्चभ्रे ¡ अपने स्वार्थक्रो समसेर 

कुदा नारी धरम कीपनेन्रोतने तथा देवतार्थोको वलि 

( उपहारखामग्री ) अर्पण करनेकरा क्म भी केरे | वह कमी 

दर्वचनका प्रयोग न करे ॥ ५१ ॥ 

पर्यश्चातु च सा कञ्चिदपि शगकं यशखिनि । 


विष्णुपवं 1 


बि खजत्वतथ्यं च परित्यजतु भामिनि ॥ ५२॥ 
यदरास्विनि ! वह, किसी एक शकका दही भक्षण करे । 


एकाद्ीतितमो ऽध्यायः 


५३५ 


भामिनि ! षह देवतार्थे द्यि “उपहार दे ओर असत्य 
माप्रणकरा व्याग करे ॥ ५२ ॥ 


इति श्रीमहाभारते लिरूभागे हरिवंशे विष्णुपवैणि पारिजातदरणे चतकविधनेऽद्यौतितमोऽध्यायः॥ ८० ॥ 


इस प्रकार श्रीमहाभारते खिरुमाम हरिविकके अन्तर्गत बिषमुप्वमे पारिजातहरणने प्रश्ने र्षोका 
विधानेविषयक अस्सी; अध्याय पुरा हुमा ॥ ८० ॥ 


एकारीतितमोऽध्यायः 


उमे दाश त्रतकथनका उपसंहार, श्रीनारदजीका देवियोद्रारा किये गये व्रतोका। वर्णन 
करना तथा श्रीकृष्ण-पलि्योहयरा त्रतफा अनुष्ठन एवं दान 


उमोवाच 
बान्धवान्‌ सगुणानिच्छेदेकभकेन नित्यदा । 
सप्तमीं खप्तमी नित्यं क्षपेत्‌ सखी पतिदेवता ॥ १ ॥ 
उमद्विवी कती है- जो पतिव्रता श्री गुणवन्‌ 
वान्धवोकी इच्छा रखती हैः वह प्रत्येक सप्तमीको सद्‌ा एक 
समय भोजन करके व्यतीत करे ॥ १ ॥ 
ततः संवत्सरे पूणे वक्षं ददाद्धिरण्मयम्‌ । 
सदक्षिणं ब्राह्मणाय शुभवन्धुमती भवेत्‌ ॥ २ ॥ 
तदश्चात्‌ व॑ पूणं होनेपर ब्राह्मणको दक्षिणासहित एक 
सुबर्णमय वृष्षका दान करे । इसते वह खम गुणसम्पन्न बन्धु- 
वान्धवति युक्तं होती है ॥ २॥ 
करञ्जे दीपकं दद्यात्‌ सदा या प्रमदा वरे] 
पृणँ संचत्खरे दयात्‌ सौवर्णं दीपकं ततः ॥ ३ ॥ 
जो नारी सदा उत्तम करंज ( कंजा या करज ) बरक्षके 
नीचे दीप दान करती है, उसे वर्ष पूर्णं होनेपर सुवर्णमय 
दीपकका दान करना चाहिये ॥ ३ ॥ 


च्या सा खी भवेद्‌ भुरिष्टा पुत्रवती तथा 1 

सपल्लीनामधि तथा दीपवज्ज्वल्ते श्चुभे ॥ ४॥ 
शुभे बह खरी अपनी सुन्दर कान्तिसे पतिकी प्राण- 

वर्छभा बन जाती है ओर पुत्रवती होती है । वह सपक्तियोमि 

सव्रते ऊँचा-स्थान बना लेती है ओर दीपककी भति प्रकाशित 

होती रती है ॥ ४ ॥ 

या क्ञेषभोजिनी नित्यं नैव च स्यादरुन्तुदा । 

न च स्याद्‌ व्यशना स्तौभ्ये नित्यं च पतिदेवता ॥ ५ ॥ 

शौचान्विता च सततं न च रुक्चाभिभाषिणी । 

भ्वश्रूऽ्वश्ुरयोर्तित्यं शछ्युश्रूषाभिरता सती ॥ & ॥ 

कि तस्या नतकैः कायं किं वा स्यादुपवासकेः । 

या भदैदेवता नित्यं सत्यधर्मशरुणान्विता ॥ ७ ॥ 
सौम्ये [ जो खी प्रतिदिन सरके भोजनके पश्चात्‌ रेष 

अन्लका आहार करती £, किक हदयको चोर नदीं पुचाती 


बिना खये नदीं रहती ओर खदा पातिनत्यमे सित रहती दै 

सदा शौचाचारकरा पाटन करती है कमी रूखी वात नहीं 

बोरतीः प्रतिदिन साख-ससुरकी सेवम तत्पर रहती है, उस 

सती ख्रीको बरतोखे क्या करना है १ अथवा उपवासोंते क्या 

प्रयोजन है £ जो सदा पतिको दी देवताकी भति पूजती है 

ओर सत्यधर्म तथा सदृगु्णेसि सम्पन्न है ( उसका जौवन 

सफ़ल है ) ॥ ५-७ ॥ 

विधवा खरी तु या हि स्याद्‌ दैवयोगात्‌ सती सति। 

तस्या वक्ष्यामि यो ध्मः पुराणोक्तः सुमध्यमे ॥ ८ ॥ 
सुन्दर कयिप्रदेशवाटी पतिन्रते ! जो ठती-साध्यी नारी 

कभी दैवयोगसे विधवा दो जाय; उसके व्यि पुराणि जो 

धर्म बताया गया है, उसका वर्णन करती दँ ॥ ८ ॥ 

पति संकरपयित्वा सा चिन्रस्थं वाथ मृन्मयम्‌ । 

तस्य पूजां सदा कयत्‌ सतां धर्ममुस्मरेत्‌ ॥ ९ ॥ 
वह पतिक्रे चित्रेमे अथवा उसकी मि्धीकी प्रतिम 

पतिकी भावना करफ़े सदा उसीकौ पूजा फेरे ओर स्पुरभौके 

धर्मक्रा निरन्तर स्रण स्वे ॥ ९॥ 

तत पवाभ्यनुक्षां सा नित्यं याचेत्त सुनता । 

तके चोपवासे च भोजने च विरोषत्तः ॥ १५॥ 
उत्तम त्तका पारनं करनेवाली चह ली प्रतिदिन उसी 

( चिनगत या प्रतिमागत ) पतिसे प्रतः उपवास ओौर 

विरोषतः भोजनके स्थि आसा मंगि ॥ १०॥ 

भकैलोकान्‌ जजत्येव न चेद्‌ ब्युञ्चरते पतिम्‌ । 

शाण्डकी सूयंवद्‌ भाति सततं पतिदेवता ॥ ११॥ 
यदि वह्‌ अपने पतिका उल्छङ्खन नदीं करती तो पर्ति 

लोकम ही जाती है ओर खमे पतिव्रता शाण्डिीकी मति 

सदा सूर्यके समान प्रकारित होती रहती टै ॥ ११९ ॥ 

अद्यप्रभृति सर्वेषां देवानां चैव योषितः । 

्रष््यन्ति पुण्यकविधि पौयणो यः समावनः ॥ १२॥ 


५२६ 


श्रीमहाभारते सिलभागे 


[ हरिवंशे 


अःजसे समस्त देवतार्ओोकी पिरयो जो पुयणप्रतिपादित 
सनातन पुण्यकषिधि है उप्रका दर्दन करेगी ॥ १२॥ 


मुनिश्च नारद्‌; छृत्सनं पौराणं क्षास्यते विधिम्‌ । 
उश्वासस्य धमौत्मा वतकानां तथैश्र च ॥ १३॥ 
धर्मात्मा नारद परनि मी त्रत-उपवातकी सम्पूर्णं पौराणिक 
विधिके शावा हंगि ॥ १३॥ 
अदितिस्तपसेन्द्राणी त्वं घ सोमसुते वरे। 
प्रवर्तते पुण्यक्रानां व्रतकानां च सर्वदा ॥ १४॥ 
की्तनीयाः सतीनां हि भविष्यथ गुणान्विताः । 
रेष्ठ सोमक्रुमारी } अदिति देती, इन्द्राणी ओर दम मी 
अपनी तपस्यसि उन विधिक्रो जानोमी । पुण्यक ओर बरतोकि 
परवर्तन ( आरम्भ ) मे सदा छम सद्ुणवती देविरयोका सती 
नायियिद्वारा कीर्तन होभा ॥ १४१ ॥ 
उपवासव्तविधि यथावदिह रत्स्नखः ॥ १५॥ 
प्रदुभौवेषु सर्वेषु भार्य विष्णोर्मदात्मनः 1 
हास्यन्ति पुण्यकविधि नित्यमेव सनातनम्‌ ॥ १६॥ 
महात्मा विष्णुकरे सभी अवतारे जो उनकी पलिनर्यौ 
होगी, वे उपवास-त एवं पुण्यर्कोकी सम्पूर्णं सनातन विधिको 
यदा खदा ष्टी यथावत्‌ ख्यते ज्निगी ॥ १५-१६॥ 
सविषं च धमौणां स्रीधरेंषु प्रशस्यते । 
पतिभक्तिरदुटत्वमवाग्दुष्टत्वमेव च  ॥१७॥ 
समी धर्मो अथवा लीधर्मर्मि पतिमक्तिः दुराचारका 
अमाव ओर्‌ दुर्वचनका प्रयोग न करना--इन तीनकी विरेष- 
स्पसे प्रशंखा की जाती द ॥ १७॥ 
नरद उवा 
पवमुक्तास्तु ताः साभ्न्यो महदरेव्या तपोघनाः। 
जग्मुर मदद्र्ची प्रणिपत्य हरप्रियम्‌ ॥ १८॥ 
नारवजी कदते है-देवि ! महादेवी पारवतीके रेखा 
कहनेपर वे साघ्करी तयोधना देविर्यो र्मे भरकर उन हरप्रिया 
पार्वतीको प्रणाम करके अपने-अपने स्यानको चली गयी ॥ 
अदितिन्रैतकं चके श्णु यद्‌ धर्मचारिणी । 
उमावरतविधिः स्वः पूर्वोदिष्टस्तया ङतः ॥ १९॥ 
धर्मचारिणी अदितिने जो त्रत किया, उसे सुनो--उमाने 
पहले जो.वतकी विधि बतायी थीः उस सत्रका पाटने अदिति 
देर्वीनि किया ॥ १९ ॥ 
पारिजाते निवध्याथ मम दृत्तस्तु फदयपः। 
अदितिनरतकं नाम तद्‌ दत्तं सत्यभामया ॥ २०॥ 
उर्ौनि मदर्पिं कश्यपको पारिजाते बोधकर मेरे हाथमे 
दे दिया । इसीका नाम भअरितित्रतक' है! भदितिने जिष्ठ 
तरह व्रतक् ( बनक्षम्बन्धी दन) दिया थाः, उखी प्रकार 
सत्यमामने भी दिया ॥ २०॥ 


तदेव तकं दत्तं साविव्या धर्मनित्यया। 

तैरेव युक्तैः संयु्तमिदं स्वभ्यधिकं रतम्‌ ॥ २१॥ 
नित्य धर्मपरायणा सावित्रीने मी वदी व्रत क्रिया थीर 

उसी तरह दान दिया था | उन्दी समुचित खाधनेपिं संयुक्त 

दोनेफे कारण यद संध्याकाल अच्यन्त उक्कृष्ट माना गया १ ॥ 

संध्याकाले तु सम्प्रतत स्थाने स्थाने तथेव च । 

पूजनं वा नमस्कारो जपश्च द्विगुणः स्मरतः ॥ २२॥ 
संध्याकालं अआनेपर जगद-जगह क्रिया गवा पूजनः 

नमस्कार भौर जप द्विगुण माना गया द ॥ २२॥ 


साविभ्रीच्रतकः त्वा तथादित्या वतं सती। 
भर्तुः टं पिवङ्कुरमात्मानं चैव तास्येत्‌ ॥ २३॥ 
सती नारी सावित्री.चत यर अदिति त्रत्का अनुम्ठान 
करके पतिकरुखः पितरकुरु तथा अपने-यापक्रा मी उद्धार कर 
देती £ ॥ २३ ॥ 
हनद्राणी घतकं चक्ते तदेवौमं यथाविधि । 
रकमभ्यधिकं वासो भोजनं चैव सामिषम्‌ ॥ २४॥ 
दन्द्राणीने भी उसी उमाके ताये हुए वतका विधि- 
पूर्वक पालन करिया । उनम अधिक या विशेष बात इतनी दही 
थी क्रि उन्न खार र॑गका व्र जीर योग्य पदा्थंति युक्त 
उत्तम भोजन दिया ॥ २४॥ 
चतुथं दिवसे चापि पुण्यकार्थं विधिः पुनः। 
अहोरात्रोपवासश्च देयं ऊम्भदतं तथा ॥ २५॥ 
नीये दिन फिर पुण्यकव्रतकरे व्यि दानकी विधि दै। 
एक दिन-रातका उपवास करे सौ धर्दौका दान कला चादिये॥ 
गद्या तकं दत्तं तदेवौमं यदास्करि।, 
सानमभ्यधिकं त्वघ्च प्त्युषस्यात्मनो जले ॥ २६॥ 
अन्यस्मिन्‌ चा जके माधद्युङ्कपक्षे हरिप्रिये । 
पतद्‌ ग्नाचतं नाम सर्वकामप्रदं स्पृतम्‌ ॥ २७॥ 
य॒राका विस्तार करनेवाटी हरिप्रिये रुक्मिणी | गद्धाजीने 
भी उखी उमाके बताये हुए चतक अनुष्ठान योर दान करवा) 
उस्म अधिक बात इतनी ही थी क्रि वे प्रतिदिन प्रातःकाठ 
माष ्युक् पक्षमे अपने दी ज्म अयवा दूसरे ज्म भी 
स्नान किया करती थीं ! यह गद्धा-नत समस्त मनोवाज्छित 
कामना्ओको देनेवाला माना गया है ॥ २६-२७॥ 
सप्त सप्त च सप्ताथ कुखानि हरिवलमे 1 
खी तास्यति धघर्पक्षा गद्गावतकचारिणी ॥ २८॥ 
हसिवस्छमे ! गङ्ग-चतकरा पालन करनेवाली धर्म॑ नारी 
पितृक, मातामहकुःर ओर पतिङुखकी खात-सात पोदिरयोका - 
उद्धार करदेतीटै॥ २८ ॥ 
देयं कुम्भसदखरं तु गङ्गाया मतके श्युमे। 
तारणं पारणं चैव तद्‌ चतं सावंकामिकम्‌ ॥ २९॥ 


विष्णुपवं ] 


पकारीवितमोध्ध्यायः 


५३७ 


न~~ 


ञयभे 1 गङ्गात्रतर्मे एक सदस घड्धौका दान करना चादिये। 
बह समसत कामनार्ओोका पूरकं व्रत दुःखसे तासे ओर 
मनोरर्थोकी पूर्तिं करनेवाला दै ॥ २९ ॥ 
यमभायी ` चकाराथ बतं यामरथं दयुभम्‌। 
हेमन्ते तत्‌ तु कर्तव्यमाकारो हरिवदलभे ॥ ३०॥ 
इरिवस्भे | यमराजकी पत्नीने यामरथ नामक ञ्युभ 
्रतका अनुष्ठान किया था वह त्रत हेमन्त ऋतम खुरे 
आकाशके नीचे करना चदय ॥ ३० ॥ 
ध्मानि चैव वाक्यानि नूयादाकारामास्थिता ! 
स्नात्वा श्युचिखमाचारा नमस्कृत्य पति दुमे ॥ ३१॥ 
सयम ! पवित्र आचरणवाटी स्री स्नानकरे पश्चात्‌ पतिको 
„. नमस्कार करके खुरे मैदानमे खद़ी ये निम्नाङ्कित वाक्य कदे-॥) 
चराम्यहं यामरथं हिमं पष्ठेन धास्ये। 
पतिता जीवपुत्रा भवेयं च पुरोऽधिका ॥ ३२॥ 
यँ अपनी पीटपर हिम (बर्फ या पाला ) का आधात 
सहती हई यामरथ व्रतका आचरण कर री हू । मेरी यद्‌ 
कामना रकि मै पतित्रताः चिरंजीवी पुतरोकी माता ओर 
नासियेमिं अग्रगण्या होऊं ॥ ३२॥ 
सपत्नीरधितिष्टेयं पद्येयं चेव मा यमम्‌। 
सभर्ठ॑पु्ा जीवेयं चिरं च खमेव च ॥ २३॥ 
ष्दौतोपर मेरा प्रभुत्व स्थापित हे, मै कमी यमका दर्यन 
न कर ओर अपने पति एदं पुत्रोके साथ चिरकारतक 
सुखपूरवक जीवित रू ॥ ३३ ॥ 
पतिलोकं च गच्छेयं भवेयं नन्दिनी तथा । 
सुचेखा मृण्दस्ता च खजनेष्ठा गुणान्विता ॥ ३४ ॥ 
'अन्त्म पतिलोकको पराप्त होऊ अपने कुल-परिवारका 
आनन्द वद्निवाली होऊ । मेरे वल्ल खच्छ रहः मेरा दाथ 
खद होः में खजर्नोकी प्यारी एवं सद्गुणवती होऊ ॥२४॥ 
पवं कृत्वा ततो विप्रं मधुना खस्ति वाचयेत्‌ 
तिदधेरपि तथा कृष्णैः पायसेन तु भोजयेत्‌ ॥ २५॥ 
इ प्रकार व्रतको पूर्णं करे बाह्मणसे खस्तिवाचन 
कराये तथा उसे मधु ओर काला तिरे मिश्रित खीर खिरये॥। 
पवं चत्तानि देवीभिः तान्यमरवर्णिनि । 
महादेव्या पुरो्तानि रुद्धपत्या हरिप्रिये ॥ २३६॥ 
देवोपम कान्तिवारी देवि ! हरिप्रिये ! इस प्रकार सद्र- 
पत्नी महादेवी उमाद्वारा पूर्वकालमे बताये गये तरतोका अनुष्ठान 
पदलेकी देविर्योनि क्रिया है ॥ ३६ ॥ 


अहं वीमि तपखा मदीयेन समन्विताः । 


` स्वी द्रक्ष्यथ गण्यानि नतकानि तथैव च ॥ २७॥ 


पौराणान्युमया देव्या यानि दघ्न वै पुरा । 
कल्याणशुणयुक्तएनि पावनानि शुभानि च ॥ ३८॥ 
भै कहता हू, देवियो | प्राचीन कालम देवी उमाने जिन 
कल्याणमय गुर्णो युक्तः पावनः गुणकरारक एवं छम पुरातन 
नतोका साक्षत्कार करिणा थाः उन समको ठम स्व लोग मेरे 
तपोबल सम्पन्न होकर देखोगी ॥ २७-३८ ॥ 
कैश्म्पायन उवान 
रुकिमिणी जतकं चके दष्ट चतकविस्तरम्‌ । 
उमाया वरदानेन दष्ट दिन्येन चश्चुषा ॥ ३९॥ 
वेदाम्पायनजी कते है--राजन्‌ ! रक्मिणीने उमाके 
वरदानके अनुसार दिग्य्रदष्टिते बर्तौका विस्तार देखकर सवयं 
भी एक ध्रतः का अनुष्ठान किया ॥ ३९ ॥ 
उमानतकवद्‌ स्व दृषदानं तथाधिकम्‌ । 
रत्नमालापदानं च तथान्नं सार्वकामिकम्‌ ॥ ४० ॥ 
उनन्दोनि सव कुछ उमाफरे चरत्के ही समान किया; कितु 
बरषरभदानः रनमाल-दान ओर सम्पूर्णं कामनार्मोक्ा पूरक 
अन्नदान--उनसे अधिक किया ॥ ४० ॥ 
तथा जाम्बवती चक्रे पुरोमा्रतकं तथा। 
ददावभ्यधिकं सा तु रत्नचरष्यं मनोहरम्‌ ॥ ४१॥ 
जाम््रवतीने मी वैषा दी किया, जैसा पहले उमाने किया 
था; किं उन्दने मनोहर रलनमय दक्षकरा दान उनकी अपेक्षा 
अधिक क्रिया | ४१॥ । 
सत्या ददौ तथैवाथ पुरोमाबतकं तथा । 
पीतमभ्यधिकं वासस्तया दत्तमुमात्रते ॥ ४२॥ 
सत्याने भी पूव॑काल्मे उमाद्वारा क्रिये गये तरतकरके समान 
दी दान किया; परंतु उस उमात्रतम उन्दनि पीतवल्का दान 
अधिक करिया | ४२॥ 
सोहिण्याथ च फारगुन्या मधया च पुरातने । 
ज्रतानि खलु दत्तानि वहनि कख्वर्धन ॥.४३॥ 
कुख्की इद्धि करनेवले नरेश ! पुरातन काल्प रोदिणीः 
फाल्गुनी ओर मधघाने भी वहुत-से तदान कयि ये ॥ ५३ ॥ 
ददौ शतभिषा चेव चतक पुण्यलक्षणम्‌ । 
येन॒ नन्षसुख्यत्वं जगाम कुरुनन्दन ॥ ७४ ॥ 
कुरुनन्दन † शतमिषाने मौ पुण्यको लक्षित करानेवाके 


तरतकेका दान किया थाः निषसे उसने नक्षि मुख्यता 
प्राप्त कर ली ॥ ४४ ॥ 


इति श्रीमहाभारते लिरभागे हरिवंशे दिष्णुपर्वणि पारिजातद्रणे उमानत्तकथनसमाक्षौ 
पारिजातहरणकथनसमाप्तौ चेकारीतितमोऽध्यायः ॥ ८१ ॥ 


इस प्रकार श्रीमहाभारतेके खिरुमाग हखिंशके अन्तर्गत विष्णुपर्व पारिजातहरण्के श्रसगमे 
उमा्तकथन-समापित्रिषयक इक्यासीरवश अध्याय पूरा हुम ॥ ८९ ॥ 


--~-~< म्न्य) 


------------------~~~~~~~~-~-~---_ 


५३८ 


श्रीमहाभारते खिरुभागे 


[ हरिवंशे 


ह्यरीतितमोऽध्यायः# 
पट्‌ पुरवासी सुरोका संप्र परिचय, उन्दँ रह्मा ओर भगवान्‌ शिवक्रा वरदान 


जनमेजयं उवाच 


वैशम्पायन धर्मश्च व्यासदिष्य तपोधन । 
पारिजातस्य रणे षट्‌ पुरं परिकीर्तितम्‌ ॥ १ ॥ 

जनमेजयरने कदा--धर्म ! व्याषरिस्य { तपोधन 1 
वेशरस्यायनजी ! आपने पारिनातदरणङ प्रसंग्मे "टुपुरः की 
चर्चा कीथी॥ १॥ 


नित्रासोऽखुस्मुख्यानां दारुणानां तपोधन । 

तेर्षां चधं सुनिधरेष्ठ कीतैयखान्धकस्य च ॥ २ ॥ 
तपोधन ! आपने कडा था करि वह्‌ नगर बड़े-बड़े भयंकर 

अदुररोका खान या । मुनिशेष्ठ { यप्र उन षटपुरनिवाषी 

देव्यो तथा अन्धकासुरफे वधका वर्णन कीजिमि ॥ २.॥ 


वै्यम्पायन उवाच 


चिपुरे निहते च्रीर र्द्रेणाङ्चि्टकर्मणा । 

तत्र प्रधाना वहवो बभूवुरद्खरोत्तमाः ॥ २ ॥ 

शाराभ्निना न द्र्घास्ते रुद्रेण चरिपुरालयाः 

ष्ठिः शतसहस्राणि न न्युनान्यधिकानिं च ॥ ४ ॥ 
वैदाम्पायनजी कहते है--जनमेजय ! वीर | अनाया 

दी समस्त करम करनेवाठे सद्रदेवके द्वारा जवर दैत्योकि तीनों 

पुर्योका विनाश किया गया; उस समय वरदो बहुत-से प्रधान- 

प्रधान अमुर-शिरोमणि येष रह्‌ गये । वे तरिपुरनिवासी दोने- 

पर भी श्द्रदेवके बार्णोकी आगतेदग्ध न दो स्के | उनकी 

संख्या लगभग खाठ छख थी ॥ ३-४॥ 

ते क्षातिव्रधसंतत्ताश्चक्रवीराः पुरा तपः) 

जम्ूमागं सखतामिष्टे महपिंगणसतेचिते ॥ ५ ॥ 
उन अ्ुर वीरोनि पूर्वकाले अपने बन्धु-बान्धरवोके वधसे 

संतप्त होकर मदर्षिगणेसि सेवित तथा सदपुरुषोके प्रिय जम्बू- 

मार्गमे जाकर तपस्या आरम्भ की 1 ५॥ 

आदित्याभिसरुखा वीराः सहस्राणां शतं समाः । 

वायुभक्षा चपश्चेठ स्तुचन्तः पद्मसम्भवम्‌ ॥ ६ ॥ 
कपश्ेष्ठ वे वीर दैत्य सूर्यकी ओर र्हं करके वायुके 

आहारपर रहकर एक छख वर्पोतकं कमल्योनि व्रह्याजीकी 

स्तुति करते रहे ॥ ६ ॥ 

तेपासुदुम्बरं राजन्‌ गण पकः समाधितः । 

चक्ष तजावसन्‌ वीरास्ते कुर्वन्तो मदत्‌ तपः ॥ ७ ॥ 
राजन्‌ † उन दयम एक दक एेसा था, ज गरक 


वृक्षका आश्रय केकर रदता था । वे वीर दैत्य बर्हो महान्‌ 
तप करते दु निवास करते थे ॥ ७ ॥ 


कपित्थचुश्चमाधित्य केचित्‌ तप्रोपिताः पुरा। 
खगाटवारीस्त्वपरे चेरर्य्रं तथा तपः॥ ८ ॥ 
पूर्वकाये उन द्योते कुछ छोग कपित्थ ( कैथ ) 
वृक्षका आश्रय ठेकर वर्हो रदते ये ओर दृखरे सियार्तेकी 
मरदिर्मिं रहकर वदो उय्र तपस्या करते ये (अथवा खगाख्नामकर 
चृ्-विशेषरङी वाचिकार्ओमिं रहकर तपस्या करते थे ) ॥ ८॥ 


वरमूडे तथा चेसस्तपः कौरवनन्दन । 

अधीयन्तो परं बह्म वटं गत्वाखुरात्मजाः ॥ ९ ॥ 
कौरवनन्दन ! कुछ अबुरछुमार वट-बरभकी जडम रहते 

ओर उस इपर चदृकर परत्रहयक्रा चिन्तन करते हए तप्य 

करतेयथे॥ ९॥ 

तेषां तुष्टः प्रजाकती नरदेव पितामहः 

चरं दातुं खररेष्ठः पाठो चर्म॑भूतां वरः ॥ १०॥ 
नस्देव 1 कुछ कालके अनन्तर धर्मात्मापि शरेष्ठ प्रजा- 

ष्टा देवशिरोमणि पितामह ब्रह्माजी उनपर संवु्ट हो उन्द 

वर देनेके व्यि वर्ह अये ॥ १० ॥ 


चरं वस्यतेत्यु्तास्ते राजन्‌ पद्मयोनिना । 
नेयुस्तद्धरदानं तु दिपन्तस्ज्यम्बकं विभुम्‌ ॥ ११॥ 

राजन्‌ 1 कमल्योनि ब्रह्मान उनसे कदा--धवर गोः 
तव उन्दने भगवान्‌ त्रिनेत्रधारी श्द्रसे देप रखनेके कारण 
वरदान ठेनेकी इच्छा नदींकी | ११॥ 


हञ्छन्तोऽपचिति गन्तुं क्षातीनां कुरुनन्दन । 
तदुवाच ततो बह्या सर्वषः कुरुनन्दन ॥ १२॥ 
` कर्छुलक्रो आनन्द प्रदान करनेवाले कुरुनन्दन [ वे 
सद्रदेवसे बदला लेकर उनके द्वारा मरि गये अपने माई 
चन्धुओक्रे णले उच्छुण होना चादते ये | तव सर्वर ब्रह्याजी- 
ने उनसे कदा-) १२॥ 
विश्वस्य जगतः कर्तः संहर्तुश्च महात्मनः । 
कः द्राकतोऽपचिति गन्तुं मास्तुवोऽश्र वृथा श्नभः॥१३॥ 
जो सम्पूर्णं जगते कर्ता ओर संहर्ता है, उन मदात्मा 
भगवान्‌ शङ्धरसे बदला छेन कौन समर्थ है १ इस विपर्यमे 
तुमे व्यर्थ श्रम न्ह उठाना चाहिये ॥ १३ ॥ 
अनादिमध्यनिधनः सोमो देवो महेश्वरः । 
तमासूय खुखं खगे वस्तुमिच्छन्ति येऽखुरः॥ १४॥ 


# पूनावाली प्रतनिकी मान्यताके भनुश्तार यसि इरिवंशका- उत्तराधं माग मारम्म होता ३ । 


~~ 


विष्णुपवे ] 


दय शीतितमोऽध्यायः 


५ 
= ३ मः = 


५२९ 


॥॥ 


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~~~ 


ते मेधुस्तत्र केचित्‌ तु दुराच्माने महासुराः । 
सधे्ुरपरे राजन्नु भव्यभावनाः ॥ १५ ॥ 
उमासहित महेश्वर देव आदिः मध्य ओर अन्तसे रहित 
ह| उनसे द्रोह स्खकरर ज असुर सर्गम मुखपुर्वक रहना 
चाहते थे, उन दुरात्मा महान्‌ अपुररोनि तो वर ठेनेकी इच्छा 
महीं की; परेतु राजन्‌ ! जो दूसरे असुर भव्य भावनाते 
सम्पन्न ( दूरदर्शी ) अथवा भगवान्‌ शिवकरी महिमाके ज्ञाता 
थे, उन्देनि षर देनेक्री अभिलाषा व्यक्त की ॥ १४१५ ॥ 
नेुथं खदुरत्मानस्ताचुवाच पितामहः । 
वरयध्वं वरं वीरा सुद्रक्ोधस्ुतेऽखराः ॥ १६॥ 
जिन दुरासमाओंने वर सेनेकी इच्छा नहीं की, उनसे 
पितामह ब्रह्याने फिर कदा--"वीर असुरो ¡ ठम भगवान्‌ 
सद्रपर क्रोध प्रकट करनेके सिवा दूसरा कोई भी वर मोग लोग 
ते ऊखुः सर्वदेवानामवध्याः स्याम हे विभो । 
पुराणि षर्‌ च नो देव भवन्त्वन्धर्मदीते ॥ १७ ॥ 
सर्वकामसख्द्धा्थं षट्‌ पुरं चास्तु नः प्रभो 1 
चयं च षर्‌ पुरं गत्वा वसेम च खं विभो ॥ १८ ॥ 
तव उन्दनि कहा--विमो ¡ हम खव देवता्थकि च्ि 
अवध्य हौं | दैव ! प्रथ्वीके मीतर हमरे छः पुर हो । प्रमो ! 
हमारे वे छँ पुर सम्पूणं मनोवाञ्छित पदार्थाकी समद्धिते 
सम्पन्न हौ । मगवन्‌ † हम षटपुरमे जाकर युखपूवक 
निवास करें ॥ १७-१८ ॥ 
रुद्रादुघ्रं भयं न स्याद्‌ येन नो क्षायो दताः । 
निहतं तरिपुरं दष्ट भीताः स्म॒ तपसां निधे ॥ १९॥ 
(तपोनिधे ! जिरन्हनि हमरे चन्धु-बन्धर्वोको मार डाल 
हैः उन रदरदेवते दमे उय मय प्राप्न हो; क्योकि तरिपुरोका 
विनाशा देखकर हम भयभीत हो गये हैः | १९॥ 
गतिमह उवाच 
असुरा भवतावध्या देवानां राङ्करस्य च । 
न बराधिप्यथ चेद्‌ विप्रात्‌ सत्पथस्थान्‌ सतत प्रियान्‌ ॥ २०) 
पितामह वोठे--असुरो ! ठम देवतार्थो तथा भगवान्‌ 
रङ्करे ल्म अवध्य हो जाओगे । पर्व॒ ठेस तभी होगाः 
जव तुम सन्मारगप्र सुखिर रहमैवाले सत्पुसषोके परिय मह्र्णो- 
को वाधा नहीं पर्ुचाओगे ॥ ९० ॥ ~ 
विग्रोपघातं मोदाच्चेत्‌ करिष्यथ कथंचन । 
नारा यास्यथ विप्रा हि जगतः परमा गतिः ॥ २१ ॥ 
यदि मोहवश क्रिंसी तरह ब्राह्म्णकी हत्या करोगे तो 
नष्ट हो जाओगे; क्यों ब्राह्यण जगत्‌के परम आध ह ॥ 
नारायणाद्‌ वरिभेतञ्यं कुवद्धिनौह्यणाहितम्‌ । 
स्वेभूतेषु भगवान्‌ दितं घतते जनार्दनः ॥ २२॥ 
तराह्मणोंका अदित करनेवाले पुरषोको मगबान्‌ 


नारायणते डरना चाहिये । करयोकरि मे मगवान्‌ जनादन 

समसत रत प्रति दिति स्खते दै ॥ २२ ॥ 

ते गता असुरा राजन्‌ ब्रह्मणाथ विसर्जिताः । 

येऽपि भक्ता महदेवमसखुय धर्मचारिणः ॥ २३ ॥ 

खयं शि श्चन तेषां ददौ ्िपुरनारनः। 

इवेतं वृषभमासद्य सोमः सप्रवरः प्रभुः । ` ' 

उवाचेदं च भगवानखुरान्‌ स सतां गतिः ॥ २४६ ॥ 
राजन्‌! रेखा कहकर ब्रह्माजीके विदा देनेपर वे अमुर 

चले गये तथा जो दूसरे असुर धर्माचरणमे तत्पर रहरनेवाठे ओर 

महादेवजीके मक्त ये, उन्द त्रि पुरविनाशन मगवान्‌ महादेवजीने 

उमासदित वेत बृषभपर आरूद्‌ होकर अपने पाषंदोके साथ 

आ सख्यं ही दर्शन दिया तथा सत्पुरुषोके आश्रयमूतं उन 

भगवान्‌ शिवने उन असुरेसि इस प्रकार कदा-1 २३-२४॥ 

वैरसुत्खञ्य दम्भं च हिंसां चाञुरसत्तमाः। 

मामेव चध्नितास्तस्माद्‌ चरं साधु ददामि वः ॥ २५॥ 
'असुरशिरोमणियो } तमने वैरः दम्भ ओर साका 

परित्याग करके जो केवर मेरा ही आश्रय लिया है, इसते मेँ 

वम्दारे चि शरेष्ठ वर प्रदान करता दू ॥ २५॥ 

येदीक्षिताः स्थ सुनिभिः सत्नियापरमेदिजञः । 

सद तै्गम्यतां खर्म; प्रीतोऽहं चः सुकर्मणा ॥ २६ ॥ 
“जिन सत्करम॑परायण व्रहषियोने वमद मेरी भक्तिकी 

दक्षा दी दहै, उनके साथ ही तुम सव्र छोग खर्गोकमै चले 

जाओ। मेँ वुम्दारे सत्कर्मसे बहुत प्रसन्न हू | २६ ॥ 

शह ये चैव चत्स्यन्ति तापसा ब्रह्मवादिनः । 

अपि कापित्थिका चक्षे तेषां ऊोको यथा मम ॥ २७ ॥ 
“जो ब्रह्मवादी तापस इस कपित्थ बक्षके पा निवास 

करेणेः वे कापित्थिक कदख्यँगे ओर उर मेरे समान लोक 

प्राप्त होगा ॥ २७ ॥ 

दृह मासान्तपक्चान्तो थः करिष्यति मानवः । 

वानप्रस्थेन विधिना पूजयन्‌ मां तपोधनाः ॥ २८ ॥ 

वषौणां स खहश्चं तु तपसां प्राप्स्यते फलम्‌ । 

कत्वा चरि राधं विधिवछ्प्स्यते चेप्सितां गतिम्‌॥ २९॥ 
"तपोधनो | जो मनुष्य अमावास्या ओर पूणिमाके दिनि 

वानप्रख विधिसे मेप पूजा करता हु यहो निवास करेगा 

वह सदस वषतिक्र तपस्या करनैका फर पा ठेगा तथा विधि- 

प्क तीन राततक निवास करनेसे उपक्र मनोवाञ्छित 

गतिकी प्राति होगी ॥ २८-२९ ॥ 

अकंद्वीपे निवसतो द्विुणे तद्‌ भविष्यति । 

न विदेशे च भद्रं वो बस्मेतद्‌ ददाम्यहम्‌ ॥ ३० ॥ 
'अकंद्रीपमे निवा करनेवकिको उरुते दूना फल 


५४० 


श्रीमहाभारते खिरभागे 


[ ह्वे 


मिलगा । परंतु दुर देशम निवास करनेपर ठम्दारा भटा 
नदीं होगा । यहे वर्मदेरहार्हु॥३०॥ 
दवेतवादननामानं यश्य मां पूजयिष्यति} 
सर्वतो भययित्तोऽपि गति स मम सास्यति ॥ ३१॥ 
धजो श्वेतवाहन नामसे मेरी पूजा करेगा, वह खव ओर्‌ 
से भयमीत-चित्त होनेपर भी मेरी ही गतिको प्राप्त दोगा ॥ 
ओदुम्बयन्‌, चाटमूलान्‌ द्विजान्‌ कापिन्थिकानपि 
तथा खगार्वाखीयान्‌ धमौत्मानो दढव्रतान्‌ ॥ ३२॥ 
सूर्नीश्च नह्यवादीयान्‌ सविशेषेण ये नराः। 
पूजयिष्यन्ति सततं ते याख्यन्तीप्सितां गतिम्‌ ॥३३॥ 
(जो मनुष्य ओदु्बैरः वार्दमूलः; कापिस्विकः खगाल- 


वौरीयः धमत्मा टदनत एवं ब्रह्मवादी मुनिर्योौका स्दा 


चिगरेषरूपसे पूजन करेगे; वे मनोवाच्छित गतिको प्राप्त शेगे"॥ 

शत्युक्त्वाथ महादेवो भगवाज्छ्वेतवा्न्‌ः । 

सैरेव सित, स्व॑ स्द्रलोकं जगाम वै॥३४॥ 
एसा ककर भगवान्‌ ध्वेतवाहन मष्टादेव उन सत्रे 

खाथ रद्रखोकमे चले गये ॥ ३४॥ 

जम्बुमार्म गमिष्यामि जम्दूमागें चसखास्यदम्‌। 

पवं संकट्पमानोऽपि रुद्रलोके महीयते ॥ ६५॥ 
धम जम्बू-मार्गको जार्जँगा; यँ जम्बूःमा्गपर निवा 


करतगाः दस तरद्‌ मनम संक करनेवादय मनुष्य भी सद्ररोकमे , 


प्रतिष्ठित होता दै ॥ ३५ ॥ 


दति श्रीमष्टाभारते खिरुभागे हरिवंशे विप्णुपर्वणि पट पुरवधे द्वयक्षीतितमोऽध्यायः ॥ ८२ ॥ 
शस प्रकार श्रीमहाभारते खिरुभाग इसिवक्षके अन्तर्मत विष्णुपवमे षट पुखधव्रिषयफ ययासीवे( भघ्याय पुरा हुमा ॥ ८२ ॥ 


त्यरीतितमोऽध्यायः 
ब्रह्मदत्ते यज्ञम वसुदेव-देवकीका आगमन, देत्योहरारा व्रहमदत्तकी कन्यार्भोका अपहरण ओर 
र्ुम्नद्वार उनकी रका, नारदजीके कहनेसे दैत्योका भूत्रियनरेशोकफो अपने 
पक्षे मिलाना तथा श्रीकृष्णका पटपुरमं आगमन 


वैशम्पायनं उवाच 

पतसिन्नेव के तु चतुर्वेदपडज्ञवित्‌। 
ब्राह्मणो याक्षव्क्यस्य रिष्यो धर्मगुणान्वितः ॥ १ ॥ 
घह्मदत्तेति धिख्यातो विप्रो वाज्ञसनेयिवान्‌ 1 
अद्वमेघः ऊृतस्तेन वसुदेवस्य धीमतः ॥ २ ॥ 
ख संबरछ्स्दीक्तायां दीक्षितः पदु पुसखयः। 
आवतौयाः शुभे तीरे सखुनया सुनिजुण्या ॥ ३ ॥ 

वैदास्पायनजगी कते है- जनमेजय | इसी समय 
चारो वेदौ ओर छदो अज्ञो शाता एक व्राह्मणः जिनका नाम 
ब्रहमदेत्त था; एक वर्पतक चाद रहनेवाठे यज्ञकी दीनम दीक्षित 
हए । ब्रह्मदत्त या्ञवस्क्यके शिष्य, पर्मसम्बन्धी युणेि 
सम्पन्न तथा शुक्छ यजुर्वेद--बाजसनेय संदिताके अध्येता ये 1 
उनका घरमी ष्र्‌ पुरम ही था। उर्दि कमी बुद्धिमान्‌ 
वसुदेवजीक्रा अद्वमेध यश्च कराया था ! वे मुनिसेवितं श्रेष्ठ 
नदी आवतर पवित्र तटपर यज करते थे ॥ १-३ ॥ 
सखा च वसुदेवस्य सहाध्यायी द्िजोत्तमः। 
उपाध्यायश्च कौरव्य श्चीरदोता महात्मनः ॥ ४ ॥ 


करुरनन्दन | दिजश्रेठ ब्रह्मदत्त महात्प्रा वदुदेवजीके ` 


सदपाठी, चखा, उपाध्यायं ओर अध्वयुं भी ये ॥ ४॥ 


चस्ुदेवस्त्न यातो देवक्या सहितः प्रभो । 
यजमानं पट्‌ पुरस्थं यथा शक्रो बृहस्पतिम्‌ ॥ ५ ॥ 
प्रमो | इसीख्यि जैसे इन्दर बृदस्पतिके य्ह जाते है 
उशी प्रकार देवकीसदित बञुदेवजी वरद षर्‌ पुरम रहकर यर 
करनेवाले ब्रह्मदत्ते य्ह निमन्वित होकर गये ये ॥ ५॥ 
तत्‌ स्रं ब्रह्मदत्तस्य वहन्नं वहुदक्षिणम्‌ । 
उपाखन्ति भुनिधेष्ठा महात्मानो दढवताः॥ ६ ॥ 
व्र्मदत्तकरा वह यज्ञ वहुत-से अन्न ओर्‌ प्रचुर दक्षिणासे 
सम्पन्न था | दृदतापूर्वंक उत्तम व्रता पालन करनेवाठे 
मुनिश्रेष्ठ महात्मा उस यज्नका सेवन करते थे ॥ ६ ॥ 
व्यासो ऽहं याक्षवस्क्यश्च सुमन्तु्जेमिनिस्तथा 1 
धतिमाञ्ावलिद्चैव देवलाद्याश्च भारत ॥ ७ ॥ 
द्धःयासुरूपया युक्तं वसुदेवस्य चीमतः। 
यत्रेपसितान्‌ ददौ कामान्‌ देवकी घमेचारिणी ॥ ८ ॥ 
वासुदरेवप्रभवेण जगत्खष्टुमेदीतले । 


१. उदुम्बर ( गूर ) वृश्वक्रा आश्रय ठेकर रदनेवले मुलिकी भीदुम्वर संशा दै । २. वयवृश्चकी ज्म निवासत कनेषारोकर 


वाटमूह कदा गया है 1 ३. 
करनेवाठेको सगाखब्राटीय का गया ई 1 


कपित्य दृश्वका आश्रय लेनेवाछे कापित्थिक्‌ कहलाते द । ४. खगार नामक ईकत्री वाटिकामे बास 


विष्णुपर्व ] 


अयद्ीतितमो इध्वायः 


५४१ 


--------------------------------~------------- ऋः = 


भरतनन्दन ! वह यन्न बुद्धिमान्‌ वघुदेवजीकी अनुरूप 
समृद्धिते युक्त था । उसमे मैः मेरे गुर व्यासजीः याशवस्क्य 
मुनि, सुमन्तः जमिनिः पै्रीर जावलि ( या जावालि ) 
तथा देवर आदि महिं मी उपचित थे । उस यमे धर्म- 
परायणा देवकी देवी जगतखष्टा भगवान्‌ वासुदेवके 
प्रभावसे इस पृथ्वीपर सबको मनोबाञ्छित पदार्थं दान 
करती यी ॥ ७.८९ ॥ 


ठस्मिन. सत्रे वर्तमाने दैत्याः षट्‌ पुरवासिनः ॥ ९ ॥ 
निक्कम्भाचाः समागम्य तसूचुवरदर्पिताः। 

जवर वह्‌ यज्ञ चलने लगा उस समय षट्‌ पुमे रहनेवाठे 
निकुम्भ आदि दैत्य, जो वर पाकर घमंडमे भरे रहते ये 
वरहो आकर ब्रह्मदत्तसे वोठे-॥ ९४. ॥ 


कार्यतां यक्ञभागो नः सोमं पास्यामहे वयम्‌ । 
कन्याश्च ब्रह्मदत्तो नो यजमानः प्रयच्छतु ॥ १०॥ 

ष्टमारे स्यि भी यक्षका भाग निकाला जाय, हमलोग 
इस यजय सोमरसका पान करेगे । यजमान व्रह्मदत्त दमे 
अपनी कन्ये दँ ॥ १०॥ 


यद्वयः सन्त्यस्य कन्याश्च रूपवत्यो महात्मनः । 
आहूय ताः प्रदातव्याः सर्वथैव हि नः श्रुतम्‌ ॥ ११॥ 
रत्नानि च बहयदत्तो विशिष्टानि ददातु नः । 
अन्यथा तु न यश्टव्यं वयमाक्षापयामदे ॥ १२॥ 
ष्टमने सुना है क्रि इन महत्माके बहुत-सी रूपवती 
कन्या ह । उन सवको बुखार सब्र परकारसे हमारे ल्ि दान 
कर देना चाहिये । ब्रह्मदत्तनी हमे उत्तमोत्तम रत्त प्रदान 
करं । ( तमी ये यहो यज्ञ कर सकते हँ ) अन्यथा इन्द यज्ञ 
नहीं करना चाहिये । यह हम आला देते दै ॥ ९१-१२॥ 
पतच्छ्ुत्वा बह्यदतच्चस्तादुवाच महासुरान्‌ । 
यक्ञभागो न विहितः षुराणेऽखुरसत्तमाः ॥ १३ ॥ 
कथं सत्रे सोमपानं शक्यं दातुं मया हि वः। 
पृच्छतेह सुनिशवेषठान्‌ वेदभाष्याथकोविद्‌ान्‌ ॥ १४॥ 
यह सुनकर ब्रह्मदत्ते उन व्दे-वडे अपुरौसे कहा- 
'असुरगििरोमणियो ! पुरातन वेदमे असुरो चयि यज्ञमाग 
देनेका विधान नीं है; फिर मँ यक्ञमे आपलो्गोको सोमरस 
केसे दे सकेता हूं १ यहो बेदके विस्तृत अर्को जाननेवाठे 
रेष्ठ सुनि वेठे हैः इनसे पूछ रीज्यि ॥ १२-१४ ॥ 
कन्या हि मम यादेयास्ताश्च संकल्पिता मया । 
अन्तवैयां प्रदातव्याः सदश्ानामसंश्षयम्‌ ॥ १५ ॥ 
'ुन्ने अपनी जिन कन्याओका दान करना था, उनका 
मानसिक संकल्प ने कर दिया (वे दूसर्ँको दी जा चुकी 
ह) अवर उन्द अन्तरवैदीमे योग्य वरे दाथमे सोप देना 
है । इम संशय नदीं ३॥ १५॥ 


५ 


रलानि त॒ प्रयच्छामि सान्त्वेनाहं विचिन्त्यताम्‌ 
चखान्नेव प्रदास्यामि . देवकीपु्रमाधितः ॥ १६॥ 
प्यव रषौ रनौकी बात, उन्दे मै आपलोगोको तमी 
दगा, जव आप सान्त्वनापूवंक वात करे” इस बातको आप, 
अच्छी तरह सोच.समश्च ठे । वल्ूर्वक मोगनेपर मँ कुछ 
नही दगा; क्योकि भगवान्‌ देवकीनन्दनकी शरण के चुका 
ह(वेदयीमेरी रक्षा करेगे )'॥ १६॥ 
निङ्कम्भायास्तु रूषिताः पापाः षट्‌ पुरवासिनः। 
यक्षवारं निलुलुडजंहुः कन्याश्च तास्तथा ४ १७॥ 


यद उत्तर सुनकर षट्‌ पुरमे निवास करनेवाले निकुम्भ, 
आदि पापी असुर रोषमे भर गये । उन्दने यक्ञमण्डपको 
तदस्त-नहस कर दिया ओर ब्रह्मदत्तकी कन्याओंको हर च्या ॥ 
तद्‌ दष्टा सम्भदृत्तं तु द्ध्यावानकदुन्दुभिः। 
वासुदेवं महात्मानं बरूभद्रं गदं तथा ॥ १८॥ 
यज्ञमण्डपे वह दटूट मची हई देख वसुदेवने महात्मा 
श्रीकृष्ण, चल्देव ओर गदका चिन्तन किया ॥ १८ ॥ 
विदितार्थस्ततः कृष्णः प्रुम्नमिदसत्रचीत्‌ । 
गच्छ कल्यापरिजाणं कुर पुव्राद्यु मायया ॥ १९ ॥ 
यावद्‌ याद्वसेन्येन षट्‌ पुरं याम्यहं प्रभो । 
श्रीकृम्णको तो सव ब्रात ज्ञात दी थी । उन्दने प्रदुम्नसे 
कहा---धवेा | जाओ ओर मायाद्वारा ब्रह्मदत्तकी कन्यार्जकी 
शीघ्र रक्षा कसे । प्रभो | तवतक भ यादव वीररोकी सेनाके 
साथ ट्‌ पुरको चर रहा ह" ॥ १९३ ॥ 
स ययौ प्‌ पुरं वीरः पितुरा्षाकरस्तवा ॥ २० ॥ 
निमेषान्तस्माचेण गत्वा कामो महाबलः । 
कन्यास्ता मायया धघीमानपजहे महाबलः ॥ २१ ॥ 
महाबली कामखवरूप वीर प्रद्युम्न पिताकी आज्ञाक्षा पालन 
करनेवाले थे । वे तत्का पर्‌ पुरकी ओर चल दिये ओौर 
पलक मारते-मारते वर्ह पर्हुचकर उन महाबली बुद्धिमान्‌ वीरने 
उन कन्याओंका मायाद्रारा अपहरण कर ल्या ॥ २०-२९॥ 
मायामयीश्च छृत्वाऽन्यान्यस्तवान्‌ रक्मिणीसुतः । 
मा अरिति च ` धमौत्मा देवकीसुक्तवांस्तद! ॥ २२॥ 
सव्िमणीनन्दन प्रद्युम्नने मायामयी दूसरी कन्याओका 
निर्माण करके उन्दं असुरो पाष छोड़ दिया था | फिर उन 
धमात्माने अपनी पितामही देवकीते कदा--'दादीजी ! आप 
भय न करः ॥ २२॥ 
मायामयीस्ततो हत्वा खता ह्यस्य दुरासदाः । 
पट्‌ पुरं विविश्याः परितुष्टा नराधिप ॥ २२॥ 
नरेशर ! बर्द्तकी पुर्यो दैत्य व्यि दुष्प्राप थीं । 
वे मायामयी कन्याओंका ही अपहरण करके षटपुरम जा 
घते ओर अपनी सुफठतापर संद्षट हए ॥ २२॥ 


५७२. 


कर्म॑ चाखार्यते तत्र विधिषष्टेन कर्म॑णा। 

यद्‌ विरिष्टं चडुशुणं तदभूश्च नराधिप ॥ २४॥ 
राजन्‌ { इधर शासनीय विधिकरे अनु्ार वर्धो यततकर्मका 

सम्पादन होने ख्गा | जो विरिष्ट एवं ब्रहुरण सम्यन्न कायं 

थाः वह सव सम्पन्नं दुला ॥ २४ ॥ 

पतस्मिचनन्तरे प्राप्ता जानस्तत्न भारत) 

सथे निमन्निताः पूर्वं बह्यदचेन घीमता ॥ २५॥ 
भारत [ दी वीचमे वर्ह ब्रहते राजा आये, जिन 

वुद्धिमान्‌ ब्रह्मदत्ते पदटेते ही यर्म पधारनेके स्यि निमन्त्रण 

देराथा॥ २५॥ 

जयसंधो दन्तवक्नः शिद्युपलस्तथेव च । 

पाण्डवा धतैराषट्रश्च माखवाः सगणास्तथा ॥ २६॥ 

रुक्मी चेवाद्वतिद्चेव नीरो वा धर्म एव च ] 

विन्दाचुषिन्दवाधन्त्यौ शद्यः श्चङ्कनिरेव च ॥ २७॥ 

राजनश्चापरे बीस महत्मनो ददायुधाः 

आवात्तित। नातिदूरे षटु पुरस्य च भार ॥ २८ ॥ 
जरासंधः दन्तवक्त्र, शिशुपाल, पाण्डवः धृतरष्टरफे समी 

पुत्र; अपने गर्णेषदहित माल्वनरेदा; स्क्मीः आदवृत्िः 

नील, धर्म, अवन्तीके विन्द ओर अतुचिन्दः शल्य, यकुनि 

दूसरे वीर नरेशः सुद्द्‌ आयुध धारण क्